Wednesday, April 14, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा | डाॅ. शरद सिंह


चर्चा प्लस        
 बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा
         - डाॅ. शरद सिंह                                                                 
      हमारी परंपराएं हमें संस्कार देती हैं। खान-पान की परंपरा हमें खाद्य-अखाद्य और कब क्या खाना चाहिए, इस बात का बोध कराती हैं। बुंदेलखंड की व्यंजन-परंपरा बहुत समृद्ध है किन्तु बर्गर, पिज्जा, चाउमिन ने इस पर भी अपना दुष्प्रभाव डाला है। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती व्यंजन-परंपरा की ।
कोरोना आपदा के पहले भोपाल एक माॅल के ‘फूडजोन’ में यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ था कि वहां पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों का भी एक ‘काॅर्नर’ है। उसके बाद झांसी के में भी बुंदेली फूड जोन काॅर्नर देखने को मिला। संयोगवश उन्हीं दिनों ‘इपिक चैनल’ के प्रसिद्ध टीवी शो ‘नाॅदर्न फ्लेवर’ में बुंदेली शादियों में बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यजनों पर एक कार्यक्रम देखा जिसमें ‘सिंदोरा-सिंदोरी’ जैसे व्यंजन बनाने की विधि बताई गई थी। इन सबको देख कर मुझे वो दिन याद आ गए जब बचपन में मैं बिरचुन यानी सूखे बेर का चूरा खाती हुई इंद्रजाल काॅमिक्स पढ़ा करती थी। स्वादानुसार नमक या शक्कर डाल कर बेरचुन का गाढ़ा घोल भी बनाया जाता था। मेरी मां खाना बनाने वाली महराजिन ‘बऊ’ के साथ मिलकर छुट्टी के दिन खुरमा-पपड़ियां बनाया करती थीं। महीनों तक रखे जा सकने वाले खुरमा-पपड़िया को हम बच्चों से बचा कर रखने के लिए ढेर सारे जतन करने पड़ते थे मां को। उन दिनों लपटा और लप्सी भी हमारी जबान पर चढ़ा हुआ था। चीले की फरमाईश तो आए दिन होती थी। गुड़ डले हुए गुलगुलों का स्वाद कभी भुलाया नहीं जा सकता है। मेरे बचपन के समय इतनी मंहगाई नहीं थी। चार की चिरौंजी सस्ती मिलती थी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि गुलगुलों में चिंरौंजियां भी डाली जाती थीं। पारंपरिक व्यंजनों का यह शौक मुझे अपनी मां से विरासत में मिला। लेकिन अब इस व्यस्त ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब घर में कोई विशेष पारंपरिक व्यंजन बन पाता हो। रिश्तेदारों एवं परिचितों के बच्चे तो पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और चाउमिन पर फ़िदा रहते हैं। रहा शादी-विवाह के समारोहों का सवाल तो वहां भी बुंदेली छोड़ कर विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों के स्टाॅल लगे होते हैं, गोया बुंदेली व्यंजन रोज घरों पर बन रहे हों। यही कारण है कि बुंदेलखण्ड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर होते जा रहे हैं।


ऐसा नहीं है कि बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का कोई मौसमी नियम ही न हो। किस मौसम में क्या खाया जाना चाहिए, इसका निर्देश साहित्य तक में मिलता है। जैसे -
चैते गुड, वैसाखे तेल, जेठे पंथ, अषाढ़े बेल
साउन साग, भादौं दही, क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिसरी, फागुन चना
जो यह बारह देई बचाय, ता घर वैद कभऊं नइं जाए।।

अर्थात चैत्र मास में गुड़ का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड़ कफकारी होता है। वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है। ज्येष्ठ मास में गर्मी की भीषणता रहती है अतः हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए। और भाद्रपद में दही पित्त को कुपित करता है। आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है। कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है,  उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही यानी मट्ठे से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए। पौष मास में धनिया, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना खाना उचित नहीं होता है। इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती।


सावन हर्रै भादों चीत। क्वार मास गुड़ खायउ मीत।।

कातिक मूली अगहन तेल। पूस में करै दूध से मेल।।

माघ मास घिउ खींचरी खाय। फागुन उठि के प्रात नहाय।।

चैत मास में नीम बेसहनी। बैसाके में खाय जड़हनी।।

          अर्थात् सावन मास में हर्रै, भादों मास में चिरायता, क्वार मास में गुड़ कार्तिक में मूली, अगहन में तेल, पौष मास में दूध, माघ मास में घी और खिचड़ी, फागुन मास में प्रातः स्नान, चैत मास में नीम का सेवन, वैशाख मास में जड़हन का भात खाना चाहिए। अब इस तरह का खान-पान चलन से बाहर होता जा रहा है और इन कहावतों के बारे में भी कम ही लोगों को ज्ञान है।

  

रहा पारंपरिक व्यंजनों का प्रश्न तो, पूड़ी के लड्डुओं का स्वाद वह कभी नहीं भूल सकता है जिसने उन्हें अपने जीवन में एक भी बार खाया हो। ये त्यौहारों बनाए जाते हैं। (चूंकि ‘थे’ लिखने में अंतस कचोटता है अतः मैं ‘है’ ही लिखूंगी) बेसन की बड़ी एवं मोटी पूड़ियां तेल में सेंककर हाथों से बारीक मीड़ी जाती है। फिर उन्हें चलनी से छानकर थोड़े से घी में भूना जाता है। उसके बाद शक्कर या गुड़ डाल कर हाथों से बांधा जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए कालीमिर्च अथवा इलायची भी डाल दी जाती है। इसी तरह है हिंगोरा। बिना मठे की बेसन की कढ़ी जिसमें हींग का तड़का लगाया जाता है। आंवरिया भी इसी श्रेणी का एक व्यंजन है। आंवरिया अर्थात् आंवले की कढ़ी। इसमें सूखे आंवलों की कलियों को तेल में भूनकर सिल पर पीस लिया जाता है। फिर बेसन को पानी में घोलकर किसी बर्तन में चूल्हे पर चढ़ा देते हैं और कढ़ी पक जाने पर, चूल्हे से उतारने के पहले इसमें आंवलों का चूर्ण और नमक डाल देते हैं। इच्छानुसार इसमें लाल मिर्च, जीरा, प्याज एवं लहसुन आदि भी पीस कर डाला जाता है। फरा भी एक पारंपरिक बुंदेली व्यंजन है। इसमें गेहूं के आटे को मांड़ कर छोटी-छोटी पूड़िया बेल ली जाती हैं फिर इन्हें खौलते हुए पानी में सेंका जाता है। बफौरी, मीड़ा, निघौना, रस खीर, बेसन के आलू, फरा, अद्रेनी, थोपा, पूड़ी के लडडू, महेरी या महेई, करार, मांडे, एरसे या आंसे, लपटा, हिंगोरा, आंवरिया, ठोमर, ठड़ूला, डुबरी, कचूमर, कुम्हड़े की खीर, गुना, खाकड़ा, लप्सी, रसाजें, खींच, बिरचून, लुचई, गकरिआ, पपड़िया, टिक्कड़, बरी, बिजौरा, कचरिया, खुरमा-खुरमी, बतियां आदि अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो बुंदेली रसोई के अभिन्न अंग हुआ करते थे किंतु अब ये इतालवी या चाइनीज़ फूड तले दबते जा रहे हैं। जबकि इनमें से अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो ‘फास्ट फूड’ की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।


यूं तो हमारे देश में व्यंजनों की संख्या का निर्धारण आमतौर पर छप्पन प्रकार के व्यंजनों के रूप में किया जाता है, किंतु बुंदेलखंड में सौ से भी अधिक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते रहे हैं। दुख तो तब होता है जब इन व्यंजनों में से कुछ को ‘स्ट्रीट फूड’ की श्रेणी में गिना जाता है। जो बुंदेली रसोईघर के राजा-रानी हुआ करते थे वे आज ‘स्ट्रीट फूड’ के रूप में बिकते हैं। यही है बाज़ारवाद का चमत्कार जिसने पारंपरिक व्यंजनों को घरों से बेघर कर के माॅल के आलीशान फूडजोन में पहुंचा दिया है जहां इनमें से कुछ व्यंजनों का अस्तित्व तो बचा हुआ है लेकिन दस रुपए के सामान को सौ रूपए में खरीद कर यह झूठा गुमान भी पालने का शगल आ गया है कि हम अपने पारंपरिक व्यंजनों को लुप्त होने से बचा रहे हैं। यद्यपि बुंदेलखंड में आयोजित किए जाने वाले बुंदेली उत्सव इन पारंपरिक व्यंजनों को पुनः चलन में लाने में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं तथा साहित्यकार पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों को पुस्तकाकार सहेज भी रहे हैं किंतु ये तभी चलन में लौट सकते हैं जब ये एक बार फिर हर घर की रसोई का हिस्सा बन जाएं। (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 14.04 .2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 7, 2021

चर्चा प्लस - बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : त्योहार-परंपरा - डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस        
बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : त्योहार-परंपरा                   
     - डाॅ. शरद सिंह                              
          जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है। परिवर्तन गतिशीलता का द्योतक होता है लेकिन स्वस्थ परंपराओं में परिवर्तन क्षेत्र की जातीय पहचान को संकट में डाल देता है। युवा पीढ़ी ऐसे कई पारंपरिक त्योहारों से दूर होती जा रही है जिनका जीवन, पर्यावरण और संस्कारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती त्योहार-परंपरा की।
बुंदेलखंड में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं जिन्हें बड़े-बूढ़े, औरत, बच्चे सभी मिलकर मनाते हैं। लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ बेटियां ही मनाती हैं, विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं। ऐसा ही एक त्यौहार है मामुलिया। बड़ा ही रोचक, बड़ा ही लुभावना है यह त्यौहार। यह जहां एक और बुंदेली संस्कृति को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर भोली भाली कन्याओं के मन के उत्साह को प्रकट करता है। दरअसल मामुलिया बुंदेली संस्कृति का एक उत्सवी-प्रतीक है। आज के दौड़-धूप के जीवन में जब बेटियां पढ़ाई और अपने भविष्य को संवारने के प्रति पूर्ण रूप से जुटी रहती है उनसे कहीं सांस्कृतिक लोक परंपराएं छूटती जा रही है मामुलिया का भी चलन घटना स्वाभाविक है। आज बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां नहीं जानती मामुलिया। यूं तो मामुलिया मुख्य रूप से क्वांर मास में मनाया जाता है। इस त्यौहार में अलग-अलग दिन किसी एक के घर मामुलिया सजाई जाती है। जिसके घर मामुलिया सजाई जाने होती है, वह बालिका अन्य बालिकाओं को अपने घर निमंत्रण देती है। सभी बालिकाओं के इकट्ठे हो जाने के बाद वे बबूल या बेर के कांटों में रंग-बिरंगे फूल लगा कर उसे सजातीं हैं। यही सजी हुई शाख मामुलिया कहलाती है। मामुलिया को सजाने के बाद भुने चने, ज्वार की लाई, केला, खीरा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके बाद बालिकाएं हाथों में हाथ डालकर मामुलिया के चारों ओर घूमती हुई गाती है-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया....’’। इस प्रकार गांव भर में घूमती हुई बालिकाएं नदी अथवा तालाब के किनारे पहुंचती हैं। वे मामुलिया को नदी या तालाब में सिरा देती हैं। मामुलिया सिरा कर लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता। कहते हैं कि पीछे मुड़कर देखने से भूत लग जाता है। घर लौटने पर वह बालिका जिसके घर मामुलिया सजाई गई थी, शेष बालिकाओं को भीगे चने का न्योता देती है। मामुलिया बेटियों के पारस्परिक बहनापे का भी त्यौहार है। इस त्यौहार में बड़ों का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है अतः इससे बेटियों में सब कुछ खुद करने का आत्मविश्वास और कौशल बढ़ता है। इस प्रकार के त्यौहारों को उत्सवी आयोजन के रूप में मनाते हुए बचाया जा सकता है। जैसे दिसम्बर 2012 में झांसी महोत्सव में भी मामुलिया सजाने की प्रतियोगिता करा कर बेटियों को मामुलिया के बारे में जानकारी दी गई थी। इसी प्रकार 12 अक्टूबर 2016 को हमीरपुर आदिवासी डेरा में ‘बेटी क्लब’ द्वारा लोक परंपरा का खेल मामुलिया और सुअटा खेला गया।  इसका संरक्षण आवश्यक है। क्योंकि यह परंपरा बेटियों के सम्मान के लिए बनाई गई है। ग्राम बसारी, हटा आदि लोकोसत्वों में भी मामुलिया जैसी परम्पराओं पर ध्यान दिया जाता है किन्तु जरूरी है शहरी जीवन को इन रोचक परम्पराओं से जोड़ना।

दीपावली के कई दिन पहले से ही घर की दीवारों की रंगाई-पुताई, आंगन की गोबर से लिपाई और लिपे हुए आंगन के किनारों को ‘‘ढिग’’ धर का सजाना यानी चूने या छुई मिट्टी से किनारे रंगना। चौक और सुराती पूरना। गुझिया, पपड़ियां, सेव-नमकीन, गुड़पारे, शकरपारे के साथ ही एरसे, अद्रैनी आदि व्यंजन बनाया जाना। बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह त्यौहार धनतेरस से शुरु होकर भाई दूज पर समाप्त होता है। बुंदेलखंड में दीपावली के त्यौहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो अब सिमट-सिकुड़ कर ग्रामीण अंचलों में ही रह गई हैं। जीवन पर शहरी छाप ने अनेक परंपराओं को विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया है। इन्हीं में से एक परंपरा है- घर की चौखट पर कील ठुकवाने की। दीपावली के दिन घर की देहरी अथवा चौखट पर लोहे की कील ठुकवाई जाती थी। मुझे भली-भांति याद है कि पन्ना में हमारे घर भोजन बनाने का काम करने वाली जिन्हें हम ‘बऊ’ कह कर पुकारते थे, उनका बेटा लोहे की कील ले कर हमारे घर आया करता था। वह हमारे घर की देहरी पर ज़मीन में कील ठोंकता और बदले में मेरी मां उसे खाने का सामान और कुछ रुपए दिया करतीं। एक बार मैं उसकी नकल में कील ठोंकने बैठ गई तो मां ने डांटते हुए कहा था-‘‘यह साधारण कील नहीं है, इसे हर कोई नहीं ठोंकता है। इसे मंत्र पढ़ कर ठोंका जाता है।’’ मेरी मां दकियानूसी कभी नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी मंत्र-तंत्र पर विश्वास किया लेकिन परंपराओं का सम्मान उन्होंने हमेशा किया। आज भी वे दीपावली पर पूछती हैं कि कील ठोंकने वाला कोई आया क्या? लेकिन शहरीकरण की दौड़ में शामिल काॅलोनियों में ऐसी परंपराएं छूट-सी गई हैं। दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने के पीछे मान्यता थी कि ऐसा करने से साल भर बलाएं या मुसीबतें घर में प्रवेश नहीं कर पातीं हैं। बलाएं होती हों या न होती हों किन्तु घर की गृहणी द्वारा अपने घर-परिवार की रक्षा-सुरक्षा की आकांक्षा की प्रतीक रही है यह परंपरा।

दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा रही है। आज पारंपरिक रीत-रिवाजों को मानने वाले घरों अथवा गांवों में ही दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती (सुरैती) बनाई जाती है। सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाते हैं। दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के  चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में ‘पना’ कहा जाता है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।

बुंदेलखंड में दशहरा-दीपावली पर मछली के दर्शन को भी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते चांदी की मछली दीपावली पर खरीदने और घर में सजाने की मान्यता भी बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में है। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला से लगभग 40 किमी. दूर उपरौस, ब्लॉक मौदहा की चांदी की विशेष मछलियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि चांदी की मछली बनाने का काम देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। उपरौस कस्बे में बनने वाली इन मछलियों को मुगलकाल के बादशाह भी पसंद करते थे। अंग्रेजों के समय रानी विक्टोरिया भी इसकी कारीगरी देखकर चकित हो गयी थीं। जागेश्वर प्रसाद सोनी उसे नयी ऊंचाई पर ले गये। मछली बनाने वाले जागेश्वर प्रसाद सोनी की 14वीं पीढ़ी की संतान राजेन्द्र सोनी के अनुसार इस कला का उल्लेख इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी किताब ‘‘आइने अकबरी’’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां के लोगों के पास बढ़िया जीवन व्यतीत करने का बेहतर साधन है, इसके बाद उन्होंने चांदी की मछली का उल्लेख किया और इसकी कारीगरी की प्रशंसा भी की है। इसके बाद सन् 1810 में रानी विक्टोरिया भी इस कला को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी थीं। उन्होंने सोनी परिवार के पूर्वज स्वर्णकार तुलसी दास को इसके लिए सम्मानित भी किया था। राजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के समय चांदी की मछलियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। क्योंकि मछली को लोग शुभ मानते हैं और चांदी को भी। उनके अनुसार धीरे-धीरे ये व्यापार सिमटता जा रहा है। कभी लाखों रुपए में होने वाला ये कारोबार अब संकट में है और चांदी की मछलियों की परंपरा समापन की सीमा पर खड़ी है।  (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 07.04 .2021 को प्रकाशित)
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Thursday, April 1, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : सिमटते खेल | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस        
   बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : सिमटते खेल                
           - डाॅ. शरद सिंह
    बुंदेलखंड की संस्कृति परंपराओं की धनी है लेकिन जीवन की आधुनिक शैली ने इसकी स्वस्थ परंपराओं को भी ग्रहण लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कई बुंदेली परंपराएं आज अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। खेल, त्योहार, व्यंजन, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य आदि की परंपराएं प्रत्येक क्षेत्र के लोकाचार को दर्शाती हैं। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट पर ‘‘चर्चा प्लस’’ में क्रमशः चर्चा करूंगी। तो इस बार के चर्चाप्लस में कर रही हूं संकटग्रस्त खेलों की चर्चा।
बुंदेलखंड में भी ऐसी अनेक परंपराएं हैं जो इस क्षेत्र की विशेषताओं को दर्शाती हैं। लेकिन आधुनिक जीवन शैली में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने इन परंपराओं का समय छीन लिया है। अब परिवार के सदस्य काना-दुआ, सोलह गोटी खेलने अथवा लोकनाट्य देखने के बजाए सोशल मीडिया पर समय बिताना अधिक पसंद करते हैं। बेशक सोशल मीडिया का अपना अलग महत्व है लेकिन अपनी स्वस्थ परंपराओं को जीवित रखना भी ज़रूरी है, भले ही यह एक अनुष्ठान की तरह ही क्यों न हो।     
 
बुंदेलखंड में आज से पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक विद्यालयों में ग्रीष्मावकाश होना बच्चों के लिए किसी महा-उत्सव से कम नहीं होता था। वार्षिक परीक्षा के दौरान भी एक उत्साह मन में कुलबुलाता रहता था कि इस बार छुट्टियों में कहां जाना है और कितना खेलना है। एक मई से 30 जून तक होेने वाले ग्रीष्मावकाश में खेलों की बाढ़ आ जाती थी। जिनको घर से बाहर निकल कर खेलने की अनुमति रहती वे गिल्ली-डंडा, पिट्टू जैसे खेल खेलते। जिन्हें घर के भीतर रह कर खेलने को मिल पाता वे चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा, लंगड़ी धप्पा जैसे खेल खेलते। इन खेलों को खेलने के लिए उन्हें कहीं जा कर प्रशिक्षण प्राप्त नहीं करना पड़ता था। वे सहज प्रवृति से इन खेलों को खेलते। इन खेलों के दौरान बच्चों के बीच परस्पर प्रेम भी बढ़ता और कभी-कभी छोटे-मोटे झगड़े भी होते जो दूसरे दिन तक स्वयं ही समाप्त हो जाते। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। अब बच्चों के परीक्षा परिणाम मेरिट के ‘कटआॅफ’ पर टिके होते हैं। गरमी की छुट्टियां बाद में होती हैं, अगली कक्षा में दाखिला पहले हो जाता है। जिससे उनकी छुट्टियां पढ़ाई के बोझ से मुक्त नहीं हो पाती हैं। उस पर ‘समर कैम्प’ और ‘स्किल डेव्हलपमेंट क्लासेस’, ‘ग्रूमिंग क्लासेस’ ‘काम्पिटीशन क्रैश कोर्स’ आदि नाना प्रकार के शैक्षणिक कैम्प तथा कोर्स रहते हैं जिनमें शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चा ‘क्लासरूम इफैक्ट’ से मुक्त नहीं हो पाते हैं। वे पाश्चात्य ज्ञान भले ही अर्जित कर लें किन्तु अपनी परम्पराओं का ज्ञान उन्हें नहीं मिल पाता है और न ही स्वतः करने की उनकी स्किल  का विकास हो पाता है। जबकि पारंपरिक खेल बच्चों द्वारा ही ईजाद किए जाते रहे हैं और उनमें संशोधन, परिवर्द्धन भी बच्चों द्वारा ही किया जाता रहा ।

बुन्देली लोकसंस्कृति भी जीवन के अनुरुप मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने में सक्षम रही है। इस तथ्य का एक उदाहरण उन खेलों को के रूप में देखा जा सकता है जिन्हें बालिकाएं सहज भाव से बड़ी रूचि के साथ खेलती बुन्देली बालिकाएं जिन खेलों को खेलती हैं उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए तो उन खेलों की उपादेयता का पता चलता है। ये खेल अंतः क्रीड़ा (इनडोर गेम) तथा बर्हिक्रीड़ा (आउटडोर गेम) दोनों तरह के होते थे। जिन खेलों को कमरे, आन्तरिक आंगन, छज्जे, अटारी अथवा छत पर खेला जा सकता है वे इनडोर गेम की श्रेणी में आते थे। इसके विपरीत जिन खेलों को बाहरी आंगन, मैदानों, खलिहान के परिसर में खेला जाता था वे आउटडोर गेम कहलाते। 
बुन्देलखण्ड बालिकाओं में जो खेल अधिक लोकप्रिय हैं तथा परम्परागत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक प्रवाहित होते आ रहे हैं, वे हैं- चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा, लंगड़ी धप्पा अथवा गपई समुद्र, गुंइयां बट्ट, घोर-घोर रानी, घोड़ा पादाम साईं, रस्सी-कूद, अंगुल-बित्ता, रोटी-पन्ना, पुतरा-पुतरियां, छिल-छिलाव, आंख-मिंचउव्वल, लंगड़ी छुआउल, छुक-छुक दाना आदि। देश की स्वतंत्रता के पूर्व सुरक्षा की दृष्टि से बुंदेलखंड में बालिकाओं को घर से बाहर कम ही जाने दिया जाता था तथा देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बुन्देलखण्ड में विकास की दर अपेक्षाकृत धीमी रही। ऐसी स्थिति में स्वप्रेरित खेलों ने उनके जीवन को मनोरंजन के साथ-साथ सुदृढ़ता प्रदान की। 

बुंदेली खेलों में चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा जैसे खेल संकटों को दूर कर के उन पर विजय पाने का साहस और कौशल बढ़ाते तो वहीं लंगड़ी धप्पा अथवा गपई समुद्र,  घोड़ा पादाम साईं, रस्सी-कूद, अंगुल-बित्ता, छिल-छिलाव, आंख-मिंचउव्वल, लंगड़ी छुआउल जैसे खेल शारीरिक संतुलन के साथ-साथ व्यायाम और आपसी सामंजस्य की शिक्षा देते। घोर-घोर रानी जैसे खेल अन्याय का विरोध करना सिखाते। वहीं छुक-छुक दाना जैसे खेल छल-कपट के प्रति सचेत रहने की चेतना जगाते। रोटी-पन्ना, पुतरा-पुतरियां जैसे खेल गृहस्थ जीवन, पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं के प्रति सम्वेदनशील बनाते। इस प्रकार बुन्देली बालिकाओं के जीवन में पारम्परिक खेल जीवन के पाठ की भूमिका निभाते हैं।

बालकों में गिल्ली-डंडा, कबड्डी, कुश्ती लोकप्रिय रही। लेकिन आज बालक-बालिकाओं दोनों के हाथों में मनोरंजन के इलेक्ट्राॅनिक उपकरण आ जाने से उन पारंपरिक खेलों से वे दूर होते जा रहे हैं जो उनमें शारीरिक क्षमता का विकास करते तथा आपसी सहयोग भावना को बढ़ाते। अब तो हाथों में झेंगाबाॅक्स का रिमोट अथवा मोबाईल का स्क्रीन होता है और होता है अकेले रहने का जुनून। इस जुनून को पबजी जैसे खेल बढ़ावा दे कर मौत के मुंह तक पहुंचा देते हैं। बुंदेलखंड के बच्चे तो अब अपने पारम्परिक खेलों को ठीक से जानते ही नहीं हैं। यह दशा शहरों में ही नहीं गंावों में भी हो चली है। गिल्ली-डंडा की जगह क्रिकेट ने ले रखा है। अब पढ़ने वाले लड़के कंचे नहीं खेलते। लड़कियां भी चपेटा खेलने के बदले चैटिंग करने में रमी रहती हैं। यही कारण है कि जहंा एक ओर पारंपरिक खेल दम तोड़ रहे हैं वहीं बच्चों की स्वाभाविकता, मासूमियत और खिलंदड़ापन गुम होता जा रहा है। फिज़िकल फिटनेस के लिए पैसे दे कर जुंबा और जिम में भर्ती होने में शान समझा जाता है।   
   
फिर भी कुछ लोग हैं जो बुंदेलखंड के पारम्परिक खेलों को बचाने का उल्लेखनीय प्रयास कर रहे हैं। छतरपुर जिले के ग्राम बसारी में डाॅ. बहादुर सिंह परमार के अथक प्रयासों से विगत 22 वर्ष से लगातार बुंदेली उत्सव का आयोजन किया रहा है। खजुराहो के निकट होने के कारण इस उत्सव का आनंद लेने न केवल स्वदेशी अपितु विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं। बुंदेली खेलों को सहेजने की दिशा में इस उत्सव में बुंदेली खेल प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं। ऐसा ही एक बुंदेली उत्सव दमोह जिले की हटा तहसील में भी होता है। इस उत्सव में भी बुंदेली खेलकूद प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं। झांसी, हटा आदि स्थानों में भी बुंदेली उत्सव मनाया जाता है। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित गौर गौरव उत्सव में भी बुंदेली खेल आयोजित किए गए थे। ये खेल थे-गिल्ली-डंडा, पिट्टू, काना-दुआ, कुश्ती, कबड्डी, गिप्पी आदि। इस तरह के प्रयास देख कर अवश्य लगता है कि अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो विलुप्त होते बुंदेली खेलों के आत्र्तनाद को सुन रहे हैं और उसके अस्तित्व को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु खेलों का सीधा संबंध बच्चों से होता है और जब तक बच्चों को इन खेलों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक इन खेलों की दीर्घजीविता खतरे में रहेगी। (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 01.04 .2021 को प्रकाशित)
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Thursday, March 25, 2021

चर्चा प्लस | इस कोरोना काल में होली का त्योहार, बनाएं यादगार | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस   
 इस कोरोना काल में होली का त्योहार, बनाएं यादगार
     - डाॅ. शरद सिंह
        हमने हमेशा होलिका दहन किया है, हमने हमेशा एक-दूसरे के गालों पर गुलाल मला है। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा। तो क्या कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों के कारण इस बार होली फीकी रहेगी ? हरगिज़ नहीं, अगर हम चाहें तो अपनी इस बार की होली का पूरा आनन्द ले सकते हैं और इसे यादगार भी बना सकते हैं। यह कैसे संभव है? तो आइएआज का ‘चर्चा प्लस’ है इसी मुद्दे पर।
एक व्यक्ति हमेशा टूर पर दूसरे शहरों में जाता था। टूर पर जाने के लिए वह आॅनलाईन बुकिंग कराता। जाने का दिन और गाड़ी तय, लौटने का दिन और गाड़ी तय। हमेशा यही रूटीन। इसमें कुछ भी विशेष नहीं। लेकिन एक बार वह टूर पर बाहर गया और जब लौटने का समय आया तो पता चला कि किसी कारण से उसकी ट्रेन कैंसिल हो गई है। टिकट का पैसा तो आॅनलाईन रिफंड हो जाना था लेकिन समस्या थी वापस घर पहुंचने की। उसने प्राईवेट टैक्सी बुक की और टैक्सी पर सवार हो कर घर लौट पड़ा। दुर्योग से बीच रास्ते में टैक्सी में कुछ ख़राबी आ गई। कई घंटे भूखे-प्यासे रहते हुए सड़क के किनारे गुज़ारने पड़े। जैसे-तैसे टैक्सी में आई ख़राबी दूर हुई और वह व्यक्ति फिर चल पड़ा अपने घर की ओर। इस बीच उसके मोबाईल का चार्ज भी ख़त्म हो गया था। घरवालों से बात किए बिना घंटों गुज़र गए थे। उसे पता था कि उसके घरवाले उसकी चिन्ता में व्याकुल हो रहे होंगे। ड्राईवर के फ़ोन से घरवालों से बात करने का प्रयास किया तो नेटवर्क ने साथ नहीं दिया। तमाम विपरीत परिस्थितियों से जूझता हुआ अंततः वह अपने घर पहुंचा। उसके सकुशल घर पहुंचने पर उसके घर वाले खुश और वह भी खुश। जैसे खुशी की घटना हमेशा चर्चा का विषय बनी रहती है ठीक वैसे ही दुख और कष्ट की घटना भी हमेशा चर्चा का विषय बन कर रोचकता का कारण बना रहती है। वह व्यक्ति आज भी अपनी उस कष्टप्रद यात्रा के बारे में हंस-हंस कर चर्चा किया करता है। सभी रुचिपूर्वक उसके अनुभव भरे उसके संस्मरण सुना करते हैं। यही तो मंत्र होता है विपरीत परिस्थितियों पर विजय हासित करने का और उन्हें अपने अनुकूल ढाल कर यादगार बना लेने का।

इस बार होली का त्योहार आने के पहले ही कोरोना संक्रमण ने फिर अपने पांव पसारने शुरु कर दिए हैं। पिछले साल की तरह इस बार भी होली का त्योहार ऐसे समय में आ रहा है जब एक बार फिर से कोरोना वायरस महामारी का खतरा बढ़ गया है। पिछले कुछ दिनों से कोरोना के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार भी पहले की तरह होली का त्योहार फीका चला जाएगा? होली खेलने की दृष्टि से परिस्थितियां प्रतिकूल हैं। इसलिए जरूरी है कि अपने घर में परिवार के साथ ही होली मनाई जाए। टोलियों में और दूसरों के घर जाकर इस बार होली न खेंले। इससे कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। अक्सर होली में रंग लगाने में लोगों का हाथ, मुंह, आंख सभी संपर्क में आते हैं, इस बार इससे बचना होगा। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों पर नियंत्रण पाने के लिए भारत सरकार की ओर से जारी निर्देश का पालन किया जाना अनिवार्य है। सार्वजनिक स्थानों पर सामूहिक होली मिलन समारोह प्रतिबंधित रहेगा। सार्वजनिक होलिका दहन कार्यक्रम नहीं होगा। हर हाल में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन जरूरी है। सैनिटाइजर का उपयोग करना अनिवार्य है। निज-निवास में होली मिलन में सम्मिलित होने वाले व्यक्तियों की थर्मल स्क्रीनिंग जरूरी है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो आयोजनकर्ता और कार्यक्रम के अहम लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए होली अपने परिवार के साथ घर पर ही मनाना है और सैनिटाइजर का उपयोग करते हुए हर्बल कलर का प्रयोग करना है।

मध्यप्रदेश में ही विगत 7 दिनों के औसत के अनुसार, प्रदेश में प्रतिदिन औसत 1019 पॉजिटिव मामले आ रहे हों तो सतर्कता बरतनी जरूरी है। मध्यप्रदेश में कोरोना के मामले में लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में सरकार सख्ती के साथ-साथ लोगों को जागरूक भी कर रही है। रविवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने राज्य में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को लेकर कहा है कि महामारी की रोकथाम के लिए लॉकडाउन को छोड़कर दूसरे उपाय करने होंगे। इसलिए होली के चल समारोह और मेला प्रतिबंधित रहेंगे। मध्य प्रदेश सरकार ने दो दिन पहले कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए होली के त्यौहार को लेकर गाइडलाइन जारी की है। इसके अनुसार, होली, रंगपंचमी पर न सामूहिक भागीदारी के कार्यक्रम होंगे और न जुलूस निकाला जा सकेगा। होली पर सार्वजनिक कार्यक्रमों को अनुमति नहीं दी जाएगी। कोरोना की नई गाइडलाइन के मुताबिक, होली, रंगपंचमी पर सामूहिक भागीदारी के कार्यक्रम नहीं होंगे। खुले स्थान पर होने वाले बड़े कार्यक्रम भी नहीं होंगे। हालांकि व्यक्तिगत कार्यक्रमों को कहीं नहीं रोका जाएगा। होली के रंग खेलने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होंगे लोगों को अपने घरों में ही होली के रंग खेलनी पड़ेगी। यह तय किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति कोरोना की गाइडलाइन का पालन करता हुआ नहीं पाया जाएगा तो फिर उसके खिलाफ चालानी कार्रवाई की जाएगी।
तो ऐसी परिस्थियों से घबराना कैसा? क्यों न इस बार की होली को ऐसी यादगार बनाई जाए कि इस कोरोना संकट के गुज़रने के बाद हम सभी हंस-हंस के अपने अनूठे अनुभवों को आपस में साझा करते रहे। और आगे चल कर अपने नाती-पोतों को भी मज़े लेते हुए किस्से सुना सकें कि जब एक बार कोरोना आपदा में होली का त्योहार पड़ा तो हमने इस तरह होली मनाई थी। वैसे भी हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होली का त्योहार बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह रंगों का पर्व है। होली आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का त्योहार है। यह आपसी भाईचारा को दर्शाता है। पूर्णिमा की रात को होलिका दहन किया जाता है। उसकी अगली सुबह यानी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को रंग वाली होली खेली जाती है। ज्योतिष विद्वानों का कहना है कि इस साल होली के पर्व पर 500 साल बाद एक अदभुत संयोग बन रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि भी पड़ रही है। साथ ही इसी दिन ध्रुव योग का भी निर्माण भी हो रहा है।  इसी दिन सर्वार्थसिद्धि योग के साथ ही अमृतसिद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। अर्थात इस बार होली सर्वार्थसिद्धि योग के साथ- साथ अमृतसिद्धियोग में मनाई जायेगी। ऐसा दुर्लभ योग 500 साल बाद बन रहा है। इसके पहले यह दुर्लभ योग 03 मार्च 1521 को पड़ा था। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल होली 29 मार्च 2021 को मनाई जायेगी, इस दिन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि भी पड़ रही है। साथ ही इसी दिन ध्रुव योग का भी निर्माण भी हो रहा है।  इसी दिन सर्वार्थसिद्धि योग के साथ ही अमृतसिद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। अर्थात इस बार होली सर्वार्थसिद्धि योग के साथ- साथ अमृतसिद्धियोग में मनाई जायेगी। ऐसा दुर्लभ योग 500 साल बाद बन रहा है। इसके पहले यह दुर्लभ योग 03 मार्च 1521 को पड़ा था। 

तो चलिए तय किया जाए कि इस बार हम कैसे होली मनाएं यह दुर्लभ संयोग वाली होली यादगार बन जाए। हमारे पास आपसी संपर्क का सबसे अच्छे साधन के रूप में सोशल मीडिया तो है ही। तो हम सोशल मीडिया पर हंसी-खुशी के सकारात्मक, उत्साहवर्द्धक संदेश, चित्र, मीम आदि एक-दूसरे को भेज सकते हैं। यदि चाहें तो अच्छी क्वालिटी की डिब्बाबंद मिठाइयां होमडिलीवरी के द्वारा परस्पर भिजवा सकते हैं। सबसे अच्छा है कि परिवार के सभी लोग मिल कर कुछ अच्छा-अच्छा पकाएं और साथ बैठ कर उसे खाने का आनंद उठाएं। होली का सही माने में मजा लेना है तो स्वाद और सेहत दोनों को ध्यान में रखते हुए होली के व्यंजन घर पर ही बनाएं। होली पर घर में बनी ठंडाई, शरबत, गुझिया, कांजी वडा, पापड़ खाएं और इस त्योहार का मजा उठाएं। अगर आप अपने बढ़ते वजन को ले कर परेशान हैं लेकिन साथ ही होली का मजा भी लेना चाहते हैं तो हर चीज खाएं लेकिन सीमित मात्रा में। 

विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत यह भी है कि जो रंग या गुलाल ज्यादा चमकदार होते हैं उनमें ज्यादा कैमिकल मौजूद होते हैं। इसलिए ऐसे रंगों से बचें। क्योंकि रंगों व गुलाल को चमकीला बनाने के लिए उन में घटिया अरारोट या अबरक पीस कर मिला दिया जाता है। बाज़ार में घटिया क्वालिटी के जो रंग बेचे जाते हैं वे ज्यादातर औक्सीडाइज्ड मैटल होते हैं। हरा रंग कौपर सल्फेट, काला रंग लेड औक्साइड से तैयार किया जाता है। ये रंग बहुत ही खतरनाक होते हैं। आंखों को हरे रंग से बचाना बहुत ही जरूरी है। बेहतर यही है कि हर्बल रंगों से होली का आनंद लें। परिवार में एक-दूसरे को हर्बल गुलाल लगाएं। यह शर्तिया कहा जा सकता है कि कोरोना आपदा समाप्त होने के बाद हम अपनी इस होली को एक खास संस्मरण की तरह एक-दूसरे को सुनाएंगे और मजे लेंगे। आखिर होली यादगार होगी तभी तो याद रहेगी वर्षों तक। याद रखें इस बार की होली एक सेहतमंद होली हो। एक शानदार और एक यादगार होली।     
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  (दैनिक सागर दिनकर 25 .03 .2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, March 17, 2021

चर्चा प्लस | भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुवारे | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस 
भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुआरे 
- डाॅ. शरद सिंह
        यदि दुनिया में ‘पाप’ की कोई अवधारणा है तो सबसे बड़ा पाप है - किसी की भावनाओं से खेलना। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे पापियों की कोई कमी नहीं है जो दूसरों की भावनाओं को हथियार बना कर उन्हीं पर वार करते हैं। इंटरनेट की आभासीय दुनिया में सच और झूठ के बीच फ़र्क़ करना बहुत कठिन है। प्रेम और विश्वास के नाम पर छलावा इंटरनेट पर हमेशा सबसे ऊपर ट्रेंड करता रहता है।
कोरोना वायरस आपदा से जब दुनिया अचानक थम-सी गई तो इंटरनेट की दुनिया ने लोगों के बीच की पारस्परिक दूरियों को मिटाया। उन्हें एक-दूसरे से जुड़े रहने में मदद की। लेकिन इंटरनेट ने जीवन को जितना सुविधाजनक बनाया है, इस इंटरनेट से उतने ही ख़तरे बढ़े हैं। आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने वाले लोगों ने इसका इसका प्रयोग अपराध के हथियार के रूप में करने से बाज नहीं आते हैं। भारत इससे अछूता नहीं है। एक मां सोचती रही कि उसका लाड़ला बेटा घंटों अपने कमरे में बैठा पढ़ाई करता रहता है। उसने अपने पढ़ाकू बेटे के खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा। ‘‘मुझे डिस्टर्ब मत करो’’ जैसी झिड़कियां भी झेला। मगर जब भयावह सच्चाई सामने आई तो मां स्तब्ध रह गई। वह अपने जिस बेटे को पढ़ाकू समझती थी। जिसके लिए वह गवर्् से कहती फिरती थी कि मेरा बेटा दिन-रात पढ़ाई में जुटा रहता है, वही बेटा इंटरनेट जुआरी और शराबी निकला।  घटना छत्तीसगढ़ की है। वैसे इस तरह की घटना किसी भी राज्य, किसी भी जिले की हो सकती है। रायगढ़ में 17 साल के एक लड़के ने ऑनलाइन गेम के चक्कर में फंसकर 75 हजार रुपये का कर्ज़ ले लिया और इसी के चलते उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। उसने अपने दोस्त से ‘फ्री फायर’ गेम में गन के अपडेट और बाकी फीचर्स खरीदने के लिए पैसे लिए थे और जिसे वह लौटा नहीं पाया। इससे नाराज होकर उसके दोस्त ने उसे शराब पिलाकर उसका गला काट दिया। इंटरनेट पर ‘पब्जी’, ‘ब्लूव्हेल’ और ‘मोमो’ जैसे आत्मघाती गेमिंग ने कुछ साल पहले ही चेतावनी दे दी थी कि इस तरह के गेम एक नशे की तरह होते हैं और खेलने वाले के मन में चुनौती का जुनून जगा कर उन्हें आत्महत्या या हत्या करने तक को विवश कर देते हैं। युवाओं के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन कर सामने आई है इस तरह की गेमिंग।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डाटा के मुताबिक वर्ष 2017 में 21796 मामले आए, वर्ष 2018 में 27248 मामले आए और वर्ष 2019 में 44546 मामले सामने आए। आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि प्रति वर्ष साइबर क्राइम में वृद्धि होती जा रहा है। सरकार ने इनसे निपटने के लिए साइबर पुलिस स्टेशन, सूचना प्रौद्यिगिकी अधिनियम 2000 में साइबर क्राइम को खत्म करने के लिए कई प्रावाधान जोड़े हैं। लेकिन हमेशा की तरह सिर्फ़ कानून बन जाने से सबकुछ नहीं हो जाता है। महज़ सावधानी ही है जो किसी भी अपराधी से बचाए रखती है। इंटरनेट की दुनिया में अपराध का कोई एक चेहरा नहीं है। किसी भी उम्र, किसी भी लिंग का व्यक्ति इसका शिकार बन सकता है।  
एक युवती सोशल मीडिया एक युवक से दोस्ती कर बैठी। दोनों को परस्पर प्रेम हो गया। युवक ने मीठी और अपनेपन की बातों से लड़की का विश्वास जीता और उसे उकसा कर उसकी कुछ न्यूड फोटो हासिल कर लीं। इसके बाद ही युवती के उस कथित प्रेमी ने अपना असली चेहरा दिखा दिया। उसने युवती को धमकी दी कि अगर वह पैसे नहीं देगी तो तो वह उन न्यूड फोटो को सोशल मीडिया पर अपलोड कर देगा। युवती घबरा गई। आरोपी युवती को लगातार ब्लैकमेल करता रहा और रुपए ऐंठता रहा। उसने लगभग ढाई लाख रुपए ऐंठ लिए। उसके बाद जब युवती ने रुपए दे पाने में असमर्थता जताई तो उस युवक ने कुछ आपत्तिजनक काम कर के रुपए जुटाने के लिए दबाव डाला। जिसके लिए युवती तैयार नहीं हुई और उसने साहस का परिचय देते हुए पुलिस में इसकी शिकायत कर दी। पुलिस ने साईबर क्राईम शाखा की मदद से आरोपी को धर दबोचा। आरोपी को उसके किए की सज़ा तो जरूर मिलेगी लेकिन युवती के विश्वास और सम्मान को जो ठेस पहुंची, उससे उबर पाना उस युवती के लिए बहुत कठिन साबित होगा। लेकिन उसे यह सीख अवश्य मिल गई कि इंटरनेट पर सबकुछ अच्छा या सबकुछ सुरक्षित नहीं होता है। इंटरनेट पर अनेक फ्रेंडशिप साईट्स हैं जहां अपराधियों फ़र्ज़ी परिचय, फ़र्ज़ी तस्वीरें लगा कर अकाउंट खोल लिए जाते हैं। उनके निशाने पर युवक, युवती, बच्चे, बूढ़े सभी होते हैं। इन सबके साथ तरीका एक ही अपनाया जाता है- भावनाओं को भड़का कर अपने प्रभाव में ले लेना और अपने अनुसार चलने को उन्हें विवश करना। बच्चों को गेमिंग के लिए, युवक-युवतियों को प्रेम के नाम पर और बड़े उम्र के व्यक्तियों को उनके एकाकीपन में भावनात्मक सहारा देने का ढोंग कर के उनके साथ छल किया जाता है।  

जहां तक भावनाओं को भड़का कर छल करने का अपराध है तो अभी पिछले दिनों इसी प्रकार की घटना सामने आई जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया। इस घटना में एक पाकिस्तानी महिला एजेंट के हनीट्रैप में भारतीय सेना का एक जवान फंस गया। वह महिला एजेंट वीडियो कॉल पर न्यूड होकर उस जवान से अश्लील बातें किया करती थी। साईबर सुरक्षा के सामने यह तथ्य आने पर उस जवान को सेना की खुफिया जानकारी विदेशी मुल्क को देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अब इस बात की जांच की जा रही है कि उस महिला ने उस जवान से कहीं कोई खुफ़िया बातें तो नहीं जान ली हैं। जाहिर है कि वह पाकिस्तानी महिला ऐजेंट ने सेना के जवान की कमजोर मनोवृत्ति का फ़ायदा उठाया।

इंटरनेट पर सोशल मीडिया तो भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का गढ़ बना हुआ है। जिसके कारण कई बार माहौल गरमाने लगता है और पुलिस व्यवस्था को यथार्थ के बदले आभासीय दुनिया से उपजे खतरों के पीछे दौड़ना पड़ता है। महिलाओं और उसमें भी विशेषरूप से स्कूल-काॅलेज जाने वाली लड़कियों को इससे विशेष खतरा रहता है। बदनीयत लड़के पहले मित्र बनते हैं फिर अवसर पाते ही विशेष ऐंगल से ली गई सेल्फी या फिर मित्रता प्रेम में बदल चुकी हो तो भावुक पलों का मोबाईल-वीडियो बना लेते हैं और फिर उसे इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर लड़की को ब्लैकमेल करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे अपराध पहले नहीं होते थे। लेकिन एक पीढ़ी पहले तक ऐसे अपराधों को उंगलियों पर गिना जा सकता था। तब लड़की द्वारा लिखे गए प्रेमपत्र बदनीयत लड़कों के हथियार होते थे लेकिन वह उन्हें लड़की के माता-पिता या रिश्तेदारों तक ही भेजने की क्षमता रखता था। लेकिन आज एक अपलोड लड़की की गोपनीयता को पल भर में पूरी दुनिया के सामने सार्वजनिक कर सकता है। यह अपराध भावनाओं के साथ किया गया ऐसा अपराध है जो हत्या से भी अधिक जघन्य है। सिर्फ लड़की नहीं वरन किसी सभ्रांत पुरुष या लड़के की आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर उसका जीना हराम करने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि कभी कोई प्रोफेसर इस अपराध की चपेट में आता है तो कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता।

आज का युग कम्प्यूटर, मोबाईल और इंटरनेट का युग है। इंटरनेट की मदद के बिना किसी बड़े काम की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में अपराधी भी तकनीक के सहारे हाईटेक हो रहे हैं। वे अपराध करने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वल्र्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑनलाइन ठगी या चोरी भी इसी श्रेणी का अहम अपराध होता है। किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की श्रेणी में आते हैं। साइबर क्राइम दुनिया भर में सुरक्षा और जांच एजेंसियां के लिए परेशानी का कारण साबित हो रहा है। लेकिन कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाईल का प्रयोग करने वालों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनसे भी जाने-अनजाने में कोई साइबर क्राइम तो नहीं हो रहा है। जहां तक संभव हो आपत्तिजनक संदेशों को फार्वर्ड करने से बचने में ही भलाई है। साथ ही, संदिग्ध-संवेदनशील संदेशों को कुछ पल ठहर कर परखना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जाने-अनजाने हम अपनी भावुकता के हाथों ही ठगे जाएं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सोशल मीडिया के अपराधी दूसरों के दिमाग पर कब्जा कर के अपने अपराधों को अंजाम देते हैं। इसी लिए सतर्क रहते हुए सोशल मीडिया में मौजूद अपराधियों से अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को बचाए रखना जरूरी है। वरना हर साईबर अपराधी ऐसा मछुआरा के जिसके लिए हर इंटरनेट सर्फर जाल में फंसाने योग्य एक मछली है।
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(दैनिक सागर दिनकर 17.03.2021 को प्रकाशित)
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Monday, March 15, 2021

पेंटिंग्स वर्कशॉप | विज्ञान में रंग | डॉ शरद सिंह

प्रिय ब्लॉग साथियों,  पेंटिंग्स का मुझे बहुत शौक़ है। मेरा एक पेंटिंग्स ब्लॉग भी है-  
और फेसबुक पेज भी...
यह सच है कि लेखन और सामाजिक संपर्क कार्यों के कारण यह शौक़ ज़रा पीछे रह गया है। फिर भी जब भी किसी पेंटिंग एक्जीबिशन या वर्कशॉप में जाने का अवसर मिलता है मैं ज़रूर जाती हूं।
         मेरी और मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह का बचपन से ही पेंटिंग में रुचि रही है। बचपन में हम दोनों ऑक्साईड कलर और पेस्टल कलर्स से काग़ज़ पर पेंटिंग किया करती थीं। फिर काग़ज़ के अलावा कैनवास, कांच, लकड़ी और कपड़े पर भी पेंटिंग्स की। लोक और समकालीन दोनों विधाएं पसंद हैं। 
     अभी हाल ही में शहर के 'रंग के साथी' ग्रुप के असरार अहमद और अंशिता वर्मा ने एक पेंटिंग वर्कशॉप किया जिसकी थीम थी 'विज्ञान में रंग'। हम दोनों बहनों ने वर्कशॉप देखा। वर्षा दीदी ने पेंटिंग्स की कला समीक्षा भी की जो 'आचरण' समाचारपत्र में प्रकाशित हुई है।
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Sunday, March 14, 2021

भोपाल के रवीन्द्र भवन में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महोत्सव में डाॅ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा कहानी पाठ

 

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021 

प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवीन्द्र भवन में महिला एवं बाल विकास विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर 09 मार्च'21 को "साहित्य और समाज में स्त्री-स्वर" विषय पर आयोजित कार्यक्रम के अंतर्गत मेरे द्वारा कहानी पाठ किया गया।

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

हमारा भारतीय समाज अनेक विडम्बनाओं से घिरा हुआ है। जब कोई स्त्री संतान के रूप में बालिका को जन्म देती है तो अनेक घरों में आज भी उसे दोषी ठहराया जाता है। उस पर यदि तीन बेटियां हो जाएं तो उस स्त्री पर दबाव और अधिक बढ़ जाता है। कई घटनाओं में उसके ससुरालजन ही नहीं वरन् उसका पति भी उसे ठुकरा देता है या फिर उसकी उपेक्षा करने लगता है। मेरी कहानी में भी एक ऐसी ही स्त्री है जो तीन बेटियों की मां है और अपने पति के उपेक्षा की शिकार है। उसकी इस दशा का फ़ायदा उठाने की नीयत से एक लम्पट पुरुष उसके समीप पहुंचने का प्रयास करता है। यहीं से शुरू होती है उस स्त्री के अंतर्द्वद्व और निर्णय की कथा।

स्त्री सरोकार की मेरी इस कहानी में स्त्री के स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान का केन्द्रीय भाव था कि एक लाचार-सी दिखने वाली अपढ़ महिला किस तरह किस तरह एक लम्पट पुरुष को अपनी मज़बूरी का फ़ायदा उठाने से रोक सकती है। - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

Dr (Miss) Sharad Singh Storytelling  at Ravindra Bhavan, Bhopal on International Woman's Day Celebrated by Woman & Child Walfare Diptt. MP, 08 March 2021

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