Tuesday, April 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवंत कहानियों का संग्रह है “उस बहार का इंतज़ार” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जीवंत कहानियों का संग्रह है  “उस बहार का इंतज़ार”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - उस बहार का इंतज़ार
लेखिका - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
मूल्य - 400/-
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उर्मिला शिरीष हिंदी कथा जगत की वे वरिष्ठ कथाकार है जिन्हें लंबी कहानियों में तारतम्य बनाए रखने की महारत हासिल है। मैंने उनके अधिकांश उपन्यास और कहानियां पढ़ी हैं। उनकी हर कहानी का कथानक अपने आसपास का होता हुआ महसूस होकर भी चौंकाता है, अनूठा लगता है। कम पात्रों के होते हुए कहानी को हजारों शब्दों में साधना आसान काम नहीं है। कई बार कहानी के प्रवाह में ढीलापन आने की संभावना रहती है और जहां ढीलापन आ जाए वहां कथानक का तारतम्य में टूट जाता है। किन्तु उर्मिला शिरीष की हर कहानी कसी हुई रहती है। कहीं कोई भटकाव नहीं, कहीं कोई शिथिलता नहीं। हर पात्र इतना जीवंत कि अपने आसपास उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है। उर्मिला जी अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जिस खूबसूरती से करती हैं वह किसी कशीदाकारी से काम नहीं है। ये सारी खूबियां उनके कहानी संग्रह ‘‘उस बहार का इंतजार’’ की कहानियों में देखी जा सकती है।
उर्मिला शिरीष के रचना कर्म में शामिल हैं उनके चौदह कहानी संग्रह, पाँच कहानी संग्रहों तथा सात अन्य पुस्तकों का सम्पादन। तीन उपन्यास। एक साक्षात्कार, एक आलोचना तथा एक जीवनी (गोविन्द मिश्र) की पुस्तक। उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, ग्यारह लम्बी कहानियाँ, चयनित कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संकलित। मेरे साक्षात्कार । देश के विभिन्न भाषाओं में उनकी कहानियों और उपन्यासों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वे हिंदी की प्रतिष्ठित कथाकार हैं।
आधुनिक हिंदी कहानियां  यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई, महानगरीय बोध, और बदलते सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दर्शाती हैं। ये कहानियां आम जनजीवन, महानगरीय एकाकीपन, स्त्री-पुरुष संबंधों में जटिलता, भ्रष्टाचार और मध्यवर्गीय चेतना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। उर्मिला शिरीष की कहानी आधुनिक हिंदी कहानी की प्रवृत्तियां का बखूबी पोषण करती हैं। उनकी कहानियों में पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, अवचेतन मन और मानसिक उलझनों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। संयुक्त परिवार का टूटना, पीढ़ीगत संघर्ष (जेनरेशन गैप) और उपभोगवादी संस्कृति का प्रभाव का विश्लेषणात्मक पक्ष उनकी कहानियों में देखा जा सकता है। सरल, सहज आम बोलचाल की भाषा उनकी कहानियां को और अधिक आकर्षक बना देती है।
‘‘उस बहार का इंतजार’’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियां हैं। हर कहानी का शेड अलग है। संग्रह की पहली कहानी ‘‘चींटियों की रेस’’ उस भ्रम को तोड़ती है कि जहां धन-दौलत है वहां खुशियां और सुकून हैं। सुकून पाने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने जरूरी होते हंै। कहानी की नायिका सुजाता ऐसे ही कठोर निर्णय के दौर से गुजरती है जिसके आगे उसकी सुख शांति का घर हो सकता है लेकिन अब तक वह जहां थी वहां उपेक्षा की अतिरिक्त और कुछ नहीं था। यह कहानी एक तलाकशुदा स्त्री की कहानी है जो यथार्थ की कई परतें खोलती है। परिस्थितियों का खुलासा, परिवार के सदस्यों का असंतुलित व्यवहार और मानसिक अंतर्द्वंद का प्रभावी चित्रण इस कहानी की विशेषता है।
दूसरी कहानी है ‘‘बिंजो माय फ्रेंड’’। ये कहानी आज के यथार्थ को पूरी मार्मिकता से बयान करती है। इस कहानी में लगभग हर दूसरे या तीसरे घर की त्रासदी मौजूद है जहां गहरे अंधेरे की भांति अकेलापन है। बच्चों के पास जाकर न बसने की ज़िद और फिर अलगाव की सीमा तक टूटती संबंधों की डोर बेजुबान पशुओं में अपनापा ढूंढने लगती है। एक निर्मम, कठोर, कड़वा सच। किसी के भी अंतर्मन को झकझोरने में सक्षम है यह कहानी।
तीसरी कहानी है ‘‘नाच, कठपुतली’’। ‘कठपुतली’ शब्द अपने आप में विवशता का प्रतीक है। न चाहते हुए भी दूसरों के अनुसार जिंदगी जीने का प्रतीक है। कभी जीवन कठपुतली की तरह नचाने लगता है तो कभी लोगों का व्यवहार, उनकी मंशा, उनकी लालसाएं दूसरों को कठपुतली बनाने के लिए प्रेरित करने लगती है, अब यह उस दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहता है कि वह कठपुतली बनना चाहता है या अपने स्वाभिमान के साथ अडिग खड़ा रहना चाहता है। कहते हैं न कि मन के हारे हार है। यह कहानी अदिति नाम की स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है जिसे परिस्थितियां कठपुतली की तरह नाचना चाहती हैं लेकिन उसके भीतर की जिजीविषा उसे न झुकने का हौसला देती है।
चौथी कहानी है ‘‘हरा पत्ता’’। यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।
संग्रह की पांचवी कहानी है ‘‘मंदिर और कुआं’’ जिसका कथानक ग्रामीण परिवेश में पंच, सरपंच, पंचायत, मंदिर, कुआं आदि से सरोकार रखता हुआ गांव में आते जा रहे परिवर्तन को भी रेखांकित करता है। परंपराओं में होने वाला परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव को भी परिवर्तित करने लगता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद एक धुनकी की भांति मनुष्य को धुनने लगता है।
‘‘पराजय का समीकरण’’, ‘पीपल का पेड़‘‘, ‘‘विदा होती बेटियों की माँ‘‘, ‘‘लड़कियों की हँसी‘‘ और ‘‘ऑनस्क्रीन‘‘ कथन को की विविधता और पात्रों की मनोदशा को सामने रखने वाली कहानी है, जिनमें संवेदना, संवेग, सौजन्यता, परंपराएं, आधुनिकता एवं मूल्य बोध के विभिन्न रंग समय हुए हैं। यह सभी कहानियां मनुष्य के चरित्र विश्लेषण का रोचक आख्यान गढ़ती हैं।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘‘उस बहार का इन्तज़ार’’। दो संस्कृतियों के बीच उसे अंतर को व्यक्त करती है जो पारस्परिक संवेदनाओं एवं पारिवारिक गठन पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं, वही पाश्चात्य संस्कृति में रिश्तों का अर्थ व्यक्तिगत इच्छाएं मात्र होती हैं। जब वही पाश्चात्य भारतीय संस्कृति के संपर्क में आता है तो उसे संबंधों की महत्ता का भान होने लगता है। स्मिथ और संहिता के रूप में लेखिका ने तो विविध संस्कृतियों के जीवन पर प्रभाव को अपने कथानक में बखूबी पिरोया है। यह कहानी मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हुई भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को भी पुनर्स्थापना देती है।
‘‘उस बहार का इंतज़ार’’ उर्मिला शिरीष
की कहानियों का वह संग्रह है जो पाठकों को उनके कथा- कौशल के और अधिक निकट ले जाने में सक्षम है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी पठनीय हैं तथा रोचकता के साथ आत्म मंथन को विवश करती हैं।
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Monday, April 20, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जो कछू सीखने होए सो जे बच्चा हरों से सीखो, जिनगी बन जैहै | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जो कछू सीखने होए सो जे बच्चा हरों से सीखो, जिनगी बन जैहै
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
 
   का आए के अभई एमपी बोर्ड 10वीं के रिजल्ट खुले रए जीमें पन्ना जिले के गुन्नौर तसील के छोटे से गांव हिनौता की बिन्ना प्रतिभा सिंह सोलंकी ने गजबई  कर दओ। ऊने 500 में 499 नंबर ला के टॉप करो। इत्ते नंबर कछू कहाऊत आएं। ऊने जा दिखा दओ के जो मन में लगन होए तो कोनऊ बी मोड़ी कछू बी कर सकत आए। तनक सोचियो के बा मोड़ी स्कूल में पढ़बे के लाने 8 किमी रोजीना बस से ग्राम गन्नौर लौं आत-जात्ती। घरे लौट के बी बा खींबई पढ़त्ती। प्रतिभा के पिताजी भारतेंद्र सिंह उतई गांव में रोजगार सहायक आएं औ मताई सरकारी स्कूल में टीचर आएं। मने मीडिल किलास फैमिली कहाई। अपनी प्रतिभा से सबई खों चौंकाबे वारी प्रतिभा आईएस बनो चाऊत आए। रामधई, राम जी ऊकी मनोकामना पूरी करें ! 
     बाकी ई दार के दसमीं बोर्ड के रिजल्ट के टापर हरों की जा खासियत रई के उनमें कोनऊं धन्ना सेठ के इते के नोंई। कोऊ किसान को मोड़ा-मोड़ी आओ तो कोऊ छोटे सरकारी करमचारी को। एक मोड़ा को बापू तो फुलकी की ठिलिया लगाऊत आए। मने कोनऊं भौतई खात-पीयत घर को नोंई। मनो, पइसा की कमी, सुविदा की कमी कछू बी इने अव्वल आबे से रोक ने सको। सो, इन ओरन से हमें कछू सीखबो चाइए। का आए के मुतके जने तनक मुस्किल आए में घबड़ान लगत आएं। उने सूझत नइयां के का करो जाए। ऐसे में बे कछू ने कछू गलत कदम उठान लगत आएं। सो, भैया औ बैन हरों मुस्किल में रै के कैसे सफलता पाई जि सकत आए, जा सीखने होए तो जे टापर बच्चा हरों से सीखो।  सई में जिनगी बन जैहै।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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मां डॉ विद्यावती मालविका की पांचवीं पुण्यतिथि पर सीताराम रसोई में भोजन कराया - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩 कुछ देर पहले लौटी हूं सीताराम रसोई से मां की स्मृति में वृद्धजन को अपने हाथों से भोजन परोस कर... भोजन से पहले उनके साथ भजन भी गाए... उनके साथ कुछ देर को सुकून मिलता है... वरना उस दिन की याद आत्मा को कुरेदती है कि उस कोरोना काल में मां को चार कंधों पर नहीं बल्कि शव वाहन में विदा करना पड़ा था अंतिम यात्रा के लिए, जबकि उन्हें कोरोना नहीं था... टीस उठती है आज भी... वह तो भाई डॉ विनोद तिवारी जैसे समाजसेवी अनुज ने हर क़दम पर साथ दिया... सहयोग किया और मां की अंतिम यात्रा को सम्मान सहित पूर्ण कराया, अन्यथा मैं नहीं जानती कि उस समय क्या, कैसे हो पाता ....
      🚩हर वर्ष जब मैं सीताराम रसोई में वृद्धजन को भोजन परोस रही होती हूं ठीक उस समय मेरे भाई विनोद रेलवे स्टेशन में यात्रियों को निःशुल्क शीतल जल पिला रहे होते हैं.... मुझे पता है वह चाह कर भी मानव सेवा के उस काम को छोड़कर नहीं आ सकेंगे लेकिन मैं  सीताराम रसोई पहुंचने की सूचना एक दिन पूर्व उन्हीं के द्वारा प्रेषित करती हूं... 
     🚩मैं जानती हूं कि मेरी दानराशि अथाह सागर में एक बूंद के समान है किंतु वहां पहुंचकर जिंदगी का एक और रूप देखने को मिलता है... वहां भोजन करने वाले वे वृद्धजन हैं जिन्हें वहां से बाहर दो रोटी भी नसीब नहीं हो पाती है... 
 🚩सीताराम रसोई का प्रत्येक कर्मचारी बहुत मिलनसार और उदार है... वहां का भोजन भी सुस्वाद और उच्चकोटि का है... मैं हर वर्ष जब जाती हूं तो प्रसादी के तौर पर थोड़ा सा भोजन चखती जरूर हूं... इससे यह संतुष्टि भी हो जाती है कि वहां वृद्धों को अच्छा भोजन परोसा जा रहा है...
     🚩मैं आभारी हूं साहिल सिक्योरिटी सर्विसेज के डायरेक्टर पंकज शर्मा जी की जो विगत 4 वर्ष से लगातार मुझे सीताराम रसोई अपनी गाड़ी में मित्रवत ले जाते हैं क्योंकि मेरे घर से संस्था बहुत दूर है  ... शहर के बिल्कुल दूसरे छोर पर... और आज के दिन मेरी मनःस्थिति भी कुछ ठीक नहीं रहती है...
     🚩साधुवाद के पात्र हैं वे सभी लोग जो सीताराम रसोई को निरंतर चला रहे हैं...
     🚩यह पांचवा वर्ष है जब मैं मां की स्मृति में सीताराम रसोई में वृद्धजन को भोजन परोस कर आई हूं... 


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मेरी मां डॉ विद्यावती मालविका जी की 5 वीं पुण्यतिथि - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पूरे 5 वर्ष... हां, मेरी मां साहित्य साधिका डॉ. विद्यावती "मालविका" जी को मुझसे दूर गए पूरे 5 वर्ष हो गए... आज ही के दिन 20 अप्रैल 2021 को वे चिरनिद्रा में लीन हो गई थीं... 😔
   मां के जाने पर दीदी डॉ वर्षा सिंह जी ने यह पोस्ट लिखी थी कि 
"छोड़ गईं मां हमें अकेला | स्वर्गीय माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" की स्मृतियों को नमन | डॉ. वर्षा सिंह"
https://varshasingh1.blogspot.com/2021/04/blog-post_22.html?m=1
   तब क्या पता था की मां के जाने के ठीक 13 दिन बाद दीदी भी मुझे हमेशा के लिए छोड़ कर चली जाएंगी... 😥
    ये दुख एक चट्टान की तरह मेरे सीने पर ताज़िंदगी रखे रहेंगे... 😔
Miss You Maa 💔
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मां की एक कविता ...

प्रिय है धरा बुंदेली
 - डॉ. विद्यावती "मालविका"

मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, 
सागर झील सहेली।।

उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किया,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,

सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।।

महाकाल के चरणों में बचपन बीता 
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,

ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।।
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मां के साथ मेरी ये आखिरी तस्वीर ... तमाम परेशानियों के बाद भी तब हम बहुत खुश रहा करते थे क्योंकि मां साथ थीं...😔
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#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #डॉविद्यावतीमालविका 
#drvidyawatimalvika 
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Sunday, April 19, 2026

मित्रों के साथ डिनर और सुकून के पल - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रों के साथ डिनर और सुकून के पल होटल श्रीजी, सागर में - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, 18.04.2026

बतकाव बिन्ना की | बिना खबर करे धमकबे वारों को का करो जाए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
बिना खबर करे धमकबे वारों को का करो जाए 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      मैं भैयाजी के इते पौंची तो मैंने देखी के भैयाजी पलकां पे बैठे अखबार बांच रए हते औ भौजी चौका में हतीं। बे दिखा ने रई हतीं मनो सुना जरूर पर रई हतीं। अब आप सोच रए हुइयो के जो दिखा ने पर रओ, बा सुना कैसे पर रओ? हो सकत के बा गाना गा रओ होए जीसें अटकल लगा लई जाए। मनो गाना गाबे वारो चौका मेंई आए, जै कैसे पतो? सो बा ऐसे पतो के हमाई भौजी चौका में बासन पटका-पटकी कर रई हतीं। मनो बे तोड़-फोड़ ने कर रई हतीं, लेकन यां से वां जोर-जोर से उठा-धर कर रई हतीं।
‘‘भौजी खों का हो गऔ जो बे बासन काए पटक रईं? उनको मूड आपने बिगारो का?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम काए खों बिगारहें? हमने कछू नईं करो!’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘सो का बात हो गई?’’ मैंने पूछी।
‘‘मोए तो कछू बता नई रईं, तुमई पूछ लेओ। कओ तुमें कछू बता दैवें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भौजी! चाय बना रईं का?’’ मैंने उतई से बैठे-बैठे भौजी खों आवाज लगाई। 
‘‘बना तो नईं रए हते, मनो अब तुम आ गईं सो बना देत हैं।’’ भौजी ने उतई चौका से उत्तर दओ।
कछू देर में भौजी चाय ले के आ गईं। तब लौं हम दोई अटकल लगात रए के भौजी को का हो गओ?
‘‘का हो गओ भौजी? आपको मूड खराब सो दिखा रओ।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘खराब सो होई गओ आए।’’ भौजी भिनकत सी बोलीं।
‘‘का हा गओ? बताओ तो कछू।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अरे अब का बताएं! का भओ के आज तुमाए भैयाजी खों पोस्टआॅफिस जाने रओ कछू काम से। जे निकरे सो हमने सोची के हम कछू देर झपकी मार लेंवे। काए से के रात को नींद ऊंसई ने आई हती। बा आंधी-मांधी चली रई सो लाईट चली गई रई। गरमी से नींद ने आई रई।’’ भौजी बतान लगीं।
‘‘फेर?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर का? हमें झपकी लगई हती के दरवाजा की घंटी कोऊ बजान लगो। हमाई नींद खुल गई। हमने सोची के को हो सकत आए? हमने अबे औन लाईन कछू मंगाओ नईयां, सो बा डिलीवरी वारो हो नईं सकत आए। कोनऊं चिठिया लिखत नईयां सो पोस्टमेन के आबे को सवालई नईं उठत आए। जब लौं हमने अटकलें लगाई, उत्ते में तो बा आबे वारे ने इत्ती बेर घंटी बजा दई के हमें लगो के बा दरवाजा की घंटी बिगार के मानहे। हमें भौतई गुस्सा आई। हमने जा के दरवाजो खोलो। देखो तो समाने तुमाए भैयाजी के एक दोस्त ठाढ़े। हमने उनसे कई के भैयाजी तो घरे नइयां। का उने पतो रओ के आप उनसे मिलबे आने वारे हैं? मैंने उनसे पूछी। सो बे बोले के नईं, हम तो सरप्राईज देबे खों चले आए। चलो कोई नईं, उनको नईं तो आपके लाने तो सरप्राइज होई गओ। कैत भए बे दांत निपोरत भए सोफा में पसर गए। भौजी एक कप चाय सो पिला देओ। ऊपर से आदेस सोई दे दओ। हमाओ तो मूड़ भिनक गओ। मनो अब बे तुमाए भैया के दोस्त हते सो हम कछू कर्रो बोल नईं सकत्ते। मनो हमने इत्तो जरूर कओ के आपको आबे से पहले इनको मोबाईल पे घंटी कर लेने रओ, बे फेर कऊं ने जाते। जा सुन के बे दांत निपोरी करन लगे। बाकी हमने उनको चाय पिलाई। मनो तब तक हमाई नींद को बेड़ा गरक हो गओ रओ।’’ भौजी ने अपनी पूरी परेसानी बताई औ फेर बोलीं,‘‘अब तुमई बताओ बिन्ना के जो का बात भई? अरे आज के जमाना में तुमाए हाथ में मोबाईल रैत आए, एक घंटी करो औ पूछ लेओ के कबे आएं? कऊं ऐसे कोनऊं के इते धमकने परत आए?’’
‘‘सई कई भौजी। भौतई दिमाग खराब होत आए। मोरे संगे सो औरई सल्ल आए। कछू जने ऐसे आएं जो बिगैर घंटी करे आ धमकत आएं। औ होत का आए के जो मैं घर पे मिली सो चलो फेर बी ठीक, मनो जो मैं घर पे नईं औ तारो डरो मिलो तो बे उलायना देबे टिकत आएं के हम आए हते औ आप मिली नईं। अरे भैया, मोए सपनों ने आओ रओ के आप आ रए। मनो उनको का बे तो अपनी सुविदा देखत आएं। दूसरे का कां परी।’’ मैंने बी भौजी खों बताओ।
‘‘हऔ, मनो कोऊ सो रओ होए, कोऊ कछू काम करओ होए औ आप इकदम से धमक परो, सो मूंड़ सो भिन्नाहे ई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, तुमें ऊको भगा दओ चाइए रओ।’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘हऔ, आपई तो ऊकी तारीफें करत फिरत हो, सो हम कैसे भगा देते? फेर आपई कैते के हमाए दोस्त खों काए भगा दओ?’’ भौजी चिड़चिड़ात भई बोलीं।
‘‘सई में भौजी! ऐसो करबे वारों पे मोए सोई भौतई गुस्सा आत आए। आप खों याद हुइए के पैसे अपने मोहल्ला में एक डाॅक्टर साब रैत्ते। सो हम ओरन की चिनारी के जित्ते जने उनके इते दिखाबे के लाने आत्ते, बे सबई उते अपनो नंबर आने तक लौं मोए इते आ के बैठ जात्ते। अब उनको भगाओ बी नई जा सकत्तो औ कऊं जरूरी जाने हो तो जाते बी नईं बनत्तो। काए से के उनको लगतो के उने भगाओ जा रओ। बे ओरे बी फोन करे बिगैर आ जात्ते। मनो आ कछू क रै होओ, सबरे काम को राम नाम सत्त! अब्बी कछू जने ऐसे आएं के बिगैर घंटी मारे आ धमकत आएं। औ ने मिल पाओ सो बुरए बनो के मनो जानबूझ के घरे ने हते। उल्टो चोर कोतवाल खों डांटे।’’ मैंने कई।
‘‘ऐसई तो मोरे संगे एक दिन और भओ रओ। मैं अथानों डार रई हती के एक बाई अपने लोहरे मोड़ा के संगे चली आईं। हमने ऊसे कई बी के बाई आबे के पैले घंटी तो कर लेतीं। मनो बा बोली के हम इते से कढ़ रए हते सो हमने सोची के आप से मिलत चलें। मिलबो तो ठीक, मनो ऊको मोड़ा इत्तो ऊधमी के का बताओ जाएं। ऊनें हमाओ अथानों को मसालो बिगार दओ। अब बा तो बच्चा ठैरो। ऊसे हम का कैते, सो गम्मा खा के रै गए। मनो हमाओ पूरो अथानों खराब हो गओ। बड़ो नुकसान भओ। अब जो ऊने हमें फोन कर के बता दओ होतो के बा आ रई आए तो हम ऊ टेम पे अथानों ने डारते।’’ भौजी ने बताई।
‘‘सई में भौजी, बड़ो बुरौ लगत आए। एक तो आप कछू कै नई सकते औ अपनों सारो टाईमटेबल सोई गड़बड़ा जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘जे तो आए बिन्ना!’’ भैयाजी बोले,‘‘पैले जबे मोबाईल ने हतो तो चलो कछू नईं, बिन बताए पौंच गए सो पौंच गए। मनो अब तो पैले पूछ लेओ चाइए तब कोनऊं के घरे जाओ चाइए। अरे, सामने वारे की बी तो तनक सोचो। मोबाईल का सिरफ सोसल मीडिया खेलबे के लाने होत आए?’’ 
‘‘सई में भैयाजी! ऐसे सरप्राईज़ देबे वारे कोन पुसात आएं।’’मैंने कई। मनो तब तक भौजी अपने जी की कै के हल्की हो चुकी हतीं। बे अब तनक मुस्का-मुस्का के बतकाव कर रई हतीं। जा देख के मोए अच्छो सो लगो।    
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं के घरे जाबे के पैले फोन कर के ऊकी सुविदा जान लई चाइए के नईं, के ऊंसई धमक परने चाइए? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, April 16, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह प्रलेस की संगोष्ठी में

विगत 12.04.26 को प्रगतिशील लेखक संघ (मकरोनिया) की गोष्ठी हुई जिसमें प्रथम सत्र में वर्तमान युद्ध की स्थिति पर गहन चर्चा हुई तथा द्वितीय सत्र में काव्यपाठ किया गया। संचालन भाई सतीश पांडे जी ने तथा आभार प्रदर्शन प्रलेस के प्रदेश सचिव भाई पेट्रिस फुसकेले ने किया।
कुछ तस्वीरें, सौजन्य भाई मुकेश तिवारी जी ....
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