Tuesday, January 25, 2022

"रांगोली में उतारा संदेश कि जहां बेटियां हैं, वहां रंग भी है और उमंग भी" - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

"रांगोली में उतारा संदेश कि जहां बेटियां हैं, वहां रंग भी है और उमंग भी" - डाॅ. शरद सिंह
"बेटियां परिवार के जीवन को खुशियों से रंग देती हैं। जिस घर में बेटियां नहीं होतीं वहां भाई के सूने हाथ रंग-बिरंगी राखी को तरसते हैं। बेटियां परिवार में, समाज में सांस्कृतिक उमंग की सरिता प्रवाहित करती हैं। रांगोली में उतारा संदेश कि जहां बेटियां हैं, वहां रंग भी है और उमंग भी। ... पोट्रेट रांगोली अपने-आप में तेजी से विकसित होती एक स्वतंत्र चित्रकला है। कैनवास पर रंगों से चित्र बनाने से कहीं अधिक कठिन होता है रांगोली द्वारा पोट्रेट बनाना। कैनवास पर चाहे एक्रेलिक हो, तैलरंग हो अथवा जलरंग उसे आपास में डिज़ॉल्व या मेल्ट करना आसान होता है और आसानी से लाईट एण्ड शेड्स की छटा दिखाई जा सकती है किन्तु रांगोली में लाईट और शेड्स तथा रंगों का पारस्परिक प्रभाव उत्पन्न करना चुनौती भरा होता है। एक रंग पर दूसरे रंग का इस प्रयोग सावधानी से प्रयोग पड़ता है जिससे शेड्स उभर कर सामने आएं और आधार रंग को भी प्रभावित न करें।"- ये मेरे विचार थे "उमंग" रांगोली आयोजन में, कल 25.01.2022 को, नवनिर्मित महाकवि पद्माकर ऑडीटोरियम परिसर में।
संस्कृति मंत्रालय के द्वारा मनाया जा रहा आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत राष्ट्रीय बालिका दिवस पर सागर नगर की चित्रकला की प्रतिनिधि संस्था ‘‘रंग के साथी’’ द्वारा रंगोली उत्सव ‘उमंग’ का आयोजन किया गया। इस आयोजन की थीम थी महिला स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ तथा महिला सशक्तिकरण। इस आयोजन में सबसे अधिक जिस विधा ने आकर्षित किया वह थी पेाट्रेट रांगोली।
 आयोजन में बालक-बालिकाओं द्वारा बनाई गई रांगोली इस बात को प्रमाणित कर रही थी कि इन कलाकारों ने इस बारीकी को भली-भांति समझ लिया है। बहुत सुंदर नयनाभिराम पोट्रेट रांगोली देखने को मिली।
मोतीनगर चौराहे पर स्वतंत्रता सेनानी रानी अवंतिबाई की प्रतिमा के निकट महाकवि पद्माकर आऑडीटोरियम के परिसर में विभिन्न स्कूल-काॅलेज की 100 से अधिक बालिकाओं ने रांगोली द्वारा अपनी भावनाओं एवं कला का प्रदर्शन किया। इसमें मुख्य रांगोली ‘‘रंग के साथी’’ ग्रुप की कलाकार लक्ष्मी पटेल, दिव्या नायक, हिमानी चैरसिया, विशाखा नामदेव, साधना रायकवार, आयुषी जैन, मीनाक्षी सिंधई एवं अपराजिता पचैरी सहित 10 कलाकारों द्वारा बनाई गई थी जिसका आकार 15 गुणा 20 फीट था। इसमें रानी अवंतीबाई लोधी को रांगोली द्वारा चित्रित किया गया था। इसे बनाने में 20 किलो रांगोली और छः घंटे का समय लगा। इसके अतिरिक्त किसी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को तो किसी ने बेटियों के उज्ज्वल भविष्य को अपनी रांगोली का विषय बनाया था। रानी अवंती बाई लोधी को इस आयोजन की केन्द्रीय रांगोली बनाए जाना विशेष उद्देश्यपूर्ण रहा क्योंकि रानी अवंतीबाई लोधी वह शक्तिपुंज रही हैं जिन्होंने अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीतियों के समक्ष झुकने से मना कर दिया था। उनके पति रामगढ़ के राजा विक्रमादित्य सिंह के अस्वस्थ होने पर लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अंतर्गत राजा को विक्षिप्त घोषित कर दिया गया और दोनों पुत्रों अमान सिंह और शेर सिंह के अवयस्क होने का बहाना लेकर रामगढ़ को हड़पने की चाल चली। तब रानी ने  अंग्रेजों की इस गलत नीति का विरोध करने का विचार किया और अपनी ओर से क्रांति का संदेश देने के लिए अपने आसपास के सभी राजाओं और प्रमुख जमींदारों को चिट्ठी के साथ कांच की दो काली चूड़ियां भिजवाईं। उस चिट्ठी में लिखा था- ‘‘देश की रक्षा करने के लिए या तो कमर कसो या चूड़ी पहनकर घर में बैठो।’’ शीघ्र ही क्रांति का बिगुल बज उठा और रानी अवंतीबाई ने तलवार खींच ली। यद्यपि इस संघर्ष में उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा लेकिन उन्होंने गलत नीति निडरता से विरोध किया। ऐसी यशस्वी रानी का पोट्रेट रांगोली में बनाने से बालिकाओं में यह संदेश गया कि अन्याय का प्रतिरोध करो और निडर बनो। इस प्रकार की रांगोली सजाने का कार्य बहुत ही सार्थक रहा। इस आयोजन में रांगोली देखने तथा बालिकाओं के पक्ष में समर्थन देने के लिए श्यामलमकला संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र, पाठकमंच सागर इकाई के अध्यक्ष राजकुमार तिवारी, वनमाली सृजनपीठ सागर इकाई की अध्यक्ष डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, महिला काव्य मंच सागर इकाई की अध्यक्ष अंजना चतुर्वेदी तिवारी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष डाॅ. साधना मिश्र आदि नगर की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं के अनेक प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इस अवसर पर ‘‘रंग के साथी’’ ग्रुप सागर के सचिव असरार अहमद ने बताया कि सागर में चित्रकला को ले कर हमेशा बहुत उत्साह रहता है। हम जब भी कोई आयोजन करते हैं तो बड़ी संख्या में प्रतिभागी उसमें शामिल होते हैं। इस बार बेटियों से जुड़े विषय के कारण और अधिक उत्साह देखने को मिल रहा है।’’ इस अवसर पर ग्रुप की अध्यक्ष अंशिता बजाज वर्मा प्रतिभागियों को हर संभव सहयोग दिया तथा रांगोली बनाने के लिए उनका उत्साहवर्द्धन किया। 
🌷 रंग के साथी ग्रुप को हार्दिक बधाई 💐
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पुस्तक समीक्षा | यथार्थ की तस्वीर दिखातीं कविताएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 25.01.2022 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि कैलाश तिवारी ‘विकल’ के काव्य संग्रह "बतरस" की समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
यथार्थ की तस्वीर दिखातीं कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - बतरस
कवि        - कैलाश तिवारी ‘विकल’
प्रकाशक    - अनुकथन प्रकाशन, अजंता प्रेस, बण्डा-बेलई, जिला सागर (म.प्र.)
मूल्य       - 100 रुपए
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ये कविताएं
दुनिया भर की कविताओं से
बहुत अलग हैं 
इन कविताओं में वो जीवन
धड़क रहा है
जिसको पाने
हर अच्छे मानव के मन में
ललक रही है।
- ये पंक्तियां उस काव्यात्मक भूमिका की अंश हैं जिसे प्रतिष्ठित शायर मायूस सागरी ने बतौर पुस्तक-भूमिका लिखी हैं। इस काव्यात्मक भूमिका को पढ़ कर इस बात का अनुमान हो जाता है कि संग्रह की कविताओं में कुछ अलग हट कर बात कही गई है। यह काव्य संग्रह है ‘‘बतरस’’ और कवि हैं कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’। संग्रह में एक और भूमिका है जो साहित्यकार स्व. महेन्द्र फुसकेले द्वारा लिखी गई है। उन्होंने अपनी भूमिका के आरम्भ में ही लिखा है कि -‘‘बतरस का मूल स्वर राजनीतिक है, जो सामाजिक बदलाव चाहती है।’’
बतरस शब्द से ही ध्वनित होता है, जिसमें बातों का रस हो। यह रस किसी भी प्रकार का, किसी भी स्वाद का हो सकता है। मीठे रस की जो मिठास एक सामान्य व्यक्ति को मधुर लगती है, वह मधुमेह के मरीज को विष के समान हानिकारक लगेगी। वहीं जो करेले का रस सभी को कड़वा और अरुचिकर लगता है, वही कड़वा रस मधुमेह के मरीज के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक होने के कारण उसे रुचिकर होता है। इसी तरह यदि कविता में अव्यवस्था के यथार्थ को पिरोया जाए तो पीड़ितवर्ग को वह अपनी आवाज़ के सामन प्रतीत होती है किन्तु वहीं यथार्थ भरी कविता अव्यवस्था फैलाने वालों को अपने विरोधस्वरूप नागवार गुज़रती है। सच कहना ताकतवर की बदसूरती को आईना दिखाने के समान होता है और आईना दिखाने का साहस सब में नहीं होता है। ऐसे ताकतवरों को झूठ बोलने वाले आईने पसंद होते हैं जो हर बार यही कहे कि ‘‘इस दुनिया में आप से सुंदर और कोई नहीं।’’ लेकिन एक सच्चा साहित्यकार कभी चाटुकारिता नहीं करता है और हमेशा यथार्थ के पक्ष में ही खड़ा दिखाई देता है। कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’ के भीतर का कवि भी अपनी कविताओं के माध्यम से यथार्थ का उद्घोष करता है।
‘‘बतरस’’ कविता संग्रह की कविताओं में व्यंजनात्मकता के साथ ही चुनौती भरी हुंकार भी है। इसमें संग्रहीत कुल अड़तीस कविताओं में गांव, शहर, रोज़मर्रा का जीवन, विसंगतियों के प्रति क्षोभ, प्रतिरोध आदि के अनेक रंग मौजूद हैं। जिसके मूल स्वर में सब कुछ सुधारे जाने की ललक ध्वनित है। इसीलिए इन कविताओं में एक तीखापन भी है। इसी संदर्भ मेें ‘‘एक तुम हो’’ शीर्षक कविता देखिए-
मुख्यमंत्री
चुनता है मंत्री
अपने खास-म-खास
जिन्हें चुन कर भेजती है जनता
फिर मंत्री
अपने लिए चुनता है जनता,
उद्योगपति, अफ़सर, सप्लायर
मालदार, ठेकेदार
एन.जी.ओ, मीडियाकर्मी/कलाबाज़,
और टुकड़खोर, मजमेबाज़,
इसी तरह सब चुनते हैं
अपने-अपने लिए जनता
सेवा तो सेवा है
अस न बस करनी है।
वस्तुतः कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’ की कविता, काव्य के साथ समय की आलोचना भी है। जो प्रकारांतर से एक स्पष्ट विचारधारा को सामने लाती है, जिसके तार उनकी सारी कविताओं से जुड़े हैं। यह एक अच्छी बात है कि वे कहीं भी अपनी विचारधारा से विचलित नहीं हुए हैं। उनकी एक कविता है ‘‘अपराधी कौन’’ जो पूंजीवाद के चरित्र को खंगालती दिखाई देती है-
मंदिर-मूर्ति
है बिड़ला की
जितनी चीज़ें बनाती फैक्ट्री
उतने बनते मंदिर-मूर्तियां
भगवान बिड़ला के हैं
या / बिड़ला हैं भगवान
ये तो सब जाने राम
हम तो बस इतना जानते हैं
हम हैं निर-अपराध।
आजीविका के लिए हाट-बाज़ार में दूकानें लगाना, श्रम की मंडी में खड़े हो कर अपने श्रम की बोली लगवाना यह भी एक सच है ग्राम्य जीवन का। गंावों से श्रमिक शहरों में आते हैं जिनमें से कोई गिट्टी फोड़ता है तो कोई माल ढोता है तो कोई मिट्टी खोदने का काम करता है लेकिन उन सबके मन में यही आशा होती है कि वे अपने श्रम से अपने परिवार के भरण-पोषण का जुगाड़ कर लेंगे। ‘‘श्रम विक्रेता’’ कविता के आरंभिक अंश में गंावों के नामों का उल्लेख करते हुए बड़ी सुंदरता से इस तथ्य को कवि ने सामने रखा है -
कोई रीठी, कोई सलैया से
कोई माजरखेड़ा, कोई पटना-बुजुर्ग
या ख़ुर्द से
हर कोई अपनी-अपनी
पोटली में
बांध कर लाया है
मिट्टी की ख़ुश्बू
आशा का दो मुट्ठी चून।
‘‘विकल’’ ने मां पर कविता लिखी है, बिन्ना ख़ाला पर कविता लिखी है, वे ज़र्दा-चूना को भी नहीं भूले हैं। वे जहां ब्राह्माण्ड की बात करते हैं वहीं सड़े आलुओं-सी सड़ी व्यवस्था को जीवन से बाहर फेंक देना चाहते हैं। ‘‘विकल’’ की कविताएं ठहर कर सोचने को विवश करती हैं, अपने भीतर की भीरुता को आंकने का आग्रह करती हैं और आह्वान करती हैं यथार्थ को समझने, परखने और सुधारने का। यक़ीनन, ‘‘बतरस’’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो बाज़ारवाद के प्रभाव में चिंतन की क्षमता खोती जा रही मानसिकता को झकझोरने में सक्षम है। इस संग्रह की कविताओं को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।          
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Sunday, January 23, 2022

Article | We have to decide whether we want pure air or impure | Dr (Ms) Sharad Singh | MP Chronicle


⛳Friends ! Today my article "We have to decide whether we want pure air or impure !" has been published in the Sunday edition of #MP_Chronicle. Please read it. 
🌷Hearty thanks MP Chronicle🙏
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Article
We have to decide whether we want pure air or impure !

- Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

The Corona pandemic has given us many lessons but it is difficult to say how much we learned from them. During the last lockdown, when life came to a standstill, air pollution had also reached its lowest level. This proved that we citizens have the biggest hand in increasing air pollution. So do we need epidemics to reduce air pollution? Time has come for us to decide whether we want pure air or impure air?

Amid the COVID-19 pandemic, a nationwide lockdown was imposed in India initially for three weeks from 24th March to 14th April 2020 and extended up to 3rd May 2020. Due to the forced restrictions, pollution levels in cities across the country drastically slowed down within just a few days. The results demonstrated that during lockdown air quality was significantly improved. The Corona pandemic has given us many lessons but it is difficult to say how much we learned from them. During the last lockdown, when life came to a standstill, air pollution had also reached its lowest level. This proved that we citizens have the biggest hand in increasing air pollution. So do we need epidemics to reduce air pollution?

By the way, contemplating on air pollution is in the same way that first we put doctors out of work and then start worrying about the patient. Yes, the natural elements that control air pollution the most are trees. But we have allowed trees to be cut to increase our concrete empire and today we are hoping that we get pure air. Looking at the open drains and piles of garbage chuckling with dirt, we still hope that we get clean air. This is more than deceiving ourselves and if anything, it is the crime we are committing towards our future generation. In 2015 alone, 3.5 lakh children died of asthma due to vehicular air pollution in India. After the publication of this report, did any awareness emerge about the maintenance of vehicles or pollution control in our country on the basis of air pollution? Simply, a concrete step was taken that vehicles older than 15 years were banned on the road. While the number of vehicles increased by a hundredfold. In India, mainly petrol and diesel are used as fuel in many vehicles. In India, mainly petrol and diesel are used as fuel in many vehicles. The smoke emitted from these vehicles contains toxic gases like carbon-di-oxide, carbon-monoxide, which are fatal to the health of humans and animals. People get respiratory diseases due to the heavy poison that is continuously dissolved in the air. Many of these are incurable. It is common for the eyes to get irritated from the fumes of the vehicles. The smoke of vehicles comes out from the end of the tube of their silencer, whose mouth remains towards the rear of the vehicles. Toxic substances dissolve in the air backwards. This smoke and dirty dust enter the nose of the people and have a fatal effect. The most lethal situation is when the waiting vehicles are standing due to a red light at the intersections, their engine keeps running and the smoke coming out of them becomes so deep that along with burning in the eyes, cough also starts.

We brought a flood of cars to our cities and settlements but we still haven't learned to 'carpool'. Whereas 'carpool' is the method in which employees going in the same office or in the same direction share the same car. One's car is used every day, which reduces fuel consumption and also reduces the number of vehicles on the road. In this method there is no burden on any one person. But like to show off, we believe more in showcasing our opulence by ignoring the dangers of car advancement.

An alternative to conventional fuel-powered vehicles has emerged in the form of electric vehicles. Electric vehicles are now being promoted in our country. The government is also giving concessions on these vehicles. But the biggest obstacle in the rise of electric vehicles is the lack of charging stations. This requires a network of charging stations. Only then can it be expected that the trend of electric vehicles will increase. Along with this, if we want the level of air pollution to remain low, then we have to make changes in our daily habits. Time has come for us to decide whether we want pure air or impure air?
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(23.01.2022)
#ClimateCahnge  #MyClimateDiary
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Saturday, January 22, 2022

ईंट बनाना श्रमसाध्य और जोख़िम भरा काम है।- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रो, पिछले दिनों एक बार फिर ईंटा भट्ठा जाने का अवसर मिला। भट्ठे में रखे जाने से पूर्व सांचे से तैयार की गई कच्ची ईंटों को धूप में सुखाया जाता है। सड़क के किनारे सूखती हुई ईटों की लंबी कतार बहुत ही आकर्षक लगती है। लेकिन यदि बारिश हो जाए तो वे ईटें गल कर मिट्टी बन जाती हैं, जो सूख नहीं पाई होती हैं।  यानी एक बड़ा नुक़सान लेकिन यह नुक़सान तो ईटा भट्ठा वालों को हमेशा सहना ही पड़ता है क्योंकि मौसम के साथ खुले में यह निर्माण कार्य होता है। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
#डॉसुश्रीशरदसिंह #ईंट #ईंटाभट्ठा #Bricksmaking #BricksKiln
Friends, in the last 3-4 years, once again I got an opportunity to visit the brick kiln.  The raw bricks prepared from the mold are dried in the sun before being placed in the kiln.  The long queue of dry bricks on the side of the road looks very attractive.  But if it rains, those bricks melt into clay, which has not dried up.  That is, a big loss, but the people of Eta kiln always have to bear this loss because this construction work is done in the open with the weather.  Brick making is really a labor and patience job.  In this, there is participation of labor of both men and women.  In this way, only brick walls make a house. - Dr. (Ms.) Sharad Singh
Bricks Photos by Dr (Ms) Sharad Singh

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Wednesday, January 19, 2022

चर्चा प्लस | स्त्रियों की आवाज़ वाया कोरोना आपदा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस
स्त्रियों की आवाज़ वाया कोरोना आपदा
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
             
हाल ही में यह तथ्य सामने आया है कि कोविड के टीके से माहवारी में अनियमितता होने लगती है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान यह तथ्य सामने आया था किन्तु घर-परिवार में इसे गंभीरता से नहीं लिया। अकसर देखने में आता है कि स्त्रियों की बातें अमूमन गंभीरता से ली ही नहीं जाती हैं। यदि स्त्री बड़े पद पर है तो भी उसके निर्णय को उसका अधीनस्थ पुरुषवर्ग संदेह की दृष्टि से ही देखता है। स्त्री की सलाह को हल्के से लेना आम बात है। जबकि यह प्रवृत्ति संकट में डाल सकती है।


प्रजनन क्षमता की दृष्टि से स्त्रियों में माहवारी का सबसे अधिक महत्व है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो माहवारी स्त्री की प्रजनन क्षमता को तय करती है। अतः माहवारी चक्र में किसी भी प्रकार का अचानक परिवर्तन होना चिन्ता का विषय होना चाहिए। हर परिवार, हर दंपत्ति अपनी संतति अथवा वंश बढ़ाने के लिए संतान पैदा करना चाहता है। भले ही इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि यदि संतान नहीं हो पा रही है तो उसका कारण सिर्फ़ स्त्री नहीं बल्कि पुरुष में भी कमी के कारण ऐसा हो सकता है। भारत जैसे विकासशील देश में स्त्रियां अभी भी माहवारी जैसे विषय पर अपने परिजन से भी खुल कर बात नहीं कर पाती हैं। लेकिन योरोप में स्थिति थोड़ी भिन्न है। वहां स्त्रियां अपनी शारीरिक समस्याओं को ले कर जागरूक रहती हैं और खुल कर डाॅक्टरी सलाह लेती हैं। उनकी इसी अगुवाई के कारण वह तथ्य सामने आया जो भारतीय स्त्रियों में भी रहा होगा किन्तु वह प्रमुखता से सामने नहीं आ सका, जिससे उसके संबंध में यहां कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन भी नहीं हो सका। 
सोन्या अंगेलिका डीन एक योरोपियन महिला हैं जिन्होंने कोविड के दोनों टीके समय पर लगवाए। लेकिन इसके बाद उन्हें माहवारी की गंभीर अनियमित झेलनी पड़ी। सोन्या अंगेलिका डीन ने जो विशेषज्ञ समिति को जो जानकारी दी, वह उन्हीं के शब्दों में -‘‘मुझे बायोनटेक-फाइजर का पहला टीका गर्मियों में लगा था। वैसे तो कुछ लोगों ने मुझे बताया था कि टीका लगने के बाद वे कितना बीमार महसूस कर रहे थे। लेकिन मुझे तसल्ली थी कि मेरे साइड इफेक्ट हल्के-फुल्के ही थे। एक महीने बाद, मुझे दूसरा टीका लगा और उसके बाद मैं अपने परिवार के साथ छुट्टियों पर निकल गईं। यात्रा की शुरुआत में ही मेरे पीरियड आ जाने चाहिए थे। एक दिन मुझे काफी ज्यादा ब्लीडिंग हुई। अगले दिन एक बूंद भी नहीं। फिर एक सप्ताह से ज्यादा समय तक यानी करीब-करीब पूरी छुट्टियों के दौरान मेरा रक्तस्राव होता रहा। ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हो रही थी और दर्द भी ज्यादा हो रहा था। मेरे लिए ये सामान्य बात नहीं थी।’’
घबरा कर सोन्या अंगेलिका ने पहले गूगल सर्च किया। उससे उन्हें कोई विशेष मदद नहीं मिली। यद्यपि यह जानकारी जरूर मिली कि कुछ अन्य महिलाओं को भी टीका लगवाने के बाद इस तरह की अनियमितताओं का समाना करना पड़ा है। चूंकि इस संबंध में कोई चेतावनी नहीं दी गई थी कि इस प्रकार का साईड इफैक्ट भी हो सकता है अतः महिलाओं का भयभीत होना स्वाभाविक था। इसके बाद महिलाओं की प्रमुखता वाली एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई जिसने अध्ययन कर के पाया कि टीके का माहवारी पर कुछ समय के लिए दुष्प्रभाव पड़ा है। लगभग 4,000 महिलाएं जिनमें से कुछ को टीके लगे थे और कुछ को नहीं, उन सभी के डाटा की मदद से, माहवारी के एक ट्रैकिंग ऐप का इस्तेमाल करते हुए शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन्हें नया-नया टीका लगा था, उनके माहवारीचक्र में सामान्य की अपेक्षा अहम बदलाव आया था। उनके पीरियड औसतन एक दिन अधिक समय तक चले थे। इस जानकारी से जहां टीके में सुधार संभव हो सकेगा वहीं इस बात की घबराहट भी दूर हो जाएगी कि यह दुष्प्रभाव स्त्री की प्रजनन क्षमता पर गहरा असर डाल सकता है।
वैज्ञानिक, शोध अथवा चिकित्सकीय धरातल पर यह महत्वपूर्ण तथ्य इसलिए सामने आ सका क्यों कि पीड़ित महिलाओं ने अपनी समस्या पर खुल कर चर्चा की और उनके परिजनों ने भी आगे बढ़ कर उनका साथ दिया। जबकि भारत जैसे देश में माहवारी को ले कर अनेक वर्जनाएं आज भी व्याप्त हैं। महिलाओं को यदि माहवारी संबंधी कोई समस्या हो तो वे खुल कर बात नहीं कर पाती हैं। इस संबंध में उन्हें झिझक होती है। क्योंकि यह उनके मन में एक वर्जित विषय के रूप में बैठा हुआ है। अधिक से अधिक वे इस विषय पर बात करेंगी भी तो ऐसी दूसरी महिला से जो ज्ञान के मामले में उसी के समकक्ष रहती है या फिर और कमतर रहती है। स्थिति गंभीर होने पर ही वे किसी महिला चिकित्सक तक पहुंचती हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि घर का पुरुषवर्ग विशेष रूप से पति भी अपनी पत्नी की गायनिक समस्याओं के प्रति ध्यान नहीं देते हैं और न इस संबंध में उनसे चर्चा करते हैं। यदि पति-पत्नी दोनों के बीच इस संबंध में चर्चा हो भी जाए तो वह परिवार की या किसी परिचित महिला के साथ पत्नी को चिकित्सक के पास जाने की सलाह दे देता है। स्वयं साथ जाने में उसे झिझक महसूस होती है। पढ़े-लिखे तबके में इस संबंध में जागरूकता आती जा रही है लेकिन ग्रामीण अंचलों में बसे परिवारों तथा शहरों में भी घोर परंपरावादी परिवारों में अभी भी पति अपनी पत्नी की गायनिक परेशानियों के बारे में लापरवाही से पेश आते हैं।
समाज और परिवार में आमस्त्रियों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वह विज्ञापन आज भी टीवी के पर्दे पर स्त्री की स्थिति की सच्चाई बयान करता है जिसमें बाॅलीबुड अभिनेता अक्षय कुमार अस्पताल की ओर इशारा कर के बीड़ी फूंकते एक व्यक्ति से पूछता है कि यहां कैसे? और वह व्यक्ति लापरवाही से उत्तर देता है कि तुम्हारी भाभी को वही औरतों वाली बीमारी हो गई है। उसका उत्तर देने का अंदाज़ बताता है कि उसे बीमारी की गंभीरता से कोई सरोकार नहीं है। यह एक कड़वा सच है जिसे सेनेटरीपैड के विज्ञापन में बड़ी गंभीरता से सामने रखा गया। इसी विज्ञापन में आगे अक्षय कुमार उसे झिड़कता है कि सिगरेट में फूंकने के लिए तेरे पास पैसे हैं लेकिन सेनेटरीपैड खरीदने को पैसे नहीं है? यही सच्चाई है समाज के एक बड़े हिस्से की जिसे हम मध्यम वर्गीय, निम्न मध्यम वर्गीय या निम्न वर्गीय के रूप में अपने बीच पाते हैं। वस्तुतः हम स्वयं भी उसी का हिस्सा हैं। हर सेनेटरीपैड मंहगा नहीं होता है। सरकार, एन्जियोज़ और अनेक संस्थाएं ग़रीब तबके की महिलाओं के लिए, लड़कियों के लिए सेनेटरीपैड निःशुल्क अथवा न्यूनतम दाम में उपलब्ध कराती हैं। किन्तु इसकी मांग की जानी भी तो ज़रूरी है। जब स्त्री स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर स्त्री, पुरुष, परिजन कोई भी पहल नहीं करेगा तो इन मुद्दों का हल कैसे निकलेगा? 
किसी भी दवा अथवा टीके का साईड इफैक्ट होना स्वाभाविक है क्योंकि इस दुनिया में हर इंसान पर पर टीकों का कुछ न कुछ अलग असर होता है। वहीं, साईड इफैक्ट का पता चलने पर स्थिति की गंभीरता का आकलन करने में सुविधा होती है। माहवारी अनियमितता के संबंध में यदि विशेषज्ञ आगाह नहीं कर पाए तो वह इसलिए कि उन्हें इस प्रकार कोई सूचना मिली ही नहीं। कुछ महिलाओं के आगे आने और अपनी समस्या बताने पर आज दुनिया को इस साईड इफैक्ट का पता चल पाया है। जबकि हमें आज भी पता नहीं है कि हमारे देश में कोविड-19 के टीके लगवाने के बाद कितनी महिलाओं को माहवारीचक्र में समस्या का सामना करना पड़ा? अगर यह आंकड़े हमारे देश में सामने आते तो हमारे वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ भी इस दिशा में अध्ययन करते और निदान ढूंढते। यह तो मात्र एक ताज़ा उदाहरण है अन्यथा ऐसी न जाने कितनी समस्याएं हैं जो स्त्रियों के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं, जिन पर खुल कर चर्चा करने से स्वयं स्त्रियां, कतराती हैं, डरती हैं अथवा संकोच करती हैं। वस्तुतः समर्थन की कमी उनके मनोबल को तोड़ती है। यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उन्हें अपनी समस्याओं को बताने से रोकता है कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा और उनका मज़ाक बनाया जाएगा। इस आपदा के दौर ने यह एक और सबक दे दिया है कि यदि गंभीर दुष्परिणामों से बचना है तो स्त्रियों की समस्याओं को हल्के में लेने अथवा अनदेखा करने की आदत छोड़नी होगी। यानी स्त्रियों को अपनी समस्याएं बताने में मुखर होना होगा और पुरुषवर्ग को उसे गंभीरता से सुनना और समझना होगा। तरह-तरह की आपदाओं के बीच मानवता को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है।  
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Tuesday, January 18, 2022

पुस्तक समीक्षा | स्त्रीजीवन का मनोवैज्ञानिक विमर्श रचती कहानियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 18.01.2022 को दैनिक "आचरण" में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका श्रीमती आराधना खरे के कहानी संग्रह "मंथन" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
स्त्रीजीवन का मनोवैज्ञानिक विमर्श रचती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - मंथन
लेखिका     - आराधना खरे
प्रकाशक    - स्टोरीमिरर इंफोटेक प्रा.लि.,145, पहला माला, पवई प्लाज़ा, हीरानन्दानी गार्डन्स, मुंबई
मूल्य       - 200 रुपए 
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कहानियां हर व्यक्ति के जीवन में उसकी बाल्यावस्था से ही प्रवेश कर जाती हैं। नानी, दादी, मां, पिता एवं अपने परिवार के बड़ों से कहानी सुनने का अवसर हर किसी को मिलता है चाहे उसके परिजन शिक्षित हों या अशिक्षित। कहानी का प्रत्यक्ष संबंध शिक्षित होने से कहीं अधिक अनुभव एवं कल्पनाशीलता से होता है। किन्तु कहानी और शिक्षा का परस्पर बड़ा घनिष्ठ होता है। हर कहानी का उद्देश्य कोई न कोई शिक्षा अथवा जानकारी देना होता है, चाहे वह वीरता का संचार करने वाली राजा-रानी की कहानी ही क्यों न हो। ‘‘पंचतंत्र’’ की कहानियां इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं जो शिक्षा देने के उद्देश्य से ही लिखी गईं। हर कहानीकार कहानी के माध्यम से अपने अनुभवों को वे चाहे निजी हों, परिवार के हो, समाज के हो अथवा देश के हों, साझा करना चाहता है। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि यह आवश्यक नहीं कि कहानी लिखनेे वाला साहित्य का ही विद्यार्थी हो, वह किसी भी विषय का स्काॅलर हो सकता है। बस, शर्त यही है कि उसकी विषय का आकलन करने और उसे कथारूप में अभिव्यक्त करने की कला आती हो। आखिर कहानी को ‘‘कहानी कला’’ यूं ही तो नहीं कहा जाता है। कहानी के मूल तत्व अर्थात् कथानक, पात्र एवं चरित्र, संवाद, भाषा-शैली, वातावरण और उद्देश्य कहानी के स्वरूप को तय करते हैं। इन सभी तत्वों पर जिसकी अच्छी पकड़ हो वह श्रेष्ठ कहानी कह या लिख सकता है। 
इस बार जिस कहानी संग्रह को समीक्षा के लिए सामने रखा गया है उसका नाम है ‘‘मंथन’’। यह लेखिका आराधना खरे का प्रथम कहानी संग्रह है। आराधना खरे रसायनशास्त्र की व्याख्याता रही हैं किन्तु साहित्य के प्रति बचपन से ही इनका रुझान था। आकाशवाणी, पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियां, कविताएं प्रसारित, प्रकाशित होती रहीं। ‘‘मंथन’’ उनकी 34 कहानियों का संग्रह है जिसमें इस नाम की कोई कहानी नहीं है अर्थात् संभवतः अब तक उनके द्वारा लिखी गई कहानियों का मंथन करके उनमें 34 कहानियों को संग्रह के लिए चुना गया और इसीलिए संग्रह का नाम ‘‘मंथन’’ रखा गया। चूंकि संग्रह में लेखिका की ओर कोई प्राक्कथन नहीं है अतः संग्रह का ‘‘मंथन’’ नाम रखे जाने के संबंध में अनुमान ही लगाया जा सकता है। इस संग्रह में एक गहन विचारणीय तथ्य है जिसके बारे में समीक्षा के अंतिम भाग में चर्चा करूंगी। पहले संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात आवश्यक है। 
आराधना खरे की कहानियां परिवार और समाज में स्त्री जीवन को व्याख्यायित करती कहानियां हैं। संग्रह की कहानियों से गुज़रते हुए यह मानना पड़ेगा कि लेखिका को मनोविज्ञान की अच्छी समझ है। उनके पात्रों का मनोविज्ञान कथा के महत्व को बखूबी प्रस्तावित करता है। जैसे संग्रह की पहली कहानी है ‘‘एक बार फिर’’। यह कहानी मनोवैज्ञानिक धरातल पर मानवीय विमर्श रचती है। लेखिका ने कहानी के माध्यम से यह यथार्थ सामने रखा है कि चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, उसकी यही इच्छा होती है कि उसका जीवनसाथी उसके अलावा और किसी को न चाहे। इस समस्या को लेकर कई बार दाम्पत्य संबंधों में दरार पड़ जाती है। जबकि कई बार स्त्री को दोयम होने का दंश सहन करना पड़ता है। ‘‘एक बार फिर’’ की नायिका अपने सांवले, साधारण रंग-रूप के कारण अपने छोटी बहन की तुलना में कमतर ही ठहराई जाती रही। फिर जब इकतीस वर्ष की आयु में उसका विवाह हुआ तो वह भी एक विधुर से। अतः विवाह के बाद उसे अपने पति की दिवंगत पूर्व पत्नी की सुंदरता की तुलनात्मक उपस्थिति का दंश सहने को विवश होना पड़ा। यह उसके अविवाहित जीवन के अनुभव से भी अधिक कष्टप्रद था। फिर भी एक स्त्री अपना दाम्पत्यजीवन को बचाने के लिए कभी आशा की डोर नहीं छोड़ती है। इसी तरह कथा की नायिका को भी आशा है कि संतान सुख उसके इस दुख को दूर कर देगा और उसका पति उसके आंतरिक सौंदर्य को समझ जाएगा। यह कहानी निराशा में आशा की डोर ढूंढ लेने का एक मजबूत आधार सुझाती है। संग्रह की सभी कहानियों की तरह यह भी एक छोटी-सी कहानी है किन्तु इसका कथानक दीर्घ विमर्श रचने में सक्षम है।
‘‘मंत्र’’ कहानी भी एक मनोवैज्ञानिक समस्या का महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती है। पति अंतर्मुखी है और पत्नी  बहिर्मुखी। पति अपनी पत्नी की सुख-सुविधाओं में कोई कमी नहीं रखता है किन्तु पति के मौन स्वभाव के कारण पत्नी को घुटन महसूस होती रहती है जिसका असर उनके बच्चे पर भी पड़ने लगता है। धीरे-धीरे दोनों के बीच अलगाव की स्थिति भी आ जाती है किन्तु एक घटना उनके बीच के अंतर को मिटा देती है। यही घटना दाम्पत्य जीवन के सुख का मंत्र साबित होती है। इस कहानी में लेखिका ने एक सुंदर परिवार-विमर्श रचा है जिसका मूलमंत्र यही है कि यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसे व्यक्त भी करिए जोकि दाम्पत्य जीवन में सबसे आवश्यक है।
एक और कहानी है ‘‘अमृत’’। यह एक संदेशात्मक कहानी है। कहानी में इस तथ्य को केन्द्र में रखा गया है कि वैवाहिक संबंध में संबंधियों के बीच दिखावे से अधिक आत्मीयता को महत्व दिया जाना चाहिए। महत्व इस बात का नहीं होना चाहिए कि विवाह में कितना खर्च किया गया, कितना दिखावा किया गया अपितु महत्व इस बात का होना चाहिए कि विवाह के दौरान कितनी आत्मीयता और अपनत्व का आदान-प्रदान किया गया।  
‘‘निर्णय’’ आत्मकथात्मक कहानी है। गोया कोई अपने जीवन के पन्ने खोल कर सामने रख रहा हो। कहानी की नायिका अपनी सेवानिवृत्ति को ले कर बहुत अधिक उत्साहित थी क्योंकि उसने अपना अब तक का सारा जीवन एक कामकाजी गृहणी के रूप में व्यतीत किया था। अर्थात नौकरी के समय नौकरी और शेष समय सिर्फ़ घर-परिवार की चिंता। सेवानिवृत्ति के समय तक पुत्र-पुत्री अपने-अपने संसार में रच-बस चुके थे अतः वह अब अपने अधूरे रह गए सपनों को पूरा करना चाहती थी। ढेर सारा साहित्य पढ़ना और खूब लिखना। यही चाहती थी वह। किन्तु सेवानिवृत्ति के कुछ समय बाद ही उसे अहसास हो गया कि एक खालीपन उसके भीतर घर करता जा रहा है। सतत् दौड़-धूप में सक्रिय रहने वाली स्त्री एक स्थान पर बैठ कर अधिक समय स्वयं को व्यस्त नहीं रख सकती है। तब उसे स्वयं को व्यस्त रखने का एक और रास्ता अपनाना पड़ा। उसने अपने पति की सलाह पर बस्ती के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया। यह कहानी उन सभी के लिए एक बड़ा संदेश देती है जो सेवानिवृत्ति के बाद रिक्तिता से घिरने लगते हैं और यही रिक्तिता आगे चल कर उनके अवसाद का कारण बनती है, फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। वस्तुतः यह भी एक मनोवैज्ञानिक समस्या है कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन भर दूसरों के लिए ही कुछ किया हो वह स्वयं पर केन्द्रित हो कर अधिक दिन तक संतुष्ट नहीं रह सकता है।
संग्रह की तीन कहानियों की बानगी से ही समझा जा सकता है कि लेखिका आराधना खरे कहानी के तानेबाने में मनोविज्ञान को बखूबी बुन सकती हैं। भाषा पर भी उनका अधिकार अच्छा है तथा शैली रोचकतापूर्ण है। छोटी कहानी में बहुत कुछ कह देने की कला उन्हें आती है। उनकी सभी कहानियां प्रभावी हैं और पठनीय हैं। 
अब बात करूंगी उस विषय की जिसके बारे में मैंने अंत में चर्चा करने की बात की थी। संग्रह के आरम्भ में तीन समीक्षात्मक लेख हैं जिनमें पहला लेख साहित्यकार टीकाराम त्रिपाठी का है। ‘‘भारतीय समाज और स्त्रीविमर्श’’ शीर्षक से यह लेख ‘‘पुस्तक समीक्षा’’ के रूप में दिया गया है जिसमें त्रिपाठी जी ने आराधना खरे के इस संग्रह की कहानियों की गहराई से समीक्षा की है। दूसरा समीक्षा लेख कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’ का है तथा तीसरा समीक्षा लेख डाॅ. मनोज श्रीवास्तव का है। पुस्तक के आरम्भ में ही प्राक्कथन, भूमिका, प्रस्तावना, आमुख अथवा पुरोवचन होने के स्थान पर ‘‘पुस्तक समीक्षा’’ का होना खटकता है। पुस्तक समीक्षा तो वह तत्व है जो पुस्तक और पाठक के बीच सेतु का काम करती है जिसे पुस्तक के प्रथम संस्करण में नहीं अपितु समाचारपत्र, पत्रिका अथवा किसी अन्य माध्यम में होना चाहिए, जहां से पुस्तक के बारे में जानकारी पा कर, जिज्ञासु हो कर पाठक पुस्तक को पढ़ने का इच्छुक हो उठे। संग्रह के आरम्भिक पन्नों में पुस्तक समीक्षा का होना ऐसा प्रतीत होता है मानो मंगलाचरण के स्थान पर उपसंहार प्रस्तुत कर दिया गया हो। बस, यह अच्छी बात है कि संग्रह की कहानियां दमदार हैं इसलिए इस ‘‘नवप्रयोग’’ ने कहानियों के प्रभाव पर विपरीत असर नहीं डाला है। यह लेखिका का प्रथम कहानी संग्रह है अतः भविष्य में उन्हें इस प्रकार के प्रयोगों से बचना होगा। इसमें दो राय है नहीं कि यह कहानी संग्रह पढ़े जाने योग्य है इसीलिए मैंने संग्रह की सभी कहानियों की चर्चा नहीं की है शेष कहानियों के बारे में पाठक स्वयं पढ़ कर जाने तो अधिक रुचिकर रहेगा।             
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Sunday, January 16, 2022

Article | Urban forests are the smart solution : To slowing climate change | Dr (Ms) Sharad Singh | MP Chronicle

⛳Friends ! Today my article "Urban forests are the smart solution : To slowing climate change" has been published in the Sunday edition of #MP_Chronicle. Please read it. 
🌷Hearty thanks MP Chronicle🙏
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MP Chronocle, Dr (Miss) Sharad Singh, 16.01.2022


Article
Urban forests are the smart solution : To slowing climate change


- Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist, Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

Population census always shows the population of humans in the city but what is the number of trees in the city? No one asks about this and no one wants to know. Trees are cut to widen roads, trees are cut to build residential and commercial buildings. In return, how many trees are planted inside the city? Don't know the figure. Whereas one can save from the loss of wildly carbon emissions and rising temperatures, then only trees. That is why the government made the plan of 'Urban Forest'. But where are those urban forests?

Before discussing the need for an 'urban forest', recall the incident in October 2019 when the Aarey Milk Colony in suburban Mumbai, known as the 'Green Lung' of the city, fell victim to urban development. In fact, the Mumbai Metro Rail Corporation cut 3,000 trees in the area to pave the way for the train depot. According to a scientific report, this place is home to 86 species of butterflies, 90 species of spiders, 46 species of reptiles, 34 species of wild flowers and nine leopards. There was public outcry about this. The Supreme Court asked the Maharashtra government to intervene. But by then the Mumbai Metro had cut enough trees to clear the required land. Ironically, the forest department, which has this understanding, has a lower status than the town planning departments of states and cities. Even so, the forest area is shrinking due to the expansion of cities.

What is almost not known to common citizens is that the Government of India is emphasizing on promoting 'smart solutions' based on state-of-the-art technology for the development of cities. It is realizing the need for coordinated efforts of all sections of the society, organizations and government institutions to tackle the challenge of environmental management and climate change. The entire focus of the Central Government is on promoting those schemes which are environment friendly. So that cities can be adapted to the possible consequences of climate change. For this, the government is promoting 'smart solutions' based on state-of-the-art technology.

If seen, urban forest planning is a very effective plan to slow down the pace of climate change and reduce urban pollution. Urban forests can improve the climate of cities. Trees help the most in reducing the temperature in cities. The heat from concrete buildings and streets in cities makes them hotter than the surrounding countryside. They also reduce ozone, sulfur dioxide and particulate matter levels. Apart from this, removing a large amount of carbon dioxide from the atmosphere gives oxygen. Trees work to increase oxygen by absorbing this carbon dioxide. These trees can become an integral part of Yahar's life in the form of urban forest. Urban forests can also compensate for the loss that is being caused by the reduction of forest areas. These types of urban forests are being developed very rapidly in large cities all over the world. Seoul, Singapore and Bangkok have created green corridors that provide space for nature and wildlife while improving the lives of their city residents.

Now if we talk about the cities of Madhya Pradesh, the city is currently away from the intense industrial pollution, but for economic development one cannot always stay away from the industries. This city has lost many of its trees in building construction, widening of roads etc. The cities of Madhya Pradesh also have less number of trees in comparison to population and vehicles. Ever since the Smart City scheme has been implemented, immediate attention has been paid towards waste management. Awareness has also come about pollution caused by vehicles. But this is not enough. The percentage of pollution we are facing globally is not enough. Keeping in view the future development, urban forest planning needs to be implemented rapidly as a smart solution. Trees do not grow enough in a day to be ready to deal with pollution. We cannot cut the level of air pollution and temperature by making some amusement parks or planting flowers on the road dividers. For this, it is necessary to identify the area for urban forest and plant trees which are dense and can help in reducing the amount of air and global warming. It is also necessary to run a public awareness campaign in this direction so that the citizens do not damage the urban forest plan due to ignorance. In fact, urban forests are essential for all types of cities, big or small. It should always be remembered that if there are trees, there is oxygen and if there is oxygen, then there are breaths. Urban forests can also play an important role in maintaining the ecosystem of the city.
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(MP Chronicle, 16.01.2021)
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