Thursday, February 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | सोचियो जरूर के जिन्नात ने ऐसी काए कई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की 
सोचियो जरूर के जिन्नात ने ऐसी काए कई
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

हम तीनों गुठियात बैठे हते। मैं, भैयाजी औ भौजी। दो तीन दिना से मोसम ने सोई यू-टर्न ले लओ हतो। गर्मी आउत-आउत फेर के जड़कारो आ गओ। मनो ऐसो बरहमेस होत आए। फेर बी पता नईं काए अपने सबई मोसम के झांसे में आ जाउत आएं। हर साल जब अपन सोचन लगत आएं के अब तो शिवरातें हो गईं औ जाड़ो चलो गओ, अब गरम कपड़ा धो के पेटी में धर दए जाएं। औ जो दिनां गरम कपड़ा पेअी में धरे जात आएं ओई दिनां जड़कारो लौट आत है। मनो ऊको अपन ओरन खों छकाबे में मजो आत आए। सो, हम तीनो जने जड़कारे के लौटबे की बतकाव कर रए ते। तभई मोए लगो के भौत दिनां से कोनऊं किसा-कहानी नईं भई।
‘‘काए भैयाजी, भौत दिनां से आपने कोनऊं किसां ने सुनाई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘किसां तुम लिखत हो औ हमसे सुनाबे की कै रईं।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘बा सो ठीक आए, बाकी मोए आपसे किसां सुन्ने।’’ मैंने कई।
‘‘कोन सी किसां?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘जोन आप खों सुनानी होय।’’ मैंने कई।
‘‘अच्छा चलो, लबरा औ दोंदा वारी किसां सुना रए।’’ भैयाजी बोले। फेर बे किसां कहन लगे-
   का आए के, एक गांव में दो ज्वान रैत्ते। एक को नांव रओ लबरा औ दूसरो को दोंदा। दोई के दोई ठलुआ। दोई हते फुल नमूना। जो लबरा हतो, बा लबरयाने में रओ उस्ताद। मने झूठ बोलबे में पक्को। हर बात पे झूठ बोलत्तो। ऐसई दसा हती दोंदा की। बा अपनी झूठ पे ऐसो अड़ जात्तो के ऊकी झूठी बात बी सांची लगन लगत्ती। मने दोंदा दोंदरा ई देत रैत्तो।       
एक बेरा का भओ, के दोई में बहस होन लगी के कोन के पुरखा कित्ते ग्रेट रए। 
‘‘हमाए दादा इत्ते स्मार्ट और बहादुर हते के उन्ने एक ठूंसा मार के शेर खों आड़ो कर दओ रओ।’’ लबरा ने दोंदा से कई।
‘‘बस? इत्तई?’ दोंदा लबरा को मजाक उड़ात भओ बोलो, ‘अरे, हमाए दादा तो इत्ते ग्रेट हते के उन्ने अपने घरे बैठे-बैठे इत्ती जोर की फूंक मारी के उनकी फूंक की जोर से उते जंगल में शेर गिर परो औ पट्ट दिना मर गओ।’’
जे सुन के लबरा को बुरौ लगो। ऊनें आगे लबरयाई के,‘‘हमाए दादा के पास इत्तो लंबों बांस रओ के ऊंसे बे बादरन खों टुच्च के जब चाएं तब पानी बरसा लेत्ते।’’ 
‘‘हमाए दादा के पास इत्ती बड़ी वारी अंजन की डिबिया हती के ऊमें बे तला को सगरो पानी भर लेत्ते।’’ दोंदा कोन पांछू रैबे वारो हतो।
दोई के बीच जेई टाईप की बहस होत रई। जब दोई थकन लगे, सो बोले के चलो सरपंच जी से फैसला करा लओ जाए के कोन के दादा ज्यादा चतुरे हते। सो, दोई सरपंच के लिंगे पौंचे।
‘‘सरपंच जी अब आपई बताओ के कऊं ऐसो हो सकत का के इत्ती बड़ी अंजन की डिबिया होय के जीमें तला को पूरो पानी समा जाए?’’ लबरा ने सरपंच से पूछी।
‘‘हट! ऐसो कऊं नई होत। इत्ती बड़ी अंजन की डिबिया? तला बरोबर?’’ कैत भओ सरपंच हंसन लगो।
‘‘सरपंच जी, आप भूल रए के इत्ती बड़ी डिबिया पाई जात्ती औ हमाए दादा जी ने हमें बताई रई के आपके दादाजी ने उनके लाने, उने बा डिब्बी दई रई।’’ दोंदा दोंदरा देत भओ बोलो।
अब सरपंच का करे? जो कैत आए के उनके दादा ने ऐसी कोनऊं डिब्बी ने दई रई, सो उनके दादा छोटे कहाते। सो सरपंच ने सोची, फेर कई,‘‘हऔ दोंदा! तुमने सई याद कराई, हमाए दादा जी नेई सो दई रई तुमाए दादा खों बा डिबिया।’’
‘‘देख लेओ! हो गई तसल्ली? जुड़ा गओ कलेजा? पर गई ठंडक?’’ दोंदा लबरा से बोलो।
लबरा को भौतई गुस्सा आओ। काय से के बा समझ गओ रओ के लबरा ने सरपंच जी खों अपनी बातन के फंदा में फांस लओ आए। ंपर ऊ टेम पे बा चुप मार गओ। जबे सरपंच चलो गओ सो लबरा बोलो,‘‘जे सरपंच तुमाई साईड ले रए हते। बे कोन दूध के धुले आएं। हम तो अब राजा जी के पास चलहें।’’
‘‘चलो, जो तुमाई मरजी।’’ दोंदा इतरात भओ बोलो।
दोई राजाजी के दरबार खों चल परे। रास्ते में दोई थक के सुस्तान लगे। लबरा की लग गई आंख। दोंदा ने दिखाई चतुराई औ सोत भए लबरा के कपड़ा पानी डार के भिजों दए। जो लबरा जगो सो बा अपने भीजें कपड़ा देख के पूछन लगो के, ‘‘जे हमाए कपड़ा कैसे भींज गए? का पानी बरस गओ?’’
‘‘हऔ, खूबई पानी बरसो।’’ दोंदा बोलो।
‘‘ठैरो, ठैरो! हमें जे बताओ के जो पानी बरसो सो तुमाए कपड़ा काए नई भीजें?’’ लबरा ने पूछी।
‘‘तुम तो राजाजी के दरबार चलो, ने तो देर हो जैहे औ दरबार उठ जैहे। हम उतई सब बताबी।’’ दोंदा बोलो।
दोई जने निंगत-निंगत राजाजी के दरबार पौंचे। राजाजी ने पूछी के का भओ? काए के लाने आए? सो दोई पांव पकर के बोले के आपई अब न्याय कर सकत हो। औ दोई ने अपने-अपने दादाजी के बारे में गप्पें सुना डारीं। राजाजी समझ गए के दोई फुल गप्पी आएं।
‘‘लबरा कै रओ के बारिश नई भईं। ऊकी बात में दम आए। काय से के जो बारिश भई होती तो तुमाए कपड़ा सोई भींजते।’’ राजाजी बोले।
‘‘आपई बताओ महाराज, के जो बारिश ने भई तो ईके कपड़ा काय से भींज गए?’’ दोंदा ने राजाजी से पूछ लई।
‘‘सो तुम काय नईं भीजें?’’ राजाजी ने सोई पूछी।
‘‘आपके दादाजी के पुन्न प्रताप से।’’ दोंदा तुरतईं बोलो।
‘‘का मतलब?’’ राजाजी चकरा गए।
‘‘मतलब जे महराज! आपके दादाजी बड़े वारे पुन्नात्मा हते। उन्ने हमाए दादा जी की सेवा से खुस हो के उने एक बूटी दई रई। बा बूटी खों शरीर पे औ कपड़ा-लत्ता पे के मले से पानी नईं भिंजा सकत।’’ दोंदा बोलो।
‘‘सो कां है बा बूटी?’’ राजाजी ने पूछी।
‘‘बा तो हमने मल लई रई तभईं तो हम नईं भींजे। अब कां बची बा बूटी।’’ दोंदा आराम से बोलो।
राजाजी समझ गए के दोंदा ऊंसई दोंदरा दे रओ, मनो बे अब जे नईं कै सकत्ते के हमाए दादाजी के पास कोनऊं बूटी ने हती, के बे पुन्नात्मा ने हते। 
‘‘चलो, तुम दोई सांचे! तुम दोई के दादाजी अपने-अपने टाईप के ग्रेट हते। अब जाओ अपने-अपने घरे।’’ राजाजी पीछा छुड़ात भए बोले। अब राजाजी के कैबे के बाद बे उते थोड़ई ठैर सकत्ते, सो उते से बढ़ लिए।
दोई के जातई साथ राजाजी ने अपने महल में रैन वारे जिन्नात खों बुला के कई के,‘‘देखो तो हमाए राज में कैसे-कैसे लबरा, दोंदा रैत आएं, का हुइए हमाए राज को? अब तुमई बताओ के लबरा बड़ो के दोंदा?’’
‘‘आप ई में ने परो महराज के लबरा बड़ो के दोंदा? काय से के कछू समै बाद जेई ओरें बारी-बारी से राज करहें।’’ जिन्नात ने कई औ उते से फुर्र हो गओ। राजाजी जिन्नात की बात पे सोचत रै गए के ऊने ऐसई काय कई? किसां हती तो खतम हो गई। - भैयाजी किसां खतम करत भए बोले। 
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोई सोचियो जरूर के जिन्नात ने ऐसई काय कई के आगे चल के लबरा औ दोंदा बारी-बारी से राज करहें। 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, February 25, 2026

पुस्तक समीक्षा | परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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सांझा गीत संग्रह- बुन्देली माहुलिया
कवि - बिहारी ‘सागर’ एवं स्व.श्री बालमुकुन्द ‘नक्श’
प्रकाशक - कु. नंदिनी कोरी, जबलपुर (प्राप्ति पता- बिहारी सागर, धर्मश्री पुल के आगे, काम्प्लेक्स रोड, अम्बेडकर वार्ड, सागर, मध्यप्रदेश-4)
मूल्य - 250/-
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सागर शहर में लोक शैलीबद्ध गीत रचने वालों में बिहारी ‘सागर’ एक चिरपरिचित नाम हैं। उनके बड़े भाई स्व. बालमुकुन्द नक्श भी रचनाकार रहे। नक्श जी के जो गीत अप्रकाशित रहे, उन्हें बिहारी सागर ने अपने गीत संग्रह में शामिल करते हुए संग्रह को एक साझा संकलन का रूप दिया है। संग्रह का नाम है ‘‘बुन्देली माहुलिया’’। दरअसल, बुन्देलखंड में ‘‘माहुलिया’’ उर्फ़ ‘‘मामुलिया’’ का विशेष महत्व है। यह एक ऐसा त्योहार है जो बचपन से ही साझा जीवन का पाठ पढ़ाता है। साथ ही सिखाता है जीवन के आने वाले दुखों को खुशियों में बदलने की कला। इस त्योहार में कांटेदार डाली, आमतौर पर बबूल की डाली को धो कर, नहला कर, उसके कांटों में तरह-तरह के फूल सजाए जाते हैं और यह कार्य बालिकाओं एवे बालको द्वारा किया जाता है। फिर वे फूलों से सजी हुई डाल को ले कर जुलूस के रूप में गांव में घूमते हैं और गाते हैं-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया’’। जी हां, समूचे बुंदेलखंड में मनाए जाने वाले इस बाल त्योहार को कहीं मामुलिया कहते हैं तो कहीं माहुलिया। माहुलिया का यही साझापन पिरोया है बिहारी सागर ने अपने इस नवीनतम गीत संग्रह में। इस संग्रह में 55 गीत बिहारी सागर के हैं तथा शेष 56 से 127 तक स्व. बालमुकुन्द नक्श की रचनाएं हैं।
“गीतऋषि” के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि “इस संग्रह में संकलित स्व. बालमुकुंद नक्श के कुछ गीतों के केसिट सुप्रसिद्ध गायकों की आवाज में संगीत कंपनियों द्वारा भी बनाए गए हैं जो बुंदेलखंड में शादी-विवाह या अन्य जुलूसों में होने नृत्यों में अक्सर बजाए जाते हैं, जैसे- ‘केंन लगे मो सें बब्बा /कहाँ गव चिलम तमाखू को डब्बा’ -ऐसा ही एक गीत और जो बेदद लोकप्रिय एवं प्रचलित है। ‘बंसी में फस गई बाम, बरौनी घरे चलो’ - प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त इस काव्य संग्रह के अनेक गीत बुंदेलखंड क्षेत्र में कवि बिहारी श्सागरश् एवं स्व. बालमुकुंद श्नक्श ने करमा, स्वांग, ढिमरयाई, दादरा, सोहरे, रसिया आदि अनेक प्रकार के लोक गीत लिखे हैं, ये गीत भाव पूर्ण, सरल भाषा में रचित हैं जो समाज में सहज स्वीकार्य हैं, इनका अर्थबोध प्रभावी है। कवि बिहारी श्सागर का यह दसवाँ काव्य संग्रह है जो उनकी सतत रचनाधर्मिता का परिचायक है।”    
   उपन्यासकार, समीक्षक एवं स्तंभ लेखक आर के तिवारी ने लिखा है कि “मैं समझता हूँ आज 10 पुस्तकें प्रकाशन कराना छोटी बात नहीं है। जिसमें परिश्रम भी लगता है और पैसा भी खर्च होता है! यह बहुत बड़ी बात है। जब आज हमारे समाज में पैसे के लिए भाई-भाई में द्वेष पैदा हो जातें हैं भाई-भाई का बैरी हो जाता है तो वहीं बिहारी सागर ने अपने स्वर्गीय भाई के लिए अपने दिल की गहराइयों में बसाये रखा है! जिसका ही उदाहरण यह पुस्तक है जिसमें आपने अपने भाई की रचनाएं भी इसमें प्रकाशित कराई हैं। जिसके लिए आप बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं।” संग्रह में लोकगीत गायिका श्रीमती मालती सेन का शुभकामना संदेश भी है। 
कवि बिहारी सागर ने बड़ी ही विनम्रता से इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने ‘बुंदेली शब्दों को गूंथने का प्रयास’ किया है वे लिखते हैं- “मैंने अपनी रचनाओं में बुंदेली शब्द गूंथने का प्रयास किया है। मेरी रचनाओं में त्रुटियां हो सकती हैं। फिर भी मैं अपना प्रयास जारी रखता हूं।”
     जीवन में लगन और अभ्यास यह दोनों महत्वपूर्ण तत्व है जो मनुष्य के कर्म में निरंतर निखार लाते हैं। कवि बिहारी सागर भी निरंतर रचनाशील हैं। कला पक्ष की अपेक्षा उनका भाव पक्ष सशक्त है। बिहार सागर के भजन की ये पंक्तियां देखिए जो ‘भगत’ के रूप में मां जगदंबा के लिए लिखी गईं हैं- 
टेक- जगदंबा विराजीं मोरे आंगना हो मां।
(1) कहां से ल्याऊं मैया, बेला चमेली, 
कहां से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
(2) बगिया से ल्याऊं मैया बेला चमेली, 
हाट से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
बुंदेलखंड में कार्तिक गीत गाने का विशेष चलन है। कार्तिक मास आते ही स्त्रियां कातकिया गाते हुए स्नान करने मुंहअंधेरे निकल पड़ती हैं। इसी कातकिया के तर्ज पर बिहार सागर ने यह गीत लिखा है जिसकी धुन उन्होंने कन्हैया भजन की बताई है-
टेक- कर दो दया की नजरिया, कन्हैया मोरे...
मैं दुखियारी शरण तुम्हारी, 
1-ले लो मोरी खबरिया, कन्हैया मोरे...
2-बड़े-बड़े बैठे बलधारी, हस्तनापुर की नगरिया, कन्हैया मोरे...
बिहारी सागर ने ढिमरयाई गीत भी लिखे हैं जैसे एक बानगी देखिए -
टेक- बंशी बाजी दुफरिया में, राधा जी की नगरिया में।
1. धुन गूंजत है कानों में जिनकी, 
भूले काम दुफरिया में 
राधा जी की...
2. ग्वाल बाल जे दौड़त आ रे, दौड़त बीच डगरिया में 
राधा जी की...
जिस प्रकार बिहारी सागर ने होली गीत, दिवाली गीत, सोहर, विदाई गीत, देवी गीत, हास्य गीत आदि विविध प्रकार के गीत लिखे हैं ठीक उसी प्रकार उनके भाई स्वर्गीय बालमुकुंद “नक्श” के गीतों में भी पर्याप्त विविधता है। उनके होली गीत के कुछ पंक्तियां देखिए -
टेक- रंग डारी सांवरिया ने रंग डारी । 
मोरी भींज गई चूनर सारी ।।
1. होली के दिन होली खेलें संवरिया,
भर भर मारें पिचकारी 
रंग डारी सांवरिया ने...
2.रंग-बिरंगी है मोरी चुनरिया, 
कर डारी कारी-कारी
रंग डारी सांवरिया ने...
कवि स्व. “नक्श” ने कई सोहर गीत लिखे हैं जिनमें से एक गीत की कुछ पंक्तियां देखिए जिनमें भावनाओं की कोमलता अत्यंत प्रभावी है-
टेक- झुलाय दैयो रे, लाल झूले अंगनवा।
1.चंदन के पलना हों रेशम की डोरी, 
डराय दैयो रे लाल...।
2. चंदा के गोटा हों तारों के झूमर, 
लगाय दैयो रे लाल...
    कवि स्व. “नक्श” ने चुलबुले हास्य गीत भी लिखे हैं। एक उदाहरण -
टेक - ऐसी मिली घरवाली,
भैया मोखों भरी जवानी में, 
आग लगा रई पानी में।
1- रोटी पानी कछु न जानें,
निशदिन मोसे करे बहाने, 
मोरी एकऊ बात न माने, 
कर रई छेदा छानी में।
2- अपनी का कहिये हैरानी, 
खा-खा कें जा खूब मुटानी, 
मरोजात भर-भर के पानी,
चैन नहीं जिदगानी में।
      बिहार ‘सागर’ एवं स्वर्गीय श्री बालमुकुंद ‘नक्श’ के सजा संकलन “बुंदेली महुलिया” में जो बुंदेली गीत सहज गए हैं उनमें गेयता के गुण भरपूर हैं। इनके व्याकरणीय दोषों को यदि अनदेखा कर दिया जाए तो यह सभी गीत ढोल, मंजीरे और नंगड़िया पर बखूबी गए जा सकते हैं। बुंदेली बोली के प्रति कवि बिहारी सागर का रुझान प्रशंसनीय है, और उतनी ही प्रशंसनीय है उनकी रचना कर्म के प्रति लगन। रचनाशीलता के लिए स्थानीय स्तर पर उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लोक धुन पर आधारित गीतों में रुचि रखने वालों के लिए यह संग्रह रुचिकर साबित होगा।   
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Thursday, February 19, 2026

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी? मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी?  मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की       
दुनिया कैसी?  मोए जैसी !
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

   ‘‘भैयाजी, आज भुनसारे मोरी नींद खुली, तभईं से मोए एक किसां याद आ रई। कओ तो सुना दई जाए।’’ मैंने भैयाजी से पूछी। मोए पतो के भैयाजी कभऊं मोय मनो ने करहें, चाए मैं उने किसां सुनाऊं चाए गारी गाऊं।
‘‘हऔ सुनाओ!’’ जैसी मैंने सोची रई, भैयाजी ने तुरतईं ‘हौ’ बोल दओ।
‘‘भैयाजी ऐसो आए के हिन्दी में कही जात के साउन के अंधरा खों सबई कछू हरीरो-हरीरो दिखात आए। सो, जेई टाईप की किसां बुंदेली में सोई कही जात आए। सुनो किसां!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो सुनाओ अब। का भूमिकई बांधत रैहो?’’ भैयाजी चिड़कात भए बोले।
‘‘का भओ भैयाजी के एक हतो भगुंता नाई। ऊकी बड़े-बड़े घरों में पौंच हती। काए से के भगुंता हाथ-पांव की मालिश करबे में अव्वल हतो। एक दिना भगुंता को दूर-दराज को नातेदार गुजर गओ। ऊ मरबे के पैले भगुंता के लाने सोने की दो मोहरें छोड़ गओ। इके पैले भगुंता के पास एकऊ मोहरें ने हतीं, सो दो-दो मोहरें पा के ऊकी बांछें खिल गईं। पर इके संगे ऊको फिकर भई के जे मोहरन खों लुका के राखने परहे। ने तो कऊं कोनऊं छिना ने ले। कऊं कोनऊ चोर चुरा ने ले जाए। भगुंता ने सोची के घर की किवरिया खो कौन भरोसो, जा तो एकई लात की आए। इसे तो मोहरन खों संगे राखने में भलाई कहानी। सो, मोहरें राखने के लाने भगुंता को कोऊ जागां ने सूझी सो ऊने एक डबिया लई, ऊमें दोई मोहरे राखी औ डबिया खों अफ्नी मालिस की पेटी में धर लई।
‘‘अब ठीक आए। अब मोरी मोहरन खों कोनऊ हाथ ने लगा पैहे।’’ भगुंता ने सोची। काए से के पेटी तो बरहमेस ऊके संगई बनी रैत्ती। अब तो भगुंता अपनी पेटी खों औरई अपने कलेजे से चिपटाए रहन लगो।
एक दिना भगुंता सरपंच की मालिश कर रओ हतो। दोई जनों में कछू-कछू बतकाव सोई चल रई हती। सरपंच ने भगुंता से पूछी-‘‘काए रें, भगुंता। तोये तो पतो हुइये के गांव में का चल रओ?’’
‘‘आप मालक की किरपा! सब ठीकई चल रओ।’’ भगुंता बोलो।
‘‘कोनऊ खों कोई तकलीफ-परेसानी तो नइयां?’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘तकलीफ परेसानी काए की? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आएं।’’ भगुंता ऐंड़ के बोलो।
सरपंच ताड़ गओ के दाल में कछु कारो आए। सरपंचने जा खबर तो सुन रखी हती के भगुंता खों अपने नातेदार के मरबे पे दो मोहरे मिली रईं। हो न हो, जा भगुंता ऊ मोहरन के लाने कै रओ। फेर सरपंच ने सोची के, बा मोहरे जा अफ्नी जेई पेटी में राखत हुइए, तर्भइं तो जा पेटी कलेजे से चिपटाए फिरत आए।
‘‘जारे, भगुंता! जा के भीतरे से तनक बिजना तो उठा ला। तनक गरमी सी लग रई।’’ सरपंच ने भगुंता से कई औ ऊको उते से टरका के, ऊकी पेटी थथोल डारी। सरपंच के हाथ बा डबिया लग गई जा में भगुंता ने मोहरे रखी हतीं। सरपंच ने सोची के जा भगुंता बड़ो ऐंड रओ आए, जा के लाने भगुंता खो सबक सिखाओ जाए। औ सरपंच ने डबिया से मोहरे निकार लई। तब लो मगुंता भीतरे से बिजना उठा लाओ। भगुंता समझई ने पाओ के ऊके पाछूं सरपंच ने ऊकी मोहरे निकार लई आएं।
सरपंच के इते से लौट के भगुंता ने अपनी पेटी जांची। ऊने डबिया में से मोहरे नदारत पाई। ऊको जी धक से रै गओ। ऊने पूरो घर छान मारो, मोहरें कहूं ने मिली। ऊने सोची के पेटी खोलत-करत में मोहरे कहू गैल में हेरा गई हुइएं। बा जे तो सोचई ने सकत्तो के सरपंच ऊकी मोहरे निकार सकत आए।
ऊ दिनां से भगुंता उदास रैन लगो।
ऊकी उदासी देख के एक दिनां सरपंच ने ऊसे पूछी- ‘‘काए रे भगुंता! तोये तो पतो हुइए के गांव में का चल रओ?’’
‘‘रामधई, बड़ो बुरओ चल रओ आए। मालक की किरपा नई रई, मालक रूठे कहाने। ’’ भगुंता ने मों लटका के कई।
‘‘काए? ऐसो का हो गओ? कौन-सी विपदा आन परी? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आए।’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘हजूर, अब कहां धरीं दो मोहरें।’’ भगुंता खिसियानो सो बोलो।
‘‘काए? तुमई तो कहत्ते के अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आएं।’’ सरपंच ने चुटकी लई।
‘‘अरे हजूर, ने पूछो। मोय तो कछु समझई में नई आत। जब लो मोरे ऐंगर दो मोहरे रईं सो मोये सबई के ऐगर मोहरें दिखात रईं। अब मोरी मोहरे हिरा गई सो मोये लगत आए के ई गांव में सबई के सब कंगला हो गएं। सो मोसेे से कछू ने पूछो, हजूर!’’ भगुंता की आंखन से टप-टप अंसुआं झरन लगे।
जा देख के सरपंच को जी पसीज गओ।
‘‘वाह रे भगुंता। तेरी तो बोई किसां ठैरी के दुनिया कैसी, मोए जैसी। जो मैं दुखी, सो दुनिया दुखी। जो मैं खुशी तो दुनिया खुशी। अरे मूरख, जे दुनिया खों अफ्नो घाई ने देखो कर। तू, तू आए औ दुनिया, दुनिया आए। सबई की अपनी खुशी औ अपने दुक्ख होए आएं। समझ परी कछू?’’ सरपंच ने भगुंता से कई और ऊकी सोने की दोई मोहरें ऊकी गदेली पे धर दईं।
भगुंता अपनी मोहरें देख के भौतई खुश हो गओ। बाकी ऊको समझ ने परी के सरपंच के लिंगे ऊकी मोंहरें कां से आई। पर ऊको ईसे का? कऊं से आई होय? मिल तो गईं। फेर सरपंच से पूछो बी नई जा सकत्तो।
ऊको खुश देख के सरपंच ने फेर ऊसे पूछी-‘‘काए भगुंता, अब गांव को का हाल-चाल आए?’’
‘‘मालिक की किरपा! अब सब ठीक हो गओ।’’ भगुंता पैले घाई चहक के बोलो।
‘‘सो अब कोनऊ खों कोऊ तकलीफ-परेसानी नइयां?’’ सरपंच ने फेर के पूछी।
‘‘काए की परेसानी, अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आए।’’ भगुंता पैलई घांईं बोलो।
जा सुन के सरपंच ने अपनो मूंड़ पीट लओ। औ मनई मन सोचन लगो के जे भगुंता तो मोहरन को अंधरा आए। जा नईं सुधर सकत।
‘‘सो भैयाजी, जा हती किसां।’’ किसां खतम करत भई मैंने कई।
‘‘हऔ, नोनी किसां हती। जा सो बई बात भई के दुनिया कैसी? मोय जैसी!’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! जेई तो सोचबे की बात आए के जब लों कछू पार्टी वारे जेई सोचत रैहें के दुनिया उनई के जैसी आए, तबलौं बे कभऊं ने जीते पाहें। अबे बी टेम आए के बे अपनी सोच बदल लेंवें, ने तो राम नाम सत्त हो जैहे।’’ मैंने कई।
‘‘ठीक कई बिन्ना!’’ भैयाजी ने मोरी बात की समर्थन कीे।
आप ओरें सोई सोचियो, जो मैंने झूठ कई होय! बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस       
यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                   ‘‘यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए!’’ यही तो कहा था ‘मिसाइल मैन’ के नाम से विख्यात वैज्ञानिक, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम ने। उन्होंने यह सिर्फ़ कहा नहीं बल्कि इसे अपने स्वयं के जीवन पर चरितार्थ कर के दिखाया। उन्होंने ने देश के लिए बहुत कुछ करने का सपना देखा। फिर अपनी पूरी शक्ति लगा दी उस सपने को सच करने में। तभी तो अखबार बेचने वाला एक हाॅकर लड़का एक दिन भारत के लिए मिसाइल बना सका और उसने राष्ट्रपति बन कर देश का गौरव बढ़ाया। यह लड़का और कोई नहीं स्वयं डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम थे।

हमारा देश एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां सब कुछ संभव है। इस देश में चाय बेचने वाला एक लड़का बड़ा हो कर प्रधानमंत्री बन सकता है, आदिवासी जीवन के रूप में मुख्यधारा से कट कर जीवन जीने को विवश बालिका राष्ट्रपति बन सकती है, इसी प्रकार अपने स्कूल की फीस भरने के लिए अख़बार बेचने वाला एक लड़का पहले उच्चकोटि का वैज्ञानिक और फिर देश राष्ट्रपति बन सकता है।इन तीनों उदाहरणों में दो स्थितियां एक समान हैं- एक तो संघर्षमय अतिसामान्य जीवन से शुरुआत और दूसरी दृढ़ इच्छाशक्ति। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे जिन्होंने ज़मीन से आरम्भ किया और आसमान तक जा पहुंचे। देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने भारत को सशक्त बनाने का सपना देखा और उस सपने को पूरा करने के लिए देश में ही मिसाइल निर्माण की शुरुआत की। इसीलिए उन्हें ‘‘मिसाईल मैन’’ भी कहा जाता है।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पिता जैनुलाब्दीन नाविक थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे, न ही ज्यादा पैसे वाले थे। लेकिन वह नियम के बहुत पक्के थे। वह मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। डॉ. कलाम ने अपनी शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए हाॅकर के रूप में अखबार बांटने काम किया था। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनका जन्म 15 अक्तूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम् जिले के धनुषकोड़ी गांव में हुआ था। कलाम एक बहुत बड़े परिवार के सदस्य थे, जिसमें पांच भाई और पांच बहन थी। कलाम ने अपनी आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् में पूरी की, सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली। वे पायलेट बनना चाहते थे किन्तु किन्हीं कारणवश वे अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर सके। तब उन्होंने अपनी इच्छा के मार्ग को दूसरी ओर मोड़ दिया लेकिन यह मार्ग भी उन्हें आसमान की ओर ले जाता था। उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
डाॅ. कलाम बेहद सादगी से जीवन जीने वाले व्यक्ति थे। अनुशासन में रहना और दैनिक रूप से पढ़ना इनकी दिनचर्या में था। अपने गुरु से उन्होंने सीखा था कि यदि आप किसी भी चीज को पाना चाहते है तो अपनी इच्छा तीव्र रखनी होगी। डाॅ. कलाम विलासिता और दिखावे से दूर रहते थे। एक बार राष्ट्रपति भवन में उनके परिजन रहने के लिए आए, जहां उनका स्वागत उन्होंने बहुत अच्छे से किया। परिजन 9 दिन तक राष्ट्रपति भवन में रहे, जिसका खर्च साढ़े तीन लाख रुपए हुआ। यह बिल उन्होंने अपनी जेब से भरा।
सन् 1962 में वे अंतरिक्ष विभाग से जुड़ गए जहां उन्हें विक्रम साराभाई, सतीश धवन और ब्रह्म प्रकाश जैसे महान हस्तियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। 1980 में पूर्ण रूप से भारत में निर्मित उपग्रह रोहिणी का प्रक्षेपण किया, जो सफल रहा। अब्दुल कलाम विभिन्न सरकारों में विज्ञान सलाहकार और रक्षा सलाहकार के पद पर रहे। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन में रहते हुए इन्होंने ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ जैसी मिसाइल का निर्माण कराया। उन्होंने राजस्थान में हुए दूसरे परमाणु परीक्षण (शक्ति-2) को सफल बनाया।
डाॅ. कलाम बच्चों से बहुत प्रेम करते थे और वे बच्चों को जीवन में विज्ञान के महत्व के बारे में समझाया करते थे। वे कहते थे कि -‘‘विज्ञान जब विशेष ज्ञान है तो हमें उसकी विशेषताओं को समझना चाहिए और उससे लाभ उठाना चाहिए।’’
जब सन् 2002 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का भार ग्रहण किया उसके बाद भी राष्ट्रपति-भवन के दरवाज़े सदा आमजन के लिए खुले रहे। युवा और बच्चे उन्हें पत्र लिख कर उनसे जीवन और विज्ञान संबंधी प्रश्न पूछा करते थे। उन पत्रों का जबाव वे स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे।
डाॅ. कलाम अविवाहित थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देशसेवा को समर्पित कर दिया था। उनका जीवन एक महानायक की तरह था। उन्होंने 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘‘विंग्स ऑफ फायर’’, ‘‘इंडिया 2020’’, ‘‘इग्नाइटेड मांइड’’, ‘‘माय जर्नी’’ बहुचर्चित और प्रेरक रहीं। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई थी। डाॅ. अब्दुल कलाम ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की विचारधरा को मानते थे। वे मानते थे कि यह धरती ही एक मात्र उपग्रह है, जहां जीवन संभव है। मानव जाति को इसकी रक्षा और संरक्षण का दायित्व निभाना ही होगा। हमारा समाज और हमारी शासन प्रणाली अब पहले से कहीं अधिक संजीदा है क्योंकि मामूली सी देरी से भी अपूर्णीय क्षति हो सकती है। भारत रत्न डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्रकृति के संरक्षण के प्रति सजग थे। वे इसे पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य के जिए जरूरी मानते थे।  27 जुलाई, 2015 को शिलांग में, भारतीय प्रबंधन संस्थान में ‘क्रिएटिंग ए लिवेबल प्लैनेट अर्थ’ (पृथ्वी को रहने योग्य ग्रह बनाना) विषय पर अपने व्याख्यान में उन्होंने विकास की जद्दोजहद में पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को हो रहे नुक्सान के प्रति आगाह किया था। उन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए भावी कार्ययोजना की रूपरेखा भी सामने रखी थी। डा. कलाम ने सबसे पहले 2 नवम्बर, 2012 को चीन में में भी अपने व्याख्यान के द्वारा इस ओर ध्यानाकर्षण किया था कि धरती को रहने योग्य बनाए रखना कितना जरूरी है।  उन्होंने कहा था कि मानव जाति को अपने सभी संघर्षों को परे धकेल कर पूरी दुनिया के नागरिकों के लिए शांति और खुशहाली का सांझा लक्ष्य रखना होगा। हमें एक रमणीक पृथ्वी के लिए वैश्विक दृष्टि विकसित करनी होगी। मानव जाति के लिए इससे अधिक कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। वर्ष 1996 में डॉक्टर कलाम टेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन, फोरकास्टिंग एंड एसेसमेंट काउंसिल (टिफैक) के अध्यक्ष थे और 1996-97 में उन्हीं की अध्यक्षता में ‘‘विजन 2020’’ डॉक्यूमेंट तैयार किया गया था। इसी के आधार पर संगठन ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया था कि साल 2020 तक भारत को क्या हुछ हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। डॉ. कलाम ने सरकार को सलाह दी थी कि देश के विकास के तकनीक, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में सरकार को क्या करना चाहिए और इसमें आम नागरिक को क्या भूमिका निभानी चाहिए। इस किताब पर काम करने के लिए डॉ. अब्दुल कलाम और उनके सहयोगी वाईएस राजन ने दर्जनों जानकारों के इंटरव्यू किए और लाखों पन्नों के दस्तावेज पढ़े. ये किताब ‘‘इंडिया 2020: ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’’ नाम से प्रकाशित हुई थी।
यूं तो ‘टिफैक’ की रिपोर्ट विज्ञान और तकनीक पर केंद्रित थी, लेकिन डाॅ. कलाम ने इसमें जोर दे कर कहा है कि विकास की राह में समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। वे बुनियादी बातों से विकास की चर्चा शुरू करने में विश्वास रखते थे। डॉ. कलाम के अनुसार, ‘‘भारत में हर साल दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इस सभी बच्चों का क्या भविष्य होगा? जीवन में उनका लक्ष्य क्या होगा? क्या हमें उनके भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए या फिर हमें उन्हें उनके नसीब के सहारे छोड़ अभिजात्य वर्ग के फायदे के लिए ही काम करना चाहिए?’’
डॉ. कलाम ने इसमें सवाल उठाया था कि - ‘‘बाजार में मांग के अनुसार स्ट्रेटेजी, और कंपीटीशन का दौर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे या फिर आने वाले दो दशकों में उनके लिए कुछ खास योजना तैयार करेंगे।’’ साल 1998 में लिखी गई इस किताब में डॉक्टर अब्दुल कलाम कहा कि- ‘‘सैंकड़ों एक्सपर्ट से बात कर के और कई रिपोर्टें पढ़ने के बाद मैं ये समझ पाया हूं कि हमारा देश साल 2020 तक विकसित देशों की सूची में शामिल हो सकता है।’’ उन्होंनेे कहा था कि, ‘‘तब भारत के लोग गरीब नहीं रहेंगे, वो लोग तरक्की के लिए अधिक कुशलता से काम करेंगे और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी और बेहतर होगी। ये सपना नहीं बल्कि हम सभी लोगों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए।’’
डॉ. कलाम का कहना था कि देश के लक्ष्य हासिल करने के बाद रुकना नहीं चाहिए बल्कि और बेहतरी के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए। उनका कहना था, ‘‘हमेशा के लिए हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि कैसे हम लोगों की जिंदगियों को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहें. वो केवल युवा हैं जिनमें ज्ञान और कौशल तो है ही। साथ ही कुछ हासिल करने का जज््बा भी है, उन्हें आगे नए लक्ष्यों की तरफ बढ़ना चाहिए। देश उस मुकाम तक पहुंचे इसके लिए हमें एक दूसरे की मदद करनी होगी और लक्ष्य के रास्ते से बिना डगमगाए हमें ये सुनिश्चित करना होगा ताकि बदलाव का असर हर व्यक्ति तक पहुंचे।’’
वे युवाओं से कहते थे कि ‘‘ये कभी मत सोचो कि आप अकेले अपने देश के लिए कुछ नहीं कर सकते, आप जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हों आप अपनी योग्यता बढ़ाएं। सभी के प्रयासों से ही भारत विकसित देश बन सकता है।’’
27 जुलाई 2015 को ‘‘अग्नि मिसाइल’’ को उड़ान देने वाले मशहूर वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे विलक्षण व्यक्तित्व ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली। शिलांग आईआईएम में लेक्चर देते हुए उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। 83 वर्ष की आयु में डाॅ. कलाम ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं किन्तु देश को भविष्य के सपनों का रास्ता दिखा गए। डाॅ. अब्दुल कलाम उन चुनिंदा लोगों में से रहे हैं जिन्हें सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले। सन् 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किया गया था। वे एक सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।             
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(दैनिक, सागर दिनकर में 19.02.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, February 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- लम्हों की तपिश
कवि - अमन मुसाफ़िर
प्रकाशक - नीरज बुक सेन्टर 109-ए, पटपड़गंज गाँव, दिल्ली-110091
मूल्य - 250/-
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20 जुलाई 1999 को उत्तर प्रदेश की बरेली के बहरोली में जन्मे मात्र 27 वर्ष के अमन कुमार उर्फ़ अमन मुसाफ़िर की ग़ज़लों में जो गहराई और नयापन है वह उन्हें ग़ज़लकारों की आम पंक्ति से अलग खड़ा करता है।
अमन मुसाफ़िर ने बी. एससी. (ऑनर्स) भौतिकी (किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय) से, एम.ए. हिन्दी (इग्नू), डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (अंग्रेजी-हिंदी), एकल विषय (संस्कृत) में द्विवर्षीय प्रमाणपत्र हासिल किया है। नेट-जेआरएफ (हिन्दी) उत्तीर्ण पीएचडी (हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) से।
    उनका एक ग़ज़ल संग्रह 'हवा में आग' इसके पूर्व प्रकाशित हो चुका है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में अनेक शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं।
   अमन मुसाफ़िर अपनी अभिव्यक्ति को लेकर पूर्णतया आश्वस्त हैं। जब कोई शहर अपनी शायरी को लेकर स्वयं पर भरोसा करता है तो उसकी शायरी अधिक मुखर और संवादी साबित होती है।  “अपनी बात” में वे अपने  इस नए ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों के बारे में लिखते हैं कि “शायरी जब महफ़िलों की वाहवाही से निकलकर सड़क के सन्नाटों और रसोइयों के धुएँ तक पहुँचती है तब वह सिर्फ़ 'शायरी' नहीं रहती, वह समय का 'दस्तावेज़' बन जाती है। 'हवा में आग' के बाद मेरे दूसरे ग़ज़ल-संग्रह 'लम्हों की तपिश' को पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे कुछ वैसी ही अनुभूति हो रही है जैसे कोई अपने 'जले हुए पलों' की राख और 'सुलगते हुए ख़्वाबों' की चिंगारी किसी अपने के हवाले कर रहा हो।
इस संग्रह का नाम 'लम्हों की तपिश' अनायास नहीं है। जीवन साल या महीनों में नहीं बल्कि उन गिने-चुने लम्हों में जिया जाता है जो हमारे ज़हन पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। कभी वह छाप प्रेम के किसी बेहद नाजुक पल की 'गुनगुनी तपिश' होती है तो कभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ उपजे आक्रोश की 'झुलसा देने वाली आँच'। यह किताब इन्हीं दोनों छोरों के बीच तनी हुई एक रस्सी है जिस पर एक शायर नंगे पाँव चल रहा है।”
     अर्थात शायर को फता है कि वह क्या लिख रहा है और क्यों लिख रहा है। अपनी अभिव्यक्ति को लेकर उसके मन में किसी तरह का भी संशय नहीं है।
     अमन मुसाफ़िर ने यह भी लिखा है कि “मैंने कोशिश की है कि मेरी ग़ज़लें झूठी तसल्लियों का झुनझुना न बनें। इसीलिए जहाँ एक ओर मैंने लिखा है कि "पत्थर को मत पूजो अब, पत्थर को औज़ार करो", वहीं दूसरी ओर मैंने उस मानवीय पीड़ा को भी जगह दी है जहाँ इंसान "भीड़ में चलकर भी तन्हा" रह जाता है। यह संग्रह उस आदमी की आवाज़ है जो प्रेम में टूटकर भी जुड़ना जानता है और जो सिस्टम से टूटकर भी लड़ना जानता है।”
      'लम्हों की तपिश' में कुल 110 ग़ज़लें हैं। इन ग़ज़लों में आमजीवन से उठाए गए बिम्ब हैं जो चौंकाते हैं गुदगुदाते हैं और मन के साथ-साथ विचारों को भी आंदोलित कर देते हैं। इसका उदाहरण संग्रह की पहली गजल में ही देखिए की किस खूबी से शायर पेड़, पौधे, फूल और पंछी की बात करते-करते दाल, चावल, साग रोटी तक जा पहुंचता है-
पेड़ पौधे फूल पंछी पत्तियों की बात कर
दाल चावल साग रोटी सब्ज़ियों की बात कर

आदमी की भूख ने बर्बाद कितने कर दिए
जंगलों को खा गयीं हैं कुर्सियों की बात कर

अब पुनः बरसात में बह जाएगी यह झोपड़ी
गर्मियाँ तो काट लेंगे सर्दियों की बात कर

धीरे-धीरे आग नफ़रत की जला देगी इन्हें
हस्तियाँ आधार इसका पीढ़ियों की बात कर
    अमन मुसाफ़िर अपनी ग़ज़लों में उस हुनर के साथ खेलते हैं जिसमें कहां जाता है कि एक ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में मुक़म्मल होता है और दूसरा शेर बिल्कुल ही अलग मिजाज़ का हो सकता है। उदाहरण के लिए एक गजल के यह कुछ शेर देखिए-
जब सबने लगाया ही था आवास में बिस्तर
हिस्से में मेरे आया है फिर घास में बिस्तर

तकिया भी लिपट रो रहा दर्दों में हो शामिल
आकर ये सिमट बैठा मेरे पास में बिस्तर

बिस्तर को बताया कि वो आयेंगे दोबारा
शरमा रहा इस प्यार के एहसास में बिस्तर
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अमन मुसाफ़िर किसी एक बिंदु पर नहीं टिकते हैं। उनकी दृष्टि का संसार विस्तृत है। वे अंतर्मन से बाहिर्संसार तक निरंतर अवलोकन करते हैं और फिर ग़ज़ल कहते हैं। तीखी चोट करने वाली यह उनकी ग़ज़ल, इसके कुछ  शेर देखिए-
दिन में फ़सलें रात को भूख उगाता है
सब कहते वह भारत-भाग्य विधाता है

उसके चेहरे की ख़ामोशी है रोती जब मज़दूरी करके वापस आता है

'धनिया' दिन भर बैठी रहती है भूखी
'होरी' अपनों से ही धोखा खाता है
       नए छत के बिंबो को चुना और उन्हें अपनी गजलों में पिरोना अमन मुसाफिर के लिए मनु बहुत सहज कार्य है वह इतनी सहजता से नूतन बिंदुओं का प्रयोग करते हैं कि उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इससे बढ़कर सटीक और कोई बम हो ही नहीं सकता था जैसे अपनी एक ग़ज़ल में उन्होंने “यादों का राशन” का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग किया है। इसी गजल में “प्रमोशन” शब्द का भी बेहतरीन प्रयोग है -
मूर्छित एक ख़्वाब जीवन चाहता है
आपकी साँसों की धड़कन चाहता है

भूख से रोता हुआ मेरा हृदय ये
आपकी यादों का राशन चाहता है

तन को दफ़्तर में रखो मंजूर लेकिन
मन हमारा अब प्रमोशन चाहता है
    इस डिजिटल युग में सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है सोशल मीडिया में युवाओं का डूबे रहना। सोशल मीडिया में उलझे युवाओं के जीवन का दिलचस्प विश्लेषण किया है अमन मुसाफ़िर ने अपनी इस ग़ज़ल में-
वो गिन रहा कमेंट बचा ये ही काम है
डिजिटल सदी का एक यही तो पयाम है

प्रोफ़ाइलों में साथ दिलों में नहीं हैं साथ
एक दूसरे के प्यार का कोई न दाम है

स्क्रीन पर ही कटते हुए जाए जिंदगी
मिलती नहीं है फुर्सतें कैसी ये शाम है

मत खोज प्यार के ख़तों को रोज़-रोज़ तू
इनबॉक्स में जो आ गया वो ही इनाम है
      सच का साथ देना शायर को ज़रूरी लगता है। बल्कि वे पूरी निडरता के साथ अपनी अभिव्यक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं, ठीक शायर अदम गोंडवी की तरह -
बात कड़वी है मगर स्वीकार है
ये ग़ज़ल मेरी नया हथियार है

सिर्फ लफ़्ज़ों का नहीं यह खेल अब
शेर में देखो 'अदम' की धार है।

देश को मिल कर यहाँ सब लूटते
चोर ही अब देश की सरकार है।

झूठ को ही सच बताता है सदा
बिक चुका पूरा यहाँ अखबार है।

आदमी की अब नहीं क़ीमत बची
हर तरफ़ बस झूठ का व्यापार है।
     दरअसल, कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में। इस संग्रह की ग़ज़लें युवा शायर अमन मुसाफ़िर को साहित्य की दुनिया में विशेष स्थान दिलाने की पूरी संभावना व्यक्त करती हैं। संग्रह की ग़ज़लें अक्षरशः पठनीय हैं तथा चिंतन मनन के योग्य हैं।
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Sunday, February 15, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | राजा हिमांचल के दमाद भोले दूला बने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
राजा हिमांचल के दमाद भोले दूला बने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
    लेओ आ गई शिवरातें। अपने बुंदेलखंड में शिवरातों को ऐसी धूम मचत आए, ऐसी धूम मचत आए के ने पूछो। सगरे शिव मंदरन में संकारे से भीर लगन लगत आए।  भीर काए ने परे अखीर शिवरातें में शिव औ पारबती को ब्याओ होत आए। शिव मने सबको भलो करबे वारे औ पारबती माता सो ऊंसईं ठैरीं ई जगत की जननी मने मताई। सो,  ई जगत की भलाई लाने जो ई जगत के पालनहार औ जगत की मताई को को ब्याओ होए तो खुसी तो मनाई जाहे। मनो जे सोचबे की बात आए के अपनी संस्कृति में शिव घांईं देवता सादगी के उदारण आएं। बे हिमांचल राजा के दमाद इएं मनो बे कोनऊं मैंगो कपड़ा नईं पैंनत, बे तो एक ठइयां बघम्मर लपेटे रैत आएं। गले मे सोना-चांदी की माला की जांगा एक ठइयां नागदेव पैने रैत आएं। मोटर-कार की जांगा बैलवा पे चढ़ के चलत आएं। मनो छवि ऐसी नोंनी के उने पाने के लाने पारबती जू ने तप करी। ऐसे देव  देवी को ब्याओ होए  मानुस ब्याओ को गानों ने गाऐं ऐसो कैसे हो सकत? अपने बुंदेलखंड में मुतके लोकगीत आएं जीमें शिव  पारबती के ब्याओ को सजीब वर्नन आए। जैसे एक गीत आए- “बन्ना जे देखे पेलऊ पेल, बैल पे झूमत आवे जू,
शंकर महादेव को ब्याव, भूतन की बारात आवे जू।”
     एक औ गीत आए जीमें गौरा जी को शिव जी के  ब्याहबे आबे की बात करी गई आए-
"हरे बांस मंडप छाए, गौरा जी को शिव जी बिहाने आए,
सेहरा में सांप विराजे, मुख पे भसम रमाए,
गौरा जी को शिव जी बिहाने आए..."
     औ जोन ने भोला की बरात देख लई ऊको इठलाबो देखतई बनत आए,-
"में तो देख आई, हे में तो देख आई,
लगन भोले की बारात, में तो देख आई,
अजब बारात है, अजब दूल्हा है..."
सो जे आए अपने इते की शिवरातों के मजे। सो, सबई जने हिलमिल के मंदर जइओ, शिव-पारबती के ब्याओ में शामिल हुइयो औ सबई के कल्यान की सोचियो।
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______________________😊
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, February 12, 2026

बतकाव बिन्ना की | काय, आज कौन सो डे आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | काय, आज कौन सो डे आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
काय, आज कौन सो डे आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘काए आज कौन सो दिन आए?’’ भैया जी ने भौजी से पूछी।
‘‘आज? आज बृहस्तपत वार आए, मनो गुरुवार। काए, जा काए पूछ रए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘औ कौन सो दिन आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आज 12 तारीख आए।’’ भौजी फेर के बोलीं।
‘‘अरे, हम तारीख नईं पूछ रए, हम दिन पूछ रए के आज कौन सो दिन आए, मने कौन सो डे आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘आज दसमीं तिथि आए। काए काल कछू की पूजा कराने है का?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने तुमसे तिथि नोंई पूछी। हम तुमसे जा पूछ रए के आज कोन सो डे आए?’’ भैयाजी ने कई।
‘‘हऔ, तुम तो ऐसे कै रए जैसे हमें डे को मतलब नईं पतो। डे मने दिन औ दिन मने तिथि। हमने आपके लाने पूरो तो बता दओ के आज गुरुवार, दसमीं तिथि आए औ कलेंडर के हिसाब से 12 तारीख आए। को जाने औ का पूछ रए हो आप?’’ भौजी झुंझलात भई बोलीं।
जा सब देख के मोए हंसी आन लगी। काए से के मोए समझ में आ गई हती के भैयाजी भौजी से का पूछबो चा रए। मैंने देखी की इते भौजी झुंझलान लगी हतीं औ उते भैयाजी बोर फील करन लगे हते सो मैंने दोई की मदद करबे की सोची।
‘‘भौजी, भैयाजी तिथि नोंई पूछ रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो, जे का पूछ रए? हमें तो कछू समझ ने आ रई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘जे बैलेंटाईन वारे डे के बारे में पूछ रए। के आज कोन सो डे आए?’’मैंने भौजी खों समझाई।
‘‘हैं? जे इनको का सूझ रई? अपन खों का लेने बैलेंटाईन से? औ वा बी ई उम्मर में?’’ भौजी कछू चकित भईं फेर झेंपत सी बोलीं।
‘‘सो ऊमें का भौजी? आप ओरें काए नईं मना सकत बैलेंटाईन? ऊमें का खराबी आए?’’ मैंने सोई जान के भौजी से पूछी।
‘‘नईं, मने खराबी तो कछू नईं। मनों कछू बी अच्छे से मनाओ जाए तो अच्छो है, लेकन जो आजकल मोड़ा-मोड़ी बैलेंटाईन के नांव पे अत्ते करन लगत आएं बा गलत आए।’’ भौजी ने बड़े पते की बात करी।
‘‘सई कई भौजी। कोनऊं को गुलाब को फूल भेंट करबे में कोनऊं खराबी नोंई, गर जो आपके मन में मैल ने होए।’’ मैंने भौजी को समर्थन करो।
‘‘तो का आज गुलाब मने रोज़ डे आए का?’’ भौजी ने पूछी औ भैयाजी के हातन की तरफी देखन लगीं के बे कऊं गुलाब ले के तो नईं आए?
‘‘हमाओ गुलाब कां आए?’’ भैयाजी के हातन में गुलाब को फूल ने देख के भौजी ने उनसे पूछी।
‘‘आज गुलाब डे नोंईं। बा तो 7 फरवरी को हतो, जब हमने तुमाई चुटिया में गुलाब खोंसो रओ।’’ भैयाजी शरमात भए बोले।
‘‘अरे, सो ऊ दिनां काए नईं बताओ हमें? खैर, सो आज का आए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘आज तो हग डे आए।’’ भैयाजी चुटकी सी लेत भए बोले।
‘‘का कई?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने कई आज हग डे आए, मने गले लगबे को दिन।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘कछू तो शरम खाओ। बिन्ना के आंगू हमसे ऐसो बोल रए।’’ भौजी झेंपत भईं बोलीं।
‘‘अरे, सो हम कछू गलत थोड़ेई कै रए। गले तो ईद, दिवारी पे बी मिलो जात आए। अबईं तुमई कै रई हतीं के जो मन में कछू गलत बात ने होए तो कछू में कछू दोस नईं आए। औ अब तुमईं मों बना रईं। मने तुमाए मन में कछू गलत वारे खयाल आए।’’ भैयाजी ने भौजी खों चुटकी लई।
‘‘हऔ, हमें पतो, हम तो ऊंसई कै रए हते।’’ भौजी अपनी बात सम्हारत भईं बोलीं।
‘‘तुमें तो याद बी ने हुइए के कोन सो दिन का कहाउत आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नईं याद, हमें सोमवार से ले के इतवार तक सबई दिन याद आएं। कौ तो सुनाएं, सोम, मंगल, बुध....।’’ भौजी गिनान लगीं के भैयाजी ने टोंको।
‘‘बस-बस, जे वारे दिन नईं पूछ रए। हम तो बैलेंटाइन वारे दिन पूछ रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें का पतो? औ काए याद राखें, कोन सी हमें बा दिन कोनऊं पूजा करने, के उपवास राखने?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बात तो तुमाई सही आए मनो, पतो तो होने चाइए के रोज डे से बैलेंटाइन शुरू होत आए। फेर प्रपोज डे, चाॅकलेट डे, टेडी डे, प्रामिस डे, हग डे, किस डे औ अखीर में होत आए बैलेंटाइन डे।’’ भैया जी ने भौजी खों बताई।
‘‘अरे, अरे, जेई तो सल्ल आए के किस डे पे सबरे खुल्लम खुल्ला... जेई से तो जा सब हमें नईं पुसात।’’ भौजी मों बनात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, अकेले में करो चाइए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘सो जो कैसो त्योहर कहाओ जोन को अकेले में मनाओ जाए? ईंसे तो अपने त्योहार नोंने के अबईं शिवरातें पे सबईं मंदिर जाहें उते शिव औ पार्वती जू के ब्याओ में सामिल हूंहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी, आप सई कै रईं। अपने इते के त्योहर ई टाईप के बनाए गए आएं जोन खों सब मिल के धूम-धाम से मना सकत आएं। ने कोऊ खों लट्ठ घुमाबे की जरूरत औ ने कोनऊं गलत हरकत। सब कछू अच्छो-अच्छो सो रैत आए। मैंने तो सोई ई बेर बड़े शिवजी लौं जाबे की सोस रईं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो अपन ओरें संगे चलबी। हम ओरें बी जेई बहाने दरसन कर आबी।’’ भौजी बोलीें।
‘‘जे ठीक रैहे। हम सोई सोस रए हते के ई बेर कऊं दरसन के लाने जाओ चाइए। बरमान में तो बड़ी भीर परहे। सो इतई ठीक रैहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘चलो तो जा पक्की रई। अपन ओरें बड़े शिवजी लौं चलहें। बाकी भैयाजी अब मोए जाबे की परमीसन देओ ताके आप अपनो हग डे कंटीन्यू कर सको।’’ मैंने भैयाजी खों टोंट मारी।
‘‘अरे, राम को नांव लेओ! हमें का करने हग डे को? तुमाई भौजी तो बरहमेस की हमाई आएं। इनें का एकई दिनां गले लगा के अफर जाहें का?’’ भैयाजी सोई हंसत भए बोले।
‘‘आप सोई कछू बी बके जा रए। कोनऊं हग-फग नईं होने। आप चलो औ अपनों काम करो।’’ भौजी झेंपत भईं भैयाजी खों झिड़कन लगीं।
‘‘सई में, मोए अब इते से चलो जाओ चाइए।’’ कैत भई मैं उठ खड़ी भई।
‘‘अरे, तुमें कऊं नईं जाने। हम नईं मानत जे सब। तुम तो इतई बैठो।’’ भौजी ने मोरो हात पकर के मोए बिठा लओ।
‘‘हम सोई कां मानत आएं, हम तो तुमाई भौजी सेे ऊंसई ठिठोली कर रए हते। ने तो हमें तो ई नांव से कछू औ सूझन लगत आए।’’ भैयाजी ठठा के हंसन लगे।
‘‘छी! आप औ!’’ भौजी मों दाब के हंसन लगीं।
रामधई! कछू बी कई जाए मनो अपने देस के त्योहार सई में त्येाहार घांई लगत आएं। जीमें खीब मजो आत आए। सबरे त्योहारन को कोऊ ने कोऊ मोसम औ प्रकृति से कछू ने कछू ताल्लुक रैत आए। अपने जे सबरे त्योहार बी तो आपस में हिल मिल के रैबो सिखात आएं। मोए तो सोई अपने त्योहार ज्यादई अच्छे लगत आएं। बाकी जोन खों जोन पुसाए, मोए का।
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे सोचियों जरूर के अपने त्योहार दुनिया में सबसे नोंने आएं के नईं? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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