Friday, January 11, 2019

अधबीच ... आओ अब हम मनाएं ‘चिन्ता दिवस’ - डॉ. शरद सिंह

आज (11.01.2019) "नई दुनिया" के "अधबीच" कॉलम में मेरा व्यंग्य लेख प्रकाशित हुआ है जिसके लिए मैं "नई दुनिया" की हार्दिक आभारी हूं🙏 ....तो आइए, आप भी पढ़िए मेरा लेख...
Adhabeech ... Aao Ab Hum Manayen Chinta Diwas - Dr (Miss) Sharad Singh, Naidunia, 11.01.2019
आओ अब हम मनाएं ‘चिन्ता दिवस’
- डॉ. शरद सिंह

चिंता और चिता में भला क्या समानता हो सकती है? चिता पर चढ़ने से पहले ही इंसान एक मुद्रा में आ जाता है लेकिन चिंता तो कहीं भी बैठकर, लेट कर, या खड़े हो कर की जा सकती है। चिंता के लिए चाहे आप उकडूं बैठें या लंगडी दौड़ें, चाहे दो पल चिंता करें या दो साल, इसमें कोई बंदिश नहीं है। फिर आजकल फास्टफूडी जीवन में इतना समय ही कहा कि अधिक चिंता की जाए। फिर भी यदि चिंता किए बगैर गुजारा नहीं हो रहा है तो हफ्तों चिंता करने के बजाए एकदिवसीय क्रिकेट मैच के समान मात्र एक दिन चिंता कर ली जाए। जी हां, एक दिन चिंता करो और दूसरे दिन पॉपकॉर्न खाओ मस्त हो जाओ!
यूं भी एक दिवसीय चिन्ताओं का हमारा अद्भुत रिकॉर्ड पाया जाता है। अब देखिए न, हम हिन्दी की चिंता सिर्फ एक दिन करते हैं। उस एक दिन हम हिंदी के उद्भव, विकास, अवसान आदि सब के बारे में चिंता कर डालते हैं। यह ठीक भी है क्योंकि शेष दिनों में अंग्रेजी के बिना हमारा काम नहीं चलता। यदि इंग्लिश-विंग्लिश नहीं बनती तो हिंग्लिश से काम चला लेते हैं। लेकिन कम से कम हिन्दी से तो दूर रहने की कोशिश करते हैं। आखिर हिंदी हमारी आजकल की तड़क-भड़क लाइफ से बेमेल है। इसलिए कई दिन तक हिंदी की चिंता में अपना खून जलाते रहने से क्या फायदा? इसीलिए हम सिर्फ एक दिन पूर्ण समर्पित भाव से हिन्दी के पाले में जा खड़े होते हैं और सुबह से देर रात तक हिंदी की वाह-वाही करते रहते हैं। वैसे हमारी एकदिवसीय चिंताओं की कोई कमी नहीं है। एकदिवसीय चिंताओं की लंबी सूची के अंतर्गत् हम साल में एक दिन बच्चों की भी चिंता करते हैं। उसे एक दिन बाल मजदूरी का जमकर विरोध करते हैं। उस दिन हम घर या होटलों में बच्चों से नौकरों की तरह काम कराए जाने का खुलकर विरोध करते हैं। यही हमारा उस दिन का विशेष कर्तव्य होता है, वरना प्रतिदिन बाल मजदूरों की तरफदारी करने से क्या फायदा? सोचने की बात है यदि हम बाकी दिन भी बाल मजदूरी का विरोध करने लगेंगे तो जूता पालिश करने वाले छोकरों का भाव हो जाएगा। फिर हमारे जूताधारी जैंटलमैन गंदे जूतों में घूमते नजर आएंगे। कूड़ा बीनने वाले बच्चों का भाव हो जाएगा तो शहर के कूड़ेदान उसे काम की वस्तुओं की छटनी नहीं हो पाएगी। और तो और, होटलों में काम करने वाले लड़कों का अभाव हो जाएगा। फिर जूठे बर्तनों का ढेर लग जाएगा। झूठे बर्तनों के ढेर लगने से मक्खियां भिन्न-भिन्न आएंगी और मक्खियां भिन्न-भिन्न आने से बीमारियां फैलेंगी। इसीलिए इन बाल मजदूरों की चिंता के लिए एक दिन ही पर्याप्त है।
हिंदी और बच्चों की भांति हम शिक्षकों के लिए भी सिर्फ एक दिन चिंता करते हैं। जी हां, ‘शिक्षक दिवस’ को ही हमें शिक्षकों की दीनदशा अथवा गरिमा की चिंता होती है, शेष दिन में शिक्षक समुदाय से यही आशा की जाती है कि वह पढ़ाई-लिखाई कराए, मनुष्यों से लेकर ढोर-डांगर तक गिने। चाहे तो ट्यूशन-व्यूशन कोचिंग-वोचिंग भी कर लिया करे। शिक्षक वैसे ही बुद्धिजीवी प्राणी होता है। उसकी हर दिन क्या चिंता करना।
एक दिवसीय चिन्ताओं के क्रम में अब हम एक दिन पिता का मनाते हैं तो एक दिन मां का। एक दिन मलेरिया का एक दिन फाइलेरिया का, एक दिन पर्यावरण का एक दिन ऊर्जा संरक्षण का, एक दिन पुरातात्विक धरोहरों का, एक दिन जनसंख्या का। मेरे विचार से तो सभी चिंताओं की चिंता करने के लिए भी एक दिन तय किया जाए। तो आइए इसके लिए हम आवाज़ उठाएं और एक दिन ‘चिन्ता दिवस’ भी मनाएं।
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अधबीच  
नईदुनिया  
चिंता दिवस  
डॉ शरद सिंह

Thursday, January 10, 2019

लेखिका डॉ. शरद सिंह की पुस्तक ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’

Third Gender Vimarsh - The  Book of Dr Sharad Singh
‘थर्ड जेंडर विमर्श’ पुस्तक पर 09.01.2019 को दैनिक ‘‘आचरण’’ में प्रकाशित समाचार एवं डॉ. शरद सिंह (मुझसे) पुस्तक के संबंध में की गई बातचीत ....
 Third Gender Vimarsh - Book Release of Dr Sharad Singh at World Book Fair Delhi,  Aacharan, Sagar Edition, 09.01.2019
              लेखिका डॉ. शरद सिंह की पुस्तक ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’ .....

सागर। नगर की हिन्दी की चर्चित लेखिका एवं स्त्रीविमर्शकार डॉ. (सुश्री) शरद सिंह नवीन विषयों पर अपने लेखन के लिए साहित्य जगत में विशेष पहचान बना चुकी हैं। उनकी नवीन पुस्तक ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’ का दिल्ली में चल रहे विश्वपुस्तक मेला में देश की अकादमी सम्मान से सम्मानित ख्यातिलब्ध वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुद्गल ने लोकार्पण किया। शरद सिंह की यह पुस्तक समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग किन्नरों अर्थात् थर्ड जेंडर के जीवन के विभिन्न पक्षों पर आधारित है। नवीन विषयों में रुचि रखने वालों, समीक्षकों एवं विश्वविद्यालयीन शोधार्थियों के बीच यह पुस्तक अपने प्रकाशन के साथ ही चर्चित हो चली है। उल्लेखनीय है कि शरद सिंह के उपन्यासों ‘पिछले पन्ने की औरतें’, ‘पचकौड़ी’ तथा ‘कस्बाई सिमोन’ पर देश के अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा शोध कार्य कराया जा चुका है। डॉ. शरद सिंह ने महिला जागरूकता एवं सशक्तिकरण विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं जिनके लिए उन्हें राष्ट्रीय एवं प्रदेशिक स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है तथा अब तक इनकी की विभिन्न विषयों पर पचास से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। अपनी पुस्तक ‘थर्ड जेंडर विमर्श’ के बारे में चर्चा करते हुए लेखिका शरद सिंह ने बताया कि ‘‘थर्ड जेंडर के पक्ष में कई साहित्यकार लगभग पिछले एक दशक से सक्रियता से आवाज़ उठा रहे हैं लेकिन वह विमर्श खड़ा नहीं हो पा रहा है जिसकी आवश्यकता है। बस, इसीलिए मुझे लगा कि हिन्दी साहित्य में पिछले एक-डेढ़ दशक में जो महत्वपूर्ण लेखन किया गया है उस पर आधारित सामग्री एक प्लेटफार्म पर लाई जाए और यह एक पुस्तक के रूप में पाठकों के लिए अधिक उपयोगी साबित होगी।’’
‘थर्ड जेंडर विमर्श’ पुस्तक में किस तरह की सामग्री है उस पर प्रकाश डालते हुए डॉ. शरद सिंह ने बताया कि ‘‘इस पुस्तक में थर्ड जेंडर के जीवन और मनोदशा का विश्लेषण करने वाला बहुचर्चित उपन्यास ‘‘पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा’’ पर केन्द्रित सामग्री है। आपको बता दूं कि ‘व्यास सम्मान’ प्राप्त लेखिका चित्रा मुद्गल को इसी उपन्यास के लिए तथा साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित किया किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त निर्मला भुराड़िया, नीरजा माधव, महेन्द्र भीष्म, सुधा अरोड़ा, तबस्सुम जहां आदि के महत्वपूर्ण आलेख तथा किन्नरों से लिए गए साक्षात्कारों को भी मैंने इसमें सहेजा है। दरअसल, यह पुस्तक उन सभी के लिए बहुउपयोगी साबित होगी जो थर्ड जेंडर के जीवन बारे में गहराई से जानना चाहते हैं।’’
अपनी पुस्तक के विषय के संदर्भ में शरद सिंह कहती हैं कि ‘‘समय आ गया कि समाज और थर्ड जेंडर के बीच की दूरी मिटाई जाए। इसीलिए साहित्यकार इसके लिए साहित्यिक सेतु बनाने लगे हैं जो थर्ड जेंडर विमर्श के रूप में आकार ले चुका है। यह जो समामाजिक व्यवस्था है कि हिजड़ा, किन्नर, ख़्वाजासरा, छक्का...अनेक नाम उस मानव समूह को दिए जा चुके हैं, जो न तो स्त्री हैं, न पुरुष और उन्हें स्वयं समाज विचित्र दृष्टि से देखता है। जबकि वही समाज अपने परिवार की खुशी, उन्नति और उर्वरता के लिए उनसे दुआएं पाने के लिए लालायित रहता है किन्तु उनके साथ पारिवारिक संबंध नहीं रखना चाहता। उनके पास सम्मानजनक रोजगार नहीं है। अनेक परिस्थितियों में उन्हें यौन संतुष्टि का साधन बनना और वेश्यावृत्ति में लिप्त होना पड़ता है। समाज का दायित्व था कि वह थर्ड जेंडर के रूप में पहचाने जाने वाले इस तृतीयलिंगी समूह को अंगीकार करता। दुर्भाग्यवश ऐसा हुआ नहीं। फिर साहित्यकारों का ध्यान इस ओर गया। हिन्दी कथा साहित्य में थर्ड जेंडर की पीड़ा को, उसके जीवन के गोपन पक्ष को दुनिया के सामने लाया जाने लगा। लोगों में कौतूहल जागा, भले ही शनैः शनैः। ‘यमदीप’, ‘किन्नरकथा’, ‘तीसरी ताली’, ‘गुलाम मंडी’, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ जैसे उपन्यास लिखे गए। स्वयं थर्ड जेंडर ने आत्मकथाएं लिखीं। शिक्षा, समाज, राजनीति और धर्म के क्षेत्र में थर्ड जेंडर ने अपनी योग्यता को साबित किया। समाज के लिए भी अपनी संकीर्ण मानसिकता के खोल से बाहर आना और थर्ड जेंडर के प्रति एक नया नज़रिया अपनाना जरूरी है।’’
शरद सिंह का मानना है कि ‘‘साहित्यकारों को हमेशा उन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए जो समाज के उपेक्षित वर्गों से जुड़े हुए हैं और जिन्हें विमर्श बनने से पहले ही अकसर टाल दिया जाता है। साहित्य वह सशक्त माध्यम है जिसमें निष्पक्ष भाव से मुद्दे का विश्लेषण किया जा सकता है और जिसका दूरगामी प्रभाव रहता है।’’ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी शरद सिंह समाचारपत्रों में सामाजिक व समसामयिक विषयों पर नियमित कॉलम लिखती हैं तथा चर्चित साहित्यिक पत्रिका ‘सामयिक सरस्वती’ की कार्यकारी संपादक हैं। उन्हें स्त्री विमर्श, भारतीय संस्कृति और हिन्दी साहित्य पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता है। पावस व्याख्यानमाला, भोपाल में जुलाई 2016 में  ‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’ विषय पर अपना महत्वपूर्ण व्याख्यान दे चुकी हैं। महिलाओं के पक्ष में ज़मीन से जुड़ कर कार्य करने के साथ ही वे सोशल मीडिया पर भी वे अपनी सक्रियता बनाए रखती हैं।
उल्लेखनीय है कि उनकी यह पुस्तक अपने प्रकाशन के साथ ही नवीन विषयों में रुचि रखने वालों, समीक्षकों एवं विश्वविद्यालयीन शोधार्थियों के बीच चर्चित हो रही है।
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पूर्वांचल के गांधी बाबा राघवदास पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा 
पूर्वांचल के गांधी पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक

     - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक   - पूर्वांचल के गांधी : बाबा राघवदास       
प्रकाशक - अनामिका प्रकाशन, 52, तुलाराम बाग, इलाहाबाद, उ.प्र. 
लेखक  - डॉ. आमोद नाथ त्रिपाठी                   
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इतिहास लेखन में अत्यंत सावधानी की आवश्यकता होती है। तथ्यों का पता लगाना, उन्हें जांचना और फिर क्रमबद्ध रूप से उन्हें प्रस्तुत करना एक उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य होता है। अतीत को न तो बदला जा सकता है और न ही उसके किसी चरित्र को बढ़ा-चढ़ा कर अथवा घटा कर प्रस्तुत किया जा सकता है। जो जैसा है, वैसे ही उसे लिपिबद्ध करना इतिहास लेखन का सीधा सरल अर्थ है। उस पर यदि इतिहास के साथ-साथ किसी ऐसे ऐतिहासिक व्यक्ति के बारे में लिखा जा रहा हो जिससे संबंधित अनेकानेक तथ्य मौजूद हैं, उसके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जानने वाले लोग मौजूद हैं तो लापरवाही की कोई गुंजरइश नहीं रह जाती है। यूं भी इतिहासकार जो भी लिखता है, उस पर पढ़ने वाला पूर्ण विश्वास करता है अतः इतिहासलेखन में त्रुटि करना विश्वासघात से कम नहीं होता है। इस सिद्धांत को डॉ. आमोद नाथ त्रिपाठी ने अपनी नवीनतम पुस्तक ‘‘पूर्वांचल के गांधी : बाबा राघवदास’’ लिखते समय आधार मान कर आत्मसात किया है। डॉ. आमोद नाथ त्रिपाठी ने उन सभी स्थानों का भ्रमण किया जहां बाबा राघवदास रहे थे तथा उन सभी दस्तावेजों का अध्ययन किया जो बाबा राघवदास के समय एवं परिस्थितियों को प्रमाणित करते हैं। 
Baba Raghav Das in Indian Stamp-1998
 बाबा राघवदास महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच स्थित बेलगांव में 12 दिसम्बर 1896 को जन्मे थे। उसी वर्ष मुंबई में प्लेग की महामारी फैली और उसने दूर-दूर तक के क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया। इस महामारी में बाबा राघव दास ने अपने परिवार के सदस्यों को एक-एक कर के खो दिया। एक समय ऐसा आया जब उनका अपना कहने को कोई नहीं बचा। इस सदमें के कारण वे सांसारिकता से विरक्त होने लगे। उन्हीं दिनों वे लोकमान्य गंगाधर तिलक से प्रभावित हुए और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए। उन्हें लगा कि उनकी आध्यात्मिक प्यास तभी बुझ सकती है जबकि उन्हें एक सच्चा गुरु मिल जाए। वे गुरु की खोज में वाराणसी, हरिद्वार, प्रयाग आदि स्थानों में भटकते रहे। अंततः अनन्त महाप्रभु के रूप में गुरु प्राप्त हुए। अनन्त महाप्रभु देवरिया के बरहज नामक स्थान में निवास कर रहे थे। बाबा राघवदास ने बरहज में महाप्रभु की शिष्यता ग्रहण की। अनन्त महाप्रभु के देहावसान के बाद बरहज आश्रम बाबा राघवदास को सौंपा गया। इसी आश्रम में गुफा बना कर अत्यंत सादगी से जीवनयापन करते हुए बाबा राघवदास ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन सभी तथ्यों को डॉ. आमोद नाथ त्रिपाठी ने अपनी पुस्तक में इतनी कुशल क्रमबद्धता से लेखबद्ध किया है कि बाबा राघवदास का व्यक्तित्व और कृतित्व अपनी पूरी दृश्यात्मकता के साथ उभर कर सामने आता है। जो पाठक बाबा राघवदास से अपरिचित है, वह भी इस पुस्तक को पढ़ने के बाद इस प्रकार अनुभव करेगा मानो उसने बाबा राघवदास को न केवल देखा हो अपितु उनके साथ देशहित में संघर्ष किया हो। इसे लेखक की लेखकीय निपुणता ही कहा जाएगा।
बाबा राघवदास के जीवन की घटनाओं के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के प्रयासों को तिथिवार पिरोया गया है। पुस्तक का सम्पूर्ण कलेवर नौ अध्यायों में (प्राक्कथन और संदर्भ-सूची छोड़ कर) विभक्त है। इसमें सबसे पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक सर्वेक्षण (1850-1920) दिया गया है। इसके बाद क्रमशः बाबा राघवदास का प्रारम्भिक जीवन, स्वतंत्रता आन्दोलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश का योगदान और बाबा राघव दास का नेतृत्व (1920-1930), स्वतंत्रता आन्दोलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश का योगदान और बाबा राघव दास का नेतृत्व (1931-1947), राजनीति से सर्वोदय की ओर, भूदान-यज्ञ में आत्माहुति, रचनात्मक कार्य एवं जनसेवाः भाग-1, रचनात्मक कार्य एवं जनसेवाः भाग-2 तथा अंत में मूल्यांकनः कृतित्व एवं व्यक्तित्व प्रस्तुत किया गया है।
बाबा राघवदास वे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने जीवन को एक सन्यासी की भांति जिया किन्तु जनहित में सबसे आगे बढ़ कर कार्य किया। उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन की भांति देवरिया में स्थापित ‘वोटर्स असोसिएशन’ की ओर से आयोजित 31 जुलाई और 1 अगस्त की सभाओं की अध्यक्षता की। वे इतने अच्छे वक्ता थे कि उनका भाषण सुनने के लिए हजारों स्त्री-पुरुषों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। ‘‘19 जुलाई 1921 को उन्हें एक साल के सपरिश्रम कारावास का दण्ड दिया गया।’’ (पृ.62) ‘संयुक्त प्रांत के गुप्तचर विभाग के अभिलेख में बाबा राघवदास को एक खतरनाक वक्ता बताया गया था। (पृ.63) ‘अपने जेल जीवन के दौरान ही बाबा राघवदास गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुन लिए गए थे।’ (पृ.63)
राजनीति में रह कर राजनीति से विरक्त रहने वाले बाबा राघवदास ने अहिंसावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए एक विशेष नारा दिया था। लेखक के अनुसार,‘‘गोरखपुर जिला कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष बाबा राघवदास के नेतृत्व में चलने वाले ‘‘सनहा आन्दोलन’’ का नारा था-मर जाएंगे, पर मारेंगे नहीं।’’ (पृ.73) इस आन्दोलन के संबंध में लेखक ने एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया है-‘‘यह आन्दोलन सनहा ग्राम के कासिम अली द्वारा नोआडुमरी गांव के एक गरीब कांग्रेसी कार्यकर्ता की कुर्क की गई भैंस एक रुपए के प्रतीक मूल्य पर लेने, और फिर उसी दिन उसे गायब करा देने के विरुद्ध प्रारम्भ किया गया था। कांग्रेस के स्वयं सेवकों ने सनहा में कासिम अली के घर के पास घरना दे कर ‘हाय-तौबा’ के नारे लगाना प्रारम्भ किया। 45 दिनों तक चलने वाले इस आन्दोलन में स्वयं सेवकों पर पुलिस ने कई बार लाठीचार्ज किया और पन्द्रह स्वयं सेवकों को गिरफ्तार कर मुकद्दमा चलाया। गिरफ्तार स्वयं सेवकों को 6-6 महीने का कारावास का दण्ड दिया गया। पुलिस की इन कार्यवाहियों का कोई उत्तर न देकर स्वयं सेवक आन्दोलन में लगे रहे। ‘हाय-तौबा’ के निरन्तर लग रहे नारे से पागल हो जाने की स्थिति में पहुंच गया कासिम अली बाबा राघवदास के पास आया। उसके द्वारा लिखित रूप से क्षमायाचना करने पर ही यह आन्दोलन समाप्त हुआ।’’ (पृ.73)
डिग्बोई में सन् 1938-39 की मजदूर हड़ताल में भी बाबा राघवदास की अहम भूमिका रही। बाबा राघवदास की क्रियाशीलता से घबरा कर देवरिया के एस.डी.एम. ने उन पर गबन का झूठा मुकद्दमा चलाया। उन्हें दो वर्ष का कारावास का दण्ड दिया गया। इस दण्ड के विरुद्ध कैलाशनाथ काटजू ने बाबा राघवदास की ओर से अपील करते हुए मुकद्दमा लड़ा।
लेखक ने बाबा राघवदास के उन महत्वपूर्ण कार्यों को भी सहेजा है जो प्रायः अनदेखे कर दिए जाते हैं। राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दिए जाने की घटना का उल्लेख अधिकांश पाठ्यपुस्तकों में भी समाहित है किन्तु उनके अंतिम संस्कार किए जाने का जोखिम भरा कार्य किसने किया, यह कम ही पढ़ने को मिलता है। जबकि उन दिनों क्रांतिकारियों के शवों को जेलअधिकारियों द्वारा अनादरपूर्वक नष्ट कर दिया जाता था। परिवारजन को छोड़ कर अन्य लोग क्रांतिकारियों के शवों को अंतिमसंस्कार के लिए लेने से डरते थे कि कहीं अंग्रेज सरकार के कोप का भाजन न बनना पड़े। किन्तु ‘‘18 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर में प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को फांसी दिए जाने के बाद उनके शव का दाहसंस्कार बाबा राघवदास ने ‘स्वदेश’(गोरखपुर) के संपादक दशरथ प्रसाद द्विवेदी के सहयोग से किया था।’’ (पृ.94)
बाबा राघवदास द्वारा कराए गए ‘वरुण यज्ञ’, ‘कोल्हू सत्याग्रह’ तथा भू-दान आन्दोलन का उनके द्वारा संचालन जैसे ऐतिहासिक महत्व के तथ्यों को लेखक ने विस्तार से स्थान दिया है। बाबा राघवदास ने ‘कुष्ठ सेवाश्रम’ भी खोले। वे स्त्रियों के अधिकार और सम्मान के पक्षधर थे। स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने वाले बाबा राघवदास के कार्यों पर स्त्रियों को अगाध श्रद्धा थी। जिस प्रकार स्त्रियां महात्मा गांधी के विचारों पर विश्वास करती थीं, ठीक उसी तरह बाबा राघवदास के विचारों पर उन्हें विश्वास था। वे बाबा को अपना हितैषी मानती थीं। इस संबंध में लेखक ने उत्तर प्रदेश की भूतपूर्व मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी का उद्गार दिया है-‘‘बापू के उठ जाने के बाद हम नारियों के एकमात्र सच्चे नेता बाबा राघवदास ही रह गए हैं।’’ (पृ.185) 
‘‘मूल्यांकनःकृतित्व एवं व्यक्तित्व’’ अध्याय में लेखक ने बाबा राघवदास को ‘पूर्वांचल का गांधी’’ कहलाए जाने को सार रूप में रखा है। इस संबंध में अनेक विद्वानों के कथन के साथ ही आचार्य विनोबा का यह कथन बाबा राघवदास के व्यक्तित्व पर सटीक बैठता है -‘‘वे अत्यंत निर्मल पुरुष थे-बिलकुल औलिया। उनके हृदय को द्वेष या बैर कभी छू भी नहीं गया।’’ (पृ.188) स्वयं लेखक की यह टिप्पणी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि ‘‘यद्यपि बाबा राघवदास मूलरूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश से जुड़े हुए थे, तथापि उनका हृदय भारतमय था, जो भाषा, धर्म, जाति, प्रांत आदि सभी भेदों से परे था। सेवा की व्यापकता, विविधता और महत्व की दृष्टि से वह निश्चय ही अखिल भारतीय स्तर के कुछ इने-गिने कार्यकर्त्ताओं में एक थे।’’(पृ.188)
बाबा राघवदास के कृतित्व और व्यक्तित्व पर लिखी गई यह पुस्तक इस बात का स्मरण कराती है कि स्वतंत्रता संग्राम की अग्रिम पंक्ति में अनेक ऐसे सेनानी थे जिन्हें राजनीतिक चमक-दमक में पड़ कर लगभग भुला दिया गया। जिन लोगों ने पूरे देश के लिए अपना सर्वस्व दिया, उन्हें देशवासियों की स्मृतियों से दूर कर दिया गया। सचमुच डॉ. आमोद नाथ त्रिपाठी ने ‘‘पूर्वांचल के गांधी : बाबा राघवदास’’ लिख कर एक विशिष्ठ कार्य किया है। पुस्तक में ‘शुभाशीष’ लिखते हुए डॉ.चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने सही टिप्पणी की है कि ‘‘आज के विद्यार्थी शोध प्रबन्धों का महत्व समझते ही नहीं, और न समुचित परिश्रम करना चाहते हैं। उनके लिए यह शोध ग्रंथ पथप्रदर्शन का कार्य करेगा, ऐसी मेरी आशा है।’’
पुस्तक की भाषा, प्रवाह एवं मुद्रण चित्ताकर्षक है। भारतीय इतिहास एवं राजनीति में रुचि रखने वालों के साथ ही जीवनी पढ़ने वालों के लिए भी एक अत्यंत उपयोगी पुस्तक है।
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Wednesday, January 9, 2019

डॉ. शरद सिंह की किताब ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’ का विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में लोकार्पण

 
Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Deshbandhu, Sagar Edition, 09.01.2019
यह मेरे लिए गर्व और खुशी की बात है कि मेरी नई किताब ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’ का अकादमी सम्मान से सम्मानित देश की ख्यातिलब्ध वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुद्गल ने विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में लोकार्पण किया। उल्लेखनीय है कि किन्नर-जीवन पर आधारित उपन्यास के लिए ही चित्रा मुद्गल जी को अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया है। 
🙏मैं धन्यवाद देना चाहती हूं सामयिक प्रकाशन को जिसने मेरी पुस्तक को बहुत ही खूबसूरत ढंग से छापा है। 

🙏...और हार्दिक आभारी हूं अपने सागर शहर के जागरूक एवं संवेदनशील प्रिंट मीडिया की जिन्होंने आज मेरी पुस्तक के लोकार्पण के समाचार को प्रमुखता से स्थान दिया।
Hearty Thanks to ....
DainikBhaskar
Patrika
Aacharan
Sagar_Dinkar
Deshabandhu
Swadesh_Jyoti
Jagaran
Navdunia

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Jagaran, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Patrika, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Aacharan, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Pradesh Today, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Sagar Dinkar, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Swadesh Jyoti, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi,  Navdunia, Sagar Edition, 09.01.2019

Third Gender Vimarsh ( Book Cover ) Book of Dr Sharad Singh  डॉ. शरद सिंह की किताब ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh Release By Smt Chitra Mudgal  at World Book Fair Delhi, 07.01.2019

Dr Sharad Singh and Her New Book - "Third Genger Vimarsh"

 

चर्चा प्लस ... साहित्य पर भारी पड़ती राजनीति और भयभीत आयोजक - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
साहित्य पर भारी पड़ती राजनीति और भयभीत आयोजक
- डॉ. शरद सिंह
इस समय दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है। साहित्य की दुनिया का महाकुंभ। वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय मराठी साहित्य सभा के आयोजकों ने उद्घाटन कार्यक्रम के लिए लेखिका नयनतारा सहगल को भेजा गया आमंत्रण वापस ले लिया है, जिससे साहित्य जगत में चिंता की लहर दौड़ गई है। याद करना ही होगा कि इससे पहले नसीरुद्दीन शाह, प्रसून जोशी, जावेद अख़्तर, सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन को भी इसी तरह के कड़े विरोधों का सामना करना पड़ चुका है। क्या इस साहित्यकारों और कलाकारों पर राजनीतिक विचारों का दबाव बनाया जाना उचित है? प्रश्न विचारणीय है। 

चर्चा प्लस ... साहित्य पर भारी पड़ती राजनीति और भयभीत आयोजक - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Sahitya Pr Bhari Padati Rajniti Aur Bhayabhit Aayojak -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh

एक ओर देश की राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है, वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय मराठी साहित्य सभा के आयोजकों ने उद्घाटन कार्यक्रम के लिए लेखिका नयनतारा सहगल को भेजा गया आमंत्रण वापस ले लिया जाना साहित्यजगत को चिंता में डाल रहा है। अवार्ड वापसी अभियान से चर्चा में आई नयनतारा सहगल को कार्यक्रम में आमंत्रित किए जाने पर एक राजनीतिक संगठन ने इसमें बाधा पहुंचाने की कड़ी चेतावनी दी। जबकि राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की उपस्थिति में नयनतारा सहगल को 11 जनवरी को 92वें साहित्य सभा सम्मेलन का उद्घाटन कार्यक्रम तय किया गया था। सम्मेलन की अध्यक्षता करना है मराठी की विख्यात लेखिका अरुणा ढेरे को। सारा कार्यक्रम तय हो जाने के बाद, नयनतारा सहगल को आमंत्रणपत्र भेज दिए जाने के बाद एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए साहित्य सभा की स्वागत समिति के कार्यकारी अध्यक्ष रमाकांत कोल्टे ने बताया कि एक राजनीतिक संगठन की ओर से कार्यक्रम बाधित करने की धमकी के बाद यह फैसला लिया गया है कि नयनतारा सहगल के आमंत्रण को रद्द कर दिया जाए। यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि कोई अप्रिय घटना ना हो।
नयनतारा सहगल अंग्रेजी भाषा में लिखती हैं। इनका जन्म 10 मई 1927 को हुआ था। वे पहली भारतीय लेखिका हैं जिन्हें अंग्रेजी लेखन के लिए पहचान मिली। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित 91 वर्षीय लेखिका नयनतारा सहगल नेहरू-गांधी परिवार की सदस्य हैं। वे पंडित मोतीलाल नेहरू की बेटी विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं और पं. जवाहरलाल नेहरु की भतीजी हैं। उनकी किताबें बेस्ट-सेलर में गिनी जाती हैं। उन्होंने ‘‘द डे इन शेडो’’, ‘‘प्रिजन एण्ड चॉकलेट केक’’, ‘‘लेज़र ब्रीड्स’’, ‘‘रिच लाईक अस’’, ‘‘ए टाईम टू बी हैप्पी’’,‘‘मिस्टेकन आईडेंटिटी’’ जैसी अनेक चर्चित किताबें लिखी हैं।
मराठी साहित्य पर आधारित यह आयोजन 11 से 13 जनवरी तक होना है। ‘‘इंडियन एक्सप्रेस’’ के अनुसार लगभग एक महीने पहले सहगल को इस कार्यक्रम का उद्घाटन करने का निमंत्रण भेज दिया गया था। यह आयोजन अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल और यवतमाल के डॉ. वीबी कोलते संशोधन केंद्र अणि वाचनालय द्वारा आयोजित करवाया जा रहा है। आमंत्रण रद्द किए जाने पर लेखिका नयनतारा सहगल ने आयोजक समिति के कार्यवाहक अध्यक्ष रमाकांत कोलते को जवाब दिया है कि, ‘‘मैं समझ सकती हूं कि वर्तमान तनावपूर्ण परिस्थिति में आपको यह आमंत्रण रद्द करना पड़ रहा है। मुझे दुख है कि ऐसा हुआ।’’
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में ’’देश में बढ़ रही असहनशीलता’’ के खिलाफ 2015 में चलाई गई ’अवॉर्ड वापसी’ मुहिम की अगुवाई करने वालों में सहगल शामिल रही हैं। उस समय अकेली नयनतारा सहगल ने नहीं अपितु अशोक वाजपेयी, शशि देशपांडे, सारा जोज़ेफ़, सच्चिदानंदन के साथ ही कन्नड़ साहित्यकार अरविंद मालागट्टी और कुम वीरभद्रप्पा ने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करने की घोषणा की थी। मालागट्टी का कहना था कि ’’डॉक्टर कलबुर्गी की हत्या की वजह हम जानते हैं। हम इंतज़ार करते रहे कि अकादमी इस बारे में कुछ करेगी लेकिन उसके इस बारे में उसने कोई रुख़ अख़्तियार नहीं किया। दादरी की घटना और कलबुर्गी हत्याकांड इस बात का संकेत हैं कि न केवल संवैधानिक अधिकारों को कुचला जा रहा है बल्कि देश के सामाजिक तानेबाने को भी तोड़ा जा रहा है’’ उनके समर्थन में पंजाबी के नाटककार आतमजीत सिंह और साहित्यकार गुरबचन भुल्लर ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिए थे। वीरभद्रप्पा ने भी दादरी हत्याकांड और साहित्य अकादमी की कथित विफलता पर अपना विरोध दर्ज कराया है। इसी तरह पंजाबी के नाटककार आतमजीत सिंह और साहित्यकार गुरबचन भुल्लर ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिए हैं। आतमजीत सिंह पंजाबी के जानेमाने नाटककार, निर्देशक और रंगकर्मी हैं जिन्हें वर्ष 2009 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने पुरस्कार वापसी के संबंध में बताया था कि ’’मेरे देश में जो कुछ हो रहा है, मुझे बहुत बुरा लग रहा है। हमारी सरकार एक्शन लेती हुई नज़र नहीं आ रही है। हम बहुसंस्कृति वाले देश में रहते हैं जहां सब किस्म के लोग हैं। हमें एक-दूसरे के धर्म और संस्कृति की कद्र करना आना चाहिए। कोई अपनी सीमा लांघता भी है तो इसका मतलब उसे मारना नहीं होता है। भारतीय संस्कृति में किसी को जान से नहीं मारा जाता।’’
दिसम्बर 2018 में इंसानियत का रास्ता दिखाने वाले सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के शहर अजमेर में एक कलाकार के विरोध का जो तरीका देखने को मिला वह प्रजातांत्रिक तो हरगिज नहीं कहा जा सकता है। नसीरुद्दीन शाह एक संवेदनशील बेहतरीन कलाकार हैं और अकसर देश एवं समाज के बुनियादी सवालों पर अपनी राय रखते आए हैं। प्रजातंत्र प्रत्येक व्यक्ति को बोलने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन भीड़ की हिंसा पर दिए गए उनके बयान से उपजे विवाद ने उन्हें अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल नहीं होने दिया। दरअसल, 03 दिसंबर 2018 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में कथित गोकशी के बाद हिंसा भड़क गई थी। हिंसा के दौरान किसी ने इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को गोली मार दी गई थी जिससे उनकी मौत हो गई थी। नसीरुद्दीन शाह ने इस घअना के बाद एक वीडियो जारी किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘’समाज में जहर फैला हुआ है। मुझे मेरे बच्चों को लेकर चिंता होती है। अगर कभी भीड़ ने घेर कर उन्हें पूछ लिया कि तुम हिंदू हो या मुस्लिम तो वो इसका जवाब नहीं दे पाएंगे। देश में किसी पुलिसवाले की मौत से ज्यादा अहम गाय की मौत है।’’ उनके इस बयान को राजनीतिक रंग दे दिया गया और बीजेपी युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम स्थल के बाहर उनका पुतला फूंककर जबरदस्त विरोध किया और नसीरुद्दीन को पाकिस्तान जाने की सलाह दी, तो कई राजनीतिक दलों ने शाह के बयान को देशविरोधी करार दिया था। कुछ उनके बयान को पाकिस्तान परस्ती से जोडकर देख रहे थे। समाचार एजेंसी ‘टाइम्स नाऊ’ के अनुसार इस तरह के उग्र विरोध से घबरा कर अजमेर से कुछ दूर पुष्कर में बंद दरवाजों के पीछे अज्ञात जगह पर नसीरुद्दीन के लिए एक सेशन का आयोजन किया गया। इसका संचालन उर्दू लेखक सैफ मोहम्मद ने किया। यहां नसीर ने अपनी किताब “नसीर का नजीर फिर एक दिन“ का विमोचन किया।
इससे पहले 19 जनवरी 2018 साहित्य के महाकुंभ के नाम से प्रसिद्ध पांच दिवसीय जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ( जेएलएफ ) में करणी सेना ने ऐलान किया था कि वे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सेंसर बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी को नहीं घुसने देंगे। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में प्रसून जोशी बतौर गीतकार बुलाए गए थे। करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेडी ने विरोध जताते हुए कहा था कि ‘‘प्रसून जोशी ने चंद रुपयों के लिए मां पद्मावती का सौदा किया है और ऐसे इंसान को जयपुर में नहीं आने देंगे।’’ इसके अलावा जावेद अख्तर के नाम पर भी करणी सेना का विरोध था। करणी सेना ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि अगर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर आते हैं तो उनका विरोध किया जाएगा।
तमाम विरोधों के बाद समझौते हुए। फिल्म का नाम बदला गया और कुछ अंश काटने के बाद इसे न केवल सिनेमाघरों में बल्कि टेलीविजन के जरिए घर-घर में दिखाया जा रहा है। यह समझौते हिंसा और अपशब्दों के पूर्व पढ़े-लिखों की तरह किए जा सकते थे। इससे कलाकार की स्वतंत्रता का भी अपमान नहीं होता और संस्कृति के संदर्भ में हुई किसी भी भूल का सौजन्यता भरे वातावरण में सुधार हो जाता। इसी तरह सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन का भी विरोध किया गया था।
दरअसल, होना तो यही चाहिए था कि चाहे नयनतारा सहगल हों या नसीरुद्दी शाह या प्रसून जोशी याफिर सलमान रुश्दी, उन्हें मंच पर पहुंचने दिया जाता, अपना पक्ष रखने दिया जाता और फिर उसी मंच से उनके विरोधी उनके सामने अपना दृष्टिकोण भी रखते। यह सच है कि सभी राजनीतिक विचार कट्टर नहीं होते हैं। जैसाकि साहित्यकार रामवचन राय का कहना है कि ‘‘सत्ता का चरित्र हमेशा साहित्यकारों के दमन का नहीं रहा है तथा साहित्य की सत्ता राजनीति की सत्ता से कमतर नहीं होती।’’ वहीं रेवती रमन मानते हैं कि ‘‘साहित्यकार राजनीति के आगे मशाल जैसी जलने वाली सच्चाई है तथा साहित्य और राजनीति का संबंध द्वंद्वात्मक है और साहित्य की अपनी एक सत्ता है। साहित्य की सत्ता राजनीति को मशाल दिखाने का कार्य करती है।’’
वयोवृद्ध लेखिका नयनतारा सहगल का विरोध करने वालों को यह सोचना चाहिए कि आखिर लोग नयनतारा सहगल को जानना-समझना चाहते थे तभी तो आयोजक उन्हें आमंत्रित कर रहे थे। उनका आमंत्रण वापस करा कर उस समुदाय की इच्छा को ठेस पहुंचाई गई जो प्रत्यक्ष हो कर उस लेखिका के विचार सुनना चाहते थे। कोई भी विरोध कट्टरता भरे पूर्वाग्रह वाला हो तो वह उचित नहीं कहा जा सकता है। शास्त्रार्थ की परंपरा वाले इस देश में इस तरह की वैचारिक कट्टरता शोभा नहीं देती। यह संस्कृति को क्षति पहुंचाने वाला तत्व है। साहित्य पर भारी पड़ रही यह राजनीतिक कट्टरता चिन्तनीय है क्योंकि मौकापरस्त इस लाभ बड़ी आसानी से उठा सकते हैं। समय रहते इस कट्टरता को त्यागना जरूरी है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 09.01.2019)

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Tuesday, January 8, 2019

राष्ट्रीय सेमिनार में डॉ शरद सिंह द्वारा ‘‘स्त्री जीवन के स्वर्णिमकाल से परिचित कराती खजुराहो की मूर्तिकला’’ विषय पर अपना व्याख्यान

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018
प्रख्यात इतिहासविद एवं भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, दिल्ली के सदस्य डॉ. रहमान अली से मेरी मुलाकात हुई। अवसर था प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग डॉ हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया विषय था भारतीय संस्कृति को मध्य प्रदेश का योगदान"। यह विभाग का हीरक जयंती वर्ष है। इसी विभाग से मैंने एम.ए.(गोल्ड मेडल) एवं पीएचडी किया था। आयोजन में मैं और मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह आमंत्रित अतिथि के रुप में सम्मिलित हुए सुखद अनुभूति रही। इस अवसर पर मैंने ‘‘स्त्री जीवन के स्वर्णिमकाल से परिचित कराती खजुराहो की मूर्तिकला’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।   (18.12.2018)

विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे एवं विभाग के सभी सदस्यों का हार्दिक आभार!
Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali and Dr Nagesh Dubey in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018
Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh With Dr Rahman Ali in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Varsha Singh with Dr K K Tripathi in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh and Dr Varsha Singh in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Dr Sharad Singh and Dr Varsha Singh in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

Vice Chancellor Pro. R P Tiwari in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018


Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018
 
Dr Sharad Singh  in  National Seminar at Ancient Indian History Department, Dr Hari Singh Gour Central University Sagar 2018

पाठक मंच की सागर ईकाई की समीक्षा गोष्ठी में डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019
रविवार दिनांक 06.01.2019 को म.प्र.संस्कृति परिषद के अंतर्गत पाठक मंच की सागर ईकाई में वरिष्ठ कवि नरेन्द्र दीपक के गीत संग्रह - "और सोच में तुम" पर सम्पन्न हुई । इस समीक्षा गोष्ठी में मेरी दीदी डॉ. वर्षा सिंह मुख्य अतिथि थीं। विशिष्ट अतिथि डॉ. आशुतोष और अध्यक्ष कवि निर्मलचंद निर्मल थे। प्रश्नकाल में मैंने भी अपने विचार रखे। इस सफल आयोजन के संयोजक थे भाई उमाकांत मिश्र।

.....समीक्ष्य पुस्तक के संदर्भ में गीत विधा की वर्तमान दशा पर टिप्पणी करते हुए मैंने कहा कि- "साहित्य से गीत विधा सिमटती जा रही है। युवा रचनाकारों को गीत के संबंध में तथा गीत, नवगीत और ग़ज़ल में अंतर बताने तथा गीत के अंतरानुशासन को समझाने के लिए गीत विधा पर एक वर्कशॉप कराए जाने की आवश्यकता है जिससे युवा रचनाकार गीत के सृजन से जुड़ सकें।’’
Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

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Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

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Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Sharad Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

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Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019

Dr Varsha Singh in Pathak Manch Sagar Pustak Samiksha Goshthi 06 Jan 2019