पुस्तक समीक्षा
छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - हरा पत्ता - उर्मिला शिरीष की कहानी
सम्पादक - हरि भटनागर, बृजनारायण शर्मा
प्रकाशक - रचना समय, 197, सेक्टर-बी, सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड भोपाल - 462042 (मध्यप्रदेश)
मूल्य - 100/-
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हिंदी साहित्य जगत अथवा हिंदी साहित्य से संबंधित पत्रिकाओं में ऐसी उदारता कम ही देखने को मिलती है जब किसी रचनाकार की किसी एक रचना को केंद्र में रखकर पूरी एक पुस्तिका प्रकाशित की जाए। मेरे संज्ञान में यह किसी भी पत्रिका का पहला अवदान है कि एक पुस्तिका जिसमें सिर्फ एक कहानी पर सामग्री केंद्रित रखी गई हो, अन्यथा किसी रचनाकार के समग्र साहित्य अथवा किसी एक संग्रह पर पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। वरिष्ठ कथाकार एवं अनुभवी संपादक हरि भटनागर के संपादन में ‘‘रचना समय’’ ने वह पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कथाकार उर्मिला शिरीष की एक चर्चित कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ पर समीक्षात्मक लेखों सहित कहानी को प्रकाशित किया गया है। यह कहानी पूर्व में मैं उर्मिला शिरीष के कहानी संग्रह में पढ़ चुकी हूं इसीलिए जब ‘‘रचना समय’’ की यह पुस्तिका मेरे हाथों में आई तो मुझे सुखद लगा क्योंकि यह कहानी मुझे भी उस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी लगी थी। यह एक ऐसी कहानी है जो पाठक का ध्यान अपनी ओर न केवल आकर्षित करती है बल्कि देर तक सोचने को विवश करती है। “उस बहार का इंतज़ार” कहानी संग्रह की चौथी कहानी है “हरा पत्ता”। उर्मिला शिरीष के 11 कहानियों के संग्रह की समीक्षा करते समय मैंने कहानी “हरा पत्ता” के संबंध में लिखा था- “यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।”
“यह पुस्तिका” शीर्षक से संपादक हरि भटनागर ने लिखा है तोलस्तोय की एक कहानी है “हाऊ मच लैंड डज़ ए मेन नीड” की याद दिलाई है कि किस प्रकार एक इंसान जमीन पाने के लालच में दौड़ता चला जाता है और अंत में एक बड़ी जमीन उसके हिस्से में आती है किन्तु इसके साथ ही वह थक कर मर चुका होता है। हरि भटनागर कहा है कि लालच की इस अंतहीन दौड़ में एक ठहराव आना ही चाहिए और यही तो कहानी ‘हरा पत्ता’’ का आग्रह है।
जैसा कि मैंने पहले ही उद्धृत किया कि इस पुस्तिका में एक कहानी है और उस कहानी पर छः साहित्यकारों के विचार हैं जिनसे कहानी के प्रत्येक पक्ष पर भरपूर प्रकाश पड़ता है। क्रमवार सबसे पहले कहानी है, उसके बाद उससे संबंधित 6 लेख इस प्रकार हैं- उर्मिला शिरीष की कहानी: हरे पत्ते का यथार्थ - सूरज पालीवाल, एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी: हरा पत्ता - अरुण होता, हरा पत्ता: कहानी को इस तरह ‘‘देखिए’’ - सुधांशु गुप्त, ग्लोबलाइज़ेशन द्वारा रचे गये यथार्थ के, प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता - हरियश राय, समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक - प्रज्ञा, घर छूटने से मुरझाया: हरा पत्ता - अंकित नरवाल।
कहानी हरा पत्ता उस बुजुर्ग दंपति की कथा है जिसने बड़ी मेहनत और आशाओं के साथ अपनी संतान को पाल-पोसकर इस योग्य बनाया कि वह विदेश में जाकर नौकरी कर सके तथा वहां सुखपूर्वक रह सके। संतान ने भी सोचा कि उसके माता-पिता उसके पास आकर रहें और उसके साथ विदेश में ही बस जाएं। यहीं से शुरू होता है हरे पत्ते का खेल। हरा पत्ता यानी “ग्रीन कार्ड” जो कि विदेश में बसने के लिए जरूरी है। लंबी-चौड़ी लिखा-पढ़ी, जांच-पड़ताल और एंबेसी के धक्के खाने के बाद आखिर वह दिन आ जाता है जब ग्रीन कार्ड पानी के लिए अंतिम औपचारिकता निभाई जाने वाली रहती है। यह औपचारिकता भी आसान नहीं है। वृद्ध पिता लंबी कतार में प्रतीक्षा करते हुए चिंतन करता है और उसके मन में प्रश्न उठता है कि वह अपना देश छोड़कर हमेशा के लिए विदेश जाने का जो कदम उठा रहा है क्या वह उचित है अथवा नहीं? एक मंथन, पत्नी द्वारा एक प्रतिरोध, बच्चों के रूठ जाने का भय इन सब से पार पाना आसान नहीं था। कहानी का अंत चौंकाता है और पढ़ने वाले के मन में अनेक विचार चस्पा करता हुआ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंचता है। इस कहानी के पात्र मेच्योर हैं विचारशील है और उनमें जिंदगी की गहरी समझ है। लेखिका ने जिस प्रकार एक लंबे संघर्ष और एक गहरे अंतर्द्वंद्व के बाद जिस प्रकार निर्णय तक पहुंचा है वह रोचकता से भरा हुआ है। पाठक जिज्ञास होकर सोचता है कि अब यह लोग क्या करेंगे? प्रश्न विकट है। निर्णय के लिए वह मानसिक कठोरता आवश्यक है जो एक झटके से उभरती है और बहुत कुछ कह जाती है।
सूरज पालीवाल ने अपने लेख “हरे पत्ते का यथार्थ” लिखते हुए इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि हमारी अर्थव्यवस्था पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के मुकाबले कितनी कमजोर है। इसी कहानी से उदाहरण देते हुए स्मरण कराया है जब विदेश में बसी संतान अपने पिता के पास पैसे भेजते थे तो नोटों की गड्डियों से उनके हाथ भर जाते थे जबकि अपने देश में बेरोजगारी का अंतहीन सिलसिला है। यही कारण है कि चाहे माता-पिता हो या संतान सभी को हरे पत्ते का यानी ग्रीन कार्ड का लालच आकर्षित करता है। पूरे परिवार का सुखद भविष्य उसमें प्रतिबिंब की भांति चमकता है। सूरज पालीवाल ने कहानी की सार्थकता को रेखांकित करते हुए यह लिखा है कि यह कहानी मात्र एक पिता का उद्घोष नहीं बल्कि डॉलर की व्यर्थता के यथार्थ को भी सामने रखती है।
“एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी हरा पत्ता” - यह उद्घोष करते हुए अरुण होता ने कहानी को वैचारिक स्तर पर टटोला है। उन्होंने हरा पत्ता को एक सहज और स्वाभाविक कहानी ठहराया है जिसमें संवाद धर्मिता के साथ भाषाई सौंदर्य भी है। अरुण होता ने कहानी में दो संस्कृतियों की सामाजिक, आर्थिक एवं परिवेशगत भिन्नताओं को पूरी गंभीरता से लेखबद्ध करने को कहानी की विशेषता कहा है।
“हरा पत्ता कहानी को इस तरह देखिए” - यह सुधांशु गुप्त का आग्रह है। उन्होंने एक अलग ही दृष्टि से कहानी को खंगाला है। उन्होंने उदाहरण के लिए स्मरण दिलाया है मुंबई में आकर बसने वाले उन हजारों लोगों के बारे में जो गांव से लगाव तो रखते हैं किंतु एक बार मुंबई में बसने के बाद कभी गांव लौट कर नहीं जाते। अपने गांव की यादों के साथ वह महानगर भी उनका अपना हो जाता है। इसी प्रकार विदेश में बसने वाले अपने देश लौटने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन लौटने के नाम पर उनके पांव ठिठक जाते हैं। सुधांशु गुप्त ने कहानी के अंत को लेखिका की सदेच्छा के रूप में पाया है।
“ग्लोबलाइजेशन द्वारा रचे गए यथार्थ के प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता” ठहराते हुए हरियश राय कहानी के कथानक में उभरे द्वंद्व के लिए उस ग्लोबलाइजेशन को जिम्मेदार मानते हैं जो 1990 से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। हमारा देश भी उससे अछूता नहीं है। डॉलर के हाथों गिरवी रखे रूपयों के समान बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास गिरवी युवाओं का जीवन मुक्त होने के लिए छटपटाता है लेकिन साथ ही उन्हें अपने बंधन से मोह भी होने लगता है। इसी प्रकार अपने देश में छूट गए वृद्ध माता-पिता के समक्ष भी एक द्वंद्व खड़ा रहता है। जिसमें एक ओर उनकी संतान है जो विदेश में बस गई है और उन्हें अपने पास रहने को आमंत्रित कर रही है और दूसरी ओर उनका अपना देश है जहां उनकी अपनी संस्कृति, अपने लोग और अपनी चिरपरिचित समस्याएं हैं। दोनों के बीच चुनाव करने की स्थिति बहुत कठिन है। इस कठिनाई को पार करते हुए देखकर हरियश राय इस ग्लोबलाइजेशन के विरुद्ध प्रतिरोध की कहानी मानते हैं।
“समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक” शीर्षक से प्रज्ञा ने कहानी के यथार्थ को एक मजबूत धरातल ठहराया है। उन्होंने भौतिकवाद में जकड़ते जा रहे भारतीय समाज की दशा की ओर भी इंगित किया है। उन्होंने कथाकार कि उसे सचेत दृष्टि की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है जो देसी विस्थापन और ग्लोबल विस्थापन के बीच सरकार होती घबराई हुई दुनिया का दृश्य रचती है। यही वर्तमान का यथार्थ है। प्रज्ञा के अनुसार यह कहानी विकास की अंधी दौड़ के बीच एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है।
“घर छूटने से मुरझाया हरा पत्ता” अंकित नरवाल इन शब्दों के साथ हमेशा के लिए देश छोड़ने और ग्रीन कार्ड धारक बनाकर विदेश में बस जाने को लेकर अपने देश के प्रति जगे हुए मुंह से उपजे वैचारिक ऊहापोह को इस कहानी का केंद्र मानते हैं। पहले बच्चे विदेश जाकर अपने लिए जमीन तलाश करते हैं और फिर उसे खाली जमीन में अपनापन भरने के लिए अपने माता-पिता को भी अपने पास बुला लेना चाहते हैं लेकिन क्या माता-पिता के लिए अपनी जड़ों से कट कर जाना इतना आसान है? इसीलिए अंकित नरवाल कहानी “हरा पत्ता” को तय शुदा अंत वाली कहानी परंपरा का अंत करने वाली कहानी निरूपित किया है।
उर्मिला शिरीष एक सशक्त कहानीकार हैं। उनकी कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ ग्रीन कार्ड के संदर्भ में वर्तमान सामाजिक संकट को बहुत गहराई से रेखांकित करती है और यह पुस्तिका जिसमें इस कहानी पर 6 विद्वानों के विचार संकलित किए गए हैं अपने आप में कहानी पर समग्र समीक्षात्मक कलेवर प्रस्तुत करते हैं। ‘‘रचना समय’’ तथा उसके संपादक हरि भटनागर, बृज नारायण शर्मा तथा उप संपादक सौमित्र बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक महत्वपूर्ण कहानी को पाठकों के चिंतन-मनन के लिए सामने रखते हुए समीक्षात्मक लेखों सहित एक पुस्तिका के रूप में प्रस्तुत किया है। यह हिंदी साहित्य में एक अच्छी पहल है जिसे सतत जारी रहना चाहिए।
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