चर्चा प्लस
मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के किसी सदस्य को कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरा हिल जाता है। कई गंभीर बीमारियों का असली कारण है मिलावटी खाद्य सामग्री। जैसे अच्छी सेहत के लिए फल खाने और दूध पीने की सलाह जी जाती है। पकने से पूर्व तोड़े गए फल जिन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है क्या अच्छी सेहत दे सकते हैं? या फिर इंजेक्शन लगा कर निकाला गया दूध सेहत दे सकेगा? उस पर स्वास्थ्य सेवा की आसमान छूती मंहगाई मानो गरीबों के जीने का हक छीन लेना चाहती है।
चाहे पपीता हो या सेव बहुधा समय से पूर्व पेड़ों से तोड़ कर केमिकल द्वारा पकाए जाते हैं और जिन्हें खाने पर क्या-क्या साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं इससे आमजन बेखबर है। कभी-कभार समाचार पत्रों या पत्रिकाओं में इस संबंध में जागरूकता वाले लेख प्रकाशित होते भी हैं तो उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ कर अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि जब उपभोक्ता फलों के बाज़ार में पहुंचता है तो केमिकल्स से पकाए और चमकाए गए फलों की सुंदरता से मोहित हो कर भूल जाता है कि उसने क्या पढ़ा था अथवा वे फल कितने नुकसानदेह हैं। फिर मसला यह भी तो है कि सही फल कहां से मिलें? न तो हर व्यक्ति के पास बाग है और न बागीचा। दो कमरे या एक कमरे में रहने वाला परिवार अपने लिए फल नहीं उगा सकता। उसे तो बाज़ार में मिलने वाले फलों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यही दशा सब्जियों की है। बड़े आकार की सब्जियां चाहे लौकी हो या कद्दू संदेह के घेरे में रहता है। क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें तेजी से बड़ा करने के लिए इंजेक्शन और केमिकल वाली खाद दी जाती है। लेकिन क्या किया जाए, यदि सब्जी खानी है तो जहर की मिलावट को भी अनदेखा करना पड़ता है और बदले में मिलती है गंभीर बीमारियां।
फलों को जल्दी और कृत्रिम रूप से पकाने के लिए मुख्य रूप से एथिलीन गैस और कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग किया जाता है। एथिलीन गैस एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है और व्यावसायिक रूप से स्वीकृत है। यह फलों में पकने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू करता है। एथेफोन तरल रूप में आता है जो पौधों या फलों के संपर्क में आने पर एथिलीन गैस में बदल जाता है। कैल्शियम कार्बाइड आम भाषा में ‘‘कार्बाइड’’ कहा जाता है। यह पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो फलों को जल्दी पकाता है। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले और कैंसरकारी तत्व हो सकते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध है। खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार केवल नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस के प्रयोग की अनुमति है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती।
पैदा होने से ले कर मृत्यु तक दूध जीवन के एक अवश्यक तत्व के रूप में जुड़ा रहता है लेकिन जब दूध भी मिलावटी और नकली हो तो? पशुओं में दूध उतारने या उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का इंजेक्शन लगाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान ऑक्सीटोसिन युक्त दूध पीता है, तो पेट के एसिड और पाचक एंजाइम इस प्रोटीन हार्मोन को पचा कर नष्ट कर देते हैं। यह सक्रिय रूप से रक्त में नहीं पहुंचता है। हालांकि भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पशुओं में इसके अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसका सबसे बुरा असर पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। बार-बार ऑक्सीटोसिन देने से पशुओं में बांझपन, हॉर्मोनल असंतुलन, थनैला रोग (डंेजपजपे) और प्रजनन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
नकली या सिंथेटिक दूध को असली जैसा दिखाने और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए कई खतरनाक और जहरीले रसायन मिलाए जाते हैं। दूध में प्रोटीन और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए यूरिया मिलाया जाता है, जो किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। दूध में झाग बनाने और उसे सफेद दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पाचन तंत्र खराब होता है और उल्टी-दस्त की समस्या होती है। कास्टिक सोडा अथवा कास्टिक पोटाश केमिकल दूध को फटने से बचाता है और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाता है, लेकिन पेट की अंदरूनी परत को जला सकता है। सोया रिफाइंड या आर्टिफिशियल फैट दूध में फैट (चिकनाई) की मात्रा को नियंत्रित करने और उसे असली जैसा गाढ़ा दिखाने के लिए मिलाया जाता है। फॉर्मेलिन यह एक जहरीला प्रिजरवेट है जो दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। इसके लंबे समय तक सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड भी दूध को फटने से बचाने के लिए मिलाया जाता है जो पाचन एंजाइमों को नष्ट करता है। स्टार्च या मैदा पानी मिलाने के बाद दूध का पतलापन छुपाने और उसे गाढ़ा रखने के लिए स्टार्च मिलाया जाता है। क्या यूरिया और कास्अिक सोडा से बनने वाला नकली दूध सेहत दे सकता है?
हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सा मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 12 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं के मंहगे होने का एक मुख्य कारण है महंगे आयातित चिकित्सा उपकरण और उनके अपग्रेड होने की उच्च लागत। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में कुशल डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा स्टाफ के बढ़ते वेतन व शुल्क। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का बढ़ता प्रसार। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार भारत में लोग अपनी जेब से इलाज का भारी-भरकम हिस्सा अर्थात लगभग 63 प्रतिशत खुद चुकाते हैं। कुछ प्रमुख महंगे उपचार और लागत अनुमान इस प्रकार है-
हार्ट बाईपास सर्जरी - लगभग 1.6 लाख से 4.5 लाख रुपये ।
कैंसर उपचार (कीमो थेरेपी रेडिएशन)- लगभग 10 लाख से 25 लाख रुपये ।
लिवर ट्रांसप्लांट- लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये।
यदि इन बड़ी बीमारियों की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो मामली सर्दी-जुकाम के लिए चिकित्सक को दिखा कर ईलाज कराना मंहगा पड़ता है। यही कारण है कि नीम हकीमों का यानी फर्जी चिकित्सकों का धंधा जोरों पर चलता रहता है और आम आदमी अपनी जान जोखिम में डालता रहता है।
यह सच है कि सरकार और कुछ निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के द्वारा सहायता देती हैं जैसे सबसे लोकप्रिय सरकारी योजना है आयुष्मान योजना। लेकिन यह भी सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि साठ वर्ष की आये भी इसके लिए योग्य घोषित कर दी गई है किन्तु जब कोई साठ से सत्तर के बीच की आयु का व्यक्ति आयुष्मान कार्ड बनवाने का प्रयास करता है तो उसे निराशा हाथ लगती है। जो निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा का लाभ देती हैं वे पहले प्रीमियम भरवाती हैं, वह भी नियमित रूप। जिसके पास प्रीमियत भुगतान करने योग्य पैसे होंगे उसके लिए तो ठीक है किन्तु जो प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होगा उसका क्या होगा?
चाहे खाद्य सामग्री को दोष दें या लाईफ स्टाईल को मगर यह डरावना सच है कि पिछले दस वर्ष में घुटनों एवं जोड़ों की तकलीफ, मधुमेह, थायराइड, कोलोस्ट््राल बढ़ना आदि की समस्याएं कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में सबसे अधिक होने वाला प्रमुख हृदयरोग कोरोनरी धमनी रोग है, जिसके कारण अक्सर दिल का दौरा (हार्टअटैक) पड़ता है। इसमें हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में प्लाक (चर्बी और कोलेस्ट्रॉल) जमने से वे संकीर्ण हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप में धमनियों में रक्त का दबाव लगातार अधिक रहता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त जोर पड़ता है।हार्ट फेलियर में हृदय की मांसपेशियां इतनी कमजोर या सख्त हो जाती हैं कि वे शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाती हैं। अरिथ्मिया यह दिल की धड़कन के अनियमित, बहुत तेज या बहुत धीमी होने की स्थिति है।
हृदय रोगों के मुख्य कारण है फैट, नमक, चीनी और फास्ट फूड से भरपूर आहार। ये सभी मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से दिल कमजोर होता है और वजन बढ़ता है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं। तंबाकू और सिगरेट का धुआं धमनियों की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाता है। अत्यधिक और लगातार तनाव धमनियों को प्रभावित करता है और अन्य जोखिम कारकों को गंभीर बनाता है।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में आज सभी जानते हैं, सभी स्वस्थ भी रहना चाहते हैं किन्तु शुद्ध खाद्य सामग्री और सस्ती बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आमजन का स्वस्थ रहने का सपना कभी पूरा नहीं होने पाता है। कई निजी चिकित्सा केन्द्र तो ‘‘लुटेरे’’ के नाम से कुख्यात रहते हैं किन्तु स्वस्थ होने की चाहत उन्हें उन ‘‘लुटेरों’’ के हाथों लुटने को मजबूर कर देती है। इसका कारण यही है कि आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाऐं निजी सेवाओं के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई और जोखिम भरी हैं। इस स्थिति में सुधार हो सकता है यदि सरकारी स्तर पर ईमानदार प्रयास किए जाएं। आखिर जीने का अधिकार तो हर किसी को मिलना ही चाहिए।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 30.09.2026 को प्रकाशित)
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