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Saturday, November 23, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | जे जज़्बा जारी राखने जौं लौं ‘भारत रत्न’ ने मिले | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
जे जज़्बा जारी राखने जौं लौं ‘भारत रत्न’ ने मिले
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        हमाए बड़े जब हमाए लाने कछू करत हैं, सो बे जे नई सोचत के ऊके बदले उनको कछू मिले। बे तो बस जेई चात आएं के उनके परिवार वारन खों सबकछू मिले औ बे अच्छी जिनगी जिएं। अपने गौर बब्बा मने डॉ हरीसिंह गौर जू ने बी जेई सोची औ इते विश्वविद्यालय खुलवा दओ। बे चात्ते के जोन बिचारे बाहरे जा के आगे की पढ़ाई नईं पढ़ सकत, उन सबई खों इतई सागर मे औ ऊंची पढ़ाई पढ़बे खों मिले। उन्ने नओ-नओ बिषय इते लाओ। एक बिषय रओ एप्लाइड जियोलॉजी, जोन के लाने बे प्रो. डब्ल्यू डी. वेस्ट खों लंदन से इते ल्याये। उन्ने विशवविद्यालय अपने नांव नहीं करो बल्कि अपनी जायदाद विश्वविद्यालय बनाबे के लाने दे दई। आज के जमाना में कोऊ के लाने इत्तो को आ सोच रओ? उन्ने जो करो बिना स्वारथ के करो। जो कछू स्वारथ हतो तो मनो इत्तो सो के इते के लोग कछू अच्छे से पढ़-जाएं।
      मनो इते अपन ओरन ने का करो के अबे लौं उने “भारत रत्न” ने दिला पाए। जबके उन्ने अपन ओरन के लाने अपनो सब कछू दे दओ। औ अपन ओरें “भारत रत्न” के नांव पे बर्रयात रये। चलो, जो अलाली भई, सो भई! मनो अबकी बेर जो अपन ओरें मांग कर रये, बा तब लौं ने रुके जब लौं अपने गौर बब्बा के लाने “भारत रत्न” की घोषणा ने कर दई जाए। जे नईं होए कि जनम को उत्सव खतम भओ औ सो गए पल्ली ओढ़ के। मने का समझे, के जे जज़्बा जारी राखने जौं लौं ‘भारत रत्न’ ने मिले, अपन खों चुप नईं बैठने औ अपने गौर बब्बा के लाने ‘भारत रत्न’ ले के रैने।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, September 1, 2023

शहर का मुद्दा | काए भारत रत्न कबे दे रए? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका

मित्रो, आज राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण "पत्रिका" में... बुंदेली में... मेरा लेख...
हार्दिक धन्यवाद पत्रिका🙏
🚩बुंदेली बोली को पत्रिका में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार संपादकीय प्रभारी श्री ब्रजेश कुमार तिवारी जी 🙏
एवं हार्दिक आभार श्रीमती रेशु जैन जी 🙏
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शहर का मुद्दा
काए भारत रत्न कबे दे रए?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"काए भैया, सो गए पल्ली ओढ़ के?" जेई पूछबे को जी कर रओ। काए से के अपने इते की रीत निराली जो ठैरी। अब देख लेओ! जो हमाई कई झूठी लगे सो कइयो। जैसई पता परी के बे आबे वारे आएं, सो, मुतके ठाड़े हो गए मांगबे के लाने के हमाए गौर बब्बा खों "भारत रत्न" दओ जाए। काए से के सबई जनों खों लग रओ हतो के ई बेरा बे घोषणा कर के जेहैं। बाकी मांगबे वारों में हम सोई शामिल हते। हमने सोई मांग करी हती। पर आपई सोचों के मंगता हरों की कोन सुनत आए।  जो हमाए दुआरे कोनऊं हट्टो-कट्टो मुस्टंडा घांई मंगता आ जात आए, सो हम ऊसे जेई कैत आएं के "हट्टा-कट्टा दिखा रए औ मंगता बन फिर रए। कछू काम किया करे!"
  ने तो जे कै देत आएं के "चलो आगे बढ़ लेओ! तुमाए लाने इते कछू ने मिलहे!"
   मनो, कैबे को मतलब जे के ऐसे मंगता घांई घिघियात रैबे से कुतका कछू ने मिलहे। तनक दूसरी जांगा के लोगन खों देखो, जो चुनाव को टेम नजदीक आन लगत, सो सबरे ठन्ना-मन्ना से ठाड़े हो जात आएं के 'हमें जो चाउने, हमें बो चाउने'। मनो अपने इते का है के तनक सो दोंदरा दओ औ फेर मनो पल्ली ओढ़ के सो गए। 
    अरे भैया हरों ! पल्ली से निकरो औ दम लगा के पूछो के काए हमाए बब्बा जू खों 'भारत रत्न' कबे दे रए? अगली चुनाव में वोटें चाउने के नईं? काए से के रोए-चिंचियाए बिगैर तो अम्मा लो दूध नईं पियात। काए भैया, हमाई कई समझ में आई के नईं?
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01.09.2023
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Wednesday, August 9, 2023

चर्चा प्लस | डाॅ. हरीसिंह गौर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने में और कितनी प्रतीक्षा? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
 डाॅ. हरीसिंह गौर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने में और कितनी प्रतीक्षा?         
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
     सामान्य परिवार में जन्मे एक महान शिक्षाविद् जिन्होंने स्वयं तो उच्चशिक्षा पाई ही वरन् शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए बुंदेलखंड को एक अनूठा उच्चशिक्षा केन्द्र दिया जिसकी स्थापना सागर विश्वविद्यालय के नाम से हुई और आज यह विश्वविद्यालय पूरी दुनिया में उन्हीं के नाम से अर्थात् डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के नाम से विख्यात है। यह अनूठा इसलिए है कि इसकी स्थापना के लिए इसके संस्थापक डाॅ. हरीसिंह गौर ने अपनी संपत्ति दान कर दी थी। ऐसे महामानव के प्रति जनदायित्व यही है कि उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान मिले। इस विषय पर जनता की ओर से हमेशा मांग उठती रही है किन्तु राजनीतिक इच्छाशक्ति की शिथिलता ने इसे पूरा नहीं होने दिया। अब जननेताओं को चाहिए कि वे अपनी शिथिलता के इस दाग को धो दें और इस दीर्घ प्रतीक्षा का अंत करें।
डाॅ. हरीसिंह गौर का कद इतना बड़ा है कि उसके सामने कोई भी सम्मान बहुत छोटा है। उन्होंने शिक्षा जगत के लिए और शैक्षिक दृष्टि से देश के बहुत पिछड़े तथा उपेक्षित क्षेत्र बुंदेलखंड के लिए एक सुंदर भविष्य का निर्माण किया। जब लोग ‘सात पीढ़ियों के लिए’ धन संचय की बात करते थे, तब डाॅ. हरीसिंह गौर ने अपना कमाया हुआ धन और संपत्ति बिना किसी झिझक के एक ऐसे शिक्षा केन्द्र की स्थापना के लिए निछावर कर दी जहां युवा अपना भविष्य संवार सकें। इससे पूर्व उच्चशिक्षा पाने के लिए क्षेत्र के युवाओं को आगरा विश्वविद्यालय अथवा अन्य दूरस्थ विश्वविद्यालयों में जाना पड़ता था। आर्थिकरूप से कमजोर इस क्षेत्र के सभी युवाओं के लिए यह संभव नहीं था। अतः उच्चशिक्षा पाना उनके लिए कभी पूरा न हो पाने वाले एक सपने के समान था। इस पीड़ा को महसूस किया डाॅ. हरीसिंह गौर ने और उन्होंने सागर में विश्वविद्यालय खोलने के लिए न केवल सरकार के पास प्रस्ताव भेजा किया, असहमति की स्थिति बनती देख कर, आर्थिक सहयोग के रूप में अपनी तमाम संपत्ति विश्वविद्यालय के लिए दान कर दी। जबकि उनका अपना परिवार था, अपनी जिम्मेदारियां थीं, फिर भी उन्होंने उच्चशिक्षा केन्द्र को प्राथमिकता दी। अपने परिवार के सुखों में कटौती कर के हजारों परिवारों में उच्चशिक्षा की ज्योति जला दी। ऐसे महामानव को वर्षों पूर्व ‘‘भारत रत्न’’ से सम्मानित कर दिया जाना चाहिए था, किन्तु इस मुद्दे को लेकर वह राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं बन सकी जो इस मांग को पूरी करा पाती।
यह कहते हुए हिचक होती है किन्तु सच को भला कब तक मन में दबाए रखा जा सकता है? सागर में राजनीतिक नेतृत्व की कभी कमी नहीं रही किन्तु प्राथमिकताएं पिछड़ती गईं। यदि गिनाने बैठा जाए तो अनेक ऐसे मुद्दे हैं जो कछुआचाल की गिरफ़त में हैं। सागर एक अत्यंत संभावनाशील क्षेत्र हैं किन्तु यहां कोई बड़ा उद्योग नहीं है। सदियों से बीड़ी बना कर यहां परिवार के परिवार अपना पेट पालते रहे हैं। विस्तृत वनक्षेत्र होते हुए भी वनोपज का भरपूर लाभ नहीं मिल पाया। सागर आज भी वायुमार्ग के नक्शे पर नहीं आ सका है। यहां तक कि हर बजट सत्र में अपनी झोली में एकाध और रेलगाड़ी आने की बाट जोहता एक भिक्षुक की भांति खड़ा रहता है। बात अगर रेलवे की ही करें तो हद तो ये है कि सागर की अंग्रेजी में स्पेलिंग को ले कर वर्षों मांग करने के बाद मांग मानी गई कि सागर को अंग्रेजी में भी ‘‘सागर’’ ही लिखा जाए ‘‘सागोर’’ नहीं। फिर भी आज तक सागर रेलवे स्टेशन पर ‘‘सागोर’’ स्पेलिंग ही चमचमा रही है। ऐसी धीमी गति अथवा प्राथमिकताओं की अनदेखी के माहौल में एक बार फिर जनमत बन रहा है कि डाॅ. हरीसिंह गौर को ‘‘भारत रत्न’’ दिया जाए। जनता एक बार फिर अपनी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर रही है, अब देखना यह है कि यहां की राजनीतिक शक्ति इस इच्छाशक्ति का कितना साथ देती है। यह वही जनता है जो राजनेताओं को अपना वोट दे कर उन्हें राजनीतिक अधिकार दिलाती है। ये वही जनता है जिसके दरवाजे हर पांच साल में वोट मांगते हुए राजनेता खड़े दिखाई देते हैं। डाॅ. हरीसिंह गौर को ‘‘भारत रत्न’’ दिए जाने की मांग जनता की निजी स्वार्थ की मांग नहीं है। वह इस मांग को पूरी करा कर डाॅ. हरीसिंह गौर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करना चाहती है। इससे क्षेत्र का गौरव बढ़ेगा। साथ ही उन सभी का गौरव बढ़ेगा जो इस क्षेत्र के नहीं हैं किन्तु देश-दुनिया के कोने-कोने से यहां आ कर शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। सभी के लिए एक आदर्श हैं डाॅ. हरीसिंह गौर।
आज हम गर्व से नाम गिनाते हैं कि आध्यात्मिक गुरु आचार्य रजनीश, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन, फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा, बालीवुड अभिनेता मुकेश तिवारी, आशुतोष राणा, गोविंद नामदेव आदि इस विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके हैं। इस विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग तथा अपराधशास्त्र विभाग के अनेक छात्र देश-दुनिया के महत्वपूर्ण स्थानों में कार्यरत हैं। यहां का योग विभाग ख्यातिलब्ध है। प्रदर्शनकला विभाग ने तो हमेशा ही देश-विदेश के मंचों पर इस विश्वविद्यालय का नाम रोशन किया है। इन विभागों के छात्र आज दूसरे प्रदेशों तथा दूसरे देशों में बस गए हैं किन्तु उनका अतीत विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ है। उन्हें भी तो गर्व करने का अवसर मिलना चाहिए कि वे ऐसे संस्थापक के विश्वविद्यालय में अध्ययन कर चुके हैं जिन्हें ‘‘भारत रत्न’’ से सम्मानित किया गया है। उल्लेखनीय है कि मैंने भी एक एम.ए. और पीएच. डी. इसी विश्वविद्यालय से की है।

डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय की इन्टरनेट साईट पर ‘‘हमारे संस्थापक’’ के अंतर्गत डाॅ. हरीसिंह गौर का जो जीवनपरिचय दिया गया है, उसके आधार पर मैं यहां कुछ जानकारी साझा कर रही हूं- सागर (म.प्र.) के शनीचरी टौरी वार्ड में 26 नवम्बर 1870 को हरिसिंह गौर का जन्म हुआ था। इनके पितामह का नाम मानसिंह था पर रंग-रूप की वजह से लोग भूरासिंह कहते थे। ये अवध प्रांत से गढपहरा आए और सागर में बस गए। हरीसिंह का बचपन का नाम हर प्रसाद सिंह गौर था। पिता पुलिस की नौकरी छोड़ बड़े भाई आधार सिंह के साथ जबलपुर में रहने लगे, अतः मां की छात्रछाया में हरीसिंह ने अपनी आरम्भिक शिक्षा पूर्ण की। बचपन से ही वे कुशाग्र बुद्धि के थे। प्रायमरी के पश्चात आठवीं तक की पढ़ाई इन्होने दो वर्ष में ही समाप्त की और स्कूल के ‘प्राइड ब्वॉय’ कहलाने लगे। सरकार ने 2रू मासिक छात्र वृत्ति स्वीकार की। मिडिल परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की और सरकारी छात्रवृत्ति पर शासकीय हाई स्कूल जबलपुर गये। एक उलझन भरी घटना के कारण वे ठीक से पढ़ाई नहीं कर सके और मेट्रिक की परीक्षा में फेल हो गये। जिससे छात्रवृत्ति बंद हो गई। उन्हें सागर वापस आना पड़ा। सागर में नौकरी की तलाश में 2 साल तक भटकते रहे। अंत में लोक कर्म विभाग के इन्जीनियर ने उन्हें 10 रू.मासिक और इनके मेट्रिक पास साथी को 20रू. मासिक तनख्वाह पर कुलियों के ऊपर मेटगिरी के लिये कहा, पर उन्होंने समान तनख्वाह देने के लिये आग्रह किया। इनके साथी ने तो नौकरी कर ली पर ये पक्षपात पूर्ण रवैय से नौकरी करने को तैयार नही हुए। कुछ समय पश्चात 20 रू. माहवार तनख्वाह पर मेस क्लर्क की नौकरी मिली एक माह तक प्रतिदिन सुबह से अधीरात तक इन्हें कार्य करना पड़ा जिसकी वजह से वे बीमार पड़ गये और उस नौकरी से हाथ धोना पड़ा। घर का खर्च कठिनता से चलते देख जेब की कुल जमा पूंजी 10 रू. लेकर रोजी रोटी कमाने के ध्येय से वे घर से निकल पड़े। भाई उस समय ज्यूडिशियल कमिश्नर कोर्ट नागपुर में डिप्टी रजिस्ट्रार थे। हरीसिंह उनके पास पहुंचे और कोई कार्य करने की इच्छा व्यक्त की। भाई ने पहले मेट्रिक पास करने को प्रोत्साहित किया। ये मेट्रिक की परीक्षा में बैठे और न केवल प्रथम श्रेणी में बल्कि प्रान्त भर में सर्वश्रेष्ठ रहे। इन्हें 50 रू. नगद इनाम एक चांदी की घड़ी तथा 20 रू. की छात्रवृत्ति दी गई। यहां से भाग्य ने एक बार फिर करवट ली। गणित उनका प्रिय विषय था। जिसके लिये एक विशेष उपहार मिला। आगे की शिक्षा के लिये फ्री चर्च इन्साटिट्यूशन में (हिसलप कालेज) में दाखिला लिया। हरीसिंह अंग्रेजी और इतिहास में ऑनर्स करने वाले उस काॅलेज के एकमात्र छात्र थे।
इनके भाई आधारसिंह ने अपने पुत्र मुरली मनोहर सिंह की देखरेख एवं बैरिस्ट्री की शिक्षा के लिये हरीसिंह को केब्रिज भेजा। बाल्यावस्था में अर्थाभाव की परिस्थितियों ने इन्हें अनुभवी एवं लगनशील छात्र बना दिया था और समस्त परीक्षाओं को कम से कम समय में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण होने की आवश्यकता को उन्होंने अपने जीववन में उतार लिया था। भाई से एक निर्धारित रकम उन्हें प्राप्त होती थी।
हरीसिंह के केम्ब्रिज जीवन में उनकी साहित्यिक प्रतिभा विकसित हुई। केम्ब्रिज में बी.ए.उपाधि महत्वपूर्ण मानी जाती है। 1891 में उन्होंने दर्शन और अर्थ शास्त्र में ऑनर्स की उपाधि ली ओर 1892 में कानून की उपाधि अर्जित की। बाद में 1905 में डी. लिट. की पहली डिग्री लंदन विश्वविद्यालय से और फिर ट्रिनिटी कालेज डब्लिन से प्राप्त की। केम्ब्रिज के वातावरण में श्री गौर की साहित्यक प्रतिमा तत्कालीन कवियों और लेखकों के सम्पर्क में आने से और बढ़ी। 1892 में बैरिस्टरी का प्रमाण पत्र लेने के बाद व भारत लौट आये। अपने बडे भाई श्री आधारसिंह से होशंगाबाद से मिलकर वे सीधे जबलपुर में सेन्ट्रल प्राविंस के चीफ कमिश्नर श्री एन्टोनी मेकडॉनल से मिले जिन्होंने केम्ब्रिज के तीन साल के सभी कार्यों के प्रमाण-पत्र एवं साहितयक प्रतिमा और शैक्षणिक उपधियों से प्रभावित होकर एक ई.ए.सी. को लम्बे अवकाश की छुट्टी देकर श्री गौर को भंडार में ई.ए.सी. नियुक्त किया। पहले स्थानीय न्यायालय और राजस्व अधिकारी का पद एवं कार्य उन्हें सौंपा गया। उस समय लगभग 300 उलझे मुकदमें इनके सामने थे, जिन्हें उन्होने एक वर्ष के भीतर ही निबटा दिया। उनकी कार्यप्रणाली और कानूनी योग्यता की सराहना शासकीय प्रतिवेदन में की गई और ये योग्य तथा कुशल प्रशासक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसके बाद उन्होंने वकालत को अपनाया। अपूर्व बुद्धि के धनी श्री हरीसिंह गौर ने रायपुर, नागपुर, कलकत्ता, लाहौर, रंगून आदि नगरों में वकालत की। द्वितीय विश्व युद्ध के समय उन्होंने 04 साल इंगलैंड की प्रीवी कौंसिल में भी वकालत की। मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय पं. रविशंकर शुक्ल इनके समकालीन थे और रायपुर में वकालत करते थे। सन 1902 में लॉ ऑफ ट्रान्सफर ऑफ प्रापर्टी एक्ट नामक पुस्तक प्रकाशित की। सन 1909 में उनकी भारतीय दंड संहिता की तुलनात्मक विवेचना पुस्तक प्रकाशित हुई जो 3,000 पृष्ठों के दो भागों में विभाजित थी। अंग्रेजी भाषा में इस विषय पर इतने विविध तुलनात्मक दृष्टिकोण से लिखी गई यह सर्वप्रथम पुस्तक आज भी प्रमाणिक मानी जाती है।
डॉ. हरीसिंह गौर ने इम्पीरियल कौंसिल की सीट के लिए दो बार चुनाव लड़ा पर असफल रहे। 1919 में कौंसिल के स्थान पर विधान परिषद की रचना हई। विधान परिषद की सदस्यता के लिए तीसरी बार अपने एकमात्र प्रतिद्वन्दी के नामांकन पत्र में गलती निकाल उसे खारिज करवा के विधान परिषद में निर्वाचित हुए। परिषद में सन् 1920 से लेकर 1935 तक सदस्य रहे। यहां उनका व्यक्तित्व विधि निर्माता के रूप में प्रगट हुआ। उन्होंने कई बिल परिषद में पेश किये जो कानून बने। नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में मतभेद होने से उन्होंने कांग्रेस दल की सदस्यता छोड़ दी। उस समय तक भारत में स्टाम्प और टिकिट इंग्लैंण्ड से छपकर आते थे। उन्होंने एक योजना बनाकर परिषद में पेश की। फलस्वरूप नासिक में एक फैक्ट्री बनाई गई जिसमें समस्त स्टाम्प और टिकिट छापे जाने गले। सन् 1923 के अधिनियम 30 का प्रारूप बनाकर उसे पास करवाया जिसके अनुसार हिन्दू, सिख जैन, बौद्ध संप्रदायों में अन्तर्जातीय विवाह सम्भव हो सका और ऐसे विवाहितों का पैतृक संपत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने का प्रावधान बना। हरीसिंह गौर ने हिन्दी समाज की विभिन्न संस्थाओं को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से एक बिल ‘‘हिन्दु रिलीजियस एण्ड चेरिटेबिल ट्रस्ट’’ स्वीकृत कराया। भारतीय महिलाओं को वकालत करने का अधिकार देने का प्रस्ताव भी उनके प्रयासों से पारित हुआ। ‘‘चिल्ड्रन प्रोटेक्शन एक्ट’’ भी इन्हीं के द्वारा कानून बना। सन् 1946 को भारतीय संविधान सभा का गठन हुआ इसके डॉ. गौर एक प्रमुख सदस्य थे। भारतीय संविधान के निर्माण में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। रायपुर जिला परिषद के वे दस साल तक सचिव रहे।
सन् 1921 में केन्द्रीय सरकार ने दिल्ली में विश्वविद्यालय की स्थापना हुई एवं डॉ. हरीसिंह गौर प्रथम कुलपति नियुक्त हुए और 1924 तक इस पद पर आसीन रहे। इस विश्वविद्यालय की प्रारंभिक प्रगति का इतिहास डॉ. गौर की शैक्षणिक प्रतिमा एवं प्रशासनिक अनुभव बताता है। इसके पश्चात डॉ. हरीसिंह गौर नागपुर विश्वविद्यालय में दो बार सन 1928 और 1936 में कुलपति पद पर नियुक्त हुए एवं इंग्लैण्ड में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत 27 विश्वविद्यालयों का 25 दिवसीय सम्मेलन भी डॉ. गौर की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति पर इंग्लैण्ड से भारत आने पर डॉ. गौर ने सागर के प्रमुख नागरिकों के संपर्क किया और सागर में विश्वविद्यालय की स्थापना की रूपरेखा उनके सम्मुख प्रस्तुति की। मध्य प्रदेश सरकार के विश्वविद्यालय को जबलपुर में स्थापित करने का सुझाव को ठुकरा कर डॉ. गौर ने बिना किसी शासकीय सहायता के जुलाई 1946 में सागर विश्वविद्यालय का कार्यक्रम करवाया और डॉ. हरीसिंह गौर सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति बने। 25 नवम्बर 1946 को प्रांतीय शासन ने सागर विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया।
डाॅ. हरीसिंह गौर का परिचय अत्यंत विस्तृत है। यहां अतिसंक्षेप में ही प्रस्तुत किया जा सका है। अब विचारणीय है कि एक ऐसा व्यक्ति जो आर्थिक संकटों से जूझते हुए आगे बढ़ा, असफलताओं से नहीं घबराया और अपनी प्रतिभा को साबित करते हुए युवाओं को उच्चशिक्षा का केन्द्र प्रदान किया, सामजिक हित में अनेक कानून बनवाए, क्या ऐसे महामानव को ‘‘भारत रत्न’’ नहीं दिया जाना चाहिए? निःसंदेह डाॅ. हरीसिंह गौर ‘‘भारत रत्न’’ के हकदार हैं और जनमत भी यही चाहता है कि उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान दिए जाने में अब विलम्ब न किया जाए। 
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Wednesday, December 1, 2021

चर्चा प्लस | सम्मान वाया राजनीतिक गलियारा | संदर्भ : डॉ हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
सम्मान वाया राजनीतिक गलियारा
संदर्भ : डॉ हरीसिंह  गौर को भारत रत्न देने की मांग
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
    डाॅ हरीसिंह गौर ने अपना तन, मन, धन दे कर इसलिए विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की थी कि उन्हें कोई सम्मान चाहिए था। वे तो मात्र इतना चाहते थे कि क्षेत्र और क्षेत्रवासियों का बौद्धिक तथा शैक्षिक विकास हो। उनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय में पढ़ कर भी हम आज अपने उस महान दानवीर को ‘‘भारत रत्न’’ दिलाने के लिए राजनीतिक गलियारों की खाक छान रहे हैं या इस बात से व्यथित हैं कि भोपाल का मिंटोहाॅल उनके नाम पर क्यों नहीं किया जा रहा है? शायद हमारी इच्छाशक्ति में ही कोई कमी रह गई है जो हम वर्षों बाद भी डाॅ. गौर को ‘‘भारत रत्न’’ नहीं दिला सके हैं।  
सागर विश्वविद्यालय के छात्र रहे प्रदेश भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने भोपाल की पुरानी विधानसभा मिंटो हाॅल का नाम डॉ  हरीसिंह गौर के नाम पर किए जाने की मांग की। सागरवासियों एवं विश्वविद्यालय से किसी न किसी रूप से जुड़े हर व्यक्ति को यह मांग स्वागत योग्य लगी। इसके साथ ही कानूनविद, शिक्षाविद, साहित्यकार, दार्शनिक और सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक अर्थात् बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ  हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग पहले भी कई बार उठ चुकी है। या यूं कहा जाना चाहिए कि हर साल गौर जयंती पर यह मांग उठती है और फिर वार्षिक सुप्तावस्था में चली जाती है। सभी जानते हैं कि डॉ हरीसिंह गौर भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने जीवन की पूरी कमाई बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र में आजादी के पहले विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए दान कर दी थी। लेकिन उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ दिलाने के पक्ष में ज़ोरदार पहल करते हुए कोई अपने पद से त्यागपत्र देने की घोषणा करने की भी वीरता आज तक नहीं दिखा पाया है।  
दिलचस्प बात है कि मिंटो हाल का नाम डॉ हरीसिंह गौर के नाम पर करने की मांग सागर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और मध्य प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने भोपाल स्थित पुरानी विधानसभा के मिंटो हाल का नाम महान शिक्षाविद, सागर में विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ हरीसिंह गौर के नाम पर करने का आग्रह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से कर के एक अच्छी पहल की। लेकिन इसके साथ ही राजनीतिक होड़ शुरू हो गई। ऐसा प्रतीत होने लगा कि यदि मिंटो हाल का नाम डाॅ. गौर के नाम पर कर दिया गया और उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ दे दिया गया तो श्रेय किसके झोली में आएगा। यानी परिदृश्य यह कि सूत न कपास और जुलाहों में लट्ठमलट्ठ।
मिंटोहाॅल का नाम डाॅ. गौर के नाम पर रखे जाने को कई राजनीतिज्ञ डॉ हरीसिंह गौर की हस्ती के मुकाबले इसे बहुत छोटी मांग मान रहे हैं। तो बड़ी मांग अब तक पूरी क्यों नहीं हुई? इस प्रश्न का उत्तर भी उनके पास नहीं है। इधर कांग्रेस के प्रवक्ता संदीप सबलोक का कहना है कि ‘‘सागर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और मेरे मित्र रजनीश अग्रवाल की भावनाओं का मैं सम्मान करता हूं। डॉ हरीसिंह गौर हमारी आस्था का केंद्र हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी उनके नाम के सहारे जो एजेंडा चला रही है, मैं इसको गलत मानता हूं। बेहतर होगा कि डॉ हरिसिंह गौर के नाम पर शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कार्य किए जाएं, ताकि बुंदेलखंड क्षेत्र के युवाओं को रोजगार हासिल हो. डॉ हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने का प्रस्ताव मध्यप्रदेश की विधानसभा में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए। डॉ गौर को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पास करे सरकार।’’

सागर विश्वविद्यालय के छात्रों और पूर्व छात्रों के संगठन गौर यूथ फोरम के संयोजक विवेक तिवारी का कहना है कि ‘‘डॉ गौर एक ऐसे व्यक्तित्व थे, कि उन्हें अभी तक भारत रत्न मिल जाना चाहिए था। संविधान सभा के उपसभापति रहने के अलावा उन्होंने देश और दुनिया में कानून के क्षेत्र में बहुत नाम कमाया है। उन्होंने अपना सर्वस्व दान कर सागर विश्वविद्यालय बनाकर देश का इकलौता उदाहरण पेश किया है। डॉक्टर गौर को भारत रत्न दिए जाने के लिए गौर यूथ फोरम सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है।’’

26 नवम्बर 1870 को जन्मे डॉ. हरिसिंह गौर सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, साहित्यकार तथा महान दानी एवं देशभक्त तो थे ही, साथ ही वे बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद एवं कानूनवेत्ता थे। लेकिन डाॅ. गौर चांदी का चम्मच मुंह में ले कर पैदा नहीं हुए थे। उनका आरम्भिक जीवन संघर्षमय रहा। डॉ. गौर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। प्राइमरी के बाद इन्होनें दो वर्ष मेँ ही आठवीं की परीक्षा पास कर ली जिसके कारण इन्हेँ सरकार से 2 रुपये की छात्र वृति मिली जिसके बल पर ये जबलपुर के शासकीय हाई स्कूल गये। लेकिन पारिवारिक उलझनों के कारण ठीक से पढ़ाई नहीं कर सके और मैट्रिक में फेल हो गए। इस कारण इन्हें वापिस सागर आना पड़ा। दो साल तक काम के लिये भटकते रहे फिर जबलपुर अपने भाई के पास गये जिन्होने इन्हें फिर से पढ़ने के लिये प्रेरित किया।
डॉ. गौर फिर मैट्रिक की परीक्षा में बैठे और इस बार ना केवल स्कूल मेँ बल्कि पूरे प्रान्त में प्रथम आये। इन्हें 50 रुपये नगद एक चांदी की घड़ी एवं बीस रूपये की छात्रवृति मिली। आगे की शिक्षा के लिये वे हिस्लाॅप कॉलेज में भर्ती हुये। पूरे कॉलेज में अंग्रेजी एव इतिहास मेँ ऑनर्स करने वाले ये एकमात्र छात्र थे। इसके बाद पढ़ने कैम्ब्रिज गए। वहां उन्हें रंगभेद का सामना करना पड़ा। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि गणित और अंग्रेजी कविताओं की प्रतियोगिताओं में वे प्रथम आए, पर रंगभेद की नीति के चलते इन प्रतियोगिताओं के परिणाम रोक लिए गए।

लंदन में डाॅ. गौर ने कानून की पढ़ाई की और वहीं से डीलिट की डिग्री भी हासिल की। उन दिनों दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन में भारतीय मूल के पहले सांसद निर्वाचित हुए थे। सांसद के चुनाव के लिए हरि सिंह गौर ने उनके पक्ष में प्रचार किया था। भारत आने के बाद डाॅ. गौर कुछ महीने के लिए वे डिप्टी कलेक्टर की नौकरी पर रहे। फिर वकालत करने के लिए नौकरी छोड़ दी और इलाहाबाद, मध्य प्रांत तथा कलकत्ता के उच्च न्यायालयों में वकालत की। बकालत के दौरान ही डाॅ. गौर ने सन् 1918 में नागपुर नगरपालिका का चुनाव लड़ा। चुनाव में विजयी हुए और अध्यक्ष बने। सन् 1920 में उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। तब वे पार्टी के नरम दल के समर्थक थे। 1921 से लेकर 1935 तक डाॅ. गौर सेंट्रल असेंबली के सदस्य रहे। उसी दौरान साइमन कमीशन भारत आया था। डाॅ. गौर ने कमीशन के सामने भारत को डोमिनियन दर्जा देने का प्रस्ताव रखा। इसका अर्थ यह था कि आंतरिक मामलों में भारतीयों को स्वशासन का अधिकार दिया जाए। ब्रिटिश सरकार को यह किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं था। अतः ब्रिटिश सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया।
भारतीय दंड संहिता की तुलनात्मक विवेचना पर डाॅ. गौर के द्वारा लिखी गई पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई। लगभग 3000 पृष्ठ की दो भागों में विभाजित यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में इस विषय पर लिखी पहली पुस्तक थी जो आज भी बकीलों के उपयोग में आती है। हिंदू कोड बिल पर उनका काम आज भी एक प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है। इस किताब में उन्होंने लगभग 500 अन्य किताबों और लगभग सात हजार केसों का हवाला दिया है। ऐसा कोई हिंदू शास्त्र और केस नहीं छोड़ा, जो इसमें नहीं मिलता हो। हिंदू की परिभाषा से लेकर विवाह, संपत्ति, तलाक सहित वे सारी बातें जो किसी हिंदू के जीवन में घटित हो सकती हैं, उनका कानूनी पक्ष इस किताब में मिलता है। उस दौर में बहुविवाह को लेकर हिंदू पुरुष और महिलाओं के बीच अंतर था। डाॅ. गौर ने पुरुषों के लिए बहुविवाह जायज और महिलाओं के लिए गैरकानूनी माना था।

1921 में जब दिल्ली विश्वविधालय की स्थापना हुई तो डॉ. गौर इसके प्रथम कुलपति बने 1924 तक वो इस पद पर रहे। 1928 एवं 1936 में वह नागपुर विश्वविधालय के कुलपति रहे। इंग्लैंड में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले 27 विश्वविधालयों का महाधिवेशन भी उनकी अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। लेकिन उनके मन में अपनी जन्मभूमि और समूचे बुंदेलखंड में शिक्षा की अलख जगाने की ललक थी। अतः उन्होंने अपनी निजी संपत्ति दान कर डाॅ. गौर ने सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति तो थे ही। डॉ. सर हरीसिंह गौर एक ऐसा विश्वस्तरीय अनूठा विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना एक शिक्षाविद् के द्वारा दान द्वारा की गई थी। उन्होंने इसका नामकरण ‘‘सागर विश्वविद्यालय’’ इसलिए किया था क्योंकि वे इसे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की भांति शिक्षा का उच्चकेन्द्र बनाना चाहते थे। वर्ष 1983 में इसका नाम डाॅ. गौर के नाम पर ‘‘डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय’’ कर दिया गया। अब यह विश्वविद्यालय केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पा चुका है।
चर्चित लेखक पी राजेश्वर राव ने अपनी किताब ‘द ग्रेट इंडियन पेट्रियट्स’ में डाॅ. गौर के बारे में बिलकुल सही लिखा है कि ‘‘कुछ ही लोग अपने औचित्य को साबित कर पाते हैं, कानूनविद डॉ. हरि सिंह गौर उनमें से एक थे।’’ ऐसे महान व्यक्तित्व को ‘‘भारत रत्न’’ दिलाने के लिए केवल सामयिक प्रयास और राजनीतिक बवाल की नहीं अपितु एक ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत है जो ‘‘भारत रत्न’’ घोषित कर दिए जाने पर ही शिथिल हो।
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