चर्चा प्लस
कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
v. महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।
कालिदास को प्रकृति का कवि कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में महान कवि और नाटककार कालिदास का एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं की शाश्वत सुंदरता और उनकी बेजोड़ महानता के कारण उन्हें न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में ‘‘प्रकृति के कवि’’ का सम्मानजनक खिताब मिला है। कालिदास का पूरा साहित्य पर्यावरण संरक्षण की भावना से ओत-प्रोत है। कालिदास ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकृति के प्रति अपने प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जागरूकता को व्यक्त किया है। महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि, महान कवि कालिदास की रचनाओं में प्रकृति के प्रति विशेष प्रेम दिखाई देता है। अपने महाकाव्यों में प्रकृति के वर्णन के माध्यम से, कालिदास ने न केवल प्रकृति की सुंदरता को उजागर किया है, बल्कि अपने नायक-नायिकाओं के माध्यम से आम जनता को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें नुकसान न पहुँचाने का संदेश भी दिया है। प्रकृति की विशेषताओं और महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने ‘‘ऋतुसंहार’’, ‘‘कुमारसंभव’’ और ‘‘रघुवंश’’ की रचना की है। अपने विश्व-प्रसिद्ध नाटक ‘‘अभिज्ञानशाकुंतलं’’ के मंगलाचरण में प्रकृति के मूल तत्वों (जल, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, पृथ्वी, वायु) की ‘‘अष्टमूर्ति देव’’ के रूप में स्तुति करते हुए उन्होंने प्रकृति के दैवीय स्वरूप को भी प्रस्तुत किया है।
कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ की शुरुआत हिमालय के प्राकृतिक वर्णन से करते हैं-
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।
‘‘कुमारसंभव’’ में बताया गया है कि पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए गौरी शिखर पर्वत पर जाकर तपस्या करने के लिए अपनी कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने सबसे पहले पौधे लगाए और अपने बच्चों की तरह ही रोज़ दूध जैसे पानी से उन्हें सींचा और उनकी देखभाल की। यह काम उनकी तपस्या का ही एक हिस्सा था, जैसे यज्ञ वगैरह। इसी तरह, ‘‘रघुवंश महाकाव्य’’ में सिंह और दिलीप के बीच बातचीत के दौरान, सिंह दिलीप को एक पेड़ के बारे में बताता है और कहता है कि ‘‘हे राजा! यह वही देवदार का पेड़ है जिसे शिव और पार्वती ने मिलकर अपने पुत्र की तरह पाला-पोसा था और जब हाथी ने रगड़कर उसकी छाल हटा दी, तो पार्वती को वैसा ही दर्द हुआ जैसा उन्हें राक्षसों के साथ लड़ाई में अपने बेटे कार्तिकेय के घायल होने पर हुआ था। कालिदास ने लिखा है कि पार्वती खुद पेड़ से गिरी हुई पत्तियाँ ही खाने के तौर पर लेती थीं ताकि हरी पत्तियाँ तोड़ने से पेड़ को तकलीफ़ न हो।
यह प्रकृति के प्रति मानवीय संबंधों की गहनता का द्योतक है कि कालिदास ने एक वृक्ष की पीड़ा से ठीक उसी प्रकार व्यथित होते हुए पार्वती को वर्णित किया जिस प्रकार एक माता अपने पुत्र की पीड़ा से व्यथित हो उठती है। कातिदास द्वारा किया गया यह वर्णन प्रकृति के प्रति तत्कालीन संवेदना को प्रमाणित करता है।
महाकवि कालिदास से जुड़ी हुई बहुप्रचलित रोचक कथा में भी प्रकृति से जीवन के मूल्यों को सीखने की शिक्षा दी गई है जिसमें बताया गया है कि जब राजा के सभासद किसी मूर्ख व्यक्ति को ढूढने निकले तो उन्हें एक ऐसा युवक दिखाई दिया जो एक वृक्ष की ऐसी डाल को काट रहा था जिस पर वह स्वयं बैठा हुआ था। इसी कथा से ही वह कहावत विकसित हुई कि ‘‘उस डाल को मत काटो जिस तुम स्वयं बैठे हो।’’ इस कथा की सत्यता की गहराई को छोड़ कर यदि इसके प्रकृति के पक्ष को देखा जाए तो इसमें प्रकृति के द्वारा जीवन की शिक्षा दे दी गई है। जबकि हमने इस शिक्षा को लगभग भुला दिया है। इसीलिए हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं लगातार उसे क्षति पहुंचा रहे हैं। डाल कटने पर डाल सहित से गिरने पर तो चोट ही लगेगी किन्तु पृथ्वी का संतुलन बिगड़ने पर पृथ्वी से जीवन का अस्तित्व ही मिट जाएगा।
कवि कालिदास का पौधों के प्रति लगाव इस बात से भी साबित होता है कि वे कहते हैं कि अगर कोई ज़हरीला पेड़ अपने-आप उग आए, तो उसे काटना नहीं चाहिए - ‘‘विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतं’’। वे आगे कहते हैं कि यह ज़हरीला पेड़ जीवों को नुकसान पहुँचाने के बजाय उनके लिए फ़ायदेमंद ही होगा।
वस्तुतः चाहे वनस्पति कितनी भी विषाक्त क्यों न हो, उसमें कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है। जैसे धतूरा विषैला होता है किन्तु औषधीय तत्वों से भरपूर होता है। हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों ने वैदिक ग्रथों में धतूरे को भगवान शिव का प्रिय बता कर उसके अस्तित्व को सुरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
‘‘रघुवंश’’ में ऋषियों की पत्नियों द्वारा हिरणों की अपने बच्चों की तरह देखभाल करने का वर्णन है। दूसरी ओर, कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ में लिखते हैं कि पार्वती की तपस्या के कारण तपोवन में एक-दूसरे के दुश्मन जानवर भी अपनी दुश्मनी भूल गए और बिना किसी बैर-भाव के प्यार से साथ रहने लगे। तपोवन में आकर, ब्रह्मचारी पार्वती से पूछते हैं कि ‘‘क्या बेलों और पेड़ों में नई कोंपलें ठीक से फूट रही हैं, क्या कोई रुकावट तो नहीं है? क्या जंगल का पानी आपके नहाने लायक है? क्या वे दूषित तो नहीं हैं?’’
कालिदास ने गर्मी के मौसम का वर्णन करते हुए, पशुओं के जीवन में पानी की ज़रूरत और पानी न होने पर उनके जीवन की भयावहता को दिखाया है। वे लिखते हैं कि ‘‘कितनी भीषण गर्मी है, सूरज की तेज़ धूप में सूखी घाटी में पानी की बूँदें मिलना भी मुश्किल है।श् तेज़ धूप और ज़बरदस्त प्यास से बेहाल हाथी पानी की चाह में यह भी भूल जाते हैं कि शेर उन्हें मार डालेगा। प्यास से व्याकुल होकर पानी की तलाश में वे शेर से भी नहीं डरते।’’
कवि कालिदास द्वारा वर्णित यह दृश्य प्रायः नेशनल जियोग्राफी अथवा बीबीसी अर्थ के कार्यक्रमों में दिखाई दे जाता है जिसमें आफ्रिका के मसाईमारा के जंगलों में सिमटे हुए जलस्रोत पर सभी प्रकार के वन्य पशु एक साथ पहुचते हैं पानी पीने। यह जियो या मरो का प्रश्न होते हुए भी चरितार्थ होता है। आखिर पानी जीवन का अति आवश्यक तत्व है।
कालिदास प्रकृति के कुशल चितेरे हैं। उनका प्रकृति वर्णन सूक्षम और यथार्थ है प्रकृति को जितना महत्त्व पूर्ण स्थान कालिदास के काव्य में मिला है उतना परवर्ती साहित्य में नहीं। नारी सौंदर्य एवं नायिकाओं के अलंकरण के लिए भी वे प्राकृतिक उपादानों का ही ग्रहण करते हैं। जैसे वसंत पुष्पों से अलंकृत पार्वती दृ
”अशोकनिर्भत्सितपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णकारम् द्य
मुक्ताकलापीकृत्सिन्दुवारं वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती द्यद्य” (कुमारसम्भवम् 3/53)
अर्थात अशोक के पुष्प से पद्मराग मणि का तिरस्कार करने वाले, सोने की कान्ति को ग्रहण करने वाले हार के समान किये गये निर्गुण्डी के पुष्पों वाले ऐसे वसन्त ऋतु के फूल रूप भूषण को धारण करति हुई (पर्वतराज कन्या दिखाई पड़ी।)
‘ऋतुसंहारं’ में एक श्लोक में कवि ने कहा है-
“विपांडूरं कीटरजस्त्रिन्नावितमं भुजंग्वाद्रकगतिप्रसपिर्तम”।
- अर्थात जब बरसात का पानी घरों के दीवारों से प्रथम बार टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनाता हुआ पीले-पीले के सूखे पत्तों को हटाता हुआ ऐसा प्रतीत होता है, मानो काला भुजंग वन में विचरण कर रहा हो।
‘‘मेघदूत’’ में भी प्रकृति के अनुपम वर्णन की छटा हमें बहुत ही प्रभावित करती है, कोई यक्ष जब पहाड़ी ढलान पर मेघ को देखता है तो वह यह मेघ से अत्यंत प्रभावित हो जाता है और उसी समय वह यक्ष कह उठता है- “धूमो ज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः”।
इस प्रकार धुँआ, अग्नि, जल और वायु के समन्वित रूप मेघ का ऐसा आकार कालिदास चित्रित करते हैं, मानो आकाश में मेघ स्वयं ही पर्वतशिखर- जैसा सजीव हो उठता है, न केवल मेघ अपितु मानचित्र से हिमालय की तराई में बसी अलका तक के वर्णन में कालिदास ने प्रकृति के विभिन्न क्षेत्रों का अत्यंत सजीव वर्णन किया है।
‘‘ऋतुसंहारम’’ छह ऋतुओं का संग्रह है जो एक प्रेमी द्वारा देखी जाने वाली अलग-अलग ऋतुओं के वर्णन के रूप में हैं। कालिदास का ‘‘ऋतुसंहारम’’ छह भागों में विभाजित है। सभी भाग 144 छंदों के साथ छह ऋतुओं से जुड़े हुए हैं। कविता में छह भारतीय ऋतुओं के लिए छह सर्ग हैं- ग्रिस्मा (ग्रीष्म), वर्षा (बरसात), शरत (शरद ऋतु), हेमंत (जाड़ा), सिसिर (शीतकालीन), वसंत (वसंत)। प्रत्येक ऋतु को दो महीनों में विभाजित किया गया है; सभी ऋतुएँ प्रकृति के चक्र के रूप में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह उस तालिका ऋतु का कालक्रम है, जिसे हिंदू चंद्र कैलेंडर में भारतीय 12 महीनों के छह मौसमों में विभाजित किया गया है।
‘‘मेघदूतम’’ में कालिदास ने पर्यावरण के लगभग सभी घटकों - अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, औषधि और वनस्पति आदि को प्रस्तुत किया है। ये सदैव बिना बदले की इच्छा के हमारी सहायता करते हैं, इसलिए ये देवताओं के समान हैं। इसके अधिकांश छंदों में पर्यावरणीय तत्वों का स्मरण किया गया है और यह संदेश दिया गया है कि प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए। पूर्वी मेघ में बाह्य प्रकृति का सबसे सुंदर रूप चित्रित किया गया है। एक ओर गंधावती, गंभीरा, चर्मण्वती, रेवा, जाह्न्वी, मंदाकिनी, यमुना, देवगंगा, सरस्वती जैसी नदियाँ हैं तो दूसरी ओर अलका, अवंती, विदिशा, कुरूक्षेत्र और उज्जयिनी ऊँची नगरियाँ हैं। कहीं रामगिरि, अमरकूट, देवगिरि, निचारगिरि जैसे पर्वत और पठार दिखाई देते हैं तो कहीं विशाल हिमालय, विंध्य और कैलाश। कहीं रामगिरि का पवित्र जल से भरा सरोवर है तो कहीं हंसों का प्रिय विश्व प्रसिद्ध मानसरोवर। कालिदास के काव्य में प्रकृति का सौंदर्य और प्रकृति के तत्व ही जीवन और संवेदनाओं के पर्याय हैं। इस प्रकार कालिदास का काव्य पर्यावरण और उसकी सुरक्षा के प्रति जागरूक प्रतीत होता है, हम बस इसे समझने की जरूरत है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 12.08.2026 को प्रकाशित)
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