Saturday, March 7, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     कछू जने कछू ज्यादई स्याने होत आएं। पलकां पे परे-परे मोबाईल पे उंगरिया फेर-फेर के मनो स्क्रीन की मसाज कर रए होंए, लेकन जो उनसे पूछो के काए भैया, ऊ कार्यकरम आप ने दिखाने? सो, बे जेई कैंहें के का कएं बेजा बिंधे रए। मनो ऊनसे ज्यादा बिजी तो ई दुनिया ने हुइए। जेई से बा कहनात कई जात आए के फुरसत के मारे टेम नइयां। बाकी अपने इते एक से बढ़ के एक कहनात कई जात आएं। जैसे, चित्त तुमाई पट्ट तुमाई - मने दोई तरफी से लाभई-लाभ। जाके जैसी नदियां- नारे ऊसईं ओके भरका - मने जोन जैसो हुइए वा की संगत औ करम सोई ऊसईं हुइएं। एक कहनात औ आए जो सबई खों पता आए के जबरा मारे औ रोन न दे। मने एक तरफी तो परेसान कर रए औ ऊपे से सिकायत बी नईं करन दे रए।

     आप ओरें सोच रए हुइयो के जे सबरी कहनातें हमें काए याद आ रईं? सो, बात जे आए के अपने ई सहर में टिरेफिक की दसा ऊंसईं होत जा रई के इते के बराती ने उते के न्यौतार। मने कोऊ पूछबे, देखबे वारो नइयां। खास- खास चौराए में टिरेफिक की बत्ती हप्ता-खांड़ बंद डरी रैत आए, मनो कोनऊं खों फिकर नईं। झुंड के झुंड कुत्ता सगरे में फिर रए, मनो कोनऊं खों फिकर नईं। औ बा टाटा की लेन सो भांटा निकरी। कां तो चौबीस घंटा पानी की कई गई रई, मनों दो दिनां में नल आ जाएं सो खुद को रामधनी समझो। लीकेज देखबे वारो सो ऊंसई कोनऊं नईंयां। सो, अखीर में जे कहनात औ सुन लेओ के अपन इते टेंसूआं ढा रए औ बे उते इमली के पत्ता पे कुलाटां खा रए। अब ईको मतलब आप ओरें खुदई सोचियो। जै रामजी की!
---------------------
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
#टॉपिकएक्सपर्ट #डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #पत्रिका  #patrika #rajsthanpatrika #सागर  #topicexpert #बुंदेली #बुंदेलीकॉलम

Friday, March 6, 2026

चर्चा प्लस | युद्ध के संभावित दंगल के बीच बुंदेली होली का संदल | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस        
युद्ध के संभावित दंगल के बीच बुंदेली होली का संदल 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                           होली परस्पर मैत्री और भाईचारे का त्यौहार है। जाति, धर्म, समुदाय का भेद भूल कर सभी आपस में गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। परन्तु आज वैश्विक स्तर पर जिस तरह युद्ध के बादल छा चुके हैं उन्हें देखते हुए सभी का चिंतित होना स्वाभाविक है। हमारे देश में यह कोई नहीं चाहता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध की नन्हीं-सी लपट भी आए। ऐसे चिंता भरे गरमाए माहौल में बुंदेली होली का स्मरण ही किसी संदल अर्थात चंदन की सुगंध भरी ठंडक से कम नहीं है। अतः राजनीतिक तथा यौद्धिक तनाव को भूल कर हम बुंदेली होली की विशेषताओं आनन्द लें।          
          
जब बात हो बुंदेलखंड होली की तो यहां की परम्पराओं और कथाओं में उत्सवधर्मिता को बखूबी देखा जा सकता है। बुंदेलखंड की वे महिलाएं जो हर दिन समस्याओं का सामना करती हैं लेकिन उनके भीतर मौजूद उत्सवधर्मिता होली आते ही उनके साहसी व्यक्तित्व को सबके सामने ला देती है। कवि पद्माकर ने अपने इस कवित्त में बुंदेलखंड की महिलाओं के साहस भरे पक्ष को बड़ी सुंदरता से सामने रखा है -
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी
नैन नचाय कही मुसकाय -लला फिर आइयो खेलन होरी 

बरसाने की तरह बुंदेलखंड में भी कुछ स्थानों पर ‘लट्ठमार‘ होली खेलने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। झांसी जिले के पुनावली कलां गांव में होली के अवसर पर महिलाएं गुड़ की भेली एक पोटली में बांधकर कर पेड़ की डाल पर टांग देती हैं। फिर महिलाएं लट्ठ लेकर स्वयं उसकी रखवाली करती हैं। जो भी पुरुष इस पोटली को लेने का प्रयास करता है, उसे महिलाओं के लट्ठ का सामना करना पड़ता है। इस रस्म के बाद ही यहां होलिका दहन होता है और फिर रंग खेला जाता है। इस परम्परा के संबंध में एक कथा प्रचलित है कि राक्षसराज हिरणकश्यप के समय होलिका विष्णुभक्त प्रह्लाद को अपनी गोदी में लेकर जलती चिता में बैठी थी। वहां उपस्थित महिलाओं से यह दृश्य देखा नहीं गया और उन्होंने राक्षसों के साथ युद्ध करते हुए विष्णु से प्रार्थना की कि वे प्रहलाद को बचा लें। उन साहसी महिलाओं की पुकार सुन कर विष्णु ने प्रहलाद को बचा लिया। इसी घटना की याद में ’लट्ठमार होली’ का आयोजन किया जाता है, जिसके द्वारा महिलाएं यह प्रकट करती हैं कि वे अन्याय के विरुद्ध लड़ भी सकती हैं।
बुंदेलखंड में हमीरपुर (उ.प्र.) के कुंडौरा गांव में भी लट्ठमार होली खेली जाती है। यहां रंगों की होली एक नहीं बल्कि दो दिन होती है। होलिका दहन के ठीक अगले दिन महिलाएं होली खेलती हैं और उसके बाद दूसरे दिन पुरुष होली खेल पाते हैं। पहले दिन की होली में महिलाओं का जोर चलता है। इस दिन पुरुष अपने घर से निकलने से हिचकते हैं। जो पुरुष घर से बाहर नजर आ जाता है उसे महिलाओं के लट्ठ की मार का सामना करना पड़ता है। इसलिए रंगवाली होली के पहले दिन वे महिलाओं से बच कर रहते हैं। दूसरे दिन वे महिलाओं के साथ मिल कर होली खेल पाते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे एक रोचक कथा है। कथा के अनुसार ग्राम कुंडौरा में कभी एक रसूख वाला व्यक्ति हुआ करता था जिसका नाम था मेंहर सिंह (या मेंबर सिंह)। एक बार होली के त्यौहार पर जब गांव के राम-जानकी मंदिर में फाग गाई जा रही थी। उसी समय मेंहर सिंह ने आपसी रंजिश में मंदिर में ही एक व्यक्ति की हत्या कर दी। उसने वहां उपस्थित लोगों को भी धमकाया। क्योंकि उसे संदेह था कि मंदिर में उसके दुश्मन को पनाह दी गई थी। इस घटना से डर कर गांव वालों ने होली का त्योहार मनाना छोड़ दिया। वर्षों तक गांव में होली नहीं मनाई गई। तब वहां की महिलाओं ने पहल की और वे हुरियारों की तरह होली खेलने लट्ठ ले कर निकल पड़ीं। तभी से कुंडौरा में लट्ठमार होली खेली जाने लगी। दरअसल स्त्रीशक्ति की कथा कहती है बुंदेलखंड की होली।
बुंदेलखंड में प्रचलित होली की इन कथाओं और परम्पराओं के संदर्भ में कवि पद्माकर का यह कवित्त सटीक बैठता है जिसमें यहां की महिलाओं के साहस भरे पक्ष को बड़ी सुंदरता से सामने रखा गया है -
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुसकाय ’’लला फिर आइयो खेलन होरी।

ऐसा नहीं है कि बुंदेली महिलाएं सामान्य होली के अलावा सिर्फ लट्ठमार होली ही खेलती हों। अनेक स्थानों पर वे फूलों की होली भी खेलती हैं। बुंदेलखंड के मध्यप्रदेशी अंचल के सागर नगर में गोपालगंज झंडा चैक स्थित श्री नृत्यगोपाल मंदिर में होलाष्टक के अवसर पर महिलाएं राधा-कृष्ण के साथ फूलों की होली खेलती हैं। वे फाग एवं भजन गाती हैं, नृत्य करती हैं तथा परस्पर एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा करती हैं। महिलाओं द्वारा फूलों से होली खेलने की परम्परा उत्तरप्रदेश के बुंदेली अंचल कुलपहाड़ में भी है। कुलपहाड़ महोबा जिले में स्थित है। टेसू के फूलों की वर्षा और ईसुरी के गीतों के गायन के साथ यहां फूलों की होली खेली जाती है।
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...

बुंदेलखंड में माना जाता है कि होली का त्योहार बुंदेलखंड से ही आरम्भ हुआ। एक किंवदंती के अनुसार झांसी से लगभग 66 कि.मी. दूर स्थित एरच नामक गांव से इसकी शुरुआत हुई। कथा के अनुसार एरच कभी राजा हिरयकश्यपु की राजधानी हुआ करता था।एरच में ही बालक प्रहलाद को होलिका अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठी थी, किन्तु प्रहलाद सही-सलामत बच गया और होलिका स्वयं जल कर भस्म हो गई। इसके बाद ही होलिका दहन की परम्परा आरम्भ हुई जो धीरे-धीरे समूचे देश में फैल गई। बुंदेलखंड के कई इलाकों में पंचमी तक होली खेली जाती है। 
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...

मध्यप्रदेश के अशोक नगर से लगभग 75 कि.मी. दूर है करीला। रंगपंचमी के अवसर पर इस छोटे से गांव में भीड़ उमड़ने लगती है। लाखों की संख्या में लोग पहुंचकर यहां स्थित सीता माता के मंदिर में गुलाल अर्पित करते हैं। एक किंवदंती के अनुसार यहीं ऋषि बाल्मीकि के आश्रम में सीता माता ने लव-कुश को जन्म दिया था। लव-कुश के जन्म पर स्वयं अप्सराओं ने यहां नृत्य किया था। नृत्य की इस परम्परा को बेड़नी नर्तकियां आज भी जारी रखे हुए है। मनौतियां पूरी होने पर भी श्रद्धालु मंदिर में गुलाल चढ़ाते हैं और रंग-गुलाल उड़ाते हुए बेड़नियों का नृत्य कराते हैं। धर्म, रंग और मान्यताओं का सुंदर मेल यहां देखने को मिलता है। 
   
राजकिशोरी महल बिच खेलत रे होरी।
कर झटकत घूंघट पट खोलत,
मलत कपोलन रोरी। महल...
कंचन की पिचकारी घालत,
तक मारत उर ओरी। महल...
सोने के घड़न अतर अरगजा,
लै आईं सब गोरी। महल...
हिलमिल फाग परस्पर खेलत,
केसर रंग में बोरी। महल...
अपनी-अपनी घात तके दोऊ,
दाव करत बरजोरी। महल...
कंचन कुँअरि नृपत सुत हारे,
जीती जनक किशोरी। महल...

अनूठा है बुंदेलखंड और अनूठी है यहां की होली जिसमें उत्सवधर्मिता की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यही उत्सवधर्मिता की विशेषता है जिसने बुंदेलखंड की भूमि को बड़े से बड़े संकट में साहस प्रदान किया है।         
   -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 04.03.2026 को प्रकाशित)  
------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह

Tuesday, March 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
--------------------
पुस्तक - बुन्देलखण्ड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत
लेखिका - डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बहादुरपुर, साउथ ईस्ट दिल्ली-

110044
मूल्य -350/- (पेपरबैक)
---------------------


  बुंदेलखंड आदि काल से इतिहास एवं परंपराओं का धनी है। यह सच है कि इस क्षेत्र का पर्यटन-विकास उतना नहीं हो हुआ, जितना होना चाहिए था किन्तु अब इस ओर मध्यप्रदेश शासन का ध्यान गया है। लेखकों एवं इतिहासकारों ने बुंदेलखंड की विरासत को बचाने के लिए सतत शोधपूर्ण कलम चलाई है तथा विरासत को सहेजा है। इसी क्रम में सागर की लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे ने एक पुस्तक ‘‘बुंदेलखंड: द हार्टबीट आॅफ मध्यप्रदेश’’ का लेखन किया था जिसमें विश्व प्रसिद्ध छायाकार गणेश पंगारे द्वारा खींचे गए नयनाभिराम छायाचित्र थे। यह पुस्तक अंग्रेजी में थी। आवश्यकता थी ठीक उसी प्रकार की उपयोगी पुस्तक की हिन्दी भाषा में। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए लेखिका नीलिमा पिंपलापुरे ने हिन्दी में अपनी नवीनतम पुस्तक प्रस्तुत की है जिसका नाम है- ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’। इस पुस्तक में भी छायाकार गणेश पंगारे के छायाचित्र मौजूद हैं जिनके द्वारा बुंदेली विरासत के विविध रंगों को बारीकी से देखा और समझा जा सकता है।

बुंदेलखंड देश का वह क्षेत्र है जिसकी भौगोलिकता अपने आप में अनूठी है। इसके इतिहास में प्राचीनता है और यह कला में बेजोड़ है। इस क्षेत्र के बारे में इतिहासकार राय बहादुर सिंह ने लिखा था कि ‘‘बुंदेलखंड शौर्य एवं जीवटता का धनी है।’’ इसीप्रकार ‘‘बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास’’ पुस्तक लिखने वाले इतिहासकार गोरेलाल तिवारी का कथन था कि ‘‘बुंदेलखंड को जानने के बाद इससे प्रेम हो जाना स्वाभाविक है।’’ वहीं, डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त बुंदेलखंड को प्रगैतिहासिक मनुष्यों से अद्यतन मानवों की विकास यात्रा का सटीक साक्ष्यमय उदाहरण मानते थे।
प्रागैतिहासिक काल से इंसानों ने बुंदेलखंड को अपने निवास के रूप में चुना। यहां स्थित गुफाचित्र इसका साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मृदभाण्ड तथा तांबे के सिक्के इसकी प्राचीनता की कथा कहते हैं। बुंदेलखंड श्रीराम के वनगमन पथ का अभिन्न हिस्सा रहा है तथा प्राचीन वैश्विक व्यापार के ‘‘सिल्क रूट’’ का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। बुंदेलखंड की वर्तमान विशेषता यह है कि यह दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। लेखिका ने ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’ में मध्यप्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की विरासत को सहेजस है तथा अपनी यह पुस्तक बुंदेलखंड के निवासियों को समर्पित की है।

पुस्तक में कुल चार अध्याय हैं - बुंदेलखंड क्षेत्र, वन्य जीव पर्यटन, बुंदेलखंड के किले एवे मंदिर तथा कला एवं संस्कृति। इन चारो अध्यायों के उपरांत पांचवें अध्याय के रूप में संदर्भसूची रखी गई है।
प्रथम अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड क्षेत्र’’। इस अध्याय में उन्होंने बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति, बुंदेलखंड का मानचित्र तथा बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास दिया है। बुंदेलखंड के इतिहास में लेखिका ने इस क्षेत्र की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए प्रीहिस्टोरिक अर्थात प्रागैतिहासिक काल से आरंभ किया है। फिर रामायण काल, महाभारत काल, छठीं शताब्दी ईसा पूर्व, ईसा उपरांत तीसरी शताब्दी, तीसरी से चौथी शताब्दी, वाकाटकों की चौथी शताब्दी, चैथी से छठीं शताब्दी गुप्ता राजवंश, आठवीं शती गुर्जर-प्रतिहार, नवीं से तेरहवीं शती चंदेल राजवंश, चौदह से सोलहवीं शती बुंदेल साम्राज्य तथा 1720 सं 1760 तक मराठाओं का बुंदेलखंड पर राजनैतिक प्रभाव का परिचय दिया गया है। इसी अध्याय में प्राचीन नगर एरण, खजुराहो के मंदिर, महाराज छत्रसाल, ब्रिटिश साम्राज्य के समय बुंदेलखंड के बारे में जानकारी है। रानी लक्ष्मी बाई के संदर्भ में झांसी का परिचय है। सागर के गोविंद पंत खेर के योगदान का विवरण है। सागर का परिचय देते हुए यहां की लाखा बंजारा झील से जुड़ी रोचक किंवदंती तथा सागर विश्वविद्यालय का परिचय है। अंत में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बुंदेलखंड का स्वरूप जो विंध्यप्रदेश तथा मध्यभारत के अंग के रूप में रहा तथा वर्तमान बुंदेलखंड की जानकारी है। 

दूसरे अध्याय ‘‘वन्य जीव पर्यटन ’’ में वन्य जीव पर्यटन अर्थात वाइल्ड लाईफ टूरिज्म की संक्षिप्त जानकारी है। लेखिका ने इसमें पन्ना टाइगर रिजर्व, पाण्डव गुफा एवं झरना पन्ना, किमासन जलप्रपात पन्ना, किलकिला झरना पन्ना, केन घड़ियाल सेंचुरी पन्ना, भीमकुंड तथा नौरादेही रानी दुर्गावती टाईगर सेंचुरी के बारे में जानकारी दी है। ये सभी मनोरम स्थान हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।
दूसरे अध्याय में ही बुंदेलखंड की वन आधारित आजीविका की जानकारी दी गई है। इस अध्याय में बुंदेलखंड की कृषि संबंधी तथा वनोपज की जानकारी दी गई है। चूंकि बीड़ी व्यवसाय बुंदेलखंड का एक प्रमुख व्यवसाय है अतः तेंदू पत्ता जिसका उपयोग बीड़ी निर्माण में होता है तथा बीड़ी बनाने की चर्चा की गई है। वनोपज पर आधारित दूसरा बड़ा व्यवसाय है महुआ बीनने का। महुआ बीनने तथा इसके विविध उपयोग की संक्षिप्त जानकारी दी गई है। 
तीसरा अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड के किले एवं मंदिर’’। इस संबंध में लेखिका ने परिचयात्मक ढंग से अध्याय के आरंभ में ही लिखा है कि -‘‘प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की भूमि बुंदेलखंड अपने पुरातात्विक स्मारकों और सभी धर्मों, हिंदू, मुस्लिम, जैन और बौद्धों के लिए तीर्थ स्थानों के लिए प्रसिद्ध है। शानदार किले गौरवशाली अतीत, महान राजवंशों, सम्राटों और योद्धाओं की याद दिलाते हैं।’’ इसमें कोई संदेह नहीं कि बुंदेलखंड स्थपत्य और कला का धनी है। यहां के किलों का पुराणों में उल्लेख मिलता है। डाॅ. पिंपलापुरे ने इस अध्याय में जिन किलों का उल्लेख किया है, वे हैं- कालिंजर, झांसी (यद्यपि यह वर्तमान में उत्तरप्रदेश में स्थित है), ओरछा के किले, मंदिर एवं छतरियां। साथ ही ओरछा की रानी गणेशकुंवरी, लाला हरदौल की कथा का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अजयगढ़ का किला, दतिया महल, खजुराहो, धामोनी, गढ़पहरा, सागर, रहली का किला, चंदेरी, तालबेहट, धुबेला संग्रहालय, हृदयशाह का महल तथा पन्ना के प्रसिद्ध मंदिरों का परिचय दिया गया है। वैसे खजुराहो को एक स्वतंत्र अध्याय बनाया जा सकता था तथा ‘खजुराहो और उसके आस-पास’ के रूप में उस पूरे क्षेत्र चंदला, मंड़ला, बसारी आदि को हाईलाईट किया जा सकता था।

दमोह जिले में स्थित जैन तीर्थ कुण्डलपुर, सागर के रानगिर का हरािद्धी माता मंदिर, श्रीदेव पंढरीनाथ मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर, विनायका का विष्णु मंदिर तथा सागर के वृंदावन बाग मंदिर का विवरण भी इसी तीसरे अध्याय में है।

     चौथा अध्याय ‘‘कला एवं संस्कृतिक’’ का है। लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे के शब्दों में-  ‘‘बुंदेलखंड का खूबसूरत इलाका परंपराओं का शाही इतिहास दर्ज करता है। चाहे वह विरासत हो, कला और शिल्प, हथकरघा या संस्कृति, यह अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड का पारंपरिक संगीत और नृत्य, त्यौहार और समारोह, साहित्य और ऐतिहासिक स्मारक बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं।’’ इस अध्याय में बुंदेलखंड में प्रचलित काष्ठ एवं धातु शिल्प, चंदेरी के वस्त्र उद्योग, ताराग्राम ओरछा के हस्त निर्मित कागज उद्योग की जानकारी है। बुंदेली वाॅल पेंटिंग्स के साथ ही नृत्य कलाओं जैसे राई, दिवारी आदि एवं बुंदेली लोग गायन दादरा, फाग, लमटेरा आदि की संक्षिप्त जानकारी है। इसके साथ ही बुंदेली पकवानों के आस्वाद का भी संक्षिप्त परिचय है।

वस्तुतः यह एक ऐसी पुस्तक है जो संक्षेप में पर्यटकों को बुंदेलखंड की विविधरंगी विरासत से परिचित कराती है। इसका मूल उद्देश्य पर्यटकों को बुंदेलखंड की ओर आकर्षित करना है, जिसमें यह पुस्तक खरी उतरती है। पुस्तक का कव्हर, मुद्रण तथा कागज बेहतरीन है। लेखिका ने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि-‘‘यह प्रकाशन बुन्देलखण्ड के प्रति मेरे प्रेम और लगन का परिणाम है। मेरा विचार बुन्देलखण्ड के अनूठे पहलुओं को उजागर करना है और इसे एक सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना है, जिसका यह क्षेत्र हकदार है। मैंने मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड वाले माग पर ध्यान केन्द्रित किया है, क्योंकि यहीं मैं पिछले पचास वर्षों से निवासरत हूँ और यही वह क्षेत्र है जो मेरे हृदय के करीब है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक इस सुन्दर क्षेत्र को अग्रसर करने हेतु उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक, बुन्देलखण्ड का एक विस्तृत या गहन अध्ययन नहीं है, बल्कि यह दुनिया को इस रहस्यमय भूमि और इसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक प्रयास है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिले और बुन्देलखण्ड के इस सुन्दर क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए यहाँ पर्यटक आयें। अपनी यात्रा के दौरान, मैंने बुन्देलखण्ड के प्रत्येक क्षेत्र का विस्तार से अध्ययन, दौरा किया है और मैं अपना पर्यवेक्षण इस पुस्तक के द्वारा साझा करना चाहती हूँ।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि ‘‘पिछले पाँच दशकों से सागर जैसे सुन्दर शहर में रहते हुए, मेरे मन में बुन्देलखण्ड के प्रति गहरी आत्मीयता की भावना विकसित हुई है, जो वास्तव में भारत की जीवन रेखा और दिल की धड़कन है। मैं अपने व्यक्तित्व का श्रेय इस मनमोहक भूमि के सौहार्दपूर्ण लोगों व अपने परिवार को देती हूँ, जो मेरी ताकत, मेरा जीवन और मेरी प्रेरणा रहे हैं, जो जीवन की चुनौतियों के माध्यम से लगातार मेरा मार्गदर्शन करते रहे हैं। मैंने पूरे विश्व की यात्रा की है. लेकिन मुझे केवल सागर में ही अपने घर में सुख और सुकून मिलता है।’’
निःसंदेह बुंदेलखंड के इतिहास, सांस्कृतिक परंपराओं एवं नैसर्गिक सौंदर्य में हृदय को मोह लेने की क्षमता है। लेखिका के उत्साह एवं भावनाओं को पुस्तक में अनुभव किया जा सकता है। पुस्तक में कई महत्वपूर्ण स्थान छूट गए है किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखिका डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने इसे लिखने में निश्चित रूप से श्रम किया है क्योंकि जानकारी भले ही संक्षेप में दी जाए किन्तु वह जानकारी जब तक समग्रता से ज्ञात न हो तब तक उसका संक्षेपीकरण भी नहीं किया जा सकता है। इस परिचयात्मक पुस्तक की भाषा सरल एवं सुगम है। छायाचित्रों ने पुस्तक की गुणवत्ता को द्विगुणित कर दिया है। यह पुस्तक हर दृष्टि से पठनीय एवं संग्रहणीय है।         
---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण #DrMissSharadSingh

Saturday, February 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | समधी की मूंछ जैसे रोबो की पूंछ, रोबो पाल लेओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | समधी की मूंछ जैसे रोबो की पूंछ, रोबो पाल लेओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
समधी की मूंछ जैसे रोबो की पूंछ, रोबो पाल लेओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ई टेम पे दो टाईप को सीजन चल रओ। एक तो ब्याओ को सीजन औ दूसरो इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 को। मनो पैलो वारो सबई जांगा चल रऔ, उतई दूसरो अकेलो दिल्ली में चल रओ। जो बुंदेली ब्याओ औ समिट में पैदा भई बेफालतू की गिचड़ को। सोची जाए सो दोई में एक चीज की समानता आए। बो आए कुत्ता। अब आप सोचहो के जे कुत्ता कां से आ गओ? सो, तनक याद कर लइयो, औ जो याद ने आए तो बड़े-बूढ़न से पूछ लइयो के ब्याओ के टेम पे कुत्ता की गारी कैसी गाई जात्ती। बाकी हम सोई याद करा दे रए के लड़की वारे गारी गा के लड़का वारों की कैसी मजा लेत्ते-
कुत्ता पाल लेओ….
ओ मोरे जजमान, कुत्ता पाल लेओ …
समधी मूंछ जैसे कुत्ता की पूंछ
कुत्ता पाल लेओ….
समधन की छींट जैसे कुत्ता की पीठ
कुत्ता पाल लेओ….
देउरा को पान जैसे कुत्ता को कान
कुत्ता पाल लेओ….
      जा गारी सुन के सबरे मजो लेउत्ते। कोनऊं बुरौ नईं मानत्तो। मनो दिल्ली के एआई इम्पैक्ट समिट में एक ठइयां देसी रोबो कुत्ता दिखाओ गओ। बा नाच बी सकत आए। अब आपई सोचो के रोबो कुत्ता पालबे से एकई दार खर्चा होने। ने ऊको ख्वाने औ ने ऊको संझा-संकारे पौटी कराने। कोनऊं सुजी लगवाए की बी जरूरत नईं। सो, हमाओ तो मन कर रओ के हम कोनऊं के ब्याओ में जाएं औ गारी गाएं के -
रोबो पाल लेओ
ओ मोरे जजमान,रोबो पाल लेओ!
समधी की मूंछ जैसे रोबो की पूंछ
रोबो पाल लेओ!
    बाकी कछू हरें बा रोबो कुत्ता की नसल के पांछू परे हैं, के बा चीन को आए। मनो आपई बताओ के का अपने इते जर्मन शेफर्ड औ लेबराडोर नईं पालो जात का? अरे जोन ने पालो, कुत्ता तो बोई को कहानो। सो, गिचड़ छोड़ो औ रोबो-कुत्ता पाल लेओ।
---------------------
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
#टॉपिकएक्सपर्ट #डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #पत्रिका  #patrika #rajsthanpatrika #सागर  #topicexpert #बुंदेली #बुंदेलीकॉलम

Thursday, February 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | सोचियो जरूर के जिन्नात ने ऐसी काए कई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की 
सोचियो जरूर के जिन्नात ने ऐसी काए कई
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

हम तीनों गुठियात बैठे हते। मैं, भैयाजी औ भौजी। दो तीन दिना से मोसम ने सोई यू-टर्न ले लओ हतो। गर्मी आउत-आउत फेर के जड़कारो आ गओ। मनो ऐसो बरहमेस होत आए। फेर बी पता नईं काए अपने सबई मोसम के झांसे में आ जाउत आएं। हर साल जब अपन सोचन लगत आएं के अब तो शिवरातें हो गईं औ जाड़ो चलो गओ, अब गरम कपड़ा धो के पेटी में धर दए जाएं। औ जो दिनां गरम कपड़ा पेअी में धरे जात आएं ओई दिनां जड़कारो लौट आत है। मनो ऊको अपन ओरन खों छकाबे में मजो आत आए। सो, हम तीनो जने जड़कारे के लौटबे की बतकाव कर रए ते। तभई मोए लगो के भौत दिनां से कोनऊं किसा-कहानी नईं भई।
‘‘काए भैयाजी, भौत दिनां से आपने कोनऊं किसां ने सुनाई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘किसां तुम लिखत हो औ हमसे सुनाबे की कै रईं।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘बा सो ठीक आए, बाकी मोए आपसे किसां सुन्ने।’’ मैंने कई।
‘‘कोन सी किसां?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘जोन आप खों सुनानी होय।’’ मैंने कई।
‘‘अच्छा चलो, लबरा औ दोंदा वारी किसां सुना रए।’’ भैयाजी बोले। फेर बे किसां कहन लगे-
   का आए के, एक गांव में दो ज्वान रैत्ते। एक को नांव रओ लबरा औ दूसरो को दोंदा। दोई के दोई ठलुआ। दोई हते फुल नमूना। जो लबरा हतो, बा लबरयाने में रओ उस्ताद। मने झूठ बोलबे में पक्को। हर बात पे झूठ बोलत्तो। ऐसई दसा हती दोंदा की। बा अपनी झूठ पे ऐसो अड़ जात्तो के ऊकी झूठी बात बी सांची लगन लगत्ती। मने दोंदा दोंदरा ई देत रैत्तो।       
एक बेरा का भओ, के दोई में बहस होन लगी के कोन के पुरखा कित्ते ग्रेट रए। 
‘‘हमाए दादा इत्ते स्मार्ट और बहादुर हते के उन्ने एक ठूंसा मार के शेर खों आड़ो कर दओ रओ।’’ लबरा ने दोंदा से कई।
‘‘बस? इत्तई?’ दोंदा लबरा को मजाक उड़ात भओ बोलो, ‘अरे, हमाए दादा तो इत्ते ग्रेट हते के उन्ने अपने घरे बैठे-बैठे इत्ती जोर की फूंक मारी के उनकी फूंक की जोर से उते जंगल में शेर गिर परो औ पट्ट दिना मर गओ।’’
जे सुन के लबरा को बुरौ लगो। ऊनें आगे लबरयाई के,‘‘हमाए दादा के पास इत्तो लंबों बांस रओ के ऊंसे बे बादरन खों टुच्च के जब चाएं तब पानी बरसा लेत्ते।’’ 
‘‘हमाए दादा के पास इत्ती बड़ी वारी अंजन की डिबिया हती के ऊमें बे तला को सगरो पानी भर लेत्ते।’’ दोंदा कोन पांछू रैबे वारो हतो।
दोई के बीच जेई टाईप की बहस होत रई। जब दोई थकन लगे, सो बोले के चलो सरपंच जी से फैसला करा लओ जाए के कोन के दादा ज्यादा चतुरे हते। सो, दोई सरपंच के लिंगे पौंचे।
‘‘सरपंच जी अब आपई बताओ के कऊं ऐसो हो सकत का के इत्ती बड़ी अंजन की डिबिया होय के जीमें तला को पूरो पानी समा जाए?’’ लबरा ने सरपंच से पूछी।
‘‘हट! ऐसो कऊं नई होत। इत्ती बड़ी अंजन की डिबिया? तला बरोबर?’’ कैत भओ सरपंच हंसन लगो।
‘‘सरपंच जी, आप भूल रए के इत्ती बड़ी डिबिया पाई जात्ती औ हमाए दादा जी ने हमें बताई रई के आपके दादाजी ने उनके लाने, उने बा डिब्बी दई रई।’’ दोंदा दोंदरा देत भओ बोलो।
अब सरपंच का करे? जो कैत आए के उनके दादा ने ऐसी कोनऊं डिब्बी ने दई रई, सो उनके दादा छोटे कहाते। सो सरपंच ने सोची, फेर कई,‘‘हऔ दोंदा! तुमने सई याद कराई, हमाए दादा जी नेई सो दई रई तुमाए दादा खों बा डिबिया।’’
‘‘देख लेओ! हो गई तसल्ली? जुड़ा गओ कलेजा? पर गई ठंडक?’’ दोंदा लबरा से बोलो।
लबरा को भौतई गुस्सा आओ। काय से के बा समझ गओ रओ के लबरा ने सरपंच जी खों अपनी बातन के फंदा में फांस लओ आए। ंपर ऊ टेम पे बा चुप मार गओ। जबे सरपंच चलो गओ सो लबरा बोलो,‘‘जे सरपंच तुमाई साईड ले रए हते। बे कोन दूध के धुले आएं। हम तो अब राजा जी के पास चलहें।’’
‘‘चलो, जो तुमाई मरजी।’’ दोंदा इतरात भओ बोलो।
दोई राजाजी के दरबार खों चल परे। रास्ते में दोई थक के सुस्तान लगे। लबरा की लग गई आंख। दोंदा ने दिखाई चतुराई औ सोत भए लबरा के कपड़ा पानी डार के भिजों दए। जो लबरा जगो सो बा अपने भीजें कपड़ा देख के पूछन लगो के, ‘‘जे हमाए कपड़ा कैसे भींज गए? का पानी बरस गओ?’’
‘‘हऔ, खूबई पानी बरसो।’’ दोंदा बोलो।
‘‘ठैरो, ठैरो! हमें जे बताओ के जो पानी बरसो सो तुमाए कपड़ा काए नई भीजें?’’ लबरा ने पूछी।
‘‘तुम तो राजाजी के दरबार चलो, ने तो देर हो जैहे औ दरबार उठ जैहे। हम उतई सब बताबी।’’ दोंदा बोलो।
दोई जने निंगत-निंगत राजाजी के दरबार पौंचे। राजाजी ने पूछी के का भओ? काए के लाने आए? सो दोई पांव पकर के बोले के आपई अब न्याय कर सकत हो। औ दोई ने अपने-अपने दादाजी के बारे में गप्पें सुना डारीं। राजाजी समझ गए के दोई फुल गप्पी आएं।
‘‘लबरा कै रओ के बारिश नई भईं। ऊकी बात में दम आए। काय से के जो बारिश भई होती तो तुमाए कपड़ा सोई भींजते।’’ राजाजी बोले।
‘‘आपई बताओ महाराज, के जो बारिश ने भई तो ईके कपड़ा काय से भींज गए?’’ दोंदा ने राजाजी से पूछ लई।
‘‘सो तुम काय नईं भीजें?’’ राजाजी ने सोई पूछी।
‘‘आपके दादाजी के पुन्न प्रताप से।’’ दोंदा तुरतईं बोलो।
‘‘का मतलब?’’ राजाजी चकरा गए।
‘‘मतलब जे महराज! आपके दादाजी बड़े वारे पुन्नात्मा हते। उन्ने हमाए दादा जी की सेवा से खुस हो के उने एक बूटी दई रई। बा बूटी खों शरीर पे औ कपड़ा-लत्ता पे के मले से पानी नईं भिंजा सकत।’’ दोंदा बोलो।
‘‘सो कां है बा बूटी?’’ राजाजी ने पूछी।
‘‘बा तो हमने मल लई रई तभईं तो हम नईं भींजे। अब कां बची बा बूटी।’’ दोंदा आराम से बोलो।
राजाजी समझ गए के दोंदा ऊंसई दोंदरा दे रओ, मनो बे अब जे नईं कै सकत्ते के हमाए दादाजी के पास कोनऊं बूटी ने हती, के बे पुन्नात्मा ने हते। 
‘‘चलो, तुम दोई सांचे! तुम दोई के दादाजी अपने-अपने टाईप के ग्रेट हते। अब जाओ अपने-अपने घरे।’’ राजाजी पीछा छुड़ात भए बोले। अब राजाजी के कैबे के बाद बे उते थोड़ई ठैर सकत्ते, सो उते से बढ़ लिए।
दोई के जातई साथ राजाजी ने अपने महल में रैन वारे जिन्नात खों बुला के कई के,‘‘देखो तो हमाए राज में कैसे-कैसे लबरा, दोंदा रैत आएं, का हुइए हमाए राज को? अब तुमई बताओ के लबरा बड़ो के दोंदा?’’
‘‘आप ई में ने परो महराज के लबरा बड़ो के दोंदा? काय से के कछू समै बाद जेई ओरें बारी-बारी से राज करहें।’’ जिन्नात ने कई औ उते से फुर्र हो गओ। राजाजी जिन्नात की बात पे सोचत रै गए के ऊने ऐसई काय कई? किसां हती तो खतम हो गई। - भैयाजी किसां खतम करत भए बोले। 
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोई सोचियो जरूर के जिन्नात ने ऐसई काय कई के आगे चल के लबरा औ दोंदा बारी-बारी से राज करहें। 
 ---------------------------
बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
---------------------------
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat  

Wednesday, February 25, 2026

पुस्तक समीक्षा | परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
--------------------
सांझा गीत संग्रह- बुन्देली माहुलिया
कवि - बिहारी ‘सागर’ एवं स्व.श्री बालमुकुन्द ‘नक्श’
प्रकाशक - कु. नंदिनी कोरी, जबलपुर (प्राप्ति पता- बिहारी सागर, धर्मश्री पुल के आगे, काम्प्लेक्स रोड, अम्बेडकर वार्ड, सागर, मध्यप्रदेश-4)
मूल्य - 250/-
---------------------
सागर शहर में लोक शैलीबद्ध गीत रचने वालों में बिहारी ‘सागर’ एक चिरपरिचित नाम हैं। उनके बड़े भाई स्व. बालमुकुन्द नक्श भी रचनाकार रहे। नक्श जी के जो गीत अप्रकाशित रहे, उन्हें बिहारी सागर ने अपने गीत संग्रह में शामिल करते हुए संग्रह को एक साझा संकलन का रूप दिया है। संग्रह का नाम है ‘‘बुन्देली माहुलिया’’। दरअसल, बुन्देलखंड में ‘‘माहुलिया’’ उर्फ़ ‘‘मामुलिया’’ का विशेष महत्व है। यह एक ऐसा त्योहार है जो बचपन से ही साझा जीवन का पाठ पढ़ाता है। साथ ही सिखाता है जीवन के आने वाले दुखों को खुशियों में बदलने की कला। इस त्योहार में कांटेदार डाली, आमतौर पर बबूल की डाली को धो कर, नहला कर, उसके कांटों में तरह-तरह के फूल सजाए जाते हैं और यह कार्य बालिकाओं एवे बालको द्वारा किया जाता है। फिर वे फूलों से सजी हुई डाल को ले कर जुलूस के रूप में गांव में घूमते हैं और गाते हैं-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया’’। जी हां, समूचे बुंदेलखंड में मनाए जाने वाले इस बाल त्योहार को कहीं मामुलिया कहते हैं तो कहीं माहुलिया। माहुलिया का यही साझापन पिरोया है बिहारी सागर ने अपने इस नवीनतम गीत संग्रह में। इस संग्रह में 55 गीत बिहारी सागर के हैं तथा शेष 56 से 127 तक स्व. बालमुकुन्द नक्श की रचनाएं हैं।
“गीतऋषि” के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि “इस संग्रह में संकलित स्व. बालमुकुंद नक्श के कुछ गीतों के केसिट सुप्रसिद्ध गायकों की आवाज में संगीत कंपनियों द्वारा भी बनाए गए हैं जो बुंदेलखंड में शादी-विवाह या अन्य जुलूसों में होने नृत्यों में अक्सर बजाए जाते हैं, जैसे- ‘केंन लगे मो सें बब्बा /कहाँ गव चिलम तमाखू को डब्बा’ -ऐसा ही एक गीत और जो बेदद लोकप्रिय एवं प्रचलित है। ‘बंसी में फस गई बाम, बरौनी घरे चलो’ - प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त इस काव्य संग्रह के अनेक गीत बुंदेलखंड क्षेत्र में कवि बिहारी श्सागरश् एवं स्व. बालमुकुंद श्नक्श ने करमा, स्वांग, ढिमरयाई, दादरा, सोहरे, रसिया आदि अनेक प्रकार के लोक गीत लिखे हैं, ये गीत भाव पूर्ण, सरल भाषा में रचित हैं जो समाज में सहज स्वीकार्य हैं, इनका अर्थबोध प्रभावी है। कवि बिहारी श्सागर का यह दसवाँ काव्य संग्रह है जो उनकी सतत रचनाधर्मिता का परिचायक है।”    
   उपन्यासकार, समीक्षक एवं स्तंभ लेखक आर के तिवारी ने लिखा है कि “मैं समझता हूँ आज 10 पुस्तकें प्रकाशन कराना छोटी बात नहीं है। जिसमें परिश्रम भी लगता है और पैसा भी खर्च होता है! यह बहुत बड़ी बात है। जब आज हमारे समाज में पैसे के लिए भाई-भाई में द्वेष पैदा हो जातें हैं भाई-भाई का बैरी हो जाता है तो वहीं बिहारी सागर ने अपने स्वर्गीय भाई के लिए अपने दिल की गहराइयों में बसाये रखा है! जिसका ही उदाहरण यह पुस्तक है जिसमें आपने अपने भाई की रचनाएं भी इसमें प्रकाशित कराई हैं। जिसके लिए आप बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं।” संग्रह में लोकगीत गायिका श्रीमती मालती सेन का शुभकामना संदेश भी है। 
कवि बिहारी सागर ने बड़ी ही विनम्रता से इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने ‘बुंदेली शब्दों को गूंथने का प्रयास’ किया है वे लिखते हैं- “मैंने अपनी रचनाओं में बुंदेली शब्द गूंथने का प्रयास किया है। मेरी रचनाओं में त्रुटियां हो सकती हैं। फिर भी मैं अपना प्रयास जारी रखता हूं।”
     जीवन में लगन और अभ्यास यह दोनों महत्वपूर्ण तत्व है जो मनुष्य के कर्म में निरंतर निखार लाते हैं। कवि बिहारी सागर भी निरंतर रचनाशील हैं। कला पक्ष की अपेक्षा उनका भाव पक्ष सशक्त है। बिहार सागर के भजन की ये पंक्तियां देखिए जो ‘भगत’ के रूप में मां जगदंबा के लिए लिखी गईं हैं- 
टेक- जगदंबा विराजीं मोरे आंगना हो मां।
(1) कहां से ल्याऊं मैया, बेला चमेली, 
कहां से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
(2) बगिया से ल्याऊं मैया बेला चमेली, 
हाट से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
बुंदेलखंड में कार्तिक गीत गाने का विशेष चलन है। कार्तिक मास आते ही स्त्रियां कातकिया गाते हुए स्नान करने मुंहअंधेरे निकल पड़ती हैं। इसी कातकिया के तर्ज पर बिहार सागर ने यह गीत लिखा है जिसकी धुन उन्होंने कन्हैया भजन की बताई है-
टेक- कर दो दया की नजरिया, कन्हैया मोरे...
मैं दुखियारी शरण तुम्हारी, 
1-ले लो मोरी खबरिया, कन्हैया मोरे...
2-बड़े-बड़े बैठे बलधारी, हस्तनापुर की नगरिया, कन्हैया मोरे...
बिहारी सागर ने ढिमरयाई गीत भी लिखे हैं जैसे एक बानगी देखिए -
टेक- बंशी बाजी दुफरिया में, राधा जी की नगरिया में।
1. धुन गूंजत है कानों में जिनकी, 
भूले काम दुफरिया में 
राधा जी की...
2. ग्वाल बाल जे दौड़त आ रे, दौड़त बीच डगरिया में 
राधा जी की...
जिस प्रकार बिहारी सागर ने होली गीत, दिवाली गीत, सोहर, विदाई गीत, देवी गीत, हास्य गीत आदि विविध प्रकार के गीत लिखे हैं ठीक उसी प्रकार उनके भाई स्वर्गीय बालमुकुंद “नक्श” के गीतों में भी पर्याप्त विविधता है। उनके होली गीत के कुछ पंक्तियां देखिए -
टेक- रंग डारी सांवरिया ने रंग डारी । 
मोरी भींज गई चूनर सारी ।।
1. होली के दिन होली खेलें संवरिया,
भर भर मारें पिचकारी 
रंग डारी सांवरिया ने...
2.रंग-बिरंगी है मोरी चुनरिया, 
कर डारी कारी-कारी
रंग डारी सांवरिया ने...
कवि स्व. “नक्श” ने कई सोहर गीत लिखे हैं जिनमें से एक गीत की कुछ पंक्तियां देखिए जिनमें भावनाओं की कोमलता अत्यंत प्रभावी है-
टेक- झुलाय दैयो रे, लाल झूले अंगनवा।
1.चंदन के पलना हों रेशम की डोरी, 
डराय दैयो रे लाल...।
2. चंदा के गोटा हों तारों के झूमर, 
लगाय दैयो रे लाल...
    कवि स्व. “नक्श” ने चुलबुले हास्य गीत भी लिखे हैं। एक उदाहरण -
टेक - ऐसी मिली घरवाली,
भैया मोखों भरी जवानी में, 
आग लगा रई पानी में।
1- रोटी पानी कछु न जानें,
निशदिन मोसे करे बहाने, 
मोरी एकऊ बात न माने, 
कर रई छेदा छानी में।
2- अपनी का कहिये हैरानी, 
खा-खा कें जा खूब मुटानी, 
मरोजात भर-भर के पानी,
चैन नहीं जिदगानी में।
      बिहार ‘सागर’ एवं स्वर्गीय श्री बालमुकुंद ‘नक्श’ के सजा संकलन “बुंदेली महुलिया” में जो बुंदेली गीत सहज गए हैं उनमें गेयता के गुण भरपूर हैं। इनके व्याकरणीय दोषों को यदि अनदेखा कर दिया जाए तो यह सभी गीत ढोल, मंजीरे और नंगड़िया पर बखूबी गए जा सकते हैं। बुंदेली बोली के प्रति कवि बिहारी सागर का रुझान प्रशंसनीय है, और उतनी ही प्रशंसनीय है उनकी रचना कर्म के प्रति लगन। रचनाशीलता के लिए स्थानीय स्तर पर उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लोक धुन पर आधारित गीतों में रुचि रखने वालों के लिए यह संग्रह रुचिकर साबित होगा।   
 ---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer 
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण #DrMissSharadSingh

Thursday, February 19, 2026

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी? मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी?  मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की       
दुनिया कैसी?  मोए जैसी !
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

   ‘‘भैयाजी, आज भुनसारे मोरी नींद खुली, तभईं से मोए एक किसां याद आ रई। कओ तो सुना दई जाए।’’ मैंने भैयाजी से पूछी। मोए पतो के भैयाजी कभऊं मोय मनो ने करहें, चाए मैं उने किसां सुनाऊं चाए गारी गाऊं।
‘‘हऔ सुनाओ!’’ जैसी मैंने सोची रई, भैयाजी ने तुरतईं ‘हौ’ बोल दओ।
‘‘भैयाजी ऐसो आए के हिन्दी में कही जात के साउन के अंधरा खों सबई कछू हरीरो-हरीरो दिखात आए। सो, जेई टाईप की किसां बुंदेली में सोई कही जात आए। सुनो किसां!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो सुनाओ अब। का भूमिकई बांधत रैहो?’’ भैयाजी चिड़कात भए बोले।
‘‘का भओ भैयाजी के एक हतो भगुंता नाई। ऊकी बड़े-बड़े घरों में पौंच हती। काए से के भगुंता हाथ-पांव की मालिश करबे में अव्वल हतो। एक दिना भगुंता को दूर-दराज को नातेदार गुजर गओ। ऊ मरबे के पैले भगुंता के लाने सोने की दो मोहरें छोड़ गओ। इके पैले भगुंता के पास एकऊ मोहरें ने हतीं, सो दो-दो मोहरें पा के ऊकी बांछें खिल गईं। पर इके संगे ऊको फिकर भई के जे मोहरन खों लुका के राखने परहे। ने तो कऊं कोनऊं छिना ने ले। कऊं कोनऊ चोर चुरा ने ले जाए। भगुंता ने सोची के घर की किवरिया खो कौन भरोसो, जा तो एकई लात की आए। इसे तो मोहरन खों संगे राखने में भलाई कहानी। सो, मोहरें राखने के लाने भगुंता को कोऊ जागां ने सूझी सो ऊने एक डबिया लई, ऊमें दोई मोहरे राखी औ डबिया खों अफ्नी मालिस की पेटी में धर लई।
‘‘अब ठीक आए। अब मोरी मोहरन खों कोनऊ हाथ ने लगा पैहे।’’ भगुंता ने सोची। काए से के पेटी तो बरहमेस ऊके संगई बनी रैत्ती। अब तो भगुंता अपनी पेटी खों औरई अपने कलेजे से चिपटाए रहन लगो।
एक दिना भगुंता सरपंच की मालिश कर रओ हतो। दोई जनों में कछू-कछू बतकाव सोई चल रई हती। सरपंच ने भगुंता से पूछी-‘‘काए रें, भगुंता। तोये तो पतो हुइये के गांव में का चल रओ?’’
‘‘आप मालक की किरपा! सब ठीकई चल रओ।’’ भगुंता बोलो।
‘‘कोनऊ खों कोई तकलीफ-परेसानी तो नइयां?’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘तकलीफ परेसानी काए की? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आएं।’’ भगुंता ऐंड़ के बोलो।
सरपंच ताड़ गओ के दाल में कछु कारो आए। सरपंचने जा खबर तो सुन रखी हती के भगुंता खों अपने नातेदार के मरबे पे दो मोहरे मिली रईं। हो न हो, जा भगुंता ऊ मोहरन के लाने कै रओ। फेर सरपंच ने सोची के, बा मोहरे जा अफ्नी जेई पेटी में राखत हुइए, तर्भइं तो जा पेटी कलेजे से चिपटाए फिरत आए।
‘‘जारे, भगुंता! जा के भीतरे से तनक बिजना तो उठा ला। तनक गरमी सी लग रई।’’ सरपंच ने भगुंता से कई औ ऊको उते से टरका के, ऊकी पेटी थथोल डारी। सरपंच के हाथ बा डबिया लग गई जा में भगुंता ने मोहरे रखी हतीं। सरपंच ने सोची के जा भगुंता बड़ो ऐंड रओ आए, जा के लाने भगुंता खो सबक सिखाओ जाए। औ सरपंच ने डबिया से मोहरे निकार लई। तब लो मगुंता भीतरे से बिजना उठा लाओ। भगुंता समझई ने पाओ के ऊके पाछूं सरपंच ने ऊकी मोहरे निकार लई आएं।
सरपंच के इते से लौट के भगुंता ने अपनी पेटी जांची। ऊने डबिया में से मोहरे नदारत पाई। ऊको जी धक से रै गओ। ऊने पूरो घर छान मारो, मोहरें कहूं ने मिली। ऊने सोची के पेटी खोलत-करत में मोहरे कहू गैल में हेरा गई हुइएं। बा जे तो सोचई ने सकत्तो के सरपंच ऊकी मोहरे निकार सकत आए।
ऊ दिनां से भगुंता उदास रैन लगो।
ऊकी उदासी देख के एक दिनां सरपंच ने ऊसे पूछी- ‘‘काए रे भगुंता! तोये तो पतो हुइए के गांव में का चल रओ?’’
‘‘रामधई, बड़ो बुरओ चल रओ आए। मालक की किरपा नई रई, मालक रूठे कहाने। ’’ भगुंता ने मों लटका के कई।
‘‘काए? ऐसो का हो गओ? कौन-सी विपदा आन परी? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आए।’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘हजूर, अब कहां धरीं दो मोहरें।’’ भगुंता खिसियानो सो बोलो।
‘‘काए? तुमई तो कहत्ते के अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आएं।’’ सरपंच ने चुटकी लई।
‘‘अरे हजूर, ने पूछो। मोय तो कछु समझई में नई आत। जब लो मोरे ऐंगर दो मोहरे रईं सो मोये सबई के ऐगर मोहरें दिखात रईं। अब मोरी मोहरे हिरा गई सो मोये लगत आए के ई गांव में सबई के सब कंगला हो गएं। सो मोसेे से कछू ने पूछो, हजूर!’’ भगुंता की आंखन से टप-टप अंसुआं झरन लगे।
जा देख के सरपंच को जी पसीज गओ।
‘‘वाह रे भगुंता। तेरी तो बोई किसां ठैरी के दुनिया कैसी, मोए जैसी। जो मैं दुखी, सो दुनिया दुखी। जो मैं खुशी तो दुनिया खुशी। अरे मूरख, जे दुनिया खों अफ्नो घाई ने देखो कर। तू, तू आए औ दुनिया, दुनिया आए। सबई की अपनी खुशी औ अपने दुक्ख होए आएं। समझ परी कछू?’’ सरपंच ने भगुंता से कई और ऊकी सोने की दोई मोहरें ऊकी गदेली पे धर दईं।
भगुंता अपनी मोहरें देख के भौतई खुश हो गओ। बाकी ऊको समझ ने परी के सरपंच के लिंगे ऊकी मोंहरें कां से आई। पर ऊको ईसे का? कऊं से आई होय? मिल तो गईं। फेर सरपंच से पूछो बी नई जा सकत्तो।
ऊको खुश देख के सरपंच ने फेर ऊसे पूछी-‘‘काए भगुंता, अब गांव को का हाल-चाल आए?’’
‘‘मालिक की किरपा! अब सब ठीक हो गओ।’’ भगुंता पैले घाई चहक के बोलो।
‘‘सो अब कोनऊ खों कोऊ तकलीफ-परेसानी नइयां?’’ सरपंच ने फेर के पूछी।
‘‘काए की परेसानी, अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आए।’’ भगुंता पैलई घांईं बोलो।
जा सुन के सरपंच ने अपनो मूंड़ पीट लओ। औ मनई मन सोचन लगो के जे भगुंता तो मोहरन को अंधरा आए। जा नईं सुधर सकत।
‘‘सो भैयाजी, जा हती किसां।’’ किसां खतम करत भई मैंने कई।
‘‘हऔ, नोनी किसां हती। जा सो बई बात भई के दुनिया कैसी? मोय जैसी!’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! जेई तो सोचबे की बात आए के जब लों कछू पार्टी वारे जेई सोचत रैहें के दुनिया उनई के जैसी आए, तबलौं बे कभऊं ने जीते पाहें। अबे बी टेम आए के बे अपनी सोच बदल लेंवें, ने तो राम नाम सत्त हो जैहे।’’ मैंने कई।
‘‘ठीक कई बिन्ना!’’ भैयाजी ने मोरी बात की समर्थन कीे।
आप ओरें सोई सोचियो, जो मैंने झूठ कई होय! बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
 ---------------------------
बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
---------------------------
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat