Tuesday, April 28, 2026

पुस्तक समीक्षा | संस्कृति की वास्तविकता के हर पक्ष को रेखांकित करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | संस्कृति की वास्तविकता के हर पक्ष को रेखांकित करती कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - संस्कृति की धरोहर
कवयित्री- डॉ.आराधना सिंह बुंदेला
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्धनगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य - 350/-
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प्रत्येक रचना में प्रतिबिम्बित होते हैं उसके सृजनकर्ता के विचार, सरोकार एवं भावनाएं। सृजनकर्ता कोई भी हो सकता है किन्तु जब सृजनकर्ता आधुनिक चिकित्सा पद्धति में निपुण एक उच्चकोटि की स्त्रीरोग विशेषज्ञ हो तो उसके अनुभव का दायरा और सरोकार का वलय और बड़ा हो जाता है। आज जिनकी पुस्तक समीक्ष्य है उसकी सृजनकर्ता डॉ. आराधना सिंह बुंदेला वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं लैप्रोस्कोपिक, रोबोटिक सर्जन हैं इसके साथ ही वे डायरेक्टर आरुण्या क्लिनिक, द कंपेशनेट हेल्थ केयर, नोएडा, एडिशनल डायरेक्टर ऑब्स एंड गाइनी, फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा हैं। वे नोएडा औबस्टेट्रिक एंड गायनेकोलोजिकल सोसायटी की प्रेसिडेंट (2021-2023) भी रह चुकी हैं। उनकी चिकित्सकीय योग्यता ने उन्हें आधुनिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक पहचान दी है। उनके जीवनसाथी डॉ. यशपाल सिंह बुंदेला न्यूरोसर्जन हैं। डॉ. आराधना की सासू मां श्रीमती विमल बुंदेला छतरपुर मध्यप्रदेश की वरिष्ठ कवयित्री हैं। डॉ. आराधना सिंह बुंदेला के इस नवीनतम काव्य संग्रह ‘‘संस्कृति की धरोहर’’ के पूर्व ‘‘गुजरता वक्त ठहरते पल’’ नामक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है।

भारतीय संस्कृति पारिवारिक सौहार्द को प्रमुख मानती है। जब पारिवारिक संचरना स्वस्थ एवं सृदुढ़ होगी तो समाज और राष्ट्र स्वतः सुदृढ़ रहेगा। इस काव्य संग्रह के संदर्भ में इस बात को रेखांकित करते हुए सुखद लग रहा है कि जहां एक ओर आज टीवी धारावाहिक सास-बहू के गलाकाट झगड़ों को दिखा-दिखा कर परिवार में विषबीज बो रहे हैं, वहीं यह काव्य संग्रह पारंपरिक एवं स्वस्थ पारिवारिक संरचना का उम्दा उदाहरण है। इस पुस्तक पर आर्शीवचन लिखा है कवयित्री की सासू मां श्रीमती विमल बुंदेला ने। एक तो सास तथा स्वयं कवयित्री होते हुए भी बिना किसी द्वेष भाव के स्नेहिल टिप्पणी करना तथा अपनी बहू को बेटी समान मानते हुए बढ़ावा देना, हमारे देश के वास्तविक सांस्कृतिक मूल्यों का अनुमोदन करता है। श्रीमती विमल बुंदेला ने लिखा है कि ‘‘संस्कृति की धरोहर - मेरी पुत्रवधू डॉ. आराधना की द्वितीय काव्य कृति है। आदर्श और परंपराओं के प्रति आस्था लिए हुए उनकी कविताएँ नैतिक मूल्यों का निर्वाहन करते हुए चली हैं। उनका काव्य जगत स्वस्थ, सुंदर और निर्मल है। उनकी भावनाएं निर्दाेष और उमंगें स्वच्छ आकाश को छूना चाहती हैं।’’

जब एक स्त्री को अपनों का साथ मिलता है तो वह निश्चित रूप से आसमान छू लेती है। डॉ आराधना बुंदेला की कविताएं समाज के आमआदमी का पक्ष लेती हुई उन सभी विसंगतियों पर चोट करती हैं जिनके कारण व्यवस्थाएं दूषित हो चली हैं। दूसरों के दुख से द्रवित होना ही सृजन के लिए प्रेरित करता है। वे अपने सृजन पर ‘‘कविता बन गई’’ के माध्यम से कहती हैं कि-
मैं कुछ कहने नहीं जा रही थी,
पर कविता बन गई,
कुछ यूँ ही सोचे जा रही थी, और कविता बन गई।
दिल थोड़ा दुखा जिस दिन,
एहसास झिलमिलाये,
शब्दों ने ली अँगड़ाई, और कविता बन गई।

संग्रह की भूमिका लिखते हुए ‘पद्मश्री’ कवि अवध किशोर जड़िया जी ने सही लिखा है कि - ‘‘डॉ. आराधना सिंह शब्दों की मर्मज्ञ और अनुभूतियों की गहन ग्राह्यता रखती हैं। संग्रह में, कर्म कौशल को प्राथमिकता, अध्यात्म को प्रतिष्ठा, और संस्कृति को उपासना का दर्जा दिया गया, यह उनकी स्वभावगत विशेषताएँ हैं।’’

महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. बहादुर सिंह परमार ने संग्रह की रचनाओं पर टिप्पणी की है कि ‘‘यह कविता-संग्रह जीवन अनुभवों से निकला हुआ एक ऐसा ही संग्रह है जो पाठकों को हिम्मत और विश्वास से जीवन के उतार-चढ़ाव में आगे बढ़ने का साहस देगा। ये कविताएँ संस्कारों की एक सुंदर धरोहर या मंजूषा के जैसी हैं, जिसमें विभिन्न जीवन विषयों की भावनात्मक कविताओं का मनभावन समन्वय है।’’

सबसे अच्छी बात यह है कि कवयित्री डॉ आराधना तमाम झंझावातों में भी साहस बनाए रखने का आह्वान करती हैं। वे अपनी कविता ‘‘आशा की किरण’’ में लिखती हैं कि-
जब जब कुछ बिगड़ रहा था,
कहीं न कहीं कुछ सुधर रहा था,
सब टूटता सा लग रहा था,
तब तब कहीं पर कुछ था जो जुड़ रहा था।
दुःख ही दुःख का अंधेरा जब था,
कहीं आशा का दीपक जल रहा था,
आंसुओं की उफनती नदियों में,
तब सब्र का बांध बंध रहा था।

‘‘अंतर्मन की स्फूर्त कविताएँ’’ कहते हुए उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह ने लिखा है कि ‘‘कवयित्री डॉ. आराधना सिंह बुंदेला के नए कविता संग्रह ‘संस्कृति की धरोहर’ को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि आप एक संवेदनशील कवयित्री हैं जो अपने आसपास की घटनाओं पर पैनी नजर रखती हैं और घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर कविता के विषयों को उठातीं हैं और फिर अपने शब्दों से कविता में पिरोतीं हैं।’’

संग्रह में एक मार्मिक कविता है ‘‘ख़त जो कभी पहुँचा नहीं’’। इस कविता में एक पुत्री द्वारा अपने पिता के मरणोपरांत उन्हें पत्र लिखने और उन तक न पहुंच पाने की पीड़ा है। यह एक शाश्वत पीड़ा है जो प्रत्येक संतान को कभी न कभी अनुभव करनी ही पड़ती है-
पापा जब से गए, एक ख़त लिखा था उनको,
लगता है अभी तक वो उन तक पहुँचा ही नहीं।
हाल दिल के हमेशा की तरह खोल कर लिख दिए,
सवालों के जवाब चाहने वाला एक ख़त लिखा था मैंने।

डॉ आराधना की कविताओं पर मनोविज्ञानी डॉ. छाया श्रीवास्तव ने संग्रह को ‘‘जीवन के विविध रंगों का एक सजीव दस्तावेज’’ कहा है। वहीं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय छतरपुर की हिन्दी प्रोफेसर डॉ. श्रीमती गायत्री वाजपेयी नं संग्रह को ‘‘संस्कृति की धरोहरः भावों का महकता मधुवन’’ करार दिया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ये कविताएँ सिर्फ कविताएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन के उतार- चढ़ाव,रिश्ते, आत्मीयता, सामाजिक संवेदनाओं और भावनाओं का सुंदर समन्वय हैं।’’

संग्रह के आरंभ में कवयित्री की मातुश्री श्रीमती चंद्रकांता सिंह का भी ‘‘आशीर्वचन’’ है। वे लिखती हैं कि ‘‘मेरी बेटी आराधना बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही है। उनका यह दूसरा काव्य संग्रह प्रकाशित हो रहा है, जिसमें उन्होंने दिल से निकले हुए अपने भावों को बड़ी गहराई और सुंदरता से व्यक्त किया है।’’
मां ही तो वह प्रथम शिक्षिका होती है जो अपनी बेटी को संस्कार एवं संस्कृति सिखाती है। फिर ऐसी बेटी की कलम से जब कविता फूटती है तो वही भाव कविता का आकार लेते हैं जो डॉ आराधना की कविता ‘‘रिवाज और संस्कृति’’ में हैं-
रिवाजों पर चल कर, हमने बड़ों के पैर छूना सीखा,
आशीर्वाद बहुत मिला, आया सम्मान देने का सलीका,
रिवाजों से सीख कर, हम दिया बाती करते,
मंदिर की घंटियाँ और नगाड़ों की गूंज सुनते।

एक और कविता है जो कवयित्री की संवेदनाओं को बखूबी मुखर करती है- ‘‘बेटी का हॉस्टल जाना’’। यूं तो यह एक सामान्य-सी घटना है कि पढ़ाई के लिए बेटी को दूसरे शहर भेजना पड़ता है और उसे हॉस्टल में रहना पड़ता है किन्तु इस घटना के पीछे छिपी रहती है गहरी वेदना जिसे मां का हृदय अनुभव कर के व्याकुल होने लगता है। कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
तुम हॉस्टल गई रानी बेटी,
बिखरे तुम्हारे पेन और कॉपी,
तुम्हारी किताबें जगह जगह,
याद दिलातीं तुम्हारी।
आधे खाये हुए चिप्स का पैकेट,
मैगी भी कुछ तनहा सी,
ईयर फोन्स तुम छोड़ गई....

डॉ. आराधना सिंह बुंदेला की कविताएं छंदबद्ध नहीं हैं किन्तु उनमें एक छांदासिक प्रवाह है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाने में सक्षम है। उनका हिन्दी का शब्द ज्ञान समृद्ध है। वे भावानुसार सटीक शब्दों का चयन करती हैं। उन्हें पता है कि कहां व्यंजनात्मक होना है और कहां कोमल संवाद करना है। भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने सही कहा था कि ‘‘हम विज्ञान में जितना आगे बढ़ते हैं, संस्कृति के उतने निकट होते जाते हैं।’’ डॉ. आराधना सिंह बुंदेला चिकित्सा विज्ञान में जितनी माहिर हैं उतनी ही सांस्कृतिक रुझान रखती है और यह तथ्य उनके इस नवीनतम संग्रह ‘‘संस्कृति की धरोहर’’ की प्रत्येक कविता में महसूस की जा सकती है। संग्रह की सभी कविताएं पठनीय हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से जीवन जीने की कला सिखा जाती हैं।
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Saturday, April 25, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | बे टीचर आएं मकोय के जरेटा नोईं, उने सोई लू-लपट लगत है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
बे टीचर आएं मकोय के जरेटा नोईं, उने सोई लू-लपट लगत है
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

 जनगनना होए चाए ढोरन  गिनबे को काम सरकारी टीचरन की ड्यूटी पैले लगा दई जात आए। मने गिनवाबे वारों को उनकी योग्यता पे पूरो भरोसो कहानों। जे नोंनी बात आए। लेकन उतई जब बात रैत आए अपने मोड़ा-मोड़ी औ पोता-पोती खों स्कूल में भरती करबे की सो सरकारी टीचरन वारो बा भरोसो कपूर घांईं उड़ जात आए। ऊ टेम पे सरकारी टीचरन के पढ़ाए पे भरोसो नईं रैत, ऊ टेम पे पिराइवेट स्कूलें दिखात आएं। चलो कछू नईं जे तो बरहमेस से होत आ रओ। चुनाव कराने होए सो टीचर औ पब्लिक खों गिनने होए सो टीचर। मनों टीचर कम परे में आंगनबाड़ी वारी सोई लगा दईं जात आएं। बे तो ऊंसईं कच्ची लोई  कहानी। जित्तो ऊनसे बन परत आए उत्तो बे जी-जान से फारम भरवाऊत रैत आएं। बाकी जे ने पूछियो के कित्तो सई कर पाऊत आएं औ कित्तो नईं? काए से के ऊमें उनको कोनऊं दोस नईं रैत। अब मनों कोनऊं प्रायमरी वारे खों सीदे यूपीएससी की परीच्छा में बैठा देओ तो बा कोसिस तो करहे, मनो परीच्छा में कित्तो सई लिख पाहे जे को कै सकत आए? चलो, जेबी सई। अब ड्यूटी तो सबई खों करनेई पड़त आए। सो करन देओ ड्यूटी।
   मनों जे बात सोई सोचबे की आए के गनना को काम मूंड़ चटकाबे वारी गरमी में काए कराओ जा रओ? सो, आप कैहो के जे मई-जून मेंईं तो टीचरन की छुट्टियां रैत आएं। चलो जे बी ठीक बात आए। पर एसी कमरा में बैठ के आडर देबे वारों खों तनक सोचो चाइए के 44-45 डिगरी से ऊपरे जात भई गरमी में उने दोरे-दोरे फिरा के उनकी पूरई छुट्टी करबे की मंसा आए का? जा काम का साजे मोसम में कराओ नईं जा सकत? काए से बे टीचर आएं मकोय के जरेटा नोईं, उने सोई लू-लपट लगत आए। तरे ऊपरे वारे सबई जने तनक सोचियों ई बारे में।    
 
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Thursday, April 23, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो कऊं ऊ टेम पे मोबाईल होतो तो वीरगाथा काल को का होतो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जो कऊं ऊ टेम पे मोबाईल होतो तो वीरगाथा काल को का होतो?
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘बिन्ना आज कोन सो दिन आए?’’ भैयाजी ने कछू सोंसत भई मोसे पूछी।
‘‘आज गुरुवार आए।’’ मैंने कई।
‘‘और?’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘और का?
‘‘आज कछू खास दिनां औ आए।’’ भैयाजी बोले। 
‘‘हऔ, सो आप विश्व पुस्तक दिवस की आ कै रए!’’ मोए समझ में आ गई के भैयाजी मोसे का कहाबो चा रए आएं।
‘‘तुमने तो मुतकी किताबे लिखीं, बा बी बिगैर कट-पेस्ट करे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, किताबें तो ऐसईं लिखी जात आएं, कट-पेस्ट वारी तो चोरी कहाऊत आएं। बाकी आप कैबो का चा रए?’’ मोए अब फेर के समझ ने परी के बे का कैबो चा रए?
‘‘हम जा सोच रए के जो कऊं राजा हरों के टेम पे मोबाईल चल परो होतो तो ऊ टेम के कबित्तों को का होतो? औ ऊ टेम के कवियन को का होतो?’’ भैयाजी फेर के सोंसत भए बोले।
‘‘का होतो? जोन खों ऊ टेम पे कबित्त लिखने होतो, सो बा ऊ टेम पे बी लिखतो। मोबाईल आए से का कविताई बढ़ा गई?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘कविताई बढ़ा नोंईं गई, ऊकी तो बाढ़ आ गई। जोन खों देखो बोई उल्टी-सीदी कबिताएं सोसल मिडिया पे पेलत रैत आए। औ इत्तई नईं, ऊके बाद अपने पइसा से बा कचूमर सलाद घांईं कविताओं की किताब छपा के खुद खों भूषण औ रहीम को चचा समझन लगत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कचूमर सलाद घांईं कविताएं, वाह! का तुलना करी आपने।’’ मोए हंसी फूट पड़ी।
‘‘सई सी तो कै रए। मनों जे सोचो बिन्ना के ऊ टेम पे कवि हरें अपने राजा जू के संगे लड़ाई के मैदान में सोई जात्ते। उतई से बे आंखन देखी कबिताएं लिखत्ते। अपने कवि भूषण सोई संगे जात रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ बे ओरें डरात ने हते।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, अब के तो बीर रस वारे कवियन खों देख लेओ तनक, मंच पे तो बे पाकिस्तान औ चीन की दारी-मतारी करहें औ कओ के भैया तनक सेना में भर्ती हो के उन ओरन से लड़ आओ, सो कओ पतरी गली से दौर लगा देवें।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
भैयाजी की बात सुन के मोए सोई हंसी आ गई। मनो बे कै सांची रए ते।
‘‘ऐसो आए भैयाजी के आजकाल के कवियन कोनऊं राज्य नईं जीतने रैत आए, उनें तो बस, मंच लूटने रैत आए। अब राजा औ लुटेरा में कछू फरक को हुइए के नईं? फेर ऊ टेम के कवियन खों जे ध्यान रखने परत्तो के उनके राजा जू को एकऊ कारनामों ने छूट जाए। बे सब कछू ठीक से देखें औ ऊको अपने कबित्त में लिख देबें। मनो आज के मंच बिराजे कवियन खों जे ध्यान रखने परत आए के उनकी वीडियो ठीक से बनाई जा रई के नईं? उनको कवितापाठ लाईव दिखाओ जा रओ के नईं? औ सबसे बड़ी बात के ऊ टेम के कबियन खों जे पतो नईं रैत्तो के उनके राजा जू सई-सलामत लौटहें के नईं। जो बे ने लौट पाए तो उनें इनाम-इकराम देबे वारो कोऊ ने रैत्तो। मनो आज के जे कवि पैलई ठैरा लेत आएं के तुमाओ प्रोगराम चाए चले के पिटे, हमें तो इत्ते रुपैया चाऊने, मने चाऊने। औ मुतके बड़े नांव वारे कवि सो पैलई एडवांस ले लेत आएं। काए खों बे रिस्क में रएं?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! मनो हम तो जे सोच रए के जो ऊ टेम पे मोबाईल होतो तो का होतो। मनो ऊ टेम पे राजा के संगे लड़ाई पे जाबे वारो कोनऊं कवि के लिंगे मोबाईल होता तो बा लड़ाई के मैदान में जा के राजा जू से जेई कैतो के महाराज हमाओ फोन आ गओ सो हम देख ने पाए के आपने बे सिपाइयन को गलो कैसे काटो, सो दो-चार के औ काट के दिखा देओ, ने तो हम का लिखबी के आपने कैसे काटो?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, औ जो राजा जू के लिंगे मोबाईल होतो तो बे जवाब देते के हमाओ सोई फोन बजन लगो रओ सो हम अबे काट कां पाए। अब तुम ध्यान से देखियो हम दुस्मन के सिपाइयों को गला काटबे जा रए।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘सो इत्तई पे काए, बे दुस्मन के सिपाई का ऊंसई बिगैर फोन के उते लड़बे आऊते? उने बी तो अपनी रील बना के सोसल मिडिया पे पोस्ट करने परती। सो बे राजा जू से कैते के महाराज, हमाओ गलो काटने होए सो काट लइयो, मनो पैले हमें जा लड़ाई के मैदान पे तलवार के संग वारी अपनी रील पोस्ट कर लेन देओ।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘बा तो सब ठीक आए भैयाजी, मनो जे आप सोचो के संत प्रणनाथ जू ने महाराज छत्रसाल खों बुंदेलखंड में हीरा होबे की बताई रई। उन्ने कई रई के-
छत्ता तेरे राज में धक-धक धरती होय
जित-जित घोड़ा पग धरे, उत-उत हीरा होय।।
मनो जो ऊ टेम पे मोबाईल और गूगल गुरू होतो तो कोनऊं बी एआई से पूछ के बता देतो के हीरा कां निकरहे।’’मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जे एआई की तुमने भली कई। गूगल पे एआई बताऊतो जरूर मनो संगे जे औ कै देतो के जरूरी नई के एआई की जानकारी सई होए, सो औ सोर्सन से सोई पतो कर लेओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जा तो आपने सई कई के जो बे एआई से पूछ के सई ने बता पाते तो उनको गलो कटनो तै रैतो। जा खतरा तो रैतो। पर हो सकत के ऊ टेम पे बी व्हाटअप यूनवर्सिटी चल रई होती औ राजा जू उतई की नौलेज पे टिके होते तो कोनऊं खतरा ने रैतो।’’ मैंने सोई कई।
‘‘तनक जे सोई सोचो के ऊ टेम पे चंदबरदाई ने बिना फीता से नप्पे बता दओ रओ के -
चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता ऊप्पर सुल्तान है, मत चूक्के चौहान।।
औ पिरथवी राज चौहान बी ऐसे के उने दिखा नई रओ तो फेर बी बे सई नाप समझ गए औ सई निसाना पे तीर चला दओ। आज काल के मोड़ा तो सीदी लकीर नईं खेंच सकत। औ मोबाईल के कैल्कुलेटर के बिगैर पिज्जा-बर्गर को हिसाब नईं कर सकत।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बा सब तो ठीक आए भैयाजी, मैं जा सोस रई के जो ऊ टेम पे मोबाईल होतो तो का फेर बी ऊ टेम के साहित्य को वीरगाथा काल कओ जातो?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘का पतो? तब ऊ टेम पे इत्ती नोंनी कबित्त कोऊ लिखई ने पातो। काए से के बे तो चार लेन लिखते और लाईक, कमेंट जुटात-जुटात पूरो टेम निकार देते। भला भूषण घांई ऐसे कबित्त कां लिख पाते के- 
बाने फहराने घहराने घंटा गजन के 
नाहिं ठहराने राव राजे देस देसन के
नग भहराने ग्राम नगर पराने सुनि
बाजत निसाने शिवराज जू नरेश के
इत्तो अच्छो कबित्त बोई लिख सकत आए जोन ने लड़ाई अपनी सगी आंखन से देखी होए। बा टीवी चैनल की गप्पे देख के ऐसो कबित्त थोड़े रचो जा सकत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कई आपने भैयाजी! जो बाने फहराने घहराने टेम पे मोबाईल होतो तो वीरगाथा काल सोई आजकाल की घांईं रील काल बन के रै जातो। अच्छो रओ के बाने फहराने घहराने टेम पे जा मोबाईल को ईजाद ने भओ रओ। कम से कम राजा हरें चैन से लड़ तो पाए। ने तो बे सोई ट्रोल-ट्रोल खेलत रैते औ फेर जब लड़बे की सोसतें तो कवि हरें पैलई कैते के पैले हमें कोनऊं बड़ों वारो सम्मान, पुरस्कार देओ सो संगे चलबी, ने तो तुम जानो औ तुमाओ काम जाने।’’ मैंने कई।
‘‘सई में बिन्ना, अच्छो रओ के बा वीरगाथा काल वारे टेम पे मोबाईल ने चलो रओ। ने तो हिन्दी साहित्य को इतिहास रील साहित्य को इतिहास बन के रै जातो।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
मनो जा चिंता हंसबे की नोंईं सोचबे वारी आए। 
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जो वीरगाथा काल में मोबाईल होतो तो का ऊंसई भओ रैतो जैसी मैं औ भैयाजी सोंस रए हते? जो आपके लाने कछू औ समझ परे सो बतइयो। जै राम जी की! 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में मेरी पुस्तक पर चल रहा शोध - डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

विश्व पुस्तक दिवस पर आज राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण में "पत्रिका" में .... मेरे ही शब्दों में मेरा सृजनकर्म... वैसे मुझे संकोच होता है यूं ख़ुद के बारे में बताने में... लेकिन अच्छा भी लगता है जब लोग मेरी मेहनत के बारे में जानें..😊
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मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में मेरी पुस्तक पर चल रहा शोध

सच कहूं तो लिखना मेरा पैशन है और पुस्तक मेरा पहला प्रेम। हाल ही में मेरी 60 वीं पुस्तक प्रकाशित हुई है, लोकमाता अहिल्याबाई होलकर। यह अहिल्याबाई की जीवनी है। मेरी किताबों के पाठक अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और मिस्र जैसे देशों में भी हैं। कुछ किताबों के 6 से 8 संस्करण तक आ चुके हैं। मेरी पुस्तक बुंदेली लोककथाओं पर मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में शोधकार्य चल रहा है। स्त्री विमर्श पर देश की विभिन्न विश्वविद्यालय में शोध कार्य किया जा गया है। मेरे उपन्यासों एवं कहानियों का पंजाबी, उर्दू, मराठी एवं कन्नड़ में भी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। लगातार कई वर्ष मेरी पुस्तकों का मनोरम ईयरबुक में उल्लेख किया गया। स्त्री विमर्श, थर्ड जेंडर विमर्श, आदिवासी जीवन एवं संस्कृति, खजुराहो की मूर्तिकला, प्राचीन भारतीय इतिहास, बुंदेली संस्कृति, फोरेंसिक साईंस, पर्यावरण, कहानी, नाटक, नवगीत आदि की पुस्तकों सहित विभिन्न विषयों एवं विभिन्न विधाओं में 60 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
- डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
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हार्दिक धन्यवाद #पत्रिका 🙏
हार्दिक धन्यवाद रेशू 🙏
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Wednesday, April 22, 2026

चर्चा प्लस | 22 अप्रैल, विश्व पृथ्वी दिवस : कौन खरीदेगा पृथ्वी के लिए जीवन बीमा पॉलिसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
22 अप्रैल, विश्व पृथ्वी दिवस  
कौन खरीदेगा पृथ्वी के लिए जीवन बीमा पॉलिसी?           
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                               
   हम अपनी जीवन बीमा पॉलिसी तो खरीद लेते हैं, लेकिन जलवायु, पर्यावरण और पृथ्वी के लिए बीमा पॉलिसी कौन खरीदेगा? इनके बिना हमारे जीवन का क्या कोई भविष्य है? हम अपनी भविष्य की सुरक्षा के लिए जीवन बीमा पॉलिसी लेते हैं। भविष्य में हमारे साथ कोई अनहोनी होने पर ये पॉलिसी हमारे और हमारे परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। तरह-तरह की सुरक्षा पॉलिसी लेकर हम चिंता-मुक्त हो जाते हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने पृथ्वी का बीमा करवाने के बारे में सोचा है? पृथ्वी ही हमारा घर और हमारी दुनिया है। क्या हम पृथ्वी के बिना अपने जीवन की कल्पना भी कर सकते हैं? पृथ्वी की सुरक्षा के लिए बीमा पॉलिसी कौन लेगा?
  पृथ्वी पर रहने वाले जीवों में, हम इंसान खुद को दूसरे जीवों से ज़्यादा समझदार मानते हैं, क्योंकि हमने अपने कौशल को विकसित किया है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि दूसरे जीवों में बुद्धि नहीं होती। इंसान उतनी कुशलता से बुनाई नहीं कर पाता, जितनी कुशलता से कोई पक्षी अकेले अपना घोंसला बुन लेता है। यहाँ तक कि अपना घर बनाने के लिए भी उसे टीमवर्क की ज़रूरत पड़ती है। अगर डॉल्फ़िन इंसानी शब्दों को समझ सकती हैं, तो चींटियाँ न सिर्फ़ अपनी बस्तियाँ बनाती हैं, बल्कि भविष्य के लिए खाना भी जमा करके रखती हैं। तो फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि उनमें बुद्धि नहीं होती? लेकिन एक बात ऐसी है जो हम इंसानों को दूसरे सभी जीवों से श्रेष्ठ साबित करती है—वह यह कि हम अपने लंबे अतीत को याद रख सकते हैं और अपने लंबे भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं, क्योंकि हमारे पास तर्क करने की क्षमता है। इसीलिए आज हम आसानी से समझ सकते हैं कि जलवायु और पर्यावरण किस दौर से गुज़र रहे हैं। आज हम जानते हैं कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ओज़ोन परत—जो पृथ्वी को सूर्य से आने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों और रेडिएशन से बचाती है—खतरे में है। आज हम यह आकलन कर सकते हैं कि अपने आधुनिक संसाधनों को पाने की होड़ में हमने प्राकृतिक संसाधनों को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया है। अगर यह सच न होता, तो वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल को कम करने की आवाज़ें न उठतीं। जर्मनी अपनी कोयला खदानों को हमेशा के लिए बंद करने की घोषणा न करता।
हम इंसान सामाजिक प्राणी हैं और समाज तथा समुदाय में रहते हैं। अपने परिवार और अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए हम अलग-अलग तरह की सुरक्षा बीमा पॉलिसियाँ खरीदते हैं—जैसे स्वास्थ्य सुरक्षा, घर की सुरक्षा, वाहन सुरक्षा, शिक्षा सुरक्षा, दुर्घटना बीमा वगैरह। तो फिर हम अपने उस घर की चिंता क्यों नहीं करते, जो हम सभी इंसानों का साझा घर है? जो हमारे जीवन का आधार है। यानी, हमारी पृथ्वी। अब वह समय आ गया है, जब हमें पृथ्वी के भविष्य की चिंता करनी होगी।

    पिछले कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन एक बहुत ही गंभीर समस्या के रूप में उभरकर सामने आया है। जलवायु परिवर्तन के कई कारण हैं, जो पृथ्वी पर चल रहे जीवन को कई तरह से प्रभावित करते हैं। जलवायु परिस्थितियों में व्यापक बदलावों के कारण, कई पौधों और जानवरों की पूरी आबादी विलुप्त हो गई है और कई अन्य की आबादी विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है। कुछ क्षेत्रों में, कुछ खास तरह के पेड़ पूरी तरह से विलुप्त हो गए हैं और इसके कारण वन क्षेत्र में कमी आ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण जल प्रणाली पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है, जिसके चलते ग्लेशियर पिघल रहे हैं और बारिश अनियंत्रित होती जा रही है। ये सभी स्थितियाँ हमारे पर्यावरण में हो रहे असंतुलन को बढ़ावा दे रही हैं, जिसके कारण पर्यावरण बहुत बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के दो कारण हैं - पहला, प्राकृतिक कारणों से और दूसरा, मानवीय कारणों से। प्राकृतिक कारणों में ग्लेशियरों का खिसकना, ज्वालामुखियों का फटना और मानव-जनित ग्रीनहाउस प्रभाव शामिल हैं, जिसे हम ग्लोबल वार्मिंग भी कहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि जिसे हम प्राकृतिक कारण मानते हैं, उसे भी हम इंसानों ने ही बढ़ाया है।
इसे इस तरह से देखा जा सकता है कि जब से मशीनों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने लगा है, तब से प्राकृतिक संसाधनों पर खतरा बढ़ गया है। मशीनों को चलाने के लिए जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) की ज़रूरत होती है, जैसे कोयला और तेल; जीवाश्म ईंधन, कोयला और तेल को जलाने से बहुत ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जिससे मीथेन, ओज़ोन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें बनती हैं, जिसे ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जाना जाता है।
         जलवायु परिवर्तन का पृथ्वी के वायुमंडल पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड को संतुलित करने में पेड़ों की बहुत बड़ी भूमिका होती है, क्योंकि वे कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं और हमें ऑक्सीजन देते हैं। पर्यावरण के प्रभाव के कारण, पेड़ों की कई प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं, जो हमारे लिए एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। जलवायु को नियंत्रित करने के लिए हमारे उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव महत्वपूर्ण हैं। जलवायु नियंत्रण में हो रहे बदलावों के कारण इन पर बहुत बड़ा असर पड़ रहा है। यदि जलवायु परिवर्तन इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में जीवन पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगा।
               पानी पर असर: जलवायु परिवर्तन के कारण, पानी पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। बारिश के हालात पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है, जिससे धरती पर कई जगहों पर सूखा और बाढ़ जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। बहुत से लोग एक गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। कहीं तो बहुत से लोगों के घर डूब रहे हैं, और कहीं वे पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। तापमान में लगातार बढ़ोतरी के कारण, ग्लेशियर पिघलने का संकट पैदा हो गया है, जो एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है।
        जहां तक हवा का प्रश्न है तो हर इंसान, हर जीवित प्राणी को ज़िंदा रहने के लिए साँस की ज़रूरत होती है। सिर्फ़ हवा और पर्यावरण की शुद्धता ही हमें स्वस्थ साँस दे सकती है। लेकिन हम इंसानों ने अपने ही हाथों से अपने घर को जलाने और प्रदूषण फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अगर हम सिर्फ़ दिल्ली की ही बात करें, तो वहाँ हर साल सर्दियों में स्मॉग (धुंध) की वजह से लोगों का दम घुटने लगता है। साँस की बीमारियाँ बढ़ जाती हैं, और अब कोरोना संक्रमण, जो साँस के ज़रिए तेज़ी से फैलता है, उसने इस जोखिम को और भी बढ़ा दिया है। मास्क के पीछे फँसी साँसें और साफ़ हवा की कमी सेहत के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। लेकिन शुद्ध हवा और शुद्ध पर्यावरण आएगा कहाँ से, जब हमने वातावरण को ज़हरीली गैसों का 'कचराघर' बना दिया है? यह सोचकर अच्छा लगता है कि इस कोरोना काल में, दुनिया भर के देशों में लगे लॉकडाउन की वजह से धरती की छत—यानी ओज़ोन परत—की मरम्मत हो गई है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण, दुनिया के ज़्यादातर देशों में लॉकडाउन लगा दिया गया था। उद्योगों का कामकाज बंद हो गया था। सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही सीमित हो गई थी। इससे वायु प्रदूषण अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। नदियों का पानी साफ़ होने लगा, आसमान साफ़ और नीला दिखाई देने लगा। लॉकडाउन के दौरान बड़े पैमाने पर चलने वाले उद्योगों के बंद होने से ज़हरीली गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी आई, जिसकी वजह से ओज़ोन परत में बने छेद सिकुड़ने लगे, छोटे होने लगे। लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। कोरोना संक्रमण के बावजूद, दुनिया अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई है। ऐसा होना ज़रूरी भी है। उद्योगों के बिना अर्थव्यवस्था और विकास ठप पड़ जाएँगे, और बेरोज़गारी तथा भुखमरी को संभालना और भी मुश्किल होता चला जाएगा। कहने का मतलब यह है कि जो चीज़ हमें अपनी नंगी आँखों से दिखाई नहीं देती, वह भी हमारे जीवन के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है—यानी ओज़ोन परत।
        इंसानों ने सिर्फ़ 120 सालों में धरती की जलवायु को बदल दिया है। यह नतीजा संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) द्वारा 9 अगस्त 2021 को जारी छठी आकलन रिपोर्ट “Climate Change 2021: The Physical Science Basis” में निकाला गया है। फ़िलहाल, धरती की तुलना 1850-1900 के औद्योगिक क्रांति से पहले के दौर से नहीं की जा सकती। यह वह दौर था जब जीवाश्म ईंधन जलाने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के असर के बिना जलवायु स्थिर थी।
हमने अपनी धरती को बीमार कर दिया है। हमने इसका संतुलन बिगाड़ दिया है। अब हमारी धरती को हर तरह की बीमा पॉलिसियों की ज़रूरत है, जैसे स्वास्थ्य, दुर्घटना, भविष्य की सुरक्षा वगैरह। धरती के लिए बीमा पॉलिसियाँ कौन खरीदेगा? अगर कोई अरबपति इसे खरीद भी ले, तो भी अगर धरती तबाह हो गई, तो क्या कोई बीमा का दावा करने वाला ज़िंदा बचेगा? कहने का मतलब यह है कि अगर भविष्य में धरती को बचाना है, तो इसके वर्तमान को बचाना होगा। सभी पॉलिसियाँ भविष्य के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए होनी चाहिए, ताकि हम धरती के साथ-साथ इंसानियत के भविष्य को भी बचा सकें। 
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(दैनिक, सागर दिनकर में 22.04.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, April 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवंत कहानियों का संग्रह है “उस बहार का इंतज़ार” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जीवंत कहानियों का संग्रह है  “उस बहार का इंतज़ार”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - उस बहार का इंतज़ार
लेखिका - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
मूल्य - 400/-
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उर्मिला शिरीष हिंदी कथा जगत की वे वरिष्ठ कथाकार है जिन्हें लंबी कहानियों में तारतम्य बनाए रखने की महारत हासिल है। मैंने उनके अधिकांश उपन्यास और कहानियां पढ़ी हैं। उनकी हर कहानी का कथानक अपने आसपास का होता हुआ महसूस होकर भी चौंकाता है, अनूठा लगता है। कम पात्रों के होते हुए कहानी को हजारों शब्दों में साधना आसान काम नहीं है। कई बार कहानी के प्रवाह में ढीलापन आने की संभावना रहती है और जहां ढीलापन आ जाए वहां कथानक का तारतम्य में टूट जाता है। किन्तु उर्मिला शिरीष की हर कहानी कसी हुई रहती है। कहीं कोई भटकाव नहीं, कहीं कोई शिथिलता नहीं। हर पात्र इतना जीवंत कि अपने आसपास उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है। उर्मिला जी अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जिस खूबसूरती से करती हैं वह किसी कशीदाकारी से काम नहीं है। ये सारी खूबियां उनके कहानी संग्रह ‘‘उस बहार का इंतजार’’ की कहानियों में देखी जा सकती है।
उर्मिला शिरीष के रचना कर्म में शामिल हैं उनके चौदह कहानी संग्रह, पाँच कहानी संग्रहों तथा सात अन्य पुस्तकों का सम्पादन। तीन उपन्यास। एक साक्षात्कार, एक आलोचना तथा एक जीवनी (गोविन्द मिश्र) की पुस्तक। उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, ग्यारह लम्बी कहानियाँ, चयनित कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संकलित। मेरे साक्षात्कार । देश के विभिन्न भाषाओं में उनकी कहानियों और उपन्यासों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वे हिंदी की प्रतिष्ठित कथाकार हैं।
आधुनिक हिंदी कहानियां  यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई, महानगरीय बोध, और बदलते सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दर्शाती हैं। ये कहानियां आम जनजीवन, महानगरीय एकाकीपन, स्त्री-पुरुष संबंधों में जटिलता, भ्रष्टाचार और मध्यवर्गीय चेतना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। उर्मिला शिरीष की कहानी आधुनिक हिंदी कहानी की प्रवृत्तियां का बखूबी पोषण करती हैं। उनकी कहानियों में पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, अवचेतन मन और मानसिक उलझनों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। संयुक्त परिवार का टूटना, पीढ़ीगत संघर्ष (जेनरेशन गैप) और उपभोगवादी संस्कृति का प्रभाव का विश्लेषणात्मक पक्ष उनकी कहानियों में देखा जा सकता है। सरल, सहज आम बोलचाल की भाषा उनकी कहानियां को और अधिक आकर्षक बना देती है।
‘‘उस बहार का इंतजार’’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियां हैं। हर कहानी का शेड अलग है। संग्रह की पहली कहानी ‘‘चींटियों की रेस’’ उस भ्रम को तोड़ती है कि जहां धन-दौलत है वहां खुशियां और सुकून हैं। सुकून पाने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने जरूरी होते हंै। कहानी की नायिका सुजाता ऐसे ही कठोर निर्णय के दौर से गुजरती है जिसके आगे उसकी सुख शांति का घर हो सकता है लेकिन अब तक वह जहां थी वहां उपेक्षा की अतिरिक्त और कुछ नहीं था। यह कहानी एक तलाकशुदा स्त्री की कहानी है जो यथार्थ की कई परतें खोलती है। परिस्थितियों का खुलासा, परिवार के सदस्यों का असंतुलित व्यवहार और मानसिक अंतर्द्वंद का प्रभावी चित्रण इस कहानी की विशेषता है।
दूसरी कहानी है ‘‘बिंजो माय फ्रेंड’’। ये कहानी आज के यथार्थ को पूरी मार्मिकता से बयान करती है। इस कहानी में लगभग हर दूसरे या तीसरे घर की त्रासदी मौजूद है जहां गहरे अंधेरे की भांति अकेलापन है। बच्चों के पास जाकर न बसने की ज़िद और फिर अलगाव की सीमा तक टूटती संबंधों की डोर बेजुबान पशुओं में अपनापा ढूंढने लगती है। एक निर्मम, कठोर, कड़वा सच। किसी के भी अंतर्मन को झकझोरने में सक्षम है यह कहानी।
तीसरी कहानी है ‘‘नाच, कठपुतली’’। ‘कठपुतली’ शब्द अपने आप में विवशता का प्रतीक है। न चाहते हुए भी दूसरों के अनुसार जिंदगी जीने का प्रतीक है। कभी जीवन कठपुतली की तरह नचाने लगता है तो कभी लोगों का व्यवहार, उनकी मंशा, उनकी लालसाएं दूसरों को कठपुतली बनाने के लिए प्रेरित करने लगती है, अब यह उस दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहता है कि वह कठपुतली बनना चाहता है या अपने स्वाभिमान के साथ अडिग खड़ा रहना चाहता है। कहते हैं न कि मन के हारे हार है। यह कहानी अदिति नाम की स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है जिसे परिस्थितियां कठपुतली की तरह नाचना चाहती हैं लेकिन उसके भीतर की जिजीविषा उसे न झुकने का हौसला देती है।
चौथी कहानी है ‘‘हरा पत्ता’’। यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।
संग्रह की पांचवी कहानी है ‘‘मंदिर और कुआं’’ जिसका कथानक ग्रामीण परिवेश में पंच, सरपंच, पंचायत, मंदिर, कुआं आदि से सरोकार रखता हुआ गांव में आते जा रहे परिवर्तन को भी रेखांकित करता है। परंपराओं में होने वाला परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव को भी परिवर्तित करने लगता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद एक धुनकी की भांति मनुष्य को धुनने लगता है।
‘‘पराजय का समीकरण’’, ‘पीपल का पेड़‘‘, ‘‘विदा होती बेटियों की माँ‘‘, ‘‘लड़कियों की हँसी‘‘ और ‘‘ऑनस्क्रीन‘‘ कथन को की विविधता और पात्रों की मनोदशा को सामने रखने वाली कहानी है, जिनमें संवेदना, संवेग, सौजन्यता, परंपराएं, आधुनिकता एवं मूल्य बोध के विभिन्न रंग समय हुए हैं। यह सभी कहानियां मनुष्य के चरित्र विश्लेषण का रोचक आख्यान गढ़ती हैं।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘‘उस बहार का इन्तज़ार’’। दो संस्कृतियों के बीच उसे अंतर को व्यक्त करती है जो पारस्परिक संवेदनाओं एवं पारिवारिक गठन पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं, वही पाश्चात्य संस्कृति में रिश्तों का अर्थ व्यक्तिगत इच्छाएं मात्र होती हैं। जब वही पाश्चात्य भारतीय संस्कृति के संपर्क में आता है तो उसे संबंधों की महत्ता का भान होने लगता है। स्मिथ और संहिता के रूप में लेखिका ने तो विविध संस्कृतियों के जीवन पर प्रभाव को अपने कथानक में बखूबी पिरोया है। यह कहानी मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हुई भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को भी पुनर्स्थापना देती है।
‘‘उस बहार का इंतज़ार’’ उर्मिला शिरीष
की कहानियों का वह संग्रह है जो पाठकों को उनके कथा- कौशल के और अधिक निकट ले जाने में सक्षम है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी पठनीय हैं तथा रोचकता के साथ आत्म मंथन को विवश करती हैं।
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Monday, April 20, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जो कछू सीखने होए सो जे बच्चा हरों से सीखो, जिनगी बन जैहै | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जो कछू सीखने होए सो जे बच्चा हरों से सीखो, जिनगी बन जैहै
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
 
   का आए के अभई एमपी बोर्ड 10वीं के रिजल्ट खुले रए जीमें पन्ना जिले के गुन्नौर तसील के छोटे से गांव हिनौता की बिन्ना प्रतिभा सिंह सोलंकी ने गजबई  कर दओ। ऊने 500 में 499 नंबर ला के टॉप करो। इत्ते नंबर कछू कहाऊत आएं। ऊने जा दिखा दओ के जो मन में लगन होए तो कोनऊ बी मोड़ी कछू बी कर सकत आए। तनक सोचियो के बा मोड़ी स्कूल में पढ़बे के लाने 8 किमी रोजीना बस से ग्राम गन्नौर लौं आत-जात्ती। घरे लौट के बी बा खींबई पढ़त्ती। प्रतिभा के पिताजी भारतेंद्र सिंह उतई गांव में रोजगार सहायक आएं औ मताई सरकारी स्कूल में टीचर आएं। मने मीडिल किलास फैमिली कहाई। अपनी प्रतिभा से सबई खों चौंकाबे वारी प्रतिभा आईएस बनो चाऊत आए। रामधई, राम जी ऊकी मनोकामना पूरी करें ! 
     बाकी ई दार के दसमीं बोर्ड के रिजल्ट के टापर हरों की जा खासियत रई के उनमें कोनऊं धन्ना सेठ के इते के नोंई। कोऊ किसान को मोड़ा-मोड़ी आओ तो कोऊ छोटे सरकारी करमचारी को। एक मोड़ा को बापू तो फुलकी की ठिलिया लगाऊत आए। मने कोनऊं भौतई खात-पीयत घर को नोंई। मनो, पइसा की कमी, सुविदा की कमी कछू बी इने अव्वल आबे से रोक ने सको। सो, इन ओरन से हमें कछू सीखबो चाइए। का आए के मुतके जने तनक मुस्किल आए में घबड़ान लगत आएं। उने सूझत नइयां के का करो जाए। ऐसे में बे कछू ने कछू गलत कदम उठान लगत आएं। सो, भैया औ बैन हरों मुस्किल में रै के कैसे सफलता पाई जि सकत आए, जा सीखने होए तो जे टापर बच्चा हरों से सीखो।  सई में जिनगी बन जैहै।
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