Saturday, October 3, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | कागा कां गए, करै दिन कढ़े जा रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
कागा कां गए, करै दिन कढ़े जा रए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
संकारे से भैया जू अपनी छत पे ठांड़े ‘कां-कां’ कर रए हते। कुल्ल देर हमने उनकी ‘कां-कां’ सुनीं, फेर जो रहाई ने परी सो हम सोई छत पे जा पौंचे। ऊ टेम पे बी बे ‘कां-कां’ कर रए हते। हमने उनसे पूछी, “काए भैया जू, हमें तो जे पतो आए के करै दिन में कागा खों बरा ख्वाए जात हैं, मनों उनकी बोली में चिचियाओ बी जात आए, जे मोए पता ने हती। का जो कोनऊं नओ ट्रेंड आए?”
“काए को नओ ट्रेंड? हम तो कागा हरों खों टेर रए।” भैया जू बोले।
“काए टेर रए? आपके टेरे से बे आ जैहें? आप तो घंटा खांड़ से चिंचिया रए, अबे लौं एक ने आओ।” हमने भैया जू से कई।
“जेई से तो हमें टेंशन हो रई। जो कागा खों भोग ने लगो तो पितर खफा हो जैहें।” भैया जू बोले।
“जे बी खूब रई! परकी साल आपई ने अपने दोरे को नीम को पेड़ कटा दओ, कागा हरों खों बेघर कर दओ, औ अब कां-कां करबे दते हो आप! अरे, अब बे जां रै रए हुइएं, उतई दिखाहें। इते काए खों ढू़कहें?” हमने सोई खरी-खरी कै दई।
“बात तो सांची आए! जब से नीम को पेड़ो काटो है एक बी कागा ने दिखाने। बाकी उत्तो ध्यान बी नईं गओ। बा तो करै दिन में उनकी जरूरत परत है।” भैया जू बोले।
“भैया जू ऐसो आए के कागा हरें ऊंचे पेड़न पे घोंसला बनाऊंत आएं। जो बड़े पेड़ ने बचाहो तो कागा बी ने बचहें।” हमने उनें समझाओ।
“मनो अबे हम का करें?” बे घबड़ाए से बोले।
“अब तो जेई करो के कागा के नांव को बुजुर्गन खों ख्वाओ औ उनकी सेवा करो। पितर हरें खुस हो जैहें। आपकी मताई आपखों टेर रईं, उनकी सुनो, उने टेम से खाबे खों औ दवाई देओ करो। कागा बी आपखों माफ कर दैहें।” हमने उने समझाई।
    बाकी बे कित्तो समझे पतो नईं? मनों आप ओंरे समझदार आओ सो, हमाई कई समझ लइयो ।
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 Thank You Patrika 🙏
Thank you Reshu Jain 🙏
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने की गांधी जयंती समारोह की अध्यक्षता

2 अक्टूबर 2026 की शाम काव्यायन एवं सहकार भारती संस्था के संयुक्त तत्वाधान में महात्मा गांधी जयंती समारोह का आयोजन किया गया जिसमें कार्यक्रम की अध्यक्षता मुझे सौंपी गई। इस अवसर पर संस्था द्वारा भारतीय सेना के सेवानिवृत्ति तीन सैन्य अधिकारियों, कृषिकों एवं साहित्यकारों का सम्मान किया गया।🇮🇳🏆🇮🇳
     इस अवसर पर मैंने अपनी पुस्तक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व "महात्मा गांधी" की चर्चा करते हुए महात्मा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संक्षेप में प्रकाश डाला तथा गांधी जी पर केंद्रित अपनी एक कविता "गांधी होना आसान नहीं" का भी पाठ किया।📖🎤🌹🎙️🌹

   श्रीमती ममता भूरिया जी को साहित्य एवं समाज सेवा के लिए सम्मानित होने पर हार्दिक बधाई 🌹💐🌹
       इस अवसर पर अधिवक्ता संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष एडवोकेट भाई अंकलेश्वर दुबे "अन्नी", उपाध्यक्ष एडवोकेट उत्कर्ष श्रीवास्तव कभी सम्मान किया गया। आयोजन मे समाज के विभिन्न कार्य क्षेत्र के विशिष्ट व्यक्ति उपस्थित रहे।🪷
       होटल यशोदा पैलेस के सभागार में आयोजित इस सफल आयोजन के लिए आयोजक द्वय अधिवक्ता भाई रामनरेश सिंह राजपूत एवं भाई आलोक जैन जी को हार्दिक बधाई एवं उनका हार्दिक आभार 💐🙏💐
      भाई अभय सिंह जी को भी हार्दिक धन्यवाद जिन्होंने आयोजन में अपनी सक्रियता बनाए रखी।💐
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बतकाव बिन्ना की | हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    ईके पैले गांव देहात खों ले के हमाए बिचार कछू और हते। हमने पन्ना जिला के छोटे से छोटे गांव देखे। दमोए के मुतके गांव देखे। छतरपुर जिला के मुतके तो नोंई पर कछू गांव जरूर देखे। टीकमगढ़ के गांवन से सोई गुजरे। सागर जिला के गांवन में तो जब चाए तब घुमक्कड़ी के लाने निकरबो होई जात आए। अबे लौं मोए जेई लगत रओ के गांव देहात में सुबिदाओं की कमी आए। उते चाए दबाई के लाने होए, चाए सुद्ध पानी के लाने, भौत तकलीफ उठाने परत आए। औ बेरोजगारी सो ऐसी के उते से गरीब-गुरबा खों पेट भरे के लाने सहर में जा के मजूरी करने परत आए। उतईं जो किसान आएं उने जी-तोड़ मेनत करने परत आए। सो मोए हमेसई गांव के लाने दया माया रई। मनो पिछली शनिच्चर खों हमें बा देखने को मिलो जा के बारे में हमने कभऊं सोची ने हती।
का भओ के हमें जाने रओ सीताराम रसोई नांव की संस्था। काए से के उते गरीब-गुरबा बुजुरगन खों मुफत में भरपेट खाना खवाओ जात आए। हम सोई उते भोजन कराबे के लाने जात रैत आएं। ई दार बी गए। उते अपने सगे हातन से भोजन परोसो। उते की खाना पकाने वारी बाइयों खों धुतिया भेंट करी। काए से हमें बे भौतई अच्छी लगत आएं, बिलकुल अपनी बैन घांई। औ उनकी मेनत औ ब्यौहार भौतई अच्छो रैत आए। फेर हम ओरन ने सोची के ऊंसई घरे लौटबे से अच्छो आए के तनक चक्कर काट के, एकाद गंाव देहात से घूमत चलें। अच्छो लगहे। सो सीताराम रसोई से निकर के पैले बालाजी मंदिर में शनि भगवान के दर्शन करे। बा मंदिर सोई ऊंची पहरिया पे बनो आए, सो उते जा के भौतई अच्छो लगत आए। सो, उते बालाजी हनुमान भगवान औ शनिदेव के दरसन करे हमने। फेर हम ओरन ने रस्ता पकरी मंदिर के नैचे से पांछू वारी। हम ओरन खों पतो ने हतो के हम ओरें कोन तरफी जा रए? मनो जा तो पता रई के अपने जिला से बायरे नईं जा रए। कछू दूर तो साजी रस्ता रई, फेर मनों रोड को नक्सा बदल गओ। साजी सी रोड पे गड्ढा मिलन लगे। दचका खात भए कछू दूर औ चले तो रोड कनारे ‘‘प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत’’ लिखों भओ बोर्ड दिखानों। हमने प्रधानमंत्री योजना वारी मुतकी रोडें देखी आएं मनो ऐसी गड्ढा वारी रोड पैली दार देखी। रस्ता में एक बड़ो स्कूल औ एक फैक्टरी दिखानी। मनो रोड की दसा से उनको कोनऊं मेल ने हतो।
चलो कछू नईं, गांव आए। ऊ रोड पे भैंसन ने चल-चल के गड्ढा बना दओ हुइए। जा सोस के हमने खुद खों तसल्ली दई। इत्ते में एक फेमस गांव को बोर्ड दिखानों। कछू नईं। गांव के बायरे से निकरी रोड पे बी कऊं-कऊं गिलावो सो मचो हतो। बा बी कछू नईं। काए से के अब बरसात के दिनां में गिलावो ने हुइए तो का धूरा उड़हे? बा गांव बड़ो हतो। गांव के बायरे के हिस्सा में एक तरफी नोने-नोने खेत हते। तो दूसरी तरफी जंगल विभाग वारों के सगोना के जंगल हते। बा सब देख के भौतई अच्छो लग रओ तो। ऊ सीनरी देखत समै रोड के दचका लौं बिसर गए। तनक देर बाद लगो के अब कोनऊं से पूछ लेव चाइए के हम ओरें कोन तरफी जा रए? लग तो रई हती के जोन तरफी बढ़ रए बा रोड चक्कर काट के राजघाट बंधान लौं जात हुइए। फेर बी कोनऊं से पूछ लेबो सई लगो। हमने संग वारे भैयाजी जू से कई के कोऊ दाऊ दिखाएं सो उनसे पूछ लइयो। मनो भैया जू खों दाऊ से पैले तीन मोड़ा दिखा गए। 12 ने तो 14 बरस के रए हुइएं। तीनों में से एक सायकिल लए हतो। मनो तीनोंई गुटखा खा रए हते। भैया जू ने उनईं तीनों से पूछ लई के जा रोड कोन गांव खों जा रई? जा सुन के एक मोड़ा ने अपने कुकुरमुत्ता घांई बालन पे हात फेरत भओ बड़े स्टाईल से पूछो आप ओरन खों कां जाने? भैया जू बोले के हमें राजघाट जाने। जा सुन के बा मोड़ा बोलो के फेर तो तुम ओरें आगे ई रोड पे चलके दाएं मुड़ जइयो। तब लौं दूसरो मोड़ा गुटखा अपने मों में डार के खींसा निपोरत भओ बोलो के दाएं नईं बाएं मुड़ियो। इत्ते में तीसरो मोड़ा बोलो इते कां चले आए, पांछे लौट जाओ। भैया जू ठैरे बुंदेलखंड के बायरे के सो बे उन ओरन की कई उत्ती समझ ने पाए। मनो मोए समझ में आ गई के जे मोड़ा गांव के भले आएं मनों ठैरे चंटा-पंटा। पूरे आवारा टट्टू। सो हमने भैया जू से कई के इन ओरन खों पतो नइयां, आप तो आगूं चलो, रोड कऊं तो पौंचाहे। 
हम ओरन की गाड़ी बढ़ी औ पांछू से उन तीनों की हंसबे की आवाज सुना परी। हमाओ जी तो ऐसो करो के गाड़ी रुकवाएं औ उतर के उन ओरन खों दो-दो थपाड़ा लगाएं। जरा-जरा से लरका औ गुटखा खा-खा के गर्रा रए। मनो हमने अपनों गुस्सा पे काबू करो औ बढ़ लए।
कछू दूर पे एक दूसरो गांव आ गओ। उते जो दिखानों, बा हम देखतई रै गए। उते एक दलान में छै-सात लुगवा बैठे पत्ता खेल रए हते। मनो सई कएं तो उते जुआ चल रओ हतो। चलो कछू नईं, गांव ठैरो। टेम पास। मनो गांव वारन को इत्ती फुरसत कां से मिल गई? ऊपरे से जां हम ओरन की गाड़ी उते से निकरी तो बे सब हम ओरन खों देखन लगे। जे ई कोई बीस कदम बाद एक घर के बायरे पट्टा घांईं बनो चबूतरा पे छै-सात लोग औ दिखाने। बे सोई फुरसत से बैठे गपिया रए हते। उतई एक टपरा हतो। चाय को। ऊमें चार जने बैठे हते। बे ओरें मोबाईल पे कछू देखने में मगन हते। बाकी हम ओरन की गाड़ी उते से कढ़ी तो सब के सब हम ओरन की तरफी घूरन लगे। भैया जू ने हमसे पूछी के इन ओरन से रस्ता पूछी जाए? हमने कई के नईं, जे ठलुआ हरें को जाने का बताएं। इते तो गाड़ी बी ने रोको, बढ़त चलो। मनो उन ओरन खो देख के हमें लगो के इन ओरन खों कछू काम-धंदा नइयां का? इने तो फुरसत के मारे टेम नइयां। औ ईसे बुरई बात जे के इते की लुगाइन खों जो ऊ तरफी से निकरने परत हुइए तो कित्तो बुरौ लगत हुइए? कुल मिला के बा सो अच्छो माहौल ने दिखानों। 
हम सोसन लगे के कछू गांव खों ई गुटखा औ मोबाईल ने का कर डारो। मेनत करबे वारे की जांगा इने ठलुआ बना डारो। ऐसई बुरए माहौल में मोड़ियां औ लुगाइयां खतरा में पर जात आएं। जा सोस के हमाओ मन दुखी होन लगो। इत्ते में कोनऊं हम ओरन की गाड़ी के पांछू से हार्न बजात सुनाई परो। पीछे देखत के शीश में देखो तो मोटरसायकिल वारो दिखानों। ऊके हार्न से भैया जू को दिमाग गरम हो गओ। उन्ने साईड में गाड़ी रोकी औ ऊंसे बोले के तुमें जल्दी आए सो तुमई पैले कढ़ जाओ। हमने देखी के ऊके मोटरसायकिल पे ऊके पांछू लुगाई औ बच्चा सोई बैठे हते। हम भैया जू खों कछू समझा पाउते के इत्ते में बा मोटर सायकिल वारे ने पूछी के आप ओरन खों राजघाट जाने? भैया जू बोले हऔ। सो बा बोलो के तो फेर हमाए पांछू-पांछू आ जाओ, हम सोई ऊ तरफी जा रए। ऊकी जा बात सुन के भैया जू को गुस्सा ठंडो पर गओ। औ हम समझ गए के जा मोटर सायकिल वारो ऊ गुटखा छाप लरकों के इते से हमाई बात सुन के पछांरें आ रओ हुइए। औ हमें रस्ता बताबे के लाने हार्न बजा रओ हतो। 
सो हम ओरन ने ऊपे भरोसा करो औ अपनी गाड़ी ऊकी मोटरसायकिल के पांछू लगा दई। गांव से निकरतई सांत अच्छी रोड मिलन लगी औ हम ओरें ऊके पांछू-पांछू चल परे। सातेक किलोमीटर चलबे के बाद बड़ी रोड दिखानीं। बा मोटरसायकिल वारो रुको औ बोलो के अब आप ओरें बायीं तरफी मुड़ जाओ औ जेई बड़ी रोड पे चल हो तो दसेक किलोमीटर पे राजघाट दिखान लगहे। ऊको दूसरी तरफी जाने रओ सो बा दूसरी तरफी मुड़ गओ। भैया जू ने ऊको धन्यबाद करो। जोन रोड पे हम ओरन खों ऊने पौंचाओ रओ बा सागर से जैसीनगर वारी रोड हती। ऊपे पौंच के हम ओरन खों रस्ता याद आ गओ। काए से के ऊ रोड पे चल के हम ओरें पैले एक बेर सिलवानी गांव लौं गए रए। सो, फेर तो साजी रोड पे गाड़ी दौरा दई। रस्ता में एक मंदिर पे रामधुन सोई सुनाई परी। फेर राजघाट दिखान लगो। सो ऐसी रई ऊ दिनां की सैर।
मनों एक बात हमें पता परी के सबरे गंाव एक सी दसा के नईयां। कऊं-कऊं गुटखा औ मोबाईल की हवा कछू ज्यादाई लग गई आए। ऐसे गांवन में मुतके ठलुआ बी आएं जोन ताश पत्ती खेलत बैठे रैत आएं। उते रोड पे चलत लुगाइयां कमई दिखानीं। औ जो ऐसे ठलुआ रोड के लिंगे बैठे होंए तो लुगाइयां निकरें बी तो कैसे? सो हमें गांव को जा दूसरो चेहरा देखबे को मौका सोई मिल गओ। मनो ऐसो माहौल होन नईं चाइए। बाकी हम नईं चात के कछू जने के मारे पूरो गांव को नांव धरो जाए सो हमने गांव को नांव नईं लिखो। बाकी जोन उते के रैबे वारे आएं औ ने तों उते से कढ़े हुइएं सो बे समझ जैहें। बाकी बा मोटर सायकिल वारे घांईं अच्छे लोग अबे बी उते रैत आएं। जोन से गांव की इज्जत बनी रैत आए। जे नोनी बात आए।            
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के गांवन पे सई से ध्यान देबे की जरूरत आए के नईं? औ कछू नईं तो उते गुटखा औ दारू पे लगाम लगाओ चाइए। संगे ठलुआ हरों से कछू काम लओ जाओ चाइए। कओ, सई कई के नईं?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Friday, October 2, 2026

गांधी जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यदि महात्मा गांधी के व्यक्तित्व को समझना है तो पहले उनके विचारों को जानना, समझना होगा। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

महात्मा गांधी जी को सादर नमन 🙏🇮🇳

      2 अक्टूबर, गांधी जयंती पर पढ़िए राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला की मेरी पुस्तक "महात्मा गांधी"... यह सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित है तथा ऑनलाइन उपलब्ध है।
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Wednesday, September 30, 2026

चर्चा प्लस | चर्चा प्लस मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य डॉ (सुश्री) शरद सिंह


चर्चा प्लस
मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के किसी सदस्य को कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरा हिल जाता है। कई गंभीर बीमारियों का असली कारण है मिलावटी खाद्य सामग्री। जैसे अच्छी सेहत के लिए फल खाने और दूध पीने की सलाह जी जाती है। पकने से पूर्व तोड़े गए फल जिन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है क्या अच्छी सेहत दे सकते हैं? या फिर इंजेक्शन लगा कर निकाला गया दूध सेहत दे सकेगा? उस पर स्वास्थ्य सेवा की आसमान छूती मंहगाई मानो गरीबों के जीने का हक छीन लेना चाहती है।

चाहे पपीता हो या सेव बहुधा समय से पूर्व पेड़ों से तोड़ कर केमिकल द्वारा पकाए जाते हैं और जिन्हें खाने पर क्या-क्या साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं इससे आमजन बेखबर है। कभी-कभार समाचार पत्रों या पत्रिकाओं में इस संबंध में जागरूकता वाले लेख प्रकाशित होते भी हैं तो उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ कर अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि जब उपभोक्ता फलों के बाज़ार में पहुंचता है तो केमिकल्स से पकाए और चमकाए गए फलों की सुंदरता से मोहित हो कर भूल जाता है कि उसने क्या पढ़ा था अथवा वे फल कितने नुकसानदेह हैं। फिर मसला यह भी तो है कि सही फल कहां से मिलें? न तो हर व्यक्ति के पास बाग है और न बागीचा। दो कमरे या एक कमरे में रहने वाला परिवार अपने लिए फल नहीं उगा सकता। उसे तो बाज़ार में मिलने वाले फलों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यही दशा सब्जियों की है। बड़े आकार की सब्जियां चाहे लौकी हो या कद्दू संदेह के घेरे में रहता है। क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें तेजी से बड़ा करने के लिए इंजेक्शन और केमिकल वाली खाद दी जाती है। लेकिन क्या किया जाए, यदि सब्जी खानी है तो जहर की मिलावट को भी अनदेखा करना पड़ता है और बदले में मिलती है गंभीर बीमारियां।
फलों को जल्दी और कृत्रिम रूप से पकाने के लिए मुख्य रूप से एथिलीन गैस और कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग किया जाता है। एथिलीन गैस एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है और व्यावसायिक रूप से स्वीकृत है। यह फलों में पकने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू करता है। एथेफोन तरल रूप में आता है जो पौधों या फलों के संपर्क में आने पर एथिलीन गैस में बदल जाता है। कैल्शियम कार्बाइड आम भाषा में ‘‘कार्बाइड’’ कहा जाता है। यह पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो फलों को जल्दी पकाता है। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले और कैंसरकारी तत्व हो सकते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध है। खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार केवल नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस के प्रयोग की अनुमति है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती।

पैदा होने से ले कर मृत्यु तक दूध जीवन के एक अवश्यक तत्व के रूप में जुड़ा रहता है लेकिन जब दूध भी मिलावटी और नकली हो तो? पशुओं में दूध उतारने या उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का इंजेक्शन लगाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान ऑक्सीटोसिन युक्त दूध पीता है, तो पेट के एसिड और पाचक एंजाइम इस प्रोटीन हार्मोन को पचा कर नष्ट कर देते हैं। यह सक्रिय रूप से रक्त में नहीं पहुंचता है। हालांकि भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पशुओं में इसके अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसका सबसे बुरा असर पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। बार-बार ऑक्सीटोसिन देने से पशुओं में बांझपन, हॉर्मोनल असंतुलन, थनैला रोग (डंेजपजपे) और प्रजनन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
नकली या सिंथेटिक दूध को असली जैसा दिखाने और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए कई खतरनाक और जहरीले रसायन मिलाए जाते हैं। दूध में प्रोटीन और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए यूरिया मिलाया जाता है, जो किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। दूध में झाग बनाने और उसे सफेद दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पाचन तंत्र खराब होता है और उल्टी-दस्त की समस्या होती है। कास्टिक सोडा अथवा कास्टिक पोटाश केमिकल दूध को फटने से बचाता है और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाता है, लेकिन पेट की अंदरूनी परत को जला सकता है। सोया रिफाइंड या आर्टिफिशियल फैट दूध में फैट (चिकनाई) की मात्रा को नियंत्रित करने और उसे असली जैसा गाढ़ा दिखाने के लिए मिलाया जाता है। फॉर्मेलिन यह एक जहरीला प्रिजरवेट है जो दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। इसके लंबे समय तक सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड भी दूध को फटने से बचाने के लिए मिलाया जाता है जो पाचन एंजाइमों को नष्ट करता है। स्टार्च या मैदा पानी मिलाने के बाद दूध का पतलापन छुपाने और उसे गाढ़ा रखने के लिए स्टार्च मिलाया जाता है। क्या यूरिया और कास्अिक सोडा से बनने वाला नकली दूध सेहत दे सकता है?
हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सा मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 12 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं के मंहगे होने का एक मुख्य कारण है महंगे आयातित चिकित्सा उपकरण और उनके अपग्रेड होने की उच्च लागत। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में कुशल डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा स्टाफ के बढ़ते वेतन व शुल्क। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का बढ़ता प्रसार। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार भारत में लोग अपनी जेब से इलाज का भारी-भरकम हिस्सा अर्थात लगभग 63 प्रतिशत खुद चुकाते हैं। कुछ प्रमुख महंगे उपचार और लागत अनुमान इस प्रकार है-
हार्ट बाईपास सर्जरी - लगभग 1.6 लाख से 4.5 लाख रुपये ।
कैंसर उपचार (कीमो थेरेपी रेडिएशन)- लगभग 10 लाख से 25 लाख रुपये ।
लिवर ट्रांसप्लांट- लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये।
यदि इन बड़ी बीमारियों की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो मामली सर्दी-जुकाम के लिए चिकित्सक को दिखा कर ईलाज कराना मंहगा पड़ता है। यही कारण है कि नीम हकीमों का यानी फर्जी चिकित्सकों का धंधा जोरों पर चलता रहता है और आम आदमी अपनी जान जोखिम में डालता रहता है।
यह सच है कि सरकार और कुछ निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के द्वारा सहायता देती हैं जैसे सबसे लोकप्रिय सरकारी योजना है आयुष्मान योजना। लेकिन यह भी सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि साठ वर्ष की आये भी इसके लिए योग्य घोषित कर दी गई है किन्तु जब कोई साठ से सत्तर के बीच की आयु का व्यक्ति आयुष्मान कार्ड  बनवाने का प्रयास करता है तो उसे निराशा हाथ लगती है। जो निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा का लाभ देती हैं वे पहले प्रीमियम भरवाती हैं, वह भी नियमित रूप। जिसके पास प्रीमियत भुगतान करने योग्य पैसे होंगे उसके लिए तो ठीक है किन्तु जो प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होगा उसका क्या होगा?
चाहे खाद्य सामग्री को दोष दें या लाईफ स्टाईल को मगर यह डरावना सच है कि पिछले दस वर्ष में घुटनों एवं जोड़ों की तकलीफ, मधुमेह, थायराइड, कोलोस्ट््राल बढ़ना आदि की समस्याएं कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में सबसे अधिक होने वाला प्रमुख हृदयरोग कोरोनरी धमनी रोग है, जिसके कारण अक्सर दिल का दौरा (हार्टअटैक) पड़ता है। इसमें हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में प्लाक (चर्बी और कोलेस्ट्रॉल) जमने से वे संकीर्ण हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप में धमनियों में रक्त का दबाव लगातार अधिक रहता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त जोर पड़ता है।हार्ट फेलियर में हृदय की मांसपेशियां इतनी कमजोर या सख्त हो जाती हैं कि वे शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाती हैं। अरिथ्मिया  यह दिल की धड़कन के अनियमित, बहुत तेज या बहुत धीमी होने की स्थिति है।
हृदय रोगों के मुख्य कारण है फैट, नमक, चीनी और फास्ट फूड से भरपूर आहार। ये सभी मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से दिल कमजोर होता है और वजन बढ़ता है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं। तंबाकू और सिगरेट का धुआं धमनियों की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाता है। अत्यधिक और लगातार तनाव धमनियों को प्रभावित करता है और अन्य जोखिम कारकों को गंभीर बनाता है।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में आज सभी जानते हैं, सभी स्वस्थ भी रहना चाहते हैं किन्तु शुद्ध खाद्य सामग्री और सस्ती बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आमजन का स्वस्थ रहने का सपना कभी पूरा नहीं होने पाता है। कई निजी चिकित्सा केन्द्र तो ‘‘लुटेरे’’ के नाम से कुख्यात रहते हैं किन्तु स्वस्थ होने की चाहत उन्हें उन ‘‘लुटेरों’’ के हाथों लुटने को मजबूर कर देती है। इसका कारण यही है कि आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाऐं निजी सेवाओं के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई और जोखिम भरी हैं। इस स्थिति में सुधार हो सकता है यदि सरकारी स्तर पर ईमानदार प्रयास किए जाएं। आखिर जीने का अधिकार तो हर किसी को मिलना ही चाहिए।        

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(दैनिक, सागर दिनकर में 30.09.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, September 29, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह  
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - ज़िंदगी के रंग अनेक
लेखिका     - आशा मुखारया
प्रकाशक    - पाथेय प्रकाशन, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मूल्य       - 200/-
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समीक्ष्य कहानी संग्रह उन कहानियों का संग्रह है जिसमें मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़े कथानक हैं। ये कथानक अपने घर-परिवार तथा अपने आसपास के घरों की अंतर्कथा हैं। कहानी संग्रह का नाम है-‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’। इसकी कहानीकार हैं आशा मुखारया। संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने से पहले लेखिका के भारतीय परिवेश और सामाजिक सरोकार को जान लेना आवश्यक है। लेखिका आशा मुखारया 5 जुलाई 1942 को जबलपुर (म.प्र.) में जन्मीं, वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई, किन्तु सागर (म.प्र.) से भी उनका गहरा नाता है। सागर में उनके अनेक परिवारजन निवासरत् हैं। उनके पति डाॅ. प्रताप सिंह मुखारया इतिहास के प्रोफेसर रहे। पति की सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र विवेक मुखारया के पास अमेरिका के जैक्सनविल (फ्लोरिडा) में बसने का निर्णय लिया। वहीं आशा मुखारया को अपने पति का चिरविछोह सहना पड़ा किन्तु बेटे-बहू के अपनत्व से उन्हें सहारा दिया। अपनी इकलौती संतान अर्थात् पुत्र विवेक के साथ रहना उनका सही निर्णय था लेकिन भारत में मौज़ूद अपना गांव, घर, शहर हर प्रवासी भारतीय की तरह उनके दिल में भी बसा हुआ है। नागरिकता भले ही अमेरिका की हो लेकिन दिल है हिन्दुस्तानी। आशा मुखारया की प्रत्येक कहानी में इस तथ्य को शब्दशः अनुभव किया जा सकता है। समय-समय पर भारत में प्रवास के दौरान भारतीय समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन और स्मृतियों की तिजोरी में सुरक्षित पुराने अनुभव उनकी कहानियों में सजीव हो उठे हैं। सीधे-सरल शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के लिखी गई ये कहानियां सहसा ही मन को छू जाती हैं। 
‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’ संग्रह की कहानियों का आकार बड़ा नहीं हैं। ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं। कुल अट्ठाईस कहानियां भारतीय परिवारों के अटठाईस रंग (शेड्स) दिखाती हैं। ‘‘निर्णय’’ शीर्षक कहानी पारिवारिक संबंधों में आती जा रही संवेदनहीनता को सामने रखती है। यह कहानी एक ऐसी स्त्री के बारे में है जो परिवार में बुआ का दर्ज़ा रखती है। अपने आरम्भिक जीवन में सारी सुख-सुविधाओं का आनन्द उठाती है। किन्तु जैसे-जैसे उसकी वृद्धावस्था आती है वह पारिवारिक उपेक्षा की शिकार बनने लगती है। इस कहानी का अंत लेखिका ने एक नाटकीय मोड़ के साथ रोचक बना दिया है। जो सुखद भी लगता है। ‘‘चंदा’’ शीर्षक कहानी को पढ़ते हुए यह अनुभव करना अच्छा लगता है कि लेखिका अपनी ज़मीन से यानी बुंदेलखण्ड से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहानी में बुंदेली गीतों को पिरोया है। 
‘‘वरदान’’ कहानी एक ऐसे स्त्री पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे परिस्थितिवश एक शक्की और क्रोधी व्यक्ति के साथ विवाह करना पड़ा और अनेक वर्ष घुटन भरा जीवन जीना पड़ा। किन्तु लंदन में बसे उसके बेटे ने उसका जीवन बदलने में मदद की और उसके हिस्से की खुशियां उसकी झोली में डाल दीं। यह एक ऐसी कहानी है जो स्त्री के पारिवारिक जीवन को एक नई पहचान देती है। इसे एक ज़रूरी-सी कहानी कहा जा सकता है। इस कहानी में स्त्री जीवन का वह पक्ष भी है जिसमें उसे निराधार लांछित किया जाता है। कहानी की नायिका दीपा का परिचय देते हुए लेखिका ने लिखा है-‘‘ये वही दीपा थी जो बचपन में मेरे यहां रोज़ ही आया करती थी। मेरी छोटी बहन की सहेली थी। ज़रूरत से ज़्यादा स्मार्ट और ख़ूबसूरत। महाराष्ट्रीयन परिवार से थी। पिता चीफ इंजीनियर थे। उसे किसी से भी बात करने में हिचक नहीं होती थी। उसकी इसी आदत को ले कर लोग तरह-तरह की बातें किया करते थे।जिन लोगों को लिफ्ट नहीं देती थी, वो उसके बारे में फ़ालतू बातें करते थे। पर वो एक बहुत अच्छे चरित्र वाली लड़की थी।’’ 
परिवारों में ज़ायदाद को ले कर होने वाले झगड़े और मनमुटाव आम बात है। मंा की मृत्यु पर बेटियों का उनके ज़ेवर को ले कर खींचातानी के सच्चे किस्से अकसर सुनने को मिल जाते हैं। यही मूल कथानक है, ‘‘मैं कहां हूं’’ कहानी का। इसी तरह ‘‘वापसी’’ कहानी उन माता-पिता की कहानी है जो विदेश में जा बसे अपने बच्चों के पास उत्साह से जाते हैं किन्तु वहां घोर उपेक्षा झेल कर अपने देश लौटने को विवश हो जाते हैं, जहां जीवन के नए अनुभव उनकी प्रतीक्षा में मुस्कुराते हुए खड़े हैं। 
‘‘वी आर जस्ट फ्रेंड्स’’ एक दिलचस्प कहानी है। यह एक फ्र्लट करने वाले लड़के के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की कहानी है। ‘‘ज़िन्दगी के रंग अनेक’’ संवेदनात्मक कहानी है। अपनों के होते हुए भी एकाकी जीवन जीने को विवश स्त्री की कहानी। इस कहानी में मन को भिगो देने वाला एक प्रसंग है-‘‘अपना बुढ़ापा उन्होंने अपनी किताबों के साहारे काट दिया। अपने कष्टों को छुपा कर वो अपना अकेलापन काटती रहीं। अपनी ज़िन्दगी से और अपनों से कभी शिकायत नहीं की और एक दिन चुपचाप मौत के आगोश में खो गईं।’’
संग्रह में एक कहानी है-‘‘ऐसी भी बहू’’। रोचक और सकारात्मक कहानी है जो ज़िदगी के एक ख़ास रंग को सामने रखती है। कहानी में एक ऐसी बहू का वर्णन है जो विखंडित होते आधुनिक परिवार की परिपाटी को अनदेखा कर के अपने परिवार के प्रति समर्पित रहने के लिए कृतसंकल्प है। ‘‘तीसरी पीढ़ी’’ उस पारिवारिक व्यवस्था को उजागर करती है जिसमें बेटियों को चाहे कितनी भी छूट दी जाए लेकिन जब विवाह की बात आती है तो माता-पिता पारम्परिक रुख अपना लेते हैं। लड़की चाहे विदेश में रह रही हो लेकिन उसके लिए विशुद्ध भारतीय दूल्हा और वह भी भारत में रह रहा हो तो और अच्छा है तथा दान-दहेज वाली शादी तय करने की मशक्कत शुरू हो जाती है। इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि एक अलग परिवेश में रह रही लड़की ठेठ परंपरावादी परिवार या पति के साथ कैसे सुखी रह पाएगी? ऐसी लड़की की स्थिति ठीक उस पतंग की भांति होती है जिसे खुले आकाश में ऊचे- बहुत ऊंचे तक उडज्ञने दिया जाता है तथा अपनी खुशी प्रकट कर के उसका उत्साह बढ़ाया जाता है। जब वह लड़की समझने लगती है कि वह अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार पा चुकी है, ऐन उसी समय उसकी डोर तेजी से लपेटे जानी लगती है। उड़ान समाप्त, स्वतंत्रता समाप्त, बाहरी दुनिया समाप्त, उसके निर्णय लेने का अधिकार समाप्त। उस पर माता-पिता अपने निर्णय को थोपना शुरू कर देते हैं तथा बाध्य करते हैं कि वह लड़की उनके निर्णय को माने। इस ट्रेजडी को कहानी की इन पंक्तियों में देखिए-‘‘इस बीच रिया को भी अपने साथ काम करने वाले एक जर्मन लड़के से प्यार हो गया और फिर इतिहास अपने को दोहराने लगा। और तीसरी पीढ़ी की कहानी शुरू हो गई। भारत में रिया के मां-बाप उसके लिए लड़का ढूंढने लगे।’’
संग्रह की एक और कहानी है जो समाज के बदलते माहौल की ओर संकेत करती है। कहानी का शीर्षक है-‘‘यहां से वहां’’। मेहमानों के चरित्र पर बुनी गई यह कहानी एक अलग ही खाका रचती है। कहानी के आरम्भिक पैरा देखिए- ‘‘आज के जमाने में लोग मेहमान-नवाज़ी से घबराने लगे हैं। पहले कैसे लोग मेहमान को भगवान मानते थे। ‘अतिथि देवो भवः’। पअ अब तो रात को घंटी बजते ही लोग घबराने लगते हैं कि पता नहीं कौन आ गया।’’
इसी कहानी के अगले पैरा में मेहमानों के बारे में भी लेखिका ने दिलचस्प विवरण दिया है-‘‘पर मुझे लगता है कि आज के मेहमान भी आरामपरस्त होते जा रहे हैं। जिसके घर भी जाएंगे, पांव पसार कर बैठ जाएंगे। बच्चों पर हुकंम चलाएंगे-पानी ले आओ, पेपर ले आओ, सिगरेट ले आओ। ये नहीं सोचते कि जिसके घर जाते हैं तो उसके काम में हााि बंटाएं जिससे मेहमान का आना न अखरे।’’
अमेरिका में बसे भारतियों के परिवेश का लेखा-जोखा है कहानी ‘‘सिद्धपुरुष’’ में। भारतीय संस्कृति और धर्म विदेश में भी भारतीयों को संबल प्रदान करता है। इस कहानी का एक अंश है-‘‘कई सालों से हम लोग अमेरिका के न्यूयार्क शहर में अपने बेटे के पास सेटिल हो गए थे। कई लोग हम लोगों से पहले वहां रहते थे। इसी से हमउम्र लोगों से काफी जान-पहचान हो गई थी। वहां पर बहुत बड़ा व सुंदर मंदिर है। हम सब सीनियर सिटीजन महीने में एक बार मिलते हैं और आपस में दुनिया-जहान की बातें करते हैं। उसमें धार्मिक बातों के अलावा जनरल, कुछ घरेलू समस्याओं पर भी बातें होती हैं।.... हम बुजुर्गों के पास समय काटने का बस यही एक तरीका था। सोमवार से शुक्रवार तक हमारे बच्चे अपनी नौकरी में काफी व्यस्त रहते हैं फिर भी उनकी कोशिश रहती है कि हम लोगों को भी समय दें। यहां पार्टियां बहुत होती हैं तो वो हम लोगों को पार्टियों में ले जाते हैं। वहां तरह-तरह के लोग मिलते हैं। बच्चों के सभी दोस्त बहुत अच्छे हैं।’’
विदेश में रहते हुए देश के अस्तित्व को अपने भीतर जगाए रखना और अपनत्व की तलाश में आपस में जुड़ते रहना हर प्रवासी भारतीय के जीवन का अभिन्न पक्ष होता है। अपने अतीत और अपने वर्तमान के बीच तुलना करना, अपने अतीत को याद रखना और पराए परिवेश में रच-बस जाना प्रवासी भारतीयों की खूबी होती है। यही विशेषता लेखिका आशा मुखारया की कहानियों देखा जा सकता है। उनकी कहानियां प्रत्येक पाठक से संवाद करने में सक्षम हैं। संग्रह का आमुख जबलपुर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व संपादक डाॅ. राजकुमार ‘सुमित्र’ ने लिखा है-‘‘लेखिका ने मध्यमवर्गीय परिवारों की रचना, स्थिति और मनःस्थितियों का सटीक चित्रण किया है। बेटे से बेटी भली, परिवारों की टूटन, वृद्धों की उपेक्षा और परदेश में देश की याद को बड़ी मार्मिकता से उकेरा है।’’ अपने कहानी लेखन के बारे में लेखिका आशा मुखारया ने स्वयं लिखा है कि ‘‘कई बार कई घटनाएं और पात्र अपनी छाप छोड़ जाते हैं जो सालों तक मन को सालते रहते हैं और जो अंत में काग़ज़ पर उतर कर कहानियों का रूप ले लेते हैं। चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी लिख जाते हैं। कई सालों से अपने मन के भावों को काग़ज़ पर उतारती रही और अंत में देखा कि इन कहानियों ने कहानी संग्रह का रूप धारण कर लिया है।’’
कुलमिला कर यह कहा जा सकता है कि यह छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह है जिसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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Monday, September 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, पता पर जैहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

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जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, पता पर जैहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   दो दिनां पैले रानगिर वारी माता हरसिद्धि देवी जू को बुलावा आओ औ हम चल परे उनके दरसन के लाने। बा कई जात है ने के जबे माता बुलात आएं, तभईं उनके दरबार में पौंचो जा सकत आए। वैसे जे बात सबई देवी-देवतन के लाने कई जात आए, चाए बे कोनऊं धरम के होंए। बाकी खास बात जो हम बताबो चात आएं, जे नईयां के माता ने हमाए लाने बुलावा भेजो। खास बात सो ईके बाद सुरू होत आए। का है के हम ओरन ने करी एक गाड़ी औ निकर परे। मकरोनिया से नरसिंगपुर रोड पकरी। संझा की बिरियां हती औ झिमिर-झिमिर पानी बरस रओ तो। अबे ऊ जांगा लौ पौंचे जां मुतके बड्डे-बड्डे कालेज ठाड़ें, औ हम ओरन खों पैलो धचका लगो। हम ओरन ने गाड़ी चलाबे वारे खों गरियाओ। बा कैन लगो के “हम का करें रोड पे गड्ढा हो गए हैं, कित्तऊ बचाओ धचका तो लगहेई।”
   कछू नईं, हमने सोची के जे तो  लोहरी रोड आए, अभईं फोर लेन पे पौंच के सरसरान लगबी। उते की रोड सो साजी हुइए। अखीर ऊको साजी रखबे के लाने अपन ओरें मुतको टोल टैक्स भरत आएं। मनों जे का? जैसेई फोर लेन पे पौंचे ऊंसईं भरका घांईं गोल-गोल गड्ढन ने हम ओरन को वेलकम करो। हमें याद आई के पर की साल जेई मोसम में हम फोर लेन से झांसी गए रए। संकारे मों अंदेरे निकरे हते औ रात लौं वापसी हती। मनो ऊ रोड पे गड्ढा औ गइयां इत्ती मिलीं के ने पूछो। अब बोई दसा ई रोड पे मिल रई हती। पर गड्ढा के बारे में कोनऊं खों फिकर नईं औ गइयां तो टोल नाका के इते बीच रोड पे पसरी मिलीं। बा दसा देख के हमें लगो की अपन कित्ते महान आएं जोन टैक्स तो भरत रैत आएं मानों साजी रोड के लाने मों ने खोल पाऊत आएं। है ने सई बात? जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, सई से पता पर जैहे।
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