Wednesday, October 7, 2026

चर्चा प्लस | अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह

तितलियां ही तो है रंग-बिरंगी, नाज़ुक। बटरफ्लाई कैचर नेट में पकड़ने लायक़, पारदर्शी बोतल में कर क़ैद कर लेने लायक़ और किसी ट्रॉफी की तरह किताब के पन्नों में दबाकर रख लेने के लायक़। जिन्हें जब चाहे तब देख कर अपनी शक्ति का एहसास किया जा सके। जब शहरों में, गांव में, कस्बों में बहुत से बगीचे हुआ करते थे, बहुत से फूल खिला करते थे तब बहुत सी तितलियां उड़ा करती थीं। तब भी यही सुलूक होता था उनके साथ। आज बगीचे कम हैं, फूल कम हैं लेकिन सुलूक बदला नहीं है। मुट्ठी पर तितलियां भी किसी चौक- चौराहे पर जुड़ जाए तो टूट पड़ते हैं लोग उन पर। मगर तितलियों का साहस तो देखिए वे किताबें से निकल कर अपने पर खोलना चाहती हैं।

बचपन में बहुत से नसमझी वाले काम हो जाते हैं जैसे टिड्डे की टांग में धागा बांधकर उसे उचकाना, मेंढक की टांग में धागा बांधकर उसे लटका देना, किसी चीटें को पारदर्शी गिलास में बंद कर उसे छटपटाते हुए देखना और सुंदर, नाज़ुक तितलियों को  पकड़ कर कभी उनके पंख नोच लेना तो कभी उन्हें जीते जी किताबों के पन्नों में दबाकर, भविष्य में देखने के लिए दफ़्न कर देना। बचपन की यही बचकानी नसमझ भरी गलतियां किसी किसी पर ऐसा प्रभाव डालती है कि वह बड़े होने पर भी तितली जैसी खूबसूरत हर चीज को अपने कब्जे में कर लेना चाहते हैं, मिटा देना चाहते हैं, दबा देना चाहते हैं। इसे चाहे तो साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर भी कह सकते हैं जिसकी नींव इंसान के बचपन में ही नहीं बल्कि पीढ़ियों पहले से पड़ चुकी रहती है। उसे पीढ़ी से जिसमें पूर्वजों ने वन्य पशुओं के सिर काटकर अपनी ड्राइंग रूम में ट्रॉफी बनाकर सजाने का चलन चलाया था। परिणाम यह हुआ कि शिकार हुए पशुओं की प्रजाति ही खतरे में पड़ गई। पूरी दुनिया को चिंता करनी पड़ी के लुप्त होने की कगार में खड़ी प्रजाति को कैसे बचाया जाए? कुछ दुर्भाग्यशाली प्रजातियां तो अब इतिहास के पन्नों भर में हैं। वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन नेचर)  के अनुसार, कुछ विशिष्ट तितली प्रजातियाँ ही पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं, जिनमें लिब्याथी सिनिरास (1866 में), मोरेंट्स ब्लू (1879 में), यूरेनिया स्लोनस (20 वीं सदी के आरंभ में) और ज़ेरसेस ब्लू (1941 में) विलुप्त हो चुकी हैं।  पर्यावरण प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 20% मूल्यांकित प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
हां, मनुष्य का स्वास्थ्य बढ़ जाता है और वह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने लगता है तो प्रजातियों पर संकट आना स्वाभाविक है।

 बेटी बचाओ आंदोलन भी कुछ इन्हीं कारणों से चलाया गया। भारतीय समाज में बेटों की ललक इतनी अधिक बढ़ती चली गई की बेटियां कोख में ही मारी जाने लगीं। पुरुषों और महिलाओं का अनुपात गड़बड़ा गया। आज भी देश में कई स्थान ऐसे हैं जहां पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की कमी है। विवाह के लिए भी लड़कियां नहीं मिलती हैं। वे दूसरे राज्यों से खरीद कर लड़कियां लाते हैं ताकि वैवाहिक जीवन बिता सके और अपना वंश चल सकें। मनुष्य एक बुद्धिमान प्रजाति है। मनुष्यों में ही कुछ लोग समझ गए कि यदि बेटियों को इसी तरह कोख में मारा जाता रहा तो स्त्री प्रजाति ही संकट में पड़ जाएगी। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या सबसे कम (सबसे कम लिंगानुपात) वर्ष 1991 की जनगणना में पाई गई थी जो ऐतिहासिक रूप से सबसे कम दर्ज किया गया था। इसके बाद शासकीय स्तर पर प्रयास शुरू किए गए।
देश में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के रूप में एक संघीय कानून पारित किया गया। इस अधिनियम से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी की गई। ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान रखा गया। प्रत्येक आनुवांशिक परामर्श केंद्र, आनुवांशिक प्रयोगशाला या आनुवांशिक क्लिनिक परामर्श देने या प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का संचालन करने में लगे हुए, जैसे कि गर्भाधान से पहले और बाद में लिंग चयन की संभावनाओं के साथ इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) पीसीसीपीटी अधिनियम के दायरे में आता है, इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ तथा पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या फिर बढ़ने लगी। देखा जाए तो इससे स्त्री प्रजाति विलुप्ति के पन्नों में दर्ज़ होने से बच गई। फिर भी यह बहुत खुश होने वाली बात नहीं कहीं जा सकती है क्योंकि प्रतिबंधों की बाड़ उसके इर्द-गिर्द सदियों से खड़ी की जाती रही है।
स्त्रियों के लिए सबसे बड़ा प्रतिबंध रहा उसके साथ होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध खामोशी को अपनाने का। यदि राह चलते छेड़छाड़ की जाए तो वह प्रतिकार न करें सर झुका कर निकल जाए। यदि उसके साथ बलात्कार जैसी जागने वारदात हो तभी वह खामोश रहे क्योंकि समाज बलात्कार पीड़िता स्त्री को ही दोषी ठहराएगा। यदि जबरदस्ती प्रेम के नाम पर धोखा देकर उसे गर्भवती कर दिया जाए तो भी खामोश रहे क्योंकि उसे ही बदचलन ठहराया जाएगा। यदि घर की चौखट के भीतर परिवार के किसी पुरुष द्वारा उसे यौन अपराध का शिकार बनाया जाए तो भी वह मौन धारण किए रहे, क्योंकि इसमें भी स्त्री को ही दोषी ठहराया जाएगा। यही कारण है कि बलात्कार पीड़िता के प्रति उसके परिजन भी सहानुभूति रखने के बजाय भयभीत हो उठते हैं। यदि पीड़िता पुलिस में शिकायत करना भी चाहे तो परिजन उसे ऐसा करने से रोकते हैं। यदि परिजन साथ दे भी दें, तो समाज उन परिजन को भी कटघरे में खड़ा कर देता है कि “क्या आवश्यकता थी ढिंढोरा पीटने की जो हो गया सो हो गया।”
अपराधी बेटों को दोष नहीं किंतु पीड़िता बेटी को दोषी ठहराया जाना समाज की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। इसीलिए आज भी यह स्थिति है कि रात को कोई लड़की, कोई स्त्री घर से बाहर अकेली नहीं जाना चाहती है। जो लड़कियां शिक्षा अपने या नौकरी करने के लिए दूसरे शहरों में जाकर रहती हैं उन्हें भी कोई पुरुष सहारे के रूप में ढूंढना पड़ता है फिर चाहे वह सहारा ही उनके लिए मुसीबत क्यों न बन जाए।
नौकरी पेशा स्त्री यो का जीवन भी दोधारी तलवार पर चलता रहता है। स्त्री के लिए नौकरी करने का मतलब सिर्फ नौकरी करना नहीं होता है साथ में उसे घर की पूरी जिम्मेदारियां वहन करनी पड़ती हैं। एक पुरुष यदि नौकरी करके घर लौटता है तो घर में मौजूद स्त्री चाहे वह पत्नी, बहन या मां हो, चाय नाश्ता बना कर देती है। वहीं, यदि एक स्त्री काम करके कार्यस्थल से घर लौटती है तो उसे घर लौट कर सबके लिए न केवल चाय नाश्ता बल्कि रात का खाना भी बनाना पड़ता है। बहुत सी कामकाजी महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें कार्य स्थल पर आपत्तिजनक टीका टिप्पणी अथवा अनचाहे दबाव का सामना करना पड़ता है और ठीक वहीं दूसरी ओर घर में ताने सुनने पड़ते हैं। यह तमाम बातें पूरे समाज को विदित है। कुछ भी छुपा हुआ नहीं है फिर भी स्त्री की स्थिति में परिवर्तन कोई नहीं चाहता है।

वैवाहिक संबंध हो तो दहेज का दानव लड़की के कंधे पर बिठा दिया जाता है। जिससे मां-बाप उसके पैदा होने के साथ ही इस चिंता में डूब जाते हैं कि कल यह जब बड़ी होगी तो इसके लिए ढेर सारे दहेज का इंतजाम करना पड़ेगा। यदि ढेर सारा दहेज नहीं दिया गया तो लालची ससुराल वाले तरह-तरह से परेशान करेंगे और हो सकता है कि उसे मौत के घाट ही उतार दें। यह सब भी पूरा समाज जानता है। दहेज विरोधी कानून भी देश में लागू है लेकिन दहेज की प्रथा आज भी जारी है, सिर्फ तरीका बदल गए हैं। परंपरा रही कि दूल्हा बारात लेकर आता था लेकिन अब कई वैवाहिक बंधन के दौरान दुल्हन को “बारात” लेकर जाना पड़ता है।
नई पीढ़ी की लड़कियों को यह बंधन मंजूर नहीं हैं। उनका यही कहना है कि यह हमारा अपना जीवन है और इसे हमें अपनी तरह से जीने दो। हमें हमारे शहर में वे सड़क दो जिस पर हम निर्भय होकर चल सकें। हमें वह समाज दो जो हमारी प्रताड़ना के समय हमारे साथ खड़ा हो और हमें समर्थन दे। वे  पुरुष प्रजाति की विरोधी नहीं हैं, वे सिर्फ उन पुरुषों की विरोधी हैं जो उनको किसी न किसी रूप में मानसिक एवं शारीरिक के प्रताड़ना देते हैं।

दुर्भाग्य से आज भी स्थिति यह है कि जब बेटियां अपने विरुद्ध होने वाली अपराध के बारे में साहस करके आवाज उठाती हैं तो समाज दो फड़ में बंट जाता है। कोई उनके कपड़ों पर उंगली उठाता है तो कोई उनके आवाज उठाने पर उंगली उठाता है तो कोई उन्हें बदचलन ही ठहर देता है। गोया स्त्रियों को अपनी फट होने वाले किसी भी अपराध को लेकर आवाज उठाने या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अधिकार नहीं है। की अगुवाई में हुई थी। ओलंपिक स्तर की भारतीय महिला पहलवानों विनेश फोगाट और साक्षी मलिक द्वारा यौन शोषण के विरुद्ध पहली बार आधिकारिक तौर पर 18 जनवरी 2023 को आवाज़ उठाई गई थी। इस दिन देश के शीर्ष पहलवानों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली पुलिस ने अप्रैल 2023 के आखिर में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया और जून 2023 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। अगस्त 2026 में, दिल्ली की एक अदालत (राउज़ एवेन्यू कोर्ट) ने पर्याप्त सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बृजभूषण शरण सिंह को इन आरोपों से बरी कर दिया गया। एक सीधी चोट स्त्री समाज पर की जब विश्व स्तर की महिला खिलाड़ियों को न्याय नहीं मिल सकता तो एक सामान्य स्त्री को न्याय कैसे मिलेगा?

अपने जीवन में कभी ना कभी यौन शोषण का शिकार हुई महिलाओं ने “#मी टू” की मुहिम चलाई। यह विश्व व्यापी मुहिम थी। अनेक महिलाओं ने अपनी पीड़ा खुलकर बयान की। अनेक नामचीन पुरुष बेनकाब हुए। फिर भी वह हर स्त्री सामने नहीं आ सकी जो कभी ना कभी प्रताड़ना का शिकार बनी थी। सदियों के डर और बंधन का पहाड़ एक झटके में बिखर नहीं सकता था।
तितलियां पंख लेकर पैदा होती हैं। प्रकृति या कहें, ईश्वर भी उन्हें उनकी सुंदरता के साथ निर्भय होकर उड़ते हुए देखना चाहता है। युवा पीढ़ी की लड़कियां भी अपने अधिकारों को पाना चाहती हैं। जिस तरह तितली अपने पंख फैला कर उड़ना शुरू करती है, इसी तरह लड़कियां भी खुलकर सामने आकर अपनी बात रखने का साहस कर रही हैं। जो पहले कभी देखा न गया हो और अचानक दिखाई देने लगे तो समाज में अनेक लोगों को परेशानी का अनुभव होने लगता है। बेशक यह भी सही है कि जो पहले कभी किया न हो और अचानक किया जाने लगे तो उसमें कुछ गड़बड़ियां भी होती हैं, कुछ अनाड़ीपन भी होता है और कुछ आक्रोश की अधिकता भी रहती है। फिर भी ऐसा लगता है की आज की तितलियां किताब में एक स्मृति चिन्ह की तरह दबाकर अपना जीवन खोने के बजाय पंख खोलकर उड़ने का विकल्प चुनना चाहती हैं। इसी संदर्भ में निदा फ़ाज़ली का यह शेर याद आता है-


बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं,
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए।        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 07.10.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, October 6, 2026

पुस्तक समीक्षा | पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक   
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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वार्षिकांक    - बघेली अंजोर
संपादक     - डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’
प्रकाशक    - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी - 486661 (म.प्र.)
मूल्य       - 100/-
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मध्य प्रदेश के सीधी से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘बघेली अँजोर’’ का यह दूसरा वर्ष है तथा इसका पांचवा अंक (जुलाई- सितम्बर, 2026) वार्षिक अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका के संपादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उप सम्पादक गीता शुक्ला ‘‘गीत’’। प्रधान सह सम्पादक रामलाल मिश्र और शिवी शुक्ला हैं। यह पत्रिका उत्तर भारत की बोलियां के उत्थान के उद्देश्य से प्रकाशित की जा रही है जिसमें वर्तमान में पांच बोलियां शामिल हैं - बघेली, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी। पत्रिका में इसके उद्देश्य के संबंध में टीप लिखी गई है- ‘‘बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य संस्कृति की पूर्णतया अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका।’’
आज जब भारतीय भाषाओं को संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है ऐसे समय में बोलियां के पक्ष में खड़े होना संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हिंदी और उर्दू धीरे-धीरे हिंग्लिश और एंग्लो-उर्दू के हवाले होती जा रही है। बोलियों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। किंतु यह अच्छी बात है कि बोलियां लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं। बोलियों में लचीलापन होता है। वे विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों के शब्द ग्रहण करके भी अपनी मौलिकता बनाए रखती हैं। बोलियां इस कठिन दौर में भी अपनी यथावत पकड़ बनाए हुए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि व्यक्ति चाहे जितना भी पढ़ लिख जाए, अनेक भाषाओं का ज्ञाता बन जाए लेकिन जब उसे अपनी मूल संस्कृति से जुड़ना या उसे अभिव्यक्त करना होता है तो वह अपनी बोलियांे का ही सहारा लेता है। यानी बोलियां उसकी मूल अस्मिता, मूल क्षेत्रियता की पहचान होती हैं। अमेरिका या कनाडा में बसा हुआ व्यक्ति भी जब गर्व से कहता है कि मैं भारत के बुंदेलखंड का हूं, बघेलखंड का हूं या फिर भोजपुरी हूं तो इस उद्घोष में उसके क्षेत्र की बोली भी समाई रहती है।
‘‘बघेली अंजोर’’ के संपादकीय ‘‘कहब जरूरी है’’ में संपादक डॉ. ‘विकल’ ने “अक्षराणामकारोऽस्मि” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘अक्षराणामकारोऽस्मि’’ के सबसे बड़े जानकार औ समझै खातिर सबसे जादा जिम्मेदार हमरे साहित्यकारन क कहा जाय सकत है। दुइ-चारि लाइन से लै के कुछ किताबन तक के लिखड्या-पढ़ड्या अपने आप क सबसे बड़ा मानै लागत हैं। ओतनी दार उँ इया बिसरि जात हैं, के जउने अच्छर के साधना-आराधना उँ कै रहे हैं, उहे ब्रम्ह आय, उहे परम सत्ता आय, उहै भगमान आय। त फेर ओके सामने अहंकार काहे के? हँसी आबति है, दुक्खी लागत है इया देखि के, जब दुसरे बोली-भाखा के नाम पर, सहर, जिला, प्रदेस के नाम पर दुसरे क छोट बताय के ओकर हँसी उड़ायी जाति है। एतनै नहीं, ओकर जरि काटै म सगली ताकत झोंकि दीन जाति है। जउन हम कै रहेन है, उहै उत्तम है औ बाँकी सब घटिया। माने हमरे मन्दिर बाले भगमान असली औ बाँकी सब मन्दिरन के भगमान नकली?”
डॉ. विकल ने अपने संपादकीय में बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है। सचमुच, बोलियों को बहनों की तरह मिलकर रहना चाहिए। कोई भी बोली न तो बड़ी है और न छोटी। प्रत्येक की अपनी स्वतंत्र अस्मिता है लेकिन साथ ही शब्दों का बहानापा भी है, यह भूलना नहीं चाहिए। संपादकीय बघेली में लिखा गया है बघेली सरल बोली है, समझ में आ जाने वाली। किंतु संपूर्ण पत्रिका वर्तमान में पांच बोलियों का प्रतिनिधित्व कर रही है इसलिए यदि संपादकीय खड़ी बोली में होता तो अधिक उत्तम रहता विशेषरूप से वार्षिकांक का। वैसे, पांचों बोलियां आपस में इतनी घुली-मिली हैं कि इनमें से सभी को संपादकीय में कही गई बातें भलीभांती समझ में आ जाएंगी। किन्तु यह बघेली और उसकी निकटवर्ती बोलियों के अतिरिक्त भी अन्य बोली बोलने वाले पाठकों के हाथों में भी जाएगी और वे उत्सुकतावश इसे पढ़ने का प्रयास करेंगे।
वार्षिकांक के लिए रचनाओं का सटीक चयन किया गया है। इसका प्रथम आलेख लोकोक्तियों पर है। लोकोक्ति अर्थात लोक की उक्ति। लोक की वही उक्ति स्थायित्व पाती है जिसमें कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया हो। जिसमें संदेश हो, शिक्षा हो, चुटीलापन हो और जो स्मृति में अपना स्थान बना कर जबान पर चढ़ जाए और बार-बार बोली जाए। डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘‘चन्द्र’’ ने ‘‘लोकोक्तियाँ: हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ शीर्षक से लिखे गए लेख में लिखा है कि ‘‘लोकोक्तियाँ समय के अनुसार ढलती और बदलती भी रहती हैं। जिन्हें कल तक कोई भी नहीं पूछता था, जो चलन में नहीं थीं, वे भी कभी-कभी अपने को पाव-सेर से आगे पसेरी के भाव से स्थापित होने का दावा करती हैं। शायद इसीलिए कहा गया हो, कि ‘जेऊ रोड चलै न पाबै ओऊ रोड पसेरी तामैं’।’’
दूसरा आलेख अवधी की काव्यात्मक विशेषता के रूप में बरवै छंद पर लिखा गया है। आलेख “बरवै काव्य-परम्परा” में डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी ने अवधी काव्य में बरवै छंद के व्यापक प्रयोग पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “अवधी काव्य के व्यवहृत छन्दों में बरवै का स्थान विशेष है। वह अवधी का दुलारा छन्द है।’’
इस वार्षिकांक में कुल चार आलेख हैं - ‘‘लोकोक्तियाँः हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ - डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘चन्द्र’, ‘‘बरवै काव्य-परम्परा’’ - डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी, ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ - डॉ. संजय अलंग, ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’- डॉ. अक्षय पाण्डेय। ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ डॉ. संजय अलंग का शोधात्मक लेख है जिसमें उन्होंने गोण्ड जनजाति की उत्पत्ति, गोण्ड साम्राज्य, गोण्ड संस्कृति, रीतिरिवाज़, बोली, जीवनशैली आदि की विस्तृत जानकारी दी है।  डॉ. अक्षय पाण्डेय ने अपने लेख ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’ में इस तथ्य को उद्धृत किया है कि ‘‘नवगीत में मिथकों और सांस्कृतिक प्रतीकों का पुनर्पाठ मिलता है।’’
वार्षिकांक में चार कहानियां हैं। जिनमें गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ की बघेली कहानी ‘‘बुढ़ाई के गइलि’’, डॉ. शेषमणि शुक्ल की अवधी कहानी ‘‘जइसि नियति वइसि बरक्कति’’, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बुंदेली कहानी ‘‘बुकरिया’’ तथा डॉ. विष्णुदेव तिवारी की भोजपुरी कहानी ‘‘सेहुँड़ आ कदम्ब’’ है।
रामनाथ साहू के छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘‘आमापाली के इस्कूल’’ का अंश, जो छत्तीसगढ़ी बोली का साहित्यिक समृद्धि को रेखांकित करता है। चार लघु कथाएं भी शामिल की गई हैं। बघेली में  समरजीत वर्मा ‘बारी’ की लघुकथा ‘‘गरीबी रेखा के कार्ड, बालश्रमिक’’, बुंदेली में सिद्ध नारायण दुबे की ‘‘मैंने कओ तो का, पड़ोसी धर्म’’, छत्तीसगढ़ी में डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथा ‘‘भगवान के नाव म, डर’’ तथा भोजपुरी में अनीता मिश्र ‘‘सिद्धि’’ की लघुकथा ‘‘माई के सपना, मोबाइल वाला मास्टर’’।
डाॅ. विकल ने साहित्य की लगभग सभी बहुप्रचलित विधाओं को इस वार्षिकांक में स्थान देते हुए व्यंग्य और रेखाचित्र को भी स्थान दिया है। अवधी में अजय प्रधान की व्यंग्य ‘‘जीजा से फूफा’’ चुटीला और रोचक व्यंग्य है। लेखिका सुधा वर्मा का छत्तीसगढ़ी रेखा चित्र ‘‘फाफी’’। यह फाफी नामक महिला पर संवेदनात्मक रेखाचित्र है।
‘‘बघेली अंजोर’’ में एक स्थाई स्तम्भ रहता है ‘‘पुरखिन के कोठार से’’। इसमें इस बार डॉ. दुर्गेश दीक्षित की बुंदेली कहानी ‘‘तीसमारखाँ’’ दी गई है। समीक्षा के स्तम्भ में डाॅ. दया दीक्षित के बुंदेली उपन्यास की समीक्षा ‘‘मेरी दृष्टि में: ओरछा की गणेशकुँवरि’’ डॉ. सुषमा त्रिपाठी द्वारा की गई है। इसी स्तम्भ में गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ के लघुकथा संग्रह ‘‘को बनाइस’’ की समीक्षा डाॅ. सुषमा त्रिपाठी ने की है।
‘‘अड़ोस-पड़ोस’’ स्तम्भ में भगवती प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध ‘‘हरियरी’’ तथा ‘‘चलत-चलाबत’’ में डाॅ. सुधाकर तिवारी की रचना ‘‘अनन्या, राघव और रामायण’’ है। इसके साथ ही ‘‘रपट’’ के अंतर्गत रीवा शहर के प्रतिष्ठित कृष्णा राजकपूर आडिटोरियम में जनवरी-फरवरी 2026 में हुए पाँच दिवसीय छठवें चित्रांगन इंटरनेशनल फिल्म एवं थिएटर फेस्टिवल 2026 की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है।


कोई भी वार्षिकांक विशेष रूप से जो बोलियों पर केंद्रित हो, काव्य विधा के बिना हो ही नहीं सकता है। डाॅ. ‘विकल’ ने विभिन्न बोलियों में लिखे गए गीत और ग़ज़ल को पर्याप्त स्थान दिया है। गीत विधा में अनूप ‘‘अशेष’’ का ‘‘घुँघरा कस हो, पानी में’’ (बघेली), प्रदीप सारंग का ‘‘करमै पाठ पढ़ावै, बदरिया छाय रही’’ (अवधी), महेश कटारे ‘‘सुगम’’ का ‘‘हा हा दैया, का रै गी है’’ (बुन्देली), मिनेश कुमार साहू का ‘‘मुड़ी-पीरा माटी महतारी के, मुड़ी उल्हापाना (छत्तीसगढ़ी) तथा भालचन्द त्रिपाठी का ‘‘के समझावे, सुख के बिहान मंगली’’ (भोजपुरी) गीत है। ग़ज़लों के क्रम में रामसखा नामदेव की बघेली, डॉ. अशोक अज्ञानी की अवधी, राज सागरी की बुन्देली, जितेन्द्र कुमार ‘‘साहिर’’ की छत्तीसगढ़ी तथा मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़ल है।
‘‘बघेली अंजोर’’ का यह वार्षिकांक एक समृद्ध विशेषांक है जिसके लिए डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उनका संपादक मंडल प्रशंसा का पात्र है। बोलियों के उत्थान एवं संरक्षण की दिशा में ‘बघेली अंजोर’’ यूं भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, उस पर इस वार्षिकांक ने उसकी महत्ता पर चार चांद लगा दिए हैं। वार्षिक अंक का मूल्य 100 रुपए है तथा पत्रिका की वार्षिक राशि मात्र 280 रुपए है। सरकारी विज्ञापन अथवा किसी प्रतिष्ठान के विज्ञापन के बिना इस प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक उच्चकोटि का मिशन ही कहा जाएगा। उस पर यह वार्षिकांक न केवल बघेली और उसकी समीपवर्ती बोलियों को नवीन पटल देता है अपतिु बोलियों में हो रहे नवीन सृजन का भी साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यह एक संग्रहणीय वार्षिकांक है।         
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Saturday, October 3, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | कागा कां गए, करै दिन कढ़े जा रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
कागा कां गए, करै दिन कढ़े जा रए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
संकारे से भैया जू अपनी छत पे ठांड़े ‘कां-कां’ कर रए हते। कुल्ल देर हमने उनकी ‘कां-कां’ सुनीं, फेर जो रहाई ने परी सो हम सोई छत पे जा पौंचे। ऊ टेम पे बी बे ‘कां-कां’ कर रए हते। हमने उनसे पूछी, “काए भैया जू, हमें तो जे पतो आए के करै दिन में कागा खों बरा ख्वाए जात हैं, मनों उनकी बोली में चिचियाओ बी जात आए, जे मोए पता ने हती। का जो कोनऊं नओ ट्रेंड आए?”
“काए को नओ ट्रेंड? हम तो कागा हरों खों टेर रए।” भैया जू बोले।
“काए टेर रए? आपके टेरे से बे आ जैहें? आप तो घंटा खांड़ से चिंचिया रए, अबे लौं एक ने आओ।” हमने भैया जू से कई।
“जेई से तो हमें टेंशन हो रई। जो कागा खों भोग ने लगो तो पितर खफा हो जैहें।” भैया जू बोले।
“जे बी खूब रई! परकी साल आपई ने अपने दोरे को नीम को पेड़ कटा दओ, कागा हरों खों बेघर कर दओ, औ अब कां-कां करबे दते हो आप! अरे, अब बे जां रै रए हुइएं, उतई दिखाहें। इते काए खों ढू़कहें?” हमने सोई खरी-खरी कै दई।
“बात तो सांची आए! जब से नीम को पेड़ो काटो है एक बी कागा ने दिखाने। बाकी उत्तो ध्यान बी नईं गओ। बा तो करै दिन में उनकी जरूरत परत है।” भैया जू बोले।
“भैया जू ऐसो आए के कागा हरें ऊंचे पेड़न पे घोंसला बनाऊंत आएं। जो बड़े पेड़ ने बचाहो तो कागा बी ने बचहें।” हमने उनें समझाओ।
“मनो अबे हम का करें?” बे घबड़ाए से बोले।
“अब तो जेई करो के कागा के नांव को बुजुर्गन खों ख्वाओ औ उनकी सेवा करो। पितर हरें खुस हो जैहें। आपकी मताई आपखों टेर रईं, उनकी सुनो, उने टेम से खाबे खों औ दवाई देओ करो। कागा बी आपखों माफ कर दैहें।” हमने उने समझाई।
    बाकी बे कित्तो समझे पतो नईं? मनों आप ओंरे समझदार आओ सो, हमाई कई समझ लइयो ।
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 Thank You Patrika 🙏
Thank you Reshu Jain 🙏
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने की गांधी जयंती समारोह की अध्यक्षता

2 अक्टूबर 2026 की शाम काव्यायन एवं सहकार भारती संस्था के संयुक्त तत्वाधान में महात्मा गांधी जयंती समारोह का आयोजन किया गया जिसमें कार्यक्रम की अध्यक्षता मुझे सौंपी गई। इस अवसर पर संस्था द्वारा भारतीय सेना के सेवानिवृत्ति तीन सैन्य अधिकारियों, कृषिकों एवं साहित्यकारों का सम्मान किया गया।🇮🇳🏆🇮🇳
     इस अवसर पर मैंने अपनी पुस्तक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व "महात्मा गांधी" की चर्चा करते हुए महात्मा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संक्षेप में प्रकाश डाला तथा गांधी जी पर केंद्रित अपनी एक कविता "गांधी होना आसान नहीं" का भी पाठ किया।📖🎤🌹🎙️🌹

   श्रीमती ममता भूरिया जी को साहित्य एवं समाज सेवा के लिए सम्मानित होने पर हार्दिक बधाई 🌹💐🌹
       इस अवसर पर अधिवक्ता संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष एडवोकेट भाई अंकलेश्वर दुबे "अन्नी", उपाध्यक्ष एडवोकेट उत्कर्ष श्रीवास्तव कभी सम्मान किया गया। आयोजन मे समाज के विभिन्न कार्य क्षेत्र के विशिष्ट व्यक्ति उपस्थित रहे।🪷
       होटल यशोदा पैलेस के सभागार में आयोजित इस सफल आयोजन के लिए आयोजक द्वय अधिवक्ता भाई रामनरेश सिंह राजपूत एवं भाई आलोक जैन जी को हार्दिक बधाई एवं उनका हार्दिक आभार 💐🙏💐
      भाई अभय सिंह जी को भी हार्दिक धन्यवाद जिन्होंने आयोजन में अपनी सक्रियता बनाए रखी।💐
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बतकाव बिन्ना की | हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    ईके पैले गांव देहात खों ले के हमाए बिचार कछू और हते। हमने पन्ना जिला के छोटे से छोटे गांव देखे। दमोए के मुतके गांव देखे। छतरपुर जिला के मुतके तो नोंई पर कछू गांव जरूर देखे। टीकमगढ़ के गांवन से सोई गुजरे। सागर जिला के गांवन में तो जब चाए तब घुमक्कड़ी के लाने निकरबो होई जात आए। अबे लौं मोए जेई लगत रओ के गांव देहात में सुबिदाओं की कमी आए। उते चाए दबाई के लाने होए, चाए सुद्ध पानी के लाने, भौत तकलीफ उठाने परत आए। औ बेरोजगारी सो ऐसी के उते से गरीब-गुरबा खों पेट भरे के लाने सहर में जा के मजूरी करने परत आए। उतईं जो किसान आएं उने जी-तोड़ मेनत करने परत आए। सो मोए हमेसई गांव के लाने दया माया रई। मनो पिछली शनिच्चर खों हमें बा देखने को मिलो जा के बारे में हमने कभऊं सोची ने हती।
का भओ के हमें जाने रओ सीताराम रसोई नांव की संस्था। काए से के उते गरीब-गुरबा बुजुरगन खों मुफत में भरपेट खाना खवाओ जात आए। हम सोई उते भोजन कराबे के लाने जात रैत आएं। ई दार बी गए। उते अपने सगे हातन से भोजन परोसो। उते की खाना पकाने वारी बाइयों खों धुतिया भेंट करी। काए से हमें बे भौतई अच्छी लगत आएं, बिलकुल अपनी बैन घांई। औ उनकी मेनत औ ब्यौहार भौतई अच्छो रैत आए। फेर हम ओरन ने सोची के ऊंसई घरे लौटबे से अच्छो आए के तनक चक्कर काट के, एकाद गंाव देहात से घूमत चलें। अच्छो लगहे। सो सीताराम रसोई से निकर के पैले बालाजी मंदिर में शनि भगवान के दर्शन करे। बा मंदिर सोई ऊंची पहरिया पे बनो आए, सो उते जा के भौतई अच्छो लगत आए। सो, उते बालाजी हनुमान भगवान औ शनिदेव के दरसन करे हमने। फेर हम ओरन ने रस्ता पकरी मंदिर के नैचे से पांछू वारी। हम ओरन खों पतो ने हतो के हम ओरें कोन तरफी जा रए? मनो जा तो पता रई के अपने जिला से बायरे नईं जा रए। कछू दूर तो साजी रस्ता रई, फेर मनों रोड को नक्सा बदल गओ। साजी सी रोड पे गड्ढा मिलन लगे। दचका खात भए कछू दूर औ चले तो रोड कनारे ‘‘प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत’’ लिखों भओ बोर्ड दिखानों। हमने प्रधानमंत्री योजना वारी मुतकी रोडें देखी आएं मनो ऐसी गड्ढा वारी रोड पैली दार देखी। रस्ता में एक बड़ो स्कूल औ एक फैक्टरी दिखानी। मनो रोड की दसा से उनको कोनऊं मेल ने हतो।
चलो कछू नईं, गांव आए। ऊ रोड पे भैंसन ने चल-चल के गड्ढा बना दओ हुइए। जा सोस के हमने खुद खों तसल्ली दई। इत्ते में एक फेमस गांव को बोर्ड दिखानों। कछू नईं। गांव के बायरे से निकरी रोड पे बी कऊं-कऊं गिलावो सो मचो हतो। बा बी कछू नईं। काए से के अब बरसात के दिनां में गिलावो ने हुइए तो का धूरा उड़हे? बा गांव बड़ो हतो। गांव के बायरे के हिस्सा में एक तरफी नोने-नोने खेत हते। तो दूसरी तरफी जंगल विभाग वारों के सगोना के जंगल हते। बा सब देख के भौतई अच्छो लग रओ तो। ऊ सीनरी देखत समै रोड के दचका लौं बिसर गए। तनक देर बाद लगो के अब कोनऊं से पूछ लेव चाइए के हम ओरें कोन तरफी जा रए? लग तो रई हती के जोन तरफी बढ़ रए बा रोड चक्कर काट के राजघाट बंधान लौं जात हुइए। फेर बी कोनऊं से पूछ लेबो सई लगो। हमने संग वारे भैयाजी जू से कई के कोऊ दाऊ दिखाएं सो उनसे पूछ लइयो। मनो भैया जू खों दाऊ से पैले तीन मोड़ा दिखा गए। 12 ने तो 14 बरस के रए हुइएं। तीनों में से एक सायकिल लए हतो। मनो तीनोंई गुटखा खा रए हते। भैया जू ने उनईं तीनों से पूछ लई के जा रोड कोन गांव खों जा रई? जा सुन के एक मोड़ा ने अपने कुकुरमुत्ता घांई बालन पे हात फेरत भओ बड़े स्टाईल से पूछो आप ओरन खों कां जाने? भैया जू बोले के हमें राजघाट जाने। जा सुन के बा मोड़ा बोलो के फेर तो तुम ओरें आगे ई रोड पे चलके दाएं मुड़ जइयो। तब लौं दूसरो मोड़ा गुटखा अपने मों में डार के खींसा निपोरत भओ बोलो के दाएं नईं बाएं मुड़ियो। इत्ते में तीसरो मोड़ा बोलो इते कां चले आए, पांछे लौट जाओ। भैया जू ठैरे बुंदेलखंड के बायरे के सो बे उन ओरन की कई उत्ती समझ ने पाए। मनो मोए समझ में आ गई के जे मोड़ा गांव के भले आएं मनों ठैरे चंटा-पंटा। पूरे आवारा टट्टू। सो हमने भैया जू से कई के इन ओरन खों पतो नइयां, आप तो आगूं चलो, रोड कऊं तो पौंचाहे। 
हम ओरन की गाड़ी बढ़ी औ पांछू से उन तीनों की हंसबे की आवाज सुना परी। हमाओ जी तो ऐसो करो के गाड़ी रुकवाएं औ उतर के उन ओरन खों दो-दो थपाड़ा लगाएं। जरा-जरा से लरका औ गुटखा खा-खा के गर्रा रए। मनो हमने अपनों गुस्सा पे काबू करो औ बढ़ लए।
कछू दूर पे एक दूसरो गांव आ गओ। उते जो दिखानों, बा हम देखतई रै गए। उते एक दलान में छै-सात लुगवा बैठे पत्ता खेल रए हते। मनो सई कएं तो उते जुआ चल रओ हतो। चलो कछू नईं, गांव ठैरो। टेम पास। मनो गांव वारन को इत्ती फुरसत कां से मिल गई? ऊपरे से जां हम ओरन की गाड़ी उते से निकरी तो बे सब हम ओरन खों देखन लगे। जे ई कोई बीस कदम बाद एक घर के बायरे पट्टा घांईं बनो चबूतरा पे छै-सात लोग औ दिखाने। बे सोई फुरसत से बैठे गपिया रए हते। उतई एक टपरा हतो। चाय को। ऊमें चार जने बैठे हते। बे ओरें मोबाईल पे कछू देखने में मगन हते। बाकी हम ओरन की गाड़ी उते से कढ़ी तो सब के सब हम ओरन की तरफी घूरन लगे। भैया जू ने हमसे पूछी के इन ओरन से रस्ता पूछी जाए? हमने कई के नईं, जे ठलुआ हरें को जाने का बताएं। इते तो गाड़ी बी ने रोको, बढ़त चलो। मनो उन ओरन खो देख के हमें लगो के इन ओरन खों कछू काम-धंदा नइयां का? इने तो फुरसत के मारे टेम नइयां। औ ईसे बुरई बात जे के इते की लुगाइन खों जो ऊ तरफी से निकरने परत हुइए तो कित्तो बुरौ लगत हुइए? कुल मिला के बा सो अच्छो माहौल ने दिखानों। 
हम सोसन लगे के कछू गांव खों ई गुटखा औ मोबाईल ने का कर डारो। मेनत करबे वारे की जांगा इने ठलुआ बना डारो। ऐसई बुरए माहौल में मोड़ियां औ लुगाइयां खतरा में पर जात आएं। जा सोस के हमाओ मन दुखी होन लगो। इत्ते में कोनऊं हम ओरन की गाड़ी के पांछू से हार्न बजात सुनाई परो। पीछे देखत के शीश में देखो तो मोटरसायकिल वारो दिखानों। ऊके हार्न से भैया जू को दिमाग गरम हो गओ। उन्ने साईड में गाड़ी रोकी औ ऊंसे बोले के तुमें जल्दी आए सो तुमई पैले कढ़ जाओ। हमने देखी के ऊके मोटरसायकिल पे ऊके पांछू लुगाई औ बच्चा सोई बैठे हते। हम भैया जू खों कछू समझा पाउते के इत्ते में बा मोटर सायकिल वारे ने पूछी के आप ओरन खों राजघाट जाने? भैया जू बोले हऔ। सो बा बोलो के तो फेर हमाए पांछू-पांछू आ जाओ, हम सोई ऊ तरफी जा रए। ऊकी जा बात सुन के भैया जू को गुस्सा ठंडो पर गओ। औ हम समझ गए के जा मोटर सायकिल वारो ऊ गुटखा छाप लरकों के इते से हमाई बात सुन के पछांरें आ रओ हुइए। औ हमें रस्ता बताबे के लाने हार्न बजा रओ हतो। 
सो हम ओरन ने ऊपे भरोसा करो औ अपनी गाड़ी ऊकी मोटरसायकिल के पांछू लगा दई। गांव से निकरतई सांत अच्छी रोड मिलन लगी औ हम ओरें ऊके पांछू-पांछू चल परे। सातेक किलोमीटर चलबे के बाद बड़ी रोड दिखानीं। बा मोटरसायकिल वारो रुको औ बोलो के अब आप ओरें बायीं तरफी मुड़ जाओ औ जेई बड़ी रोड पे चल हो तो दसेक किलोमीटर पे राजघाट दिखान लगहे। ऊको दूसरी तरफी जाने रओ सो बा दूसरी तरफी मुड़ गओ। भैया जू ने ऊको धन्यबाद करो। जोन रोड पे हम ओरन खों ऊने पौंचाओ रओ बा सागर से जैसीनगर वारी रोड हती। ऊपे पौंच के हम ओरन खों रस्ता याद आ गओ। काए से के ऊ रोड पे चल के हम ओरें पैले एक बेर सिलवानी गांव लौं गए रए। सो, फेर तो साजी रोड पे गाड़ी दौरा दई। रस्ता में एक मंदिर पे रामधुन सोई सुनाई परी। फेर राजघाट दिखान लगो। सो ऐसी रई ऊ दिनां की सैर।
मनों एक बात हमें पता परी के सबरे गंाव एक सी दसा के नईयां। कऊं-कऊं गुटखा औ मोबाईल की हवा कछू ज्यादाई लग गई आए। ऐसे गांवन में मुतके ठलुआ बी आएं जोन ताश पत्ती खेलत बैठे रैत आएं। उते रोड पे चलत लुगाइयां कमई दिखानीं। औ जो ऐसे ठलुआ रोड के लिंगे बैठे होंए तो लुगाइयां निकरें बी तो कैसे? सो हमें गांव को जा दूसरो चेहरा देखबे को मौका सोई मिल गओ। मनो ऐसो माहौल होन नईं चाइए। बाकी हम नईं चात के कछू जने के मारे पूरो गांव को नांव धरो जाए सो हमने गांव को नांव नईं लिखो। बाकी जोन उते के रैबे वारे आएं औ ने तों उते से कढ़े हुइएं सो बे समझ जैहें। बाकी बा मोटर सायकिल वारे घांईं अच्छे लोग अबे बी उते रैत आएं। जोन से गांव की इज्जत बनी रैत आए। जे नोनी बात आए।            
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के गांवन पे सई से ध्यान देबे की जरूरत आए के नईं? औ कछू नईं तो उते गुटखा औ दारू पे लगाम लगाओ चाइए। संगे ठलुआ हरों से कछू काम लओ जाओ चाइए। कओ, सई कई के नईं?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Friday, October 2, 2026

गांधी जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यदि महात्मा गांधी के व्यक्तित्व को समझना है तो पहले उनके विचारों को जानना, समझना होगा। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

महात्मा गांधी जी को सादर नमन 🙏🇮🇳

      2 अक्टूबर, गांधी जयंती पर पढ़िए राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला की मेरी पुस्तक "महात्मा गांधी"... यह सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित है तथा ऑनलाइन उपलब्ध है।
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Wednesday, September 30, 2026

चर्चा प्लस | चर्चा प्लस मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य डॉ (सुश्री) शरद सिंह


चर्चा प्लस
मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के किसी सदस्य को कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरा हिल जाता है। कई गंभीर बीमारियों का असली कारण है मिलावटी खाद्य सामग्री। जैसे अच्छी सेहत के लिए फल खाने और दूध पीने की सलाह जी जाती है। पकने से पूर्व तोड़े गए फल जिन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है क्या अच्छी सेहत दे सकते हैं? या फिर इंजेक्शन लगा कर निकाला गया दूध सेहत दे सकेगा? उस पर स्वास्थ्य सेवा की आसमान छूती मंहगाई मानो गरीबों के जीने का हक छीन लेना चाहती है।

चाहे पपीता हो या सेव बहुधा समय से पूर्व पेड़ों से तोड़ कर केमिकल द्वारा पकाए जाते हैं और जिन्हें खाने पर क्या-क्या साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं इससे आमजन बेखबर है। कभी-कभार समाचार पत्रों या पत्रिकाओं में इस संबंध में जागरूकता वाले लेख प्रकाशित होते भी हैं तो उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ कर अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि जब उपभोक्ता फलों के बाज़ार में पहुंचता है तो केमिकल्स से पकाए और चमकाए गए फलों की सुंदरता से मोहित हो कर भूल जाता है कि उसने क्या पढ़ा था अथवा वे फल कितने नुकसानदेह हैं। फिर मसला यह भी तो है कि सही फल कहां से मिलें? न तो हर व्यक्ति के पास बाग है और न बागीचा। दो कमरे या एक कमरे में रहने वाला परिवार अपने लिए फल नहीं उगा सकता। उसे तो बाज़ार में मिलने वाले फलों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यही दशा सब्जियों की है। बड़े आकार की सब्जियां चाहे लौकी हो या कद्दू संदेह के घेरे में रहता है। क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें तेजी से बड़ा करने के लिए इंजेक्शन और केमिकल वाली खाद दी जाती है। लेकिन क्या किया जाए, यदि सब्जी खानी है तो जहर की मिलावट को भी अनदेखा करना पड़ता है और बदले में मिलती है गंभीर बीमारियां।
फलों को जल्दी और कृत्रिम रूप से पकाने के लिए मुख्य रूप से एथिलीन गैस और कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग किया जाता है। एथिलीन गैस एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है और व्यावसायिक रूप से स्वीकृत है। यह फलों में पकने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू करता है। एथेफोन तरल रूप में आता है जो पौधों या फलों के संपर्क में आने पर एथिलीन गैस में बदल जाता है। कैल्शियम कार्बाइड आम भाषा में ‘‘कार्बाइड’’ कहा जाता है। यह पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो फलों को जल्दी पकाता है। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले और कैंसरकारी तत्व हो सकते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध है। खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार केवल नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस के प्रयोग की अनुमति है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती।

पैदा होने से ले कर मृत्यु तक दूध जीवन के एक अवश्यक तत्व के रूप में जुड़ा रहता है लेकिन जब दूध भी मिलावटी और नकली हो तो? पशुओं में दूध उतारने या उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का इंजेक्शन लगाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान ऑक्सीटोसिन युक्त दूध पीता है, तो पेट के एसिड और पाचक एंजाइम इस प्रोटीन हार्मोन को पचा कर नष्ट कर देते हैं। यह सक्रिय रूप से रक्त में नहीं पहुंचता है। हालांकि भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पशुओं में इसके अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसका सबसे बुरा असर पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। बार-बार ऑक्सीटोसिन देने से पशुओं में बांझपन, हॉर्मोनल असंतुलन, थनैला रोग (डंेजपजपे) और प्रजनन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
नकली या सिंथेटिक दूध को असली जैसा दिखाने और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए कई खतरनाक और जहरीले रसायन मिलाए जाते हैं। दूध में प्रोटीन और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए यूरिया मिलाया जाता है, जो किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। दूध में झाग बनाने और उसे सफेद दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पाचन तंत्र खराब होता है और उल्टी-दस्त की समस्या होती है। कास्टिक सोडा अथवा कास्टिक पोटाश केमिकल दूध को फटने से बचाता है और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाता है, लेकिन पेट की अंदरूनी परत को जला सकता है। सोया रिफाइंड या आर्टिफिशियल फैट दूध में फैट (चिकनाई) की मात्रा को नियंत्रित करने और उसे असली जैसा गाढ़ा दिखाने के लिए मिलाया जाता है। फॉर्मेलिन यह एक जहरीला प्रिजरवेट है जो दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। इसके लंबे समय तक सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड भी दूध को फटने से बचाने के लिए मिलाया जाता है जो पाचन एंजाइमों को नष्ट करता है। स्टार्च या मैदा पानी मिलाने के बाद दूध का पतलापन छुपाने और उसे गाढ़ा रखने के लिए स्टार्च मिलाया जाता है। क्या यूरिया और कास्अिक सोडा से बनने वाला नकली दूध सेहत दे सकता है?
हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सा मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 12 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं के मंहगे होने का एक मुख्य कारण है महंगे आयातित चिकित्सा उपकरण और उनके अपग्रेड होने की उच्च लागत। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में कुशल डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा स्टाफ के बढ़ते वेतन व शुल्क। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का बढ़ता प्रसार। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार भारत में लोग अपनी जेब से इलाज का भारी-भरकम हिस्सा अर्थात लगभग 63 प्रतिशत खुद चुकाते हैं। कुछ प्रमुख महंगे उपचार और लागत अनुमान इस प्रकार है-
हार्ट बाईपास सर्जरी - लगभग 1.6 लाख से 4.5 लाख रुपये ।
कैंसर उपचार (कीमो थेरेपी रेडिएशन)- लगभग 10 लाख से 25 लाख रुपये ।
लिवर ट्रांसप्लांट- लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये।
यदि इन बड़ी बीमारियों की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो मामली सर्दी-जुकाम के लिए चिकित्सक को दिखा कर ईलाज कराना मंहगा पड़ता है। यही कारण है कि नीम हकीमों का यानी फर्जी चिकित्सकों का धंधा जोरों पर चलता रहता है और आम आदमी अपनी जान जोखिम में डालता रहता है।
यह सच है कि सरकार और कुछ निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के द्वारा सहायता देती हैं जैसे सबसे लोकप्रिय सरकारी योजना है आयुष्मान योजना। लेकिन यह भी सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि साठ वर्ष की आये भी इसके लिए योग्य घोषित कर दी गई है किन्तु जब कोई साठ से सत्तर के बीच की आयु का व्यक्ति आयुष्मान कार्ड  बनवाने का प्रयास करता है तो उसे निराशा हाथ लगती है। जो निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा का लाभ देती हैं वे पहले प्रीमियम भरवाती हैं, वह भी नियमित रूप। जिसके पास प्रीमियत भुगतान करने योग्य पैसे होंगे उसके लिए तो ठीक है किन्तु जो प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होगा उसका क्या होगा?
चाहे खाद्य सामग्री को दोष दें या लाईफ स्टाईल को मगर यह डरावना सच है कि पिछले दस वर्ष में घुटनों एवं जोड़ों की तकलीफ, मधुमेह, थायराइड, कोलोस्ट््राल बढ़ना आदि की समस्याएं कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में सबसे अधिक होने वाला प्रमुख हृदयरोग कोरोनरी धमनी रोग है, जिसके कारण अक्सर दिल का दौरा (हार्टअटैक) पड़ता है। इसमें हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में प्लाक (चर्बी और कोलेस्ट्रॉल) जमने से वे संकीर्ण हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप में धमनियों में रक्त का दबाव लगातार अधिक रहता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त जोर पड़ता है।हार्ट फेलियर में हृदय की मांसपेशियां इतनी कमजोर या सख्त हो जाती हैं कि वे शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाती हैं। अरिथ्मिया  यह दिल की धड़कन के अनियमित, बहुत तेज या बहुत धीमी होने की स्थिति है।
हृदय रोगों के मुख्य कारण है फैट, नमक, चीनी और फास्ट फूड से भरपूर आहार। ये सभी मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से दिल कमजोर होता है और वजन बढ़ता है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं। तंबाकू और सिगरेट का धुआं धमनियों की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाता है। अत्यधिक और लगातार तनाव धमनियों को प्रभावित करता है और अन्य जोखिम कारकों को गंभीर बनाता है।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में आज सभी जानते हैं, सभी स्वस्थ भी रहना चाहते हैं किन्तु शुद्ध खाद्य सामग्री और सस्ती बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आमजन का स्वस्थ रहने का सपना कभी पूरा नहीं होने पाता है। कई निजी चिकित्सा केन्द्र तो ‘‘लुटेरे’’ के नाम से कुख्यात रहते हैं किन्तु स्वस्थ होने की चाहत उन्हें उन ‘‘लुटेरों’’ के हाथों लुटने को मजबूर कर देती है। इसका कारण यही है कि आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाऐं निजी सेवाओं के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई और जोखिम भरी हैं। इस स्थिति में सुधार हो सकता है यदि सरकारी स्तर पर ईमानदार प्रयास किए जाएं। आखिर जीने का अधिकार तो हर किसी को मिलना ही चाहिए।        

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(दैनिक, सागर दिनकर में 30.09.2026 को प्रकाशित) 
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