Thursday, June 4, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       जा राजनीति बी गजबई की चीज आए। जोन की लाग लग गई बा सातमें आसमान पे औ जोन की ने लगी बा कऊं को नईं। चार दिनां से भैया औ भौजी बायरे गए सो उनसे बतकाव ने हो पा रई, बाकी असल तो आप ओरें हो जोन से जी भर के बतकाव करी जा सकत आए। का आए के जब कोऊ बड़ो चुनाव जीत जात आए तो ऊके गुट के छुटभैया हरें ऐसे उचकत फिरत आएं मनो सगरे तीर उनईं ने चलाए नए होंए। बे इतरान लगत आएं। कछू के कछू बकन लगत आएं। जे बरहमेस चलत आ रओ। जेई टाईप की दो किसां आएं महाभारत वारे अर्जुन औ भीम की। सो, पैले सुनों आ ओरें अर्जुन की किसां।
का भओ के जबे महाभारत की लड़ाई खतम भई तो पांडव हरन खों राज मिल गओ। एक दिनां अर्जुन ने दरबार में कई के ‘‘हम सबसे बड़े तीरंदाज आएं। जो हमने अपने तीर से कर्ण खों ने मारो होतो तो आज कओ दुर्योधन हरें इते बैठे राज करत दिखाते। बा हमई हते जोन ने भीष्मपितामह जू के लाने अपने तीरन से बिछौना सो बना दओ रओ। औ हमई हते जोन ने अपने तीर से धरती खों फाड़ के भीष्मपितामह जू को पानी पिलाओ रओ।’’
उते जोन चमचा टाईप के दरबारी हते बे अर्जुन की जा बात सुन के उनके जैकारे लगाऊंन लगे। जा देख के किसन भगवान खों अच्छो नई लगो। उन्ने अर्जुन से कई के ‘‘बा सब तो ठीक आए, मनो तुमें ऐसो बखान नईं करो चाइए। सब कछू तुमाओ करो भओ नइयां।’’
जा सुन के अर्जुन खों लगो के किसन भगवान हमाए सारथी बने रए, जेई से अपनी तारीफ ने सुन के इने बुरौ लग रओ आए। सो बा बोलो के ‘‘आप सबई जान लेओ के हमाए रथ को हांकबे वारे जे किसन जू रए जेई से हम सई-सई तीर चला पाए।’’
ऊकी बात सुन के किसन भगवान समझ गए के जा अर्जुन ऐसे ने मानहे, ईकी आंखें खोलनई परहें।
कछू नईं! किसन भगवान ने घूमबे को प्रोगराम बनाओ। बे पाचों पांडो हरों खों ले के चल परे। एक जांगा पे पतरी सी नदी परी। ऊमें पानी बी कमई रओ। अर्जुन ने अपनों रथ बा नदी में उतार दओ के नदी पार करी जा सके। सबरे भैयन को रथ नदी पार पौंच गए मनो अर्जुन को रथ बीच नदी में पौंच के धसन लगो। अर्जंन ने भौतई कोसिस करी पर रथ को धंसबो ने थमो। अब अर्जुन तनक घबड़ानों। बा रथ से उतर के रथ को चका उठाबे की कोसिस करन लगो। पर कछू फरक ने परो। तब ऊने किसन भगवान से कई के ‘‘आप रथ पे बैठे आओ, जेई से जो धंसत जा रओ आए। अब तनक उतर आओ।’’
किसन भगवान अर्जंन के कए पे रथ से उतर गए। उनके उतरतई सात रथ के चका औ तेजी से धंसन लगे। अर्जंुन रथ के चका निकारबे के लाने जित्तो जोर लगातो, उत्तई बे धंसन लगते। अर्जंन थक गओ। तब ऊने किसन भगवान से पूछी के ‘‘जो सब का हो रओ? सबके रथ कढ़ गए, मनो मोरो रथ बीता भर पानी बारी नदी में बूड़त जा रओ। हमें तो कछू समझ में नईं आ रओ। हम उतर गए, आप उतर गए रथ पे कोनऊं ने बचो फेर बी रथ फंसो डरो। मनो चुल्लू भर पानी में डूब के मरो चात होए। कछू समझ नईे आ रई के जे का लीला आए?’’
‘‘बात जे आए अर्जुन के तुमा जे रथ खों ने तो हमने सम्हारो रओ और ने तो तुमने। ईको सम्हारबे वारो भौतई वजनदारी वारो आए। औ अबे उन्हई की वजनदारी के कारन तुमाओ रथ धंसो जा रओ।’’ किसन भगवान ने समझाई।
‘‘सो को आ बे? जिनके कारन हमाए रथ की जे दसा भई जा रई।’’ अर्जुन ने पूछा।
‘‘तनक इते आओ औ देखो को आ तुमाए रथ पे?’’ किसन भगवान बोले।
‘‘को आ?’’ कैत भए अर्जुन ने ऊ तरफी देखी जी तरफी किसन भगवान देख रए हते।
‘‘उते का दिखा रओ? उते तो पतरो सो झंडा लगो आए। उते तो एक ठंइयां बंदरा लौं नइयां।’’ अर्जुन बमकत भओ बोलो।
जेसई अर्जुन ने इत्तो बोलो के बा पतरो सो झंडा जोर से हलो औ ऊमें से हनुमान जू निकरे औ अर्जुन से बोले के ऐसो कै के तुमने ठीक नईं करो।’’
फेर बे गायब हो गए। जा देख-सुन के अर्जुन घबड़ानों।
‘‘जे हनुमान जू इते का कर रए हते? औ अब कां चले गए? अरे, जे हमाओ रथ तो ऊपरे निकर आओ।’’ कैत भओ अर्जुन थर-थर कांपन लगो।
‘‘अर्जुन भैया, तुम आओ मूरख। अरे हनुमान जू तो पूरे जुद्ध के टेम पे अपन दोई के संगे रए। तुमाए रथ खों बेई तो दाबे रए ने तो कर्ण के तीरन की आंधी में तुमाओ रथ उड़ गओ होतो औ तुम धूरा चाट रए होते। हनुमान जू तुमाए रथ के झंडा पे सवार रए आए जेई से तुमाओ रथ सई-सई चलत रओ। जेई से तुम जीत पाए।’’ किसन भगवान ने असल बात बताई। फेर बोले के तुमने बंदरा वारी बात बोल के उने नाराज कर दओ आए। सो लौट के चलबी तो उनसे माफी मंगा लइयो।’’
जा सुन के अर्जुन रोन लगो औ बोलो के ‘‘हमाओ दिमाग चल गओ रओ। हमें घमंड आ गओ रओ। हम आप से माफी मांगत आएं औ संगे हनुमान जू के सोई पांस पकर लेबी।’’ अर्जुन बोलो।
‘‘तुमें कछू करबे की जरूरत नइयां, बस इत्तई करो के जुद्ध जीतबे पे घमंड ने करियो। घमंड को फल करओ होत आए।’’ किसन भगवान बोले।
अर्जुन खो अपनी गलती समझ में आ गई औ ऊने घमंड करबो छोड़ दओ। मनो आजकाल के छुटकुल नेता हरो के समझ के लाने कोनऊं ने तो किसन भगवान आएं औ ने तो हनुमान जू। सो बे तो इतरातई रैंहें। संगे कछू बी बकत रैंहे।
रई दूसरी किसां की बात, बोई भीम वारी तो सो बा अगली बेर सुनाबी। ने तो दोई गड्मड् हो जाहे।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं बी राजनीतिक पार्टी के छुटुकुल नेता हरें बकर-बकर कर के अपनी पार्टी खों कित्तों नुकसान पौंचात आएं? सो इनपे लगाम कैसे लग सकत आए?      
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, June 3, 2026

चर्चा प्लस | क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा?      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                    
     यह सच है कि हममें से 99 प्रतिशत लोगों ने कभी खुद जाकर ग्लेशियर नहीं देखे हैं; उन्हें केवल टीवी या इंटरनेट पर ही देखा है। ग्लेशियरों को पिघलते हुए भी हमने सीधे तौर पर नहीं देखा है। तो फिर हमें इस बात की चिंता क्यों करनी चाहिए कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जबकि हम तो मैदानी इलाकों के निवासी हैं? हालाँकि, हम मैदानी इलाकों के निवासियों ने तो कभी बर्फबारी भी नहीं देखी है। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो पूरा मैदानी इलाका भी शीत लहरों की चपेट में आ जाता है। राजस्थान की गर्म हवाएं मध्यप्रदेश को झुलसा देती हैं। तो क्या हमें सचमुच चिंता नहीं करनी चाहिए?
सागरवाले कौन हैं? मैं सागरवाली हूँ। हाँ, मैं सागर में रहती हूँ, जो भारत के दिल यानी मध्य प्रदेश में स्थित एक विकासशील शहर है, और इसीलिए मैं सागरवाली हूँ। कुछ दिन पहले मैं एक परिचित से चर्चा कर रही था कि आजकल मौसम बहुत अस्थिर हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मौसम भी बदल रहा है, जिसे हम अपने जीवन में ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। माफ़ कीजिए, जब तक हम इसे समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। मेरे परिचित ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि मौसम तो बदलता ही रहता है, इसमें चिंता की क्या बात है? इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आप बेवजह ही जलवायु और मौसम को लेकर चिंता करती रहता हैं। अरे, जिस जगह पर हम रहते हैं, वहाँ इन सब चीज़ों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मैंने कहा - वाह! क्या आपने वह कहावत नहीं सुनी है कि अगर धरती पर एक पत्ता भी हिलता है, तो उसका असर दूर अंतरिक्ष तक होता है? तो जब धरती पर ही कोई घटना घटती है, तो उसका असर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक ज़रूर होगा। अब देखिए, जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसका असर पूरी धरती पर पड़ना स्वाभाविक है। यह सुनकर उन्होंने कहा, ‘‘आप कहती हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और यह चिंता का विषय है। बेशक यह चिंता का विषय होगा, लेकिन हमारे लिए नहीं। हम तो बीच के इलाके में रहते हैं। हमें चिंता क्यों करनी चाहिए? हम यहाँ सागर में रहते हैं, जो समुद्र से बहुत दूर है। हमें ग्लेशियरों के पिघलने से क्यों डरना चाहिए? अगर ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है, तो समुद्र के तटीय इलाकों में रहने वालों को चिंता करनी चाहिए, हमें नहीं।’’
क्या सचमुच एक सागरवाले, एक भोपाली, एक लखनवी या एक लुधियानवी को ग्लेशियरों के पिघलने से नहीं डरना चाहिए? असल में, ग्लेशियरों का पिघलना आज ग्लोबल वार्मिंग का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। सीधे शब्दों में कहें तो, ग्लेशियरों की सफ़ेद सतहें सूरज की किरणों को परावर्तित करती हैं, जिससे हमारे मौजूदा मौसम को मध्यम बनाए रखने में मदद मिलती है। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो नीचे की काली सतहें सामने आ जाती हैं, जो गर्मी को सोखती और छोड़ती हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है। ग्लेशियर पानी के भंडार के रूप में काम करते हैं, जो गर्मियों के मौसम में भी बने रहते हैं। ग्लेशियरों से लगातार पिघलने वाला पानी सूखे महीनों के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र को मिलता रहता है, जिससे बारहमासी जलधाराओं का निर्माण होता है और पेड़-पौधों व जानवरों के लिए पानी का स्रोत बना रहता है। ग्लेशियरों से बहकर आने वाला ठंडा पानी, नीचे की ओर बहने वाली नदियों और जलधाराओं के तापमान को भी प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है - पर्यावरण में बदलाव। यह बदलाव हमारे सामने बेमौसम बारिश, बर्फ़बारी, बढ़ती गर्मी और सूखे के रूप में आ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका से लेकर ग्रीनलैंड तक, इन क्षेत्रों का अस्तित्व खतरे में है। जीवनदायिनी नदियाँ सूख रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते निकट भविष्य में दुनिया के नक्शे से कई देशों का अस्तित्व मिट जाने की आशंका है। पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि देखी गई है। जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक और मानवीय, दोनों ही कारण हैं; लेकिन वर्तमान समय में जो परिणाम सामने आए हैं, वे मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण हैं। हमारे सामने एक बड़ा संकट खड़ा है, और दुर्भाग्य से हम इससे अनजान हैं। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज़ कर रहे हैं, जिससे उन 75 करोड़ लोगों का जीवन और आजीविका खतरे में पड़ गई है, जो इन ग्लेशियरों और बर्फ से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। पिघलते ग्लेशियर समुद्र के बढ़ते जलस्तर में योगदान देते हैं, जिससे तटीय कटाव बढ़ता है और तूफानी लहरों (ेजवतउ ेनतहमे) का खतरा बढ़ जाता है; क्योंकि गर्म होती हवा और समुद्री तापमान के कारण हरिकेन और टाइफून जैसे तटीय तूफान अधिक बार-बार और अधिक तीव्रता के साथ आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल गई, तो इससे वैश्विक समुद्र का जलस्तर 20 फीट तक बढ़ जाएगा।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर प्रमाणों में से एक है। यह इस बात का सबूत है कि ग्लोबल वार्मिंग न केवल पृथ्वी का तापमान बढ़ा रही है, बल्कि यह मौसम और जलवायु को भी बदल रही है। मौसम पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव का अर्थ है कि कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो कहीं भारी वर्षा होती है। इसका कृषि और बागवानी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जलस्तर कम होने के कारण पेयजल का संकट भी उत्पन्न हो जाता है। हमने पिछले पाँच वर्षों के दौरान बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़े सूखे के दौरान इन सभी बातों के उदाहरण पहले ही देख लिए हैं। इसलिए, यह सोचना कि हिमालय या ध्रुवीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने का हमारे देश के भीतरी इलाकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, स्वयं को भ्रम में रखना है। इसीलिए दुनिया के हर व्यक्ति के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा करने में अपना योगदान दे। हमें यह समझना होगा कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने का प्रभाव तटीय क्षेत्रों पर 50 प्रतिशत होगा, तो उसी समय भीतरी इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका प्रभाव कम से कम 10 से 20 प्रतिशत अवश्य पड़ेगा। इसलिए, जागिएकृचाहे आप सागर के निवासी हों, भोपाली हों, लखनवी हों, लुधियानवी हों, या फिर आप कहीं के भी नागरिक हों।

2025 का संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 10-21 नवंबर 2025 को ब्राजील के बेलेम में आयोजित किया गया था। इसमें 190 से अधिक देशों के नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के सदस्यों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्यों पर चर्चा करने के लिए एक साथ लाया गया, जिसमें पहले वैश्विक स्टॉकटेक  के परिणामों को ठोस राष्ट्रीय कार्यों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया गया था। अगला सम्मेलन नवंबर 2026 में होगा।

बीसवीं शताब्दी में तीव्र हुई ग्लेशियरों के पिघलने से हमारा ग्रह बर्फ़विहीन होता जा रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में मानवीय गतिविधियाँ मुख्य भूमिका निभाती हैं। समुद्र का स्तर और वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि बर्फ़ के ये विशाल भंडार किस प्रकार विकसित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के निरंतर बढ़ते प्रभाव के कारण पृथ्वी के ग्लेशियर आधी सदी से भी अधिक समय से सिकुड़ रहे हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय (स्विट्जरलैंड) द्वारा 2019 में किए गए एक उपग्रह अध्ययन के के बाद कहा गया था कि दक्षिण-पूर्व एशिया को छोड़कर पृथ्वी पर कोई भी स्थान इस घटना के प्रभावों को झेलने में सक्षम नहीं है, जिसने 1961 से अब तक दुनिया भर में 9.6 अरब टन से अधिक हिमनद बर्फ पिघला दी है, और विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, 2100 तक एक तिहाई से अधिक ग्लेशियरों के वाष्पीकृत होने का खतरा है। दुर्भाग्य से यह भविष्यवाणी सच होने लगी है।

ग्लेशियर क्या होता है और यह कैसे बनता है? दरअसल, बर्फ के ये विशालकाय गतिशील पिंड ठंडे स्थानों में जमा हुई बर्फ के संघनन और पुनरू क्रिस्टलीकरण से बनते हैं, जैसा कि उदाहरण के लिए पर्वतीय और ध्रुवीय ग्लेशियरों में होता है, जिन्हें विशाल आर्कटिक प्लेटों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। हिमनदों को उनकी आकृति विज्ञान के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है - हिमक्षेत्र, सर्क हिमनद, घाटी हिमनद, आदि - जलवायु के अनुसार - ध्रुवीय, उष्णकटिबंधीय या समशीतोष्ण - और उनकी तापीय स्थितियों के अनुसार - ठंडा, गर्म या बहुतापीय आधार। एक हिमनद के निर्माण में हजारों वर्ष लगते हैं, और इसका आकार इसके जीवनकाल में इसमें मौजूद बर्फ की मात्रा के आधार पर बदलता रहता है। बर्फ पिघलने के दौरान इन हिमनदों का व्यवहार उन नदियों के समान होता है जिन्हें ये पानी देते हैं, और इनकी गति घर्षण और उस भूभाग की ढलान पर निर्भर करती है जिस पर ये चलते हैं। कुल मिलाकर, हिमनद पृथ्वी की सतह के 10 प्रतिशत भाग को ढकते हैं और बर्फ की चोटियों के साथ मिलकर विश्व के लगभग 70 प्रतिशत ताजे पानी का स्रोत हैं।
पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने ग्लेशियरों के पिघलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज, जलवायु परिवर्तन की बढ़ती गति के कारण ये रिकॉर्ड समय में विलुप्त हो सकते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन- उद्योग, परिवहन, वनों की कटाई और जीवाश्म ईंधन जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की वायुमंडलीय सांद्रता पृथ्वी को गर्म करती है और ग्लेशियरों को पिघलाती है। महासागर पृथ्वी की 90 प्रतिशत गर्मी को अवशोषित करते हैं, और यह तथ्य समुद्री ग्लेशियरों के पिघलने को प्रभावित करता है, जो ज्यादातर ध्रुवों के पास और अलास्का (संयुक्त राज्य अमेरिका) के तटों पर स्थित हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय ने पाया कि पिछले तीन दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो गई है। बर्फ का यह नुकसान पहले ही 335 अरब टन प्रति वर्ष तक पहुंच चुका है, जो समुद्र के वर्तमान विस्तार की दर का 30 प्रतिशत  है।

ग्लेशियरों के पिघलने के मुख्य परिणाम घातक हैं। सन 1961 से हिमनदों के पिघलने के कारण समुद्र का स्तर 2.7 सेंटीमीटर बढ़ गया है। इसके अलावा, दुनिया के ग्लेशियरों में लगभग 170,000 घन किलोमीटर बर्फ मौजूद है, जो समुद्र के स्तर को लगभग आधा मीटर तक बढ़ा सकती है। ध्रुवों पर हिमनदों के पिघलने से समुद्री धाराओं की गति धीमी हो रही है, यह एक ऐसी घटना है जो वैश्विक जलवायु में परिवर्तन और दुनिया भर में तेजी से बढ़ती चरम मौसम घटनाओं की एक श्रृंखला से संबंधित है। हिमनदों के पिघलने से कई प्रजातियों का विलुप्त होना भी तय है, क्योंकि हिमनद स्थलीय और जलीय दोनों प्रकार के कई जानवरों का प्राकृतिक आवास हैं। ग्लेशियरों के लुप्त होने का अर्थ यह भी है कि जनसंख्या द्वारा उपभोग के लिए कम पानी, जलविद्युत ऊर्जा उत्पादन क्षमता में कमी और सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा कम हो जाती है।
ग्लेशियर वैज्ञानिकों का मानना है कि भारी बर्फ पिघलने के बावजूद, हमारे पास अभी भी हिमनदों को उनके अनुमानित लुप्त होने से बचाने का समय है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में हम कैसे मदद कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को कम करने और ग्लेशियरों को बचाने के लिए, यह अनिवार्य है कि अगले दशक में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम किया जाए, और 2050 के बाद इसे शून्य तक लाया जाए।
जरा सोचिए कि सागर भी इसी पृथ्वी पर है। यदि पृथ्वी में प्राकृतिक असंतुलन होगा तो उसके दुष्प्रभावों से सागर भी बचेगा नहीं। इस बार गर्मियों में रिकार्ड तोड़ तपन और हीटवेव्स ने चेतावनी दे ही दी है कि यदि हम पेड़ काटते रहे, जलाशय सुखाते रहे तो हम चाहे सागर में रहें या जबलपुर में, हमें ग्लेशियरों के पिघलने का असर झेलना ही होगा।      
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(दैनिक, सागर दिनकर में 03.06.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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Sunday, May 31, 2026

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर | जीवनी | लेखिका शरद सिंह (डॉ (सुश्री) शरद सिंह)

आज लोक माता देवी अहिल्याबाई की जन्म जयंती है... 
स्त्री शक्ति की प्रतीक लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर के जन्म दिवस पर उन्हें शत-शत प्रणाम 🙏
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर के बारे में विस्तार से जानने के लिए पढ़िए सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी पुस्तक "लोकमाता अहिल्याबाई होलकर"।  यह एक जीवनी पुस्तक है जो उनके व्यक्तित्व एवं सुशासन  से परिचित कराती है। अवश्य पढ़ें 🙏 आप इसे सीधे प्रकाशक से भी मंगा कर पढ़ सकते हैं और ऑनलाइन मंगाने के लिए अमेजन का लिंक यहां दे रही हूं...
Lokmata Devi Ahilyabai Holkar ( लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ) - Sharad Singh ( शरद सिंह ) https://amzn.in/d/04SkWZHj


Saturday, May 30, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट 
पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कछू बरस पैले एक फिलम आई रई जोन मे आयुष्मान खुराना हीरो रओ। ऊं फिलम में जो गाना रओ -”पानी दा रंग वेख के, अँखियाँ चो हंजो रोड दे/ माहिया ना आया मेरा, माहिया ना आया”। ईको मतलब जो आए के पानी को रंग देखके मोरी अंखियों से अंसुवा बै रै। काए से के मोरों चाएबो वारो ने आओ।” 
अब आप ओरें सोच रए हुइयों के पानी तो बरसों नईं औ जे को जाने कां को पानी को रंग देख के रोन लगीं। मनो टाटा वारन की सप्लाई को पानी को रंग देख के अंसुवां तो आहें, पर हम अबे टाटा वारन के पानी की नईं, ऊके पानी के बिल की बात कर रै, जोन ने अंखियन से अंसुवां चुवा दए। चलो हम अपनी सुना रए। का भऔ के हम अप्रैल मईना में संपत्ती टैक्स भरने गए सो उते मुतकी पेनाल्टी ठुंक गई। उन्ने बताई के 31मार्च से पैले भरो चाइए रओ। सो, अपने जी पे फथरा रख के पेनाल्टी भर दई। ओई टेम पे हमने सोंसी के पानी को पईसा भर देवें। साल भर को इकट्ठा भरे में एक मईना की छूट मिल जैहे तो कछू गम गलत हो जैहे। लेकन उते बताओ गओ के साफ्टवेयर  अपडेट हो रओ तो, सो मई में आइयो। रामधई, हम तो उधनईं समझ गए रए के जे ओरें छूट ने दैंहे। औ देख लेओ के बोई भओ। बिल लौं भेजत नइयां औ पेनाल्टी  ठोंकते आएं, छूट मसक लेते आएं। अब कोसत रओ चाए टाटा वारन खों, चाए नगरपालिका वारन कों, चाए निगम वारन खों, औ पूरों बिल भरत रओ। कओ पानी औ कचरा पे भी पेनाल्टी ठोंक दई जाए तो गश ने खाइयों। बीजासेन माईं किरपा करें! बाकी हम तो अपने अंसुवां पोंछईं रए औ गा रए-
पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, 
बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ …
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
#टॉपिकएक्सपर्ट #डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #पत्रिका #बुंदेलीकॉलम #PatrikaNews #rajsthanpatrika  #topicexpert #बुंदेली

Friday, May 29, 2026

शायर डॉ बशीर बद्र साहब को विनम्र श्रद्धांजलि - डॉ सुश्री शरद सिंह

अलविदा मेरे पसंदीदा शायर बशीर बद्र साहब ... आप अपनी शायरी में  हमेशा जिंदा रहेंगे 😔
▪️ वर्षों पहले मेरे शहर सागर में ही उनके साथ एक कवि - सम्मेलन मुशायरा पढ़ने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था... इससे पहले वह मुझे सुखद आश्चर्य में डाल चुके थे, हुआ यूं था कि तत्कालीन बहुचर्चित साहित्यिक पत्रिका "सापेक्ष"  के लिए विजय वाते जी ने बशीर बद्र साहब से एक  इंटरव्यू लिया था जिसमें उन्होंने शायरी में नएपन का उदाहरण देते हुए मेरे एक शेर को उद्धृत किया था। जब वह विशेषांक मेरे हाथों में आया तो अगर सीधे-सीधे कहा जाए तो मैं बेहोश होते-होते बची क्योंकि यह मेरे लिए अत्यंत सुखद आश्चर्य था कि जिस शायर की शायरी को मैं बहुत पसंद करती हूं और जिन्हें मैं एक उम्दा शायर मानती हूं उन्होंने मेरे शायरी को रेखांकित किया यह उनकी सहजता और शायरी के प्रति समर्पण था कि जिन्होंने सिर्फ़ शायरी को पहचाना, पहचान के आधार पर शायरी को नहीं... यही उनका बड़प्पन था जिसने मेरे दिल को छू लिया था...
▪️ अपने इंटरव्यू में डॉ बशीर बद्र साहब ने कहा था -
"कुछ लोग ग़ज़ल की पुरानी परम्पराओं और नई बदली हुई जुबान को खूबसूरती से मिला कर नई ग़ज़ल लिख रहे हैं। इस तरह नई गज़ल की नई रूह सामने आ रही है। मसलन, शरद सिंह का ये शेर -
     फिर हवा के हाथ में हैं शीत के नेजे नुकीले,
     फट गया है ताप का अस्तर, चलो, चलना कहां है ?"
- डॉ. बशीर बद्र, सापेक्ष-32, ग़ज़ल विशेषांक
(यह विशेषांक आज भी मेरे पास सुरक्षित है एक अविस्मरणीय कृति के रूप में)
#बशीरबद्र #अलविदाडॉबशीरबद्र #mytribute #DrBashirBadr 
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh

Wednesday, May 27, 2026

चर्चा प्लस | बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                      

    हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली जिसमें मौसम के पैटर्न बदलने के गंभीर आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे। समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ रिपोर्ट का अंश। कितने लोगों ने पढ़ा? इसके आंकड़े बता पाना मुश्किल है लेकिन यह तो तय है कि उससे बहुत कम लोगों ने जितनों ने ‘‘हनी ट्रैप ’’, ‘‘ट्विशा केस’’ अथवा ‘‘मेलोडी’’ के समाचार पर अपनी आंखें गड़ाए रखी होंगी। कितने आश्चर्य के बात है न कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसके निरंतर कटने का हमें अहसास नहीं है लेकिन चटखारे भरे समाचारों पर हमारा पूरा ध्यान केन्द्रित रहता है। दरअसल, हमारा मौसम जिस तरह घातक रूप से अपना पैटर्न बदल रहा है, ठीक उसी प्रकार इंसानी स्वभाव भी बदल रहा है।


      मौसम में परिवर्तन होना एक स्वाभाविक एवं स्वस्थ प्राकृतिक क्रिया है। किन्तु जब मौसम अपनी प्रकृति के विपरीत चलने लगे तो स्थिति स्वाभाविक नहीं रह जाती है। जैसे यदि कोई नदी अपना रास्ता बदल कर बहने लगे तो वह गांव, शहर, खेत सबकुछ बरबाद कर सकती है। मौसम का चक्र भी अपनी गति या प्रकृति को बदलता है तो यह मानना होगा कि विनाश की दस्तक पड़ना शुरू हो गई है। अब यह इस पर निर्भर है कि हम उस दस्तक को कितनी देर से अथवा कितनी जल्दी सुनते हैं। जब बात आती है जलवायु परिवर्तन अथवा मौसम के परिवर्तन की तो लोगों का रवैया लापरवाह हो जाता है। वे साशल मीडिया पर घंटों ‘‘हनी ट्रैप’’ के किस्से ढूंढ-ढूंढ के पढ़ सकते हैं, ‘‘मेलोडी चॉकलेट’’ से जुड़े किस्से पर वाद-विवाद में पूरा-पूरा दिन बिता सकते हैं, हाई प्रोफाईल ‘‘ट्विशा मर्डर केस’’ पर परिणाम विहीन चिंन्तन में सिर खपा सकते हैं लेकिन उस संकट की ओर ध्यान देने का समय नहीं निकाल पाते हैं जिसके शिकंजे में धीरे-धीरे पूरी पृथ्वी और पूरी मानव सभ्यता जकड़ती जा रही है। अभी भी स्थिति पर नियंत्रण पाने का समय है किन्तु उस पर विचार करने का हमारे पास न तो समय है और न इच्छा। हम आभासीय दुनिया के गुलाम बन कर स्वयं को बुद्धिजीवी मानने का भ्रम पाल चुके हैं। जबकि बुद्धिजीवी का असल दायित्व होता है कि वह सबसे पहले पृथ्वी और सकल मानवता के बारे में गंभीरता से सोचे।  

हाल ही में समाचार पत्रों में यह रिपोर्ट पढ़ी कि हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है। बर्फबारी के महीने माने जाने वाले जनवरी-फरवरी से ज्यादा बर्फ अब मार्च-अप्रैल में गिर रही है। इसका सीधा असर वाटर बैंक माने जाने वाले ग्लेशियरों पर पड़ेगा। इस पैटर्न के कारण ट्री लाइन भी लगातार ऊपर को खिसक रही है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ताजा शोध जर्मनी की एप्लाइड जियोमेटिक्स शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है। हिमालय में सर्दियों की तुलना में गर्मियों में ज्यादा हो रही बर्फबारी का कारण पश्चिमी विक्षोभ में आई असमानता है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर होने से बारिश और बर्फबारी में कमी आ रही है। गर्मियों में इसके बढ़ने से बर्फबारी के साथ बारिश, ओलावृष्टि और आपदाओं के खतरे बढ़े हैं। पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी के मुताबिक, हिमालय में मौसम के बदले पैटर्न से आर्थिक और सामाजिक नुकसान का खतरा भी बढ़ा है। पश्चिमी विक्षोभ में आ रही असमानता से हर साल खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। इससे अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं। पर्यटन और हॉर्टिकल्चर प्रभावित होगा। ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया, तो आपदाओं के खतरे ज्यादा बढ़ेंगे। मार्च-अप्रैल में हो रही बर्फबारी से ग्लेशियर खतरे में हैं। डॉ. पंकज चौहान बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में धरती का तापमान अधिक रहता है। इससे बर्फ जिस गति से पड़ रही है, उसी गति से पिघल रही है और ग्लेशियर कमजोर पड़ रहे हैं। ये भविष्य में स्रोत-जलधाराओं को प्रभावित करेंगे। साथ ही आपदा के खतरों को भी बढ़ाएंगे। बर्फबारी के बदले पैटर्न ने हिमालय में ट्री लाइन को भी प्रभावित किया है। अलग-अलग घाटियों में ट्री लाइन पहले की तुलना में ऊपर खिसकी है। मध्य हिमालय में औसत ट्री लाइन 3600 मीटर तक मानी जाती है, लेकिन अब ये 3800 मीटर तक पहुंच रही है।

दूसरी ओर एक समाचार और भी पढ़ा जिसमें दूसरे ग्रहों में मानव बस्तियां बसा कर मानव एवं पृथ्वी की प्रजातियों को बचाने के अभियान की चर्चा थी। मुझे आद आया किस्सा ‘‘नूह की नाव’’ का। नूह की नाव की कहानी ‘‘कुरान’’ और ‘‘बाईबल’’ में दर्ज़ है। कहानी के अनुसार, जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बढ़े, तो ईश्वर/अल्लाह/याहोवा ने एक विनाशकारी जलप्रलय (महाबाधा) द्वारा दुष्ट दुष्टों को सजा देने का निर्णय लिया।  ईश्वर ने अपने भक्त नूह को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया, क्योंकि वही एकमात्र नेक इंसान थे।  पानी से बचने के लिए नाव को सील कर के वाटरप्रूफ बना दिया गया था। इसमें तीन मंजिलें थीं। नूह ने ईश्वर के निर्देशों के अनुसार अपने परिवार (पत्नी, तीन पुत्र और उनके अनुयायी) को पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव-जंतु, पशु-पक्षियों के नर और मादा जोड़े के साथ नाव में सुरक्षित रख लिया।  जब सभी लोग और जानवर नाव में सुरक्षित चले गए। फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई और धरती जलमग्न हो गई। नाव के बाहर का सारा जीवन नष्ट हो गया।  कई दिनों तक पानी में तैरने के बाद, जब बाढ़ का पानी कम होने लगा, तो नाव अरारत पर्वत (माउंट अरारत) की चोटियों पर जा टिकी और वहीं से धरती पर जीवन का पुनः विकास हुआ।
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में शूकर या वराह रूप में पृथ्वी पर जल प्रलय (रसतल) से भगवान विष्णु के तीसरे अवतार की कथा है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में दिति के पुत्र और दैत्य हिरण्यक्ष ने घोर तपस्या कर अपार शक्तियां प्राप्त कर लीं। उसने सभी लोकों पर अधिकार कर लिया और पृथ्वी को समुद्र तट (रसातल) की गहराई में छिपा दिया। पृथ्वी के जलमग्न होने से हाहाकार मच गया। तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर, उनके नासिका (नाक) से भगवान विष्णु एक छोटे से वराह (शूकर) के रूप में प्रकट हुए।  देखते ही देखते वराह भगवान का आकार अत्यंत विशाल हो गया। वे समुद्र में गहरे उतर गए। हिरण्याक्ष ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी, लेकिन भगवान वराह ने उन्हें अपने वध से परास्त कर दिया।  वराह भगवान ने अपने विशाल दांत (थूथनी) से पृथ्वी को स्थिर किया और जल के ऊपर उसे अपने मूल स्थान पर स्थापित कर दिया।

      महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी महाकाव्य ‘‘कामायनी’’ की शुरुआत ही जल प्रलय (प्रलय प्रवाह) से की है।  महाकाव्य के पहले सर्ग, जिसका नाम ‘‘चिंता’’ है, में शामिल हैं मनु हिमालय के विशाल शिखर पर बैठ कर प्रलय का दृश्य देख रहा है।  ‘‘कामायनी’’ के अनुसार देव संस्कृति में भोग-विलासिता की भारी वृद्धि हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपना भीषण रूप दिखाया और जल प्रलय (महाजल-प्लावन) के द्वारा पूरी तरह से देव संस्कृति नष्ट हो गई।  इस प्रलय के बाद केवल मनु ही जीवित बचा और उसने मानव जाति के पुनर्विकास को सुनिश्चित किया।

     जल प्रलय और हिमयुग की अनेक कथाएं हैं। हॉलीवुड ने तो ‘‘आईस एज़’’ नाम से फिल्मों की एक श्रृंखला ही बना डाली। जिनमें डायनोसार युग के विशाकाय पशुओं के लुप्त होने की कड़ी और आई एज़ की भयावहता को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। दिलचस्प बात है कि इन फिल्मों को बच्चों से ले कर वयस्कों तक ने बहुत पसंद किया लेकिन उसमें कहे गए संदेश की गंभीरता को नहीं समझा। शायद हम मौसम को ले कर तात्कालिक चर्चा से आगे बढ़ने की प्रवृति खोते जा रहे हैं। जबकि वैज्ञानिक मानव व्यवहार में आते जा रहे परिवर्तन का आलन करते हुए निरंतर इस तथ्य से आगाह कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन में बदलाव का प्रभाव मानव व्यवहार पर भी पड़ रहा है। 
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई जलवायु और चरम मौसम का मानव व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इन लोगों में मानसिक तनाव और आक्रामकता बहुतायत है।। साथ ही, सीमित औपचारिकता के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के कारण मानवीय निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। अत्यधिक गर्मी और लू के दिनों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, जिससे लोगों में हिंसक व्यवहार और अपराध की दर में वृद्धि देखी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं, मधुमेह और मधुमेह के कारण होने वाले नुकसान से लोगों में ‘‘इको-एंजाइटी’’ (पर्यावरण चिंता), अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का खतरा बढ़ जाता है। खराब मौसम और राजनीतिक संकट के कारण लोगों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है, जिससे वे कई बार जोखिम और निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं।  रहने लायक जगह और पानी की कमी के कारण एक बड़े वर्ग का शहरों की ओर पलायन होना है। इससे भीड़-भाड़ वाले इलाकों में रहने लायक जगह और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। नई पीढ़ी के शारीरिक विकास और लंबाई में भी बदलाव आ रहे हैं। हम आजकल अकसर पढ़ते हैं कि कम आयुवर्ग में भी हार्ट के साईलेंट अटैक की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन घटनाओं के कारण में कुछ प्रतिशत प्रभाव जलवायु परिवर्तन का भी है। हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी का जितना श्रेय गरीबी और बेरोजगारी को है उतना ही उस एग्रेसिवनेस को जिसके चलते जल्दी गुस्सा आता है और इंसान बिना सोचे समझे हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है।

    प्रश्न यह है कि कैसे रोका जा सकता है मौसम के पैटर्न में बदलाव और मानव स्वाभाव में आते जा रहे परिवर्तनों को? मौसम के पैटर्न (जलवायु परिवर्तन) और मानव स्वभाव में आ रहे नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के लिएव्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर ठोस कदम उठाना आवश्यक है। प्राकृतिक गैसों के उपयोग को कम करके मौसम में ही सुधारा जा सकता है। ग्रेड और तेल की जगह सौर ऊर्जा (सौर ऊर्जा), पवन ऊर्जा (पवन ऊर्जा), और पनबिजली के उपयोग को बढ़ावा देना। वनों की कटाई को रोकें और अधिक से अधिक वृक्षों की कटाई करें, ताकि कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक रूप से अवशोषित हो सके। सतत कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) यानी रासायनिक खादों के बजाय जैविक खेती का उपयोग करें, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और जल संरक्षण हो सके।

   आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीक की लता और तनाव के कारण मानव स्वभाव में आक्रामकता और शरीर में कमी आ रही है। इसके लिए योग, ध्यान (मेडिटेशन) और प्राणायाम का दैनिक अवलोकन का हिस्सा। इससे मानसिक शांति और साहस बढ़ता है। स्क्रीन और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग सीमित करें। इसके बजाय परिवार, दोस्तों और प्रकृति के साथ वास्तविक समय जोड़ें। डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। यदि मन शांत रहेगा तो भौतिकता की अंधी दौड़ में पड़ कर प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और स्वयं तथा आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित कर सकेगा। यह समय है उन वैदिक मूल्यों की ओर जाने की जहां प्रकृति एवं पृथ्वी के संरक्षण के साथ मानव व्यवहार में आने वाले नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के उपाय सुझाए गए हैं। जरूरत है कि वैदिक ग्रंथों को मात्र धार्मिक ग्रंथों के रूप में देखने के बजाए जीवन रक्षक मूल्यों के रूप में देखने की। मौसम के पैटर्न और मानव स्वभाव में परिवर्तन को सुधारने कोई परग्रहवासी नहीं आएगा, इसे हमें ही सुधारना होगा।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 27.05.2026 को प्रकाशित) 
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