Tuesday, October 20, 2026

दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


सदा सत्य की विजय हो 🚩

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
Happy Dussehra 🙏🚩🙏
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पुस्तक समीक्षा | भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड
लेखिका  - वर्षा कौशल
प्रकाशक - साहित्य कलश पब्लिकेशन, 32/3, अमरशक्ति निवास, महिन्द्रा कॉलोनी, सामने महिन्द्रा कालेज, पटियाला - 147001
मूल्य       - 300/-
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भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदा चिंतन के केन्द्र में रही है। साथ ही यह भी सच है कि समाज में नारी की स्थिति में गंभीर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। जहां प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को पढ़ने-लिखने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति थी, वहीं मध्यकाल में आक्रांताओं के कारण उन्हें न केवल पढ़ने- लिखने से दूर कर दिया गया अपितु घर की चौखट के भीतर रह कर कठोर एवं अमानवीय नियमों को ढोने के लिए विवश किया गया जिसमें विधवा के रूप में तिरस्कृत जीवन जीने, पति की मृत्यु पर सती हो जाने तथा  युद्धकाल में जौहर करने तक की विवशता शामिल थी। इसे स्त्रियों का साहस कह कर भले ही महिमा मंडित किया जाए किन्तु वस्तुतः थी यह कुरीति ही। बुंदेलखंड के गांव-देहात में आज भी सती के पत्थर पाए जाते हैं जिनकी पूजा होती है। ऐसे विकट उतार-चढ़ाव भरे अतीत से आगे बढ़ कर आज समाज में स्त्रियों ने जो अपनी जगह बनाई है वह उसकी असली शक्ति, संघर्ष एवं अस्मिता की परिचायक है। स्त्रियों की इस रूपांतरण यात्रा को लेखिका वर्षा कौशल ने अपनी शोधात्मक पुस्तक ‘‘नारी : रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ में प्रस्तुत किया है।    

वर्षा कौशल की पुस्तक पर अपनी ‘‘सम्मति’’ देते हुए मणिकुंडल सेवा संस्थान कानपुर के संस्थापक, संरक्षक उमाशंकर गुप्ता ने ‘‘नारी की स्थिति पर शोधपरक कृति’’ शीर्षक से लिखा है कि-‘‘प्रस्तुत पुस्तक में कानपुर एवं बुंदेलखंड के जनपदों में जनसंपर्क, विद्यालयों से संपर्क करके सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक वास्तविकता को प्रस्तुत करती है और सरकार तथा समाज को चाहिए कि गंभीर चिंतन कर महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए सार्थक प्रयास करें इस संदर्भ में श्रीमती वर्षा कौशल को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इतने महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी चलाई जिससे देश-प्रदेश में जन जागरण और उन्नति का एक नया अध्याय प्रारंभ होगा।’’

अपनी पुस्तक ‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ की सामग्री को लेखिका ने कुल सात अध्यायों में विभक्त किया है। प्रथम अध्याय में अतीत में प्रेरक महिलायें सुकला, अपाला, दुर्गावती, रत्नावली, सारंध्रा गणिका, मदालसा के बारे में है। द्वितीय अध्याय बुंदेलखंड की नारी के अंतर्गत बुंदेलखंड शब्द की विकास यात्रा, बुंदेलखंड की स्मरणीय महिलायें, शिक्षा के क्षेत्र में नारी की स्थिति, वर्तमान की दुःस्थिति, सुखद भविष्य का भाव लेखबद्ध किया है। तृतीय अध्याय नारी सशक्तिकरण का है जिसमें बाल्यकाल, ऐतिहासिक महिलाओं का बाल्यकाल दुर्गावती, मैना, महिला के स्वरूप एवं भूमिका पर शिक्षा का प्रभाव, ईश भक्ति में रत महिलाओं का बाल्यकाल कर्माबाई, विमला कुमारी, मल्हना, समाज की दिशादात्री महिलाओं का बाल्यकाल अमृता शेरगिल, जेन एडम्स, डॉ मुथु लक्ष्मी रेड्डी के संबंध में जानकारी दी गई है। चतुर्थ अध्याय में ऐतिहासिक महिलायें हैं जिनमें महारानी लक्ष्मीबाई, भक्ति रस में मग्न महिलायें रानी रासमणि, समाज की पथ प्रदर्शिका महिलायें अन्ना चेण्डी, श्रीमती एलीनर रूजवेल्ट, श्रीमती धनवंती रामराव के व्यक्तित्व एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है। पंचम अध्याय में वर्तमान में सशक्तिकरण के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति, अधिकार व अधिकार की सीमाएं महिला मानवाधिकार, हिंदू विवाह अधिनियम, मौलिक अधिकार, मूलाधिकार शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा विषयक अधिकार, संपत्ति का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार आदि की जानकारी दी गई है। छठां अध्याय स्त्रियों के समग्र अधिकारों पर दृष्टिपात का है जिसमें अतीत में महिलाओं का राजनैतिक योगदान, ग्रामीणांचल में राजनैतिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति समस्यायें, समाधान, उपलब्धि, सामाजिक परिवर्तन में भूमिका, शिक्षा का क्षेत्र, व्यावसायिक शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र के आधार पर विवेचन किया गया है। सातवां और अंतिम अध्याय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा है। इस अध्याय में बुंदेली लोक संस्कृति, जीवनयापन, भोजन, वस्त्र, परंपराओं का पालन, परिणाम, लोक संस्कृति विषयक महिलाओं की स्थिति, लोकगीत, लोकनृत्य का विवरण है। इसके बाद अंत में परिशिष्ट एवं संदर्भ ग्रंथ सूची रखी गई है। कुल मिला कर पुस्तक का स्वरूप अकादमिक शोध का है। संभवतः इसीलिए नारी की रूपांतरण यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पक्ष छूट गए हैं तथा बुंदेलखंड के परिचय की अपेक्षा बुंदेली स्त्रियों की दशा और दिशा को समुचित विस्तार नहीं मिल सका है क्योंकि अकादमिक शोध की अपनी सीमाएं होती हैं। वहीं स्वंतत्र शोध सीमाओं से परे जा कर भी विषय को खंगालता है। फिर भी लेखिका ने विषय को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने का पूरा एवं सफल प्रयास किया है।
नारी इंसाफ सेना परिवार के सहयोग से प्रकाशित इस पुस्तक की लेखिका वर्षा कौशल ने मास्टर ऑफ एक्सटेंशन एण्ड रुरल डेवलेपमेंट में एम. ए. तथा छत्रपति साहू जी महाराज वि. वि. कानपुर, योग शिक्षा में उपाधि प्राप्त की है। कानपुर निवासी वर्षा कौशल नारी इंसाफ सेना की राष्ट्रीय कमांडर हैं तथा वे भ्रष्टाचार व अनियमितताओं का विरोध एवं न्याय के पक्ष में आंदोलन व धरना प्रदर्शन करती हैं एवं समाज में गरीब व उपेक्षित समुदाय एवं जनमानस का अपेक्षित सहयोग करती हैं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को जमीनी यथार्थ से जोड़े रखा है।
अपनी पुस्तक के लेखन के संबंध में लेखिका वर्षा कौशल का कथन है कि ‘‘मुझे भी नारी इंसाफ सेना महिला संगठन के माध्यम से महिलाओं के बीच कार्य करने का अवसर मिला है। महिलाओं की समस्याओं को जानने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि नारी की सहायक नारी ही हो सकती है। कानून बना देने से ही सिर्फ नारी का हित नहीं हो सकता। नारी पगड़ी की तरह है जो कहने को तो शीश पर धारण की जाती है किंतु उस पगड़ी को बिखेरने के लिए समाज का अधिकांश वर्ग भिन्न-भिन्न वेश में प्रस्तुत होकर तत्पर है। कहावत है कि बेल (लता) और स्त्री बिना सहारे के नहीं रह सकती हैं और इस कहावत को चरितार्थ करने के लिए लोग विविध प्रसंगों और तर्कों से पुष्टि करने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग कर रहे हैं, तब मुझे लगा कि ऐसी कृति लिखी जाये जिसमें अतीत से वर्तमान तक की नारी की स्थिति रेखांकित हो सके और समाज में नारियों के योगदान की झांकी प्रस्तुत की जा सके। यह कृति आंकड़ों पर आधारित नहीं है क्योंकि आंकड़े और यथार्थ दोनों ही अलग-अलग हो चुके हैं।’’
सरस्वती बालिका विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, बांदा की शिक्षिका शैलजा तिवारी ने ‘‘धरातलीय अभिव्यक्ति’’ शीर्षक से पुस्तक पर अपनी अभिव्यक्ति इस प्रकार दी है-‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, हमारे समाज ने मनु स्मृति की इस सूक्ति को थोड़ा भी अपनाने का प्रयास किया होता तो शायद महिलाओं उत्पीड़न और अत्याचार से निजात मिल गई होती। लेकिन विडंबना है कि यह सूक्तियां सिर्फ हमारे धर्मग्रंथों तक ही सिमट कर रहा गईं हैं और नारी को सही मायने मे न्याय दिलाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। इस पुस्तक में नारियों द्वारा कई क्षेत्रों में किए गए कार्यों और संघर्षों का उल्लेख होने से उनसे प्रेरणा लेते हुए नारी में हीन भावना नहीं आ सकेगी।’’

‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ एक ऐसी पुस्तक है जिसमें अतीत से वर्तमान तक के नारी संघर्ष की सोदाहरण चर्चा करते हुए बुंदेलखंड की स्त्रियों की स्थिति पर भी चर्चा की गई है। लेखिका ने नारी की मनो एवं सामाजिक दशा तथा प्रतिक्रियाओं पर विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘‘जो महिला उपलब्धि प्राप्त कर लेती है वह अतीत की घटनाओं व्यवहार से मिले तनाव से मुक्त हो जाती है जब वह अपने माध्यम से किसी की समस्या का हल करती है तब उसे बहुत आत्म संतोष होता है जब महिला की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है तब वह प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए एक नए रूप में आती है। फूलन देवी ऐसी महिला का उदाहरण है जब उसके साथ किए गए अनाचार पर कहीं पर ग्राम में सुनवाई नहीं हुई बल्कि उसे और अपमानित किया गया तब वह बंदूक लेकर बीह में चली गई और जिस बेहमई ग्राम में उसके साथ अनाचार हुआ था उस गांव में उसने जाकर लोगों को एक पंक्ति में खा कर मार दिया था। इसी प्रकार पारिवारिक शोषण के शिकार महिला जब समाज में महिला उत्थान के लिए निकलती है तब उसके अनुभवजन्य व्यक्तव्य श्रोताओं में रोमांच उत्पन्न कर देते हैं। नारी का स्वभाव होता है कि जब वह बोध विरोध में आती है तो उसके प्रतिशोध की कोई सीमा नहीं होती। सूर्पनखा में सुंदर युवती के रूप में राम के समक्ष प्रस्तुत होकर प्रणय निवेदन किया था किंतु जब उसके नाक कान काटे गए तब वह अपने वास्तविक रूप में आकर प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगी थी और उसने रावण के समक्ष बात रखी इसके परिणाम स्वरुप सीता का हरण हुआ इसी प्रकार दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया था उसके परिणाम स्वरूप द्रौपदी ने दुशासन के शरीर के रक्त से अपने बाल धोये थे।’’
इसके साथ ही लेखिका ने महिलाओं को सशक्त बनाने में महिला समाख्या कार्यक्रम का अनुमोदन किया है-‘‘महिलाओं में चेतना या जागरूकता लाना वह प्रक्रिया है जिसमें महिलाओं को संगठित करके उन्हें प्रेरित करना है कि संसाधनों को प्राप्त करने के लिए उनके प्रति जो भेदभाव बढ़ता जा रहा है या जो भी बढ़े हैं वह उन्हें दूर कर सके। इसके लिए ‘‘महिला समाख्या’’ कार्यक्रम एक सशक्त माध्यम है।’’
लेखिका का प्रयास सराहनीय है तथा पुस्तक पठनीय है। विशेषरूप से शोधार्थियों के लिए उपयोगी है।                    
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Saturday, October 17, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | इते माता की धूम मची, औ उते आए हमाए नए रैवासी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
इते माता की धूम मची, औ उते आए हमाए नए रैवासी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

“ऊंची पहरिया पे माई को ठिकानो, कैसे मिलन खों आऊं मोरी मैया…” ऐसईं भक्तें गाई जात आएं देवी मैया के दरबार में पौंचबे के लाने। मनों जे तो सोची जाए के साल में नौ-नौ दिनां के लाने माता खुदई आ जात आएं दरसन देबे के लाने। हम नौरातों की कै रए। सो, आजकाल नौरातों में माता के मुतके दरबार सजे। इनमें से कछू तो डेढ़-दो सौ बरस से सजते आ रए। बड़ा बजार, पुरव्याऊ, सदर सबई कऊं एक से बढ़ के एक छबि आए माता की। औ नोनी बात जे के सबई जात-धरम के लोग ईमें मिल के सहयोग करत आएं। मनो ई दार नओ जे भओ आए के दो नए रैवासी अपने इते आ गए आएं।
   हऔ, अपने इते वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व (नौरादेही) में दो चीतां नए निवासी बन के पधारे आएं। जीमें एक को नांव वियोम औ दूसरे को नीरा आए। जो दोई की जोड़ी बन जैहे तो अपने इते इन ओरन के लल्ला-लल्ली हुइएं। वैसे कओ जात आए के नर चीते के लाने जेई कछू 39 से 78 वर्ग किलोमीटर  को घूमत को  एरिया  लगत आए जोन को ऊकी ‘टेरिटरी’ कओ जात आए। उतई मादा चीतां के लाने 800 से 1,000 वर्ग किलोमीटर या ऊंसे भी ज्यादा को इलाको लगत आए। मनो जो अपनों टाइगर रिज़र्व सागर, दमोए और नरसिंहपुर जिला लौं फैलो आए। सो, ईको एरिया जेई कछू 2,339 वर्ग किलोमीटर को आए। मनो ईको डर नोंई के संकारे दोरे की कुंडी खोली औ चीता के दरसन मिल गए। साल भरे बाद से बे उतई नौरादेही में देखबे खों मिलहें। तब लौं माई के शेर खों निहारो औ बोलो, जै माता दी!
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Thank you Reshu Jain 🙏
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Thursday, October 15, 2026

बतकाव बिन्ना की | बा कमा से कम नौरातें को तो लिहाज कर रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की           
बा कमा से कम नौरातें को तो लिहाज कर रओ
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘बिन्ना! तनक साजी सी चाय सो पिला देओ!’’ भैयाजी आतई साथ बोले। मोए समझ में आ गई के कोनऊं सल्ल बींध गई हुइए जो आतई साथ भैयाजी चाय के लाने बोल रए।
‘‘हऔ! अभईं लो!’’ मैंने कही। फेर तुरतईं चाय बना लाई।
‘‘अब तनक अच्छो लगो!’’ चाय सुड़कत भए भैयाजी बोले।  
‘‘का हो गऔ? काय की सल्ल बींध गई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे ने पूछो!’’
‘‘अरे कछू तो बताओ आप!’’ मैंने सोई जिद पकर लई।
‘‘अरे बो आए न, अपन ओरने के इते को नेता!’’
‘‘को? कौन की कै रए?’’ मोए कछु समझ में ने आई।
‘‘अरे बोई जमुना, जमुना पार्षद!’’
‘‘अरे, उनकी कह रै! का कर दओ जमुना भेया ने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे तुम सोई, ऊको भैया-वैया ने कहो!’’
‘‘काए? ईमें का बुराई दिखा रई?’’
‘‘बुराई तुमाए कैबे में नई दिखा रई, बो आदमई बुरौ कहानो!’’ भैयाजी चिड़कत भए बोले।
‘‘अब बे काए के लाने बुरै बन गए? काल तक तो आप ई ऊकी तारीफ करत फिरत्ते।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, मोए का पता रओ को जमुना सोई ऐसो निकरहे।’’ भैयाजी गुस्सा दिखात भए बोले।
‘‘मनो ऐसो का कर दओ उन्ने?’’ मैंने पूछी।
‘‘हमने कही न, के ऊके लाने इज्जत से ने बोलो! बो ई के काबिल नइयां! औ फेर ऊ तो ऊंसई तुमसे लोहरो ठैरो, सो तुम तो ऊको आप-वाप ने कहो करो।’’ भैयाजी मोय समझान लगे।
‘‘हऔ, हमें पतो आए के कौन से कैसे बात करी जात आए। आप सो अपनी कहो के ऊने आपके कौन से खेत काट लए?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘बो का हमाओ खेत काटहे? अगली बेरा आन देओ चुनाव, चार से ज्यादा वोटें ने मिल पाहें ऊको!’’ भैयाजी तिन्नात भए बोले।
‘‘चार? चार कौन-कौन की? एक आपकी, एक भौजी की....!’’
‘‘हम काए खों देबी?’’ मोरी बात काटत भए भैयाजी बोल परे।
‘‘सो, औ को देहे?’’ मैंने पूछी।
‘‘एक मताई की, एक बापराम की, एक लुगाई की औ एक ऊकी खुद की! ई चार से पांचवीं वोट ऊको मिल जाए सो हमाओ नांव बदल दइयो!’’ भैयाजी उखड़त भए बोले।
‘‘ऐसो का कर दओ ऊने? चलो अब आपई बता देओ!’’ अब मोए से रओ नई जा रओ हतो।
‘‘भओ का, के कुल्ल दिनां से हमाओ एक काम अटको डरो आए नगरपालिका में। सो हम सोचई रै हते के कोई दिनां जमुना मिल जेहे सो ऊसे कै देबी के हमाओ जल्दी काम करा देओ। अभईं आज संकारे जमुना हमें दिखा गओ। हमने ऊसे कहीं के हमाओ काम नगरपालिका में अटको परो आए, सो तुम तनक जल्दी करा देओ।’’ 
‘‘सो का कही ऊने? करा देहे जल्दी?’’ मैंने बीचई में पूछ लई।
‘‘अरे काय खों, ऊ ससुरो कहन लगो के अभई नौरातें चल रईं सो हम कछु ऐसो-वैसो काम नईं करा सकत आएं। काए से हम नौरातें में गल्त काम नईं करत।’’ भैयाजी बतान लगे।
‘‘ऐं? ऊने ऐसी कही? पर आपको तो गल्त काम नइयां, मोए पतो आए।’’ मोरे मों से निकर परो।
‘‘औ का! हमाओ काम ठक्का-ठाई आए! एकदम सांचो!’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊने ऐसी काए कई?’’ मोए अचरज भओ।
‘‘हमने सोई ऊसे पूछी, के भैया जमुना तुमाओ मुंडा सो ठिकाने पे आए के नईं? हम कोनऊ गल्त काम कराबे खों नईं कै रए, जो तुम हमाए लाने भाव दिखा रए। सो बो कैन लगो के अरे नईं भैयाजी आपको काम सो सांचो आए मनो जो आपको काम कराबी सो दस जने औ आ जेहें अपनों काम ले के। अब सबको काम सांचो सो रैहे ने, औ ई नौरातें चलत में हम गल्त काम ने करत आएं औ ने करात आएं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘जे का बात भई? मने नौरातें के आगूं-पांछू बो गल्त करत रैत आए?’’ मोए बड़ो अचरज भओ जे सुन के।
‘‘औ का! तभईं सो हमाओे मुंडा खराब हो गओ। हमई ने सो ऊको जिताबे के लाने तरे-ऊपरे एक करो रओ और जे देखो! ऊ समै कैत रओ के अब कछु ने गल्त करबी औ ने गल्त होने देबी, औ अब देखो! हमें सो अभई की ऊकी बात सुन के जी में आओ रओ के ससुरे को एक लपाड़ा दे दें, बाकी हम गम्म खा के रै गए के मोहल्ला वारे का कैहें? हमाओ बकरा, हमई खों सींग दिखा रओ।’’ भैयाजी खदबदात भए बोले।
भैयाजी की कहनात सुन के मोए हंसी फूट परी -‘‘हमाओ बकरा, हमई खों सींग दिखा रओ।’’ 
‘‘भैयाजी, मनो अब सो ऊने सो आपई खों बकरा बना दओ।’’ मोसे हंसी रोकत ने बनीं। मोरी हंसी सुन के भैयाजी सोई हंसन लगे। मनो ईसे उनको मूड ठीक हो गओ।
‘‘भैयाजी आप तो जे सोचो के बा कम से कम नौरातें को तो लिहाज कर रओ, ने तों आजकाल नेता हरें एकऊं रातन को लिहाज नईं करत आएं। उनको सो चैबीसों घंटा औ सातो दिनां गल्त-सल्त करबे में जी लगो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘हऔ, सो कोनऊं किरपा कर रओ का? ऊको सो पूरे बारहों मईना ईमानदारी से काम करो चाइए। चुनाव से पैलऊं खुदई कैत रओ के मोए सो कभऊं गल्त नहीं करने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई सो नेता औ जनता में फरक आए भैयाजी! उने बेवकूफ बनात बनत आए औ जनता खों सिरफ बेवकूफ बनबो आत आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ठीक कही बिन्ना तुमने, मनो जे बताओ के ऐसे में देवी मैया ऊपे कैसे के किरपा करहें? ऐसो ध्रम-करम कोनऊं काम खों नईंया।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘देवी मैया की सो पतो नइयां भैयाजी, पर जे सो पक्को कहानो के अगली चुनाव में आप ऊपे किरपा ने करहो!’’ मैंने हंसत भए कही।
‘‘रामधईं! कभऊं ने करबी। ससुरो लबरा कहीं को।’’ भैयाजी सोई हंसन लगे। फेर कहन लगे,‘‘अब चलन देओ मोए, एकाध चक्कर खुदई लगाने पड़हे नगरपालिका को।’’
‘‘अभई उते ने जाओ भैयाजी! अभईं बे ओरें देवी पूजा में बिजी हुइएं।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘काए? जे आॅफिस के टेम पे काए बिजी हुइएं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप सो ऐसे पूछ रए मनो आप कोनऊं औरई ग्रह से आए हो! जे कओ के आप खों पैले काम नई परो सो आप खों पतो नइयां मनो...!’’
‘‘हऔ-हऔ, आ गई समझ में!’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले औ चलबे खों ठाड़े हो गए। 
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के नौरातें के आगूं-पीछूं इमानदारी काए ने सध सकत? औ भक्ती ऑफिस के टेम में काए जरूरी आए? तनक सोचियो!
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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शरद सिंह के उपन्यासों में चेतना के विविध आयाम

अच्छा लगता है जब अपनी मेहनत से दूसरे की मेहनत जुड़कर एक नया इतिहास रचती है। एक ऐसी ही सुखद सूचना है भाई डॉ बहादुर सिंह परमार की वॉल से साभार 👇🌹🙏
*ज्योति पाण्डेय ने 'शरद सिंह के उपन्यासों में चेतना के विविध आयाम' पर किया महत्वपूर्ण शोध* 

*महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय छतरपुर के हिंदी विभाग में शोधार्थी ज्योति पांडे द्वारा अपने शोध उपाधि हेतु शोध प्रबंध का पूर्व प्रस्तुतीकरण सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। ज्योति पांडे ने अपना शोध कार्य शोध निर्देशक डॉ. बहादुर सिंह परमार के मार्गदर्शन में पूर्ण किया है। उनके शोध का विषय "शरद सिंह के उपन्यासों में चेतना के आयाम" रहा है।  
कार्यक्रम का शुभारंभ विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ प्राध्यापकों की उपस्थिति में माँ सरस्वती के पूजन एवं वंदना के साथ किया गया। इस कार्यक्रम में कला संकाय की अध्यक्ष प्रो उषा शुक्ला , हिंदी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो गायत्री बाजपेई, हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो बहादुर सिंह परमार तथा हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक नंदकिशोर पटेल, विषय विशेषज्ञ श्री दिनकर प्रसाद साकेत, स्वेच्छा पाठक, श्री विवेक तिवारी सहित जेआरएफ शोधार्थी और स्नातकोत्तर हिन्दी के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
शोध पूर्व प्रस्तुतीकरण के दौरान शोधार्थी ने अपने शोध प्रबंध की रूपरेखा एवं अध्याय विभाजन को विस्तार से प्रस्तुत किया,
जिसमें शरद सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व (प्रथम अध्याय): इसमें लेखक के जीवन परिचय, शिक्षा-दीक्षा, साहित्यिक प्रेरणा एवं उनकी प्रमुख कृतियों का समावेश किया गया है।  
चेतना का आशय एवं आयाम (द्वितीय अध्याय): चेतना शब्द की व्युत्पत्ति (संस्कृत की 'चित्' धातु) को स्पष्ट करते हुए अरस्तू और डॉ. रामविलास शर्मा के विचारों के आलोक में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक चेतना के आयामों को रेखांकित किया गया। तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम अध्याय
उपन्यासों में चेतना का विश्लेषण किया। शरद सिंह के उपन्यासों में विद्यमान सामाजिक चेतना, राजनीतिक चेतना तथा सांस्कृतिक चेतना पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया , जिसमें विशेष रूप से स्त्री अधिकारों व उनके हनन का मुद्दों पर विचार किया गया।* 
*समग्र मूल्यांकन:
प्रस्तुतीकरण के अंत में विषय विशेषज्ञों द्वारा शोध के विभिन्न बिंदुओं पर विचार-विमर्श एवं मूल्यांकन किया गया। विशेषज्ञों ने माना कि शरद सिंह का साहित्य मानवीय दृष्टिकोण, सामाजिक संवेदनाओं, स्त्री चेतना और न्यायबोध से परिपूर्ण है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य सामाजिक जीवन की प्रक्रियाओं, प्रतिमानों और व्यवहारों का गहन अध्ययन करना रहा है।*

प्रिय ज्योति पांडे जी को हार्दिक बधाई 🌹 
आदरणीय भाई डॉ बहादुर सिंह परमार जी का हार्दिक आभार 🙏🚩
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Wednesday, October 14, 2026

चर्चा प्लस | पं. दीनदयाल उपाध्याय ने क्यों बनाया था अटल बिहारी वाजपेयी को ‘‘राष्ट्रधर्म’’ का संपादक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस                
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने क्यों बनाया था अटल बिहारी वाजपेयी को ‘‘राष्ट्रधर्म’’ का संपादक

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

                                                                15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता प्राप्त हो गई किन्तु इसके साथ ही विभाजन का दंश भी मिला था जिसने हर भारतीय की आत्मा को झकझोर दिया था। ऐसे समय में देश के नागरिकों में राष्ट्र के प्रति उत्साह की नवीन ऊर्जा का संचार करना आवश्यक था। यह याद दिलाना जरूरी था कि स्वतंत्रता प्राप्ति की एक बड़ा लक्ष्य पा लिया है किन्तु अब नवीन राष्ट्र को नए सिरे से स्थापना देने के लिए सबको जुटना होगा। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘‘राष्ट्रधर्म’’ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। अब आवश्यकता थी ‘‘राष्ट्रधर्म’’ के लिए एक योग्य संपादक की। पं. दीनदयाल उपाध्याय संपादक की खोज में जुट गए और उनकी खोज समाप्त हुई अटल बिहारी वाजपेयी पर। उन्होंने ऐसा क्या देखा था अटल जी में?


सन् 1946 में स्वतंत्रता संग्राम अपनी चरम स्थिति पर जा पहुंचा था। सन् 1947 के आरम्भिक महीनों में अंग्रेज सरकार को भी समझ में आ गया था कि अब उनके भारत से जाने का समय आ गया है। 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हो गया किन्तु इससे पहले देश के बंटवारे का दंश देश की आत्मा को घायल कर चुका था। बंटवारे से उपजा अविश्वास का वातावरण फन फैलाए था। ऐसे में सौहार्द स्थापित किया जाना आवश्यक था। इसी विकट समय सभी दुरूह प्रश्नों के उत्तर जन-जन तक पहुंचाने के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय ने समाचारपत्र को माध्यम बनाने का निश्चय किया और सन् 1947 में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड’ की स्थापना की थी जिसके अंतर्गत क्रमशः स्वदेश, राष्ट्रधर्म एवं पांचजन्य नामक पत्र प्रकाशित हुए।
‘राष्ट्रधर्म’ का प्रकाशन आरम्भ करने से पूर्व आवश्यकता थी एक अत्यंत योग्य संपादक की, जो पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को भली-भांति समझते हुए पत्रिका को सही स्वरूप प्रदान कर सके। चूंकि दीनदयाल उपाध्याय स्वयं संपादक पद पर रह कर बंधन स्वीकार नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण दायित्व अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपने का निर्णय किया। उपाध्याय जी ने अटल बिहारी को लखनऊ बुला दिया। अटल बिहारी ने भी ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादन का भार सहर्ष स्वीकार कर लिया।
अटल बिहारी वाजपेयी में राजनीतिक समझ, साहित्यिक प्रतिभा और लेखन की प्रभावी कला थी। उनकी ये विशेषताएं एक न एक दिन उन्हें सफलता के उच्चतम शिखर तक पहुंचाने वाली थीं। अटल बिहारी यदि चाहते तो वे तत्काल सफलता प्राप्त करने का कोई छोटा रास्ता भी चुन सकते थे किन्तु वे किसी भी ‘शाॅर्टकट’ में विश्वास नहीं रखते थे। उनका उस समय भी मानना था कि ‘‘जो श्रम करके प्राप्त किया जाए, वही सुफलदायी होता है और स्थायी रहता है।’’ कर्म के प्रति आस्था रखने वाले अटल बिहारी ने श्रम का मार्ग चुना। वे जनसेवक बनना चाहते थे। दिखावे के जनसेवक नहीं, वरन् सच्चे जनसेवक। वे जनता के सहभागी बन कर काम करना चाहते थे, जनता से दूर रह कर नहीं। उनकी यह अभिलाषा उनके भाषणों और लेखों में मुखर होती रहती। अतः जब पं. दीनदयाल उपाध्याय को एक पत्रिका प्रकाशित करने का विचार आया तो प्रश्न था कि उस पत्रिका का संपादक किसे बनाया जाए? क्योंकि पं. दीनदयाल स्वयं संपादन का भार ग्रहण नहीं करना चाहते थे। ऐसी स्थिति में उन्हें सबसे पहला नाम अटल बिहारी का ही सूझा।
राजधानी लखनऊ के राजेंद्र नगर स्थित आरएसएस मुख्यालय के ठीक बगल में राष्ट्रधर्म का काम शुरू हुआ था। सन 1947 में अटल बिहारी वाजपेयी ‘‘राष्ट्रधर्म’’ के पहले संपादक बने। देश स्वतंत्र होने के बाद राष्ट्रवाद की अलख जगाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना के अनुसार प्रकाशित राष्ट्रधर्म पत्रिका में लेखन और फिर उसकी छपाई का काम शुरू हुआ था। उस दौर में ट्रेडइल और विक्टोरिया फ्रंट जैसी छोटी मशीनों में पत्रिका और अखबारों की छपाई का काम होता था। धीरे-धीरे करके यह काम अटल जी के नेतृत्व में आगे बढ़ा और उनके नेतृत्व में लोगों को राष्ट्रवाद के विचार मिलने शुरू हो गए। राष्ट्रधर्म में लेखन और उसके वितरण का काम अटल बिहारी वाजपेयी खुद करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘‘राष्ट्रधर्म’’ को अपने धर्म की भांति सम्हाला। वे समाचार लिखते थे, लेख लिखते थे, संपादकीय लिखते थे और छपने के बाद उसे हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए लखनऊ की गलियों में साइकिल से भी राष्ट्रधर्म बांटने का काम भी किया करते थे। उनकी इस विशेषता को पहचानते हुए ही दीनदयान उपाध्याय ने ‘‘राष्ट्रधर्म’’ के लिए जब संपादक के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को चुना उस दौरान मनोहर आठवले ने उनसे पूछा कि ‘‘आप राष्ट्रधर्म के लिए संपादक ढूंढ रहे थे, कोई मिला कि नहीं?’’
इस पर दीनदयाल उपाध्याय ने संतोष भरे स्वर में उत्तर दिया कि ‘‘मैंने ‘राष्ट्रधर्म’ के लिए उसे चुन लिया है जिसे राष्ट्रधर्म की समझ है।’’
फिर जैसे ही दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी का नाम लिया तो मनोहर आठवले के मुख से निकला,‘‘उत्तम चयन!’’
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और 31 अगस्त 1947 को राष्ट्रधर्म का पहला अंक निकला. स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक 16वें दिन राष्ट्रधर्म का पहला अंक निकला था अतः उसे विशिष्ट होना ही था। अटल जी ने अपनी कविता ‘‘हिंदू तन मन हिंदू जीवन, हिन्दू रग-रग, हिन्दू मेरा परिचय’’ को राजधर्म के प्रथम अंक में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया। कविता के प्रथम दो बंद थे-
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार।
डमरू की वह प्रलयदृध्वनि हूँ, जिसमे नचता भीषण संहार।
रणचंडी की अतृप्त प्यास, मै दुर्गा का उन्मत्त हास।
मै यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुंआधार।
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मैं।
यदि धधक उठे जल, थल, अंबर, जड चेतन तो कैसा विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!

मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर्णभ मे घहर-घहर, सागर के जल मे छहर-छहर।
इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सोराभ्मय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!

तथा, कविता के अंतिम दो बंद थे -
होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूँ सब को गुलाम?
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।
गोपाल-राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया?
कब दुनिया को हिन्दू करने घर-घर मे नरसंहार किया?
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी?
भूभाग नहीं, शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज।
मेरा इसका संबन्ध अमर, मैं व्यक्ति और यह है समाज।
इससे मैने पाया तनदृमन, इससे मैने पाया जीवन।
मेरा तो बस कर्तव्य यही, कर दू सब कुछ इसके अर्पण।
मै तो समाज की थाति हूँ, मै तो समाज का हूं सेवक।
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
यद्यपि यह प्रथम अंक निकालना भी कोई आसान काम नहीं था। पहले अंक की 3500, दूसरे अंक की आठ हजार और तीसरे अंक की 12000 प्रतियां निकली थीं। पत्रिका लोकप्रिय हुई, प्रसार बढ़ा, पाठक बढ़े किन्तु इसी के साथ काम भी बढ़ गया। अटल जी को अपने ही हाथ से कंपोजिंग करना रहता था और राष्ट्रधर्म के बंडल साइकिल पर लेकर उनको बांटने के लिए जाना पड़ता था। इतनी विषम परिस्थिति में अटल जी काम करते थे। किन्तु उनकी इसी जीवटता के कारण इस युवा संपादक की पहचान पूरे देश में स्थापित हो गई थी।
अटल बिहारी के संपादन में ‘राष्ट्रधर्म’ ने शीघ्र ही लोकप्रियता प्राप्त कर ली। उनके संपादकीय लेख लोग रुचि से पढ़ते। समाचारपत्र की प्रसार संख्या और प्रशंसकों की संख्या लगातार बढ़ने लगी। पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी, अमृतलाल नागर, महादेवी वर्मा एवं डाॅ. रामकुमार वर्मा भी अटल बिहारी के संपादकीय लेखों के प्रशंसक थे। ‘राष्ट्रधर्म’ का पहला अंक 31 अगस्त, 1947 को प्रकाशित हुआ। पाठकों द्वारा इसका भरपूर स्वागत हुआ। राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड ने आगे चल कर न केवल अटल बिहारी वाजपेयी वरन् वचनेश त्रिपाठी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चन्द्र मिश्र तथा राजीवलोचन अग्निहोत्री जैसे महानुभावों को पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित किया। इसी के साथ ‘राष्ट्रधर्म’ का वह उद्देश्य भी पूरा हुआ जिसके लिए इसका प्रकाशन आरम्भ किया गया था। उद्देश्य था राष्ट्रवासियों के मन में उत्साह संचार करना एवं नवीन लक्ष्यों की ओर ध्यानआकर्षित करना ताकि एक सृदुढ़ स्वतंत्र भारत आकार ले सके।                                  ------------------


(दैनिक, सागर दिनकर में 14.10.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, October 13, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली विरासत को सहेजती : आल्हा समर सारावली | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
बुंदेली विरासत को सहेजती : आल्हा समर सारावली  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - श्री ईश्वरीप्रसाद खरे कृत आल्हा समर सारावली
संपादक - संतोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक    - वीरेंद्र बहादुर खरे (पौत्र), ओल्ड मीनार, ई-125, सोपनी स्ट्रीट, भोपाल (म.प्र.), दूरभाष - 9753442700
मूल्य       - 150/-
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आल्हा काव्य बुंदेली जनमानस में रचा-बसा है। इसमें आल्हा और ऊदल दो भाइयों के वीरता भरे युद्ध का रोचक विवरण है। जागनेर के राजा एवं कवि जगनिक की यह रचना है जिसमें दोनों वीरों के 52 युद्धों की काव्यात्मक कथा है। यह ऐसा काव्य है जिसका पाठ अथवा गायन करते समय भुजाएं फड़क उठती हैं। इसमें ‘‘आल्हा’’ नामक एक विशिष्ट मात्रिक छंद का प्रयोग होता है, जो ढोलक की थाप के साथ वीरगति और प्रवाह में गाया जाता है।   आल्हा को मां शारदा (मैहर मध्यप्रदेश स्थित) का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। मान्यता है कि आज भी मंदिर का पट खुलने से पूर्व आल्हा मां शारदा देवी को पुष्प अर्पित करते हैं। ब्रिटिश काल के दौरान भी भारतीय सैनिकों में जोश और युद्ध-कुशलता भरने के लिए आल्हा खंड का प्रयोग किया जाता था। इसी आल्हा काव्य को सारावली के रूप में पहले उर्दू में ‘‘जुल्उतुमरमजिया’’ के नाम से मुंशी मोहम्मद खां पुलिस इंस्पेक्टर के सहयोग से मुंशी ईश्वरी प्रसाद ने लिखा था। यह कृति एक लंबे समय संज्ञान से बाहर रही। फिर महोबा के साहित्यकार संतोष कुमार पटेरिया ने ‘‘आल्हा समर सारावली’’ के नाम से अनुवाद कर प्रकाशित कराया। मुंशी ईश्वरी प्रसाद के अवदान के प्रति साहित्य समाज द्वारा की गई अवहेलना के संबंध में लेखक वीरेन्द्र बहादुर खरे ने पुस्तक के आरंभ में ही ‘‘मुंशी ईश्वरी प्रसाद की साहित्य साधना’’ के अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि ‘‘19वीं सदी में बुन्देलखण्ड में एक ही समय में दो ईश्वरी साहित्य साधना में रत थे। उनमें से एक फागों के ऋतुराज लोकगायक ईश्वरी थे, जो कम से कम बुन्देलखण्ड में परिचय के मोहताज नहीं हैं। पर मैं जिन मुंशी ईश्वरी प्रसाद खरे महोबा निवासी के साहित्य अवदान की बात कहने जा रहा हूँ। उनका उल्लेख पाठ्य पुस्तकीय हिन्दी साहित्य के इतिहास में उल्लेख नहीं है। यहाँ तक कि स्वतंत्रता के बाद के बुन्देली साहित्य पर शोध करने एवं बुन्देलखण्ड के अज्ञात कवियों को प्रकाश में लाने का श्रेय लूटने वाले विद्वानों ने अपने लेखों में इनका उल्लेख तक नहीं किया। जबकि 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में किये गये शोधकार्यों में इनका उल्लेख है। पण्डित श्याम बिहारी एवं सुखदेव बिहारी मिश्र बंधुओं के मिश्रबंधु विनोद में एवं दीवान प्रतिपाल सिंह के प्रकाशित बुन्देलखण्ड का इतिहास प्रथम खण्ड में उनका उल्लेख है। उनकी मृत्यु के लगभग 75 वर्ष बाद मुंशी ईश्वरी प्रसाद का उल्लेख छतरपुर के विद्वान डॉ. बहादुर सिंह परमार एवं डॉ. हरि सिंह घोष द्वारा संपादित एवं आदिवासी लोककला अकादमी द्वारा प्रकाशित बुन्देलखण्ड की छंदबद्ध काव्य परम्परा प्रकाशन वर्ष 2005 में किया गया है। मुंशी ईश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव खरे का जन्म सन् 1829 में कन्नौज उ.प्र. में हुआ।’’

इस प्रकार ‘‘आल्हा समर सारावली’’ एक बार पुनः साहित्य जगत के संज्ञान में आई। मूल पुस्तक में इसके सृजन के संबंध में लिखा गया है कि ‘‘जाहिर महान की शूरता का कर्तव्य का सत्य बखान जिसको मुंशी ईश्वरी प्रसाद हेड मास्टर पेन्शिनियर वाल हमीरपुर व वर्तमान हाल निवासी महोबा ने अपनी किताब "जुल्दतुलरमजिया" जो कि आज्ञानुसार श्रीमान् जनाब मुंशी मोहम्मद खाँ सहिब इन्सपेक्टर पुलिस के जवान उर्दू में बनायी गई थी। उसका उल्था जबान हिन्दी में आज्ञानुसार श्रीमान् बनाफर वंश अवतंस जनाब ठाकुर सभासिंह साहिब रईस कस्बा कुलपहाड़ के प्रेमी स्वजन अवलोकन के हेतु किया।’’

पुस्तक की मूल सामग्री को इन शीर्षकों में प्रस्तुत किया गया है- चन्द्रब्रह्म का जन्म, चन्देलवंश की उत्पत्ति, बनाफर कौम की उत्पत्ति एवं कालिंजर, चंदेलवंश के राजा (राजा परमालदेव तक), माहिल परिहार का वृतान्त, चन्देलवंश के नियम भंग एवं मनियादेव, दस्सराज, वक्षराज, सैयद तालन का परिचय और करंगाराम का आक्रमण, मड़ौं की लड़ाई, पंडित ढौवा (ढेबा) का वृतांत और क्षत्रिय जाति की रीति, आल्हखण्ड में वर्णित अन्य युद्ध, राजा परमाल और पृथ्वीराज चैहान तृतीय के मध्य द्वेष, महोबा से आल्हा ऊदल का निष्कासन, अन्य युद्ध और आल्हा को कन्नौज से लाना, राजा समरजीत उर्फ रणजीत व अन्य जाति के राजवंश, बुन्देलवंश की उत्पत्ति और अर्जुनपाल, चम्पतराय आदि, सरदार दलेल खाँ का जगतराज पर आक्रमण, महोबा में पूर्व दिशा के स्थान, महोबा में पश्चिम दिशा के स्थान, महोबा बस्ती के अन्दर देव स्थान, शिलालेख व मूर्ति का चित्र, बनाफर वंशावली-स्व. दीवान प्रतिपाल सिंह।

पुस्तक के संपादक संतोष कुमार पटैरिया ने ‘‘भूमिका’’ में लिखा है कि ‘‘परम्परागत यह बात आती रही है कि बारहवीं शताब्दी में महोबा में चन्देल राजा परमर्दिदेव प्रथम उपाख्य परमाल (सन् 1165-1203 ई) के यहां जनकवि जगनिक ने आल्हखण्ड लिखा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’ में जगनिक की कृति परमाल रासो का उल्लेख किया है। बाबू श्याम सुन्दरदास ने दो पाण्डुलिपियों के संकलन को परमाल रासो नाम दिया है जो नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ने प्रकाशित किया है। आल्हखण्ड का कथानक भिन्न रूप में कई ग्रन्थों भविष्य महापुराण, जगतराज की दिग्विजय सहित आल्हा गायकों के गायन को लिपिबद्ध करके प्रकाशित पुस्तकों में भी मिलता है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर आल्हखण्ड की कथा की पुष्टि भी होती है। सन् 1881 में चौधरी घासीराम द्वारा लिखित आठ प्रसंग प्रकाशित हुये थे। सन् 1865 में फर्रुखाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी सर ईलियट ने आल्हखण्ड प्रकाशित कराया था जिसमें मुख्यतः कन्नौजी गायकी में कथानक निहित थे। फिर लगभग पैंतालीस वर्षों बाद सन् 1910 प्रस्तुत कृति आल्हा समरसारावली प्रकाशित हुई थी। कृतिकार श्री ईश्वरी प्रसाद खरे ने बचपन में कन्नौज में आल्हा गायन सुना। सन् 1872 व 1884 में जनरल कनिंघम ने बुन्देलखण्ड में पुरातात्विक स्थल व शिलालेख खोजे किन्तु उनका प्रकाशन न होने के कारण श्रद्धेय खरे जी को शिलालेखों में निहित इतिहास की जानकारी नहीं हो सकी। खरे जी ने आल्हखण्ड व महोबा के दर्शनीय स्थलों का वर्णन अपनी उर्दू में लिखी कृति जुल्द तुलरमजिया में मुहम्मद मुस्तफा खां पुलिस इंस्पेक्टर की प्रेरणा से किया फिर कुलपहाड़ के श्री सभा सिंह बनाफर की प्रेरणा से उसका हिन्दी में अनुवाद किया और ‘‘आल्हा समर सारावली’’ कृति को नाम दिया। ज्ञातव्य है कि उस समय श्री खरे जी कुलपहाड़ में सरकारी स्कूल में हेड मास्टर थे। उर्दू की पुस्तक के प्रकाशन का विवरण नहीं मिलता है।


इस कृति में लेखक ने आल्हखण्ड के पात्रों के बारे में उस समय प्रचलित कथानक के आधार पर लिखा है उस समय इतिहासकार लाला भगवानदीन थे संभव है कि लेखक ने हरिकेश कृत जगतराज की दिग्विजय भी पढ़ी हो, और जिससे जो जानकारी मिली, खरे जी ने उस जानकारी का उपयोग किया। शिलालेखों के आधार पर चन्देल राजाओं का शासनकाल निश्चित किया गया। अतः सन् 1165 से सन् 1203 तक राजा परमर्दिदेव प्रथम के शासन काल में आल्हा ऊदल हुये। ऊदल का निधन वर्तमान जनपद जालौन के बैरागढ़ में हुई अन्तिम लड़ाई में हुआ जो कि सन् 1182-83 में हुआ था। जनपद ललितपुर के मदनपुर में सड़क के किनारे बने शिव मंदिर में उत्कीर्ण शिलालेख सम्वत् 1239 का है। इससे यह सिद्ध होता है कि महोबा में लगभग सत्रह वर्ष तक रहे इसी अवधि में उनका कन्नौज में रहने का काल सम्मिलित है। बैरागढ़ के युद्ध के पूर्व ही परमर्दिदेव प्रथम कालिर्जिर दुर्ग में चले गये जहाँ 27 अप्रैल 1203 में रज्जब की पहली तारीख सोमवार को उनका निधन हुआ। इन सत्रह वर्षों में ही युद्धों में आल्हा ऊदल, ताल्हन सैयद, मलखान, ढेवा आदि की सहभागिता रही। इसी मध्य आल्हा का पुत्र इन्दल हुआ। हर काल में लोक कवियों ने आल्ह खण्ड में वर्णित प्रसंगों को विस्तार दिया और युद्धों की संख्या 52 तक पहुँच गई। सन् 1182 के श्रावणमास के कीर्तिसागर तट पर हुये युद्ध को भुजरियों की लड़ाई भी कहा जाता है। पृथ्वीराज चौहान जो कि चन्देलकाल में थे उन्हें इतिहास में पृथ्वीराज चौहान तृतीय कहा जाता है। उनके किसी भी शिलालेख में महोबा में हुए युद्ध का वर्णन नहीं है और न ही महोबा विजय का उल्लेख है। केवल वर्तमान जनपद ललितपुर के पुराने मदनपुर में शीघ्रतावश उत्कीर्ण किये गये तीन लघु शिलालेख वर्तमान में आल्हा ऊदल की कचहरी कहे जाने वाले भवन की भीतरी दीवारों में है। इसमें एक शिलालेख में जेजाभुक्ति के स्थान पर जेजाकभुक्ति लिखा है। शीघ्रता में कोई तिथि नहीं लिखी गई। भाषा यह है- "ओम ! अरूणोराजस्य पौत्रना श्री सोमेश्वर सुनुना जेजाकभुक्ति देसोयम पृथ्वी राजना लुंठितः सम्वत् 1239।’’

दरअसल जब हम साहित्य और इतिहास की कृतियों को सहेजने में भेदभाव करने लगते हैं तो ‘‘जुल्उतुमरमजिया’’ उर्फ़ ‘‘आल्हा समर सारावली’’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियां अवहेलना की चादर में ढंक कर रह जाती हैं और फिर धीरे-धीरे खो जाती हैं। ऐसी तमाम कृतियों को लुप्त अथवा नष्ट होने से बचाने के लिए आवश्यक है कि उनका पुनः प्रकाशन कराया जाए। यही महती कार्य किया है संतोष कुमार पटैरिया ने। उन्होंने ‘‘आल्हा समर सारावली’’ का संपादन करते हुए पुस्तक में स्व. श्री माधव प्रसाद स्वर्णकार का स्मरण करते हुए ‘‘महोबा नगर का मुकम्मिल इतिहास’’ तथा पं. हरिविष्णु अवस्थी का लेख भी रखा है।
वस्तुतः आल्हा ऊदल द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों के बारे में जानना एवं पढ़ना बुंदेलखंड के शौर्य एवं वीरता से स्वयं को जोड़ने के समान है। ये लड़ाइयां मात्र लड़ाइयां नहीं थीं यह भारतीय संस्कृति की वे मूल परिचायक थीं जिनमें आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की गाथा सिमटी हुई थी। प्रायः 52 युद्धों का काव्यात्मक इतिहास ‘‘आल्हा’’ पढ़ पाना सबके लिए संभव नहीं हो पाता है, ऐसे में ‘‘आल्हा समर सारावली’’ संक्षेप में और गद्य में उन चर्चित युद्धों का सम्पूर्ण विवरण संक्षेप में उपलब्ध कराता है, जिसे पढ़ कर ‘‘आल्हा’’ काव्य के कलेवर को जाना और समण जा सकता है। यह कृति बुंदेली विरासत को सहेजने की दिशा में अति महत्वपूर्ण है। यह पुस्तक न केवल पुरातन साहित्य को पुनः प्रकाश में लाने का कार्य करती है अपितु बुंदेला इतिहास के एक महत्वपूर्ण अंश को भी पुनः संरक्षित करती है।                      
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