Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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Sunday, May 31, 2026

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर | जीवनी | लेखिका शरद सिंह (डॉ (सुश्री) शरद सिंह)

आज लोक माता देवी अहिल्याबाई की जन्म जयंती है... 
स्त्री शक्ति की प्रतीक लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर के जन्म दिवस पर उन्हें शत-शत प्रणाम 🙏
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर के बारे में विस्तार से जानने के लिए पढ़िए सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी पुस्तक "लोकमाता अहिल्याबाई होलकर"।  यह एक जीवनी पुस्तक है जो उनके व्यक्तित्व एवं सुशासन  से परिचित कराती है। अवश्य पढ़ें 🙏 आप इसे सीधे प्रकाशक से भी मंगा कर पढ़ सकते हैं और ऑनलाइन मंगाने के लिए अमेजन का लिंक यहां दे रही हूं...
Lokmata Devi Ahilyabai Holkar ( लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ) - Sharad Singh ( शरद सिंह ) https://amzn.in/d/04SkWZHj


Saturday, May 30, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट 
पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कछू बरस पैले एक फिलम आई रई जोन मे आयुष्मान खुराना हीरो रओ। ऊं फिलम में जो गाना रओ -”पानी दा रंग वेख के, अँखियाँ चो हंजो रोड दे/ माहिया ना आया मेरा, माहिया ना आया”। ईको मतलब जो आए के पानी को रंग देखके मोरी अंखियों से अंसुवा बै रै। काए से के मोरों चाएबो वारो ने आओ।” 
अब आप ओरें सोच रए हुइयों के पानी तो बरसों नईं औ जे को जाने कां को पानी को रंग देख के रोन लगीं। मनो टाटा वारन की सप्लाई को पानी को रंग देख के अंसुवां तो आहें, पर हम अबे टाटा वारन के पानी की नईं, ऊके पानी के बिल की बात कर रै, जोन ने अंखियन से अंसुवां चुवा दए। चलो हम अपनी सुना रए। का भऔ के हम अप्रैल मईना में संपत्ती टैक्स भरने गए सो उते मुतकी पेनाल्टी ठुंक गई। उन्ने बताई के 31मार्च से पैले भरो चाइए रओ। सो, अपने जी पे फथरा रख के पेनाल्टी भर दई। ओई टेम पे हमने सोंसी के पानी को पईसा भर देवें। साल भर को इकट्ठा भरे में एक मईना की छूट मिल जैहे तो कछू गम गलत हो जैहे। लेकन उते बताओ गओ के साफ्टवेयर  अपडेट हो रओ तो, सो मई में आइयो। रामधई, हम तो उधनईं समझ गए रए के जे ओरें छूट ने दैंहे। औ देख लेओ के बोई भओ। बिल लौं भेजत नइयां औ पेनाल्टी  ठोंकते आएं, छूट मसक लेते आएं। अब कोसत रओ चाए टाटा वारन खों, चाए नगरपालिका वारन कों, चाए निगम वारन खों, औ पूरों बिल भरत रओ। कओ पानी औ कचरा पे भी पेनाल्टी ठोंक दई जाए तो गश ने खाइयों। बीजासेन माईं किरपा करें! बाकी हम तो अपने अंसुवां पोंछईं रए औ गा रए-
पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, 
बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ …
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, May 29, 2026

शायर डॉ बशीर बद्र साहब को विनम्र श्रद्धांजलि - डॉ सुश्री शरद सिंह

अलविदा मेरे पसंदीदा शायर बशीर बद्र साहब ... आप अपनी शायरी में  हमेशा जिंदा रहेंगे 😔
▪️ वर्षों पहले मेरे शहर सागर में ही उनके साथ एक कवि - सम्मेलन मुशायरा पढ़ने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था... इससे पहले वह मुझे सुखद आश्चर्य में डाल चुके थे, हुआ यूं था कि तत्कालीन बहुचर्चित साहित्यिक पत्रिका "सापेक्ष"  के लिए विजय वाते जी ने बशीर बद्र साहब से एक  इंटरव्यू लिया था जिसमें उन्होंने शायरी में नएपन का उदाहरण देते हुए मेरे एक शेर को उद्धृत किया था। जब वह विशेषांक मेरे हाथों में आया तो अगर सीधे-सीधे कहा जाए तो मैं बेहोश होते-होते बची क्योंकि यह मेरे लिए अत्यंत सुखद आश्चर्य था कि जिस शायर की शायरी को मैं बहुत पसंद करती हूं और जिन्हें मैं एक उम्दा शायर मानती हूं उन्होंने मेरे शायरी को रेखांकित किया यह उनकी सहजता और शायरी के प्रति समर्पण था कि जिन्होंने सिर्फ़ शायरी को पहचाना, पहचान के आधार पर शायरी को नहीं... यही उनका बड़प्पन था जिसने मेरे दिल को छू लिया था...
▪️ अपने इंटरव्यू में डॉ बशीर बद्र साहब ने कहा था -
"कुछ लोग ग़ज़ल की पुरानी परम्पराओं और नई बदली हुई जुबान को खूबसूरती से मिला कर नई ग़ज़ल लिख रहे हैं। इस तरह नई गज़ल की नई रूह सामने आ रही है। मसलन, शरद सिंह का ये शेर -
     फिर हवा के हाथ में हैं शीत के नेजे नुकीले,
     फट गया है ताप का अस्तर, चलो, चलना कहां है ?"
- डॉ. बशीर बद्र, सापेक्ष-32, ग़ज़ल विशेषांक
(यह विशेषांक आज भी मेरे पास सुरक्षित है एक अविस्मरणीय कृति के रूप में)
#बशीरबद्र #अलविदाडॉबशीरबद्र #mytribute #DrBashirBadr 
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh

Wednesday, May 27, 2026

चर्चा प्लस | बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                      

    हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली जिसमें मौसम के पैटर्न बदलने के गंभीर आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे। समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ रिपोर्ट का अंश। कितने लोगों ने पढ़ा? इसके आंकड़े बता पाना मुश्किल है लेकिन यह तो तय है कि उससे बहुत कम लोगों ने जितनों ने ‘‘हनी ट्रैप ’’, ‘‘ट्विशा केस’’ अथवा ‘‘मेलोडी’’ के समाचार पर अपनी आंखें गड़ाए रखी होंगी। कितने आश्चर्य के बात है न कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसके निरंतर कटने का हमें अहसास नहीं है लेकिन चटखारे भरे समाचारों पर हमारा पूरा ध्यान केन्द्रित रहता है। दरअसल, हमारा मौसम जिस तरह घातक रूप से अपना पैटर्न बदल रहा है, ठीक उसी प्रकार इंसानी स्वभाव भी बदल रहा है।


      मौसम में परिवर्तन होना एक स्वाभाविक एवं स्वस्थ प्राकृतिक क्रिया है। किन्तु जब मौसम अपनी प्रकृति के विपरीत चलने लगे तो स्थिति स्वाभाविक नहीं रह जाती है। जैसे यदि कोई नदी अपना रास्ता बदल कर बहने लगे तो वह गांव, शहर, खेत सबकुछ बरबाद कर सकती है। मौसम का चक्र भी अपनी गति या प्रकृति को बदलता है तो यह मानना होगा कि विनाश की दस्तक पड़ना शुरू हो गई है। अब यह इस पर निर्भर है कि हम उस दस्तक को कितनी देर से अथवा कितनी जल्दी सुनते हैं। जब बात आती है जलवायु परिवर्तन अथवा मौसम के परिवर्तन की तो लोगों का रवैया लापरवाह हो जाता है। वे साशल मीडिया पर घंटों ‘‘हनी ट्रैप’’ के किस्से ढूंढ-ढूंढ के पढ़ सकते हैं, ‘‘मेलोडी चॉकलेट’’ से जुड़े किस्से पर वाद-विवाद में पूरा-पूरा दिन बिता सकते हैं, हाई प्रोफाईल ‘‘ट्विशा मर्डर केस’’ पर परिणाम विहीन चिंन्तन में सिर खपा सकते हैं लेकिन उस संकट की ओर ध्यान देने का समय नहीं निकाल पाते हैं जिसके शिकंजे में धीरे-धीरे पूरी पृथ्वी और पूरी मानव सभ्यता जकड़ती जा रही है। अभी भी स्थिति पर नियंत्रण पाने का समय है किन्तु उस पर विचार करने का हमारे पास न तो समय है और न इच्छा। हम आभासीय दुनिया के गुलाम बन कर स्वयं को बुद्धिजीवी मानने का भ्रम पाल चुके हैं। जबकि बुद्धिजीवी का असल दायित्व होता है कि वह सबसे पहले पृथ्वी और सकल मानवता के बारे में गंभीरता से सोचे।  

हाल ही में समाचार पत्रों में यह रिपोर्ट पढ़ी कि हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है। बर्फबारी के महीने माने जाने वाले जनवरी-फरवरी से ज्यादा बर्फ अब मार्च-अप्रैल में गिर रही है। इसका सीधा असर वाटर बैंक माने जाने वाले ग्लेशियरों पर पड़ेगा। इस पैटर्न के कारण ट्री लाइन भी लगातार ऊपर को खिसक रही है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ताजा शोध जर्मनी की एप्लाइड जियोमेटिक्स शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है। हिमालय में सर्दियों की तुलना में गर्मियों में ज्यादा हो रही बर्फबारी का कारण पश्चिमी विक्षोभ में आई असमानता है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर होने से बारिश और बर्फबारी में कमी आ रही है। गर्मियों में इसके बढ़ने से बर्फबारी के साथ बारिश, ओलावृष्टि और आपदाओं के खतरे बढ़े हैं। पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी के मुताबिक, हिमालय में मौसम के बदले पैटर्न से आर्थिक और सामाजिक नुकसान का खतरा भी बढ़ा है। पश्चिमी विक्षोभ में आ रही असमानता से हर साल खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। इससे अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं। पर्यटन और हॉर्टिकल्चर प्रभावित होगा। ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया, तो आपदाओं के खतरे ज्यादा बढ़ेंगे। मार्च-अप्रैल में हो रही बर्फबारी से ग्लेशियर खतरे में हैं। डॉ. पंकज चौहान बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में धरती का तापमान अधिक रहता है। इससे बर्फ जिस गति से पड़ रही है, उसी गति से पिघल रही है और ग्लेशियर कमजोर पड़ रहे हैं। ये भविष्य में स्रोत-जलधाराओं को प्रभावित करेंगे। साथ ही आपदा के खतरों को भी बढ़ाएंगे। बर्फबारी के बदले पैटर्न ने हिमालय में ट्री लाइन को भी प्रभावित किया है। अलग-अलग घाटियों में ट्री लाइन पहले की तुलना में ऊपर खिसकी है। मध्य हिमालय में औसत ट्री लाइन 3600 मीटर तक मानी जाती है, लेकिन अब ये 3800 मीटर तक पहुंच रही है।

दूसरी ओर एक समाचार और भी पढ़ा जिसमें दूसरे ग्रहों में मानव बस्तियां बसा कर मानव एवं पृथ्वी की प्रजातियों को बचाने के अभियान की चर्चा थी। मुझे आद आया किस्सा ‘‘नूह की नाव’’ का। नूह की नाव की कहानी ‘‘कुरान’’ और ‘‘बाईबल’’ में दर्ज़ है। कहानी के अनुसार, जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बढ़े, तो ईश्वर/अल्लाह/याहोवा ने एक विनाशकारी जलप्रलय (महाबाधा) द्वारा दुष्ट दुष्टों को सजा देने का निर्णय लिया।  ईश्वर ने अपने भक्त नूह को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया, क्योंकि वही एकमात्र नेक इंसान थे।  पानी से बचने के लिए नाव को सील कर के वाटरप्रूफ बना दिया गया था। इसमें तीन मंजिलें थीं। नूह ने ईश्वर के निर्देशों के अनुसार अपने परिवार (पत्नी, तीन पुत्र और उनके अनुयायी) को पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव-जंतु, पशु-पक्षियों के नर और मादा जोड़े के साथ नाव में सुरक्षित रख लिया।  जब सभी लोग और जानवर नाव में सुरक्षित चले गए। फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई और धरती जलमग्न हो गई। नाव के बाहर का सारा जीवन नष्ट हो गया।  कई दिनों तक पानी में तैरने के बाद, जब बाढ़ का पानी कम होने लगा, तो नाव अरारत पर्वत (माउंट अरारत) की चोटियों पर जा टिकी और वहीं से धरती पर जीवन का पुनः विकास हुआ।
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में शूकर या वराह रूप में पृथ्वी पर जल प्रलय (रसतल) से भगवान विष्णु के तीसरे अवतार की कथा है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में दिति के पुत्र और दैत्य हिरण्यक्ष ने घोर तपस्या कर अपार शक्तियां प्राप्त कर लीं। उसने सभी लोकों पर अधिकार कर लिया और पृथ्वी को समुद्र तट (रसातल) की गहराई में छिपा दिया। पृथ्वी के जलमग्न होने से हाहाकार मच गया। तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर, उनके नासिका (नाक) से भगवान विष्णु एक छोटे से वराह (शूकर) के रूप में प्रकट हुए।  देखते ही देखते वराह भगवान का आकार अत्यंत विशाल हो गया। वे समुद्र में गहरे उतर गए। हिरण्याक्ष ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी, लेकिन भगवान वराह ने उन्हें अपने वध से परास्त कर दिया।  वराह भगवान ने अपने विशाल दांत (थूथनी) से पृथ्वी को स्थिर किया और जल के ऊपर उसे अपने मूल स्थान पर स्थापित कर दिया।

      महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी महाकाव्य ‘‘कामायनी’’ की शुरुआत ही जल प्रलय (प्रलय प्रवाह) से की है।  महाकाव्य के पहले सर्ग, जिसका नाम ‘‘चिंता’’ है, में शामिल हैं मनु हिमालय के विशाल शिखर पर बैठ कर प्रलय का दृश्य देख रहा है।  ‘‘कामायनी’’ के अनुसार देव संस्कृति में भोग-विलासिता की भारी वृद्धि हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपना भीषण रूप दिखाया और जल प्रलय (महाजल-प्लावन) के द्वारा पूरी तरह से देव संस्कृति नष्ट हो गई।  इस प्रलय के बाद केवल मनु ही जीवित बचा और उसने मानव जाति के पुनर्विकास को सुनिश्चित किया।

     जल प्रलय और हिमयुग की अनेक कथाएं हैं। हॉलीवुड ने तो ‘‘आईस एज़’’ नाम से फिल्मों की एक श्रृंखला ही बना डाली। जिनमें डायनोसार युग के विशाकाय पशुओं के लुप्त होने की कड़ी और आई एज़ की भयावहता को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। दिलचस्प बात है कि इन फिल्मों को बच्चों से ले कर वयस्कों तक ने बहुत पसंद किया लेकिन उसमें कहे गए संदेश की गंभीरता को नहीं समझा। शायद हम मौसम को ले कर तात्कालिक चर्चा से आगे बढ़ने की प्रवृति खोते जा रहे हैं। जबकि वैज्ञानिक मानव व्यवहार में आते जा रहे परिवर्तन का आलन करते हुए निरंतर इस तथ्य से आगाह कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन में बदलाव का प्रभाव मानव व्यवहार पर भी पड़ रहा है। 
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई जलवायु और चरम मौसम का मानव व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इन लोगों में मानसिक तनाव और आक्रामकता बहुतायत है।। साथ ही, सीमित औपचारिकता के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के कारण मानवीय निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। अत्यधिक गर्मी और लू के दिनों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, जिससे लोगों में हिंसक व्यवहार और अपराध की दर में वृद्धि देखी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं, मधुमेह और मधुमेह के कारण होने वाले नुकसान से लोगों में ‘‘इको-एंजाइटी’’ (पर्यावरण चिंता), अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का खतरा बढ़ जाता है। खराब मौसम और राजनीतिक संकट के कारण लोगों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है, जिससे वे कई बार जोखिम और निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं।  रहने लायक जगह और पानी की कमी के कारण एक बड़े वर्ग का शहरों की ओर पलायन होना है। इससे भीड़-भाड़ वाले इलाकों में रहने लायक जगह और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। नई पीढ़ी के शारीरिक विकास और लंबाई में भी बदलाव आ रहे हैं। हम आजकल अकसर पढ़ते हैं कि कम आयुवर्ग में भी हार्ट के साईलेंट अटैक की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन घटनाओं के कारण में कुछ प्रतिशत प्रभाव जलवायु परिवर्तन का भी है। हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी का जितना श्रेय गरीबी और बेरोजगारी को है उतना ही उस एग्रेसिवनेस को जिसके चलते जल्दी गुस्सा आता है और इंसान बिना सोचे समझे हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है।

    प्रश्न यह है कि कैसे रोका जा सकता है मौसम के पैटर्न में बदलाव और मानव स्वाभाव में आते जा रहे परिवर्तनों को? मौसम के पैटर्न (जलवायु परिवर्तन) और मानव स्वभाव में आ रहे नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के लिएव्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर ठोस कदम उठाना आवश्यक है। प्राकृतिक गैसों के उपयोग को कम करके मौसम में ही सुधारा जा सकता है। ग्रेड और तेल की जगह सौर ऊर्जा (सौर ऊर्जा), पवन ऊर्जा (पवन ऊर्जा), और पनबिजली के उपयोग को बढ़ावा देना। वनों की कटाई को रोकें और अधिक से अधिक वृक्षों की कटाई करें, ताकि कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक रूप से अवशोषित हो सके। सतत कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) यानी रासायनिक खादों के बजाय जैविक खेती का उपयोग करें, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और जल संरक्षण हो सके।

   आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीक की लता और तनाव के कारण मानव स्वभाव में आक्रामकता और शरीर में कमी आ रही है। इसके लिए योग, ध्यान (मेडिटेशन) और प्राणायाम का दैनिक अवलोकन का हिस्सा। इससे मानसिक शांति और साहस बढ़ता है। स्क्रीन और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग सीमित करें। इसके बजाय परिवार, दोस्तों और प्रकृति के साथ वास्तविक समय जोड़ें। डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। यदि मन शांत रहेगा तो भौतिकता की अंधी दौड़ में पड़ कर प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और स्वयं तथा आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित कर सकेगा। यह समय है उन वैदिक मूल्यों की ओर जाने की जहां प्रकृति एवं पृथ्वी के संरक्षण के साथ मानव व्यवहार में आने वाले नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के उपाय सुझाए गए हैं। जरूरत है कि वैदिक ग्रंथों को मात्र धार्मिक ग्रंथों के रूप में देखने के बजाए जीवन रक्षक मूल्यों के रूप में देखने की। मौसम के पैटर्न और मानव स्वभाव में परिवर्तन को सुधारने कोई परग्रहवासी नहीं आएगा, इसे हमें ही सुधारना होगा।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 27.05.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, May 26, 2026

पुस्तक समीक्षा | छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - हरा पत्ता - उर्मिला शिरीष की कहानी
सम्पादक - हरि भटनागर, बृजनारायण शर्मा
प्रकाशक - रचना समय, 197, सेक्टर-बी, सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड भोपाल - 462042 (मध्यप्रदेश)
मूल्य - 100/-
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हिंदी साहित्य जगत अथवा हिंदी साहित्य से संबंधित पत्रिकाओं में ऐसी उदारता कम ही देखने को मिलती है जब किसी रचनाकार की किसी एक रचना को केंद्र में रखकर पूरी एक पुस्तिका प्रकाशित की जाए। मेरे संज्ञान में यह किसी भी पत्रिका का पहला अवदान है कि एक पुस्तिका जिसमें सिर्फ एक कहानी पर सामग्री केंद्रित रखी गई हो, अन्यथा किसी रचनाकार के समग्र साहित्य अथवा किसी एक संग्रह पर पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। वरिष्ठ कथाकार एवं अनुभवी संपादक हरि भटनागर के संपादन में ‘‘रचना समय’’ ने वह पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कथाकार उर्मिला शिरीष की एक चर्चित कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ पर समीक्षात्मक  लेखों सहित कहानी को प्रकाशित किया गया है। यह कहानी पूर्व में मैं उर्मिला शिरीष के कहानी संग्रह में पढ़ चुकी हूं इसीलिए जब ‘‘रचना समय’’ की यह पुस्तिका मेरे हाथों में आई तो मुझे सुखद लगा क्योंकि यह कहानी मुझे भी उस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी लगी थी। यह एक ऐसी कहानी है जो पाठक का ध्यान अपनी ओर न केवल आकर्षित करती है बल्कि देर तक सोचने को विवश करती है। “उस बहार का इंतज़ार” कहानी संग्रह की चौथी कहानी है “हरा पत्ता”। उर्मिला शिरीष के 11 कहानियों के संग्रह की समीक्षा करते समय मैंने कहानी “हरा पत्ता” के संबंध में लिखा था- “यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।”
“यह पुस्तिका” शीर्षक से संपादक हरि भटनागर ने लिखा है तोलस्तोय की एक कहानी है “हाऊ मच लैंड डज़ ए मेन नीड” की याद दिलाई है कि किस प्रकार एक इंसान जमीन पाने के लालच में दौड़ता चला जाता है और अंत में एक बड़ी जमीन उसके हिस्से में आती है किन्तु इसके साथ ही वह थक कर मर चुका होता है। हरि भटनागर कहा है कि लालच की इस अंतहीन दौड़ में एक ठहराव आना ही चाहिए और यही तो कहानी ‘हरा पत्ता’’ का आग्रह है।
जैसा कि मैंने पहले ही उद्धृत किया कि इस पुस्तिका में एक कहानी है और उस कहानी पर छः साहित्यकारों के विचार हैं जिनसे कहानी के प्रत्येक पक्ष पर भरपूर प्रकाश पड़ता है। क्रमवार सबसे पहले कहानी है, उसके बाद उससे संबंधित 6 लेख इस प्रकार हैं- उर्मिला शिरीष की कहानी: हरे पत्ते का यथार्थ - सूरज पालीवाल, एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी: हरा पत्ता - अरुण होता, हरा पत्ता: कहानी को इस तरह ‘‘देखिए’’ - सुधांशु गुप्त, ग्लोबलाइज़ेशन द्वारा रचे गये यथार्थ के, प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता - हरियश राय, समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक - प्रज्ञा, घर छूटने से मुरझाया: हरा पत्ता - अंकित नरवाल।
कहानी हरा पत्ता उस बुजुर्ग दंपति की कथा है जिसने बड़ी मेहनत और आशाओं के साथ अपनी संतान को पाल-पोसकर इस योग्य बनाया कि वह विदेश में जाकर नौकरी कर सके तथा वहां सुखपूर्वक रह सके। संतान ने भी सोचा कि उसके माता-पिता उसके पास आकर रहें और उसके साथ विदेश में ही बस जाएं। यहीं से शुरू होता है हरे पत्ते का खेल। हरा पत्ता यानी “ग्रीन कार्ड” जो कि विदेश में बसने के लिए जरूरी है। लंबी-चौड़ी लिखा-पढ़ी, जांच-पड़ताल और एंबेसी के धक्के खाने के बाद आखिर वह दिन आ जाता है जब ग्रीन कार्ड पानी के लिए अंतिम औपचारिकता निभाई जाने वाली रहती है। यह औपचारिकता भी आसान नहीं है। वृद्ध पिता लंबी कतार में प्रतीक्षा करते हुए चिंतन करता है और उसके मन में प्रश्न उठता है कि वह अपना देश छोड़कर हमेशा के लिए विदेश जाने का जो कदम उठा रहा है क्या वह उचित है अथवा नहीं? एक मंथन, पत्नी द्वारा एक प्रतिरोध, बच्चों के रूठ जाने का भय इन सब से पार पाना आसान नहीं था। कहानी का अंत चौंकाता है और पढ़ने वाले के मन में अनेक विचार चस्पा करता हुआ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंचता है। इस कहानी के पात्र मेच्योर हैं विचारशील है और  उनमें जिंदगी की गहरी समझ है। लेखिका ने जिस प्रकार एक लंबे संघर्ष और एक गहरे अंतर्द्वंद्व के बाद जिस प्रकार निर्णय तक पहुंचा है वह रोचकता से भरा हुआ है। पाठक जिज्ञास होकर सोचता है कि अब यह लोग क्या करेंगे? प्रश्न विकट है। निर्णय के लिए वह मानसिक कठोरता आवश्यक है जो एक झटके से उभरती है और बहुत कुछ कह जाती है।
सूरज पालीवाल ने अपने लेख “हरे पत्ते का यथार्थ”  लिखते हुए इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि हमारी अर्थव्यवस्था पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के मुकाबले कितनी कमजोर है। इसी कहानी से उदाहरण देते हुए स्मरण कराया है जब विदेश में बसी संतान अपने पिता के पास पैसे भेजते थे तो नोटों की गड्डियों से उनके हाथ भर जाते थे जबकि अपने देश में बेरोजगारी का अंतहीन सिलसिला है। यही कारण है कि चाहे माता-पिता हो या संतान सभी को हरे पत्ते का यानी ग्रीन कार्ड का लालच आकर्षित करता है। पूरे परिवार का सुखद भविष्य उसमें प्रतिबिंब की भांति चमकता है। सूरज पालीवाल ने कहानी की सार्थकता को रेखांकित करते हुए यह लिखा है कि यह कहानी मात्र एक पिता का उद्घोष नहीं बल्कि डॉलर की व्यर्थता के यथार्थ को भी सामने रखती है।
“एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी हरा पत्ता” - यह उद्घोष करते हुए अरुण होता ने कहानी को वैचारिक स्तर पर टटोला है। उन्होंने हरा पत्ता को एक सहज और स्वाभाविक कहानी ठहराया है जिसमें संवाद धर्मिता के साथ भाषाई सौंदर्य भी है। अरुण होता ने कहानी में दो संस्कृतियों की सामाजिक, आर्थिक एवं परिवेशगत भिन्नताओं को पूरी गंभीरता से लेखबद्ध करने को कहानी की विशेषता कहा है।
“हरा पत्ता कहानी को इस तरह देखिए” - यह सुधांशु गुप्त का आग्रह है। उन्होंने एक अलग ही दृष्टि से कहानी को खंगाला है। उन्होंने उदाहरण के लिए स्मरण दिलाया है मुंबई में आकर बसने वाले उन हजारों लोगों के बारे में जो गांव से लगाव तो रखते हैं किंतु एक बार मुंबई में बसने के बाद कभी गांव लौट कर नहीं जाते। अपने गांव की यादों के साथ वह महानगर भी उनका अपना हो जाता है। इसी प्रकार विदेश में बसने वाले अपने देश लौटने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन लौटने के नाम पर उनके पांव ठिठक जाते हैं। सुधांशु गुप्त ने कहानी के अंत को लेखिका की सदेच्छा के रूप में पाया है।
“ग्लोबलाइजेशन द्वारा रचे गए यथार्थ के प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता” ठहराते हुए हरियश राय कहानी के कथानक में उभरे  द्वंद्व के लिए उस ग्लोबलाइजेशन को जिम्मेदार मानते हैं जो 1990 से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। हमारा देश भी उससे अछूता नहीं है। डॉलर के हाथों गिरवी रखे रूपयों के समान बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास गिरवी युवाओं का जीवन मुक्त होने के लिए छटपटाता है लेकिन साथ ही उन्हें अपने बंधन से मोह भी होने लगता है। इसी प्रकार अपने देश में छूट गए वृद्ध माता-पिता के समक्ष भी एक द्वंद्व खड़ा रहता है। जिसमें एक ओर उनकी संतान है जो विदेश में बस गई है और उन्हें अपने पास रहने को आमंत्रित कर रही है और दूसरी ओर उनका अपना देश है जहां उनकी अपनी संस्कृति, अपने लोग और अपनी चिरपरिचित समस्याएं हैं। दोनों के बीच चुनाव करने की स्थिति बहुत कठिन है। इस कठिनाई को पार करते हुए देखकर हरियश राय इस ग्लोबलाइजेशन के विरुद्ध प्रतिरोध की कहानी मानते हैं।
“समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक” शीर्षक से प्रज्ञा ने कहानी के यथार्थ को एक मजबूत धरातल ठहराया है। उन्होंने भौतिकवाद में जकड़ते जा रहे भारतीय समाज की दशा की ओर भी इंगित किया है। उन्होंने कथाकार कि उसे सचेत दृष्टि की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है जो देसी विस्थापन और ग्लोबल विस्थापन के बीच सरकार होती घबराई हुई दुनिया का दृश्य रचती है। यही वर्तमान का यथार्थ है। प्रज्ञा के अनुसार यह कहानी विकास की अंधी दौड़ के बीच एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है।
“घर छूटने से मुरझाया हरा पत्ता” अंकित नरवाल इन शब्दों के साथ हमेशा के लिए देश छोड़ने और ग्रीन कार्ड धारक बनाकर विदेश में बस जाने को लेकर अपने देश के प्रति जगे हुए मुंह से उपजे वैचारिक ऊहापोह को इस कहानी का केंद्र मानते हैं। पहले बच्चे विदेश जाकर अपने लिए जमीन तलाश करते हैं और फिर उसे खाली जमीन में अपनापन भरने के लिए अपने माता-पिता को भी अपने पास बुला लेना चाहते हैं लेकिन क्या माता-पिता के लिए अपनी जड़ों से कट कर जाना इतना आसान है? इसीलिए अंकित नरवाल कहानी “हरा पत्ता” को तय शुदा अंत वाली कहानी परंपरा का अंत करने वाली कहानी निरूपित किया है।
उर्मिला शिरीष एक सशक्त कहानीकार हैं। उनकी कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ ग्रीन कार्ड के संदर्भ में  वर्तमान सामाजिक संकट को बहुत गहराई से रेखांकित करती है और यह पुस्तिका जिसमें इस कहानी पर 6 विद्वानों के विचार संकलित किए गए हैं अपने आप में कहानी पर समग्र समीक्षात्मक कलेवर प्रस्तुत करते हैं। ‘‘रचना समय’’ तथा उसके संपादक हरि भटनागर, बृज नारायण शर्मा तथा उप संपादक सौमित्र बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक महत्वपूर्ण कहानी को पाठकों के चिंतन-मनन के लिए सामने रखते हुए समीक्षात्मक लेखों सहित एक पुस्तिका के रूप में प्रस्तुत किया है। यह हिंदी साहित्य में एक अच्छी पहल है जिसे सतत जारी रहना चाहिए।
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Thursday, May 21, 2026

बतकाव बिन्ना की | जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘सुनियों तनक ठंडो पानी पिलइयोे!’’ भैयाजी कऊं बायरे से आए। पसीना में भींजे भए दिखा रए हते। बेर-बेर अपनो माथा गमछा से पोंछत जा रए हते।
‘‘कां से आ रए भैयाजी?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे का बताएं, बजार गए रए। बेजा गरमी पर रई। रामधई, भुंटा से भुन गए।’’ भैया जी अकुलाने से बोले।
‘‘हऔ गरमी सो खीब जम के पर रई। कल अपने करीब 46 डिग्री रओ औ उते खजुराहो में 47 लौं पोंच गओ। आगी से बर रई बायरे तो।’’ मैंने कई।
‘‘जेई से तो हमने कई रई के अबे ने जाओ संझा खों ले आइयो। ऐसो कोनऊं जरूरी को सामान ने हतो।’’ भौजी भैयाजी खों पानी को गिलास पकरात भईं बोलीं। फेर मोंसे पूंछी,‘‘तुमें पीने?’’
‘‘नईं, अबई तो पियो रओ।’’ मैंने कई।
‘‘इत्ती देर घाम में फिरत रए औ जे का ले आए इत्तो सो?’’ भौजी ने थैलिया उठात भए पूंछी।
‘‘अब तुमई देख लेओ।’’ भैयाजी बोले। ठंडो पानी पी के उने तनक सहूरी सी लगी हती।
‘‘जे का? जे इत्ती सी भिंडी, दो ठइयां करेला? बस? औ धना तो ले न पाओ हुइए आपने। जबके बे ओरें कोनऊं मूफत-वूफत में नईं देत आएं। बे तो सब्जी में पैले से धना के पइसा जोछ़े रैत आएं।’’ भौजी ने भैयाजी से कई।
‘‘अरे अब कोनऊं नहीं दे रओ धना-मना। हमने तो ऊसे कई रई, मनो बा बोलो के धना सोई मैंगी हो गई सा अब हम ने दे पाबी। खरीदने होए सो खरीद लेओ।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हऔ खरीद लेओ।’’ भौजीे मों बनात भईं बोली,‘‘ हम तो होते तो ऊसे कैते के हऔ हम धना खरीद लेत आएं मनो तुम सबई सब्जियन पांच-पांच रुपइया कम करो। औ जे इत्ती सी सब्जी को का हुइए? जे दोई सब्जियां बनात में पुचक जात आएं। चटनी घांई खाने परहे।’’ भौजी बोलीे।
‘‘अब चटनी खाबे के दिन आ गए समझो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’भौजी ने करेला खों उलट-पटल के देखत भईं पूंछी।
‘‘मतलब जे के अब तो थैलिया भर के पइसा ले जाओ औ मुठिया भर के सब्जी लाओ। जे हो रओ। सबई सब्जियन के दाम बढ़ गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रै भैयाजी!’’ काल मैंने र्सोअ फतकुली के दाम पूछे औ पलट के मोए कैने परो के नईं भैया रैन देओ। तुम तो जोन कछू कम की होए सो बताओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘उते सब्जी वारे के इते हमाओ एक दोस्त मिलो रओ बा बता रओ तो के अब तो होअलन में भी सब्जी रोटी के दाम बढ़ गए। बा अबे बी मोबाईल से पइसा नईं देत। ऊसे बनत नइयां। सो बा जित्ते नोट ले के परों अपनी फैमिली को होटल में खबावे खों ले गओ रओ, उत्ते नोट कम पर गए। बा तो ऊको मोड़ा मोबाईल से पइसा देबो जानत आए औ ऊके मोबाईल में पइसा हते सो ऊने बाकी पइसा मोबाइल से दे दए ने तो उन ओरन की बड़ी फजीयत होती।’’भैयाजी ने बताई।
‘‘तेल तो ऊंसई कम खा रए। तलो-फुलो बनाबो छोड़ दओ, का अब साग-भाजी खाबो बी छोड़ने परहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बे चाए हवाई जाहज में उड़े, बे चाए दावतें करें, बे चाए दौरा में फूंके, मनो पब्लिक खों ने तो तेल खाने, ने तो गाड़ी पे चलने औ ने सोनो खरीदने। अब औ का-का छोरने परहे बा औ बता देते संगे। तुमें पतो के जे दो ठइया करेला कितेक में आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘आए हुइएं बीस रुपइया में।’’ भौजी अटकल लगात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, का धरे बीस रुपइया में? जे दो ठइया करेला साठ रुपइया के आएं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हे माई! इत्ते मैंगे? सो काए खों ले आए? कछू दूसरो ले आउते।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का ले आते? सबई तो मैंगी हो गईं। मनो बे ओरें बी का करें? उने बी तो मंडी से बजरिया लौं लाबे में गाड़ी को खर्चा लगत आए। औ गाड़ी को किराया सोई बढ़ गओ आए। गरीब खा खाए, का पैने औ का ओढ़े?’’भैयाजी बोले।
‘‘काए गरीबन के लाने बा मुतकी योजनाएं सो चल रईं। जे लच्छमी बा लच्छमी। मुफत को तो बंाट रई सरकार। बा नईं दिखा रओ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो का? उने का सामान ने खरीने परहे? जोन मिलत आए, बा बी पूरो ने परहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘एक बेर कोरोना में मुतके निपट गए औ अब जे मैंगाई लील जैहे। कोनऊं से जुट्ट बना के जे नईं दबाव डारत बन रओ के लड़ाई खतम करी जाए। बे लड़-मर रए औ संगे अपन सोई निपटाए जा रए।’’ भैयाजी फिर के भड़कत भए बोले।
भैया खों भड़कबो सई हतो, काए से के जोन को तीस रुपइया में एक ठो करेला खरीदने परहे बा तो भड़कहे ई। मोए सोई लगत आए के जे जो मैंगाई ऐसई बढ़त रई तो का हुइए?
‘‘भैयाजी, मोए जे बताओ के डीजल औ पेट््रोल बचाबे के लाने सायकिल पे चलबे की फोटुएं छप रईं। जबके सई तो जा आए के पब्लिक के पास अब सायकिल रैती कां आए? गांव दो किलोमीटर से बारा किलोमीटर लौं पसर गए। सहर बीस-तीस किलोमीटर लौं फैलत चले गए। औ पांछू कछू दिनां से तो जेई चलन बन परी के कालोनी इते बनाओ तो बसस्टेंड उते सहर से बायरे बनाओ। अब सायकिल ने तो पैदल कोऊ कैसे जा पा रओ। ऊपे से आदत लौं नई रई। फेर तुमके घर ऐसे आंए जीमें बच्चा सबरे बायरे दूसरे सहर, ने तो दूसरे देस चले गए कमाबे के लाने औ घरे बुड्ढा-बुड्ढी रै रए। बे का करहें?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुम तो उन ओरन की सोंस रईं, अब तो जे कए रै के इत्ते करै घाम में सायकिल चलाबो ने तो पैदत चलबो का आसान आए? पेड़ सो पैलई सबरे कटा दए गए। मूंड़ पे छायरी लौं ने बची।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो जे बी तो कै कए रए के गाड़ी में एक-दूसरे के संगे चलो।’’ मैंने याद कराई।
‘‘कोऊ कोनऊं खों संगे नईं ले जा रओ। फेर अपने इते के लोग इत्ते साजे बी नोंई के एक दिनां एक पेट््रल भरा ले औ दूसरे दिन दूसरो। बे कैने लगहंे के हमाई सो कड़की चल रई। औ दोई दिनो में जा अपनी गैल, बा अपनी गैल।  
‘‘रामधई बिन्ना, जे मैंगाई तो लूघरा छुबान लगी। आगे का हुइए? मोरो तो सोचई के जी घबरान लगो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ने घबड़ाओ भौजी। एक तो ऊंसई गरमी पर रई, ऊमें तुम ने अपनी तबीयत बिगार लई तो बड़ी सल्ल बींध जैहे।’’ मैंने भौजी खों समझाई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जे मैंगाई चुनाव से पैले काए ने बढ़ी जबके लड़ाई तो पैले से चल रई हती?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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