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Friday, October 2, 2026
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Wednesday, September 30, 2026
चर्चा प्लस | चर्चा प्लस मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य डॉ (सुश्री) शरद सिंह
चर्चा प्लस
मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के किसी सदस्य को कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरा हिल जाता है। कई गंभीर बीमारियों का असली कारण है मिलावटी खाद्य सामग्री। जैसे अच्छी सेहत के लिए फल खाने और दूध पीने की सलाह जी जाती है। पकने से पूर्व तोड़े गए फल जिन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है क्या अच्छी सेहत दे सकते हैं? या फिर इंजेक्शन लगा कर निकाला गया दूध सेहत दे सकेगा? उस पर स्वास्थ्य सेवा की आसमान छूती मंहगाई मानो गरीबों के जीने का हक छीन लेना चाहती है।
चाहे पपीता हो या सेव बहुधा समय से पूर्व पेड़ों से तोड़ कर केमिकल द्वारा पकाए जाते हैं और जिन्हें खाने पर क्या-क्या साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं इससे आमजन बेखबर है। कभी-कभार समाचार पत्रों या पत्रिकाओं में इस संबंध में जागरूकता वाले लेख प्रकाशित होते भी हैं तो उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ कर अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि जब उपभोक्ता फलों के बाज़ार में पहुंचता है तो केमिकल्स से पकाए और चमकाए गए फलों की सुंदरता से मोहित हो कर भूल जाता है कि उसने क्या पढ़ा था अथवा वे फल कितने नुकसानदेह हैं। फिर मसला यह भी तो है कि सही फल कहां से मिलें? न तो हर व्यक्ति के पास बाग है और न बागीचा। दो कमरे या एक कमरे में रहने वाला परिवार अपने लिए फल नहीं उगा सकता। उसे तो बाज़ार में मिलने वाले फलों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यही दशा सब्जियों की है। बड़े आकार की सब्जियां चाहे लौकी हो या कद्दू संदेह के घेरे में रहता है। क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें तेजी से बड़ा करने के लिए इंजेक्शन और केमिकल वाली खाद दी जाती है। लेकिन क्या किया जाए, यदि सब्जी खानी है तो जहर की मिलावट को भी अनदेखा करना पड़ता है और बदले में मिलती है गंभीर बीमारियां।
फलों को जल्दी और कृत्रिम रूप से पकाने के लिए मुख्य रूप से एथिलीन गैस और कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग किया जाता है। एथिलीन गैस एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है और व्यावसायिक रूप से स्वीकृत है। यह फलों में पकने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू करता है। एथेफोन तरल रूप में आता है जो पौधों या फलों के संपर्क में आने पर एथिलीन गैस में बदल जाता है। कैल्शियम कार्बाइड आम भाषा में ‘‘कार्बाइड’’ कहा जाता है। यह पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो फलों को जल्दी पकाता है। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले और कैंसरकारी तत्व हो सकते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध है। खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार केवल नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस के प्रयोग की अनुमति है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती।
पैदा होने से ले कर मृत्यु तक दूध जीवन के एक अवश्यक तत्व के रूप में जुड़ा रहता है लेकिन जब दूध भी मिलावटी और नकली हो तो? पशुओं में दूध उतारने या उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का इंजेक्शन लगाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान ऑक्सीटोसिन युक्त दूध पीता है, तो पेट के एसिड और पाचक एंजाइम इस प्रोटीन हार्मोन को पचा कर नष्ट कर देते हैं। यह सक्रिय रूप से रक्त में नहीं पहुंचता है। हालांकि भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पशुओं में इसके अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसका सबसे बुरा असर पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। बार-बार ऑक्सीटोसिन देने से पशुओं में बांझपन, हॉर्मोनल असंतुलन, थनैला रोग (डंेजपजपे) और प्रजनन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
नकली या सिंथेटिक दूध को असली जैसा दिखाने और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए कई खतरनाक और जहरीले रसायन मिलाए जाते हैं। दूध में प्रोटीन और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए यूरिया मिलाया जाता है, जो किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। दूध में झाग बनाने और उसे सफेद दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पाचन तंत्र खराब होता है और उल्टी-दस्त की समस्या होती है। कास्टिक सोडा अथवा कास्टिक पोटाश केमिकल दूध को फटने से बचाता है और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाता है, लेकिन पेट की अंदरूनी परत को जला सकता है। सोया रिफाइंड या आर्टिफिशियल फैट दूध में फैट (चिकनाई) की मात्रा को नियंत्रित करने और उसे असली जैसा गाढ़ा दिखाने के लिए मिलाया जाता है। फॉर्मेलिन यह एक जहरीला प्रिजरवेट है जो दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। इसके लंबे समय तक सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड भी दूध को फटने से बचाने के लिए मिलाया जाता है जो पाचन एंजाइमों को नष्ट करता है। स्टार्च या मैदा पानी मिलाने के बाद दूध का पतलापन छुपाने और उसे गाढ़ा रखने के लिए स्टार्च मिलाया जाता है। क्या यूरिया और कास्अिक सोडा से बनने वाला नकली दूध सेहत दे सकता है?
हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सा मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 12 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं के मंहगे होने का एक मुख्य कारण है महंगे आयातित चिकित्सा उपकरण और उनके अपग्रेड होने की उच्च लागत। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में कुशल डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा स्टाफ के बढ़ते वेतन व शुल्क। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का बढ़ता प्रसार। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार भारत में लोग अपनी जेब से इलाज का भारी-भरकम हिस्सा अर्थात लगभग 63 प्रतिशत खुद चुकाते हैं। कुछ प्रमुख महंगे उपचार और लागत अनुमान इस प्रकार है-
हार्ट बाईपास सर्जरी - लगभग 1.6 लाख से 4.5 लाख रुपये ।
कैंसर उपचार (कीमो थेरेपी रेडिएशन)- लगभग 10 लाख से 25 लाख रुपये ।
लिवर ट्रांसप्लांट- लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये।
यदि इन बड़ी बीमारियों की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो मामली सर्दी-जुकाम के लिए चिकित्सक को दिखा कर ईलाज कराना मंहगा पड़ता है। यही कारण है कि नीम हकीमों का यानी फर्जी चिकित्सकों का धंधा जोरों पर चलता रहता है और आम आदमी अपनी जान जोखिम में डालता रहता है।
यह सच है कि सरकार और कुछ निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के द्वारा सहायता देती हैं जैसे सबसे लोकप्रिय सरकारी योजना है आयुष्मान योजना। लेकिन यह भी सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि साठ वर्ष की आये भी इसके लिए योग्य घोषित कर दी गई है किन्तु जब कोई साठ से सत्तर के बीच की आयु का व्यक्ति आयुष्मान कार्ड बनवाने का प्रयास करता है तो उसे निराशा हाथ लगती है। जो निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा का लाभ देती हैं वे पहले प्रीमियम भरवाती हैं, वह भी नियमित रूप। जिसके पास प्रीमियत भुगतान करने योग्य पैसे होंगे उसके लिए तो ठीक है किन्तु जो प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होगा उसका क्या होगा?
चाहे खाद्य सामग्री को दोष दें या लाईफ स्टाईल को मगर यह डरावना सच है कि पिछले दस वर्ष में घुटनों एवं जोड़ों की तकलीफ, मधुमेह, थायराइड, कोलोस्ट््राल बढ़ना आदि की समस्याएं कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में सबसे अधिक होने वाला प्रमुख हृदयरोग कोरोनरी धमनी रोग है, जिसके कारण अक्सर दिल का दौरा (हार्टअटैक) पड़ता है। इसमें हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में प्लाक (चर्बी और कोलेस्ट्रॉल) जमने से वे संकीर्ण हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप में धमनियों में रक्त का दबाव लगातार अधिक रहता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त जोर पड़ता है।हार्ट फेलियर में हृदय की मांसपेशियां इतनी कमजोर या सख्त हो जाती हैं कि वे शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाती हैं। अरिथ्मिया यह दिल की धड़कन के अनियमित, बहुत तेज या बहुत धीमी होने की स्थिति है।
हृदय रोगों के मुख्य कारण है फैट, नमक, चीनी और फास्ट फूड से भरपूर आहार। ये सभी मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से दिल कमजोर होता है और वजन बढ़ता है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं। तंबाकू और सिगरेट का धुआं धमनियों की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाता है। अत्यधिक और लगातार तनाव धमनियों को प्रभावित करता है और अन्य जोखिम कारकों को गंभीर बनाता है।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में आज सभी जानते हैं, सभी स्वस्थ भी रहना चाहते हैं किन्तु शुद्ध खाद्य सामग्री और सस्ती बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आमजन का स्वस्थ रहने का सपना कभी पूरा नहीं होने पाता है। कई निजी चिकित्सा केन्द्र तो ‘‘लुटेरे’’ के नाम से कुख्यात रहते हैं किन्तु स्वस्थ होने की चाहत उन्हें उन ‘‘लुटेरों’’ के हाथों लुटने को मजबूर कर देती है। इसका कारण यही है कि आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाऐं निजी सेवाओं के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई और जोखिम भरी हैं। इस स्थिति में सुधार हो सकता है यदि सरकारी स्तर पर ईमानदार प्रयास किए जाएं। आखिर जीने का अधिकार तो हर किसी को मिलना ही चाहिए।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 30.09.2026 को प्रकाशित)
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पुस्तक समीक्षा | आम मुस्लिम परिवारों पर बुनी गई इक्कीस कहानियां जिनके केंद्र में है स्त्री-संघर्ष | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
आम मुस्लिम परिवारों पर बुनी गई इक्कीस कहानियां जिनके केंद्र में है स्त्री-संघर्ष
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - कौन लगती है वह आपकी ?
लेखक - आर.के. तिवारी
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, सागर मो. 9039390856
मूल्य - 150/-
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कहानी हमेशा एक ऐसा संसार रचती है जिसमें यथार्थ की नई पर कल्पना का वह सुंदर महल खड़ा किया जाता है जो मानव मूल्यों को स्थापित करने में सक्षम हो। दरअसल वह लिखित या मौखिक रचना है, जिसमें किसी वास्तविक या काल्पनिक घटना, पात्र या जीवन के किसी एक पक्ष का रोचक और संक्षिप्त वर्णन होता है। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के अनुसार, कहानी में संपूर्ण जीवन का विस्तृत विश्लेषण नहीं होता, बल्कि उसके किसी एक चरित्र, अंग या परिस्थिति का मनोरम चित्रण होता है। वहीं आलोचक रामचंद्र शुक्ल मानते हैं कि कहानी व्यष्टि से समष्टि में प्रवेश करने का द्वार खोलती है।’’
‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’ सागर के कथाकार आरके तिवारी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इस संग्रह में उनकी 21 कहानी संग्रहित है। इन कहानियां की विशेषता यह है कि यह सभी आम मुस्लिम समाज के परिवार, उनके रीति-रिवाज एवं उनकी स्थिति-परिस्थिति पर केंद्रित हैं। कथाकार के तिवारी की कथा लेखन की यह खूबी है कि वे समाज के यथार्थ को भावनात्मक स्तर पर आकलन करते हुए कहानियां लिखते हैं। आरके तिवारी जी ने बैंकिंग जीवन से सेवानिवृत होने के बाद बतौर साहित्यकार शब्दों के निवेश में अपनी विशेष पहचान बनाई है। आज उनका नाम सागर के साहित्यकारों में प्रतिष्ठापूर्वक लिया जाता है। उनकी रचनाओं में गहरा सामाजिक सरोकार उपस्थित रहता है। उनकी कहानी आम जीवन के दुख-सुख का ताना-बाना बुनती है। चाहे व्यंग हों, लघु कथाएं हों अथवा लघु उपन्यास सभी में तिवारी जी का रचना कौशल स्पष्ट दिखाई देता है। वैसे उनकी अब तक 11 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जिनमें 5 कहानी संग्रह, 3 लघु उपन्यास, 2 काव्य संग्रह, 1 व्यंग्य संग्रह है।
नवीनतम कहानी संग्रह ‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’ पहली कहानी है ‘‘कासमी बेन’’। यह एक ऐसी महिला की कहानी है जो देश प्रेम को ही अपना धर्म मानती है। इस कहानी की पात्र तबस्सुम भारत-पाकिस्तान की सीमा में आतंकवाद ग्रस्त क्षेत्र में बच्चे को अपने सीने से लगाए हुए शहीद हो जाती है। यह मार्मिक कहानी है। यह इस विश्वास को दृढ़ करती है कि प्रत्येक भारतीय चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो देश के प्रति पहले समर्पित रहता है तथा प्रत्येक नागरिक शांति चाहता है। इस कहानी में एक स्त्री की अडिग इच्छाशक्ति भी स्पष्ट रेखांकित है।
डॉ. आनंद तिवारी, प्राचार्य, शास.उ. स्ना. कन्या महाविद्यालय, सागर ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि ‘‘प्रत्येक कहानी का अंत आशावादी संदेश से समाप्त होता है। कहानी का मुख्यपात्र आम आदमी जो परिवार हेतु संघर्ष कर रहा है, भावनात्मकता दृष्टि से कहानियों में प्रेम, करूणा, समर्पण, त्याग, पारिवारिक मूल्यों को प्रदर्शित किया गया है। भाषा शैली सरल सहज और समझने योग्य है, प्रत्येक कहानी पाठक को आकर्षित करती है, क्योंकि कहानियों में सद्भाव, संवेदना, सहानभूति जैसी भावनायें प्रबलता से है। यह संग्रह पूर्णतः मुस्लिम महिलाओं, परिवारों पर केन्द्रित हैं। जो एक विशेष बात है।’’
दूसरी कहानी है ‘‘गुलाबो’’। बच्चे तो आखिर बच्चे होते हैं कोमल, सुंदर, प्यारे-प्यारे। देवदूत से निर्मल एवं गुलाब के फूल जैसे मन को प्रफुल्लित कर देने वाले। नन्ही बच्ची गुलाबो भी ठीक एक गुलाब के फूल की तरह, सुंदर कोमल और निश्छल है। उसकी मां शकीला ने असलम से शादी सिर्फ इसीलिए की थी कि वह अपनी बेटी गुलाबो को एक अच्छी परवरिश के साथ एक पिता का प्यार भी उपलब्ध करा सके। लेकिन असलम के लिए वह एक सौतेली बेटी थी जिसे वह बात बात पर डांट देता था, झिड़क देता था। ऐसा लगता था कि वह गुलाबो को कभी अपनाएगा नहीं लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया और तब असलम को एहसास हुआ की गुलाबो उसकी अपनी सगी बेटी जैसी है क्योंकि बच्चे कभी सौतेली नहीं होते, बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। यह कहानी मानवीय संबंधों की रेशों की उलझन को सुलझाती हुई संवेदना का सुंदर ताना-बाना बुनती है।
तीसरी कहानी है ‘‘मायका’’। हर उसे स्त्री की दो दुनिया होती हैं जो विवाहित है। पहले दुनिया उसके मायके की होती है और दूसरी दुनिया ससुराल की। एक दुनिया से निकाल कर दूसरी दुनिया में प्रवेश करना और फिर उसमे स्वयं को राम देना आसान नहीं होता है। कई बार दूसरी दुनिया में निर्वाह करना कठिन हो जाता है तब उसे लौटना पड़ता है अपनी पहली दुनिया में जहां सब कुछ बदल चुका होता है। एक संघर्ष उसका स्वागत करता है जिस पर विजय पाना उसके लिए अनिवार्य है क्योंकि यही उसकी जीवन में परीक्षा की घड़ी भी होती है। यह कहानी आकार में भले ही छोटी है किंतु इसकी मुख्य पात्र साहिब के संघर्ष के रूप में एक भरपूर कथानक समेटे हुए हैं।
संग्रह में कई छोटी-छोटी कहानी है जैसे कम्मो, ईद की ईदी, हारुन मियां का दर्द, ख़ौफ़ बंदोबस्त आदि। इनमें ‘‘ईद की ईदी’’ एक बेहद मासूम कहानी है जो धर्म के नाम पर पलने वाले आपसी वैमनस्य पर तीखा प्रहार करती है। एक हिंदू व्यक्ति छोटी बच्ची को ईदी के रूप में पैसे दे कर एक पूरे मुस्लिम परिवार की मदद करता है जबकि ईद गुजरे कुछ महीने हो चुके हैं। यहां लेखक ने ईदी के सच्चे अर्थ को स्थापित करते हुए बताया है कि यह कोई ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ नहीं बल्कि इंसानियत और आपसी भाईचारे की प्रतीक का व्यवहार है।
लेखक एवं सिनेमैटोग्राफर माधव चंद्र ने कहानी संग्रह की कहानियों के बारे में विस्तृत टिप्पणी करते हुए ‘‘कौन लगती है वह आपकी ? लघु साहित्य की चैपाल से एक आवाज’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘साहित्य की दुनिया में कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो महज कहानी नहीं, बल्कि कौन लगती है वह? समाज के सीने में दबी हुई एक टीस होती हैं। यह 21 कहनियों का गुलदस्ता ‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’, इन्हीं टीसों को बड़े सादे ढंग से सामने रखती है। न इसमें कोई बड़ा दर्शन है, न कोई नाटकीय क्रांति। यह तो बस हमारे बीच की उस सच्चाई को दिखाती है, जहाँ रिश्तों पर रुतबे की धूल पड़ जाती है। लेखक, आर. के. तिवारी जी की यह किताब कौन लगती है वह आपकी? की इक्कीस कहनियों को पढ़ते हुए मेरा दिल बार-बार भर आया। जैसे कोई पुराना दोस्त कंधे पर हाथ रखकर कहे,देखो, जिंदगी इसी में है- दर्द में, प्यार में, भाईचारे में।’’
कहानी ‘‘शबीरा अंजुम’’ के आरंभ में ही कथाकार आरके तिवारी ने कथानक के स्वरूप से परिचित कराते हुए लिखा है कि ‘‘यह कहानी एक शबीरा अंजुम नाम की चित्रकार लड़की की है जिसकी परवरिश उसकी माँ ने की जिसे समाज की दकियानूशी विचारधारा और बेटियों के विरोधी मानसिकता वालों ने तलाक दे कर घर से बाहर कर दिया था पर वह हिम्मत नहीं हारी जो उनके गाल पर आजादी का एक तमाचा है।’’ वस्तुतः लड़की चाहे किसी भी धर्म या समाज की हो उसका संघर्ष एक लगभग एक-सा होता है। यदि उसे अपने परिवार से, अपने माता-पिता से सहारा मिल जाए तो वह हर एक संघर्ष में विजय पा सकती है। यही इस कहानी का मूल संदेश है। यह कहानी स्त्री की क्षमता और आत्मविश्वास की कहानी है।
कहानी “कौन लगती है वह आपकी” मालिक नौकर के आपसी संबंधों के झरोखे से मानवमूल्यों की तफ्तीश करती है। इसी कहानी का एक अंश है- “ऐसा कौन मालिक होगा जो अपने मुलाज़िमों की इस कदर फिक्र करता होगा कौन लगती है वह आपकी क्या रिश्ता है आपका और फिर उसी तेवर में बोली आप कुछ भी कहें! पर मुझे शक है कि फातीमा आपकी रखैल है और अब जब उसकी उम्र ढल गई तो अब आपकी नज़र उसकी जवान बेटी पर है। इतना सुनना था कि नवाब गुस्से से चीखते हुए बोले ! खामोश बदजात औरत ! तूं औरत के सारे कायदे भूल गई क्या! अपनी जुबान को लगाम दे वर्ना ! इतना कह नवाब कुछ और करे! कि तभी दरवाजे से एक जोरदार कड़क आवाज़ सुन कर सभी उसी ओर देखने लगे। वह आवाज़ और किसी की नहीं नवाब के चचा जान हामिद अंसारी की थी जो उसी शहर में अलग एक कोठी में अपने परिवार सहित रहते थे। जो कुछ दिनों पहले हज्ज के लिए गये थे और अभी हाल ही में लौटकर आये थे और आज अपने भतीजे नवाब नूर मोहम्मद से मिलने उनके घर आये पर यहाँ का माजरा देख गुस्से से रुबीना से बोले ऐ क्या बकवास लगा रखी है बहू! बेहूदी की हद हो गई तुम्हें कुछ पता भी है तुम अपने शौहर पर इतना घिनौना इलज़ाम लगा रही हो। तुम्हें पता भी है वह कितनी कशमकश की ज़िन्दगी जी रहा है! अरे उस खुदा का शुक्रिया अदा करो कि वह यह सब बरदास्त कर रहा है।”
हर अंधेरा भीतर से इतना स्याह भी नहीं होता जितना ऊपर से दिखाई देता है। हर नौकर बेईमान नहीं होता और हर मलिक क्रूर या शोषक नहीं होता। जहां मानवी संवेदनाएं होती हैं वहां मालिक और नौकर का आपसे रिश्ता एक दूसरे के पूरक के रूप में होता है किसी बेमेल रिश्ते की तरह नहीं। क्या कहानी एक ही एक अलग ही धरातल पर पाठकों से सीधा संवाद करती है और मन को छू जाती है।
“बंदोबस्त” कहानी मैं वर्णित परिस्थितियां किसी भी मजहब से जुड़े परिवार की हो सकती है क्योंकि दंगे फसाद मजहब के नाम पर होते हैं लेकिन उस पीड़ित होने वाले सिर्फ इंसान ही होते हैं। मात्र धर्म के आधार पर किसी को दंगाई मान लेना मानवीय कृत्य है। यह कहानी उसे परिवार की है जिसके एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति को दंगाई होने की संदेह में गिरफ्तार कर हवालात में डाल दिया जाता है। घर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। नन्हा बालक रसूल इन सब बातों से अनभिज्ञ है। वह मां से जिद करता है कि इस बार ईद में उसके लिए नया कुर्ता पजामा सिलवा दे। उसकी मां अपनी व्यवस्था पर रो पड़ती है। लेकिन जो व्यक्ति खांटी विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत से कम लेता है उसके लिए रास्ते खुद ब खुद निकल आते हैं।
कथाकार आर.के. तिवारी ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय एवं निम्न मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवारों की समस्याओं को प्राथमिकता दी है तथा उनका सकारात्मक हल भी अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से यह कहानी संग्रह न केवल पठनीय है अपितु मनन-चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। सभी कहानियां मुस्लिम परिवारों पर केंद्रित होने के कारण भी यह संग्रह विशिष्ट बन गया है।
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