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पुस्तक समीक्षा | जीवंत कहानियों का संग्रह है “उस बहार का इंतज़ार” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
जीवंत कहानियों का संग्रह है “उस बहार का इंतज़ार”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - उस बहार का इंतज़ार
लेखिका - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
मूल्य - 400/-
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उर्मिला शिरीष हिंदी कथा जगत की वे वरिष्ठ कथाकार है जिन्हें लंबी कहानियों में तारतम्य बनाए रखने की महारत हासिल है। मैंने उनके अधिकांश उपन्यास और कहानियां पढ़ी हैं। उनकी हर कहानी का कथानक अपने आसपास का होता हुआ महसूस होकर भी चौंकाता है, अनूठा लगता है। कम पात्रों के होते हुए कहानी को हजारों शब्दों में साधना आसान काम नहीं है। कई बार कहानी के प्रवाह में ढीलापन आने की संभावना रहती है और जहां ढीलापन आ जाए वहां कथानक का तारतम्य में टूट जाता है। किन्तु उर्मिला शिरीष की हर कहानी कसी हुई रहती है। कहीं कोई भटकाव नहीं, कहीं कोई शिथिलता नहीं। हर पात्र इतना जीवंत कि अपने आसपास उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है। उर्मिला जी अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जिस खूबसूरती से करती हैं वह किसी कशीदाकारी से काम नहीं है। ये सारी खूबियां उनके कहानी संग्रह ‘‘उस बहार का इंतजार’’ की कहानियों में देखी जा सकती है।
उर्मिला शिरीष के रचना कर्म में शामिल हैं उनके चौदह कहानी संग्रह, पाँच कहानी संग्रहों तथा सात अन्य पुस्तकों का सम्पादन। तीन उपन्यास। एक साक्षात्कार, एक आलोचना तथा एक जीवनी (गोविन्द मिश्र) की पुस्तक। उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, ग्यारह लम्बी कहानियाँ, चयनित कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संकलित। मेरे साक्षात्कार । देश के विभिन्न भाषाओं में उनकी कहानियों और उपन्यासों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वे हिंदी की प्रतिष्ठित कथाकार हैं।
आधुनिक हिंदी कहानियां यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई, महानगरीय बोध, और बदलते सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दर्शाती हैं। ये कहानियां आम जनजीवन, महानगरीय एकाकीपन, स्त्री-पुरुष संबंधों में जटिलता, भ्रष्टाचार और मध्यवर्गीय चेतना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। उर्मिला शिरीष की कहानी आधुनिक हिंदी कहानी की प्रवृत्तियां का बखूबी पोषण करती हैं। उनकी कहानियों में पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, अवचेतन मन और मानसिक उलझनों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। संयुक्त परिवार का टूटना, पीढ़ीगत संघर्ष (जेनरेशन गैप) और उपभोगवादी संस्कृति का प्रभाव का विश्लेषणात्मक पक्ष उनकी कहानियों में देखा जा सकता है। सरल, सहज आम बोलचाल की भाषा उनकी कहानियां को और अधिक आकर्षक बना देती है।
‘‘उस बहार का इंतजार’’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियां हैं। हर कहानी का शेड अलग है। संग्रह की पहली कहानी ‘‘चींटियों की रेस’’ उस भ्रम को तोड़ती है कि जहां धन-दौलत है वहां खुशियां और सुकून हैं। सुकून पाने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने जरूरी होते हंै। कहानी की नायिका सुजाता ऐसे ही कठोर निर्णय के दौर से गुजरती है जिसके आगे उसकी सुख शांति का घर हो सकता है लेकिन अब तक वह जहां थी वहां उपेक्षा की अतिरिक्त और कुछ नहीं था। यह कहानी एक तलाकशुदा स्त्री की कहानी है जो यथार्थ की कई परतें खोलती है। परिस्थितियों का खुलासा, परिवार के सदस्यों का असंतुलित व्यवहार और मानसिक अंतर्द्वंद का प्रभावी चित्रण इस कहानी की विशेषता है।
दूसरी कहानी है ‘‘बिंजो माय फ्रेंड’’। ये कहानी आज के यथार्थ को पूरी मार्मिकता से बयान करती है। इस कहानी में लगभग हर दूसरे या तीसरे घर की त्रासदी मौजूद है जहां गहरे अंधेरे की भांति अकेलापन है। बच्चों के पास जाकर न बसने की ज़िद और फिर अलगाव की सीमा तक टूटती संबंधों की डोर बेजुबान पशुओं में अपनापा ढूंढने लगती है। एक निर्मम, कठोर, कड़वा सच। किसी के भी अंतर्मन को झकझोरने में सक्षम है यह कहानी।
तीसरी कहानी है ‘‘नाच, कठपुतली’’। ‘कठपुतली’ शब्द अपने आप में विवशता का प्रतीक है। न चाहते हुए भी दूसरों के अनुसार जिंदगी जीने का प्रतीक है। कभी जीवन कठपुतली की तरह नचाने लगता है तो कभी लोगों का व्यवहार, उनकी मंशा, उनकी लालसाएं दूसरों को कठपुतली बनाने के लिए प्रेरित करने लगती है, अब यह उस दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहता है कि वह कठपुतली बनना चाहता है या अपने स्वाभिमान के साथ अडिग खड़ा रहना चाहता है। कहते हैं न कि मन के हारे हार है। यह कहानी अदिति नाम की स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है जिसे परिस्थितियां कठपुतली की तरह नाचना चाहती हैं लेकिन उसके भीतर की जिजीविषा उसे न झुकने का हौसला देती है।
चौथी कहानी है ‘‘हरा पत्ता’’। यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।
संग्रह की पांचवी कहानी है ‘‘मंदिर और कुआं’’ जिसका कथानक ग्रामीण परिवेश में पंच, सरपंच, पंचायत, मंदिर, कुआं आदि से सरोकार रखता हुआ गांव में आते जा रहे परिवर्तन को भी रेखांकित करता है। परंपराओं में होने वाला परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव को भी परिवर्तित करने लगता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद एक धुनकी की भांति मनुष्य को धुनने लगता है।
‘‘पराजय का समीकरण’’, ‘पीपल का पेड़‘‘, ‘‘विदा होती बेटियों की माँ‘‘, ‘‘लड़कियों की हँसी‘‘ और ‘‘ऑनस्क्रीन‘‘ कथन को की विविधता और पात्रों की मनोदशा को सामने रखने वाली कहानी है, जिनमें संवेदना, संवेग, सौजन्यता, परंपराएं, आधुनिकता एवं मूल्य बोध के विभिन्न रंग समय हुए हैं। यह सभी कहानियां मनुष्य के चरित्र विश्लेषण का रोचक आख्यान गढ़ती हैं।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘‘उस बहार का इन्तज़ार’’। दो संस्कृतियों के बीच उसे अंतर को व्यक्त करती है जो पारस्परिक संवेदनाओं एवं पारिवारिक गठन पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं, वही पाश्चात्य संस्कृति में रिश्तों का अर्थ व्यक्तिगत इच्छाएं मात्र होती हैं। जब वही पाश्चात्य भारतीय संस्कृति के संपर्क में आता है तो उसे संबंधों की महत्ता का भान होने लगता है। स्मिथ और संहिता के रूप में लेखिका ने तो विविध संस्कृतियों के जीवन पर प्रभाव को अपने कथानक में बखूबी पिरोया है। यह कहानी मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हुई भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को भी पुनर्स्थापना देती है।
‘‘उस बहार का इंतज़ार’’ उर्मिला शिरीष की कहानियों का वह संग्रह है जो पाठकों को उनके कथा- कौशल के और अधिक निकट ले जाने में सक्षम है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी पठनीय हैं तथा रोचकता के साथ आत्म मंथन को विवश करती हैं।
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