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चर्चा प्लस | महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। इसीलिए माना जाता है कि यदि महात्मा गांधी के विचारों को समझना है तो उनके समग्र विचारों को जानना जरूरी है जैसे कला और सौंदर्य के संबंध में उनके विचार।
अधिकांश लोग महात्मा गांधी को एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही देखते और समझते हैं। उनकी दृष्टि में माहत्मा गांधी वे व्यक्ति थे जिन्होंने बड़े-बड़े अहिंसक आंदोलन किए और देश को स्वतंत्रता दिलाई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी में विशेष राजनीतिक सूझ-बूझ थी लेकिन इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों को ले कर उनमें अगाध जिज्ञासा थी तथा उनका अपना मौलिक दृष्टिकोण था। सादा जीवन जीने वाले महात्मा गांधी को कला और सौंदर्य की अद्भुत समझ थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंट्उ विथ ट्रू’ में कला के बारे में लिखा है- ‘‘मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता जबकि प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाह्य रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।’’
दरअसल किसी भी कला के तीन आधार तत्व होते हैं- 1. जातीय तत्ववाद 2. कल्पनात्मक विस्तार 3. ऐतिहासिक परम्परा। जातीय तत्ववाद में मानव जाति समूह का अथवा जातीय दर्शन एवं चिन्तन होता है। कभी-कभी यह तत्व अवचेतन में रहकर कला पर अपना प्रभाव डालता है तो कभी अपने जातीय तत्वों को जानबूझ कर कला में पिरोया जाता है। यह तत्व सामाजिक रुढ़ियों और जातिगत ऐतिहासिक परम्परा के रूप में भी गतिमान रहता है। कल्पनात्मक विस्तार वैचारिक परिपक्वता को दर्शाता है। कला के संदर्भ में कल्पना मूर्त और अमूर्त के मध्य संबंध स्थापन का कार्य करती है। कल्पना का हृदय से सीधा संबंध होता है इसलिए यह कला के रूप में प्रकट होने के बाद प्रायः चकित कर देती है। ऐतिहासिक परम्परा कला के विकास को वातावरण प्रदान करती है, उसे दिशा देती है। भारतीय कलाओं के आधार में मनुष्य और सृष्टि का अटूट संबंध है पाया जाता है यह संबंध सार्वभौमिक सम्पूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है।
महात्मा गांधी कला में प्राकृतिक तत्वों को असीमित मानते थे। उनके अनुसार मानवीय कला प्राकृतिक कला के सामने कुछ भी नहीं है। वे कला की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि -‘‘‘हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों, मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश को निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की कला कभी नहीं कर सकती।’’
कला के महत्व के साथ ही महात्मा गांधी ने कला के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। वे मानते थे कि कला का कोई न कोई उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य ही कला की गुणवत्ता को सिद्ध करता है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इन्कार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि यह प्राकृतिक सौन्दर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती हैं। ’’
भारतीय दृष्टिकोण से कला की यही परिभाषा हो सकती है। हम केवल उसके लक्ष्य से ही यह लक्षण नहीं बना रहे हैं। काव्य की जो परिभाषा अपने यहाँ है, उसे यदि व्यापक रूप से लगाइए तो वह काव्य की ही परिभाषा नहीं रह जाती; चित्र, मूर्ति, कविता, संगीत आदि कलामात्र की परिभाषा हो जाती है। वस्तुतः कलामात्र की परिभाषा को ही काव्य की परिभाषा बनाने के लिए, एक देशीय रूप देकर काव्य की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। अर्थात्, काव्य की परिभाषा पूर्ण व्याप्ति तभी होती है जब हम वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” के स्थान परकृ“कृतिरसात्मिका कला कहें वा रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” के बदले रमणीयार्थप्रतिपादिका कृतिः कला”
महात्मा गांधी कला में सत्य को ढूंढते थे। यदि कला में सत्यता है तो वह सभी के लिए उपयोगी हो सकती है। उनके अनुसार ‘‘सत्य का शोध पहली चीज है, सौन्दर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था। ऐसे ही मोहम्मद साहब भी थे जिनकी ‘कुरान’ सम्पूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है, कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौन्दर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौन्दर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा।’’
महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए। मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं लेकिन मैं उनको उतना महत्त्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर मैं उन कार्यकलापों के महत्त्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। जीवन सब कलाओं से बढ़कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या?’’
सत्य महात्मा गांधी का प्रिय विषय था। वे निरंतर सत्य की खोज में लगे रहते थे। वे कहते थे कि -‘‘मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौन्दर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौन्दर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौन्दर्य के दर्शन करने लगेंगे, तब सच्ची कला का उदय होगा।’’
जर्मन दार्शनिक हेगेल का मानना थ कि ‘‘सौंदर्य संवोदी रूप में सत्य या विचार की अभिव्यक्ति है।’’ वे यह भी मानते थे कि सौंदर्य केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना और परम सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। हेगेल के दर्शन में सौंदर्य मात्र बाहरी दिखावट अथवा इंद्रियों को प्रसन्न करने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना या आत्मा की बाहरी दुनिया में अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार शुद्ध विचार या सत्य जब किसी कला माध्यम के द्वारा साकार होता है तो वही सौंदर्य है। कला में सौंदर्य प्रकृति की नकल करने से नहीं अपितु उसमें अपनी दृष्टि को शामिल करना भी है। ठीक इसी प्रकार महात्मा गांधी ने कला के साथ सौंदर्य के महत्व एवं विशेषताओं को देखा और परखा। वे कला, सौंदर्य और सत्य को परस्पर पूरक मानते थे। महात्मा गांधी के अनुसार -‘‘‘सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाह्य रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य से आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौन्दर्य नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन कहते हैं कि उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया और आपको याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अन्दर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौन्दर्य के दर्शन का अभ्यस्त था।’’
महात्मा गांधी ने वास्तविक सुंदर कृति की बड़े सरल शब्दों में व्याख्या की है। वे इस बारे में भी प्रकाश डालते हैं कि सुंदर कृति कब जन्म लेती है-‘‘सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि ‘तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है, लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।’’
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी ने न केवल राजनीतिक मसलों का हल निकाला बल्कि कला और सौंदर्य का भी गहराई आकलन किया और इन दोनों तत्वों को जनोपयोगी तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना। इसीलिए वे मानते थे कि जो कला और सौंदर्य आमजन के मन में शांति, सुंदरता और जीवंतता का बोध कराए वही सच्ची कला और सौंदर्य है। महात्मा गांधी ने जितने सुंदर ढंग से कला और सौंदर्य की व्याख्या की है, उसे पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई दार्शनिक विषय के मर्म को आत्मसात कर के अपने विचार व्यक्त कर रहा हो। महात्मा गांधी के इन विचारों को जाने बिना उनके वैचारिक व्यक्तित्व को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है। ---------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 15.07.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, July 14, 2026
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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली को समृद्ध करने वाली अनुपम कृति- "श्रीमद्भगवद्गीता : बुन्देली भावार्थ" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
बुंदेली को समृद्ध करने वाली अनुपम कृति- "श्रीमद्भगवद्गीता : बुन्देली भावार्थ"
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - श्रीमद्भगवद्गीता: बुन्देली भावार्थ
लेखिका - डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव
प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन्स, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य - 350/-
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श्रीमद्भगवद्गीता का विश्व की 578 से अधिक भाषाओं और बोलियों में गीता का अनुवाद हो चुका है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो जीवन की नश्वरता एवं मृत्यु के यथार्थ का बोध कराता है लेकिन इसके साथ ही जीवन जीने की कला भी सीखता है। इसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश तथा अर्जुन की शंकाओं का समाधान है। इसे अपनी दिव्य दृष्टि से संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाया था। यह महाभारत महाकाव्य का एक अंश है किंतु सबसे लोकप्रिय अंश। सनातन धर्म का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ा या सुन ना हो। किंतु कई बार भाषाई समस्या को लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के अर्थ को समझने में परेशानी होती है। विशेष रूप से उन व्यक्तियों को जिनका भाषा ही ज्ञान सीमित है जो बोलियों के अधिक निकट हैं उन्हें संस्कृत या संस्कृतनिष्ठ श्रीमद्भगवद्गीता को समझने में परेशानी होती है। गीता प्रेस गोरखपुर के द्वारा टीका सहित श्रीमद्भगवद्गीता का प्रकाशन किया जा चुका है तथा कुछ अन्य प्रकाशक भी इसे टीका सहित प्रकाशित करते हैं। फिर भी यदि अपनी बोली में व्यक्ति को ऐसा ग्रंथ उपलब्ध हो तो यह उसके लिए तथा उन प्रवचन कर्ताओं के लिए जो उस बोली विशेष में प्रवचन करते हैं, एक अच्छी और उपयोगी उपलब्धता होगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर सुमनलता श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया है। इस भावार्थ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक को बड़े सरल बुंदेली में भावांतरित किया गया है। पूरी पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता का मूल भाव कहीं भी आहत नहीं हुआ है। इस भावार्थ में डॉ सुमनलता श्रीवास्तव का श्रम स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण कार्य करके डॉ सुमनलता जी ने श्रीमद्भगवद्गीता को बुंदेली में उपलब्ध कराते हुए बुंदेली को समृद्ध किया है।
डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने 1967 में सागर विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। 20 दिसम्बर 1946 को जन्मी डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने एक गृहिणी के रूप में अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाते हुए इ.क.सं. विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से 2004 में संगीत में एम. ए., 2007 में संगीतशास्त्र, संस्कृत में पी.एच.डी.,तथा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर से 2019 में सामुद्रिकशास्त्र में संस्कृत में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुंजन कलासदन, जबलपुर द्वारा 2011 में सरस्वती अलंकरण, कादम्बरी, जबलपुर द्वारा 2012 में संगीतशास्त्र तथा 2016 में बहुआयामी हिन्दी सेवाओं के लिये पुरस्कृत किया गया। कहानी संग्रह ‘‘जिजीविषा’’ पर 2014 में म.प्र. लेखिका संघ, भोपाल द्वारा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें साहित्य में रुचि के साथ ही रवीन्द्रसंगीत, नृत्य, नाटक, हस्तकला, गृहोद्यान एवं समाजसेवा में भी अभिरुचि है। उनके प्रकाशित ग्रंथ हैं- संगीताधिराज हृदयनारायण देव हृदयकौतुकम्- हृदयप्रकाशः, 2008, कालिदास-साहित्य एवं कामकला नायकनायिकानखशिखनिरूपण, 2014, कहानी संग्रह - जिजीविषा 2014, कहानी संग्रह सरेराह- 2015 तथा सामुकद्रिशास्त्र के आलोक में कालिदास, 2021।
पुस्तक के आरंभ में अमरेंद्र नारायण, पूर्व महासचिव, एशिया पैसिफिक टेली कम्युनिटी, बैंकॉक ने ‘‘अनुशंसन’’ में उल्लेख किया है कि- ‘‘डॉ. सुमनलता जी के बहुमुखी प्रतिभा का ही पावन पुष्प है, बुंदेली में श्रीमद्भगवद्गीता का भावानुवाद । लोकभाषा में अत्यंत सहजता-पूर्वक उन्होंने गीता के अध्यायों को बुन्देली भाषी जनमानस के लिए प्रस्तुत कर एक अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है। यह उनकी विद्वता और उनके व्यक्तित्व की सरलता का सुपरिणाम है कि गीता के सभी अध्यायों का मर्म एक सामान्य गृहस्थ को भी सुग्राह्य लगता है। जिन लोगों ने संस्कृत या हिंदी के माध्यम से गीता नहीं पढ़ी है, उन्हें अपने दैनिक बोलचाल की भाषा में गीता के रहस्य को समझने का सुअवसर प्राप्त होता है।’’
वहीं प्रोफेसर अरुण कुमार मिश्र डी.लिट्. हिन्दी साहित्य जबलपुर ने अनुगुंजन शीर्षक से लिखा है-‘‘आज जब बोली में बातचीत करने वालों को भद्र समाज के कुछ लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बोली के प्रति प्रगाढ़ आदर-भाव रखते हैं। यही वजह है कि सुमन जी ने एक दुष्कर कार्य करने का बीड़ा उठाया और महान् ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्यायों का बुन्देली बोली में अनुवाद किया। बुन्देली के वैभव का जिन्हें पता है, उनके लिए यह अनुवाद-कृति जीवन की संजीवनी औषधि के समान है। श्रीमद्भगवद्गीता पर कुछ भी कहना सामान्य मानव की बात नहीं है; पर जो लोग गीता के ज्ञान से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं, लेकिन सामान्य सी बुन्देली बोली को समझने के योग्य हैं, उन लोगों के लिये प्रस्तुत ग्रंथ जीवन का पाथेय है।’’
प्रभा विश्वकर्मा ‘‘शील’’, संस्थापक अध्यक्ष-बुन्देली संस्कृति संगम, मध्यप्रदेश जबलपुर ने ‘‘अनुरंजन’’ के अंतर्गत बुंदेली में इस पुस्तक पर अपने विचार कुछ इस प्रकार प्रकट किए हैं - ‘‘भगवान किशन जू के मोंह सें गीता गाबे में जे कछु बोल संस्कृत में निकरे हैं। उन सबई अठारा अध्यायों के यानी सात सौ इस्लोकों को उल्था हमरी सुमनलता श्रीवास्तव जिज्जी ने ऐसी उम्दा बुन्देली बानी में करो है, कै हम का बताएँ! कित्तो सुरीलो लगत है सुनत में, बाँचत में।’’
“अनुभावन” शीर्षक से आत्मकथन लिखते हुए डॉ सुमनलता श्रीवास्तव ने इस बुंदेली भावार्थ के उद्देश्य के संबंध में प्रकाश डाला है- ‘‘ई अनुबाद में मोरी मंसा नें अपनौ गेयान बघारबे की आय और में प्रबचन करकें धरमगुरु बनबे की। मोरो तो संकलप इत्तोई है कै बुन्देलखण्ड के आम आदमी समज जाबें कै आखर गीता-ग्रंथ में लिखो का गओ है, जोन ईकी चरचा संत-महात्मा, गेयानी-बिज्ञानियों सें लैकें कारपोरेट बारे लौं करत हैं। अब तो गीतागेयान में नौजबानों खों सोई चाओ आन लगौ है।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि - “हो सकत है, मोरी सगरयाउ बुन्देली सब खों नें जँचे, हिज्जे नें जमें, काय सें कै मैं तो बुन्देलखण्ड सें चालीस बरस दूर रही हौं। बई किसा, कै बीरन खों दै दये बाबुल महल अटारीं, हमखों दये परदेस। सो चाय परम्परा बारी बोली पै पकर सोई ढीली पर गई होय!”
आइए अब देखते हैं उनके द्वारा किया गया श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ जिसमें बुंदेली का भाषाई सौंदर्य, सहजता, सरलता और लोक मूल्यवत्ता स्पष्ट प्रकट हुई है। सबसे पहले लक्ष्मीपति भगवान विष्णु का ध्यान किया गया है- अथ ध्यानम् - पाठ आरंभ करबे के पैलें अपन सब जनें ई इस्लोक खों पढ़ कें जगत के अधार, लच्छमीपति भगबान बिस्नु को धेयान करिये -
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भगबान की आकरिति भौत सांत है। बे सेसनांग की सैया पै सयन कर रय हैं। उनकी नाभि में कमल है। बे देवताओं के भी ईसबर हैं। पूरे जगत के अधार हैं। बे अकास के समान सब जग्घा बेयापत हैं। उनकौ बरन नीले मेघों के समान है। उनके अंग-अंग भौतई सुन्दर और सुभ हैं। बे लछमी जी के पति हैं। उनके नैन कमल घाईं हैं। उनें जोगी हरें धेयान करकें पा सकत हैं। जनम-मरन के भय कौ नास करबे बारे और सकल लोकों के स्वामी भगबान सिरी बिस्नु खों मैं बन्दत हौं। (पृ. 17)
अध्याय - 1 अर्जुनविषादयोग में भावार्थ देखिए जिसमें संजय द्वारा जन्मांध धृतराष्ट्र को अपनी दिव्यदृष्टि से कुरूक्षेत्र का हाल बताना आरम्भ करते हैं। लेखिका ने बुंदेली भावार्थ इस प्रकार किया है-
अब गीता को उल्था आरम्भ करहौं।
कुरुछेत्र में कौरबों और पांडबों की सेनाएँ जमा हो गई हैं। महाराजा ध्रितरास्ट द्रिस्टी सें लाचार हैं सो बे दिब्य-द्रिस्टी बारे संजय सें जुद्ध कौ पूरो आँखों देखो हाल सुनत जा रये हैं। सो आप औरें भी सुनो कै बे का जिग्गयासा कर रय हैं और संजय का जवाब दे रय है।
जोई आय गीता के पहले अध्याय को पहलौ इस्लोक-
धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चौव किमकुर्वत संजय।।1।।
ध्रितरास्ट बोले- हे संजय ! धरम की छेत्र, कुरुच्छेत्र में इकट्ठे भये, जुद्ध की इच्छा बारे मोरे और पाण्डु के पुत्रों ने का करौ, सो बताओ। (पृ. 21)
अर्जुन उवाच- कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।4।।
अरजुन बोले- अरे मधुसूदन ! मैं जुद्धभूमि में भीस्म पितामह और गुरु द्रोणाचार के बिरोध में बान चलाकें कैंसें लड़ाई करहों? ए अरिसूदन ! जे दोई मोरे पूजनीय आएँ। (पृ. 32)
इसी प्रकार कर्मयोग की व्याख्या है-
नैव तस्य कृतेनार्थाे नाकृतेनेह कश्चन ।न चा स्यसर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।18।।
ई संसार में कर्मयोग सें सिद्ध भए ऊ महापुरुस खों नें तो कर्म करबे सें कौनऊ मतलब रहत है और नें कर्मों के नें करबे सेंई कौनऊ मतलब रहत है। सकल प्रानियों सें भी ऊ कौ तन्नक भी स्वारथ कौ नातो नई होत ।
तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः।।19।।
ई सें तुम बिगैर लाग-लगाव कें सदाँ-सरबदाँ करतब्ब-कर्म करत रहो, कायसें कै आसक्ति के बिना कर्म करत भओ मनुस्य परमात्मा खों प्राप्त हो जात है। (पृ. 53)
इस प्रकार लेखिका डॉ सुमनलता श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ कर के बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह बुंदेली भाषियों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह पुस्तक बुंदेली के शोधार्थियों के साथ ही उन प्रवचनकर्ताओं के लिए भी उपयोगी है जो बुंदेली भाषियों के बीच श्रीमद्भगवद्गीता का प्रवचन करते हैं। बुंदेली को इस प्रकार समृद्ध करने के लिए डॉ सुमनलता श्रीवास्तव को साधुवाद है। इस प्रकार के भावार्थ अथवा भावानुवाद बुंदेली को न केवल समृद्ध करेगा वरन लोकप्रिय भी बनाएगा।
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