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शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Thursday, March 26, 2026
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चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चाप्लस
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।
या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया।
नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं-
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।
मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।
उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।
हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 25.03.2026 को प्रकाशित)
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चर्चा प्लस | देवी दुर्गा को बहुत प्रिय है बारले अर्थात जौ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
देवी दुर्गा को बहुत प्रिय है बारले अर्थात जौ
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह सिंह
नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही जौ के बीज ‘‘ज्वारे’’ के रूप में बोए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि जौ कितना महत्वपूर्ण अनाज है? आप कहेंगे कि हाँ! आजकल इसे मोटे अनाज के रूप में खाने पर जोर दिया जा रहा है। इसे स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि हमारे वैदिक साहित्य में इसे ‘‘ब्रह्मा का अन्न’’ माना गया है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ है। इसीलिए इसे यज्ञ, हवन और जवारों में भी पवित्र अनाज के रूप में शामिल किया जाता है और देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है।
वर्तमान में पूरे विश्व में खाद्य समस्या और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए मोटे अनाज के उपयोग और उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। हमारे देश भारत में भी मोटे अनाज को खाद्यान्न के मूल आधार के रूप में देखा जा रहा है। ये मोटे अनाज हैं जौ, बाजरा, रागी आदि। ये सभी अनाज पहले हमारे भोजन की थाली में शामिल ते थे। लेकिन आधुनिकता और पाश्चात्य भोजन शैली के कारण ये हमारी भोजन की थाली से दूर होते चले गए। जबकि हमारे देश में, चाहे वे किसी भी धर्म से ताल्लुक रखते हों, सभी जानते हैं कि नवरात्रि की शुरुआत में ‘‘ज्वारे’’ बोए जाते हैं। यह एक तरह का धार्मिक अनुष्ठान है। इन बीजों को बोने का एक अर्थ यह भी है कि इससे देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अच्छी फसल का आशीर्वाद देती हैं। हालांकि इस संबंध में देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन सभी का मानना है कि देवी मां को जौ के बीज चढ़ाने से वे प्रसन्न होती हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ पसंद है। यह धरती पर उगाए जाने वाले सबसे पुराने अनाजों में से एक है। प्राचीन काल से ही इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता रहा है। संस्कृत में इसे ‘‘यव’’ कहा जाता है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और भारत में होता है।
नवरात्रि में जौ बोने का विशेष महत्व है। नवरात्रि में कलश और घटस्थापना के साथ ही घट में जौ (कभी-कभी गेहूं) बोया जाता है। मां दुर्गा को यह बहुत पसंद है। आइए जानते हैं क्या है इसका रहस्य। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ रूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत रखे जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में लोग अपने घरों में अखंड ज्योति जलाते हैं। साथ ही माता रानी के नौ रूपों की पूजा भी करते हैं। नवरात्रि में कलश स्थापना और जौ का बहुत महत्व होता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ ही जौ बोए जाते हैं। कहा जाता है कि इसके बिना मां अम्बे की पूजा अधूरी रहती है। कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। ऐसे में आइए आज जानते हैं कि नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक महत्व है?
जौ को भगवान ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तो वनस्पतियों में सबसे पहली फसल ‘‘जौ’’ ही थी। इसीलिए नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना के समय सबसे पहले जौ की पूजा की जाती है और कलश में भी इसे स्थापित किया जाता है।
पुराणों और वेदों में जौ (यव) को सबसे प्राचीन, पवित्र और पौष्टिक अन्न माना गया है, जिसे ‘‘यज्ञ का अन्न’’ कहा जाता है। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के समय जौ बोना धन-धान्य और समृद्धि का प्रतीक है। पुराणों के अनुसार, यह विष्णु का स्वरूप है और पितृ तर्पण में भी अनिवार्य है, जो यव-प्रिय (जौ को प्रेम करने वाला) कहलाता है।
सप्तधान्य श्लोक में यव यानी जौ का महत्व इन शब्दों में बताया गया है-
यवधान्यतिलाः कंगु मुद्गचणकश्यामकाः।
एतानि सप्तधान्यानि सर्वकार्येषु योजयेत्।।
(अर्थात जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना, और सांवा - ये सात प्रकार के धान्य सभी शुभ कार्यों में अनिवार्य हैं।)
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात।
- अर्थात अन्न ही ब्रह्म है। ऋग्वेद में जौ को दिव्य अन्न माना गया है।)
पौराणिक मान्यताओं में जौ को अन्नपूर्णा का स्वरूप माना गया है। शांति ऋषियों को सभी धान्यों में जौ सर्वाधिक प्रिय है। इसी कारण ऋषि तर्पण जौ से किया जाता है। पुराणों में कथा है कि जब जगतपिता ब्रह्मा ने ब्रह्मांड का निर्माण किया, तो वनस्पतियों के बीच उगने वाली पहली फसल जौ ही थी। इसी से जौ को पूर्ण सस्य यानी पूरी फसल भी कहा जाता है। यही कारण है कि नवरात्र में भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए जौ उगाए जाते हैं। सम्मान में किसी को सस्य देना अर्थात नवधान्य देना शुभ व कल्याणकारी माना गया है। नवरात्र उपासना में जौ उगाने का शास्त्रीय विधान है, जिससे सुख, और समृद्धि प्राप्त होती है। जौ को देवकार्य, पितृकार्य व सामाजिक कार्यों में अच्छा माना जाता है।
जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है, इसलिए जब भी देवी-देवताओं की पूजा या हवन किया जाता है तो जौ को ही अर्पित किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि जौ अन्न यानी ब्रह्मा के समान है और अन्न का हमेशा सम्मान करना चाहिए। इसलिए पूजा-पाठ में जौ का प्रयोग किया जाता है। नवरात्रि में कलश स्थापना के दौरान बोए गए जौ दो-तीन दिन में ही अंकुरित हो जाते हैं, लेकिन अगर ये अंकुरित न हों तो यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। ऐसी मान्यता है कि अगर दो-तीन दिन बाद भी अंकुर न निकलें तो इसका मतलब है कि कड़ी मेहनत के बाद ही फल मिलेगा। इसके अलावा अगर जौ उग आए हैं लेकिन उनका रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से आधा हरा है तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा तो ठीक रहेगा, लेकिन बाद में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। अगर बोए गए जौ सफेद या हरे रंग के उग रहे हैं तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। इसका मतलब है कि पूजा सफल रही। आने वाला पूरा साल खुशियों से भरा रहेगा। नवरात्रि के दिनों में कलश के सामने मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूं बोया जाता है और उसकी पूजा भी की जाती है। बाद में जब नौ दिन में जवारे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। देवी मां के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के लिए जब भी हवन किया जाता है तो उसमें जौ का बहुत महत्व होता है। जौ बोने से बारिश, फसल और व्यक्ति के भविष्य का भी अनुमान लगाया जाता है। कहा जाता है कि अगर जौ सही आकार और लंबाई में नहीं उगते हैं तो साल छोटा रहेगा और फसल भी कम होगी। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बोए गए जौ का रंग भी शुभ और अशुभ संकेत देता है। ऐसा माना जाता है कि अगर जौ का ऊपरी आधा भाग हरा और निचला आधा भाग पीला है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा अच्छा होगा और आधा मुश्किलों से भरा होगा। ऐसा माना जाता है कि अगर 2 से 3 दिन में जौ अंकुरित हो जाएं तो यह बहुत शुभ होता है और अगर आदि जौ नवरात्रि के अंत तक जौ नहीं उगते हैं, तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है। हालाँकि, कभी-कभी ऐसा होता है कि अगर जौ को ठीक से नहीं बोया है, तो भी जौ नहीं उगते हैं। इसके साथ ही, अगर जौ का रंग हरा है या सफेद हो गया है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल बहुत अच्छा होगा। इतना ही नहीं, देवी भगवती की कृपा से आपके जीवन में अपार सुख और समृद्धि आएगी। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान बोए गए जौ जितने अधिक बढ़ते हैं, उतनी ही अधिक देवी दुर्गा की कृपा बरसती है। यह इस बात का भी संकेत है कि व्यक्ति के घर में सुख और समृद्धि आएगी।
जौ बोने की रस्म हमें अपने भोजन और अनाज का हमेशा सम्मान करना सिखाती है। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि इस तरह खेती से न जुड़ा व्यक्ति भी खेती के काम को समझ पाता है। यहां तक कि परिवार के बच्चे भी ज्वार बोने और उसे हरा-भरा रखने में जरूरी सावधानियों को जान और समझ पाते हैं। स्वस्थ ज्वारे खेती के लिए मौसम को समझने में भी मदद करते हैं। जरा सोचिए जौ का मोटा अनाज कितना महत्वपूर्ण है, जिसे देवी मां को प्रसन्न करने के लिए उनके सामने उगाया जाता है और फिर नौ दिन बाद उन ज्वारों को देवी मां के साथ जल में विसर्जित कर दिया जाता है। यानी उन अनाजों को देवी मां के साथ ही भेज दिया जाता है, जैसे विदाई के समय रास्ते में किसी मेहमान को खाने के लिए खाना पैक करके दिया जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण अनाजों को हमें अपने रोजमर्रा के जीवन में अपनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि मोटा अनाज स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जौ जैसा मोटा अनाज खाने के बहुत लाभ हैं, जैसे- मोटे अनाज में प्रोटीन, खनिज, और विटामिन, चावल और गेहूं से तीन से पांच गुना ज्यादा होते हैं। मोटे अनाज में फाइबर काफी होता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। मोटे अनाज में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) होता है, जिससे मधुमेह की रोकथाम में मदद मिलती है। मोटे अनाज में कैल्शियम, आयरन, और जिंक जैसे खनिज होते हैं। मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और कैल्शियम की कमी को रोकते हैं। मोटे अनाज में मौजूद फाइबर की वजह से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, जिससे बार-बार खाने की जरूरत नहीं होती। मोटे अनाज खाने से एनीमिया का खतरा कम होता है। मोटे अनाज दिल के लिए भी अच्छे होते हैं।
खाद्य विशेषज्ञ मोटे अनाज खाने का तरीका भी सुझाते हैं। उनके अुनसार मोटे अनाज को हमेशा भिगोकर या अंकुरित करके खाना चाहिए। मोटे अनाज में फिटिक एसिड होता है, जो शरीर में बाकी पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं होने देता। लेकिन परंपरागत तरीकों से भी मोटे अनाज को खाया जा सकता है जैसे उबाल कर, पीस कर रोटी आदि के रूप में।
यही सब कारण हैं कि आजकल मोटे अनाज को स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ और इसकी भांति मोटे अनाज की श्रेणी में आनेे वाले अन्न ही हमें स्वास्थ्य एवं खद्यान्न संकट से भी उबार सकते हैं। अतः इस नवरात्रि से गर्व के साथ याद रखिए कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है और हम इसे उनके आशीर्वाद के रूप में अपनी खाद्यचर्या में शामिल कर सकते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 19.03.2026 को प्रकाशित)
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