Tuesday, July 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - लोक मिथक : मूल्य और सौंदर्य दृष्टि
लेखक    - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक - विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य        - 450/-
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आज लोक संस्कृति संग्रहालयों की वस्तु बनती जा रही है। वर्तमान भौतिकवाद के लिए लोक संस्कृति भी एक बाज़ार की एक वस्तु है। वस्तुतः बाजार की संस्कृति ने लोक संस्कृति को भी बाजार की वस्तु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। घर की बैठक में वर्ली आर्ट या मधुबनी कलम की पेंटिग लगा लेना ही संस्कृति को सहेजना नहीं होता है। लोक संस्कृति को सहेजने के लिए सबसे पहले जरूरी है लोक संस्कृति के स्वरूप को समझना। यह समझना आवश्यक है कि लोक संस्कृति मात्र एक शब्द नहीं है, यह एक समृद्ध परम्परा है जो विचार, शिल्प कथा, आस्था आदि विविध रूपों में उस समय से प्रवाहित है जब दुनिया में संस्कृतियों का विधिवत उद्भव ही नहीं हुआ था। लोक संस्कृति वस्तुतः मौलिक चेष्टाएं हैं जो कभी अभिव्यक्ति के माध्यम से तो कभी कला, कल्पना और आस्था के माध्यम से व्यक्त होती रही हैं। लोक संस्कृति पर एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’। इसके लेखक है प्रतिष्ठित संस्कृतिविद डॉ. श्यामसुंदर दुबे।


लोक संस्कृति में मिथक की उपस्थिति के संबंध में डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने लिखा है कि ‘‘लोक-संस्कृति, मानवीय सौंदर्य चेतना का अक्षय स्रोत है। निःसर्ग और मनुष्य के सह समायोजन से अभिव्यक्त होने वाली लोक संस्कृति अपनी सामाजिकता में उदार आशयों वाली है। उसकी नैतिकता वैश्विक परिदृश्य में सृष्टि के समुचित संरक्षण से आविर्भूत है। लोक संस्कृति जितना मनुष्य को संरक्षणीय मानती है, उतना ही संरक्षणीय वह प्रकृति के प्रत्येक अंग को संरक्षणीय मानती है उसकी अभेद दृष्टि सर्वत्र सभी संदर्भों में एक ही चैतन्य को तलाशती है। यही वजह है कि उसमें मानवीय अंतर्दृष्टि के आलोक को हम प्रत्येक रचना-विधान में प्राप्त करते हैं।’’


लोक संस्कृति की अपनी अलग पहचान एवं विशेषता होती है इसका संबंध किसी देश व क्षेत्र विशेष के सामान्य जन समुदाय से होता है समाज में प्रचलित विभिन्न क्रियाकलाप परंपराएं अचार-विचार, संस्कार, प्रथाएं कर्मकांड, आस्था एवं विश्वास - लोक संस्कृति के आधारभूत तत्व हैं। संस्कृति व्यक्ति एवं समाज के विकास का परिचायक होती है। लोक जीवन इसी संस्कृति का अक्षय भंडार है। लोक संस्कृति समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को आकार देती है। लोक संस्कृति विविधरूपों में आकार लेती रहती है। जैसे- लोक भाषा, लोक परंपरा, लोकनाट्य, लोकगीत, लोककला आदि। लोक परंपराओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के व्रत, त्यौहार, प्रथाएं, मेले, रूढ़िया एवं संस्कार आते हैं, जिनके द्वारा समाज में उत्साह एवं विश्वास बना रहता है। लोक साहित्य लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति है यह प्राय अलिखित रहता है तथा वाचक परंपरा के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक प्रवाहित होता है। लोक साहित्य परिभाषित भाषा शास्त्रीय रचना पद्धति एवं व्याकरणिक नियमों से रहित होता है, इसकी भाषा लोक भाषा होती है लोक साहित्य के अंतर्गत लोक गाथा, लोकगीत, लोक कथाएं, सुभाषित, पहेलियां, लोकोक्तियां, लोकनाट्य आदि आते हैं।


लेखक श्यामसुंदर दुबे ने अपनी पुस्तक ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’ में लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए विस्तार से लोक के स्वरूप को सामने रखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक के कलेवर को मुख्य तीन शीर्षकों एवं 25 लेखों में विभक्त किया है। ‘‘लोक-संस्कृति: विमर्श के नए आयाम’’ शीर्षक से दी गई भूमिका के उपरांत तीन मुख्य शीर्षक हैं- मिथकीय संरचना का संसार, जीवन-मूल्यों के आधार तथा कला-दृष्टियों का समाहार। इन तीन मुख्य शीर्षकों अथवा खंडों के अंतर्गत जो पच्चीस लेख हैं उनके मिथकीय संरचना का संसार के अंतर्गत हैं- लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध, भाषिक संरचना और लोक आख्यान, लोक आख्यान और आज का लेखन-कर्म, मिथक संरचना के आधारभूत बिंदु, लोक चित्र परंपरा के मिथकीय आधार, लोक-संस्कृति की भूमि पर लोक-विश्वासों की हरी दूब, लोक-प्रतीकों की अवधारणा, लोक-परंपरा और लोक-संस्कार, आदिम चित्रकला अभिप्रायों का संसार।
जीवन-मूल्यों के आधार के अंतर्गत हैं- लोक संस्कृति: मानव संसाधन का आधार, मानवीय मूल्य और लोक-साहित्य, लोक-साहित्य की मूल्य-चेतना, लोक-साहित्य: जीवन-मूल्य और भारतीयता,  लोक-संस्कृति में माधुर्य-बोध, लोक की सौंदर्यशास्त्रीय भूमिका।
कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं- बोलियों और लोकगीतों का अंतर्संवादी स्वर, प्रदर्शनकारी लोक-कलाएं और जन-संचार माध्यम, लोक-लय के प्रयोग, लोक गायिकी: रंगतों का वर्णपट, लोक नृत्य ‘राई’, आल्हा परंपरा की उखड़ती सांसें, मिट्टी तेरे रूप अनेक: मृदा कला, लोक में बाजार और बाजार में लोक, हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता, लोक-गाथा में निहित समकालीनता।


लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध की विवेचना करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘ प्रारंभिक मिथक रचनाओं में आदिम मनुष्य का भय उसकी प्रसन्नता, उसकी घृणा, उसका बैर आदि मनोभावों के प्रबल प्रवेग ने मानवीय और अतिमानवीय चरित्रों के साथ मानवेतर प्राणियों और वस्तु संदर्भों के बीच संबंधों का चक्र निर्मित किया।यह चक्र आख्यान के सूत्रों के रेशों की सघन बुनावट से बना था। इन रेशों की चमक से जो झकर-मकर करता स्पेस निर्मित हो रहा था उसकी उर्वर क्षमता को इस रूप में अनुभव किया जा सकता है कि हमारे निकट अतीत के अनेक घटना प्रसंग जब आख्यान बनने हेतु समुद्यत होते हैं, तब मिथक के आदिम अनुभव से वे उद्रेकित होने लगते हैं। मिथक रहस्य भावना की उपज भी माने जा सकते हैं।’’
भाषिक संरचना और लोक आख्यान के अंतर्संबंध के बारे में लेखक श्यामसुंदर दुबे का कहना है कि- ‘‘भाषिक संप्राप्ति के तत्काल बाद ही मनुष्य आख्यानपरकता की ओर उन्मुख हुआ होगा। भाषा की वृत्ति अपने-आपको अभिव्यक्त करने की चेष्टाओं का भले ही ध्वन्यात्मक परिणाम हो, किंतु भाषिक संरचना की लंबी जद्दोजहद में मनुष्य की आख्यान व्याकुलता ही क्रियाशील रही है। मनुष्य केवल इच्छित विषय की संकेतधर्मी परंपरा से संबंधित ध्वनि-पर्यायों से संतुष्ट नहीं रहा- ये पर्याय वस्तु-बिंब और उससे जुड़े तमाम क्रिया- व्यापारों की आख्यान केंद्रित इकाई की तरह निर्मित हुए हैं। इसलिए प्रत्येक शब्द एक आख्यायिका को अपने भीतर छिपाए हुए है।’’ इसी लेख में लोकबोलियों के संबंध में लेखक ने सोदाहरण लिखा है कि- ‘‘कम-से-कम संस्कृत भाषा की शब्द- संरचनाओं में धातु आधार तो हमारे अभिज्ञान में है ही। इसी क्रम में लोक-बोलियों का विकास हुआ और इन बोलियों के शब्दों का मूल, क्रिया-जन्य ही है। क्रिया मात्र ध्वनि नहीं है वह एक पूरा दृश्याख्यान है। मैं यहाँ एक शब्द ‘पत्र’ लेता हूँ- यह शब्द प्रारंभ में वृक्ष के पत्ते के पर्याय को व्यक्त करने वाला रहा है-फिर चिट्ठी, पन्ना आदि का अर्थ देने वाला बना। लोक बोली के पत्ते को आधार बनाकर एक रूपक रचा ‘पत्ता टूटा डाल से-उड़कर गया अकास’ डाल से पत्ता टूटा और हवा के झोंके के साथ उड़कर आकाशचारी बना। पत्र के मूल में पत् क्रिया है। डाल से पत्र टूटा और पृथ्वी की सतह पर गिरा गिरने से पत् की आवाज आई। इस क्रिया के पूर्व पत्ता-पत्ता नहीं था-एक क्रिया ने उसका नामकरण किया। क्रिया संपूर्ण इंद्रिय-संवेदी व्यापार है, टूटते हुए पत्ते के शेड्स की झलमलाहट, पत् ध्वनि का परिस्पंदन, पत्ते के ताजे डंठल से निर्गत गंध, पत्ते की कोमलता को छूने का भाव, पत्ते की ओक बनाकर तरल पदार्थ पीने का अनुभव - ये संपूर्ण संवेदनाएँ एक ध्वनि-बिंब’ में सिमट आईं।’’


लोक-परंपरा और लोक-संस्कार के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘लोक एक परंपरा है। परंपरा सतत विकसित मूल्य-बोध है। इसके सातत्य में सृजनमूलक समस्त अनुष्ठान अगली पीढ़ी के लिए हस्तांतरित होते रहते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसमें कुछ नया जुड़ता रहता है। परंपरा का विकास लगभग एक रैखिक होता है। चूँकि यह विकास है, इसलिए यह ऊर्ध्वगामी भी होता है। लोक में परंपरा का विकास एक तरह से सांस्कृतिक समुन्नयन भी है, इसलिए यह एक क्रियाशील जीवित प्रणाली है, जो सामाजिक प्रकार्यों को गति देती है। परंपरा का नाभिकेंद्र लोक है, अतः लोक के परिवृत्तों में जो परिवर्तन की ऊर्जा समाहित है, वह लोक की अभ्युदयमूलक सिसृक्षा है।’’


यह पुस्तक लोक मिथक को बीरीकी से समझाती है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं एक लोक संस्कृतिविद हैं अतः बुंदेली लोक संस्कृति के साथ ही उन्होंने देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों का अध्ययन तथा उन पर लेखन किया है। सबसे अच्छी बात है कि जब वे लोक संस्कृति की चर्चा करते हैं अथवा उस पर कुछ लिखते हैं तो तथ्यात्मकरूप से लिखते हैं। अपनी इस पुस्तक में भी उन्होंने वैचारिक तर्कों के साथ लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि के उदाहरण देकर विषय की व्याख्या की है। पुस्तक के प्रथम दो मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत लेख समग्रता लिए हुए हैं। तीसरे कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं रखे गए लेखों में मृदा कला,  हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता आदि पर।
श्यामसुंदर दुबे के पास भाषाई समृद्धि है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों से सुसम्पन्न उनकी भाषा उन लोगों को पर्याप्त भाषिक आनन्द देती है जो हिन्दी के श्रेष्ठ स्वरूप का रसास्वादन करना चाहते हैं किन्तु लोक एक ऐसा विषय है जिसमें हर तरह के पाठक वर्ग की रुचि हो सकती है। अतः पुस्तक की संस्कृतनिष्ठ भाषा उन पाठकों के लिए तनिक असुविधा पैदा कर सकती है जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से दूर हैं। चूंकि यह पुस्तक लोक संस्कृति के लोक मिथक पर है अतः इसकी भाषा थोड़ी सरलीकृत होती तो और अधिक पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह पुस्तक सुधि पाठकों को लोक मिथक के सौंदर्य एवं स्वरूप से गहराई से भली-भांति परिचित कराने में सक्षम है। लोक संस्कृति अथवा संस्कृति में रुचि रखने वालों तथा उत्तम भाषा का रसास्वादन करने की इच्छा रखने वालों को इस पुस्तक को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।   
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Sunday, July 5, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | झला परन लगे, अब उठ बैठो खतरा वारे घर औ स्कूलों के लाने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
झला परन लगे, अब उठ बैठो खतरा वारे घर औ स्कूलों के लाने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक कहनात सबई ने सुनी हुइए ‘आवन लगी बरात, सो ओटन लगे कपास’। मने जबे खबर मिलीं के बरात बस दोरे पे आनेई वारी आए सो घराती-बाराती दोई के लाने हुन्ना-लत्ता बनाबे के लाने सूत-कपास तैयार करन लगे। अब आपई सोचो के का इत्ती झट्टई हुन्ना-लत्ता तैयार हो पाहें? औ का तुमाए हुन्ना-लत्ता के लाने बरात दोरे पे ठाड़ी-ठाड़ी बाट जोहत रैहे? रार सो परहेई। जेई दसा अपने इते उन घरों औ स्कूलों की रैत आएं जोन पुराने पर के गिरबे के जोग हो गए। ने तो जोन रिपेयरिंग मांग रए। सई पूछी जाए तो ऐसे घरों औ स्कूलों खों यां तो गिरा दओ चाइए, ने तो समै रैत में उनकी रिपेयरिंग करा दओ चाइए। मगर अपने इते ऐसो कभऊं होत आए का? राम के नांव लेओ! ऐसो कभऊं नईं होत। इते तो जब झला परन लगत आएं तब परसासन के लाने कोऊ-कोऊ अखबार वारे याद दिलान लगत आएं के मालक झला परन लगे मने बरसात दोरे पे ठाड़ी। अब अपनी आंखन खों खोलके तनक उन ओरें घरों औ स्कूलों खों हेर लेओ जो रग्दा गिरे में गिर सकत आएं। तब कऊं नोटशीट पे चिरइयां बैठत आएं। मुतकी बेर ऐसो हो चुको के रग्दा परे में मने भारी बारिश होत बेरा ऐसे मकान धंसक गए, ने तो उनकी छतें गिर परीं। औ तो औ पर की सालों में जिला अस्पताल की छतें लौं चुअत रईं।
      अबकी साल सोई जेई भओ जा रओ के बरयाबर के झला परबे सुरू भए, बरसात को आबो पक्को हो गओ मनों सई-सई जे नईं पतो के कोन सो घर बरसात में गिरबे जोग आए औ कोन से स्कूलन में छत टपकबे को खतरा आए। मनों अबे बी टेम आए जो तनक फुरती दिखाई जाए सो बड़ो नुसकान से बचो जा सकत आए। काए सई कई के नईं!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏

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Thursday, July 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       हमें एक घटना याद आ रई, बरसो पैले की। का भओ रओ के पन्ना के जुगल किसोर मंदर में में एक दार चोरी भई। किसोर जू के मुकुट, मुरली औ सबरे जेवर ऊ भड़या ने चुरा लए। संकारे मंदर खुलो तो पुजारी जू ने हल्ला मचाओ। भीड़ लग गई। पुलिस आ गई। सबरे ऊ भड़या खों गरयान लगे के जीने बी जुगल किसोर जू के जेवर चुराए ऊकी ठठरी बंधे, ऊको कीरा परें, ऊपे जुगल किसोर जू की गाज गिरे। जांच सुरू करी गई। पब्लिक तो ऊंसई खोंखिया रई हती सो ऊने सोई पुलिस पे दबाव डारो। पुलिस के लाने सोई जे बड़े सरम की बात हती। सो पुलिस वारे ऊ भड़या खों पकरबे के लाने जुट परे। दोई दिनां में जा साबित हो गओ के जो पुलिस चाए तो कोनऊं बदमास बच नईं सकत। ऊ भड़या पकरो गओ औ किसोर जू के सबरे जेवर उतई मंदर के कुंआ में मिले। काए से के ऊ भड़या ने बा जेवर बांध के कुआ में लटका दए रए। ऊकी सेाच से के पुलिस को तो पतो परहे नईं। मनो पुलिस औ ऊके कुत्ता ने सूंघ-सांघ के बा जेवर ढूंढ निकारे। इत्तोई नोंई, पुलिस ने ऊ भड़या खों भी पकर लओ। जबे पब्लिक खों भड़या के बारे में पता परी तो सबरे अकबका के रए गए। काए से के बा भड़या और कोऊ नईं मंदर को पुजारी ई रओ। पब्लिक ने ऊ पुजारी खों औ गरियाओ। ऊ पे केस चलो। मनो सायद बा ऊ टेम पे जमानत पे छूटो रओ। सायद ईसे कहने पर रए के जा भौत पैले की बात आए। हम हते लोहरे ऊ टेम पे, सो जित्ती याद आ रई बता रए। फेर पता परी के ऊ पुजारी खों अपने करम पे इत्तो पछताओ भओ के ऊने ओई कुंआ में कूंद के अपने प्रान दे दए। इत्तई नईं, कछू समै बाद पता परी के ऊके घरे औ दो-तीन मौतें भईं। सो सबई कैत्ते के किसोर जू ने ऊको दंड दओ। बाकी काम बी तो ऊने बुरौ करो रऔ।
एसईं एक घटना औ भई रई। छतरपुर में हरपालपुर की रस्ता पे एक छोटो सो मंदर रओ। अब तो बा बड़ो बन गओ हुइए। मनो ऊ टेम पे बा छोटो सो रओ। ऊकी मानता ऊ टेम पे बी रई। अब हमें जे ध्यान नोंई के बा किसन जू को मंदर रओ के रामजी को, मनो इन्हई दोई में से एक को रओ हुइए। काए से के कोऊ ने मनौती पूरी होबे पे उते चांदी को मुकुट चढ़ाओ रओ। मुकुट चढाए चार दिनां भए नईं के एक दारूखोर भड़या रात को मंदर में घुसो औ बा मुकुट ले भगो। ऊको दारू के लाने पइसा चाउने रए सो ऊने जे न सोची के भगवान को मुकुट आए के कोन को आए? ऊने तो उठाओ औ चलतो बनो। दूसरे दिनां कोऊ ने बताओ के मंदर के लिंगे बा दारूखोर को घूमत देखो रओ। अब सबरे ऊको ढूंढबे में जुटे। ऊको कऊं पतो ने परो। बाद में पता परी के बा रातई खों कोनऊं टिरक में चढ़ के कानपुर भाग गओ रओ। इते पुलिस छतरपुर औ हरलपालपुर में ऊको ढूंढत फिरई हती, मनो बा तो उते कानपुर में दारू सूंट रओ हतो। फेर एक दिनां बड़ो गजब को भओ। बा दारूखोर भड़या गांव लौट आओ। ऊने बा मुकुट बी मंदर खों दे दओ। पुलिस ने ऊंसे पूछी के अब तक कां रए औ अब काए लौटे औ संगे जा मुकुट लौटाबे की तुमें काए सूझी? सो ऊ भड़या ने मजे की किसां सुनाई। ऊने बताई के ऊके लिंगे पइसा ने हते औ ऊको दारू की तलब लग रई हती। सो ऊने बिगैर कछू सोचे-बिचारे मंदर में से मुकुट चुरा लओ औ कानपुर भाग गओ। उते एक चोरी को समान खरीदबे वारे खों मुकुट बेंचो औ पईसा ले के दारू पियन लगो। रात की बेरा जब बा सोओ सो ऊको लगो के कोनऊं सीना पे चढ़ो बैठो। साना पे चढ़ो बा मानुस बिगैर मुकुट के भगवान की मूरत घांई दिखा रओ तो। दो रातें औ जेई भओ। ईंसे बा दारूखोर डरा गओ। ऊके मन में आई के ऊसे गलती हो गई, अब ऊको मुकुट वापस कर दओ चाइए। मनो बा तो ऊको बेंच चुको हतो। ऊने सोची के अब का करो जाए? जो कऊं बा ऊ चोरबजार वारे से मांगबे जैहे सो बा न लौटाहे। सो ऊ दारूखोर ने बा चोरबजार वारे के इते सेंध लगाई औ मुकुट ले भगो। ईके बाद बा वापस गांव वापस पौंचो औ ऊने मुकुट सोई मंदर खों लौटा दओ। चोरी करबे के कारन ऊको सजा तो भई, मनो कर्री ने भई। उते के लोग कैत्ते के जो बा मुकुट ने लौटातो तो भगवान ऊको पटक-पटक के मारते। बाकी बा चोरबजार वारो सोई पकरो गओ। ऊके तो पइसा बी गए औ मुकुट बी गओ। औ पुलिस के डंडा परे सो अलग से। अब बुरए काम को बुरौ अंत तो होतई आए।
सो जे दो किसां सो हमें याद आ रई। अब आप ओरन जानतई आओ के जे किसां हमें याद काए आई? ठीक समझे आप ओरें! अरे रामलला के इते चंदा के पइसा में गड़बड़ी भई सो हमें जे दोईं घटना याद आ गईं। ऊंसई अपने इते जब कछू होत आए तो मुतकी पुरानी बातें याद आन लगत आएं। जैो कोऊं के इते कोनऊं दिल के दौरा से सांत हो गओ होए तो सबरे जने जो उते जुटत आएं बे अपनी-अपनी सुनान लगत आएं के हमाए फूफा के संगे बी ऐसोई भओ रओ, तो हमाई मौसी के संगे बी ऐसई भओ रओ। मनो कोनऊं के इते समै के पैले मोड़ा या मोड़ी पैदा हो जाए सो सबई खों याद आन लगत आए के हमाए इते बी ऐसो भओ रओ। ऐसे समै सबई जनमपतरी खोल के बैठ जात आएं के कोन के इते सतमासी भई औ कोन के इते अठमासा भओ। जो कोऊ एक खों मलेरिया हो जाए सा बाकी सब जनों खों अपनों-अपनों मलेरिया याद आन लगत आए। सो जे तो बड़ी बात आए। इत्ते नोंने रामलला। इत्तो नोंनो मंदर। इत्ते अच्छे से प्रानप्रतिष्ठा भई रई के आज लौं आंखन के आगे दिखात आए। बाकी हम आज लौं रामलला के दरसनों के लाने ने जा पाए। हमने एक भैयाजी से तो यां तक कै रखी आए के जो हमें संगे ने लिवा गए अरै दरसन ने कराई तो आपके लाने पाप परहे। बाकी सांची तो जा आए के जबे रामलला को बुलावो आहे तभई उते जाबे खों मिलहे औ तभईं दरसन हो पाहें। 
बाकी जब से हमने बा खबर सुनी के उते चंदा के पइसा को घपला हो गओ, तभई से हमें जे दोई किसां याद आन लगीं। सो का आए के जोन ने रामलला के चंदा के पइसा डकारे उनें पचहे नईं, जे बात तो तै कहाई। एक तो भड़याई ऊंसई बुरऔ काम आए, ऊपे से मंदर में भड़याई? ईसे बढ़के औ कछू बुरौ काम होई नईं सकत आए। सो हम अपने जी खों जेई तसल्लसी दे रए के एक न एक दिनां सबरे भड़या हरों खों सजा जरूर मिलहे। इते अंधेर बी औ देर बी आए, मनो उते देर भले होए पर अंधेर ने हुइए।         
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के बे ओरें कित्ते ढीठ आएं के इत्ते पापुलर मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो? रामलला के पइसा चुरात समै उनको जी ने कांपो? अब रामलला उनखों दंड दैहें के नईं?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 1, 2026

चर्चा प्लस | हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए?   
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                   
      एक दिन अचानक सभी के मोबाईल पर रेड अर्लट बजा। चेतावनी थी मौसम विभाग की ओर से। साथ ही मैसेज भी था कि तीन घंटे में तेज हवाएं चलेंगी। तीन क्या, तेरह घंटे निकल गए लेकिन रेड अलर्ट वाली तेज हवाएं नहीं चलीं। बहरहाल, लोगों को रेड अर्लट बजने का अनुभव तो हुआ। लेकिन यदि सही में तेज तूफानी हवाएं चलतीं तो आमजन को क्या करना चाहिए इसका उन्हें कोई पता नहीं था। चूंकि तूफानी हवाएं नहीं चलीं तो मामला हंसी-मजाक में दब गया। लेकिन प्रकृति कभी मजाक नहीं करती। इसका जाता उदाहरण वेनेजुएला में आया भूकंप है। गूगल के मौसम विभाग ने चेतावनी भी दी थी किन्तु हताहतों की संख्या दस हजार से अधिक रही। क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि वे अपना बचाव कैसे करें? वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट पर स्थित है। भूकंपों की यह श्रृंखला 7.2 तीव्रता के भूकंप से शुरू हुई और 39 सेकंड बाद पास ही में 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आया। वेनेजुएला सम्हल नहीं सका। क्या हम सम्हल सकेंगे?


24 जून  2026 को वेनेजुएला में  शाम के समय दो शक्तिशाली भूकंप आए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार पहले 7.1 और दूसरे 7.5 तीव्रता के भूकंप ने काराकास में कई इमारतें गिरा दीं। लोग सड़कों पर आ गए। सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई। पहला भूकंप 7.1 तीव्रता का था, जिसका केंद्र मोरॉन समुदाय के पश्चिम में था। ये देश के कैरेबियन तट पर स्थित है, काराकास से करीब 168 किलोमीटर दूर। इसकी गहराई 13 किलोमीटर थी। कुछ मिनट बाद दूसरा और भी बड़ा 7.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसकी गहराई 10 किलोमीटर थी। केंद्र मोरॉन से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में था। इन भूकंपों ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। लोग सड़कों पर निकल आए, इमारतों की दीवारें गिर गईं और धूल के गुबार उठते दिखे। इसके साथ ही कई राज्यों में झटके महसूस किए गए, खासकर काराकास के अल्तामिरा इलाके में भारी नुकसान हुआ। लोगों से बाहर रहने और आफ्टरशॉक्स से सावधान रहने की अपील की गई।
भूकंप पृथ्वी की टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति से होते हैं। वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट और साउथ अमेरिकन प्लेट की सीमा पर स्थित है।  भूगर्भीय वैज्ञानिकों के अनुसार कैरेबियन प्लेट साउथ अमेरिकन प्लेट के सापेक्ष पूर्व दिशा में लगभग 20 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से खिसक रही है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ट्रांसफॉर्म बाउंड्री है, जहां प्लेट्स एक-दूसरे के बगल से गुजरती हैं, जैसे सैन सेबेस्टियन और एल पिलार फॉल्ट स जब प्लेट्स फंस जाती हैं और तनाव बढ़ता है, तो अचानक फिसलन होती है, जिससे भूकंप आता है। इस बार के भूकंप उथले थे (10-13 किमी गहराई), इसलिए उनका प्रभाव ज्यादा था। उथले भूकंप सतह पर ज्यादा कंपन पैदा करते हैं। यह क्षेत्र सदियों से सक्रिय है। सन 1812 और 1900 में भी काराकास के आसपास 7$ तीव्रता के भूकंप आए थे. इस प्लेट बाउंड्री का बड़ा हिस्सा श्लॉक्डश् है यानी तनाव जमा हो रहा है, जो 8 तीव्रता तक के भूकंप पैदा कर सकता है। इस डबलेट इवेंट (फोरशॉक के तुरंत बाद मेनशॉक) ने ऊर्जा रिलीज की, जो क्षेत्र की जटिल भू-संरचना का नतीजा है। उत्तर पश्चिम और दक्षिण पूर्व दिशा की सहायक फॉल्ट्स भी यहां सक्रिय हैं, जो स्ट्राइक-स्लिप मोशन पैदा करती हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि वेनेजुएला ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ का हिस्सा नहीं है,  जहां भूकंप, विशेष रूप से उच्च तीव्रता वाले भूकंप, अपेक्षाकृत आम हैं। यही कारण है कि इस तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला जैसे स्थान पर जापान की तुलना में कहीं अधिक नुकसान पहुंचा। क्योंकि ‘‘रिंग ऑफ फायर’’  में या उसके निकट होने कारण जापान इस प्रकार की घटनाओं के लिए कहीं अधिक तैयार रहता है। वहां बच्चों को भी स्कूल में प्रशिक्षण्या दिया जाता है कि भूकंप की चेतावनी मिलने पर स्वयं को किस तरह सुरक्षित रहना है। हमारे देश में आम नागरिकों को नही पता कि बाढ़, भूकेप या ट्विस्टर आने पर किस तरह अपना बचाव करना है? 
ऐसा नहीं है कि कैरेबियन प्लेट में पहले कभी भूकंप नहीं आए, कैरेबियन प्लेट के दक्षिणी भाग में बड़े भूकंप आते रहते हैं। पिछले 100 वर्षों में इस क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता के पांच भूकंप आ चुके हैं। सितंबर 2025 में, उत्तरी वेनेजुएला में दो भूकंपों का एक साथ कहर बरपा लेकिन इसकी तीव्रता वर्तमान भूकंप से कम थी यानी रिक्टर स्केल पर 6.2/6.3 तीव्रता। यद्यपि 6.3 तीव्रता का भूकंप भी बड़ा होता है, लेकिन यह प्रायः व्यापक, विनाशकारी क्षति का कारण नहीं बनता है। 7.5 तीव्रता का  भूकंप अन्य भूकंपों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।  इसमें खराब ढंग से निर्मित या बिना सुदृढ़ीकरण वाली इमारतों को भारी नुकसान पहुंचता है। जिससे अधिक जनहानि भी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष की घटना तीव्रता और उत्सर्जित ऊर्जा के आधार पर पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 63 गुना अधिक शक्तिशाली थी । उत्तरी वेनेजुएला में आए इस भूकंप से प्रभावित क्षेत्र के बारे में यूएसजीएस के  आकलन के अनुसार, ष्कुल मिलाकर, इस क्षेत्र की आबादी भूकंप के झटकों के प्रति संवेदनशील संरचनाओं में रहती है, हालांकि कुछ संरचनाएं भूकंप प्रतिरोधी भी हैं। सबसे अधिक संवेदनशील भवन प्रकार बिना सुदृढ़ीकरण वाली ईंटों की चिनाई और मिट्टी के ब्लॉक से निर्मित हैं।
2018 में,  7.3 तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के कम आबादी वाले क्षेत्र (काराकास क्षेत्र में नहीं) के तट से काफी दूर उत्तर में आया था। इस घटना के परिणामस्वरूप मध्यम स्तर की क्षति हुई और कुछ लोगों की मौत हुई।
सन 1997 में,  कैरियाको के उत्तर में अंतर्देशीय क्षेत्र में 6.9 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 81 लोगों की मौत  हुई थी।  सन 1967 में, तटरेखा के पास 6.6 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 240 लोगों की मौतें हुई और ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट इमारतों के ढहने सहित व्यापक क्षति हुई थी। सन् 97 वर्ष पूर्व, सन् 1929 में, समुद्र तट से दूर 6.7 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप सुनामी भी आई थी। ताजा भूकंप यानी जून 2026 में  आए दोहरे भूकंपों की घटना वेनेजुएला के आबादी वाले हिस्सों में, समुद्र तट से दूर नहीं, बल्कि अंतर्देशीय क्षेत्र में हुई, यह एक 7.5 तीव्रता के भूकंप से होने वाले दोहरे भूकंपों की तुलना में अधिक समय तक चली और इसलिए पिछली सदी में आए किसी भी भूकंप की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली रही। यूएसजीएस का अनुमान है कि मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक हो जाएगी और संभावित रूप से 10,000 से भी अधिक हो सकती है।
वेनेजुएला में आए भीषण भूकंप का भारतीय उपमहाद्वीप की जियोलॉजिकल (भूगर्भीय) संरचना से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार यह भारत के लिए सजग रहने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की एक बहुत बड़ी चेतावनी जरूर है।
वेनेजुएला में जो तबाही हुई, वह हमें निम्नलिखित कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के लिए सबक देती है कि भारत में हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्व के राज्य, अंडमान-निकोबार, गुजरात, कच्छ और दिल्ली-एनसीआर अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय ज़ोन 4, 5  में आते हैं। इन क्षेत्रों के नीचे इंडियन प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिससे कभी भी वेनेजुएला जैसे या उससे भी बड़े तीव्र झटके (8.0$ मैग्नीट्यूड) आ सकते हैं।
वेनेजुएला के भूकंप के कुछ दिन दिल्ली, एमसीआर और उत्तर भारत के कई शहरों में भूकंप के झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में आए भूकंप का केंद्र धरती की सतह से काफी उथला था (10 से 20 किलोमीटर की गहराई), जिसके कारण धरती की सतह पर कंपन बहुत भयानक हुआ। हिमालय और उत्तर भारत के भूकंप भी अक्सर उथले होते हैं, जो अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वेनेजुएला में भारी तबाही का एक बड़ा कारण वहां की इमारतों का भूकंपरोधी न होना था। ठीक इसी तरह, दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य संवेदनशील शहरों में अधिकांश निर्माण अनियोजित हैं। यदि भारत में ऐसा भूकंप आता है, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। भूकंपीय संवेदनशीलतारू नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, भारत के 29 प्रमुख शहर उच्च भूकंप जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
प्रकृति में होने वाले निरंतर परिवर्तन जिन्हें हम जलवायु परिवर्तन भी कहते हैं लगातार किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की चेतावनी दे रहा है लेकिन हम कागजी कार्यवाहियों में व्यस्त हैं। न तो गगनचुंबी इमारतों की ठीक से जांच होती है कि वे भूकंपरोधी हैं या नहीं और न भूकंप के समय सुरक्षित रहने का उपाय आमजन को सिखाया जाता है। यह कटु सत्य है कि जिन शहरों में इमारतों के आग से बचाव के उपाय की ही जांच नहीं की जाती है वहां प्राकृतिक आपदा से बचाव कहां सिखाया जाएगा? अब खुद आमजन को प्राकृतिक आपदा से बचना सीखना होगा जबकि यह आपदाप प्रबंधन तथा जिला प्रशासनों का दायित्व है।                                -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 01.07.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, June 30, 2026

पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह  - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य   - 200/-
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   हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को  किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।

      श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां  हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को  अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।

पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”

वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”

दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
       संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।

चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है।  यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और  प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।

संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।

सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।

संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है।  जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है।  यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।

11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।

कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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Saturday, June 27, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | डिवाइडर ने भओ टकरौंदा हो गओ, रोजीना दो-चार टकरा रये | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
डिवाइडर ने भओ टकरौंदा हो गओ, रोजीना दो-चार टकरा रये
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
मकरोनिया से दीनदयाल नगर जाबे वाली रोड के बारे में कछु कैबे जी डरात आए। जे ने समझियो के उते कौनऊं भूत-प्रेत दोंदरा दे रये औ ने जा सोचियो के उते कोनऊं कटर-मटर चलाबे वारे फिर रये । हऔ, ने उते भूत-प्रेत आएं औ ने कटरबाज, ऊ रोड पे तो बड़े-बड़े मॉल, बड़ी-बड़ी होटलें, बड़ो सो सनीमा औ भौत बड़ो सो अस्पताल आए। आप ओरें जो ई रोड पे कम चलत आओ औ बे बायरे वारे जोन ने ई रोड के बारे में सुन तो रखो आए मनों ऊपे से चले नइयां, सबई सोच रए हुइयो के इत्ती नोंनी रोड खों हम डराए वारी काए कै रए? सो भैया औ बैन हरों बात जे आए के ऊ रोड पे जात-आत टेम जोई डर लगत रैत आए के कऊं गाड़ी डिवाइडर पे ने चढ़ जाए। काए से  के चार-पांच बेर तो हम खुदई अपनी सगी आंखन से देख चुके के कैसे देखत-देखत चार चका वारी डिवाइडर पे जा चढ़ी। दो पहिया सोई टकरात देखी। ऐसे टेम पे जा सोच के जी कंपत आए के उनकी जांगा कभऊं अपनी वारी गाड़ी चढ़ गई तो? फेर तो उतई की कोनऊं अस्पताल में डरें दिखाहें।
हमाओ जे डर बेफालतू को नोंई। आप खुदई अखबार उठा के देख लेओ, डिवाइडर से कोऊं ने कोऊं गाड़ी टकराबे की खबर रोजीना जरूर पढ़बे खों मिल जैहे। कभऊं-कभऊं तो तीनेक गाड़ियां टकराबे की खबर मिलत आए। बाकी जे बात सोई सोचबे वारी आए के‌ ऐसे टकरौंदा डिवाइडर की खबर अखबार में छपत आए, मोबाइल में चलत आए, मनों परसासन के जिम्मेवारन खों नईं मिलत का? उते गलत पार्किंग करबे वारन की गाड़ियन में तारे चटकाबे वारे सो खूब‌ घूमत रैत आएं मनों ईपे कोनऊं ध्यान नईं दे रओ के उते डिवाइडर के नांव पे बन गओ टकरौंदा। सो, आप सबई से जेई बिनती आए के जो ऊ तरफी जाइयो सो बच के जाइयो!
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Thursday, June 25, 2026

बतकाव बिन्ना की | सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      जब हम लोहरे हते तो हमाए इते खाना पकाने वारी बऊ बड़े मजे-मजे की किसां सुनात्तीं। उनईं से सबसे पैले हमने लड़इयों के ब्याओ की किसां सुनी हती। जा किसां खाली किसां ने हती, ईमें मोसम की खासियत सोई बताई गई हती।
का हतो के पैले 15 जून लौं बरसात को मौसम सुरू हो जात्तो। हप्ता भर में चकौड़ा/चरौंटा हरियान लगत्ते। मनो कोऊ-कोऊ दिनां ऐसो बी होत्तो के सूरज बी दिखात रैत्तो औ पानी की झला आन के कढ़ जात्तो। ऊ टेम पे इन्द्रधुष सोई देखबे खों मिल जात्तो। ऊके बारे में बऊ कैत्तीं के जबे सूरज निकरो होए औ झला परे तो ऊ टेम पे लड़इयन को ब्याओ होत आए। अब ऊ टेम पे हमें तो समझ में ने आत्ती के लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? हमें ऊ समै पे जेई लगत्तो के जोन टाईप से दूला-दुलैया को ब्याओ होत आए, मंड़वा तरे, ऊंसई लड़इयन को ब्याओ होत हुइए। का उनके इते बी पंगतें बैठत आएं? हम जेई सोचत्ते। बऊ से एक बेर हमने पूछई लई के जे लड़इयन को ब्याओ कैसो होत आए? उनके इते बी ढोलक बजत आए का? गारी सोई गाई जात हुइए, मनो का बे ओरें गारी गा लेत आएं? बऊ ने हमाई बात सुनी तो बे खूब हंसी। फेर उन्ने हमें जे किसां सुनाईं जोन हम आप ओरन खों सुना रए-
का भओ के एक हतो जंगल। ऊ जंगल में एक लड़इया रैत्तो। बा भड़यागिरी सोई करत्तो। जब बा जंगल में शिकार करत-करत बोर हो जात्तो तो कभऊं-कभऊं मुर्गा-मुर्गी चुराबे के लाने गांव में पौंच जात्तो। एक बेर बा गांव पौंचो सो ऊने देखी के गांव में कोनऊं को ब्याओ हो रओ। घासलेट वारी अच्छी लालटेनें जल रईं। पूरो घर, आंगन औ अहातो लौं जगमगा रओ। उत्तई नईं, बा लाईटन से पूरो गांव दमक रओ तो। अब इत्तो उजालो होए तो कोऊ भड़या भला कछू कैसे चुरा सकत? सो बा लड़इया इत्तो तो समझ गओ के आज मुर्गा-मुर्गी कछू नईं मिल पाने। मनो ऊको लगो के जब इते लौं आ ई गए आएं तो तनक ब्याओ देख लओ जाए। बा बाड़ के जरवा की ऊ तरफी छिप के बैठ गओ औ ब्याओ देखन लगो। पूरो ब्याओ देख के ऊको जी बी कुलबुलान लगो के जेई टाईप से अपनों ब्याओ करो जाए। जेई सोचत भओ बा भुनसारे जंगल खों लौट परो।
जंगल पौंच के ऊको लगो के ब्याओ तो तब हुइए जब एक ठइयां लड़इयन मिले। सो बा सब कछू भूल-भाल के एक लड़इयन ढूंढने निकर परो। कछू मेनत के बाद ऊको एक लड़इयन मिल गई। 
‘‘तुम हमसे ब्याओ करहो?’’ लड़इया ने लड़इयन से पूंछी। 
‘‘काए नईं, जरूर करबी!’’ लड़इयन सरमात भई बोली।
मने लड़़इया ने एक दोरो तो पार कर लओ हतो। ऊको ब्याओ के लाने नोंनी सी लड़इयन मिल गई हती।
‘‘कबे करने ब्याओ बोलो?’’ लड़इयन ने लड़इया से पूछी।
‘‘अबे गम्म खाओ! हम तनक रोसनी-मोसनी को इंतजाम तो कर लेवें फेर करबी ब्याओ।’’ लड़इया बोलो।
अब लड़इयन ने तो इंसानों को ब्याओ देखो ने हतो सो ऊको का पतो के लड़इया के दिमाग में का चल रओ? बा बोली, ‘‘ठीक आए, जबे करने हो सो बतइयो।’’
लड़इया ने सोच तो लओ रओ के घासलेट की लाइटें जला के ऊके उजियारे में ब्याओ करहे, मनो ऊके इते कां धरी लालटेनें? तब ऊने सोची के जोन टाईप से बा मुर्गा मसक लात आए ओई टाईप से लालटेनें दबा लाहे। अगली रात खों बो लड़इया गांव पौंचो। मुतकी देर तको रओ। ऊको अबेर होबे की परवा ने हती, बा तो लालटेन चुराबे के लाने मों दताए बैठो हतो।
कुल्ल देर बाद गांव के सब ओरें अपनी-अपनी लालटेंनें बुझा के सो गए। लड़इया दबे पांव उठो औ एक घरे की खिड़की से कूंद के भीतरे पौंचो। उते ऊको लालटेन खूंटा पे टंगी दिखानी। लड़इया उचको औ ऊने लालटेन निकारबे को कोसिस करी। लालटेन ऊके पंजा में ने अटकी औ जमीन पे जा गिरी। आवाज सुन के घर वारे जाग परे। उन्ने लड़या खों देखो तो लट्ठ उठा के ऊको मारबे दौरे। लड़इया बरया-बरके अपनी जान बचा के उते से भागो।
पर बा लड़इया इत्ते पे हार मानबे वारो ने हतो। चार दिनां बाद ऊने फेर गांव को चक्कर मारो। अब के बा एक लालटेन मों में दबाबे में सफल हो गओ। मनो ऊको तुरतईं लालटेन उतई पटकने परी। काए से के लालटेन को कांच ऊ समैं बी भौतई गरम हतो। लड़इया को मों चिहुंक गओ। बा मों झटकत भओ भाग खड़ो भओ।
तीसरी बेरा बा फेर के गांव में घुसो। ई बेर ऊने पैले से बुझी भई लालटेन ताकी औ मौका परतई ऊको मों में दबा के भाग खड़ो भओ। जंगल पौंच के बा भौतई खुस भओ के अब तो लालटेंन की रोसनी में ऊको ब्याओ हुइए। ऊने लड़इन खों बुला लओ। चार लड़या औ बुला लए जोन से बे ओरें देखें के ऊको कित्तो नोंनो ब्याओ हो रओ। सबरी तैयारी हो गई। मुर्गा-मुर्गी सोई भड़याई से ला के धर लए गए। सबने कई के अब ब्याओ सुरू करो जाए। जा सुन के लड़इया ने लालटेन जलाबे की कोसिस करी। पर ऊको जे ने पतो रओ के लालटेन जलाई कैसे जात आए। ऊने भौतई कोसिस करी। इत्ती कोसिस के कोसिस करत-करत भुनसारो हो गओ। तनक देर में भुनसारो सोई ढरक गओ औ दुफारी हो गई। लालटेन ने जलनी ती, ने जली। लड़इया बी थक गओ हतो। मगर करे सो का करे। अब तो ऊकी इज्जत पे बन आई हती। धूप सोई चटक रई हती। इत्ते में कऊं से तनक से बदरा घिर आए, बिजुरिया चमकन लगी औ पानी बरसन लगो। लड़इयन समेत सबरे लड़यों ने कई के ‘‘पानी में भींगबे से अच्छो आए के अब बढ़ लओ जाए। ब्याओ कोनऊं औ दिनां कर लइयो।’’
‘‘तुम ओरें औ फुर्रा आओ! तुमें पतो नइयां के अबई भोलेबाबा ने हमसे कई आए के लड़इयों को ब्याओ इंसानों की लालटेन में नईं होत आए। तुमाए लाने तो हम घाम में बिजली चमकाहें औ पानी बरसाहें। इत्तोई नईं, तुम ओरन के ब्याओ के लाने इंदर भगवान अपनों रंग-बिरंगो धनुष से आसमान सजा देहें। सो जल्दी करो औ ब्याओ कर लेओ।’’ चतुरा लड़इया ने अपनो दिमाग चलाओ औ सबई खों मनगढ़ंत किसां सुना दई। मजे की बात जे के सबरे ऊकी बात में आ बी गए। काए से के ईके पैले उन्ने कभऊं जा सब पे ध्यान ई ने दओ रओ। उनें पतो ई नईं हतो के घाम के संगे बिजुरी बी चमकत आए औ पानी बरसत भए इन्द्रधनुष सोई दिखान लगत आए। काए से के बे ओरे ज्यादातर दिन में सोत रैत्ते और रात के टेम पे शिकार औ भड़याई के लाने निकरत्ते। सो उने बी लगो के जा सांची कै रओ। जरूर भोलेबाबा ने ईको बताओ हुइए। तभई तो घाम में पानी बरस रओ।
फेर का हतो, तुंरतईं लड़या औ लड़इयन को ब्याओ हो गओ। ओई समै से सबरे लड़इयन ने तै करो के अब जब बी घाम के संगे बिजुरी चमक के पानी बरसहे, मनो झला परहे तभईं लड़यां हरें अपनो ब्याओ किया करहें।
सो जे हती किसां लड़यों के ब्याओ के महूरत की। 
लेकन आजकाल का हो रओ के 15 जून तो कब को कढ़ गओ मनो बरसात ने आई। बाकी कभऊं-कभऊं झला आ जात आए। सो लड़यों को ब्याओ हो जात आए। मनो अब बरसात आबे में इत्ती देर होन लगी आए औ घाम के झला इत्ते बार आत-जात आएं के हमें लगत के अब तक तो सबरे लड़यों को ब्याओ हो गओ हुइए। औ बरसात आत-आत सो उनकी मोड़ा-मोड़ी उनके अंगना में खेलन लगहें। जा मौसम की देरी कऊं लड़इयों की जमात ने बढ़ा दे। पता परी के पैले तो लड़इयां गांव में घुसत्ते औ अब सहर में सोई घुसन लगे।
मनो जे बी आए के सहर में जंगल वारे लड़इयों की दाल ने गलहे। काए से के इते राजनीति वारे मुतके लड़या कैमरा की लाइटें चमकवात भए फिरत रैत आएं। औ कऊं कोनऊं लड़या कोऊ टीवी के न्यूज चैनल वारे से टकरा गओ तो समझो के हो गओ ऊको बेड़ो गरक। ऊकी घींच पकर के ऊसे सवाल बी पूंछहें औ ऊको बोलन बी ने दैंहे। खैर, जे सब छोरो, आप ओरे जब देखियो के घाम निकरो औ पानी बरस रओ तो समझ जाइयो के लड़इयों को ब्याओ हो रओ।       
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के लड़या बी तभई लौं हैं, जब लौं जंगल बचे हैं। जो जंगल ने बचहें तो लड़इन को का हुइए? बे कां जीहें?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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