Sunday, February 15, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | राजा हिमांचल के दमाद भोले दूला बने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
राजा हिमांचल के दमाद भोले दूला बने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
    लेओ आ गई शिवरातें। अपने बुंदेलखंड में शिवरातों को ऐसी धूम मचत आए, ऐसी धूम मचत आए के ने पूछो। सगरे शिव मंदरन में संकारे से भीर लगन लगत आए।  भीर काए ने परे अखीर शिवरातें में शिव औ पारबती को ब्याओ होत आए। शिव मने सबको भलो करबे वारे औ पारबती माता सो ऊंसईं ठैरीं ई जगत की जननी मने मताई। सो,  ई जगत की भलाई लाने जो ई जगत के पालनहार औ जगत की मताई को को ब्याओ होए तो खुसी तो मनाई जाहे। मनो जे सोचबे की बात आए के अपनी संस्कृति में शिव घांईं देवता सादगी के उदारण आएं। बे हिमांचल राजा के दमाद इएं मनो बे कोनऊं मैंगो कपड़ा नईं पैंनत, बे तो एक ठइयां बघम्मर लपेटे रैत आएं। गले मे सोना-चांदी की माला की जांगा एक ठइयां नागदेव पैने रैत आएं। मोटर-कार की जांगा बैलवा पे चढ़ के चलत आएं। मनो छवि ऐसी नोंनी के उने पाने के लाने पारबती जू ने तप करी। ऐसे देव  देवी को ब्याओ होए  मानुस ब्याओ को गानों ने गाऐं ऐसो कैसे हो सकत? अपने बुंदेलखंड में मुतके लोकगीत आएं जीमें शिव  पारबती के ब्याओ को सजीब वर्नन आए। जैसे एक गीत आए- “बन्ना जे देखे पेलऊ पेल, बैल पे झूमत आवे जू,
शंकर महादेव को ब्याव, भूतन की बारात आवे जू।”
     एक औ गीत आए जीमें गौरा जी को शिव जी के  ब्याहबे आबे की बात करी गई आए-
"हरे बांस मंडप छाए, गौरा जी को शिव जी बिहाने आए,
सेहरा में सांप विराजे, मुख पे भसम रमाए,
गौरा जी को शिव जी बिहाने आए..."
     औ जोन ने भोला की बरात देख लई ऊको इठलाबो देखतई बनत आए,-
"में तो देख आई, हे में तो देख आई,
लगन भोले की बारात, में तो देख आई,
अजब बारात है, अजब दूल्हा है..."
सो जे आए अपने इते की शिवरातों के मजे। सो, सबई जने हिलमिल के मंदर जइओ, शिव-पारबती के ब्याओ में शामिल हुइयो औ सबई के कल्यान की सोचियो।
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______________________😊
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, February 12, 2026

बतकाव बिन्ना की | काय, आज कौन सो डे आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | काय, आज कौन सो डे आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
काय, आज कौन सो डे आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘काए आज कौन सो दिन आए?’’ भैया जी ने भौजी से पूछी।
‘‘आज? आज बृहस्तपत वार आए, मनो गुरुवार। काए, जा काए पूछ रए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘औ कौन सो दिन आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आज 12 तारीख आए।’’ भौजी फेर के बोलीं।
‘‘अरे, हम तारीख नईं पूछ रए, हम दिन पूछ रए के आज कौन सो दिन आए, मने कौन सो डे आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘आज दसमीं तिथि आए। काए काल कछू की पूजा कराने है का?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने तुमसे तिथि नोंई पूछी। हम तुमसे जा पूछ रए के आज कोन सो डे आए?’’ भैयाजी ने कई।
‘‘हऔ, तुम तो ऐसे कै रए जैसे हमें डे को मतलब नईं पतो। डे मने दिन औ दिन मने तिथि। हमने आपके लाने पूरो तो बता दओ के आज गुरुवार, दसमीं तिथि आए औ कलेंडर के हिसाब से 12 तारीख आए। को जाने औ का पूछ रए हो आप?’’ भौजी झुंझलात भई बोलीं।
जा सब देख के मोए हंसी आन लगी। काए से के मोए समझ में आ गई हती के भैयाजी भौजी से का पूछबो चा रए। मैंने देखी की इते भौजी झुंझलान लगी हतीं औ उते भैयाजी बोर फील करन लगे हते सो मैंने दोई की मदद करबे की सोची।
‘‘भौजी, भैयाजी तिथि नोंई पूछ रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो, जे का पूछ रए? हमें तो कछू समझ ने आ रई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘जे बैलेंटाईन वारे डे के बारे में पूछ रए। के आज कोन सो डे आए?’’मैंने भौजी खों समझाई।
‘‘हैं? जे इनको का सूझ रई? अपन खों का लेने बैलेंटाईन से? औ वा बी ई उम्मर में?’’ भौजी कछू चकित भईं फेर झेंपत सी बोलीं।
‘‘सो ऊमें का भौजी? आप ओरें काए नईं मना सकत बैलेंटाईन? ऊमें का खराबी आए?’’ मैंने सोई जान के भौजी से पूछी।
‘‘नईं, मने खराबी तो कछू नईं। मनों कछू बी अच्छे से मनाओ जाए तो अच्छो है, लेकन जो आजकल मोड़ा-मोड़ी बैलेंटाईन के नांव पे अत्ते करन लगत आएं बा गलत आए।’’ भौजी ने बड़े पते की बात करी।
‘‘सई कई भौजी। कोनऊं को गुलाब को फूल भेंट करबे में कोनऊं खराबी नोंई, गर जो आपके मन में मैल ने होए।’’ मैंने भौजी को समर्थन करो।
‘‘तो का आज गुलाब मने रोज़ डे आए का?’’ भौजी ने पूछी औ भैयाजी के हातन की तरफी देखन लगीं के बे कऊं गुलाब ले के तो नईं आए?
‘‘हमाओ गुलाब कां आए?’’ भैयाजी के हातन में गुलाब को फूल ने देख के भौजी ने उनसे पूछी।
‘‘आज गुलाब डे नोंईं। बा तो 7 फरवरी को हतो, जब हमने तुमाई चुटिया में गुलाब खोंसो रओ।’’ भैयाजी शरमात भए बोले।
‘‘अरे, सो ऊ दिनां काए नईं बताओ हमें? खैर, सो आज का आए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘आज तो हग डे आए।’’ भैयाजी चुटकी सी लेत भए बोले।
‘‘का कई?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने कई आज हग डे आए, मने गले लगबे को दिन।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘कछू तो शरम खाओ। बिन्ना के आंगू हमसे ऐसो बोल रए।’’ भौजी झेंपत भईं बोलीं।
‘‘अरे, सो हम कछू गलत थोड़ेई कै रए। गले तो ईद, दिवारी पे बी मिलो जात आए। अबईं तुमई कै रई हतीं के जो मन में कछू गलत बात ने होए तो कछू में कछू दोस नईं आए। औ अब तुमईं मों बना रईं। मने तुमाए मन में कछू गलत वारे खयाल आए।’’ भैयाजी ने भौजी खों चुटकी लई।
‘‘हऔ, हमें पतो, हम तो ऊंसई कै रए हते।’’ भौजी अपनी बात सम्हारत भईं बोलीं।
‘‘तुमें तो याद बी ने हुइए के कोन सो दिन का कहाउत आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नईं याद, हमें सोमवार से ले के इतवार तक सबई दिन याद आएं। कौ तो सुनाएं, सोम, मंगल, बुध....।’’ भौजी गिनान लगीं के भैयाजी ने टोंको।
‘‘बस-बस, जे वारे दिन नईं पूछ रए। हम तो बैलेंटाइन वारे दिन पूछ रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें का पतो? औ काए याद राखें, कोन सी हमें बा दिन कोनऊं पूजा करने, के उपवास राखने?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बात तो तुमाई सही आए मनो, पतो तो होने चाइए के रोज डे से बैलेंटाइन शुरू होत आए। फेर प्रपोज डे, चाॅकलेट डे, टेडी डे, प्रामिस डे, हग डे, किस डे औ अखीर में होत आए बैलेंटाइन डे।’’ भैया जी ने भौजी खों बताई।
‘‘अरे, अरे, जेई तो सल्ल आए के किस डे पे सबरे खुल्लम खुल्ला... जेई से तो जा सब हमें नईं पुसात।’’ भौजी मों बनात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, अकेले में करो चाइए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘सो जो कैसो त्योहर कहाओ जोन को अकेले में मनाओ जाए? ईंसे तो अपने त्योहार नोंने के अबईं शिवरातें पे सबईं मंदिर जाहें उते शिव औ पार्वती जू के ब्याओ में सामिल हूंहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी, आप सई कै रईं। अपने इते के त्योहर ई टाईप के बनाए गए आएं जोन खों सब मिल के धूम-धाम से मना सकत आएं। ने कोऊ खों लट्ठ घुमाबे की जरूरत औ ने कोनऊं गलत हरकत। सब कछू अच्छो-अच्छो सो रैत आए। मैंने तो सोई ई बेर बड़े शिवजी लौं जाबे की सोस रईं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो अपन ओरें संगे चलबी। हम ओरें बी जेई बहाने दरसन कर आबी।’’ भौजी बोलीें।
‘‘जे ठीक रैहे। हम सोई सोस रए हते के ई बेर कऊं दरसन के लाने जाओ चाइए। बरमान में तो बड़ी भीर परहे। सो इतई ठीक रैहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘चलो तो जा पक्की रई। अपन ओरें बड़े शिवजी लौं चलहें। बाकी भैयाजी अब मोए जाबे की परमीसन देओ ताके आप अपनो हग डे कंटीन्यू कर सको।’’ मैंने भैयाजी खों टोंट मारी।
‘‘अरे, राम को नांव लेओ! हमें का करने हग डे को? तुमाई भौजी तो बरहमेस की हमाई आएं। इनें का एकई दिनां गले लगा के अफर जाहें का?’’ भैयाजी सोई हंसत भए बोले।
‘‘आप सोई कछू बी बके जा रए। कोनऊं हग-फग नईं होने। आप चलो औ अपनों काम करो।’’ भौजी झेंपत भईं भैयाजी खों झिड़कन लगीं।
‘‘सई में, मोए अब इते से चलो जाओ चाइए।’’ कैत भई मैं उठ खड़ी भई।
‘‘अरे, तुमें कऊं नईं जाने। हम नईं मानत जे सब। तुम तो इतई बैठो।’’ भौजी ने मोरो हात पकर के मोए बिठा लओ।
‘‘हम सोई कां मानत आएं, हम तो तुमाई भौजी सेे ऊंसई ठिठोली कर रए हते। ने तो हमें तो ई नांव से कछू औ सूझन लगत आए।’’ भैयाजी ठठा के हंसन लगे।
‘‘छी! आप औ!’’ भौजी मों दाब के हंसन लगीं।
रामधई! कछू बी कई जाए मनो अपने देस के त्योहार सई में त्येाहार घांई लगत आएं। जीमें खीब मजो आत आए। सबरे त्योहारन को कोऊ ने कोऊ मोसम औ प्रकृति से कछू ने कछू ताल्लुक रैत आए। अपने जे सबरे त्योहार बी तो आपस में हिल मिल के रैबो सिखात आएं। मोए तो सोई अपने त्योहार ज्यादई अच्छे लगत आएं। बाकी जोन खों जोन पुसाए, मोए का।
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे सोचियों जरूर के अपने त्योहार दुनिया में सबसे नोंने आएं के नईं? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, February 11, 2026

चर्चा प्लस | पुण्यतिथि पर विशेष | पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स” | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि पर विशेष 

पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स”

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ में एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर संघ अगाध विश्वास करता था। पं. दीनदयाल ने भी अपना सर्वस्व संघ के विचारों के पोषण एवं विस्तार के लिए अर्पित कर दिया था। उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था-‘‘ वे संसद के सदस्य नहीं थे लेकिन भारतीय जनसंघ के जितने सदस्य इस सदन में और दूसरे सदन में बैठे हैं उनकी विजय का, जनसंघ को बनाने का, बढ़ाने का यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह श्री उपाध्याय जी को है। देखने में सीधे-सादे लेकिन मौलिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता, दूरदर्शी नेता, सबको साथ ले कर चलने का जो गुण उन्होंने अपने जीवन में प्रकट किया, वह नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा।’’ 
     वह समय था जब एक ओर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की असामयिक संदेहास्पद मृत्यु और दूसरी ओर जनसंघ में अंतरकलह - ये दोनों कारण दीनदयाल जी को चिन्ता में डालने लगे थे। जनसंघ के अध्यक्ष पं. मौलिचन्द्र शर्मा से कार्यकर्ता रुष्ट होने लगे थे। जनसंघ के केन्द्रीय अधिकारी एकनाथ राणाडे के कारण भी संघ में असंतोष बढ़ने लगा था। इनके अतिरिक्त विभिन्न रजवाड़ों को जनसंघ से जोड़ने वाले वसंतराव ओक भी इस अंतरकलह के शिकार हुए और उन्हें जनसंघ छोड़ना पड़ा। 
एक समय ऐसा आया कि लगने लगा जैसे जनसंघ पूरी तरह टूट कर बिखर जाएगा। कलह से भ्रमित कार्यकर्ताओं ने भी संघ को छोड़ना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय राजनैतिक दल का दर्जा पा लेने वाला जनसंघ जैसे नेतृत्वविहीन हो गया हो। ऐसी विकट परिस्थिति में डाॅ. रघुवीर ने जनसंघ की अध्यक्षता सम्हाल ली। दुर्भाग्यवश सन् 1962 में एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही एक बार फिर जनसंघ में नेतृत्व का संकट गहरा गया। लेकिन दीनदयाल जी किसी भी परिस्थिति में जनसंघ का पराभव नहीं देख सकते थे। उन्होंने डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के अनुरूप संगठनकर्ता के रूप में सक्रिय राजनीति में भाग लेना तय किया। संघ के अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता भी उनके इस निर्णय से उत्साहित हो उठे। जनसंघ में मानों पुनः आशा की लहर दौड़ गई। किन्तु जनसंघ अंतर्कलह से पूरी तरह उबरा नहीं था, जिसका परिणाम शीघ्र ही सामने आया।

जौनपुर उपचुनाव  

दीनदयालजी जनसंघ की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कृतसंकल्प थे किन्तु वे स्वयं एक राजनेता के रूप में चुनाव लड़ कर पद प्राप्त नहीं करना चाहते थे। सन् 1963 में लोकसभा के उपचुनाव हुए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने दीनदयाल जी से आग्रह किया कि वे जौनपुर से चुनाव लड़ें। दीनदयाल जी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे किन्तु वे गुरूजी अर्थात् माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का आग्रह भी टाल नहीं सकते थे। 
भाऊराव देवरस ने दीनदयाल जी से संबंधित अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ‘‘हमारे तीस वर्ष के सहचर्य में उनके मन के विरुद्ध मैंने केवल एक ही बात की और वह थी उन्हें जौनपुर से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने को विवश करना।  सन्  1962 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के हारने के कारण जनसंघ की दृष्टि से लोकसभा में एक प्रकार की रिक्तता उत्पन्न हो गई थी। उसे भरने के लिए सबकी सम्मति थी कि पण्डित जी चुनाव लड़ें। लेकिन पण्डित जी इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे रहे थे। उनका कहना था कि मैं स्वयंसेवक और प्रचारक हूं। चुनाव लड़ना मेरे लिए उचित नहीं होगा। प्रचारक भी चुनाव लड़ते हैं, ऐसी गलत परिपाटी इससे पड़ जाएगी और भविष्य में संगठन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। हम सभी सहयोगियों ने एक मत से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा, तब कहीं वे माने।’’
अंततः दीनदयाल जी ने जौनपुर से नामांकन भर दिया और चुनाव की तैयारी करने लगे।  यद्यपि एक दिन उन्होंने अवसर पा कर अपने मन की बात गुरूजी से कह डाली थी कि ‘‘आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया। मुझे प्रचारक का काम ही करने दें।’’
इस पर गोलवलकर गुरूजी ने उन्हें समझाया था कि ‘‘तुम्हारे अतिरिक्त इस झमेले में किसको डालें। संगठन के कार्य पर जिसके मन में इतनी अविचल श्रद्धा और निष्ठा है वही उस झमेले में रह कर कीचड़ में भी कीचड़ से अस्पृश्य रहता हुआ सुचारु रूप से वहां की सफाई कर सकेगा।’’
जौनपुर में जनसंघ के कार्यकर्ता जातिवादी समीकरण का सहारा लेना चाहते थे। जाधवराव देशमुख के अनुसार कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी से निवेदन किया कि ‘‘कांग्रेस ठाकुरवाद चला रही है तो हम ब्राह्मणवाद चला दें। इसमें क्या हानि है? चुनाव-युद्ध में सभी कुछ क्षम्य होता है न!’’
यह सुन कर दीनदयाल जी क्रोधित हो उठे। वे कार्यकर्त्ताओं को डांटते हुए बोले-‘‘सिद्धांत की बलि चढ़ा कर जातिवाद के सहारे मिलने वाली विजय, सच पूछो तो, पराजय से भी बुरी है।’’
उनकी यह बात सुन कर वहां सन्नाटा छा गया। इस पर दीनदयाल जी ने संयत होते हुए शांत स्वर में समझाया -‘‘भाईयों! राजनीतिक दल के जीवन में एक उपचुनाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता, किन्तु एक चुनाव में जीतने के लिए हमने यदि जातिवाद का सहारा लिया तो वह भूत सदा के लिए हम पर सवार हो जाएगा और फिर कांग्रेस और जनसंघ में कोई अंतर नहीं रहेगा।’’
दीनदयाल जी का कहना था कि राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत, नीति और कार्यक्रमों में सुन्दर ताल-मेल चाहिए, टकराव या विरोधाभास नहीं। वे कार्यकर्ताओं के ही नहीं, अपितु जन-सामान्य के राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बल देते थे। वे मतपत्र को कागज का टुकड़ा न मानकर अपना अधिकार-पत्र मानने को कहते थे। इस संबंध में उनका सिद्धांत स्पष्ट था जिसे वे तीन बिन्दुओं के रूप में कार्यकर्त्ताओं एवं आमजन के समक्ष रखते थे -
1. वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स 
2. वोट फार पार्टी, नाट फार पर्सन 
3. वोट फार आइडियोलोजी, नाट फार पार्टी
जब चुनाव का परिणाम घोषित हुआ तो स्पष्ट हो गया कि जनसंघ में अंतर्कलह समाप्त नहीं हुआ था। जौनपुर में संघ के कुछ कार्यकर्ता ऐसे थे जो दीनदयाल जी की ‘आइडियोलोजी’ के समर्थन में नहीं थे और आरम्भ से ही चाहते थे कि दीनदयाल जी वहां से चुनाव न लड़ें। उन कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी के चुनाव अभियान को सहयोग देने के बदले उनका विरोध किया था। इसका मतदाताओं के मन पर बुरा असर पड़ा और दीनदयाल जी चुनाव हार गए। किन्तु उनकी संघ के प्रति तत्परता एवं निष्ठा का देश के अन्य कार्यकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्वयं दीनदयाल जी को इस बात का संतोष था कि भले ही वे उपचुनाव हार गए किन्तु उन्होंने अपने और संघ के सिद्धांतों को जातिवादी समीकरण की भेंट नहीं चढ़ाया। 
चुनाव में पराजय के बाद दीनदयाल जी के व्यवहार के बारे में भाऊराव देवरस ने अपने एक संस्मरण में लिखा कि ‘‘चुनाव में हारने के दूसरे दिन ही वे (दीनदयाल जी) काशी के संघ वर्ग में पहुंच गए। वहां उनका आचरण देख कर हम सभी लोग आश्चर्य पड़ गए कि इतने बड़े चुनाव में हारने वाले क्या ये ही दीनदयाल जी हैं? उनका अत्यंत सहज और शांत आचरण देख कर मैं स्वयं दंग रह गया था।’’
     चुनाव में पराजित होने के बाद पत्रकारवार्ता में एक सम्वाददाता ने उनसे प्रश्न किया कि ‘‘देश में जब कांग्रेसविरोधी वातावरण है तो आप चुनाव कैसे हार गए?’’ इस पर दीनदयाल जी ने विनम्रतापूर्वक बिना किसी संकोच के कहा कि ‘‘स्पष्ट बताऊं, मेरे विरुद्ध खड़ा कांग्रेस का प्रत्याशी एक सच्चा कार्यकर्ता है। उसने अपने क्षेत्र में पर्याप्त काम किया है, इसीलिए लोगों ने उसे अधिक मत दिए।’’
       गोलवलकर गुरूजी ने एक बार दीनदयाल जी के संबंध में कहा था ‘‘बिलकुल नींव के पत्थर से प्रारम्भ कर जनसंघ के कार्य को इतना नाम और इतना रूप देने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वह दीनदयाल जी को ही देना होगा।’’
 
जनसंघ के अध्यक्ष घोषित

सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी को दीनदयाल जी की क्षमता पर पूरा भरोसा था, इसीलिए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया।
दीनदयाल जी के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जिस जनसंघ को डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सुदृढ़ राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में देखना चाहते थे वह जनसंघ अब वास्तव में सुदृढ़ता प्राप्त करने वाला था। दीनदयाल जी के संगठनात्मक कौशल का लाभ जनसंघ को मिलने वाला था। दीनदयाल जी के द्वारा जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने से भारतीय राजनीति में पड़ने वाले प्रभाव पर शिकागो विश्वविद्यालय के लिए ‘‘जनसंघ आइडियोलाॅजी एण्ड ऑरगेनाइजेशन इन पार्टी बिहेवियर’’ विषय पर किए गए अपने शोध में वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन ने लिखा है कि ‘‘पण्डित दीनदयाल जी के सन् 1967 में जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने का यही अर्थ था कि दल की संगठनात्मक नींव डालने का काम पूरा हो गया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रबल प्रतिस्पर्धी के नाते सत्ता की प्रतियोगिता में उतरने का उसका संकल्प है।’’
यही तथ्य वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन एवं श्रीधर डी. दामले की पुस्तक ‘‘द ब्रदरहुड इन सेफराॅन: द राष्ट्रीय सेवक संघ एण्ड हिन्दू रीवाइवलिज़्म’’ (वेस्ट व्यू प्रेस, आई एस बी एन: 0-8133-7358-1) में सन् 1987 के संस्करण में प्रकाश में आया।
जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद दीनदयाल उपाध्याय का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। चुनावी रणनीति में भी उन्होंने स्वच्छ संकल्पना की और उसी पर अमल किया। उनके चुनावी आदर्श आज पथप्रदर्शक साबित हो सकते हैं और राजनीतिक स्वच्छता स्थापित कर सकते हैं, यदि कोई आदर्शों को आत्मसात करने का साहस करे।
(राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला के अंतर्गत सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी जीवनी-पुस्तक ‘‘दीनदयाल उपाध्याय’’ पर आधारित।)                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.02.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, February 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरणपुस्तक समीक्षा

व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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स्मारिका  - महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक   - मुकेश तिवारी
प्रकाशक  - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य - उल्लेख नहीं।
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यदि स्व. महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व की व्याख्या की जाए तो भगवद्गीता (12.13-14) का यह श्लोक सटीक बैठता है कि-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च,
निर्ममो निरहंकारः समदुखसुखः क्षमी।। 
- अर्थात जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, दयालु है, अहंकार रहित है और सुख-दुख में समान रहता है, वही वास्तव में सुसंस्कृत है। महेंद्र फुसकेले जी में सकल मानवता के प्रति दया, ममता, करुणा, धैर्य आदि सभी गुण थे। इस पर भी सबसे बड़ा गुण उनमें था सत्य की पक्षधरता का। प्रोफेशन से वे अधिवक्ता थे। श्रमिकों के प्रबल समर्थक थे तथा स्त्रियों के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर हिमायती थे। ऐसे ही व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मारिका का कोई औचित्य होता है।
महेंद्र फुसकेले जी के निधन (1फरवरी 2021) के उपरांत से प्रगतिशील लेखक संघ के सौजन्य से प्रतिवर्ष एक स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा। उन्होंने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन को जितनी सूक्ष्मता से सामने रखा, उतनी ही बारीकी से कविताओं के द्वारा स्त्री की दशा को अभिव्यक्ति दी। ‘‘आचरण’’ के इसी काॅलम के अंतर्गत स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने लिखा था कि ‘‘हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्मे, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। .... महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।’’
इस वर्ष की स्मारिका और अधिक विशिष्ट है क्योंकि इसमें महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह और श्री लाल शुक्ल की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनका भी स्मरण किया गया है तथा प्रेमचंद एवं कबीर के साहित्य पर भी लेख सहेजे गए हैं। कबीर वे कवि थे जिनके सामाजिक सरोकार अत्यंत विस्तृत थे। उनकी साखियां आज भी बेजोड़ हैं। साथ ही, उनकी ललकार की क्षमता का आज भी कोई सानी नहीं है। जहां तक प्रेमचंद का प्रश्न है तो वे हिन्दी साहित्य के वे बिन्दु थे जहां से हिन्दी कथा साहित्य ने सच्चे अर्थ में आधुनिक कथानक में प्रवेश किया तथा उस तबके से नाता जोड़ा जिसकी ओर साहित्यकारों की कलम का ध्यान कम ही जाता था।
श्रीलाल शुक्ल की पहचान उनकी स्पष्टवादिता से रही। उन्हें कालजयी बनाया उनकी रचना ‘‘राग दरबारी’’ ने। ‘‘राग दरबारी’’ हिंदी साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में लिखा था। यह उपन्यास भारत के ग्रामीण और अर्द्धदृशहरी जीवन की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक गिरावट का आईना है। इसकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और तीखे व्यंग्य से परिपूर्ण है। वहीं, नामवर सिंह हिंदी साहित्यिक आलोचना के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। वह प्रगतिवादी आलोचक होने के साथ-साथ नए आलोचकों में भी अपना अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना, संपादन, शोध, व्याख्यान और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचना के ‘रचना पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने वाले नामवर सिंह को उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
चाहे कबीर या प्रेमचंद हों, नामवर सिंह या श्रीलाल शुक्ल हों या फिर महेंद्र फुसकेले जी हों, इनका स्मरण इनके गम और कृतित्व के आधार पर ही किया जाता है, वस्तुतः व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी स्मृतियां रचता है तथा उसे कालजयी बनता है। जब व्यक्ति निज की चिंता को हाशिए पर रखकर सकल मानवता तथा विशेष रूप से उन लोगों के बारे में मनन चिंतन करता है जिन्हें समाज ने ही गौण बना दिया है तथा उनकी सदा उपेक्षा की है, तब चिंतन करने वाला व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतः विस्तार लेने लगता है। प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की इस स्मारिका में प्रस्तुत गद्य एवं पद्य सामग्री को पढ़कर इस तथ्य का प्रमाण हासिल किया जा सकता है। स्मारिका में महेंद्र फुसकेले जी पर पंद्रह लेख हैं- एडवोकेट के.के. सिलाकारी ने फुसकेले जीक्ष के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है “सागर के महान व्यक्तित्व श्री महेन्द्र फुसकेले”, गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख है  “मार्क्सवाद के प्रति सारा जीवन प्रतिबद्ध रहे कामरेड”, एडवोकेट अरविंद श्रीवास्तव ने लिखा है “कामरेड फुसकेले राजनैतिक घटनाक्रम से”। इनके साथ ही एडवोकेट ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने “श्रद्धांजलि: एक कम्युनिस्ट योद्धा”, वीरेंद्र प्रधान ने “नव लेखकों के प्रेरणास्रोत महेंद्र फुसकेले”, डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने “स्मृतियां जो धरोहर हैं”, प्रो. एन.के. जैन ने “संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी-फुसकेले जी”, एडवोकेट राजेश पाण्डेय ने “सत्यता के प्रतीक श्री महेंद्र फुसकेले जी” संजय गुप्ता ने “यादगार पल”, डॉ. बहादुर सिंह परमार ने “फुसकेले जी थे सर्वहारा वर्ग के मसीहा”, शैलेंद्र शैली ने “हमारे आदर्श और प्रेरक कॉमरेड”, डॉ राजेंद्र पटोरिया ने “सिद्धान्तवादी श्री महेन्द्र फुसकेले जी”, कामरेड चंद्रकुमार ने “स्मृति दिवस”, देवेंद्र सिंघई ने “बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री फुसकेले जी” तथा अजित कुमार जैन ने “कॉमरेड महेन्द्र कुमार फुसकेले” अपने लेख के रूप में महेंद्र फुसकेले जी का स्मरण किया है।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जो लेख स्मारिका में प्रकाशित किए गए हैं वे हैं - “नामवरसिंह: एक साथी, एक आलोचक”(नमृता फुसकेले), “नामवर जी को मैंने देखा है” (टीकाराम त्रिपाठी)। श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित लेख है डॉ. नमृता फुसकेले का “श्रीलाल शुक्ल जन्म शताब्दी स्मरण”।
कबीर पर लेख हैं - “मोकूँ रोए सोई जन, जो सबद विवेकी होए” (कैलाश तिवारी ‘विकल’), “कबीर के कथित स्त्री-विरोधी दोहों का सच” (डॉ सुश्री शरद सिंह), “कबीर और वर्तमान में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता” (सतीशचंद्र पाण्डे), “क्रान्तिकारी कवि कबीर” (टीकाराम त्रिपाठी), “कबीर का दर्शन” (पेट्रिस फुसकेले)  तथा “कबीर और किसान” (कैलाश तिवारी ‘विकल’) तथा  कबीर: एक दृष्टि निक्षेप (पी.आर. मलैया)।
प्रेमचंद पर लेख इस प्रकार हैं- “प्रेमचंद की दृष्टि में प्रेम वाया - प्रेम की वेदी’’ (डॉ सुश्री शरद सिंह), “प्रेमचंद के साहित्य में मानव प्रेम एवं राष्ट्रधर्म” (डॉ. महेंद्र खरे), “प्रेमचंद वर्तमान परिदृश्य और साहित्य में प्रासंगिक है” (एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले), “प्रेमचंद कल आज और कल”(कैलाश तिवारी ‘विकल’)।
इन सामग्रियों के अतिरिक्त दोहे, गजल, संस्मरण, कहानी, चौकड़िया, गीत, अठवाई आदि अन्य गद्य-पद्य रचनाएं समाहित हैं।
महेंद्र फुसकेले जी की जयंती पर प्रकाशित इस स्मारिका की विशेषता यह है कि इसका प्रकाशन व्यय मुख्य रूप से  फुसकेले परिवार तथा प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के कुछ सदस्य मिलकर वहन करते हैं। स्मारिका का मुद्रण निमिष आर्ट एंड पब्लिकेशन ने किया है जो कि नयनाभिराम है। कव्हर के अंतिम भीतरी पृष्ठ पर प्रगति लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। कलेवर की दृष्टि से यह स्मारिका प्रकाशित कर प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई ने एक नया प्रतिमान गढ़ा है तथा एक पठनीय एवं संग्रहणीय स्मारिका प्रकाशित की है।
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Saturday, February 7, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
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ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   आप ओरें सोच रए हुइयो के हम कोन की कै रए औ का कै रए? सो, ऐसो आए के हम अपनी ब्यथा कै रए, जो आप ओरन की सोई ब्यथा आए मनो आप ओरन खोंं ऊ तरफी ध्यानई ने जात आए। इत्ते सहूरी वारी पब्लिक औ कऊं ने हुइए जित्ती अपने ई सागर में आए। जो हम झूठी कै रए होए सो बताव हमें। हम आप ओरन खों अकेली दो रोडन पे लिवाऊत चल रए। पैली रोड आए राधा तिगड्डा से पुरानी अलंकार टॉकीज लौं की रोड। आप सोच रए हुइयो के हमने जामा मस्जिद से अम्बेडकर तिराहा की काए नईं कई? बोई रोड के इत्ते से टुकड़ा की काय कई? सो भैया, बा टुकड़ाई तो फंदा बनो डरो। बा टुकड़ा रेलपुल के नैंचे से निकरत आए। उते की रोड नाला पे बनी आए। उते बरसात में पानी भर जात्तो सो ऊके निस्तार के लाने रोड पे जाले लगा दए गए। मनो आज जे दसा आए के कोऊ जाला रोड ऊपर निकर आओ है, सो कछू रोड में नैंचें धंस गए आएं। इत्तोई नोईं एक जाला पे फथरा धरें हैं, औ बा एक तरफी से टूटो धरो है। जो कोनऊं भारी गाड़ी ऊपे से गुजरी सो बा जाला को हो जाहे राम नाम सत्त औ गाड़ी नाला में लटकी दिखाहे। 
  दूसरी रोड आए मकरोनिया से सिविल लेन की जी पे शंकरगढ़ के नजीक एक पानी की लेन को गढ़ा आए। बा बरहमेस बनो रैत आए। ऊके लिंगे से निकरो ऊको घेर के निकरने परत आए। एक तो वन-वे रोड  ऊपे घेर के निकरने में औ सकरौंदो हो जात है। मने इन दोई रोडन में एक्सीडेंट के फुल चांस। दोई में खूब भीर गुजरत आए, मनो ऐसो लगत आए के चाए परसासन होए चाए पब्लिक ने कोनऊं खों फिकर,  ने कोनऊं खों परी। सई कई न? सोंस के बताइयो!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, February 5, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह कर्क रेखा पर

बहुत कुछ कहती हैं रेखाएं 
ज़िन्दगी   पढ़ती  हैं रेखाएं
कभी  टुकड़े  करती हैं  ये
कभी खुद जुड़ती हैं रेखाएं 
          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक बार फिर कर्क रेखा पर मैं, सांची के निकट... 🚩
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #कर्करेखा #tropicofcancer
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Lines speak volumes
Lines read life
Sometimes they break into pieces
Sometimes the lines join together on their own
- Dr. (Ms.) Sharad Singh.
Once again on the Tropic of Cancer, near Sanchi... 🚩

बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     आज संकारे से भौजी को फोन आओ के गांकरें बना रए, आ जाओ। दुफारी को इतई जीमियो। काय से भौजी खों पतो के मोए गांकरें भौतई पुसात आएं। जो पिसी के आटा की होए तो कोनऊं नईं, बाकी जुंडी औ बाजरे के आटा की होए तो औरई मजा आ जात आए। भौजी को न्योतो सुन के मोए लगो के बे अकेली कां लौं बनाहें, सो मैंने सोई उनके इते पैलई पौंचने की सोच लई औ झट्टई तैयार हो के उनके इते जा पौंची।
‘‘चलो भौजी मैं सोई हाथ बंटा दे हौं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे कछू नईं हम तो अकेले बना लेते। बाकी जो अब तुम आ गई हो सो जा भंटा को भरता बनाओ, ज्यों लौं हम गाकरों के लाने आटा गूंथ लेत आएं। अपने भैयाजी खो सोई टेर लेओ। इतई गरमा-गरम बनात जाबी औ जीमत जाबी।’’ भौजी बोलीं।
मैंने भैयाजी खों टेर लगाई। बे सोई सपर-खोंर के भगवान खों अगरबत्ती लागा-लुगू के तैयार हते। मनो मोए गरमा-गरम गाकरों से कछू पुरानी यादें आ गईं।
‘‘भौजी, कछू कर लओ जाए पर मोए बा गाकरें आ लौं ने बिसरीं जोन की सुगंध मोए पन्ना में मिलत्ती।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अच्छा, उते तुमाए इते गाकरें बनो करत रई हुइएं।’’ भौजी गाकर की लोई अपनी गदेली पे थपियात भईं बोलीं।
‘‘नईं, घरे वारी नोंईं। उते का हतो के मोरे घर के इते रओ छत्रसाल पार्क औ छत्रसाल पार्क के सामने रओ बड़ो सो मैदान। बाकी अब बा मैदान नईं बचो, लेकन ऊ टेम पे रओ। उते इतवार की बजरिया भरत्ती। भौतई बड़ी वारी। दूर-दूर से किसान हरें अपनो नाज बैलगाड़ी में भर के दो दिनां पैले से आ जात्ते। उतई एक बड़ो सो कुआ रओ। ओई कुआ के पानी से बे सपरत्ते, ओई को पानी पियत्ते, ओई पानी से खाना बनाउत्ते और बोई कुआ के पानी अपने बैलन खों पियाउत्ते। उतई कुआ के दोई तरफी बे अपनो डेरा डारत्ते। उनके संगे उनके घर की लुगाइयां ने आउत्तीं। खाली मरद हरें आउत्ते। बेई कंडा बार के दोई टेम अपने लाने गांकरें सेंकत्ते और भरता बनाउत्ते। ऊ तरफी से कढ़ो तो इत्ती नोनी सुगंध मिलत्ती के का कई जाए। पेट चाए टनटना के भरो होए, मनो लगत्तो के एकाद गाकर खाबे खों मिल जाए।’’ मैंने बताई।
‘‘फेर कभऊं खाबे खो मिली के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी। 
‘‘मिली ना! बा कई जात आए ने के जां चाह उते राह, सो मोरो जुगाड़ बी बन गओ। भओ का के ऊ टेम पे मोरे कमल मामा जू पन्ना में हते। आप ओरें तो जानत आओ के बे बतकाव करे में उस्ताद हते। उन्ने एक किसान से दोस्ती गांठ लई। फेर एक दिनां ऊसे कई के मोरी भांजी खों तुमाए हाथ की गांकरे खाने। बा किसान भौतई खुस भओ औ ऊने मोए बड़े लाड़ से भरता औ टमाटर की चटनी के संगे गाकड़े खवाईं। औ आपके लाने बता दूं के उनके लिंगे सिल-बट्टा तो रैत नई हतो सो बे टमाटर खों कंडा में भून के हाथ से मसक-मसक के चटनी बनाऊत्ते। ऊमें हरी धनां सोई डरी रैत्ती। ऊंसी गांकरें मैंने फेर कभऊं कऊं ने खांईं। ऊको स्वादई कछू औ रैत्तो। जो आज के हिसाब से तनक सयानेपन से कई जाए तो ऊमें सई की माटी की सुगंध रैत्ती।’’ मैंने बताई।
‘‘होत आए। ऐसो सई में होत आए। हमें सोई याद पर रई के लरकपन में जब हम फुआ के इते जात्ते तो उनके इते उल्टे तवा पे रोटी सेंकी जात्तीं। मनो बोई पिसी को आटा लेकन हाथ से थपिया के उल्टो तवा पे सेंकी गई रोटियन को स्वादई कछू दूसरो रैत्तो। उते से लौट के जब अम्मा के हाथ की सीदे तवा की रोटी जीमत्ते तो बा स्वाद न मिलत्तो। हम अम्मा से कैत्ते के फुआ घांई रोटियां काए नईं बनाऊंत, तो बे हम ओरन खों डांट के कैत्तीं के उते जा के उल्टे तवा की रोटियां जीम-जीम के तुम ओरन को दिमाग उलट गओ आए। जो हम बना रए, खाने होए सो बई खाओ ने तो जाओ अपनी फुआ के घरे। अब फुआ के घरे जा के बरहमेस तो रै नईं सकत्ते, सो मों दाब के अम्मा की बनाई रोटियां खान लगत्ते।’’ भैयाजी ने हंसत भए बताई।
‘‘ऊको कल्ला कओ जात आए। बा मिट्टी को होत आए। बाकी कोनऊं के लिंगे कल्ला ने होए तो बा तवा उल्टो कर के बी रोटियां सेक लेत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो ऐसई तो हमाए संगे रओ के हमें लकड़ी के चूला की रोटियां नोंनी लगत्तीं। फेर जब घरे गैस चूला आ गओ सो ऊपे सिकीं रोटियां हमाए गले से ने उतरत्ती। ऊ टेम पे हमाए बाबू कओ करत्ते के गैस चूला को बनो खाना मनो अच्छो तो नईं लगत, पर एक दिनां ऐसो आहे के चूला के लाने लकड़ियां ने मिलहें औ हमें जेई पे पको खाना खाने परहे। फेर भओ बी बोई। आज देख लेओ, चाए भरता बनाने होए चाए गाकरें बनाने होंए, गैस चूला पे बनत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘गैस चूला भर नोईं भौजी, अबतो माइक्रोवेव ओवन में बनत आए। मैं सोई भरता को भंटा ओवन में भूनत हौं। औ संगे बाटी बनाने होए तो ओवन में बनत आएं बाटियां।’’ मैंने कई।
‘‘मनो ऊको स्वाद ऊंसो सो नईं रैत जैसे कंडा में सिंकी बाटियन को होत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब तुम ओरन ने इत्ती बतकाव कर लई गाकरों औ बाटियन की के मोरो जी कर रओ के कऊं बायरे चलें औ उतई गाकरें बना के खाएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। घूमें फिरे से मन अच्छो रैत आए। कछू हवा-पानी बदलो चाइए। जेई घरे पिड़े-पिड़े बोरियत सी होन लगत आए। चलो ने कछू पिलान बनाओ जाए।’’मैंने तुरतईं कई। काय से के मैं तो मनो जनम से घुमक्कड़ ठैरी। मोए घूमबो-फिरबो भौतई पुसात आए। 
‘‘हऔ, शिवरातें सोई आ रई। शिवरातों पे चलो जाए कऊं। जटाशंकर कैसो रैहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ चल तो सकत आएं मनो जटा शंकर में भारी भीर उमरहे, सो कऊं देहात के मेला वारे मंदिर में चलो जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपने सई कई। मेला की भीर से मोए याद आ गई के एक दार मैं मोरी दीदी  औ एक भैयाजी पन्ना में चैमुखनाथ के मेला गए। उते भौतई भीर हती। सो मैंने दीदी को हात पकर लओ औ भैयाजू ने दीदी को हात पकर लओ, के हम ओरे कऊं बिछर ने जाएं। उते भीर इत्ती के बीच में लुगााइयों को झुंड सो आओ औ बा चक्कर में भैयाजू से दीदी को हात छूट गओ। थेड़ी देर चलत-चलत दीदी की हंसी फूट परी। मैंने पूछी के का भओ? सो बे बोलीं के देखो भैयाजू कोन को हात पकरे जा रए। मैंने देखी, बे सई में एक देहातन बिन्ना को हात पकरे चले जा रए हते औ बा बिन्ना बी गजब की कहानी, जो बा उनके संगे चलत जा रई हती। फेर हम ओरें तनक तेजी से आगे बढ़े औ भैयाजू खों टोंका मारो सो उन्ने देखो के बे तो दीदी की जांगा कोऊं औ को हात पकरे जा रए हते। उन्ने तुरतईं हात छोड़ो। फेर बे सोई देर तक हंसत रए। सो जो भारी भीर होए तो कछू बी हो सकत आए। अपन तो कम भीर वारी जांगा पे चलहें।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो पक्को रओ। जा शिवरातें में अपने खों कऊं ने कऊं बायरे चलने।’’ भौजी बोलीं। औ उन्ने थाली परसबे को इसारा करो, सो मैंने थाली परसी सुरू करी। थारी में भंटा को भरता, आम को अथान, मूरी औ टमाटर की चटनी के संगे तनक सो नोन रखो। गिलासन में पानी भरो। तब लौं भौजी गांकरें सेंकन लगीं। कछू-कछू ओई टाईप की सुगंध रई जैसी पन्ना की बजरिया में बा किसानों के बनाबे पे लगत्ती, मनो वैसी ने हती। ऊकी बातई कछू औ हती। 
असल में होत का आए के जमीन से जुरो जो कछू होत आए बा ज्यादई अच्छो लगत आए। काए से के बा अपनी असल जिनगी से जुरी होत आएं। सो बे चीजें कैसे भुलाई जा सकत आएं। औ भूलबो बी नई चाउने। सो, हम ओरे जेई सब बतकाव करत भए जीतन लगे। 
बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। कभऊं-कभऊं आप ओरें बी अपने पांछू की जिनगी खों याद कर लओ करे। ईसे बड़ो सुख मिलत आए। सई मानो!  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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