Monday, April 20, 2026

मेरी मां डॉ विद्यावती मालविका जी की 5 वीं पुण्यतिथि - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पूरे 5 वर्ष... हां, मेरी मां साहित्य साधिका डॉ. विद्यावती "मालविका" जी को मुझसे दूर गए पूरे 5 वर्ष हो गए... आज ही के दिन 20 अप्रैल 2021 को वे चिरनिद्रा में लीन हो गई थीं... 😔
   मां के जाने पर दीदी डॉ वर्षा सिंह जी ने यह पोस्ट लिखी थी कि 
"छोड़ गईं मां हमें अकेला | स्वर्गीय माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" की स्मृतियों को नमन | डॉ. वर्षा सिंह"
https://varshasingh1.blogspot.com/2021/04/blog-post_22.html?m=1
   तब क्या पता था की मां के जाने के ठीक 13 दिन बाद दीदी भी मुझे हमेशा के लिए छोड़ कर चली जाएंगी... 😥
    ये दुख एक चट्टान की तरह मेरे सीने पर ताज़िंदगी रखे रहेंगे... 😔
Miss You Maa 💔
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मां की एक कविता ...

प्रिय है धरा बुंदेली
 - डॉ. विद्यावती "मालविका"

मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, 
सागर झील सहेली।।

उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किया,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,

सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।।

महाकाल के चरणों में बचपन बीता 
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,

ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।।
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मां के साथ मेरी ये आखिरी तस्वीर ... तमाम परेशानियों के बाद भी तब हम बहुत खुश रहा करते थे क्योंकि मां साथ थीं...😔
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Sunday, April 19, 2026

मित्रों के साथ डिनर और सुकून के पल - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रों के साथ डिनर और सुकून के पल होटल श्रीजी, सागर में - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, 18.04.2026

बतकाव बिन्ना की | बिना खबर करे धमकबे वारों को का करो जाए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
बिना खबर करे धमकबे वारों को का करो जाए 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      मैं भैयाजी के इते पौंची तो मैंने देखी के भैयाजी पलकां पे बैठे अखबार बांच रए हते औ भौजी चौका में हतीं। बे दिखा ने रई हतीं मनो सुना जरूर पर रई हतीं। अब आप सोच रए हुइयो के जो दिखा ने पर रओ, बा सुना कैसे पर रओ? हो सकत के बा गाना गा रओ होए जीसें अटकल लगा लई जाए। मनो गाना गाबे वारो चौका मेंई आए, जै कैसे पतो? सो बा ऐसे पतो के हमाई भौजी चौका में बासन पटका-पटकी कर रई हतीं। मनो बे तोड़-फोड़ ने कर रई हतीं, लेकन यां से वां जोर-जोर से उठा-धर कर रई हतीं।
‘‘भौजी खों का हो गऔ जो बे बासन काए पटक रईं? उनको मूड आपने बिगारो का?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम काए खों बिगारहें? हमने कछू नईं करो!’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘सो का बात हो गई?’’ मैंने पूछी।
‘‘मोए तो कछू बता नई रईं, तुमई पूछ लेओ। कओ तुमें कछू बता दैवें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भौजी! चाय बना रईं का?’’ मैंने उतई से बैठे-बैठे भौजी खों आवाज लगाई। 
‘‘बना तो नईं रए हते, मनो अब तुम आ गईं सो बना देत हैं।’’ भौजी ने उतई चौका से उत्तर दओ।
कछू देर में भौजी चाय ले के आ गईं। तब लौं हम दोई अटकल लगात रए के भौजी को का हो गओ?
‘‘का हो गओ भौजी? आपको मूड खराब सो दिखा रओ।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘खराब सो होई गओ आए।’’ भौजी भिनकत सी बोलीं।
‘‘का हा गओ? बताओ तो कछू।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अरे अब का बताएं! का भओ के आज तुमाए भैयाजी खों पोस्टआॅफिस जाने रओ कछू काम से। जे निकरे सो हमने सोची के हम कछू देर झपकी मार लेंवे। काए से के रात को नींद ऊंसई ने आई हती। बा आंधी-मांधी चली रई सो लाईट चली गई रई। गरमी से नींद ने आई रई।’’ भौजी बतान लगीं।
‘‘फेर?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर का? हमें झपकी लगई हती के दरवाजा की घंटी कोऊ बजान लगो। हमाई नींद खुल गई। हमने सोची के को हो सकत आए? हमने अबे औन लाईन कछू मंगाओ नईयां, सो बा डिलीवरी वारो हो नईं सकत आए। कोनऊं चिठिया लिखत नईयां सो पोस्टमेन के आबे को सवालई नईं उठत आए। जब लौं हमने अटकलें लगाई, उत्ते में तो बा आबे वारे ने इत्ती बेर घंटी बजा दई के हमें लगो के बा दरवाजा की घंटी बिगार के मानहे। हमें भौतई गुस्सा आई। हमने जा के दरवाजो खोलो। देखो तो समाने तुमाए भैयाजी के एक दोस्त ठाढ़े। हमने उनसे कई के भैयाजी तो घरे नइयां। का उने पतो रओ के आप उनसे मिलबे आने वारे हैं? मैंने उनसे पूछी। सो बे बोले के नईं, हम तो सरप्राईज देबे खों चले आए। चलो कोई नईं, उनको नईं तो आपके लाने तो सरप्राइज होई गओ। कैत भए बे दांत निपोरत भए सोफा में पसर गए। भौजी एक कप चाय सो पिला देओ। ऊपर से आदेस सोई दे दओ। हमाओ तो मूड़ भिनक गओ। मनो अब बे तुमाए भैया के दोस्त हते सो हम कछू कर्रो बोल नईं सकत्ते। मनो हमने इत्तो जरूर कओ के आपको आबे से पहले इनको मोबाईल पे घंटी कर लेने रओ, बे फेर कऊं ने जाते। जा सुन के बे दांत निपोरी करन लगे। बाकी हमने उनको चाय पिलाई। मनो तब तक हमाई नींद को बेड़ा गरक हो गओ रओ।’’ भौजी ने अपनी पूरी परेसानी बताई औ फेर बोलीं,‘‘अब तुमई बताओ बिन्ना के जो का बात भई? अरे आज के जमाना में तुमाए हाथ में मोबाईल रैत आए, एक घंटी करो औ पूछ लेओ के कबे आएं? कऊं ऐसे कोनऊं के इते धमकने परत आए?’’
‘‘सई कई भौजी। भौतई दिमाग खराब होत आए। मोरे संगे सो औरई सल्ल आए। कछू जने ऐसे आएं जो बिगैर घंटी करे आ धमकत आएं। औ होत का आए के जो मैं घर पे मिली सो चलो फेर बी ठीक, मनो जो मैं घर पे नईं औ तारो डरो मिलो तो बे उलायना देबे टिकत आएं के हम आए हते औ आप मिली नईं। अरे भैया, मोए सपनों ने आओ रओ के आप आ रए। मनो उनको का बे तो अपनी सुविदा देखत आएं। दूसरे का कां परी।’’ मैंने बी भौजी खों बताओ।
‘‘हऔ, मनो कोऊ सो रओ होए, कोऊ कछू काम करओ होए औ आप इकदम से धमक परो, सो मूंड़ सो भिन्नाहे ई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, तुमें ऊको भगा दओ चाइए रओ।’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘हऔ, आपई तो ऊकी तारीफें करत फिरत हो, सो हम कैसे भगा देते? फेर आपई कैते के हमाए दोस्त खों काए भगा दओ?’’ भौजी चिड़चिड़ात भई बोलीं।
‘‘सई में भौजी! ऐसो करबे वारों पे मोए सोई भौतई गुस्सा आत आए। आप खों याद हुइए के पैसे अपने मोहल्ला में एक डाॅक्टर साब रैत्ते। सो हम ओरन की चिनारी के जित्ते जने उनके इते दिखाबे के लाने आत्ते, बे सबई उते अपनो नंबर आने तक लौं मोए इते आ के बैठ जात्ते। अब उनको भगाओ बी नई जा सकत्तो औ कऊं जरूरी जाने हो तो जाते बी नईं बनत्तो। काए से के उनको लगतो के उने भगाओ जा रओ। बे ओरे बी फोन करे बिगैर आ जात्ते। मनो आ कछू क रै होओ, सबरे काम को राम नाम सत्त! अब्बी कछू जने ऐसे आएं के बिगैर घंटी मारे आ धमकत आएं। औ ने मिल पाओ सो बुरए बनो के मनो जानबूझ के घरे ने हते। उल्टो चोर कोतवाल खों डांटे।’’ मैंने कई।
‘‘ऐसई तो मोरे संगे एक दिन और भओ रओ। मैं अथानों डार रई हती के एक बाई अपने लोहरे मोड़ा के संगे चली आईं। हमने ऊसे कई बी के बाई आबे के पैले घंटी तो कर लेतीं। मनो बा बोली के हम इते से कढ़ रए हते सो हमने सोची के आप से मिलत चलें। मिलबो तो ठीक, मनो ऊको मोड़ा इत्तो ऊधमी के का बताओ जाएं। ऊनें हमाओ अथानों को मसालो बिगार दओ। अब बा तो बच्चा ठैरो। ऊसे हम का कैते, सो गम्मा खा के रै गए। मनो हमाओ पूरो अथानों खराब हो गओ। बड़ो नुकसान भओ। अब जो ऊने हमें फोन कर के बता दओ होतो के बा आ रई आए तो हम ऊ टेम पे अथानों ने डारते।’’ भौजी ने बताई।
‘‘सई में भौजी, बड़ो बुरौ लगत आए। एक तो आप कछू कै नई सकते औ अपनों सारो टाईमटेबल सोई गड़बड़ा जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘जे तो आए बिन्ना!’’ भैयाजी बोले,‘‘पैले जबे मोबाईल ने हतो तो चलो कछू नईं, बिन बताए पौंच गए सो पौंच गए। मनो अब तो पैले पूछ लेओ चाइए तब कोनऊं के घरे जाओ चाइए। अरे, सामने वारे की बी तो तनक सोचो। मोबाईल का सिरफ सोसल मीडिया खेलबे के लाने होत आए?’’ 
‘‘सई में भैयाजी! ऐसे सरप्राईज़ देबे वारे कोन पुसात आएं।’’मैंने कई। मनो तब तक भौजी अपने जी की कै के हल्की हो चुकी हतीं। बे अब तनक मुस्का-मुस्का के बतकाव कर रई हतीं। जा देख के मोए अच्छो सो लगो।    
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं के घरे जाबे के पैले फोन कर के ऊकी सुविदा जान लई चाइए के नईं, के ऊंसई धमक परने चाइए? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, April 16, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह प्रलेस की संगोष्ठी में

विगत 12.04.26 को प्रगतिशील लेखक संघ (मकरोनिया) की गोष्ठी हुई जिसमें प्रथम सत्र में वर्तमान युद्ध की स्थिति पर गहन चर्चा हुई तथा द्वितीय सत्र में काव्यपाठ किया गया। संचालन भाई सतीश पांडे जी ने तथा आभार प्रदर्शन प्रलेस के प्रदेश सचिव भाई पेट्रिस फुसकेले ने किया।
कुछ तस्वीरें, सौजन्य भाई मुकेश तिवारी जी ....
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh 
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Wednesday, April 15, 2026

चर्चा प्लस | स्त्री अधिकारों के प्रबल समर्थक डाॅ. अम्बेडकर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
स्त्री अधिकारों के प्रबल समर्थक डाॅ. अम्बेडकर          
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                 
       
डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल विधेयक को विखंडित करके लागू किए जाने के विरोध में नेहरू मंत्रिमण्डल से अपना त्यागपत्र दे दिया था। अंततः सरकार को हिन्दू कोड बिल विधेयक पास करना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के रूप में महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। डाॅ. अंबेडकर मुस्लिम स्त्रियों को भी गुलामों जैसी दशा से मुक्त कराना चाहते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों को भी अपनी स्त्रियों की दशा सुधारने के बारे में विचार करना चाहिए।


आमतौर पर यही मान लिया जाता है कि बाबासाहेब अंबेडकर समाज के दलित वर्ग के उद्धार के संबंध में क्रियाशील रहे। अतः उन्होंने दलित वर्ग की स्त्रियों के विषय में ही चिन्तन किया होगा। किन्तु उनकी सोच संकृचित नहीं थी। डाॅ अंबेडकर राष्ट्र को एक नया स्वरूप देना चाहते थे। एक ऐसा स्वरूप जिसमें किसी भी व्यक्ति को दलित जीवन न जीना पड़े। डाॅ. अंबेडकर की दृष्टि में वे सभी भारतीय स्त्रियां दलित श्रेणी में थीं जो दूषित सामाजिक नियमों एवं परंपराओं के कारण अपने अधिकारों से वंचित थीं। वे समाज के हर वर्ग की स्त्रियों को अधिकार दिलाना चाहते थे। वे जानते थे कि यदि समाज को सुधारना है तो स़्ियों की स्थिति को भी सुधारना होगा।
बाबासाहेब डाॅ. अंबेडकर यह भली-भांति समझ गए थे कि जब तक स्त्रियों का ध्यान शिक्षा की ओर नहीं जाएगा तथा वे आत्मसम्मान को नहीं जानेंगी तब तक स्त्रियों का उद्धार संभव नहीं है। वे स्त्रियों को शिक्षा के महत्व से परिचित कराते थे। उन्होंने शिक्षा के साथ ही जीवन की उन बुनियादी बातों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया जिन पर आमतौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। वे जहां भी, जो भी समझाते, एकदम स्पष्ट शब्दों में, जिससे उनकी कही हुई बातों का स्त्रियां सुगमता से समझ जातीं और आत्मसात करतीं। डाॅ. अंबेडकर ने महाड में चर्मकार समुदाय की स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ‘‘साफ-सुथरा जीवन व्यतीत करो। इसकी कभी चिंता न करो कि तुम्हारे वस्त्र फटे-पुराने हैं। यह ध्यान रखो कि वे साफ हैं। आपके वस्त्र की स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता और न ही कोई तुम्हें जेवरात के चुनाव से रोक सकता है। अपने मन को स्वच्छ बनाने का ध्यान रखो और आत्म सहायता की भावना अपने में पैदा करो।’’
बाबा साहब जानते थे कि स्त्रियों को सबसे अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है जब उनके पति या पुत्र शराबी होते हैं। वे रोज रात को घर पहुंचने पर अपनी पत्नी के साथ मारपीट करते हैं और उनसे घरखर्च के पैसे भी छीन लेते हैं। स्त्रियां चुपचाप सबकुछ सहती रहती हैं। अतः महाड की सभा में डाॅ. अंबेडकर ने यह भी कहा था कि ‘‘तुम्हारे पति और पुत्र शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो। अपने बच्चों को स्कूल भेजो। स्त्री-शिक्षा उतनी ही आवश्यक है जितनी कि पुरुष शिक्षा।’’ 
डाॅ. अंबेडकर जिन दिनों जनजागरण अभियान के अंतर्गत मध्यप्रदेश, मुंबई और मद्रास (अब चेन्नई) का तूफानी दौरा कर रहे थे, उन दिनों उन्होंने मालाबार में दलित समुदाय की स्त्रियों को उन्होंने अपने भाषण के द्वारा समझाया कि ‘‘तुम्हारे गांव में ब्राह्मण चाहे कितना भी निर्धन क्यों न हो अपने बच्चों को पढ़ाता है। उसका लड़का पढ़ते-पढ़ते डिप्टी कलेक्टर बन जाता है। तुम ऐसा क्यों नहीं करतीं? तुम अपने बच्चों को पढ़ने क्यों नहीं भेजतीं? क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारे बच्चे सदैव मृत पशुओं का मांस खाते रहें? दूसरों का जूठन बटोर कर चाटते रहे?’’
19 जुलाई 1942 को नागपुर में सम्पन्न हुई ‘दलित वर्ग परिषद्’ की सभा में उपस्थित हजारों स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए डाॅ. अंबेडकर ने कहा था,‘‘नारी जगत् की प्रगति जिस अनुपात में हुई होगी, उसी मानदण्ड से मैं उस समाज की प्रगति को अंाकता हूं।’’
नागपुर सभा में ही डाॅ. अंबेडकर ने ग़रीबीरेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था कि ‘आप सफ़ाई से रहना सीखो, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह की जल्दी मत करो और अधिक संताने पैदा मत करो। पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति के कार्य में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए। लेकिन यदि पति गुलाम के रूप में बर्ताव करे तो उसका खुल कर विरोध करो, उसकी बुरी आदतों का खुल कर विरोध करना चाहिए और समानता का आग्रह करना चाहिए।’
डाॅ. अंबेडकर के इन विचारों को कितना आत्मसात किया गया इसके अंाकड़े घरेलू हिंसा के दर्ज़ अंाकड़ें ही बयान कर देते हैं। जो दर्ज़ नहीं होते हैं ऐसे भी हजारों मामले हैं। सच तो यह है कि स्त्रियों के प्रति डाॅ. अंबेडकर के विचारों को हमने भली-भांति समझा ही नहीं। उनके मानवतावादी विचारों के उन पहलुओं को लगभग अनदेखा कर दिया जो भारतीय समाज का ढांचा बदलने की क्षमता रखते हैं। जिन चैराहों पर डाॅ. अंबेडकर की प्रतिमा पूरे सम्मान के साथ लगाई गई उनके आस-पास बसी बस्तियों में गंदगी के अंबार को वहंा के निवासी ही दूर नहीं कर पाते हैं। गरीबीरेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों में बच्चों की संख्या के विषय में कोई रोक-टोक नहीं है। अधिक हुआ तो ‘‘जितने हाथ-उतना काम’’ वाला मुहावरा ओढ़ लेते हैं। स्त्री-पुरुष की जिस समानता की कल्पना डाॅ. अंबेडकर ने की थी वह भी बहुसंख्यक परिवारों में आज भी नहीं है। पुरुष घर का मुखिया है, स्त्री को बराबरी का आर्थिक अधिकार भी नहीं है, भले ही वह कमाऊ स्त्री हो।
वे रुढ़िवादियों से इन प्रश्नों के तार्किक उत्तर पूछते थे कि क्यों स्त्रियों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जाए? इस प्रश्न का सटीक एवं तार्किक उत्तर किसी के पास नहीं था।
हिन्दू समाज में ही नहीं अपितु भारतीय समाज के सभी वर्गों की स्त्रियों की दशा सुधारने की दिशा में डाॅ. अंबेडकर ने ध्यान दिया। वे मुस्लिम समाज में स्त्रियों की पिछड़ी दशा के प्रति भी चिन्तित थे। अंबेडकर ने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुव्र्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा, ‘‘बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किए जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। हालांकि कुरान में वर्णित ग़ुलामों के साथ उचित और मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसा योग्य हैं लेकिन, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। यदि गुलामी खत्म भी हो जाए पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जाएगी।’’
डाॅ. अंबेडकर मुस्लिम स्त्रियों को गुलामों जैसी दशा से मुक्त कराना चाहते थे। उन्होंने अपने लेखों में मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है। अतः भारतीय मुसलमानों को भी अपनी स्त्रियों की दशा सुधारने के बारे में विचार करना चाहिए। आगे चल कर डाॅ. अंबेडकर के इन सकारात्मक विचारों का मुस्लिम समाज सुधारकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डाॅ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में एक समिति की स्थापना की गई। डाॅ. अंबेडकर स्त्री-पुरुष समानता के अग्रदूत थे। वे स्त्रियों विकास में बाधा के लिए धर्म व जाति प्रथा को दोषी मानते थे। वे जानते थे इन बाधाओं को संवैधानिक ढंक से ही दूर किया जा सकता है। उन्होंने जाति-धर्म व लिंग निरपेक्ष संविधान में उन्होंने सामाजिक न्याय की पकिल्पना की। हिन्दू कोड बिल के जरिए उन्होंने  संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य किया। डा. अंबेडकर  ने महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्रदान कर उनकी राजनैतिक अधिकारों की। हिन्दू समाज के लिए कोई पर्सनल लाॅ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह, उतराधिकार, दत्तक, निर्भरता या गुजारा भत्ता  आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष पर कोई सीमा नहीं थी। विधवा को मृत पति के संपत्ति  पर अधिकार नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परंपरा नहीं थी। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रख कर हिन्दू कोड बिल तैयार किया गया जिसमें में हिन्दू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, गोद लेना (दत्तक  ग्रहण) अधिनियम,  हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण उतराधिकारी अधिनियम, हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि का प्रवधान था। डाॅ. अंबेडकर ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विरोध की लहर दौड़ गई। धार्मिक कट्टरपंथियों से लेकर आर्यसमाजी तक डाॅ. अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद में भी इस बिल का विरोध किया गया और सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। किन्तु डाॅ. अंबेडकर अडिग रहे। उनका कहना था कि-‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।’’
डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल विधेयक को विखंडित करके लागू किए जाने के विरोध में नेहरू मंत्रिमण्डल से अपना त्यागपत्र भी दे दिया था। अंततः सरकार को हिन्दू कोड बिल विधेयक पास करना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के के रूप में महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है।  न्यायशास्त्र की दृष्टि से ‘‘रामायण’’ का विश्लेषण करते हुए किन्तु डाॅ. अंबेडकर ने कहा कि ‘‘अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।’’ उनके ऐसे शब्द श्रीराम के विरोध में नहीं बल्कि स्त्रियों के प्रति उनकी तीव्र मानवीयता की ओर संकेत करते हैं जो तत्कालीन सामाजिक दुरावस्थाओं से पीड़ित थीं। वस्तुतः डाॅ अंबेडकर स्त्री-अधिकारों के प्रबल पक्षधर थे।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 15.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, April 14, 2026

पुस्तक समीक्षा | जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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विशेषांक - समय के साखी (जेंडर डिस्कोर्स पर केंद्रित)
संपादक - आरतीे
प्रकाशक - संपादकीय कार्यालय, 701, अन्नपूर्णा परिसर, पीएण्डटी चौराहा के पास, भोपाल (म.प्र.) 462003
मूल्य - 300/-
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         आरती जी के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका “समय के साखी” का 57 वां अंक सागर के वरिष्ठ कवि वीरेंद्र प्रधान जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ। वस्तुतः यह अंक सामान्य अंक न होकर विशेषांक है और वह भी जेंडर डिस्कोर्स पर। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सभी को गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से अब, जब जेंडर को लेकर नए अधिनियम आकार ले रहे हैं। वीरेंद्र प्रधान जी ने “समय के साखी” पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक इस आग्रह के साथ दिया कि मैं इस विशेषांक के संबंध में कुछ समीक्षात्मक लिखूं। चूंकि जब मैं सामयिक प्रकाशन की साहित्यिक पत्रिका “साहित्य सरस्वती’’ (नई दिल्ली) की कार्यकारी संपादक थी तब पत्रिका के संपादक महेश भारद्वाज जी के निर्देशन में थर्ड जेंडर विमर्श विशेषांक प्रकाशित किया गया था। बाद में विशेषांक की सामग्री के अलावा कुछ और विद्वानों से लेख आमंत्रित करके कलेवर को “थर्ड जेंडर विमर्श” पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। ताकि शोधार्थियों एवं जेंडर डिस्कोर्स में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष एवं तार्किक जानकारी एक ही ज़िल्द में उपलब्ध हो सके। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है तो मेरा लेखन एवं सामयिक प्रकाशन का मुख्य प्रकाशन स्त्री विमर्श पर ही केंद्रित रहा है। इसलिए ‘‘समय के साखी’’ पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक मेरे लिए दिलचस्प का विषय था। फिर भाई वीरेंद्र प्रधान जी का आग्रह भी था। परिणामतः मैंने विशेषांक को एकाग्रचित्त हो कर आद्योपांत पढ़ा। विशेषांक में स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श दोनों मौजूद हैं। मुझे भी लगा कि इस पर अवश्य लिखा जाना चाहिए।
   दिलचस्प बात यह है की ट्रांसजेंडर को लेकर विगत दिनों अधिनियम 2026 पर बड़ा बवाल मचा। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, 2019 के कानून को बदलकर पहचान के लिए स्व-घोषणा की जगह मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य किय गया है। इस प्रस्तावित बदलाव का ट्रांसजेंडर समुदाय विरोध कर रहा है क्योंकि उनका मानना है कि यह आत्म-निर्णय के अधिकार को सीमित करता है। यह बिल 13 मार्च 2026 को पेश किया गया था। यह कानून 2014 के ‘‘नालसा’’ (नेशनल लीगल सर्विसेस अथरिटी) फैसले का उल्लंघन माना जा रहा है, जिसने पहचान के स्व-निर्धारण को मान्यता दी थी। समुदाय द्वारा ‘‘काला कानून’’ कह कर इसे आत्म-सम्मान के खिलाफ भी कहा गया। वही दूसरा विषय है स्त्रियों के अधिकारों का ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ (106वां संवैधानिक संशोधन) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लागू किया जाना है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इस कानून का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से मिलना शुरू हो सकता है। यह कितने प्रतिशत महिलाओं को सशक्त बना सकेगा यह तो भविष्य ही बताएगा किंतु इससे महिलाओं की सभी सहभागिता राजनीति में बढ़ेगी।
    स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श यह दोनों विषय विशेषांक में शामिल हैं। इन पर विद्वानों ने अपनी अपनी राय दी है। देखा जाए तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिला जनसंख्या लगभग 58.64 करोड़ (कुल जनसंख्या का 48.5 प्रतिशत) थी। 2021 में 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों 985 पाया गया है। वहीं, सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आधिकारिक संख्या 4.88 लाख थी। हालांकि, कार्यकर्ता और विभिन्न अनुमान बताते हैं कि सामाजिक कलंक और पहचान के मुद्दों के कारण वास्तविक संख्या इससे 6-7 गुना अधिक हो सकती है। सटीक सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
विशेषांक में समाज में जेंडर के अनुपात, उनकी स्थितियों एवं उनके जीवन की प्रगति की संभावनाओं पर विचार किया गया है। जो आलेख इसमें शामिल किए गए हैं वे हैं- बंदीगृह की औरतें और खामोशी का विमर्श- प्रज्ञा जोशी, जिंदा कौमों की मुर्दा दास्तान- नाइश हसन, वे बहादुर स्त्रियाँ- हिन्दी कहानी में घुमंतू समुदाय, स्त्री और पुलिस- रमाशंकर सिंह,  ट्रांसजेंडर और समाज मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत- अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’, दलित स्त्री का ‘अन्य’ आत्मकथा-संदर्भ- डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, इकोफेमिनिज्म: स्त्री और प्रकृति का पक्षधर-सुरेश तोमर, राष्ट्रवादी उन्माद के दौर में मुस्लिम स्त्री - समीना खान, संघर्ष से कामयाबी तक का लंबा सफर- सुमित पी.वी., पितृसत्ता: विचारधारा-आलोचना के नए आयाम- ईश्वर सिंह दोस्त, समकालीन भारतीय स्त्री आंदोलन- अवंतिका शुक्ला।
आलेखों के साथ ही दो वर्ताएं -‘‘बातचीत-एक’’ तथा ‘‘बातचीत-दो’’ हैं। जिनमें ‘‘बातचीत-एक’’ में सविता सिंह, सीमा आजाद, रेखा सेठी, रेखा कस्तवार, संजीव चंदन के विचार हैं तथा ‘‘बातचीत-दो’’ में वंदना चौबे, जितेन्द्र विसारिया, अनुपम सिंह एवं नेहा नरूका के विचार हैं। 
‘‘लेखा-जोखा’’ के अंतर्गत ‘‘कुछ पहाड़ लाँधे हैं, अभी बाकी हैं बहुत....’’ शीर्षक से सुधा अरोड़ा के ज़मीनी विचार हैं। इसके साथ ही ‘‘प्रसंग: आलोचना’’ के अंतर्गत माया मिश्र ने लिखा है ‘‘स्त्री रचनात्मकता: किताबों के आलोक में’’।
लेखक रामशंकर सिंह का यह कथन ध्यान देने योग्य है-‘‘पितृसत्तात्मक परिवारों में महिलाओं को अपना ताबेदार बनाया और इस ताबेदारी को लिखने की प्रक्रिया से और ताकत मिली। सब कुछ लिख दिया गया- कौन स्वामी, कौन सेवक, किसको किस जगह पर रखा जाना है- यह सब लिखा गया। उन समाजों में जहाँ लेखन कला नहीं थी, वहाँ ‘परम्परा के भीतर’ स्त्रियों की ताबेदारी को सुरक्षित रखा गया। यह अनायास नहीं था कि मानवविज्ञानी लेवी स्ट्रॉस को कहना पड़ा कि एक केंद्रीकृत, पदानुक्रमित राज्य अपने आपको पुनरुत्पादित करने के लिए लेखन कला का प्रयोग करता है...। लेखन एक अजीब चीज है...। एकमात्र घटना जो इसके साथ हमेशा जुड़ी रही है, वह है शहरों और साम्राज्यों का निर्माण राजनीतिक व्यवस्था में एकीकरण, अर्थात् बड़ी संख्या में व्यक्तियों का जातियों और वर्गों के पदानुक्रम में एकीकरण। यह मानवजाति के ज्ञानोदय की अपेक्षा शोषण को ही बढ़ावा देने के लिए प्रतीत होता है।’ वास्तव में पहले परम्परा और बाद में लिखित संहिताओं में स्त्रियों के लिए ताबेदारी की इबारतें तैयार की गई। इसे आप अनुभवमूलक तरीके से उस समय लक्षित कर सकते हैं, जब कहा जाता है कि ‘ऐसा हमारे ग्रंथों में कहा गया है’ ‘हमारी परम्परा में ऐसा है’ या ‘हमारे यहाँ तो ऐसा था।’ इन सारे तर्कों में लेखन कला, समाज का वर्चस्वशाली सांस्कृतिक तंत्र और राज्य भूमिका निभाते हैं।’’
सक्रिय समाजसेवी, लेखिका एवं स्त्री अधिकारों की पैरोकार सुधा आरोड़ा ने स्त्रीमुक्ति - ‘‘कुछ भ्रांतियाँ और सुझाव’’ शीर्षक से स्त्री विमर्श के स्वरूप की बारीकी से व्याख्या की है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘स्त्री विमर्श दरअसल पितृसत्ता, सम्पत्ति में भागीदारी और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों की बराबरी और सम्मान का मुद्दा है। भारत में स्त्री का अस्तित्ववादी संघर्ष बहुत पुराना है। बौद्धकाल से लेकर वैदिक काल और मध्यकाल तक इसके अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा, लोपा, अनेक थेरियों सहित सारन्धा, अहिल्याबाई से लेकर रजिया सुल्तान तक हम एक परंपरा देख सकते हैं कि स्त्रियों ने सोच और सत्ता दोनों ही स्तरों पर संघर्ष किया। मीराबाई, अक्क महादेवी, ललद्यद, जनाबाई और बहिणा बाई दर्जनों नाम हैं। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में इन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्नों को जोड़कर स्त्री मुक्ति का एक वृहद पाठ तैयार नहीं किया जा सका इसलिये लिंगभेद के खिलाफ भारत में संघर्ष की परंपरा को बल न मिल सका।’’  सुधा आरोड़ा ने आगे लिखा है कि ‘‘स्त्रियों में बदलाव आया पर इस बदलाव के लिये हमारा समाज तैयार नहीं है। उन्होंने घर की चहारदीवारी के साथ अर्थ उपार्जन में भी हाथ बंटाया पर यह दोहरी जिम्मेदारी भी उसे अपना सम्मान दिलाने में नाकाम रही। दिक्कत यह है कि स्त्री की दशा में सुधार, समाज और पुरुषों की मानसिकता को बदले बिना नहीं हो सकता और समाज पुरुषसत्तात्मक है और आंदोलनकारी स्त्रियों की जमात को पीछे धकेलने में पुरुषों का ही नहीं, पुरुष सोच वाली महिलाओं का भी बहुत बड़ा हाथ है। यह एक अलग मुद्दा है।’’
ट्रांसजेंडर की जब बात आती है तो भारत के प्ररिप्रेक्ष्य में वह और अधिक जटिल हो जाती है। सच तो ये है कि आज भी यहां लोग ट्रांसजेंडर की जैविक विविधता को नहीं जानते और समझते हैं। उनके लिए एक ट्रांसजेंडर मात्र ट्रांसजेंडर होता है, नाच-गा कर नेग के पैसे मांगने वाला समुदाय। इस संदर्भ में अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ का लेख ‘‘ट्रांसजेंडर और समाज: मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत’’ बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ट्रांस जेंडर शब्द को लेकर समाज के आम लोग अक्सर भ्रम की स्तिथि में होते हैं। वे ट्रांस जेंडर केवल उन्हें समझते हैं जो किन्नर के रूप में नाच-गाकर बधाई माँगने का काम करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ट्रांस जेंडर में वे सभी व्यक्ति आते हैं जिनका जन्म से प्राप्त लिंग उनके मनोवैज्ञानिक लिंग अर्थात जेंडर से मेल नहीं खाता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ लेकिन वह व्यक्ति जेंडर से खुद को एक स्त्री महसूस करता है या एक स्त्री शरीर में जन्मा व्यक्ति खुद को पुरुष अनुभव करता है। अर्थात जिन व्यक्तियों की लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती ऐसे सभी व्यक्ति ट्रांस जेंडर होते हैं। ट्रांस जेंडर में अलग अलग श्रेणियों के लोग सम्मिलित हैं।’’ उन्होंने ट्रांस महिला, ट्रांस पुरुष, इंटर सेक्स, ट्रांस सेक्सुअल  में बायोलाॅजिकल अंतर बताते हुए ‘‘हिजड़ा या किन्नर’’ को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘हिजड़ा शब्द अरबी भाषा के हिज से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विछोह, विरह या छोड़ देना। वैसे हिजड़ा या किन्नर अपने आप मे कोई जेंडर नहीं। यह एक गुरु-शिष्य आधारित परम्परा है। जो परंपरा सदियों पुरानी है। वर्तमान में यह परम्परा भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बंग्लादेश में है, इस परम्परा को केवल ट्रांस महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं।’’
यहां उल्लेखनीय है कि अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ स्वयं ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं। उन्होंने एमकॉम, एमए (भारतीय शास्त्रीय संगीत में) जबलपुर से किया है। वे कई वर्षों तक किन्नर डेरे में रहीं। 2007 में डेरा छोड़ कर ट्रांस जेंडर अधिकारों पर एक कार्यकर्ता के रूप में में काम की शुरुआत की। 2011 में ‘‘अस्मान फाउंडेशन’’ नाम से समुदाय आधारित संगठन की स्थापना की जो वर्तमान में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर कार्य कर रहा है। वे सामाजिक न्याय विभाग द्वारा गठित जिला किन्नर कल्याण बोर्ड में समुदाय की प्रतिनिधि सदस्य भी हैं। उन्होंने कविताएं एवं ग़ज़लें भी लिखी हैं। देखा जाए तो वे अपने समुदाय की एक बौद्धिक प्रतिनिधि हैं। इस विशेषांक में उनका लेख ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति को आधिकारिक रूप से सामने रखता है।
जैसाकि ‘‘समय के साखी’’ की संपादक आरती ने लिखा है-‘‘विशेषांक में बातचीत के दो भाग वरिष्ठ और युवा साथियों के साथ अलग-अलग रखकर, खासतौर पर चार दशक के स्त्री चिंतन, चुनौतियों और अभी तक के हासिल को समझने की कोशिश की गई है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जो लोग लगातार जेंडर जस्टिस पर काम करते आए हैं, उनके विचारों की समानता और विभिन्नता को जाना जा सके।’’ इस दृष्टि से ‘‘समय के साखी’’ का यह ट्रांसजेंडर डिस्कोर्स विशेषांक पठनीय होने के साथ-साथ संग्रहणीय भी है तथा शोधार्थियों के लिए तो बेहद उपयोगी है।    
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Saturday, April 11, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | मोसम बदलो, बे बदले मनो आप अपनो ख्याल राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

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मोसम बदलो, बे बदले मनो आप अपनो ख्याल राखियो

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    मोसम फेर के गरम होन लगो आए। घाम मूंड़ चटकान लगो आए। सो, तनक सावधानी तो राखने परहे ने तो तबीयत खराब होबे में देर न लगहे। सेअत कैसे सई राखी जाए ऊके बारे में घाघ औ भड्डरी ने भौतई नोंने उपाय बताए हैं। ऊमें से कछू तो हमने पिछली हप्ता बताई रई, आज सोई कछू बताहें, मनो पैले उनकी बतकाव कर लई जाए जोन बदल गए। आईजी मैडम सो रिटायर हो के चली गई, सो लगो के बड़ी कुर्सी पे कोनऊं मैडम ने रैहें तो सूनो लगहे। मनो अब जी जुड़ाओ के कलेक्टर मैडम इते आ रईं। बाकी अबे लौं जो कलेक्टर साब रए उनखों ले के पब्लिक बड़़ी कनफुजिआत रई। मने पब्लिक खों खुदई पता न परत्ती के बा कलेक्टर साब से खुस आए के खफा आए? मनो बे अपनी समझ की डबिया अबे बी खोले से डरा रए के कऊं बे फेर के लौट ने आएं। अब ईको का मतलब आए बा आप ओरें अटकलें लगाइयो। हम तो अब कर रए सेअत की बतकाव।
भुनसारे खटिया से उठि के पिये तुरतै पानी।
ऊके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के जानी।।
मने जो संकारे से उठ के सबसे पैले पानी पीयत आए बा कभऊं बीमार नईं परत आए औ ऊके घरे कभऊं बैद मने डाक्टर नई आत आएं। मनो आज के जमाना में डाक्टर ऊंसईं घरे नईं आत आए। औ कऊं आबे को भूले से मान गओ तो तगड़ी फीस ले लेत आए। जेई से सेअत के लाने एक कहनात औ गांठ बांध लेओ-
जेठ मास जो दिन में सोए।
ऊको जर असाढ़े  रोए।।
सो, सई टेम पे सोओ, सही टेम पे उठो करे औ धूप-गरमी से अपनो बचाव करियो, सो सब ठीक रैहे। राम-राम !
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Thank you Patrika 🙏
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