Sunday, March 8, 2026

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 पर आपके शहर की प्रबुद्ध बहनों के साथ डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ये तस्वीरें जिनमें मैं कल अपनी बहनों के साथ रही, पत्रिका टॉकशो के दौरान ❤️....
🚩 और  आकाशवाणी केंद्र सागर में कवयित्री गोष्ठी के सिलसिले में साथ-साथ...
🙋 यद्यपि ये सभी तस्वीरें 'ऑफ द रिकॉर्ड' हैं 😀🌻🌹
❤️👭 We will always be together like this👭❤️

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"मातृशक्ति के नव स्वर, मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं" में डॉ (सुश्री) शरद सिंह, राजनीति वाला पोस्ट

"राजनीति वाला पोस्ट" में "मातृशक्ति के नव स्वर, मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं" शीर्षक से डॉ ब्रह्मदीप आलूने के लेख में  स्वयं के बारे में देखकर अत्यंत सुखद लगा।
    👇इसे आप विस्तार से पढ़ सकते हैं इस लिंक पर👇
🙏 हार्दिक धन्यवाद डॉ ब्रह्मदीप आलूने एवं  राजनीति वाला पोस्ट  🙏
🙏 हार्दिक आभार भाई पंकज सोनी जी 🙏
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दैनिक भास्कर द्वारा चुनी गईं सागर शहर की विशिष्ट महिलाओं में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🌹🙏🌹
अभीभूत हूं मेरी लेखनी के प्रति इस विश्वास के लिए...
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सुरक्षित सफर के लिए पिंक टैक्सी चलाई जाए - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पत्रिका द्वारा आयोजित टॉक शो में

🌹 हार्दिक आभार 'पत्रिका' महिलाओं की समस्याओं और उनकी आवाज़ को मुखर करने का अवसर देने के लिए 🙏🙋
🌹 हार्दिक धन्यवाद पत्रिका की प्रखर पत्रकार प्रिय रेशु जैन ❤️
🌹 जी हां, राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण 'पत्रिका' द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष टॉक शो का आयोजन किया गया, जिसमें मेरे सहित शहर के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न प्रबुद्ध महिलाओं ने अपने विचार रखें....
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आकाशवाणी सागर की कवयित्री गोष्ठी का संचालन एवं काव्य पाठ डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा

8 मार्च राष्ट्रीय महिला दिवस पर आकाशवाणी सागर द्वारा आयोजित कवि गोष्ठी का सुबह 9:00 बजे प्रसारण किया गया। इस गोष्ठी का संचालन मैंने किया था तथा इसमें मैंने अपनी काव्य रचनाएं भी सुनाई थी ...
🙋हार्दिक आभार श्री दीपक निषाद जी, केंद्र निदेशक आकाशवाणी सागर का 🚩 🙏🚩
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Saturday, March 7, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
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बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     कछू जने कछू ज्यादई स्याने होत आएं। पलकां पे परे-परे मोबाईल पे उंगरिया फेर-फेर के मनो स्क्रीन की मसाज कर रए होंए, लेकन जो उनसे पूछो के काए भैया, ऊ कार्यकरम आप ने दिखाने? सो, बे जेई कैंहें के का कएं बेजा बिंधे रए। मनो ऊनसे ज्यादा बिजी तो ई दुनिया ने हुइए। जेई से बा कहनात कई जात आए के फुरसत के मारे टेम नइयां। बाकी अपने इते एक से बढ़ के एक कहनात कई जात आएं। जैसे, चित्त तुमाई पट्ट तुमाई - मने दोई तरफी से लाभई-लाभ। जाके जैसी नदियां- नारे ऊसईं ओके भरका - मने जोन जैसो हुइए वा की संगत औ करम सोई ऊसईं हुइएं। एक कहनात औ आए जो सबई खों पता आए के जबरा मारे औ रोन न दे। मने एक तरफी तो परेसान कर रए औ ऊपे से सिकायत बी नईं करन दे रए।

     आप ओरें सोच रए हुइयो के जे सबरी कहनातें हमें काए याद आ रईं? सो, बात जे आए के अपने ई सहर में टिरेफिक की दसा ऊंसईं होत जा रई के इते के बराती ने उते के न्यौतार। मने कोऊ पूछबे, देखबे वारो नइयां। खास- खास चौराए में टिरेफिक की बत्ती हप्ता-खांड़ बंद डरी रैत आए, मनो कोनऊं खों फिकर नईं। झुंड के झुंड कुत्ता सगरे में फिर रए, मनो कोनऊं खों फिकर नईं। औ बा टाटा की लेन सो भांटा निकरी। कां तो चौबीस घंटा पानी की कई गई रई, मनों दो दिनां में नल आ जाएं सो खुद को रामधनी समझो। लीकेज देखबे वारो सो ऊंसई कोनऊं नईंयां। सो, अखीर में जे कहनात औ सुन लेओ के अपन इते टेंसूआं ढा रए औ बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए। अब ईको मतलब आप ओरें खुदई सोचियो। जै रामजी की!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, March 6, 2026

चर्चा प्लस | युद्ध के संभावित दंगल के बीच बुंदेली होली का संदल | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस        
युद्ध के संभावित दंगल के बीच बुंदेली होली का संदल 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                           होली परस्पर मैत्री और भाईचारे का त्यौहार है। जाति, धर्म, समुदाय का भेद भूल कर सभी आपस में गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। परन्तु आज वैश्विक स्तर पर जिस तरह युद्ध के बादल छा चुके हैं उन्हें देखते हुए सभी का चिंतित होना स्वाभाविक है। हमारे देश में यह कोई नहीं चाहता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध की नन्हीं-सी लपट भी आए। ऐसे चिंता भरे गरमाए माहौल में बुंदेली होली का स्मरण ही किसी संदल अर्थात चंदन की सुगंध भरी ठंडक से कम नहीं है। अतः राजनीतिक तथा यौद्धिक तनाव को भूल कर हम बुंदेली होली की विशेषताओं आनन्द लें।          
          
जब बात हो बुंदेलखंड होली की तो यहां की परम्पराओं और कथाओं में उत्सवधर्मिता को बखूबी देखा जा सकता है। बुंदेलखंड की वे महिलाएं जो हर दिन समस्याओं का सामना करती हैं लेकिन उनके भीतर मौजूद उत्सवधर्मिता होली आते ही उनके साहसी व्यक्तित्व को सबके सामने ला देती है। कवि पद्माकर ने अपने इस कवित्त में बुंदेलखंड की महिलाओं के साहस भरे पक्ष को बड़ी सुंदरता से सामने रखा है -
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी
नैन नचाय कही मुसकाय -लला फिर आइयो खेलन होरी 

बरसाने की तरह बुंदेलखंड में भी कुछ स्थानों पर ‘लट्ठमार‘ होली खेलने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। झांसी जिले के पुनावली कलां गांव में होली के अवसर पर महिलाएं गुड़ की भेली एक पोटली में बांधकर कर पेड़ की डाल पर टांग देती हैं। फिर महिलाएं लट्ठ लेकर स्वयं उसकी रखवाली करती हैं। जो भी पुरुष इस पोटली को लेने का प्रयास करता है, उसे महिलाओं के लट्ठ का सामना करना पड़ता है। इस रस्म के बाद ही यहां होलिका दहन होता है और फिर रंग खेला जाता है। इस परम्परा के संबंध में एक कथा प्रचलित है कि राक्षसराज हिरणकश्यप के समय होलिका विष्णुभक्त प्रह्लाद को अपनी गोदी में लेकर जलती चिता में बैठी थी। वहां उपस्थित महिलाओं से यह दृश्य देखा नहीं गया और उन्होंने राक्षसों के साथ युद्ध करते हुए विष्णु से प्रार्थना की कि वे प्रहलाद को बचा लें। उन साहसी महिलाओं की पुकार सुन कर विष्णु ने प्रहलाद को बचा लिया। इसी घटना की याद में ’लट्ठमार होली’ का आयोजन किया जाता है, जिसके द्वारा महिलाएं यह प्रकट करती हैं कि वे अन्याय के विरुद्ध लड़ भी सकती हैं।
बुंदेलखंड में हमीरपुर (उ.प्र.) के कुंडौरा गांव में भी लट्ठमार होली खेली जाती है। यहां रंगों की होली एक नहीं बल्कि दो दिन होती है। होलिका दहन के ठीक अगले दिन महिलाएं होली खेलती हैं और उसके बाद दूसरे दिन पुरुष होली खेल पाते हैं। पहले दिन की होली में महिलाओं का जोर चलता है। इस दिन पुरुष अपने घर से निकलने से हिचकते हैं। जो पुरुष घर से बाहर नजर आ जाता है उसे महिलाओं के लट्ठ की मार का सामना करना पड़ता है। इसलिए रंगवाली होली के पहले दिन वे महिलाओं से बच कर रहते हैं। दूसरे दिन वे महिलाओं के साथ मिल कर होली खेल पाते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे एक रोचक कथा है। कथा के अनुसार ग्राम कुंडौरा में कभी एक रसूख वाला व्यक्ति हुआ करता था जिसका नाम था मेंहर सिंह (या मेंबर सिंह)। एक बार होली के त्यौहार पर जब गांव के राम-जानकी मंदिर में फाग गाई जा रही थी। उसी समय मेंहर सिंह ने आपसी रंजिश में मंदिर में ही एक व्यक्ति की हत्या कर दी। उसने वहां उपस्थित लोगों को भी धमकाया। क्योंकि उसे संदेह था कि मंदिर में उसके दुश्मन को पनाह दी गई थी। इस घटना से डर कर गांव वालों ने होली का त्योहार मनाना छोड़ दिया। वर्षों तक गांव में होली नहीं मनाई गई। तब वहां की महिलाओं ने पहल की और वे हुरियारों की तरह होली खेलने लट्ठ ले कर निकल पड़ीं। तभी से कुंडौरा में लट्ठमार होली खेली जाने लगी। दरअसल स्त्रीशक्ति की कथा कहती है बुंदेलखंड की होली।
बुंदेलखंड में प्रचलित होली की इन कथाओं और परम्पराओं के संदर्भ में कवि पद्माकर का यह कवित्त सटीक बैठता है जिसमें यहां की महिलाओं के साहस भरे पक्ष को बड़ी सुंदरता से सामने रखा गया है -
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुसकाय ’’लला फिर आइयो खेलन होरी।

ऐसा नहीं है कि बुंदेली महिलाएं सामान्य होली के अलावा सिर्फ लट्ठमार होली ही खेलती हों। अनेक स्थानों पर वे फूलों की होली भी खेलती हैं। बुंदेलखंड के मध्यप्रदेशी अंचल के सागर नगर में गोपालगंज झंडा चैक स्थित श्री नृत्यगोपाल मंदिर में होलाष्टक के अवसर पर महिलाएं राधा-कृष्ण के साथ फूलों की होली खेलती हैं। वे फाग एवं भजन गाती हैं, नृत्य करती हैं तथा परस्पर एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा करती हैं। महिलाओं द्वारा फूलों से होली खेलने की परम्परा उत्तरप्रदेश के बुंदेली अंचल कुलपहाड़ में भी है। कुलपहाड़ महोबा जिले में स्थित है। टेसू के फूलों की वर्षा और ईसुरी के गीतों के गायन के साथ यहां फूलों की होली खेली जाती है।
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...

बुंदेलखंड में माना जाता है कि होली का त्योहार बुंदेलखंड से ही आरम्भ हुआ। एक किंवदंती के अनुसार झांसी से लगभग 66 कि.मी. दूर स्थित एरच नामक गांव से इसकी शुरुआत हुई। कथा के अनुसार एरच कभी राजा हिरयकश्यपु की राजधानी हुआ करता था।एरच में ही बालक प्रहलाद को होलिका अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठी थी, किन्तु प्रहलाद सही-सलामत बच गया और होलिका स्वयं जल कर भस्म हो गई। इसके बाद ही होलिका दहन की परम्परा आरम्भ हुई जो धीरे-धीरे समूचे देश में फैल गई। बुंदेलखंड के कई इलाकों में पंचमी तक होली खेली जाती है। 
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...

मध्यप्रदेश के अशोक नगर से लगभग 75 कि.मी. दूर है करीला। रंगपंचमी के अवसर पर इस छोटे से गांव में भीड़ उमड़ने लगती है। लाखों की संख्या में लोग पहुंचकर यहां स्थित सीता माता के मंदिर में गुलाल अर्पित करते हैं। एक किंवदंती के अनुसार यहीं ऋषि बाल्मीकि के आश्रम में सीता माता ने लव-कुश को जन्म दिया था। लव-कुश के जन्म पर स्वयं अप्सराओं ने यहां नृत्य किया था। नृत्य की इस परम्परा को बेड़नी नर्तकियां आज भी जारी रखे हुए है। मनौतियां पूरी होने पर भी श्रद्धालु मंदिर में गुलाल चढ़ाते हैं और रंग-गुलाल उड़ाते हुए बेड़नियों का नृत्य कराते हैं। धर्म, रंग और मान्यताओं का सुंदर मेल यहां देखने को मिलता है। 
   
राजकिशोरी महल बिच खेलत रे होरी।
कर झटकत घूंघट पट खोलत,
मलत कपोलन रोरी। महल...
कंचन की पिचकारी घालत,
तक मारत उर ओरी। महल...
सोने के घड़न अतर अरगजा,
लै आईं सब गोरी। महल...
हिलमिल फाग परस्पर खेलत,
केसर रंग में बोरी। महल...
अपनी-अपनी घात तके दोऊ,
दाव करत बरजोरी। महल...
कंचन कुँअरि नृपत सुत हारे,
जीती जनक किशोरी। महल...

अनूठा है बुंदेलखंड और अनूठी है यहां की होली जिसमें उत्सवधर्मिता की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यही उत्सवधर्मिता की विशेषता है जिसने बुंदेलखंड की भूमि को बड़े से बड़े संकट में साहस प्रदान किया है।         
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(दैनिक, सागर दिनकर में 04.03.2026 को प्रकाशित)  
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