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शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Thursday, July 9, 2026
बतकाव बिन्ना की | ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, July 8, 2026
चर्चा प्लस | गंभीर चिंतन आवश्यक है विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
गंभीर चिंतन आवश्यक है विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
स्त्री के लिए ‘लेखिका’ शब्द है और पुरुषों के लिए ‘‘लेखक’’ शब्द। लेकिन फिसलन यह कि ‘‘महिला लेखिका’’ शब्द का प्रयोग भी कर दिया जाता है। अर्थात् एक स्त्री के लिए विशेषण का दोहरा जेंडर। विशेष यह की कई बार हिन्दी के विद्वान प्राध्यापकों की लेखनी एवं उद्बोधन में भी यह प्रयोग पढ़ने-सुनने को मिल जाता है। इसी तरह एक विशेषण प्रत्यय प्रचलन हिन्दी में भी चलन में आया है - ‘‘कारा’’। जैसे ‘‘ग़ज़लकारा’’। यहां तक कि मैंने स्वयं अपने लिए संबोधन सुना है ‘‘कहानीकारा’’, ‘‘उपन्यासकारा’’। देखा जाए तो भाषा और स्त्री दोनों को भाषाई दोष की काराओं में बंदी बनाया जा रहा है। यह बात हंसी में नहीं उड़ाई जा सकती है क्योंकि थर्ड जेंडर राईटर्स के रूप में रचनाकार- संसार का विस्तार हो रहा है। इस समय विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।
वर्ष 2009 में नरेन्द्र कोहली की छः भागों की एक उपन्यास श्रृंखला आई थी जिसका नाम था ‘‘तोड़ो, कारा तोड़ो’’। यह स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित थी। मेरी इस चर्चा का इस उपन्यास से मात्र इतना ही संबंध है कि इस उपन्यास के नाम में ‘‘कारा’’ शब्द आया है और कारा अर्थात् बंधन। जिसे तोड़ने का आह्वान किया गया है उपन्यास में। इस ‘‘कारा’’ से ही बना है शब्द ‘‘कारावास’’ जिसका शाब्दिक अर्थ है बंदीगृह। स्त्री-जीवन से भी कारा शब्द का गहरा संबंध है। स्त्री-जीवन अनेक काराओं से अर्थात् बंधनों से जकड़ा हुआ है। इस बंधन की बुनियाद उसके बचपन में ही पड़ जाती है जब उसकी प्रत्येक चेष्टा पर ‘‘ऐ लड़की’’ कह कर अंकुश पर अंकुश लगाए जाते हैं। कृष्णा सोबती ने इसी संबंध में एक उपन्यास लिख डाला था जिसका नाम ही है-‘‘ऐ लड़की’’। स्त्री जीवन की काराओं का आरम्भिक रूप है कि ‘‘ऐ लड़की तू ये न कर’’, ‘‘ऐ लड़की तू वो न कर’’, ‘‘ऐ लड़की तू यहां मत जा’’, ‘‘ऐ लड़की तू वहां मत जा’’, ‘‘ऐ लड़की तू यह मत पहन’’, ‘‘ऐ लड़की तू वह मत पहन’’, ‘‘ऐ लड़की तू इससे बात मत कर’’,‘‘ऐ लड़की तू उससे बात मत कर’’ आदि-आदि अनेक बंधन। स्त्रियों ने इन अनावश्यक काराओं से मुक्त होने के लिए दुनिया भर में लंबा संघर्ष किया है। यह संघर्ष आज भी जारी है। किन्तु जिस अपनी पहचान और अस्तित्व की स्थापना के लिए अनेक स्त्रियां संघर्षरत हैं वहीं कथित प्रबुद्ध स्त्रियां अपने कार्य से जुड़े अस्तित्व की पहचान के साथ ‘‘कारा’’ जोड़े जाने पर कोई आपत्ति नहीं कर रही हैं।
चलिए बता दूं कि यह मुद्दा कहां से दिमाग़ में आया। वस्तुतः फेसबुक पर एक साहित्यिक कार्यक्रम का पोस्टर देखा। जिसमें कवियों के साथ कवयित्रियों, शायराओं की तस्वीरें थीं और उनके नाम के साथ उनकी विधा को स्पष्ट करते हुए ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द लिखा गया था। अब यह ‘‘ग़ज़लकारा’’ क्या होता है? ‘‘ग़ज़लगो’’, ‘‘शायरा’’, ‘‘कवयित्री’’ जैसे शब्द प्रचलन में रहे हैं लेकिन इधर कुछ समय से ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द वाया सोशल मीडिया तेजी से प्रचलन में आया है। अभी कुछ समय पहले एक कार्यक्रम में मेरा लेखकीय परिचय देते हुए एक संचालक महोदय ने मेरे लिए कहा था कि ‘‘ये चर्चित कहानीकारा हैं, उपन्यासकारा हैं, स्तम्भकारा हैं।’’ अपने परिचय के साथ तीन-तीन ‘‘कारा’’ सुन कर मुझे लगा कि इसके बाद बस, कारागार ही शेष बचता है।
एक ओर स्त्रियों और पुरुषों की समानता के लिए आवाज़ उठाई जाती है। बुद्धिजीवी साहित्यिक वर्ग यहां तक कहता है कि ‘‘लेखक’’, ‘‘साहित्यकार’’ ‘‘कवि’’ आदि शब्दों को लिंगभेद से अलग कर के देखा जाना चाहिए और चाहे स्त्री रचनाकार हो अथवा पुरुष रचनाकार दोनों के लिए एक समान सम्बोधन होना चाहिए। जैसे अंग्रेजी में ‘‘राईटर’’, ऑथर’’ जैसे शब्द दोनों के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। जहां जेंडर स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है वहां ‘‘मेल राईटर’’, ‘‘फीमेल राईटर’’ का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में भी स्त्री लेखक, पुरुष लेखक जैसे शब्द प्रचलन में आ चुके हैं। लेकिन मजे की बात है कि इन शब्दों के प्रयोग में हिन्दी के प्राध्यापकों एवं शोधकर्ताओं तक को गलती करते पाया है। कई बार लिखा हुआ पढ़ने में आया ‘‘महिला लेखिका’’। बोलने में भी कई बार लोग ‘‘महिला लेखिका’’ बोल देते हैं किन्तु इसे ज़बान की फिसलन मान कर अनदेखा किया जा सकता है किन्तु लिखे हुए अथवा मुद्रित सामग्री में ‘‘महिला लेखिका’’ को कैसे फिसलन मान लेंगे? अब कोई ऐसी त्रुटि करने वाले से पूछे कि यदि आप ‘‘महिला लेखिका’’ शब्द ही प्रचलन में लाना चाहते हैं तो फिर साथ में ‘‘पुरुष लेखिका’’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? आखिर तय तो करना पड़ेगा कि आप महिला को ‘‘महिला’’ और ‘‘लेखिका’’ के दोहरे जेंडर सूचक शब्द में बांधना चाहते हैं या फिर सही और उचित संबोधन देना चाहते हैं?
यूं भी अब बात स्त्री या पुरुष सर्जकों की नहीं रह गई है। थर्ड जेंडर की कृतियां भी सामने आने लगी हैं। महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा ‘‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’’ मराठी, गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है। आर. रेवती दक्षिण भारत में रहने वाली ट्रांसजेंडर सर्जक है। उनकी प्रथम पुस्तक तमिल में प्रकाशित हुई थी जिसका अंग्रेजी अनुवाद का नाम था ‘‘अवर लाइव्स, अवर वर्ड्स’’। फिर 2010 में उनकी दूसरी पुस्तक आई ‘‘दी ट्रुथ अबाउट मी: ए हिजड़ा लाईफ स्टोरी’’। आर. रेवती से प्रभावित हो कर ट्रांसजेंडर प्रियाबाबू ने 2007 में ‘‘नान सर्वनान अल्ला’’ और ट्रांसजेंडर विद्या ने ‘‘आई एम विद्या’’ पुस्तक लिखी। तो प्रश्न यह उठता है कि थर्ड जेंडर के साहित्य सर्जकों के लिए किस तरह का संबोधन प्रयोग में लाया जाएगा? क्या बेहतर यही नहीं होगा कि साहित्य सर्जकों को जेंडर सूचक शब्दों की कारा से मुक्त रखा जाए। यदि ‘‘लेखक’’ शब्द सभी के लिए प्रयोग किया जाना है तो वह स्त्री, पुरुष और थर्ड जेंडर तीनों के लिए प्रयोग में लाया जाए।
इस विषय पर मेरा ध्यान हमेशा ही आकृष्ट हुआ है। सन् 2005 में मेरे उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका में मैंने हिन्दी व्याकरण में जेंडर की बात उठाते हुए लिखा था कि- ‘‘अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ पर्सन अर्थात व्यक्ति शब्द जुड़ा होता है। यह पर्सन पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी। किंतु हिंदी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष। फिर स्त्री के लिए जगह कहां है? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित है? क्या स्त्री की पहचान मात्र लिंग तक सीमित है? मैं न तो व्याकरण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न ही आधिकारिक व्याख्याकार हूं, लेकिन एक औरत होने के नाते मुझे यह बात सदैव चुभती है।’’
यह बात विस्मृत करने की नहीं है कि भाषा का सीधा संबंध संस्कार से होता है। भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व की परिचायक होती है। भाषा और संस्कार का अंतर्सम्बन्ध घनिष्ठ है। कोई व्यक्ति किस प्रकार की भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग बोलचाल में कर रहा है, उसी से उसके संस्कारों का पता चल जाता है। यदि कोई व्यक्ति बात-बात में अपशब्दों का प्रयोग करता है तो तत्काल समझ में आ जाता है उस व्यक्ति को अच्छे संस्कार नहीं मिले हैं। वहीं कोई व्यक्ति सम्य, शालीन भाषा का प्रयोग करता है तो हम उसे संस्कारवान मानने में देर नहीं करते हैं। इसी बात को यदि और सरल शब्दों में कहा जाए तो भाषा संस्कार का ‘‘आईडी कार्ड’’ होती है। कहने का आशय यही है कि इस ग्लोबल होते समय में भाषा के संस्कार को बचाए और बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
खैर, बात चल रही थी, ‘‘ग़ज़लकारा’’ की। इस शब्द ने मुझे इतना परेशान किया कि मैंने अपनी शंका-समाधान के लिए एक जाने-माने शायर से इस बारे में पूछा कि उर्दू में ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द होता है क्या? वे उर्दू और हिन्दी दोनों भाषाओं में समान रूप से ग़ज़ल कहते हैं इसलिए मुझे उनसे अपना उत्तर मिलने की पूरी उम्मीद थी। उन्होंने भी वहीं उत्तर दिया जिसका मुझे पता था कि उर्दू में ऐसा कोई शब्द नहीं होता है। फिर उन्होंने विस्तार से समझाया कि ‘‘ग़ज़ल लिखी नहीं जाती बल्कि कहीं जाती है इसीलिए ग़ज़ल कहने वाले को ग़ज़लगो कहा जाता है। गजलकार शब्द हिंदी में प्रचलन में आ गया है जो उचित नहीं है। क्योंकि ग़ज़ल स्वतः बनती है, उसमें किसी प्रकार की कलाकारी नहीं की जाती है। जहां कलाकारी हो वही कार शब्द उचित लगता है जैसे अदाकार या अदाकारा।’’
इस बारे में मैंने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर से भी चर्चा कर डाली। उन्होंने भी ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द पर आपत्ति जताई कि ‘‘यह सर्वथा गलत है।’’ एक ग़ज़ल विधा के ज्ञाता और दूसरे भाषाशास्त्र के ज्ञाता, इन दोनों से चर्चा करने के उपरांत मुझे विश्वास हो गया कि मैं सही दिशा में चिंतन कर रही हूं। दरअसल प्रश्न मात्र ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द का ही नहीं है, प्रश्न है भाषा और स्त्री दोनों की अस्मिता का, उनकी पहचान का। इस प्रकार के शब्द गढ़ने वाले स्वयं को साहित्य का विद्वान कहते हैं और उसे अनदेखा करने वाले उन्हें अनजाने में प्रोत्साहन देते हैं। यह तो हुई भाषा में दोषपूर्ण शब्दों के समावेश की। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है स्त्री की बौद्धिक विशेषता के लिए दिए जा रहे संबोधन की। स्त्री समाज जहां एक ओर अपनी काराओं को तोड़ कर स्वयं की क्षमता प्रमाणित करने में जुटा हुआ है, वहीं संबोधन में ‘कारा’ का विशेषण प्रफुल्लित हो कर स्वीकार किया जा रहा है। कवियों के लिए तो यूं भी प्रचलित है कि ‘‘जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि’’, तो क्या कवि समुदाय इन काराओं तक पहुंच नहीं पा रहा है अथवा देख कर अनदेखा कर रहा है या फिर इस ओर सोचना ही व्यर्थ मानता है? बेशक़ प्रश्न अनेक हैं। क्या करूं, दिल है कि प्रश्न किए बिना मानता ही नहीं। वैसे, फिलहाल तो दिल यही कहना चाहता है (नरेन्द्र करेहली जी से क्षमायाचना सहित) कि ‘‘प्रिय रचनाकार बंधु-बांधवी, तोड़ो कारा तोड़ो और संबोधन के लिए चलन में उचित शब्द जोड़ो’’।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.07.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, July 7, 2026
पुस्तक समीक्षा | लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - लोक मिथक : मूल्य और सौंदर्य दृष्टि
लेखक - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक - विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य - 450/-
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आज लोक संस्कृति संग्रहालयों की वस्तु बनती जा रही है। वर्तमान भौतिकवाद के लिए लोक संस्कृति भी एक बाज़ार की एक वस्तु है। वस्तुतः बाजार की संस्कृति ने लोक संस्कृति को भी बाजार की वस्तु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। घर की बैठक में वर्ली आर्ट या मधुबनी कलम की पेंटिग लगा लेना ही संस्कृति को सहेजना नहीं होता है। लोक संस्कृति को सहेजने के लिए सबसे पहले जरूरी है लोक संस्कृति के स्वरूप को समझना। यह समझना आवश्यक है कि लोक संस्कृति मात्र एक शब्द नहीं है, यह एक समृद्ध परम्परा है जो विचार, शिल्प कथा, आस्था आदि विविध रूपों में उस समय से प्रवाहित है जब दुनिया में संस्कृतियों का विधिवत उद्भव ही नहीं हुआ था। लोक संस्कृति वस्तुतः मौलिक चेष्टाएं हैं जो कभी अभिव्यक्ति के माध्यम से तो कभी कला, कल्पना और आस्था के माध्यम से व्यक्त होती रही हैं। लोक संस्कृति पर एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’। इसके लेखक है प्रतिष्ठित संस्कृतिविद डॉ. श्यामसुंदर दुबे।
लोक संस्कृति में मिथक की उपस्थिति के संबंध में डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने लिखा है कि ‘‘लोक-संस्कृति, मानवीय सौंदर्य चेतना का अक्षय स्रोत है। निःसर्ग और मनुष्य के सह समायोजन से अभिव्यक्त होने वाली लोक संस्कृति अपनी सामाजिकता में उदार आशयों वाली है। उसकी नैतिकता वैश्विक परिदृश्य में सृष्टि के समुचित संरक्षण से आविर्भूत है। लोक संस्कृति जितना मनुष्य को संरक्षणीय मानती है, उतना ही संरक्षणीय वह प्रकृति के प्रत्येक अंग को संरक्षणीय मानती है उसकी अभेद दृष्टि सर्वत्र सभी संदर्भों में एक ही चैतन्य को तलाशती है। यही वजह है कि उसमें मानवीय अंतर्दृष्टि के आलोक को हम प्रत्येक रचना-विधान में प्राप्त करते हैं।’’
लोक संस्कृति की अपनी अलग पहचान एवं विशेषता होती है इसका संबंध किसी देश व क्षेत्र विशेष के सामान्य जन समुदाय से होता है समाज में प्रचलित विभिन्न क्रियाकलाप परंपराएं अचार-विचार, संस्कार, प्रथाएं कर्मकांड, आस्था एवं विश्वास - लोक संस्कृति के आधारभूत तत्व हैं। संस्कृति व्यक्ति एवं समाज के विकास का परिचायक होती है। लोक जीवन इसी संस्कृति का अक्षय भंडार है। लोक संस्कृति समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को आकार देती है। लोक संस्कृति विविधरूपों में आकार लेती रहती है। जैसे- लोक भाषा, लोक परंपरा, लोकनाट्य, लोकगीत, लोककला आदि। लोक परंपराओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के व्रत, त्यौहार, प्रथाएं, मेले, रूढ़िया एवं संस्कार आते हैं, जिनके द्वारा समाज में उत्साह एवं विश्वास बना रहता है। लोक साहित्य लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति है यह प्राय अलिखित रहता है तथा वाचक परंपरा के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक प्रवाहित होता है। लोक साहित्य परिभाषित भाषा शास्त्रीय रचना पद्धति एवं व्याकरणिक नियमों से रहित होता है, इसकी भाषा लोक भाषा होती है लोक साहित्य के अंतर्गत लोक गाथा, लोकगीत, लोक कथाएं, सुभाषित, पहेलियां, लोकोक्तियां, लोकनाट्य आदि आते हैं।
लेखक श्यामसुंदर दुबे ने अपनी पुस्तक ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’ में लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए विस्तार से लोक के स्वरूप को सामने रखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक के कलेवर को मुख्य तीन शीर्षकों एवं 25 लेखों में विभक्त किया है। ‘‘लोक-संस्कृति: विमर्श के नए आयाम’’ शीर्षक से दी गई भूमिका के उपरांत तीन मुख्य शीर्षक हैं- मिथकीय संरचना का संसार, जीवन-मूल्यों के आधार तथा कला-दृष्टियों का समाहार। इन तीन मुख्य शीर्षकों अथवा खंडों के अंतर्गत जो पच्चीस लेख हैं उनके मिथकीय संरचना का संसार के अंतर्गत हैं- लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध, भाषिक संरचना और लोक आख्यान, लोक आख्यान और आज का लेखन-कर्म, मिथक संरचना के आधारभूत बिंदु, लोक चित्र परंपरा के मिथकीय आधार, लोक-संस्कृति की भूमि पर लोक-विश्वासों की हरी दूब, लोक-प्रतीकों की अवधारणा, लोक-परंपरा और लोक-संस्कार, आदिम चित्रकला अभिप्रायों का संसार।
जीवन-मूल्यों के आधार के अंतर्गत हैं- लोक संस्कृति: मानव संसाधन का आधार, मानवीय मूल्य और लोक-साहित्य, लोक-साहित्य की मूल्य-चेतना, लोक-साहित्य: जीवन-मूल्य और भारतीयता, लोक-संस्कृति में माधुर्य-बोध, लोक की सौंदर्यशास्त्रीय भूमिका।
कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं- बोलियों और लोकगीतों का अंतर्संवादी स्वर, प्रदर्शनकारी लोक-कलाएं और जन-संचार माध्यम, लोक-लय के प्रयोग, लोक गायिकी: रंगतों का वर्णपट, लोक नृत्य ‘राई’, आल्हा परंपरा की उखड़ती सांसें, मिट्टी तेरे रूप अनेक: मृदा कला, लोक में बाजार और बाजार में लोक, हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता, लोक-गाथा में निहित समकालीनता।
लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध की विवेचना करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘ प्रारंभिक मिथक रचनाओं में आदिम मनुष्य का भय उसकी प्रसन्नता, उसकी घृणा, उसका बैर आदि मनोभावों के प्रबल प्रवेग ने मानवीय और अतिमानवीय चरित्रों के साथ मानवेतर प्राणियों और वस्तु संदर्भों के बीच संबंधों का चक्र निर्मित किया।यह चक्र आख्यान के सूत्रों के रेशों की सघन बुनावट से बना था। इन रेशों की चमक से जो झकर-मकर करता स्पेस निर्मित हो रहा था उसकी उर्वर क्षमता को इस रूप में अनुभव किया जा सकता है कि हमारे निकट अतीत के अनेक घटना प्रसंग जब आख्यान बनने हेतु समुद्यत होते हैं, तब मिथक के आदिम अनुभव से वे उद्रेकित होने लगते हैं। मिथक रहस्य भावना की उपज भी माने जा सकते हैं।’’
भाषिक संरचना और लोक आख्यान के अंतर्संबंध के बारे में लेखक श्यामसुंदर दुबे का कहना है कि- ‘‘भाषिक संप्राप्ति के तत्काल बाद ही मनुष्य आख्यानपरकता की ओर उन्मुख हुआ होगा। भाषा की वृत्ति अपने-आपको अभिव्यक्त करने की चेष्टाओं का भले ही ध्वन्यात्मक परिणाम हो, किंतु भाषिक संरचना की लंबी जद्दोजहद में मनुष्य की आख्यान व्याकुलता ही क्रियाशील रही है। मनुष्य केवल इच्छित विषय की संकेतधर्मी परंपरा से संबंधित ध्वनि-पर्यायों से संतुष्ट नहीं रहा- ये पर्याय वस्तु-बिंब और उससे जुड़े तमाम क्रिया- व्यापारों की आख्यान केंद्रित इकाई की तरह निर्मित हुए हैं। इसलिए प्रत्येक शब्द एक आख्यायिका को अपने भीतर छिपाए हुए है।’’ इसी लेख में लोकबोलियों के संबंध में लेखक ने सोदाहरण लिखा है कि- ‘‘कम-से-कम संस्कृत भाषा की शब्द- संरचनाओं में धातु आधार तो हमारे अभिज्ञान में है ही। इसी क्रम में लोक-बोलियों का विकास हुआ और इन बोलियों के शब्दों का मूल, क्रिया-जन्य ही है। क्रिया मात्र ध्वनि नहीं है वह एक पूरा दृश्याख्यान है। मैं यहाँ एक शब्द ‘पत्र’ लेता हूँ- यह शब्द प्रारंभ में वृक्ष के पत्ते के पर्याय को व्यक्त करने वाला रहा है-फिर चिट्ठी, पन्ना आदि का अर्थ देने वाला बना। लोक बोली के पत्ते को आधार बनाकर एक रूपक रचा ‘पत्ता टूटा डाल से-उड़कर गया अकास’ डाल से पत्ता टूटा और हवा के झोंके के साथ उड़कर आकाशचारी बना। पत्र के मूल में पत् क्रिया है। डाल से पत्र टूटा और पृथ्वी की सतह पर गिरा गिरने से पत् की आवाज आई। इस क्रिया के पूर्व पत्ता-पत्ता नहीं था-एक क्रिया ने उसका नामकरण किया। क्रिया संपूर्ण इंद्रिय-संवेदी व्यापार है, टूटते हुए पत्ते के शेड्स की झलमलाहट, पत् ध्वनि का परिस्पंदन, पत्ते के ताजे डंठल से निर्गत गंध, पत्ते की कोमलता को छूने का भाव, पत्ते की ओक बनाकर तरल पदार्थ पीने का अनुभव - ये संपूर्ण संवेदनाएँ एक ध्वनि-बिंब’ में सिमट आईं।’’
लोक-परंपरा और लोक-संस्कार के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘लोक एक परंपरा है। परंपरा सतत विकसित मूल्य-बोध है। इसके सातत्य में सृजनमूलक समस्त अनुष्ठान अगली पीढ़ी के लिए हस्तांतरित होते रहते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसमें कुछ नया जुड़ता रहता है। परंपरा का विकास लगभग एक रैखिक होता है। चूँकि यह विकास है, इसलिए यह ऊर्ध्वगामी भी होता है। लोक में परंपरा का विकास एक तरह से सांस्कृतिक समुन्नयन भी है, इसलिए यह एक क्रियाशील जीवित प्रणाली है, जो सामाजिक प्रकार्यों को गति देती है। परंपरा का नाभिकेंद्र लोक है, अतः लोक के परिवृत्तों में जो परिवर्तन की ऊर्जा समाहित है, वह लोक की अभ्युदयमूलक सिसृक्षा है।’’
यह पुस्तक लोक मिथक को बीरीकी से समझाती है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं एक लोक संस्कृतिविद हैं अतः बुंदेली लोक संस्कृति के साथ ही उन्होंने देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों का अध्ययन तथा उन पर लेखन किया है। सबसे अच्छी बात है कि जब वे लोक संस्कृति की चर्चा करते हैं अथवा उस पर कुछ लिखते हैं तो तथ्यात्मकरूप से लिखते हैं। अपनी इस पुस्तक में भी उन्होंने वैचारिक तर्कों के साथ लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि के उदाहरण देकर विषय की व्याख्या की है। पुस्तक के प्रथम दो मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत लेख समग्रता लिए हुए हैं। तीसरे कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं रखे गए लेखों में मृदा कला, हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता आदि पर।
श्यामसुंदर दुबे के पास भाषाई समृद्धि है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों से सुसम्पन्न उनकी भाषा उन लोगों को पर्याप्त भाषिक आनन्द देती है जो हिन्दी के श्रेष्ठ स्वरूप का रसास्वादन करना चाहते हैं किन्तु लोक एक ऐसा विषय है जिसमें हर तरह के पाठक वर्ग की रुचि हो सकती है। अतः पुस्तक की संस्कृतनिष्ठ भाषा उन पाठकों के लिए तनिक असुविधा पैदा कर सकती है जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से दूर हैं। चूंकि यह पुस्तक लोक संस्कृति के लोक मिथक पर है अतः इसकी भाषा थोड़ी सरलीकृत होती तो और अधिक पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह पुस्तक सुधि पाठकों को लोक मिथक के सौंदर्य एवं स्वरूप से गहराई से भली-भांति परिचित कराने में सक्षम है। लोक संस्कृति अथवा संस्कृति में रुचि रखने वालों तथा उत्तम भाषा का रसास्वादन करने की इच्छा रखने वालों को इस पुस्तक को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।
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Sunday, July 5, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | झला परन लगे, अब उठ बैठो खतरा वारे घर औ स्कूलों के लाने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Thursday, July 2, 2026
बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, July 1, 2026
चर्चा प्लस | हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक दिन अचानक सभी के मोबाईल पर रेड अर्लट बजा। चेतावनी थी मौसम विभाग की ओर से। साथ ही मैसेज भी था कि तीन घंटे में तेज हवाएं चलेंगी। तीन क्या, तेरह घंटे निकल गए लेकिन रेड अलर्ट वाली तेज हवाएं नहीं चलीं। बहरहाल, लोगों को रेड अर्लट बजने का अनुभव तो हुआ। लेकिन यदि सही में तेज तूफानी हवाएं चलतीं तो आमजन को क्या करना चाहिए इसका उन्हें कोई पता नहीं था। चूंकि तूफानी हवाएं नहीं चलीं तो मामला हंसी-मजाक में दब गया। लेकिन प्रकृति कभी मजाक नहीं करती। इसका जाता उदाहरण वेनेजुएला में आया भूकंप है। गूगल के मौसम विभाग ने चेतावनी भी दी थी किन्तु हताहतों की संख्या दस हजार से अधिक रही। क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि वे अपना बचाव कैसे करें? वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट पर स्थित है। भूकंपों की यह श्रृंखला 7.2 तीव्रता के भूकंप से शुरू हुई और 39 सेकंड बाद पास ही में 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आया। वेनेजुएला सम्हल नहीं सका। क्या हम सम्हल सकेंगे?
24 जून 2026 को वेनेजुएला में शाम के समय दो शक्तिशाली भूकंप आए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार पहले 7.1 और दूसरे 7.5 तीव्रता के भूकंप ने काराकास में कई इमारतें गिरा दीं। लोग सड़कों पर आ गए। सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई। पहला भूकंप 7.1 तीव्रता का था, जिसका केंद्र मोरॉन समुदाय के पश्चिम में था। ये देश के कैरेबियन तट पर स्थित है, काराकास से करीब 168 किलोमीटर दूर। इसकी गहराई 13 किलोमीटर थी। कुछ मिनट बाद दूसरा और भी बड़ा 7.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसकी गहराई 10 किलोमीटर थी। केंद्र मोरॉन से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में था। इन भूकंपों ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। लोग सड़कों पर निकल आए, इमारतों की दीवारें गिर गईं और धूल के गुबार उठते दिखे। इसके साथ ही कई राज्यों में झटके महसूस किए गए, खासकर काराकास के अल्तामिरा इलाके में भारी नुकसान हुआ। लोगों से बाहर रहने और आफ्टरशॉक्स से सावधान रहने की अपील की गई।
भूकंप पृथ्वी की टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति से होते हैं। वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट और साउथ अमेरिकन प्लेट की सीमा पर स्थित है। भूगर्भीय वैज्ञानिकों के अनुसार कैरेबियन प्लेट साउथ अमेरिकन प्लेट के सापेक्ष पूर्व दिशा में लगभग 20 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से खिसक रही है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ट्रांसफॉर्म बाउंड्री है, जहां प्लेट्स एक-दूसरे के बगल से गुजरती हैं, जैसे सैन सेबेस्टियन और एल पिलार फॉल्ट स जब प्लेट्स फंस जाती हैं और तनाव बढ़ता है, तो अचानक फिसलन होती है, जिससे भूकंप आता है। इस बार के भूकंप उथले थे (10-13 किमी गहराई), इसलिए उनका प्रभाव ज्यादा था। उथले भूकंप सतह पर ज्यादा कंपन पैदा करते हैं। यह क्षेत्र सदियों से सक्रिय है। सन 1812 और 1900 में भी काराकास के आसपास 7$ तीव्रता के भूकंप आए थे. इस प्लेट बाउंड्री का बड़ा हिस्सा श्लॉक्डश् है यानी तनाव जमा हो रहा है, जो 8 तीव्रता तक के भूकंप पैदा कर सकता है। इस डबलेट इवेंट (फोरशॉक के तुरंत बाद मेनशॉक) ने ऊर्जा रिलीज की, जो क्षेत्र की जटिल भू-संरचना का नतीजा है। उत्तर पश्चिम और दक्षिण पूर्व दिशा की सहायक फॉल्ट्स भी यहां सक्रिय हैं, जो स्ट्राइक-स्लिप मोशन पैदा करती हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि वेनेजुएला ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ का हिस्सा नहीं है, जहां भूकंप, विशेष रूप से उच्च तीव्रता वाले भूकंप, अपेक्षाकृत आम हैं। यही कारण है कि इस तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला जैसे स्थान पर जापान की तुलना में कहीं अधिक नुकसान पहुंचा। क्योंकि ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ में या उसके निकट होने कारण जापान इस प्रकार की घटनाओं के लिए कहीं अधिक तैयार रहता है। वहां बच्चों को भी स्कूल में प्रशिक्षण्या दिया जाता है कि भूकंप की चेतावनी मिलने पर स्वयं को किस तरह सुरक्षित रहना है। हमारे देश में आम नागरिकों को नही पता कि बाढ़, भूकेप या ट्विस्टर आने पर किस तरह अपना बचाव करना है?
ऐसा नहीं है कि कैरेबियन प्लेट में पहले कभी भूकंप नहीं आए, कैरेबियन प्लेट के दक्षिणी भाग में बड़े भूकंप आते रहते हैं। पिछले 100 वर्षों में इस क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता के पांच भूकंप आ चुके हैं। सितंबर 2025 में, उत्तरी वेनेजुएला में दो भूकंपों का एक साथ कहर बरपा लेकिन इसकी तीव्रता वर्तमान भूकंप से कम थी यानी रिक्टर स्केल पर 6.2/6.3 तीव्रता। यद्यपि 6.3 तीव्रता का भूकंप भी बड़ा होता है, लेकिन यह प्रायः व्यापक, विनाशकारी क्षति का कारण नहीं बनता है। 7.5 तीव्रता का भूकंप अन्य भूकंपों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। इसमें खराब ढंग से निर्मित या बिना सुदृढ़ीकरण वाली इमारतों को भारी नुकसान पहुंचता है। जिससे अधिक जनहानि भी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष की घटना तीव्रता और उत्सर्जित ऊर्जा के आधार पर पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 63 गुना अधिक शक्तिशाली थी । उत्तरी वेनेजुएला में आए इस भूकंप से प्रभावित क्षेत्र के बारे में यूएसजीएस के आकलन के अनुसार, ष्कुल मिलाकर, इस क्षेत्र की आबादी भूकंप के झटकों के प्रति संवेदनशील संरचनाओं में रहती है, हालांकि कुछ संरचनाएं भूकंप प्रतिरोधी भी हैं। सबसे अधिक संवेदनशील भवन प्रकार बिना सुदृढ़ीकरण वाली ईंटों की चिनाई और मिट्टी के ब्लॉक से निर्मित हैं।
2018 में, 7.3 तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के कम आबादी वाले क्षेत्र (काराकास क्षेत्र में नहीं) के तट से काफी दूर उत्तर में आया था। इस घटना के परिणामस्वरूप मध्यम स्तर की क्षति हुई और कुछ लोगों की मौत हुई।
सन 1997 में, कैरियाको के उत्तर में अंतर्देशीय क्षेत्र में 6.9 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 81 लोगों की मौत हुई थी। सन 1967 में, तटरेखा के पास 6.6 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 240 लोगों की मौतें हुई और ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट इमारतों के ढहने सहित व्यापक क्षति हुई थी। सन् 97 वर्ष पूर्व, सन् 1929 में, समुद्र तट से दूर 6.7 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप सुनामी भी आई थी। ताजा भूकंप यानी जून 2026 में आए दोहरे भूकंपों की घटना वेनेजुएला के आबादी वाले हिस्सों में, समुद्र तट से दूर नहीं, बल्कि अंतर्देशीय क्षेत्र में हुई, यह एक 7.5 तीव्रता के भूकंप से होने वाले दोहरे भूकंपों की तुलना में अधिक समय तक चली और इसलिए पिछली सदी में आए किसी भी भूकंप की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली रही। यूएसजीएस का अनुमान है कि मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक हो जाएगी और संभावित रूप से 10,000 से भी अधिक हो सकती है।
वेनेजुएला में आए भीषण भूकंप का भारतीय उपमहाद्वीप की जियोलॉजिकल (भूगर्भीय) संरचना से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार यह भारत के लिए सजग रहने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की एक बहुत बड़ी चेतावनी जरूर है।
वेनेजुएला में जो तबाही हुई, वह हमें निम्नलिखित कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के लिए सबक देती है कि भारत में हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्व के राज्य, अंडमान-निकोबार, गुजरात, कच्छ और दिल्ली-एनसीआर अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय ज़ोन 4, 5 में आते हैं। इन क्षेत्रों के नीचे इंडियन प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिससे कभी भी वेनेजुएला जैसे या उससे भी बड़े तीव्र झटके (8.0$ मैग्नीट्यूड) आ सकते हैं।
वेनेजुएला के भूकंप के कुछ दिन दिल्ली, एमसीआर और उत्तर भारत के कई शहरों में भूकंप के झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में आए भूकंप का केंद्र धरती की सतह से काफी उथला था (10 से 20 किलोमीटर की गहराई), जिसके कारण धरती की सतह पर कंपन बहुत भयानक हुआ। हिमालय और उत्तर भारत के भूकंप भी अक्सर उथले होते हैं, जो अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वेनेजुएला में भारी तबाही का एक बड़ा कारण वहां की इमारतों का भूकंपरोधी न होना था। ठीक इसी तरह, दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य संवेदनशील शहरों में अधिकांश निर्माण अनियोजित हैं। यदि भारत में ऐसा भूकंप आता है, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। भूकंपीय संवेदनशीलतारू नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, भारत के 29 प्रमुख शहर उच्च भूकंप जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
प्रकृति में होने वाले निरंतर परिवर्तन जिन्हें हम जलवायु परिवर्तन भी कहते हैं लगातार किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की चेतावनी दे रहा है लेकिन हम कागजी कार्यवाहियों में व्यस्त हैं। न तो गगनचुंबी इमारतों की ठीक से जांच होती है कि वे भूकंपरोधी हैं या नहीं और न भूकंप के समय सुरक्षित रहने का उपाय आमजन को सिखाया जाता है। यह कटु सत्य है कि जिन शहरों में इमारतों के आग से बचाव के उपाय की ही जांच नहीं की जाती है वहां प्राकृतिक आपदा से बचाव कहां सिखाया जाएगा? अब खुद आमजन को प्राकृतिक आपदा से बचना सीखना होगा जबकि यह आपदाप प्रबंधन तथा जिला प्रशासनों का दायित्व है। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 01.07.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, June 30, 2026
पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य - 200/-
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हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।
श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।
पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”
वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”
दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।
चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है। यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।
संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।
सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।
संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है। जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है। यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।
11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।
कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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