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Wednesday, June 24, 2026
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Tuesday, June 23, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | मानसून खों ने कोसों, इते तो ऊंसईं सब काम लेट होत आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।
भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।
यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।
यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।
“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं। विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।
कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/- साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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Sunday, June 21, 2026
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Wednesday, June 17, 2026
चर्चा प्लस | जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हम पशुओं का सम्मान करते हैं। हम गाय को अपनी माँ मानते हैं। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई माँ समान गाय को ज़रा भी चोट पहुँचाए। जब हम कुत्तों को सड़कों पर घूमते हुए देखते हैं, तो हमें उन पर दया आती है। जब किसी गाड़ी की टक्कर से किसी कुत्ते की मौत हो जाती है, तो उसकी बेरहम मौत पर हमें दुख होता है। जानवरों के लिए हमारे मन में कोमल भावनाएँ होती हैं, लेकिन इस जीव दया की भावना के चलते क्या हम मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बढ़ता नहीं जा रहा है? आवारा कुत्तों को न मारा जाए यह एक अच्छी मानवीय भावना है किन्तु वहीं जब 3 साल की नन्हीं बालिका माही का 55 टांकों वाले चेहरे की तस्वीर देखने को मिलती है तो आत्मा कांप उठती है। क्या गुज़री होगी उस नन्हीं बच्ची पर। उसका क्या दोष था जो उसे आवारा कुत्तों के हमले की मर्मांतक पीड़ा झेलनी पड़ी। तो क्या उन आवारा कुत्तों को पूरा दोष था जो भेड़ियों के कुल के हैं और जिनके डीएनए भेड़ियों से 99 प्रतिशत मिलते हैं? इस विषय पर गंभीरता से सोचना जरूरी है और हल निकालना भी।
लगभग हर भारतीय शहर, गांव और कस्बों में आवारा कुत्ते पीढ़ियों से घूम रहे हैं। बेशक वे हमारे मित्र हैं, वफादार हैं लेकिन उस स्थिति में जब वे हमारे पालतू हों। वैसे पालतू कुत्तों के द्वारा अपने मालिक को काट लिए जाने की भी अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं। मगर समस्या उनकी नहीं बल्कि उन कुत्तों की है जो सड़कों पर दबंगई से आवारा घूमते हैं। पहले यह कानून था कि नगरपालिका द्वारा जगहर की गोलियां दे कर कुत्तों की संख्या को नियंत्रित कर दिया जाता था किन्तु जब से माननीय मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवाया कि आवारा कुत्तों को ज़हरीली गोलियाँ देकर नहीं मारा जाना चाहिए, तब से उनकी संख्या काफ़ी बढ़ गई है। यह जीव दया के पक्ष में एक अच्छा निर्णय था। मैं खुद जानवरों को मारने के विरुद्ध हूँ। किसी जानवर को ज़हर देकर मारना मानवीय तरीका नहीं है। लेकिन इस कानून को लाते समय क्या यह सोचा गया कि इसके परिणाम क्या होंगे? यह तो पता नहीं किन्तु आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी किए जाने का कानून पास हुआ। लेकिन समस्या यह है कि हमारे देश में कई अच्छे प्रावधान तो हैं, पर उनके लागू होने में कई कमियाँ हैं। इन्हीं कमियों की वजह से कुत्ते आज भी गाँवों और शहरों में बड़ी संख्या में घूम रहे हैं और अपनी बदकिस्मती का जीवन जीते हुए मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हैं।
समाचार पत्रों में आए दिन आवारा कुत्तों द्वारा गंभीर रूप से काटे जाने की घटनाएं पढ़ने को मिलती रहती हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के माहिदपुर तहसील के देवलवाड़ी गांव में 3 वर्ष की मासूम माही अपने पिता के साथ अपने घर के बाहर आंगन में थी, तभी एक कुत्ते ने उन पर हमला कर दिया। नन्हीं माही को इतनी बुरी तरह से काटा कि उसका चेहरा लहूलुहान हो गया। चिकित्सकों को उसके घावों को सीने के लिए 55 टांके लगाने पड़े। ज़रा सोचिए कि 3 साल की नन्हीं बच्ची और 55 टांके! अखबार में छपी तस्वीर देख कर आंखों में आंसू आ गए। क्या यह जीव दया का उल्लंघन नहीं है? किन्तु आवारा कुत्तों को क्या पता कि जीव दया क्या होती है। वे तो स्वभाव से ही वन्य पशुओं के समान हैं।
यह वैज्ञानिक सत्य है कि कुत्ते भेड़ियों के कुल के हैं। कुत्तों और भेड़ियों के डीएनए में 99 प्रतिशत समानता है। वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार, पालतू कुत्ता और ग्रे भेड़िया दोनों ‘‘कैनिडे’’ कुल का हिस्सा हैं। ये आपस में प्रजनन करके स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकते हैं। वैसे कुत्ते सीधे तौर पर आधुनिक भेड़ियों के वंशज नहीं हैं, बल्कि आज के कुत्ते और भेड़िये दोनों ही एक विलुप्त हो चुके प्राचीन भेड़ियों के वंशज हैं। मनुष्यों के साथ रहते-रहते वे मनुष्य-मित्र बन जाते हैं। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो उनके व्यवहार में परिस्थितिजन्य भिन्नता मौजूद रहती है। जैसे जिन पालतू कुत्तों को घूने-फिरने की आजादी, लोगों से मेल-मिलाप की छूट और अपने मालिक से अधिक प्रेम मिलता है वे प्रायः शांत और मिलनसार स्वभाव के हो जाते हैं। किन्तु जिन पालतू कुत्तों को अधिकतर पिंजरे में या जंजीरों से बांध कर रखा जाता है तथा रात में ही चौकीदारी के लिए बाहर लाया जाता है वे अधिक खूंखार यानी एग्रेसिव होते हैं। फिर भी दोनों ही स्थिति के पालतू कुत्तों को समय पर भोजन-पानी और दवाएं मिलती रहती हैं। कम से कम दिन में दो बार उन्हें पट्टा बांध कर घर के बाहर घुमाया भी जाता है। हमारे देश में विशेषरूप से उन्हें पौटी कराने के लिए। जोकि शर्मनाक बात है। क्योंकि एक ओर तो अपने पालतू कुत्तों को सब कुछ अच्छे से अच्छा दिया जाता है, वहीं पौटी कराने के लिए किसी भी गंदी जगह पर ले जाता जाता है। जिनसे उन कुत्तों को भी बीमारियां होने का खतरा रहता है और मनुष्यों को भी गंदगी का सामना करना पड़ता है।
खैर, आवारा कुत्तों की स्थिति पालतू कुत्तों से भिन्न होती है। उन्हें हर उस व्यक्ति की ओर आशा भरी दृष्टि से देख कर दुम हिलाना होता है जिनसे उन्हें रोटी के कुछ टुकड़े मिलने की उम्मींद होती है। ये कुत्ते भोजन की आशा में स्वयं को वफादार और चौकीदार बनाने में जुटे रहते हैं। इसीलिए ये आवारा कुत्ते हमें अच्छे लगते हैं। हम उन्हें बचा हुआ भोजन देकर सोच लेते हैं कि उससे उनका पेट भर गया होगा। जबकि सच्चाई यह नहीं होती है। दिन भर दाने-दाने के लिए भटकने वाले कुत्ते जहां एक ओर अपने समुदाय में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए संघर्ष करने हैं वहीं निरंतर भटकते रहने के कारण उन्हें जितनी भूख लगती है, उतना खाना नहीं मिलता है। उस स्थिति में तो और भी नहीं जब कुत्तों की संख्या अधिक हो। यहीं से शुरू होता है उनके भेड़िए वाले डीएनए का कुलबुलाना। भेड़िए समूह में रहते हैं जिसका नेता उनमें सबसे शक्तिशाली यानी अल्फा भेड़िया होता है। उस अल्फा भेड़िए के नेतृत्व में ही शेष भेड़िए शिकार करते हैं। आवारा कुत्तों में भी कमजोर कुत्ते उस शक्तिशाली कुत्ते के साथ समूह बना लेते हैं जिसके बल पर उन्हें भोजन का कुछ हिस्सा मिल सके। आवारा कुत्तों के हर झुंड में एक अल्फा डॉग होता है। यह खूंखार, अवसरवादी और आक्रामक होता है। चूंकि आवारा कुत्ते मनुष्यों की बस्ती में रहते हैं और वे जानते हैं कि उन्हें मनुष्यों से ही भोजन मिलेगा, इसलिए वे मनुष्यो से ‘‘बना कर चलते’’ हैं। लेकिन जब उनका अपना झुंड बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो वे अपनी भूख मिटाने के लिए अवसर वादी बन जाते हैं। साथ ही उनके भीतर की हिंसक प्रवृत्ति जागने लगती है। अकसर यह देखने में आता है कि आवारा कुत्ते छोटे बछड़ों को घेर कर उसे काटने का प्रयास करते हैं। ऐसे मुसीबत में फंसे बछड़ों को कभी गाय बचा लेती है तो कभी मनुष्य। फिर भी कई बार नन्हें बछड़े कुत्तों का शिकार हो जाते हैं। पानी की तलाश में गांव में घुस आने वाले हिरण जैसे मासूम पशु भी आवारा कुत्तों के शिकार बन जाते हैं। क्योंकि बात वही है कि आवारा कुत्तों के भीतर का भेड़िया जाग उठा होता है।
मनुष्य आखिर मनुष्य होता है और पशु अंततः पशु। जो मनुष्य हिंसक हो जाता है उसे भी ‘‘पशुवत’’ ही कहा जाता है। तो आवारा कुत्तों के हिंसक होने और अचानक किसी कमजोर प्राणी पर हमला कर देने को उसकी हिंसक प्रवृत्ति नहीं तो और क्या कहेंगे?
अब प्रश्न यह है कि इन आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और इनके बढ़ते आतंक से बचने का उपाय क्या है? बेशक नसबंदी का उपाय लागू किया गया है जो पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इसके उदाहरण कुत्तों के झुंड के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल विचार इस बात पर होना चाहिए कि जीव दया की भावना भी बनी रहे, कुत्तों को भी कष्ट न हो और मनुष्य भी सुरक्षित रहें। जाहिर है कि इ सके लिए हमें विदेशों विशेषरूप से अमरीका, योरोप, चीन, जापान आदि की ओर देखना और उनसे सीखना होगा कि वहां की सड़कें आवारा कुत्तों से कैसे मुक्त हैं? हमारे मंत्रियों एवं अधिकारियों के दल प्रायः विभिन्न ज्ञान की प्राप्ति के लिए सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राएं करते रहते हैं किन्तु इस विषय का हल क्यों नहीं ढूंढ कर ला सके? या फिर इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई?
विदेशों में सड़कों पर कोई भी आवारा पशु घूमता दिखाई नहीं देता है। क्योंकि वहां परिस्थितिवश आवारा हुए कुत्तों के लिए डॉग शेल्टर होते हैं जहां उन्हें रख कर उनकी देखभाल की जाती है। हम स्वयं को जीव दया का सबसे कट्टर समर्थक मानते हैं किन्तु हमीं जीव दया का सही तरीका नहीं जानते हैं। यदि कोई पशु आवारा घूम रहा है और दाने-दाने के लिए मोहताज जीने को विवश है तो उसे रोटी के दो टुकड़े दे कर जीव दया का दम नहीं भर सकते हैं। सही जीव दया तो तब होगी जब हम उनके लिए रहने की उचित व्यवस्था, खाने का उचित प्रबंध कर सकें। इस बिन्दु पर विदेशी हमसे अधिक जीव दया वाले हैं। अमरिका और योरोप में तो कुत्ता पालने की बाकायदा परमीशन लेनी पड़ती है और इस बात के लिए प्रशासन को आश्वस्त करना पड़ता है कि वे जो भी पशु पालेंगे, उसका हर प्रकार से पूरा ध्यान रखेंगे। यदि वे अपनी बात पर खरे नहीं उतरते हैं और अपने पालतू पशु को पीड़ा पहुंचाते हैं तो प्रशासन उनसे उनका पालतू पशु छीन कर ले जाता है और शेल्टर होम के हवाले कर देता है। हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। देश में कुछ एनजीओ हैं जो डॉग शेल्टर होम चलाते हैं वरना अधिकतर एनजीओ भी आवारा कुत्तों को नियमित खाना खिला कर अपने कर्तव्य को पूर्ण समझ लेते हैं।
यदि कुत्ते सड़कों पर आवारा घूमेंगे और भूखे रहेंगे तो अपना झुंड बनाएंगे ही ताकि मिल कर शिकार द्वारा अपने लिए भोजन जुटा सकें। यही उनकी डीएनए प्रकृति है। इसमें उनका कोई दोष नहीं है। विपरीत परिस्थिति में उनके भीतर का भेड़िया जागने लगता है और वे एग्रेसिव हो कर वह कर बैठते हैं जो हम मनुष्यों को लगता है कि उन्हें नहीं करना चाहिए। जो कुत्ते पीढ़ियों से मनुष्यों के बीच रह रहे हैं उन्हें जंगल में नहीं खदेड़ा जा सकता है और न निर्ममता से मौत के घाट उतारा जा सकता है। लेकिन जलवायु में बढ़ती गर्मी और अधिक संख्या के कारण भोजन की कमी का दबाव आवारा कुत्तों को हमलावर बनाने लगा है। लिहाजा, अब समय आ गया है कि कुत्तों को मनुष्यों से एक निश्चित दूरी पर पहुंचा दिया जाए। यह तभी संभव है जब हर शहर, गाव, कस्बे में डॉग शेल्टर होम बनाए जाएं। क्योंकि विचारणीय बात है कि यदि आवारा कुत्तों की वर्तमान पीढ़ी को नसबंदी द्वारा संतति के अयोग्य बना भी दिया जाए तो क्या यह पीढ़ी मनुष्यों पर हमला करना छोड़ देगी? नहीं! भूख, मौसमी परेशानियां और उनकी बढ़ी हुई संख्या का दबाव उन्हें एग्रेसिव तथा हमलावर बनाता रहेगा।
यदि धार्मिक दृष्टि से विचार करें तो कुत्ता उन कालभैरव का वाहन है जो बस्ती से बाहर पहाड़ों में निवास करते हैं। हम अपने स्वार्थ में उन्हें शहर में ला कर आवारा जीवन जीने को विवश कर चुके हैं और अब वे जब हमारे लिए कालदूत बनते जा रहे हैं तो हमें भी इस पर पुनः विचार करना चाहिए कि उनका असली स्थान कहां है। अब पहाड़ों अथवा जंगलों में नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि वे हमारे स्वभाव के अनुरूप ढल गए हैं, उनका वन्य स्वभाव शांत आचरण में बदल चुका है। लेकिन उनके भीतर की हिंसा को जगाने वाले तत्वों का तोड़ ध्यान में रखते हुए उनके लिए सबसे उपयुक्त जगह है डॉग शेल्टर होम। जब सड़कों पर से आवारा कुत्ते हट जाएंगे तो उनका आतंक भी समाप्त हो जाएगा और फिर प्रत्येक माही सुरक्षित जी सकेगी। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 17.06.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, June 16, 2026
पुस्तक समीक्षा | सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - सॉनेट सागर
कवि - डॉ. विनीत मोहन औदिच्य
प्रकाशक - सर्वभाषा प्रकाशन, जे-49,गली नं.-38, राजापुरी (मेनरोड) उत्तमनगर,नई दिल्ली-110059
मूल्य - 249/-
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सॉनेट विधा हिन्दी साहित्य के लिए हमेशा एक नूतन विधा रही है। यह माना जाता है कि सबसे पहले कवि त्रिलोचन शास्त्री ने इस विधा को हिन्दी में सम्मिलित किया। उनके समकालीन कुछ कवियों ने सॉनेट लिखे भी लेकिन फिर भी सॉनेट हिन्दी काव्य जगत में अपनी पैंठ नहीं बना सका। इधर विगत कुछ वर्षों से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य ने सॉनेट के क्षेत्र में कड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है जिससे हिन्दी साहित्य में सॉनेट को स्थापना मिलने की संभावना बढ़ी है। डॉ. औदिच्य हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के समर्थ ज्ञाता हैं। उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें ‘‘फ्रिक्र सागरी’’ के तख़ल्लुस से लिखी हैं। इसके साथ ही अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कार्य में पाब्लो नरुदा के सॉनेट्स का अनुवाद कर के हिन्दी जगत को पाब्लो की काव्यात्मक विशेषताओं से परिचित कराया है। स्वयं के मौलिक सॉनेट संग्रह तथा भारतीय सॉनेटियर्स एवं अंग्रेजी के 101 सॉनेटियर्स के सॉनेट्स के पुस्तक संपादन के बाद डॉ औदिच्य को यह महसूस होता है कि हिन्दी जगत को सॉनेट की संरचना की बारीकियों से भी अवगत होना चाहिए। हाल ही में उनका नवीनतम सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने सॉनेट विधा के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने “सॉनेट काव्य विधा संरचना एवं हिन्दी साहित्य में प्रयोग” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘काव्यात्मक एकाकी विचार की संक्षिप्त अभिव्यक्ति के लिए एक बौद्धिक या इन्द्रियजनित लहर जो भावनात्मक और लयबद्ध रूप से तीव्रता से अनुभव हो, सॉनेट एक सर्वाेत्तम माध्यम सिद्ध होगा। एक ऐसा साधन जो मधुरता और एकता के क्रांतिकारी नियमों के आधार पर निश्चित किया गया हो। उन पाठकों को जिन्हें सॉनेट साहित्य के क्षेत्र व तकनीक का ज्ञान नहीं है उन्हें इसके विकास व क्षमताओं से परिचित कराना समीचीन होगा। सॉनेट के अनेक इतिहासकार हुए हैं जिनके अपने मत व दृष्टिकोण हैं। इनमें सर्वप्रमुख कैपल लाफ्ट हैं जिन्होंने इस रोचक विधा का विशिष्ट अध्ययन किया। उन्होंने 1813-14 में मौलिक और अनूदित इटालियन सॉनेट संकलन ‘लौरा’ प्रकाशित किया। आर एच हाउसमैन ने 1833 में एक श्रेष्ठ संकलन निर्गमित किया। डाइस, लेह हंट, टामलिंसन, डी एम मेन, मिस्टर एस वैडिंगटन सहित मिस्टर डेनिस ने इंग्लिश सॉनेट्स के माध्यम से योगदान दिया। मिस्टर हाल कैन के सॉनेट्स आफ श्री सेन्चुरीज ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। क्वार्टरली रिव्यू 1866, वे स्टमिनिस्टर रिव्यू 1871, द डब्लिन रिव्यू 1876-77 में सॉनेट साहित्य पर महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए। इटली में लेंटीनी, पैट्रार्क तथा इग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, विलियम वर्ड्सवर्थ, जान मिल्टन, स्पेंसर के अतिरिक्त अनेक देशों के कवियों ने सॉनेट काव्य विधा में लेखन कर इस विधा को लोकप्रिय बनाया। भारत में भी विभिन्न राज्यों में इस विधा को विविध स्वरूपों में लिखा जाता रहा है।’’ अपने इस लेख में डॉ. औदिच्य ने हिन्दी में सॉनेट छंद लिखे जाने के आधारभूत तत्वों को भी सामने रखा है। यह लेख सॉनेट विधा को जानने, समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
‘‘सॉनेट सागर’’ में डॉ औदिच्य के कुल 51 सॉनेट संग्रहीत हैं। इस संग्रह के संबंध में ओड़िशा की सॉनेटियर व कवयित्री अनिमा दास ने “सॉनेट सागर; एक अनंत यात्रा” शीर्षक से भूमिका में लिखा है कि “प्रस्तुत नवीन संग्रह ‘सॉनेट सागर’ सॉनेटियर विनीत मोहन जी की एक अद्भुत यात्रा धारा है। इस संग्रह में लिपिबद्ध समस्त सॉनेट्स कई भाव, विचार, विषय की विस्तृत परिभाषा है। सॉनेट के मूलतः कई तत्व होते हैं जिसमें प्रमुख है मीटर, गेयता, विशिष्ट तुकांत, भाव, एक स्वतंत्र विचार, रूपक, प्रतीक, बिम्ब एवं रहस्य। 14 पंक्तियों की किसी भी कविता को सॉनेट नहीं कहा जा सकता। सॉनेट का अन्य एक रूप है जिसे अनियंत्रित रूप कहा जाता है, जिसमें उपरोक्त सभी तत्व होते हैं किंतु छंद के नियमों से मुक्त होते हैं। डॉ. विनीत मोहन जी ने सॉनेट के दोनों रूपों को सम्पूर्ण विशेषता देते हुए कई सृजन किए हैं।”
पुस्तक में अनिमा दास ने “सॉनेटियर एवं ग़ज़लकार प्रो. (डॉ.) विनीत मोहन औदिच्य उर्फ फ़िक्र सागरी: एक परिचय” शीर्षक से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का विस्तृत परिचय भी दिया है। डॉ औदिच्य बिना शोर मचाए नेपथ्य में रहते हुए सतत सृजनशील हैं। फिर भी उन्हें अनेक राष्ट््रीय स्तर के पुरस्कार सम्मान मिल चुके हैं। उनकी अब तक की प्रमुख कृतियां हैं- ग़ज़ल संग्रह - खुशबु-ए-सुखन (2014), कारवां-ए-सुखन (2021), अंदाज-़ए-ग़ज़ल (2022), तन्हाइयाँ आवाज़ देती हैं (2023), काव्य संग्रह काव्य प्रवाह (2015), भाव स्रोतस्विनी (2019), प्रथम सॉनेट संग्रह - 69 अंग्रेजी सॉनेटस का हिंदी अनुवाद कर ‘‘प्रतीची से प्राची पर्यंत’’ साझा संग्रह (2020), द्वितीय सॉनेट संग्रह - नोबेल पुरस्कार विजेत पाब्लो नेरुदा की ‘‘हंड्रेड लव सॉनेट्स’’ पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘‘ओ प्रिया!!! (2021), तृतीय सॉनेट संग्रह ‘‘सिक्त स्वरों के सॉनेट’’ (118 सॉनेट्स) - 2022, चतुर्थ सॉनेट संग्रह ‘‘काव्य कादम्बिनी’’ - 2022 (101अंग्रेजी सॉनेट रचनाकारों के 135 सॉनेटस का हिंदी अनुवाद)। यह सुनिश्चित है कि डॉ औदिच्य द्वारा सॉनेट के लिए किया गया श्रम एवं मौलिक सॉनेट सृजन ही उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थाई पहचान दिलाएगा।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य के सॉनेट्स में वैचारिक संवाद हैं, प्रकृति की सुंदर छटा है तथा विविध मानवीय व्यवहार हैं। संग्रह का पहला सॉनेट है “अदृश्य चक्षु” जिसमें उन्होंने लिखा है कि-
ऐसा कह दूँ कि मैं आनंद में हूँ, मिथ्या यह तथ्य नहीं
मैं ही जानता हूँ अग्नि-वन में कैसे होता श्वास रुद्ध
और दुखित मेरा जीवन है, यह भी मेरा कथ्य नहीं
है ज्ञात मुझे कैसे काँटों की शय्या पर काया हो रही वृद्ध
इस प्रकार देखा जाए तो डॉ औदिच्य अपने सॉनेट में व्यष्टि से समष्टि की ओर बड़ी सहजता से बढ़ते चले जाते हैं। उनका अपना दुख-सुख जन-जन के दुख-सुख का प्रतिबिम्ब बन कर उभरने लगता है। इसी प्रकार उनके कुठ सॉनेट्स में नॉस्टेल्जिक शेड दिखाई देता है। जैसे एक सॉनेट है ‘‘प्रहेलिका’’। इसमें प्रकृति के लक्षणों में मानवीय भावनाओं की अद्भुत छटा का रूपक है-
कहीं दूर कानन में खिल उठा था फूल
सूखी नदी की देह से उड़ गई थी धूल
मंदार सा लाल लगा था तब आकाश
शीश झुका कर शशि बिखराया प्रकाश।
कह दिया था मेघ ने वह नहीं बरसेगा
नक्षत्रों में जलकर एक कल्प तरसेगा
आशा-अरण्य में रहेगा भौरों का गुंजार
मध्यरात्रि के स्वप्न में संभावना का नीहार।
कवि डॉ. विनीत मोहन औदिच्य प्रकृति की महत्ता को समझते हैं। उनकी संवेदनाओं में उस समय तीव्र आलोड़न उठता है जब प्रकृति को किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाई जाती है। जैसे अपने एक सॉनेट में वे लिखते हैं कि-
रे मानव, अंधाधुंध वृक्ष काटे क्यों? चलो प्रकृति की ओर
उग आए कंक्रीट के जंगल, नहीं है जिनका कोई छोर
नंगे पर्वत, कठोर बंजर अवनि व सूखे सर नद-नदियाँ
है भूकंप का जोर भयंकर, वृक्षों पर मुरझाई कलियाँ।
कर्णकटु है प्रतिदिन बढ़ता शोर, रे कहाँ गई धरोहर?
जी रहें सभीत सारे थलचर, जलचर और नभचर
विषाक्त धुएँ में घुल रहा नवपल्लव का अमिय नीर
आ रही मृत्यु ध्वनि निकट, पीड़ित प्रकृति का वक्ष चीर।
जब हृदय व्यथित होता है तो ईश्वर की कृपा की आकांक्षा बढ़ जाती है। यूं भी भारतीय संस्कृति में ईश्वर की सत्ता को पूर्णतया स्वीकार किया गया है। श्रीराम के रूप में ईश्वर की छवि हर भारतीय के हृदय में बसती है। डॉ औदिच्य ने नया प्रयोग करते हुए सॉनेट में श्रीराम का स्मरण किया है। उनके सॉनेट ‘‘राम मेरे जीवन में’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
कहें राम का नाम... सुनें राम अभिराम
नित करे आराधना... हो कृतार्थ सर्वनाम
सरयु है प्राण... राम है तरणी... व निर्वाण
है आराध्य जो किया संसार का निर्माण
इस तरह देखा जाए तो संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ में विषय की विविधता है तथा नूतनता है जिससे यह संग्रह रोचक बन गया है।
पुस्तक के दूसरे खंड में कवि की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षाएं सहेजी गई हैं। यह समस्याएं हैं - “सिक्त स्वरों के सॉनेट” संग्रह की समीक्षा “सॉनेट की विदेशी शैली का सुंदर भारतीय स्वरूप” - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह, “ओ प्रिया” (पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी अनुवाद) की समीक्षा समीक्षक प्रो. हरेराम पाठक, प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित काव्य संग्रह रू अविरल बहती भाव स्रोतस्विनीश् की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, काव्य संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक डॉ. चंचला दवे, आंग्ल भाषा से हिंदी में प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित सार्वकालिक श्रेष्ठ सॉनेट संग्रह “काव्य कादम्बिनी” की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, सॉनेट संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक विजय कुमार तिवारी, पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी में विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित “ओ प्रिया” समीक्षक वीणा शर्मा वशिष्ठ, “ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक मनोरमा जैन पाखी तथा ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक: डॉ. शैलेष गुप्त वीर।
समीक्षाओं के उपरांत “श्री विनोद मोहन जी की लेखनी पर प्रबुद्ध साहित्यकारों की अन्य प्रतिक्रिया” शीर्षक से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं हैं यह साहित्यकार हैं अशोक बाजपेई, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, डॉ प्रणव भारती, प्रभु दयाल मिश्र, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, डॉ हरे राम पाठक, डॉ कविता नंदन, किशोर नायक, प्रताप नारायण सिंह, केशव मोहन पांडेय, अमरेश विश्विल, डॉ शैलेश गुप्त वीर, मनोरमा जैन पाखी, वीणा शर्मा वशिष्ठ, लिली मित्रा, डॉ छबिल कुमार मेहेर तथा अनिमा दास। पुस्तक के अंतिम परिशिष्ट में डॉ विनीत मोहन आदित्य को उनके कृतित्व के लिए दिए गए सारस्वत सम्मान की तस्वीर एवं सम्मान पत्र स्मृति चिन्ह आदि रखे गए हैं।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का यह सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ न केवल पठनीय है अपितु हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना सहित काव्यात्मक .
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