Tuesday, July 28, 2026

पर्यावरण और जीवन के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति में एक जुनून जागने की जरूरत है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, मुख्य अतिथि, पर्यावरण जीवन संरक्षण परिषद, सागर द्वारा आयोजित परिचर्चा समारोह

"पर्यावरण और जीवन के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति में एक जुनून जागने की जरूरत है। जब हर व्यक्ति इस बात को समझेगा कि पर्यावरण और जीवन को नुकसान पहुंचा कर हम स्वयं के लिए कितना खतरा उत्पन्न कर रहे हैं तो वह जागरूक होगा और पॉलिथीन के उपयोग जैसे हर कार्य करना बंद कर देगा जिससे पर्यावरण और जीवन को चोट पहुंचे। इस प्रकार की परिचर्चा एवं संगोष्ठियों के द्वारा पर्यावरण और जीवन के प्रति जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सकता है यह एक सार्थक कदम है।" - कल बतौर मुख्य अतिथि मैंने पर्यावरण जीवन संरक्षण परिषद, सागर द्वारा आयोजित परिचर्चा समारोह में अपने विचार रखे। मैंने कहा कि "पर्यावरण और जीव संरक्षण एक ऐसा  ज्वलंत  विषय है जिस पर गंभीरता से बार-बार विचार करने की आवश्यकता है।"
     परिचर्चा समारोह की अध्यक्षता की सेवानिवृत्त फॉरेस्ट कंजरवेटर (IFS) बी पी उपाध्याय जी ने। विशिष्ट अतिथि थीं श्रुतिमुद्रा सांस्कृतिक समिति सागर की अध्यक्ष डॉ. कविता शुक्ला जी।
      पर्यावरण जीवन संरक्षण परिषद, सागर संस्था के अध्यक्ष एवं से. नि. सहायक वन संरक्षक आदरणीय आर सी चौकसे जी तथा संस्था के संरक्षक से.नि. सहायक वन संरक्षक आदरणीय पी एन मिश्रा ने जी श्यामलम संस्था के श्री उमाकांत मिश्र जी के सहयोग से इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस सफल आयोजन में सहभागी संस्थाएं थीं- भारत विकास परिषद सागर, राष्ट्रीय कल्चुरी परिषद सीहोर व सागर, सहज योग संस्था सागर तथा क्लीन सागर - ग्रीन सागर संस्था, सागर।
      सरस्वती वंदना की श्री मुकेश तिवारी जी ने तथा सफल संचालन किया श्री यू .एस.बी.गौर जी ने।
     इस आयोजन में शामिल होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई क्योंकि  पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति मैं अत्यंत संवेदनशील हूं तथा मैं हमेशा चाहती हूं कि उस पर चर्चा, विचार -विमर्श और चिंतन किया जाए ताकि हम सभी एक आम नागरिक की हैसियत से जलवायु परिवर्तन की गति को कम करने में अपनी भूमिका समझ सकें।   
   समारोह में श्री संतोष श्रीवास्तव 'विद्यार्थी', श्रीमती सुनीला सराफ, श्रीमती वर्षा जी, श्री हरि शुक्ला, श्रीसंतोष पाठक आदि बड़ीसंख्या में साहित्यकार एवं समाजसेवी उपस्थित थे।

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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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खंडकाव्य    - मंगा (बुंदेली बोली का हास्य प्रधान प्रथम खण्ड काव्य)
लेखक      - श्री बाबू लाल खरे
प्रकाशक    - स्क्राईब पब्लिकेशन्स 303, कुबेर हाउस 162, कंचनबाग, इन्दौर (म.प्र.)
मूल्य       - 150/-
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बुंदेली में वर्षों से प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है विशेष रूप से पद्य साहित्य। किंतु बहुत सा साहित्य ऐसा रहा जो प्रकाश में नहीं आ सका। डॉ बहादुर सिंह परमार जैसे मनीषी जो बुंदेली संस्कृति और भाषा के उत्थान में निरंतर लगे हुए हैं, उन्होंने बहुत से ऐसी  पांडुलिपियां ढूंढ निकालीं जो अप्रकाशित अवस्था में साहित्यकारों के वंशजों के पास मौजूद थीं। उनके वंशज नहीं जानते थे कि उस कृति को किस तरह से प्रकाशित किया जाए अथवा कई वंशजों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह साहित्य कितना महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार बुंदेली में लिखी गई कई पुस्तक ऐसी हैं जो प्रकाशित तो हुई किंतु जिन पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए थी अथवा वे पाठकों के हाथ में पहुंचनी चाहिए थी किंतु नहीं पहुंच सकीं। ऐसी ही एक पुस्तक की जानकारी मुझे पिछले दिनों प्राप्त हुई। अनायास शशी खरे जी जोकि रायपुर में निवासरत हैं और  स्वयं साहित्यकार हैं, उनसे मेरा संपर्क हुआ। चर्चा के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिताश्री ने बुंदेली में प्रथम हास्य खंडकाव्य लिखा था जो प्रकाशित भी हुआ। उसके कुछ अंश आकाशवाणी भोपाल से प्रसारित हुए। डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के प्राध्यापक डॉ बलभद्र तिवारी ने अपने ग्रंथ में उसका उल्लेख भी किया। फिर भी यह खंडकाव्य उतना चर्चित नहीं हो सका कितना कि उसे होना चाहिए था। दुर्भाग्य से पुस्तक प्रकाशित होने से पूर्व उसके रचनाकार दिवंगत हो गए, किंतु सुधि परिजन ने उस खंड काव्य को सुरुचि पूर्वक प्रकाशित कराया। खंडकाव्य का नाम है “मंगा”। 
 इस खंडकाव्य की विशेष बात यह भी है कि इसमें सागर की बुंदेली बोली का प्रयोग हुआ है क्योंकि रचयिता डॉ खरे सागर जिले के निवासी थे। श्री बाबू लाल खरे का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले की रहली तहसील में स्थित चरगुवां नामक एक छोटे से ग्राम में 11 नवम्बर 1917 को हुआ। पिता का नाम श्री भगवानदास तथा माता श्रीमती लक्ष्मीबाई था। धनाभाव तथा उस समय आसपास कोई उच्च शिक्षा की सुविधा वाले शिक्षालय के अभाव के कारण इन्हे ग्राम से दो मील दूर स्थित गौरझामर के मिडिल स्कूल में केवल सातवीं (हिन्दी) तक ही शिक्षा प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त हो सका। शिक्षाकाल में ये प्रायमरी से लेकर अन्त तक अपनी कक्षा में सदा प्रथम स्थान और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते रहे। सन् 1933 ई. में नार्मल स्कूल बिलासपुर की प्रवेश परीक्षा में सागर जिले से केवल दो छात्र चुने गए, जिनमें से एक बाबू लाल थे। प्रायमरी टीचर्स ट्रेनिंग परीक्षा में पूरे मध्यप्रदेश व बरार में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उन्होंने ‘‘स्पेन्स मैडल’’ प्राप्त किया। जून 1935 में थोड़े दिनों तक  मिडिल स्कूल तखतपूर (बिलासपुर) में, अगस्त 1936 से म्युनिसिपल प्राथमिक शाला देवालानाका सागर में और दिसम्बर 1936 में गवर्नमेन्ट केन्टोन्मेन्ट स्कूल नं. 1, सदर बाजार सागर में अध्यापक रहने के पश्चात् ये सन् 1948 में नार्मल स्कूल सागर के प्रेक्टिसिंग स्कूल में अधिपाठक के रूप में स्थानान्तरित हुए। सन् 1940 में पिता के स्वर्गवासी होने से एक बड़े परिवार के पालन और शिक्षण का भार इन पर आ जाने के कारण इन्हें अत्यधिक अर्थाभाव रूग्णता और चिन्ताओं से अत्यधिक कष्ट झेलना पड़े। तीन छोटे भाईयों और दो बहनों की शिक्षा तथा विवाह के उत्तरदायित्व से निवृत हो कर बाबू लाल खरे ने सन् 1949 से स्वध्यायी छात्र के रूप में विशारद तथा मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। फलतः नार्मल स्कूल में अध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली। इसके पश्चात् उन्होंने साहित्य रत्न तथा सागर विश्वविद्यालय से इन्टर, बी.ए. तथा एम.ए. की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन्टर तथा एम.ए. में इन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम तथा बी.ए. में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। सन् 1956 में एम.ए. करने के पश्चात् इन्होंने पी.जी.बी.टी. कालेज जबलपुर से वी.टी. (बेसिक) परीक्षा (सन् 1957) में सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों में प्रथम श्रेणी तथा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए उत्तीर्ण की तथा विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक प्राप्त किया। अगस्त 1957 में म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयन के उपरांत शासकीय महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर चयन हुआ। इसके उपरांत विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में असि. प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग के पद पर कार्य किया। कुछ अवधि के लिए शासकीय महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य भी किया। बाबू लाल खरे ने ‘‘रस सिद्धान्त की परम्परा तथा शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा’’ विषय पर विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के तत्कालीन उप-कुलपति डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन के मार्ग-दर्शन में शोध कार्य प्रारंभ किया। दुर्भाग्यवश जिसके पूर्ण होने के पूर्व ही बाबू लाल खरे का निधन हो गया।  बाबू लाल खरे  का खंड काव्य “मंगा”  हास्यरस का होते हुए भी सामाजिक यथार्थ  कुछ चुटीले अंदाज में सामने रखता है।  इस खंडकाव्य में मुहावरेदार भाषा का स्वरूप और सहज भावभिव्यंजना  अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। सन् 1946 में आरम्भ हुआ खंडकाव्य ‘‘मंगा’’ में 1972 तक कई और अध्याय जुड़ने के बाद पूर्ण हुआ। करीब साठ दशक पहले रचा गया यह हास्य खण्ड काव्य आज भी समसामयिक व सटीक लगता है। इसमें खांटी व्यंजनात्मकता है, शिष्ट हास्य है तथा बुंदेली रीति-रिवाज की आकर्षक झलक है। 
‘‘मंगा’’ कथा है, बुंदेलखंड के सीधे-साधे, ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े, आलसी, अनपढ़ इंसान मंगा की। मंगा मेहनत नहीं करना चाहता है लेकिन ज़िन्दगी आराम से गुजारना चाहता है। इसीलिए दो स्त्रियों का पति बन कर उनकी मेहनत व कमाई के बूते चैन की जिंदगी गुजारने की उसकी इच्छा उस पर भारी पड़ती है। अपनी दुर्दशा से उबर कर, सही राह पर, मंगा किस तरह आता है, यही इस काव्य का मूल कथानक है। इस काव्य में संवाद भी हैं जो हास्य रस उत्पन्न करने में सक्षम हैं। व्यंग भी है और छिपा संदेश भी। कई स्थानों पर तो पढ़ कर हंसी रोके नहीं रुकती है। बानगी देखिए -
काट कूट कें गऔ सपरबे 
नरवा में जब बौ बूड़ौ, 
हाँत पाँव गये ठिठुर
काए कै पानी तौ बिकटई जूड़ौं।
सपरखोर कें मंगा नें, 
चाही कै बजाएँ हम बाजौ,
ठिठुरे हाँ ता बजी नें चुटकी,
अरे राम, हो गऔ का जौ!
पानी में गिर गऔ-जान कें 
झार चुटैया सें छूटी, 
इत्ती महँगी चीज हिरानी 
अरे बाप! किस्मत फूटी।
(पृ 9)
अनाज समाप्त हो जाने पर आलसी मंगा से उसकी पत्नी मुलिया अनाज लाने को कहती है लेकिन मंगा उसकी अनसुनी कर देता है तब मुलिया उसे खरी-खोटी सुनाती है। इस दृश्य में एक स्त्री के सहज भाव हैं जो अलसी पति से तंग आ चुकी है-
मुलिया बोली, का कएं तुमसें, कैसें हम जे दिन काटें।
कौन करम के है, तुमखों का हम बैठे-बैठे चाटें।
पुरुष प्रधान समाज की इस विडम्बना को कवि ने बड़ी बारीकी से प्रस्तुत कर दिया है कि पुरुष चाहे काम करे या न करे, दोष स्त्री के सिर पर ही मढ़ा जाता है। इसीलिए मुलिया की बात सुन कर मंगा अकड़ दिखाते हुए कहता है-
मंगा बोलौ - इतै पेट में कूँदत खूब बिलैयें हैं।
तें बैठी है सास्तर पड़बे कैसीं बरै लुगैयें हैं!
पहर भरे सें चल रइ तोरे थूथर की पैनी कैंची।
भाजी सी पौलबे खंगी है सोचत नइँ ऊँची-नैंची ।।
मुलिया की गुस्साँ बड़ बैठी जो मंगा नें दै डाँटौ ।
रोउन लगी, कही मंगा नें-पटा डार तें तौ भाटौं ।।
गोरा नोंनें भलाँ लुगाईं उनकीं रोउत तौ नइयाँ ।
जब देखौ घूमत बजार में डारें बइँयाँ में बइँयाँ ।।
चुवन लगत हैं तोरे नैनाँ तनक-तनक सी बातों में।
अब जानी कै लातों की देवी नें मान है बातों में।।
(पृ 34)
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। जब मुलिया के पास दाल नहीं गलती है तो मंगा गंगिया के आगे हाथ फैलाता लेकिन सीधे-सीधे नहीं, वरन प्रेम जताने का नाटक करते हुए-
अरे, प्रेम के भूके हैं हम तौ, सुन ले मोरी गंगा!
छोड़ौ बातें, खाबे दे जो हो बै सो, - बोलौ मंगा ।।
पानी-पानी भई गंगिया सुन कें बातें भोरी-सीं ।
खुवा खूब पकवान, मिठाई बचत हती जो थोरी सी ।।
रहे कछू दिन इतै मजे में फ़िर आ गई फाँके-मस्ती ।
मंगा नें सोची कै- जा तौ जुगत मिली अच्छी सस्ती ।।
थोरौ-भौत कछू तौ मुलिया नें जोरौ हुइऐ अब लौं ।
उतै कछू दिन रहौ, गंगिया लैहै जोर कछू जब लौं ।।
सो गंगा सें लड़े और मुलिया के घर फिर कें आये।
ऐंसई पारी-पारी सें दोई के खूब प्रान खाये ।।
(पृ 60)
‘‘मंगा’’ एक ऐसा खंडकाव्य है जो प्रकाशित हो कर भी पर्याप्त चर्चा में नहीं आ पाया। किन्तु अच्छी कृति पानी की भांति देर-सबेर अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है। प्रकाशन के बाद नेपथ्य में अर्थात समय के पन्नों में दब जाने के बाद एक बार फिर ‘‘मंगा’’ ने पाठकों के घर के दरवाजे पर दस्तक दी है। बुंदेली को समृद्ध करने वाली यह कृति बुंदेली के हर पाठक के लिए रोचक एवं हास्य से भरपूर है। इसमें बुंदेली की सोधी महक है और मिठास के साथ मिलनसारिता भी है। इस खंड काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें हर पन्ने पर फुटनोट्स में बुंदेली के हिन्दी शब्दार्थ दिए गए हैं। बुंदेली साहित्य की समृद्धि को जानने के लिए स्व. बाबू लाल खरे की इस कृति को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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आचरण,  28.07.2026
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Saturday, July 25, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | तला में कूंदे से कछू हल निकलहे का, जिनगी इत्ती फालतू की नोंई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली

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तला में कूंदे से कछू हल निकलहे का, जिनगी इत्ती फालतू की नोंई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   अभईं चार दिनां पैले हम घूमबे के लाने तनक देर को कारीडोर पे गए रए। ऊ दिनां तनक उमस हती सो कारीडोर पे तला की हवा खा के अच्छो सो लगो। उते रेलिंग पे कछू दूर लौं जाली लगी दिखानी सो बतकाव होन लगी के लोग इते से तला में कूंद-कूंद के अपनी जान देन लगे जेई से जाली लगाने पर रई। कारीडोर से तला को देखबे को मजा खराब हो जाहे। सो, हमने कई के ईसे का, जो इते जाली लगाई जाहे सो कूंदबे वारे उते से कूंद जाहें। कूंदने वारन खों का? मनों बात तो जे आए के जान काए खों दई जाए? जिनगी इत्ती फालतू की आए का? अरे, सबई की जिनगी में कोऊ ने कोऊ दुख पीरा लगी रैत आए। कभऊं-कभऊं ऐसो समै बी आत आए जबें मरबे को जी करन लगत आए। हमाई जिनगी में बी ऐसो समै आओ रओ, कोरोना के टेम पे। मनों हमने सोची के हमाई मताई औ दीदी ने अपनी जिनगी लगा दई हमें खुसी से राखने खों, तो अब उन ओरन के ने रैने पे का हमें सोई मर जाने चाइए? उनके किए-धरे पे पानी फेर दओ चाइए? कभऊं नईं। हमाए ऐसो करे से उनें दुख हुइए, बे जां बी हुइएं। संगे हमने जेबी सोची के जो हमाई घड़ी आ गई होती तो कोरोना से हम सोई निपट गए होते। जो ऊपरवारे ने हमें छोड़ दओ तो कछू सोच के छोड़ी हुइए। औ सई में, हमने जीने की हिम्मत करी तो मुतके लोगन ने हमाओ साथ दओ। सो, खुद को मारबे से कछू नई मिलत। जो खुद पे भरोसो राखो औ जीबे की हिम्मत करो, लोगन से बात करो, सो बा दुख, पीरा औ मुसीबत पांछे छूटत जात आए। अब तनक सोचियो के तुमने तो तला में कुद्दी लगा दई औ मर गए, मनों तुमाए पांछू रै गए मताई,बाप, बैन,भाई तुमाए लानें कित्ते कलपहें? सो, बहादुरी मरबे में नोंईं जीबे में आए। सो तला खों सुसाइड प्वाइंट ने बनाओ औ बहादुरी से जिंदा रओ!
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Thank you Patrika 🙏
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बतकाव बिन्ना की | ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती, सई न! अब आप सोचहो के कोन टेम पे? हम कब की कै रए? ऊ टेम की जब हम बालपन में रए। ऊंसई बी बे ओरें सब जने हमाई बात समझ जैहें जोन के बालपन में मोबाईल औ टीवी ने रओ। ऊ टेम पे बच्चा हरों के मन बैलाओ के दोई तरीका हते। एक तो खेलबे को औ दूसरो किसां सुनबे को। सो, आज बतकाव खेलबे की। का होत्तो के स्कूल से लौट के दिन को उजियारा रैत भर तो हम ओरें खेलत रैत्ते, मनों संझा होतई सात हमें डांट-डपट के घर के भीतरे बुला लओ जात्तो। 
‘‘चलो हात-मों धो लेओ। कपड़ा बदल लेओ औ पढ़बे बैठ जाओ।’’ हम ओरें सबई खों अपने-अपने घरे जेई सुनबे को मिलत्तो। 
अब पढ़बे के लाने तो बैठनेई परत्तो। जो ने बैठते तो मताई चार लपाड़े सूंट देतीं। बाकी हमाई मताई ऐसी ने हतीं औ ने हम ऐसे हते के मताई को कओ ने मानें। सो हमें तो डांट ने घलत्ती, पर हमाए संगी साथियन में लड़का हरों खो जरूर घल जात्ती। ऊंसई बी बिटियां ऐंड़ ने देती हती, ऊ टेम पे तनक बिगरे मोड़ा हरें ई ऐंड़ देत्ते औ मताई-बाप से कुटत्ते। हमाओ बालपन तो सरकारी कालोनी में गुजरो, जिते छै मकान हते। सो हम छैओ मकान के मोड़ा-मोड़ी संगे खेलत्ते। ऊ टेम पे हम ओरों में कोऊ खों जे ने सूझत्तो के जे मोड़ा आएं औ जे मोड़ियां आएं। हम सबरे बच्चा एक संगे खेलत्ते। जेई से हम गुल्ली-डंडा, कंचा, काना-दुआ, लुका-छिपी, खिपड़ी गद्दा, कबड्डी, खो-खो, नदी-पहार, पुतरा-पुतरियां बगैरा, मने मोड़ा औ मोड़ियन दोई को खेल खेलत्ते। बा तो बाद में जब मोड़ा हरें तनक बड़े भए तो उनें किरकेट में मन लगन लगो औ हम मोड़ियां खिपड़ी गद्दा खेलत रईं। बाकी हमने किरकेट बी खेलो। पर ज्यादा नोंईं। काए से के मताई को डर हतो के कई हम अपनों मूंड़ ने फुड़वा लें। बाकी तनक बड़े होबे पे हमने सायकिल खूब चलाई।
लेकन हम बात कर रए हते बालपन के खेल की। औ जे हमें ईंसे याद आ रए के जबे पानी बरसत्तो औ हम सबई घर पे होत्ते तो कभऊं काना-दुआ खेलत्ते, तो कभऊं चपेटा खेलत्ते। ऊ टेम पे जा कैरम-फैरम बी सबके घरे ने होत्ते। काना-दुआ घांई एक-दो गेम औ होत्ते। एक में तो गुना को आकार की लकीरें खेंची जात्तीं औ ऊमें आड़ी लकीरें सोई भरी जात्तीं। लकीरन के हर जोड़ पे गोटियां धरी जात्तीं। इमली के बीजा की चइयां से गोटिया चलाई जात्तीं। जो वारो गेम बे ओरें बी खेलत्ते जोन गइयां-बुकरियां चराबे के लाने हारे जात्ते। ई गेम को हम नांव भूल रए। जो कोनऊं खों याद आए सो हमें बताइयो। 
चपेटा खेलबे के लाने लाख के बने रंग-गिरंगा चपेटा उंगरियन से तौल-तौल के लए जात्ते। भारी चपेटा अच्छे माने जात्ते। मनों बे कभऊं जो उल्टे हात पे गिरत्ते तो उंगरियां ठन्ना जात्तीं। सो, मोए हरये चपेटा नोंने लगत्ते। घरे भीतरे बैठ के सांप-सीढ़ी खेलबे में बी खूबई मजो आउत्तो। मनो ऊ टेप पे मूंड़ भिन्ना जात्तो जबे निन्यानबे पे पौचों औ सांप के मों में पौंच के सूदे नीचे दस्सी पे आ गिरो। ऊ टेम पे बा सांप-सीढ़ी को आबिस्कार करबे वारे खों गरियाबे को जी करत्तो। अब इत्ते से गेम में इत्तो लंबो सांप बनाबे की का जरूरत हती? तनक छोटो सो सांप बना देते तो उनको का बिगर जातो? रस्ता में सो ऊंसई मुतके सांप मिलत्ते। खैर, अब हम तो ने बदल सकत्ते ऊकी डिजाइन। बाकी आतो भौत मजो रओ। 
एक और इनडोर गेम रओ जी को नांव हतो लंगड़ी-धप्पा। जे बरांडा औ आंगन , ने तो छतों पे खेलो जात्तो। ई में कम से कम आठ घर, ने तो दस-बारा जित्ते चाओ उत्ते घर बनाए जात्ते औ ऊपे हर घर में एक टांग से उचकत भए बा खिपरिया सरकानी रैत्ती जो खेल सुरू होबे पे फेंक के घरे डारी जात्ती। अब सोचो तो लगत आए के ऊ टेम पे सरीर कित्तो हरय रओ के फुदकत से उचकत रैत्ते जैसे लंगड़ी दुआ-छुअब्बल में होत्तो। अब तो दोई टांग से उत्तो नईं उचक सकत, एक की तो छोरो। औ जो कऊं कोसिस कर के देखी तो कओ घूंटा पिरान लगे।  
कंचा बी बड़े औ छोटे दोई किसम के होत्ते। रामधई! कंचा सो कभऊं दिमाग से निकरई ने पाओ। काए से के जब बी कभऊं कोनऊं के आफिस में कांच को पेपरवेट दिखानो तो हमें बालपन के कंचा याद आने लगत्ते। कंचा खेलबे में भी बड़े नियम-कायदा रैत्ते। कंचा को उंगरिया से चटका के घुच्चू में डारो जात्तो। जोन को कंचा घुच्चू में चलो गओ, बा जीतो कहात्तो औ जोन को कंचा घुच्चू से बायरे रै जात्तो ऊको उंगरिया से ठेल-ठेल के कंचा को घूच्चू में डारबे की कोसिस करने परत्ती। औ कऊं तब बी ने डार पाए तो एक टेम ऐसो आत्तो जबे हात की कोहनी से कंचा धकिया के घूच्चू में डारने परत्तो। ई चक्कर में कोहनी छिल जात्ती। घुच्चू में डारबे से पैले एक कंचा से दूसरो कंचा सोई पीटो जात्तो। औ जो हार गए सो अपनो कंचा जीतबे वारे को देने परत्तो। अब तो कंचा खेलबे वारे गांव-दिहात में ई दिखात आएं। बा बी भौतई कम। काए से के अब तो बच्च हरें बी मोबाईल में जुटे रैत आएं। 
गिल्ली डंडा सोई भौतई मजे को गेम रओ। दोई तरफी से नुक्कीदार गिल्ली औ एक से डेढ़ फुट को डंडा। देखो जाए तो ऊको मजा किरकेट से कम नईं रओ। औ किरकेट घांई ऊमें बी दूसरी टीम के बच्चा हरें घेर के ठाड़े रैत्ते। फेर जैसई गिल्ली उचकाई जात्ती ऊंसई ऊको लोकबे के लाने सबरे दौर परत्ते। सो उचकाबे वारो कोसिस करत्तो के ऊ तरफी गिल्ली उचकाई जाए जी तरफी कोऊ लोकबे वारो ने होए। कोऊ-कोऊ सिक्सर लगाबे वारी स्टाईल में गिल्ली खों सूंटत्ते। ईंसे उनकी गिल्ली तो कोऊं ने लोक पाउत्तो, मनों उनकी गिल्ली उते से गुजरबे वारों के कभऊं मूंड़ में घलत्ती तो कभऊं कोनऊं के घरे की खिरकी के कांच फोड़त्ती। ऊके बाद तो आप समझतई हो के का होत रओ हुइए? गुल्ली डंडा के बदले महाभारत होन लगत्ती। यां तक तो ठीक आए मनो एक-दो बेर तो ऐसो भओ के कोनऊं के आंख में घली औ ने तो मूंड़ फूटो। जेई सब से बाद में हमाई मताई ने हम ओरन खों गुल्ली-डंडा खेलबे की मनाई कर दई रई। दूसरे की आंख फूटे सो सल्ल औ अपनी फूटे सो सल्ल। 
अब का आए के बच्चा हरें मोबाईल औ लेपटाप पे गेम खेलत एक जांगा बैठे दिखात आएं। ने तो रील देखत रैत आएं। औ मताई-बाप सोई मोबाईल में जुटे रैत आएं सो बे बी जा नईं देख पाऊत आएं के उनको बच्चा ठलुआ बनो जा रओ। जोन उमर में कूंद-फांद के सरीर बनाओ चाइए ऊ उमर में एक जांगा पे पसरे रैबे से का हुइए? फेर होत का आए के जब उनई मोड़ा-मोड़ी को हारमोन बदलत आए तो उने समझ में आन लगत आए के हमें तो स्लिम औ सुंदर दिखने, सिक्स पैक बनाने। सो, बे पिल परत आएं जिम जा के। फेर भले चाए कछू हो जाए। उतई दूसरी बात के जब मोबाईल पे सब कछू बनो-बनाओ देख लेओ तो अपने लाने सोचबे को कछू नईं रै जात। मने कल्पना करबे की सक्ती नईं रै जात। पर का करो जाए, समै तो बदलत आए। जो समै को नियम आए। अब समै के संगे कछू नओ, कछू पुरानो ले के चलो तो सब ठीक रैहे। औ सम्हर के ने चलहो सो ने तो हम का उखार लेबी?      
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती। जे सोई बताइयो के आप ओरन ने अपने बालपन में इनमें से कोनऊ खेल खेलो के नईं? औ हां, जो गेम हमेंयाद ने आए बे सोई याद दिला दइयो। जै-जै!!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, July 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - छोटी बड़ी इबारतें
लेखक      - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली -110012
मूल्य        - 399/-
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साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं, समय का इतिहास, संवेदनाओं का इतिहास, भावनाओं का इतिहास। शैली कोई भी हो सकती है गद्य या पद्य, या दोनों। जो साहित्यिक कृति मन को छू लेती है विचारों को आंदोलन कर देती है, वही इतिहास की तरह मानस के दस्तावेज में ढल जाती है। ‘‘इबारत’’ का शाब्दिक अर्थ है लिखावट, लेख, या गद्यांश। यह अरबी मूल का शब्द है जिसका प्रयोग अक्सर किसी दस्तावेज़, पुस्तक, या आलेख में लिखे गए शब्दों या वाक्यों की संरचना को दर्शाने के लिए किया जाता है। चर्चित वरिष्ठ लेखक हरजिंदर सिंह सेठी ने ऐसी ही इतिहास रचने वाली कृतियों एवं मुंबई की साहित्यिक उपलब्धियों पर अपने विचारों को संग्रह का रूप दे कर अपने आप में एक दस्तावेज रच दिया है। इसमें उनके द्वारा की गई समीक्षाएं, लेख एवं अनुशीलन भी है। साथ उन महत्वपूर्ण बिन्दुओं का विवरण है जिन्होंने मुंबई को निरंतर साहित्यिक वातावरण दिया। हरजिंदर सिंह सेठी की इस पुस्तक का नाम है- ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’। 
      इस पुस्तक में विचारों का एक सुरुचि पूर्ण संवाद है जो साहित्य के विविध व्यक्तित्व एवं उनकी सृजनधर्मिता से परिचित कराने के साथ ही तत्संबंधी वातावरण तैयार करने वाले कारकों की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है। इस दृष्टि से ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ मायानगरी मुंबई और आर्थिक केन्द्र मुंबई के साहित्यिक पक्ष से गहराई से परिचित कराती है।
      22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद (उ.प्र.) में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी की शिक्षा मुंबई में हुई और उनका कार्यक्षेत्र भी मुम्बई रहा। उनकी पहचान एक प्रगतिशील चेतना के लेखक एवं कवि के रूप में है। उनके लेखन में विषय की बहुत विविधता है। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) 1995, यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह) 2000, सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास) 2003, कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण) 2011, नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) 2015, बादशाह दरवेश (जीवन गाथा) 2017, मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) 2025। कुछ रचनाओं का प्रकाशन पंजाबी एवं गुजराती में भी। इनमें से गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) तथा मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) मैंने पढ़ा है तथा कविताओं की समीक्षा भी की है। उनका लेखन प्रभावी है। लेखन के साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सम्पादन भी किए हैं जिनमें हैं- ‘‘पानी के ताप में’’ भगवत लाल उत्पल की कविताओं का सम्पादन (1996), ‘‘मेरे मन सांझ हुई’’ डॉ. रविनाथ सिंह की कविताओं का सम्पादन (2007) एवं ‘‘एन.बी. सिंह नादान की चुनिंदा गजलें’’ (2025)। हरजिंदर सिंह सेठी को संपादन एवं साहित्य सृजन के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार मिले हैं जिनमें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा काका कालेलकर पुरस्कार-1997 तथा महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी द्वारा आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी पुरस्कार-
2013 शामिल हैं।
     ‘‘आ से आरम्भ’’ शीर्षक से पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि ‘‘सन् 2011 में मेरी पुस्तक ‘‘कुछ किताबें कुछ लोग’’ प्रकाशित हुई थी जिसमें विभिन्न विधाओं की 28 पुस्तकें एवं साहित्य के क्षेत्र से जुड़े पांच व्यक्तियों पर लिखे गये आलेख शामिल थे, जिसे पाठकों और समीक्षकों से भरपूर सराहना मिली थी। उस किताब की चर्चा-गोष्ठी में कवि-समीक्षक विजय बहादुर सिंह, उपन्यासकार-कवि विनोद कुमार श्रीवास्तव, कवि-आलोचक विजय कुमार, कहानीकार हरियश राय, कवि-समीक्षक हृदयेश मयंक, राधेश्याम उपाध्याय, शैलेश सिंह, रमेश राजहंस जैसे दिग्गज साहित्यकारों एवं विद्वतजनों ने अपना सकारात्मक मत व्यक्त कर मुझे संबल प्रदान किया। ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ उसी क्रम की अगली कड़ी है। मुम्बई के साहित्यिक जगत में उठते-बैठते जो प्राप्त हुआ, उसे ही किताब के रूप में प्रस्तुत करने का उपक्रम है यह। कुछ कृतियों और कुछ स्मृतियों के बहाने समीक्षा, संस्मरण, निबंध, आलेख, टिप्पणियों के अतिरिक्त बीते समय की कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं, पत्रिकाओं और व्यक्तियों की चर्चा के साथ मुम्बई में लिखी जा रही कविता के इतिहास को सहेजने की कोशिश की गई है इसमें।’’
     पुस्तक में कुल 37 लेख हैं-आ से आरम्भ, ललद्यदःगाथा अद्भुत प्रेम की विश्वसनीय कवितायें, अंधेरे में रोशन चिराग, मुस्तहसन अज्.म की ग़ज़लें: एक नई उम्मीद की आहट, डॉ. बंसीधर पंडा - समय, समाज और परिवेश, विजय कुमार की कवितायें: प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का नियोजन स्वर्ग को जमीन पर उतार लाने की चाहत जीवन और समय को देखने की दृष्टि, ‘‘निर्वासिनी’’: नारी अस्मिता का आख्यान, पत्तों पर लिखी कवितायें: विजुअल पोएट्री का सर्जक, वैचारिक व्यंग्य की खुली किताब, अतीत के कुछ यादगार पन्ने, खामोशी की जुबां, ख्वाब ही बस देखते रह जायें क्या?, अक्षय जैन: सतत सक्रिय साहित्यिक सफर, आदमी को चाहिए एक मुट्ठी आसमान, अंधेरे में उजाले की उम्मीद भरी आश्वस्ति, नवगीत के उन्नायक: वीरेंद्र मिश्र, हृदयेश मयंक की कहानियां: स्मृतियों का आख्यान, गाथा एक निरासक्त कर्मयोगी की, पहाड़ की चिंता - चिंता का पहाड़, अपने समय का लेखा-जोखा, सपने, स्मृतियां, संघर्ष और प्रेम से रची कवितायें, दोहों में सिमटा कालखंड, इंसान और इंसानियत की पैरवी करती ग़ज़लें, डॉ. धर्मवीर भारती के साथ कुछ पल, तबले पर उंगलियों की जादुई थाप, एक यादगार शाम, मेघबिंदु, साहित्य सहकार, तथापि, मुम्बई की पंजाबी साहित्यिक संस्थायें, कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन, दो कदम हम भी चले एवं मुम्बई की लघु साहित्यिक पत्रिकायें।
पुस्तक के सभी लेखों पर यदि बारीकी से दृष्टिपात किया जाए तो उनके विषय की विविधा, जानकारी की सम्पन्नता और समय की लिपिबद्धता को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। जैसे पहला ही लेख ‘‘ललद्यद: गाथा अद्भुत प्रेम की’’ कश्मीरी कवयित्री कवयित्री ललद्यद के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराता है। इस लेख में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं कि -‘‘कश्मीर में लगभग मिथक बन चुकी, सात सौ वर्ष पूर्व जन्मी, कश्मीरी भाषा की आद्य संत कवयित्री ललद्यद को कुछ लोग कवयित्री कहते हैं, कुछ विदुषी एवं ज्ञानवती, कुछ दैवी शक्ति, कुछ योगिनी, कुछ तपस्विनी, कुछ सूफी फकीर, तो कुछ लोग उसे शिव भक्त मानते हैं। पर यह तो स्वयं सिद्ध है कि उसके द्वारा रचित ‘‘वाख’’ (पद) कश्मीरी भाषा की प्रारंभिक रचनायें हैं, एवं वर्तमान कश्मीरी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर। आध्यात्मिक स्वर से मुखरित ये गीत जीवन, योग, सहजोपासना, ईश्वर, धर्म, दर्शन एवं आत्मा के संदर्भ में कहे गये हैं। इनमें भक्ति और ज्ञान से अखंड-अव्यक्त स्वरूप का साक्षात्कार किया गया है। लल अद्वैतवादी और पूर्ण रूप से एक ब्रह्म में विश्वास रखने वाली कवयित्री रही है। वर्षों से उनके वाख लोगों की जुबान पर चढ़े हैं, अपितु उनके जीवन में, उनके दिलों में रच-बस गये हैं। आम कश्मीरी नागरिक की मानसिकता पर उनका गहरा प्रभाव है। वस्तुतः यह एक समीक्षा लेख है जिसमें वेदराही के उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ की समीक्षा की गई है। लेखक ने उपन्यास के बारे में लिखा है कि ‘‘हिंदी में उनके बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस कमी को पूरा करता है वेद राही का उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ जो उसके जीवन, रहन-सहन, उसके समय, सामाजिक दशा, राजनीतिक परिस्थितियों एवं उसकी कविताओं को आधार बना कर बड़ी शोध, मेहनत, निष्ठा और ईमानदारी से लिखा गया है। अपनी अनूठी लेखन शैली, रवानी एवं पठनीयता के कारण यह उपन्यास बड़ा अद्भुत बन पड़ा है।’’
      एक समीक्षात्मक लेख हृदयेश मयंक की कविताओं पर है। इसमें हजजिंदर सिंह लिखते हैं कि ‘‘लगभग आधी शताब्दी बीत गई, हृदयेश मयंक को कविता के साथ विचरण करते हुए। जनधर्मी प्रतिबद्धता और जन जीवन से गहरा सरोकार रखने वाले कवि मयंक की काव्य यात्रा मैं शहर और सूरज, सायरन से सन्नाटे तक, युद्ध में शामिल नहीं थीं चिड़ियां, ठहराव के विरुद्ध, अभी भी बचा हुआ है बहुत कुछ, हम ये जो मिट्टी के बने हैं, अपने हिस्से की धूप, दिल से निकली दिल की बात, एक महक सोंधी माटी की के पड़ाव पार करती हुई अनवरत जारी है। इधर उनकी ‘‘चयनित कविताओं’’ का संकलन प्रकाशित होकर आया है, जो उनकी पूरी यात्रा के विकास क्रम को दर्शाता है। ’’
कविताओं के साथ ही ग़ज़ल संग्रह पर भी हरजिंदर सिंह सेठी ने अपनी समीक्षात्मक कलम चलाई है। ‘‘मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लेंः एक नई उम्मीद की आहट’’ शीर्षक लेख में मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लों के बारे में वे लिखते हैं कि ‘‘मुस्तहसन अज़्म अपने रचनाकर्म के लिए निजी मुहावरे की तलाश करते हुए ग़ज़ल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए नजर आते हैं और ‘हमवार नहीं है कुछ भी’ नाम से अपना ग़ज़ल संग्रह लेकर आते हैं। आज के माहौल में यह शीर्षक बड़ा उचित जान पड़ता है। वर्तमान के पूरे परिदृश्य पर दृष्टि डालें, तो देखेंगे कि कुछ भी ठीक ठाक नहीं है।’’ वे आगे लिखते हैं-‘‘ऐसी स्थिति में मुस्तहसन अज़्म अपनी ग़ज़लों के माध्यम से बिगड़े वातावरण को संवारने की ख्वाहिश रखते हैं और सभी समस्याओं से निपटने के लिए जमीनी कार्यवाही की जरूरत पर बल देते हैं। शायर का हौसला इतना कि वह अकेला ही इस स्थिति से टकराने की जुर्रत करता है -
कदम जो बढ़ गये आगे तो रुक नहीं सकते 
सफर में साथ मेरे काफिला रहे न रहे।

     एक अन्य लेख में हरजिंदर सिंह सेठी ‘‘जीवन और समय को देखने की दृष्टि: डॉ. दलजीत सिंह की कवितायें’’ शीर्षक से उस कवि की कविताओं को प्रकाश में लाते हैं जो ‘‘डॉ. दलजीत सिंह नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में संसार भर में विख्यात रहे हैं। सफेद मोतियाबिंद के आपरेशन के पश्चात आंखों में इंट्राओकुलर लेंस का प्रत्यारोपण करने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने मोतिया बिंद के एक लाख से अधिक आपरेशन कर और उनमें लेंस बिठा कर विश्व रिकार्ड बनाया। वे भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के मानद सर्जन रहे।’’ ऐसे चिकित्सक के मन में सामाजिक विषमताओं, अभाव और अन्याय को लेकर कवि के भीतर एक गहरा असंतोष रहा है। -
बहुत जी करता है, 
सभी सोयों को जगा जाऊं, 
मकड़ी के जो जाले, पूरे देश को लगे हैं, 
एक तेज आंधी के साथ, 
जड़ों से उखाड़ ले जाऊं।

एक लेख संगीत मनीषी पर भी है। ‘‘तबले पर उंगलियों की जादुई थाप’’ में वे लिखते हैं कि सन् 1989 में अन्नु कपूर के ‘‘अंत्याक्षरी’’ कार्यक्रम के साथ टीवी पर शुरुवात करने के पश्चात उन्होंने ‘‘मेरी आवाज सुनो’’ में तबला वादन किया, पर उन्हें पहचान मिली शेखर सुमन के शो ‘शेकर एंड मूवर्स’ से। उसके बाद तो वे ग्रेट इंडियन लाफ्टर चौलेंज, नानसेंस अनलिमिटेड, कामेडी सर्कस, कपिल शर्मा शो आदि दर्जनों सीरियल्स में अपनी कला का जौहर दखाते हुए लगभग पैंतीस वर्षों से तबले की थाप के साथ लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं।’’

‘‘कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन’’ और ‘‘मुंबई की लघु साहित्यिक पत्रिकाएं’’ मुंबई के साहित्यिक इतिहास को सहेजते लेख हैं। दरअसल हरजिंदर सिंह सेठी की यह पुस्तक इस तथ्य को गाढ़ी स्याही से रेखांकित करती है कि साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं। इसलिए इस पुस्तक की उपादेयता निर्विवाद है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि मुंबई की साहित्यिक धारा को जानना और समझना है तो यह पुस्तक अपनी पूरी रोचकता के साथ नितांत उपयोगी ठहरती है।
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आचरण,  21.07.2026
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Saturday, July 18, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अबे लौं में हमने जोई पाओ के सागर से नोंनो कोनऊं सहर नोंई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अबे लौं में हमने जोई पाओ के सागर से नोंनो कोनऊं सहर नोंई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हमाई जे बात पढ़ के, के सागर से नोंनो  कोनऊं सहर नोंई, बायरे वारे सोचहें के ईमें का खास? अपनों सहर सो सबई खों नोंनो लगत आए। औ भीतरे वारे सोचहें के आज जे बर्यान लगीं, ने तो सबसे नोंनो होबे की ऐसी का आए इते? सो, आप सब ओरें तनक सहूरी धरो औ हमाई जे एक्पर्ट राय ध्यान से पढ़त जाओ!
       का आए के अपनों जो सागर सई मायने को सागर आए। ईको लंबो-चौंड़ो इतिहास आए। जबे अपन मानुस हरें मों बोलत ने जानत्ते ऊ टेम पे बी अपने पुरखा इते रैत्ते। ऊ टेम पे इते रैबे वारे अपने पुरखन ने इतई आगी जलाबी सीखी औ इतई फथरा के औजार बनाने सीखे। जबके ऊ टेम पे इते कोनऊं अनवरसिटी ने हती। अब जे ने पूछन लगियो के अनवरसिटी बने के बाद इते का-का आबिष्कार भए। काए से के इते के आबिस्कारन को अनवरसिटी से कोऊ लेबो-देबो कभऊं रहओ नईं। अब का तेल भरे की कुप्पी घांईं कारीडोर की डिजाइन अनवरसिटी वारन ने बनाईं? कभऊं नईं! बाकी जा सब छोड़ो, अपने सागर को करेजा भौत बड़ो आए। इते जोन एक बेर आत आए बा इतई को हो जात आए। इते के लोग सबखों गले लगात आएं। जेई से मुतके अधिकारी रिटायर होबे के टेम पे इतई को ट्रांसफर ले लेत आएं। उने पतो आए के बे जात-जात इते कित्तोई खात-खवाई कर लें, इते कोऊ ने बोलहे। भौतई दयालु औ सहनसील आएं इते के लोग। खैर, कछू नईं, जेई तो खूबी आए इते की। बाकी जे सोई आए के अपने सागर में हिंदू, मुसलमान, जैन, सिख, ईसाई, बौद्ध - मने सबई हिलमिल के रैत आएं। सबरे एक-दूसरे के त्योहार पे खुसियां मनात आएं। इते बृंदाबन बाग आए तो जामा मस्जिद भी आए। इते गौराबाई को जैन मंदिर आए तो सेंट पीटर्स चर्च औ गुरुद्वारा साहिब भी आए। इते करोड़ों की लगत्त से संत रविदास जू को मंदर बी बन रओ। मनें सागर में इत्ती खूबी आएं के बा सबरी आजई नईं गिनाईं जा सकत। सो, जा कॉलम पढ़त रहियो औ खूबी जानत रहियो! राम-राम!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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