Wednesday, April 1, 2026

चर्चा प्लस | राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस : हनुमान जन्मोत्सव विशेष:   
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                       

                           
     हनुमान देवत्व का वानर रूप हैं जो मनुष्य के भीतर आत्मबल का संचार करते हैं तथा उन्हें संकट से उबरने में सहायता करते हैं। हनुमान जी का हिंदू धर्म और संस्कृति में अत्यंत उच्च और पवित्र स्थान है। उन्हें शक्ति, भक्ति, ज्ञान, और निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और भगवान श्री राम के सबसे अनन्य भक्त हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा 1 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से लेकर 2 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 41 मिनट तक रहने वाली है अतः उदया तिथि के चलते हनुमान जन्मोत्सव का त्योहार 2 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दुखों और कष्टों को दूर करने वाला। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की हर तरह की बाधा दूर होती है और व्यक्ति को निडरता प्राप्त होती है। वे नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और भय से रक्षा करते हैं अर्थात वे आत्मबल का विकास करते हैं।

भगवान हनुमान, जिन्हें अंजनेय, पवनपुत्र, केसरीनंदन और राम भक्त हनुमान के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में अटूट भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय सेवा भावना के प्रतीक हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा का उल्लेख शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में मिलता है। हर साल चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में इसी दिन बजरंगबली के जन्म का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और रुद्र के 11वें अवतार हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने धरती पर धर्म स्थापना के लिए जब रामावतार लिया तो हनुमान उनके सहायक बनकर बजरंगबली के रूप में धरती पर आए थे।
शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शिव ने भी उनके साथ पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से वानरराज केसरी और माता अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। माता अंजना को यह वरदान था कि उनके पुत्र को पवन देव का विशेष आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 37) में वर्णन है-“भगवान शंकर ने अपने अंश से रुद्र रूप में वानर स्वरूप में जन्म लिया। माता अंजना ने कठिन तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया, तब महादेव ने रुद्रांश के रूप में जन्म लेकर हनुमान स्वरूप धारण किया।”
यह जन्मकथा इस प्रकार है कि समुद्रमंथन के बाद जब भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने को कहा था जो उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को दिखाया था। उनकी बात का मान रखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु का आकर्षक रूप देखकर शिवजी आकर्षित होकर कामातुर हो गए और उन्होंने अपना वीर्य गिरा दिया। जिसे पवनदेव ने शिवजी के वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इस तरह माता अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ। उन्हें शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी हनुमान जी के जन्म की कथा विस्तार से मिलती है- माता अंजना, एक अप्सरा थीं, जो ऋषि के श्राप से  राजा कुंजर की इच्छानुसार रूप धारण करने वाली पुत्री  के रूप में  कपि योनि में जन्मी थीं। एक दिन जब वे मानवी स्त्री का रूप धारण कर के एक पर्वत शिखर पर विचार रही थी द्य तब उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी जिसे वायुदेवता ने धीरे से हर लिया और काम से मोहित होकर उन्होंने अंजना का अव्यक्त रूप से आलिंगन कर लिया। पतिव्रता होने के कारण अंजना तुरंत ही समझ गई और बोली “कौन मेरे इस पतिव्रत का नाश करना चाहता है?“ तब पवन देव ने उत्तर दिया कि “मैं तुम्हारे पतिव्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। मैंने मानसिक संकल्प से तुम्हारे साथ समागम किया है जिससे तुम्हे बल पराक्रम से संपन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा।”
फिर एक दिन पवन देव के आशीर्वाद से उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। जन्म के बाद, हनुमान जी को असीमशक्ति, वेग और बल प्राप्त हुआ। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 -20 ) में वर्णन है- “वानरराज केसरी की पत्नी अंजना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जो महाबली, महातेजस्वी और अत्यंत बुद्धिमान था। पवन देव की कृपा से जन्म लेने के कारण उसे ‘पवनपुत्र’ कहा गया।”
एक और कथा है हनुमान जी के जन्म की- एक बार की बात है अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने के बाद राजा दशरथ ने प्रसाद रूपी खीर को अपनी तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को बांट दिया। तभी वहां एक कौवा आया और खीर का एक भाग लेकर उड़ गया। उड़ता हुआ वह उस जगह पहुंच गया, जहां अंजनी पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रही थीं। यह सब शिव और वायुदेव के इशारे पर हो रहा था।
अंजनी ने देखा कि कौवा खीर लेकर आया है। अंजनी को लगा कि यह शिवजी की कृपा है। उन्होंने खीर को पी लिया और इसी प्रसाद से उन्होंने एक बलवान पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र पवनदेव का था। अंजनी के पति वानर राज केसरी थे। इसलिए अंजनी के पुत्र को पवनपुत्र और केसरी नंदन दोनों नामों से जाना गया।
हनुमान जी के जन्म की कथा एक और रूप में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार शिव जी के उस वरदान से जो उन्होंने राजा केसरी और माता अंजना को दिया था. दरअसल एक बार राजा केसरी और माता अंजना ने शिव जी की कठिन तपस्या की, जब दोनों की तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए तो उन्होंने माता अंजना और केसरी से वरदान मांगने को कहा. जिस पर माता अंजना ने कहा कि -‘‘हे भोलेनाथ, हमें एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो बल में रुद्र, गति में वायु और बुद्धि में गणपति के समान तेजस्वी  हो।’’ माता के वचनों से खुश होकर शिव जी माता को वरदान दिया और अपनी रौद्र शक्ति को पवन देव के रूप में यज्ञ कुंड में समाहित किया और उत्पन्न शक्ति को माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। जिस वजह से हनुमान जी का एक नाम पवनपुत्र भी हुआ। शिव शंकर की कृपा से अंजना गर्भवती हो गईं और चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन मंगलवार को भगवान रूद्र के 11वें अवतार के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी जन्म से ही बल, बुद्धि और विद्या में निपुण हैं।
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
बजरंग बली जब छोटे थे तब उन्हें बहुत भूख लगती थी। एक बार उन्होंने अपनी मां अंजनी से खाने के लिए मांगा। अंजनी तब कुछ काम कर रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि बाहर जाओ और फल खा लो। जितने भी पके हुए फल हैं, वो खाने योग्य हैं। बजरंग बली भूख से व्याकुल हो रहे थे। वे बाहर गए और फल खाने लगे। तभी उन्हें आसमान में उन्हें चमकता हुआ सूरज दिखाई दिया। बजरंग बली को लगा कि यह भी एक फल है। उन्होंने अपनी शक्ति से लंबी छलांग लगाकर सूर्य के पास पहुंच गए और उसे अपने मुंह में रख लिया। बजरंग बली की इस हरकत से धरती पर अंधेरा छा गया। इंद्रलोक तक हाहाकार मच गया। तब सभी देव इंद्र के पास गए और कहा कि एक वानर ने सूर्यदेव को अपने मुंह में रख लिया है। सभी देवों ने इंद्रदेव से इस समस्या का हल निकालने की विनती की। तब इंद्रदेव आए। उन्होंने वज्र लहराया और बजरंग बली की ठोड़ी पर प्रहार कर दिया। बजरंग बली बेहोश होकर गिर पड़े। उनके जबड़े पर चोट लग गई। इंद्र के इस कदम से पवन देव नाराज हो गए। तब इंद्र ने हनुमान को फिर से होश में लाए। ठोड़ी को हनु भी कहते हैं। मान का अर्थ विरूपित होता है। इस तरह बजरंग बली का नाम हनुमान पड़ गया।
अतुलित बल धामा क्यों कहा गया?
हनुमान जी का बल असीम, अतुलनीय और अपरिमित है, जिसे शब्दों में नहीं मापा जा सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 10,000 इंद्रों का बल हनुमान जी के शरीर के एक रोम (बाल) में निहित है। वे ‘‘अतुलितबलधामा’’ (अतुलनीय बल के धाम) कहे जाते हैं, जिनकी एक दहाड़ से तीनों लोक काँप उठते हैं। हनुमान चालीसा की दूसरी चैपाई में हनुमान जी को श्अतुलित बल धामाश् कहा गया है, जिसका अर्थ है - ‘‘अतुलनीय (जिसकी तुलना न की जा सके) शक्ति के निवास स्थान’’। उन्हें यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असीम शक्ति के स्वामी हैं।
इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं कि उन्हें बचपन में ही कई देवताओं से वरदान प्राप्त थे। इंद्र ने उन्हें वज्र के समान शरीर का, अग्नि ने निर्भयता का, और पवन देव ने वायु के समान वेग का आशीर्वाद दिया था। असीम शारीरिक शक्तिरू उन्होंने समुद्र को लांघकर लंका जाना, संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत उठा लाना, और युद्ध में राक्षसराज रावण की सेना को धूल चटाने जैसे कार्य किए, जो साधारण बल से परे हैं। वे ‘‘रामदूत’’ हैं और उनका मानना है कि उनका बल उनका अपना नहीं, बल्कि उनके हृदय में निवास करने वाले प्रभु राम का है। वे बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र और अहंकार शून्य हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधि का वरदान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो स्वयं शक्ति का रूप हैं।
हनुमान को संकटमोचन क्यों कहा गया?
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकटमोचन के नाम से क्यों जाना जाता है?
जब रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता माता का हरण किया था तो हनुमान ने ही उन्हें ढूंढ़कर अपने स्वामी श्रीराम को उनका पता बताया था। हनुमानजी हे श्रीराम का दूत बनकर रावण के पास गए थे और जब रावण ने उन्हें पकड़ लिया था तो वो अपनी बहादुरी से लंका में आग लगाकर बच निकलें थे। उन्होंने भगवान राम के वनवास काल में उनके मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं और संकटों को दूर कर अपनी सच्ची भक्ति का प्रमाण दिया था। हनुमानजी ने श्रीराम की रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने में बहुत सहायता की थी। सीता माता अपने रामजी के लिए हनुमानजी की स्वामी भक्ति और प्रेम को देखकर प्रसन्न हो उठी थीं और उन्होंने बजरंगबली को अमरता का वरदान दिया। अजर-अमर का वरदान पाकर बजरंगबली हनुमान निस्वार्थ भाव से अपने भक्तो की रक्षा करके उन्हें सभी संकटो से बचते हैं और इसलिए उन्हें संकट मोचन महाबली हनुमान के नाम से जाना जाता हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 01.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 31, 2026

पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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    बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति  और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश  में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने  के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने  की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”

संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”

  डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”

    गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल  सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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Saturday, March 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     ई साल सबरे त्योहार  जल्दी- जल्दी कढ़ गए सो गर्मी को मौसम सोई तनक जल्दी आ गओ। ऊको बी लगो हुइए के पेड़-मेंड़ सो कटत जा रए सो अपन सोई मार्च के मइना से अपनो दम दिखान लगें। जो बात होए दम दिखाबे की तो बिजली के झटका से बड़ो दम तो कोनऊं को हो नई सकत। नईं-नईं, बा वारो झटका नोईं जो बिजली के तार छूबे से लगत आए। हम बा वारे झटका की कै रए जोन बिजली के बिल को छूबे से लगत आए। हऔ बिजली विभाग वारे अगली माह से जोर को झटका देबे वारे आएं। टैरिफ सो बढ़ाई रए आएं औ ऊपे से जे सोई तै कहानो के जोन ने संझा बिरियां छै से दस बजे लौं बिजली से चलत वारीं बड़ी चीजें चलाईं उने अच्छे पइसा घलहें। 
     चलो मान लओ के तेल वारे देसन में चल रई लड़ाई के चलत भए डीजल, पेटरोल पे कोनऊं संकट आ सकत आए, मनो जे बिजली वारे काए दाम बढ़ा रए। चलो जे बी मान लई के गरमी खपत बढ़बे के कारन दाम बढ़ा रए। सो का बरसात सुरू होबे पे टैरिफ कम कर देहें? रामधई! ऐसो कभऊं नईं होत के रुपइया भरे बढ़ाए गए दाम पूरे रुपइया घटे होंए। भौत करी तो आठ पईसा ने तो दस पईसा घटा के खुनखुना पकरा दओ जात आए। सो, अगली मईना से जोर को झटका खाबे को तैयार रहियो औ पसीना पोंछत रहियो। जो हो सके तो ठिलिया से ले के बरफ को गोला खात रहियो। ईसे कूलर, पंखा चलाबे की जरूरत ने परहे। जै राम जी की!
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Thursday, March 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘जो कोनऊं त्योहर चलत आएं तो समै को पतो नईं परत। आज प्रथमा, सो काल दुतिया औ परों तृतिया औ जेई तरां से सप्तमें औ आठें सोई गुजर जात आएं। मनो दिन को सोई पतो नई परत के कैसे गुजर जात आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! ऐसई करत-करत जिनगी गुजर जात आए।’’ भौजी तनस सोंसत सी बोलीं।
‘‘ऐसी काए कै रईं? ई दफा तो चैत की नवरातें बी पैले पर गईं औ बीच में तनक पानी सोई गिर गओ सो ठंडक बनी रई। नें तो जो कभऊं अप्रैल में नवरातें परत आएं तो धूप तपन लगत आए औ उपास राखबे में सोई परेसानी होत है। ई दफे तो मंदिर-दिवाला गए में गोड़े बी नईं जरे। जोन दिनां मैं ज्वाला देवी के मंदिर गई रई ऊ दिनां उतई पानी परसन लगो रओ। भौतई अच्छो सो मौसम हो गओ रओ। बाकी फसल के लाने जरूर चिंता भई रई काए से के रसता में देखी रई के फसल कट के खेतन में सूखबे खों धरी हती औ कऊं-कऊं तो खड़ी हती। मने कटाई बी नईं भई रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जा सब तो ठीक आए बिन्ना मनो जे देखो के अपने इते नौ-नौ दिन लौं देवी माई की पूजा होत आए। सबरे लुगवा सोई माई की पूजा करत आएं, उपास रखत आएं। कोऊ-कोऊ तो नौ दिनां चप्पलें नईं पैनत, दाढ़ी नईं कटात औ धरती पे सोऊत आएं। मनो माई खों प्रसन्न करबे के लाने खूब-खूब जतन करत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, जे तो आप सांची कै रईं। मनो लुगाइयां सोई नौ दिनां उपवास राखत आएं। कोऊ फलाहारी करत आएं तो कोऊ निरजला लौं रैत आएं। माई को खुस को नईं करबेा चात आए? सबई चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना, के एक तरफी तो सब चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए औ दूसरी तरफी बे मरई को मतलब नईं समझत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का मतलब आपको? तनक खुल के बोलो आप।’’ मैंने कई।
‘‘हम का खुल के बोलें? सब कछू तो आंगू में खुलो डरो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो मोए समझ नईं पर रई के आप का कैबो चा रईं? सो तनक जे सोई बताओ के जे आप काए के बारे में कै रईं?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे, मोए तो रै-रै के बोई खयाल परत आए के बा बिचारी खों कैसो लगो हुइए जब ऊके घरवारे ने ई ऊको मारो औ गाड़ी में बार दऔ।’’भौजी बोलीं।
‘‘कऊं आप बा डाक्टर वारी घटना की तो नईं कै रईं?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘हऔ, ओई की बात कर रई। कैसो राकस डाक्टर रओ ऊ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ बा घटना के बारे में मैंने सोई पढ़ी रई औ मोए बी बुरौ लगो रऔ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘नईं, तुमई सोचो बिन्ना के जो का मतलब भओ? एक तरफी तो सबई जने माई की पूजा करत आएं। औ कओ बी जात आए के जां लुगाई की इज्जत होत आए उते देवता रैत आएं। औ इते तो लुगाइयन की इज्जत का, जान को ठौर नइयां। अरे तुमें नईं पुसा रई तो छोड़ो। छोर-छुट्टी करा लेओ औ दूसरी राख लेओ। जे का के तुमे अब नई पुसा रई सो तुमने ऊको मार के ठिकाने लगा दओ। का बा इंसान नोंई? कोनऊं सामान आए का के बोर हो गए सो तोड़-ताड़ के कूडा में मेंक दओ, ने तो बार दओ। बा जोन डाक्टर ने अपनी लुगाई खों कार में बार दओ, अबे तो पतो परहे के मार के बारो के बारत समै बा जिन्दा हती?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी! कोन टाईप के होत आएं जे ओरें जो कोऊ खों ऐसे मारबे को करेजा रखत आएं। इते ब्लड टेटस्ट के लाने जाओ तो खून नईं देखो जात आए। मैं तो अपनों मों दूसरी तरफी फेर लेत आओं। बा तो भौतई बुरौ करो बा नीच आदमी ने। ऊको तो डाक्टर कैबे में डाक्टरन को अपमान होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘एक बोई का? अखबार उठा के देख लेओ, मुतकी खबरे मिल जैहें ई टाईप की। कऊं दहेज के लाने मार डारत आएं तो कऊं इज्जत लूट के बार देत आएं तो कऊं खाली दूसरी लाबे के चक्कर में निपटा देत आएं। मनो लुगाई ने भई कोनऊं बेजान चीज हो गई के मन भर गओ तो तोड़-मोड़ के मेंक दओ। ऊपे दम भरत आएं माई की पूजा की। अरे, जोन समाज में ऐसे लुगवा रैत होंए ऊपे माई काए खों प्रसन्न हुइएं?’’ भौजी तनक गुस्सा सी करत भई बोलीं। मनो उनकी बात सांची हती।
‘‘आप सई कै रईं भौजी, जो माई खों समझबे को दम भरत आएं उने लुगाई की जान की बी इज्जत करो चाइए। हमें तो जे देख के लगत आए के अपने ई समाज में धरम खों समझबे वारे कित्ते आएं औ धरम के नांव पे ठेकेदारी करबे वारे कित्ते आए? अब आपई देखो के ज्यादा से ज्यादा व्रत त्योहार अपन ओरन मने लुगाइन के करे से चल रए। या तक के मैंने देखी आए के कई मंदिरन में मंगल के मंगल सुंदरकांड को पाठ करो जात आए, बा बी लुगाइयां करत आएं। कम से कम बजरंगबली के लाने तो लुगवों खों टेम निकारने चाइए। पैले जोई होत्तो, मंगलवार खों लुगवा हरें मंदर में भजन गाउत्ते और बजरंबली की पूजा करत्ते। अब उने मोबाईल पे टिपियाबे से फुरसत नइयां।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘औ का, जेई से तो जे सब कांड होन लगे। औरन बी मोबाईल पे बा न्यूज देख-सुन लई औ अगली पोस्ट पे बढ़ गए। कोन खों परी के ऊके विरोध में कछू हल्ला-गुल्ला करें। जितनी बहस फिलम पे होत आए उत्ती तो ई टाईप की घटना पे लौं नई होत। औ ईके लाने अपन लुगाइयां सोई जिम्मेवार कहाईं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बा कैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा ऐसे के अपन माई के नौ रूपों की पूजा तो करत आएं मनो उनके घांईं बनबे की सोचत बी नइयां। तनक अपने भीतरे जो माई को भाव ले आवें सो कोन की हिम्मत के अपन खों कछू कर सके। बोलो सई कई के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘बिलकुल सई कै रई आप। का आए के डरने या घबड़ाने का नईं, हिम्मत से मुकाबला करबे की जरूरत आए। जो कोनऊं बदमाशी करे सो ऊको इूंसई-ठूंसा मारो फेर देखो माई कैसे साथ देत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई लाने ई दफा सो हमने माई से जेई मांगो के सगरे लुगवा औ लुगाइयन खों बुद्धी दे माई औ लुगाइयन खों तनक बुद्धी के संगे शक्ति देंवें के बे जो खतरा देखें तो बुद्धी से काम लेवें। पैले खुद सामना करें औ जो लगे के मदद की जरूरत आए तो संकोच ने करें औ सबई से मदद मांगे। कुट-पिट के बाथरूम में अपट परी कैबे से काम ने चलहे। इसे बुरै इंसानों के हौसले बढ़त आएं। काए सई कई के नईं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बिलकुल सई भौजी। जब तक सबरे जे ने समझहें के माई को मतलब का आए तब तक खाली पूजा करे से कछू ने मिलहे। सबई खों माई को मतलब समझबे की जरूरत आए।’’ मैंने कई।  
आकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरें माई को मतलब कित्तो समझत हो?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, March 25, 2026

चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चाप्लस 
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                            
   नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की  क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।


या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया।

नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।

हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।

दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं-
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।

मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।

उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।

हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।         
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(दैनिक, सागर दिनकर में 25.03.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | होंए जालपा चाए ज्वाला माई,परन न देवें दुख की छांई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
होंए जालपा चाए ज्वाला माई,परन न देवें दुख की छांई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
चैत की नवरातें आतई साथ पूरे सागरे में देवी मैया के जयकारे गूंजने लगत आएं। चाए दीनदुखी होंएं, चाए सुखी मानुस, सबई माता के दोरे पे माथा टेकबे के लाने निकर परत आएं। कोऊ रानगिर वारी हरसिद्धि माई के लिंगे जात आए तो कोऊ बाघराज वारी हरसिद्धि माई के इते। ऊंसई अपने सागरे में माई के दरबार चारों खूंट में आए। जेई लाने तो भगतें गाई जात आएं के-
होंए जालपा चाए ज्वाला माई। परन ना देवें दुख की छांई ।।
   सागर से खुरई जात में जरुआखेड़ा से जलंधर के लाने रोड  कटत आए। आप जोन जलंधर पौंचे सो मनो ज्वाला देवी के दरबार के दोरे पे पौंच गए। उते ऊंची पहरिया पे माई को मंदिर आए। जो छिड़ियां चढ़ के ऊपरे ज्वालामाई के दरबार में पौंचो तो भौतई अच्छो लगत आए, काए से उते से चारो तरफी पहरियां दिखात आएं। बे पहरियां बी अबे जंगल वारी आएं। ज्वालामाई की सौं, उते भौतई नोनों लगत आए। ऐसो लगत आए के उते सजीवन माता उतर आई होंए।
   मनो होत का आए के जां सब साफ-सुथरो होय, लोग बी नोने जी से कऊं पौंचें तो उते देवी मैया को वास सो फील होत आए। माता सो माता आएं, बे अपने बच्चन खों चाए दो लपाड़े लगा लेवें मनो कभऊं साथ नईं छोरत आएं। मनों अपन ऐसो काम काए खरें के माई अपन खो थपड़िआएं। कैबे को मतलब जे के जो अपन अपने पूरे सागरे खों साफ-सुथरो औ अच्छो राखें तो हरसिद्धि माई, जालपा माई औ ज्वाला माई सबई की किरपा अपने सहर पे बनी रैहे।  सो, बोलो जै माई की!    
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बुंदेली बानी
कवयित्री - डॉ. कुंकुम गुप्ता
प्रकाशक-संदर्भ प्रकाशन,भोपाल
मूल्य -200/- 
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प्रत्येक बोली कि अपनी विशेषता और अपनी मिठास होती है। बुंदेली बोली भी इसी तरह से अपने क्षेत्रीय मिठास लिए हुए हैं जो सुनने और पढ़ने वाले के मन को सहज ही स्पर्श करती है। बोलियां जहां एक ओर संस्कृति की संवाहक होती हैं वही निज गौरव और आत्मीयता का भी बोध कराती हैं। डॉ कुंकुम गुप्ता ने बुंदेली बोली की मिठास को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हुए बुंदेली संस्कृति को भी सहेजा है। उनके काव्य संग्रह का नाम है “बुंदेली बानी”। 
“बुंदेली बानी” में कुल 51 कविताएं हैं, जिनमें संस्कृतिस सामाजिकता, प्रकृति, राष्ट्रीयता तथा आध्यात्मिकता के साथ ही हास्य और प्रेम के संवेग भी समाहित हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं वर्तमान में प्राचार्य, पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म.प्र.) प्रो. सरोज गुप्ता ने संग्रह की प्रस्तावना लिखते हुए डॉ. कुंकुम गुप्ता की रचना धर्मिता के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया है। डॉ सरोज गुप्ता के शब्दों में- “डॉ कुंकुम गुप्ता साहित्य जगत में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, संस्मरण, बाल साहित्य आदि में लेखनी चलाने के साथ नित नूतन प्रयोग करने की कला में दक्ष हैं। आपकी रचनाओं में बुन्देलखण्ड की माटी की सौंधी महक, सहजता, सरलता, उदारता, भावों में सम्प्रेषणीयता के साथ जन्मभूमि के प्रति समर्पण, बुन्देली और बुन्देली संस्कृति से जुड़ाव दृष्टव्य है। आप राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त परिवार में जन्मीं, बखरी में दद्दा जी, बापू जी के प्यार दुलार के साथ बचपन में अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों से सहज संपर्क से उनके साहित्यिक संस्कारों को आत्मसात करते हुए न सिर्फ अपनी रचनाधर्मिता को जीवन्त बनाये हुए हैं वरन् अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रही हैं। डॉ. कुंकुम गुप्ता समाज की गतिविधियों, लोक व्यवहारों का यथार्थ पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती हैं।”
डॉ. कुंकुम गुप्ता सौभाग्यशाली हैं कि वे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की वंशज हैं। साहित्य प्रेम उनकी धमनियों में प्रवाहित होना स्वाभाविक है। डाॅ कुंकुम गुप्ता लेखिका संघ मध्यप्रदेश की प्रांतीय अध्यक्ष हैं। वे अन्य महिला रचनाकारों को अपनी संस्था के अंतर्गत निरंतर प्रोत्साहित करती रहती हैं। अपनी रचनाशीलता के बारे में डॉ. कुंकुम गुप्ता ने “आत्मकथ्य” में लिखा है- “मेरा बचपन झाँसी जिले के चिरगाँव में बीता इसलिए बुंदेली परिवेश, पर्वों, लोकगीतों, परम्पराओं आदि से लगाव रहा है। भोपाल आकर जब साहित्यकारों से बुंदेली, निमाड़ी, मालवी आदि में कविताएँ सुनीं तो मेरे मन में भी यह जिज्ञासा जागृत हुई कि मैं भी बुंदेली में रचनाएँ लिखूँ। मध्यप्रदेश लेखक संघ की लोक भाषा गोष्ठी में भी कविता सुनाने का अवसर मिला तो कुछ आत्मविश्वास जागा और हिन्दी लेखिका संघ में भी बुंदेली में कविताओं को पढ़ा जिसको सराहना मिली इससे मेरा उत्साहवर्धन हुआ।”
बोलियों की यह विशेषता होती है कि हर दस कोस में बोली के कुछ शब्द बदल जाते हैं। जैसे बुंदेलखंड में पन्ना की तरफ बेटियों को “बिन्ना” कहा जाता है जबकि ललितपुर, झांसी के तरफ उन्हें “बिन्नू” कहकर पुकारा जाता है इसीलिए कुंकुम गुप्ता जी की प्रथम कविता का शीर्षक है “बिन्नू काए रिसानी”। इस कविता में कवयित्री ने बालिका शिक्षा सहित बालिका के अधिकारों की बात बहुत सहजता से उठाई है। बानगी देखिए-
बिन्नू काय रिसानी हमसें, 
बिन्नू काय रिसानी 
बैठीं हो काय मों लटकायें, 
भर आँखन में पानी।

रोज तो तुम गैया बछियन की 
साफ-सफाई करततीं
फिर कुअलन पै पानी भरवे
सखियन संग निकरततीं
आज कछु न कर रही बिन्नू 
अब लौं करी न सानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।

दादा भौत देख लई हमने 
बातें बड़ी तुम्हाई 
कहत कछु और करत कछु 
फिर पीछें देत सफाई
सबकी बिटियाँ आगें पढ़ रहीं 
तुमने बात न मानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।
     जब बिन्नू अर्थात बेटियों की बात चलेगी तो सखियों की चर्चा भी होना स्वाभाविक है। बेटियों का संसार अपनी सखियों के संग से ही आरम्भ होता है। ‘‘गुइयाँ’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए जिनमें सेहत की बातों के संग सखियों का विमर्श भी मौजूद है- 
ऐसी काय बैठी मोरी गुइयां
बैठी उदास औ लटकी मुंइयां
कछू न पूछौ हाल सखी री 
देर रात कैं खा लई घुइयाँ।
आज परहेज करौ थोड़ो सो 
लौकी बनाओ चाँय तुरइयाँ।
हरी सब्जिन को स्वाद न भावैं 
अबै उमर तो है लड़कैंया।
वादी की चीजें हमें भाउतीं 
सो गुस्सा होंय हमारे सइयाँ।
आज से सेहत कौ ख्याल करलो 
तन को दुख कोउ बाँटत नइया।
      वृद्धावस्था जीवन का एक शाश्वत सत्य है। किन्तु सामाजिक परिवर्तनों के कारण अनेक लोगों के लिए वृद्धावस्था कष्टप्रद साबित होने लगी है। इसका मूल कारण है कि युवा अपने बड़ों से विरत होने लगे हैं और वृद्धाश्रम पनपने लगे हैं। दूसरी ओर वे माता-पिता भी जो धनअर्जन करने की लिप्सा में पहले स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं फिर बच्चों को अपने से दूर भेज देते हैं उन्हें भी कवयित्री ने चेताया है। वस्तुतः डाॅ. कुंकुम गुप्ता की ‘‘बुढ़ापा’’ कविता हर व्यक्ति को जीवन के सत्य का स्मरण कराती है-
बुढ़ापौ सबको आने है 
एक दिना मर जाने है।
जानत तो है जौ सब कोऊ 
फिर भी सीना ताने है।
कैसेउ प्रीत लगा लो सबसें 
बाद में रोने गाने है।
साठ साल के बाद सबई कौ 
जानै कबै बुलउआ आने है।
ताले कुची लगा लो कित्ती 
बनाओ कितेक तहखाने है।
जिनसे छिपा के जोड़ी माया 
उनई खौं सब हथियाने है।
   संग्रह में एक बहुत ही ‘स्वादिष्ट’ कविता भी है क्योंकि इसमें बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का विवरण दिया गया है। कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
बुंदेली व्यंजन की कर लैवें बात 
स्वाद इनकौ सबखौं भौतई सुहात 
बैगन का भर्ता और मौन दई गकइयाँ 
सब मिल कैं खावें पड़ौसी और गुंड्याँ 
आम की चटनी स्वाद है बढ़ात।
चूरमा के लड्डू दाल बाटी को स्वाद 
शुद्ध घी की खुशबू और बढ़िया पुलाव 
ऊपर से मठा पियो जल्दी पचात ।
समूदी रोटी खौं देख जिया डोले 
बरा मगौरा पापड़ मिश्री सी घोलें 
खीचला कचरियां कालोनी में मिलात।
      यह विशेषता है बोलियों में सृजन की कि जब कोई रचनाकार अपनी बोली में रचना करता है तो वह अपनी परंपराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं माटी की सुगंध को उसमें पिरोना नहीं भूलता है। डाॅ कुंकुम गुप्ता ने भी अपनी बुंदेली कविताओं में समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाते हुए बुंदेली मिठास को भरपूर संजोया है। इस तरह के काव्य संग्रह बहुतायत आने चाहिए क्योंकि यही बुंदेलखंड की संस्कृति को भविष्य तक पहुंचाने में सहायक होंगे। डाॅ. कुंकुम गुप्ता का यह बुंदेली काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ इतनी सहज बुंदेली में है कि सुगमता से सभी को समझ में आ सकता है तथा हर क्षेत्र का पाठक इन कविताओं से जुड़ सकता है।      
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