पुस्तक समीक्षा
बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत
संपादक - प्रो. नागेश दुबे, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन
प्रकाशक -रिसर्च इंडिया प्रेस ई-6/34 फर्स्ट फ्लोर, संगम विहार नई दिल्ली-110080
मूल्य -3500/-
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बुंदेलखंड संस्कृति का धनी है। इसके इतिहास के पन्ने इसकी संस्कृति के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्रागैतिहासिक काल में भी वह संस्कृति बुंदेलखंड में मौजूद थी जिसके मनुष्यों ने आबचंद की गुफाओं में भित्ति चित्र बना कर अपने अनुभवों एवं अपनी जीवनचर्या को आने वाली पीढ़ियों के लिए अंकित कर दिया। बुंदेलखंड में अवशेषों के रूप में मिलने वाले मृदभाण्ड, औजार एवं आभूषणों से इस अंचल में सास्कृतिक विकास की सम्पूर्ण कथा पढ़ी और जानी जा सकती है। बुंदेलखंड में कला और संस्कृति के विकास का चरम बिन्दु था खजुराहो के मंदिर एवं मूर्तियां। जहां धर्म, दर्शन, आध्यात्म, जीवन आदि सभी एकाकार हो कर बोल उठते हैं तथा तत्कालीन समाज की मानसिक विशालता से परिचित कराते हैं। बुंदेलखंड में अभी भी अनेक पक्ष ऐसे हैं जिन पर सतत शोधकार्य किया जा रहा है ताकि काल के पर्दों के पीछे छिपे हुए तथ्यों को प्रकाश में लाया जा सके। इस कार्य में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग का सबसे बड़ा योगदान है। विभाग में म्यूजियम के संस्थापक डाॅ. के.डी. बाजपेयी से ले कर वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे ने गहन शोध कार्य किए हैं तथा कराए हैं। प्रो.नागेश दुबे ने समय-समय पर सेमिनार में शोध आलेख का न सिर्फ वाचन कराया अपितु उन शोध आलेखों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करा कर उन्हें दस्तावेज में ढाल दिया जो कि भावी शोधकर्ताओं के लिए भी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ दिशानिर्देश देने का भी काम करते हैं। ऐसा ही एक शोध ग्रंथ प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है ‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’। इस शोघ ग्रंथ का संपादन किया है प्रो. नागेश दुबे तथा डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने।
प्रो. नागेश दुबे ने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से ही वर्ष 1998 में पीएच.डी. की उपाधि प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग से प्राप्त की। वे इसी विभाग में नियुक्त हुए तथा अकादमिक कार्यों के साथ ही वर्ष 2014 से निरन्तर इस विभाग में विभागाध्यक्ष पद का भी निर्वहन कर रहे हैं। इनकी विषय विशेषज्ञता प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास तथा भारतीय कला एवं स्थापत्य है। इन्होंने अनेक पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों में भी सहभगिता की है। इनकी आठ पुस्तके प्रकाशित हैं। इन्होंने सात राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल आयोजन आपके निर्देशन में करवाया है तथा सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता भी की है। इनके 60 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। इनके शोध निर्देशन में 20 शोधार्थियों ने शोधकार्य पूर्ण किया है।
वहीं, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय (उ.प्र.) से स्नातकोत्तर तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने पुरातत्त्व विषय में यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। इन्होंने संग्रहालय विज्ञान, प्रागैतिहास, शैलचित्र कला, पुरातात्त्विक उत्खनन एवं अन्वेषण में विशेषज्ञता हासिल की है। इनके द्वारा अशोकनगर जिले में विद्यमान 50 से अधिक नवीन पुरास्थलों सहित 6.6 करोड़ वर्ष पुराने जीवश्मों की भी खोज की गई। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में इनके 15 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। इनकी तीन संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, सम्मेलनों में 30 से अधिक शोध पत्र भी प्रस्तुत किए हैं। डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, शाढ़ौरा, जिला अशोकनगर, मध्य प्रदेश में इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक (अतिथि विद्वान) के रूप में कार्यरत हैं।
‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’ पुस्तक के सह-सम्पादक हैं डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. सुरेन्द्र कुमार यादव, डॉ. मशकूर अहमद कादरी, डॉ. शिव कुमार पारोचे तथा मो. आदिल खान।
जब विषय विशेषज्ञ अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं तथा विषय विशेषज्ञों की एक पूरी टीम उसका संपादन करती है तो ऐसी शोधात्मक पुस्तक की अर्थवत्ता, गुणवत्ता एवं सामग्री विषयक विश्वसनीयता स्वयं सिद्ध रहती है। इस शोध्रगंथ रूपी पुस्तक में बुंदेलखंड की संस्कृति के विविध पक्षों पर शोघात्मक सामग्री सहेजी गई है। पुस्तक में कुल 34 आलेख हैं जिनमें कई आलेखों के साथ छायाचित्र भी प्रस्तुत किए गए हैं। इन लेखों में इतिहास एवं पुरातत्व से ले कर भूगोल तक, खानपान से ले कर आस्था एवं संगीत तक हर पक्ष को सामने रखा गया है। विशेष यह कि जब इतिहास एवं पुरात्तव बात करते हैं तो साक्ष्य सहित बात करते हैं। प्रो. नागेश दुबे ने ‘‘प्राक्कथन’’ में लिखा है कि ‘‘बुन्देलखण्ड का भू-भाग आदिकाल से ही अपने अंचल में विभिन्न युगों की सांस्कृतिक विरासत को संजोये रहा है। इस क्षेत्र में विभित्र संस्कृतियाँ पुष्पित और पल्लिवित हुई। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों को उद्घाटित करने के लिये भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली की वित्तीय सहायता से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित पुरातत्व संग्रहालय में 17-18 फरवरी, 2022 में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। जिसमें बुंदेलखंड के सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों, साहित्यिक परम्परा, कला-स्थापत्य, समाज, धर्म, पर्यटन, आदि विविध पक्षों पर केन्द्रित शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। इस ग्रंथ में बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को उदघाटित करने वाले शोधपत्रों को सम्मिलित किया गया है।’’
व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि मैं भी भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर की ‘‘गोल्ड मेडलिस्ट’’ विद्यार्थी रही हूं तथा यही से मैंने ‘‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। मेरा भी एक शोधपत्र इस पुस्तक में शामिल है। यद्यपि सतत अकादमिक रूप से मैं कभी विभाग से जुड़ी नहीं रही किन्तु समय-समय पर अपने शोधपत्र वाचन करने तथा विषय विशेषज्ञ के रूप में सेमिनारों में मुझे विभाग ने शामिल किया है। इसीलिए मैं विभाग द्वारा किए जाने वाले शोध कार्यों की गंभीरता से भली-भांति परिचित भी हूं और इसीलिए इस पुस्तक पर आधिकारिक तौर पर कोई भी समीक्षात्मक टिप्पणी करने के योग्य स्वयं को अनुभव करती हूं।
पुस्तक में जो आलेख हैं उनकी गुणवत्ता एवं श्रेष्ठता निःसंदेह स्वीकार्य है। जैसाकि मैंने पूर्व में भी लिखा कि यह पुस्तक भावी शोधकर्ताओं को एक ऐसी ज़मीन देती है जिस पर खड़े हो कर वे इन पर पुनर्शोध एवं इससे आगे का कार्य कर सकते हैं। यूं भी इतिहास एवं पुरातत्व नवीन दृष्टिकोण से बार-बार शोध कार्य की मांग करते हैं। इस पुस्तक में जो 34 लेख हैं वे इस प्रकार हैं- 1.बुन्देलखण्ड के संग्रहालयों में प्रदर्शित बुन्देलखण्ड की साँस्कृतिक विरासत - प्रो. नागेश दुबे 2. सागर की सांस्कृतिक विरासत एवं पर्यटन की संभावनायें - डॉ. बी.के. श्रीवास्तव 3. बुंदेलखण्ड की संस्कृति प्राचीन हिंदी साहित्य के आइने में - प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी 4. बुंदेलखण्ड में प्रभु श्रीराम - डॉ. कृष्ण कुमार त्रिपाठी 5. मढ़-बमोरा के प्राचीन मंदिर परिसर से ज्ञात सदाशिव प्रतिमा - प्रो. आलोक श्रोत्रिय, डॉ. मोहनलाल चढ़ार 6. खजुराहो की मूर्तिकला में दशावतार का अंकन - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 7. दमोह जिला. मध्य प्रदेश की विशिष्ट नटराज प्रतिमाएं प्रतिमाशास्त्रीय अवलोकन - डॉ० सुरेन्द्र कुमार यादव 8. चन्देल काल में शाक्त एवं अन्य सम्प्रदाय - डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह 9. बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति के विविध पक्ष (व्रत, पर्व एवं उत्सव के विशेष सन्दर्भ में) - डॉ. विश्वजीत सिंह परमार 10. सागर संभाग के संग्रहालयों में प्रदर्शित विष्णु की गरूड़ासीन प्रतिमाएँ: एक अध्ययन - डॉ. शिवकुमार पारोचे 11. खानपुर (सागर) के शैलचित्रों का सांस्कृतिक अनुक्रम - डॉ. मशकूर अहमद कादरी 12. एरण से प्राप्त नवीन सती स्तम्भ - डॉ. मोहन लाल चढ़ार 13. मध्यप्रदेशीय बुन्देलखण्ड में जैन संस्कृति की निरन्तरता के अभिलेखीय प्रमाण - डॉ. जिनेन्द्र कुमार जैन 14. सागर जिले के धार्मिक पर्यटन स्थल - डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन 15. रहली अंचल का प्राचीन शैव मूर्तिशिल्प एक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन - डॉ. गोविन्द सिंह दांगी 16. सागर क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्र -डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ल 17. सागर संभाग की शिव प्रतिमाओं से सम्बद्ध सांस्कृतिक तत्व - राज बहादुर क्षत्री 18. सागर एवं दमोह का संस्कृत साहित्य - डॉ. नौनिहाल गौतम 19. बुन्देलखण्ड की लोकगाथाएँ (दिमान हरदौलजी एवं कारसदेवजी के विशेष सन्दर्भ में) - श्रीमती दीपशिखा सिंह परमार 20. लोक गीतों में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष बुंदेली लोक गीतों के विशेष संदर्भ में - डॉ. अखिल कुमार गुप्ता 21. बुन्देलखण्ड का स्थापत्य शिल्प (मन्दिर, मठ, दुर्ग एवं गढ़ी) -डॉ. अर्चना द्विवेदी 22. सागर जिला पुरातत्त्व संग्रहालय में प्रदर्शित देवी गंगा की प्रतिमाएँ - डॉ. मनीषा तिवारी 23. थूबोन (जिला अशोकनगर) की प्रमुख गणेश प्रतिमाएँ - कीरत अहिरवार 24. खजुराहो की कला में यक्ष प्रतिमाओं का अंकन एवं मान्यताएँ - डॉ आशीष कुमार चाचोंदिया 25. दोनी (जिला-छतरपुर) के प्राचीन मंदिर - डॉ. रमेश कुमार अहिरवार 26. रानी दमयंती की नगरी का पुरा वैभव - डॉ. सुरेन्द्र कुमार चैरसिया 27. बुन्देलखण्ड अंचल की सांस्कृतिक विरासत - डॉ. दीपक कुमार 28. बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में लोकउत्सव एंव मेले - निधि सोनी 29. बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत में लोक नृत्य -अंजली पाण्डेय 30. बुन्देलखण्ड के संगीत में ताल वाद्य परंपरा - डॉ. राहुल स्वर्णकार 31. दमोह जिले का प्रमुख कला केन्द्र नोहटा - डॉ. वन्दना गुप्ता 32. बुंदेली कला, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव के प्रचार प्रसार में जनमाध्यमों की भूमिका - डॉ. अलीम अहमद खान 33. बुन्देलखण्ड की पुरा सम्पदा का सर्वेक्षण एवं राजनीतिक परिदृश्य - डॉ. रणवीर सिंह ठाकुर तथा 34. सेटपीटर्स चर्च सागर: एन एक्जाम्पल ऑफ कोलोनियल आर्कीटेक्चर।
इस प्रकार देखा जाए तो बुंदेलखंड के लगभग प्रत्येक कालखंड को तथा प्रत्येक सांस्कृतिक पक्ष को इस पुस्तक में संग्रहीत किया गया है जिससे पुस्तक का कलेवर समृद्ध एवं सुरुचिपूर्ण है। प्रो. नागेश दुबे एवं डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने इस महत्वपूर्ण प्रकाशन के लिए साधुवाद के पात्र हैं। अकादमिक प्लेटफार्म के साथ विशेषज्ञों की मुहर किसी भी पुस्तक को एथेंटिक एवं बहुउपयोगी बना देती है। उस पर विशेषता यह है कि सभी आलेख सहज एवं सरल भाषा में हैं तथा संदर्भ सूचियों से परिपूर्ण हैं। शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों के साथ ही बुंदेलखंड को समग्रता से जानने के इच्छुक आम पाठकों के लिए भी यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।
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