Wednesday, August 4, 2021

चर्चा प्लस | मार्निंग वाॅक पर ऑक्सीजन टैक्स : कहां से आते हैं ऐसे विचार ? | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस           
मार्निंग वाॅक पर ऑक्सीजन टैक्स : कहां से आते हैं ऐसे विचार ?
- डाॅ शरद सिंह
          कोरोना काल की दूसरी लहर ने ऑक्सीजन के महत्व को बखूबी समझा दिया है। उस दौरान मुंह मांगे दाम पर ऑक्सीजन बिकी है और जिसे नहीं मिल सकी वह एक-एक सांस को तरस कर मरा है। क्या उनके परिजन कभी ऑक्सीजन के महत्व को भूल सकेंगे? जिसे प्रकृति ने सबके लिए मुफ़्त में दिया है उस ऑक्सीजन अब एक विश्वविद्यालय परिसर में टैक्स दे कर पा सकेंगे। क्या यह बाज़ारवादी सोच  नहीं है? 

कोरोना संकटकाल ने हमें ऑक्सीजन का महत्व समझाया। एक एक सांस कितनी कीमती हो सकती है, ये बताया। जो ऑक्सीजन पेड़ हमें हमेशा मुफ्त देते आए हैं, वही सिलेंडर में कितनी महंगी साबित हो सकती है ये बात समझना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। इसी बात को और अच्छे से समझाने के लिए उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय प्रबंधन ने एक अनोखा निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय परिसर में मॉर्निंग और इवनिंग वॉक करने वालों पर ऑक्सीजन टैक्स लगाने की तैयारी की जा रही है। कुलपति प्रो. पांडेय के अनुसार इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसर में ऑक्सीजन लेवल को बनाए रखना और उसमें बढ़ोतरी करना है। यद्यपि ये टैक्स अनिवार्य न होकर स्वैच्छिक रहेगा। लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने और पेड़ पौधों का महत्व बताने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। विक्रम विश्वविद्यालय परिसर में सम्राट विक्रमादित्य के नौ रत्नों के नाम पर नौ पर्यावरण संरक्षित क्षेत्र विकसित करने की योजना भी है जहां विभिन्न प्रकार के पौधे लगाए जाएंगे। इस योजना में यहां आने वाले लोगों को भी जोड़ा जाएगा और जो परिसर में वॉक के लिए आते हैं उन्हें पौधे लगाने की जिम्मेदारी दी जाएगी। यहां रोजाना सुबह शाम वॉक करने के लिए करीब पांच हजार लोग आते हैं। इसी के साथ उन्हें साल भर तक उस पौधे की देखरेख भी करनी होगी। विश्वविद्यालय के अधिकारियों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों को भी एक पौधा लगाने और उसे सहेजने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
योजना का उद्देश्य भले ही अच्छा हो लेकिन जिसे प्रकृति ने मुफ़्त प्रदान किया है उस पर टैक्स लगाया जाना ठीक वैसा ही है जैसे रोज़मर्रा के जीवन में भी ऑक्सीजन सिलेंडर की कीमत अदा करनी पड़े। यदि आप स्वच्छ सांस चाहते हैं तो उन संासों को खरीदें। यह व्यवसायिकता किसी निजी सेक्टर के एम्यूज़मेंट पार्क में भले ही स्वीकार्य लगती लेकिन एक उच्चशिक्षा केन्द्र में ऑक्सीजन की सौदेबाजी यार्मनाक ही लग रही है। जिस केन्द्र में ऑक्सीजन बढ़ाने, उसे बचाने की मुफ़्त जागरूकता शिक्षा दी जानी चाहिए वहां ऑक्सीजन पर टैक्स की बात शिक्षा केन्द्र के उद्देश्यों को ही कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। उदाहरण के लिए ज़रा सोचें कि वाटर प्यूरी फायर बनाने वाली प्राईवेट कंपनियां कभी नहीं चाहती हैं कि जनता को प्राकृतिक रूप से स्वच्छ पानी पीने के लिए मिले। यदि जनता को पीने का साफ़ पानी प्राकृतिक रूप से मिल जाएगा तो वह वाटर प्यूरी फायर क्यों खरीदेगी? ऐसी कंपनियों का मुनाफ़ा पेयजल के गंदा होने पर ही टिका होता है। अब यदि एक उच्चशिक्षा केन्द्र उसके परिसर में घूमनेवालों पर ऑक्सीजन टैक्स लगाएगा तो इससे होने वाले मुनाफ़े पर शोधकार्य भी उसी उच्चशिक्षा केन्द्र के शोधार्थियों को करना पड़ेगा। शोध कर के जांचना पड़ेगा कि यह मुनाफ़ा ऑक्सीजन के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में हुआ अथवा विश्वविद्यालय के आर्थिक मद में मुनाफ़ा हुआ? इसके साथ ही इस छोटे से अव्यवहारिक मुनाफ़े से क्या ऑक्सीजन बढ़ पाई? इसी तरह के कई बिन्दु रहेंगे शोधकार्य के। वैसे आम जीवन में भी ऑक्सीजन मुफ़्त नहीं मिलती है। बेशक़ हम ऑक्सीजन टैक्स के नाम से सांसों का टैक्स नहीं देते हैं लेकिन नगर की स्वच्छता के लिए नगरपालिका और नगरनिगम को जो टैक्स अदा करते हैं उसमें स्वच्छ हवा का टैक्स स्वतः शामिल रहता है।
वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा अन्य गैसों की तुलना में लगभग 20.95 प्रतिशत आयतन है। यह मात्रा पहले की अपेक्षा कम हो गई है क्योंकि पिछले दशकों में जंगल तेजी से नष्ट हुए हैं। जबकि एक पेड़ एक दिन में करीब 230 लीटर ऑक्सीजन देता है जिससे लगभग 7 व्यक्ति सांस ले सकते हैं। जानने का विषय यह भी है कि सरकार ऑक्सीमीटर से लेकर ऑक्सीजन पर कितना वसूलती है टैक्स? ऑक्सीजन पर 12 प्रतिशत जीएसटी, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर-जेनरेट पर 12 प्रतिशत जीएसटी, पल्स ऑक्सीमीटर पर 12 प्रतिशत जीएसटी, मास्क (छ-95 मास्क, ट्रिपल-लेयर मास्क और सर्जिकल मास्क) पर 5 प्रतिशत जीएसटी, वेंटिलेटर पर 12 प्रतिशत जीएसटी, आरटी एंड पीसीआर मशीन पर 18 फीसदी (जीएसटी), आरएनए निष्कर्षण मशीन पर 18 प्रतिशत जीएसटी। ये आंकड़े कोरोना की दूसरी लहर के दौरान के हैं। वह दौर था कि कोरोना पीड़ित ऑक्सीजन के लिए तड़प रहे थे।  ऑक्सीजन   सिलेंडर की कालाबाज़़ारी तक शुरू हो गई थी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों ने ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, वेंटिलेटर और जीवनरक्षक दवाओं पर टैक्स घटाने की मांग की थी। इन राज्यों ने कहा था कि जीएसटी काउंसिल की बैठक में इनपर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए।
सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, हर सरकार ने वृक्षारोपण को बढावा दिया। जिससे सांस लेने लायक ऑक्सीजन आज भी वायुमंडल में मौजूद है। यह अवश्य है कि प्रदूषण बढ़ने से विषाक्त गैसों का प्रतिशत हवा में बढ़ा है और वहीं दूसरी ओर जहां जंगलों में वृक्षों की अवैध कटाई हुई है वहीं शहरों के फैलने और आधुनिकीकरण के कारण दशकों पुराने वृक्षों को काट कर सड़कें चैड़ी की गईं, बस्तियों का विस्तार किया गया और पुराने विशाल वृक्षों की अपेक्षा कम आॅक्सीजन दे पाने वाले सजावटी पेड़ों की कतारें रोप दी गईं। एक शोध के अनुसार हर 50 मीटर की दूरी पर एक पेड़ लगाने से पर्यावरण संतुलित रह सकता है। लेकिन वे वृक्ष कौन से होने चाहिए और उनसे आॅक्सीजन की यह मात्रा कितने वर्षों में मिल सकती है, यह भी विचारणीय है।
वायु पृथ्वी पर जीवन का एक आवश्यक तत्व है। लेकिन धीरे-धीरे पृथ्वी में हो रहे बदलाव के कारण ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है, इसमें कई प्रकार की विषैली गैसे घुल रही है। साधारण शब्दों में कहें तो स्वच्छ वायु में रसायन, सूक्ष्म पदार्थ, धूल, विषैली गैसें, जैविक पदार्थ, कार्बन डाइऑक्साइड आदि के कारण वायु प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषण दिन-प्रतिदिन भयानक रूप लेता जा रहा है। पिछले कई सालों से हर नगर में कारखानों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है जिसकी वजह से वायुमंडल बहुत अधिक प्रभावित हुआ है। स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छ पर्यावर्णीय हवा का होना बहुत जरूरी होता है। जब हवा की संरचना में परिवर्तन होने पर स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो जाता है। संसार की बढती हुयी जनसंख्या ने प्राकृतिक संसाधनों का अधिक प्रयोग किया है। औद्योगीकरण की वजह से बड़े-बड़े शहर बंजर बनते जा रहे हैं। वाहनों और कारखानों से जो धुआं निकलता है उसमें सल्फर-डाई-आक्साइड की मात्रा होती है जो पहले सल्फाइड और बाद में सल्फ्यूरिक अम्ल में बदलकर बूंदों के रूप में वायु में रह जाती है। कुछ रासायनिक गैसे वायुमण्डल में पहुंचकर वहाँ के ओजोन मंडल से क्रिया करके उनकी मात्रा को कम कर देते हैं जिसकी वजह से भी वायु प्रदूषण बढ़ जाता है। अगर वायुमंडल में लगातार कार्बन-डाई-आक्साइड, कार्बन-मोनो-आक्साइड, नाईट्रोजन, आक्साइड, हाईड्रोकार्बन इसी तरह से मिलते रहंगे तो वायु प्रदूषण अपनी चरम सीमा पर पहुंच जायेगा।
वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण कपड़ा बनाने के कारखाने, रासायनिक कारखाने, तेल शोधक कारखाने, चीनी बनाने के कारखाने, धातुकर्म और गत्ता बनाने वाले कारखाने, खाद और कीटनाशक कारखाने होते हैं। इन कारखानों से निकलने वाले कार्बन-डाई-आक्साइड, नाईट्रोजन, कार्बन-मोनो-आक्साइड, सल्फर, सीसा, बेरेलियम, जिंक, कैडमियम, पारा और धूल सीधे वायुमंडल में पहुंचते हैं जिसकी वजह से वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है। प्रदूषण पूरे पारिस्थितिक तंत्र को लगातार नष्ट करके पेड़-पौधों और पशुओं के जीवन को बहुत ही प्रभावित किया है और अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। वायु में उपस्थित सल्फर-डाई-आक्साइड की वजह से दमा रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। जब सल्फर-डाई-आक्साइड बूंदों के रूप में वर्षा के समय भूमि पर गिरती है तो उससे भूमि की अम्लता बढ़ जाती है और उत्पादन क्षमता घट जाती है। जब वायु में आक्सीजन की कमी हो जाएगी तो प्राणियों को साँस लेने में तकलीफ होगी। जब कारखानों से निकलने वाले पदार्थों का अवशोषण वृक्षों के द्वारा किया जायेगा तो प्राणियों के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। वायु प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव महानगरों पर पड़ता है।
पर्यावरण के संरक्षण के लिए निजी संस्थानों को बाध्य करने पर नियंत्रित करना होगा। पैट्रोल, डीजल की जगह पर सौर, जल, गैस और विद्युत ऊर्जा से चलने वाले वाहनों का आविष्कार और उत्पादन करना होगा। सीसा रहित पेट्रोल के प्रयोग पर नियंत्रण करना होगा। वाहनों के दुरुपयोग पर नियंत्रण करना होगा। जंगलों की कटाई को हतोत्साहित करना होगा। यदि ऑक्सीजन टैक्स वसूलना ही है तो वायु प्रदूषित करने वाले कारखानों से वसूलना चाहिए, न कि स्वच्छ सांस पाने के लिए सुबह-शाम घूमने वाले आम नागरिकों से। माॅर्निंग-ईवनिंग वाॅक वालों से ऑक्सीजन टैक्स वसूलने की विश्वविद्यालय प्रशासन की बाज़ारवादी सोच पर यही पूछने को दिल करता है कि क्या उन्हें शर्म भी नहीं आती? इससे तो बेहतर है कि वे परिसर में आम जनता के लिए ‘‘प्रवेश निषेध’’ का बोर्ड लगा दें।
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(सागर दिनकर, 04.08.2021)
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Tuesday, August 3, 2021

पुस्तक समीक्षा | परसाईं एवं आचार्य परम्परा के रोचक व्यंग्यों का संग्रह | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 03.08. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक डॉ. राजेश दुबे के व्यंग्य संग्रह "बबूल की छांव" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏

पुस्तक समीक्षा
परसाईं एवं आचार्य  परम्परा के रोचक व्यंग्यों का संग्रह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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व्यंग्य संग्रह - बबूल की छांव
लेखक     - डाॅ. राजेश दुबे
प्रकाशक    - अद्वैत प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य       - 275/-
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आज जिस व्यंग संग्रह की समीक्षा कर रही हूं, उसका नाम है ‘‘बबूल की छांव में’’। जहां तक व्यंग्य विधा का प्रश्न है तो व्यंग विधा यूं भी चुनौती भरी विधा है, जो लिखे उसके लिए, जो पढ़े उसके लिए और जिस पर लिखा जाए उसके लिए तो चुनौती है ही। मेरे विचार से व्यंग आलेख वह आलेख होता है जो कथात्मक स्वरूप रखते हुए अपने चुटीलेपन से आक्रोश उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।  यही व्यंग की सबसे बड़ी खूबी होती है। साहित्य की शक्तियों अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में हास्य अभिधा यानी सपाट शब्दों में हास्य की अभिव्यक्ति के द्वारा क्षणिक हंसी तो आ सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकती। व्यंजना के द्वारा प्रतीकों और शब्द-बिम्बों के द्वारा किसी घटना, नेता या विसंगितयों पर प्रतीकात्मक भाषा द्वारा जब व्यंग्य किया जाता है, तो वह चिर स्थायी प्रभाव डालता है। हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार हैं- हरिशंकर परसाई, शंकर पुणतांबेकर, नरेंद्र कोहली, गोपाल चतुर्वेदी, विष्णुनागर, प्रेम जन्मेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, विष्णुनागर, सूर्यकांत व्यास, आलोक पुराणिक, सुरेश आचार्य आदि। इन व्यंग्यकारों ने हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा को नई स्थापना दी।

वर्तमान समाज में व्याप्त अव्यस्थाओं को देखकर कभी-कभी मन व्यथित हो जाता है, चाहे वह अव्यवस्था सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या धार्मिक हो मन इन अव्यवस्थाओं का प्रतिकार करना चाहता है परन्तु किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से हम इनका प्रतिकार नहीं कर पाते और ये भावनाएं मन के किन्ही कोने में संचित होने लगती है। व्यंग्यकार इन्ही संचित भावनाओं को व्यंग्य के माध्यम से समाज में लाने का प्रयास करता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘‘व्यंग्य वह है, जब सुनने वाला अधरोष्ठों में हंस रहा हो किन्तु भीतर तिलमला उठा हो और फिर भी कहने वाले को जवाब देना उसके लिए अपने को और भी उपहास का पात्र बनाना हो जाता है।’’

डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी के अनुसार, ‘‘आलम्बन के प्रति तिरस्कार, उपेक्षा या भत्र्सना की भावना लेकर बढने वाला हास्य व्यंग्य कहलाता है।” शरद जोशी के अनुसार, ‘‘व्यंग्य की पहचान है कि ऐसा साहित्य जो कष्ट सहती सामान्य जिन्दगी के करीब है या उससे जुड़ा है। यदि ऐसा न हो तो कहीं गड़बड़ है।” हरिशंकर परसाई के अनुसार, व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का पर्दाफाश करता है।’’

इन परिभाषाओं की छांव में देखा जाए तो डॉक्टर राजेश दुबे का व्यंग संग्रह ‘‘बबूल की छांव’’ सटीक बैठता है। इस संग्रह में कुल 36 व्यंग हैं। जैसे की प्रस्तावना में डॉ. सुरेश आचार्य ने बड़े मार्के की बात कही है कि-‘‘व्यंग संशोधन या सुधार नहीं बदलाव चाहता है।’’ यानी थोड़े-बहुत से समझौता करना व्यंग्य की प्रवृत्ति नहीं है। वह पूर्ण परिवर्तनगामी होता है। इसी परिवर्तन की आकांक्षा रखते हुए डॉ राजेश दुबे ने अपने 36 व्यंग्यों को अपने संग्रह में संग्रहीत किया है। यह ठीक वैसे ही है कि जैसे सुव्यवस्था चाहने वालों और इन व्यंग्यों के 36 के 36 गुण आपस में मिल जाए तो अव्यवस्था की जड़ें आसानी से खोदी जा सकती हैं और अव्यवस्था को समूल नष्ट किया जा सकता है। बालेन्दु शेखर तिवारी ने व्यंग्य को प्रयोजनशील अभिव्यक्ति का साधन माना है, उनके अनुसार, ‘‘व्यंग्य किसी लेखक की निजी टिप्पणी नहीं है। वह प्रयोजनशील सघनता से निःसृत यथार्थ की अभिव्यक्ति है। व्यंग्य परिवेश की बहुस्तरीय जटिलताओं को उघाड़ते हुए उस बिन्दु तक अपने पाठकों को पहुंचाने में समर्थ हैं, जहां छद्मपराण तौर-तरीकों के बीच अपने होने का एहसास पाठक को बुरी तरह आन्दोलित कर डाले।’’
पतनोन्मुख व्यक्ति व समाज व्यंग्यकार के लिए पीड़ा का विषय है। वह इस पीड़ा का अनुभव करता है तथा उसे अपनी रचना द्वारा उस पतन को समाज के समक्ष लाता है। इस संग्रह में एक व्यंग है ‘‘तेरे द्वार खड़ा भगवान’’ भी आचार संहिता की शानदार परिभाषा की गई है- ‘‘हमारे वाग्वीर जनप्रतिनिधि जो जन के नहीं, निधि के प्रति समर्पित रहते हैं। अपने भविष्य के सुंदर सपने देखने में व्यस्त रहते हैं। राजनीति का विषदंत धारण किए हुए रहते हैं, कालियादह के इन वंशजों को आज भारतीय निर्वाचन आयोग के सपेरे ने उन्हें दंत विहीन आचार की जिस पिटारी में बंद कर दिया है उस पिटारी को आचार संहिता कहते हैं।’’

सितंबर मास आते ही हिंदी के प्रति हमारा प्रेम और हमारी जागरूकता अचानक बढ़ जाती है। बड़े-बड़े आयोजन समारोह होने लगते हैं। चर्चा-परिचर्चा परिसंवाद सभी कुछ होने लगता है और उस मास सप्ताह यह दिवस में हिंदी के प्रति सारी चिंताएं सारी संभावनाएं और सुखद भविष्य की कल्पनाएं की जाने लगती हैं। मौसमी चिंता पर कटाक्ष करते हुए अपने व्यंग्य ‘‘हिंदी का हाजमा’’ में व्यंग्यकार में लिखा है कि ‘‘हिंदी दिवस पर भांग खाए लोगों ने अपने उद्बोधनों में हिंदी के खूब प्रशस्ति गान गाय हैं। हिंदी भाषियों ने, हिंदी भाषियों को, हिंदी भाषा में सुनाया कि हिंदी को अब बैसाखियों की जरूरत नहीं है। अब वह अपने पैरों पर खड़ी है।’’
हमारे दैनिक जीवन में बाज़ारवाद ने हमें बुरी तरह प्रभावित कर रखा है। कभी हम उसके रंग में रंगे हुए दिखाई देते हैं तो कभी भयाक्रांत। बाज़ारवाद का असर अंतरिक्ष पर भी जा पहुंचा है। वहां भी बाज़ार के मोल भाव और बंटवारे होने लगे हैं। लेकिन बाजार तभी बाज़ार होता है, जबकि ग्राहक मौजूद हो और ग्राहक को लुभाने के लिए बाज़ार हर हथकंडे अपनाता है। ग्राहक भी सब कुछ जानते समझते उन हथकंडों में आसानी से फंस जाता है और फिर भी मुस्कुराता रहता है जैसे कि कुछ हुआ ही न हो।  बाजार और ग्राहकी इस प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए लेखक ने लिखा है-‘‘आजकल सब बाजार में व्यस्त हैं। अभी भी मेनका विश्वामित्र को रिझाने में लगी हैं और शकुंतला की अंगूठी हो गई है। इतना सब कुछ होते हुए भी हमारे जीवन में अंतःसलिला सरस्वती प्रवाह मान है।’’

हमारे कर्मों और प्रयासों में भ्रष्टाचार इस तरह रच बस गया है कि हम उससे अलग होकर जीवन जीने की कल्पना ही नहीं कर पाते हैं। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार में लिप्त होता है। चाहे वह एक कप चाय पिला कर अपना काम करवाने का भ्रष्टाचार क्यों ही न करें,  भ्रष्टाचारी तो कहलाएगा ही। इस भ्रष्टाचार में नोटों का सबसे अधिक महत्व होता है नोटों का लेन-देन ही भ्रष्टाचार के आधार का काम करता है। जिस पर तंज करते हुए राजेश दुबे अपने व्यंग्य ‘‘भ्रष्टाचार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’’ में लिखते हैं-‘‘गांधीजी ने जिस रास्ते पर हमें चलने का संदेश दिया है हम उन्हें लेकर ही आगे बढ़ा सकते हैं। जब गांधी जी हमारे पास होते हैं। जब वे हमारे जेब में होते हैं, वह हमारे बैंक खातों में होते हैं, वे हमारी तिजरियों में रहते हैं, तब हम सुखी रहते हैं।’’

व्यंग्यकार अपने व्यंग्य रचना द्वारा भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा पर व्यंग्य कर नैतिक मूल्यों को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करता है। व्यंग्यकार शिक्षा, राजनीति या धार्मिक सभी क्षेत्र में आई अनावश्यक विसंगति को समाज के समक्ष लाने का प्रयास करता है। नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए व्यंग्यकार अनैतिक पक्षों को समाज व पाठकों के समक्ष रखता है। इस संदर्भ में ‘‘लोकतंत्र की नाव’’ व्यंग्य इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण व्यंग है जिसमें लोकतंत्र की बहुत ही पैनी परिभाषा दी गई है। हम लोकतंत्र में रहते हैं हमें गर्व है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा लोकतंत्र है लेकिन इस लोकतंत्र के करो को बनाए रखने के लिए शायद हम सचेत नहीं रहते हैं इसीलिए लोकतंत्र अक्सर कटघरे में खड़ा दिखाई देता है इसी तथ्य को आधार बनाते हुए लेखक ने लोकतंत्र को इन शब्दों में परिभाषित किया है- ‘‘लोकतंत्र, धृतराष्ट्र की सभा में खड़ी द्रोपदी है। जिसे सब लोलुप निगाहों से भोगने को आतुर हैं।’’ लोकतंत्र को परिभाषित करने के बाद लेखक ने आगे लिखा है कि -‘‘कितने धीर वीर अपने सिंहासन पर बैठे मौन हैं। सारे उपस्थित महानुभावों के बीच उठे सारे निवेदन के स्वर, न्याय पूर्ण कथन और सिफारिशों ने आत्महत्या कर ली है। परिणामतः लोकतंत्र की दयनीय हो रही स्थिति पर हम शर्मसार हैं। राजनीतिक अराजकता की इस परिस्थिति में हम छेद वाली नाव में सवार हैं और वैतरणी पार करने के हौसले बनाए हुए हैं।’’ वस्तुतः व्यंग्य की भाषा उसकी प्रहारक क्षमता को दुगुना करता है। व्यंग्य विसंगतियों के प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता बल्कि वह कठोर व तीक्ष्ण भाषा का प्रयोग करता है।

‘‘बबूल की छांव’’ के कुछ व्यंग्यों में बुंदेली शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। जिसे लोकतत्व का रोचक समावेश माना जा सकता है। जैसे एक व्यंग्य है-‘‘ डूबते जहाज के तैरते यात्री’’। इस व्यंग्य का एक अंश देखिए-‘‘ अपनो घर आंगन छोड़ कें पराय मंडप भात खा रय हैं। काय का घरबारों ने लात मार कें भगा दओ का। अरे कल्लू कैसी बात करत हो। इते राजा की मान मर्यादा का सवाल है और दरबारियों की निष्ठा का सवाल है।’’

व्यंगकार राजेश दुबे के व्यंग हरिशंकर परसाई और डॉक्टर सुरेश आचार्य की परंपरा के व्यंग है। यह एक पठनीय व्यंग संग्रह है इसे पढ़कर आनंद की अनुभूति के साथ ही विचारों का उद्वेलन होना सुनिश्चित है।
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Monday, August 2, 2021

डाॅ सुश्री शरद सिंह के उपन्यास ‘‘शिखंडी’’ की ‘‘प्रेरणा’’ के अप्रैल-जून 2021 में समीक्षा

 प्रस्तुत है मेरे (डाॅ सुश्री शरद सिंह के ) उपन्यास ‘‘शिखंडी’’ की मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘‘प्रेरणा’’ के अप्रैल-जून 2021 में प्रकाशित डाॅ. सुरेश आचार्य द्वारा की गई समीक्षा।

 Sharad Singh Novel - Shikhandi - review published in Prerna Patrika April- Jun 2021 

 Sharad Singh Novel - Shikhandi - review published in Prerna Patrika April- Jun 2021 

 Sharad Singh Novel - Shikhandi - review published in Prerna Patrika April- Jun 2021 

 Sharad Singh Novel - Shikhandi - review published in Prerna Patrika April- Jun 2021 

 Cover - Prerna Patrika April- Jun 2021 


Wednesday, July 28, 2021

चर्चा प्लस | कभी न रुकने वाले ओलम्पिक खेलों के जज़्बे को सलाम | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस            
कभी न रुकने वाले ओलम्पिक खेलों के जज़्बे को सलाम !
 - डाॅ शरद सिंह
        टोक्यो में चल रहे ओलम्पिक गेम्स में भारत ने अपना खाता खोल दिया है और उस जीवटता का हिस्सा बन गया है जो कोरोना की विश्व-आपदा जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी खेलों को जारी रखे हुए है। इससे पहले भी ऐसे तीन अवसर आ चुके हैं जब ओलम्पिक पर संकट के बादल मंडराए थे। लेकिन हर बार ओलम्पिक ने खुद को संकट से उबार लिया और आगे बढ़ता गया।  
 आज कोई विश्व युद्ध नहीं चल रहा है लेकिन एक युद्ध अवश्य है जिसमें पूरा विश्व कोरोना आपदा से युद्ध कर रहा है। सन् 2019 के अंतिम महीनों में कोरोना वायरस कोविड-19 ने पूरी दुनिया को हिला दिया। सन् 2020 आरम्भ होते ही कोरोना वायरस की भयावहता से पूरा विश्व थर्रा उठा। योरोपीय देशों में हज़ारों लोगों की जानें गईं। लोगों को अपनी सामान्य गतिविधियां स्थगित कर देनी पड़ी। यहां तक कि शादी-विवाह भी थम गए। ऐसी परिस्थिति में स्टेडियम में जाने, खोलने या खेल देखने की कल्पना करना भी कठिन हो गया था। जबकि सन् 2020 का वर्ष था ओलम्पिक खेलों का। कोरोना की भयावहता को देखते हुए ओलम्पिक संघ ने ओलम्पिक खेलों को स्थगित करने का निर्णय लिया। यह चैथी बार था जब ओलम्पिक खेलों को रोका गया। इससे पहले ओलम्पिक खेलों के इतिहास में ऐसे तीन अवसर आए थे जब इन खोलों को स्थगित करना पड़ा था। लेकिन ओलम्पिक खेलों ने अपनी हर बाधा को पार कर के सिद्ध किया कि उसमें ‘‘वसुधैवकुटुम्बकम’’ का जज़्बा है। जब दुनिया के सारे देश एक साथ खड़े हो जाएं ता कोई बाधा हरा नहीं सकती है, मिटा नहीं सकती है। ओलम्पिक खेल भी कुछ समय के लिए स्थगित किए गए और स्थितियां सुधरने पर पुनः आयोजित किए गए।
प्रत्येक चार वर्ष में होने वाले ओलम्पिक खेलों का इतिहास लगभग 124 साल पुराना है। सन् 1896 में ग्रीस के शहर एथेंस में पहला आधुनिक ओलम्पिक खेल शुरू हुए थे। उस समय मात्र 14 देशों ने इसमें भाग लिया था। कुल 42 खेल स्पर्धा में इसमें 250 पुरुष खिलाड़ियों ने इसमें भाग लिया था। सन् 1916 तक सब कुछ ठीक रहा लेकिन सन् 1916 में जर्मनी  की राजधानी बर्लिन में ओलम्पिक होने थे। तब तक यूरोप प्रथम विश्व युद्ध के शिकंजे में फंस चुका था। 28 जुलाई 1914 को पहला विश्व युद्ध शुरू हो चुका था।  इस युद्ध मे लगभग 16 मिलियन लोग मारे गए। यह युद्ध चार वर्ष तक चला। ओलम्पिक खेल रद्द कर दिए गए।  इसके बाद सन् 1936 में ओलम्पिक खेल हुए। जिसकी मेजबानी की जर्मनी ने।
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि तत्कालीन बढ़ते नाजीवाद के कारण ओलम्पिक का आयोजन जर्मनी की राजधानी बर्लिन में हो पाएगा या नहीं। अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि बढ़ते नाजीवाद के कारण ओलम्पिक का आयोजन बर्लिन में हो पाएगा या नहीं। अमेरिका ने बर्लिन ओलम्पिक के बहिष्कार किए जाने का प्रस्ताव रखा किन्तु वह अमान्य कर दिया गया और अमेरिका ने ओलम्पिक में अपने खिलाड़ी भेजे। मात्र स्पेन ही ऐसा देश था जो बर्लिन ओलम्पिक में भाग नहीं ले पाया क्योंकि वह अपने गृहयुद्ध में उलझा हुआ था।
एडोल्फ हिटलर ने ओलम्पिक खेलों का उदघाटन किया और कई टीमों ने उन्हें नाजी सैल्यूट भी दिया। लेकिन उदघाटन समारोह से ब्रिटेन और अमरीका की टीमें अनुपस्थित रहीं। लेकिन बर्लिन ओलम्पिक के स्टार रहे अमरीका के अश्वेत खिलाड़ी जेसी ओवंस। ओवंस ने चार स्वर्ण पदक जीते। उन्होंने 100 मीटर, 200 मीटर, लंबी कूद में स्वर्ण जीता और 4 गुणा 100 मीटर रिले दौड़ में भी वे अमरीकी टीम में शामिल थे जिसने गोल्ड जीता था। जर्मनी की टीम मेडल तालिका में सबसे ऊपर रही। उसने 33 स्वर्ण पदक जीते। अमरीका के हिस्से में 24 और हंगरी के हिस्से में 10 स्वर्ण पदक आए।
विश्व युद्ध के कारण 1916 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हुआ। लेकिन 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प को मेजबानी का अवसर मिला। यद्यपि विश्व युद्ध की पीड़ा बेल्जियम को भी झेलनी पड़ी थी लेकिन इसके बावजूद आयोजकों ने जरूरी व्यवस्था पूरी कर ली। प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने के कारण जर्मनी, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, हंगरी और तुर्की को ओलम्पिक का आमंत्रण नहीं दिया गया। लेकिन फिर भी इसमें बड़ी संख्या में एथलीटों ने हिस्सा लिया। एंटवर्प ओलम्पिक से ही ओलम्पिक खेलों का आधिकारिक झंडा सामने आया। इस झंडे में आपस में जुड़े पाँच गोलों को दिखाया गया जो एकता और मित्रता का प्रतीक है। पहले ओलम्पिक की तरह इस ओलम्पिक में भी देशों के बीच शांति प्रदर्शित करने के लिए कबूतर उड़ाए गए। किसी दक्षिण अमेरिकी देश ने पहली बार 1920 में स्वर्ण पदक जीता। ब्राजील के गिलहेर्म पैरेंस ने रैपिड फायर पिस्टल प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता। अमेरीका के ऐलिन रिगिन सबसे कम उम्र में स्वर्ण जीतने वाले खिलाड़ी बनें। उन्होंने गोताखोरी में गोल्ड मेडल जीता सिर्फ 14 वर्ष और 119 दिन की आयु में। 1500 मीटर में ब्रिटेन के फिलिप नोएल बेकर ने सिल्वर मेडल जीता और बाद में वे ब्रिटेन के एमपी भी बने। 1959 में वे पहले ऐसे ओलंपियन बनें जिन्हें शांति पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गया।ं
द्वितीय विश्व युद्ध सितंबर 1939 से लेकर सितंबर 1945 तक यानी कुल 6 साल चला। करीब 70 देशों की सेनाएं इस युद्ध में शामिल थीं। इस भयावह युद्ध में करीब 7 करोड़ लोगों की जान गई थी। इस बीच दो ओलम्पिक खेलों का आयोजन होना था। 1940 और 1944 में होने वाले ओलम्पिक खेल दूसरे विश्व युद्ध की बलि चढ़ गए। उन्हें स्थगित करना पड़ा। इसमें 1940 का ओलम्पिक की संयुक्त मेजबानी जापान और फिनलैंड पर थी। जबकि 1944 में होने वाले ओलम्पिक खेल लंदन में होना था। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण ये दोनों ओलम्पिक्स रद्द करने पड़े थे। इस प्रकार तीन बार ओलम्पिक खेलों को स्थगित होना पड़ा।
इस बार सन् 2020 में टोक्यो में आयोजित होने वाले ओलम्पिक खेलों को कोरोना महामारी के कारण स्थगित करना पड़ा। लेकिन जापान ने हौसला दिखाया और एक मेजबान की हैसीयत से उसने तैयारी जारी रखी। महामारी का प्रकोप थोड़ा कम होता दिखने पर दुनिया के और भी देशों ने साहस दिखाया और आज सन् 2021 में ‘‘टोक्यो ओलम्पिक-2020’’ का आयोजन किया जा रहा है। टोक्यो ओलम्पिक में हिस्सा लेने के लिए 205 देशों से 11 हजार एथलीट जापान पहुंचे हैं। 17 दिनों तक यहां 33 अलग-अलग खेलों के 339 इवेंट्स होंगे। इस बार ओलम्पिक में मैडिसन साइकलिंग, बेसबॉल और सॉफ्टबॉल की वापसी हुई है। वहीं अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, रूस, जापान और जर्मनी मेडल सूची में टॉप पर रहने के लिए कड़ी टक्कर करती दिखेंगे।
ओलम्पिक के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि उद्घाटन समारोह में दर्शकदीर्घा खाली थी। दर्शकों के बिना खेलों का आयोजन करने का साहस जापान ने दिखाया जो किउसकी जीवटता का परिचायक है। साथ ही ओलम्पिक खेलों का हर बाधा को पार करते हुए 124 साल तक जारी रहना इस बात का संदेश देता है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि दुनिया के सारे देश एकता दिखाएं तो फिर से उठ खड़ा हुआ जा सकता है।    
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(सागर दिनकर, 28.07.2021)
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Tuesday, July 27, 2021

पुस्तक समीक्षा | अनगढ़पन के स्वाभाविक सौंदर्य की कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
अनगढ़पन के स्वाभाविक सौंदर्य की कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - उद्गार
कवयित्री    - श्रीमती शशि दीक्षित
प्रकाशक    - जे.टी.एस. पब्लिकेशन, बी-508, गली नं.17, विजय पार्क, दिल्ली-53
मूल्य       - 350/-
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समीक्ष्य पुस्तक ‘‘उद्गार’’ नवोदित कवयित्री श्रीमती शशि दीक्षित का पहला काव्य संग्रह है। ‘उद्गार’ शब्द से ही प्रकट होता है कि इस संग्रह की कविताएं मन से निकली हुई भावनाओं की मधुर अभिव्यक्ति होगी। जिस प्रकार भूमिगत जलश्रोत किसी उद्गम से फूट पड़ने पर बाहर आते हैं और नदियों के रूप में प्रवाहित होने लगते हैं। ये नदियां अपने आरम्भिक रूप में संकरी, सीमित जलयुक्त और अनिश्चित आकार-फैलाव में होती हैं किन्तु ये जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, वैसे-वैसे इनका रूप और स्वरूप निखरता जाता है। ये नदियां लम्बाई-चैड़ाई में निरंतर विस्तार पाती जाती हैं और कहीं-कहीं तो अथाह पा लेती हैं। दो तटों के बीच बहती नदी की भांति काव्य का भी अस्तित्व होता है। मन के भीतर उमड़ते-घुमड़े भाव जब लेखनी के माध्यम से बाहर आते हैं तो आरम्भ में उनमें विस्तार और गहराई उतनी नहीं होती है जितनी कि निरंतर सृजन के बाद वह विस्तार और गहराई पाती है। मन और मस्तिष्क - इन दो तटों के बीच बहती हुई कविता अपने आरम्भिक स्तर पर परिष्कार की स्वतः मांग करती है लेकिन इन कविताओं में एक अनघढ़पन, एक सोंधापन होता है जो चित्ताकर्षक होता है। यह प्रभावित करता है और काव्य के सिद्धांतों से परे जा कर संवाद स्थापित करता है।
श्रीमती शशि दीक्षित एक गृहणी हैं। उन्होंने अपने अब तक का अधिकांश जीवन परिवार-प्रबंधन में व्यतीत किया। किन्तु उनके मन में काव्यात्मकता के तत्व मौजूद थे जो उन्हें कुछ न कुछ लिखने की प्रेरणा देते रहते थे। लिहाज़ा, कवयित्री शशि दीक्षित ने कलम उठाई और अपनी डायरी के पन्नों पर काव्य के रूप में पनी भावनाओं को सहेजती गईं। यही कविताएं अब ‘‘उद्गार’’ काव्य संग्रह के रूप में प्रकाशित हो कर पाठकों के हाथों में पहुंचा है। संग्रहीत कविताओं में विचारों-भावनाओं की लहरें हिलोरे मारती दिखाई देती हैं। कहा जाता है कि कोई भी काम आरम्भ करने के पूर्व ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। ‘‘उद्गार’’ का आरम्भ सरस्वती वंदना से किया है। इसके उपरांत सहज काव्ययात्रा आरम्भ होती है जो ‘समय परिंदा’ शीर्षक कविता के द्वारा समय का आकलन के रूप में सामने आती है-
समय परिंदा उड़ता जाता
हम सब पीछे-पीछे हैं।
जीवन का शैशव धरा अंक में
यौवन चंचल जल-सा है
उम्र ढली तो पाया मैंने 
हुनर सलीका जीने का
समय परिंदा उड़ता जाता
हम सब पीछे-पीछे हैं।

ईश्वर और समय के बाद उस भूमि, उस देश के प्रति अपनी भावनाओं का उद्घोष स्वाभाविक है। 
मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
यह श्लोक वाल्मीकि रामायण में है, जिसमें भारद्वाज मुनि श्रीराम को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि  ‘‘मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। किन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।’’ यदि मातृभूमि दासत्व की श्रृंखला से बंधी रही हो तो उसके द्वारा श्रृंखलाएं तोड़ कर मुक्त होना सबसे सुखद पक्ष होती है। कविता ‘‘भारत मां’’ की यह पंक्तियां देखिए-
भारत मां जब मुक्त हुई थीं
दो सौ वर्षों के बंधन से 
तीन रंग से हुआ था स्वागत
धानी, धवल और केसरिया।
धानी आंचल धरती का था
ममता का आंचल फैलाए
केसरिया सूरज का रंग था
मुखड़े की आभा बन आए।

शशि दीक्षित के सृजन में तरलता और सरलता दृष्टिगोचर होती है। देश में व्याप्त अव्यवस्थाएं कवयित्री के मन को प्रभावित करती हैं और वह इसकी पड़ताल में लग जाती हैं। पड़ताल के बाद अव्यवस्था का एक कारण असहिष्णुता के रूप में सामने आता है। ‘‘असहिष्णुता’’ शीर्षक से कविता लि1खती हुई कवयित्री देश के भीतर उत्पन्न वातावरण को लक्षित करती हैं-
धरती प्यासी, अम्बर सूखा
हैरान परेशान फिरते हम सब
आओ हम तुम मिल कर सोचें
क्या बिगड़ा है? देश के अंदर,
कुछ अपने, कुछ बहुत पराए
फैलाएं हैं बाहें अपनी
जकड़ रहे सारी खुशियों को
रौंद रहे ताज़ा फूलों को
फिर भी ख़ुशबू नहीं हाथ में
लहू भरे हाथों से देखो
तिलक लगाते मां लक्ष्मी को।

पिता पर दो कविताएं हैं जिनमें पिता की महत्ता को शब्दांकित किया गया है। कवयित्री रक्तसंबंधों के साथ ही दिल के रिश्तों की भी बात करती दिखाई देती हैं। उनकी दृष्टि में दिल के रिश्ते अटूट होते हैं तथा समय या परिस्थिति भी उन्हें तोड़ नहीं पाती है। ‘‘दिल के रिश्ते’’ कविता की यह पंक्तियां ध्यानाकर्षित करती हैं कि -
हम सब मिलते खुश होते हैं
कोई तो बात निराली है
रंग लहू का गाढ़ा होता
दिल का रिश्ता भी गाढ़ा है
सावन के मौसम जैसा है
हम सब का मन पावन है
दूरी अपना क्या छीनेगी
दिल से जब हम दूर नहीं
इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता है ‘‘अपनी ख़ातिर’’। यह एक गृहणी के सच्चे उद्गार हैं जो अपने विशेष दायित्वों से लगभग निवृत्त हो कर स्वयं के बारे में चिंतन करती है। उसे लगता है कि घर-परिवार अर्थात् दूसरों के लिए जीते हुए जीवन का अधिकांश समय व्यतीत कर दिया। अब बचा हुआ समय स्वयं के लिए होना चाहिए। यही भारतीय परिवेश में एक गृहणी के जीवन का सच है कि वह अपना पूरा जीवन अपने परिवार के लिए समर्पित कर देती है और स्वयं की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को भुलाती चली जाती है। जबकि जीवन की दूसरी पारी में यानी अपने मूल दायित्वों को पूर्ण करने के बाद वह अपने सपनों को साकार करने की दिशा में प्रयत्न कर सकती है। यह स्वार्थ नहीं अपितु स्वचेतना का विस्तार है जो स्वयं पर ध्यान देने का आग्रह करता है। 
सबकी ख़ातिर जिया है अब तक
कुछ अपनी ख़ातिर भी जी लो।
व्यर्थ गंवाया सारा जीवन 
अब आंचल खुशियों से भर लो
समय गति बड़ी तेज है प्यारे 
जल्दी-जल्दी सब कुछ कर लो
सबकी ख़ातिर जिया है अब तक
कुछ अपनी ख़ातिर भी जी लो।

इस संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता है ‘‘नन्हीं चिड़िया’’। यह चिड़िया के बहाने उन स्त्रियों को लक्षित करके लिखी गई कविता है जो अपनी उच्चाकांक्षाओं के चलते छोटी-छोटी सफलताओं के भ्रम में पड़ कर आकाश में इतनी ऊंची उड़ान भरती चली जाती हैं कि उनसे उनकी ज्त्रमीन और उनकी जड़ें बहुत पीछे छूट जाती हैं। इस कविता में ऐसी ही ऊंची उड़ान भरने वाली एक नन्हीं चिड़िया को सचेत करते हुए चिड़वा कहता है कि इतनी ऊंची उड़ान भी मत भरो कि जब तुम नीचे गिरो तो मैं तुम्हें सम्हाल भी न सकूं। बड़ी सहज औा सुंदर कविता है यह। इसकी कुछ पंक्तियां देखें-
सुनो सखी मैं एक कहानी
तुमको आज सुनाती हूं
व्यथा नहीं यह कथा समझना
जो भी आज सुनाती हूं
बहुत समय की बात नहीं
यह घटना ताज़ी-ताज़ी है
एक नन्हीं सी चिड़िया थी
और बहुत ही प्यारी लगती थी
बहुत ही कोमल पंख थे उसके
फिर भी उड़ना मांगती थी

जीवन साथी, प्रेम, पर्यावरण और कोरोना जैसे विषयों पर भी कविताएं इस संग्रह में है। पुस्तक के आरम्भिक पृष्ठों पर कवयित्री द्वारा लिखी गई संग्रह की भूमिका, श्रीमती सुनीला चैरसिया द्वारा दी गई शुभकामनाएं तथा विदुषी कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता द्वारा संग्र की कविताओं की गई समीक्षा दी गई है। श्रीमती शशि दीक्षित का यह प्रथम काव्य संग्रह भावनाओं और विचारों का एक सुंदर सम्मिश्रण है तथा संग्रह की कविताएं अपने अनघगढ़पन का स्वाभाविक, प्रकृतिक सौंदर्य लिए हुए हैं। इन्हें पढ़ कर लगता है कि ये कविताएं सप्रयास नहीं लिखी गई वरन् स्वतः उघोषित हुई हैं। निःसंदेह इस संग्रह में पठनीयता के तत्व मौजूद हैं।    
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण 

Friday, July 23, 2021

बुंदेली व्यंग्य | जै हो पेगासस भैया की | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


ब्लॉग साथियों, आज 23.07.2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "जै हो पेगासस भैया की " प्रकाशित हुआ है... आप भी पढ़ें...आंनद लें....
#Thank you #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य    
  जै हो पेगासस भैया की
              - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
नोने भैया मूंड़ औंधाए भये बैठे हते अपने दुआरे पे। भौजी ने कही हती के जा के भटा-मटा ले आओ, सो तुमाये लाने भर्त बना देवें।
‘‘हऔ, लाए देत हैं। पैले अच्छी-सी चाय-माय तो पिला देओ। जब देखों बस काम ई की कैत रैत हो। कछु तो सरम कर लौ करे।’’ नोने भैया ने भौजी से कही।
‘‘जे देखो, कछु करत न धरत के औ बोल ऐसे रै के मनो घर-बाहरै को सबई काम जे ई तो करत होंए। हुंह! चाय पी के भटा ले अइयो, ने तो आज सब्जी न मिलहे खाबे खों।’’ भौजी ने सोई ठोंक के सुना दई।
‘‘हऔ तो, चलो चाय तो देओ, मंत्री हरन की घोषणा घंई बोल के न रै जाओ।’’ नोने भैया ने कहीं और ताज़ो अख़बार ले के बैठ गए। पैलई ख़बर पढ़ के उनको मत्था घूम गओ। ख़बर हती पेगासस फोन हैकिंग की।
जो का, जे पेगासस लिस्ट में सोई सबरे बड़े-बड़े नाम दए हैं। ग़रीब की तो कोई पूछ-परख करत ई नईयां। ग़रीबन के इते ने तो कभऊं कोई छापा-वापा पड़त आए, ने तो कोनऊ मंत्री-मिनिस्टर आउत है औ अब जे देखो, पेगासस से भी बड़े लोगन की जासूसी कराई जा रई। अरे, कभऊं कोनऊ गरीबन की बातें सुन लओ करे। छोटो-मोटो सस्तो सो एंडरायड फोन तो गरीबन के एऐंडर सोई पाओ जात आए। मनो उनको तो कोनऊं स्टेटस ई नइयां। नोने भैया चाय सुड़कत भए सोसत रये। चाय ख़तम भई सो कप-बसी उतई छोड़ के बाहरे दुआरे पे पसर गए।
दरअसल, नोने भैया ने भौजी को ‘हऔ’ तो कै दई बाकी बे भटा-मटा लेबे कहूं गए नईं। अखबार पढ़ के उनको मन उदास हो गओ। मोए का पतो रहो के नोने भैया उदासे डरे हैं। नोने भैया के दुआरे से निकलत भए मैंने उनसे राम-राम कर लई। बे तो मनो कोनऊं से बतकाव करन चाह रए हते।
‘‘काए भैया सब ठीक आए।’’ मैंने नोने भैया से का पूछी, मनो भिड़ के छत्ते में अपनों हाथ दे दओ।
‘‘बिन्ना हमाए इते छापो पड़वा देओ।’’ नोने भैया मोए चौंकात भए बोले।
‘‘का? का कै रए?’’ मोए कछु समझ में न आओ।
‘‘अरे बिन्ना, ई दुनिया में हमाई तो कोनऊं पूछ-परख है नईं। मनो हमाए इते बी छापो-वापो पड़ जातो तो बिरादरी में तनक इज्जत बढ़ जाती।’’ नोने भैया बोले।
‘‘जो का कै रए, भैया? सुभ-सुभ बोलो!’’
‘‘अरे बिन्ना, हम सुभ-सुभ ई बोल रए। तुम देखत नईयां का, के जोने के इते छापो पड़ जात है, उनकी इज्जत बढ़ जात है। सबई समझ जात आएं के जे खतो-पीतो पिरानी आए। एक हम आएं ठट्ठ, कोनऊं पूछ-बकत नईं।’’ नोने भैया कलपत भए बोले।
‘‘जो का उल्टो-सूधो बक रए हो भैया! ऐसो कहूं नईं होत।’’ मैंने विरोध करी।
‘‘चलो, छापो-वापो को छोड़ो, हमाई आज की पीड़ा सुनो।’’ नोने भैया ने कही।
‘‘हऔ, बोलो!’’
‘‘बोलने का आए, जे देखो हमाए पास सोई एंडरायड मोबाईल फोन आए, पर हमाई बात कोई ने न सुनी।’’ नोने भैया ने दूसरो सुर पकड़ लओ।
‘‘एंडरायड फोन से का होत है, तुम सोई कभऊं कोनऊं खों फोव-वोन कर लओ करे। तुम ने लगेओ सो, दूसरो ई कहां तक तुमाए लाने घंटी मारत रैहे?’’ मैंने नोने भैया को समझाई।
‘‘अरे, हम तो दो-तीन दिना से खटोले कक्का से रोजई बतकाव कर रै आएं पर जे देखो नासपिटे पेगासस की, हमाई ने तो कोनऊं न बात सुनी, ने तो फोन हैक करो और तो और हमाओ डाटा तक ने चुराओ, नासपिटे ने।’’ नोने भैया मों लटकात भए बोले।
‘‘उदास न हो भैया! बड़े-बड़े लोगन को फोन हैक करो जात है। हमाए-तुमाए फोन में का रखो? अपन ओरन के पास बेई घिसी-पिटी बातें रैत आएं कि आज डीजल मैंहगो हो गओ तो कल पेट्रोल के दाम बढ़ गए। आज टमाटर पचास रुपए किलो बिको तो गिल्की साठ रुपए किलो। हमाई इन बातन से कोनऊं को कोऊ मतलब नईयां।’’ मैंने नोने भैया को समझाई।
‘‘बात तो सही कै रईं बिन्ना, बाकी मैंहगाई के बारे में कोऊ काए नहीं बात करत है। अपन ओरन के कष्टन की कोनऊं को फिकर नईयां।’’ नोने भैया दुखी होत भए बोले।
‘‘मैंहगाई-फहंगाई में कछु नई रखो, पेगासस में तुमें अपना नाम जुड़वाने है तो मंत्री-मिनिस्टर से सांठ-गांठ करो। उनसे ऐसे बतियाओ के मनो कोई भेद की बात कर रए। तुमाओ रसूख जम जाए, तब कहीं काम बनेगा।
‘‘अरे, का बिन्ना! तुमने का हमें बाबाजी को ठुल्लू समझ रखो है? हमने बताई न कि हम दो-तीन दिना से खटोले कक्का से राजनीति पे बहसें कर रैं हैं, पर बात नईं बनी। खटोले कक्का राजनीति से संन्यास ले चुके हैं, बाकी, बे ठैरे मंत्री जी के चच्चा, सो हमने बोल-चाल के लाने उनई को पकड़ रखो है। काए से के मंत्री जी सो हमने बोलहें न।’’ नोने भैया ने अपनी चतुराई बघारी।
‘‘गम्म न करो भैया, कोन जाने अगली लिस्ट में तुमाओ नाम सोई दिखा जाए।’’ मोए उनको झूठी तसल्ली देनी पड़ी।
‘‘नासपिटे जे पेगासस को, इसे जो न बनो के ऊपरे के बजाए तरे से लिस्ट बनाए। जोन को देखो ऊपरई वालन खों देखत आए। नाम ऊपर वारे कमाएं औ मैंहगाई के मोटे-मोटे दाम हम चुकाएं। अभ्भई हमने भी सोच लई कि हमें व्हाट्सएप्प अनवरसिटी में भर्ती हो जाने है, कछु उल्टो-सूधो लिखबो सीख जाएं तो कहो काम बन जाए।’’ नोने भैया ने अपनी परेसानी को खुदई हल निकार लओ।
‘‘भली सोची भैया! सो, अब तुम लग जाओ पोस्ट-मोस्ट में औ हमें जान देओ।’’ मैंने नोने भैया से कही औ चलबे को हुई कि नोने भैया बोल उठे,‘‘देख लइयो, नासपिटे पेगासस की अगली लिस्ट में हमाओ नाम सोई हुइए। औ हम सोई कछु बड़े कहान लगहें।’’
‘‘हऔ भैया, मोरी दुआ तुमाए संगे है।’’ मैंने कही औ वहां से दौड़ लगा दई।
बाकी नोने भैया खों बड़ी आसा है पेगासस से कि उनको फोन कोई हैक कर के उनको रसूख दिला देगा। जै हो सेंधमार पेगासस भैया की!   
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Thursday, July 22, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड तक आ पहुंची पेगासस की आंच | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस            

बुंदेलखंड तक आ पहुंची पेगासस की आंच
- डाॅ शरद सिंह
बुंदेलखंड का क्षेत्र आमतौर पर राजनीतिक दृष्टि से शांत क्षेत्र है। यहां कोई बड़ी राजनीतिक हलचल कभी नहीं हुई। शायद पहली बार बुंदेलखंड किसी राजनीतिक मुद्दे पर दुनिया के नक्शे पर आ गया है। पेगासिस लिस्ट में बुंदेलखंड के एक राजनेता का नाम आना चौंकाने  वाला है। पेगासस यानी हैकिंग की दुनिया का वो ‘‘सफे़द घोड़ा’’ जो डेटा सुरक्षा की हर दीवार लांघ सकता है। सच-झूठ का पता तो बाद में चलेगा लेकिन फ़िलहाल इस मुद्दे ने बुंदेलखंड में एक गर्म लहर दौड़ा दी है।


केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति राज्य मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल का नाम भी पेगासस की नई लिस्ट में पाए जाने से बुंदेलखंड में राजनीतिक गरमागर्मी शुरू हो गई है। प्रहलाद सिंह पटेल मध्य प्रदेश में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। वाजपेयी प्रशासन में एक पूर्व कोयला मंत्री, प्रहलाद सिंह पहली बार 1989 में 9 वीं लोकसभा के लिए चुने गए और फिर 1996 में 11 वीं लोकसभा (दूसरा कार्यकाल), 1999 में 13 वीं लोकसभा (तीसरा कार्यकाल), 16 वीं लोकसभा 2014 में (चैथा कार्यकाल) के लिए चुने गए। वे वर्तमान में मध्य प्रदेश में दमोह लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय संसद के सदस्य के रूप में कार्यरत हैं। वे कटनी जिले में नर्मदाखंड सेवा संस्थान, तहसील बहोरीबंद के संस्थापक हैं। वे नियमित रूप से विभिन्न रक्तदान और नेत्र दान शिविरों का संचालन करते हैं और गरीब बच्चों और व्यक्तित्व विकास पाठ्यक्रमों को शिक्षित करने के लिए विभिन्न वर्गों का संचालन भी करते हैं। लेकिन मानसून सत्र शुरू होने के ठीक एक दिन पहले प्रहलाद सिंह पटेल का नाम पेगासस की लिस्ट में पाया गया। क्या उनकी भी जासूसी की जा रही थी? यदि हां, तो कौन कर रहा था यह?
इजरायली कंपनी एनएसओ के पेगासस सॉफ्टवेयर से भारत में कथित तौर पर 300 से ज्यादा हस्तियों के फोन हैक किए जाने का मामला अब गंभीर हो चला है। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के एक दिन पहले ही इस जासूसी कांड का खुलासा हुआ है। दावा किया जा रहा है कि जिन लोगों के फोन टैप किए गए उनमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर सहित कई पत्रकार भी शामिल हैं। यद्यपि, सरकार ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है और रिपोर्ट जारी होने की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि इजराइल स्थित कंपनी एनएसओ ग्रुप के सैन्य दर्जे के मालवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक असंतुष्टों की जासूसी करने के लिए किया जा रहा है।
पत्रकारिता संबंधी पेरिस स्थित गैर-लाभकारी संस्था फॉरबिडन स्टोरीज एवं मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा हासिल की गई और 16 समाचार संगठनों के साथ साझा की गई 50,000 से अधिक सेलफोन नंबरों की सूची से पत्रकारों ने 50 देशों में 1,000 से अधिक ऐसे व्यक्तियों की पहचान की है, जिन्हें एनएसओ के ग्राहकों ने संभावित निगरानी के लिए कथित तौर पर चुना। वैश्विक मीडिया संघ के सदस्य श्द वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, जिन लोगों को संभावित निगरानी के लिए चुना गया, उनमें 189 पत्रकार, 600 से अधिक नेता एवं सरकारी अधिकारी, कम से कम 65 व्यावसायिक अधिकारी, 85 मानवाधिकार कार्यकर्ता और कई राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं। ये पत्रकार द एसोसिएटेड प्रेस (एपी), रॉयटर, सीएनएन, द वॉल स्ट्रीट जर्नल, ले मोंदे और द फाइनेंशियल टाइम्स जैसे संगठनों के लिए काम करते हैं। एनएसओ ग्रुप के स्पाइवेयर को मुख्य रूप से पश्चिम एशिया और मैक्सिको में लक्षित निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप हैं। सऊदी अरब को एनएसओ के ग्राहकों में से एक बताया जाता है। इसके अलावा सूची में फ्रांस, हंगरी, भारत, अजरबैजान, कजाकिस्तान और पाकिस्तान सहित कई देशों के फोन हैं। इस सूची में मैक्सिको के सर्वाधिक फोन नंबर हैं। इसमें मैक्सिको के 15,000 नंबर हैं।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, भाजपा के मंत्रियों अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर उन लोगों में शामिल हैं, जिनके फोन नंबरों को इजराइली स्पाइवेयर के जरिए हैकिंग के लिए सूचीबद्ध किया गया था। एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संघ ने सोमवार को यह जानकारी दी।  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे तथा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद अभिषेक बनर्जी और भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अप्रैल 2019 में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली उच्चतम न्यायालय की कर्मचारी और उसके रिश्तेदारों से जुड़े 11 फोन नंबर हैकरों के निशाने पर थे। गांधी और केंद्रीय मंत्रियों वैष्णव और प्रहलाद सिंह पटेल के अलावा जिन लोगों के फोन नंबरों को निशाना बनाने के लिये सूचीबद्ध किया गया उनमें चुनाव पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक जगदीप छोकर और शीर्ष वायरोलॉजिस्ट गगनदीप कांग शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार सूची में राजस्थान की मुख्यमंत्री रहते वसुंधरा राजे सिंधिया के निजी सचिव और संजय काचरू का नाम शामिल था, जो 2014 से 2019 के दौरान केन्द्रीय मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी के पहले कार्यकाल के दौरान उनके विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) थे। इस सूची में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अन्य जूनियर नेताओं और विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का फोन नंबर भी शामिल था।
पेगासस संबंधित फोन पर आने-जाने वाले हर कॉल का ब्योरा जुटाने में सक्षम है। यह फोन में मौजूद मीडिया फाइल और दस्तावेजों के अलावा उस पर आने-जाने वाले एसएमएस, ईमेल और सोशल मीडिया मैसेज की भी जानकारी दे सकता है। पेगासस स्पाइवेयर को जासूसी के क्षेत्र में अचूक माना जाता है। तकनीक जानकारों का दावा है कि इससे व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे एप भी सुरक्षित नहीं। क्योंकि यह फोन में मौजूद एंड टू एंड एंक्रिप्टेड चैट को भी पढ़ सकता है। पेगासस एक स्पाइवेयर है, जिसे इसराइली साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ग्रुप टेक्नॉलॉजीज ने बनाया है। इसका दूसरा नाम क्यू-सुईट भी है।
स्पाईवेयर का अर्थ है जासूूसी करने वाला टूल। स्पाई यानी जासूस और वेयर का मतलब टूल। सरल शब्दों कहें तो स्पाईवेयर उस सॉफ्टवेयर को कहते हैं जो डिवाइसेज की हैकिंग के काम आता है। इन्हें जासूसी के काम में लाया जाता  है। पेगासस स्पाईवेयर दुनिया में अब तक किसी प्राइवेट कंपनी का बनाया सबसे ताकतवर स्पाईवेयर माना जा रहा है। एक बार ये किसी फोन डिवाइस में घुस गया तो फोन यूज़र की रह बात जैसे वह किससे बात करता है, कहां जाता है, क्या मैसेज करता है, यहां तक कि चुपके से कैमरा ऑन करके वीडियो भी रिकॉर्ड किया जा सकता है। पेगासस वॉट्सऐप चैट, ईमेल्स, एसएमएस, जीपीएस, फोटो, वीडियोज, माइक्रोफोन, कैमरा, कॉल रिकॉर्डिंग, कैलेंडर, कॉन्टैक्ट बुक, इतना सब एक्सेस कर सकता है।
किसी फोन में सिर्फ मिस कॉल के जरिए इसे इंस्टॉल किया जा सकता है। इसे यूजर की इजाजत और जानकारी के बिना भी फोन में डाला जा सकता है। एक बार फोन में पहुंच जाने के बाद इसे हटाना आसान नहीं होता। ये एक ऐसा प्रोग्राम है, जिसे अगर किसी स्मार्टफोन फोन में डाल दिया जाए, तो कोई हैकर उस स्मार्टफोन के माइक्रोफोन, कैमरा, ऑडियो और टेक्सट मैसेज, ईमेल और लोकेशन तक की जानकारी हासिल कर सकता है। यह एक ऐसी खुफिया तकनीक है जो हर डिवाइस और सॉफ्टवेयर में सेंध लगा सकती है। चाहे एंड्रॉयड फोन हो या आई फोन, इससे कोई नहीं बच सकता है।
पेगासस नाम ग्रीस के देवता के सफेद घोड़े का है, जो अपने पंखों के सहारे किसी को भी धरती से पल भर में सातवें आसमान पर पहुंचा सकता है। अर्थात् पेगासस को कोई बाधा रोक नहीं सकती है। उसकी इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए इसका स्पाईवेयर का नाम पेगासस दिया गया। आज इस साफ्टवेयर ने पूरी दुनिया में तहलका मचा रखा है। बहरहाल, यह तय है कि भारतीय संसद के मानसून सत्र का केन्द्रबिन्दु पेगासस ही रहेगा और बुंदेलखंड को भी इसकी आंच झुलसाती रहेगी।   
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(सागर दिनकर, 22.07.2021)
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