Wednesday, June 10, 2026

चर्चा प्लस | प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                          

     यदि मध्यप्रदेश में सरकारी योजनाओं को देखा जाए तो मन खुश हो जाता है। ‘‘अच्छे दिन’’ का सपना साकार होने की संभावना बढ़ जाती है। किन्तु विडम्बना यह है कि लोकहित की योजनाएं जितनी चुस्त-दुरुस्त हैं उनका क्रियान्वयन उतना ही सुस्त है। यदि सुस्त नहीं होता तो प्रदेश की तस्वीर आज कुछ और होती। बेशक तस्वीर बदल रही है किन्तु उस गति से नहीं जिस गति से बदलनी चाहिए थी। यहां तक कि जिनके लिए योजनाएं हैं उन्हें भी सभी लाभकारी योजनाओं का ज्ञान नहीं है। सुशिक्षित लोगों को भी नहीं। यह सोचने का विषय है कि इस खामी का जिम्मेदार कौन है?


हाल ही में एक सीनियर सिटिजन से मेरी चर्चा हो रही थी। मैंने उनसे पूछा कि आपने अपना सीनियर सिटिजन कार्ड बनवाया कि नहीं? वे मेरा मुंह ताकने लगे। उन्हें ऐसे किसी भी कार्ड की जानकारी नहीं थी। हां, आयुष्मान योजना की जानकारी अवश्य थी जिसके लिए उन्होंने आह भरते हुए कहा कि ‘‘अभी तो मैं पैंसठ का ही हुआ हूं। अभी मुझे आयुष्मान योजना के लिए पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा, यदि तब तक मैं जिन्दा रहा।’’ दरअसल वे नौकरी पेशा नहीं रहे। उनका अपना छोटा-सा व्यवसाय था। उनके बच्चे पढ़-लिख कर मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी पर चले गए हैं। अब पति-पत्नी ही बचे हैं। दोनों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आता रहता है। कुछ हद तक उनकी अपनी सेविंग से काम चल जाता है लेकिन जब कोई मंहगे मेडिकल टेस्ट कराने की नौबत आती है तो उन्हें अपने बच्चों से गुहार लगानी पड़ती है। वे अकेले नहीं, अनेक ऐसे सीनियर सिटिजन हैं जो सरकारी सहायता के लिए तरसते रहते हैं। इसका पहला कारण कि उन्हें अधिकांश योजनाओं का पता ही नहीं है। जिन बहुचर्चित, बहुप्रचारित योजनाओं का पता है वे उनके दायरे में नहीं आते हैं। जिन योजनाओं दायरे में आते भी हैं उनका लाभ लेने का रास्ता उन्हें नहीं पता। सभी सीनियर सिटिजन इतने ‘‘इंटरनेट मित्र’’ नहीं हैं कि वे ऑनलाईन आवेदन कर सकें। लगभग यही हाल उन सभी का है जिन्हें इंटरनेट पर सोशल मीडिया के कुछ एप्प चलाने के अलावा और कुछ नहीं बनता है। उन्हें कियोस्क केन्द्रों की शरण में जाना पड़ता है और पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
अभी माह भर पहले की बात है मैंने अपने एक परिचित से पूछा कि ‘‘आपको अपनी मध्यप्रदेश सरकार की नवांकुर योजना का पता तो होगा?’’
‘‘ये कौन-सी योजना है?’’ उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की और फिर अटकल लगाते हुए बोले। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए होगी यह योजना, है न!’’
उनकी इस अटकल पर मुझे हंसी भी आई और रोना भी। प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में उन उच्चशिक्षित, रोज अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति को पता नहीं है तो सामान्य लोगों से तो इसकी उम्मींद करना ही व्यर्थ है। मैं कुछ बोल पाती इसके पहले ही वे बोल उठे ‘‘मुझे तो बस, लाड़ली लक्ष्मी, जननी योजना और वो जो किसानों के बिल-विल माफ कर दिए जाते हैं, बस उन्हीं पता है।’’
उनके इस कथन में दम था क्योंकि जिन योजनाओं को बहुप्रचारित किया जाए, जिनकी तस्वीरें सबसे ज्यादा छापी जाएं उनके बारे में पता रहना स्वाभाविक है। अब हर योजना के लिए फीता काटने मंत्री महोदय तो आएंगे नहीं। फिर बाकी योजनाओं पर बड़ी खबर कैसे बनेगी? और आजकल तो यही चलन है कि जिस पर विवाद हो, टीवी के न्यूज चैनल्स पर वाद-विवाद हो, टॉक-शो हो, वही जानकारी के पन्ने पर अपनी जगह बना पाता है। खैर, बात चली है नवांकुर योजना की तो उस पर एक संक्षिप्त दृष्टि डाल ली जाए। इससे कम से कम मुझे भी इस योजना की प्रमुख बातें याद रह जाएंगी, जिन्हें मैं औरों से शेयर कर सकूंगी। 
दरअसल, नवांकुर योजना का मूल उद्देश्य प्रदेश में समाज एवं शासन के मध्य सेतु के रूप में कार्य करना है। विकास के कार्यों में समाज की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि समाज विकास के विभिन्न विषयों में दक्ष स्वैच्छिक संगठन उपलब्ध हों। अतः विभिन्न विषयों जैसे जल संरक्षण, सबको शिक्षा सहित भारतीय संस्कारों की शिक्षा, नशामुक्ति, सबको स्वास्थ्य, हरियाली/पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता एवं साफ सफाई, ऊर्जा संरक्षण, कृषि को लाभकारी बनाना, कुपोषण एवं परिवार नियोजन, सामाजिक समरसता तथा विवाद रहित समाज/ग्राम आदि पर विशेषज्ञता रखने वाले स्वैच्छिक संगठन प्रत्येक सेक्टर स्तर पर विकसित किये जायेगें। इन स्वैच्छिक संगठनों द्वारा सेक्टर में गठित प्रस्फुटन समितियों को उनके कार्यों में आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जायेगा, वहीं मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठयक्रम के छात्रों को इंटर्नशिप कराई जायेगी तथा पाठयक्रम संबंधी परामर्श प्रदान किया जावेगा। समाज की स्वैच्छिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने हेतु प्रति वर्ष प्रत्येक विकासखण्ड में 05 (प्रत्येक विकासखण्ड में प्रति सेक्टर हेतु 01 नवांकुर संस्था के मान से) का चयन कर प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि रूपये 01.00 लाख निरंतर (कार्य संतोषजनक पाए जाने पर) प्रदान की जावेगी। यह संस्थायें उस विकासखण्ड के सेक्टर हेतु लीड स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करेंगी। इस प्रकार योजनांतर्गत स्वैच्छिक संगठनों के उन्मुखीकरण एवं पोषण हेतु जिला स्तर पर गठित समिति के माध्यम से प्रदेश में 1565 स्वैच्छिक संगठनों का चयन किया जायेगा। है न बेहतरीन योजना। लेकिन यह सब कुछ कितने प्रतिशत होते दिख रहा है, यह विचारणीय है।
वैसे नवांकुर योजना का लक्ष्य है सेक्टर स्तर पर सक्रिय प्रस्फुटन समितियों/नवीन स्वयंसेवी संस्थाओं का उन्मुखीकरण एवं पोषण करना तथा सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करते हुये आत्म निर्भर मध्यप्रदेश का निर्माण करना। वहीं इसका उद्देश्य है ऐसे स्वैच्छिक संगठन का निर्माण करना जो विकास के प्रमुख विषयों में विशेषज्ञता रखते हो। विकास के प्रमुख विषयों पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने हेतु विषय विशेषज्ञ/स्वैच्छिक कार्यकर्ता तैयार करना। स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से योजनाओं के संचालन हेतु परियोजना निर्माण तथा क्रियान्वयन करना। सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में स्वैच्छिक संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए विकास प्रक्रिया में नागरिक समुदाय को शामिल करना। सामाजिक सुरक्षा एवं समरसता सुनिश्चित् करना। केन्द्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार एवं उनके क्रियान्वयन में सहयोग करना। नवीन व स्थानीय संस्थाओं का पोषण व उनका क्षमतावर्द्धन करना।
चयन हेतु पात्र संस्थाओं के लिए योजनांतर्गत चयन हेतु परिषद की वेबसाइट पर विज्ञप्ति जारी की करने का प्रावधान रखा गया। उन नगर/ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी रखा गया जिनके द्वारा संबंधित विकासखण्ड अंतर्गत लगातार तीन वर्ष तक कार्य किया गया हो तथा परिषद द्वारा संचालित कार्यक्रमों/अभियानों में उनकी निरन्तर भागीदारी रही हो। यह भी सुनिश्चित किया गया कि म.प्र. फमर््स एवं संस्थायें पंजीकरण अधिनियम 1973 के अंतर्गत वे ही पंजीकृत संस्थाएं मान्य होगी जिनमें 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित विकासखण्ड तथा 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित जिले के स्थानीय निवासी हो।
इस सुंदर नवांकुर योजना में नवकरीण ऊर्जा के तहत ऊर्जा साक्षरता अभियान और लोक सेवा प्रबंधन के तहत सी.एम. जनसेवा योजना भी है। यह कितने लोगों को पता है? और नवांकुर की तमाम योजना के अंतर्गत अब तक कितनी प्रगति हुई यह कितने लोगों को पता है? योजना तैयार करने वालों को? कागजी कार्यवाही करने वालों को? जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों एवं जनप्रतिनिधियों को? या फिर इन सबके बारे में कितना पता है उन लोगों को जिनके हित के लिए ये योजनाएं हैं। एक योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’। मेरी एक घरेलू सहायिका यानी कामवाली बहन से बात हुई तो पता चला कि वह अपनी बहू के लिए राजगार ढूंढ रही है लेकिन घर-घर जा कर चौका-बरतन का काम उससे नहीं कराना चाहती है। उसकी बहू को लाड़ली लक्ष्मी और बीपीएल के लाभ मिल रहे हैं किन्तु बिना मेहनत के हाथ आए पैसों का उसे मोल नहीं है। इसीलिए सास चाहती है कि बहू कुछ काम करके भी पैसे कमाए ताकि उसके खर्चों पर लगाम लगे। लेकिन परेशानी ये कि उसकी बहू को घर के कामों के अलावा कुछ नहीं आता है। मैंने उससे कहा कि सरकार की योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’, सो उसे सिलाई सीखने भेजो। वहीं से उसकी कमाई भी शुरू हो जाएगी। इस बारे में उस कामवाली बहन को तनिक भी जानकारी नहीं थी। उसे जानकारी थी तो बस लाड़ली लक्ष्मी योजना की, समूह सहायता योजना ही और साहूकार से कर्जा लेने की। सच तो यह था कि समूह सहायता योजना का वास्तविक स्वरूप भी उसे पता नहीं था। उसने मुझसे पूछा कि वह अपनी बहू को सिलाई सीखने कहां भेजे? सेंटर कहां है? मैं उसे क्या बताती क्योंकि मुझे भी सेंटर के बारे में पता नहीं था। मैंने उसे महिला बाल विकास के दफ्तर का पता बता दिया कि शायद उसे वहां से कोई जानकारी मिल जाए। उसी समय मुझे लगा कि आशा कार्यकर्ता की भांति ऐसी कार्यकर्ताएं भी होनी चाहिए जो योजनाओं की विस्तृत जानकारी घर-घर पहुंचा सकें। 
चलिए बात की जाए योजनाओं के क्रियान्वयन की तो अभी हाल ही में चल रहे जनगणना योजना को ही ले लीजिए। पहली बात तो इसे भरी गर्मी में आरंभ कर दिया गया जिससे गणना करने वालों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। उन्हें चिलचिलाती धूप में दर-दर भटकना पड़ा। उस पर गर्मी की सूनी दोपहर में सब लोग दरवाजा खोलने में भी झिझकते हैं। लिहाजा अभी भी अनेक घर ऐसे हैं जहां गणना करने वाले पहुंचे ही नहीं है, या फिर पड़ोसी से पूछ कर खानापूरी कर बैठे हैं। क्या इससे योजनाओं के लिए सही जानकारी मिल सकेगी? क्या गलत आंकड़ों के आधार पर नई सही योजनाएं बन सकेंगी? वस्तुतः सरकारी योजनाओं में कोई खामी नहीं है लेकिन उनके क्रियान्वयन में अनेक व्यवहारिक खामियां हैं जिन्हें किसी अधिकारी या कर्मचारी को सस्पेंड कर के दूर नहीं किया जा सकता है। खामियां दूर करने के लिए जरूरी है कि लोकहित की योजनाओं को लोक की आवश्यकता के अनुरूप व्यापक बनाया जाए। जिनके लिए यह योजनाएं बनाई जाती हैं उन तक जानकारी की पहुंच बनाई जाए। साथ कुछ योजनाओं को और अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है तथा मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बदले रोजगार के अवसर बढ़ाने जरूरत है। तभी लोकहितकारी योजनाएं अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर सकेंगी और गतिवान बन सकेंगी।    ------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 10.06.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, June 9, 2026

पुस्तक समीक्षा | उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल”

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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उपन्यास     - पहाड़ का पाताल

लेखक      - श्यामसुंदर दुबे

प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32

मूल्य       - 550/-

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पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि पहाड़ जितना धरातल के ऊपर दिखाई देता है उससे कहीं अधिक धरातल के नीचे होता है। ठीक यही स्थिति व्यवस्था और मनुष्यों के चरित्र की होती है। ऊपर से जो कुछ जितना दिखाई देता है उससे कहीं अधिक अप्रत्यक्ष रहता है। अतः यदि पहाड़ है तो उसका पाताल भी होगा ही। कभी-कभी यह पाताल चौंकाता है, चमतना को झकणेर देता है। यही कहता है डॉ. श्यामसुंदर दुबे का उपन्यास ‘‘पाताल का पहाड़’’।  

जब किसी उपन्यास की चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। ‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार,ललित निबंधकार एवं लोकविद डॉ.श्यामसुंदर दुबे ने। 

‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’

उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनः भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।’’

विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि  ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’

यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’

इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।

उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनियर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।

व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’

उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट कर भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।

उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जन्म दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’  

‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरूप  हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं बारम्बार पठनीय है।      

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Monday, June 8, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | सिर्फ एक दिनां नोंईं, हर दिन मनो चाहिए पर्यावरण दिवस | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
सिर्फ एक दिनां नोंईं, हर दिन मनो चाहिए पर्यावरण दिवस
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
कढ़ गओ 05 जून। मन गओ पर्यावरण दिवस। गड्ढा खुदो, पौधा लगे, भासन भए, रासन भए, पेड़ बचाबे पे बड़ी-बड़ी बातें भईं। सब कछू अच्छो-अच्छो भओ। मनो दूसरे दिनां कोनऊं ने खबर लई के उनके लगाए पौधन को का भओ? नईं लई हुइए। काए से के दूसरे दिनां तो जे देखने परत आए के पौधा लगाते भए की फोटू अखबार में छपी के नईं। औ जो फोटू संगे खबर छप गई तो ऊको सोसल मीडिया में भी डारबे को काम रैत आए। सो, दूसरे दिनां कोन खों परी के पौधन कों हेरबे जाए। ऊंसई पर्यावरण दिवस तो एक दिनां को रैत आए जोन टाईप से शिक्षक दिवस, महिला दिवस, फादर दिवस मने किसम-किसम को दिवस। एक दिनां लुगाइयन के जैकारे करे और दूजे दिनां से बोई मार-कुटव्वल। जो पेरेंट्स डे भओ तो एक दिनां मताई-बाप खों गिफट-मिफट दे के पूछ लओ औ दूसरे दिनां से मूंड़ से मूंड़ जोर के सोचन लगे के अब कोन से वाले भैया के इते उने टिपाओ जाए? बस, जेई दसा रैत आए पर्यावरण की। ने तो आपई सोचो के जो हरेक साल लगाए गए पौधा सई से रै पाते औ बड्डे हो पाते तो आज पर्यावरण बचाबे की फ़िक्र ने करने परती। तनक जा बी सोचियो के पड़ोस के जिला में, जोन अपनईं संभाग में आए छतरपुर को बक्सवाहा में हीरा निकारबे के लाने पेड़े कट  रए औ अबे औ कटहें। का कोनऊं इते चीं बी बोल रओ? कोनऊं नईं! चलो उते की छोरो, अपने इते सागर में कालोनियां तो मनों मुतकीं बढ़ गईं लेकन का सहर में उत्ते पेड़ें लगाए गए? जो लगाए जाते तो पूरी गरमी नौतपा घांईं काए खों तपती? सो, भैया-भैन हरों, अपन खों पर्यावरण दिवस एक दिनां मना के नईं रै जाने, हर दिन मनाने है। तभईं अपन औ अपनों सहर अच्छें रैहें।
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Saturday, June 6, 2026

अंबेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, समिति संवाद पत्रिका, अप्रैल-मई 2026 संयुक्तांक

"अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां" मेरा यह लेख पुणे की "समिति संवाद" पत्रिका के संयुक्तांक अप्रैल-मई 2026 में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका के कार्यकारी संपादक आदरणीय भाई डॉ सुनील केशव देवधर जी का हार्दिक आभार 🙏
    मुझे पहली बार इस पत्रिका को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ निश्चित रूप से यह एक उच्च कोटि की वैचारिक पत्रिका है। संपादक  ज. गं. फगरे एवं कार्यकारी संपादक डॉ. सुनील देवधर जी को पत्रिका के संपादन के लिए हार्दिक बधाई एवं साधुवाद💐
लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

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Thursday, June 4, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       जा राजनीति बी गजबई की चीज आए। जोन की लाग लग गई बा सातमें आसमान पे औ जोन की ने लगी बा कऊं को नईं। चार दिनां से भैया औ भौजी बायरे गए सो उनसे बतकाव ने हो पा रई, बाकी असल तो आप ओरें हो जोन से जी भर के बतकाव करी जा सकत आए। का आए के जब कोऊ बड़ो चुनाव जीत जात आए तो ऊके गुट के छुटभैया हरें ऐसे उचकत फिरत आएं मनो सगरे तीर उनईं ने चलाए नए होंए। बे इतरान लगत आएं। कछू के कछू बकन लगत आएं। जे बरहमेस चलत आ रओ। जेई टाईप की दो किसां आएं महाभारत वारे अर्जुन औ भीम की। सो, पैले सुनों आ ओरें अर्जुन की किसां।
का भओ के जबे महाभारत की लड़ाई खतम भई तो पांडव हरन खों राज मिल गओ। एक दिनां अर्जुन ने दरबार में कई के ‘‘हम सबसे बड़े तीरंदाज आएं। जो हमने अपने तीर से कर्ण खों ने मारो होतो तो आज कओ दुर्योधन हरें इते बैठे राज करत दिखाते। बा हमई हते जोन ने भीष्मपितामह जू के लाने अपने तीरन से बिछौना सो बना दओ रओ। औ हमई हते जोन ने अपने तीर से धरती खों फाड़ के भीष्मपितामह जू को पानी पिलाओ रओ।’’
उते जोन चमचा टाईप के दरबारी हते बे अर्जुन की जा बात सुन के उनके जैकारे लगाऊंन लगे। जा देख के किसन भगवान खों अच्छो नई लगो। उन्ने अर्जुन से कई के ‘‘बा सब तो ठीक आए, मनो तुमें ऐसो बखान नईं करो चाइए। सब कछू तुमाओ करो भओ नइयां।’’
जा सुन के अर्जुन खों लगो के किसन भगवान हमाए सारथी बने रए, जेई से अपनी तारीफ ने सुन के इने बुरौ लग रओ आए। सो बा बोलो के ‘‘आप सबई जान लेओ के हमाए रथ को हांकबे वारे जे किसन जू रए जेई से हम सई-सई तीर चला पाए।’’
ऊकी बात सुन के किसन भगवान समझ गए के जा अर्जुन ऐसे ने मानहे, ईकी आंखें खोलनई परहें।
कछू नईं! किसन भगवान ने घूमबे को प्रोगराम बनाओ। बे पाचों पांडो हरों खों ले के चल परे। एक जांगा पे पतरी सी नदी परी। ऊमें पानी बी कमई रओ। अर्जुन ने अपनों रथ बा नदी में उतार दओ के नदी पार करी जा सके। सबरे भैयन को रथ नदी पार पौंच गए मनो अर्जुन को रथ बीच नदी में पौंच के धसन लगो। अर्जंन ने भौतई कोसिस करी पर रथ को धंसबो ने थमो। अब अर्जुन तनक घबड़ानों। बा रथ से उतर के रथ को चका उठाबे की कोसिस करन लगो। पर कछू फरक ने परो। तब ऊने किसन भगवान से कई के ‘‘आप रथ पे बैठे आओ, जेई से जो धंसत जा रओ आए। अब तनक उतर आओ।’’
किसन भगवान अर्जंन के कए पे रथ से उतर गए। उनके उतरतई सात रथ के चका औ तेजी से धंसन लगे। अर्जंुन रथ के चका निकारबे के लाने जित्तो जोर लगातो, उत्तई बे धंसन लगते। अर्जंन थक गओ। तब ऊने किसन भगवान से पूछी के ‘‘जो सब का हो रओ? सबके रथ कढ़ गए, मनो मोरो रथ बीता भर पानी बारी नदी में बूड़त जा रओ। हमें तो कछू समझ में नईं आ रओ। हम उतर गए, आप उतर गए रथ पे कोनऊं ने बचो फेर बी रथ फंसो डरो। मनो चुल्लू भर पानी में डूब के मरो चात होए। कछू समझ नईे आ रई के जे का लीला आए?’’
‘‘बात जे आए अर्जुन के तुमा जे रथ खों ने तो हमने सम्हारो रओ और ने तो तुमने। ईको सम्हारबे वारो भौतई वजनदारी वारो आए। औ अबे उन्हई की वजनदारी के कारन तुमाओ रथ धंसो जा रओ।’’ किसन भगवान ने समझाई।
‘‘सो को आ बे? जिनके कारन हमाए रथ की जे दसा भई जा रई।’’ अर्जुन ने पूछा।
‘‘तनक इते आओ औ देखो को आ तुमाए रथ पे?’’ किसन भगवान बोले।
‘‘को आ?’’ कैत भए अर्जुन ने ऊ तरफी देखी जी तरफी किसन भगवान देख रए हते।
‘‘उते का दिखा रओ? उते तो पतरो सो झंडा लगो आए। उते तो एक ठंइयां बंदरा लौं नइयां।’’ अर्जुन बमकत भओ बोलो।
जेसई अर्जुन ने इत्तो बोलो के बा पतरो सो झंडा जोर से हलो औ ऊमें से हनुमान जू निकरे औ अर्जुन से बोले के ऐसो कै के तुमने ठीक नईं करो।’’
फेर बे गायब हो गए। जा देख-सुन के अर्जुन घबड़ानों।
‘‘जे हनुमान जू इते का कर रए हते? औ अब कां चले गए? अरे, जे हमाओ रथ तो ऊपरे निकर आओ।’’ कैत भओ अर्जुन थर-थर कांपन लगो।
‘‘अर्जुन भैया, तुम आओ मूरख। अरे हनुमान जू तो पूरे जुद्ध के टेम पे अपन दोई के संगे रए। तुमाए रथ खों बेई तो दाबे रए ने तो कर्ण के तीरन की आंधी में तुमाओ रथ उड़ गओ होतो औ तुम धूरा चाट रए होते। हनुमान जू तुमाए रथ के झंडा पे सवार रए आए जेई से तुमाओ रथ सई-सई चलत रओ। जेई से तुम जीत पाए।’’ किसन भगवान ने असल बात बताई। फेर बोले के तुमने बंदरा वारी बात बोल के उने नाराज कर दओ आए। सो लौट के चलबी तो उनसे माफी मंगा लइयो।’’
जा सुन के अर्जुन रोन लगो औ बोलो के ‘‘हमाओ दिमाग चल गओ रओ। हमें घमंड आ गओ रओ। हम आप से माफी मांगत आएं औ संगे हनुमान जू के सोई पांस पकर लेबी।’’ अर्जुन बोलो।
‘‘तुमें कछू करबे की जरूरत नइयां, बस इत्तई करो के जुद्ध जीतबे पे घमंड ने करियो। घमंड को फल करओ होत आए।’’ किसन भगवान बोले।
अर्जुन खो अपनी गलती समझ में आ गई औ ऊने घमंड करबो छोड़ दओ। मनो आजकाल के छुटकुल नेता हरो के समझ के लाने कोनऊं ने तो किसन भगवान आएं औ ने तो हनुमान जू। सो बे तो इतरातई रैंहें। संगे कछू बी बकत रैंहे।
रई दूसरी किसां की बात, बोई भीम वारी तो सो बा अगली बेर सुनाबी। ने तो दोई गड्मड् हो जाहे।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं बी राजनीतिक पार्टी के छुटुकुल नेता हरें बकर-बकर कर के अपनी पार्टी खों कित्तों नुकसान पौंचात आएं? सो इनपे लगाम कैसे लग सकत आए?      
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, June 3, 2026

चर्चा प्लस | क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा?      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                    
     यह सच है कि हममें से 99 प्रतिशत लोगों ने कभी खुद जाकर ग्लेशियर नहीं देखे हैं; उन्हें केवल टीवी या इंटरनेट पर ही देखा है। ग्लेशियरों को पिघलते हुए भी हमने सीधे तौर पर नहीं देखा है। तो फिर हमें इस बात की चिंता क्यों करनी चाहिए कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जबकि हम तो मैदानी इलाकों के निवासी हैं? हालाँकि, हम मैदानी इलाकों के निवासियों ने तो कभी बर्फबारी भी नहीं देखी है। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो पूरा मैदानी इलाका भी शीत लहरों की चपेट में आ जाता है। राजस्थान की गर्म हवाएं मध्यप्रदेश को झुलसा देती हैं। तो क्या हमें सचमुच चिंता नहीं करनी चाहिए?
सागरवाले कौन हैं? मैं सागरवाली हूँ। हाँ, मैं सागर में रहती हूँ, जो भारत के दिल यानी मध्य प्रदेश में स्थित एक विकासशील शहर है, और इसीलिए मैं सागरवाली हूँ। कुछ दिन पहले मैं एक परिचित से चर्चा कर रही था कि आजकल मौसम बहुत अस्थिर हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मौसम भी बदल रहा है, जिसे हम अपने जीवन में ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। माफ़ कीजिए, जब तक हम इसे समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। मेरे परिचित ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि मौसम तो बदलता ही रहता है, इसमें चिंता की क्या बात है? इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आप बेवजह ही जलवायु और मौसम को लेकर चिंता करती रहता हैं। अरे, जिस जगह पर हम रहते हैं, वहाँ इन सब चीज़ों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मैंने कहा - वाह! क्या आपने वह कहावत नहीं सुनी है कि अगर धरती पर एक पत्ता भी हिलता है, तो उसका असर दूर अंतरिक्ष तक होता है? तो जब धरती पर ही कोई घटना घटती है, तो उसका असर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक ज़रूर होगा। अब देखिए, जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसका असर पूरी धरती पर पड़ना स्वाभाविक है। यह सुनकर उन्होंने कहा, ‘‘आप कहती हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और यह चिंता का विषय है। बेशक यह चिंता का विषय होगा, लेकिन हमारे लिए नहीं। हम तो बीच के इलाके में रहते हैं। हमें चिंता क्यों करनी चाहिए? हम यहाँ सागर में रहते हैं, जो समुद्र से बहुत दूर है। हमें ग्लेशियरों के पिघलने से क्यों डरना चाहिए? अगर ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है, तो समुद्र के तटीय इलाकों में रहने वालों को चिंता करनी चाहिए, हमें नहीं।’’
क्या सचमुच एक सागरवाले, एक भोपाली, एक लखनवी या एक लुधियानवी को ग्लेशियरों के पिघलने से नहीं डरना चाहिए? असल में, ग्लेशियरों का पिघलना आज ग्लोबल वार्मिंग का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। सीधे शब्दों में कहें तो, ग्लेशियरों की सफ़ेद सतहें सूरज की किरणों को परावर्तित करती हैं, जिससे हमारे मौजूदा मौसम को मध्यम बनाए रखने में मदद मिलती है। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो नीचे की काली सतहें सामने आ जाती हैं, जो गर्मी को सोखती और छोड़ती हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है। ग्लेशियर पानी के भंडार के रूप में काम करते हैं, जो गर्मियों के मौसम में भी बने रहते हैं। ग्लेशियरों से लगातार पिघलने वाला पानी सूखे महीनों के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र को मिलता रहता है, जिससे बारहमासी जलधाराओं का निर्माण होता है और पेड़-पौधों व जानवरों के लिए पानी का स्रोत बना रहता है। ग्लेशियरों से बहकर आने वाला ठंडा पानी, नीचे की ओर बहने वाली नदियों और जलधाराओं के तापमान को भी प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है - पर्यावरण में बदलाव। यह बदलाव हमारे सामने बेमौसम बारिश, बर्फ़बारी, बढ़ती गर्मी और सूखे के रूप में आ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका से लेकर ग्रीनलैंड तक, इन क्षेत्रों का अस्तित्व खतरे में है। जीवनदायिनी नदियाँ सूख रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते निकट भविष्य में दुनिया के नक्शे से कई देशों का अस्तित्व मिट जाने की आशंका है। पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि देखी गई है। जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक और मानवीय, दोनों ही कारण हैं; लेकिन वर्तमान समय में जो परिणाम सामने आए हैं, वे मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण हैं। हमारे सामने एक बड़ा संकट खड़ा है, और दुर्भाग्य से हम इससे अनजान हैं। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज़ कर रहे हैं, जिससे उन 75 करोड़ लोगों का जीवन और आजीविका खतरे में पड़ गई है, जो इन ग्लेशियरों और बर्फ से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। पिघलते ग्लेशियर समुद्र के बढ़ते जलस्तर में योगदान देते हैं, जिससे तटीय कटाव बढ़ता है और तूफानी लहरों (ेजवतउ ेनतहमे) का खतरा बढ़ जाता है; क्योंकि गर्म होती हवा और समुद्री तापमान के कारण हरिकेन और टाइफून जैसे तटीय तूफान अधिक बार-बार और अधिक तीव्रता के साथ आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल गई, तो इससे वैश्विक समुद्र का जलस्तर 20 फीट तक बढ़ जाएगा।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर प्रमाणों में से एक है। यह इस बात का सबूत है कि ग्लोबल वार्मिंग न केवल पृथ्वी का तापमान बढ़ा रही है, बल्कि यह मौसम और जलवायु को भी बदल रही है। मौसम पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव का अर्थ है कि कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो कहीं भारी वर्षा होती है। इसका कृषि और बागवानी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जलस्तर कम होने के कारण पेयजल का संकट भी उत्पन्न हो जाता है। हमने पिछले पाँच वर्षों के दौरान बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़े सूखे के दौरान इन सभी बातों के उदाहरण पहले ही देख लिए हैं। इसलिए, यह सोचना कि हिमालय या ध्रुवीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने का हमारे देश के भीतरी इलाकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, स्वयं को भ्रम में रखना है। इसीलिए दुनिया के हर व्यक्ति के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा करने में अपना योगदान दे। हमें यह समझना होगा कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने का प्रभाव तटीय क्षेत्रों पर 50 प्रतिशत होगा, तो उसी समय भीतरी इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका प्रभाव कम से कम 10 से 20 प्रतिशत अवश्य पड़ेगा। इसलिए, जागिएकृचाहे आप सागर के निवासी हों, भोपाली हों, लखनवी हों, लुधियानवी हों, या फिर आप कहीं के भी नागरिक हों।

2025 का संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 10-21 नवंबर 2025 को ब्राजील के बेलेम में आयोजित किया गया था। इसमें 190 से अधिक देशों के नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के सदस्यों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्यों पर चर्चा करने के लिए एक साथ लाया गया, जिसमें पहले वैश्विक स्टॉकटेक  के परिणामों को ठोस राष्ट्रीय कार्यों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया गया था। अगला सम्मेलन नवंबर 2026 में होगा।

बीसवीं शताब्दी में तीव्र हुई ग्लेशियरों के पिघलने से हमारा ग्रह बर्फ़विहीन होता जा रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में मानवीय गतिविधियाँ मुख्य भूमिका निभाती हैं। समुद्र का स्तर और वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि बर्फ़ के ये विशाल भंडार किस प्रकार विकसित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के निरंतर बढ़ते प्रभाव के कारण पृथ्वी के ग्लेशियर आधी सदी से भी अधिक समय से सिकुड़ रहे हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय (स्विट्जरलैंड) द्वारा 2019 में किए गए एक उपग्रह अध्ययन के के बाद कहा गया था कि दक्षिण-पूर्व एशिया को छोड़कर पृथ्वी पर कोई भी स्थान इस घटना के प्रभावों को झेलने में सक्षम नहीं है, जिसने 1961 से अब तक दुनिया भर में 9.6 अरब टन से अधिक हिमनद बर्फ पिघला दी है, और विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, 2100 तक एक तिहाई से अधिक ग्लेशियरों के वाष्पीकृत होने का खतरा है। दुर्भाग्य से यह भविष्यवाणी सच होने लगी है।

ग्लेशियर क्या होता है और यह कैसे बनता है? दरअसल, बर्फ के ये विशालकाय गतिशील पिंड ठंडे स्थानों में जमा हुई बर्फ के संघनन और पुनरू क्रिस्टलीकरण से बनते हैं, जैसा कि उदाहरण के लिए पर्वतीय और ध्रुवीय ग्लेशियरों में होता है, जिन्हें विशाल आर्कटिक प्लेटों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। हिमनदों को उनकी आकृति विज्ञान के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है - हिमक्षेत्र, सर्क हिमनद, घाटी हिमनद, आदि - जलवायु के अनुसार - ध्रुवीय, उष्णकटिबंधीय या समशीतोष्ण - और उनकी तापीय स्थितियों के अनुसार - ठंडा, गर्म या बहुतापीय आधार। एक हिमनद के निर्माण में हजारों वर्ष लगते हैं, और इसका आकार इसके जीवनकाल में इसमें मौजूद बर्फ की मात्रा के आधार पर बदलता रहता है। बर्फ पिघलने के दौरान इन हिमनदों का व्यवहार उन नदियों के समान होता है जिन्हें ये पानी देते हैं, और इनकी गति घर्षण और उस भूभाग की ढलान पर निर्भर करती है जिस पर ये चलते हैं। कुल मिलाकर, हिमनद पृथ्वी की सतह के 10 प्रतिशत भाग को ढकते हैं और बर्फ की चोटियों के साथ मिलकर विश्व के लगभग 70 प्रतिशत ताजे पानी का स्रोत हैं।
पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने ग्लेशियरों के पिघलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज, जलवायु परिवर्तन की बढ़ती गति के कारण ये रिकॉर्ड समय में विलुप्त हो सकते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन- उद्योग, परिवहन, वनों की कटाई और जीवाश्म ईंधन जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की वायुमंडलीय सांद्रता पृथ्वी को गर्म करती है और ग्लेशियरों को पिघलाती है। महासागर पृथ्वी की 90 प्रतिशत गर्मी को अवशोषित करते हैं, और यह तथ्य समुद्री ग्लेशियरों के पिघलने को प्रभावित करता है, जो ज्यादातर ध्रुवों के पास और अलास्का (संयुक्त राज्य अमेरिका) के तटों पर स्थित हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय ने पाया कि पिछले तीन दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो गई है। बर्फ का यह नुकसान पहले ही 335 अरब टन प्रति वर्ष तक पहुंच चुका है, जो समुद्र के वर्तमान विस्तार की दर का 30 प्रतिशत  है।

ग्लेशियरों के पिघलने के मुख्य परिणाम घातक हैं। सन 1961 से हिमनदों के पिघलने के कारण समुद्र का स्तर 2.7 सेंटीमीटर बढ़ गया है। इसके अलावा, दुनिया के ग्लेशियरों में लगभग 170,000 घन किलोमीटर बर्फ मौजूद है, जो समुद्र के स्तर को लगभग आधा मीटर तक बढ़ा सकती है। ध्रुवों पर हिमनदों के पिघलने से समुद्री धाराओं की गति धीमी हो रही है, यह एक ऐसी घटना है जो वैश्विक जलवायु में परिवर्तन और दुनिया भर में तेजी से बढ़ती चरम मौसम घटनाओं की एक श्रृंखला से संबंधित है। हिमनदों के पिघलने से कई प्रजातियों का विलुप्त होना भी तय है, क्योंकि हिमनद स्थलीय और जलीय दोनों प्रकार के कई जानवरों का प्राकृतिक आवास हैं। ग्लेशियरों के लुप्त होने का अर्थ यह भी है कि जनसंख्या द्वारा उपभोग के लिए कम पानी, जलविद्युत ऊर्जा उत्पादन क्षमता में कमी और सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा कम हो जाती है।
ग्लेशियर वैज्ञानिकों का मानना है कि भारी बर्फ पिघलने के बावजूद, हमारे पास अभी भी हिमनदों को उनके अनुमानित लुप्त होने से बचाने का समय है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में हम कैसे मदद कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को कम करने और ग्लेशियरों को बचाने के लिए, यह अनिवार्य है कि अगले दशक में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम किया जाए, और 2050 के बाद इसे शून्य तक लाया जाए।
जरा सोचिए कि सागर भी इसी पृथ्वी पर है। यदि पृथ्वी में प्राकृतिक असंतुलन होगा तो उसके दुष्प्रभावों से सागर भी बचेगा नहीं। इस बार गर्मियों में रिकार्ड तोड़ तपन और हीटवेव्स ने चेतावनी दे ही दी है कि यदि हम पेड़ काटते रहे, जलाशय सुखाते रहे तो हम चाहे सागर में रहें या जबलपुर में, हमें ग्लेशियरों के पिघलने का असर झेलना ही होगा।      
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(दैनिक, सागर दिनकर में 03.06.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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