Wednesday, September 30, 2026

चर्चा प्लस | चर्चा प्लस मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य डॉ (सुश्री) शरद सिंह


चर्चा प्लस
मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के किसी सदस्य को कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरा हिल जाता है। कई गंभीर बीमारियों का असली कारण है मिलावटी खाद्य सामग्री। जैसे अच्छी सेहत के लिए फल खाने और दूध पीने की सलाह जी जाती है। पकने से पूर्व तोड़े गए फल जिन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है क्या अच्छी सेहत दे सकते हैं? या फिर इंजेक्शन लगा कर निकाला गया दूध सेहत दे सकेगा? उस पर स्वास्थ्य सेवा की आसमान छूती मंहगाई मानो गरीबों के जीने का हक छीन लेना चाहती है।

चाहे पपीता हो या सेव बहुधा समय से पूर्व पेड़ों से तोड़ कर केमिकल द्वारा पकाए जाते हैं और जिन्हें खाने पर क्या-क्या साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं इससे आमजन बेखबर है। कभी-कभार समाचार पत्रों या पत्रिकाओं में इस संबंध में जागरूकता वाले लेख प्रकाशित होते भी हैं तो उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ कर अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि जब उपभोक्ता फलों के बाज़ार में पहुंचता है तो केमिकल्स से पकाए और चमकाए गए फलों की सुंदरता से मोहित हो कर भूल जाता है कि उसने क्या पढ़ा था अथवा वे फल कितने नुकसानदेह हैं। फिर मसला यह भी तो है कि सही फल कहां से मिलें? न तो हर व्यक्ति के पास बाग है और न बागीचा। दो कमरे या एक कमरे में रहने वाला परिवार अपने लिए फल नहीं उगा सकता। उसे तो बाज़ार में मिलने वाले फलों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यही दशा सब्जियों की है। बड़े आकार की सब्जियां चाहे लौकी हो या कद्दू संदेह के घेरे में रहता है। क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें तेजी से बड़ा करने के लिए इंजेक्शन और केमिकल वाली खाद दी जाती है। लेकिन क्या किया जाए, यदि सब्जी खानी है तो जहर की मिलावट को भी अनदेखा करना पड़ता है और बदले में मिलती है गंभीर बीमारियां।
फलों को जल्दी और कृत्रिम रूप से पकाने के लिए मुख्य रूप से एथिलीन गैस और कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग किया जाता है। एथिलीन गैस एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है और व्यावसायिक रूप से स्वीकृत है। यह फलों में पकने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू करता है। एथेफोन तरल रूप में आता है जो पौधों या फलों के संपर्क में आने पर एथिलीन गैस में बदल जाता है। कैल्शियम कार्बाइड आम भाषा में ‘‘कार्बाइड’’ कहा जाता है। यह पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो फलों को जल्दी पकाता है। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले और कैंसरकारी तत्व हो सकते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध है। खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार केवल नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस के प्रयोग की अनुमति है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती।

पैदा होने से ले कर मृत्यु तक दूध जीवन के एक अवश्यक तत्व के रूप में जुड़ा रहता है लेकिन जब दूध भी मिलावटी और नकली हो तो? पशुओं में दूध उतारने या उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का इंजेक्शन लगाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान ऑक्सीटोसिन युक्त दूध पीता है, तो पेट के एसिड और पाचक एंजाइम इस प्रोटीन हार्मोन को पचा कर नष्ट कर देते हैं। यह सक्रिय रूप से रक्त में नहीं पहुंचता है। हालांकि भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पशुओं में इसके अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसका सबसे बुरा असर पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। बार-बार ऑक्सीटोसिन देने से पशुओं में बांझपन, हॉर्मोनल असंतुलन, थनैला रोग (डंेजपजपे) और प्रजनन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
नकली या सिंथेटिक दूध को असली जैसा दिखाने और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए कई खतरनाक और जहरीले रसायन मिलाए जाते हैं। दूध में प्रोटीन और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए यूरिया मिलाया जाता है, जो किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। दूध में झाग बनाने और उसे सफेद दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पाचन तंत्र खराब होता है और उल्टी-दस्त की समस्या होती है। कास्टिक सोडा अथवा कास्टिक पोटाश केमिकल दूध को फटने से बचाता है और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाता है, लेकिन पेट की अंदरूनी परत को जला सकता है। सोया रिफाइंड या आर्टिफिशियल फैट दूध में फैट (चिकनाई) की मात्रा को नियंत्रित करने और उसे असली जैसा गाढ़ा दिखाने के लिए मिलाया जाता है। फॉर्मेलिन यह एक जहरीला प्रिजरवेट है जो दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। इसके लंबे समय तक सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड भी दूध को फटने से बचाने के लिए मिलाया जाता है जो पाचन एंजाइमों को नष्ट करता है। स्टार्च या मैदा पानी मिलाने के बाद दूध का पतलापन छुपाने और उसे गाढ़ा रखने के लिए स्टार्च मिलाया जाता है। क्या यूरिया और कास्अिक सोडा से बनने वाला नकली दूध सेहत दे सकता है?
हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सा मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 12 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं के मंहगे होने का एक मुख्य कारण है महंगे आयातित चिकित्सा उपकरण और उनके अपग्रेड होने की उच्च लागत। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में कुशल डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा स्टाफ के बढ़ते वेतन व शुल्क। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का बढ़ता प्रसार। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार भारत में लोग अपनी जेब से इलाज का भारी-भरकम हिस्सा अर्थात लगभग 63 प्रतिशत खुद चुकाते हैं। कुछ प्रमुख महंगे उपचार और लागत अनुमान इस प्रकार है-
हार्ट बाईपास सर्जरी - लगभग 1.6 लाख से 4.5 लाख रुपये ।
कैंसर उपचार (कीमो थेरेपी रेडिएशन)- लगभग 10 लाख से 25 लाख रुपये ।
लिवर ट्रांसप्लांट- लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये।
यदि इन बड़ी बीमारियों की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो मामली सर्दी-जुकाम के लिए चिकित्सक को दिखा कर ईलाज कराना मंहगा पड़ता है। यही कारण है कि नीम हकीमों का यानी फर्जी चिकित्सकों का धंधा जोरों पर चलता रहता है और आम आदमी अपनी जान जोखिम में डालता रहता है।
यह सच है कि सरकार और कुछ निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के द्वारा सहायता देती हैं जैसे सबसे लोकप्रिय सरकारी योजना है आयुष्मान योजना। लेकिन यह भी सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि साठ वर्ष की आये भी इसके लिए योग्य घोषित कर दी गई है किन्तु जब कोई साठ से सत्तर के बीच की आयु का व्यक्ति आयुष्मान कार्ड  बनवाने का प्रयास करता है तो उसे निराशा हाथ लगती है। जो निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा का लाभ देती हैं वे पहले प्रीमियम भरवाती हैं, वह भी नियमित रूप। जिसके पास प्रीमियत भुगतान करने योग्य पैसे होंगे उसके लिए तो ठीक है किन्तु जो प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होगा उसका क्या होगा?
चाहे खाद्य सामग्री को दोष दें या लाईफ स्टाईल को मगर यह डरावना सच है कि पिछले दस वर्ष में घुटनों एवं जोड़ों की तकलीफ, मधुमेह, थायराइड, कोलोस्ट््राल बढ़ना आदि की समस्याएं कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में सबसे अधिक होने वाला प्रमुख हृदयरोग कोरोनरी धमनी रोग है, जिसके कारण अक्सर दिल का दौरा (हार्टअटैक) पड़ता है। इसमें हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में प्लाक (चर्बी और कोलेस्ट्रॉल) जमने से वे संकीर्ण हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप में धमनियों में रक्त का दबाव लगातार अधिक रहता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त जोर पड़ता है।हार्ट फेलियर में हृदय की मांसपेशियां इतनी कमजोर या सख्त हो जाती हैं कि वे शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाती हैं। अरिथ्मिया  यह दिल की धड़कन के अनियमित, बहुत तेज या बहुत धीमी होने की स्थिति है।
हृदय रोगों के मुख्य कारण है फैट, नमक, चीनी और फास्ट फूड से भरपूर आहार। ये सभी मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से दिल कमजोर होता है और वजन बढ़ता है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं। तंबाकू और सिगरेट का धुआं धमनियों की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाता है। अत्यधिक और लगातार तनाव धमनियों को प्रभावित करता है और अन्य जोखिम कारकों को गंभीर बनाता है।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में आज सभी जानते हैं, सभी स्वस्थ भी रहना चाहते हैं किन्तु शुद्ध खाद्य सामग्री और सस्ती बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आमजन का स्वस्थ रहने का सपना कभी पूरा नहीं होने पाता है। कई निजी चिकित्सा केन्द्र तो ‘‘लुटेरे’’ के नाम से कुख्यात रहते हैं किन्तु स्वस्थ होने की चाहत उन्हें उन ‘‘लुटेरों’’ के हाथों लुटने को मजबूर कर देती है। इसका कारण यही है कि आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाऐं निजी सेवाओं के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई और जोखिम भरी हैं। इस स्थिति में सुधार हो सकता है यदि सरकारी स्तर पर ईमानदार प्रयास किए जाएं। आखिर जीने का अधिकार तो हर किसी को मिलना ही चाहिए।        

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(दैनिक, सागर दिनकर में 30.09.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, September 29, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह  
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - ज़िंदगी के रंग अनेक
लेखिका     - आशा मुखारया
प्रकाशक    - पाथेय प्रकाशन, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मूल्य       - 200/-
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समीक्ष्य कहानी संग्रह उन कहानियों का संग्रह है जिसमें मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़े कथानक हैं। ये कथानक अपने घर-परिवार तथा अपने आसपास के घरों की अंतर्कथा हैं। कहानी संग्रह का नाम है-‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’। इसकी कहानीकार हैं आशा मुखारया। संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने से पहले लेखिका के भारतीय परिवेश और सामाजिक सरोकार को जान लेना आवश्यक है। लेखिका आशा मुखारया 5 जुलाई 1942 को जबलपुर (म.प्र.) में जन्मीं, वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई, किन्तु सागर (म.प्र.) से भी उनका गहरा नाता है। सागर में उनके अनेक परिवारजन निवासरत् हैं। उनके पति डाॅ. प्रताप सिंह मुखारया इतिहास के प्रोफेसर रहे। पति की सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र विवेक मुखारया के पास अमेरिका के जैक्सनविल (फ्लोरिडा) में बसने का निर्णय लिया। वहीं आशा मुखारया को अपने पति का चिरविछोह सहना पड़ा किन्तु बेटे-बहू के अपनत्व से उन्हें सहारा दिया। अपनी इकलौती संतान अर्थात् पुत्र विवेक के साथ रहना उनका सही निर्णय था लेकिन भारत में मौज़ूद अपना गांव, घर, शहर हर प्रवासी भारतीय की तरह उनके दिल में भी बसा हुआ है। नागरिकता भले ही अमेरिका की हो लेकिन दिल है हिन्दुस्तानी। आशा मुखारया की प्रत्येक कहानी में इस तथ्य को शब्दशः अनुभव किया जा सकता है। समय-समय पर भारत में प्रवास के दौरान भारतीय समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन और स्मृतियों की तिजोरी में सुरक्षित पुराने अनुभव उनकी कहानियों में सजीव हो उठे हैं। सीधे-सरल शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के लिखी गई ये कहानियां सहसा ही मन को छू जाती हैं। 
‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’ संग्रह की कहानियों का आकार बड़ा नहीं हैं। ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं। कुल अट्ठाईस कहानियां भारतीय परिवारों के अटठाईस रंग (शेड्स) दिखाती हैं। ‘‘निर्णय’’ शीर्षक कहानी पारिवारिक संबंधों में आती जा रही संवेदनहीनता को सामने रखती है। यह कहानी एक ऐसी स्त्री के बारे में है जो परिवार में बुआ का दर्ज़ा रखती है। अपने आरम्भिक जीवन में सारी सुख-सुविधाओं का आनन्द उठाती है। किन्तु जैसे-जैसे उसकी वृद्धावस्था आती है वह पारिवारिक उपेक्षा की शिकार बनने लगती है। इस कहानी का अंत लेखिका ने एक नाटकीय मोड़ के साथ रोचक बना दिया है। जो सुखद भी लगता है। ‘‘चंदा’’ शीर्षक कहानी को पढ़ते हुए यह अनुभव करना अच्छा लगता है कि लेखिका अपनी ज़मीन से यानी बुंदेलखण्ड से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहानी में बुंदेली गीतों को पिरोया है। 
‘‘वरदान’’ कहानी एक ऐसे स्त्री पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे परिस्थितिवश एक शक्की और क्रोधी व्यक्ति के साथ विवाह करना पड़ा और अनेक वर्ष घुटन भरा जीवन जीना पड़ा। किन्तु लंदन में बसे उसके बेटे ने उसका जीवन बदलने में मदद की और उसके हिस्से की खुशियां उसकी झोली में डाल दीं। यह एक ऐसी कहानी है जो स्त्री के पारिवारिक जीवन को एक नई पहचान देती है। इसे एक ज़रूरी-सी कहानी कहा जा सकता है। इस कहानी में स्त्री जीवन का वह पक्ष भी है जिसमें उसे निराधार लांछित किया जाता है। कहानी की नायिका दीपा का परिचय देते हुए लेखिका ने लिखा है-‘‘ये वही दीपा थी जो बचपन में मेरे यहां रोज़ ही आया करती थी। मेरी छोटी बहन की सहेली थी। ज़रूरत से ज़्यादा स्मार्ट और ख़ूबसूरत। महाराष्ट्रीयन परिवार से थी। पिता चीफ इंजीनियर थे। उसे किसी से भी बात करने में हिचक नहीं होती थी। उसकी इसी आदत को ले कर लोग तरह-तरह की बातें किया करते थे।जिन लोगों को लिफ्ट नहीं देती थी, वो उसके बारे में फ़ालतू बातें करते थे। पर वो एक बहुत अच्छे चरित्र वाली लड़की थी।’’ 
परिवारों में ज़ायदाद को ले कर होने वाले झगड़े और मनमुटाव आम बात है। मंा की मृत्यु पर बेटियों का उनके ज़ेवर को ले कर खींचातानी के सच्चे किस्से अकसर सुनने को मिल जाते हैं। यही मूल कथानक है, ‘‘मैं कहां हूं’’ कहानी का। इसी तरह ‘‘वापसी’’ कहानी उन माता-पिता की कहानी है जो विदेश में जा बसे अपने बच्चों के पास उत्साह से जाते हैं किन्तु वहां घोर उपेक्षा झेल कर अपने देश लौटने को विवश हो जाते हैं, जहां जीवन के नए अनुभव उनकी प्रतीक्षा में मुस्कुराते हुए खड़े हैं। 
‘‘वी आर जस्ट फ्रेंड्स’’ एक दिलचस्प कहानी है। यह एक फ्र्लट करने वाले लड़के के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की कहानी है। ‘‘ज़िन्दगी के रंग अनेक’’ संवेदनात्मक कहानी है। अपनों के होते हुए भी एकाकी जीवन जीने को विवश स्त्री की कहानी। इस कहानी में मन को भिगो देने वाला एक प्रसंग है-‘‘अपना बुढ़ापा उन्होंने अपनी किताबों के साहारे काट दिया। अपने कष्टों को छुपा कर वो अपना अकेलापन काटती रहीं। अपनी ज़िन्दगी से और अपनों से कभी शिकायत नहीं की और एक दिन चुपचाप मौत के आगोश में खो गईं।’’
संग्रह में एक कहानी है-‘‘ऐसी भी बहू’’। रोचक और सकारात्मक कहानी है जो ज़िदगी के एक ख़ास रंग को सामने रखती है। कहानी में एक ऐसी बहू का वर्णन है जो विखंडित होते आधुनिक परिवार की परिपाटी को अनदेखा कर के अपने परिवार के प्रति समर्पित रहने के लिए कृतसंकल्प है। ‘‘तीसरी पीढ़ी’’ उस पारिवारिक व्यवस्था को उजागर करती है जिसमें बेटियों को चाहे कितनी भी छूट दी जाए लेकिन जब विवाह की बात आती है तो माता-पिता पारम्परिक रुख अपना लेते हैं। लड़की चाहे विदेश में रह रही हो लेकिन उसके लिए विशुद्ध भारतीय दूल्हा और वह भी भारत में रह रहा हो तो और अच्छा है तथा दान-दहेज वाली शादी तय करने की मशक्कत शुरू हो जाती है। इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि एक अलग परिवेश में रह रही लड़की ठेठ परंपरावादी परिवार या पति के साथ कैसे सुखी रह पाएगी? ऐसी लड़की की स्थिति ठीक उस पतंग की भांति होती है जिसे खुले आकाश में ऊचे- बहुत ऊंचे तक उडज्ञने दिया जाता है तथा अपनी खुशी प्रकट कर के उसका उत्साह बढ़ाया जाता है। जब वह लड़की समझने लगती है कि वह अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार पा चुकी है, ऐन उसी समय उसकी डोर तेजी से लपेटे जानी लगती है। उड़ान समाप्त, स्वतंत्रता समाप्त, बाहरी दुनिया समाप्त, उसके निर्णय लेने का अधिकार समाप्त। उस पर माता-पिता अपने निर्णय को थोपना शुरू कर देते हैं तथा बाध्य करते हैं कि वह लड़की उनके निर्णय को माने। इस ट्रेजडी को कहानी की इन पंक्तियों में देखिए-‘‘इस बीच रिया को भी अपने साथ काम करने वाले एक जर्मन लड़के से प्यार हो गया और फिर इतिहास अपने को दोहराने लगा। और तीसरी पीढ़ी की कहानी शुरू हो गई। भारत में रिया के मां-बाप उसके लिए लड़का ढूंढने लगे।’’
संग्रह की एक और कहानी है जो समाज के बदलते माहौल की ओर संकेत करती है। कहानी का शीर्षक है-‘‘यहां से वहां’’। मेहमानों के चरित्र पर बुनी गई यह कहानी एक अलग ही खाका रचती है। कहानी के आरम्भिक पैरा देखिए- ‘‘आज के जमाने में लोग मेहमान-नवाज़ी से घबराने लगे हैं। पहले कैसे लोग मेहमान को भगवान मानते थे। ‘अतिथि देवो भवः’। पअ अब तो रात को घंटी बजते ही लोग घबराने लगते हैं कि पता नहीं कौन आ गया।’’
इसी कहानी के अगले पैरा में मेहमानों के बारे में भी लेखिका ने दिलचस्प विवरण दिया है-‘‘पर मुझे लगता है कि आज के मेहमान भी आरामपरस्त होते जा रहे हैं। जिसके घर भी जाएंगे, पांव पसार कर बैठ जाएंगे। बच्चों पर हुकंम चलाएंगे-पानी ले आओ, पेपर ले आओ, सिगरेट ले आओ। ये नहीं सोचते कि जिसके घर जाते हैं तो उसके काम में हााि बंटाएं जिससे मेहमान का आना न अखरे।’’
अमेरिका में बसे भारतियों के परिवेश का लेखा-जोखा है कहानी ‘‘सिद्धपुरुष’’ में। भारतीय संस्कृति और धर्म विदेश में भी भारतीयों को संबल प्रदान करता है। इस कहानी का एक अंश है-‘‘कई सालों से हम लोग अमेरिका के न्यूयार्क शहर में अपने बेटे के पास सेटिल हो गए थे। कई लोग हम लोगों से पहले वहां रहते थे। इसी से हमउम्र लोगों से काफी जान-पहचान हो गई थी। वहां पर बहुत बड़ा व सुंदर मंदिर है। हम सब सीनियर सिटीजन महीने में एक बार मिलते हैं और आपस में दुनिया-जहान की बातें करते हैं। उसमें धार्मिक बातों के अलावा जनरल, कुछ घरेलू समस्याओं पर भी बातें होती हैं।.... हम बुजुर्गों के पास समय काटने का बस यही एक तरीका था। सोमवार से शुक्रवार तक हमारे बच्चे अपनी नौकरी में काफी व्यस्त रहते हैं फिर भी उनकी कोशिश रहती है कि हम लोगों को भी समय दें। यहां पार्टियां बहुत होती हैं तो वो हम लोगों को पार्टियों में ले जाते हैं। वहां तरह-तरह के लोग मिलते हैं। बच्चों के सभी दोस्त बहुत अच्छे हैं।’’
विदेश में रहते हुए देश के अस्तित्व को अपने भीतर जगाए रखना और अपनत्व की तलाश में आपस में जुड़ते रहना हर प्रवासी भारतीय के जीवन का अभिन्न पक्ष होता है। अपने अतीत और अपने वर्तमान के बीच तुलना करना, अपने अतीत को याद रखना और पराए परिवेश में रच-बस जाना प्रवासी भारतीयों की खूबी होती है। यही विशेषता लेखिका आशा मुखारया की कहानियों देखा जा सकता है। उनकी कहानियां प्रत्येक पाठक से संवाद करने में सक्षम हैं। संग्रह का आमुख जबलपुर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व संपादक डाॅ. राजकुमार ‘सुमित्र’ ने लिखा है-‘‘लेखिका ने मध्यमवर्गीय परिवारों की रचना, स्थिति और मनःस्थितियों का सटीक चित्रण किया है। बेटे से बेटी भली, परिवारों की टूटन, वृद्धों की उपेक्षा और परदेश में देश की याद को बड़ी मार्मिकता से उकेरा है।’’ अपने कहानी लेखन के बारे में लेखिका आशा मुखारया ने स्वयं लिखा है कि ‘‘कई बार कई घटनाएं और पात्र अपनी छाप छोड़ जाते हैं जो सालों तक मन को सालते रहते हैं और जो अंत में काग़ज़ पर उतर कर कहानियों का रूप ले लेते हैं। चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी लिख जाते हैं। कई सालों से अपने मन के भावों को काग़ज़ पर उतारती रही और अंत में देखा कि इन कहानियों ने कहानी संग्रह का रूप धारण कर लिया है।’’
कुलमिला कर यह कहा जा सकता है कि यह छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह है जिसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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Monday, September 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, पता पर जैहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, पता पर जैहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   दो दिनां पैले रानगिर वारी माता हरसिद्धि देवी जू को बुलावा आओ औ हम चल परे उनके दरसन के लाने। बा कई जात है ने के जबे माता बुलात आएं, तभईं उनके दरबार में पौंचो जा सकत आए। वैसे जे बात सबई देवी-देवतन के लाने कई जात आए, चाए बे कोनऊं धरम के होंए। बाकी खास बात जो हम बताबो चात आएं, जे नईयां के माता ने हमाए लाने बुलावा भेजो। खास बात सो ईके बाद सुरू होत आए। का है के हम ओरन ने करी एक गाड़ी औ निकर परे। मकरोनिया से नरसिंगपुर रोड पकरी। संझा की बिरियां हती औ झिमिर-झिमिर पानी बरस रओ तो। अबे ऊ जांगा लौ पौंचे जां मुतके बड्डे-बड्डे कालेज ठाड़ें, औ हम ओरन खों पैलो धचका लगो। हम ओरन ने गाड़ी चलाबे वारे खों गरियाओ। बा कैन लगो के “हम का करें रोड पे गड्ढा हो गए हैं, कित्तऊ बचाओ धचका तो लगहेई।”
   कछू नईं, हमने सोची के जे तो  लोहरी रोड आए, अभईं फोर लेन पे पौंच के सरसरान लगबी। उते की रोड सो साजी हुइए। अखीर ऊको साजी रखबे के लाने अपन ओरें मुतको टोल टैक्स भरत आएं। मनों जे का? जैसेई फोर लेन पे पौंचे ऊंसईं भरका घांईं गोल-गोल गड्ढन ने हम ओरन को वेलकम करो। हमें याद आई के पर की साल जेई मोसम में हम फोर लेन से झांसी गए रए। संकारे मों अंदेरे निकरे हते औ रात लौं वापसी हती। मनो ऊ रोड पे गड्ढा औ गइयां इत्ती मिलीं के ने पूछो। अब बोई दसा ई रोड पे मिल रई हती। पर गड्ढा के बारे में कोनऊं खों फिकर नईं औ गइयां तो टोल नाका के इते बीच रोड पे पसरी मिलीं। बा दसा देख के हमें लगो की अपन कित्ते महान आएं जोन टैक्स तो भरत रैत आएं मानों साजी रोड के लाने मों ने खोल पाऊत आएं। है ने सई बात? जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, सई से पता पर जैहे।
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Friday, September 25, 2026

चर्चा प्लस | चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग 
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
   संत कबीर ने कहा है कि “कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस। ना जानो कहां मारिसी, कै घर कै परदेस।।” अर्थात तुम अपने इस शरीर और जीवन पर इतना अहंकार क्यों करते हो? मृत्यु (काल) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। वह तुम्हें कब और कहाँ ले जाकर मार देगी यह कोई नहीं जानता। फिर भी कुछ लोग सोचते हैं कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं! मैं सर्वोत्तम हूं! मैं अजर अमर हो गया हूं! मेरे विचार अनंत काल तक प्रवाहित रहेंगे! क्या सचमुच ऐसा संभव है?
जब विचारधाराएं ही स्थाई नहीं रहती अमरत्व को प्राप्त नहीं कर पाती हैं, फिर भी कोई व्यक्ति सोचे कि मैं हमेशा रहूंगा, मेरा नाम हमेशा रहेगा, मेरा अस्तित्व हमेशा रहेगा, तो यह सबसे बड़ा भ्रम है। दुख और सुख भी स्थाई नहीं रहते हैं तो फिर कोई विचार कोई व्यक्ति या कोई संस्था स्थाई कैसे रह सकती है? 
भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 में कहा गया है कि संसार में सुख-दुःख और परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।। 
अर्थात, हे कुन्ती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इंद्रियों और विषयों के संयोग केवल आने-जाने वाले और अनित्य (अस्थायी) हैं। हे भारत! तुम सहनशील बनो और उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।
सहन करना यह एक बहुत बड़ी विशेषता है और जो इस विशेषता में पारंगत हो जाता है वह निर्विकार हो जाता है। किंतु सहन करने के भी अनेक अर्थ हैं। जो व्यक्ति निर्बल है उसके  द्वारा किसी भी प्रकार की अत्याचार को सहन करना निर्विकार की श्रेणी में नहीं आएगा। उसकी स्थिति दलित और पीड़ित की ही बनेगी। अल्पकाल के लिए सहन करना और अवसर प्राप्त होते ही अपने सहनशक्ति को एक और रख कर आक्रामक हो जाना यह अवसरवादी सहनशीलता होती है। ऐसे मामले अधिकांश राजनीति के क्षेत्र में देखे जाते हैं या फिर कार्यालय परिवेश में जहां परिस्थिति वश व्यक्ति प्रताड़ित करने वाले अथवा दबाव बनाने वाले व्यक्ति की हर बात को सहन करता रहता है सिर्फ इस प्रतीक्षा में कि एक दिन समय आने पर वह पलटवार करेगा और डट कर जवाब देगा। बहरहाल चर्चा सिर्फ सहनशक्ति की नहीं बल्कि स्थायित्व और अमरत्व के भ्रम की है। 
 जब व्लादिमीर लेनिन ने रूस में साम्यवाद की स्थापना की थी और सोवियत संघ ने अपना आकार पाया था तक किसने सोचा था कि उन्हें के वंशज एक दिन लेनिन की मूर्ति को तोड़कर फेंक देंगे उनके विचारों को कुचल देंगे और साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़ जाएंगे। ठीक इसी तरह हमारे देश के पश्चिम बंगाल में भी उस समय तक किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि वहां से साम्यवाद के निशान ढूंढ के मिटा दिए जाएंगे, जिस समय वहां साम्यवादी सरकार थी, साम्यवादी विचारधारा का बोलबाला था। समय बदल चुका है। पूरी दुनिया में साम्यवाद सिमट चुका है। पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच एक नया पूंजीवादी साम्यवाद जन्म ले चुका है जिसे यदि राजनीतिक भ्रम कहा जाए तो गलत न होगा। किंतु इसकी किलकारी भी अभी दुनिया के बहुत कम देश में सुनाई देती है। हमारे देश भारत में स्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल में कई सड़कों और पुलों के नाम बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है। राज्य सरकार की 10 सदस्यीय कमेटी कोलकाता की प्रमुख सड़कें लेनिन सरणी, कार्ल मार्क्स, सरणी व हो-ची-मिन्ह सरणी के नाम बदलने में जुट गई है। यानी अंतिम निशान भी पोंछे जा रहे हैं। हमेशा यही होता है और यही होता रहेगा। जब हम वह कहावत सुनते हैं कि खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी तो इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि कभी उस इमारत का दबदबा रहा होगा। लेकिन समय के साथ इमारत ढहने लगी और खंडहर में बदल गई। न जाने कितने शहरों, गलियों और चौराहों के नाम बदले जा चुके हैं। यहां तक कि दुनिया में कुछ देशों ने भी अपने नाम बदल दिए। यह यूं ही नहीं होता। जब एक विचार दूसरे विचार पर स्थापित हो जाता है तो वह अपने अनुरूप पूरे परिवेश को बदलने लगता है चाहे वह किसी स्थान का नाम हो या व्यक्ति के कार्य या कृतित्व की स्मृति हो। यह प्रभावी विचार का दम्भ ही होता है जो समसामयिक रूप से उसे स्थाई और अमर होने के भ्रम में डाल देता है। वह सोचने लगता है कि मैं सर्वोत्तम हूं। मैं श्रेष्ठ हूं। मेरे जैसा दूसरा नहीं। मुझे यह दुनिया युगों-युगों तक याद रखेगी। मैं अमर हो गया हूं। मेरे विचार अमर हो गए हैं। ऐसे समय में वह भूल जाता है कि जिन विचारों को कुचलकर वह स्थापित हुआ है उन विचारों ने भी यही भ्रम पाल था कि वह अमर हो गए हैं।
अपने नाम एवं कार्यों के अमरत्व की भावना से प्रेरित होकर टाइम कैप्सूल भी भूमि में गाड़े गए। भारत में सबसे चर्चित सरकारी टाइम कैप्सूल (काल पात्र) 15 अगस्त 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले के पास जमीन से 32 फीट नीचे गाड़ा गया था। इसे आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में रखा गया था।  लाहौरी गेट के पास दबाए गए इस टाइम कैप्सूल को ‘‘काल पात्र’’ नाम दिया गया था। इसे लेकर देश में काफी लंबा राजनीतिक विवाद चला।इसमें भारत की आज़ादी के शुरुआती 25 वर्षों का घटनाक्रम, संघर्ष और देश की उपलब्धियों का विवरण था। इसके भीतर लगभग 10,000 शब्दों की एक पांडुलिपि  को तांबे की प्लेटों पर उकेरा गया था ताकि वह हजारों सालों तक सुरक्षित रहे। यह टाइम कैप्सूल 1,000 साल तो दूर, अपनी जगह पर मात्र 4 साल ही रह सका। आपातकाल  के बाद जब 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई, तो उन्होंने इस कैप्सूल को जमीन से बाहर निकलवा लिया। सरकार बदलने के बाद इसे निकाला और खोला तो गया, लेकिन इसके अंदर मिली सामग्री की पूरी रिपोर्ट को कभी भी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया।
        मेरे एक परिचित प्रोफेसर थे हिंदी विषय के। एक बार उन्होंने अपने शोध कार्य के संबंध में चर्चा करते हुए यह कहा कि मैंने फलां साहित्यकार पर शोध करके, उन पर सेमिनार करवा कर उन्हें अमर कर दिया है। उनकी लिखी सारी किताबें लाइब्रेरी में खरीदवा दी हैं। उन पर लिखी मेरी सारी किताबें भी लाइब्रेरी में  हमेशा रहेंगी। फिर उन्होंने यहां तक कह दिया कि मेरे नाम से उन्हें यानी उन फलां साहित्यकार को जाना जाएगा। मुझे उस समय आश्चर्य हुआ था यह सुनकर क्योंकि मैं इतिहास की विद्यार्थी थी और मैं यही पढ़ रही थी कि किस प्रकार बिस्मार्क, हिटलर, मुसोलिनी आदि काल की गर्त में समा गए। उनके विचार इतिहास की विषय वस्तु बन कर रह गए। उस कालखंड की तमाम विशेषताओं से हम विद्यार्थी सिर्फ अक्षरों के द्वारा ही ज्ञान प्राप्त कर रहे थे अन्यथा उसकी कल्पना हमारे लिए कठिन थी कि वह युग कैसा रहा होगा। मुझे उस समय भी लगा था कि आज प्रोफेसर जो कह रहे हैं कल इन्हें भी कोई याद रखने वाला रहेगा या नहीं क्योंकि यह इतिहास बनाने का भ्रम पाल रहे हैं लेकिन इनका व्यक्तित्व इतिहास में दर्ज होने योग्य भी नहीं है। हुआ भी यही है आज उन्हें कोई याद नहीं करता है उनकी लिखी किताबों के बारे में तो कोई जानता भी नहीं है और जिस साहित्यकार को अपनी लेखनी के द्वारा अमरत्व दिलाने का दावा उन्होंने किया था, वे जरूर एकेडमिक तबके में कभी-कभार याद कर लिए जाते हैं। अमरत्व उनके नाम को भी नहीं मिला।
कुछ साहित्यकारों को यह भ्रम होता है कि उनकी रचना यदि सिलेबस में शामिल हो जाएगी तो वह अमर हो जाएंगे, आने वाली पीढ़ी उन्हें याद रखेगी। जबकि हर पीढ़ी की व्यवस्था अलग होती है। हर पीढ़ी में अपने एक मौलिक विचार विकसित होते हैं। सिलेबस में दर्ज हर बात हमेशा याद नहीं रहती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने और उपाधि प्राप्त करने के साथ ही सिलेबस की पुस्तकों के अनेक पन्ने स्मृति से गायब हो जाते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि उन पन्नों में दर्ज़ ज्ञान और विचार व्यवहारिक जीवन के लिए अनुपयोगी हो जाते हैं और अनुपयोगी तत्वों से कोई भी अपना वास्ता नहीं रखना चाहता है, मस्तिष्क भी नहीं। 
    शाश्वत सत्य यही है कि जो आज है वह कल नहीं होगा और जो कल होगा वह परसों नहीं रह जाएगा। समय,परिस्थितियां और विचार परिवर्तनशील होते हैं। कुछ बुनियादी वैचारिक तत्व ही स्थाई रहते हैं जो यह बार-बार याद दिलाते हैं कि जीवन स्थाई नहीं है, सामान्य विचार अथवा कुविचार स्थाई नहीं हैं। यदि कुछ स्थाई है तो वह अच्छे विचार और नश्वरता का स्मरण।
स्वयं को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान मानने वालों को देखते हुए कबीर दास जी का यह दोहा याद आ जाता है-
माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोए।
एक दिन ऐसा होएगा, मैं रौंदूगी तोए।।           -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 24.09.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, September 22, 2026

पुस्तक समीक्षा | आम मुस्लिम परिवारों पर बुनी गई इक्कीस कहानियां जिनके केंद्र में है स्त्री-संघर्ष | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
आम मुस्लिम परिवारों पर बुनी गई इक्कीस कहानियां जिनके केंद्र में है स्त्री-संघर्ष
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - कौन लगती है वह आपकी ?
लेखक - आर.के. तिवारी
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, सागर मो. 9039390856
मूल्य - 150/-
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कहानी हमेशा एक ऐसा संसार रचती है जिसमें यथार्थ की नई पर कल्पना का वह सुंदर महल खड़ा किया जाता है जो मानव मूल्यों को स्थापित करने में सक्षम हो। दरअसल वह लिखित या मौखिक रचना है, जिसमें किसी वास्तविक या काल्पनिक घटना, पात्र या जीवन के किसी एक पक्ष का रोचक और संक्षिप्त वर्णन होता है। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के अनुसार, कहानी में संपूर्ण जीवन का विस्तृत विश्लेषण नहीं होता, बल्कि उसके किसी एक चरित्र, अंग या परिस्थिति का मनोरम चित्रण होता है। वहीं आलोचक रामचंद्र शुक्ल मानते हैं कि कहानी व्यष्टि से समष्टि में प्रवेश करने का द्वार खोलती है।’’
‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’ सागर के कथाकार आरके तिवारी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इस संग्रह में उनकी 21 कहानी संग्रहित है। इन कहानियां की विशेषता यह है कि यह सभी आम मुस्लिम समाज के परिवार, उनके रीति-रिवाज एवं उनकी स्थिति-परिस्थिति पर केंद्रित हैं। कथाकार के तिवारी की कथा लेखन की यह खूबी है कि वे समाज के यथार्थ को भावनात्मक स्तर पर आकलन करते हुए कहानियां लिखते हैं। आरके तिवारी जी ने बैंकिंग जीवन से सेवानिवृत होने के बाद बतौर साहित्यकार शब्दों के निवेश में अपनी विशेष पहचान बनाई है। आज उनका नाम सागर के साहित्यकारों में प्रतिष्ठापूर्वक लिया जाता है। उनकी रचनाओं में गहरा सामाजिक सरोकार उपस्थित रहता है। उनकी कहानी आम जीवन के दुख-सुख का ताना-बाना बुनती है। चाहे व्यंग हों, लघु कथाएं हों अथवा लघु उपन्यास सभी में तिवारी जी का रचना कौशल स्पष्ट दिखाई देता है। वैसे उनकी अब तक 11 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जिनमें 5 कहानी संग्रह, 3 लघु उपन्यास, 2 काव्य संग्रह, 1 व्यंग्य संग्रह है।
नवीनतम कहानी संग्रह ‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’ पहली कहानी है ‘‘कासमी बेन’’। यह एक ऐसी महिला की कहानी है जो देश प्रेम को ही अपना धर्म मानती है। इस कहानी की पात्र तबस्सुम भारत-पाकिस्तान की सीमा में आतंकवाद ग्रस्त क्षेत्र में बच्चे को अपने सीने से लगाए हुए शहीद हो जाती है। यह मार्मिक कहानी है। यह इस विश्वास को दृढ़ करती है कि प्रत्येक भारतीय चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो देश के प्रति पहले समर्पित रहता है तथा प्रत्येक नागरिक शांति चाहता है। इस कहानी में एक स्त्री की अडिग इच्छाशक्ति भी स्पष्ट रेखांकित है।
डॉ. आनंद तिवारी, प्राचार्य, शास.उ. स्ना. कन्या महाविद्यालय, सागर ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि ‘‘प्रत्येक कहानी का अंत आशावादी संदेश से समाप्त होता है। कहानी का मुख्यपात्र आम आदमी जो परिवार हेतु संघर्ष कर रहा है, भावनात्मकता दृष्टि से कहानियों में प्रेम, करूणा, समर्पण, त्याग, पारिवारिक मूल्यों को प्रदर्शित किया गया है। भाषा शैली सरल सहज और समझने योग्य है, प्रत्येक कहानी पाठक को आकर्षित करती है, क्योंकि कहानियों में सद्भाव, संवेदना, सहानभूति जैसी भावनायें प्रबलता से है। यह संग्रह पूर्णतः मुस्लिम महिलाओं, परिवारों पर केन्द्रित हैं। जो एक विशेष बात है।’’
      दूसरी कहानी है ‘‘गुलाबो’’। बच्चे तो आखिर बच्चे होते हैं कोमल, सुंदर, प्यारे-प्यारे। देवदूत से निर्मल एवं गुलाब के फूल जैसे मन को प्रफुल्लित कर देने वाले। नन्ही बच्ची गुलाबो भी ठीक एक गुलाब के फूल की तरह, सुंदर कोमल और निश्छल है। उसकी मां शकीला ने असलम से शादी सिर्फ इसीलिए की थी कि वह अपनी बेटी गुलाबो को एक अच्छी परवरिश के साथ एक पिता का प्यार भी उपलब्ध करा सके। लेकिन असलम के लिए वह एक सौतेली बेटी थी जिसे वह बात बात पर डांट देता था, झिड़क देता था। ऐसा लगता था कि वह गुलाबो को कभी अपनाएगा नहीं लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया और तब असलम को एहसास हुआ की गुलाबो उसकी अपनी सगी बेटी जैसी है क्योंकि बच्चे कभी सौतेली नहीं होते, बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। यह कहानी मानवीय संबंधों की रेशों की उलझन को सुलझाती हुई संवेदना का सुंदर ताना-बाना बुनती है।
तीसरी कहानी है ‘‘मायका’’। हर उसे स्त्री की दो दुनिया होती हैं जो विवाहित है। पहले दुनिया उसके मायके की होती है और दूसरी दुनिया ससुराल की। एक दुनिया से निकाल कर दूसरी दुनिया में प्रवेश करना और फिर उसमे स्वयं को राम देना आसान नहीं होता है। कई बार दूसरी दुनिया में निर्वाह करना कठिन हो जाता है तब उसे लौटना पड़ता है अपनी पहली दुनिया में जहां सब कुछ बदल चुका होता है। एक संघर्ष उसका स्वागत करता है जिस पर विजय पाना उसके लिए अनिवार्य है क्योंकि यही उसकी जीवन में परीक्षा की घड़ी भी होती है। यह कहानी आकार में भले ही छोटी है किंतु इसकी मुख्य पात्र साहिब के संघर्ष के रूप में एक भरपूर कथानक समेटे हुए हैं।
संग्रह में कई छोटी-छोटी कहानी है जैसे कम्मो, ईद की ईदी, हारुन मियां का दर्द, ख़ौफ़ बंदोबस्त आदि। इनमें ‘‘ईद की ईदी’’ एक बेहद मासूम कहानी है जो धर्म के नाम पर पलने वाले आपसी वैमनस्य पर तीखा प्रहार करती है। एक हिंदू व्यक्ति छोटी बच्ची को ईदी के रूप में पैसे दे कर एक पूरे मुस्लिम परिवार की मदद करता है जबकि ईद गुजरे कुछ महीने हो चुके हैं। यहां लेखक ने ईदी के सच्चे अर्थ को स्थापित करते हुए बताया है कि यह कोई ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ नहीं बल्कि इंसानियत और आपसी भाईचारे की प्रतीक का व्यवहार है।
लेखक एवं सिनेमैटोग्राफर माधव चंद्र ने कहानी संग्रह की कहानियों के बारे में विस्तृत टिप्पणी करते हुए ‘‘कौन लगती है वह आपकी ? लघु साहित्य की चैपाल से एक आवाज’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘साहित्य की दुनिया में कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो महज कहानी नहीं, बल्कि कौन लगती है वह? समाज के सीने में दबी हुई एक टीस होती हैं। यह 21 कहनियों का गुलदस्ता ‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’, इन्हीं टीसों को बड़े सादे ढंग से सामने रखती है। न इसमें कोई बड़ा दर्शन है, न कोई नाटकीय क्रांति। यह तो बस हमारे बीच की उस सच्चाई को दिखाती है, जहाँ रिश्तों पर रुतबे की धूल पड़ जाती है। लेखक, आर. के. तिवारी जी की यह किताब कौन लगती है वह आपकी? की इक्कीस कहनियों को पढ़ते हुए मेरा दिल बार-बार भर आया। जैसे कोई पुराना दोस्त कंधे पर हाथ रखकर कहे,देखो, जिंदगी इसी में है- दर्द में, प्यार में, भाईचारे में।’’
कहानी ‘‘शबीरा अंजुम’’ के आरंभ में ही कथाकार आरके तिवारी ने कथानक के स्वरूप से परिचित कराते हुए लिखा है कि ‘‘यह कहानी एक शबीरा अंजुम नाम की चित्रकार लड़की की है जिसकी परवरिश उसकी माँ ने की जिसे समाज की दकियानूशी विचारधारा और बेटियों के विरोधी मानसिकता वालों ने तलाक दे कर घर से बाहर कर दिया था पर वह हिम्मत नहीं हारी जो उनके गाल पर आजादी का एक तमाचा है।’’ वस्तुतः लड़की चाहे किसी भी धर्म या समाज की हो उसका संघर्ष एक लगभग एक-सा होता है। यदि उसे अपने परिवार से, अपने माता-पिता से सहारा मिल जाए तो वह हर एक संघर्ष में विजय पा सकती है। यही इस कहानी का मूल संदेश है। यह कहानी स्त्री की क्षमता और आत्मविश्वास की कहानी है।
कहानी “कौन लगती है वह आपकी” मालिक नौकर के आपसी संबंधों के झरोखे से मानवमूल्यों की तफ्तीश करती है। इसी कहानी का एक अंश है- “ऐसा कौन मालिक होगा जो अपने मुलाज़िमों की इस कदर फिक्र करता होगा कौन लगती है वह आपकी क्या रिश्ता है आपका और फिर उसी तेवर में बोली आप कुछ भी कहें! पर मुझे शक है कि फातीमा आपकी रखैल है और अब जब उसकी उम्र ढल गई तो अब आपकी नज़र उसकी जवान बेटी पर है। इतना सुनना था कि नवाब गुस्से से चीखते हुए बोले ! खामोश बदजात औरत ! तूं औरत के सारे कायदे भूल गई क्या! अपनी जुबान को लगाम दे वर्ना ! इतना कह नवाब कुछ और करे! कि तभी दरवाजे से एक जोरदार कड़क आवाज़ सुन कर सभी उसी ओर देखने लगे। वह आवाज़ और किसी की नहीं नवाब के चचा जान हामिद अंसारी की थी जो उसी शहर में अलग एक कोठी में अपने परिवार सहित रहते थे। जो कुछ दिनों पहले हज्ज के लिए गये थे और अभी हाल ही में लौटकर आये थे और आज अपने भतीजे नवाब नूर मोहम्मद से मिलने उनके घर आये पर यहाँ का माजरा देख गुस्से से रुबीना से बोले ऐ क्या बकवास लगा रखी है बहू! बेहूदी की हद हो गई तुम्हें कुछ पता भी है तुम अपने शौहर पर इतना घिनौना इलज़ाम लगा रही हो। तुम्हें पता भी है वह कितनी कशमकश की ज़िन्दगी जी रहा है! अरे उस खुदा का शुक्रिया अदा करो कि वह यह सब बरदास्त कर रहा है।”
हर अंधेरा भीतर से इतना स्याह भी नहीं होता जितना ऊपर से दिखाई देता है। हर नौकर बेईमान नहीं होता और हर मलिक क्रूर या शोषक नहीं होता। जहां मानवी संवेदनाएं होती हैं वहां मालिक और नौकर का आपसे रिश्ता एक दूसरे के पूरक के रूप में होता है किसी बेमेल रिश्ते की तरह नहीं। क्या कहानी एक ही एक अलग ही धरातल पर पाठकों से सीधा संवाद करती है और मन को छू जाती है।
“बंदोबस्त” कहानी मैं वर्णित परिस्थितियां किसी भी मजहब से जुड़े परिवार की हो सकती है क्योंकि दंगे फसाद मजहब के नाम पर होते हैं लेकिन उस पीड़ित होने वाले सिर्फ इंसान ही होते हैं। मात्र धर्म के आधार पर किसी को दंगाई मान लेना मानवीय कृत्य है। यह कहानी उसे परिवार की है जिसके एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति को दंगाई होने की संदेह में गिरफ्तार कर हवालात में डाल दिया जाता है। घर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। नन्हा बालक रसूल इन सब बातों से अनभिज्ञ है। वह मां से जिद करता है कि इस बार ईद में उसके लिए नया कुर्ता पजामा सिलवा दे। उसकी मां अपनी व्यवस्था पर रो पड़ती है। लेकिन जो व्यक्ति खांटी विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत से कम लेता है उसके लिए रास्ते खुद ब खुद निकल आते हैं।
कथाकार आर.के. तिवारी ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय एवं निम्न मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवारों की समस्याओं को प्राथमिकता दी है तथा उनका सकारात्मक हल भी अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से यह कहानी संग्रह न केवल पठनीय है अपितु मनन-चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। सभी कहानियां मुस्लिम परिवारों पर केंद्रित होने के कारण भी यह संग्रह विशिष्ट बन गया है।
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Saturday, September 19, 2026

टाॅपिक एक्सपर्ट | गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षण खों मानों, सब अच्छो-अच्छो रैहे- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

टाॅपिक एक्सपर्ट |
गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षण खों मानों, सब अच्छो-अच्छो रैहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     गणपति बप्पा बिराजे हैं औ संगे जैन समाज को दसलक्षण परब सोई चल रओ । बप्पा सो भलो करहेईं, मनो अपन ओरन खों बी कछु अच्छे काम करो चाइए जीसे जिनगी सुदर जाए। अच्छी बातें सबई धरम में होत आएं। सो, अच्छी बातें चाए जोन धरम की होंए बे सबई मानुस को पालन करो चाइए। जो ने पतो होय सो खुदई देख लेओ। पैलो लक्षण आए क्षमा। दूसरो आए मार्दव मने ने लड़ो औ ने झूठो गरब करो। तीसरो आए आर्जव मने दूसरों से जलापिट्टी ने करो। चौथो आए सत्य। अब ई बारे में आप सब खुदई जानत हो। पांचवो आए शौच मने बुरई आदतन औ लालच खों छोर देओ। छठों आए संयम मने सहूरी धरे में भलाई ठैरी। सातमों तप औ आठमों आए त्याग। ईको मतलब जे के नोने काम करो औ सबरी बुराई खों छोर देओ, सो गिरहस्थी बी नोनी चलहे। नौमों अंकिचन औ दसमों आए  ब्रह्मचर्य। अंकिचन मने नियम खों पालो औ ब्रह्मचर्य मने बुरई आदत़ें छोर के भले मानुस बनो। सो जे सबरे लक्षण सबई के पालन जोग आएं। सांची कई के नईं?
    जो पइसा की जोड़ा-जोड़ी में ने परो जाए तो जिनगी आसान हो जाए। फेर  रिशवतखोरी, कामचोरी, मिलावटखोरी ने हुइए। दूसरन की मदद करो। औ संगे, सांची बोलो औ कोनऊं सल्ल ने पालो। गणपति बप्पा बी जेई कैत आएं औ महवीर जू बी जेई कैत आएं। जो अपन ओरें अच्छे से रैहें, तो अपनो घर-परिवार अच्छो रैहे। जो घर-परिवार अच्छो रैहे, सो अपने गांव-शहर अच्छे रैहें। अच्छे गांव-शहरन सेई तो अपनो देस अच्छो रैहे। सो गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षणन खों मानों। फेर सब अच्छो-अच्छो हुइए।
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हार्दिक आभार पत्रिका 🙏
हार्दिक आभार प्रिय रेशू 🌹
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Wednesday, September 16, 2026

चर्चा प्लस | श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                              एकदंत, मोहासुरपति, विध्नराज, धूम्रवर्ण, गजानन आदि 108 नाम हैं श्री गणेश के जिन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। जिा देवता का अवतरण ही अत्यंत रोचक ढंग से हुआ हो और जिन्होंने एक अलग ही स्वरूप पाया, ऐसे देव श्रीगणेश के हर नाम के पीछे एक कहानी मौजूद है। ये कहानियां श्रीगणेश के स्वरूप को तो समझाती ही है, साथ ही इस बात से भी आगाह करती हैं कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी रूप, रंग या व्यवसाय को हो उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हर व्यक्ति अपने गुणों के कारण पूज्य बन सकता है।  

हिन्दू संस्कृति में श्रीगणेश एकमात्र ऐसे देवता है जिनका मुख हाथी का तथा शेष शरीर मनुष्यों  अथवा देवताओं जैसा है। उनका यह स्वरूप मानव और वन्यजीवन के बीच घनिष्ठ अटूट संबंधों को दर्शाता है। वन्य पशुओं में हाथी को सबसे अधिक बलशाली, सबसे अधिक बुद्धिमान, सबसे अधिक स्मरणशक्ति वाला तथा सबसे अधिक धैर्यवान माना जाता है। हाथी तब तक किसी पर प्रहार नहीं करता है जब तक कि उसके परिवार अथवा उस पर संकट न आए। हाथी दीर्घायु होता है तथा विशुद्ध शाकाहारी होता है। अलौकिक शक्ति के धनी होते हुए भी श्रीगणेश में समस्त गजतत्व मौजूद हैं। सृष्टि की योग्य कृति मानव तथा वन्य समुदाय की सर्वश्रेष्ठ रचना गज के सम्मिश्रण वाले श्री गणेश की शक्तियों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी ने ही महाभारत को अबाधगति से लिपिबद्ध किया था।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितं।
उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।
श्रीगणेश के एक नहीं अपितु 108 नाम हैं, जिनका जाप किया जाता है। प्रत्येक नाम का अपना एक अलग महत्व है। जैसे - अखुरथ- जिनके पास रथ के रूप में एक चूहा है, अलमपता- सदा सनातन भगवान, अमितःअतुलनीय प्रभु, अनंतचिद्रुपमयं- अनंत और चेतना-व्यक्तित्व, अवनीश- पूरी दुनिया के भगवान, अविघ्न- सभी बाधाओं को दूर करने वाला, बालगणपति- प्रिय और प्यारा बच्चा, भालचंद्र- चंद्रमा-कलक वाले भगवान, भीम- विशाल और विशाल, भूपति- देवताओं के स्वामी, भुवनपति - जगत के स्वामी, बुद्धिनाथ- ज्ञान के देवता, बुद्धिप्रिया- ज्ञान और बुद्धि को प्यार करने वाले भगवान, बुद्धिविधता- ज्ञान और बुद्धि के देवता, शूपर्णकर्ण- बड़े कान वाले भगवान, शुबनः सर्व मंगलमय प्रभु, शुभगुणकानन- वह जो सभी गुणों का स्वामी है, श्वेता- वह जो सफेद रंग की तरह पवित्र हो, सिद्धिधाता- सफलता और सिद्धियों के दाता, सिद्धिप्रिया- वह जो इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा करती है, सिद्धिविनायक- सफलता के दाता, स्कंदपुर्वजा- स्कंद (भगवान मुरुगन) के बड़े भाई, सुमुख- जिसका मुख प्रसन्न है, सुरेश्वरम- सभी प्रभुओं के भगवान, स्वरूप - सौंदर्य के प्रेमी, तरुण- अजेय भगवान, उद्दंड- बुराइयों और दोषों की दासता, उमापुत्र- देवी उमा (पार्वती) के पुत्र, वक्रतुंड - घुमावदार सूंड वाले भगवान, वरगणपति - वरदानों के दाता, वरप्रदा- इच्छाओं और इच्छाओं का दाता, वरदविनायक - सफलता प्रदान करने वाले, वीरगणपति- वीर प्रभु, विद्यावारिधि- ज्ञान और बुद्धि के देवता, विघ्नहर्ता- विघ्नों का नाश करने वाले, विघ्नराज- सभी बाधाओं के भगवान, विघ्नस्वरूप- विघ्नों का रूप धारण करने वाले, विकट- विशाल और राक्षसी, विनायक- सभी लोगों के भगवान आदि।
श्रीगणेश के कुछ नामों की रोचक कथाएं भी देख ली जाएं। ये ही तो हमारी पौराणिक विरासत हैं-

एकदंत की कथा
श्रीगणेश के एकदंत होने की कई कथाएं मिलती हैं-
एक कथा- एक बार विष्णु के अवतार परशुराम शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यानावस्थित थे तथा वे कोई व्यवधान नहीं चाहते थे। शिवपुत्र गणेश ने परशुराम को रोक दिया और मिलने की अनुमति नही दी। इस बात पर परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्री गणेश को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। श्रीगणेश ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ। इसी युद्ध में परशुरामजी के फरसे से उनका एक दांत टूट गया।
दूसरी कथा- भविष्य पुराण में कथा है जिसके अनुसार कार्तिकेय ने श्रीगणेश का दन्त तोडा था। श्रीगणेश अपनी बाल अवस्था में अति नटखट हुआ करते थे। एक बार उन्होंने खेल-खेल में अपने ज्येष्ठ भाई कार्तिकेय को परेशान करना शुरू कर दिया। कार्तिकेय को श्रीगणेश पर गुस्सा आ गया और वे गणेश से लड़ पड़े। इसी लड़ाई-झगड़े में गणपति का एक दांत टूट गया।
तीसरी कथा- एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत लिखने के लिए किसी बुद्धिमान लेखक की जरुरत थी। उन्होंने इस कार्य के लिए श्रीगणेश को चुना। श्रीगणेश इस कार्य के लिए मान तो गए। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखाते समय रुकेंगे नहीं और न ही बोलना बंद करेंगे। वेदव्यास ने शर्त स्वीकार कर ली। तब श्री गणेश जी ने अपने एक दांत को तोड़कर उसकी कलम बना ली और उसी से वेद व्यास जी के वचनों पर महाभारत लिखी।
चौथी कथा- गजमुखासुर नामक एक महाबलशाली असुर हुआ जिसने अपनी घोर तपस्या से यह वरदान प्राप्त कर दिया की उसे कोई अस्त्र शास्त्र मार नही सकता। यह वरदान पाकर उसने तीनो लोको में अपना प्रभुत्व जमा लिया। सब उससे भयभीत रहने लगे। तब उसका वध करने के लिए सभी देवताओं ने श्रीगणेश को मनाया। गजानंद ने गजमुखासुर को युद्ध के ललकारा और अपना एक दांत तोड़कर हाथ में पकड़ लिया। गजमुखासुर को अपनी मृत्यु नजर आने लगी। वह मूषक रूप धारण करके युद्ध से भागने लगा। गणेशजी ने उसे पकड़ लिया और अपना वाहन बना लिया।

मोहासुरपति
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं को प्रताड़ित करने के लिए भेजा। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया। तभी से श्रीगणेश मोहासुरपति कहलाए।

लंबोदर
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर मोहित हो गए। भावावेश में उनका स्खलन हो गया, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

विकट
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

विघ्नराज
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी भेंट शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

धूम्रवर्ण
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वह शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए। उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।

श्रीगणेश अन्य देवताओं की भांति शारीरिक दृष्टि से सुंदर नहीं हैं किन्तु उनकी अपरिमित बुद्धि के कारण उन्हें प्रथमपूज्य देवता का पद प्राप्त है। यही वह बात है जिसे हम मनुष्यों को सीखना चाहिए कि जाति, धर्म, आकार, प्रकार, सुंदरता, असुंदरता का कोई अर्थ नहीं है, यदि किसी चीज का अर्थ है तो वह है सर्वकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में और यही सत्य हमारे जीवन में उनके अस्तित्व को रोचक बनाता है।


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(दैनिक, सागर दिनकर में 16.09.2026 को प्रकाशित) 
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