Wednesday, November 4, 2026

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड के लोक साहित्य में मौजूद हैं अनेक महाभारत गाथाएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
बुंदेलखंड के लोक साहित्य में मौजूद हैं अनेक महाभारत गाथाएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बुन्देली लोक साहित्य  गद्य और पद्य दोनों विधाओं में धनी है। बुन्देली में सामान्य जन जीवन से जुड़े संदर्भों के काव्य के साथ ही लोक गाथाएं भी सदियों से कहीं-सुनी जा रही हैं। इनमें भारतीय इतिहास के महाकाव्य कहे जाने वाले रामायण एवं महाभारत काल की कथाओं को भी गाथाओं के रूप में गाया जाता है। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ने लगभग 14 वीं सदी में महाभारत कथा और रामायण कथा लिखी। विष्णुदास की महाभारत कथा 1435 ई. माना गया है। यह गाथा शैली में दोहा, सोरठा, चैपाई तथा छंदों से युक्त है। बुंदेली लोकसाहित्य गाथाओं से समृद्ध है जिसमें महाभारत पर आधारित गाथाओं में ओज का अद्भुत संचार है। यद्यपि आधुनिकता के आज के दौर में इन लोक गाथाओं के मूल स्वरूप के लुप्त होने का भय बढ़ चला है।


बुन्देली की प्रसि़द्ध महाभारत काल संदर्भित लोकगाथाएं हैं- बैरायठा, कृष्ण-सुदामा, द्रौपदी चीरहरण तथा मेघासुर दानव आदि। इनके अतिरिक्त राजा जगदेव की लोकगाथा में भी पाण्डवों की चर्चा का समावेश है। महाभारत कालीन चरित्रों से जुड़ी गाथाओं का इस प्रकार बुन्देलखण्ड में रूचिपूर्वक गाया जाना इस बात का द्योतक है कि बुन्देली जन प्रकृति से जितने वीर होते हें तथा मानवीय संबंधों के आकलन को लेकर उतने ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें व्यक्ति के अच्छे अथवा बुरे होने की परख होती है तथा साहसी, वीर, उदार, दानी और सच्चा व्यक्ति अपना आदर्श प्रतीत होता है। इसीलिए जन-जन में गाए जाने वाली बैरायठा लोकगाथा में ‘महाभारत’ महाकाव्य की लगभग सम्पूर्ण कथा को जन-परिवेश में पस्तुत किया गया है। जैसे, धृतराष्ट्र और गंाधारी के विवाह के प्रसंग को इन शब्दों में ्रप्रस्तुत किया गया है-
जब आ गई है चिठिया महाराज रे कै,
जब गंधार में हो रये हैं ब्याव रे कै
जब गंाधारी को हुइये नौने ब्याव रे कै,
जब खबरंे तो मिल गईं महराज रे कै  
जब सज गए गंगंव महराज रे कै,
जब फौजें कटीली सजवांय रे कै
जब गांधार की पकरी उनने गैल रे कै
जब गांधार तो पौंचे जांय रे कै
जब गांधारी के हो रये नौने ब्याव रे कै
जब देखे समर महराज रे कै
इसी गाथा में द्यूतक्रीड़ा तथा चीर-हरण का अत्यंत दृश्यात्मक वर्णन मिलता है-
जब सकुनी ने डारे दाव रे कै,
जब पर गये अठारा दाव रे कै
फिर हारे धरम और राज रे कै
जब बोले जरजोधन महराज रे कै
..........
जब जबरन तो लैजा रव महराज रे कै
जब जूटो तो पकरो ओने आज रे कै
जब रानी खों लै गव अपने साथ रे कै
जब आ गई सभा के नोने बीच रे कै
जब सबरो से करी है गुहार रे कै
इस विवरण में  जिन तथ्यों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है वे ध्यान देने योग्य हैं कि जब व्यक्ति अनुचित कर्म करने लगता है तो ‘धरम’ और ‘राज’ दोनों गंवा बैठता है। इसी प्रकार जब ‘पांच पती’ अर्थात् सगे-संबंधी भी रक्षा नहीं कर पाते हैं उस समय ‘हरि’ अर्थात् ईश्वर सहायता करता है। यह मानव मन की वह अवस्था है जो राजनीतिक अस्थिरता एवं असुरक्षा के दौर में प्रभावी हो उठती है। यही भाव ‘चीरहरण’ लोग गाथा में मिलते हैं। दुश्शासन द्वारा चीरहरण किए जाने पर द्रौपदी पतियों द्वारा निर्धारित नियति को चुपचाप स्वीकार करने के बदले सहायता के लिए कृष्ण को पुकारती है-
हे श्याम मेरी सुध लइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
शकुनी दुर्योधन ने मिल के, कपट के पांसे डारे
जुआ खेल के पति हमारे, राजपाट सब हारे
मोरी बिगड़ी आज बनइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
इसी गाथा में द्रौपदी की पुकार सुन कर श्री कृष्ण के आने का वर्णन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि श्री कृष्ण द्रौपदी की लाज बचाने पहुंचे तो किन्तु किस साधन अथवा किस वाहन से?
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई, कारज बिगड़ो जाई
नौ सौ कोस हस्तिनापुर बसो है, जल्दी देव पहुंचाई
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई।।
नौ गज चलत हवा से आगंे, दस गज की ऊंचाई
तीन लोक को भार जो लावे, और चाल प्रभु कहंा से आई
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई।।
गरुड़ पर सवार हो कर श्री कृष्ण सभा में पहुंचे जहंा द्रौपदी के पांचों पति मूक दर्शक बने बैठे थे -
पांचई पति मौन हो बैठे, अर्जुन भीम सही
हरि से द्रौपति टेर करी
जब नन्दलाल आये सभा में, बढ़ गओ चीर सही
खेंचत चीर दुसासन हारे, चीर पे भीर भरी
बुन्देली लोकगाथाओं में महाभारत के विविध प्रसंगों के साथ ही विविध पात्रों एवं चरित्रों को भी स्थान दिया गया है। ‘कृष्ण सुदामा’ लोकगाथा में कृष्ण और सुदामा की मित्रता का सुन्दर वर्णन है।
दोई पढ़ें इक गुरुकुल में, नन्द नन्दन और सुदामा।
ईंधन की हुई महा तबाही, घर में से मिसरानी आई
जल्दी लकड़ी दो मंगवाई, अधकचरी है दाल
भोजन खों हो गई शामा, नन्द नन्दन और सुदामा।

वर्षों बाद अपनी पत्नी के कहने पर अपने मित्र से मदद मांगने पहुंचे सकुचाए हुए सुदामा की आवभगत मित्र कृष्ण ने की। अपने हाथों से सुदामा के चरण धोए तथा सिंहासन बैठने को दिया। मित्र कृष्ण की सम्पन्नता देखकर सुदामा भेंट में लाए चावल देने का साहस नहीं कर पा रहे थे जिसे कृष्ण ने ताड़ लिया।
कासी दास श्रीकृष्ण कांख से, तुदुल खेंच चबावे
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें
तंदुल खाय मुट्ठी भर कें, मन में बहुत सराहवें
कंचन महल बनाय मित्रा के, संपति अमित भरवें
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें
‘राजा जगदेव’ लोकगाथा में भी पाण्डवों का उल्लेख आया है। यह उललेख प्रश्नों के रूप में है। किसने पृथ्वी को रचा? किसने संसार को रचा? किसने पाण्डवों को बनाया? पाण्डवों को किस उद्देश्य से बनाया गया? इन प्रश्नों का उत्तर भी इन्हीं के साथ दिया गया है कि देवी ने पाण्डवों को बनाया। पृथ्वी से अन्याय और अधर्म का विनाश करने के लिए पाण्डवों की रचना की गई।
कौना रची पिरथवी रे दुनियां संसार, कौना रचे पंडवां उनई के दरबार
बिरमा रची पिरथवी रे दुनियां संसार, माई रचें पंडवां रे अपने दरबार
रैबे खों रची पिरथवी रे दुनियां संसार, रन खों रचे पंडवा रे अपने दरबार ।।
लोक गाथाएं लोक परम्पराओं के साथ चलती हैं। इनमें जन की आस्था, विश्वास और धारणाएं निहित होती हैं। लोग गाथाएं जन के चरित्रा को समझने में मदद करती हैं। कुल मिला कर ये सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं चारित्रिक परम्पराओं का प्रतिबिम्ब होती हैं। 
भारतीय जनमानस को चरित्रों की विविधता से परिपूर्ण ‘महाभारत’ महाकाव्य ‘रामायण’ के बाद सबसे अधिक प्रभावित करता है। बुन्देली जनमानस इससे अलग नहीं है। अन्याय, दासता के विरुद्ध युद्धघोष करने वाले बुन्देलों के लिए महाभारतकालीन प्रसंगों का विशेष महत्व होना स्वाभाविक है। यदि मुग़लों अथवा अंग्रेजों के विरु़द्ध बुन्देलों के संघर्ष का इतिहास पढ़ा जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि बहुसंख्यक शत्राुओं से अल्पसंख्यक बुन्देलों ने सदैव डट कर संघर्ष किया। ठीक उसी तरह जिस प्रकार पाण्डवों ने कौरवों का सामना किया था। अतः इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि ऐसे संघर्षपूर्ण अवसरों पर ये लोग गाथाएं आमजन में साहस का संचार करती रही होंगी। आज भी सुदूर ग्राम                                                   
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(दैनिक, सागर दिनकर में 04.11.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, November 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | मोबाइल कैमरे से लिखे गए काव्यात्मक चित्रों की सुंदर प्रस्तुति है- ‘‘निसर्ग गाथा’’ | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
मोबाइल कैमरे से लिखे गए काव्यात्मक चित्रों की सुंदर प्रस्तुति है- ‘‘निसर्ग गाथा’’ 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक    - निसर्ग गाथा
लेखिका एवं छायाकार - संध्या सर्वटे
प्रकाशक   - अमन प्रकाशन, पन्नालाल साहित्याचार्य मार्ग, जवाहर गंज मार्ग, सागर, म.प्र.-470002
मूल्य     - 500/-
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  ‘‘निसर्ग’’ अर्थात प्रकृति। मानव जीवन प्रकृति का एक तत्व है, अभिन्न अंग है। मनुष्य को सौंदर्य की समझ प्रकृति से ही मिली है। प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य प्रकृति के सौंदर्य को गुफा की भित्तियों एवं शिलाओं पर उकेरता था। वह प्रयास करता था कि जो कुछ उसने देखा है, उसे वह यथावत चित्रित कर सके जिससे अन्य लोग भी प्रकृति के उस सौंदर्य एवं भाव से अवगत हो सकें। फिर भी सब कुछ यथावत चित्रित नहीं हो पाता था। सब कुछ ‘जस का तस’ दिखाने की ललक ने फोटोग्राफी की कला का न केवल आविष्कार किया अपितु उसे निरंतर विकसित किया। आज डिजिटल युग में फोटोग्राफी यथार्थ के और अधिक निकट हो गई है। डिजिटल तकनीक ने तस्वीरों की स्पष्टता को और अधिक बढ़ा दिया है। श्वेत-श्याम चित्रों से ले कर डिजिटल चित्रों तक का सफर अपने आप में अनूठा है। उतना ही अनूठा है उस पुस्तक का प्रकाशित होना जो मोबाइल फोटोग्राफी के सुंदर तस्वीरों के संग्रह के रूप में है, वह भी एक महिला फोटोग्राफर द्वारा अपने मोबाइल से खींची गई तस्वीरों के संग्रह के रूप में। सागर निवासी कवयित्री संध्या सर्वटे की नवीनतम पुस्तक हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसका नाम है ‘‘निसर्ग गाथा’’। यह उनके द्वारा अपने मोबाइल से खींचे गए चित्रों का सुरुचिपूर्ण संग्रह है।
संध्या सर्वटे काव्य सृजन एवं फोटोग्राफी दोनों में निष्णात हैं। यूं तो वे रांगोली, पेंटिंग, बागवानी आदि में भी माहिर है, इसके साथ ही वे प्रकृति के सुंदर दृश्यों को अपने मोबाइल कैमरे से बढ़ी खूबसूरती से क़ैद करती हैं, बिल्कुल किसी कविता की भांति। मृदुल स्वभाव की संध्या सर्वटे़ का प्रकृति-प्रेम स्वाभाविक है क्योंकि जो भी व्यक्ति संवेदनशील है वह प्रकृति के तत्वों से सहज ही अपना तादात्म्य स्थापित कर सकता है और उन तत्वों को स्थायित्व प्रदान करने का सबसे अच्छा माध्यम है फोटोग्राफी।
वस्तुतः फोटोग्राफी प्रकृति के सौंदर्य, उसके रहस्यों और संरक्षण के प्रति जागरूकता का एक सुंदर दस्तावेज होती है। कैमरे का लेंस प्रकृति के उन अनमोल क्षणों को थाम लेता है जो पलभर में बदल जाते हैं। एक अच्छी तस्वीर सिर्फ दृश्य नहीं दिखाती, बल्कि जंगल, नदी और मौसम की अनकही कहानी कहती है। सुंदर तस्वीरें लोगों के हृदय में प्रकृति के प्रति प्रेम और उसके संरक्षण की भावना जगाती हैं। वर्तमान में नेचर फोटोग्राफी का महत्व और अधिक हो गया है क्यों कि शहरों के विस्तार ने प्रकृति की नैसर्गिकता को निरंतर घटाया है। जहां हरे-भरे जंगल हुआ करते थे, वहां आज कांक्रीट की इमारतें हैं, सीमेंट की चैड़ी सड़के हैं, वहां हरियाली कट चुकी है। भविष्य में यही क्रम जारी रहेगा तो तस्वीरें की साक्ष्य बनेंगी कि उन क्षेत्रों में कितनी अधिक हरियाली हुआ करती थी। दूसरा पक्ष यह भी है कि आज भाग-दौड़ भरी शहरी होती जिन्दगी में प्रकृति का आनन्द लेने का समय मानो समाप्त होता जा रहा है। घरों में न आंगन हैं और न आंगन वाले नीम, अमरूद, नींबू के पेड़। ऐसे में छायाकारों द्वारा प्रकृति की उतारी गई तस्वीरें ही प्रकृति की छटाओं से साक्षात्कार कराती हैं। फिर भी यह कहना होगा कि नेचर फोटोग्राफी उतनी आसान नहीं है जितनी प्रतीत होती है। हमारी आंखों के सामने से ढेर सारे दृश्य गुज़रते हैं, उनमें से किस दृश्य का महत्व है, कौन-सा दृश्य कैप्चर किया जाए और किस ऐंगल से, एपर्चर कितना होना चाहिए, लाइट कितनी और कैसी होनी चाहिए आदि तत्वों का महत्व रहता है। एक नेचर फोटोग्राफर असंख्य दृश्यों के बीच से एक दृश्य बड़ी खूबसूरती से सहेज कर रख लेता है।


पुस्तक की भूमिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह अर्थात मैंने लिखी है। शीर्षक है ‘‘कैमरे से लिखे गए काव्यात्मक चित्रों की नयनाभिराम प्रस्तुति है निसर्ग गाथा’’। पुस्तक के संबंध में सागर के वरिष्ठ साहित्यकार टीकाराम त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘‘संध्याजी, के छायाचित्रों में भोर, प्रभात, रविराज का आगमन, दोपहर का नभ, सूर्यास्त शीर्षकों से सर्वाधिक बृहत् प्रकाश स्रोत सूर्य का स्तवन है वस्तुतः यह सूर्य के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव करते हुए कृतज्ञता ज्ञापन है। रंग बिरंगे फूल खिले, बगिया की बहार आदि से गेंदा, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, रातरानी, पारिजात प्रभृति अनेकानेक फूलों के छायाचित्र हैं जो भारत की विविधता में एकता के द्योतक हैं।’’
सामाजिक एवं कलात्मक कार्यों के कलए विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित संध्या सर्वटे वनस्पति-शास्त्र से एम.एस.सी., बी.एल.आय.एस.सी. तथा डिप्लोमा इन बिजनेस मेनेजमेन्ट, डिप्लोमा इन ड्राइंग-पेंटिंग हैं। वे रंचमंच के निर्देशन एवं नाट्य लेखन से भी जुड़ी हुई हैं। उनके पिता स्व. ना. श्री. सर्वटे अपने समय के सागर के प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं में गिने जाते थे तथा माता स्व. मालिनी ताई सर्वटे प्रतिष्ठित समाज सेविका रहीं। आज भी सर्वटे परिवार सागर के समाज में अपनी प्रतिष्ठा यथावत बनाए हुए है। संध्या सर्वटे मानती हैं कि उनकी प्रतिभा के विकास में उनके परिवार का सदा सहयोग रहा है।
अपनी फोटोग्राफी के संबंध में ‘‘मनोगात’’ शीर्षक से अपने विचारों को प्रकट करते हुए संध्या सर्वटे ने लिखा है कि-‘‘शिक्षा के बाद विधिवत ड्राइंग सीखी। रंगोली, चित्रकला की प्रदर्शनी लगाई। टेक्नोलोजी की प्रगति से मोबाइल फोन आया जिसके कारण फोटोग्राफी आसान हुई। मेरे हाथ में मोबाइल फोन आया तो फोटोग्राफी करने लगी। फोटो को पसंद किया जाता था। प्रोत्साहन मिलता गया। मैंने एकल फोटो प्रदर्शनी लगाई। सागर में व सागर के बाहर। फरवरी-मार्च 2026 में देवास में लगाने का अवसर मिला। सभी को फोटो पसंद आये। इस बात का सभी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि मोबाइल से इतने अच्छे फोटो आ सकते हैं? मेरे मन में विचार आया की कुछ फोटो पर एक छोटी-सी पुस्तक निकाली जाए। यह एक प्रयास है। परिणामस्वरुप पुस्तक निकली।’’
संध्या सर्वटे की यह पुस्तक ‘‘निसर्ग गाथा’’ पाठकों को किसी भी सामान्य दृश्य को एक फोटोग्राफर की गहरी नज़र से देखना सिखाती है। जैसे, सुबह, दोपहर, शाम होना प्रतिदिन की प्राकृतिक घटना है किंतु जब इन तीनों समयों का भिन्नता पूर्ण सौंदर्य कैमरे में कैद हो जाता है और तस्वीरों के रूप में सामने आता है तो उस सौंदर्य की छटा प्रकृति की एक अलग ही गाथा व्यक्त करती है। प्रकृति की फोटोग्राफी (नेचर फोटोग्राफी) न केवल एक खूबसूरत कला है और संध्या सर्वटे ़ इस कला में माहिर हैं। यह बात इस पुस्तक में उनके द्वारा खींचे गए छायाचित्रों से स्वतः प्रमाणित होती है।
नेचर फोटोग्राफी पर दुनिया के सबसे प्रसिद्ध वाइल्डलाइफ और नेचर फोटोग्राफर्स में से एक, एन्सेल एडम्स का यह कथन बेहद लोकप्रिय है,‘‘एक बेहतरीन तस्वीर वह होती है जो पूरी तरह से व्यक्त करती है कि कोई व्यक्ति उस चीज के बारे में क्या महसूस करता है जिसे फोटोग्राफ किया जा रहा है, और इस प्रकार, यह जीवन की गहरी समझ को दर्शाती है।’’
एक अन्य नेचर फोटोग्राफर मार्क रिबॉड नेचर फोटोग्राफी के बारे में बहुत सटीक बात कही है कि ‘‘फोटोग्राफी ़वन को तीव्रता से देखने का एक तरीका है, हर सौवें सेकंड में।’’
अपनी इस फोटोग्राफी की पुस्तक ‘‘निसर्ग गाथा’’ की छायाचित्रों को संध्या सर्वटे जी ने विषयवार सात भागों में विभक्त किया है- पहला भाग है ‘भोर’ जिसमें विहंग का कलरव और मंदिर में आरती के सुंदर दृश्य हैं। दूसरा भाग है ‘प्रभात’ (रविराज आगमन) जिसमें प्रभात की सुंदर छटाएं हैं। तीसरे भाग ‘बगिया की बहार’ में रंग-बिरंगे फूलों से सहित सुंदर-सुंदर दृश्य हैं। चतुर्थ भाग ‘मध्यान्ह-नभ’ अपनी एक अलग प्राकृतिक सौंदर्य गाथा सुनता है।
पंचम भाग ‘दर्शनीय स्थल’ में उन प्राकृतिक स्थलों के दृश्य हैं जिन्हें देखकर ही मन प्रफुल्लित हो उठेगा। छठां भाग ‘सूर्यास्त’ का समय घर लौटते परिंदों का समय होता है। सातवां अंतिम भाग दिन के हर पहर को पढ़ता हुआ उसे परिवर्तन कल की ओर बढ़ता है जिसमें संध्या, निशा, चंद्रमा के साथ एक दिवस का पटाक्षेप हो जाता है।
संध्या सर्वटे द्वारा खींचे गए सभी छायाचित्र कैमरे के लेंस से लिखी गई कविताओं के समान भावपूर्ण, रोचक और नयनाभिराम हैं। यूं तो संध्या सर्वटे अपने छायाचित्रों की कई प्रदर्शनियां लगा चुकी हैं बल्कि सच तो ये है कि फोटोग्राफी कैमरे से किसी दृश्य को कैप्चर करना मात्र नहीं होता है।
आमतौर पर यही माना जाता है कि फोटोग्राफी आज कोई बड़ी बात नहीं रह गई, जब से हर हाथ में एंडरॉयड मोबाईल फोन आ गया है, लेकिन सच तो ये है कि फोटोग्राफी कैमरे से किसी दृश्य को कैप्चर करना मात्र नहीं होता है। इसके पीछे एक विशेष दृष्टिकोण होना जरूरी है। जिसे अकसर हम अंग्रेजी शब्द ‘विजन’ के रूप में स्वीकार करते हैं। सागर के फोटोग्राफी के इतिहास में कुछ पुरुष और महिला फोटोग्राफर्स के नाम आते हैं लेकिन पहली महिला फोटोग्राफर के रूप में संध्या सर्वटे के छाया चित्रों की एकल प्रदर्शनी हुई थी जिसने सागर शहर में कला प्रदर्शन का एक नया द्वार खोल दिया था। अब यह पुस्तक उन दर्शकों तक उनके छायाचित्रों को पहुंच सकेंगे जो उनकी प्रदर्शनियों को देखने नहीं पहुंच पाते हैं। यह पुस्तक उन लोगों के लिए भी प्रेरणा स्रोत है जो मोबाइल फोटोग्राफी का शौक तो रखते हैं लेकिन अपने द्वारा खींची गई तस्वीरों को मात्र सोशल मीडिया तक सीमित रखते हैं। जबकि प्रिंट एक स्थाई माध्यम है अतः वे लोग भी अपने चित्रों को पुस्तक के रूप में संग्रहीत कर के स्थायित्व प्रदान कर सकते हैं।                  
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Friday, October 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | ने तो पीबे वारे गम्म खा रए औ ने बेंचबे वारे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की      
     
ने तो पीबे वारे गम्म खा रए औ ने बेंचबे वारे                                
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘पीबे वारों खो पीबे को बहानो चाइए!’’ कैबे, सुनबे में तो बड़ो मजे को लगत आए मनो जब जेई पिए-पिलाए में जहरीली दारू पिब जात आए तो का होत आए जा अपन ओरें सबई देख रए। भौत पैले की नईं, अबई की तनक हेर लेओ। जेई साल की सितंबर मईना में सागर जिला में जहरीली दारू को बड़ो कांड भओ। जीमें 30 से 50 लोगन की मौत भई औ मुतके अबे लौं बीमार चल रए। औ अक्टूबर मईना में देवास में बड़ो कांड हो गओ। उते बी बोई भओ के पिबे वारों को उल्अियां होन लगीं। आंखे धुदंरा गईं। दिखबो बंद हो गओ औ कओ जात आए के 13 मजदूर मर गए। कई आंकड़ों तो बाद में पतो परहे। कओ जा रओ के तीन मईना में जा तीसरो बड़ो कांड आए। बाकी ई टाईप के कांड पैले बी मुतके हो चुके। बिहार में, उत्तरप्रदेश में, कर्नाटक में। हर दइयां जेई लगत आए के अब तो पीबे वारे कछू सबक ले लैंहे, मनो उने तो मरबे की कोनऊं फिकर नइयां। अबई संकारे हमने एक मिस्त्री से बतकाव करी के दारू नईं पियो चाइए। जिनगी इत्ती फालतू की नोईं। सो बा बड़ो दरस बघारत भओ बोलो,‘‘मैंडम, दारू पिए से का नुसकान हुइए?’’
‘‘लीवर खराब हो जात आए औ फेर बी ने सम्हरे सो मरबो पक्को कहानो।’’ हमने ऊसे कई।
‘‘सो, जो नईं पियत का बे मरत नइयां? के उनको कभऊं कोनऊं बीमारी ने होत आए?’’ ऊने उल्टे हमसे पूछ लई।
‘‘सुनो भैया! एक दिनां मरने तो सबई खों आए मनो का जरूरी के दारू पी के समै के पैले मर जाओ जाए?’’ हमने सोई ऊको समझाबे को प्रयास करो।
‘‘समै से पैले को का मतलब? कोन खों पतो के कब जमराज को बुलौव्वा आहे? औ जब पतो नईं तो समै को का मतलब?’’ ऊने अच्छे पढ़े-लिखे घांई तर्क दओ।
‘‘फेर तो तुम अबई जहर पी के देख लेओ। जो समै हो गओ हुइए सो अबई निपट जैहो औ जो समै ने भओ हुइए तो जियत रैहो।’’ हमें सोई गुस्सा सी आ गई। हमे लगो के देखो तो दारू के चक्कर में जा कित्तो बड़ो वारो ज्ञानी बनो जा रओ। अबई कछू लिखबे-पढ़बे की बात हुइए तो तुरतईं भोला घांई कहन लगहे के हम तो पढ़े के - ने लिखे के, हमें कछू नईं पतो।
‘‘तुमए इते दार-चाउंर को लातो आए, तुम की तुमाई घरवारी?’’ महने ऊसे पूछीं।
‘‘हमें को टेम धरो? छै बजे तो छूटत आएं, फेर घरे पौंचत-पौंचत आठ-नौ बज जात आएं।’’ बा बड़ी मासूमियत से बोलो।
‘‘सो, कित्ती दूर रैत आओ। इते से 20-25 किलोमीटर हुइए तुमाओ घर?’’ हमने पूछीं। 
‘‘अरे नईं, हम तो इतई रैत आएं। इते से हमाओ घर कछू नईं तो आधा किलोमीटर से कम हुइए।’’ बा बड़े आराम से बोलो।
‘‘तो भइया, हमें जे बताओ के छै बजे छूट के घरे पौंचे में नौं काए बज जात आएं? अहाता जात हुइओ, दारू पीबे के लाने?’’ हमने पूछी।
‘‘अब ऐसो आए बाई, के दिन भर काम करत-करत थक जात आएं सो, संझा को तनक-मनक ले लेत आएं।’’ बा मुस्कयात भओ बोलो।
‘‘सो, घरे जात के समै अपनी लुगाई के लाने सोई ले जात हुइयो।’’ मैंने बी ऊंसई मुस्या के कई।
‘‘अरे, बे काए पीहें? बे तो पियन ने देने के लाने हमसे लर परत आएं।’’ बा मिस्त्री उचकत भओ बोलो।
‘‘काए ऊको काए ने पियो चाइए? बा बी तो दिन भर घर के कुल्ल काम करत-करत थक जात हुइए। ऊको बी लगत हुए के दो-चार घूंट लगा लओ जाए।’’ हमने ऊसें कई।
‘‘आप सोई कां की कै रईं! ऐसो कऊं होत आए?’’ बा हमाओ मजाक सो उड़ात भओ बोलो।
‘‘हऔ दिन भरे काम करत में तुमई लोग थ्सकत आओ, तुमाई लुगाइयां नईं? भइया, जे सब तुम ओरन को कहानो आए। तुमे पीने सो कोनऊं ने कोनऊं बहाने से पीनेई आए। चाए पीबे के चक्कर में जान चली जाए। औ तुम ओरन खों का, पी-पुआ के निपट बी गए तो तुमाए पाछें को रो रओ, कैसे जी पा रओ, तुमें ईसे का?’’ हमने ऊको करौ बोलो।
‘‘सो पीबे से सबई थोड़े मर रए।’’ बा चुप रैबे वारों में ने हतो।
‘‘ईकी का गारंटी के पीके मरबे वारों में तुम ने रैहो?’’ हमने बी खरी-खरी कई।
‘‘सो, आप का चा रईं के हम दारू पी के मर जाएं?’’ बा तुनकत भओ बोलो।
‘‘ऐसो हमने कबे कई? हम तो जू चात आएं के तुम ओरे दारू ने पियो। बा ने सेअत के लाने अच्छी औ ने परिवार के लाने। तुम अच्छे मिस्त्री आओ। दिन भरे में हजार-खांड़ सो कमाई लेत हुइए। ऊमें से जो तुमने छे-सात सौ दारू में मिटा दए तो बचो का? ऊमें तुमाई लुगाई घर कैसे चलात हुइए बा बोई जानत आए। दारू में सब कछू नास हो जात आए।’’ हमने ऊको समझाई।
‘‘अब हमें काम करन देओ।’’ बा बोलो। काए से ऊको हमाई बतकाव बेमतलब की लग रई हती। पीबे वारों के संगे लाख सर पटक लेओ, मनो बे सुदर जाएं ऐसो हो नईं सकत। जैसे बिड़ी पीबे वारे, गुटखा खाबे वारे ऊके ऊपर के कवर पे छपे नुकसान वारी फोटुओं को हेरत लौं नइयां। उन्ने तो बिड़ी निकारी औ जला के लगे सुट्टा करबे। ऊंसई गुटखा वारे तो बड़ी स्टाईल से गुटखा को पाऊच खोलत आएं औ सूधे मों में डार के पन्नी नाएं-माएं मेंक देत आएं। उने कां परी के पन्नी पे छपी फोटू देखें औ मों को कैंसर कैसो बुरौ होत आएं जा समझें। नईं, उने तो गुटखा चबाने, उने तो दारू पीने। घरवारे पइसा के लाने तरसें, सो तरसें। 
सई कैं तो दारू पीबे वारों खों पियो नई चाइए। रई बेचबे वारों की तो बे तो सरकार से लाइसेंस ले के बैठे रैत आएं। मनो उने सोई इत्तो तो सोचो चाइए के बे गलत ढंग से बनी जहरीली दारू ने बेंचे। अखीर चार पइसा के लाने कोऊ की जान लेबे से का फायदा? औ उनकी जान भर की नईं, मरबे वारे को पूरो परिवार रोड पे आ जात आए। मनो का करो जाए ने तो पीबे वारे गम्म खा रए औ ने बेचबे वारे।      
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के जहरीली दारू के इत्ते बड़े-बड़े कांड होबे के बाद बी पीबे वारों खों कभऊं अकल आहे के ने आहे? संगे जहरीली दारू बनाबे वारों को सोई कभऊं डर लगहे के ने लगहे? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Thursday, October 29, 2026

चर्चा प्लस | मतदाता सूची की शुद्धता का विवाद और लोकतंत्र का भविष्य | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
मतदाता सूची की शुद्धता का विवाद और लोकतंत्र का भविष्य
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) का शुद्ध और त्रुटिहीन होना फर्जी और दोहरे मतदान पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है। यदि मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी, तो एक ही व्यक्ति का नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों या एक ही क्षेत्र में एक से अधिक बार (डुप्लीकेट एंट्रीज) दर्ज हो सकता है। शुद्धीकरण से ऐसे दोहरे नामों को हटाया जाता है जिससे बोगस या फर्जी वोटिंग की संभावना खत्म होती है। वस्तुतः लोकतंत्र की वास्तविकता उसकी संवाद क्षमता, सहमति और कानून के सम्मान में है। विरोध और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब विरोव अराजकता और भीड के दबाव में बदलता है, तब वह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चुनौती बन जाता है। लेकिन मतदाता सूची शुद्धता पर उंगली उठ रही है। आरोप लग रहे हैं। चूक कहां हो रही है? 

मतदाता सूची की शुद्धता से भला किसका और क्यों विरोध हो सकता है? लेकिन विरोध हो रहा है और विरोध करने वालों पास अपने ठोस तर्क हैं। उनका कहना है कि नई सूचियों में कई पुराने योग्य मतदाताओं के नाम गायब है और नए फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े गए हैं। निसंदेह यह प्रशासनिक अक्षमता का मसला है। ऐसा नहीं होना चाहिए। शुद्धता का अर्थ शुद्धता ही होता है। उसका और कोई अर्थ हो ही नहीं सकता। इस ओर सरकार और प्रशासन का ध्यान देना आवश्यक है। अन्यथा मतदाता सूची की शुद्धता का दावा खोखला हो कर रह जाएगा।
 भारतीय लोकतंत्र एक ऐसी संसदीय और प्रतिनिधि लोकतांत्रिक प्रणाली है जहां जनता वोट के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जो देश के सर्वोच्च संविधान के नियमों पर चलता है। दुर्भाग्यवश वर्तमान परिदृश्य में भीड़तंत्र सर उठाने का निरंतर प्रयास कर रहा है। यह लोकतंत्र को दूषित कर नागरिक अधिकारों का हनन करना चाहता है। इसीलिए भारतीय राजनीति में वर्तमान समय में लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ एक प्रमुख विषय और अभियान के रूप में उभरा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस समस्या को गंभीरता से संज्ञान में होते हुए अक्टूबर 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूची की शुद्धता जैसे मुद्दे पर विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों के प्रत्युत्तर में इस एक देशव्यापी अभियान की शुरुआत की है।     
     लोकतंत्र की रक्षा के लिए मतदाता सूची की शुद्धता सबसे प्राथमिक एवं आवश्यक कनम है। उस अभियान के तहत मतगाता सूचियों के पुनरीक्षण (एसआईआर), अवैध घुसपैठ के मुद्दों और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को लेकर जन-जागरूकता बढ़ाई जा रही है। एक सशक्त, पारदर्शी और विश्वसनीय लोकतंत्र की आधारशिला निपक्ष निर्वाचन प्रक्रिया है, और निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता बेहद जरूरी है। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के अनुसार शुद्ध मतदाता सूची ही लोकतंत्र का असली आधार है। इसके लिए चुनाव आयोग समय-समय पर विशेष गठन पुनरीक्षण जैसे अभियान चलाता है।
मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) का शुद्ध और त्रुटिहीन होना फर्जी और दोहरे मतदान पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है। यदि मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी, तो एक ही व्यक्ति का नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों या एक ही क्षेत्र में एक से अधिक बार (डुप्लीकेट एंट्रीज) दर्ज हो सकता है। शुद्धीकरण से ऐसे दोहरे नामों को हटाया जाता है जिससे बोगस या फर्जी वोटिंग की संभावना खत्म होती है।
पात्र नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा स्वस्थ लोकतंत्र में ही हो सकती है। देश के हर उस नागरिक को वोट देने का आकार है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली है। मतदाता सूची की शुद्धता यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी वास्तविक और योग्य मतदाता (एलिजिबल वोटर) अपने इस संवैधानिक अधिकार से वंचित न रह जाए।
अपात्र और मृत व्यक्तियों के नाम हटाना अति आवश्यक है। समय के साथ कई मतदाताओं की मृत्यु हो जाती है या वे उस स्थान को छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। यदि उनके (शिफ्टेड वोटर्स के) नाम सूची में बने रहेंगे, तो उनके नाम पर फर्जी मतदान का खतरा रहता है। शुद्धता प्रक्रिया के तहत ऐसे नामों को नियमानुसार हटा दिया जाता है।
चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनता का विश्वास हमेशा बने रहना चाहिए। जब मतदाता सूची पारदर्शी और त्रुटिहीन होती है, तो राजनीतिक दलों और आम जनता का चुनाव प्रणाली तथा उसके परिणामों पर अटूट विश्वास बना रहता है। इससे चुनाव के बाद गाली के आरोपों और विवादों की संभावना स्वतः समाप्त हो जाती है। संवैधानिक मूल्यों का पालन आवश्यक है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 "वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। मतदाता सूची का शुद्धीकरण इस संवैधानिक भावना को जमीन पर उतारने का एकमात्र माध्यम है, जिससे हर एक वोट का सही मूल्य सुनिश्चित हो सके।
सरल शब्दों में करें तो, गलत मतदाता सूची से गलत जनप्रतिनिधि चुना जा सकता है, जो पूरे लोकतंत्र को कमजोर करता है। इसीलिए मतदाता सूची को पूरी तरह साफ, सटीक और अत्गतन (अपडेट) रखना देश के भविष्य के लिए अनिवार्य है।
गलत मतदाता भीड़ की शक़्ल में लोकतंत्र को हानि पहुंचाते है। इस विषय की गहराई को समझने के लिए सबसे पहले लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बुनियादी अंतर को समझना आवश्यक है।
लोकतंत्र नियमों, संविधान, और कानून के शासन पर आधारित होता है। इसमें हर नागरिक को वोट देने का अधिकार होता है और सरकारें तथा प्रतिनिधि एक तय लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने जाते हैं। वहीं, जब फैसले या दबाव सड़कों की भीड़, उत्तेजना, या बल के जरिए थोपने की कोशिश की जाती है, तो यह व्यवस्था भीड़तंत्र का रूप ले लेती है। इससे संविधान, अदालतें और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं। 
लोकतंत्र में सर्वोपरि संविधान और कानून की स्थापित प्रक्रिया होती है। यहां हर नागरिक, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली वयों न हो, कानून के दायरे में आता है। लोकतंत्र अदालतों, पुलिस, और प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से न्याय सुनिश्चित करता है। इसमें "दोषी साबित होने तक निर्दोष मानने का सिद्धांत लागू होता है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में फैसलों के लिए विचार-विमर्श, बहस, और बहुमत का सहारा लिया जाता है। इसमें अल्पसंख्यकों और विरोधियों के विचारों का भी सम्मान किया जाता है।
भीड़तंत्र  उस स्थिति को कहते हैं जब कानून और व्यवस्था को ताक पर रखकर एक अनियंत्रित भीड़ अपने हिसाब से न्याय करने या फैसले लागू करने लगती है। इतिहास से लेकर आधुनिक काल तक, विश्व में भीड़तंत्र के कई विनाशकारी उदाहरण देखने को मिले हैं।
प्राचीन रोम में भोजन की कमी या राजनीतिक फैसलों के खिलाफ भीड़ अक्सर हिंसक हो जाती थी। 'ब्रेड एंड सर्कस' (रोटी और मनोरंजन) की नीति भीड़ को शांत रखने के लिए ही बनाई गई थी, लेकिन जब यह विफल होती, तो भीड़ महलों को फूंक देती थी।
फ्रांसीसी क्रांति (1789) का 'आतंक का दौर': राजा लुई सोलहवां के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन बाद में पूरी तरह भीड़तंत्र में बदल गया। जेकोबिन शासन के दौरान, अनियंत्रित भीड़ के दबाव में 'गिलोटीन' (सिर काटने की मशीन) से हजारों निर्दोष लोगों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया।
अमेरिका में लिंचिंग का दौर (19वीं-20वीं सदी): अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद, विशेषकर दक्षिणी राज्यों में, गोरे लोगों की हिंसक भीड़ बिना किसी कानूनी मुकदमे के काले अमेरिकियों को पकड़कर सरेआम फांसी पर लटका देती थी।
आधुनिक और समकालीन उदाहरण देखें तो -
यूएस कैपिटल हिल पर हमला (6 जनवरी, 2021): संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को पलटने के इरादे से तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों की एक उग्र भीड़ ने अमेरिकी संसद (कैपिटल बिल्डिंग) पर धावा बोल दिया। यह आधुनिक लोकतंत्र में भीड़तंत्र का एक सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
श्रीलंका का आर्थिक और राजनीतिक संकट (2022): भारी आर्थिक तंगी से गुस्साए लाखों लोगों की भीड़ ने कोलंबो में राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा कर लिया। भीड़ ने कई राजनेताओं के घरों को आग लगा दी और तत्कालीन राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा।
बांग्लादेश राजनीतिक संकट (2024): छात्र आंदोलन के हिंसक रूप लेने के बाद उग्र भीड़ ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के आवास (गणभवन) पर धावा बोल दिया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा। इसके बाद भीड़ द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में तोड़फोड़, लूटपाट और चुनिंदा समुदायों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया।
भीडतंत्र में कानून को ताक पर रखकर, केवल संख्या बल के आधार पर फैसले सड़कों पर किए जाते है। भीड़ न ती साक्ष्य देखती है और न ही किसी को अपनी बात रखने का मौका देती है। वह स्वयं ही जाचकर्ता, न्यायाधीश और जल्लाद की भूमिका में आ जाती है। भीड़तंत्र तार्किकता से नहीं बल्कि भावनाओं और उत्तेजना से संचालित होता है। यहां असहमति के लिए कोई स्थान नहीं होता और हिंसा को ही अंतिम उपाय मान लिया जाता है।
इसीलिए जागरूकता अभियान के आवश्यकता का अनुभव किया गया। यह अभियान अवटूबर 2026 के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर नवंबर 2026 तक के लिए फिलहाल निर्धारित है, जिसके तहत जिला मुख्यालयों पर पदयात्राएं और बौद्धिक संवाद आयोजित किया जाना तय किया गया है।
भीडतंत्र का सबसे अधिक दुष्प्रभाव युवाओं पर पड़ता है। युवाओं से संवाद पर विशेष जोर दिया गया है। युवाओं से संवाद के लिए महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के बीच जाकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और मतदान के महत्व पर चर्चा की जाना तय है।
      वस्तुतः लोकतंत्र की वास्तविकता उसकी संवाद क्षमता, सहमति और कानून के सम्मान में है। विरोध और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब विरोध अराजकता और भीड़ के दबाव में बदलता है, तब वह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चुनौती बन जाता है। "लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ का संदेश यही याद दिलाता है कि देश की व्यवस्था भीड़ से नहीं, अपितु संविधान और कानून से चलनी चाहिए।                                                       -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 29.10.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, October 27, 2026

पुस्तक समीक्षा | जाति प्रथा पर एक पुस्तक जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा      
जाति प्रथा पर एक पुस्तक जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए  
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - जाति प्रथा: राम मनोहर लोहिया 
संपादक    - रघु ठाकुर
प्रकाशक    - आकार बुक्स, 28 ई पाॅकेट-4, मयूर विहार फेज1, दिल्ली-110091
मूल्य       - 250/-
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आज जाति व्यवस्था को ले कर मानो संक्रमण काल चल रहा है। यद्यपि आज जातिगत स्थितियां देश की स्वतंत्रतापूर्व की स्थितियों से भिन्न हैं किन्तु जाति प्रथा का पोषण निरंतर बना हुआ है। देश को स्वतंत्र हुए दशको गुज़र चुके हैं, किन्तु हम जाति प्रथा से मुक्त नहीं हो सके हैं। जबकि यह सभ्यसमाज का सबसे बड़ा कलंक है। एक ऐसा कलंक जो समाज को कभी भी वैचारिक प्रगति नहीं दे सकता है। आज जातिगत जनगणनाएं होती हैं। जातिगत योजनाएं बनाई जाती हैं। यहां तक कि लोकतांत्रिक चुनावों में भी जातिगत आधार पर विजय की रणनीतियां तैयार की जाती हैं। महात्मा गांधी जाति व्यवस्था को धीरे-धीरे समाप्त करना चाहते थे, वहीं डाॅ. राम मनोहर लोहिया जाति प्रथा के कलंक को शीघ्र मिटाना चाहते थे। वे जानते थे कि जब तक समाज विभिन्न जातियों में बंटा रहेगा तब तक देश और समाज सही अर्थ में विकसित नहीं हो सकेगा। 
‘‘जाति प्रथा’’, यह पुस्तक है जिसमें राम मनोहर लोहिया के विचारों को गांधीवादी चिंतक एवं समाज विमर्श के वरिष्ठ लेखक रघु ठाकुर ने संपादित किया है। रघु ठाकुर स्वयं लोहियावादी विचारों के प्रबल समर्थक हैं। उनका जमीनी कार्यों का दीर्घ जीवनानुभव है। उन्होंने सुदूर ग्रामीण अंचलों से ले कर महानगरों तक में व्याप्त जाति प्रथा और उसके दुष्प्रभावों को बहुत करीब से देखा है। न केवल देखा है अपितु उन परिस्थितियों का आकलन तथा विवेचन भी किया है। रघु ठाकुर समतामूलक समाज को स्थापित होते देखना चाहते हैं। समाजविमर्श को ले कर अब तक गद्य एवं पद्य की उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘‘जाति प्रथा’’ पुस्तक में रघु ठाकुर ने डाॅ. राम मनोहर लोहिया के उन विचारों एवं भाषणों को प्रस्तुत किया है जो जाति प्रथा उन्मूलन के संबंध में हैं। यह पुस्तक डाॅ. राम मनोहर लोहिया के विचारों को बारीकी से समझने में मदद करती है। रधु ठाकुर ने पुस्तक के संबंध में आरम्भ में ही लिखा है कि -‘‘डॉ. राम मनोहर लोहिया के 8 लेख व भाषण इस पुस्तक में शामिल हैं। वैसे तो ये लेख व भाषण लगभग 60 वर्ष पुराने हैं, परन्तु मूल विचार के संदर्भ में आज भी जीवन्त और प्रासंगिक हैं। लोहिया ने अपने इन लेखों में न केवल जाति प्रथा का सच उजागर किया है, बल्कि इसके साथ-साथ इस बुराई को कैसे नष्ट किया जाये, यह भी रास्ता बताया है।’’
संपादक रघु ठाकुर ने आगे लिखा है कि -‘‘जाति प्रथा भारत की विदेशी गुलामी का मुख्य कारण रही है। भारत एक विशाल देश था परन्तु चन्द हमलावरों ने इस पर कब्जा किया था, क्योंकि मुल्क जातियों में बंटा हुआ था और जातियों ने समाज के बड़े हिस्से को जाति के नाम पर थोपे गए व्यवसाय में बांध दिया था। अगर भारत में जाति व्यवस्था नहीं होती तो भारत जैसा विशाल देश कभी भी विदेशी हुकूमतों या हमलावरों का गुलाम नहीं बन सकता था। लोहिया ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए, जातिवाद ने भारतीय समाज को जिस जड़ता में बांध दिया था, उसे मुक्त कराकर राष्ट्रीय जीवन में हलचल पैदा करने की पहल की थी। इस जड़ता को तोड़ने व भागीदारी की इच्छा को जगाने के लिए लोहिया ने कई राजनैतिक प्रयोग भी किए थे। जिनमें से एक था ग्वालियर की महारानी के खिलाफ सुक्खो रानी जमादारिन को लोकसभा में खड़ा करना। इस एक घटना ने देश के करोड़ों शोषितों, वंचितों और समाज में दलित अनुसूचित जाति के नाम पर एक निम्न कर्म से बांध दिए गए करोड़ों लोगों के मन में हलचल पैदा की और राष्ट्रीय कार्यों में भागीदारी की भूख पैदा की। ऐसा ही प्रयोग लोहिया ने रायबरेली में भी किया था जहां प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाई स्व. फिरोज गाँधी के खिलाफ स्व. नन्द किशोर जी को खड़ा किया था जो नाई समाज से थे।’’
हमारे भारतीय समाज में यह जाति प्रथा आई कहां से और कब से? यह माना जाता है कि कर्म के आधार पर जातियों का जन्म हुआ किन्तु यदि ऋग्वैदिक काल में देखें तो यह तर्क खोखला प्रतीत होता है। ऋग्वेद में एक ऐसे युवक का उल्लेख है जो अपना परिचय देते हुए बताता है कि -‘‘मेरे पिता एक वैद्य हैं, मेरी मां अनाज पीसती हैं, मैं एक कवि हूं। हम सभी अलग-अलग तरीकों से धन के लिए प्रयास करते हैं।’’ इस परिचय में तो एक ही परिवार के सभी सदस्यों के कर्म अलग-अलग हैं। इसका आशय है कि ऋग्वैदिक काल में कर्म के आधार पर समाज बंटा हुआ नहीं था और न ही इस प्रकार के बंटवारे की कोई अनुवांशिक व्यवस्था थी। यह कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल में इस प्रकार की भावानाओं का उदय होने लगा तथा स्मृतियों के आते तक जाति प्रथा जोंक समाज की देह से चिपक चुकी थी और उसने पारस्परिक समता का रक्त चूसना आरंभ कर दिया था। 
देख जाए तो ऋग्वैदिक काल के विचारों की दोषपूर्ण व्याख्या ने लगभग उसी काल से जाति प्रथा के बीज बो दिए थे। वर्ण-व्यवस्था ऋग्वैदिक काल में थी। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार ब्राह्मण की उत्पत्ति ब्रह्म (भगवान) के मुख से राजन्य (क्षत्रिय) की बाहु से, वैश्य की जांघ से और शूद्र की पैरों से बताई गई है। ऋग्वेदकाल में चार वर्ण अस्तित्व में थे। ऋग्वैदिक काल में कुछ वर्ग तथा व्यवसाय अस्तित्व में थे। किन्तु वे वंशानुगत नही थे। रुचि एवं योग्यता के आधार पर कोई भी पुरोहित, योद्धा अथवा व्यवसायी बन सकता था। ऋग्वेद में विभिन्न वर्गों व व्यवसायों के बीच साथ भोजन ग्रहण करने तथा परस्पर वैवाहिक विभिन्न वर्गों व व्यवसायों के बीच साथ भोजन ग्रहण करने तथा परस्पर वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। वर्ण की गलत व्याख्या के कारण जाति का उद्भव हुआ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि वर्णों को जाति के नाम से जाना जाने लगा। ब्राह्मण को ब्राह्मण जाति, क्षत्रिय को क्षत्रिय जाति, वैश्य को वैश्य जाति तथा शूद्र को शूद्र जाति से जाना जाने लगा। वर्ण के जाति में परिवर्तित होने का मुख्य कारण बना जन्म एवं वंशानुगत व्यवसाय । प्रत्येक जाति का एक परम्परागत (वंशानुगत) निश्चित व्यवसाय होता था जो एक पीढी से दूसरी पीढी को हस्तांतरित होता रहता था। कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति अपना व्यवसाय बदल लेता था जिसकी अनुमति थी। जिस कारण अनेक उपजातियों का उदय हुआ । 
गलतियां इंसान ही करता है और उन्हें सुधारने की क्षमता भी इंसान के पास होती है, बशर्ते वह अपनी क्षमताओं को अमल में लाए और अपनी गलती सुधारने की दृढ़ इच्छाशक्ति रखे। डाॅ. राम मनोहर लोहिया जाति प्रथा रूपी गलती को सुधारना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने सक्रियता से प्रयास किया। सुव्यवस्थित ढंग से संपादन करते हुए पुस्तक के आरम्भ में डाॅ. राम मनोहर लोहिया का संक्षिप्त परिचय दिया गया है जिससे युवा पाठक जो लोहिया के व्यक्तित्व से परिचित नहीं हैं उनके बारे में कुछ बुनियादी बातें जान सकें। जैसे उनका जन्म 23 मार्च 1910 तथा मृत्यु 12 अक्टूबर 1967 को हुई। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में जन्म और प्रारंभिक शिक्षा । बाद में बम्बई के मारवाड़ी उच्च विद्यालय से माध्यमिक शिक्षा। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पाने के पश्चात जर्मनी के होमबोल्ट विश्वविद्यालय, बर्लिन, से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की उपाधि। जर्मनी से लौटने के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी। 1934 में कांग्रेस के अंदर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। कांग्रेस के विदेश विभाग के 1937 से 1939 सचिव रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन मे जयप्रकाश नारायण के साथ भूमिगत रेडियो का संचालन और बाद में लाहौर जेल गए। गोवा मुक्ति आंदोलन, 1946 का नेतृत्व किया। सन 1948 में कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना। बाद में सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी एवं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में कार्य किया। 1963 में लोकसभा के उप-चुनाव विजयी हुए। ‘‘मैनकाइंड’’ एवं ‘‘जन’’ के संपादक के अलावा कई महत्वपूर्ण विचारोत्तेजक रचनाएं लिखीं। 
इस पुस्तक में प्रो. अशोक पंकज का प्राक्कथन, मदन जैन के ‘‘दो शब्द’’ के उपरांत जिन शीर्षकों में कलेवर को बांटा गया है वे हैं-‘‘जाति प्रथा के संबंध में - रघु ठाकुर’’, जिसके उपशीर्षक हैं- 1.जाति प्रथा का नाश क्यों और कैसे? 2. जाति 3. जाति प्रथा और गुलामी 4. छोटी जातियां और लासा 5.सुक्खो रानी और ग्वालियर महारानी 6. विशेष अवसर क्यो? 7. द्रौपदी या सावित्री? 8. अवसर से योग्यता। ये लेख डाॅ. राम मनोहर लोहिया द्वारा विभिन्न स्थानों में दिए गए भाषणों का संपादिक अंश हैं। इन लेखों से लोहिया के सामाजिक उत्थान के विचारों का पता चलता है। बानगी के लिए दो उद्धरण देखिए जिनमें एक है ‘‘जाति’’ शीर्षक भाषण-लेख से। लोहिया ने 17 जुलाई 1959 को हैदराबाद में अपने लम्बे उद्बोधन में कहा था कि -‘‘ सवाल उठता है कि फिर इसको (जाति) खतम कैसे किया जाए? में समझता हूं कि इस पर तो ज्यादा बहस करने की जरूरत नहीं कि इसको खतम किए बिना हिंदुस्तान तरक्की कर नहीं सकता में समझता हूं कि हिंदुस्तान की दुर्गाति का सबसे बड़ा कारण जाति प्रथा है। हिंदुस्तान बार-बार विदेशियों के कब्जे में गया और हमले हम इतने झेल नहीं पाये, इसका भी सबब जाति प्रथा है, पर अकेला नहीं। मैं वह गलती करना नहीं चाहता जो दूसरे लोग कर चुके हैं कि यही सबब बताऊँ। कई सबब हैं, पर उनमें यह शायद सबसे बड़ा है। वैसे दुनिया के सभी मुल्कों पर हमले हुए बहुत से देश परतंत्र हुए हैं। लेकिन जितनी बार हिंदुस्तान परतंत्र हुआ है, उतनी बार और कोई बड़ा सभ्य मुल्क नहीं हुआ। यह बिलकुल तय बात है। इस पर किसी को कोई शक नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह तो इतिहास की बात है। ऐसा क्यों हुआ है? क्यों हम इतनी बार परतंत्र होते गए? यह भी सही है कि जब हमारे पुरखे अच्छे-भले और ताकतवर और फैले हुए दिमाग के थे, तब जाति प्रथा कुछ बोली रहती भी तो बाहरी हमलों का मुकाबला कुछ अच्छी तरह से कर लिया करते थे। कभी-कभी ऐसे जमाने भी आए कि 400-500 वर्ष तक हिंदुस्तान की तरफ किसी बाहरी आदमी ने तिरछी आँखें करके देखने की हिम्मत तक नहीं की थी, लेकिन कम समय तक ज्यादातर हमले आते रहे और जब सिलसिल चलता था तो फिर एक के बाद एक, एक के बाद एक। कहीं यह गलती मत कर बैठना कि मैं कह रहा हूँ कि हिंदू-मुसलमानों के हमलों के नीचे आ गए, यह बात नहीं। बात यह है कि जब पहली दफे मुसलमानों का जो हमला हुआ, मुसलमान नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह तो गलत बात होगी, कहो पठान, या अफगान या तुर्क क्योंकि मुसलमान भी तो एक दफे राजा बनने के बाद फिर दुबारा मुसलमान के हाथ से हारा, तिबारा हारा, चैबारा हारा, दफे हारा।’’
22 जून 1962 में नैनीताल में समाजवादी युवजन सभा शिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए ‘‘द्रौपदी या सावित्री’’ पर चर्चा करते हुए डाॅ. लोहिया ने कहा था कि ‘‘सावित्री के लिए हिंदू नारी और हिंदू नर, दोनों का दिल एकदम से आलोड़ित हो उठता है कि वाह, क्या गजब की औरत थी। औरत भी खुद आलोड़ित हो उठती है। मैंने कई दफा पूछा कि अगर हिंदू किंवदंती में ऐसी पतिव्रता का किस्सा मौजूद है कि यम के हाथों से अपने पति को छुड़ा लाए, तो कोई किस्सा हमको ऐसा भी बताओ, किसी पत्नीव्रत का कि जो अपनी औरत को मर जाने पर यम के हाथों से उसको छुड़ा लाया हो और फिर से उसको जीवित कराया हो। आखिर मजा तो तभी आता है जब ऐसा किस्सा दुतरफा होता है। जाहिर है कि कोई किस्सा ऐसा है नहीं।’’ 
पुस्तक के अंतिम भाग में दो परिशिष्ट हैं जिनमें पुस्तक के संपादक रघु ठाकुर के विचार हैं - 1. ई.डब्ल्यू.एस. के लिए आरक्षण का निर्णय कितना तार्किक? तथा, 2. जातिगत जनगणना।
यह पुस्तक ‘‘जाति प्रथा’’ शीर्षक की होते हुए भी मात्र जाति प्रथा पर ही प्रहार नहीं करती है वरन भारतीय संस्कृति में रचती-बसती गई कुरीतियों पर भी चोट करती है। यह पुस्तक दलितों एवं स्त्रियों सहित सभी मनुष्यों की बात करती है। वस्तुतः जातिप्रथा वह वायरस है जो अनेक सामाजिक बीमारियों की जड़ है। इस पुस्तक को पढ़ा जाना इसलिए भी जरूरी है कि इससे जाति प्रथा के उद्गम, विकास एवं समापन के प्रयासों के बारे में तार्किक जानकारी मिलेगी जो समाज से जाति प्रथा के कलंक को मिटाने के लिए दिशा प्रदान करेगी। महत्वपूर्ण विचार सदा प्रासंगिक होते हैं। लोहिया के महत्वपूर्ण विचारों को संपादित रूप में प्रस्तुत कर के लेखक रघु ठाकुर ने समता मूलक समाज संबंधी विचारों को सहेजने का विशिष्ट कार्य किया है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए।                          
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Saturday, October 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | दिवारी आ रई, पटाखा फोरबे वारे बच्चा हरों को तनक ध्यान राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
दिवारी आ रई, पटाखा फोरबे वारे बच्चा हरों को तनक ध्यान राखियो
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
दिवारी आत-आत घर को महौल बदल जात आए। लिपाई, पुताई, ढिग धराई सबई कछू समै पे निपटाबे की परी रैत आए। इत्तोई नोंई, खुरमा, पपरियां, गूझा, बरफी बनन लगत आए। मनो जोन घरे बनावे वारी अकेली होए सो बा यां तो खाना पकाबे वारी से मदद ले लेत आए। ने तो आजकाल मिठाई की दुकान वारे सोई घर घांई मुतको सामान मिलत आए। बाकी घर के बने की बात औ रैत आए। लेकन लरका-बच्चा को तो खाली खाबे औ पटाखा फोरबे से मतलब रैत आए। उने तो दसेरा से पटाखा पाबे की धुन सवार हो जात आए। फेर दिवारी नजीक आत-आत सो बे औ पगलान लगत आए। औ पगलाए काए नईं अकेरी दिवारी के टेम पे उने पटाखा फोरबे मिलत आएं। सो उने पटाखा जरूर द्वाएं जाएं मनो पटाखा द्वाबे औ चलाबे के टेम पे बच्चा हरों खों ध्यान राखबो जरूरी आए। ईके लाने सबसे अच्छो आए के उनें पटाखा के लाने रुपइया देबे की जांगा खुदई जा के उने पटाखा द्वा दए जाएं। ईसे का हुइए के उनकी उम्मर के हिसाब से उने पटाखा मिलहें। ने तो होत का आए के लोहरे हरन खों लगत आए के हमाए दाऊ तो बम घाल रए, सो हम सोई बम घांले। उने बम घालबे को खतरा को पता कोन रैत आए। 
    बच्चा हरों खों पटाखा द्वाबे के समै जा बी ध्यान राखबे जरूरी आए के बे कऊं चाइनीज वारे ने होंए। ऊंसे तो सरकार ने चाइनीज पटाखों पे रोक लगा रखी आए मानों कोऊ ओई टाईप को बेच रओ होए तो कमा से कम बच्चा हरों को तो ने मिले। काए से चाइनीज पटाखा औ बड़े पटाखा बच्चन के लाने ठीक नईं रैत। औ बच्चा हरों भर को काए, दिल के मरीजन के लाने, सांस की बीमारी वारन के लाने, मां बनबे वारी लुगाइयन के लाने ठीक नईं रैत आए। सो, अच्छो तो जे आए के बच्चा हरों खों खुदई जा के उनके जोग पटाखा द्वाओ औ खुदई की निगरानी में चलवाओ। एक बात  औ के पटाखा खरीदत समै मैंगाई को ध्यान सोई राखियो। कऊं पटाखा के चक्कर में घर को बजट ने बिगरे। ईंसे पटाखा बी चलहे औ सब कछू अच्छो-अच्छो रैहे।
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 Thank You Patrika 🙏
Thank you Reshu Jain 🙏
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Friday, October 23, 2026

बतकाव बिन्ना की | काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की    
      
काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे?                              
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘काए भौजी, लिपाई-पुताई हो गई का?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अभई कां, दिवारी के पैलऊं हुईए!’’ भौजी बोलीं।
‘‘नईं, मैं वो वारी लिपाई-पुताई की नई कै रई, अभईं दशहरा के लाने कछु ने करहो का?’’ मैंने भौजी से साफ-साफ पूछी।
‘‘ने करबी का? आंगन देखो कैसो फूटो सो डरो आए, पर तुमाए भैयाजी खों कछु दिखाए तब न!’’ भौजी खिजियात भईं बोलीं।
‘‘सो, ई बेरा उनके जिम्मे है का जे काम?’’ मैंने पूछी।
‘‘हौ, बे करहें? आड़ी की काड़ी सो टरत नइयां उनसे, लिपाई-पुताई करहें? खूब कही तुमने बिन्ना!’’ भौजी भैयाजी के लाने ताना मारत भई बोलीं।
‘‘सो, फेर काए उनके लाने परखीं बैठीं? कछु मोरे जोग काम हो सो कहो!’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘तुम का कर पैहो? तुमने सो कभऊं गोबर न छुओ हुइए।’’ भौजी हंसत भईं बोलीं।
‘‘जे लो, तुमने सोई खूब कही भौजी! हमने सोई लिपाई-पुताई करी आए। मनो दीवारन की नई, पर आंगन की खूब करी, ढिग सोई धरत्ती। उते पन्ना में हमाओ सरकारी मकान घनो छोटो रओ, पर आंगन खूबई बड़ो हतो। मैं और मोरी दीदी, दोई जनी गोबर बीन लातत्तीं औ पैलऊ लीपत्तीं, फेर ऊके किनार पे ढिग धरत्तीं।’’ मैंने भौजी को बताई।
‘‘अरे, वाह! बाकी अब तो तुमाए ऐंगर आंगन ई नइयां। सो, प्रैक्टिस छूट गई हुइए!’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे तुम भी भौजीं, कहूं लीपनो-पोतनों कोऊं कभऊं भूलत आए? बाकी अब गोबर छीबे में जरूर अच्छो नईं लगत। काए से के अब गोबर कछु औरई तरहा से बतास आए।’’ मैंने भौजी से सांची बात कै दई।
‘‘हौ सो, अब पैलऊं जैसो कहां से बसाहे? पैलऊं गाइयां हरें घास-पात खात्तीं। मनो अब सो उने पन्नी लो खाने परत आए। जेई लाने हम सो डेयरी वाले यादव भैया के हियंा से गोबर मंगा लेत आएं। औ जेई सो सल्ल बिधींे कहानी। हम तीन दिनां से तुमाए भौयाजी के लाने ठेन कर रए के यादव डेयरी से हमाए लाने गोबर लान देओ, मगर तुमाए भौयाजी सुनें तब न!’’ भौजी घूमत-फिरत फेर के भैयाजी पे आ गईं।
तभईं भैयाजी प्रगट भए।
‘‘राम-राम भैयाजी!’’
‘‘राम-राम बिन्ना!’’
‘‘कां हो आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कहूं नईं, इतई लों!’’ भैयाजी बोले।
‘‘इने कहां जाने? गए हुइएं सट्टा लगाबे!’’ भौजी कुड़कुड़ात भई बोलीं।
‘‘सट्टा? आप कब से खेलन लगे?’’ मोए भारी अचरज भओ जे सुन के।
‘‘अरे नईं! हम कां खेलत आएं सट्टा-मट्टा!’’ फेर भौजी से बोले,‘‘तुम औ, बिन्ना से झूठ काए बोल रईं? जे का सोचहे?’’
‘‘हम कां झूठ बोल रए? ऊ दिनां तुम ओरें सट्टा की बात नई कर रए हते का? जो दिनां समाज को अध्यक्ष चुनो जाने रओ। बो तुमाओ करिया छुटकुल कै रओ हतो के हमने सो खड़से पे सट्टा लओ आए, बेई बनहें। औ तुम सोई कै रए हते के दिग्गी राजा के सो कोनऊं चांस नई दिखा रओ। काय कै रए हते के नईं?’’ भौजी ने तमक के पूछी।
‘‘हऔ, कै रए हते! मनो हम सो बतकाव ई कर रए हते, हम कौन सट्टा लगा रए हते? बा तो छुटकुल हरें जुटे हते।’’ भैयाजी सफाई देत भए बोले।
‘‘हऔ, सो तुम सो बड़े दूध के धुले कहाने! का पतो, सट्टा लगाओ होय, औ हार गए सो चिमा रए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे नईं मोरी मैयां, ऐसो नईयां! अध्यक्ष पे सट्टा लगे के मोए जुधिष्ठिर बनने आए का, के राज-पाट सबई कछु हार गए।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘राज-पाट का हार हो? बाकी कभऊं मोए दांव पे लगाबे की सोचीं सो जेई मुंगरिया से तुमाओ मूंड़ कुचर देबी!’’ भौजी पास रखी मुंगरिया ठोंकत भईं बोलीं।
‘‘अरे मालकन! गम्म खाओ! हम कभऊं कछु ऐसो-वैसो ने करबी।’’ भैयाजी अपने दोई हाथ जोड़त भए बोले।
‘‘खैर, जे सब आप ओरें छोड़ो! भैयाजी आप आ कां से रए हो? दो दिनां से दिखाने बी नईं, कहूं बिजी हो का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कहूं नईं! बो दशहरा के लाने रावण बनाओ जाने रओै, सो बोई के लाने तैयारी चलत रई। बे ओरें बोले के पटाखों को इंतेजाम कर दइयो, सो हमने हामी भर दई हती। फेर पटाखन के लाने गए हते।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘भैयाजी, रावण बनाबे में पटाखो लगाबो का जरूरी होत आए?’’ मैैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जरूरी सो कछू नईं, पर अच्छो लगत आए। जब बे फट्ट-फट्ट फूटत आएं, सो ऐसो लगत आए के मनो रावण ई के मूंड फूट रए होएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बाकी रावण को तो रामजी ने मार दओ रओ, सो अब जे मूंड कां से आत रैत आएं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुम औ! ऐसे पूंछ रईं जैसे पैलऊं कभऊं रावण मरत देखो नइयां! बिन्ना, जे तो प्रतीक आए! अब तुम लो सब जानत भईं, अनजान बन रईं।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे, मोरो मतलब जो नइयां, मैं सो जे पूछो चाह रई के हम ओंरे कब तक लो हर बरस रावण मारत रैबी? रावण कभऊं फाईनली मरहे के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे बिन्ना! जब लो ई धरती पे रावण घांईं लोग रैहें, तब लों रावण फाईनली कां मरहे।’’ भैयाजी बोल।
‘‘सो हम जित्ती ताकत रावण को पुतरा बनाबे में लगात आएं उत्ती ताकत समाज से रावण हरों खों मारबे में काए नईं लगात?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब जे सब छोड़ो!’’ भैयाजी टरकान लगे।
‘‘अरे काए छोड़ो? बिन्ना सांची सो कै रई के जित्तो टेम तुमने पटाखे ढूंढबे में हरजा कर दए, उत्ते टेम सो तुम कभऊं एक जागां टिकतई नइयां! ऊ दिनां दमोए वारी चाची खों हस्पताल में भरती कर करा के, दवा-दारू रख के ऐसे उते से भागे हो के हम कां कहें? अरे, तनक देर रुक लेते सो सब को सहूरी बंधती। मगर तुमाए लाने सो रावण के पुतरा के लाने पटाखें लाने को टेम है, मनो गोबर लाने को टेम नइयां।’’ भौजी बोलीं।
भौजी के इत्ते नोने लेक्चर की अखीरी लाईन सुन के मोए लगो के भौजी ने गोबर की बतकाव कर के इत्तो गंभीर टाॅपिक को गुड़-गोबर कर दओ।
‘‘हऔ, लान देबी! चाय पिला देओ! फेर जात हों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘तुमने सई कई भौजी! अपन ओरें हर साल रावण को पुतरा सो फूंकत रैत आएं पर जो कभऊं कोनऊं आजकाल के रावण के बारे में सुनी परत आए सो जेई कैन लगत अरएं के अपन अकेले का कर सकत आएं?’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘औ सांची सो आए! आजकाल के रावण हरों से कोनऊं अकेले नईं निपट सकत!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हौ, औ रामचन्दर जी सो अजोध्या से पूरी सेना ले के गए रए न बनवास के लाने? अरे, बे और उनके लोहरे भैया लछमन के अलावा औ कौन रओ उनके संगे? बाकी उन्ने हिम्मत ने हारी औ छोटे-बड़े भूल के सबई खों अपने संगे लओ, तभईं सो रावण खों मार पाए। औ एक अपन ओरें आएं जो संगे चलबो ई भूले जा रए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘कै सो तुम ठीक रईं बिन्ना! बाकी आजकाल जो दसा आए ऊमें हम का, कोनऊं बता नईं सकत के रावण फाईनली कबे मरहे! जब लों जनता औ कानून संगे ने चलहे, तब तक कछु नईं हो सकत।’’ भैयाजी दुखी होत भए बोले।
‘‘दुखी न हो भैयाजी! मैंने आपके लाने दुखी करबे को जे सब नईं कही। बा सो दुनियादारी देख के कै आई। अब आप सो उठो औ भौजी के लाने गोबर लान देओ! चलो उठो आप, गम्म ने खाओ!’’ मैंने भैयाजी से कही।        
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रावण को पुतरा में चाए पटाखो भरो जाए, चाए बम, मोए का करने? बात सो तब बनहे जब अपन ओरें मिल के ई समाज से रावण हरों खों फाईनली मार देबी!
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के समाज में आज बी जियत भए रावनों खों कैसे मारो जाए? तनक सोचियो! 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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