चर्चा प्लस
बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली जिसमें मौसम के पैटर्न बदलने के गंभीर आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे। समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ रिपोर्ट का अंश। कितने लोगों ने पढ़ा? इसके आंकड़े बता पाना मुश्किल है लेकिन यह तो तय है कि उससे बहुत कम लोगों ने जितनों ने ‘‘हनी ट्रैप ’’, ‘‘ट्विशा केस’’ अथवा ‘‘मेलोडी’’ के समाचार पर अपनी आंखें गड़ाए रखी होंगी। कितने आश्चर्य के बात है न कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसके निरंतर कटने का हमें अहसास नहीं है लेकिन चटखारे भरे समाचारों पर हमारा पूरा ध्यान केन्द्रित रहता है। दरअसल, हमारा मौसम जिस तरह घातक रूप से अपना पैटर्न बदल रहा है, ठीक उसी प्रकार इंसानी स्वभाव भी बदल रहा है।
मौसम में परिवर्तन होना एक स्वाभाविक एवं स्वस्थ प्राकृतिक क्रिया है। किन्तु जब मौसम अपनी प्रकृति के विपरीत चलने लगे तो स्थिति स्वाभाविक नहीं रह जाती है। जैसे यदि कोई नदी अपना रास्ता बदल कर बहने लगे तो वह गांव, शहर, खेत सबकुछ बरबाद कर सकती है। मौसम का चक्र भी अपनी गति या प्रकृति को बदलता है तो यह मानना होगा कि विनाश की दस्तक पड़ना शुरू हो गई है। अब यह इस पर निर्भर है कि हम उस दस्तक को कितनी देर से अथवा कितनी जल्दी सुनते हैं। जब बात आती है जलवायु परिवर्तन अथवा मौसम के परिवर्तन की तो लोगों का रवैया लापरवाह हो जाता है। वे साशल मीडिया पर घंटों ‘‘हनी ट्रैप’’ के किस्से ढूंढ-ढूंढ के पढ़ सकते हैं, ‘‘मेलोडी चॉकलेट’’ से जुड़े किस्से पर वाद-विवाद में पूरा-पूरा दिन बिता सकते हैं, हाई प्रोफाईल ‘‘ट्विशा मर्डर केस’’ पर परिणाम विहीन चिंन्तन में सिर खपा सकते हैं लेकिन उस संकट की ओर ध्यान देने का समय नहीं निकाल पाते हैं जिसके शिकंजे में धीरे-धीरे पूरी पृथ्वी और पूरी मानव सभ्यता जकड़ती जा रही है। अभी भी स्थिति पर नियंत्रण पाने का समय है किन्तु उस पर विचार करने का हमारे पास न तो समय है और न इच्छा। हम आभासीय दुनिया के गुलाम बन कर स्वयं को बुद्धिजीवी मानने का भ्रम पाल चुके हैं। जबकि बुद्धिजीवी का असल दायित्व होता है कि वह सबसे पहले पृथ्वी और सकल मानवता के बारे में गंभीरता से सोचे।
हाल ही में समाचार पत्रों में यह रिपोर्ट पढ़ी कि हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है। बर्फबारी के महीने माने जाने वाले जनवरी-फरवरी से ज्यादा बर्फ अब मार्च-अप्रैल में गिर रही है। इसका सीधा असर वाटर बैंक माने जाने वाले ग्लेशियरों पर पड़ेगा। इस पैटर्न के कारण ट्री लाइन भी लगातार ऊपर को खिसक रही है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ताजा शोध जर्मनी की एप्लाइड जियोमेटिक्स शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है। हिमालय में सर्दियों की तुलना में गर्मियों में ज्यादा हो रही बर्फबारी का कारण पश्चिमी विक्षोभ में आई असमानता है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर होने से बारिश और बर्फबारी में कमी आ रही है। गर्मियों में इसके बढ़ने से बर्फबारी के साथ बारिश, ओलावृष्टि और आपदाओं के खतरे बढ़े हैं। पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी के मुताबिक, हिमालय में मौसम के बदले पैटर्न से आर्थिक और सामाजिक नुकसान का खतरा भी बढ़ा है। पश्चिमी विक्षोभ में आ रही असमानता से हर साल खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। इससे अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं। पर्यटन और हॉर्टिकल्चर प्रभावित होगा। ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया, तो आपदाओं के खतरे ज्यादा बढ़ेंगे। मार्च-अप्रैल में हो रही बर्फबारी से ग्लेशियर खतरे में हैं। डॉ. पंकज चौहान बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में धरती का तापमान अधिक रहता है। इससे बर्फ जिस गति से पड़ रही है, उसी गति से पिघल रही है और ग्लेशियर कमजोर पड़ रहे हैं। ये भविष्य में स्रोत-जलधाराओं को प्रभावित करेंगे। साथ ही आपदा के खतरों को भी बढ़ाएंगे। बर्फबारी के बदले पैटर्न ने हिमालय में ट्री लाइन को भी प्रभावित किया है। अलग-अलग घाटियों में ट्री लाइन पहले की तुलना में ऊपर खिसकी है। मध्य हिमालय में औसत ट्री लाइन 3600 मीटर तक मानी जाती है, लेकिन अब ये 3800 मीटर तक पहुंच रही है।
दूसरी ओर एक समाचार और भी पढ़ा जिसमें दूसरे ग्रहों में मानव बस्तियां बसा कर मानव एवं पृथ्वी की प्रजातियों को बचाने के अभियान की चर्चा थी। मुझे आद आया किस्सा ‘‘नूह की नाव’’ का। नूह की नाव की कहानी ‘‘कुरान’’ और ‘‘बाईबल’’ में दर्ज़ है। कहानी के अनुसार, जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बढ़े, तो ईश्वर/अल्लाह/याहोवा ने एक विनाशकारी जलप्रलय (महाबाधा) द्वारा दुष्ट दुष्टों को सजा देने का निर्णय लिया। ईश्वर ने अपने भक्त नूह को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया, क्योंकि वही एकमात्र नेक इंसान थे। पानी से बचने के लिए नाव को सील कर के वाटरप्रूफ बना दिया गया था। इसमें तीन मंजिलें थीं। नूह ने ईश्वर के निर्देशों के अनुसार अपने परिवार (पत्नी, तीन पुत्र और उनके अनुयायी) को पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव-जंतु, पशु-पक्षियों के नर और मादा जोड़े के साथ नाव में सुरक्षित रख लिया। जब सभी लोग और जानवर नाव में सुरक्षित चले गए। फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई और धरती जलमग्न हो गई। नाव के बाहर का सारा जीवन नष्ट हो गया। कई दिनों तक पानी में तैरने के बाद, जब बाढ़ का पानी कम होने लगा, तो नाव अरारत पर्वत (माउंट अरारत) की चोटियों पर जा टिकी और वहीं से धरती पर जीवन का पुनः विकास हुआ।
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में शूकर या वराह रूप में पृथ्वी पर जल प्रलय (रसतल) से भगवान विष्णु के तीसरे अवतार की कथा है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में दिति के पुत्र और दैत्य हिरण्यक्ष ने घोर तपस्या कर अपार शक्तियां प्राप्त कर लीं। उसने सभी लोकों पर अधिकार कर लिया और पृथ्वी को समुद्र तट (रसातल) की गहराई में छिपा दिया। पृथ्वी के जलमग्न होने से हाहाकार मच गया। तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर, उनके नासिका (नाक) से भगवान विष्णु एक छोटे से वराह (शूकर) के रूप में प्रकट हुए। देखते ही देखते वराह भगवान का आकार अत्यंत विशाल हो गया। वे समुद्र में गहरे उतर गए। हिरण्याक्ष ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी, लेकिन भगवान वराह ने उन्हें अपने वध से परास्त कर दिया। वराह भगवान ने अपने विशाल दांत (थूथनी) से पृथ्वी को स्थिर किया और जल के ऊपर उसे अपने मूल स्थान पर स्थापित कर दिया।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी महाकाव्य ‘‘कामायनी’’ की शुरुआत ही जल प्रलय (प्रलय प्रवाह) से की है। महाकाव्य के पहले सर्ग, जिसका नाम ‘‘चिंता’’ है, में शामिल हैं मनु हिमालय के विशाल शिखर पर बैठ कर प्रलय का दृश्य देख रहा है। ‘‘कामायनी’’ के अनुसार देव संस्कृति में भोग-विलासिता की भारी वृद्धि हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपना भीषण रूप दिखाया और जल प्रलय (महाजल-प्लावन) के द्वारा पूरी तरह से देव संस्कृति नष्ट हो गई। इस प्रलय के बाद केवल मनु ही जीवित बचा और उसने मानव जाति के पुनर्विकास को सुनिश्चित किया।
जल प्रलय और हिमयुग की अनेक कथाएं हैं। हॉलीवुड ने तो ‘‘आईस एज़’’ नाम से फिल्मों की एक श्रृंखला ही बना डाली। जिनमें डायनोसार युग के विशाकाय पशुओं के लुप्त होने की कड़ी और आई एज़ की भयावहता को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। दिलचस्प बात है कि इन फिल्मों को बच्चों से ले कर वयस्कों तक ने बहुत पसंद किया लेकिन उसमें कहे गए संदेश की गंभीरता को नहीं समझा। शायद हम मौसम को ले कर तात्कालिक चर्चा से आगे बढ़ने की प्रवृति खोते जा रहे हैं। जबकि वैज्ञानिक मानव व्यवहार में आते जा रहे परिवर्तन का आलन करते हुए निरंतर इस तथ्य से आगाह कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन में बदलाव का प्रभाव मानव व्यवहार पर भी पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई जलवायु और चरम मौसम का मानव व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इन लोगों में मानसिक तनाव और आक्रामकता बहुतायत है।। साथ ही, सीमित औपचारिकता के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के कारण मानवीय निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। अत्यधिक गर्मी और लू के दिनों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, जिससे लोगों में हिंसक व्यवहार और अपराध की दर में वृद्धि देखी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं, मधुमेह और मधुमेह के कारण होने वाले नुकसान से लोगों में ‘‘इको-एंजाइटी’’ (पर्यावरण चिंता), अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का खतरा बढ़ जाता है। खराब मौसम और राजनीतिक संकट के कारण लोगों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है, जिससे वे कई बार जोखिम और निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। रहने लायक जगह और पानी की कमी के कारण एक बड़े वर्ग का शहरों की ओर पलायन होना है। इससे भीड़-भाड़ वाले इलाकों में रहने लायक जगह और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। नई पीढ़ी के शारीरिक विकास और लंबाई में भी बदलाव आ रहे हैं। हम आजकल अकसर पढ़ते हैं कि कम आयुवर्ग में भी हार्ट के साईलेंट अटैक की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन घटनाओं के कारण में कुछ प्रतिशत प्रभाव जलवायु परिवर्तन का भी है। हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी का जितना श्रेय गरीबी और बेरोजगारी को है उतना ही उस एग्रेसिवनेस को जिसके चलते जल्दी गुस्सा आता है और इंसान बिना सोचे समझे हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है।
प्रश्न यह है कि कैसे रोका जा सकता है मौसम के पैटर्न में बदलाव और मानव स्वाभाव में आते जा रहे परिवर्तनों को? मौसम के पैटर्न (जलवायु परिवर्तन) और मानव स्वभाव में आ रहे नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के लिएव्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर ठोस कदम उठाना आवश्यक है। प्राकृतिक गैसों के उपयोग को कम करके मौसम में ही सुधारा जा सकता है। ग्रेड और तेल की जगह सौर ऊर्जा (सौर ऊर्जा), पवन ऊर्जा (पवन ऊर्जा), और पनबिजली के उपयोग को बढ़ावा देना। वनों की कटाई को रोकें और अधिक से अधिक वृक्षों की कटाई करें, ताकि कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक रूप से अवशोषित हो सके। सतत कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) यानी रासायनिक खादों के बजाय जैविक खेती का उपयोग करें, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और जल संरक्षण हो सके।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीक की लता और तनाव के कारण मानव स्वभाव में आक्रामकता और शरीर में कमी आ रही है। इसके लिए योग, ध्यान (मेडिटेशन) और प्राणायाम का दैनिक अवलोकन का हिस्सा। इससे मानसिक शांति और साहस बढ़ता है। स्क्रीन और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग सीमित करें। इसके बजाय परिवार, दोस्तों और प्रकृति के साथ वास्तविक समय जोड़ें। डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। यदि मन शांत रहेगा तो भौतिकता की अंधी दौड़ में पड़ कर प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और स्वयं तथा आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित कर सकेगा। यह समय है उन वैदिक मूल्यों की ओर जाने की जहां प्रकृति एवं पृथ्वी के संरक्षण के साथ मानव व्यवहार में आने वाले नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के उपाय सुझाए गए हैं। जरूरत है कि वैदिक ग्रंथों को मात्र धार्मिक ग्रंथों के रूप में देखने के बजाए जीवन रक्षक मूल्यों के रूप में देखने की। मौसम के पैटर्न और मानव स्वभाव में परिवर्तन को सुधारने कोई परग्रहवासी नहीं आएगा, इसे हमें ही सुधारना होगा।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 27.05.2026 को प्रकाशित)
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