Monday, April 6, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह "नारी शक्ति सम्मान 2026" से पत्रिका द्वारा सम्मानित

साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए मुझे "नारी शक्ति सम्मान 2026" से कल दोपहर (05.04.26 को) सम्मानित किया गया....खुरई विधानसभा के विधायक एवं पूर्व मंत्री भाई भूपेंद्र सिंह तथा विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलपति भाई अनिल तिवारी जी के कर कमलों से सम्मान प्राप्त करना सुखद लगा... अवसर था 
राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण पत्रिका द्वारा  विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को "पत्रिका नारी शक्ति सम्मान 2026" से सम्मानित किया गया... पत्रिका सागर संस्करण के संपादक नितिन त्रिपाठी जी पत्रिका परिवार के श्री उदय गौतम जी, श्रीमती रेशु जैन जी आदि सभी का हार्दिक आभार 🌹🙏🌹
होटल दीपाली के क्रिस्टल हॉल में आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम के दौरान अपनी बहनों से सुखद भेंट भी हुई।

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Saturday, April 4, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | बड़े पते की आएं जे कहनातें, इनें छुड्डा में गठियां लेओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
बड़े पते की आएं जे कहनातें, इनें छुड्डा में गठियां लेओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

  मार्च को मईना लगत साथ ऐसी गरमी परन लगी रई मनो मई को मईना आ गओ होए। कछू नई तो पूरो मईना तपो। बस, अखीर-अखीर में नाएं-माएं पानी गिरन लगो। बा जोन मोसम बिभाग वारे कैत आएं ने के गरज के संगे छींटें परहें, सो, ऐसोई कछू होन लगो। ई टाईप से मोसम बदले में तबीयत सोई बिगरन लगत आए। ऊंसई देखो जाए तो मार्च औ अप्रेल को मईना चैत औ बैसाख कहाउत आएं, जोन के लाने घाघ औ भड्डरी ने खींब पते की कहनातें कईं आएं। जेसे चैत के लाने उन्ने खाबे-पीबे को सई हिसाब बताओ आए के का खाओ चाइए औ का नईं खाओ चाइए - 
चैते गुड़, बैसाखे तेल, 
जेठे महुआ, आषाढ़े बेल 
- मने चैत में गुड़, बैसाख में तलो-फुलो, जेठ के मईना में महुआ औ असाढ़ मईना में बेल नईं खाओ चाइए। जेई के संगे घाघ कैत आएं के का खाओ चाइए जोन से सेअत सही रए-
चैत मास में नीम सेवती,
बैसाखहि में खाय बासमती
- मने चैत में नीम की नईं-नईं पत्तियां खाए से औ बैसाख में बासमती घांई बिना मांड़ को भात खाए से सेअत अच्छी रैत आए।
     बाकी घाघ औ भड्डरी ने मोसम के लाने सोई कओ आए के-
चैत मास दसमी खड़ा, जो कहुं कोरा जाइ।
चौमासे भर बादरा, भली-भां‍ति बरसाइ।।
- मने चैत मईना के शुक्ल पक्ष की दशमी को जो बदरा ने छाएं तो पूरे चौमासे झमाझम पानी बरसत आए।  मनो उतई जो-
जब बरखा चित्रा में होय
सगरी खेती जावै खोय
- मने जो चित्रा नक्षत्र में पानी बरस गओ तो समझो सगरी खेती चौपट। सो, इन कहनातों को फिजूल ने मानियो, जे सेअत ठीक राखबे औ मोसम की दसा समझबे को गुर बताउतीं आएं। अगली दफा कछू औ कहनातें बताबी,जो लौं इनें छुड्डा में गठियां लेओ। राम-राम !
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, April 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे चिल्लम-चिल्ली कभऊं बंद हुइए के नईं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जे चिल्लम-चिल्ली कभऊं बंद हुइए के नईं ? 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    मैं और भौजी बैठी बतकाव कर रई हतीं, इत्ते में भैयाजी आ पौंचे औ उनके संगे खाना पकाबे की गैस को सिलेंडर वारो हतो।
‘‘अई गजब! आपने तो मैदान मार लओ, भैयाजी! ई टेम पे सिलेंडर को जुगाड़ सबसे बड़ो जुगाड़ आए।’’ मैंने भैयाजी की तारीफ करी।
‘‘ने कछूं, तुम तो ऊंसईं भाव दे रईं।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘नईं। हम सांची कै रए। ई टेम पे जबे सिलेंडरन की मारा-मारी चल रई, ऐसे में भरो सिलेंडर घरे ले आने से बड़ों कोनऊं काम नईं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, जोन तुम समझ रईं, बा कछू नईं आए। जे सिलेंडर वारे भैया तो हमें दोरे के चार कदम उते पे मिल गए। सो हम ओरे संगे चले आए। मनो हमने दो दिनां पैले नंबर लिखाओ रओ औ जा गैस खुदई से हमाए इते आ गई आए। मनो मारा-मारी हुइए, लेकन हमाई ई ऐजेंसी में तो नइयां। ने तो जे भैया कां से चले आउते सिलेंडर पौंचाबे के लाने?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, हमाए इते ऐसो कछू नइयां। अबे तो मुतके सिलेंडर गोडाउन में आएं। बाकी जो कोनऊं जे चाए के बिना नंबर लिखाए ऊको सिलेंडर मिल जाए सो बा नईं हो रओ।’’ बा सिलेंडर वारो अपने माथा से पसीना पोंछत भओ बोलो। 
‘‘ने पूछो भैया, बड़ी गदर मची आए। जो टीवी पे, ने तो माबाईल पे देख लेओ तो ऐसो लगत आए के मानों लड़ाई इतई छिड़ी जा रई।’’ बा सिलेंडर वारे से भौजी बोलीं।
‘‘अरे बे पगला हरें। बे तो ऐसे बखानत आएं जैसे बे ईरान वारों के गोदी में बैठे होंए के ट्र्म्प के पलकां पे डरे होंए। मनो दोई उनई से पूछ-पूछ के मिसाइलें छोड़ रए हों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, कलई सो हम मोबाईल पे देख रए हते एक जने कै रआ हतो के ईरान ने घनों दोंदरा दे रखो आए औ घंटा भर बाद बोई आदमी कैत मिलो के अमेरिका ने ईरान खों माटी में मिलाबे की ठान रखी आए। मोए तो समझ नईं परत के बा कोन की तरफी आए?’’ बा गैस सिलेंडर वारो जात-जात बोलो। 
‘‘जे आजकाल के चैनल वारे कोनऊं के सगे नोंई। इने तो अपनी टीआरपी बढ़ाबे की परी रैत आए। फेर ऊके लाने कछू बी अल्ल-गल्ल बकने होए सो बकत रैत आएं। जरूरी बात पे उनको मों खोलत नईं बनत।’’भैयाजी बोले।
‘‘अरे, भैयाजी! मोए जरूरी बात पे बोलबे पे से याद आई के अबे मैं बा जलसेवा के उद्घाटन में गई रई।’’ मैंने कई।
‘‘कोन सी जल सेवा?’’ भैयाजी ने टोंकत भए पूछी।
‘‘अरे बोई जोन हरेक साल श्रीराम सेवा समिति वारे करत आएं। सागर के रेलवे स्टेशन पे सबरे यात्रियन खों मुफत में ठंडो पानी पिलाबे को पुन्न काम। बा ऊके अध्यक्ष मोरे लोहरे भैया डाॅ विनोद तिवारी आएं। बे सोई सांझ-संकारे एक करत रैत आएं। सो, उते का भओ के उद्घाटन के लाने आए हते समाजवादी चिन्तक दादा रघु ठाकुर जू औ भैया रमाकांत यादव जू जोन पिछड़ावर्ग आयोग वारे ठैरे। सो रमाकांत यादव भैया ने अपने भाषन में बड़ी पते की बात कई। बे बोले के जे जो रुपैया को चलन बंद करत जा रए ऊके लाने कछू करो चाइए। मोए उनकी जा बात भौतई पुसाई। काए से जोन को डिजिटल रुपैया से काम करत बनत आए उनके लाने तो कछू नईं, कोनऊं परेसानी नोंई, बाकी जोन खों ढंग से मोबाईल चलाउत नईं बनत, ने तो ऊके लिंगे सस्तो सो बटन वारो मोबाईल आए, बा बिचारो का करहे? जो कोऊ नईं सोचत। सबखों ईरान औ अमेरिका की लड़ाई की ऐसी परी के मनो बे दोई इतई तिगड्डा पे लड़ रए होएं।’’ मैंने कई।
‘‘सई कई उन्ने। जा बाकई भौत बड़ी वारी समस्या आए। पर कोनऊं खों ऊकी परी नईयां।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, औ तनक औ करबे की चली तो बे बाई, का नांव ऊको?? अरे हऔ बा फिलम वारी बाई, बा राहुल गांधी के लाने कछू ने कछू बकन लगत आए। जीसें फालतू के बातकाव चलत रए औ काम की बात ने होने पाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, बा सब पब्लिक को ध्यान भटकाबे को काम चलत रए। पब्लिक फजूल की गिरगिटर करत रएं, काम की बात सोंचे बी नईं। मनो बा तो पब्लिक बी अब समझन लगी आए, लेकन जा लड़ाई खों ले के जा कमी, बा कमी की कैबे में का रखो? जित्तों को संकट नोंई, उत्ते को दोंदरा देत फिर रए। जा सई आए के तनक चौकन्ने रओ, फिजूलखर्ची ने करो सो कछू फरक नईं परने।’’ मैंने कई।   
‘‘हम तो कैत आएं के जे जो जित्ते टीवी पे कांव-कांव करबे वारे चैनल आएं, सब खो बंद कर दओ जाए। कम से कम तब तक के लाने जब तक जे जो लड़ाई चल रई।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘अब का कओ जाए भौजी! आजकाल कछू औरई दिमाग चल रओ लोगन को। अब आपई देख लेओ के एक फिलम आई ‘धुरंधर’। मोए बा तनकऊ ने पुसाई काए से के ऊमें भर-भर के गालियां हतीं। मनो भौत से लोगन खों बा भौतई पुसाई। सबने ऊकी खूबई तारीफ करी। उतई एक फिलम औ आई ‘‘केरला स्टोरी’’। बा हती तारीफ करबे जोग, मनो ऊपे बोले में लोग डरात दिखे। जबके ‘केरला स्टोरी’ में लव जिहाद को कच्चो चिट्ठा रओ। ऊपे भौतई कम बात करी लोगन ने। सो, आजकाल कछू कैबो मुस्किल आए के कोन का चा रओ?’’ मैंने कई।
‘‘सो तो सई कई!’’भैयाजी बोले।
‘‘औ तनक जे देखो के राशन की दुकान पे राशन लेत समै उंगलियन को निसान लेबे को नियम कर दओ, मनो बोट डालत समै काए नईं फिगर प्रिंट लेत आएं? ईसे एकऊ गलत बोट ने पड़ पाहे। काए सई कई के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कई तो सई तुमने, मनो तुमाई को सुन रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे तुम ओरें कां की ले के बैठ गए? हम तो सिरफ इत्तई कै रए हते के जे लड़ाई खों ले के बेफालतू की चिल्लम-चिल्ली ने करी जाए। काए से ईसे डर सो फैलत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘तुम जे डर की कै रईं? औ बा जोन जो सीरियल में दिखा रए बसीकरण औ चुड़ैल को साया सो बो का आए? ऊको काए नई रोको जात आए? जोन जो पढ़े-लिखे आएं बे सोई ई सब के बारे में सोचन लगे अब तो। अभईं कल मोए मास्साब जी मिले सो कैन लगे के उनके मोड़ा खों कोनऊं ने नजर लगा दई आए जोन से बा बीमार डरो आए। सो हमने उनसे गई के आप तो पढ़े लिखे आओ, आप सो ऐसो ने बोलो। कछू गलत खा पी लओ हुइए आपके बालक ने सो ऊकी तबीयत बिगर गई। सो जे तो हाल आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, जेई तो हम कै रए के जोन जे चिंचियात रैत आएं औ अंधबिस्वास फैला रए, इन ओरन पे पाबंदी लगो चाइए।’’ भौजी बोलीं। 
भौजी कै तो सई रई हतीं, मनो उनकी कोऊ सुन ले सो अच्छो, ने तो टीवी चैनल वारे अपनी टीआरपी की चकिया में ऐसई पीसत रैंहें। कैबे खों प्राईम टाईम औ कऊं किले को भूत के बारे में बताहें तो कहूं कोनऊं चमत्कार के बारे में।  
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के फिजूल की चिल्लम-चिल्ली करबे वारे चैनलों पे रोक लगने चाइए के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, April 1, 2026

चर्चा प्लस | राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस : हनुमान जन्मोत्सव विशेष:   
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                       

                           
     हनुमान देवत्व का वानर रूप हैं जो मनुष्य के भीतर आत्मबल का संचार करते हैं तथा उन्हें संकट से उबरने में सहायता करते हैं। हनुमान जी का हिंदू धर्म और संस्कृति में अत्यंत उच्च और पवित्र स्थान है। उन्हें शक्ति, भक्ति, ज्ञान, और निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और भगवान श्री राम के सबसे अनन्य भक्त हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा 1 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से लेकर 2 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 41 मिनट तक रहने वाली है अतः उदया तिथि के चलते हनुमान जन्मोत्सव का त्योहार 2 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दुखों और कष्टों को दूर करने वाला। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की हर तरह की बाधा दूर होती है और व्यक्ति को निडरता प्राप्त होती है। वे नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और भय से रक्षा करते हैं अर्थात वे आत्मबल का विकास करते हैं।

भगवान हनुमान, जिन्हें अंजनेय, पवनपुत्र, केसरीनंदन और राम भक्त हनुमान के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में अटूट भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय सेवा भावना के प्रतीक हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा का उल्लेख शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में मिलता है। हर साल चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में इसी दिन बजरंगबली के जन्म का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और रुद्र के 11वें अवतार हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने धरती पर धर्म स्थापना के लिए जब रामावतार लिया तो हनुमान उनके सहायक बनकर बजरंगबली के रूप में धरती पर आए थे।
शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शिव ने भी उनके साथ पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से वानरराज केसरी और माता अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। माता अंजना को यह वरदान था कि उनके पुत्र को पवन देव का विशेष आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 37) में वर्णन है-“भगवान शंकर ने अपने अंश से रुद्र रूप में वानर स्वरूप में जन्म लिया। माता अंजना ने कठिन तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया, तब महादेव ने रुद्रांश के रूप में जन्म लेकर हनुमान स्वरूप धारण किया।”
यह जन्मकथा इस प्रकार है कि समुद्रमंथन के बाद जब भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने को कहा था जो उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को दिखाया था। उनकी बात का मान रखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु का आकर्षक रूप देखकर शिवजी आकर्षित होकर कामातुर हो गए और उन्होंने अपना वीर्य गिरा दिया। जिसे पवनदेव ने शिवजी के वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इस तरह माता अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ। उन्हें शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी हनुमान जी के जन्म की कथा विस्तार से मिलती है- माता अंजना, एक अप्सरा थीं, जो ऋषि के श्राप से  राजा कुंजर की इच्छानुसार रूप धारण करने वाली पुत्री  के रूप में  कपि योनि में जन्मी थीं। एक दिन जब वे मानवी स्त्री का रूप धारण कर के एक पर्वत शिखर पर विचार रही थी द्य तब उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी जिसे वायुदेवता ने धीरे से हर लिया और काम से मोहित होकर उन्होंने अंजना का अव्यक्त रूप से आलिंगन कर लिया। पतिव्रता होने के कारण अंजना तुरंत ही समझ गई और बोली “कौन मेरे इस पतिव्रत का नाश करना चाहता है?“ तब पवन देव ने उत्तर दिया कि “मैं तुम्हारे पतिव्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। मैंने मानसिक संकल्प से तुम्हारे साथ समागम किया है जिससे तुम्हे बल पराक्रम से संपन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा।”
फिर एक दिन पवन देव के आशीर्वाद से उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। जन्म के बाद, हनुमान जी को असीमशक्ति, वेग और बल प्राप्त हुआ। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 -20 ) में वर्णन है- “वानरराज केसरी की पत्नी अंजना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जो महाबली, महातेजस्वी और अत्यंत बुद्धिमान था। पवन देव की कृपा से जन्म लेने के कारण उसे ‘पवनपुत्र’ कहा गया।”
एक और कथा है हनुमान जी के जन्म की- एक बार की बात है अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने के बाद राजा दशरथ ने प्रसाद रूपी खीर को अपनी तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को बांट दिया। तभी वहां एक कौवा आया और खीर का एक भाग लेकर उड़ गया। उड़ता हुआ वह उस जगह पहुंच गया, जहां अंजनी पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रही थीं। यह सब शिव और वायुदेव के इशारे पर हो रहा था।
अंजनी ने देखा कि कौवा खीर लेकर आया है। अंजनी को लगा कि यह शिवजी की कृपा है। उन्होंने खीर को पी लिया और इसी प्रसाद से उन्होंने एक बलवान पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र पवनदेव का था। अंजनी के पति वानर राज केसरी थे। इसलिए अंजनी के पुत्र को पवनपुत्र और केसरी नंदन दोनों नामों से जाना गया।
हनुमान जी के जन्म की कथा एक और रूप में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार शिव जी के उस वरदान से जो उन्होंने राजा केसरी और माता अंजना को दिया था. दरअसल एक बार राजा केसरी और माता अंजना ने शिव जी की कठिन तपस्या की, जब दोनों की तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए तो उन्होंने माता अंजना और केसरी से वरदान मांगने को कहा. जिस पर माता अंजना ने कहा कि -‘‘हे भोलेनाथ, हमें एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो बल में रुद्र, गति में वायु और बुद्धि में गणपति के समान तेजस्वी  हो।’’ माता के वचनों से खुश होकर शिव जी माता को वरदान दिया और अपनी रौद्र शक्ति को पवन देव के रूप में यज्ञ कुंड में समाहित किया और उत्पन्न शक्ति को माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। जिस वजह से हनुमान जी का एक नाम पवनपुत्र भी हुआ। शिव शंकर की कृपा से अंजना गर्भवती हो गईं और चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन मंगलवार को भगवान रूद्र के 11वें अवतार के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी जन्म से ही बल, बुद्धि और विद्या में निपुण हैं।
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
बजरंग बली जब छोटे थे तब उन्हें बहुत भूख लगती थी। एक बार उन्होंने अपनी मां अंजनी से खाने के लिए मांगा। अंजनी तब कुछ काम कर रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि बाहर जाओ और फल खा लो। जितने भी पके हुए फल हैं, वो खाने योग्य हैं। बजरंग बली भूख से व्याकुल हो रहे थे। वे बाहर गए और फल खाने लगे। तभी उन्हें आसमान में उन्हें चमकता हुआ सूरज दिखाई दिया। बजरंग बली को लगा कि यह भी एक फल है। उन्होंने अपनी शक्ति से लंबी छलांग लगाकर सूर्य के पास पहुंच गए और उसे अपने मुंह में रख लिया। बजरंग बली की इस हरकत से धरती पर अंधेरा छा गया। इंद्रलोक तक हाहाकार मच गया। तब सभी देव इंद्र के पास गए और कहा कि एक वानर ने सूर्यदेव को अपने मुंह में रख लिया है। सभी देवों ने इंद्रदेव से इस समस्या का हल निकालने की विनती की। तब इंद्रदेव आए। उन्होंने वज्र लहराया और बजरंग बली की ठोड़ी पर प्रहार कर दिया। बजरंग बली बेहोश होकर गिर पड़े। उनके जबड़े पर चोट लग गई। इंद्र के इस कदम से पवन देव नाराज हो गए। तब इंद्र ने हनुमान को फिर से होश में लाए। ठोड़ी को हनु भी कहते हैं। मान का अर्थ विरूपित होता है। इस तरह बजरंग बली का नाम हनुमान पड़ गया।
अतुलित बल धामा क्यों कहा गया?
हनुमान जी का बल असीम, अतुलनीय और अपरिमित है, जिसे शब्दों में नहीं मापा जा सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 10,000 इंद्रों का बल हनुमान जी के शरीर के एक रोम (बाल) में निहित है। वे ‘‘अतुलितबलधामा’’ (अतुलनीय बल के धाम) कहे जाते हैं, जिनकी एक दहाड़ से तीनों लोक काँप उठते हैं। हनुमान चालीसा की दूसरी चैपाई में हनुमान जी को श्अतुलित बल धामाश् कहा गया है, जिसका अर्थ है - ‘‘अतुलनीय (जिसकी तुलना न की जा सके) शक्ति के निवास स्थान’’। उन्हें यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असीम शक्ति के स्वामी हैं।
इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं कि उन्हें बचपन में ही कई देवताओं से वरदान प्राप्त थे। इंद्र ने उन्हें वज्र के समान शरीर का, अग्नि ने निर्भयता का, और पवन देव ने वायु के समान वेग का आशीर्वाद दिया था। असीम शारीरिक शक्तिरू उन्होंने समुद्र को लांघकर लंका जाना, संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत उठा लाना, और युद्ध में राक्षसराज रावण की सेना को धूल चटाने जैसे कार्य किए, जो साधारण बल से परे हैं। वे ‘‘रामदूत’’ हैं और उनका मानना है कि उनका बल उनका अपना नहीं, बल्कि उनके हृदय में निवास करने वाले प्रभु राम का है। वे बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र और अहंकार शून्य हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधि का वरदान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो स्वयं शक्ति का रूप हैं।
हनुमान को संकटमोचन क्यों कहा गया?
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकटमोचन के नाम से क्यों जाना जाता है?
जब रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता माता का हरण किया था तो हनुमान ने ही उन्हें ढूंढ़कर अपने स्वामी श्रीराम को उनका पता बताया था। हनुमानजी हे श्रीराम का दूत बनकर रावण के पास गए थे और जब रावण ने उन्हें पकड़ लिया था तो वो अपनी बहादुरी से लंका में आग लगाकर बच निकलें थे। उन्होंने भगवान राम के वनवास काल में उनके मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं और संकटों को दूर कर अपनी सच्ची भक्ति का प्रमाण दिया था। हनुमानजी ने श्रीराम की रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने में बहुत सहायता की थी। सीता माता अपने रामजी के लिए हनुमानजी की स्वामी भक्ति और प्रेम को देखकर प्रसन्न हो उठी थीं और उन्होंने बजरंगबली को अमरता का वरदान दिया। अजर-अमर का वरदान पाकर बजरंगबली हनुमान निस्वार्थ भाव से अपने भक्तो की रक्षा करके उन्हें सभी संकटो से बचते हैं और इसलिए उन्हें संकट मोचन महाबली हनुमान के नाम से जाना जाता हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 01.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 31, 2026

पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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    बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति  और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश  में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने  के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने  की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”

संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”

  डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”

    गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल  सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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Saturday, March 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     ई साल सबरे त्योहार  जल्दी- जल्दी कढ़ गए सो गर्मी को मौसम सोई तनक जल्दी आ गओ। ऊको बी लगो हुइए के पेड़-मेंड़ सो कटत जा रए सो अपन सोई मार्च के मइना से अपनो दम दिखान लगें। जो बात होए दम दिखाबे की तो बिजली के झटका से बड़ो दम तो कोनऊं को हो नई सकत। नईं-नईं, बा वारो झटका नोईं जो बिजली के तार छूबे से लगत आए। हम बा वारे झटका की कै रए जोन बिजली के बिल को छूबे से लगत आए। हऔ बिजली विभाग वारे अगली माह से जोर को झटका देबे वारे आएं। टैरिफ सो बढ़ाई रए आएं औ ऊपे से जे सोई तै कहानो के जोन ने संझा बिरियां छै से दस बजे लौं बिजली से चलत वारीं बड़ी चीजें चलाईं उने अच्छे पइसा घलहें। 
     चलो मान लओ के तेल वारे देसन में चल रई लड़ाई के चलत भए डीजल, पेटरोल पे कोनऊं संकट आ सकत आए, मनो जे बिजली वारे काए दाम बढ़ा रए। चलो जे बी मान लई के गरमी खपत बढ़बे के कारन दाम बढ़ा रए। सो का बरसात सुरू होबे पे टैरिफ कम कर देहें? रामधई! ऐसो कभऊं नईं होत के रुपइया भरे बढ़ाए गए दाम पूरे रुपइया घटे होंए। भौत करी तो आठ पईसा ने तो दस पईसा घटा के खुनखुना पकरा दओ जात आए। सो, अगली मईना से जोर को झटका खाबे को तैयार रहियो औ पसीना पोंछत रहियो। जो हो सके तो ठिलिया से ले के बरफ को गोला खात रहियो। ईसे कूलर, पंखा चलाबे की जरूरत ने परहे। जै राम जी की!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, March 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘जो कोनऊं त्योहर चलत आएं तो समै को पतो नईं परत। आज प्रथमा, सो काल दुतिया औ परों तृतिया औ जेई तरां से सप्तमें औ आठें सोई गुजर जात आएं। मनो दिन को सोई पतो नई परत के कैसे गुजर जात आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! ऐसई करत-करत जिनगी गुजर जात आए।’’ भौजी तनस सोंसत सी बोलीं।
‘‘ऐसी काए कै रईं? ई दफा तो चैत की नवरातें बी पैले पर गईं औ बीच में तनक पानी सोई गिर गओ सो ठंडक बनी रई। नें तो जो कभऊं अप्रैल में नवरातें परत आएं तो धूप तपन लगत आए औ उपास राखबे में सोई परेसानी होत है। ई दफे तो मंदिर-दिवाला गए में गोड़े बी नईं जरे। जोन दिनां मैं ज्वाला देवी के मंदिर गई रई ऊ दिनां उतई पानी परसन लगो रओ। भौतई अच्छो सो मौसम हो गओ रओ। बाकी फसल के लाने जरूर चिंता भई रई काए से के रसता में देखी रई के फसल कट के खेतन में सूखबे खों धरी हती औ कऊं-कऊं तो खड़ी हती। मने कटाई बी नईं भई रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जा सब तो ठीक आए बिन्ना मनो जे देखो के अपने इते नौ-नौ दिन लौं देवी माई की पूजा होत आए। सबरे लुगवा सोई माई की पूजा करत आएं, उपास रखत आएं। कोऊ-कोऊ तो नौ दिनां चप्पलें नईं पैनत, दाढ़ी नईं कटात औ धरती पे सोऊत आएं। मनो माई खों प्रसन्न करबे के लाने खूब-खूब जतन करत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, जे तो आप सांची कै रईं। मनो लुगाइयां सोई नौ दिनां उपवास राखत आएं। कोऊ फलाहारी करत आएं तो कोऊ निरजला लौं रैत आएं। माई को खुस को नईं करबेा चात आए? सबई चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना, के एक तरफी तो सब चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए औ दूसरी तरफी बे मरई को मतलब नईं समझत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का मतलब आपको? तनक खुल के बोलो आप।’’ मैंने कई।
‘‘हम का खुल के बोलें? सब कछू तो आंगू में खुलो डरो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो मोए समझ नईं पर रई के आप का कैबो चा रईं? सो तनक जे सोई बताओ के जे आप काए के बारे में कै रईं?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे, मोए तो रै-रै के बोई खयाल परत आए के बा बिचारी खों कैसो लगो हुइए जब ऊके घरवारे ने ई ऊको मारो औ गाड़ी में बार दऔ।’’भौजी बोलीं।
‘‘कऊं आप बा डाक्टर वारी घटना की तो नईं कै रईं?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘हऔ, ओई की बात कर रई। कैसो राकस डाक्टर रओ ऊ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ बा घटना के बारे में मैंने सोई पढ़ी रई औ मोए बी बुरौ लगो रऔ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘नईं, तुमई सोचो बिन्ना के जो का मतलब भओ? एक तरफी तो सबई जने माई की पूजा करत आएं। औ कओ बी जात आए के जां लुगाई की इज्जत होत आए उते देवता रैत आएं। औ इते तो लुगाइयन की इज्जत का, जान को ठौर नइयां। अरे तुमें नईं पुसा रई तो छोड़ो। छोर-छुट्टी करा लेओ औ दूसरी राख लेओ। जे का के तुमे अब नई पुसा रई सो तुमने ऊको मार के ठिकाने लगा दओ। का बा इंसान नोंई? कोनऊं सामान आए का के बोर हो गए सो तोड़-ताड़ के कूडा में मेंक दओ, ने तो बार दओ। बा जोन डाक्टर ने अपनी लुगाई खों कार में बार दओ, अबे तो पतो परहे के मार के बारो के बारत समै बा जिन्दा हती?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी! कोन टाईप के होत आएं जे ओरें जो कोऊ खों ऐसे मारबे को करेजा रखत आएं। इते ब्लड टेटस्ट के लाने जाओ तो खून नईं देखो जात आए। मैं तो अपनों मों दूसरी तरफी फेर लेत आओं। बा तो भौतई बुरौ करो बा नीच आदमी ने। ऊको तो डाक्टर कैबे में डाक्टरन को अपमान होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘एक बोई का? अखबार उठा के देख लेओ, मुतकी खबरे मिल जैहें ई टाईप की। कऊं दहेज के लाने मार डारत आएं तो कऊं इज्जत लूट के बार देत आएं तो कऊं खाली दूसरी लाबे के चक्कर में निपटा देत आएं। मनो लुगाई ने भई कोनऊं बेजान चीज हो गई के मन भर गओ तो तोड़-मोड़ के मेंक दओ। ऊपे दम भरत आएं माई की पूजा की। अरे, जोन समाज में ऐसे लुगवा रैत होंए ऊपे माई काए खों प्रसन्न हुइएं?’’ भौजी तनक गुस्सा सी करत भई बोलीं। मनो उनकी बात सांची हती।
‘‘आप सई कै रईं भौजी, जो माई खों समझबे को दम भरत आएं उने लुगाई की जान की बी इज्जत करो चाइए। हमें तो जे देख के लगत आए के अपने ई समाज में धरम खों समझबे वारे कित्ते आएं औ धरम के नांव पे ठेकेदारी करबे वारे कित्ते आए? अब आपई देखो के ज्यादा से ज्यादा व्रत त्योहार अपन ओरन मने लुगाइन के करे से चल रए। या तक के मैंने देखी आए के कई मंदिरन में मंगल के मंगल सुंदरकांड को पाठ करो जात आए, बा बी लुगाइयां करत आएं। कम से कम बजरंगबली के लाने तो लुगवों खों टेम निकारने चाइए। पैले जोई होत्तो, मंगलवार खों लुगवा हरें मंदर में भजन गाउत्ते और बजरंबली की पूजा करत्ते। अब उने मोबाईल पे टिपियाबे से फुरसत नइयां।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘औ का, जेई से तो जे सब कांड होन लगे। औरन बी मोबाईल पे बा न्यूज देख-सुन लई औ अगली पोस्ट पे बढ़ गए। कोन खों परी के ऊके विरोध में कछू हल्ला-गुल्ला करें। जितनी बहस फिलम पे होत आए उत्ती तो ई टाईप की घटना पे लौं नई होत। औ ईके लाने अपन लुगाइयां सोई जिम्मेवार कहाईं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बा कैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा ऐसे के अपन माई के नौ रूपों की पूजा तो करत आएं मनो उनके घांईं बनबे की सोचत बी नइयां। तनक अपने भीतरे जो माई को भाव ले आवें सो कोन की हिम्मत के अपन खों कछू कर सके। बोलो सई कई के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘बिलकुल सई कै रई आप। का आए के डरने या घबड़ाने का नईं, हिम्मत से मुकाबला करबे की जरूरत आए। जो कोनऊं बदमाशी करे सो ऊको इूंसई-ठूंसा मारो फेर देखो माई कैसे साथ देत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई लाने ई दफा सो हमने माई से जेई मांगो के सगरे लुगवा औ लुगाइयन खों बुद्धी दे माई औ लुगाइयन खों तनक बुद्धी के संगे शक्ति देंवें के बे जो खतरा देखें तो बुद्धी से काम लेवें। पैले खुद सामना करें औ जो लगे के मदद की जरूरत आए तो संकोच ने करें औ सबई से मदद मांगे। कुट-पिट के बाथरूम में अपट परी कैबे से काम ने चलहे। इसे बुरै इंसानों के हौसले बढ़त आएं। काए सई कई के नईं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बिलकुल सई भौजी। जब तक सबरे जे ने समझहें के माई को मतलब का आए तब तक खाली पूजा करे से कछू ने मिलहे। सबई खों माई को मतलब समझबे की जरूरत आए।’’ मैंने कई।  
आकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरें माई को मतलब कित्तो समझत हो?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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