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Thursday, July 2, 2026
बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, July 1, 2026
चर्चा प्लस | हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक दिन अचानक सभी के मोबाईल पर रेड अर्लट बजा। चेतावनी थी मौसम विभाग की ओर से। साथ ही मैसेज भी था कि तीन घंटे में तेज हवाएं चलेंगी। तीन क्या, तेरह घंटे निकल गए लेकिन रेड अलर्ट वाली तेज हवाएं नहीं चलीं। बहरहाल, लोगों को रेड अर्लट बजने का अनुभव तो हुआ। लेकिन यदि सही में तेज तूफानी हवाएं चलतीं तो आमजन को क्या करना चाहिए इसका उन्हें कोई पता नहीं था। चूंकि तूफानी हवाएं नहीं चलीं तो मामला हंसी-मजाक में दब गया। लेकिन प्रकृति कभी मजाक नहीं करती। इसका जाता उदाहरण वेनेजुएला में आया भूकंप है। गूगल के मौसम विभाग ने चेतावनी भी दी थी किन्तु हताहतों की संख्या दस हजार से अधिक रही। क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि वे अपना बचाव कैसे करें? वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट पर स्थित है। भूकंपों की यह श्रृंखला 7.2 तीव्रता के भूकंप से शुरू हुई और 39 सेकंड बाद पास ही में 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आया। वेनेजुएला सम्हल नहीं सका। क्या हम सम्हल सकेंगे?
24 जून 2026 को वेनेजुएला में शाम के समय दो शक्तिशाली भूकंप आए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार पहले 7.1 और दूसरे 7.5 तीव्रता के भूकंप ने काराकास में कई इमारतें गिरा दीं। लोग सड़कों पर आ गए। सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई। पहला भूकंप 7.1 तीव्रता का था, जिसका केंद्र मोरॉन समुदाय के पश्चिम में था। ये देश के कैरेबियन तट पर स्थित है, काराकास से करीब 168 किलोमीटर दूर। इसकी गहराई 13 किलोमीटर थी। कुछ मिनट बाद दूसरा और भी बड़ा 7.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसकी गहराई 10 किलोमीटर थी। केंद्र मोरॉन से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में था। इन भूकंपों ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। लोग सड़कों पर निकल आए, इमारतों की दीवारें गिर गईं और धूल के गुबार उठते दिखे। इसके साथ ही कई राज्यों में झटके महसूस किए गए, खासकर काराकास के अल्तामिरा इलाके में भारी नुकसान हुआ। लोगों से बाहर रहने और आफ्टरशॉक्स से सावधान रहने की अपील की गई।
भूकंप पृथ्वी की टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति से होते हैं। वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट और साउथ अमेरिकन प्लेट की सीमा पर स्थित है। भूगर्भीय वैज्ञानिकों के अनुसार कैरेबियन प्लेट साउथ अमेरिकन प्लेट के सापेक्ष पूर्व दिशा में लगभग 20 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से खिसक रही है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ट्रांसफॉर्म बाउंड्री है, जहां प्लेट्स एक-दूसरे के बगल से गुजरती हैं, जैसे सैन सेबेस्टियन और एल पिलार फॉल्ट स जब प्लेट्स फंस जाती हैं और तनाव बढ़ता है, तो अचानक फिसलन होती है, जिससे भूकंप आता है। इस बार के भूकंप उथले थे (10-13 किमी गहराई), इसलिए उनका प्रभाव ज्यादा था। उथले भूकंप सतह पर ज्यादा कंपन पैदा करते हैं। यह क्षेत्र सदियों से सक्रिय है। सन 1812 और 1900 में भी काराकास के आसपास 7$ तीव्रता के भूकंप आए थे. इस प्लेट बाउंड्री का बड़ा हिस्सा श्लॉक्डश् है यानी तनाव जमा हो रहा है, जो 8 तीव्रता तक के भूकंप पैदा कर सकता है। इस डबलेट इवेंट (फोरशॉक के तुरंत बाद मेनशॉक) ने ऊर्जा रिलीज की, जो क्षेत्र की जटिल भू-संरचना का नतीजा है। उत्तर पश्चिम और दक्षिण पूर्व दिशा की सहायक फॉल्ट्स भी यहां सक्रिय हैं, जो स्ट्राइक-स्लिप मोशन पैदा करती हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि वेनेजुएला ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ का हिस्सा नहीं है, जहां भूकंप, विशेष रूप से उच्च तीव्रता वाले भूकंप, अपेक्षाकृत आम हैं। यही कारण है कि इस तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला जैसे स्थान पर जापान की तुलना में कहीं अधिक नुकसान पहुंचा। क्योंकि ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ में या उसके निकट होने कारण जापान इस प्रकार की घटनाओं के लिए कहीं अधिक तैयार रहता है। वहां बच्चों को भी स्कूल में प्रशिक्षण्या दिया जाता है कि भूकंप की चेतावनी मिलने पर स्वयं को किस तरह सुरक्षित रहना है। हमारे देश में आम नागरिकों को नही पता कि बाढ़, भूकेप या ट्विस्टर आने पर किस तरह अपना बचाव करना है?
ऐसा नहीं है कि कैरेबियन प्लेट में पहले कभी भूकंप नहीं आए, कैरेबियन प्लेट के दक्षिणी भाग में बड़े भूकंप आते रहते हैं। पिछले 100 वर्षों में इस क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता के पांच भूकंप आ चुके हैं। सितंबर 2025 में, उत्तरी वेनेजुएला में दो भूकंपों का एक साथ कहर बरपा लेकिन इसकी तीव्रता वर्तमान भूकंप से कम थी यानी रिक्टर स्केल पर 6.2/6.3 तीव्रता। यद्यपि 6.3 तीव्रता का भूकंप भी बड़ा होता है, लेकिन यह प्रायः व्यापक, विनाशकारी क्षति का कारण नहीं बनता है। 7.5 तीव्रता का भूकंप अन्य भूकंपों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। इसमें खराब ढंग से निर्मित या बिना सुदृढ़ीकरण वाली इमारतों को भारी नुकसान पहुंचता है। जिससे अधिक जनहानि भी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष की घटना तीव्रता और उत्सर्जित ऊर्जा के आधार पर पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 63 गुना अधिक शक्तिशाली थी । उत्तरी वेनेजुएला में आए इस भूकंप से प्रभावित क्षेत्र के बारे में यूएसजीएस के आकलन के अनुसार, ष्कुल मिलाकर, इस क्षेत्र की आबादी भूकंप के झटकों के प्रति संवेदनशील संरचनाओं में रहती है, हालांकि कुछ संरचनाएं भूकंप प्रतिरोधी भी हैं। सबसे अधिक संवेदनशील भवन प्रकार बिना सुदृढ़ीकरण वाली ईंटों की चिनाई और मिट्टी के ब्लॉक से निर्मित हैं।
2018 में, 7.3 तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के कम आबादी वाले क्षेत्र (काराकास क्षेत्र में नहीं) के तट से काफी दूर उत्तर में आया था। इस घटना के परिणामस्वरूप मध्यम स्तर की क्षति हुई और कुछ लोगों की मौत हुई।
सन 1997 में, कैरियाको के उत्तर में अंतर्देशीय क्षेत्र में 6.9 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 81 लोगों की मौत हुई थी। सन 1967 में, तटरेखा के पास 6.6 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 240 लोगों की मौतें हुई और ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट इमारतों के ढहने सहित व्यापक क्षति हुई थी। सन् 97 वर्ष पूर्व, सन् 1929 में, समुद्र तट से दूर 6.7 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप सुनामी भी आई थी। ताजा भूकंप यानी जून 2026 में आए दोहरे भूकंपों की घटना वेनेजुएला के आबादी वाले हिस्सों में, समुद्र तट से दूर नहीं, बल्कि अंतर्देशीय क्षेत्र में हुई, यह एक 7.5 तीव्रता के भूकंप से होने वाले दोहरे भूकंपों की तुलना में अधिक समय तक चली और इसलिए पिछली सदी में आए किसी भी भूकंप की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली रही। यूएसजीएस का अनुमान है कि मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक हो जाएगी और संभावित रूप से 10,000 से भी अधिक हो सकती है।
वेनेजुएला में आए भीषण भूकंप का भारतीय उपमहाद्वीप की जियोलॉजिकल (भूगर्भीय) संरचना से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार यह भारत के लिए सजग रहने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की एक बहुत बड़ी चेतावनी जरूर है।
वेनेजुएला में जो तबाही हुई, वह हमें निम्नलिखित कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के लिए सबक देती है कि भारत में हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्व के राज्य, अंडमान-निकोबार, गुजरात, कच्छ और दिल्ली-एनसीआर अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय ज़ोन 4, 5 में आते हैं। इन क्षेत्रों के नीचे इंडियन प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिससे कभी भी वेनेजुएला जैसे या उससे भी बड़े तीव्र झटके (8.0$ मैग्नीट्यूड) आ सकते हैं।
वेनेजुएला के भूकंप के कुछ दिन दिल्ली, एमसीआर और उत्तर भारत के कई शहरों में भूकंप के झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में आए भूकंप का केंद्र धरती की सतह से काफी उथला था (10 से 20 किलोमीटर की गहराई), जिसके कारण धरती की सतह पर कंपन बहुत भयानक हुआ। हिमालय और उत्तर भारत के भूकंप भी अक्सर उथले होते हैं, जो अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वेनेजुएला में भारी तबाही का एक बड़ा कारण वहां की इमारतों का भूकंपरोधी न होना था। ठीक इसी तरह, दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य संवेदनशील शहरों में अधिकांश निर्माण अनियोजित हैं। यदि भारत में ऐसा भूकंप आता है, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। भूकंपीय संवेदनशीलतारू नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, भारत के 29 प्रमुख शहर उच्च भूकंप जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
प्रकृति में होने वाले निरंतर परिवर्तन जिन्हें हम जलवायु परिवर्तन भी कहते हैं लगातार किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की चेतावनी दे रहा है लेकिन हम कागजी कार्यवाहियों में व्यस्त हैं। न तो गगनचुंबी इमारतों की ठीक से जांच होती है कि वे भूकंपरोधी हैं या नहीं और न भूकंप के समय सुरक्षित रहने का उपाय आमजन को सिखाया जाता है। यह कटु सत्य है कि जिन शहरों में इमारतों के आग से बचाव के उपाय की ही जांच नहीं की जाती है वहां प्राकृतिक आपदा से बचाव कहां सिखाया जाएगा? अब खुद आमजन को प्राकृतिक आपदा से बचना सीखना होगा जबकि यह आपदाप प्रबंधन तथा जिला प्रशासनों का दायित्व है। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 01.07.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, June 30, 2026
पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य - 200/-
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हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।
श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।
पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”
वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”
दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।
चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है। यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।
संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।
सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।
संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है। जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है। यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।
11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।
कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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