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शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Thursday, February 19, 2026
बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी? मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
चर्चा प्लस | यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह ‘‘यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए!’’ यही तो कहा था ‘मिसाइल मैन’ के नाम से विख्यात वैज्ञानिक, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम ने। उन्होंने यह सिर्फ़ कहा नहीं बल्कि इसे अपने स्वयं के जीवन पर चरितार्थ कर के दिखाया। उन्होंने ने देश के लिए बहुत कुछ करने का सपना देखा। फिर अपनी पूरी शक्ति लगा दी उस सपने को सच करने में। तभी तो अखबार बेचने वाला एक हाॅकर लड़का एक दिन भारत के लिए मिसाइल बना सका और उसने राष्ट्रपति बन कर देश का गौरव बढ़ाया। यह लड़का और कोई नहीं स्वयं डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम थे।
हमारा देश एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां सब कुछ संभव है। इस देश में चाय बेचने वाला एक लड़का बड़ा हो कर प्रधानमंत्री बन सकता है, आदिवासी जीवन के रूप में मुख्यधारा से कट कर जीवन जीने को विवश बालिका राष्ट्रपति बन सकती है, इसी प्रकार अपने स्कूल की फीस भरने के लिए अख़बार बेचने वाला एक लड़का पहले उच्चकोटि का वैज्ञानिक और फिर देश राष्ट्रपति बन सकता है।इन तीनों उदाहरणों में दो स्थितियां एक समान हैं- एक तो संघर्षमय अतिसामान्य जीवन से शुरुआत और दूसरी दृढ़ इच्छाशक्ति। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे जिन्होंने ज़मीन से आरम्भ किया और आसमान तक जा पहुंचे। देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने भारत को सशक्त बनाने का सपना देखा और उस सपने को पूरा करने के लिए देश में ही मिसाइल निर्माण की शुरुआत की। इसीलिए उन्हें ‘‘मिसाईल मैन’’ भी कहा जाता है।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पिता जैनुलाब्दीन नाविक थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे, न ही ज्यादा पैसे वाले थे। लेकिन वह नियम के बहुत पक्के थे। वह मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। डॉ. कलाम ने अपनी शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए हाॅकर के रूप में अखबार बांटने काम किया था। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनका जन्म 15 अक्तूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम् जिले के धनुषकोड़ी गांव में हुआ था। कलाम एक बहुत बड़े परिवार के सदस्य थे, जिसमें पांच भाई और पांच बहन थी। कलाम ने अपनी आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् में पूरी की, सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली। वे पायलेट बनना चाहते थे किन्तु किन्हीं कारणवश वे अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर सके। तब उन्होंने अपनी इच्छा के मार्ग को दूसरी ओर मोड़ दिया लेकिन यह मार्ग भी उन्हें आसमान की ओर ले जाता था। उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
डाॅ. कलाम बेहद सादगी से जीवन जीने वाले व्यक्ति थे। अनुशासन में रहना और दैनिक रूप से पढ़ना इनकी दिनचर्या में था। अपने गुरु से उन्होंने सीखा था कि यदि आप किसी भी चीज को पाना चाहते है तो अपनी इच्छा तीव्र रखनी होगी। डाॅ. कलाम विलासिता और दिखावे से दूर रहते थे। एक बार राष्ट्रपति भवन में उनके परिजन रहने के लिए आए, जहां उनका स्वागत उन्होंने बहुत अच्छे से किया। परिजन 9 दिन तक राष्ट्रपति भवन में रहे, जिसका खर्च साढ़े तीन लाख रुपए हुआ। यह बिल उन्होंने अपनी जेब से भरा।
सन् 1962 में वे अंतरिक्ष विभाग से जुड़ गए जहां उन्हें विक्रम साराभाई, सतीश धवन और ब्रह्म प्रकाश जैसे महान हस्तियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। 1980 में पूर्ण रूप से भारत में निर्मित उपग्रह रोहिणी का प्रक्षेपण किया, जो सफल रहा। अब्दुल कलाम विभिन्न सरकारों में विज्ञान सलाहकार और रक्षा सलाहकार के पद पर रहे। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन में रहते हुए इन्होंने ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ जैसी मिसाइल का निर्माण कराया। उन्होंने राजस्थान में हुए दूसरे परमाणु परीक्षण (शक्ति-2) को सफल बनाया।
डाॅ. कलाम बच्चों से बहुत प्रेम करते थे और वे बच्चों को जीवन में विज्ञान के महत्व के बारे में समझाया करते थे। वे कहते थे कि -‘‘विज्ञान जब विशेष ज्ञान है तो हमें उसकी विशेषताओं को समझना चाहिए और उससे लाभ उठाना चाहिए।’’
जब सन् 2002 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का भार ग्रहण किया उसके बाद भी राष्ट्रपति-भवन के दरवाज़े सदा आमजन के लिए खुले रहे। युवा और बच्चे उन्हें पत्र लिख कर उनसे जीवन और विज्ञान संबंधी प्रश्न पूछा करते थे। उन पत्रों का जबाव वे स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे।
डाॅ. कलाम अविवाहित थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देशसेवा को समर्पित कर दिया था। उनका जीवन एक महानायक की तरह था। उन्होंने 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘‘विंग्स ऑफ फायर’’, ‘‘इंडिया 2020’’, ‘‘इग्नाइटेड मांइड’’, ‘‘माय जर्नी’’ बहुचर्चित और प्रेरक रहीं। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई थी। डाॅ. अब्दुल कलाम ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की विचारधरा को मानते थे। वे मानते थे कि यह धरती ही एक मात्र उपग्रह है, जहां जीवन संभव है। मानव जाति को इसकी रक्षा और संरक्षण का दायित्व निभाना ही होगा। हमारा समाज और हमारी शासन प्रणाली अब पहले से कहीं अधिक संजीदा है क्योंकि मामूली सी देरी से भी अपूर्णीय क्षति हो सकती है। भारत रत्न डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्रकृति के संरक्षण के प्रति सजग थे। वे इसे पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य के जिए जरूरी मानते थे। 27 जुलाई, 2015 को शिलांग में, भारतीय प्रबंधन संस्थान में ‘क्रिएटिंग ए लिवेबल प्लैनेट अर्थ’ (पृथ्वी को रहने योग्य ग्रह बनाना) विषय पर अपने व्याख्यान में उन्होंने विकास की जद्दोजहद में पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को हो रहे नुक्सान के प्रति आगाह किया था। उन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए भावी कार्ययोजना की रूपरेखा भी सामने रखी थी। डा. कलाम ने सबसे पहले 2 नवम्बर, 2012 को चीन में में भी अपने व्याख्यान के द्वारा इस ओर ध्यानाकर्षण किया था कि धरती को रहने योग्य बनाए रखना कितना जरूरी है। उन्होंने कहा था कि मानव जाति को अपने सभी संघर्षों को परे धकेल कर पूरी दुनिया के नागरिकों के लिए शांति और खुशहाली का सांझा लक्ष्य रखना होगा। हमें एक रमणीक पृथ्वी के लिए वैश्विक दृष्टि विकसित करनी होगी। मानव जाति के लिए इससे अधिक कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। वर्ष 1996 में डॉक्टर कलाम टेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन, फोरकास्टिंग एंड एसेसमेंट काउंसिल (टिफैक) के अध्यक्ष थे और 1996-97 में उन्हीं की अध्यक्षता में ‘‘विजन 2020’’ डॉक्यूमेंट तैयार किया गया था। इसी के आधार पर संगठन ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया था कि साल 2020 तक भारत को क्या हुछ हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। डॉ. कलाम ने सरकार को सलाह दी थी कि देश के विकास के तकनीक, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में सरकार को क्या करना चाहिए और इसमें आम नागरिक को क्या भूमिका निभानी चाहिए। इस किताब पर काम करने के लिए डॉ. अब्दुल कलाम और उनके सहयोगी वाईएस राजन ने दर्जनों जानकारों के इंटरव्यू किए और लाखों पन्नों के दस्तावेज पढ़े. ये किताब ‘‘इंडिया 2020: ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’’ नाम से प्रकाशित हुई थी।
यूं तो ‘टिफैक’ की रिपोर्ट विज्ञान और तकनीक पर केंद्रित थी, लेकिन डाॅ. कलाम ने इसमें जोर दे कर कहा है कि विकास की राह में समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। वे बुनियादी बातों से विकास की चर्चा शुरू करने में विश्वास रखते थे। डॉ. कलाम के अनुसार, ‘‘भारत में हर साल दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इस सभी बच्चों का क्या भविष्य होगा? जीवन में उनका लक्ष्य क्या होगा? क्या हमें उनके भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए या फिर हमें उन्हें उनके नसीब के सहारे छोड़ अभिजात्य वर्ग के फायदे के लिए ही काम करना चाहिए?’’
डॉ. कलाम ने इसमें सवाल उठाया था कि - ‘‘बाजार में मांग के अनुसार स्ट्रेटेजी, और कंपीटीशन का दौर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे या फिर आने वाले दो दशकों में उनके लिए कुछ खास योजना तैयार करेंगे।’’ साल 1998 में लिखी गई इस किताब में डॉक्टर अब्दुल कलाम कहा कि- ‘‘सैंकड़ों एक्सपर्ट से बात कर के और कई रिपोर्टें पढ़ने के बाद मैं ये समझ पाया हूं कि हमारा देश साल 2020 तक विकसित देशों की सूची में शामिल हो सकता है।’’ उन्होंनेे कहा था कि, ‘‘तब भारत के लोग गरीब नहीं रहेंगे, वो लोग तरक्की के लिए अधिक कुशलता से काम करेंगे और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी और बेहतर होगी। ये सपना नहीं बल्कि हम सभी लोगों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए।’’
डॉ. कलाम का कहना था कि देश के लक्ष्य हासिल करने के बाद रुकना नहीं चाहिए बल्कि और बेहतरी के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए। उनका कहना था, ‘‘हमेशा के लिए हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि कैसे हम लोगों की जिंदगियों को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहें. वो केवल युवा हैं जिनमें ज्ञान और कौशल तो है ही। साथ ही कुछ हासिल करने का जज््बा भी है, उन्हें आगे नए लक्ष्यों की तरफ बढ़ना चाहिए। देश उस मुकाम तक पहुंचे इसके लिए हमें एक दूसरे की मदद करनी होगी और लक्ष्य के रास्ते से बिना डगमगाए हमें ये सुनिश्चित करना होगा ताकि बदलाव का असर हर व्यक्ति तक पहुंचे।’’
वे युवाओं से कहते थे कि ‘‘ये कभी मत सोचो कि आप अकेले अपने देश के लिए कुछ नहीं कर सकते, आप जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हों आप अपनी योग्यता बढ़ाएं। सभी के प्रयासों से ही भारत विकसित देश बन सकता है।’’
27 जुलाई 2015 को ‘‘अग्नि मिसाइल’’ को उड़ान देने वाले मशहूर वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे विलक्षण व्यक्तित्व ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली। शिलांग आईआईएम में लेक्चर देते हुए उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। 83 वर्ष की आयु में डाॅ. कलाम ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं किन्तु देश को भविष्य के सपनों का रास्ता दिखा गए। डाॅ. अब्दुल कलाम उन चुनिंदा लोगों में से रहे हैं जिन्हें सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले। सन् 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किया गया था। वे एक सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 19.02.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, February 17, 2026
पुस्तक समीक्षा | कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- लम्हों की तपिश
कवि - अमन मुसाफ़िर
प्रकाशक - नीरज बुक सेन्टर 109-ए, पटपड़गंज गाँव, दिल्ली-110091
मूल्य - 250/-
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20 जुलाई 1999 को उत्तर प्रदेश की बरेली के बहरोली में जन्मे मात्र 27 वर्ष के अमन कुमार उर्फ़ अमन मुसाफ़िर की ग़ज़लों में जो गहराई और नयापन है वह उन्हें ग़ज़लकारों की आम पंक्ति से अलग खड़ा करता है।
अमन मुसाफ़िर ने बी. एससी. (ऑनर्स) भौतिकी (किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय) से, एम.ए. हिन्दी (इग्नू), डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (अंग्रेजी-हिंदी), एकल विषय (संस्कृत) में द्विवर्षीय प्रमाणपत्र हासिल किया है। नेट-जेआरएफ (हिन्दी) उत्तीर्ण पीएचडी (हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) से।
उनका एक ग़ज़ल संग्रह 'हवा में आग' इसके पूर्व प्रकाशित हो चुका है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में अनेक शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं।
अमन मुसाफ़िर अपनी अभिव्यक्ति को लेकर पूर्णतया आश्वस्त हैं। जब कोई शहर अपनी शायरी को लेकर स्वयं पर भरोसा करता है तो उसकी शायरी अधिक मुखर और संवादी साबित होती है। “अपनी बात” में वे अपने इस नए ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों के बारे में लिखते हैं कि “शायरी जब महफ़िलों की वाहवाही से निकलकर सड़क के सन्नाटों और रसोइयों के धुएँ तक पहुँचती है तब वह सिर्फ़ 'शायरी' नहीं रहती, वह समय का 'दस्तावेज़' बन जाती है। 'हवा में आग' के बाद मेरे दूसरे ग़ज़ल-संग्रह 'लम्हों की तपिश' को पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे कुछ वैसी ही अनुभूति हो रही है जैसे कोई अपने 'जले हुए पलों' की राख और 'सुलगते हुए ख़्वाबों' की चिंगारी किसी अपने के हवाले कर रहा हो।
इस संग्रह का नाम 'लम्हों की तपिश' अनायास नहीं है। जीवन साल या महीनों में नहीं बल्कि उन गिने-चुने लम्हों में जिया जाता है जो हमारे ज़हन पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। कभी वह छाप प्रेम के किसी बेहद नाजुक पल की 'गुनगुनी तपिश' होती है तो कभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ उपजे आक्रोश की 'झुलसा देने वाली आँच'। यह किताब इन्हीं दोनों छोरों के बीच तनी हुई एक रस्सी है जिस पर एक शायर नंगे पाँव चल रहा है।”
अर्थात शायर को फता है कि वह क्या लिख रहा है और क्यों लिख रहा है। अपनी अभिव्यक्ति को लेकर उसके मन में किसी तरह का भी संशय नहीं है।
अमन मुसाफ़िर ने यह भी लिखा है कि “मैंने कोशिश की है कि मेरी ग़ज़लें झूठी तसल्लियों का झुनझुना न बनें। इसीलिए जहाँ एक ओर मैंने लिखा है कि "पत्थर को मत पूजो अब, पत्थर को औज़ार करो", वहीं दूसरी ओर मैंने उस मानवीय पीड़ा को भी जगह दी है जहाँ इंसान "भीड़ में चलकर भी तन्हा" रह जाता है। यह संग्रह उस आदमी की आवाज़ है जो प्रेम में टूटकर भी जुड़ना जानता है और जो सिस्टम से टूटकर भी लड़ना जानता है।”
'लम्हों की तपिश' में कुल 110 ग़ज़लें हैं। इन ग़ज़लों में आमजीवन से उठाए गए बिम्ब हैं जो चौंकाते हैं गुदगुदाते हैं और मन के साथ-साथ विचारों को भी आंदोलित कर देते हैं। इसका उदाहरण संग्रह की पहली गजल में ही देखिए की किस खूबी से शायर पेड़, पौधे, फूल और पंछी की बात करते-करते दाल, चावल, साग रोटी तक जा पहुंचता है-
पेड़ पौधे फूल पंछी पत्तियों की बात कर
दाल चावल साग रोटी सब्ज़ियों की बात कर
आदमी की भूख ने बर्बाद कितने कर दिए
जंगलों को खा गयीं हैं कुर्सियों की बात कर
अब पुनः बरसात में बह जाएगी यह झोपड़ी
गर्मियाँ तो काट लेंगे सर्दियों की बात कर
धीरे-धीरे आग नफ़रत की जला देगी इन्हें
हस्तियाँ आधार इसका पीढ़ियों की बात कर
अमन मुसाफ़िर अपनी ग़ज़लों में उस हुनर के साथ खेलते हैं जिसमें कहां जाता है कि एक ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में मुक़म्मल होता है और दूसरा शेर बिल्कुल ही अलग मिजाज़ का हो सकता है। उदाहरण के लिए एक गजल के यह कुछ शेर देखिए-
जब सबने लगाया ही था आवास में बिस्तर
हिस्से में मेरे आया है फिर घास में बिस्तर
तकिया भी लिपट रो रहा दर्दों में हो शामिल
आकर ये सिमट बैठा मेरे पास में बिस्तर
बिस्तर को बताया कि वो आयेंगे दोबारा
शरमा रहा इस प्यार के एहसास में बिस्तर
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अमन मुसाफ़िर किसी एक बिंदु पर नहीं टिकते हैं। उनकी दृष्टि का संसार विस्तृत है। वे अंतर्मन से बाहिर्संसार तक निरंतर अवलोकन करते हैं और फिर ग़ज़ल कहते हैं। तीखी चोट करने वाली यह उनकी ग़ज़ल, इसके कुछ शेर देखिए-
दिन में फ़सलें रात को भूख उगाता है
सब कहते वह भारत-भाग्य विधाता है
उसके चेहरे की ख़ामोशी है रोती जब मज़दूरी करके वापस आता है
'धनिया' दिन भर बैठी रहती है भूखी
'होरी' अपनों से ही धोखा खाता है
नए छत के बिंबो को चुना और उन्हें अपनी गजलों में पिरोना अमन मुसाफिर के लिए मनु बहुत सहज कार्य है वह इतनी सहजता से नूतन बिंदुओं का प्रयोग करते हैं कि उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इससे बढ़कर सटीक और कोई बम हो ही नहीं सकता था जैसे अपनी एक ग़ज़ल में उन्होंने “यादों का राशन” का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग किया है। इसी गजल में “प्रमोशन” शब्द का भी बेहतरीन प्रयोग है -
मूर्छित एक ख़्वाब जीवन चाहता है
आपकी साँसों की धड़कन चाहता है
भूख से रोता हुआ मेरा हृदय ये
आपकी यादों का राशन चाहता है
तन को दफ़्तर में रखो मंजूर लेकिन
मन हमारा अब प्रमोशन चाहता है
इस डिजिटल युग में सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है सोशल मीडिया में युवाओं का डूबे रहना। सोशल मीडिया में उलझे युवाओं के जीवन का दिलचस्प विश्लेषण किया है अमन मुसाफ़िर ने अपनी इस ग़ज़ल में-
वो गिन रहा कमेंट बचा ये ही काम है
डिजिटल सदी का एक यही तो पयाम है
प्रोफ़ाइलों में साथ दिलों में नहीं हैं साथ
एक दूसरे के प्यार का कोई न दाम है
स्क्रीन पर ही कटते हुए जाए जिंदगी
मिलती नहीं है फुर्सतें कैसी ये शाम है
मत खोज प्यार के ख़तों को रोज़-रोज़ तू
इनबॉक्स में जो आ गया वो ही इनाम है
सच का साथ देना शायर को ज़रूरी लगता है। बल्कि वे पूरी निडरता के साथ अपनी अभिव्यक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं, ठीक शायर अदम गोंडवी की तरह -
बात कड़वी है मगर स्वीकार है
ये ग़ज़ल मेरी नया हथियार है
सिर्फ लफ़्ज़ों का नहीं यह खेल अब
शेर में देखो 'अदम' की धार है।
देश को मिल कर यहाँ सब लूटते
चोर ही अब देश की सरकार है।
झूठ को ही सच बताता है सदा
बिक चुका पूरा यहाँ अखबार है।
आदमी की अब नहीं क़ीमत बची
हर तरफ़ बस झूठ का व्यापार है।
दरअसल, कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में। इस संग्रह की ग़ज़लें युवा शायर अमन मुसाफ़िर को साहित्य की दुनिया में विशेष स्थान दिलाने की पूरी संभावना व्यक्त करती हैं। संग्रह की ग़ज़लें अक्षरशः पठनीय हैं तथा चिंतन मनन के योग्य हैं।
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Sunday, February 15, 2026
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Thursday, February 12, 2026
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Tuesday, February 10, 2026
पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरणपुस्तक समीक्षा
व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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स्मारिका - महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक - मुकेश तिवारी
प्रकाशक - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य - उल्लेख नहीं।
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यदि स्व. महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व की व्याख्या की जाए तो भगवद्गीता (12.13-14) का यह श्लोक सटीक बैठता है कि-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च,
निर्ममो निरहंकारः समदुखसुखः क्षमी।।
- अर्थात जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, दयालु है, अहंकार रहित है और सुख-दुख में समान रहता है, वही वास्तव में सुसंस्कृत है। महेंद्र फुसकेले जी में सकल मानवता के प्रति दया, ममता, करुणा, धैर्य आदि सभी गुण थे। इस पर भी सबसे बड़ा गुण उनमें था सत्य की पक्षधरता का। प्रोफेशन से वे अधिवक्ता थे। श्रमिकों के प्रबल समर्थक थे तथा स्त्रियों के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर हिमायती थे। ऐसे ही व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मारिका का कोई औचित्य होता है।
महेंद्र फुसकेले जी के निधन (1फरवरी 2021) के उपरांत से प्रगतिशील लेखक संघ के सौजन्य से प्रतिवर्ष एक स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा। उन्होंने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन को जितनी सूक्ष्मता से सामने रखा, उतनी ही बारीकी से कविताओं के द्वारा स्त्री की दशा को अभिव्यक्ति दी। ‘‘आचरण’’ के इसी काॅलम के अंतर्गत स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने लिखा था कि ‘‘हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्मे, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। .... महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।’’
इस वर्ष की स्मारिका और अधिक विशिष्ट है क्योंकि इसमें महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह और श्री लाल शुक्ल की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनका भी स्मरण किया गया है तथा प्रेमचंद एवं कबीर के साहित्य पर भी लेख सहेजे गए हैं। कबीर वे कवि थे जिनके सामाजिक सरोकार अत्यंत विस्तृत थे। उनकी साखियां आज भी बेजोड़ हैं। साथ ही, उनकी ललकार की क्षमता का आज भी कोई सानी नहीं है। जहां तक प्रेमचंद का प्रश्न है तो वे हिन्दी साहित्य के वे बिन्दु थे जहां से हिन्दी कथा साहित्य ने सच्चे अर्थ में आधुनिक कथानक में प्रवेश किया तथा उस तबके से नाता जोड़ा जिसकी ओर साहित्यकारों की कलम का ध्यान कम ही जाता था।
श्रीलाल शुक्ल की पहचान उनकी स्पष्टवादिता से रही। उन्हें कालजयी बनाया उनकी रचना ‘‘राग दरबारी’’ ने। ‘‘राग दरबारी’’ हिंदी साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में लिखा था। यह उपन्यास भारत के ग्रामीण और अर्द्धदृशहरी जीवन की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक गिरावट का आईना है। इसकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और तीखे व्यंग्य से परिपूर्ण है। वहीं, नामवर सिंह हिंदी साहित्यिक आलोचना के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। वह प्रगतिवादी आलोचक होने के साथ-साथ नए आलोचकों में भी अपना अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना, संपादन, शोध, व्याख्यान और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचना के ‘रचना पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने वाले नामवर सिंह को उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
चाहे कबीर या प्रेमचंद हों, नामवर सिंह या श्रीलाल शुक्ल हों या फिर महेंद्र फुसकेले जी हों, इनका स्मरण इनके गम और कृतित्व के आधार पर ही किया जाता है, वस्तुतः व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी स्मृतियां रचता है तथा उसे कालजयी बनता है। जब व्यक्ति निज की चिंता को हाशिए पर रखकर सकल मानवता तथा विशेष रूप से उन लोगों के बारे में मनन चिंतन करता है जिन्हें समाज ने ही गौण बना दिया है तथा उनकी सदा उपेक्षा की है, तब चिंतन करने वाला व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतः विस्तार लेने लगता है। प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की इस स्मारिका में प्रस्तुत गद्य एवं पद्य सामग्री को पढ़कर इस तथ्य का प्रमाण हासिल किया जा सकता है। स्मारिका में महेंद्र फुसकेले जी पर पंद्रह लेख हैं- एडवोकेट के.के. सिलाकारी ने फुसकेले जीक्ष के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है “सागर के महान व्यक्तित्व श्री महेन्द्र फुसकेले”, गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख है “मार्क्सवाद के प्रति सारा जीवन प्रतिबद्ध रहे कामरेड”, एडवोकेट अरविंद श्रीवास्तव ने लिखा है “कामरेड फुसकेले राजनैतिक घटनाक्रम से”। इनके साथ ही एडवोकेट ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने “श्रद्धांजलि: एक कम्युनिस्ट योद्धा”, वीरेंद्र प्रधान ने “नव लेखकों के प्रेरणास्रोत महेंद्र फुसकेले”, डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने “स्मृतियां जो धरोहर हैं”, प्रो. एन.के. जैन ने “संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी-फुसकेले जी”, एडवोकेट राजेश पाण्डेय ने “सत्यता के प्रतीक श्री महेंद्र फुसकेले जी” संजय गुप्ता ने “यादगार पल”, डॉ. बहादुर सिंह परमार ने “फुसकेले जी थे सर्वहारा वर्ग के मसीहा”, शैलेंद्र शैली ने “हमारे आदर्श और प्रेरक कॉमरेड”, डॉ राजेंद्र पटोरिया ने “सिद्धान्तवादी श्री महेन्द्र फुसकेले जी”, कामरेड चंद्रकुमार ने “स्मृति दिवस”, देवेंद्र सिंघई ने “बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री फुसकेले जी” तथा अजित कुमार जैन ने “कॉमरेड महेन्द्र कुमार फुसकेले” अपने लेख के रूप में महेंद्र फुसकेले जी का स्मरण किया है।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जो लेख स्मारिका में प्रकाशित किए गए हैं वे हैं - “नामवरसिंह: एक साथी, एक आलोचक”(नमृता फुसकेले), “नामवर जी को मैंने देखा है” (टीकाराम त्रिपाठी)। श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित लेख है डॉ. नमृता फुसकेले का “श्रीलाल शुक्ल जन्म शताब्दी स्मरण”।
कबीर पर लेख हैं - “मोकूँ रोए सोई जन, जो सबद विवेकी होए” (कैलाश तिवारी ‘विकल’), “कबीर के कथित स्त्री-विरोधी दोहों का सच” (डॉ सुश्री शरद सिंह), “कबीर और वर्तमान में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता” (सतीशचंद्र पाण्डे), “क्रान्तिकारी कवि कबीर” (टीकाराम त्रिपाठी), “कबीर का दर्शन” (पेट्रिस फुसकेले) तथा “कबीर और किसान” (कैलाश तिवारी ‘विकल’) तथा कबीर: एक दृष्टि निक्षेप (पी.आर. मलैया)।
प्रेमचंद पर लेख इस प्रकार हैं- “प्रेमचंद की दृष्टि में प्रेम वाया - प्रेम की वेदी’’ (डॉ सुश्री शरद सिंह), “प्रेमचंद के साहित्य में मानव प्रेम एवं राष्ट्रधर्म” (डॉ. महेंद्र खरे), “प्रेमचंद वर्तमान परिदृश्य और साहित्य में प्रासंगिक है” (एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले), “प्रेमचंद कल आज और कल”(कैलाश तिवारी ‘विकल’)।
इन सामग्रियों के अतिरिक्त दोहे, गजल, संस्मरण, कहानी, चौकड़िया, गीत, अठवाई आदि अन्य गद्य-पद्य रचनाएं समाहित हैं।
महेंद्र फुसकेले जी की जयंती पर प्रकाशित इस स्मारिका की विशेषता यह है कि इसका प्रकाशन व्यय मुख्य रूप से फुसकेले परिवार तथा प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के कुछ सदस्य मिलकर वहन करते हैं। स्मारिका का मुद्रण निमिष आर्ट एंड पब्लिकेशन ने किया है जो कि नयनाभिराम है। कव्हर के अंतिम भीतरी पृष्ठ पर प्रगति लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। कलेवर की दृष्टि से यह स्मारिका प्रकाशित कर प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई ने एक नया प्रतिमान गढ़ा है तथा एक पठनीय एवं संग्रहणीय स्मारिका प्रकाशित की है।
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