Wednesday, March 11, 2026

चर्चा प्लस | हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 

हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा?

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                               

         हाल ही में सागर में बाल साहित्य पर एक संगोष्ठी हुई जिसमें स्थानीय एवं अतिथि साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। दूसरे सत्र में बाल कविताएं भी पढ़ी गईं। यह सेमिनार कई प्रश्न जगाने में सफल रहा जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पर्याप्त बाल साहित्य लिखा जा रहा है? दूसरा प्रश्न था कि क्या एआई का युग में बाल साहित्य को प्रभावित करेगा? अर्थात हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? इस दृष्टि से सेमिनार सफल रहा कि वह विचारों को उद्वेलित कर सका, बशर्ते साहित्यकारों के मानस में यह उद्वेलन बना रहे। 

       
बाल साहित्य शोध सृजनपीठ, साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश के संभागीय मुख्यालय सागर में 06 मार्च 2026 को बाल साहित्य पर एक विमर्श एवं काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय श्यामलम संस्था का पूर्ण सहयोग रहा। विमर्श का विषय था ‘‘लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक’’। बाल साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार रखे। बाल साहित्य शोध सृजनपीठ की अध्यक्ष डाॅ मीनू पांडे ‘नयन’ ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि बाल साहित्य लिखने के लिए बाल मनोविज्ञान को जानना और समझना जरूरी है।

सेमिनार के बाद बाल साहित्य की दशा और दिशा को ले कर मेरे मन में भी मंथन चलता रहा। मुझे याद आने लगा वह समय जब मैं अपनी बाल्यावस्था में अपने नानाजी से कहानियां सुना करती थी। इतना ही नहीं मेरे घर खाना पकाने का काम करने वाली जिन्हें हम आदरपूर्वक ‘‘बऊ’’ यानी ‘मां’ कहते थे, वे भी चूल्हें में रोटियां सेंकने के दौरान ढेर सारी कहानियां सुनाया करती थीं। बाल्यावस्था में मैंने दो और लोगों से कहानियां सुनीं, एक अपने कमल सिंह मामाजी से और दूसरी अपनी दीदी वर्षा सिंह जी से। यानी मेरा बचपन कहानियों से सराबोर रहा। चारो के कथानक परस्पर बहुत भिन्न हुआ करते थे। नानाजी जो कहानियां सुनाते थे उनमें रामायण और महाभारत से निकले किस्से हुआ करते थे। उनमें कई क्षेपक कथाएं होती थीं। जैसे उन्होंने सुनाया था कि महाभारत काल के अंत समय में भीम को घमंड हो गया कि यदि उसने दुर्योंधन को नहीं मारा होता तो युद्ध कभी समाप्त नहीं होता। यानी युद्ध की विजय का सारा श्रेय उसी को है। श्रीकृष्ण उसके इस घमंड को ताड़ गए और उन्होंने पांडवों से कहा कि बहुत दिन से वन घूमने नहीं गए हैं, चलो चलते हैं। श्रीकृष्ण के साथ पांडव वन की ओर निकल पड़े। रास्ते में एक वृद्ध वानर अपनी पूंछ फैलाए लेटा हुआ था। यह देख कर भीम ने उस वानर से डपटते हुए कहा कि अपनी पूंछ हटा ले। वानर ने अपनी पूंछ हिलाई भी नहीं। इस पर भीम को क्रोध आ गया। उसने ललकारते हुए कहा कि यदि तू अपनी पूंछ नहीं हटाएगा तो मैं तेरी पूंछ काट दूंगा। तब उस वानर ने अपनी आंखें खोली और मंद स्वर में कहा कि मैं इतना बूढ़ा और अशक्त हो गया हूं कि अपनी पूंछ भी नहीं हिला पा रहा हूं। इसलिए तुम स्वयं मेरी पूंछ उठा कर एक ओर सरका दो और निकल जाओ। यह सुन कर भीम को और क्रोध आया किन्तु श्रीकृष्ण ने उसका कंधा दबा कर इशारा किया कि तुम्हीं पूंछ सरका दो। भीम ने पहले उंगली से पूंछ हटाने का प्रयास किया, वह नहीं हटी। फिर एक हाथ से प्रयास किया, मगर वह रंचमात्र नहीं सरकी। इसके बाद भीम ने अपने दोनों हाथों से अपनी पूरी शक्ति लगा कर पूंछ को सरकाने का प्रयास किया लेकिन पूंछ टस से मस नहीं हुई। तब भीम को लगा कि इसमें अवश्य कोई रहस्य है और उसने उस वानर के सम्मुख हाथ जोड़ कर पूछा की महानुभाव आप कौन हैं? इस पर वह वानर उठ खड़ा हुआ और अपने दिव्य रूप में आ कर उत्तर दिया कि मैं श्रीराम भक्त हनुमान हूं। यह सुनते ही भीम उनके चरणों में गिर गया और उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि वह गलत घमंड कर रहा था। - यह कहानी उपेदशात्मक तो थी ही साथ ही कल्पना शक्ति को बढ़ावा देने वाली भी थी। कहानी सुनते समय मैं कल्पना करती के कैसे भीम को वृद्ध वानर के रूप में हनुमान मिले होंगे? कैसे उसका घमंड चूर-चूर हुआ होगा?

बऊ की कहानियां राजा, रानियों, भूत, प्रेत आदि से भरी होती थीं। लेकिन सब की सब सुखांत और सत्य की विजय स्थापित करने वाली। एक मनुष्य भूत के सामने भी कैसे निडरता से डटा रह सकता है, उनकी कहानियों में यही नुस्खा रहता था। मामाजी की कहानियों में आदिवासी अंचलों की कहानियों की बहुलता होती थी। आदिवासियों के देवी, देवता, उनका जुझारूपन आदि उन कहानियों में रहता था। मेरी वर्षा दीदी की कहानियों में ‘‘अंधेर नगरी चैपट राजा’’ भी शामिल रहती थी, क्योंकि उन्हें कहानियां, नाटक आदि पढ़ने का भी बहुत शौक था। आज अगर मैं कहानियां या उपन्यास लिख पाती हूं तो उसके मूल में बचपन में सुनी वे कहानियां ही हैं जिन्होंने मुझे कल्पना और दृश्यात्मकता का पाठ पढ़ाया। मेरे समकालीन लगभग सभी साहित्यकारों के जीवन में यह दौर आया होगा जब उन्होंने अपने बचपन में जी भर-भर के कहानियां सुनी होंगी। कल्पना शक्ति को बढ़ाने और संस्कारित करने में चंदामामा, नंदन आदि की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। वे बाल पत्रिकाएं हमारे लिए उसी प्रकार प्रिय थीं जैसे आज छोटे बच्चों को मोबाईल पसंद है। लेकिन उन पत्रिकाओं और मोबाईल में जमीन-आसमान का अन्तर है। उनमें भटकने की गुंजाइश नहीं थी किन्तु मोबाईल में बालमन को भटकने के अनेक अवसर रहते हैं।

जब से मोबाईल ‘‘लाईफ लाइन’’ की भांति जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है तब से एक बात मैंने गौर की है कि कई युवा माताएं अपने बच्चे के मन बहलाने तथा उन्हें उलझाए रखने के लिए उनके हाथ में मोबाईल थमा देती हैं। बच्चा अधिकतर मार-काट वाले गेम्स में उलझता चला जाता है और मां को इसका अहसास ही नहीं हो पाता है। आजकल छोटे बच्चों के जिद्दी और क्रोधी स्वभाव बढ़ने का एक कारण यह भी मुझे लगता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि उनके हाथों से मोबाइल दूर कर के उन्हें चित्रों वाली किताबें, और तनिक बड़े होने पर बाल साहित्य वाली किताबें दी जाएं। क्योंकि जो बच्चे को दिया जाएगा, वह उसी के प्रति आकर्षित होगा और उसे ही पहचानेगा।

आधुनिक मांए आजकल लोरी, गीत या कहानियां कम ही सुनाती हैं, यह काम ‘‘एलेक्सा’’ को सौंप दिया जाता है जिसमें साहित्य तो होता है किन्तु स्पर्श या संवेदनात्मकता नहीं होती है। लिहाज़ा यह एक कठिन दौर है जब बाल साहित्य अपनी पुनस्र्थापना की मांग कर रहा है। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के अध्यक्ष विकास दवे जी को इसकी चिंता है किन्तु मात्र क्या उनकी चिंता करने से सबकुछ संभव हो सकेगा? साहित्यकारों को भी बाल साहित्य लिखने में ईमानदारी बरतनी होगी। मात्र कथित बाल कविताओं की तुकबंदियां कर स्वयं को बाल साहित्यकार समझ लेने वाले रचनाकार भले ही अपनी पुस्तकों की संख्या बढ़ा लें किन्तु बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य कभी नहीं दे सकते हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमेशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ की कहानियां रोचक होती हुई शिक्षाप्रद हैं। ‘‘वेताल कथाओं’ को भला कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें विक्रमादित्य वेताल को वृक्ष की शाखा से उतार कर अपने कंधे पर रखता है और वेताल अचानक सचेत हो कर राजा से कहता है कि ‘राजन, मैं तुझे एक कहानी सुना रहा हूं। इसके अंत में एक प्रश्न आएगा जिसका उत्तर यदि तूने नहीं दिया तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’ विडंबना ये कि राजा को पता है कि यदि वह बोलेगा तो वेताल फिर से पेड़ पर जा कर लटक जाएगा। अतः रोज रात को विक्रमादित्य वेताल को शाख से उतारता और उसकी कहानी के अंत के प्रश्न का उत्तर देकर उसे खो देता। इस तरह अनेक कहानियों की श्रृंखला है वह।

प्रश्न उठता है कि क्या आज बाल साहित्य का स्वरूप पहले जैसा बचा है? अथवा उसके कलेवर को समकालीन बनाए रखा जा सकता है? जब हम छोटे तो हमने जो कविताएं सुनी थीं, याद की थीं उनमें एक नन्हीं-सी कविता थी -
चल उठ,
मुंह धो,
जल भर।
आज बच्चे को इस तरह पानी भरना सिखाने की आवश्यकता लगभग नहीं है। फिर अधिकांश बच्चे अंग्रेजी स्कूलों के सुपुर्द कर दिए जाते हैं जहां वे ट्विंकल- ट्विंकल लिटिल स्टार’’ और ‘‘जैक एंड जिल’’ जैसी कविताएं सीखते हैं। यहां भी विडंबना ये कि फ्लैट्स में रहने वाले और अधिकांश समय पंखा, एसी में सोने वाले बच्चे खुले आसमान की तारों वाली रात देख ही नहीं पाते हैं। वे न तो ‘चोरखटिया’ यानी बड़ी सप्तऋषि जानते हैं और न छोटी सप्तऋषि। ध्रुव तारा आकाश में कहा स्थित होता है, उन्हें यह भी पता नहीं। न जानने के क्रम में वह कदंब का पेड़ भी है जिस पर सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्रसिद्ध कविता लिखी थी कि-
वह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।
आज शहरों से कंदब के पेड़ गायब हो चुके हैं, जो बचे हैं वे बच्चों के माता-पिता के भी संज्ञान में भी नहीं रहते हैं।

अब प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके। यहां मैं वे दो बातें कहना चाहूंगी जो मेरी मां मुझसे कहा करती थीं कि कोई भी चुनौती स्थाई नहीं होती और कोई भी चुनौती ऐसी नहीं होती जिसका कोई हल न निकाला जा सके, यदि चुनौती का सामना करने की ईमानदार मंशा हो।               
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.03.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत
संपादक - प्रो. नागेश दुबे, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन
प्रकाशक -रिसर्च इंडिया प्रेस ई-6/34 फर्स्ट फ्लोर, संगम विहार नई दिल्ली-110080
मूल्य -3500/-
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बुंदेलखंड संस्कृति का धनी है। इसके इतिहास के पन्ने इसकी संस्कृति के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्रागैतिहासिक काल में भी वह संस्कृति बुंदेलखंड में मौजूद थी जिसके मनुष्यों ने आबचंद की गुफाओं में भित्ति चित्र बना कर अपने अनुभवों एवं अपनी जीवनचर्या को आने वाली पीढ़ियों के लिए अंकित कर दिया। बुंदेलखंड में अवशेषों के रूप में मिलने वाले मृदभाण्ड, औजार एवं आभूषणों से इस अंचल में सास्कृतिक विकास की सम्पूर्ण कथा पढ़ी और जानी जा सकती है। बुंदेलखंड में कला और संस्कृति के विकास का चरम बिन्दु था खजुराहो के मंदिर एवं मूर्तियां। जहां धर्म, दर्शन, आध्यात्म, जीवन आदि सभी एकाकार हो कर बोल उठते हैं तथा तत्कालीन समाज की मानसिक विशालता से परिचित कराते हैं। बुंदेलखंड में अभी भी अनेक पक्ष ऐसे हैं जिन पर सतत शोधकार्य किया जा रहा है ताकि काल के पर्दों के पीछे छिपे हुए तथ्यों को प्रकाश में लाया जा सके। इस कार्य में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग का सबसे बड़ा योगदान है। विभाग में म्यूजियम के संस्थापक डाॅ. के.डी. बाजपेयी से ले कर वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे ने गहन शोध कार्य किए हैं तथा कराए हैं। प्रो.नागेश दुबे ने समय-समय पर सेमिनार में शोध आलेख का न सिर्फ वाचन कराया अपितु उन शोध आलेखों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करा कर उन्हें दस्तावेज में ढाल दिया जो कि भावी शोधकर्ताओं के लिए भी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ दिशानिर्देश देने का भी काम करते हैं। ऐसा ही एक शोध ग्रंथ प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है ‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’। इस शोघ ग्रंथ का संपादन किया है प्रो. नागेश दुबे तथा डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने।

प्रो. नागेश दुबे ने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से ही वर्ष 1998 में पीएच.डी. की उपाधि प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग से प्राप्त की। वे इसी विभाग में नियुक्त हुए तथा अकादमिक कार्यों के साथ ही वर्ष 2014 से निरन्तर इस विभाग में विभागाध्यक्ष पद का भी निर्वहन कर रहे हैं। इनकी विषय विशेषज्ञता प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास तथा भारतीय कला एवं स्थापत्य है। इन्होंने अनेक पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों में भी सहभगिता की है। इनकी आठ पुस्तके प्रकाशित हैं। इन्होंने सात राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल आयोजन आपके निर्देशन में करवाया है तथा सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता भी की है। इनके 60 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। इनके शोध निर्देशन में 20 शोधार्थियों ने शोधकार्य पूर्ण किया है।
वहीं, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय (उ.प्र.) से स्नातकोत्तर तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने पुरातत्त्व विषय में यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। इन्होंने संग्रहालय विज्ञान, प्रागैतिहास, शैलचित्र कला, पुरातात्त्विक उत्खनन एवं अन्वेषण में विशेषज्ञता हासिल की है। इनके द्वारा अशोकनगर जिले में विद्यमान 50 से अधिक नवीन पुरास्थलों सहित 6.6 करोड़ वर्ष पुराने जीवश्मों की भी खोज की गई। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में इनके 15 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। इनकी तीन संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, सम्मेलनों में 30 से अधिक शोध पत्र भी प्रस्तुत किए हैं। डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, शाढ़ौरा, जिला अशोकनगर, मध्य प्रदेश में इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक (अतिथि विद्वान) के रूप में कार्यरत हैं।

‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’ पुस्तक के सह-सम्पादक हैं डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. सुरेन्द्र कुमार यादव, डॉ. मशकूर अहमद कादरी, डॉ. शिव कुमार पारोचे तथा मो. आदिल खान।
जब विषय विशेषज्ञ अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं तथा विषय विशेषज्ञों की एक पूरी टीम उसका संपादन करती है तो ऐसी शोधात्मक पुस्तक की अर्थवत्ता, गुणवत्ता एवं सामग्री विषयक विश्वसनीयता स्वयं सिद्ध रहती है। इस शोध्रगंथ रूपी पुस्तक में बुंदेलखंड की संस्कृति के विविध पक्षों पर शोघात्मक सामग्री सहेजी गई है। पुस्तक में कुल 34 आलेख हैं जिनमें कई आलेखों के साथ छायाचित्र भी प्रस्तुत किए गए हैं। इन लेखों में इतिहास एवं पुरातत्व से ले कर भूगोल तक, खानपान से ले कर आस्था एवं संगीत तक हर पक्ष को सामने रखा गया है। विशेष यह कि जब इतिहास एवं पुरात्तव बात करते हैं तो साक्ष्य सहित बात करते हैं। प्रो. नागेश दुबे ने ‘‘प्राक्कथन’’ में लिखा है कि ‘‘बुन्देलखण्ड का भू-भाग आदिकाल से ही अपने अंचल में विभिन्न युगों की सांस्कृतिक विरासत को संजोये रहा है। इस क्षेत्र में विभित्र संस्कृतियाँ पुष्पित और पल्लिवित हुई। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों को उद्घाटित करने के लिये भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली की वित्तीय सहायता से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित पुरातत्व संग्रहालय में 17-18 फरवरी, 2022 में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। जिसमें बुंदेलखंड के सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों, साहित्यिक परम्परा, कला-स्थापत्य, समाज, धर्म, पर्यटन, आदि विविध पक्षों पर केन्द्रित शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। इस ग्रंथ में बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को उदघाटित करने वाले शोधपत्रों को सम्मिलित किया गया है।’’

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि मैं भी भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर की ‘‘गोल्ड मेडलिस्ट’’ विद्यार्थी रही हूं तथा यही से मैंने ‘‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। मेरा भी एक शोधपत्र इस पुस्तक में शामिल है। यद्यपि सतत अकादमिक रूप से मैं कभी विभाग से जुड़ी नहीं रही किन्तु समय-समय पर अपने शोधपत्र वाचन करने तथा विषय विशेषज्ञ के रूप में सेमिनारों में मुझे विभाग ने शामिल किया है। इसीलिए मैं विभाग द्वारा किए जाने वाले शोध कार्यों की गंभीरता से भली-भांति परिचित भी हूं और इसीलिए इस पुस्तक पर आधिकारिक तौर पर कोई भी समीक्षात्मक टिप्पणी करने के योग्य स्वयं को अनुभव करती हूं। 

पुस्तक में जो आलेख हैं उनकी गुणवत्ता एवं श्रेष्ठता निःसंदेह स्वीकार्य है। जैसाकि मैंने पूर्व में भी लिखा कि यह पुस्तक भावी शोधकर्ताओं को एक ऐसी ज़मीन देती है जिस पर खड़े हो कर वे इन पर पुनर्शोध एवं इससे आगे का कार्य कर सकते हैं। यूं भी इतिहास एवं पुरातत्व नवीन दृष्टिकोण से बार-बार शोध कार्य की मांग करते हैं। इस पुस्तक में जो 34 लेख हैं वे इस प्रकार हैं-   1.बुन्देलखण्ड के संग्रहालयों में प्रदर्शित बुन्देलखण्ड की साँस्कृतिक विरासत - प्रो. नागेश दुबे 2. सागर की सांस्कृतिक विरासत एवं पर्यटन की संभावनायें - डॉ. बी.के. श्रीवास्तव 3. बुंदेलखण्ड की संस्कृति प्राचीन हिंदी साहित्य के आइने में - प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी 4. बुंदेलखण्ड में प्रभु श्रीराम - डॉ. कृष्ण कुमार त्रिपाठी 5. मढ़-बमोरा के प्राचीन मंदिर परिसर से ज्ञात सदाशिव प्रतिमा - प्रो. आलोक श्रोत्रिय, डॉ. मोहनलाल चढ़ार 6. खजुराहो की मूर्तिकला में दशावतार का अंकन - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 7. दमोह जिला. मध्य प्रदेश की विशिष्ट नटराज प्रतिमाएं प्रतिमाशास्त्रीय अवलोकन - डॉ० सुरेन्द्र कुमार यादव 8. चन्देल काल में शाक्त एवं अन्य सम्प्रदाय - डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह 9. बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति के विविध पक्ष (व्रत, पर्व एवं उत्सव के विशेष सन्दर्भ में) - डॉ. विश्वजीत सिंह परमार 10. सागर संभाग के संग्रहालयों में प्रदर्शित विष्णु की गरूड़ासीन प्रतिमाएँ: एक अध्ययन - डॉ. शिवकुमार पारोचे 11. खानपुर (सागर) के शैलचित्रों का सांस्कृतिक अनुक्रम - डॉ. मशकूर अहमद कादरी 12. एरण से प्राप्त नवीन सती स्तम्भ - डॉ. मोहन लाल चढ़ार 13. मध्यप्रदेशीय बुन्देलखण्ड में जैन संस्कृति की निरन्तरता के अभिलेखीय प्रमाण - डॉ. जिनेन्द्र कुमार जैन 14. सागर जिले के धार्मिक पर्यटन स्थल - डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन 15. रहली अंचल का प्राचीन शैव मूर्तिशिल्प एक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन - डॉ. गोविन्द सिंह दांगी 16. सागर क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्र -डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ल 17. सागर संभाग की शिव प्रतिमाओं से सम्बद्ध सांस्कृतिक तत्व - राज बहादुर क्षत्री 18. सागर एवं दमोह का संस्कृत साहित्य - डॉ. नौनिहाल गौतम 19. बुन्देलखण्ड की लोकगाथाएँ (दिमान हरदौलजी एवं कारसदेवजी के विशेष सन्दर्भ में) - श्रीमती दीपशिखा सिंह परमार 20. लोक गीतों में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष बुंदेली लोक गीतों के विशेष संदर्भ में - डॉ. अखिल कुमार गुप्ता 21. बुन्देलखण्ड का स्थापत्य शिल्प (मन्दिर, मठ, दुर्ग एवं गढ़ी) -डॉ. अर्चना द्विवेदी 22. सागर जिला पुरातत्त्व संग्रहालय में प्रदर्शित देवी गंगा की प्रतिमाएँ - डॉ. मनीषा तिवारी 23. थूबोन (जिला अशोकनगर) की प्रमुख गणेश प्रतिमाएँ - कीरत अहिरवार 24. खजुराहो की कला में यक्ष प्रतिमाओं का अंकन एवं मान्यताएँ - डॉ आशीष कुमार चाचोंदिया 25. दोनी (जिला-छतरपुर) के प्राचीन मंदिर - डॉ. रमेश कुमार अहिरवार 26. रानी दमयंती की नगरी का पुरा वैभव - डॉ. सुरेन्द्र कुमार चैरसिया 27. बुन्देलखण्ड अंचल की सांस्कृतिक विरासत - डॉ. दीपक कुमार 28. बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में लोकउत्सव एंव मेले - निधि सोनी 29. बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत में लोक नृत्य -अंजली पाण्डेय 30. बुन्देलखण्ड के संगीत में ताल वाद्य परंपरा - डॉ. राहुल स्वर्णकार 31. दमोह जिले का प्रमुख कला केन्द्र नोहटा - डॉ. वन्दना गुप्ता 32. बुंदेली कला, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव के प्रचार प्रसार में जनमाध्यमों की भूमिका - डॉ. अलीम अहमद खान 33. बुन्देलखण्ड की पुरा सम्पदा का सर्वेक्षण एवं राजनीतिक परिदृश्य - डॉ. रणवीर सिंह ठाकुर तथा 34. सेटपीटर्स चर्च सागर: एन एक्जाम्पल ऑफ कोलोनियल आर्कीटेक्चर।

   इस प्रकार देखा जाए तो बुंदेलखंड के लगभग प्रत्येक कालखंड को तथा प्रत्येक सांस्कृतिक पक्ष को इस पुस्तक में संग्रहीत किया गया है जिससे पुस्तक का कलेवर समृद्ध एवं सुरुचिपूर्ण है। प्रो. नागेश दुबे एवं डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने इस महत्वपूर्ण प्रकाशन के लिए साधुवाद के पात्र हैं। अकादमिक प्लेटफार्म के साथ विशेषज्ञों की मुहर किसी भी पुस्तक को एथेंटिक एवं बहुउपयोगी बना देती है। उस पर विशेषता यह है कि सभी आलेख सहज एवं सरल भाषा में हैं तथा संदर्भ सूचियों से परिपूर्ण हैं। शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों के साथ ही बुंदेलखंड को समग्रता से जानने के इच्छुक आम पाठकों के लिए भी यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।        
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Sunday, March 8, 2026

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 पर आपके शहर की प्रबुद्ध बहनों के साथ डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ये तस्वीरें जिनमें मैं कल अपनी बहनों के साथ रही, पत्रिका टॉकशो के दौरान ❤️....
🚩 और  आकाशवाणी केंद्र सागर में कवयित्री गोष्ठी के सिलसिले में साथ-साथ...
🙋 यद्यपि ये सभी तस्वीरें 'ऑफ द रिकॉर्ड' हैं 😀🌻🌹
❤️👭 We will always be together like this👭❤️

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"मातृशक्ति के नव स्वर, मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं" में डॉ (सुश्री) शरद सिंह, राजनीति वाला पोस्ट

"राजनीति वाला पोस्ट" में "मातृशक्ति के नव स्वर, मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं" शीर्षक से डॉ ब्रह्मदीप आलूने के लेख में  स्वयं के बारे में देखकर अत्यंत सुखद लगा।
    👇इसे आप विस्तार से पढ़ सकते हैं इस लिंक पर👇
🙏 हार्दिक धन्यवाद डॉ ब्रह्मदीप आलूने एवं  राजनीति वाला पोस्ट  🙏
🙏 हार्दिक आभार भाई पंकज सोनी जी 🙏
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दैनिक भास्कर द्वारा चुनी गईं सागर शहर की विशिष्ट महिलाओं में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🌹🙏🌹
अभीभूत हूं मेरी लेखनी के प्रति इस विश्वास के लिए...
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सुरक्षित सफर के लिए पिंक टैक्सी चलाई जाए - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पत्रिका द्वारा आयोजित टॉक शो में

🌹 हार्दिक आभार 'पत्रिका' महिलाओं की समस्याओं और उनकी आवाज़ को मुखर करने का अवसर देने के लिए 🙏🙋
🌹 हार्दिक धन्यवाद पत्रिका की प्रखर पत्रकार प्रिय रेशु जैन ❤️
🌹 जी हां, राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण 'पत्रिका' द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष टॉक शो का आयोजन किया गया, जिसमें मेरे सहित शहर के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न प्रबुद्ध महिलाओं ने अपने विचार रखें....
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आकाशवाणी सागर की कवयित्री गोष्ठी का संचालन एवं काव्य पाठ डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा

8 मार्च राष्ट्रीय महिला दिवस पर आकाशवाणी सागर द्वारा आयोजित कवि गोष्ठी का सुबह 9:00 बजे प्रसारण किया गया। इस गोष्ठी का संचालन मैंने किया था तथा इसमें मैंने अपनी काव्य रचनाएं भी सुनाई थी ...
🙋हार्दिक आभार श्री दीपक निषाद जी, केंद्र निदेशक आकाशवाणी सागर का 🚩 🙏🚩
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