Wednesday, April 8, 2026

चर्चा प्लस | हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य          
- डाॅ (सुश्री) शरद 
सिंह                                                                  
   आज दुनिया जिन सबसे बड़ी समस्याओं का सामना कर रही है, उनमें से एक प्लास्टिक कचरे की समस्या है। इस प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा हमारे घरों से ही निकलता है। यह न केवल प्रदूषण फैलाता है, बल्कि नालियों को भी जाम कर देता है, जिससे बाढ़ जैसी गंभीर स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। यह आवारा जानवरों की जान ले लेता है, और इससे निकलने वाला जहरीला धुआँ इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के लिए कौन जिम्मेदार हैकृमैं, आप, वह (पुरुष), वह (स्त्री) या वे? हम एक-दूसरे पर दोष डालकर बच नहीं सकते, क्योंकि जलवायु हम सभी की साझा संपत्ति हैय इसलिए इसे सही बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। जलवायु परिवर्तन हर इंसान और सभी जीवित प्राणियों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अब हमें यह तय करना होगा कि क्या हम इस धरती पर अन्य जीवित तत्वों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, या फिर इस धरती से जीवन को ही मिटा देना चाहते हैं। एक बार सोचिए, क्योंकि यह कोई विज्ञान-कथा (साईफाई) नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह सच है कि हम प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद नहीं कर सकते, लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस समस्या से निपटने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

जलवायु क्या है? आसान शब्दों में कहें तो, जलवायु किसी खास इलाके में मौसम का लंबे समय तक चलने वाला पैटर्न है। मौसम हर घंटे, हर दिन, हर महीने या यहाँ तक कि हर साल बदल सकता है। किसी इलाके के मौसम के पैटर्न, जिन्हें आम तौर पर कम से कम 30 सालों तक ट्रैक किया जाता है, उस इलाके की जलवायु माने जाते हैं। अगर पूरी धरती का मौसम बदल रहा हैकृजिसे हम जलवायु परिवर्तन कहते हैंकृतो इसका मतलब है कि पिछले तीस सालों में हमने इतनी गलतियाँ और लापरवाही की है कि मौसम में बदलाव सिर्फ किसी एक इलाके में ही नहीं, बल्कि पूरी धरती पर देखा जा रहा है। और भी साफ शब्दों में कहें तो, आज जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसके लिए हम और सिर्फ हम ही जिम्मेदार हैं।

जरा सोचिए कि किसी दिन हमारे पास साँस लेने के लिए साफ हवा, पीने के लिए साफ पानी और खाने के लिए साफ खाना न होय धरती और महासागरों की गर्म सतहों से लावा फूट रहा होय और समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से धरती का जमीनी हिस्सा पानी में डूब गया हो। तो फिर हम क्या करेंगे? हम अपनी जान कैसे बचाएँगे? यह कोई साइंस-फिक्शन कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह हमारे भविष्य के जीवन का वह नजारा है, जिसकी पटकथा हम खुद ही लिख रहे हैं।
हमारी जलवायु हमारी गतिविधियों पर निर्भर करती है। अगर आज वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमने अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाली जहरीली गैसों पर रोक नहीं लगाई। हमने ऐसे वाहनों का इस्तेमाल किया, जिनसे सालों तक जहरीला धुआँ निकलता रहा। हम उन जंगलों को काटते रहे, जिनके पेड़ हवा को साफ करते थे। अगर आज जल प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी वजह यह है कि हमने अपनी गंदी नालियों के पानी को तालाबों और नदियों के साफ पानी में मिलने दिया। हमने फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले कचरे और गंदे पानी को नदियों में मिलने दिया। हमने नदियों से रेत का अवैध खनन करके उनके प्राकृतिक बहाव को बिगाड़ दिया। हमने जमीन में ऐसे जहरीले पदार्थ डाले कि ट्यूबवेल का जमीन के नीचे का पानी भी दूषित होने लगा। पानी बचाने के बजाय, हमने उसे बर्बाद किया। हमने इतनी ज्यादा बर्बादी की कि आज कई जगहों पर पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। अगर जमीन की बात करें, तो हमने जमीन को भी कहाँ बख्शा है? हमने सालों तक अपने खेतों में जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक डालकर मिट्टी की उर्वरता को कम कर दिया है। जमीन को प्रदूषित करने में प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का भी बहुत बड़ा हाथ है। हमने बहुत अधिक औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति की है, लेकिन हमने कचरा निपटान की मूलभूत आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया है।
प्लास्टिक कचरा, या प्लास्टिक प्रदूषण, श्पृथ्वी के पर्यावरण में प्लास्टिक की चीजों (प्लास्टिक की बोतलें और भी बहुत कुछ) का जमाव है, जो वन्यजीवों, वन्यजीवों के रहने की जगहों और इंसानों पर बुरा असर डालता है। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है। यह देखा गया है कि प्लास्टिक कचरे को ठिकाने लगाना एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इसे इकट्ठा करने और अलग करने का सिस्टम ठीक नहीं है। जितना प्लास्टिक बनता है, उसका सिर्फ 60ः ही रीसायकल हो पाता हैय बाकी 9400 टन प्लास्टिक पर्यावरण में ही पड़ा रहता है, जिससे जमीन, हवा और पानी प्रदूषित होते हैं।
हरे रंग के कूड़ेदान गीले और बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए होते हैं, जिसमें रसोई का कचरा, जैसे सब्जियों और फलों के छिलके शामिल हैं। नीले कूड़ेदान प्लास्टिक के रैपर और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे को ठिकाने लगाने के लिए होते हैं। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे प्रदूषण रुकता है और जीवाश्म ईंधन की खपत की माँग कम होती हैय साथ ही, प्राकृतिक संसाधन और ऊर्जा भी बचती है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान दे रही हैं। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है।
प्लास्टिक पर्यावरण को पाँच तरीकों से नुकसान पहुँचाता है। पहला, यह रासायनिक प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक प्रदूषण के माध्यम से भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। प्लास्टिक मूल रूप से तेल और गैस से बनता है। इन गैर-नवीकरणीय संसाधनों की खुदाई से बेंजीन, टोल्यूनि, एथिलबेंजीन, जाइलीन, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और कई अन्य जैसे हानिकारक रसायन उत्पन्न होते हैं। दूसरा, यह माइक्रो-प्लास्टिक बनाता है। माइक्रो-प्लास्टिक अब लगभग हर जगह पाए जाते हैं। ये छोटे कण जलमार्गों, मिट्टी, पौधों, जानवरों और मनुष्यों को प्रदूषित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक के प्रभावों का अभी नया अध्ययन किया जा रहा है। यह देखा गया है कि माइक्रो-प्लास्टिक मिट्टी की गुणवत्ता, उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों और अपघटन के लिए जिम्मेदार छोटे कीड़ों को प्रभावित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक बड़े जानवरों को भी कई तरीकों से प्रभावित करते हैं, जैसे उनके क्छ। को नुकसान पहुँचाना, उनकी वृद्धि को रोकना, प्रजनन अंगों को क्षति पहुँचाना और भी बहुत कुछ।
तीसरा, प्लास्टिक कचरा ऐसे अपशिष्ट के रूप में जमा होता रहता है जो अपने आप विघटित नहीं होता। चैथा, जब यह प्लास्टिक कचरा सीवेज प्रणाली तक पहुँचता है, तो उसे जाम कर देता है। कुछ साल पहले मुंबई में आई बाढ़ का एक मुख्य कारण प्लास्टिक कचरे से जाम हुई सीवेज प्रणाली ही थी।
चौथा, कूड़ेदान में फेंके जाने के बाद, हमारे देश में आवारा जानवर अन्य खाद्य पदार्थों के साथ प्लास्टिक कचरा भी खा लेते हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ खाने से गायों की मौत की घटनाएँ भी सामने आती हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ पचती नहीं हैं और उनकी आँतों में फँसकर उनके लिए जानलेवा साबित होती हैं।
पाँचवाँ, दुनिया के कई देश अवैध रूप से प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंक देते हैं। समुद्री दुनिया में बड़ी संख्या में कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। प्लास्टिक कचरा समुद्री जीवन को भारी नुकसान पहुँचाता है। इस कारण समुद्री तट भी प्रदूषित हो जाते हैं।
देखा जाए तो प्लास्टिक कचरे से पानी, जमीन और हवाकृसभी को नुकसान पहुँचता है। इसीलिए, प्लास्टिक कचरे से बचने का सबसे अच्छा तरीका है प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना। लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक की उपयोगिता हमारे जीवन में इस तरह एक जरूरत बन गई है कि हम इसे पूरी तरह से छोड़ नहीं सकते। इसलिए, यह जरूरी है कि हम अपने इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक कचरे को सही तरीके से संभालना सीखें। तभी हम प्लास्टिक कचरे के बुरे प्रभावों से बच पाएँगे। हाँ, हमें अपने घरों के प्लास्टिक कचरे को अलग रखना चाहिए और उसे नीले रंग के कूड़ेदान में डालना चाहिए, जो इसी काम के लिए बनाया गया है। इससे प्लास्टिक कचरे का निपटारा करने वालों को आसानी होगी और हम प्लास्टिक कचरे के हानिकारक प्रभावों से बच पाएँगे। यह छोटा सा कदम हमें एक बड़े खतरे से बचा सकता है।
नदियों की तरह, हमने समुद्रों और महासागरों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिसके कारण समुद्रों और महासागरों में रहने वाली कई महत्वपूर्ण प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। महासागर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निकलने वाली अधिकांश अतिरिक्त गर्मी को सोख लेते हैं, जिससे महासागरों का तापमान बढ़ रहा है। महासागरों के बढ़ते तापमान का समुद्री प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों पर बुरा असर पड़ता है। बढ़ते तापमान के कारण कोरल ब्लीचिंग होती है और समुद्री मछलियों तथा स्तनधारियों के प्रजनन स्थलों को नुकसान पहुँचता है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में दुनिया ने अपने लगभग 14 प्रतिशत कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) खो दिए हैं। शोध में बताया गया है कि महासागरों का अम्लीकरण, समुद्र के बढ़ते तापमान और अत्यधिक मछली पकड़ना, प्रदूषण, अनियंत्रित पर्यटन तथा खराब तटीय प्रबंधन जैसे स्थानीय दबाव, कोरल पारिस्थितिक तंत्रों के लिए मिलकर एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।
इस समय हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा ग्लोबल वार्मिंग है। ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य से निकलने वाले विकिरण से बचाती है और पृथ्वी के तापमान को संतुलित रखती हैय प्रदूषण के कारण इसे पहुँचने वाले नुकसान से ओजोन परत कमजोर हो रही है और पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसका परिणाम ग्लेशियरों का पिघलना और मौसम में बढ़ती अनिश्चितता है, जिसे हम अभी अपनी आँखों से देख रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण झीलों के जल स्तर में कमी आई है, समुद्र का जल स्तर बढ़ा है, और नदियों तथा वर्षा के पैटर्न में बदलाव आया हैय साथ ही, इसने प्लवक (चसंदाजवद) से लेकर स्तनधारियों तक, सभी जलीय जीवों पर नकारात्मक प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। पिछले 30 वर्षों में क्रिल (छोटे समुद्री जीव) की संख्या में औसतन 80ः की कमी आई है। कोरल ब्लीचिंग (मूंगा विरंजन) में भी भारी वृद्धि हुई है। हमारे देश के जल क्षेत्र में पाई जाने वाली हिंद महासागर मूल की मछलियों की संख्या अब तक 30 तक पहुँच चुकी है। समुद्री कछुओं के प्रजनन क्षेत्र सिकुड़ गए हैं, क्योंकि समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण उनके तटीय आवास नष्ट हो रहे हैं। समुद्री बर्फ के पिघलने या कम होने के कारण, कई समुद्री स्तनधारियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में विकसित किए गए गणितीय कंप्यूटर मॉडलों के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि यदि  कार्बन  की सांद्रता (घनत्व) दोगुनी हो जाती है, तो वैश्विक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। जलवायु की इस बुरी स्थिति के लिए हम सभी जिम्मेदार हैंकृहम सभी का अर्थ है, हम सभी मनुष्य। एक-दूसरे पर दोषारोपण करके हम अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर सकते। लेकिन हम अपनी उन गतिविधियों में सुधार अवश्य कर सकते हैं, जो जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। हमारी गतिविधियों के कारण जलवायु में आ रही गिरावट यह साबित करती है कि हमारी जलवायु का भविष्य हमारे ही हाथों में है अब यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे संवारते हैं या बिगाड़ते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, April 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल गीत संग्रह - तिल के फूल तिली के दाने
कवि - रमेशदत्त दुबे
प्रकाशक - प्रमाण कम्प्यूटर्स, कटरा बाज़ार, सागर
मूल्य - 25/- 
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      रचनाकार पुराना हो जाता है। कालकवलित हो जाता है। वह अपनी अर्थवत्ता भी खो सकता है। किन्तु, उसका सृजन कभी अपना महत्व नहीं खोता है। पुरातन साहित्य की श्रेणी में गिना जाने वाला पंचतंत्र, जातक कथाएं, सिंहासन बत्तीसी, अरब की कहानियां, नाविक सिंदबाद की यात्राएं आदि आज भी उतनी ही रोचक लगती हैं जितनी उस समय के बाल श्रोताओं, पाठकों एवं उनके बड़ों को लगती रही होंगी। उनमें मौजूद शिक्षा आज भी प्रासंगिक है। पुरातन साहित्य अपने सृजन की तिथि के आधार पर पुरातन की श्रेणी में भले ही गिना जाए किन्तु उसकी अर्थवत्ता कभी पुरानी नहीं पड़ती है। जी हां, पुरानी किताबों की भी अर्थवत्ता होती है जैसे ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’। यह बाल गीत संग्रह है। इसके रचयिता रमेशदत्त दुबे अब स्वर्गीय हो चुके हैं किन्तु उनकी अन्य कृतियों की भांति उनके बाल गीतों का यह संग्रह आज भी जब हाथों में आता है तो इसका महत्व स्वतः जागृत हो जाता है। फिर कई वर्षों से आधुनिक बाल साहित्य की कमी को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, विशेषरूप से हिन्दी में। अंग्रेजी में राईम्स के रूप में आयातित बाल काव्य अथवा उन पर आधारित देसी अंग्रेजी बाल काव्य तो उपलब्ध होता रहा है किन्तु हिन्दी का बाल साहित्य सिकुड़ता गया। इसका एक कारण यह है कि आज अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं और दूसरा कारण कि बहुत-सी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया। बाल साहित्य से संस्कारित करने वानी पत्रिकाएं जैसे नंदन, पराग आदि ने कम से कम दो पीढ़ियों को बाल साहित्य से जोड़े रखा था किन्तु अब उस स्तर की पत्रिकाएं नहीं के बराबर हैं। 

रमेश दत्त दुबे सागर शहर के एक ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने फक्कड़पन से जीवन व्यतीत करते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा। उन्होंने उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं लेख भी लिखे। ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ बाल गीत संग्रह है जिसमें उनके 27 गीत संग्रहीत हैं। इन गीतों की विशेषता यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ शिक्षा एवं सांस्कृतिक मूल्य समाहित हैं। इनमें से कुछ गीतों की ध्वनि खेल गीत की है जो बालमन को ऊर्जा का संचार करने में सक्षम हैं। यूं तो मैंने इस संग्रह को उनके जीवनकाल में पढ़ा था किन्तु विगत दिनों मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अंतर्गत बाल साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य पर शहर में चर्चा संगोष्ठी के दौरान रमेशदत्त दुबे जी के सुपुत्र ने इस बाल गीत संग्रह की प्रतियां आयोजन में वितरित कीं, जिससे एक बार फिर यह पुस्तक दृष्टि से गुज़री। एक बार फिर संग्रह की कविताओं को पढ़ने का सुअवसर मिला। वस्तुतः होता क्या है कि हम अपने जीवन में इतने व्यस्त होते जाते हैं कि पुस्तक का स्वरूप और नाम तो स्मृति में रहता है किन्तु कई बार उसका कलेवर धुंधला पड़ता जाता है। पुस्तक भी अन्य नवीन पुस्तकों के नीचे दबती चली जाती है। किन्तु जब कभी वह पुस्तक पुनः सामने आती है तो उसके स्वरूप और नाम की स्मृति के साथ उसका कलेवर भी पुनः ताज़ा हो जाता है। तब हमें लगता है कि यह तो अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है तथा इसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों है। इसका कारण यह है कि इसके गीतों को समय की नब्ज़ पर उंगली रख कर लिखा गया है।

        इस संग्रह का प्रथम गीत है ‘‘मुनिया’’। यह गीत उस परिस्थिति पर आधारित है जिसमें माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और नन्हीं मुनिया जैसी बेटी घर में अकेली अपनी कल्पनाओं के अनुरुप खेल रचाा कर मन लगा रही है। इस गीत को पढ़ कर जहां बड़े एकाकी बालमन की दशा को समझ सकते हैं वहीं बच्चे अपना समय खेल-खेल में व्यतीत करने का गुर सीख सकते हैं। इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए -
मुनिया ने देखा, आज पापा नहीं हैं 
मुनिया ने पाया, आज माँ भी नहीं हैं
मुनिया ने पाया, घर बिल्कुल सूना छुआ 
उसने वह सब, मना जिसको छूना
औरत की फोटो में मूंछें लगाई 
राजा की फोटो में पूंछें लगाई
कहा उसने वह सब, जो था उसको कहना 
सुना उसने सब कुछ, जो था उसको सुनना
गाना भी गाया, नची, कूदी-फांदी 
गुड्डा और गुड़िया की, कर डाली शादी
छोटी सी मुनिया को बहुत सा काम है 
दिन हो या रात, चैन न आराम है
़़़़़़़हाथी-घोड़ा-पालकी
हाथी, घोडा, पालकी 
बातें हैं उस काल की 
मोटर, साइकिल, प्लेन की 
बातें हैं इस काल की
बच्चों की कल्पना में आज शेर, भालू से कहीं अधिक मोटर, साइकिल, प्लेन कौंधते हैं। यही टीवी आदि के चलित दृश्यों में उनकी नन्हीं आखों के आगे होते हैं तथा यही खिलौनों के रूप में उन्हें मिलते हैं। अतः गुड़िया के विवाह जैसे पारंपरिक खेल के साथ आधुनिक वस्तुओं को जोड़ कर गीत लिखने से गीत की समसामयिकता बढ़ गई है। 
संग्रह में ‘‘कहानी’’ शीर्ष से भी एक गीत है जिसमें छोटी-छोटी तुकबंदी और सहज शब्दों के साथ मनोरंजन है। यह गीत सहज ही बच्चों की जुबान पर चढ़ जाने का गुण रखता है। गीत का एक अंश-
आमोती - दामोती रानी
अंधी भूरी कहे कहानी
एक कहानी दादी कहती
एक कहानी नानी
एक कहानी हरबोलों की, 
खूब लड़ी मरदानी
अमोती-दामौती रानी

बुंदेलखंड का एक पुराना खेल गीत है जो आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है, जहां पारंपरिक ग्रामीण खेल खेले जाते हैं। यह खेल गीत है ‘‘पो संपा भई पो संपा’’। यह गीत संवादनात्मक है। एक बच्चा उसे प्रश्न के रूप में गाता है तो शेष बच्चे उसका उत्तर देते हैं। इस पारंपरिक गीत को आधार बना कर राजा-रानी के स्थान पर रेलगाड़ी और रेलमपेल जैसे उपमान रखे गए हैं जिससे यह बच्चों के लिए अधिक दृश्यात्मक हो जाता है। उदाहरण देखिए- 
पो संपा भई पो संपा 
पो संपा ने क्या किया ?
पो संपा ने रेल बनाई 
रेल बनाकर खूब चलाई 
अब तो रेल में जाना पड़ेगा 
लटके, बैठे, खड़े-खड़े 
साथ चलेंगे पेड़ खड़े 
छुक-छुक करती चलती 
रेल डिब्बों में है रेलमपेल 

संग्रह का शीर्षक गीत ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ प्रकृति और जीवों से मिलाता है। इस गीत का अपना अलग ही सौंदर्य है तथा अलग ही रसात्मकता है। 
तिल के फूल, तिली के दाने 
खिलते फूल लगे मुरझाने 
सूरज घबराया-घबराया 
चिड़ियों ने गाना न गाया
बिल्ली बोली-न खेलूंगी 
चुहिया बोली-न दौडूंगी 
घोड़ा बैठ गया था थककर 
मछली बैठी जल में छुपकर 
चिडियों ने गाना न गाया
शेर न था बिल्कुल गुर्राया 
- अर्थात एक नन्हा-सा तिल का फूल यदि मुरझा जाए तो पूरी प्रकृति और जीव-जन्तु उदास हो जाते हैं। इसलिए फूलों और पौधों की देखभाल करना चाहिए, उन्हें मुाझाने नहीं देना चाहिए। यही तो वह शिक्षा है जो खेल-खेल में, पांव के पंजो पर बिठा कर झूला झूलाते हुए, गीत गाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दे दी जाती थी। आज माता-पिता भौतिकता की दौड़ में इस तरह उलझ गए हैं कि उन्हें न तो स्वयं इस प्रकार के गीत याद हैं और न वे स्वयं गीत रच पाते हैं। वे अपने बच्चों को डिजिटल मीडिया के हवाले छोड़ कर उनके प्राकृतिक बचपन की आकांक्षा करते हैं जो पूरी तरह संभव नहीं है। दरअसल इस प्रकार के गीत ही है जो पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवेदना, आत्मीयता एवं ज्ञान के तार जोड़ते हैं। इसीलिए स्वर्गीय रमेशदत्त दुबे जी का यह बाल गीत संग्रह ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ आज भी गहरी अर्थवत्ता रखता है। आज के युवा माता-पिता को स्वयं ऐसे गीत पढ़ने चाहिए तथा अपने बच्चों को स्वयं सुनाने चाहिए। इस दृष्टि से यह पुस्तक सदा प्रासंगिक बनी रहेगी।  
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Monday, April 6, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह "नारी शक्ति सम्मान 2026" से पत्रिका द्वारा सम्मानित

साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए मुझे "नारी शक्ति सम्मान 2026" से कल दोपहर (05.04.26 को) सम्मानित किया गया....खुरई विधानसभा के विधायक एवं पूर्व मंत्री भाई भूपेंद्र सिंह तथा विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलपति भाई अनिल तिवारी जी के कर कमलों से सम्मान प्राप्त करना सुखद लगा... अवसर था 
राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण पत्रिका द्वारा  विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को "पत्रिका नारी शक्ति सम्मान 2026" से सम्मानित किया गया... पत्रिका सागर संस्करण के संपादक नितिन त्रिपाठी जी पत्रिका परिवार के श्री उदय गौतम जी, श्रीमती रेशु जैन जी आदि सभी का हार्दिक आभार 🌹🙏🌹
होटल दीपाली के क्रिस्टल हॉल में आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम के दौरान अपनी बहनों से सुखद भेंट भी हुई।

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Saturday, April 4, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | बड़े पते की आएं जे कहनातें, इनें छुड्डा में गठियां लेओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
बड़े पते की आएं जे कहनातें, इनें छुड्डा में गठियां लेओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

  मार्च को मईना लगत साथ ऐसी गरमी परन लगी रई मनो मई को मईना आ गओ होए। कछू नई तो पूरो मईना तपो। बस, अखीर-अखीर में नाएं-माएं पानी गिरन लगो। बा जोन मोसम बिभाग वारे कैत आएं ने के गरज के संगे छींटें परहें, सो, ऐसोई कछू होन लगो। ई टाईप से मोसम बदले में तबीयत सोई बिगरन लगत आए। ऊंसई देखो जाए तो मार्च औ अप्रेल को मईना चैत औ बैसाख कहाउत आएं, जोन के लाने घाघ औ भड्डरी ने खींब पते की कहनातें कईं आएं। जेसे चैत के लाने उन्ने खाबे-पीबे को सई हिसाब बताओ आए के का खाओ चाइए औ का नईं खाओ चाइए - 
चैते गुड़, बैसाखे तेल, 
जेठे महुआ, आषाढ़े बेल 
- मने चैत में गुड़, बैसाख में तलो-फुलो, जेठ के मईना में महुआ औ असाढ़ मईना में बेल नईं खाओ चाइए। जेई के संगे घाघ कैत आएं के का खाओ चाइए जोन से सेअत सही रए-
चैत मास में नीम सेवती,
बैसाखहि में खाय बासमती
- मने चैत में नीम की नईं-नईं पत्तियां खाए से औ बैसाख में बासमती घांई बिना मांड़ को भात खाए से सेअत अच्छी रैत आए।
     बाकी घाघ औ भड्डरी ने मोसम के लाने सोई कओ आए के-
चैत मास दसमी खड़ा, जो कहुं कोरा जाइ।
चौमासे भर बादरा, भली-भां‍ति बरसाइ।।
- मने चैत मईना के शुक्ल पक्ष की दशमी को जो बदरा ने छाएं तो पूरे चौमासे झमाझम पानी बरसत आए।  मनो उतई जो-
जब बरखा चित्रा में होय
सगरी खेती जावै खोय
- मने जो चित्रा नक्षत्र में पानी बरस गओ तो समझो सगरी खेती चौपट। सो, इन कहनातों को फिजूल ने मानियो, जे सेअत ठीक राखबे औ मोसम की दसा समझबे को गुर बताउतीं आएं। अगली दफा कछू औ कहनातें बताबी,जो लौं इनें छुड्डा में गठियां लेओ। राम-राम !
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, April 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे चिल्लम-चिल्ली कभऊं बंद हुइए के नईं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जे चिल्लम-चिल्ली कभऊं बंद हुइए के नईं ? 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    मैं और भौजी बैठी बतकाव कर रई हतीं, इत्ते में भैयाजी आ पौंचे औ उनके संगे खाना पकाबे की गैस को सिलेंडर वारो हतो।
‘‘अई गजब! आपने तो मैदान मार लओ, भैयाजी! ई टेम पे सिलेंडर को जुगाड़ सबसे बड़ो जुगाड़ आए।’’ मैंने भैयाजी की तारीफ करी।
‘‘ने कछूं, तुम तो ऊंसईं भाव दे रईं।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘नईं। हम सांची कै रए। ई टेम पे जबे सिलेंडरन की मारा-मारी चल रई, ऐसे में भरो सिलेंडर घरे ले आने से बड़ों कोनऊं काम नईं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, जोन तुम समझ रईं, बा कछू नईं आए। जे सिलेंडर वारे भैया तो हमें दोरे के चार कदम उते पे मिल गए। सो हम ओरे संगे चले आए। मनो हमने दो दिनां पैले नंबर लिखाओ रओ औ जा गैस खुदई से हमाए इते आ गई आए। मनो मारा-मारी हुइए, लेकन हमाई ई ऐजेंसी में तो नइयां। ने तो जे भैया कां से चले आउते सिलेंडर पौंचाबे के लाने?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, हमाए इते ऐसो कछू नइयां। अबे तो मुतके सिलेंडर गोडाउन में आएं। बाकी जो कोनऊं जे चाए के बिना नंबर लिखाए ऊको सिलेंडर मिल जाए सो बा नईं हो रओ।’’ बा सिलेंडर वारो अपने माथा से पसीना पोंछत भओ बोलो। 
‘‘ने पूछो भैया, बड़ी गदर मची आए। जो टीवी पे, ने तो माबाईल पे देख लेओ तो ऐसो लगत आए के मानों लड़ाई इतई छिड़ी जा रई।’’ बा सिलेंडर वारे से भौजी बोलीं।
‘‘अरे बे पगला हरें। बे तो ऐसे बखानत आएं जैसे बे ईरान वारों के गोदी में बैठे होंए के ट्र्म्प के पलकां पे डरे होंए। मनो दोई उनई से पूछ-पूछ के मिसाइलें छोड़ रए हों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, कलई सो हम मोबाईल पे देख रए हते एक जने कै रआ हतो के ईरान ने घनों दोंदरा दे रखो आए औ घंटा भर बाद बोई आदमी कैत मिलो के अमेरिका ने ईरान खों माटी में मिलाबे की ठान रखी आए। मोए तो समझ नईं परत के बा कोन की तरफी आए?’’ बा गैस सिलेंडर वारो जात-जात बोलो। 
‘‘जे आजकाल के चैनल वारे कोनऊं के सगे नोंई। इने तो अपनी टीआरपी बढ़ाबे की परी रैत आए। फेर ऊके लाने कछू बी अल्ल-गल्ल बकने होए सो बकत रैत आएं। जरूरी बात पे उनको मों खोलत नईं बनत।’’भैयाजी बोले।
‘‘अरे, भैयाजी! मोए जरूरी बात पे बोलबे पे से याद आई के अबे मैं बा जलसेवा के उद्घाटन में गई रई।’’ मैंने कई।
‘‘कोन सी जल सेवा?’’ भैयाजी ने टोंकत भए पूछी।
‘‘अरे बोई जोन हरेक साल श्रीराम सेवा समिति वारे करत आएं। सागर के रेलवे स्टेशन पे सबरे यात्रियन खों मुफत में ठंडो पानी पिलाबे को पुन्न काम। बा ऊके अध्यक्ष मोरे लोहरे भैया डाॅ विनोद तिवारी आएं। बे सोई सांझ-संकारे एक करत रैत आएं। सो, उते का भओ के उद्घाटन के लाने आए हते समाजवादी चिन्तक दादा रघु ठाकुर जू औ भैया रमाकांत यादव जू जोन पिछड़ावर्ग आयोग वारे ठैरे। सो रमाकांत यादव भैया ने अपने भाषन में बड़ी पते की बात कई। बे बोले के जे जो रुपैया को चलन बंद करत जा रए ऊके लाने कछू करो चाइए। मोए उनकी जा बात भौतई पुसाई। काए से जोन को डिजिटल रुपैया से काम करत बनत आए उनके लाने तो कछू नईं, कोनऊं परेसानी नोंई, बाकी जोन खों ढंग से मोबाईल चलाउत नईं बनत, ने तो ऊके लिंगे सस्तो सो बटन वारो मोबाईल आए, बा बिचारो का करहे? जो कोऊ नईं सोचत। सबखों ईरान औ अमेरिका की लड़ाई की ऐसी परी के मनो बे दोई इतई तिगड्डा पे लड़ रए होएं।’’ मैंने कई।
‘‘सई कई उन्ने। जा बाकई भौत बड़ी वारी समस्या आए। पर कोनऊं खों ऊकी परी नईयां।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, औ तनक औ करबे की चली तो बे बाई, का नांव ऊको?? अरे हऔ बा फिलम वारी बाई, बा राहुल गांधी के लाने कछू ने कछू बकन लगत आए। जीसें फालतू के बातकाव चलत रए औ काम की बात ने होने पाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, बा सब पब्लिक को ध्यान भटकाबे को काम चलत रए। पब्लिक फजूल की गिरगिटर करत रएं, काम की बात सोंचे बी नईं। मनो बा तो पब्लिक बी अब समझन लगी आए, लेकन जा लड़ाई खों ले के जा कमी, बा कमी की कैबे में का रखो? जित्तों को संकट नोंई, उत्ते को दोंदरा देत फिर रए। जा सई आए के तनक चौकन्ने रओ, फिजूलखर्ची ने करो सो कछू फरक नईं परने।’’ मैंने कई।   
‘‘हम तो कैत आएं के जे जो जित्ते टीवी पे कांव-कांव करबे वारे चैनल आएं, सब खो बंद कर दओ जाए। कम से कम तब तक के लाने जब तक जे जो लड़ाई चल रई।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘अब का कओ जाए भौजी! आजकाल कछू औरई दिमाग चल रओ लोगन को। अब आपई देख लेओ के एक फिलम आई ‘धुरंधर’। मोए बा तनकऊ ने पुसाई काए से के ऊमें भर-भर के गालियां हतीं। मनो भौत से लोगन खों बा भौतई पुसाई। सबने ऊकी खूबई तारीफ करी। उतई एक फिलम औ आई ‘‘केरला स्टोरी’’। बा हती तारीफ करबे जोग, मनो ऊपे बोले में लोग डरात दिखे। जबके ‘केरला स्टोरी’ में लव जिहाद को कच्चो चिट्ठा रओ। ऊपे भौतई कम बात करी लोगन ने। सो, आजकाल कछू कैबो मुस्किल आए के कोन का चा रओ?’’ मैंने कई।
‘‘सो तो सई कई!’’भैयाजी बोले।
‘‘औ तनक जे देखो के राशन की दुकान पे राशन लेत समै उंगलियन को निसान लेबे को नियम कर दओ, मनो बोट डालत समै काए नईं फिगर प्रिंट लेत आएं? ईसे एकऊ गलत बोट ने पड़ पाहे। काए सई कई के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कई तो सई तुमने, मनो तुमाई को सुन रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे तुम ओरें कां की ले के बैठ गए? हम तो सिरफ इत्तई कै रए हते के जे लड़ाई खों ले के बेफालतू की चिल्लम-चिल्ली ने करी जाए। काए से ईसे डर सो फैलत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘तुम जे डर की कै रईं? औ बा जोन जो सीरियल में दिखा रए बसीकरण औ चुड़ैल को साया सो बो का आए? ऊको काए नई रोको जात आए? जोन जो पढ़े-लिखे आएं बे सोई ई सब के बारे में सोचन लगे अब तो। अभईं कल मोए मास्साब जी मिले सो कैन लगे के उनके मोड़ा खों कोनऊं ने नजर लगा दई आए जोन से बा बीमार डरो आए। सो हमने उनसे गई के आप तो पढ़े लिखे आओ, आप सो ऐसो ने बोलो। कछू गलत खा पी लओ हुइए आपके बालक ने सो ऊकी तबीयत बिगर गई। सो जे तो हाल आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, जेई तो हम कै रए के जोन जे चिंचियात रैत आएं औ अंधबिस्वास फैला रए, इन ओरन पे पाबंदी लगो चाइए।’’ भौजी बोलीं। 
भौजी कै तो सई रई हतीं, मनो उनकी कोऊ सुन ले सो अच्छो, ने तो टीवी चैनल वारे अपनी टीआरपी की चकिया में ऐसई पीसत रैंहें। कैबे खों प्राईम टाईम औ कऊं किले को भूत के बारे में बताहें तो कहूं कोनऊं चमत्कार के बारे में।  
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के फिजूल की चिल्लम-चिल्ली करबे वारे चैनलों पे रोक लगने चाइए के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, April 1, 2026

चर्चा प्लस | राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस : हनुमान जन्मोत्सव विशेष:   
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                       

                           
     हनुमान देवत्व का वानर रूप हैं जो मनुष्य के भीतर आत्मबल का संचार करते हैं तथा उन्हें संकट से उबरने में सहायता करते हैं। हनुमान जी का हिंदू धर्म और संस्कृति में अत्यंत उच्च और पवित्र स्थान है। उन्हें शक्ति, भक्ति, ज्ञान, और निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और भगवान श्री राम के सबसे अनन्य भक्त हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा 1 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से लेकर 2 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 41 मिनट तक रहने वाली है अतः उदया तिथि के चलते हनुमान जन्मोत्सव का त्योहार 2 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दुखों और कष्टों को दूर करने वाला। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की हर तरह की बाधा दूर होती है और व्यक्ति को निडरता प्राप्त होती है। वे नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और भय से रक्षा करते हैं अर्थात वे आत्मबल का विकास करते हैं।

भगवान हनुमान, जिन्हें अंजनेय, पवनपुत्र, केसरीनंदन और राम भक्त हनुमान के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में अटूट भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय सेवा भावना के प्रतीक हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा का उल्लेख शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में मिलता है। हर साल चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में इसी दिन बजरंगबली के जन्म का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और रुद्र के 11वें अवतार हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने धरती पर धर्म स्थापना के लिए जब रामावतार लिया तो हनुमान उनके सहायक बनकर बजरंगबली के रूप में धरती पर आए थे।
शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शिव ने भी उनके साथ पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से वानरराज केसरी और माता अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। माता अंजना को यह वरदान था कि उनके पुत्र को पवन देव का विशेष आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 37) में वर्णन है-“भगवान शंकर ने अपने अंश से रुद्र रूप में वानर स्वरूप में जन्म लिया। माता अंजना ने कठिन तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया, तब महादेव ने रुद्रांश के रूप में जन्म लेकर हनुमान स्वरूप धारण किया।”
यह जन्मकथा इस प्रकार है कि समुद्रमंथन के बाद जब भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने को कहा था जो उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को दिखाया था। उनकी बात का मान रखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु का आकर्षक रूप देखकर शिवजी आकर्षित होकर कामातुर हो गए और उन्होंने अपना वीर्य गिरा दिया। जिसे पवनदेव ने शिवजी के वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इस तरह माता अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ। उन्हें शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी हनुमान जी के जन्म की कथा विस्तार से मिलती है- माता अंजना, एक अप्सरा थीं, जो ऋषि के श्राप से  राजा कुंजर की इच्छानुसार रूप धारण करने वाली पुत्री  के रूप में  कपि योनि में जन्मी थीं। एक दिन जब वे मानवी स्त्री का रूप धारण कर के एक पर्वत शिखर पर विचार रही थी द्य तब उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी जिसे वायुदेवता ने धीरे से हर लिया और काम से मोहित होकर उन्होंने अंजना का अव्यक्त रूप से आलिंगन कर लिया। पतिव्रता होने के कारण अंजना तुरंत ही समझ गई और बोली “कौन मेरे इस पतिव्रत का नाश करना चाहता है?“ तब पवन देव ने उत्तर दिया कि “मैं तुम्हारे पतिव्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। मैंने मानसिक संकल्प से तुम्हारे साथ समागम किया है जिससे तुम्हे बल पराक्रम से संपन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा।”
फिर एक दिन पवन देव के आशीर्वाद से उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। जन्म के बाद, हनुमान जी को असीमशक्ति, वेग और बल प्राप्त हुआ। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 -20 ) में वर्णन है- “वानरराज केसरी की पत्नी अंजना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जो महाबली, महातेजस्वी और अत्यंत बुद्धिमान था। पवन देव की कृपा से जन्म लेने के कारण उसे ‘पवनपुत्र’ कहा गया।”
एक और कथा है हनुमान जी के जन्म की- एक बार की बात है अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने के बाद राजा दशरथ ने प्रसाद रूपी खीर को अपनी तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को बांट दिया। तभी वहां एक कौवा आया और खीर का एक भाग लेकर उड़ गया। उड़ता हुआ वह उस जगह पहुंच गया, जहां अंजनी पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रही थीं। यह सब शिव और वायुदेव के इशारे पर हो रहा था।
अंजनी ने देखा कि कौवा खीर लेकर आया है। अंजनी को लगा कि यह शिवजी की कृपा है। उन्होंने खीर को पी लिया और इसी प्रसाद से उन्होंने एक बलवान पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र पवनदेव का था। अंजनी के पति वानर राज केसरी थे। इसलिए अंजनी के पुत्र को पवनपुत्र और केसरी नंदन दोनों नामों से जाना गया।
हनुमान जी के जन्म की कथा एक और रूप में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार शिव जी के उस वरदान से जो उन्होंने राजा केसरी और माता अंजना को दिया था. दरअसल एक बार राजा केसरी और माता अंजना ने शिव जी की कठिन तपस्या की, जब दोनों की तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए तो उन्होंने माता अंजना और केसरी से वरदान मांगने को कहा. जिस पर माता अंजना ने कहा कि -‘‘हे भोलेनाथ, हमें एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो बल में रुद्र, गति में वायु और बुद्धि में गणपति के समान तेजस्वी  हो।’’ माता के वचनों से खुश होकर शिव जी माता को वरदान दिया और अपनी रौद्र शक्ति को पवन देव के रूप में यज्ञ कुंड में समाहित किया और उत्पन्न शक्ति को माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। जिस वजह से हनुमान जी का एक नाम पवनपुत्र भी हुआ। शिव शंकर की कृपा से अंजना गर्भवती हो गईं और चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन मंगलवार को भगवान रूद्र के 11वें अवतार के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी जन्म से ही बल, बुद्धि और विद्या में निपुण हैं।
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
बजरंग बली जब छोटे थे तब उन्हें बहुत भूख लगती थी। एक बार उन्होंने अपनी मां अंजनी से खाने के लिए मांगा। अंजनी तब कुछ काम कर रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि बाहर जाओ और फल खा लो। जितने भी पके हुए फल हैं, वो खाने योग्य हैं। बजरंग बली भूख से व्याकुल हो रहे थे। वे बाहर गए और फल खाने लगे। तभी उन्हें आसमान में उन्हें चमकता हुआ सूरज दिखाई दिया। बजरंग बली को लगा कि यह भी एक फल है। उन्होंने अपनी शक्ति से लंबी छलांग लगाकर सूर्य के पास पहुंच गए और उसे अपने मुंह में रख लिया। बजरंग बली की इस हरकत से धरती पर अंधेरा छा गया। इंद्रलोक तक हाहाकार मच गया। तब सभी देव इंद्र के पास गए और कहा कि एक वानर ने सूर्यदेव को अपने मुंह में रख लिया है। सभी देवों ने इंद्रदेव से इस समस्या का हल निकालने की विनती की। तब इंद्रदेव आए। उन्होंने वज्र लहराया और बजरंग बली की ठोड़ी पर प्रहार कर दिया। बजरंग बली बेहोश होकर गिर पड़े। उनके जबड़े पर चोट लग गई। इंद्र के इस कदम से पवन देव नाराज हो गए। तब इंद्र ने हनुमान को फिर से होश में लाए। ठोड़ी को हनु भी कहते हैं। मान का अर्थ विरूपित होता है। इस तरह बजरंग बली का नाम हनुमान पड़ गया।
अतुलित बल धामा क्यों कहा गया?
हनुमान जी का बल असीम, अतुलनीय और अपरिमित है, जिसे शब्दों में नहीं मापा जा सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 10,000 इंद्रों का बल हनुमान जी के शरीर के एक रोम (बाल) में निहित है। वे ‘‘अतुलितबलधामा’’ (अतुलनीय बल के धाम) कहे जाते हैं, जिनकी एक दहाड़ से तीनों लोक काँप उठते हैं। हनुमान चालीसा की दूसरी चैपाई में हनुमान जी को श्अतुलित बल धामाश् कहा गया है, जिसका अर्थ है - ‘‘अतुलनीय (जिसकी तुलना न की जा सके) शक्ति के निवास स्थान’’। उन्हें यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असीम शक्ति के स्वामी हैं।
इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं कि उन्हें बचपन में ही कई देवताओं से वरदान प्राप्त थे। इंद्र ने उन्हें वज्र के समान शरीर का, अग्नि ने निर्भयता का, और पवन देव ने वायु के समान वेग का आशीर्वाद दिया था। असीम शारीरिक शक्तिरू उन्होंने समुद्र को लांघकर लंका जाना, संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत उठा लाना, और युद्ध में राक्षसराज रावण की सेना को धूल चटाने जैसे कार्य किए, जो साधारण बल से परे हैं। वे ‘‘रामदूत’’ हैं और उनका मानना है कि उनका बल उनका अपना नहीं, बल्कि उनके हृदय में निवास करने वाले प्रभु राम का है। वे बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र और अहंकार शून्य हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधि का वरदान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो स्वयं शक्ति का रूप हैं।
हनुमान को संकटमोचन क्यों कहा गया?
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकटमोचन के नाम से क्यों जाना जाता है?
जब रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता माता का हरण किया था तो हनुमान ने ही उन्हें ढूंढ़कर अपने स्वामी श्रीराम को उनका पता बताया था। हनुमानजी हे श्रीराम का दूत बनकर रावण के पास गए थे और जब रावण ने उन्हें पकड़ लिया था तो वो अपनी बहादुरी से लंका में आग लगाकर बच निकलें थे। उन्होंने भगवान राम के वनवास काल में उनके मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं और संकटों को दूर कर अपनी सच्ची भक्ति का प्रमाण दिया था। हनुमानजी ने श्रीराम की रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने में बहुत सहायता की थी। सीता माता अपने रामजी के लिए हनुमानजी की स्वामी भक्ति और प्रेम को देखकर प्रसन्न हो उठी थीं और उन्होंने बजरंगबली को अमरता का वरदान दिया। अजर-अमर का वरदान पाकर बजरंगबली हनुमान निस्वार्थ भाव से अपने भक्तो की रक्षा करके उन्हें सभी संकटो से बचते हैं और इसलिए उन्हें संकट मोचन महाबली हनुमान के नाम से जाना जाता हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 01.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 31, 2026

पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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    बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति  और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश  में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने  के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने  की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”

संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”

  डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”

    गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल  सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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