Tuesday, June 30, 2026

पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह  - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य   - 200/-
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   हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को  किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।

      श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां  हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को  अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।

पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”

वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”

दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
       संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।

चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है।  यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और  प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।

संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।

सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।

संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है।  जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है।  यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।

11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।

कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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Saturday, June 27, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | डिवाइडर ने भओ टकरौंदा हो गओ, रोजीना दो-चार टकरा रये | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
डिवाइडर ने भओ टकरौंदा हो गओ, रोजीना दो-चार टकरा रये
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
मकरोनिया से दीनदयाल नगर जाबे वाली रोड के बारे में कछु कैबे जी डरात आए। जे ने समझियो के उते कौनऊं भूत-प्रेत दोंदरा दे रये औ ने जा सोचियो के उते कोनऊं कटर-मटर चलाबे वारे फिर रये । हऔ, ने उते भूत-प्रेत आएं औ ने कटरबाज, ऊ रोड पे तो बड़े-बड़े मॉल, बड़ी-बड़ी होटलें, बड़ो सो सनीमा औ भौत बड़ो सो अस्पताल आए। आप ओरें जो ई रोड पे कम चलत आओ औ बे बायरे वारे जोन ने ई रोड के बारे में सुन तो रखो आए मनों ऊपे से चले नइयां, सबई सोच रए हुइयो के इत्ती नोंनी रोड खों हम डराए वारी काए कै रए? सो भैया औ बैन हरों बात जे आए के ऊ रोड पे जात-आत टेम जोई डर लगत रैत आए के कऊं गाड़ी डिवाइडर पे ने चढ़ जाए। काए से  के चार-पांच बेर तो हम खुदई अपनी सगी आंखन से देख चुके के कैसे देखत-देखत चार चका वारी डिवाइडर पे जा चढ़ी। दो पहिया सोई टकरात देखी। ऐसे टेम पे जा सोच के जी कंपत आए के उनकी जांगा कभऊं अपनी वारी गाड़ी चढ़ गई तो? फेर तो उतई की कोनऊं अस्पताल में डरें दिखाहें।
हमाओ जे डर बेफालतू को नोंई। आप खुदई अखबार उठा के देख लेओ, डिवाइडर से कोऊं ने कोऊं गाड़ी टकराबे की खबर रोजीना जरूर पढ़बे खों मिल जैहे। कभऊं-कभऊं तो तीनेक गाड़ियां टकराबे की खबर मिलत आए। बाकी जे बात सोई सोचबे वारी आए के‌ ऐसे टकरौंदा डिवाइडर की खबर अखबार में छपत आए, मोबाइल में चलत आए, मनों परसासन के जिम्मेवारन खों नईं मिलत का? उते गलत पार्किंग करबे वारन की गाड़ियन में तारे चटकाबे वारे सो खूब‌ घूमत रैत आएं मनों ईपे कोनऊं ध्यान नईं दे रओ के उते डिवाइडर के नांव पे बन गओ टकरौंदा। सो, आप सबई से जेई बिनती आए के जो ऊ तरफी जाइयो सो बच के जाइयो!
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Thursday, June 25, 2026

बतकाव बिन्ना की | सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      जब हम लोहरे हते तो हमाए इते खाना पकाने वारी बऊ बड़े मजे-मजे की किसां सुनात्तीं। उनईं से सबसे पैले हमने लड़इयों के ब्याओ की किसां सुनी हती। जा किसां खाली किसां ने हती, ईमें मोसम की खासियत सोई बताई गई हती।
का हतो के पैले 15 जून लौं बरसात को मौसम सुरू हो जात्तो। हप्ता भर में चकौड़ा/चरौंटा हरियान लगत्ते। मनो कोऊ-कोऊ दिनां ऐसो बी होत्तो के सूरज बी दिखात रैत्तो औ पानी की झला आन के कढ़ जात्तो। ऊ टेम पे इन्द्रधुष सोई देखबे खों मिल जात्तो। ऊके बारे में बऊ कैत्तीं के जबे सूरज निकरो होए औ झला परे तो ऊ टेम पे लड़इयन को ब्याओ होत आए। अब ऊ टेम पे हमें तो समझ में ने आत्ती के लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? हमें ऊ समै पे जेई लगत्तो के जोन टाईप से दूला-दुलैया को ब्याओ होत आए, मंड़वा तरे, ऊंसई लड़इयन को ब्याओ होत हुइए। का उनके इते बी पंगतें बैठत आएं? हम जेई सोचत्ते। बऊ से एक बेर हमने पूछई लई के जे लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? उनके इते बी ढोलक बजत आए का? गारी सोई गाई जात हुइए, मनो का बे ओरें गारी गा लेत आएं? बऊ ने हमाई बात सुनी तो बे खूब हंसी। फेर उन्ने हमें जे किसां सुनाईं जोन हम आप ओरन खों सुना रए-
का भओ के एक हतो जंगल। ऊ जंगल में एक लड़इया रैत्तो। बा भड़यागिरी सोई करत्तो। जब बा जंगल में शिकार करत-करत बोर हो जात्तो तो कभऊं-कभऊं मुर्गा-मुर्गी चुराबे के लाने गांव में पौंच जात्तो। एक बेर बा गांव पौंचो सो ऊने देखी के गांव में कोनऊं को ब्याओ हो रओ। घासलेट वारी अच्छी लालटेनें जल रईं। पूरो घर, आंगन औ अहातो लौं जगमगा रओ। उत्तई नईं, बा लाईटन से पूरो गांव दमक रओ तो। अब इत्तो उजालो होए तो कोऊ भड़या भला कछू कैसे चुरा सकत? सो बा लड़इया इत्तो तो समझ गओ के आज मुर्गा-मुर्गी कछू नईं मिल पाने। मनो ऊको लगो के जब इते लौं आ ई गए आएं तो तनक ब्याओ देख लओ जाए। बा बाड़ के जरवा की ऊ तरफी छिप के बैठ गओ औ ब्याओ देखन लगो। पूरो ब्याओ देख के ऊको जी बी कुलबुलान लगो के जेई टाईप से अपनों ब्याओ करो जाए। जेई सोचत भओ बा भुनसारे जंगल खों लौट परो।
जंगल पौंच के ऊको लगो के ब्याओ तो तब हुइए जब एक ठइयां लड़इयन मिले। सो बा सब कछू भूल-भाल के एक लड़इयन ढूंढने निकर परो। कछू मेनत के बाद ऊको एक लड़इयन मिल गई। 
‘‘तुम हमसे ब्याओ करहो?’’ लड़इया ने लड़इयन से पूंछी। 
‘‘काए नईं, जरूर करबी!’’ लड़इयन सरमात भई बोली।
मने लड़़इया ने एक दोरो तो पार कर लओ हतो। ऊको ब्याओ के लाने नोंनी सी लड़इयन मिल गई हती।
‘‘कबे करने ब्याओ बोलो?’’ लड़इयन ने लड़इया से पूछी।
‘‘अबे गम्म खाओ! हम तनक रोसनी-मोसनी को इंतजाम तो कर लेवें फेर करबी ब्याओ।’’ लड़इया बोलो।
अब लड़इयन ने तो इंसानों को ब्याओ देखो ने हतो सो ऊको का पतो के लड़इया के दिमाग में का चल रओ? बा बोली, ‘‘ठीक आए, जबे करने हो सो बतइयो।’’
लड़इया ने सोच तो लओ रओ के घासलेट की लाइटें जला के ऊके उजियारे में ब्याओ करहे, मनो ऊके इते कां धरी लालटेनें? तब ऊने सोची के जोन टाईप से बा मुर्गा मसक लात आए ओई टाईप से लालटेनें दबा लाहे। अगली रात खों बो लड़इया गांव पौंचो। मुतकी देर तको रओ। ऊको अबेर होबे की परवा ने हती, बा तो लालटेन चुराबे के लाने मों दताए बैठो हतो।
कुल्ल देर बाद गांव के सब ओरें अपनी-अपनी लालटेंनें बुझा के सो गए। लड़इया दबे पांव उठो औ एक घरे की खिड़की से कूंद के भीतरे पौंचो। उते ऊको लालटेन खूंटा पे टंगी दिखानी। लड़इया उचको औ ऊने लालटेन निकारबे को कोसिस करी। लालटेन ऊके पंजा में ने अटकी औ जमीन पे जा गिरी। आवाज सुन के घर वारे जाग परे। उन्ने लड़या खों देखो तो लट्ठ उठा के ऊको मारबे दौरे। लड़इया बरया-बरके अपनी जान बचा के उते से भागो।
पर बा लड़इया इत्ते पे हार मानबे वारो ने हतो। चार दिनां बाद ऊने फेर गांव को चक्कर मारो। अब के बा एक लालटेन मों में दबाबे में सफल हो गओ। मनो ऊको तुरतईं लालटेन उतई पटकने परी। काए से के लालटेन को कांच ऊ समैं बी भौतई गरम हतो। लड़इया को मों चिहुंक गओ। बा मों झटकत भओ भाग खड़ो भओ।
तीसरी बेरा बा फेर के गांव में घुसो। ई बेर ऊने पैले से बुझी भई लालटेन ताकी औ मौका परतई ऊको मों में दबा के भाग खड़ो भओ। जंगल पौंच के बा भौतई खुस भओ के अब तो लालटेंन की रोसनी में ऊको ब्याओ हुइए। ऊने लड़इन खों बुला लओ। चार लड़या औ बुला लए जोन से बे ओरें देखें के ऊको कित्तो नोंनो ब्याओ हो रओ। सबरी तैयारी हो गई। मुर्गा-मुर्गी सोई भड़याई से ला के धर लए गए। सबने कई के अब ब्याओ सुरू करो जाए। जा सुन के लड़इया ने लालटेन जलाबे की कोसिस करी। पर ऊको जे ने पतो रओ के लालटेन जलाई कैसे जात आए। ऊने भौतई कोसिस करी। इत्ती कोसिस के कोसिस करत-करत भुनसारो हो गओ। तनक देर में भुनसारो सोई ढरक गओ औ दुफारी हो गई। लालटेन ने जलनी ती, ने जली। लड़इया बी थक गओ हतो। मगर करे सो का करे। अब तो ऊकी इज्जत पे बन आई हती। धूप सोई चटक रई हती। इत्ते में कऊं से तनक से बदरा घिर आए, बिजुरिया चमकन लगी औ पानी बरसन लगो। लड़इयन समेत सबरे लड़यों ने कई के ‘‘पानी में भींगबे से अच्छो आए के अब बढ़ लओ जाए। ब्याओ कोनऊं औ दिनां कर लइयो।’’
‘‘तुम ओरें औ फुर्रा आओ! तुमें पतो नइयां के अबई भोलेबाबा ने हमसे कई आए के लड़इयों को ब्याओ इंसानों की लालटेन में नईं होत आए। तुमाए लाने तो हम घाम में बिजली चमकाहें औ पानी बरसाहें। इत्तोई नईं, तुम ओरन के ब्याओ के लाने इंदर भगवान अपनों रंग-बिरंगो धनुष से आसमान सजा देहें। सो जल्दी करो औ ब्याओ कर लेओ।’’ चतुरा लड़इया ने अपनो दिमाग चलाओ औ सबई खों मनगढ़ंत किसां सुना दई। मजे की बात जे के सबरे ऊकी बात में आ बी गए। काए से के ईके पैले उन्ने कभऊं जा सब पे ध्यान ई ने दओ रओ। उनें पतो ई नईं हतो के घाम के संगे बिजुरी बी चमकत आए औ पानी बरसत भए इन्द्रधनुष सोई दिखान लगत आए। काए से के बे ओरे ज्यादातर दिन में सोत रैत्ते और रात के टेम पे शिकार औ भड़याई के लाने निकरत्ते। सो उने बी लगो के जा सांची कै रओ। जरूर भोलेबाबा ने ईको बताओ हुइए। तभई तो घाम में पानी बरस रओ।
फेर का हतो, तुंरतईं लड़या औ लड़इयन को ब्याओ हो गओ। ओई समै से सबरे लड़इयन ने तै करो के अब जब बी घाम के संगे बिजुरी चमक के पानी बरसहे, मनो झला परहे तभईं लड़यां हरें अपनो ब्याओ किया करहें।
सो जे हती किसां लड़यों के ब्याओ के महूरत की। 
लेकन आजकाल का हो रओ के 15 जून तो कब को कढ़ गओ मनो बरसात ने आई। बाकी कभऊं-कभऊं झला आ जात आए। सो लड़यों को ब्याओ हो जात आए। मनो अब बरसात आबे में इत्ती देर होन लगी आए औ घाम के झला इत्ते बार आत-जात आएं के हमें लगत के अब तक तो सबरे लड़यों को ब्याओ हो गओ हुइए। औ बरसात आत-आत सो उनकी मोड़ा-मोड़ी उनके अंगना में खेलन लगहें। जा मौसम की देरी कऊं लड़इयों की जमात ने बढ़ा दे। पता परी के पैले तो लड़इयां गांव में घुसत्ते औ अब सहर में सोई घुसन लगे।
मनो जे बी आए के सहर में जंगल वारे लड़इयों की दाल ने गलहे। काए से के इते राजनीति वारे मुतके लड़या कैमरा की लाइटें चमकवात भए फिरत रैत आएं। औ कऊं कोनऊं लड़या कोऊ टीवी के न्यूज चैनल वारे से टकरा गओ तो समझो के हो गओ ऊको बेड़ो गरक। ऊकी घींच पकर के ऊसे सवाल बी पूंछहें औ ऊको बोलन बी ने दैंहे। खैर, जे सब छोरो, आप ओरे जब देखियो के घाम निकरो औ पानी बरस रओ तो समझ जाइयो के लड़इयों को ब्याओ हो रओ।       
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के लड़या बी तभई लौं हैं, जब लौं जंगल बचे हैं। जो जंगल ने बचहें तो लड़इन को का हुइए? बे कां जीहें?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                           
      विशेष रूप से उत्तर भारत में मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ अपने पांव पसारता जा रहा है। यदि आप राजनीतिक, प्रशासनिक रूप से या पैसों से पॉवरफुल हैं तो आपको उन मंदिरों में भी गर्भगृह तक जाने और देवप्रतिमा के निकट पहुंच कर दर्शन करने की सुविधा मिल जाएगी जहां आमजन के लिए प्रवेश निषेध है। क्या ईश्वर की निकटता पैसों और पॉवर से बंधी हुई है? हम श्रीमदभगवद्गीता पढ़ते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उसकी शपथ भी लेते हैं, हम वेद, पुराण पढ़ते-सुनते हैं और प्रवचनों में उनके उद्धरण सुन कर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। क्या कभी हमने ध्यान से पढ़ा है कि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने किसे असली भक्त और अपना प्रिय बताया है? ‘‘ऋग्वेद’’ में किसे ईश्वर का प्रिय बताया गया है? या फिर क्या हमने कभी ध्यान दिया गया है कि ‘‘रामचरित मानस’’ में किसे असली भक्त कहा गया है? इन सबको समझे बिना यदि हम मंदिरों में ईश-दर्शन पर वीआईपी संस्कृति थोपते जाएंगे तो हम अपने धर्म का भी व्यवसायीकरण करते जाएंगे। जबकि धर्म आस्था है बाजार नहीं।  
यह तो सभी ने देखा होगा कि नवरात्रि अथवा विशेष हिन्दू पर्वों में ग्रामीण अथवा आर्थिकरूप से कमजोर तबके के लोग, चाहे वे स्त्री हो या पुरुष ईश्वर की आस्था से प्रेरित हो कर धर्म ध्वज उठाए पैदल निकल पड़ते हैं मंदिरों की ओर। कुछ लोग तो डामरीकृत अथवा सीसीरोड पर तपन की परवाह किए बिना लेट-लेट कर अपने घर से मंदिर तक की दूरी तय करते हैं। कांवरियों के बारे में तो सभी जानते हैं। जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को ईशस्थल के दर्शन कराने के लिए कांवर में उन्हें ढोया था ठीक वैसे ही एक पलड़े में आस्था और दूसरे पलड़े में ईश्वर के प्रति प्रेममय समर्पण रख कर कांवरियां निकल पड़ते हैं। इस प्रकार के समर्पित भक्तों को जिनके मन में श्रद्धा और भक्ति हिलोरें लेती रहती हैं क्या वीआईपी दर्शन मिलते हैं? उत्तर होगा ‘नहीं!’ क्योंकि ये विशुद्ध भक्त हैं, धनपति, पॉवरपति या प्रशासनपति नहीं। इन्हें गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति कभी नहीं होती है। 

हर वर्ष नवरात्रि पर मैं अपनी आंखों से देखती हूं कि किस प्रकार वीआईपी कल्चर उन मंदिरों में भी प्रवेश पा चुका है जहां पहले हर प्रकार के भक्त को कदम रखने की अनुमति थी। पिछले वर्ष की नवरात्रि की घटना है, मैं रानगिर मंदिर दर्शन करने गई थी। रास्ते में मैंने अनेक ऐसे भक्त देखे जो माता का ध्वज पैदल जा रहे थे। उनमें कुछ ऐसे भी थे जो सड़क पर दंडवत लेट-लेट कर रस्ता तय कर रहे थे। आस्था का घोर समर्पित रूप जिसमें श्रद्धालु स्वयं को कष्ट पहुंचाता है ताकि देवी को प्रसन्न कर सके। देवी के दर्शन कर के उसकी कृपा पा सके। किन्तु मंदिर में पहुंच कर लंबी लाईन में लगने के बाद भी उसे वह निकट दर्शन नहीं मिलते हैं जो एक विधायक, मंत्री, कमिश्नर, कलेक्टर या किया धन सम्पन्न व्यक्ति को सुगमता से मिलते हैं। क्या कष्ट उठा कर पहुंचने वाले भक्त की भक्ति में कोई कमी है और शक्ति सम्पन्न भक्त की भक्ति विशिष्ट है? दोनों की भक्ति में कोई अंतर होता तो नहीं है लेकिन बना दिया जाता है। फिर भी यदि बारीकी से धर्म के पलड़े पर तौला जाए तो कष्ट उठा कर आने वाले भक्त का पलड़ा भारी ही रहेगा। फिर भी उसे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं मिलेगा, जबकि एक वीआईपी को तत्काल मिल जाएगा। जब ईश्वर अपने भक्तों में भेद-भाव नहीं करता है तो हमारे मंदिरों में इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है?

इस बात का आशय यह नहीं है कि हर व्यक्ति को मंदरों के गर्भगृह में प्रवेश दिया जाए। यदि सुरक्षा कारणों से यह उचित नहीं है तो प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। मंदिर के पुरोहित या पुजारी आदि को ही यह अनुमति मिलनी चाहिए। हर भक्त एक निश्चित दूरी से ईशप्रतिमा के दर्शन करे। लेकिन ‘‘हर भक्त’’। इस नियम को कोई वीआईपी भी न तोड़ सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। क्या यह उचित नहीं होगा? कि या तो हर भक्त को प्रवेश मिले अथवा किसी भी भक्त को प्रवेश न मिले। ईश्वर के दरबार में सभी एक समान महसूस कर सकें। यही धर्मोचित व्यवस्था कहलाएगी।  

ईश्वर का प्रिय भक्त कौन है और उसकी क्या विशेषता होनी चाहिए इस बारे में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में स्पष्ट उल्लेख है कि ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त है जो निस्वार्थ, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान रहता है और निरंतर प्रभु के प्रति समर्पित होता है। ‘‘गीता’’ के 12वें अध्याय के 13वें और 14वें श्लोक में स्पष्ट कहा किया कि -
श्लोकःअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्याे मद्भक्तः स मे प्रियः।।
 - अर्थात जो व्यक्ति किसी भी जीव से द्वेषभाव नहीं रखता, सब प्राणियों का मित्र और दयालु है, ममता से युक्त, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान (शांत) रहने वाला और क्षमाशील है। जो योगी निरंतर संतुष्ट है, जिसने मन और इंद्रियों को वश में कर रखा है, जिसका मन और बुद्धि मुझमें अर्पित हैं, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
इसी प्रकार गीता के 12वें अध्याय का 15वां श्लोक है कि 
‘‘रूयस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोड्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।
- अर्थात जिससे किसी भी जीव को कष्ट नहीं होता, जो किसी जीव से स्वयं भी भयभीत नहीं होता, और जो हर्ष (अत्यधिक ख़ुशी), अमर्ष (ईर्ष्या/क्रोध), भय तथा उद्वेगों से मुक्त है, वह भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है।
गीता के 12वें अध्याय का 16वां श्लोक इस संबंध में और अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि-
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।
- अर्थात जो भक्त सांसारिक कामनाओं से रहित, भीतर-बाहर से पवित्र, कार्य करने में कुशल, पक्षपातरहित, दुखों से मुक्त है और जिसने सभी आरंभों (कर्मों के फलों की चाहना) का त्याग कर दिया है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है।
भगवद गीता के अलावा, अन्य हिंदू धर्मग्रंथों जैसे रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और ऋग्वेद में भी ईश्वर के प्रिय भक्त के गुणों और लक्षणों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में उन लोगों को ईश्वर का प्रिय बताया गया है जो सत्य मार्ग पर चलते हैं और ईश्वर की स्तुति करते हैं। देखिए ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 31, श्लोक 6 -
सत्यं वदन्तं कवयः पृच्छन्ति 
नयन्ति धीराः सुकृताय लोकं।।
- अर्थात जो मनुष्य हमेशा सत्य का आचरण करता है, सत्य बोलता है, वही बुद्धिमान, श्रेष्ठ और ईश्वर का प्रिय है। ऐसे ही सच्चे ज्ञानी मनुष्य को ईश्वर उत्तम लोक तक ले जाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त होता है जो निष्कपट, अहंकारहीन हो और सांसारिक दिखावे से दूर रहकर निष्काम भाव से प्रभु के प्रेम में लीन रहता है। इस संबंध में श्रीहरि और नारद मुनि की एक बहुत प्रसिद्ध पौराणिक कथा है। श्रीमद्भागवत पुराण इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण प्रह्लाद के चरित्र के माध्यम से बताते हैं कि ईश्वर का प्रिय कौन है? (स्कंध 7, अध्याय 14)-
निर्ममा निरहङ्काराः समदुःखसुखाः सुहृदः।
निःसङ्गाः सर्वतो येषां मयि सन्निवेशितं मनः।।
- अर्थात जो ममता और अहंकार से रहित हैं, सुख-दुख में समान हैं, सब प्राणियों के सच्चे हितैषी (सुहृद) हैं, आसक्तिहीन हैं और जिनका मन पूरी तरह से मुझमें (परमात्मा में) लगा हुआ है, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

तुलसीदासकृत ‘‘रामचरितमानस’’ में प्रभु श्रीराम ने शबरी को बताते हुए ईश्वर के प्रिय के लक्षण स्पष्ट किए हैं। रामचरितमानस में यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। देखिए अरण्यकाण्ड, दोहा 35-36, रामचरित मानस -
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
करम बचन मन राउर चेरा। 
सोइ जनु मोर परम प्रिय नेरा।।
-अर्थात जिसका मन निष्कपट और निर्मल होता है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है। मुझे छल-कपट और दूसरों में दोष (छिद्र) ढूँढना बिल्कुल पसंद नहीं है। जो मनुष्य कर्म, वचन और मन से मेरा (ईश्वर का) दास है, वही मेरा परम प्रिय है। 

संत रैदास की भक्ति मुख्य रूप से दास्य भाव और बिना शर्त समर्पण पर आधारित है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि शुद्ध मन और प्रेम से प्राप्त होती है। इसीलिए तो वे कहते हैं कि ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’’ संत कबीर ने अपनी रचनाओं में ईश्वर भक्ति के नाम पर होने वाले आडंबरों, दिखावे और कर्मकांडों का घोर विरोध किया है। उनके अनुसार, ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्रेम में बसते हैं। चाहे रैदास हों या कबीर यही कहते हैं कि ईश्वर की निकटता आडम्बरहीन रहने में है, आडम्बरों नहीं। 

दरअसल, मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन’’ एक ज्वलंत विषय है। ईश्वर के दरबार में सभी भक्तों को समान माना जाना चाहिए, लेकिन वीआईपी संस्कृति के तहत प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं और अधिकारियों को विशेष सुविधाएँ मिलती हैं, जिससे आम जनता को घंटों लाइनों में इंतजार करना पड़ता है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि भगवान के सामने सभी भक्त बराबर हैं। अदालतों का मानना है कि मंदिरों में विशेषाधिकार की बजाय समानता का भाव होना चाहिए। जहां वीआईपी कुछ ही मिनटों में दर्शन करके लौट जाते हैं, वहीं आम श्रद्धालुओं को कई घंटों तक लंबी और थका देने वाली कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। वीआईपी आगमन के समय अक्सर आम कतारों को रोक दिया जाता है या सुरक्षाकर्मियों को आम जनता से धक्का-मुक्की करनी पड़ती है, जिससे भगदड़  का खतरा बढ़ जाता है। कई मंदिरों में वीआईपी और विशेष दर्शन के लिए अलग-अलग राशि तय कर दी गई है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति भी अब एक व्यापार बन चुकी है। 
जबकि सिख धर्म में ऐसा नहीं है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां किसी भी प्रकार का वीआईपी या प्राथमिकता पास नहीं होता। सभी को एक ही आम कतार से गुजरना पड़ता है। अन्य गुरु़द्वारे भी इसका पालन करते हैं। फिर हिन्दू मंदिरों में वीआईपी कल्चर की अपसंस्कृति को क्यों घुसपैंठ करने दिया जा रहा है? इससे हिन्दू धर्म को ही ठेस पहुंच रही है। वैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वीआईपी दर्शन जैसी कोई सुविधा देनी ही है तो वह वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों  और अतिआवश्यक संवैधानिक पदों तक ही सीमित रखना चाहिए। बहरहाल, इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार किया जाना जरूरी है।                          -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 25.06.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, June 24, 2026

देव जागेश्वर नाथ शिव मंदिर बांदकपुर भ्रमण | ट्रैवलर डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚗 🚩🚙 एक और घुम्मकड़ी... जी हां, एक धार्मिक घुम्मकड़ी..., बांदकपुर के देव जागेश्वर नाथ शिव मंदिर का भ्रमण... कल  23जून को...
🚩मध्य प्रदेश के सागर संभाग के दमोह जिले में बांदकपुर में स्थित  देव श्री जागेश्वर नाथ जी मंदिर बुंदेलखंड का एक प्रमुख और सिद्धपीठ शिव मंदिर है। यहाँ स्वयंभू शिवलिंग है जिसे देश का तेरहवां ज्योतिर्लिंग भी माना जाता है। प्रचलित विश्वास के अनुसार यह शिवलिंग हर साल आकार में बढ़ता यानी चौड़ा होता जा रहा है।
🚩 बांदकपुर के जागेश्वर नाथ जी मंदिर की सागर से सड़क मार्ग से दूरी लगभग 103 किलोमीटर है। यह स्टेट हाईवे 14 पर स्थित है। वैसे बांदकपुर में रेलवे स्टेशन भी है। 
   🔸मैं सड़क मार्ग से सागर से दमोह बाईपास होते हुए बांदकपुर पहुंची। लगभग ढाई घंटे का समय लगा।
🚩"स्कंद पुराण" में भी इस जागृत शिवलिंग का उल्लेख है। मान्यता है कि चारों धाम की यात्रा करने के बाद भी, यदि  माँ नर्मदा के जल से भगवान जागेश्वर का अभिषेक नहीं किया जाए तो उनकी तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है। बांदकपुर धाम में स्थापित शिवलिंग किसी मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह एक प्राकृतिक स्वयंभू लिंग है, जिसे पुराणों में अत्यंत जाग्रत और कल्याणकारी माना गया है।
    🔸जागेश्वर शिव (जागेश्वर महादेव) का उल्लेख स्कंद पुराण के मानस खंड और कुमारिका खंड के विभिन्न श्लोकों में मिलता है। स्कंद पुराण में जागेश्वर धाम को वह पवित्र स्थान माना गया है जहाँ पृथ्वी पर सबसे पहले शिवलिंग की पूजा शुरू हुई थी।
  🔱"तंत्र जागेश्वर लिंग श्री रामेण स्वपूजिता" श्लोक का उल्लेख आता है। इसका अर्थ है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने दंडकारण्य (या उत्तराखंड क्षेत्र) में स्वयं जागेश्वर महादेव की पूजा की थी।
इस श्लोक का भावार्थ है- "वहां (बांदकपुर) स्थित स्वयंभू जागेश्वर शिवलिंग की पूजा स्वयं भगवान श्री राम द्वारा की गई थी।"
   - यह श्लोक मूल रूप से स्कंद पुराण के कुमारिका खंड  से उद्धृत माना जाता है। वर्ष 1940 में बांदकपुर के प्रख्यात विद्वान कवि भैरव प्रसाद बाजपेई द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक "बांदकपुर जागेश्वर रहस्यम" में इस श्लोक का विशेष रूप से उल्लेख और संकलन किया गया है।
🚩मुख्य जागेश्वर मंदिर से पूर्व दिशा की ओर लगभग 100 फीट की दूरी पर माता पार्वती का भव्य मंदिर स्थित है। 
🚩 पार्वती मंदिर के द्वार पर जागेश्वर मंदिर की ओर मुख किए नंदी की प्रतिमा है।  मान्यता है कि इस प्रतिमा के कानों में अपनी जो भी इच्छा व्यक्त की जाए यानी नंदी जी को जो भी अपनी इच्छा बताई जाए वह भगवान जागेश्वर तक अवश्य पहुंचती है और भगवान जागेश्वर शिव उस इच्छा को पूर्ण करते हैं।
     🔸मैंने भी नंदी जी के कानों में अपनी इच्छा कह डाली।😊 क्या कहा यह सीक्रेट है 😃
🚩 वैसे लोग जो कहते हैं की देवता या देवी स्वयं बुलाती हैं, कभी-कभी यह बात सच लगती है.. क्योंकि बांदकपुर यात्रा का पहले से कोई विचार नहीं था। अप्रैल में मैहर और ओरछा जाने का कार्यक्रम बना किंतु अत्यधिक गर्मी के कारण और कुछ और समस्या आ जाने के कारण दोनों जगह जाना कैंसिल हो गया और अब अचानक विचार आया की बांदकपुर जाना चाहिए वर्षों हो गए जागेश्वर नाथ शिव के दर्शन किए...   अचानक कार्यक्रम बना और दो दिन के भीतर उसे कार्यक्रम पर अमल भी हो गया... यद्यपि इस कार्यक्रम के बने के बाद चित्रकूट जाने का भी सुयोग बन रहा था किंतु बाबा जागेश्वर नाथ की मर्जी थी कि उनके दरबार में मैं पहुंचूं और मत्था टेकूं🙏🚩🙏 
🚩लगभग 2.25 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस परिसर में यज्ञ मंडप, अमृत कुंड, काल भैरव, श्री रामजानकी और हनुमान जी के अन्य छोटे मंदिर भी बने हुए हैं।
🚩 मंदिर सुबह खुलता है तथा दोपहर 12:00 भगवान को भोग लगाने के बाद विश्राम के लिए बंद कर दिया जाता है फिर दोपहर 3:00 बजे फिर मंदिर खुलता है जो रात्रि की आरती के बाद बंद किया जाता है।  मंदिर के दर्शन के समय की जानकारी की भी फोटोग्राफी कर ली तथा उसे पोस्ट कर रही हूं ताकि जो भी व्यक्ति वहां जाना चाहे वह दर्शन का समय देखकर पहुंच सकें।
     🔱महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी के त्योहारों पर मंदिर परिसर में  भारी भीड़ उमड़ती है। दूर-दूर से कांवड़िए और भक्त जल चढ़ाने आते हैं। सोमवती अमावस्या दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र कुंड में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं।
🚩 मैं ठीक 3:00 बजे बांदकपुर मंदिर परिसर में पहुंची। पहले मेरा कार्यक्रम सोमवार को जाने का था किंतु किसी ने मुझे सलाह दी कि सोमवार को भारी भीड़ रहती है इसलिए किसी और दिन का चयन करूं तो मैं मंगलवार का  दिन किया।
   🔱फिर भी 3:00 बजे मंदिर के द्वार खुलते ही अच्छी खासी भीड़ उमड़ आई। कोई मनौती मानने आया था, तो कोई अपने परिजनों के विवाह का कार्ड चढ़ाने आया था, तो कोई अभिषेक करने... गर्भगृह के संकरे द्वार से सभी श्रद्धालु बड़ी शालीनता से पंक्तिबद्ध प्रवेश करते गए यद्यपि भीड़ के कारण स्पष्ट फोटो लेना संभव नहीं हो सका 😌
🚩 यहां मनौती के संबंध में कुछ दिलचस्प  परंपराएं हैं... जैसे मनौती पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपनी इच्छा और हैसियत के अनुरूप धन्यवाद ज्ञापित करते हैं यानी कुछ लोग जागेश्वर शिव का जलाभिषेक करते हैं, तो कुछ कीमती सामग्री का चढ़ावा भी चढ़ाते हैं।
    🔱मनौती पूरी होने पर पार्वती मंदिर की भित्तियों पर महावर से हथेलियों की छाप लगाई जाती है।
  🚩🚙 दोपहर लगभग 1:00 बजे जब मैं सागर से रवाना हुई थी उस समय सागर में बारिश के आसार दिखाई पड़ने लगे थे। काले बादल छाने लगी थे। मौसम सुहाना हो चला था। 🌨️⛈️ लेकिन  दमोह पहुंचते-पहुंचते मौसम बदल गया। बांदकपुर में भारी गर्मी थी। 🌞
     🙋मंदिरों में दर्शन करने के बाद मैंने ठेले पर पानी पुरी खाईं और कोल्ड ड्रिंक पिया।🍛🧋
    🚩फिर  बांदकपुर से वापसी का सफर शुरू हुआ 🚙 बांदकपुर और दमोह की गर्मी के बाद सागर आते-आते मौसम बदलता चला गया और सागर जिले में प्रवेश करते ही बारिश ने स्वागत किया। रास्ते में बिजलियों की चमक और बादलों की गरज के साथ भारी बारिश देखने को मिली। इस बारिश ने घर पहुंचने तक साथ दिया। उसे देखकर लगा कि अब सही में मानसून दस्तक दे रहा है। 
❗🔱🚩 देखा जाए तो यह मेरी धार्मिक घुमक्कड़ी थी... मेरे विचार से इस तरह की घुम्मकड़ी अवश्य करना चाहिए इससे लोगों की आस्था ईश्वर के प्रति समर्पण और हमारी धार्मिक संस्कृति को निकट से देखने का अवसर मिलता है साथ ही ईश्वरीय विचार और प्रकृति का सुंदर संयोग भी  अनुभव किया जा सकता है।... इस प्रकार की घुम्मकड़ी से शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की ऊर्जा मिलती है। अत्यंत व्यस्त और विपरीतता से भारी जीवन में इस तरह की यात्राएं जीवन में भी ऊर्जा का संचार करती हैं। कम से कम मेरा तो यही मानना है 🌹😊🌹
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23 जून 20 26
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🌹 घुम्मकड़ी चाहे धार्मिक हो यह मात्र पर्यटन की दृष्टि से हमेशा आनंददायक ही रहती है... दुनिया को देखने का एक अलग नज़रिया देती है... और हौसला देती है उत्साह और साहस के साथ जीने का...🚩🎉🙋

🚩If you explore the places you were finds Everything is special. - Dr (Ms) Sharad Singh's advice 🙋🤩❤️
🚶🏃🚴🚙🚜🛤️🚩🎉🚩

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Tuesday, June 23, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | मानसून खों ने कोसों, इते तो ऊंसईं सब काम लेट होत आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट 
मानसून खों ने कोसों, इते तो ऊंसईं सब काम लेट होत आएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
परों एक भैयाजी  बजरिया में टकराने। कुल्ल मईना बाद मिले, मनों हालचाल पूछने की जांगा अपने माथे को पसीना पोंछत भए कैन लगे के “जा मानसून ने अच्छो दगा करो, 15 जून लौं आत-आत ऐसो धीमों पर गओ के 25 जून लौं ने आहे। जा तो भौतई गलत बात आए।” 
पसीना मानों हमें सोई चुआ रओ हतो पर हमने उनसे कई के “मानसून खों आप ने कोसों। ईमें मानसून को कोनऊं दोस नईयां।”
“काए ने कोंसो जाए? आते आबे में बा लेट कर रओ के नईं?” भैयाजी बिगड़त भए बोले।
तब हमने उनें समझाओ, “भैयाजी, सई में ईमें ऊको कोनऊं दोस नईयां, बा तो अपने इते की चलन में चल रओ।”
“का मतलब?” भैयाजी ने पूंछी।
“मतलब जे आए भैयाजी के अपने इते मकरोनिया से सदर वारी आरओबी कित्ते साल में बनीं, तनक याद करो? अपने लाखा बंजारा जू की स्टेच्यू ने   कित्तो इंतजार करो अपनों मों दिखाबे खों बा सोई याद कर लेओ। अभईं कछू समै पैले अपने इते सिविल लाइंस की टिरेफिक लाईट कित्ते हप्ता बंद रई तनक याद करियो!” हमने भैयाजी खों गिनवाबो सुरू करो।
“सो, ईंसे मानसून को का लेबोदेबो?” भैयाजी ने मोंसे पूछी।
“बोई तो हम बता रए। तनक गम्म तों खाओ। का आपखों पतो के 46 किमी पाईप लेन बदली जानी आए के जींसे पीबे के लाने साफ पानी मिल सके। पर भओ का आए के 4 माए में खाली 700 मीटर पाईप लेन बदली गई आए। सो, जब इते इत्ती सुस्ती से हरय-हरय काम होत है, सो मानसून सोई सोंचत हुइए के टेम पे पौंच के इते को चलन काए बिगारो जाए!” हमने भैयाजी खों औ अच्छे से समझाई। भैयाजी खों समझ में आ गई औ बे अपनों मूंड़ हिलात भए बढ़ गए। 
मनों हमने सई कई के नईं? जो सई लगे तो मानसून खों कोसें से पैले तनक जे जरूर सोंच लइयो के इते कोनऊं काम टेम पे होत आएं के नईं!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य  - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।

भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी  कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।

यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।

यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला  ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।

“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं।  विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।

कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/-  साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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