चर्चा प्लस
जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हम पशुओं का सम्मान करते हैं। हम गाय को अपनी माँ मानते हैं। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई माँ समान गाय को ज़रा भी चोट पहुँचाए। जब हम कुत्तों को सड़कों पर घूमते हुए देखते हैं, तो हमें उन पर दया आती है। जब किसी गाड़ी की टक्कर से किसी कुत्ते की मौत हो जाती है, तो उसकी बेरहम मौत पर हमें दुख होता है। जानवरों के लिए हमारे मन में कोमल भावनाएँ होती हैं, लेकिन इस जीव दया की भावना के चलते क्या हम मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बढ़ता नहीं जा रहा है? आवारा कुत्तों को न मारा जाए यह एक अच्छी मानवीय भावना है किन्तु वहीं जब 3 साल की नन्हीं बालिका माही का 55 टांकों वाले चेहरे की तस्वीर देखने को मिलती है तो आत्मा कांप उठती है। क्या गुज़री होगी उस नन्हीं बच्ची पर। उसका क्या दोष था जो उसे आवारा कुत्तों के हमले की मर्मांतक पीड़ा झेलनी पड़ी। तो क्या उन आवारा कुत्तों को पूरा दोष था जो भेड़ियों के कुल के हैं और जिनके डीएनए भेड़ियों से 99 प्रतिशत मिलते हैं? इस विषय पर गंभीरता से सोचना जरूरी है और हल निकालना भी।
लगभग हर भारतीय शहर, गांव और कस्बों में आवारा कुत्ते पीढ़ियों से घूम रहे हैं। बेशक वे हमारे मित्र हैं, वफादार हैं लेकिन उस स्थिति में जब वे हमारे पालतू हों। वैसे पालतू कुत्तों के द्वारा अपने मालिक को काट लिए जाने की भी अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं। मगर समस्या उनकी नहीं बल्कि उन कुत्तों की है जो सड़कों पर दबंगई से आवारा घूमते हैं। पहले यह कानून था कि नगरपालिका द्वारा जगहर की गोलियां दे कर कुत्तों की संख्या को नियंत्रित कर दिया जाता था किन्तु जब से माननीय मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवाया कि आवारा कुत्तों को ज़हरीली गोलियाँ देकर नहीं मारा जाना चाहिए, तब से उनकी संख्या काफ़ी बढ़ गई है। यह जीव दया के पक्ष में एक अच्छा निर्णय था। मैं खुद जानवरों को मारने के विरुद्ध हूँ। किसी जानवर को ज़हर देकर मारना मानवीय तरीका नहीं है। लेकिन इस कानून को लाते समय क्या यह सोचा गया कि इसके परिणाम क्या होंगे? यह तो पता नहीं किन्तु आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी किए जाने का कानून पास हुआ। लेकिन समस्या यह है कि हमारे देश में कई अच्छे प्रावधान तो हैं, पर उनके लागू होने में कई कमियाँ हैं। इन्हीं कमियों की वजह से कुत्ते आज भी गाँवों और शहरों में बड़ी संख्या में घूम रहे हैं और अपनी बदकिस्मती का जीवन जीते हुए मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हैं।
समाचार पत्रों में आए दिन आवारा कुत्तों द्वारा गंभीर रूप से काटे जाने की घटनाएं पढ़ने को मिलती रहती हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के माहिदपुर तहसील के देवलवाड़ी गांव में 3 वर्ष की मासूम माही अपने पिता के साथ अपने घर के बाहर आंगन में थी, तभी एक कुत्ते ने उन पर हमला कर दिया। नन्हीं माही को इतनी बुरी तरह से काटा कि उसका चेहरा लहूलुहान हो गया। चिकित्सकों को उसके घावों को सीने के लिए 55 टांके लगाने पड़े। ज़रा सोचिए कि 3 साल की नन्हीं बच्ची और 55 टांके! अखबार में छपी तस्वीर देख कर आंखों में आंसू आ गए। क्या यह जीव दया का उल्लंघन नहीं है? किन्तु आवारा कुत्तों को क्या पता कि जीव दया क्या होती है। वे तो स्वभाव से ही वन्य पशुओं के समान हैं।
यह वैज्ञानिक सत्य है कि कुत्ते भेड़ियों के कुल के हैं। कुत्तों और भेड़ियों के डीएनए में 99 प्रतिशत समानता है। वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार, पालतू कुत्ता और ग्रे भेड़िया दोनों ‘‘कैनिडे’’ कुल का हिस्सा हैं। ये आपस में प्रजनन करके स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकते हैं। वैसे कुत्ते सीधे तौर पर आधुनिक भेड़ियों के वंशज नहीं हैं, बल्कि आज के कुत्ते और भेड़िये दोनों ही एक विलुप्त हो चुके प्राचीन भेड़ियों के वंशज हैं। मनुष्यों के साथ रहते-रहते वे मनुष्य-मित्र बन जाते हैं। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो उनके व्यवहार में परिस्थितिजन्य भिन्नता मौजूद रहती है। जैसे जिन पालतू कुत्तों को घूने-फिरने की आजादी, लोगों से मेल-मिलाप की छूट और अपने मालिक से अधिक प्रेम मिलता है वे प्रायः शांत और मिलनसार स्वभाव के हो जाते हैं। किन्तु जिन पालतू कुत्तों को अधिकतर पिंजरे में या जंजीरों से बांध कर रखा जाता है तथा रात में ही चौकीदारी के लिए बाहर लाया जाता है वे अधिक खूंखार यानी एग्रेसिव होते हैं। फिर भी दोनों ही स्थिति के पालतू कुत्तों को समय पर भोजन-पानी और दवाएं मिलती रहती हैं। कम से कम दिन में दो बार उन्हें पट्टा बांध कर घर के बाहर घुमाया भी जाता है। हमारे देश में विशेषरूप से उन्हें पौटी कराने के लिए। जोकि शर्मनाक बात है। क्योंकि एक ओर तो अपने पालतू कुत्तों को सब कुछ अच्छे से अच्छा दिया जाता है, वहीं पौटी कराने के लिए किसी भी गंदी जगह पर ले जाता जाता है। जिनसे उन कुत्तों को भी बीमारियां होने का खतरा रहता है और मनुष्यों को भी गंदगी का सामना करना पड़ता है।
खैर, आवारा कुत्तों की स्थिति पालतू कुत्तों से भिन्न होती है। उन्हें हर उस व्यक्ति की ओर आशा भरी दृष्टि से देख कर दुम हिलाना होता है जिनसे उन्हें रोटी के कुछ टुकड़े मिलने की उम्मींद होती है। ये कुत्ते भोजन की आशा में स्वयं को वफादार और चौकीदार बनाने में जुटे रहते हैं। इसीलिए ये आवारा कुत्ते हमें अच्छे लगते हैं। हम उन्हें बचा हुआ भोजन देकर सोच लेते हैं कि उससे उनका पेट भर गया होगा। जबकि सच्चाई यह नहीं होती है। दिन भर दाने-दाने के लिए भटकने वाले कुत्ते जहां एक ओर अपने समुदाय में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए संघर्ष करने हैं वहीं निरंतर भटकते रहने के कारण उन्हें जितनी भूख लगती है, उतना खाना नहीं मिलता है। उस स्थिति में तो और भी नहीं जब कुत्तों की संख्या अधिक हो। यहीं से शुरू होता है उनके भेड़िए वाले डीएनए का कुलबुलाना। भेड़िए समूह में रहते हैं जिसका नेता उनमें सबसे शक्तिशाली यानी अल्फा भेड़िया होता है। उस अल्फा भेड़िए के नेतृत्व में ही शेष भेड़िए शिकार करते हैं। आवारा कुत्तों में भी कमजोर कुत्ते उस शक्तिशाली कुत्ते के साथ समूह बना लेते हैं जिसके बल पर उन्हें भोजन का कुछ हिस्सा मिल सके। आवारा कुत्तों के हर झुंड में एक अल्फा डॉग होता है। यह खूंखार, अवसरवादी और आक्रामक होता है। चूंकि आवारा कुत्ते मनुष्यों की बस्ती में रहते हैं और वे जानते हैं कि उन्हें मनुष्यों से ही भोजन मिलेगा, इसलिए वे मनुष्यो से ‘‘बना कर चलते’’ हैं। लेकिन जब उनका अपना झुंड बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो वे अपनी भूख मिटाने के लिए अवसर वादी बन जाते हैं। साथ ही उनके भीतर की हिंसक प्रवृत्ति जागने लगती है। अकसर यह देखने में आता है कि आवारा कुत्ते छोटे बछड़ों को घेर कर उसे काटने का प्रयास करते हैं। ऐसे मुसीबत में फंसे बछड़ों को कभी गाय बचा लेती है तो कभी मनुष्य। फिर भी कई बार नन्हें बछड़े कुत्तों का शिकार हो जाते हैं। पानी की तलाश में गांव में घुस आने वाले हिरण जैसे मासूम पशु भी आवारा कुत्तों के शिकार बन जाते हैं। क्योंकि बात वही है कि आवारा कुत्तों के भीतर का भेड़िया जाग उठा होता है।
मनुष्य आखिर मनुष्य होता है और पशु अंततः पशु। जो मनुष्य हिंसक हो जाता है उसे भी ‘‘पशुवत’’ ही कहा जाता है। तो आवारा कुत्तों के हिंसक होने और अचानक किसी कमजोर प्राणी पर हमला कर देने को उसकी हिंसक प्रवृत्ति नहीं तो और क्या कहेंगे?
अब प्रश्न यह है कि इन आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और इनके बढ़ते आतंक से बचने का उपाय क्या है? बेशक नसबंदी का उपाय लागू किया गया है जो पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इसके उदाहरण कुत्तों के झुंड के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल विचार इस बात पर होना चाहिए कि जीव दया की भावना भी बनी रहे, कुत्तों को भी कष्ट न हो और मनुष्य भी सुरक्षित रहें। जाहिर है कि इ सके लिए हमें विदेशों विशेषरूप से अमरीका, योरोप, चीन, जापान आदि की ओर देखना और उनसे सीखना होगा कि वहां की सड़कें आवारा कुत्तों से कैसे मुक्त हैं? हमारे मंत्रियों एवं अधिकारियों के दल प्रायः विभिन्न ज्ञान की प्राप्ति के लिए सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राएं करते रहते हैं किन्तु इस विषय का हल क्यों नहीं ढूंढ कर ला सके? या फिर इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई?
विदेशों में सड़कों पर कोई भी आवारा पशु घूमता दिखाई नहीं देता है। क्योंकि वहां परिस्थितिवश आवारा हुए कुत्तों के लिए डॉग शेल्टर होते हैं जहां उन्हें रख कर उनकी देखभाल की जाती है। हम स्वयं को जीव दया का सबसे कट्टर समर्थक मानते हैं किन्तु हमीं जीव दया का सही तरीका नहीं जानते हैं। यदि कोई पशु आवारा घूम रहा है और दाने-दाने के लिए मोहताज जीने को विवश है तो उसे रोटी के दो टुकड़े दे कर जीव दया का दम नहीं भर सकते हैं। सही जीव दया तो तब होगी जब हम उनके लिए रहने की उचित व्यवस्था, खाने का उचित प्रबंध कर सकें। इस बिन्दु पर विदेशी हमसे अधिक जीव दया वाले हैं। अमरिका और योरोप में तो कुत्ता पालने की बाकायदा परमीशन लेनी पड़ती है और इस बात के लिए प्रशासन को आश्वस्त करना पड़ता है कि वे जो भी पशु पालेंगे, उसका हर प्रकार से पूरा ध्यान रखेंगे। यदि वे अपनी बात पर खरे नहीं उतरते हैं और अपने पालतू पशु को पीड़ा पहुंचाते हैं तो प्रशासन उनसे उनका पालतू पशु छीन कर ले जाता है और शेल्टर होम के हवाले कर देता है। हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। देश में कुछ एनजीओ हैं जो डॉग शेल्टर होम चलाते हैं वरना अधिकतर एनजीओ भी आवारा कुत्तों को नियमित खाना खिला कर अपने कर्तव्य को पूर्ण समझ लेते हैं।
यदि कुत्ते सड़कों पर आवारा घूमेंगे और भूखे रहेंगे तो अपना झुंड बनाएंगे ही ताकि मिल कर शिकार द्वारा अपने लिए भोजन जुटा सकें। यही उनकी डीएनए प्रकृति है। इसमें उनका कोई दोष नहीं है। विपरीत परिस्थिति में उनके भीतर का भेड़िया जागने लगता है और वे एग्रेसिव हो कर वह कर बैठते हैं जो हम मनुष्यों को लगता है कि उन्हें नहीं करना चाहिए। जो कुत्ते पीढ़ियों से मनुष्यों के बीच रह रहे हैं उन्हें जंगल में नहीं खदेड़ा जा सकता है और न निर्ममता से मौत के घाट उतारा जा सकता है। लेकिन जलवायु में बढ़ती गर्मी और अधिक संख्या के कारण भोजन की कमी का दबाव आवारा कुत्तों को हमलावर बनाने लगा है। लिहाजा, अब समय आ गया है कि कुत्तों को मनुष्यों से एक निश्चित दूरी पर पहुंचा दिया जाए। यह तभी संभव है जब हर शहर, गाव, कस्बे में डॉग शेल्टर होम बनाए जाएं। क्योंकि विचारणीय बात है कि यदि आवारा कुत्तों की वर्तमान पीढ़ी को नसबंदी द्वारा संतति के अयोग्य बना भी दिया जाए तो क्या यह पीढ़ी मनुष्यों पर हमला करना छोड़ देगी? नहीं! भूख, मौसमी परेशानियां और उनकी बढ़ी हुई संख्या का दबाव उन्हें एग्रेसिव तथा हमलावर बनाता रहेगा।
यदि धार्मिक दृष्टि से विचार करें तो कुत्ता उन कालभैरव का वाहन है जो बस्ती से बाहर पहाड़ों में निवास करते हैं। हम अपने स्वार्थ में उन्हें शहर में ला कर आवारा जीवन जीने को विवश कर चुके हैं और अब वे जब हमारे लिए कालदूत बनते जा रहे हैं तो हमें भी इस पर पुनः विचार करना चाहिए कि उनका असली स्थान कहां है। अब पहाड़ों अथवा जंगलों में नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि वे हमारे स्वभाव के अनुरूप ढल गए हैं, उनका वन्य स्वभाव शांत आचरण में बदल चुका है। लेकिन उनके भीतर की हिंसा को जगाने वाले तत्वों का तोड़ ध्यान में रखते हुए उनके लिए सबसे उपयुक्त जगह है डॉग शेल्टर होम। जब सड़कों पर से आवारा कुत्ते हट जाएंगे तो उनका आतंक भी समाप्त हो जाएगा और फिर प्रत्येक माही सुरक्षित जी सकेगी। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 17.06.2026 को प्रकाशित)
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