Thursday, March 19, 2026

बतकाव बिन्ना की | ब्याओ की दावतें, माई को दिवारा औ लाड़लो बन्नू | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
ब्याओ की दावतें, माई को दिवारा औ लाड़लो बन्नू
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘रामधई! अब कछू नई हो सकत। बे ओरें मोरी काय सुनहें? उने तो अपनी परी है। बस, कहत भर के लाने हैं नोने भैया, बाकी नोने भैया की परवा कोनऊ को नईयां।’’ नोने भैया बड़बड़ात भए मोरे दरवाजे के आगूं ठाड़े हते। बड़बड़ा काए मनो चिचियां रये हते। तभई तो उनकी आवाज मोरे कान लों पोंच गई। मों पे हुन्ना बंधो हतो, फेर भी उनको चिचियानो मोये समझ में आ गओ। मोसे न रही गई सो मैंने तो पूछई लई, ‘‘काय नोने भैया, का हो गए? काय के लाने बमकत फिर रए?’’
‘‘अरे हम काय बमकें बिन्ना? बमके हमारे दुस्मन।’’ नोने भैया ठसक के बोले।
‘‘सो फेर काए चिचियां रये?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम कहां चिचिया रये?’’ नोने भैया फेर के मुकर गये।
‘‘सो, जे को आ बोल रओ के अब कछू नई हो सकत? अब कछु बता बी देओ, भैया! मन की मन में नईं रखी जात। मोरे लाने कछु काम होय तो बताओ।’’ मैंने नोने भैया से कही।
‘‘अब का बताऊं बिन्ना! बड़े बुरै दिन आ गए। हमाई तो कोऊ सुनतई नईयां।’’ नोने भैया बोले।
‘‘ऐं? ऐसो का हो गओ? तुमाई तो सबई सुनत आएं? जे ऐसई काय कै रै?’’ नोने भैया बुझउव्वल-सी बुझा रए हते, सो मोए झुंझलाहट हो लगी, ‘‘अब कछु तो बोलो नोने भैया, जे ऐसई पहेलियां न बुझाओ। बाकी न बताना होय सो, न बताओ, मोय सोई टेम नइयां तुमई फालतू की बातें सुनबे के लाने।’’ मैने सोई नोने भैया खों तनक हड़काओ।
‘‘जे का बात भई बिन्ना? पैले तो पूछ रई हतीं, ओ अब कै रईं के तुमाये लाने टेम नइयां। जे तो गल्त बात आए।’’ नोने भैया ने बुरऔ सो मों बनाओ।
‘‘अब तुमई तो मों नई खोल रये। कछु बताओ तो सुनी जाये।’’ मैंने कही।
‘‘अरे, सुनाबे के लाने का है बिन्ना, भौतई बुरै दिन आ गए हैं। सोच-सोच के कलेजो फटत आए। जी तो करत आये के उन सबई जने को मार-मार के मुर्गा बना दओ जाए। चले हैं ब्याओ करने।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कोन को मारबे को जी रओ तुमाओ? और कोन को ब्याओ करा रये?’’ मोए नोने भैया की बातें कछु समझ ने आईं।
‘‘हम काये करा रये ब्याओ? बे ओरे करा रये। हमाओ बस चले तो कोनऊ को ब्याओ न होन देवे।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कोन के ब्याओ की कै रये, भैया? कछु साफ तो बोलो।’’
‘‘अरे, बे रहली वारी फुआ की बिटिया को ब्याओ होने वारो है।’’ नोने भैया कसमसात भए बोले।
‘‘काय, बोई वारी बिटिया, जोन के लाने तुमने फुआ की खूब सेवा करी हती?’’ मोये हंसी आ गई।
‘‘हओ तो, बोई वारी। बाकी हमें अब ऊसे कोनऊ लेबो-देबो नइयां। ऊने जब लों हमाए लाने मना कर दओ, तभई से हमने ऊके घरे ढूंको लो नइयां।’’ नोने भैया बोले।
‘‘सो, अब परेसानी का आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘परेसानी तो भौतई बड़ी कहानी। मोये तो जे नई समझ में आ रओ के मोय ठुकरा दओ, कोनऊं गिला नइयां। पर कोन ने कई के ब्याओ कराओ औ मोए न्योतो ने भेजो।’’ नोने भैया चिढ़त भये बोले।
‘‘कछू बात हुइये।’’ मैंने कहीं।
‘‘का बात हुइए? हप्ता भरे पैलें ऊके बापराम मिले हते। बे बोले के हमें रासन वारी सस्ती शक्कर देवा देओ। मोड़ी के ब्याओ के लाने चाउने। जा सुन के हमाओ जी करो के हम उनसे कएं के दद्दा अपनी मोड़ी हमें देत तो बनो नईं औ शक्कर मंगात सरम नईं आ रई? मनो हमने ऐसो गओ नईं। काए से के हमें लगो के कछू बी होए मनो बे हमाए एक्स जानू के बापराम आएं सो हमें उनके लाने शक्कर को जुगाड़ करो चाइए। सो हमने जुगाड़ कर दओ। ऊ दिनां से रोज हम परखे बैठे के उनके इते से अब ब्याओ को न्योतो आहे, तब आहे, मनो काय को? बे तो हमें भूलई गए।’’ नोने भैया उदासे से बोले। 
‘‘अपनों जी दोटो ने करो। हुइए कछू कारण। मनो उन्ने जो आप से मदद लई सो उने न्योतो तो भेजबो चाइए तो।’’ मैंने नोने भैया से कई।
‘‘जेई से तो हमाओ दिमा्र खराब भओ जा रओ।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कओ उने लगो होए के आप अपनी जानू खों दूजे की दुल्हन बने ने देख पाहो, सो बे आपखों नईं न्योत रए।
‘‘बा दुल्हन बने, चाये कछू बने, मोये दुख नई होने। जी तो जे लाने मसक रओ के का जमाना आ गओ? एक जमाना हतो जब दस दिनां में बीस ब्याओ जीम लेत ते। ओ अब जे जमाना आ गओ के हमाई जानूं के ब्याओ में हमें नईं बुलाओ जा रओ। हमाओ जी तो तरसहे ब्याओ की दावत खाबे के लाने। सबई खों न्योत रए औ मोये तरसा रये।’’ ठंडी सांस भरत भए नोने भैया बोले।
‘‘ऐं? सो भैया तुम ब्याओ की दावत के लाने रो रये? ओ हमने सोसी के ऊ फुआ की बिटिया के लाने...।’’मोए अचरज भओ।
‘‘अरे, तुमने सोई भली चलाई। ऐसी तो बिटियां मुदकी फिरत मोरे आंगू-पीछूं पर ब्याओ की दावतें सबई की थेड़ी मिलत आएं। सो हम तो कै आए फूफा से के जो हमाई जानू को ब्याओ करा रए तो हमें न्योतो देओ ने तो ब्याओ ने होन देबी। बस, जेई सुन के फूफा ने जूता फेंक के मारो मोए, वो तो लगो नइयां। बाकी ई समै बयाओ करा के बे गल्त कर रये।’’ कहत भये नोने भैया सो आगे बढ़ गये और मैं सोसत रै गई के वाह रे नोने भैैया, इने प्रेमिका को ब्याओ को गम नइयां, गम आये सो ब्याओ की दावत ने मिल पाबे को। बाकी मोए नोने भैया पे दया सी आई सो मैंने उने पांछू से आवाज़ लगाई।
‘‘का आए?’’ नोने भैया ने मुंड़ के देखो औ पूछो।
‘‘बात जे आए नोने भैया, के मोसे आपको जो दुख देखो नई जा रओ। सो आपके लाने मोए एक तरीका सूझो आए। कओ तो बताएं?’’ मैंने नोने भैया से कई।
‘‘अरे बताओ, का बता रईं?’’ नोने भैया पूछन लगे
आप ऐसो करो के नवरातें तो सुरू हो गई आएं औ आपकी जानू को ब्याओ नवरातों के बाद आए। सो आप चार-छै जांगो पे माई के दिवारे दरसन कर आओ। उते कछू न कछू परसात बंअत रैत आए, तुमाओ काम बन जैसे। ब्याओ की दावत नोंई सो मई के दिवारे को परसाद तो मिलई जाहे।’’ मैंने सलाय दई।
‘‘बात तो तुमाई ठीक आए। कछू नईं से, जो कछू मिले वोई ठीक आए।’’ नोने भैया खुश होत भए बोले। फेर बे बोले के,‘‘चलो हम माई के बड़े दिवारे से सुरू कर देत आएं।’’
बे तो उते से खुस होत भए चले गए, मनो मोए लगो के जे तो सरकार की लाड़ली बिन्ना घांईं लाड़लो बन्नू आए जोन को मुफत को खाबे की ऐसी लत लग गई के अपनी जानू के ब्याओ को न्योतो खाबे खों पगला रओ। मनो अब सरकार खों सोई ‘‘लाड़लो बन्नू योजना’’ चलाई दओ चाइए। आप ओरें सोई सोचियो ई बारे में।    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | देवी दुर्गा को बहुत प्रिय है बारले अर्थात जौ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस       
देवी दुर्गा को बहुत प्रिय है बारले अर्थात जौ
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह सिंह                                                                   
      नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही जौ के बीज ‘‘ज्वारे’’ के रूप में बोए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि जौ कितना महत्वपूर्ण अनाज है? आप कहेंगे कि हाँ! आजकल इसे मोटे अनाज के रूप में खाने पर जोर दिया जा रहा है। इसे स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि हमारे वैदिक साहित्य में इसे ‘‘ब्रह्मा का अन्न’’ माना गया है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ है। इसीलिए इसे यज्ञ, हवन और जवारों में भी पवित्र अनाज के रूप में शामिल किया जाता है और देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है।


     वर्तमान में पूरे विश्व में खाद्य समस्या और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए मोटे अनाज के उपयोग और उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। हमारे देश भारत में भी मोटे अनाज को खाद्यान्न के मूल आधार के रूप में देखा जा रहा है। ये मोटे अनाज हैं जौ, बाजरा, रागी आदि। ये सभी अनाज पहले हमारे भोजन की थाली में शामिल ते थे। लेकिन आधुनिकता और पाश्चात्य भोजन शैली के कारण ये हमारी भोजन की थाली से दूर होते चले गए। जबकि हमारे देश में, चाहे वे किसी भी धर्म से ताल्लुक रखते हों, सभी जानते हैं कि नवरात्रि की शुरुआत में ‘‘ज्वारे’’ बोए जाते हैं। यह एक तरह का धार्मिक अनुष्ठान है। इन बीजों को बोने का एक अर्थ यह भी है कि इससे देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अच्छी फसल का आशीर्वाद देती हैं। हालांकि इस संबंध में देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन सभी का मानना है कि देवी मां को जौ के बीज चढ़ाने से वे प्रसन्न होती हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ पसंद है। यह धरती पर उगाए जाने वाले सबसे पुराने अनाजों में से एक है। प्राचीन काल से ही इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता रहा है। संस्कृत में इसे ‘‘यव’’ कहा जाता है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और भारत में होता है।

नवरात्रि में जौ बोने का विशेष महत्व है। नवरात्रि में कलश और घटस्थापना के साथ ही घट में जौ (कभी-कभी गेहूं) बोया जाता है। मां दुर्गा को यह बहुत पसंद है। आइए जानते हैं क्या है इसका रहस्य। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ रूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत रखे जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में लोग अपने घरों में अखंड ज्योति जलाते हैं। साथ ही माता रानी के नौ रूपों की पूजा भी करते हैं। नवरात्रि में कलश स्थापना और जौ का बहुत महत्व होता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ ही जौ बोए जाते हैं। कहा जाता है कि इसके बिना मां अम्बे की पूजा अधूरी रहती है। कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। ऐसे में आइए आज जानते हैं कि नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक महत्व है?
जौ को भगवान ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तो वनस्पतियों में सबसे पहली फसल ‘‘जौ’’ ही थी। इसीलिए नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना के समय सबसे पहले जौ की पूजा की जाती है और कलश में भी इसे स्थापित किया जाता है।
पुराणों और वेदों में जौ (यव) को सबसे प्राचीन, पवित्र और पौष्टिक अन्न माना गया है, जिसे ‘‘यज्ञ का अन्न’’ कहा जाता है। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के समय जौ बोना धन-धान्य और समृद्धि का प्रतीक है। पुराणों के अनुसार, यह विष्णु का स्वरूप है और पितृ तर्पण में भी अनिवार्य है, जो यव-प्रिय (जौ को प्रेम करने वाला) कहलाता है।
सप्तधान्य श्लोक में यव यानी जौ का महत्व इन शब्दों में बताया गया है-
यवधान्यतिलाः कंगु मुद्गचणकश्यामकाः।
एतानि सप्तधान्यानि सर्वकार्येषु योजयेत्।।
(अर्थात जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना, और सांवा - ये सात प्रकार के धान्य सभी शुभ कार्यों में अनिवार्य हैं।)
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात।
- अर्थात अन्न ही ब्रह्म है। ऋग्वेद में जौ को दिव्य अन्न माना गया है।)
पौराणिक मान्यताओं में जौ को अन्नपूर्णा का स्वरूप माना गया है। शांति ऋषियों को सभी धान्यों में जौ सर्वाधिक प्रिय है। इसी कारण ऋषि तर्पण जौ से किया जाता है। पुराणों में कथा है कि जब जगतपिता ब्रह्मा ने ब्रह्मांड का निर्माण किया, तो वनस्पतियों के बीच उगने वाली पहली फसल जौ ही थी। इसी से जौ को पूर्ण सस्य यानी पूरी फसल भी कहा जाता है। यही कारण है कि नवरात्र में भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए जौ उगाए जाते हैं। सम्मान में किसी को सस्य देना अर्थात नवधान्य देना शुभ व कल्याणकारी माना गया है। नवरात्र उपासना में जौ उगाने का शास्त्रीय विधान है, जिससे सुख, और समृद्धि प्राप्त होती है। जौ को देवकार्य, पितृकार्य व सामाजिक कार्यों में अच्छा माना जाता है।

जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है, इसलिए जब भी देवी-देवताओं की पूजा या हवन किया जाता है तो जौ को ही अर्पित किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि जौ अन्न यानी ब्रह्मा के समान है और अन्न का हमेशा सम्मान करना चाहिए। इसलिए पूजा-पाठ में जौ का प्रयोग किया जाता है। नवरात्रि में कलश स्थापना के दौरान बोए गए जौ दो-तीन दिन में ही अंकुरित हो जाते हैं, लेकिन अगर ये अंकुरित न हों तो यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। ऐसी मान्यता है कि अगर दो-तीन दिन बाद भी अंकुर न निकलें तो इसका मतलब है कि कड़ी मेहनत के बाद ही फल मिलेगा। इसके अलावा अगर जौ उग आए हैं लेकिन उनका रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से आधा हरा है तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा तो ठीक रहेगा, लेकिन बाद में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। अगर बोए गए जौ सफेद या हरे रंग के उग रहे हैं तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। इसका मतलब है कि पूजा सफल रही। आने वाला पूरा साल खुशियों से भरा रहेगा। नवरात्रि के दिनों में कलश के सामने मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूं बोया जाता है और उसकी पूजा भी की जाती है। बाद में जब नौ दिन में जवारे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। देवी मां के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के लिए जब भी हवन किया जाता है तो उसमें जौ का बहुत महत्व होता है। जौ बोने से बारिश, फसल और व्यक्ति के भविष्य का भी अनुमान लगाया जाता है। कहा जाता है कि अगर जौ सही आकार और लंबाई में नहीं उगते हैं तो साल छोटा रहेगा और फसल भी कम होगी। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बोए गए जौ का रंग भी शुभ और अशुभ संकेत देता है। ऐसा माना जाता है कि अगर जौ का ऊपरी आधा भाग हरा और निचला आधा भाग पीला है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा अच्छा होगा और आधा मुश्किलों से भरा होगा। ऐसा माना जाता है कि अगर 2 से 3 दिन में जौ अंकुरित हो जाएं तो यह बहुत शुभ होता है और अगर आदि जौ नवरात्रि के अंत तक जौ नहीं उगते हैं, तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है। हालाँकि, कभी-कभी ऐसा होता है कि अगर जौ को ठीक से नहीं बोया है, तो भी जौ नहीं उगते हैं। इसके साथ ही, अगर जौ का रंग हरा है या सफेद हो गया है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल बहुत अच्छा होगा। इतना ही नहीं, देवी भगवती की कृपा से आपके जीवन में अपार सुख और समृद्धि आएगी। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान बोए गए जौ जितने अधिक बढ़ते हैं, उतनी ही अधिक देवी दुर्गा की कृपा बरसती है। यह इस बात का भी संकेत है कि व्यक्ति के घर में सुख और समृद्धि आएगी।

जौ बोने की रस्म हमें अपने भोजन और अनाज का हमेशा सम्मान करना सिखाती है। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि इस तरह खेती से न जुड़ा व्यक्ति भी खेती के काम को समझ पाता है। यहां तक कि परिवार के बच्चे भी ज्वार बोने और उसे हरा-भरा रखने में जरूरी सावधानियों को जान और समझ पाते हैं। स्वस्थ ज्वारे खेती के लिए मौसम को समझने में भी मदद करते हैं। जरा सोचिए जौ का मोटा अनाज कितना महत्वपूर्ण है, जिसे देवी मां को प्रसन्न करने के लिए उनके सामने उगाया जाता है और फिर नौ दिन बाद उन ज्वारों को देवी मां के साथ जल में विसर्जित कर दिया जाता है। यानी उन अनाजों को देवी मां के साथ ही भेज दिया जाता है, जैसे विदाई के समय रास्ते में किसी मेहमान को खाने के लिए खाना पैक करके दिया जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण अनाजों को हमें अपने रोजमर्रा के जीवन में अपनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि मोटा अनाज स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जौ जैसा मोटा अनाज खाने के बहुत लाभ हैं, जैसे- मोटे अनाज में प्रोटीन, खनिज, और विटामिन, चावल और गेहूं से तीन से पांच गुना ज्यादा होते हैं। मोटे अनाज में फाइबर काफी होता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। मोटे अनाज में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) होता है, जिससे मधुमेह की रोकथाम में मदद मिलती है। मोटे अनाज में कैल्शियम, आयरन, और जिंक जैसे खनिज होते हैं। मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और कैल्शियम की कमी को रोकते हैं। मोटे अनाज में मौजूद फाइबर की वजह से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, जिससे बार-बार खाने की जरूरत नहीं होती। मोटे अनाज खाने से एनीमिया का खतरा कम होता है। मोटे अनाज दिल के लिए भी अच्छे होते हैं।
खाद्य विशेषज्ञ मोटे अनाज खाने का तरीका भी सुझाते हैं। उनके अुनसार मोटे अनाज को हमेशा भिगोकर या अंकुरित करके खाना चाहिए। मोटे अनाज में फिटिक एसिड होता है, जो शरीर में बाकी पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं होने देता। लेकिन परंपरागत तरीकों से भी मोटे अनाज को खाया जा सकता है जैसे उबाल कर, पीस कर रोटी आदि के रूप में।

यही सब कारण हैं कि आजकल मोटे अनाज को स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ और इसकी भांति मोटे अनाज की श्रेणी में आनेे वाले अन्न ही हमें स्वास्थ्य एवं खद्यान्न संकट से भी उबार सकते हैं। अतः इस नवरात्रि से गर्व के साथ याद रखिए कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है और हम इसे उनके आशीर्वाद के रूप में अपनी खाद्यचर्या में शामिल कर सकते हैं।         
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(दैनिक, सागर दिनकर में 19.03.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, March 18, 2026

चित्रों के जरिए कलाकारों ने देशभक्ति और संस्कृति को रंगों में उतारा - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, कला समीक्षक | दैनिक भास्कर

🙏 हार्दिक आभार एवं धन्यवाद #दैनिकभास्कर  🌹🙏🌹
कला भवन आर्ट क्लासेस की श्रीमती स्वाति हल्वे एवं गुरुकृपा फाइन आर्ट के हेमंत ताम्रकार के संयुक्त प्रयास से आयोजित दो दिवसीय पेंटिंग एग्जीबिशन की मेरे द्वारा की गई समीक्षा एवं विस्तृत रिपोर्ट दैनिक भास्कर में फुल स्पेस के साथ....👍

🌹हार्दिक बधाई प्रिय स्वाति एवं हेमंत 💐
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Tuesday, March 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | सच की आंच में तपी हुई कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
सच की आंच में तपी हुई कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - वक्त की ही तू तलाश है
कवि - डाॅ. प्रदीप पाण्डेय
प्रकाशक -सुभारती प्रकाशन, डी ब्लाॅक, पाॅकेट 16, 153,सेक्टर-7, राहिणी, नई दिल्ली-85
मूल्य -350/-
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यह कहा जाता है कि सच कड़वा होता है। निःसंदेह जो लोग सच में कड़वाहट घोलने के लिए जिम्मेदार होते हैं उनके लिए सच कड़वा ही होता है। गोया वे अपना को कृत्य स्वयं देख, सुन नहीं सकते या सहन नहीं कर पाते हैं। ठीक वहीं दूसरी ओर जो सच की कड़वाहट से जूझता है और उस कड़वाहट को मिठास में बदलने की आकांक्षा रखता है उसके लिए यही कड़वाहट एक चुनौती होती है। कवि प्रदीप पांडेय की कविताओं में विपरीत परिस्थितियों के प्रति एक ललकार ध्वनित होती है।  प्रदीप पांडेय एक ऐसे रचनाकार है जो समाज में व्याप्त विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठाने में विश्वास रखते हैं। उनकी पहली कृति  ‘‘पक्षद्रोह’’ उपन्यास  के रूप में पाठकों के समक्ष आई, जिसमें उन्होंने न्याय, कानून  तथा सरकारी तंत्र में व्याप्त विसंगतियों पर करारा प्रहार किया था । उनका यह काव्य संग्रह ‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ लगभग उसी तेवर पर आधारित है। विधा उपन्यास के स्थान पर कविताओं में ढल गई है किंतु ललकार की ध्वनि वही है जो उनके उपन्यास में मौजूद है। इस इस संग्रह की कविताओं में कवि प्रदीप पांडेय ने बिना किसी संकोच के कठोर से कठोर शब्दों में उन लोगों को ललकारा है जो जागते हुए भी सो रहे हैं और अव्यवस्था को निरंतर अनदेखा किया जा रहे हैं। साहित्य में इस प्रकार के तेवर आज काम ही दिखाई देते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सीधे-सपाट तरीके से सच कहने का माद्दा रखते हैं। सृजन के दौरान जब भावनाएं पूरे आवेग से प्रभाव डाल रही हों तो शिल्प गौण होने लगता है लेकिन कविता वह विधा है जो शिल्प की गौणता को भी संभाल लेती है और एक वैशिष्ट्य में परिवर्तित कर देती है।
‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है कि प्रदीप पांडेय अपनी कविताओं में शब्दों से उलझाते नहीं हैं वरन वे अपनी बात स्पष्टता से कहते हैं। जैसे उनकी कविता है- ‘‘जिंदा हो कि मर गए हो’’ । इस कविता में बिना किसी लाग-लपेट के सीधे करारे शब्दों में कटाक्ष किया गया है-
सहमे - सहमे दुबके- दुबके
जियत हो कैंसें, तुम छुप-छुपके
कोई कांड कहूं, कछु कर गए हो
कछु तो बोलो !
जिंदा हो कि मर गए हो !
प्रदीप पांडेय की कविताओं में रोष का अपना एक अलग रंग है। ‘‘ये गधों की रेस है’’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं कि-
करता है जी
उठा लूँ बेसवाल या बल्ला
पकडू सिरमौरों को
जमाऊं रोज
चाहे करते रहें
अब्बा व लल्ला
फीलिंग्स है अंदर ही दम तोड़ देती है
जाने दो गुनहगारों ये सोचकर छोड़ देती है
आज हर शहर विकसित भी है और समस्याओं से जकड़ा हुआ भी ।अपने शहर को लक्षित करते हुए प्रदीप पांडेय उस सारी अव्यवस्था को लक्ष्य करते हैं जिसके कारण शहर कोलाहल से भरा हुआ होने पर भी निष्पंद और निःशब्द प्रतीत होता है। शहर में व्याप्त सारी सक्रियता थोथी नजर आती है। ‘‘ये मेरा शहर’’ कविता में देश-दुनिया के तमाम शहर समाए हुए हैं-
न सुने दर्द की आवाजें
न देखे दाग जिगर के
जिंदा जैसे दिखने वाले
है मुर्दे लोग शहर के
संग्रह की कुछ कविताओं में शब्दों का चयन जितना चैंकाता है, उतना ही गुदगुदाता भी है। जैसे ‘‘ऐ मुश्किलों’’ कविता में वे ‘‘दामाद’’ शब्द का प्रयोग करते हुए कवि ने मखमली प्रहार किया है-
ऐ मुश्किलों
ज्यादा न इतराओ
दामाद हूँ तुम्हारा
दूर कहाँ जाऊँगा
साथ तुम्हारा /मुझको भी
बहुत भाता है /कमजर्फ नहीं हूँ
तुमको जो भूल जाऊंगा।
संतान आयु में चाहे जितनी भी बड़ी हो जाए किंतु उसके लिए मां का आंचल सदा महत्वपूर्ण रहता है। हर संतान हर आयु में यही चाहती है कि उसकी मां हमेशा स्फूर्त, चैतन्य और युवा रहे तथा उसकी ममत्व की छांह हमेशा मिलती रहे। कवि की आकांक्षा भी यही है । ‘‘माँ तुम और बूढ़ी न होना’’ कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
थपकियां बनकर
मुझको सुलाती उंगलियां
कभी ‘‘मां’’ सिर पर
फेरा करती थी
तो सब कुछ भूल जाता
कैसे गिले कैसे शिकवे
कहां याद रहते
जब मै रोता
तो वो मुझको मनाती
ढेरों किस्से कहानी सुनाती।
संग्रह की छः कविताएं एक अलग ही धरातल की रोचक कविताएं हैं। ये सभी कविताएं मदिरा और मदिरा पान करने वालों पर केंद्रित हैं। जैसे - ‘‘हे मदिराप्रेमी’’, ‘‘मद्यासक्त’’, ‘‘मदिरादृष्टि’’, ‘‘मदिरा योग’’, ‘‘मद्याभिलाषी’’ तथा ‘‘हे मधुग्राही’’। ‘‘मद्याभिलासी’’ कविता में व्यंजना-अभिव्यंजना में निबद्ध शब्दावली  की छटा निराली है। यथा-
हे मद्याभिलासी !
मद्यसक्त धैर्य न खोना,
न छटपटाना
बरसती धूप हो या समंदर
तुम सूखे गले ठेके पे जाना
सरकार ने सजाये है ठेके
तुम्हारी आस विश्वास में
कैसा धर्म? कैसी नीति?
तुम तो बस! प्याले उठाना।
और अंत में उस कविता की चर्चा जो संग्रह की शीर्षक कविता है। ‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ कविता की भावभूमि सच की आंच में तप कर सुदृढ़ हुए व्यक्ति का आत्मपरिचय प्रस्तुत करती हुई हृदय में ओज का संचार करती है-
आज कर, इसी वक्त कर
एक प्रण! कर ठान ले ।
है तू ही य सर्वज्ञ जग में
आज इतना जान ले ।
उठ जिगर में, भरकर
आंधी बैठा क्यों, होकर
उदास है वक्त ने बोया है तुझको
वक्त की ही, तू तलाश है ।
कवि प्रदीप पांडे की कविताएं वर्तमान के प्रत्येक सच को खुलकर रेखांकित करती है तथा विसंगतियों को मिटाने का आह्वान करती हैं। कविताओं की भाषा सरल, सहज एवं आम बोलचाल की है। छंद मुक्त होते हुए भी इनमें एक प्रवाह है जो पाठकों को बांधे रखने में सक्षम है। यह संग्रह पठनीय है क्योंकि इसकी कविताओं में एक विशेष वैचारिक उद्वेलन है जो मानस को झकझोरता है और ठहर कर सोचने को विवश करता है।      
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Sunday, March 15, 2026

साहित्य अकादमी के "स्मरण मुक्तिबोध" में सारस्वत अतिथि डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"मुक्तिबोध न तो पूरी तरह  साम्यवादी थे और न वामपंथी, वे मूल रूप से सिर्फ मानवतावादी थे। यह बात उनकी कहानियां "ब्रह्मराक्षस का शिष्य" और "क्लॉड ईथरली" जैसी कहानियां पढ़ने के बाद भली-भांति समझा जा सकता है। मुक्तिबोध की रचनाओं को पुनर्व्याख्यायित किया जाना आवश्यक है।"- बतौर सारस्वत अतिथि मैंने मुक्तिबोध के व्यक्तित्व एवं विचारों पर अपने विचार रखे।
🚩अवसर था "स्मरण मुक्तिबोध" का। जिसकी अध्यक्षता की डॉक्टर हरिशंकर दुबे जी ने।
,🚩हार्दिक आभार मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक आदरणीय डॉ.विकास दवे जी, मुक्तिबोध सृजन पीठ के निदेशक आदरणीय ऋषि कुमार मिश्र जी एवं  श्यामलम संस्था सागर के अध्यक्ष आदरणीय उमाकांत मिश्र जी 🚩🙏🚩
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Saturday, March 14, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | पब्लिक खों अंधरा काए बनात रैत | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | पब्लिक खों अंधरा काए बनात रैत | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
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पब्लिक खों अंधरा काए बनात रैत
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         दो दिनां पैले की बात आए हम मकरोनिया चौराए से कढ़े, वा बी रात के साढ़े ग्यारा बजे। अब आप ओरें सोचहो के हम रात को साढ़े ग्यारा बजे उते कां फिर रए हते? काए से अपने इते को जो चलन आए के जोन बात जानो चाइए ऊ छोर के ई जानबे में ज्यादा मन लगत आए के को कां, काए को,  कोन के संगे घूम रओ तो? सो ऐसे जिज्ञासुअन के लाने बताबो जरूरी आए के हम अनरय करके बंडा से लौट रए हते। अनरय मने कोनऊं के घरे गमी के बाद को पैलो त्योहार। पर गई ठंड? चलो, अब आगे की असल बात सुनो के हमने मकरोनिया चौराए पे देखी के उते मसीन से गड्ढा सो खोदो जा रओ तो। बा देख के हमाए मों से निकरो के “इते जो का हो रओ?” जा सुन के हमाए डिराइवर भैया ने कई के “को जाने का करत रैत आएं? कभऊं गोलचक्का (रोटरी) पटा देत आएं, तो कभऊं जा तिकुनियां (आईलैंड) बना देत आएं। अब को जानें का कर रए?” 
     “हमें लगत आए के जे फेर के इते रोटरी बना रए।” हमाई संगवारी बोलीं। तभई हमाई संगवारी के संगवारे बोले के “हमें तो लग रओ के कछू पानी की पाईप को काम आए।” 
   “अरे नईं, आप ओरें का जानों के उने खुदई पता ने हुइए के बे इते काए के लाने गढ़ा खोद रए।” संगवारे के सालेजू ने ठिठोली करी। जा सब सुन के मोए बा एक हाथी औ चार अंधरा की किसां याद आ गई। जीमें चारों अंधरा हाथी खों थथोल-थथोल के अपनों-अपनों बखान करत आएं। बाकी अपने सागरे में सोई दसा अंधरन घांईं आए। करबे वारन के अलावा कोनऊं खों पतो नईं रैत के कब कां, का होन लगहे। पब्लिक को पइसा, मनो पब्लिक खों पैले नईं बताओ जात के का करबे जा रए। अरे एक ठइयां न्यूज छपाबे में का जा रओ? जे पब्लिक खों अंधरा सो काए बनात रैत आएं? तनक सोचियो!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, March 12, 2026

बतकाव बिन्ना की | उनें कुंआ चाउने, इनें फुआ चाउने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
उनें कुंआ चाउने, इनें फुआ चाउने
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
जब से ऊने लड़ाई छेड़ी आए, बस तभई से मोरो मुंडा खराब चल रओ। काए से के अपने ओरें लड़ाई-झगड़ा वारे जो नोंईं। राजी-खुसी बनी रए ओई अच्छो लगत आए। मनो बा पगलेट खों तो कछू औ सूझई नईं रओ। सबई खों लड़ाई के चूला में झोकबे खों उधारो खाओ फिर रओ। बाकी अपने इते होली के हुरियाने कोसिस तो करत रए के इते सबको जी अच्छो सो बने रए। काए से के अपन तो ठैरे व्रत-त्योहरन में अपनो जी लगा के अपनो दुख-पीरा से ध्यान बांटबे वारे। जेई से तो अपने बुंदेलखंड में मुतके टाईप के होरी गीत गाए जात आएं। तनक ध्यान करो ईसुरी को। उन्ने सोई फागें लिखीं, मनो जब लुगाइयन की होरी खोलबे की बात आई सो उन्ने राधा रानी के बहाने लुगाइयन को पावर दिखा दओ। बुंदेलखंड की राधारानी किसन भगवान जू से डरबे वारी नोंईं। जेई से ईसुरी ने लिखो के-  
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी
नैन नचाय कही मुसकाय -लला फिर आइयो खेलन होरी 
अब दम हो सो आएं गोविंद फेर के होरी खेलबे खों। ऊंसई तो गोविंद जू गोपियन के चीर के के दुपा देत्ते औ उने परेसान करत्ते, मनो होरी के टेम पे गोपियन ने उनसे बदला ले लओ। बे उने घरे भीतरे लिवा ले गईं औ अपने मन की कर डारी। गोविंद जू को पितांबर छीन लओ, गालन पे गुलाल मल दओ औ फेर अंखियां मटकात भईं बोली के ‘‘लला फेर आइयो खेलन होरी’’। 
आप ओरन ने बरसाने की लट्ठमार होरी के बारे में तो सुनो हुइए मनो अपने बुंदेलखंड में सोई लट्ठमार होरी होत आए। हऔ, झांसी जिला के पुनावली कलां गांव में होरी के टेम पे लुगाइयां गुड़ को डगला एक पुटरिया में बांध के पेड़ की डगरिया पे टांग देती आएं। फेर बे लुगाइयां लट्ठ ले के खुदई। ऊकी रखवारी करत आएं। जो बी लुगवा बा पुटरिया लेबे की कोसिस करत आए, ऊकी लट्ठ से कुटाई करी जात आए। जे खेल होबे के बादई होलिका को बारो जात आए औ रंग खेलो जात आए। जे जो रिवाज आए, ईके बारे में एक किसां कई जात आए के जबें होलिका बालक प्रहलाद को अपनी गोदी में ले के आगी में बैठीं तो जा देख के उते ठाड़ी लुगाइयन से रई नई गई औ उन ओरन ने होलिका माई के राक्षसन से लट्ठ घुमा-घुमा के लड़ाई करी। संगे भगवान बिष्णु से प्रार्थना करी के बे बालक प्रहलाद खों बचा लें। भगवान ने देखी के बे लुगाइयां अपनी जान पे खोल के राक्षसन से लड़ रई आएं सो भगवान आए औ उन्ने प्रहलाद खों बचा लओ। मनो ईके बाद जे रिवाज सो चल परो के होरी जलाए के पैले उते लुगाइयां लठ्ठ चलाउत आएं फेर कऊं होरी जलत आए औ फेर रंग खोलो जात आए।  
पुनावली कलां गांव में नोईं बल्कि उत्तर प्रदेस के बुंदेलखंड में हमीरपुर के कुंडौरा गांव में सोई लट्ठमार होरी खेली जात आए। इते एक नई, बल्कि दो दिनां रंग खेले जात आएं। होलिका जलाए जाबे के बाद पैले दिन लुगाइयां होरी खेलत आएं। ऊ दिनां लुगवा घर से बायरे निकरबे में डर आएं। काए से जोन लुगवा बायरे दिखाओ ऊको खेंच के लट्ठ जमा दओ जात आए।ईके अगले दिन सबई की होरी होत आए। जा रिवाज बी ऐसोई नईं बन गओ। ईके पांछू सोई एक किसां आए। का भओ के  ग्राम कुंडौरा में एक लंबरदार रओ जोन को नांव रओ मेंहर सिंह (मेंबर सिंह)। एक दफा जबे जानकी मंदिर में फागें गाई जा रई हतीं, उतई समै मेंहर सिंह ने एक जने की उतई मंदिर में हत्या कर दई औ सबईं खों धमकाओ के जो कोनऊं ने ऊके खिलाफ बोलो तो बा ऊको काट डारहे। ईके बाद वां ऐसी दहसत फैली के होरी ने मनाई गई। कई बरस हो गए मनो होरी ने मनी। जा बात उते की लुगाइयन खों ने जंची। उन्ने अच्छे लट्ठ निकारे औ निकर परीं होरी खेलने के लाने।
अब चलो आप के लाने सागर सिटी की स्पेसल होरी बता दई जाए। सागर सहर के गोपालगंज झंडा चैक में श्री नृत्यगोपाल मंदिर आए। उते होलाष्टक के टेम पे लुगाइयां राधा-कृष्ण के संगे फूलों की होरी खेलत आएं। बे फाग औ भजन सोई गात आएं। एम-दूजे पे फूल सोई बरसाए जात आएं। जेई टाईप से उत्तरप्रदेश के कुलपहाड़ में सोई फूलन की होरी खेली जात आए। जे कुलपहाड़ महोबा जिला में आए। ऊटेम पे फूल बरसाए जात आएं औ ईसुरी की फागें गाई जात आएं। ऐ फाग आप ओरें सोई देखो-
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
वैसे कई तो जे जात आए के जा होरी के त्योहार की सुरुआत अपने बुंदेलखंड से भई रई। ई के बारे में एक कहनात आए के झांसी से कोनऊं 66 कि.मी. दूर एरच गांव से में पैली होरी खेली गई रई। काए से के एरच राजा हिरयकश्यपु के राज की राजधानी हुआ करत्ती। एरच में ई होलिका प्रहलाद खों अपनी गोदी में ले के बैठी रईं। जीमें होलिका सो जल गईं औ प्रहलाद बच गओ रओ। जेई से उते पांच दिनां की होरी खेली जात आए औ गीत गाए जात आएं -
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...
औ जो करीला की रंगपांचे की बात ने करी तो मनो बात पूरी ने हुइए। मध्यप्रदेश के अशोक नगर से कोनऊं 75 कि.मी. दूर एक गांव आए करीला। इते सीता माता का मंदिर आए। यां बेड़िनियां पूजा करबे के लाने आऊत आएं। कओ जात आए के इतई सीता मैया ने लव औ कुश को जनम दओ रओ। करीला में रंगपांचे पे भौतई बड़ो मेला भरत आए।
अपने ई बुंदेलखंड में अकेली श्रीकृष्ण जू से नोईं श्रीराम और जानकी मैया से सोई होरी खेली जात आए- 
राजकिशोरी महल बिच खेलत रे होरी।
कर झटकत घूंघट पट खोलत,
मलत कपोलन रोरी। महल...
कंचन की पिचकारी घालत,
तक मारत उर ओरी। महल...
मनो मोए कलई एक नओ बुंदेली फाग सुनबे को मिली जीमें आजकाल की लड़ाई पे तानो मारो गओ आए। दो-चार लाइनें आप ओरें सोई सुन लेओ-
उनें कुआ चाउने, इनें फुआ चाउने
बाकी जाएं चूला में, रमें हैं बे तो दूला में
उनकी तोपें उनको राज, बाकी के सब गिरे काज
उनें रुंआ चाउने, इने पुआ चाउनें....
जेई के संगे मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोई सोचियो जरूर के जे लड़ाई करे से का मिलहे उने? औ जो मिलहे का बे अपने संगे ऊ पार लौं ले जाहें, जो सबको चैन बिगार रए।    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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