चर्चा प्लस
कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
एक कामर्शियल विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के ब्रालेट पहनने पर पक्ष और विपक्ष में जितनी तलवारें खिंची यदि उसकी आधी भी बहस प्राकृति संकट को ले कर होती तो नेपाल जैसी विभीषिका से बचा जा सकता था। हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के असंतुलित दोहन से स्थितियां दिन पर दिन बदतर हो रही हैं। जोशी मठ हासदे से ले कर हाल ही में नेपाल में आई कीचड़ की बाढ़ ने जता दिया कि प्रकृति नाराज़ है और वह बार-बार चेतावनी दे रही है किन्तु हमारी वर्तमान राष्ट््रीय चिंता तो एक विज्ञापन में पहना गया ब्रालेट है। विज्ञापन को नकारने के बजाए उसे पूरी पब्लीसिटी देना गोया राष्ट््रीय कर्तव्य है। क्या 903 लोगों की मौतें और चार हजार से अधिक लोगों का लापता हो जाना मामूली बात है? जबकि अभी संकट की दस्तक मात्र है।
ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त के रुख़ पे तबाही की इबारत लिख गया।
- शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से नेपाल तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। आज बाढ़ें भयावह रूप लेती जा रही हैं। लेकिन इस बारे में चिंता करने के बजाय कृति सेनन के ब्रालेट की चिंता में समय खपाना जागरूकता की निशानी बन गया है। एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति की तौहीन बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे स्त्री की आजादी से जोड़ कर इसकी पैरवी कर रहा है। सोशल मीडिया कृति सेनन और कंगना रनौत की कम और पूरे कपड़ों के साथ टांके गए पोस्टों से भारा पड़ा है। इक्का-दुक्का पोस्ट नेपाल के हादसे पर भी दिख जाती है गोया कुछ लोग स्वयं को जागरूक दिखाना चाहते हैं। अन्यथा इस तरह की आपदा की जड़ तक पहुंचने में भला किसको दिलचस्पी है?
6 फरवरी 2023 को जब टर्की में विनाशकारी भूकंप आया था तब मुझे एक आश्चर्यजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा था। भूकंप की खबर पढ़ने के बाद जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई थी। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया था कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा था कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।
भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं थीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?
तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई थी। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए थे। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है। भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं है। चाहे भारत हो या नेपाल हो बड़े बांधों से पैदा होने वाले संकट को अनदेखा करना, ग्लेशियर्स के तेजी से पिघलने को अनदेखा करना ही हमें विनाश का आईना दिखा देगा। नेपाल में आया ‘‘मड फ्लड’’ अर्थात कीचड़ की बाढ़ के पीछे असली कारण ग्लेशियर्स पिघलने से अचानक जलस्तर बढ़ना था। ग्लेशिर्यस क्यों तेजी से पिघल रहे हैं? क्योंकि पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, क्योंकि इससे मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव हो रहा है। दुख की बात ये है कि यह सब हमारे संज्ञान में है, फिर भी प्रकृति को चोट पहुंचाने से हम बाज नहीं आ रहे हैं।
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।
वैज्ञानिकों ने हमेशा इस ओर ध्यान दिलाया और चेतावनी भी दी। प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है।
6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आई थी कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी 2023 को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया।
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
नेपाल की ओर से बह कर आने वाली नदियां हों या चीन से उतरने वालीं, भारत के लिए संकट पैदा करने में सक्षम है। नेपाल आपदा के बाद यह आशंका जताई भी गई थी कि कहीं चीने को अपने दो बंाधों ये यदि बंधान खोले तो और अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इस गंभीर समाचार पर कितने लोगों ने ध्यान दिया? शायद गिनती के लोगों ने। अधिकांश का सरोकार तो ब्रालेट पहनी अभिनेत्री के विज्ञापन से था। उन्हें संस्कृति की चिंता थी जिसे उस विज्ञापन को अनदेखा कर के, उसे अप्रभावकारी साबित कर के भी संस्कृति के पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता था। जबकि कोई भी संस्कृति तभी तक है जब तक उस संस्कृति के लोग सुरक्षित हैं और जीवित हैं। अतः पहली और प्रखर चिंता होनी चाहिए थी प्राकृतिक आपदा की, बालेट की नहीं।
दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते, लेकिन ग्लेशिर्य के पिघलने की गति को कम कर सकते हैं। इस तरह प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो हमें प्रकृति-मित्र बनना होगा। प्रकृति की चिंता करनी होगी। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 02.09.2026 को प्रकाशित)
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