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शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Thursday, May 14, 2026
बतकाव बिन्ना की | जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
चर्चा प्लस | नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
वेदों में यह माना जाता है कि हमें ब्रह्मांड में मौजूद सभी प्रकार के जल की रक्षा करनी चाहिए। नदियों के जल को सबसे अधिक संरक्षित माना गया है, क्योंकि उससे खेतों की सिंचाई होती है, जिसके कारण जीवों का जीवन चलता रहता है। नदियों का बहता हुआ जल पवित्र माना जाता है। इसीलिए वेदों में कहा गया है कि नदियों को प्रदूषित नहीं करना चाहिए। वैदिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद आने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। इसी संदर्भ में माना गया है कि स्वर्ग तक केवल वैतरणी को पार करने के बाद ही पहुंचा जा सकता है, इसलिए यदि जो वैतरणी को पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता और उसकी आत्मा प्यासी भटकती रहती है।
हिंदू वैदिक, पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैतरणी नदी (स्टिक्स नदी) में भयानक कीड़े, मगरमच्छ और वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध रहते हैं। मृत्यु के बाद, जब यमदूत पापी आत्मा को लेकर वैतरणी नदी से गुज़रते हैं, तो नदी का पानी उबलने लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है यानी जो जीवन में बुरे कर्म करता है, धार्मिक कार्य, दान-पुण्य नहीं करता, उस पापी आत्मा को वैतरणी नदी पार करने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। जो व्यक्ति नदी के जल को हानि पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद मिलने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। चूंकि स्वर्ग तक पहुंचने के लिए वैतरणी नदी को पार करना अनिवार्य है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति वैतरणी पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह नदी पृथ्वी के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी प्रवाहित होती है। जिस नदी की यहां बात की जा रही है, वह यमलोक से नरक तक बहती है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नदी का नाम वैतरणी नदी है। यह 100 योजन अर्थात् 120 किलोमीटर लंबी है और रक्त (खून) से भरी हुई है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इस नदी का एक हिस्सा पृथ्वी से होकर यमलोक तक जाता है, और वहां से नरक के द्वार तक पहुंचता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा को यमलोक में यमराज के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यदि उसके कर्मों के अनुसार उसे नरक की प्राप्ति होती है, तो यमदूत उस पापी आत्मा को इस नदी के पास ले जाते हैं। किसी भी पापी आत्मा को देखते ही नदी का रक्त उबलने लगता है और नदी से एक भयानक गर्जना उठने लगती है। वहीं, जो व्यक्ति अपने जीवन में दान-पुण्य करता है, तथा प्रकृति और नदी के जल को कोई हानि नहीं पहुंचाता, वैतरणी नदी उसकी आत्मा की रक्षा करती है। हमारे विद्वान पूर्वजों ने नदीजल संरक्षण को पारलौकिक जीवन से जोड़ कर जो भय पैदा किया वह नदीजल संरक्षण में सहायक रहा। किन्तु आधुनिकता ने इन प्राचीन संदेशों की अनदेखी की है और नदियों को गंभीर क्षति पहुंचाया है। हमारे पूर्वजों ने संभवतः इसी कारणवश धार्मिक ग्रंथों में वैतरणी नदी के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है, ताकि मनुष्य प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाने से भयभीत हों; वे अच्छे कर्म करें, प्रकृति का संरक्षण करें, जल बचाए और जैव विविधता की रक्षा करें।
जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय नदियों की जलवायु की स्थिति लगातार खराब हो रही है, जिसमें अनिश्चितकालीन वृद्धि, अत्यधिक वृद्धि, ज्वालामुखी का पिघलना और पानी की कमी मुख्य चुनौतियाँ हैं। बढ़ते तापमान के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे नदियां समय से पहले सूख रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 2070-2100 तक मानसून में नदियों का तापमान 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को पानी देने वाले हिमालयी ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना इन नदियों का प्रवाह प्रभावित कर रहा है। बारिश के पैटर्न में बदलाव से बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। भारत में बाढ़ की दर बढ़ी है। वहीं अनियमित बारिश से सूखा और बंजरपन भी बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह का 71 प्रतिशत भाग जल से ढंका हुआ है, लेकिन मात्र 1 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। गंगा, यमुना और साबरमती जैसी नदियां पूरे भारत में पूजनीय हैं। नदी का जल वाणिज्यिक और औद्योगिक विकास, जलविद्युत उत्पादन, कृषि, नए बहुउद्देशीय बांधों और पर्यटन स्थलों के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि कीटनाशकों, भारी धातुओं, जैविक अपशिष्ट, रासायनिक अपशिष्ट और सीधे सीवेज के निर्वहन जैसे विभिन्न प्रदूषकों की उपस्थिति ने नदी के जल की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाया है। भारत में, नदी जल प्रदूषण एक प्रमुख समस्या है जिसने न केवल मानव और पशु स्वास्थ्य को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया है।
सन 2023 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में पांच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई थी। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया था कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। दरअसल, हिमनद यानी ग्लेसियर्स पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है।’’
इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा। गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियां झेलम, चिनाब, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियां सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहां पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है।
हमारे पूर्वज नदी जल के महत्व को हमसे कहीं अधिक समझते थे। ‘‘जलमेव जीवनं’’ भारतीय संस्कृति में जल और जलाशयों के महत्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे वैदिक साहित्य में जल के स्रोतों, सभी जीवों के लिए जल के महत्व, जल की गुणवत्ता और उसके संरक्षण पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है। वेदों में जल को ‘‘विश्वभेषजं’’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि सभी औषधियां जल में ही समाहित हैं (अर्थात् शुद्ध जल सभी जीवों के लिए अत्यंत लाभकारी, हितकारी और महत्वपूर्ण है)। वर्तमान में भी जल चिकित्सा के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ऋग्वेद में जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-‘‘अप्सवमृतमप्सु भेषजं।’’
- इसका अर्थ है कि जल में अमृत है, जल में औषधि है। वास्तव में, आर्य संस्कृति नदियों के किनारों पर ही फली-फूली और विकसित हुई। बड़े-बड़े प्राचीन नगर नदियों के किनारों पर ही समृद्ध हुए। जैसे सरयू के तट पर अयोध्या, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जयिनी, त्रिवेणी के तट पर प्रयाग, यमुना के तट पर मथुरा आदि। पंजाब को ‘‘सप्तसिंधु’’ प्रदेश कहा जाता है। वैदिक काल में, सरस्वती नदी के तट के समीप रहते हुए और इस नदी के जल का सेवन करते हुए, ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया।
पवित्र नदियों की महिमा का गान हजारों नामों से किया जाता है। ऋग्वेद के दशम मंडल के ‘‘नदी सूक्त’’ में भारत की नदियों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है-
गंगे च यमुने चौव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
- इसका अर्थ है, हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी नदियों! आप सभी मेरे स्नान के लिए इस जल में पधारें।
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा।
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका।।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी।
पूर्णाः पूर्णजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तु मे मङ्गलं।।
आदिग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित वेदों में, जल को एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व मानते हुए उसकी स्तुति की गई है। अथर्ववेद में जल को लाभकारी बताते हुए कहा गया है कि ‘‘जो जल मरुस्थल में है, जो जल तालाब में है, जो जल घड़े में लाया जाता है, जो जल वर्षा से प्राप्त होता है, ये सभी जल हमारे लिए कल्याणकारी हों। कुओं का जल हमें समृद्धि प्रदान करे। संचित जल हमें समृद्धि दे, वर्षा का जल हमें समृद्धि दे।’’ औषधि के रूप में जल का स्थान चिकित्सा विज्ञान, औषध-शास्त्र और विभिन्न देशों की चिकित्सा पद्धतियों में सर्वाेच्च है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ-साथ, सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसके दर्शन का विस्तार से वर्णन किया गया है। जल समस्त रोगों की औषधि है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो जल स्वर्ण के समान कांतिमान है, अत्यंत सुंदर है, जो पवित्रता प्रदान करता है, जिससे सवितादेव और अग्निदेव का जन्म हुआ, जो सर्वाेत्तम वर्ण वाला और ‘‘अग्निगर्भ’’ है, वह जल हमारे रोगों को दूर करने में सक्षम है; सभी को सुख और शांति की प्राप्ति हो। ऋग्वेद में जल-संस्कृति का निरंतर प्रवाह देखने को मिलता है। ऋग्वेद की जल-संस्कृति और परंपरा का विकास अथर्ववेद में भी परिलक्षित होता है। जल ही एक सुखी और समृद्ध जीवन का आधार है। शतपथ ब्राह्मण में जल को ‘‘आपो वै प्राणाः’’ (जल ही प्राण है) कहकर जीवन के रूप में वर्णित किया गया है। समस्त देवता जल में ही प्रतिष्ठित हैं। देवताओं तक हमारी स्तुतियों को पहुँचाने का माध्यम भी जल ही है।
वस्तुतः, प्रवाहित जल अर्थात् नदी के जल को सर्वाधिक पवित्र मानते हुए, वेदों में नदी जल के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है; क्योंकि नदी ही वह एकमात्र तत्व है जो जीवन के इस पार और उस पार ‘‘दोनों लोकों में’’ विद्यमान रहती है, और मनुष्य को सुख तथा स्वर्ग की प्राप्ति कराती है। यही कारण है कि शास्त्रों में नदी जल को बचाने का आह्वान किया गया है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 14.05.2026 को प्रकाशित)
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चर्चा प्लस | क़त्ल उनका जिन्होंने हमें ज्ञान, ध्यान और जीवन दिया | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
क़त्ल उनका जिन्होंने हमें ज्ञान, ध्यान और जीवन दिया
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह आज जंगल का इलाका तेज़ी से सिकुड़ रहा है। यहाँ तक कि हम अपने घर को बड़ा करने के लिए आँगन में लगे पेड़ भी काट देते हैं। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि हमारे धर्म और संस्कृति के विकास में पेड़ों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह नहीं भूलना चाहिए कि रावण द्वारा अगवा की गई सीता ने अशोक के पेड़ के नीचे ही शरण ली थी। वनवास के दौरान, अर्जुन को अपने गांडीव धनुष को छिपाने और सुरक्षित रखने के लिए शमी के पेड़ में जगह मिली थी। भगवान बुद्ध का जन्म साल के पेड़ के नीचे हुआ था और उन्हें पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। यानी, पेड़ों ने हमारे पूर्वजों को ज्ञान प्राप्त करने के लिए ध्यान करने की जगह दी और उनके हथियारों को सुरक्षित रखकर, भविष्य में उन्हें सुरक्षा प्रदान की। ये वृक्ष ही हैं जो हमें प्राणवायु आक्सीजन देते हैं। हम ऐसे पेड़ों को कटने कैसे दे रहे हैं?
हमारी भारतीय संस्कृति एक गौरवशाली संस्कृति है। हमारे भारत में अनेक ऋषि-मुनि हुए हैं, जिन्होंने हमें ज्ञान दिया और जीवन जीने का सही तरीका सिखाया। भारतीय संस्कृति में जीवन को जिन चार आश्रमों में बांटा गया है - ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम - उनमें से वानप्रस्थ आश्रम में वन में रहने का एक काल निर्धारित है। बचपन और जवानी के बाद, गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को पूरा करने के उपरांत वानप्रस्थ को अपनाना एक परंपरा थी। चाहे स्त्री हो या पुरुष, वे अपनी इच्छा अनुसार वन में चले जाते थे और प्रकृति के सानिध्य में रहते हुए, गृहस्थ जीवन और संन्यास जीवन के बीच एक सेतु (कड़ी) का काम करते थे। वन में रहते हुए भी वे अपने परिवार से जुड़े रहते थे। उनके सगे-संबंधी उनसे मिलने वन तक पहुँचते थे, जिन्हें वे प्रकृति की उपयोगिता, महत्व और उसके संरक्षण का ज्ञान देते थे। यदि हम भारत के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डालें, तो हमें ज्ञात होगा कि वृक्षों ने हमारे देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों को ध्यान-साधना के लिए एक उपयुक्त स्थान प्रदान किया। वृक्षों के नीचे बैठकर ही ध्यान किया जाता था और तपस्या की जाती थी। साथ ही, वृक्ष विश्राम के लिए छाया और अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए स्थान भी प्रदान करते थे।
ऋग्वेद के अनुसार, शमी के वृक्ष में अग्नि उत्पन्न करने की क्षमता होती है; और ऋग्वेद में वर्णित एक किंवदंती के अनुसार, आदिम काल में सर्वप्रथम ‘‘पुरु’’ (जो चंद्रवंशियों के पूर्वज थे) ने शमी और पीपल की टहनियों को आपस में रगड़कर अग्नि प्रज्वलित की थी।
शास्त्रों में पीपल के पेड़ को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इस एक पेड़ को मोक्ष के लाखों-करोड़ों उपायों के बराबर माना गया है। यहाँ तक कि गीता में भी, श्री कृष्ण ने पीपल को सबसे श्रेष्ठ कहा है। भविष्य पुराण में ऐसे कई पेड़ों का उल्लेख है जिन्हें पापकारी माना जाता है। वृक्षायुर्वेद में पेड़ों के औषधीय महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।
वनस्पति जगत में पीपल ही एकमात्र ऐसा पेड़ है जिसमें कीड़े नहीं लगते। यह पेड़ सबसे अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है, जिसे आज विज्ञान ने भी स्वीकार कर लिया है। जिस पेड़ के नीचे बैठकर भगवान बुद्ध ने तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त किया था, वह पीपल का पेड़ ही है; और श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पेड़ों में पीपल सबसे श्रेष्ठ है।
भविष्य पुराण में ही यह बताया गया है कि शीशम, अर्जुन, जयंती, करवीर, बेल और पलाश के पेड़ लगाने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, और पेड़ लगाने वाले के तीनों जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति सौ पेड़ लगाता है, वह ब्रह्मा का स्वरूप बन जाता है; और जो एक हज़ार पेड़ लगाता है, वह विष्णु का स्वरूप बन जाता है। अशोक के पेड़ के बारे में लिखा है कि इसे लगाने से किसी प्रकार का शोक या दुख नहीं होता। घर में अशोक का पेड़ लगाने से अन्य अशुभ पेड़ों के दोष समाप्त हो जाते हैं। बिल्व वृक्ष को श्श्रीवृक्षश् के नाम से भी जाना जाता है। इस पेड़ को अत्यंत शुभ माना जाता है। वास्तव में, इसमें देवी लक्ष्मी का वास होता है और यह लंबी आयु प्रदान करता है। भविष्य पुराण में ही यह बताया गया है कि वट वृक्ष (बरगद) मोक्ष प्रदान करता है, आम का पेड़ मनोकामना पूरी करता है, सुपारी का पेड़ फलदायी सिद्ध होता है, जामुन का पेड़ धन-संपत्ति देता है, बकुल का पेड़ पापों का नाश करता है, तिनिश का पेड़ शक्ति और बुद्धि प्रदान करता है, और कदंब का पेड़ प्रचुर मात्रा में लक्ष्मी प्रदान करता है।
आंवले का पेड़ लगाने से आपको अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि गूलर के पेड़ में भगवान दत्तात्रेय का वास होता है। पारिजात के पेड़ के बारे में बताया गया है कि भगवान कृष्ण इसे स्वर्ग से लेकर आए थे। शास्त्रों में यह कहा गया है कि जो व्यक्ति पेड़ों को काटता है, वह मूक (गूंगा) हो जाता है और उसे अनेक प्रकार के रोग घेर लेते हैं। जो लोग अश्वत्थ (पीपल, वट वृक्ष और श्रीवृक्ष) को क्षति पहुँचाते हैं, उन्हें श्ब्रह्महत्याश् के पाप का भागी माना जाता है। इसी तरह, शास्त्रों में बरगद के पेड़ के बारे में भी विस्तार से बताया गया है। श्वृक्षायुर्वेदश् में कहा गया है कि जो व्यक्ति विधि-विधान से दो बरगद के पेड़ लगाता है, उसे मृत्यु के बाद श्शिवलोकश् की प्राप्ति होती है।
जब हम महाभारत की कथा पढ़ते या सुनते हैं, तो उसमें ‘‘शमी’’ के पेड़ का ज़िक्र आता है। शमी का पेड़ वही है जिसने अर्जुन के ‘‘गांडीव’’ धनुष को आश्रय दिया था। अपने 12 वर्षों के वनवास के बाद, एक वर्ष के ‘‘अज्ञातवास’’ के दौरान, पांडवों ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र इसी पेड़ में छिपा दिए थे जिनमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी शामिल था। कुरुक्षेत्र में कौरवों से युद्ध करने जाने से पहले भी, पांडवों ने अपने सभी हथियार शमी के पेड़ में ही छिपाए थे; उन्होंने उस पेड़ की पूजा की थी और उससे शक्ति तथा विजय की कामना की थी। आज भी भारत के कई क्षेत्रों में, दशहरा के दिन शमी के पेड़ की पूजा की जाती है और जीवन की हर कठिनाई पर विजय पाने के लिए प्रार्थनाएँ की जाती हैं।
शमी शम्यते पापं शमी शत्रु विनाशिनी
अर्जुनस्य धनुर्धारी, रामस्य प्रियदर्शिनी
करिष्यमन्यत्रय यथा कलम सुखं मया
तत्रानिर्विघ्नकत्रित्वं भव श्रीरामपूजिता
अर्थात - हे शमी, तुम पापों को नष्ट करने वाले और शत्रुओं का संहार करने वाले हो। तुम अर्जुन के धनुष को धारण करने वाले हो और श्री राम को प्रिय हो। जिस प्रकार श्री राम ने तुम्हारी पूजा की थी, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी पूजा करता हूँ। मेरे विजय-पथ में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करके मेरी विजय को मंगलमय बनाओ।
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में हुआ था, जब कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने मायके देवदह जा रही थीं; रास्ते में लुम्बिनी वन में एक श्सालश् वृक्ष के नीचे उनका जन्म हुआ। वर्षों बाद, भगवान बुद्ध ने एक ‘‘पीपल’’ वृक्ष के नीचे बैठकर कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप उन्हें ‘‘बुद्धत्व’’ की प्राप्ति हुई। इसीलिए उस पीपल वृक्ष को ‘‘बोधि वृक्ष’’ कहा जाने लगा।
प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को ‘‘वट’’ वृक्ष के नीचे तथा 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी को ‘‘साल’’ वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसी प्रकार, मध्य के 22 तीर्थंकरों को भी अलग-अलग वृक्षों के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। जिन वृक्षों के नीचे बैठकर इन महापुरुषों ने ज्ञान प्राप्त किया था, उन्हें ‘‘केवली वृक्ष’’ कहा जाता था।
ये वे वृक्ष हैं, जिन्होंने हमारे पूर्वजों को ज्ञान-प्राप्ति हेतु ध्यान करने के लिए स्थान प्रदान किया और उनके अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित रखकर भविष्य में उन्हें सुरक्षा प्रदान की। ऐसे वृक्षों को हम भला कैसे कटने दे सकते हैं?
हमारा वातावरण सभी प्रकार की हानिकारक गैसों से भरा हुआ हैए जिनमें कार्बन डाइऑक्साइडए कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड शामिल हैं। सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या और दुनिया भर में कारखानों की बढ़ती संख्या वातावरण में इन हानिकारक गैसों के स्तर को बढ़ा रही है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं और वह शुद्ध और ताज़ी ऑक्सीजन देते हैं जिसकी हमें इंसानों को अपने जीवित रहने के लिए ज़रूरत होती है। पेड़ हमारे पर्यावरण को साफ रखने के लिए अन्य हानिकारक गैसों को भी सोख लेते हैं। यही कारण है कि जिन इलाकों में पेड़ों की संख्या ज़्यादा होती हैए वहाँ प्रदूषण कम होता है।
जंगल वन्यजीवों के लिए आवास का काम करते हैं। पेड़ पक्षियों और जानवरों की कई प्रजातियों को आश्रय देते हैं। इस प्रकारए वे जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। वनों की कटाईए जो आजकल मुख्य चिंताओं में से एक हैए के कारण जैव विविधता का नुकसान हुआ है। जानवर और पक्षी अपना आवास खो रहे हैं और उनके लिए जीवित रहना मुश्किल हो रहा है। शोधकर्ताओं का दावा है कि जैव विविधता के और नुकसान से पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जानवर और पौधे अपनी कई ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक.दूसरे पर निर्भर रहते हैं। ज़्यादा पेड़ लगाने और वनों की कटाई से बचने से जैव विविधता को बढ़ावा देने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हमें अपनी ज़रूरतों के लिए पेड़ों से लकड़ी मिलती है। लकड़ी की किस्मों के साथ.साथ उसमें कई खासियतें भी पाई जाती हैं। लकड़ी के मामले में देवदार के पेड़ सबसे मज़बूत होते हैं। लेकिन ये पेड़ खास तौर पर पहाड़ी इलाकों में पाए जाते हैं। ये पेड़ 3500 से 12000 फीट की ऊँचाई पर पाए जाते हैं। चीड़ के पेड़ की लकड़ी बहुत मज़बूत और कठोर होती है। महोगनी एक ऐसी लकड़ी है जिसका इस्तेमाल फर्नीचरए जहाज़ए वाद्य यंत्रए बंदूक के कुंदे आदि बनाने में किया जाता है। साथ ही, इसकी लकड़ी पानी से खराब नहीं होतीए इसलिए इससे नाव भी बनाई जाती हैं। आबनूस जैसी लकड़ियाँ पानी में डूब जाती हैंए भले ही वे पूरी तरह से सूखी और अच्छी तरह से उपचारित हों, जबकि बोलसा लकड़ी कॉर्क से भी हल्की होती है। चंदन के पौधे को पूरी दुनिया में सबसे कीमती पौधा माना जाता है। भारत में चंदन की कीमत बहुत ज़्यादा है। चंदन का इस्तेमाल बहुत खास चीज़ों में किया जाता है, जिनमें पूजा.पाठ और हवन आदि शामिल हैं।
पेड़ों से मिलने वाली कई चीज़ें हमारे लिए ज़रूरत बन गई हैं, जिसकी वजह से हम पेड़ों की कटाई और उससे पैदा होने वाले खतरे के प्रति लापरवाह हो गए हैं। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि पेड़ों को काटना हमारे अपने जीवन के लिए खतरा है। धरती पर जीवन को बनाए रखने के लिए पेड़ों की कटाई को रोकना बहुत ज़रूरी है। पेड़ों की कमी को पूरा करने के लिए हमें और भी ज़्यादा पेड़ लगाने होंगे। हर किसी को पेड़ लगाने चाहिए और पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देना चाहिए। आखिर यही तो वे वृक्ष हैं जिन्होंने हमें ध्यान, ज्ञान और छाया दी और हम इन्हें निर्ममता से काट कर इनके प्रति कृतघ्न और हत्यारे बन रहे हैं, वह भी अपनी भावी पीढ़ियों तक के भविष्य को दांव पर लगा कर। क्या यह उचित है? ज़रा सोचिए!
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(दैनिक, सागर दिनकर में 06.05.2026 को प्रकाशित)
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