पुस्तक समीक्षा
सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------
काव्य संग्रह - सॉनेट सागर
कवि - डॉ. विनीत मोहन औदिच्य
प्रकाशक - सर्वभाषा प्रकाशन, जे-49,गली नं.-38, राजापुरी (मेनरोड) उत्तमनगर,नई दिल्ली-110059
मूल्य - 249/-
---------------------------
सॉनेट विधा हिन्दी साहित्य के लिए हमेशा एक नूतन विधा रही है। यह माना जाता है कि सबसे पहले कवि त्रिलोचन शास्त्री ने इस विधा को हिन्दी में सम्मिलित किया। उनके समकालीन कुछ कवियों ने सॉनेट लिखे भी लेकिन फिर भी सॉनेट हिन्दी काव्य जगत में अपनी पैंठ नहीं बना सका। इधर विगत कुछ वर्षों से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य ने सॉनेट के क्षेत्र में कड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है जिससे हिन्दी साहित्य में सॉनेट को स्थापना मिलने की संभावना बढ़ी है। डॉ. औदिच्य हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के समर्थ ज्ञाता हैं। उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें ‘‘फ्रिक्र सागरी’’ के तख़ल्लुस से लिखी हैं। इसके साथ ही अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कार्य में पाब्लो नरुदा के सॉनेट्स का अनुवाद कर के हिन्दी जगत को पाब्लो की काव्यात्मक विशेषताओं से परिचित कराया है। स्वयं के मौलिक सॉनेट संग्रह तथा भारतीय सॉनेटियर्स एवं अंग्रेजी के 101 सॉनेटियर्स के सॉनेट्स के पुस्तक संपादन के बाद डॉ औदिच्य को यह महसूस होता है कि हिन्दी जगत को सॉनेट की संरचना की बारीकियों से भी अवगत होना चाहिए। हाल ही में उनका नवीनतम सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने सॉनेट विधा के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने “सॉनेट काव्य विधा संरचना एवं हिन्दी साहित्य में प्रयोग” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘काव्यात्मक एकाकी विचार की संक्षिप्त अभिव्यक्ति के लिए एक बौद्धिक या इन्द्रियजनित लहर जो भावनात्मक और लयबद्ध रूप से तीव्रता से अनुभव हो, सॉनेट एक सर्वाेत्तम माध्यम सिद्ध होगा। एक ऐसा साधन जो मधुरता और एकता के क्रांतिकारी नियमों के आधार पर निश्चित किया गया हो। उन पाठकों को जिन्हें सॉनेट साहित्य के क्षेत्र व तकनीक का ज्ञान नहीं है उन्हें इसके विकास व क्षमताओं से परिचित कराना समीचीन होगा। सॉनेट के अनेक इतिहासकार हुए हैं जिनके अपने मत व दृष्टिकोण हैं। इनमें सर्वप्रमुख कैपल लाफ्ट हैं जिन्होंने इस रोचक विधा का विशिष्ट अध्ययन किया। उन्होंने 1813-14 में मौलिक और अनूदित इटालियन सॉनेट संकलन ‘लौरा’ प्रकाशित किया। आर एच हाउसमैन ने 1833 में एक श्रेष्ठ संकलन निर्गमित किया। डाइस, लेह हंट, टामलिंसन, डी एम मेन, मिस्टर एस वैडिंगटन सहित मिस्टर डेनिस ने इंग्लिश सॉनेट्स के माध्यम से योगदान दिया। मिस्टर हाल कैन के सॉनेट्स आफ श्री सेन्चुरीज ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। क्वार्टरली रिव्यू 1866, वे स्टमिनिस्टर रिव्यू 1871, द डब्लिन रिव्यू 1876-77 में सॉनेट साहित्य पर महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए। इटली में लेंटीनी, पैट्रार्क तथा इग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, विलियम वर्ड्सवर्थ, जान मिल्टन, स्पेंसर के अतिरिक्त अनेक देशों के कवियों ने सॉनेट काव्य विधा में लेखन कर इस विधा को लोकप्रिय बनाया। भारत में भी विभिन्न राज्यों में इस विधा को विविध स्वरूपों में लिखा जाता रहा है।’’ अपने इस लेख में डॉ. औदिच्य ने हिन्दी में सॉनेट छंद लिखे जाने के आधारभूत तत्वों को भी सामने रखा है। यह लेख सॉनेट विधा को जानने, समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
‘‘सॉनेट सागर’’ में डॉ औदिच्य के कुल 51 सॉनेट संग्रहीत हैं। इस संग्रह के संबंध में ओड़िशा की सॉनेटियर व कवयित्री अनिमा दास ने “सॉनेट सागर; एक अनंत यात्रा” शीर्षक से भूमिका में लिखा है कि “प्रस्तुत नवीन संग्रह ‘सॉनेट सागर’ सॉनेटियर विनीत मोहन जी की एक अद्भुत यात्रा धारा है। इस संग्रह में लिपिबद्ध समस्त सॉनेट्स कई भाव, विचार, विषय की विस्तृत परिभाषा है। सॉनेट के मूलतः कई तत्व होते हैं जिसमें प्रमुख है मीटर, गेयता, विशिष्ट तुकांत, भाव, एक स्वतंत्र विचार, रूपक, प्रतीक, बिम्ब एवं रहस्य। 14 पंक्तियों की किसी भी कविता को सॉनेट नहीं कहा जा सकता। सॉनेट का अन्य एक रूप है जिसे अनियंत्रित रूप कहा जाता है, जिसमें उपरोक्त सभी तत्व होते हैं किंतु छंद के नियमों से मुक्त होते हैं। डॉ. विनीत मोहन जी ने सॉनेट के दोनों रूपों को सम्पूर्ण विशेषता देते हुए कई सृजन किए हैं।”
पुस्तक में अनिमा दास ने “सॉनेटियर एवं ग़ज़लकार प्रो. (डॉ.) विनीत मोहन औदिच्य उर्फ फ़िक्र सागरी: एक परिचय” शीर्षक से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का विस्तृत परिचय भी दिया है। डॉ औदिच्य बिना शोर मचाए नेपथ्य में रहते हुए सतत सृजनशील हैं। फिर भी उन्हें अनेक राष्ट््रीय स्तर के पुरस्कार सम्मान मिल चुके हैं। उनकी अब तक की प्रमुख कृतियां हैं- ग़ज़ल संग्रह - खुशबु-ए-सुखन (2014), कारवां-ए-सुखन (2021), अंदाज-़ए-ग़ज़ल (2022), तन्हाइयाँ आवाज़ देती हैं (2023), काव्य संग्रह काव्य प्रवाह (2015), भाव स्रोतस्विनी (2019), प्रथम सॉनेट संग्रह - 69 अंग्रेजी सॉनेटस का हिंदी अनुवाद कर ‘‘प्रतीची से प्राची पर्यंत’’ साझा संग्रह (2020), द्वितीय सॉनेट संग्रह - नोबेल पुरस्कार विजेत पाब्लो नेरुदा की ‘‘हंड्रेड लव सॉनेट्स’’ पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘‘ओ प्रिया!!! (2021), तृतीय सॉनेट संग्रह ‘‘सिक्त स्वरों के सॉनेट’’ (118 सॉनेट्स) - 2022, चतुर्थ सॉनेट संग्रह ‘‘काव्य कादम्बिनी’’ - 2022 (101अंग्रेजी सॉनेट रचनाकारों के 135 सॉनेटस का हिंदी अनुवाद)। यह सुनिश्चित है कि डॉ औदिच्य द्वारा सॉनेट के लिए किया गया श्रम एवं मौलिक सॉनेट सृजन ही उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थाई पहचान दिलाएगा।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य के सॉनेट्स में वैचारिक संवाद हैं, प्रकृति की सुंदर छटा है तथा विविध मानवीय व्यवहार हैं। संग्रह का पहला सॉनेट है “अदृश्य चक्षु” जिसमें उन्होंने लिखा है कि-
ऐसा कह दूँ कि मैं आनंद में हूँ, मिथ्या यह तथ्य नहीं
मैं ही जानता हूँ अग्नि-वन में कैसे होता श्वास रुद्ध
और दुखित मेरा जीवन है, यह भी मेरा कथ्य नहीं
है ज्ञात मुझे कैसे काँटों की शय्या पर काया हो रही वृद्ध
इस प्रकार देखा जाए तो डॉ औदिच्य अपने सॉनेट में व्यष्टि से समष्टि की ओर बड़ी सहजता से बढ़ते चले जाते हैं। उनका अपना दुख-सुख जन-जन के दुख-सुख का प्रतिबिम्ब बन कर उभरने लगता है। इसी प्रकार उनके कुठ सॉनेट्स में नॉस्टेल्जिक शेड दिखाई देता है। जैसे एक सॉनेट है ‘‘प्रहेलिका’’। इसमें प्रकृति के लक्षणों में मानवीय भावनाओं की अद्भुत छटा का रूपक है-
कहीं दूर कानन में खिल उठा था फूल
सूखी नदी की देह से उड़ गई थी धूल
मंदार सा लाल लगा था तब आकाश
शीश झुका कर शशि बिखराया प्रकाश।
कह दिया था मेघ ने वह नहीं बरसेगा
नक्षत्रों में जलकर एक कल्प तरसेगा
आशा-अरण्य में रहेगा भौरों का गुंजार
मध्यरात्रि के स्वप्न में संभावना का नीहार।
कवि डॉ. विनीत मोहन औदिच्य प्रकृति की महत्ता को समझते हैं। उनकी संवेदनाओं में उस समय तीव्र आलोड़न उठता है जब प्रकृति को किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाई जाती है। जैसे अपने एक सॉनेट में वे लिखते हैं कि-
रे मानव, अंधाधुंध वृक्ष काटे क्यों? चलो प्रकृति की ओर
उग आए कंक्रीट के जंगल, नहीं है जिनका कोई छोर
नंगे पर्वत, कठोर बंजर अवनि व सूखे सर नद-नदियाँ
है भूकंप का जोर भयंकर, वृक्षों पर मुरझाई कलियाँ।
कर्णकटु है प्रतिदिन बढ़ता शोर, रे कहाँ गई धरोहर?
जी रहें सभीत सारे थलचर, जलचर और नभचर
विषाक्त धुएँ में घुल रहा नवपल्लव का अमिय नीर
आ रही मृत्यु ध्वनि निकट, पीड़ित प्रकृति का वक्ष चीर।
जब हृदय व्यथित होता है तो ईश्वर की कृपा की आकांक्षा बढ़ जाती है। यूं भी भारतीय संस्कृति में ईश्वर की सत्ता को पूर्णतया स्वीकार किया गया है। श्रीराम के रूप में ईश्वर की छवि हर भारतीय के हृदय में बसती है। डॉ औदिच्य ने नया प्रयोग करते हुए सॉनेट में श्रीराम का स्मरण किया है। उनके सॉनेट ‘‘राम मेरे जीवन में’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
कहें राम का नाम... सुनें राम अभिराम
नित करे आराधना... हो कृतार्थ सर्वनाम
सरयु है प्राण... राम है तरणी... व निर्वाण
है आराध्य जो किया संसार का निर्माण
इस तरह देखा जाए तो संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ में विषय की विविधता है तथा नूतनता है जिससे यह संग्रह रोचक बन गया है।
पुस्तक के दूसरे खंड में कवि की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षाएं सहेजी गई हैं। यह समस्याएं हैं - “सिक्त स्वरों के सॉनेट” संग्रह की समीक्षा “सॉनेट की विदेशी शैली का सुंदर भारतीय स्वरूप” - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह, “ओ प्रिया” (पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी अनुवाद) की समीक्षा समीक्षक प्रो. हरेराम पाठक, प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित काव्य संग्रह रू अविरल बहती भाव स्रोतस्विनीश् की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, काव्य संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक डॉ. चंचला दवे, आंग्ल भाषा से हिंदी में प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित सार्वकालिक श्रेष्ठ सॉनेट संग्रह “काव्य कादम्बिनी” की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, सॉनेट संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक विजय कुमार तिवारी, पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी में विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित “ओ प्रिया” समीक्षक वीणा शर्मा वशिष्ठ, “ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक मनोरमा जैन पाखी तथा ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक: डॉ. शैलेष गुप्त वीर।
समीक्षाओं के उपरांत “श्री विनोद मोहन जी की लेखनी पर प्रबुद्ध साहित्यकारों की अन्य प्रतिक्रिया” शीर्षक से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं हैं यह साहित्यकार हैं अशोक बाजपेई, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, डॉ प्रणव भारती, प्रभु दयाल मिश्र, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, डॉ हरे राम पाठक, डॉ कविता नंदन, किशोर नायक, प्रताप नारायण सिंह, केशव मोहन पांडेय, अमरेश विश्विल, डॉ शैलेश गुप्त वीर, मनोरमा जैन पाखी, वीणा शर्मा वशिष्ठ, लिली मित्रा, डॉ छबिल कुमार मेहेर तथा अनिमा दास। पुस्तक के अंतिम परिशिष्ट में डॉ विनीत मोहन आदित्य को उनके कृतित्व के लिए दिए गए सारस्वत सम्मान की तस्वीर एवं सम्मान पत्र स्मृति चिन्ह आदि रखे गए हैं।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का यह सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ न केवल पठनीय है अपितु हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना सहित काव्यात्मक .
---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह
#DrMissSharadSingh #bookreview #bookreviewer
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण