Thursday, April 16, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह प्रलेस की संगोष्ठी में

विगत 12.04.26 को प्रगतिशील लेखक संघ (मकरोनिया) की गोष्ठी हुई जिसमें प्रथम सत्र में वर्तमान युद्ध की स्थिति पर गहन चर्चा हुई तथा द्वितीय सत्र में काव्यपाठ किया गया। संचालन भाई सतीश पांडे जी ने तथा आभार प्रदर्शन प्रलेस के प्रदेश सचिव भाई पेट्रिस फुसकेले ने किया।
कुछ तस्वीरें, सौजन्य भाई मुकेश तिवारी जी ....
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Wednesday, April 15, 2026

चर्चा प्लस | स्त्री अधिकारों के प्रबल समर्थक डाॅ. अम्बेडकर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
स्त्री अधिकारों के प्रबल समर्थक डाॅ. अम्बेडकर          
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                 
       
डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल विधेयक को विखंडित करके लागू किए जाने के विरोध में नेहरू मंत्रिमण्डल से अपना त्यागपत्र दे दिया था। अंततः सरकार को हिन्दू कोड बिल विधेयक पास करना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के रूप में महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। डाॅ. अंबेडकर मुस्लिम स्त्रियों को भी गुलामों जैसी दशा से मुक्त कराना चाहते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों को भी अपनी स्त्रियों की दशा सुधारने के बारे में विचार करना चाहिए।


आमतौर पर यही मान लिया जाता है कि बाबासाहेब अंबेडकर समाज के दलित वर्ग के उद्धार के संबंध में क्रियाशील रहे। अतः उन्होंने दलित वर्ग की स्त्रियों के विषय में ही चिन्तन किया होगा। किन्तु उनकी सोच संकृचित नहीं थी। डाॅ अंबेडकर राष्ट्र को एक नया स्वरूप देना चाहते थे। एक ऐसा स्वरूप जिसमें किसी भी व्यक्ति को दलित जीवन न जीना पड़े। डाॅ. अंबेडकर की दृष्टि में वे सभी भारतीय स्त्रियां दलित श्रेणी में थीं जो दूषित सामाजिक नियमों एवं परंपराओं के कारण अपने अधिकारों से वंचित थीं। वे समाज के हर वर्ग की स्त्रियों को अधिकार दिलाना चाहते थे। वे जानते थे कि यदि समाज को सुधारना है तो स़्ियों की स्थिति को भी सुधारना होगा।
बाबासाहेब डाॅ. अंबेडकर यह भली-भांति समझ गए थे कि जब तक स्त्रियों का ध्यान शिक्षा की ओर नहीं जाएगा तथा वे आत्मसम्मान को नहीं जानेंगी तब तक स्त्रियों का उद्धार संभव नहीं है। वे स्त्रियों को शिक्षा के महत्व से परिचित कराते थे। उन्होंने शिक्षा के साथ ही जीवन की उन बुनियादी बातों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया जिन पर आमतौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। वे जहां भी, जो भी समझाते, एकदम स्पष्ट शब्दों में, जिससे उनकी कही हुई बातों का स्त्रियां सुगमता से समझ जातीं और आत्मसात करतीं। डाॅ. अंबेडकर ने महाड में चर्मकार समुदाय की स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ‘‘साफ-सुथरा जीवन व्यतीत करो। इसकी कभी चिंता न करो कि तुम्हारे वस्त्र फटे-पुराने हैं। यह ध्यान रखो कि वे साफ हैं। आपके वस्त्र की स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता और न ही कोई तुम्हें जेवरात के चुनाव से रोक सकता है। अपने मन को स्वच्छ बनाने का ध्यान रखो और आत्म सहायता की भावना अपने में पैदा करो।’’
बाबा साहब जानते थे कि स्त्रियों को सबसे अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है जब उनके पति या पुत्र शराबी होते हैं। वे रोज रात को घर पहुंचने पर अपनी पत्नी के साथ मारपीट करते हैं और उनसे घरखर्च के पैसे भी छीन लेते हैं। स्त्रियां चुपचाप सबकुछ सहती रहती हैं। अतः महाड की सभा में डाॅ. अंबेडकर ने यह भी कहा था कि ‘‘तुम्हारे पति और पुत्र शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो। अपने बच्चों को स्कूल भेजो। स्त्री-शिक्षा उतनी ही आवश्यक है जितनी कि पुरुष शिक्षा।’’ 
डाॅ. अंबेडकर जिन दिनों जनजागरण अभियान के अंतर्गत मध्यप्रदेश, मुंबई और मद्रास (अब चेन्नई) का तूफानी दौरा कर रहे थे, उन दिनों उन्होंने मालाबार में दलित समुदाय की स्त्रियों को उन्होंने अपने भाषण के द्वारा समझाया कि ‘‘तुम्हारे गांव में ब्राह्मण चाहे कितना भी निर्धन क्यों न हो अपने बच्चों को पढ़ाता है। उसका लड़का पढ़ते-पढ़ते डिप्टी कलेक्टर बन जाता है। तुम ऐसा क्यों नहीं करतीं? तुम अपने बच्चों को पढ़ने क्यों नहीं भेजतीं? क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारे बच्चे सदैव मृत पशुओं का मांस खाते रहें? दूसरों का जूठन बटोर कर चाटते रहे?’’
19 जुलाई 1942 को नागपुर में सम्पन्न हुई ‘दलित वर्ग परिषद्’ की सभा में उपस्थित हजारों स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए डाॅ. अंबेडकर ने कहा था,‘‘नारी जगत् की प्रगति जिस अनुपात में हुई होगी, उसी मानदण्ड से मैं उस समाज की प्रगति को अंाकता हूं।’’
नागपुर सभा में ही डाॅ. अंबेडकर ने ग़रीबीरेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था कि ‘आप सफ़ाई से रहना सीखो, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह की जल्दी मत करो और अधिक संताने पैदा मत करो। पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति के कार्य में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए। लेकिन यदि पति गुलाम के रूप में बर्ताव करे तो उसका खुल कर विरोध करो, उसकी बुरी आदतों का खुल कर विरोध करना चाहिए और समानता का आग्रह करना चाहिए।’
डाॅ. अंबेडकर के इन विचारों को कितना आत्मसात किया गया इसके अंाकड़े घरेलू हिंसा के दर्ज़ अंाकड़ें ही बयान कर देते हैं। जो दर्ज़ नहीं होते हैं ऐसे भी हजारों मामले हैं। सच तो यह है कि स्त्रियों के प्रति डाॅ. अंबेडकर के विचारों को हमने भली-भांति समझा ही नहीं। उनके मानवतावादी विचारों के उन पहलुओं को लगभग अनदेखा कर दिया जो भारतीय समाज का ढांचा बदलने की क्षमता रखते हैं। जिन चैराहों पर डाॅ. अंबेडकर की प्रतिमा पूरे सम्मान के साथ लगाई गई उनके आस-पास बसी बस्तियों में गंदगी के अंबार को वहंा के निवासी ही दूर नहीं कर पाते हैं। गरीबीरेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों में बच्चों की संख्या के विषय में कोई रोक-टोक नहीं है। अधिक हुआ तो ‘‘जितने हाथ-उतना काम’’ वाला मुहावरा ओढ़ लेते हैं। स्त्री-पुरुष की जिस समानता की कल्पना डाॅ. अंबेडकर ने की थी वह भी बहुसंख्यक परिवारों में आज भी नहीं है। पुरुष घर का मुखिया है, स्त्री को बराबरी का आर्थिक अधिकार भी नहीं है, भले ही वह कमाऊ स्त्री हो।
वे रुढ़िवादियों से इन प्रश्नों के तार्किक उत्तर पूछते थे कि क्यों स्त्रियों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जाए? इस प्रश्न का सटीक एवं तार्किक उत्तर किसी के पास नहीं था।
हिन्दू समाज में ही नहीं अपितु भारतीय समाज के सभी वर्गों की स्त्रियों की दशा सुधारने की दिशा में डाॅ. अंबेडकर ने ध्यान दिया। वे मुस्लिम समाज में स्त्रियों की पिछड़ी दशा के प्रति भी चिन्तित थे। अंबेडकर ने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुव्र्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा, ‘‘बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किए जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। हालांकि कुरान में वर्णित ग़ुलामों के साथ उचित और मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसा योग्य हैं लेकिन, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। यदि गुलामी खत्म भी हो जाए पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जाएगी।’’
डाॅ. अंबेडकर मुस्लिम स्त्रियों को गुलामों जैसी दशा से मुक्त कराना चाहते थे। उन्होंने अपने लेखों में मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है। अतः भारतीय मुसलमानों को भी अपनी स्त्रियों की दशा सुधारने के बारे में विचार करना चाहिए। आगे चल कर डाॅ. अंबेडकर के इन सकारात्मक विचारों का मुस्लिम समाज सुधारकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डाॅ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में एक समिति की स्थापना की गई। डाॅ. अंबेडकर स्त्री-पुरुष समानता के अग्रदूत थे। वे स्त्रियों विकास में बाधा के लिए धर्म व जाति प्रथा को दोषी मानते थे। वे जानते थे इन बाधाओं को संवैधानिक ढंक से ही दूर किया जा सकता है। उन्होंने जाति-धर्म व लिंग निरपेक्ष संविधान में उन्होंने सामाजिक न्याय की पकिल्पना की। हिन्दू कोड बिल के जरिए उन्होंने  संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य किया। डा. अंबेडकर  ने महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्रदान कर उनकी राजनैतिक अधिकारों की। हिन्दू समाज के लिए कोई पर्सनल लाॅ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह, उतराधिकार, दत्तक, निर्भरता या गुजारा भत्ता  आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष पर कोई सीमा नहीं थी। विधवा को मृत पति के संपत्ति  पर अधिकार नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परंपरा नहीं थी। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रख कर हिन्दू कोड बिल तैयार किया गया जिसमें में हिन्दू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, गोद लेना (दत्तक  ग्रहण) अधिनियम,  हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण उतराधिकारी अधिनियम, हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि का प्रवधान था। डाॅ. अंबेडकर ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विरोध की लहर दौड़ गई। धार्मिक कट्टरपंथियों से लेकर आर्यसमाजी तक डाॅ. अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद में भी इस बिल का विरोध किया गया और सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। किन्तु डाॅ. अंबेडकर अडिग रहे। उनका कहना था कि-‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।’’
डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल विधेयक को विखंडित करके लागू किए जाने के विरोध में नेहरू मंत्रिमण्डल से अपना त्यागपत्र भी दे दिया था। अंततः सरकार को हिन्दू कोड बिल विधेयक पास करना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के के रूप में महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है।  न्यायशास्त्र की दृष्टि से ‘‘रामायण’’ का विश्लेषण करते हुए किन्तु डाॅ. अंबेडकर ने कहा कि ‘‘अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।’’ उनके ऐसे शब्द श्रीराम के विरोध में नहीं बल्कि स्त्रियों के प्रति उनकी तीव्र मानवीयता की ओर संकेत करते हैं जो तत्कालीन सामाजिक दुरावस्थाओं से पीड़ित थीं। वस्तुतः डाॅ अंबेडकर स्त्री-अधिकारों के प्रबल पक्षधर थे।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 15.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, April 14, 2026

पुस्तक समीक्षा | जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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विशेषांक - समय के साखी (जेंडर डिस्कोर्स पर केंद्रित)
संपादक - आरतीे
प्रकाशक - संपादकीय कार्यालय, 701, अन्नपूर्णा परिसर, पीएण्डटी चौराहा के पास, भोपाल (म.प्र.) 462003
मूल्य - 300/-
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         आरती जी के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका “समय के साखी” का 57 वां अंक सागर के वरिष्ठ कवि वीरेंद्र प्रधान जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ। वस्तुतः यह अंक सामान्य अंक न होकर विशेषांक है और वह भी जेंडर डिस्कोर्स पर। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सभी को गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से अब, जब जेंडर को लेकर नए अधिनियम आकार ले रहे हैं। वीरेंद्र प्रधान जी ने “समय के साखी” पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक इस आग्रह के साथ दिया कि मैं इस विशेषांक के संबंध में कुछ समीक्षात्मक लिखूं। चूंकि जब मैं सामयिक प्रकाशन की साहित्यिक पत्रिका “साहित्य सरस्वती’’ (नई दिल्ली) की कार्यकारी संपादक थी तब पत्रिका के संपादक महेश भारद्वाज जी के निर्देशन में थर्ड जेंडर विमर्श विशेषांक प्रकाशित किया गया था। बाद में विशेषांक की सामग्री के अलावा कुछ और विद्वानों से लेख आमंत्रित करके कलेवर को “थर्ड जेंडर विमर्श” पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। ताकि शोधार्थियों एवं जेंडर डिस्कोर्स में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष एवं तार्किक जानकारी एक ही ज़िल्द में उपलब्ध हो सके। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है तो मेरा लेखन एवं सामयिक प्रकाशन का मुख्य प्रकाशन स्त्री विमर्श पर ही केंद्रित रहा है। इसलिए ‘‘समय के साखी’’ पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक मेरे लिए दिलचस्प का विषय था। फिर भाई वीरेंद्र प्रधान जी का आग्रह भी था। परिणामतः मैंने विशेषांक को एकाग्रचित्त हो कर आद्योपांत पढ़ा। विशेषांक में स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श दोनों मौजूद हैं। मुझे भी लगा कि इस पर अवश्य लिखा जाना चाहिए।
   दिलचस्प बात यह है की ट्रांसजेंडर को लेकर विगत दिनों अधिनियम 2026 पर बड़ा बवाल मचा। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, 2019 के कानून को बदलकर पहचान के लिए स्व-घोषणा की जगह मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य किय गया है। इस प्रस्तावित बदलाव का ट्रांसजेंडर समुदाय विरोध कर रहा है क्योंकि उनका मानना है कि यह आत्म-निर्णय के अधिकार को सीमित करता है। यह बिल 13 मार्च 2026 को पेश किया गया था। यह कानून 2014 के ‘‘नालसा’’ (नेशनल लीगल सर्विसेस अथरिटी) फैसले का उल्लंघन माना जा रहा है, जिसने पहचान के स्व-निर्धारण को मान्यता दी थी। समुदाय द्वारा ‘‘काला कानून’’ कह कर इसे आत्म-सम्मान के खिलाफ भी कहा गया। वही दूसरा विषय है स्त्रियों के अधिकारों का ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ (106वां संवैधानिक संशोधन) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लागू किया जाना है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इस कानून का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से मिलना शुरू हो सकता है। यह कितने प्रतिशत महिलाओं को सशक्त बना सकेगा यह तो भविष्य ही बताएगा किंतु इससे महिलाओं की सभी सहभागिता राजनीति में बढ़ेगी।
    स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श यह दोनों विषय विशेषांक में शामिल हैं। इन पर विद्वानों ने अपनी अपनी राय दी है। देखा जाए तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिला जनसंख्या लगभग 58.64 करोड़ (कुल जनसंख्या का 48.5 प्रतिशत) थी। 2021 में 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों 985 पाया गया है। वहीं, सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आधिकारिक संख्या 4.88 लाख थी। हालांकि, कार्यकर्ता और विभिन्न अनुमान बताते हैं कि सामाजिक कलंक और पहचान के मुद्दों के कारण वास्तविक संख्या इससे 6-7 गुना अधिक हो सकती है। सटीक सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
विशेषांक में समाज में जेंडर के अनुपात, उनकी स्थितियों एवं उनके जीवन की प्रगति की संभावनाओं पर विचार किया गया है। जो आलेख इसमें शामिल किए गए हैं वे हैं- बंदीगृह की औरतें और खामोशी का विमर्श- प्रज्ञा जोशी, जिंदा कौमों की मुर्दा दास्तान- नाइश हसन, वे बहादुर स्त्रियाँ- हिन्दी कहानी में घुमंतू समुदाय, स्त्री और पुलिस- रमाशंकर सिंह,  ट्रांसजेंडर और समाज मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत- अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’, दलित स्त्री का ‘अन्य’ आत्मकथा-संदर्भ- डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, इकोफेमिनिज्म: स्त्री और प्रकृति का पक्षधर-सुरेश तोमर, राष्ट्रवादी उन्माद के दौर में मुस्लिम स्त्री - समीना खान, संघर्ष से कामयाबी तक का लंबा सफर- सुमित पी.वी., पितृसत्ता: विचारधारा-आलोचना के नए आयाम- ईश्वर सिंह दोस्त, समकालीन भारतीय स्त्री आंदोलन- अवंतिका शुक्ला।
आलेखों के साथ ही दो वर्ताएं -‘‘बातचीत-एक’’ तथा ‘‘बातचीत-दो’’ हैं। जिनमें ‘‘बातचीत-एक’’ में सविता सिंह, सीमा आजाद, रेखा सेठी, रेखा कस्तवार, संजीव चंदन के विचार हैं तथा ‘‘बातचीत-दो’’ में वंदना चौबे, जितेन्द्र विसारिया, अनुपम सिंह एवं नेहा नरूका के विचार हैं। 
‘‘लेखा-जोखा’’ के अंतर्गत ‘‘कुछ पहाड़ लाँधे हैं, अभी बाकी हैं बहुत....’’ शीर्षक से सुधा अरोड़ा के ज़मीनी विचार हैं। इसके साथ ही ‘‘प्रसंग: आलोचना’’ के अंतर्गत माया मिश्र ने लिखा है ‘‘स्त्री रचनात्मकता: किताबों के आलोक में’’।
लेखक रामशंकर सिंह का यह कथन ध्यान देने योग्य है-‘‘पितृसत्तात्मक परिवारों में महिलाओं को अपना ताबेदार बनाया और इस ताबेदारी को लिखने की प्रक्रिया से और ताकत मिली। सब कुछ लिख दिया गया- कौन स्वामी, कौन सेवक, किसको किस जगह पर रखा जाना है- यह सब लिखा गया। उन समाजों में जहाँ लेखन कला नहीं थी, वहाँ ‘परम्परा के भीतर’ स्त्रियों की ताबेदारी को सुरक्षित रखा गया। यह अनायास नहीं था कि मानवविज्ञानी लेवी स्ट्रॉस को कहना पड़ा कि एक केंद्रीकृत, पदानुक्रमित राज्य अपने आपको पुनरुत्पादित करने के लिए लेखन कला का प्रयोग करता है...। लेखन एक अजीब चीज है...। एकमात्र घटना जो इसके साथ हमेशा जुड़ी रही है, वह है शहरों और साम्राज्यों का निर्माण राजनीतिक व्यवस्था में एकीकरण, अर्थात् बड़ी संख्या में व्यक्तियों का जातियों और वर्गों के पदानुक्रम में एकीकरण। यह मानवजाति के ज्ञानोदय की अपेक्षा शोषण को ही बढ़ावा देने के लिए प्रतीत होता है।’ वास्तव में पहले परम्परा और बाद में लिखित संहिताओं में स्त्रियों के लिए ताबेदारी की इबारतें तैयार की गई। इसे आप अनुभवमूलक तरीके से उस समय लक्षित कर सकते हैं, जब कहा जाता है कि ‘ऐसा हमारे ग्रंथों में कहा गया है’ ‘हमारी परम्परा में ऐसा है’ या ‘हमारे यहाँ तो ऐसा था।’ इन सारे तर्कों में लेखन कला, समाज का वर्चस्वशाली सांस्कृतिक तंत्र और राज्य भूमिका निभाते हैं।’’
सक्रिय समाजसेवी, लेखिका एवं स्त्री अधिकारों की पैरोकार सुधा आरोड़ा ने स्त्रीमुक्ति - ‘‘कुछ भ्रांतियाँ और सुझाव’’ शीर्षक से स्त्री विमर्श के स्वरूप की बारीकी से व्याख्या की है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘स्त्री विमर्श दरअसल पितृसत्ता, सम्पत्ति में भागीदारी और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों की बराबरी और सम्मान का मुद्दा है। भारत में स्त्री का अस्तित्ववादी संघर्ष बहुत पुराना है। बौद्धकाल से लेकर वैदिक काल और मध्यकाल तक इसके अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा, लोपा, अनेक थेरियों सहित सारन्धा, अहिल्याबाई से लेकर रजिया सुल्तान तक हम एक परंपरा देख सकते हैं कि स्त्रियों ने सोच और सत्ता दोनों ही स्तरों पर संघर्ष किया। मीराबाई, अक्क महादेवी, ललद्यद, जनाबाई और बहिणा बाई दर्जनों नाम हैं। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में इन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्नों को जोड़कर स्त्री मुक्ति का एक वृहद पाठ तैयार नहीं किया जा सका इसलिये लिंगभेद के खिलाफ भारत में संघर्ष की परंपरा को बल न मिल सका।’’  सुधा आरोड़ा ने आगे लिखा है कि ‘‘स्त्रियों में बदलाव आया पर इस बदलाव के लिये हमारा समाज तैयार नहीं है। उन्होंने घर की चहारदीवारी के साथ अर्थ उपार्जन में भी हाथ बंटाया पर यह दोहरी जिम्मेदारी भी उसे अपना सम्मान दिलाने में नाकाम रही। दिक्कत यह है कि स्त्री की दशा में सुधार, समाज और पुरुषों की मानसिकता को बदले बिना नहीं हो सकता और समाज पुरुषसत्तात्मक है और आंदोलनकारी स्त्रियों की जमात को पीछे धकेलने में पुरुषों का ही नहीं, पुरुष सोच वाली महिलाओं का भी बहुत बड़ा हाथ है। यह एक अलग मुद्दा है।’’
ट्रांसजेंडर की जब बात आती है तो भारत के प्ररिप्रेक्ष्य में वह और अधिक जटिल हो जाती है। सच तो ये है कि आज भी यहां लोग ट्रांसजेंडर की जैविक विविधता को नहीं जानते और समझते हैं। उनके लिए एक ट्रांसजेंडर मात्र ट्रांसजेंडर होता है, नाच-गा कर नेग के पैसे मांगने वाला समुदाय। इस संदर्भ में अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ का लेख ‘‘ट्रांसजेंडर और समाज: मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत’’ बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ट्रांस जेंडर शब्द को लेकर समाज के आम लोग अक्सर भ्रम की स्तिथि में होते हैं। वे ट्रांस जेंडर केवल उन्हें समझते हैं जो किन्नर के रूप में नाच-गाकर बधाई माँगने का काम करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ट्रांस जेंडर में वे सभी व्यक्ति आते हैं जिनका जन्म से प्राप्त लिंग उनके मनोवैज्ञानिक लिंग अर्थात जेंडर से मेल नहीं खाता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ लेकिन वह व्यक्ति जेंडर से खुद को एक स्त्री महसूस करता है या एक स्त्री शरीर में जन्मा व्यक्ति खुद को पुरुष अनुभव करता है। अर्थात जिन व्यक्तियों की लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती ऐसे सभी व्यक्ति ट्रांस जेंडर होते हैं। ट्रांस जेंडर में अलग अलग श्रेणियों के लोग सम्मिलित हैं।’’ उन्होंने ट्रांस महिला, ट्रांस पुरुष, इंटर सेक्स, ट्रांस सेक्सुअल  में बायोलाॅजिकल अंतर बताते हुए ‘‘हिजड़ा या किन्नर’’ को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘हिजड़ा शब्द अरबी भाषा के हिज से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विछोह, विरह या छोड़ देना। वैसे हिजड़ा या किन्नर अपने आप मे कोई जेंडर नहीं। यह एक गुरु-शिष्य आधारित परम्परा है। जो परंपरा सदियों पुरानी है। वर्तमान में यह परम्परा भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बंग्लादेश में है, इस परम्परा को केवल ट्रांस महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं।’’
यहां उल्लेखनीय है कि अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ स्वयं ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं। उन्होंने एमकॉम, एमए (भारतीय शास्त्रीय संगीत में) जबलपुर से किया है। वे कई वर्षों तक किन्नर डेरे में रहीं। 2007 में डेरा छोड़ कर ट्रांस जेंडर अधिकारों पर एक कार्यकर्ता के रूप में में काम की शुरुआत की। 2011 में ‘‘अस्मान फाउंडेशन’’ नाम से समुदाय आधारित संगठन की स्थापना की जो वर्तमान में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर कार्य कर रहा है। वे सामाजिक न्याय विभाग द्वारा गठित जिला किन्नर कल्याण बोर्ड में समुदाय की प्रतिनिधि सदस्य भी हैं। उन्होंने कविताएं एवं ग़ज़लें भी लिखी हैं। देखा जाए तो वे अपने समुदाय की एक बौद्धिक प्रतिनिधि हैं। इस विशेषांक में उनका लेख ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति को आधिकारिक रूप से सामने रखता है।
जैसाकि ‘‘समय के साखी’’ की संपादक आरती ने लिखा है-‘‘विशेषांक में बातचीत के दो भाग वरिष्ठ और युवा साथियों के साथ अलग-अलग रखकर, खासतौर पर चार दशक के स्त्री चिंतन, चुनौतियों और अभी तक के हासिल को समझने की कोशिश की गई है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जो लोग लगातार जेंडर जस्टिस पर काम करते आए हैं, उनके विचारों की समानता और विभिन्नता को जाना जा सके।’’ इस दृष्टि से ‘‘समय के साखी’’ का यह ट्रांसजेंडर डिस्कोर्स विशेषांक पठनीय होने के साथ-साथ संग्रहणीय भी है तथा शोधार्थियों के लिए तो बेहद उपयोगी है।    
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Saturday, April 11, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | मोसम बदलो, बे बदले मनो आप अपनो ख्याल राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

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मोसम बदलो, बे बदले मनो आप अपनो ख्याल राखियो

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    मोसम फेर के गरम होन लगो आए। घाम मूंड़ चटकान लगो आए। सो, तनक सावधानी तो राखने परहे ने तो तबीयत खराब होबे में देर न लगहे। सेअत कैसे सई राखी जाए ऊके बारे में घाघ औ भड्डरी ने भौतई नोंने उपाय बताए हैं। ऊमें से कछू तो हमने पिछली हप्ता बताई रई, आज सोई कछू बताहें, मनो पैले उनकी बतकाव कर लई जाए जोन बदल गए। आईजी मैडम सो रिटायर हो के चली गई, सो लगो के बड़ी कुर्सी पे कोनऊं मैडम ने रैहें तो सूनो लगहे। मनो अब जी जुड़ाओ के कलेक्टर मैडम इते आ रईं। बाकी अबे लौं जो कलेक्टर साब रए उनखों ले के पब्लिक बड़़ी कनफुजिआत रई। मने पब्लिक खों खुदई पता न परत्ती के बा कलेक्टर साब से खुस आए के खफा आए? मनो बे अपनी समझ की डबिया अबे बी खोले से डरा रए के कऊं बे फेर के लौट ने आएं। अब ईको का मतलब आए बा आप ओरें अटकलें लगाइयो। हम तो अब कर रए सेअत की बतकाव।
भुनसारे खटिया से उठि के पिये तुरतै पानी।
ऊके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के जानी।।
मने जो संकारे से उठ के सबसे पैले पानी पीयत आए बा कभऊं बीमार नईं परत आए औ ऊके घरे कभऊं बैद मने डाक्टर नई आत आएं। मनो आज के जमाना में डाक्टर ऊंसईं घरे नईं आत आए। औ कऊं आबे को भूले से मान गओ तो तगड़ी फीस ले लेत आए। जेई से सेअत के लाने एक कहनात औ गांठ बांध लेओ-
जेठ मास जो दिन में सोए।
ऊको जर असाढ़े  रोए।।
सो, सई टेम पे सोओ, सही टेम पे उठो करे औ धूप-गरमी से अपनो बचाव करियो, सो सब ठीक रैहे। राम-राम !
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, April 9, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ?  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
   ‘‘भौजी मोए जे समझ नई पर रई के जे हो का रओ?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘काए के बारे में कै रईं?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘जेई, जे ट्रम्प पूरोई पगला गओ का?’’ मैंने कई।
‘‘अब का करो ऊ पगला ने?’’ भौजी ने ऐसे ढंग से पूछी मनो बे अपनी गली के कौनऊं पगला के बारे में पूछ रई होंए। इत्ती फजीयत तो ई दुनिया में कभऊं कोनऊं प्रेसीडेंट की ने भई हुइए।
‘‘ने पूछो के का करो। बा कै रओ आए के ईरानी सभ्यता को बा पूरोई मिटा दैहे। भला जा कोन सी बात भई? तुमें कोनऊं परधानमंत्री औ प्रेसीडेंट से तकलीफ होए तो ऊको मिटाबे की कओ, उते की पब्लिक ने तुमाओ का बिगारो के तुम उते के बच्चा, बूढ़ा, लुगाइयां, सबई खों मार डारबे की कै रए। अरे जो तुम पूरी सभ्यता मिटाहो तो ईको मतलब कहाओ के तुम उते के दूद पीते बच्चा खों लौं छोड़बो नईं चात हो। कित्ती घटिया बात आए जो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘बात तो सई आए तुमाई। मनो मोए एक बात लगत आए।’’ भौजी कछू सोचती सी बोलीं। 
‘‘का लगत आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘मोए लगत आए के जा ट्रम्प खों ईरान से कछू पर्सनल खुन्नस आए।’’ भौजी ने कई।
‘‘का मतलब?’’ मैंने पूछी।
‘‘मतलब जे के ट्रम्प कोनऊं ईरानी लुगाई के पांछू पड़ो रओ हुइए। मनो ऊने ट्रम्प खों घास ने डारी हुइए। तभई से ट्रम्प के जी में लगो रओ हुइए के जे ईरानियन खों छोरने नइयां। इनें पूरोई मिटा देबी। जेई से तो बा पर्सनल दुस्मनी सी भांज रओ आए।’’ भौजी ने कई।
‘‘अई गजब! जे तो मैंने सोचई ने रई। जे बी हो सकत आए। ने तो ऐसी कोन-सी खेती काट लई ईरान ने बा ट्रम्प की के बा अपने देस वारन की बी नई सुन रओ औ पिलो परो आए ईरान के पांछू।’’ मोए भौजी की बात में दम दिखानी।
ने तो आपई ओरें सोचो के ऐसी का बात हो गई के बा पूरी ईरानी सभ्यता को मिटाबे की कैन लगो। ऐसो तो कोनऊं ने ना करी। कछू तो पर्सनल ऐंगल हुइए। औ जो ऊको तेल के कुआ चाउंने तो ऊको बोई तेल के कुआ में डुबो दओ चाइए। 
‘‘देख तो भौजी, ऊके मारे अपने इते बेरोजगारी बढ़ रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ, कल हम औ तुमाए भैयाजी संझा को तिगड्डा लौं गए रए। उते हमाओ चाट खाबे को जी करो। हम ओरन को खास चाट वारो ठेला आए। हम तो उतई चाट खात आएं। मनो बा उते ने दिखानो। सो हमने उते दूसरे ठिलिया वारो से ऊके बारे में पूछी सो बोलो के ऊको गैस को सिलेंडर ने मिल रओ हतो सो ऊको अपनी ठिलिया बंद करनी परी। हम ओंरे सोई दो-चार दिनां औ चलाबी, फेर हम ओरन खों सोई दुकान बढ़ानी परहे। काए से के जो गैस ने मिलहे तो काए में चाट समोसा बनाहें? सो मैंने पूछी के बा गओ कां? तो बा दूसरे वारे ने बताई के बा अपने गांव खों चलो गओ आए। मैंने पूछी के बा उते का करहे? सो बा बोलो के का करहे? कछू नईं। उते कछू काम ने मिलत्तो सो बा इते भग के आओ रओ औ अब इते से फेर उते जा के का मिल जाहे? मनो इत्तोई आए के इते घर को किराओ देन परत्तो, बा ने देने परहे। औ उते बाप-मताई एक रोटी में आधी ऊको औ ऊके लरका बच्चा को ख्वा दैहें। रामधई बिन्ना! ऊकी बात सुन के मोए फुरूरी-सी आ गई औ कोरोना वारे दिन याद आन लगे। ऐसई परेसानी ऊ टेम पे आई रई। बस, इत्तोई आए के ऊ टेम पे सब कछू एकदम से होत चलो गओ रओ औ अब ई टेम पे अपन देखत जा रए औ समझत जा रए। मनो कर कछू नईं सकत।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। अबे ऊ टेम के दुख सो भूले नइयां औ जे पापी ने सब खों हैरान करबो सुरू कर दओ। ईको कभऊं कोऊं माफ ने करहे।’’ मैंने कई।
‘‘बाकी जे सबरे मीडिया वारे का कर रए? जे काए नईं पतो लगा रए के बा को आए जोन के ठुकराबे पे जा पगला रओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, ऐसे तो मीडिया सबई में अपनी नाक घुसात फिरत आए।’’ कैत भए मोए हंसी आ गई। जा बात मोए कोनऊं फिल्मी स्टोरी घांईं लगी। इत्ते में भैयाजी आ गए। बे बजरिया गए रए सब्जी लेबे खों।
‘‘का बतकाव चल रई?’’ आतई सात भैयाजी ने हम दोई से पूछी।
‘‘भौजी ने बड़े पते की बात बताई।’’ मैंने कई।
‘‘का बात?’’ भैयाजी ने पूछी। 
‘‘बात जे के बा ट्रम्प की कोऊ लवस्टोरी रई हुइए जोन में ऊको लिप्ट ने मिली, सो बा पगलाओ सो ईरान के पांछू परो आए।’’ मैंने बताई।
‘‘तुमाई भौजी बी! जां ने पौंचे रवि, उते पौंचे तुमाई भौजी।’’ भैया हंसत भए बोले। फेर कैन लगे के ई लड़ाई ने तो सगरी दुनिया के देसन अर्थब्यबस्था हला दई आए। अभई हमने देखी के सब्जी के दाम बढ़ गए आएं। जो हमने पूछी सो बे सब्जी वारे कैन लगे के डीजल, पेट््रोल सई से ने मिले तो सबई कछू मैंगो होन लगत आए। बात ऊकी सई हती।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमने तो आपसे कई रई के एक फतकुली औ एक सेम की बेलें लगा लेओ, मनो अपने सुनी नईं ने तो अबे अपने घरे की मुप्त की सब्जी मिल रई होती।’’ भौजी ने सोई मोका ताक के अपनी बात कै डारी।
‘‘तुमें खाली सब्जी की परी? औ का-का उगा लैहो? जे फसल कटबे को टेम आए। औ आजकाल कटाई, थराई सबई कछू गाड़ियन से होत आए। बो का कहाऊत आएं, हार्वेस्टर! एक तो बा किराए में लेन परत आएं औ बे सोई डीजल-मीजल से चलत आएं। सो उनके दाम बी तो बढ़े हुइएं।’’ भैया जी बोले।
‘‘हऔ, औ ऊपरे से जो पानी गिरन लगत आए। दूबरे औ दो असाढ़।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई में भौजी। अपने इते सब कछू कित्तो ठीक चल रओ हतो, मनो ई पगला के मारे सब बिगरो जा रओ। अखीर आपई सोचो के जो उते इत्ता मिसाईलें घल रईं सो का ऊको पूरी धरती पे असर ने परत हुइए? ओजोन परत में ऊंसई छिद्दा भए डरे, ऊपे से जे सब का पलूशन ने फैला रए हुइएं?’’ मैंने कई।
‘‘जा बात बी तुमने सई कई बिन्ना।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे सब बी तो सोचबे वारी बात आए भैयाजी! जोन टेम पे कोन ऊं लड़ाई छिड़त आए तो पैले दोई तरफी के मारे गए सेना वारे गिने जात आएं, फेर पब्लिक वारे गिने जात आएं। मनो पसु-पक्षियन की तो कोन ऊं की परी नई रैत आए। न जाने किते कुत्ता, बिल्ली, पंछी, कीरा-पतूला सबई कछू तो मारे जात आएं। इत्तेई नईं, पेड़ पौधा सोई जल-बर जात आएं, सो उनको को गिनत आए? कोन ऊं बी लड़ाई लड़त आएं मानुस, मनो मरत आए सबई कछू। फेर बी कोनऊं ईके बारे में नईं सोचत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ बिन्ना! जो इत्ते सोचत तो लरतई काए खों? अपन पढ़त नइयां का के महाभारत भई इंची भर जमीन ने देने परे ईके लाने, मनो दोई तरफी के न जाने कितेक लोग मरे। औ बा खांडव बन वारी घटना। उते सोई सबरे पसु-पक्षी जल के मर गए रए। तुमई ने एक लेख लिखो रओ के दूसरे विश्व युद्ध में कित्ते कुत्ता, बिल्ली मारे गए रए।’’ भैयाजी बोले।
‘बा तो हमने हिल्डा कीन की ‘द ग्रेट कैट एंड डाॅग मैसेकर’ किताब पढ़ी रई, सो हमें पता परी रई के द्वितीय विश्व युद्ध होतई साथ सात लाख कुत्ता औ बिल्ली मारे गए रए।’’ मैंने कई।     
‘‘जेई से तो हम सोचत आएं के अब जा लड़ाई खतम होन चाइए। भौत हो गई।’’ भैयाजी बोले।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जा लड़ाई से कोऊ को का मिलहे? जो प्रेमी पगला घांईं काए खों लरत फिर रओ?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, April 8, 2026

चर्चा प्लस | हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य          
- डाॅ (सुश्री) शरद 
सिंह                                                                  
   आज दुनिया जिन सबसे बड़ी समस्याओं का सामना कर रही है, उनमें से एक प्लास्टिक कचरे की समस्या है। इस प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा हमारे घरों से ही निकलता है। यह न केवल प्रदूषण फैलाता है, बल्कि नालियों को भी जाम कर देता है, जिससे बाढ़ जैसी गंभीर स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। यह आवारा जानवरों की जान ले लेता है, और इससे निकलने वाला जहरीला धुआँ इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के लिए कौन जिम्मेदार हैकृमैं, आप, वह (पुरुष), वह (स्त्री) या वे? हम एक-दूसरे पर दोष डालकर बच नहीं सकते, क्योंकि जलवायु हम सभी की साझा संपत्ति हैय इसलिए इसे सही बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। जलवायु परिवर्तन हर इंसान और सभी जीवित प्राणियों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अब हमें यह तय करना होगा कि क्या हम इस धरती पर अन्य जीवित तत्वों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, या फिर इस धरती से जीवन को ही मिटा देना चाहते हैं। एक बार सोचिए, क्योंकि यह कोई विज्ञान-कथा (साईफाई) नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह सच है कि हम प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद नहीं कर सकते, लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस समस्या से निपटने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

जलवायु क्या है? आसान शब्दों में कहें तो, जलवायु किसी खास इलाके में मौसम का लंबे समय तक चलने वाला पैटर्न है। मौसम हर घंटे, हर दिन, हर महीने या यहाँ तक कि हर साल बदल सकता है। किसी इलाके के मौसम के पैटर्न, जिन्हें आम तौर पर कम से कम 30 सालों तक ट्रैक किया जाता है, उस इलाके की जलवायु माने जाते हैं। अगर पूरी धरती का मौसम बदल रहा हैकृजिसे हम जलवायु परिवर्तन कहते हैंकृतो इसका मतलब है कि पिछले तीस सालों में हमने इतनी गलतियाँ और लापरवाही की है कि मौसम में बदलाव सिर्फ किसी एक इलाके में ही नहीं, बल्कि पूरी धरती पर देखा जा रहा है। और भी साफ शब्दों में कहें तो, आज जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसके लिए हम और सिर्फ हम ही जिम्मेदार हैं।

जरा सोचिए कि किसी दिन हमारे पास साँस लेने के लिए साफ हवा, पीने के लिए साफ पानी और खाने के लिए साफ खाना न होय धरती और महासागरों की गर्म सतहों से लावा फूट रहा होय और समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से धरती का जमीनी हिस्सा पानी में डूब गया हो। तो फिर हम क्या करेंगे? हम अपनी जान कैसे बचाएँगे? यह कोई साइंस-फिक्शन कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह हमारे भविष्य के जीवन का वह नजारा है, जिसकी पटकथा हम खुद ही लिख रहे हैं।
हमारी जलवायु हमारी गतिविधियों पर निर्भर करती है। अगर आज वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमने अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाली जहरीली गैसों पर रोक नहीं लगाई। हमने ऐसे वाहनों का इस्तेमाल किया, जिनसे सालों तक जहरीला धुआँ निकलता रहा। हम उन जंगलों को काटते रहे, जिनके पेड़ हवा को साफ करते थे। अगर आज जल प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी वजह यह है कि हमने अपनी गंदी नालियों के पानी को तालाबों और नदियों के साफ पानी में मिलने दिया। हमने फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले कचरे और गंदे पानी को नदियों में मिलने दिया। हमने नदियों से रेत का अवैध खनन करके उनके प्राकृतिक बहाव को बिगाड़ दिया। हमने जमीन में ऐसे जहरीले पदार्थ डाले कि ट्यूबवेल का जमीन के नीचे का पानी भी दूषित होने लगा। पानी बचाने के बजाय, हमने उसे बर्बाद किया। हमने इतनी ज्यादा बर्बादी की कि आज कई जगहों पर पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। अगर जमीन की बात करें, तो हमने जमीन को भी कहाँ बख्शा है? हमने सालों तक अपने खेतों में जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक डालकर मिट्टी की उर्वरता को कम कर दिया है। जमीन को प्रदूषित करने में प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का भी बहुत बड़ा हाथ है। हमने बहुत अधिक औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति की है, लेकिन हमने कचरा निपटान की मूलभूत आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया है।
प्लास्टिक कचरा, या प्लास्टिक प्रदूषण, श्पृथ्वी के पर्यावरण में प्लास्टिक की चीजों (प्लास्टिक की बोतलें और भी बहुत कुछ) का जमाव है, जो वन्यजीवों, वन्यजीवों के रहने की जगहों और इंसानों पर बुरा असर डालता है। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है। यह देखा गया है कि प्लास्टिक कचरे को ठिकाने लगाना एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इसे इकट्ठा करने और अलग करने का सिस्टम ठीक नहीं है। जितना प्लास्टिक बनता है, उसका सिर्फ 60ः ही रीसायकल हो पाता हैय बाकी 9400 टन प्लास्टिक पर्यावरण में ही पड़ा रहता है, जिससे जमीन, हवा और पानी प्रदूषित होते हैं।
हरे रंग के कूड़ेदान गीले और बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए होते हैं, जिसमें रसोई का कचरा, जैसे सब्जियों और फलों के छिलके शामिल हैं। नीले कूड़ेदान प्लास्टिक के रैपर और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे को ठिकाने लगाने के लिए होते हैं। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे प्रदूषण रुकता है और जीवाश्म ईंधन की खपत की माँग कम होती हैय साथ ही, प्राकृतिक संसाधन और ऊर्जा भी बचती है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान दे रही हैं। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है।
प्लास्टिक पर्यावरण को पाँच तरीकों से नुकसान पहुँचाता है। पहला, यह रासायनिक प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक प्रदूषण के माध्यम से भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। प्लास्टिक मूल रूप से तेल और गैस से बनता है। इन गैर-नवीकरणीय संसाधनों की खुदाई से बेंजीन, टोल्यूनि, एथिलबेंजीन, जाइलीन, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और कई अन्य जैसे हानिकारक रसायन उत्पन्न होते हैं। दूसरा, यह माइक्रो-प्लास्टिक बनाता है। माइक्रो-प्लास्टिक अब लगभग हर जगह पाए जाते हैं। ये छोटे कण जलमार्गों, मिट्टी, पौधों, जानवरों और मनुष्यों को प्रदूषित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक के प्रभावों का अभी नया अध्ययन किया जा रहा है। यह देखा गया है कि माइक्रो-प्लास्टिक मिट्टी की गुणवत्ता, उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों और अपघटन के लिए जिम्मेदार छोटे कीड़ों को प्रभावित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक बड़े जानवरों को भी कई तरीकों से प्रभावित करते हैं, जैसे उनके क्छ। को नुकसान पहुँचाना, उनकी वृद्धि को रोकना, प्रजनन अंगों को क्षति पहुँचाना और भी बहुत कुछ।
तीसरा, प्लास्टिक कचरा ऐसे अपशिष्ट के रूप में जमा होता रहता है जो अपने आप विघटित नहीं होता। चैथा, जब यह प्लास्टिक कचरा सीवेज प्रणाली तक पहुँचता है, तो उसे जाम कर देता है। कुछ साल पहले मुंबई में आई बाढ़ का एक मुख्य कारण प्लास्टिक कचरे से जाम हुई सीवेज प्रणाली ही थी।
चौथा, कूड़ेदान में फेंके जाने के बाद, हमारे देश में आवारा जानवर अन्य खाद्य पदार्थों के साथ प्लास्टिक कचरा भी खा लेते हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ खाने से गायों की मौत की घटनाएँ भी सामने आती हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ पचती नहीं हैं और उनकी आँतों में फँसकर उनके लिए जानलेवा साबित होती हैं।
पाँचवाँ, दुनिया के कई देश अवैध रूप से प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंक देते हैं। समुद्री दुनिया में बड़ी संख्या में कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। प्लास्टिक कचरा समुद्री जीवन को भारी नुकसान पहुँचाता है। इस कारण समुद्री तट भी प्रदूषित हो जाते हैं।
देखा जाए तो प्लास्टिक कचरे से पानी, जमीन और हवाकृसभी को नुकसान पहुँचता है। इसीलिए, प्लास्टिक कचरे से बचने का सबसे अच्छा तरीका है प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना। लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक की उपयोगिता हमारे जीवन में इस तरह एक जरूरत बन गई है कि हम इसे पूरी तरह से छोड़ नहीं सकते। इसलिए, यह जरूरी है कि हम अपने इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक कचरे को सही तरीके से संभालना सीखें। तभी हम प्लास्टिक कचरे के बुरे प्रभावों से बच पाएँगे। हाँ, हमें अपने घरों के प्लास्टिक कचरे को अलग रखना चाहिए और उसे नीले रंग के कूड़ेदान में डालना चाहिए, जो इसी काम के लिए बनाया गया है। इससे प्लास्टिक कचरे का निपटारा करने वालों को आसानी होगी और हम प्लास्टिक कचरे के हानिकारक प्रभावों से बच पाएँगे। यह छोटा सा कदम हमें एक बड़े खतरे से बचा सकता है।
नदियों की तरह, हमने समुद्रों और महासागरों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिसके कारण समुद्रों और महासागरों में रहने वाली कई महत्वपूर्ण प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। महासागर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निकलने वाली अधिकांश अतिरिक्त गर्मी को सोख लेते हैं, जिससे महासागरों का तापमान बढ़ रहा है। महासागरों के बढ़ते तापमान का समुद्री प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों पर बुरा असर पड़ता है। बढ़ते तापमान के कारण कोरल ब्लीचिंग होती है और समुद्री मछलियों तथा स्तनधारियों के प्रजनन स्थलों को नुकसान पहुँचता है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में दुनिया ने अपने लगभग 14 प्रतिशत कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) खो दिए हैं। शोध में बताया गया है कि महासागरों का अम्लीकरण, समुद्र के बढ़ते तापमान और अत्यधिक मछली पकड़ना, प्रदूषण, अनियंत्रित पर्यटन तथा खराब तटीय प्रबंधन जैसे स्थानीय दबाव, कोरल पारिस्थितिक तंत्रों के लिए मिलकर एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।
इस समय हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा ग्लोबल वार्मिंग है। ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य से निकलने वाले विकिरण से बचाती है और पृथ्वी के तापमान को संतुलित रखती हैय प्रदूषण के कारण इसे पहुँचने वाले नुकसान से ओजोन परत कमजोर हो रही है और पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसका परिणाम ग्लेशियरों का पिघलना और मौसम में बढ़ती अनिश्चितता है, जिसे हम अभी अपनी आँखों से देख रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण झीलों के जल स्तर में कमी आई है, समुद्र का जल स्तर बढ़ा है, और नदियों तथा वर्षा के पैटर्न में बदलाव आया हैय साथ ही, इसने प्लवक (चसंदाजवद) से लेकर स्तनधारियों तक, सभी जलीय जीवों पर नकारात्मक प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। पिछले 30 वर्षों में क्रिल (छोटे समुद्री जीव) की संख्या में औसतन 80ः की कमी आई है। कोरल ब्लीचिंग (मूंगा विरंजन) में भी भारी वृद्धि हुई है। हमारे देश के जल क्षेत्र में पाई जाने वाली हिंद महासागर मूल की मछलियों की संख्या अब तक 30 तक पहुँच चुकी है। समुद्री कछुओं के प्रजनन क्षेत्र सिकुड़ गए हैं, क्योंकि समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण उनके तटीय आवास नष्ट हो रहे हैं। समुद्री बर्फ के पिघलने या कम होने के कारण, कई समुद्री स्तनधारियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में विकसित किए गए गणितीय कंप्यूटर मॉडलों के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि यदि  कार्बन  की सांद्रता (घनत्व) दोगुनी हो जाती है, तो वैश्विक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। जलवायु की इस बुरी स्थिति के लिए हम सभी जिम्मेदार हैंकृहम सभी का अर्थ है, हम सभी मनुष्य। एक-दूसरे पर दोषारोपण करके हम अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर सकते। लेकिन हम अपनी उन गतिविधियों में सुधार अवश्य कर सकते हैं, जो जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। हमारी गतिविधियों के कारण जलवायु में आ रही गिरावट यह साबित करती है कि हमारी जलवायु का भविष्य हमारे ही हाथों में है अब यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे संवारते हैं या बिगाड़ते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, April 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल गीत संग्रह - तिल के फूल तिली के दाने
कवि - रमेशदत्त दुबे
प्रकाशक - प्रमाण कम्प्यूटर्स, कटरा बाज़ार, सागर
मूल्य - 25/- 
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      रचनाकार पुराना हो जाता है। कालकवलित हो जाता है। वह अपनी अर्थवत्ता भी खो सकता है। किन्तु, उसका सृजन कभी अपना महत्व नहीं खोता है। पुरातन साहित्य की श्रेणी में गिना जाने वाला पंचतंत्र, जातक कथाएं, सिंहासन बत्तीसी, अरब की कहानियां, नाविक सिंदबाद की यात्राएं आदि आज भी उतनी ही रोचक लगती हैं जितनी उस समय के बाल श्रोताओं, पाठकों एवं उनके बड़ों को लगती रही होंगी। उनमें मौजूद शिक्षा आज भी प्रासंगिक है। पुरातन साहित्य अपने सृजन की तिथि के आधार पर पुरातन की श्रेणी में भले ही गिना जाए किन्तु उसकी अर्थवत्ता कभी पुरानी नहीं पड़ती है। जी हां, पुरानी किताबों की भी अर्थवत्ता होती है जैसे ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’। यह बाल गीत संग्रह है। इसके रचयिता रमेशदत्त दुबे अब स्वर्गीय हो चुके हैं किन्तु उनकी अन्य कृतियों की भांति उनके बाल गीतों का यह संग्रह आज भी जब हाथों में आता है तो इसका महत्व स्वतः जागृत हो जाता है। फिर कई वर्षों से आधुनिक बाल साहित्य की कमी को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, विशेषरूप से हिन्दी में। अंग्रेजी में राईम्स के रूप में आयातित बाल काव्य अथवा उन पर आधारित देसी अंग्रेजी बाल काव्य तो उपलब्ध होता रहा है किन्तु हिन्दी का बाल साहित्य सिकुड़ता गया। इसका एक कारण यह है कि आज अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं और दूसरा कारण कि बहुत-सी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया। बाल साहित्य से संस्कारित करने वानी पत्रिकाएं जैसे नंदन, पराग आदि ने कम से कम दो पीढ़ियों को बाल साहित्य से जोड़े रखा था किन्तु अब उस स्तर की पत्रिकाएं नहीं के बराबर हैं। 

रमेश दत्त दुबे सागर शहर के एक ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने फक्कड़पन से जीवन व्यतीत करते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा। उन्होंने उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं लेख भी लिखे। ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ बाल गीत संग्रह है जिसमें उनके 27 गीत संग्रहीत हैं। इन गीतों की विशेषता यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ शिक्षा एवं सांस्कृतिक मूल्य समाहित हैं। इनमें से कुछ गीतों की ध्वनि खेल गीत की है जो बालमन को ऊर्जा का संचार करने में सक्षम हैं। यूं तो मैंने इस संग्रह को उनके जीवनकाल में पढ़ा था किन्तु विगत दिनों मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अंतर्गत बाल साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य पर शहर में चर्चा संगोष्ठी के दौरान रमेशदत्त दुबे जी के सुपुत्र ने इस बाल गीत संग्रह की प्रतियां आयोजन में वितरित कीं, जिससे एक बार फिर यह पुस्तक दृष्टि से गुज़री। एक बार फिर संग्रह की कविताओं को पढ़ने का सुअवसर मिला। वस्तुतः होता क्या है कि हम अपने जीवन में इतने व्यस्त होते जाते हैं कि पुस्तक का स्वरूप और नाम तो स्मृति में रहता है किन्तु कई बार उसका कलेवर धुंधला पड़ता जाता है। पुस्तक भी अन्य नवीन पुस्तकों के नीचे दबती चली जाती है। किन्तु जब कभी वह पुस्तक पुनः सामने आती है तो उसके स्वरूप और नाम की स्मृति के साथ उसका कलेवर भी पुनः ताज़ा हो जाता है। तब हमें लगता है कि यह तो अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है तथा इसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों है। इसका कारण यह है कि इसके गीतों को समय की नब्ज़ पर उंगली रख कर लिखा गया है।

        इस संग्रह का प्रथम गीत है ‘‘मुनिया’’। यह गीत उस परिस्थिति पर आधारित है जिसमें माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और नन्हीं मुनिया जैसी बेटी घर में अकेली अपनी कल्पनाओं के अनुरुप खेल रचाा कर मन लगा रही है। इस गीत को पढ़ कर जहां बड़े एकाकी बालमन की दशा को समझ सकते हैं वहीं बच्चे अपना समय खेल-खेल में व्यतीत करने का गुर सीख सकते हैं। इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए -
मुनिया ने देखा, आज पापा नहीं हैं 
मुनिया ने पाया, आज माँ भी नहीं हैं
मुनिया ने पाया, घर बिल्कुल सूना छुआ 
उसने वह सब, मना जिसको छूना
औरत की फोटो में मूंछें लगाई 
राजा की फोटो में पूंछें लगाई
कहा उसने वह सब, जो था उसको कहना 
सुना उसने सब कुछ, जो था उसको सुनना
गाना भी गाया, नची, कूदी-फांदी 
गुड्डा और गुड़िया की, कर डाली शादी
छोटी सी मुनिया को बहुत सा काम है 
दिन हो या रात, चैन न आराम है
़़़़़़़हाथी-घोड़ा-पालकी
हाथी, घोडा, पालकी 
बातें हैं उस काल की 
मोटर, साइकिल, प्लेन की 
बातें हैं इस काल की
बच्चों की कल्पना में आज शेर, भालू से कहीं अधिक मोटर, साइकिल, प्लेन कौंधते हैं। यही टीवी आदि के चलित दृश्यों में उनकी नन्हीं आखों के आगे होते हैं तथा यही खिलौनों के रूप में उन्हें मिलते हैं। अतः गुड़िया के विवाह जैसे पारंपरिक खेल के साथ आधुनिक वस्तुओं को जोड़ कर गीत लिखने से गीत की समसामयिकता बढ़ गई है। 
संग्रह में ‘‘कहानी’’ शीर्ष से भी एक गीत है जिसमें छोटी-छोटी तुकबंदी और सहज शब्दों के साथ मनोरंजन है। यह गीत सहज ही बच्चों की जुबान पर चढ़ जाने का गुण रखता है। गीत का एक अंश-
आमोती - दामोती रानी
अंधी भूरी कहे कहानी
एक कहानी दादी कहती
एक कहानी नानी
एक कहानी हरबोलों की, 
खूब लड़ी मरदानी
अमोती-दामौती रानी

बुंदेलखंड का एक पुराना खेल गीत है जो आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है, जहां पारंपरिक ग्रामीण खेल खेले जाते हैं। यह खेल गीत है ‘‘पो संपा भई पो संपा’’। यह गीत संवादनात्मक है। एक बच्चा उसे प्रश्न के रूप में गाता है तो शेष बच्चे उसका उत्तर देते हैं। इस पारंपरिक गीत को आधार बना कर राजा-रानी के स्थान पर रेलगाड़ी और रेलमपेल जैसे उपमान रखे गए हैं जिससे यह बच्चों के लिए अधिक दृश्यात्मक हो जाता है। उदाहरण देखिए- 
पो संपा भई पो संपा 
पो संपा ने क्या किया ?
पो संपा ने रेल बनाई 
रेल बनाकर खूब चलाई 
अब तो रेल में जाना पड़ेगा 
लटके, बैठे, खड़े-खड़े 
साथ चलेंगे पेड़ खड़े 
छुक-छुक करती चलती 
रेल डिब्बों में है रेलमपेल 

संग्रह का शीर्षक गीत ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ प्रकृति और जीवों से मिलाता है। इस गीत का अपना अलग ही सौंदर्य है तथा अलग ही रसात्मकता है। 
तिल के फूल, तिली के दाने 
खिलते फूल लगे मुरझाने 
सूरज घबराया-घबराया 
चिड़ियों ने गाना न गाया
बिल्ली बोली-न खेलूंगी 
चुहिया बोली-न दौडूंगी 
घोड़ा बैठ गया था थककर 
मछली बैठी जल में छुपकर 
चिडियों ने गाना न गाया
शेर न था बिल्कुल गुर्राया 
- अर्थात एक नन्हा-सा तिल का फूल यदि मुरझा जाए तो पूरी प्रकृति और जीव-जन्तु उदास हो जाते हैं। इसलिए फूलों और पौधों की देखभाल करना चाहिए, उन्हें मुाझाने नहीं देना चाहिए। यही तो वह शिक्षा है जो खेल-खेल में, पांव के पंजो पर बिठा कर झूला झूलाते हुए, गीत गाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दे दी जाती थी। आज माता-पिता भौतिकता की दौड़ में इस तरह उलझ गए हैं कि उन्हें न तो स्वयं इस प्रकार के गीत याद हैं और न वे स्वयं गीत रच पाते हैं। वे अपने बच्चों को डिजिटल मीडिया के हवाले छोड़ कर उनके प्राकृतिक बचपन की आकांक्षा करते हैं जो पूरी तरह संभव नहीं है। दरअसल इस प्रकार के गीत ही है जो पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवेदना, आत्मीयता एवं ज्ञान के तार जोड़ते हैं। इसीलिए स्वर्गीय रमेशदत्त दुबे जी का यह बाल गीत संग्रह ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ आज भी गहरी अर्थवत्ता रखता है। आज के युवा माता-पिता को स्वयं ऐसे गीत पढ़ने चाहिए तथा अपने बच्चों को स्वयं सुनाने चाहिए। इस दृष्टि से यह पुस्तक सदा प्रासंगिक बनी रहेगी।  
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