चर्चा प्लस
भाजपा की भावी चुनावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
स्मृति ईरानी का संगठन में प्रभावशाली ढंग से कमबैक यानी पुनः आगमन को भाजपा की भावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ऐसा क्या हुआ की स्मृति ईरानी की भजपा पार्टी संगठन एक बार फिर आवश्यकता महसूस हुई। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो ज़ेन-जी के तीखे तेवर ने स्मृति ईरानी की पार्टी संगठन को याद दिला दी। अभिनय की दुनिया से राजनीति के मंच पर आईं स्मृति ईरानी कभी कद्दावर नेता के रूप में उभरीं तो कभी उन्हें बैकफुट में डाल दिया गया। फिर भी उनकी छाप स्थाई बनी रही। चलिए देखते हैं भारतीय जनता पार्टी की भावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ जो अब तक अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा है।
भारतीय जे़न-जी ने सारी दुनिया को बहुत कुछ सिखा दिया। रोजगार की तलाश में भटकते युवा, मल्टीनेशनल कंपनियों की चाकरी करने को तत्पर युवा, तमाम डिग्रियों के होते हुए परिवार का सहारा न बन पाने की गहरी निराशा से घिरा युवा इतना प्रखर आंदोलन भी कर सकता है, यह किसी ने भी नहीं सोचा होगा। आंदोलन का तरीका इतना नया होगा, यह भी किसी ने नहीं सोचा होगा। यदि तनिक भी अंदेशा रहता तो आंदोलन को समाप्त कराने में इतनी देर नहीं लगाई जाती। आंदोलन समाप्त हुआ लेकिन उसकी प्रतिध्वनियां आज भी राजनीतिक गलियारों में सुनी जा सकती हैं। इसका ताज़ा उदाहरण भारतीय जनता पार्टी के संगठन की नई कार्यकारिणी में स्मृति ईरानी की वापसी के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय जनता पार्टी की भावी रणनीति का मुख्य उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के आम चुनावों के लिए संगठन को धार देना है। पार्टी युवा और अनुभवी चेहरों संतुलित रूप में स्थान देती दिखाई दे रही है। पार्टी को स्मृति ईरानी के तीखे तेवर भी चाहिए जो उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों पर भाजपा की पकड़ को मजबूत कर सके।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर एक लोकप्रिय टीवी अभिनेत्री से लेकर भारतीय जनता पार्टी की शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व तक का रहा है। उतार-चढ़ाव से भरे इस सफर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं।
वर्ष 2003 में स्मृति ईरानी ने आधिकारिक तौर पर भाजपा की सदस्यता ली। वर्ष 2004 में उन्होंने चांदनी चैक लोकसभा सीट से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उन्हें महाराष्ट्र युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष बनाया गया और बाद में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व वर्ष 2010 में भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2011 और 2017रू वह गुजरात से राज्यसभा सांसद चुनी गईं। मोदी सरकार (2014) के पहले मंत्रिमंडल में उन्हें सबसे कम उम्र के मंत्रियों में शामिल किया गया और मानव संसाधन विकास जैसी अहम मंत्रालय की कमान सौंपी गई। इसके बाद उन्होंने कपड़ा मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का दायित्व भी संभाला। जब नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए थे तो उनके कैबिनेट में महत्वपूर्ण पदों पर नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह और अरुण जेटली जैसे अनुभवी लोग थे। साथ ही कैबिनेट में कुछ ऐसे चेहरे भी थे जिन्हें ज्यादा अनुभव नहीं था। फिर भी मोदी सरकार ने स्मृति ईरानी को एजुकेशन मिनिस्ट्री देकर सबको चैंका दिया। लेकिन स्मृति ईरानी विवादों की चपेट में आ गईं। ‘‘फेक डिग्री’’ विवाद से लेकर येल यूनिवर्सिटी में उनके कमेंट तक, केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत को तीसरी भाषा के तौर पर अनिवार्य बनाने और स्कूलों को 25 दिसंबर को ‘‘गुड गवर्नेंस डे’’ के तौर पर मनाने का निर्देश देने से लेकर रोहित वेमुला मामले तक स्मृति ईरानी समाचारों की सुर्खियां बनती रहीं और साशल मीडिया पर ट्र्ोल होती रहीं।
सन 2019 में लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश की हाई-प्रोफाइल अमेठी सीट से कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। लेकिन सन 2024 में आम चुनावों में अमेठी सीट पर स्मृति ईरानी को कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार का सामना करना पड़ा, जिसके कुछ समय बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से भी अलग होना पड़ा था।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ उतने ही रंग बदलता दिखता है जितना कोई टीवी सीरियल के पात्र की भूमिका। 2016 के बीच में उनसे एचआरडी पोर्टफोलियो ले लिया गया, 2017 के बीच में उन्हें आई एण्ड बी मिनिस्ट्री में वापस लाया गया, और फिर कुछ और आरोपों के बाद उन्हें हटा दिया गया। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू की, मगर तब तक ईरानी का प्रभाव समाप्त हो चला था। आखिर, उन्होंने कोई चुनाव नहीं जीता था, भले ही उन्होंने चांदनी चैक और अमेठी में जोरदार लड़ाई लड़ी थी किन्तु 2019 के चुनाव ने एक बार फिर सब बदल दिया। अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ उस एक जीत के साथ, ईरानी एक बड़ी ताकत बन गईं, एक ऐसी ताकत जिसकी भाजपा को जरूरत थी। सन् 2019 के चुनाव ने स्मृति ईरानी को भाजपा की जरूरत बना दिया। उन्हें एक ‘‘टूल’’ के रूप में भी तब-तब प्रयोग में लागा गया जब भजपा को राहुल गांधी पर हमला करना होता रहा, तो वह उन्हें तुरंत सामने लाया गया। ईरानी ने भाजपा को अमेठी में ऐसी जीत दिलाई जो पहले कभी नहीं मिली। भाजपा ने स्मृति ईरानी को 2014 में राहुल गांधी के मुकाबले अमेठी के चुनावी मैदान में उतरा तो स्मृति ने राहुल व गांधी व उनके परिवार को घर में ही घेरकर रखने की रणनीति पर कुछ ऐसा काम किया कि पूरा गांधी परिवार अमेठी-रायबरेली की राजनीति में उलझकर रह गया, जिसका लाभ भाजपा को भरपूर मिला। भाजपा लीडरशिप ने 2014 में स्मृति ईरानी को उनके राजनीतिक अनुभव से कहीं ज्यादा जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिससे वे लगभग असफल रहीं। इसके बाद उन्हें किनारे रखा गया।
मोदी 2.0 में स्मृति ईरानी को और अधिक मिलने की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। स्मृति ईरानी पिछले दो वर्ष से पार्टी को यह याद दिलाने में लगी रहीं कि उन्होंने भाजपा को एक बड़ी जीत दिलाई थी। लेकिन भाजपा मानो कुछ समय के लिए उनसे जुड़े विवादों से दूर रहने का मन बनाए बैठी थी। ऐसे में स्मृति ईरानी से एक पोर्टफोलियो छीना जाना स्वाभाविक था। यद्यपि उसी दौर भाजंपा नई काउंसिल में कुल 11 महिला मंत्रियों को रखने की बात कर रही थी।ं लेकिन फाइनेंस को छोड़कर, महिलाओं को जरूरी पोर्टफोलियो से दूर रखना भाजपा का ‘‘सेफ गेम’’ माना गया था।
अब मानो स्मृति ईरानी का राजनीतिक शक्ति की दृष्टि से ‘वनवास’ समाप्त हुआ है। भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया है। पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में संगठनात्मक कमान सौंप कर एक बड़ी जिम्मेदारी दी है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राहुल गांधी की बढ़ती तेजी औ ज़ेन-जी के आक्रामक तेवर ने पार्टी प्रमुखों को स्मृति ईरानी की याद दिला दी। यूं तो सांसद कंगना रानावत कई मौकों पर भाजपा की ओर से मोर्चा खोल देती हैं, किन्तु स्मृति ईरानी औ कंगना रानावत की छवि में बहुत अंतर है। स्मृति को अपने पूर्व के टीवी सीरियल की पारिवारिक छवि का भरपूर फायदा मिलता रहा है जबकि कंगना के पास ऐसी कोई मजबूत छवि नहीं है। कंगना आज भी स्मृति ईरानी की भांति मतदाताओं के दिल में जगह नहीं बना पाई हैं। इसीलिए पार्टी संगठन का स्मृति ईरानी पर भरोसा जताना स्वाभाविक है।
स्मृति ईरानी की अब तक की जीवन यात्रा भी किसी टीवी सीरियल की तरह रोचक रही है। स्मृति ईरानी का जन्म 23 मार्च 1976 को दिल्ली में हुआ और उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में ही शिक्षा ग्रहण की। अजय कुमार मल्होत्रा जो पंजाबी हैं, माता शिबानी बागची बंगाली हिंदू पृष्ठभूमि से हैं और जनसंघ से जुड़ी रहीं हैं। स्मृति ईरानी ने माॅडलिंग की और छोटी-मोटी नौकरियां भी कीं। वे मैकडॉनल्ड्स में वेट्रेस और क्लीनर के पद पर रहीं। स्विमवीयर में फोटोशूट भी किया। वे सन 1998 में फेमिना मिस इंडिया सौन्दर्य प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंची, किन्तु विजेता नहीं बन पायी। बाद में वे मुम्बई चली गईं, जहां उन्होंने वर्ष 2000 में टेलीवीजन सीरियल ‘‘हम है कल आज कल और कल’’ से अपने करियर की शुरुआत की। लेकिन उन्हें एकता कपूर के टीवी धारावाहिक ‘‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’’ में ‘तुलसी’ का केन्द्रीय किरदार निभाया और लोकप्रियता हासिल की। उस दौर में वे हर घर की चहेती बन गईं। उस किरदार के लिए उन्होंने अपना वजन भी बढ़ाया।
स्मृति ईरानी ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए पांच भारतीय टेलीविजन अकादमी अवार्ड, चार इंडियन टेली अवार्ड और आठ स्टार परिवार पुरस्कार जीते हैं। वर्ष 2001 में उन्होने जीटीवी पर प्रसारित ‘‘रामायण’’ में सीता का किरदार भी निभाया था। वर्ष 2006 में उन्होने बालाजी टेलीफिल्मस के अन्तर्गत ‘‘थोड़ी सी जमीन और थोड़ा सा आसमान’’ टीवी सीरियल में सह निदेशक की भूमिका अदा की। वर्ष 2008 में उन्होंने डांस पर आधारिक टीवी सीरियल ‘‘ये हैं जलवा’’ को साक्षी तंवर के साथ होस्ट किया।
स्मृति ने सन 2001 में जुबिन ईरानी से विवाह किया, जो पारसी हैं। इसके बाद वे स्मृति मल्होत्रा से स्मृति ईरानी बन गईं। उनके दो बच्चे हैं - जोहर ईरानी और जोइश ईरानी। जुबिन ईरानी की पूर्व पत्नी से भी एक संतान है शेनियल ईरानी जो जुबिन और स्मृति के साथ रहती है।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक जीवन वर्ष 2003 में तब शुरू हुआ जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ग्रहण की और दिल्ली के चांदनी चौक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा। हालांकि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल से हार गईं। वर्ष 2004 में इन्हें महाराष्ट्र यूथ विंग का उपाध्यक्ष बनाया गया। इन्हें पार्टी ने पांच बार केंद्रीय समिति के कार्यकारी सदस्य के रूप में मनोनीत किया और राष्ट्रीय सचिव के रूप में भी नियुक्त किया। वर्ष 2010 में उन्हें भाजपा महिला मोर्चा की कमान सौंपी गई। वर्ष 2011 में वे गुजरात से राज्यसभा की सांसद चुनी गई। इसी वर्ष इनको हिमाचल प्रदेश में महिला मोर्चे की भी कमान सौंप दी गई।
भारतीय आम चुनाव, 2014 में स्मृति ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास के खिलाफ अमेठी संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और उन्हें कड़ी चुनौती दी। यद्यपि वे यह भी चुनाव हार गईं, लेकिन राज्यसभा की सदस्य होने के नाते उन्हें भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया। 2019 के लोक सभा चुनाव ने स्मृति बेन ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को अमेठी में पराजित किया। लंबे समय तक राहुल गांधी को अमेठी में घेर कर रखने वाली स्मृति को भाजपा ने ऐसे समय में अपना महामंत्री बनाया है जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह पर सीधे तौर पर आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं। इससे इस बात का भी कयास लगाया जा रहा है कि भावी चुनावों में कांग्रेस व भाजपा के बीच पार्टी-प्रतिष्ठा की लड़ाई का मैदान एक बार फिर अमेठी-रायबरेली ही रहेगा। यह भी माना जा रहा है कि अमेठी के साथ रायबरेली व सुलतानपुर में भाजपा को मजबूती मिलेगी।
आम चुनाव 2024 में हार के बाद कांग्रेस की सक्रियता को कम करने के लिए और 2027 विधान सभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए भाजपा ने भी धरातल पर काम करना शुरू कर दिया। पांच विधान सभा क्षेत्रों वाली अमेठी संसदीय सीट की सलोन सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र भी रायबरेली का हिस्सा है तो जगदीशपुर विधान सभा का हलियापुर क्षेत्र सुलतानपुर का भूभाग है। 2014 से लेकर 2024 तक अमेठी में स्मृति ईरानी ने भाजपा के पक्ष में अपना प्रभाव स्थापित किया है। स्पष्ट है कि उनके इस प्रभाव का लाभ भजपा को आगामी चुनावों में भी मिलेगा। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 19.08.2026 को प्रकाशित)
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