पुस्तक समीक्षा
बुंदेली को समृद्ध करने वाली अनुपम कृति- "श्रीमद्भगवद्गीता : बुन्देली भावार्थ"
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - श्रीमद्भगवद्गीता: बुन्देली भावार्थ
लेखिका - डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव
प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन्स, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य - 350/-
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श्रीमद्भगवद्गीता का विश्व की 578 से अधिक भाषाओं और बोलियों में गीता का अनुवाद हो चुका है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो जीवन की नश्वरता एवं मृत्यु के यथार्थ का बोध कराता है लेकिन इसके साथ ही जीवन जीने की कला भी सीखता है। इसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश तथा अर्जुन की शंकाओं का समाधान है। इसे अपनी दिव्य दृष्टि से संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाया था। यह महाभारत महाकाव्य का एक अंश है किंतु सबसे लोकप्रिय अंश। सनातन धर्म का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ा या सुन ना हो। किंतु कई बार भाषाई समस्या को लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के अर्थ को समझने में परेशानी होती है। विशेष रूप से उन व्यक्तियों को जिनका भाषा ही ज्ञान सीमित है जो बोलियों के अधिक निकट हैं उन्हें संस्कृत या संस्कृतनिष्ठ श्रीमद्भगवद्गीता को समझने में परेशानी होती है। गीता प्रेस गोरखपुर के द्वारा टीका सहित श्रीमद्भगवद्गीता का प्रकाशन किया जा चुका है तथा कुछ अन्य प्रकाशक भी इसे टीका सहित प्रकाशित करते हैं। फिर भी यदि अपनी बोली में व्यक्ति को ऐसा ग्रंथ उपलब्ध हो तो यह उसके लिए तथा उन प्रवचन कर्ताओं के लिए जो उस बोली विशेष में प्रवचन करते हैं, एक अच्छी और उपयोगी उपलब्धता होगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर सुमनलता श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया है। इस भावार्थ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक को बड़े सरल बुंदेली में भावांतरित किया गया है। पूरी पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता का मूल भाव कहीं भी आहत नहीं हुआ है। इस भावार्थ में डॉ सुमनलता श्रीवास्तव का श्रम स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण कार्य करके डॉ सुमनलता जी ने श्रीमद्भगवद्गीता को बुंदेली में उपलब्ध कराते हुए बुंदेली को समृद्ध किया है।
डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने 1967 में सागर विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। 20 दिसम्बर 1946 को जन्मी डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने एक गृहिणी के रूप में अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाते हुए इ.क.सं. विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से 2004 में संगीत में एम. ए., 2007 में संगीतशास्त्र, संस्कृत में पी.एच.डी.,तथा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर से 2019 में सामुद्रिकशास्त्र में संस्कृत में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुंजन कलासदन, जबलपुर द्वारा 2011 में सरस्वती अलंकरण, कादम्बरी, जबलपुर द्वारा 2012 में संगीतशास्त्र तथा 2016 में बहुआयामी हिन्दी सेवाओं के लिये पुरस्कृत किया गया। कहानी संग्रह ‘‘जिजीविषा’’ पर 2014 में म.प्र. लेखिका संघ, भोपाल द्वारा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें साहित्य में रुचि के साथ ही रवीन्द्रसंगीत, नृत्य, नाटक, हस्तकला, गृहोद्यान एवं समाजसेवा में भी अभिरुचि है। उनके प्रकाशित ग्रंथ हैं- संगीताधिराज हृदयनारायण देव हृदयकौतुकम्- हृदयप्रकाशः, 2008, कालिदास-साहित्य एवं कामकला नायकनायिकानखशिखनिरूपण, 2014, कहानी संग्रह - जिजीविषा 2014, कहानी संग्रह सरेराह- 2015 तथा सामुकद्रिशास्त्र के आलोक में कालिदास, 2021।
पुस्तक के आरंभ में अमरेंद्र नारायण, पूर्व महासचिव, एशिया पैसिफिक टेली कम्युनिटी, बैंकॉक ने ‘‘अनुशंसन’’ में उल्लेख किया है कि- ‘‘डॉ. सुमनलता जी के बहुमुखी प्रतिभा का ही पावन पुष्प है, बुंदेली में श्रीमद्भगवद्गीता का भावानुवाद । लोकभाषा में अत्यंत सहजता-पूर्वक उन्होंने गीता के अध्यायों को बुन्देली भाषी जनमानस के लिए प्रस्तुत कर एक अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है। यह उनकी विद्वता और उनके व्यक्तित्व की सरलता का सुपरिणाम है कि गीता के सभी अध्यायों का मर्म एक सामान्य गृहस्थ को भी सुग्राह्य लगता है। जिन लोगों ने संस्कृत या हिंदी के माध्यम से गीता नहीं पढ़ी है, उन्हें अपने दैनिक बोलचाल की भाषा में गीता के रहस्य को समझने का सुअवसर प्राप्त होता है।’’
वहीं प्रोफेसर अरुण कुमार मिश्र डी.लिट्. हिन्दी साहित्य जबलपुर ने अनुगुंजन शीर्षक से लिखा है-‘‘आज जब बोली में बातचीत करने वालों को भद्र समाज के कुछ लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बोली के प्रति प्रगाढ़ आदर-भाव रखते हैं। यही वजह है कि सुमन जी ने एक दुष्कर कार्य करने का बीड़ा उठाया और महान् ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्यायों का बुन्देली बोली में अनुवाद किया। बुन्देली के वैभव का जिन्हें पता है, उनके लिए यह अनुवाद-कृति जीवन की संजीवनी औषधि के समान है। श्रीमद्भगवद्गीता पर कुछ भी कहना सामान्य मानव की बात नहीं है; पर जो लोग गीता के ज्ञान से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं, लेकिन सामान्य सी बुन्देली बोली को समझने के योग्य हैं, उन लोगों के लिये प्रस्तुत ग्रंथ जीवन का पाथेय है।’’
प्रभा विश्वकर्मा ‘‘शील’’, संस्थापक अध्यक्ष-बुन्देली संस्कृति संगम, मध्यप्रदेश जबलपुर ने ‘‘अनुरंजन’’ के अंतर्गत बुंदेली में इस पुस्तक पर अपने विचार कुछ इस प्रकार प्रकट किए हैं - ‘‘भगवान किशन जू के मोंह सें गीता गाबे में जे कछु बोल संस्कृत में निकरे हैं। उन सबई अठारा अध्यायों के यानी सात सौ इस्लोकों को उल्था हमरी सुमनलता श्रीवास्तव जिज्जी ने ऐसी उम्दा बुन्देली बानी में करो है, कै हम का बताएँ! कित्तो सुरीलो लगत है सुनत में, बाँचत में।’’
“अनुभावन” शीर्षक से आत्मकथन लिखते हुए डॉ सुमनलता श्रीवास्तव ने इस बुंदेली भावार्थ के उद्देश्य के संबंध में प्रकाश डाला है- ‘‘ई अनुबाद में मोरी मंसा नें अपनौ गेयान बघारबे की आय और में प्रबचन करकें धरमगुरु बनबे की। मोरो तो संकलप इत्तोई है कै बुन्देलखण्ड के आम आदमी समज जाबें कै आखर गीता-ग्रंथ में लिखो का गओ है, जोन ईकी चरचा संत-महात्मा, गेयानी-बिज्ञानियों सें लैकें कारपोरेट बारे लौं करत हैं। अब तो गीतागेयान में नौजबानों खों सोई चाओ आन लगौ है।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि - “हो सकत है, मोरी सगरयाउ बुन्देली सब खों नें जँचे, हिज्जे नें जमें, काय सें कै मैं तो बुन्देलखण्ड सें चालीस बरस दूर रही हौं। बई किसा, कै बीरन खों दै दये बाबुल महल अटारीं, हमखों दये परदेस। सो चाय परम्परा बारी बोली पै पकर सोई ढीली पर गई होय!”
आइए अब देखते हैं उनके द्वारा किया गया श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ जिसमें बुंदेली का भाषाई सौंदर्य, सहजता, सरलता और लोक मूल्यवत्ता स्पष्ट प्रकट हुई है। सबसे पहले लक्ष्मीपति भगवान विष्णु का ध्यान किया गया है- अथ ध्यानम् - पाठ आरंभ करबे के पैलें अपन सब जनें ई इस्लोक खों पढ़ कें जगत के अधार, लच्छमीपति भगबान बिस्नु को धेयान करिये -
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भगबान की आकरिति भौत सांत है। बे सेसनांग की सैया पै सयन कर रय हैं। उनकी नाभि में कमल है। बे देवताओं के भी ईसबर हैं। पूरे जगत के अधार हैं। बे अकास के समान सब जग्घा बेयापत हैं। उनकौ बरन नीले मेघों के समान है। उनके अंग-अंग भौतई सुन्दर और सुभ हैं। बे लछमी जी के पति हैं। उनके नैन कमल घाईं हैं। उनें जोगी हरें धेयान करकें पा सकत हैं। जनम-मरन के भय कौ नास करबे बारे और सकल लोकों के स्वामी भगबान सिरी बिस्नु खों मैं बन्दत हौं। (पृ. 17)
अध्याय - 1 अर्जुनविषादयोग में भावार्थ देखिए जिसमें संजय द्वारा जन्मांध धृतराष्ट्र को अपनी दिव्यदृष्टि से कुरूक्षेत्र का हाल बताना आरम्भ करते हैं। लेखिका ने बुंदेली भावार्थ इस प्रकार किया है-
अब गीता को उल्था आरम्भ करहौं।
कुरुछेत्र में कौरबों और पांडबों की सेनाएँ जमा हो गई हैं। महाराजा ध्रितरास्ट द्रिस्टी सें लाचार हैं सो बे दिब्य-द्रिस्टी बारे संजय सें जुद्ध कौ पूरो आँखों देखो हाल सुनत जा रये हैं। सो आप औरें भी सुनो कै बे का जिग्गयासा कर रय हैं और संजय का जवाब दे रय है।
जोई आय गीता के पहले अध्याय को पहलौ इस्लोक-
धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चौव किमकुर्वत संजय।।1।।
ध्रितरास्ट बोले- हे संजय ! धरम की छेत्र, कुरुच्छेत्र में इकट्ठे भये, जुद्ध की इच्छा बारे मोरे और पाण्डु के पुत्रों ने का करौ, सो बताओ। (पृ. 21)
अर्जुन उवाच- कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।4।।
अरजुन बोले- अरे मधुसूदन ! मैं जुद्धभूमि में भीस्म पितामह और गुरु द्रोणाचार के बिरोध में बान चलाकें कैंसें लड़ाई करहों? ए अरिसूदन ! जे दोई मोरे पूजनीय आएँ। (पृ. 32)
इसी प्रकार कर्मयोग की व्याख्या है-
नैव तस्य कृतेनार्थाे नाकृतेनेह कश्चन ।न चा स्यसर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।18।।
ई संसार में कर्मयोग सें सिद्ध भए ऊ महापुरुस खों नें तो कर्म करबे सें कौनऊ मतलब रहत है और नें कर्मों के नें करबे सेंई कौनऊ मतलब रहत है। सकल प्रानियों सें भी ऊ कौ तन्नक भी स्वारथ कौ नातो नई होत ।
तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः।।19।।
ई सें तुम बिगैर लाग-लगाव कें सदाँ-सरबदाँ करतब्ब-कर्म करत रहो, कायसें कै आसक्ति के बिना कर्म करत भओ मनुस्य परमात्मा खों प्राप्त हो जात है। (पृ. 53)
इस प्रकार लेखिका डॉ सुमनलता श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ कर के बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह बुंदेली भाषियों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह पुस्तक बुंदेली के शोधार्थियों के साथ ही उन प्रवचनकर्ताओं के लिए भी उपयोगी है जो बुंदेली भाषियों के बीच श्रीमद्भगवद्गीता का प्रवचन करते हैं। बुंदेली को इस प्रकार समृद्ध करने के लिए डॉ सुमनलता श्रीवास्तव को साधुवाद है। इस प्रकार के भावार्थ अथवा भावानुवाद बुंदेली को न केवल समृद्ध करेगा वरन लोकप्रिय भी बनाएगा।
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