Thursday, May 14, 2026

बतकाव बिन्ना की | जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘आज मोए जे कहनात खींबई याद आ रई के- जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने भैयाजी से कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी हंसन लगे। जा देख के मोए अचरज बी भओ औ गुस्सा बी आओ। भला ईमें हंसबे वारी बात का आए?
‘‘आप काए हंस रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बुरौ ने मानियो मगर मोए हंसी जा बात पे आई के जे कहनात तुमें कछू ज्यादई पुसात आए। जब देखो जेई कहनात कैत रैत हो।’’ भैयाजी ऊंसई हंसत भए बोले।
‘‘अब का करो जाए भैयाजी! जब दसई नईं बदलत तो कहनात कां से बदल जैहे?’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब? कोन सी दसा? का कैबो चा रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘देख नईं रै के कैसो दोंदरा मचो आए।’’ मैंने कई।
‘‘का हो गओ?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए पूछी।
‘‘होने का आए? मोए कछू नई भओ।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें नईं कछू भओ, सो कोन की कै रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप अखबार नईं पढ़त का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए नईं पढ़त? संकारे से सबसे पैले अखबारई बांचत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊमें पढ़ो नईं के जनगणना वारों में से कछू को फटकारो गओ के काम धीमो काय चल रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो, ईमें का खास आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘ईमें आपके लाने कछू खास नई दिखा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई बता देओ के ईमें का खास आए? अरे, बे ओरें समै पे काम पूरो नईं कर पाए हुइएं सो उने फटकारो गओ। कओ चिट्ठी पकरा दी गई होए। जे तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी तनक लापरवाई से बोले।
‘‘भैयाजी आप मोए एक बात बताओ।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ पूछो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें जे बताओ आप के जो कऊं अपनी भौजी कऊं टीचर होतीं औ उनकी ड्यूटी ई काम में लग जाती तो आप का करते?’’ मैंने पूछी।
‘‘करते का? सूदे कलक्टर आफिस जाते औ तुमाई भौजी की ड्यूटी कटवा के आते।’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘काए? उने ड्यूटी काए नईं करन देते?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, इत्ती घाम में बे कां फिरतीं? चाए कछू हो जातो, हम तो जान नईं देते।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जे का बात भई भैयाजी? अपनी भौजी, भौजी औ दूसरी लुगाई कछू नईं? औ लुगाई की तो छोड़ो लुगवा हरों की बी कछू नईं?’’ मैंने भैयाजी खों आड़े हाथो लओ।
‘‘तुम मनो कैबो का चा रईं?’’ भैयाजी तनक झेंपत भए बोले।
‘‘मैं जे कै रई भैयाजी के इत्ती गरमी पर रई, घाम चटक रओ औ सरकार को गिनती कराबे की परी। अरे करा लइयो तनक साजे मोसम में। मनो नईं उने तो ई गरमी में ई कराने।’’ मोए बोलत-बोलत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘तुम काए खिजियां रई? अब राजकाज में जा सब तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोए समझाबे की कोसिस करी।
‘‘खिजियाबे वारी बातई आए भैयाजी! अब आपई सोचो के अपन ओरें जो घरै रैत आएं तो  दुफारी को दोरे बंद कर के, कूलर चला के पर जात आएं। फेर कोनऊं दोरे की घंटी टनटनाए उठ के दोरे खोलबे को जी नईं करत। फेर ई गरमी में गली-मोहल्ला इत्तो सूनो हो जात आए के कोनऊं अनजाने के लाने दोरे खोलबे में डर लगत आए। उनके मों पे थोड़े लिखो रैत आए के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं औ। अबई चार दिनां पैले की घटना मैंने आपके लाने सुनाई हती के दो जने एक फटफटिया पे चढ़ के आए रए। उन्ने मोरे घर के दोरे की घंटिया बजाई। मैंने खिरकी से तनक झांक के देखो सो मोए लगो के यां तो पोस्टमेन, ने तो कूरिया वारो हुइए। मैंने बैठक को दोरो खोलो औ बरांडे में पौंची तो मोए तनक डाउट भओ। मैंने उन ओरन से पूछी के का काम आए? सो उनमें से एक बोलो जोन फटफटिया से उतर के ठाड़ो हतो, ‘‘नमस्ते! आप कैसी हो? जब आपकी जिज्जी हतीं तो हम आपके इते आत रए।’ इत्तो बोल के बा सोचो के हम ऊकी बातन में आ जाहें औ बरांडे को गेट खोल दैहें। लेकन मैंने ऊसे साफ-साफ कई के भैया, हमने आपको पैचानों नईं। तो बा बोलो के अरे, आपकी जिज्जी हमें पैचानत्तीं, आप सोई पैचानत्तीं। फेर बा पलट के अपने संगवारे से कछू बोलो औ फेर मोरी तरफी देखन लगो। सो मैंने कई के भैया, हमने आपको खों पैचानो नईयां। आप जो जिज्जी के समै पे आत रए तो जिज्जी के गए पे काए नईं आए रए? जा सुन के बा बोलो के हम काम के लाने बायरे चले गए रए। बाकी हमने जिज्जी के बारे में सुनी रई। औ आज इते से निकरे तो सोची के आपसे मिलत चलें। मैंने कई के मगर मैंने आप ओरन खों नईं चीन्हों आए सो आप ओरें फेर आइयो। इत्तो कै के मैंने दोरे बंद कर लए। मैंने खींब देर सोची मनो मोए तनक बी याद ने आई के बे ओरें कौन हते? मैंने ई बारे में जोन के बी बताओ बे सबई बोले के अच्छो करो के दोरे नईं खोले, को जाने को हते बे ओरें। बा बी दुफारी के सन्नाटा में। अब ऐसे में को आ चीन्ह पा रओ के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं ऊंसई चोर-उचक्का आएं। सो, अब आपई बताओ के ऐसे में बा गिनती करबे वारों के लाने घरों के दोरे नईं खुल रए तो ईमें उन ओरन को का दोस? औ ने ना खोलबे वारन को कोनऊं दोस। काए से दुफारी में घरे लुगाइयां, बच्चा औ बुड्ढा हरें रैत आएं। अरे अच्छो मोसम रए तो मोहल्ला में मुतके जने घूमत रैत आएं, ऐसे घाम में को आ मूंड चटकात फिरहे? पूरो सूनो डरो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! ऐसे में उनको काम धीमो सो चलहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मैं कै रई के एक तो ऐसे बुरए मोसम में जो काम करा रए औ जो काम ठीक से हो नई पा रओ तो खटिया खड़ी कर रए। अब जे दसा देख के जेई कहनात सो याद आहे के जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने कई।
‘‘हम समझ गए के तुम सोई एक जमाना में टीचर रईं, जेई से तुमें उनके लाने दुख हो रओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘मैं तो कच्ची वारी टीचर रई औ मोरी कभऊं ऐसी ड्यूटी नई लगी। मनों, जे इंसानियत की बात आए।’’ मैंने कई। 
‘‘बा तो ठीक आए बिन्ना, मनो नौकरी मने नौकर घांई जिनगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, नौकर बनाओ, जे तो गुलामी घांईं कहानो।’’ मैंने चिढ़ के कई।
‘‘अच्छा चलो, ने तिन्नाओ। हमाए-तुमाए सोचे से कछू ने हुइए, बोलने तो उनई को परहे। भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रए आप।’’ मैंने भैयाजी से कई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के पक्को करबे, पईसा बढ़ाबे के लाने तो सबई कट्ठे ठाड़ें हो जात आएं, सो ईके लाने काए नईं बोलत कोऊ?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                  
     वेदों में यह माना जाता है कि हमें ब्रह्मांड में मौजूद सभी प्रकार के जल की रक्षा करनी चाहिए। नदियों के जल को सबसे अधिक संरक्षित माना गया है, क्योंकि उससे खेतों की सिंचाई होती है, जिसके कारण जीवों का जीवन चलता रहता है। नदियों का बहता हुआ जल पवित्र माना जाता है। इसीलिए वेदों में कहा गया है कि नदियों को प्रदूषित नहीं करना चाहिए। वैदिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद आने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। इसी संदर्भ में माना गया है कि स्वर्ग तक केवल वैतरणी को पार करने के बाद ही पहुंचा जा सकता है, इसलिए यदि जो वैतरणी को पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता और उसकी आत्मा प्यासी भटकती रहती है।


   हिंदू वैदिक, पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैतरणी नदी (स्टिक्स नदी) में भयानक कीड़े, मगरमच्छ और वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध रहते हैं। मृत्यु के बाद, जब यमदूत पापी आत्मा को लेकर वैतरणी नदी से गुज़रते हैं, तो नदी का पानी उबलने लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है यानी जो जीवन में बुरे कर्म करता है, धार्मिक कार्य, दान-पुण्य नहीं करता, उस पापी आत्मा को वैतरणी नदी पार करने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। जो व्यक्ति नदी के जल को हानि पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद मिलने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। चूंकि स्वर्ग तक पहुंचने के लिए वैतरणी नदी को पार करना अनिवार्य है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति वैतरणी पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह नदी पृथ्वी के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी प्रवाहित होती है। जिस नदी की यहां बात की जा रही है, वह यमलोक से नरक तक बहती है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नदी का नाम वैतरणी नदी है। यह 100 योजन अर्थात् 120 किलोमीटर लंबी है और रक्त (खून) से भरी हुई है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इस नदी का एक हिस्सा पृथ्वी से होकर यमलोक तक जाता है, और वहां से नरक के द्वार तक पहुंचता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा को यमलोक में यमराज के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यदि उसके कर्मों के अनुसार उसे नरक की प्राप्ति होती है, तो यमदूत उस पापी आत्मा को इस नदी के पास ले जाते हैं। किसी भी पापी आत्मा को देखते ही नदी का रक्त उबलने लगता है और नदी से एक भयानक गर्जना उठने लगती है। वहीं, जो व्यक्ति अपने जीवन में दान-पुण्य करता है, तथा प्रकृति और नदी के जल को कोई हानि नहीं पहुंचाता, वैतरणी नदी उसकी आत्मा की रक्षा करती है। हमारे विद्वान पूर्वजों ने नदीजल संरक्षण को पारलौकिक जीवन से जोड़ कर जो भय पैदा किया वह नदीजल संरक्षण में सहायक रहा। किन्तु आधुनिकता ने इन प्राचीन संदेशों की अनदेखी की है और नदियों को गंभीर क्षति पहुंचाया है। हमारे पूर्वजों ने संभवतः इसी कारणवश धार्मिक ग्रंथों में वैतरणी नदी के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है, ताकि मनुष्य प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाने से भयभीत हों; वे अच्छे कर्म करें, प्रकृति का संरक्षण करें, जल बचाए और जैव विविधता की रक्षा करें।

जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय नदियों की जलवायु की स्थिति लगातार खराब हो रही है, जिसमें अनिश्चितकालीन वृद्धि, अत्यधिक वृद्धि, ज्वालामुखी का पिघलना और पानी की कमी मुख्य चुनौतियाँ हैं। बढ़ते तापमान के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे नदियां समय से पहले सूख रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 2070-2100 तक मानसून में नदियों का तापमान 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को पानी देने वाले हिमालयी ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना इन नदियों का प्रवाह प्रभावित कर रहा है।  बारिश के पैटर्न में बदलाव से बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। भारत में बाढ़ की दर बढ़ी है। वहीं अनियमित बारिश से सूखा और बंजरपन भी बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह का 71 प्रतिशत भाग जल से ढंका हुआ है, लेकिन मात्र 1 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। गंगा, यमुना और साबरमती जैसी नदियां पूरे भारत में पूजनीय हैं। नदी का जल वाणिज्यिक और औद्योगिक विकास, जलविद्युत उत्पादन, कृषि, नए बहुउद्देशीय बांधों और पर्यटन स्थलों के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि कीटनाशकों, भारी धातुओं, जैविक अपशिष्ट, रासायनिक अपशिष्ट और सीधे सीवेज के निर्वहन जैसे विभिन्न प्रदूषकों की उपस्थिति ने नदी के जल की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाया है। भारत में, नदी जल प्रदूषण एक प्रमुख समस्या है जिसने न केवल मानव और पशु स्वास्थ्य को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया है।

सन 2023 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में पांच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई थी। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया था कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। दरअसल, हिमनद यानी ग्लेसियर्स पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है।’’
इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा। गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियां झेलम, चिनाब, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियां सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहां पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है।

हमारे पूर्वज नदी जल के महत्व को हमसे कहीं अधिक समझते थे। ‘‘जलमेव जीवनं’’ भारतीय संस्कृति में जल और जलाशयों के महत्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे वैदिक साहित्य में जल के स्रोतों, सभी जीवों के लिए जल के महत्व, जल की गुणवत्ता और उसके संरक्षण पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है। वेदों में जल को ‘‘विश्वभेषजं’’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि सभी औषधियां जल में ही समाहित हैं (अर्थात् शुद्ध जल सभी जीवों के लिए अत्यंत लाभकारी, हितकारी और महत्वपूर्ण है)। वर्तमान में भी जल चिकित्सा के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ऋग्वेद में जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-‘‘अप्सवमृतमप्सु भेषजं।’’

- इसका अर्थ है कि जल में अमृत है, जल में औषधि है। वास्तव में, आर्य संस्कृति नदियों के किनारों पर ही फली-फूली और विकसित हुई। बड़े-बड़े प्राचीन नगर नदियों के किनारों पर ही समृद्ध हुए। जैसे सरयू के तट पर अयोध्या, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जयिनी, त्रिवेणी के तट पर प्रयाग, यमुना के तट पर मथुरा आदि। पंजाब को ‘‘सप्तसिंधु’’ प्रदेश कहा जाता है। वैदिक काल में, सरस्वती नदी के तट के समीप रहते हुए और इस नदी के जल का सेवन करते हुए, ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया।
पवित्र नदियों की महिमा का गान हजारों नामों से किया जाता है। ऋग्वेद के दशम मंडल के ‘‘नदी सूक्त’’ में भारत की नदियों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है-
गंगे च यमुने चौव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
- इसका अर्थ है, हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी नदियों! आप सभी मेरे स्नान के लिए इस जल में पधारें।
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा।
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका।।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी।
पूर्णाः पूर्णजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तु मे मङ्गलं।।

आदिग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित वेदों में, जल को एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व मानते हुए उसकी स्तुति की गई है। अथर्ववेद में जल को लाभकारी बताते हुए कहा गया है कि ‘‘जो जल मरुस्थल में है, जो जल तालाब में है, जो जल घड़े में लाया जाता है, जो जल वर्षा से प्राप्त होता है, ये सभी जल हमारे लिए कल्याणकारी हों। कुओं का जल हमें समृद्धि प्रदान करे। संचित जल हमें समृद्धि दे, वर्षा का जल हमें समृद्धि दे।’’ औषधि के रूप में जल का स्थान चिकित्सा विज्ञान, औषध-शास्त्र और विभिन्न देशों की चिकित्सा पद्धतियों में सर्वाेच्च है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ-साथ, सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसके दर्शन का विस्तार से वर्णन किया गया है। जल समस्त रोगों की औषधि है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो जल स्वर्ण के समान कांतिमान है, अत्यंत सुंदर है, जो पवित्रता प्रदान करता है, जिससे सवितादेव और अग्निदेव का जन्म हुआ, जो सर्वाेत्तम वर्ण वाला और ‘‘अग्निगर्भ’’ है, वह जल हमारे रोगों को दूर करने में सक्षम है; सभी को सुख और शांति की प्राप्ति हो। ऋग्वेद में जल-संस्कृति का निरंतर प्रवाह देखने को मिलता है। ऋग्वेद की जल-संस्कृति और परंपरा का विकास अथर्ववेद में भी परिलक्षित होता है। जल ही एक सुखी और समृद्ध जीवन का आधार है। शतपथ ब्राह्मण में जल को ‘‘आपो वै प्राणाः’’ (जल ही प्राण है) कहकर जीवन के रूप में वर्णित किया गया है। समस्त देवता जल में ही प्रतिष्ठित हैं। देवताओं तक हमारी स्तुतियों को पहुँचाने का माध्यम भी जल ही है।
वस्तुतः, प्रवाहित जल अर्थात् नदी के जल को सर्वाधिक पवित्र मानते हुए, वेदों में नदी जल के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है; क्योंकि नदी ही वह एकमात्र तत्व है जो जीवन के इस पार और उस पार ‘‘दोनों लोकों में’’ विद्यमान रहती है, और मनुष्य को सुख तथा स्वर्ग की प्राप्ति कराती है। यही कारण है कि शास्त्रों में नदी जल को बचाने का आह्वान किया गया है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 14.05.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, May 12, 2026

पुस्तक समीक्षा | पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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दोहा संग्रह - पीड़ा से सम्वाद
कवि      - डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया
प्रकाशक - नवदीप प्रकाशन, 821-बी, गुरु रामदास नगर एक्सटेंशन, गुरुद्वारा रोड, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092
मूल्य - 225/- 
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दोहा हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय, प्राचीन और सशक्त काव्य विधाओं में से एक है। इसका प्रयोग आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक नीति, प्रेम, भक्ति, और लोक-व्यवहार की बात कहने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कि अपभ्रंश से हिंदी तक की यात्रा में सिद्ध कवि सरहपा ने इसका प्रयोग सबसे पहले किया। कबीर, रहीम, रैदास और तुलसीदास ने दोहे के माध्यम से अमर साहित्य रचा। उन्होंने अपने दोहों में जीवन के हर आवश्यक पक्ष पर विचार किया। दोहा छंद अपनी लघुता में गहन अर्थ समाहित करने की क्षमता अर्थात गागर में सागर भरने की विशेषता के कारण आधुनिक हिंदी साहित्य में भी अत्यंत लोकप्रिय और महत्वपूर्ण बना हुआ है। परंपरा और आधुनिकता के सेतु के रूप में, यह आज भक्ति व नीति के साथ-साथ व्यंग्य, समसामयिक सामाजिक विषयों, और जीवन के अनछुए पहलुओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्त कर रहा है। आधुनिक काल के दोहाकार सामाजिक विद्रूपताओं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी की समस्याओं पर चोट करने के लिए दोहा विधा का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं। पारंपरिक क्लिष्ट भाषा के बजाय, आज के दोहे सीधी, सरल और मारक हिंदी भाषा में लिखे जा रहे हैं, जो सीधे पाठकों के दिल को छूते हैं। 

डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया गीत एवं छांदासिक काव्य के सिद्ध हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अनेक दोहे लिखे हैं जिनमें कुछ शताधिक दोहे तो एक ही विषय पर केन्द्रित रहे हैं। उनका दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ जीवन के विविध पक्षों पर लिखे गए दोहों का संग्रह है। पीड़ा जीवन का एक शाश्वत पक्ष है। इस धरती पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है और न होगा जो यह दावे से कह सके कि उसने पीड़ा का अनुभव कभी नहीं किया। यह अवश्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव में भिन्नता होती है। यथा किसी को प्रेम में पीड़ा मिलती है तो किसी को अर्थाभाव के कारण, किसी को अपनों से अवहेलना के कारण तो कभी शारीरिक कष्ट के कारण। पीड़ा का कारण कुछ भी हो किन्तु उसकी तीव्रता का चरमबिन्दु सभी में लगभग एक-सा होता है। फिर भी पीड़ा के मूल भाव एवं प्रकृति को जान कर पीड़ा की तीव्रता को कम किया जा सकता है। अपने दोहों के माध्यम से डॉ. सीरोठिया ने यही कहना चाहा है जिसे उन्होंने ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ नाम दिया है। वस्तुतः पीड़ा से सम्वाद वही व्यक्ति कर सकता है जो पीड़ा की समग्रता को समझता हो, जानता हो। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि पेशे से चिकित्सक रहे डॉ. सीरोठिया को हिन्दी साहित्य से अगाध प्रेम है। इसीलिए उन्होंने एमबीबीएस होते हुए भी, शासकीय चिकित्सक होते हुए भी हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया क्योंकि वे हिन्दी और उसके साहित्य को भली-भांति जानना और समझना चाहते थे। इसी के साथ गीत एवं छांदासिक विधाओं में निंरतर सृजन कार्य करते रहे। डॉ. सीरोठिया के सृजन में सतहीपन नहीं है, वरन एक गंभीरता की अनुभूति होती है क्योंकि उन्होंने अपने सृजनकर्म को ‘‘टाईम पास’’ या त्वरित ‘‘नेम-फेम’’ के साधन के रूप में नहीं लिया अपितु काव्य की जिस विधा को अपनाया, उसमें पूरी तरह रमते चले गए।    
 
संग्रह के बर्ल्ब में डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया की अपने सृजन के प्रति यह टिप्पणी बहुत अर्थपूर्ण है-‘‘किसी भी काव्य की रचना मानसिक वृत्तियों एवं विभिन्न प्रकार के सम्वेदनों के सामंजस्य से होता है। एक-एक भाव के लिए शब्द का चयन, और उसे सौन्दर्ययुक्त आकर्षक बनाने, अलंकृत करने का तन्मय भाव ही काव्य को सजीव बनाता है। कई बार यह किसी चित्र को बनाकर उसमें प्राण भरने जैसा कठिन भी होता है। कवि और काव्य का महिमा वर्णन हमें वेदों में भी मिलता है, यजुर्वेद में तो कवि को परमेश्वर के समतुल्य सम्मान दिया गया है। खैर, मेरे लिए काव्य साधना किसी सम्मान के लिए नहीं, स्वान्तः सुखाय की एक सहज प्रक्रिया मात्र है। मूक हृदय की मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो विधान करती आयी है, मेरे लिए वही कविता है।’’

यूं तो संत कबीर ने यह दोहा किसी और संदर्भ में कहा है किन्तु यदि साहित्य सृजन की सार्थकता पर इसे लागू किया जाए तो कवि के हृदय में साहित्य के प्रति सम्मान एवं लगन के रूप में भी इसे समझा जा सकता है-
सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप ।।

डॉ. सीरोठिया के इस दोहा संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें दोहों का मूल आधार भले ही जीवन की जटिलताएं है, किन्तु इसमें विषय की विविधता है। किसी को इनमें प्रेम-संयोग मिलेगा, तो किसी को प्रेम-वियोग, किसी को सामाजिक समरसता, तो किसी को विसंगतियों के दृश्य दिखाई देंगे। जैसे संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रो. डॉ. रघुनांदन प्रसाद तिवारी, डी.लिट., पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली ने ‘‘सामाजिकता समरसता के सशक्त और समर्थ दोहे’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘दोहा-संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ मेरे हाथ में है। इस संग्रह को पढ़ते हुए एवं अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि डॉ. सीरोठिया तन्मयी भाव के रचनाकार हैं। डॉ. सीरोठिया की रचनाओं में विषय के साथ जुड़ने की अद्भुत क्षमता है। डॉ. सीरोठिया जिस तदाकार भाव से काव्य रचना करते हैं वह मन को छू जाता है।’’

यह ‘‘तन्मयी भाव’’ डॉ. सीरोठिया के रचनाकर्म को स्थापना दिलाने में सक्षम है। प्रत्येक रचना तब हृदय को स्मर्श कर पाती है जब उसके भाव एवं विषय से तादात्म्य स्थापित कर लिया गया हो। इस संग्रह के दोहों की एक विशेषता यह भी है कि इनमें समस्याओं के साथ समाधान भी सुझाया गया है। जिससे इनकी उपादेयता और अधिक बढ़ जाती है। 

‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ दोहा संग्रह के कुल दोहों को विषयवार 11 शीर्षकों में बांटा गया है- 1. मन से मन की बात 2. बाँटो सबको प्यार 3. इन्सान-सूरत और सीरत 4. दोस्त और दोस्ती 5. सपन करें साकार 6. समय बड़ा अनमोल 7. उपकार और उपकारी 8. कलह 9. निन्दा और निन्दक 10. जल, जंगल, जमीन 11. कभी-कभी ऐसे भी। इन शीर्षकों को पढ़ कर ही समझ में आने लगता है कि कवि ने जीवन के हर बिन्दु को परस्पर जोड़कर इस संग्रह के दोहों की रेखा खींची है। दरअसल पीड़ा का सबसे बड़ा कारण होता है छल, कपट, धोखा। जब समय विपरीत हो और लोग मुंह फेर लें तो पीड़ा का जन्मना स्वाभाविक है-
समय बदलते ही यहाँ, अक्सर बदलें लोग। 
देता है धोखा बहुत, अपनेपन का रोग।।
चली जिन्दगी, उमर भर, इच्छाओं के साथ। 
लेकिन फिसली रेत सी, अब हैं खाली हाथ।।
यदि व्यौहार एवं आचरण में अपनत्व हो तो बड़े से बड़ा दुख भी कम हो जाता है। इसीलिए तुलसीदास ने लिखा है कि -
आवत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ वहां न जाइए, चाहे कंचन बरसे मेह।।

इसीलिए डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया अपने दोहों में कहते हैं कि-
घर आये हर अतिथि को, दें समुचित सम्मान । 
संस्कार कहते यही, रखिये सबका ध्यान।।
सबसे होना चाहिए, सुख कारक व्यौहार । 
इससे फलता-फूलता, है अपना परिवार।। 

बाजारवाद के इस खुरदुरे समय में प्रायः देखने को मिलता है कि लोग विलासिता की वस्तुएं अथवा एक अदद बड़ा अवसर पाने मात्र को आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान गिरवी रखने में तपिक भी हिचकते नहीं है। ऐसे लोगों का आह्वान करते हुए डॉ सीरोठिया लिखते हैं-
जिसने खुद का ही नहीं, कभी किया सम्मान। 
उसको फिर संसार में, मिलता है अपमान।। 
वृक्ष अकेले ही सहें, हर मौसम की मार। 
देते हैं फल-फूल वह, निज गुण के अनुसार।। 

गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में मित्रघात भी आम बात हो चली है। ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल जाती हैं जिनमें कभी किसी दोस्त के द्वारा धोखा दिए जाने अथवा एक तरफा प्रेम में पड़ कर जघन्य अपराध कर बैठने का विवरण होता है। जबकि मित्रता और प्रेम परस्पर विश्वास एवं एक-दूसरे की भावनाओं के सम्मान का विषय होता है। जैसे संत कबीर ने कहा है-‘‘प्रेम ने बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।’’ अर्थात प्रेम न किसी खेत की बाड़ में उगता है और न बाजार में बिकता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ नहीं पाता है वह स्वयं की और दूसरों की पीड़ा का कारण बनता है। अतः डॉ. सीरोठिया लिखते हैं कि- 
कभी दोस्त का ना करें, भूले से अपमान । 
आदर और समानता, का नित रक्खें ध्यान।।
मुश्किल में है डालता, इक तरफा का प्यार। 
कभी-कभी कारण बने, दुख का यही अपार।।
संत होना वैराग्यधारी होना नहीं है। संत होना सद्गुणों से युक्त होना है। जो संत है वहीं जगत का उद्धार कर जगत पर उपकार कर सकता है- 
सन्तों का इस जगत पर, सदा रहा उपकार। 
दुनिया को इनसे मिलें, सुन्दर, सरल विचार।।

डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के दोहे बेहद सरल, सुबोध और जनभाषा में हैं, जिन्हें आम आदमी आसानी से समझ सकता है। उनके दोहे कम शब्दों में समूचा जीवन दर्शन प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। डॉ. सीरोठिया ने प्रेम, सौंदर्य, विरह, नैतिकता, राजनीति, दर्शन, और अध्यात्म जैसे विविध विषयों पर दोहे लिखे हैं जो निराशा के क्षणों में उनके दोहे ‘‘हार न मानने’’ की प्रेरणा देते हैं। जैसे-
सच के सूरज की नहीं, कभी हुई है रात। 
हों विरोध की आँधियाँ, धोखे की बरसात।।

दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ पठनीय संग्रह है क्योंकि यह मानवीय चेतना और संवेदना के साथ दोहों के समकालीन सरोकारों को गहनता से रेखांकित करता है। 
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Saturday, May 9, 2026

गैरकामकाजी महिलाओं को सम्मान एवं आर्थिक अधिकार मिले - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

☢️"तुम दिन भर घर में पड़ी रहती हो और करती ही क्या हो?"
☢️"मैं दिन भर परिवार के लिए खटता रहता हूं लेकिन तुम्हें क्या?"
☢️ "घर से बाहर जाकर काम करो तब समझ में आए कि पैसा कमाना कितना कठिन है!"
☢️"तुम नहीं समझोगी!"

 - ऐसी सोच रखने वाले पुरुषों के द्वारा महिलाओं को कब आगे किया जाता है जब- 

👉किसी भी टिकट विंडो पर महिलाओं को जल्दी टिकट में मिलने की उम्मीद होती हो।
👉 जब राजनीतिक क्षेत्र में महिला सीट आरक्षित कर दी गई हो। (फिर सीट मिलने के बाद महिला का पति उस सीट के अधिकारों का उपयोग कर सके)
👉 जब महिलाओं को स्टार्टअप या लोन के लिए अधिक छूट और सुविधा दी जा रही हो।
👇
⛔️वरना आज भी अनेक परिवारों में महिलाएं आर्थिक अधिकार नहीं रखती हैं, निर्णय लेने का अधिकार नहीं रखती हैं तथा परिवार के पुरुषों के हाथों की कठपुतली बनकर रहती हैं।
⛔️ समाज जानता है, समझता है फिर भी ख़ामोश रहता है।
⛔️ स्त्री परिवार के टूटने के डर से, लांछन लगने के डर से,  तथा असुरक्षित महसूस करने के कारण निर्बल की भांति जीवन जीती है। विशेष रूप से समाज के मध्यम वर्ग की महिलाएं।

🤷 क्या गैर कामकाजी महिलाओं को परिवार में समान रूप से सम्मान और आर्थिक अधिकार नहीं मिलना चाहिए??❓

❗️हां ! हर महिला को सम्मान और आर्थिक बराबरी मिलनी चाहिए चाहे वह गैर कामकाजी घरेलू महिला  ही क्यों न हो❗️
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टॉपिक एक्सपर्ट | कछू घटबे के बादई काए पतो परत के उते सुरच्छा उपाय ने हते | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
कछू घटबे के बादई काए पतो परत के उते सुरच्छा उपाय ने हते
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

तला के इते पुराने सरकारी बस स्टैंड के लिंगे एक होटल की रसोई में आगी लग गई। मनो बा बड़ो पुरानो औ फेमस होटल आए। जबे हम उतई पास के स्कूल में पढ़ाबे को काम करत्ते ऊ टेम पे हमने उते के खीब समोसा खाए। कभऊं-कभऊं लौटत बेरा घरे सोई ले जात्ते। ऊ टेम पे बा तनक टपरा घांईं रई, बाकी ऊ टेम पे बी खींब चलत्ती। बाकी जे सब छोर के असल बात पे आओ जाए के ऊ होटल में आगी लगी। उते खाबे वारे, उते काम करबे वारे सबई घबड़ा गए। घबड़ाने वारी बातई रई। आगी से सबई खों डर लगत आए। आगी बुझाबे वारों ने मेनत करी औ आगी बुझा दई। तब कऊं जा के सुरच्छा को वारन खों ग्यान प्राप्त भओ के उते आगी से बचबे के सुरच्छा उपाय ने हते। मनो मामलो औ बिगर सकत्तो। 
बाकी सोचबे वारी बात जे आए के सहर में जित्ते बी बड़े-छोटे होटल औ ढाबा आएं उनमें सुरच्छा के इंतजाम कित्ते आए? औ दूसरी सोचबे वारी बात जे आए के होटलन की तो जांचें होत रैत हुइएं फेर जा चूक कोन से भई? मनो हमें पतो आए के चूक कोन से भई औ कैसे भई। आप सोचहो के हमें कैसे पतो? सो, सूदी सी बात आए के जबलौं कछू बुरौ ने हो जाए, तबलौं जिम्मेदारन की आंखें मिंची रैत हैं। हमाई ने मानो तो रोड डिवाइडरन खों देख लेओ। जब लौं उते दस-बीस गाड़ियां ने भिड़ जाएं जिम्मेदारन खों दिखात नईंयां। सो, कोऊ समै रैते देखबे की आदत डरवाओ उने जीसें औ कछू बुरौ ने घटे।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, May 7, 2026

बतकाव बिन्ना की | चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम


बतकाव बिन्ना की  
चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘तुम बड़े रोंटियाई वारे ठैरे। चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी।’’ जैसी मैं भैयाजी के इते पौंची सो भौजी के बोल सुनाई परे।
‘‘का हो रओ भौजी? भैयाजी बेईमानी कर रए का?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘तुमाए भैयाजी? कोन से बेईमानी? हमें नईं पतो।’’ भौजी अचरज करत भईं बोलीं।
‘‘आप ओरें काना-दुआ नईं खेल रए?’’ मैंने देखी के उते काना-दुआ की ने तो चौकड़िया हती औ ने गोटी, ने चईंयां।
‘‘नईं हम ओरें नईं खेल रए काना-दुआ। औ तुम इनकी बेईमानी की का कै रईं?’’ भौैजी ने मोसे पूछी।
‘‘अरे, आपई तो कै रई हतीं भैयाजी से के तुम बड़े रोंटियाई वारे ठैरे औ चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी। सो मैंने सोची के आप ओरें काना-दुआ खेल रए।’’ मैंने कई।
‘‘अरे, बा तो हम कै रए हते उते बंगाल के चुनाव के बाद की। उते देखो तो जिज्जी कैसी अड़ी दे रईं के हम कुर्सी ने छोड़बी। अरे, जो पब्लिक ने बता दई के हमें आपके बदले कछू नओ चाउने तो तो ऊको तनक मान राखो। जो का बच्चों घाईं कर रईं? हम जेई तुमाए भैयाजी से कै रए हते के जिज्जी खों सदमा बैठ गओ जेई से बे लरकोरा पना दिखा रईं। जैसे पैले अपन ओरें लरकपन में खिपड़ी गद्दा, छुआ-छुआउव्वल खेलत्ते औ जो कोनऊं हार जात्तो तो ऊको दाम देने परत्तो। तब कोऊ-कोऊ हारबे वारो अड़न लगत्तो के तुम ओरन ने रोंटियाई करी आए। चाए कछू हो जाए हम दाम ने देबी। ऊंसई सो जिज्जी बाई उते कर रईं।’’ भौजी ने कई।
‘‘बिलकुल सई कै रईं आप। अब हार गईं सो हार गईं। अपनी हार मान के देखो चाइए के उनसे चूक कां भई ताके अगली चुनाव में जीत सकें। उने समझो चाइए के आजकाल सोसल मीडिया पे ट्रोल करबे वारों की कमी नोंई। बे ऊंसई चीथत रैत आएं औ जे ऐसे करे से तो बे धजी बना दैहें। सो उने तनक सहूरी रखो चाइए।’’ मैंने भौजी की बात को समर्थन करो।
‘‘हमें तो ऊ टेम याद आ गओ जबे इंदिरा गांधी चुनाव हारी हतीं। बे ई टाईप से ने रोई हतीं। उने तो पकर के जेल ले जाओ गओ रओ। फेर बी उन्ने बिरोध ने करो हतो। ईको असर जे परो के अगली चुनाव में फेर के कुर्सी पे लौट आई रईं। औ बे अपने अटल बिहारी बाजपेयी हरें तो मुतके बेर हारे मनो बे बी कभऊं ऐसे ने रोए। जे काए अपनी भद्द उड़वा रईं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘कछू कओ पब्लिक जिज्जी से खफा तो रई हुइए तभईं तो ऊने कुर्सी से नैंचे पटक दओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘काए नईं रई? खूब रई। ने तो बटन चटका के उनके लाने वोट ने दे देती?’’ मैंने कई।
‘‘का होत आए बिन्ना के जब कोनऊं एक ई कुर्सी पे कुल्ल टेम से जमो रैत आए तो ऊको जे गल्तफेमी होन लगत आए के ऊको कोनऊं हरा नई सकत। बो चाए तो कछू बी कर सकत आए। पब्लिक की अटकी रई सो ऊने जिताओ, जो जीत गए सो काए की पब्लिक औ कां की पब्लिक।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो आप कछू कओ भैयाजी पर जे तो मानने परहे के जे अपने मोटा भाई, छोटा भाई दोई बेजा चतुरा आएं। ऐसो चक्रब्यूह रचत आएं के ऊमें उरझ के बड़े-बड़े महारथी धूरा चाटन लगत आएं। उन ओरन को दांव कोऊ भांप नई सकत। अब आगे देखियो के का-का होत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का आए बिन्ना के हमें एक किसां याद आ रई जेई पे से।’’ भौजी बोलीं।
‘‘कोन सी किसां?’’ मैंने भौजी से पूछीं।
‘‘किसां जे आए के भौत समै पैले की बात आए। एक देस में एक राजा रओे। जब बा राजा ने बनो रओ हतो सो ऊको दिन रात जेई लगत्तो के मोए राजगद्दी कबे मिलहे। ऊकी उमर सोई हो चली ती राजगद्दी सम्हारने जोग। सो एक दिनां तंग आ के ऊने अपने बापराम से सूधई कै दई के अब तुम गद्दी छोरो, ऊपे हमें बैठने। बापराम जो ऊ देस को महाराजा हतो, बोलो के हम काए गद्दी छोड़ें? हम ने छोड़बी, तुमसे जो दिखाए सो कर लेओ। जा सुन के ऊके बेटा खों आ गओ गुस्सा। ऊने तुरतईं एक फौज जोरी औ महल पे धावा बोल दओ। बाप औ बेटा में खींबई घमासान भई। अखीर में बाप हार गओ औ बेटा जीत गओ। फेर का रओ, ऊने बापराम खों गद्दी से उतार फेंकों औ खुद जा बैठो। ऊ राजा बन गओ। सुरू-सुरू में तो ऊने अपनी परजा को बरो खयाल राखो। मनो फेर ऊके राज में ढिलाई आन लगी। दसा जे भई के मुतकी परजा के पास ने तो खाबे खों नाज औ ने पहनबे खों हुन्ना। परजा देखत्ती के पड़ोस के देस में भौत कछू नोनों हो रओ औ उनके देस में खाली बतकाव होत रैत आए। सो परजा सोई अकुलान लगी। बा सोचन लगी के ईसे तो साजो आए के पड़ोसी राजा इते आए औ इते को भी राज सम्हार ले। कम से कम कछू तो अच्छो हुइए। अब का आए के परजा तो ऊंसई मंदर के घंटा घांई होत आए। जोन चाए ऊको बजात रए। ऊपे ऊको जेई भरम रैत आए के हम तो भगवान के काम आ रए। हमाई आवाज सो भगवान सुन रए। सो, बा तो ठुकत-पिटत रैत आए। सो, फेर भओ जे के एक दार पड़ोस के राजा ने चढ़ाई कर दई। दोई राजाओं में घमासान भई। मनो परजा तो जेई ताक में बैठी हती सो ऊने पड़ोसी राजा को साथ दओ औ अपने राजा खों हरा दओ। हारबे वारो राजा खों भरोसो ने हो पा राओ तो के ऊकी परजा दूसरे को साथ दे सकत आए, सो ऊने परजा से पूछी के तुम ओरन ने ऐसी काए करी? तो परजा ने अपने हारे भए राजा के आंगू एक दरपन धर दओ औ बोली के ईमें अपनी सकल देखो औ बताओ के आप पैले कैसे दिखत्ते औ अब कैसे दिखात आओ। औ जो अबे ने बता सको तो सोच के बताइयो। जो तुम अपनी परजा के लाने ने बदले होते तो तुमाई परजा बी तुमें ने बदरती। सो बिन्ना, जे किसां हमें याद आ रई हती।’’ भौजी पूरी किसां सुनात भई अखीर में बोलीे।
‘‘बिलकुल सांची किसां आए जा तो। जे तो उते भओ आए। सो अब रोए, चिचियाए से का हुइए?’’ मैंने कई। 
‘‘हऔ बिन्ना! उते पच्छिम बंगाल में ऊंसई भौत गरीबी आए। औ भीर तो इत्ती के ने पूछो। हम तो एक बेर कोलकत्ता गए रए सेा हमें पसीनों छूट गओ रओ। दो दिनां में जैसे-तैसे अपनो काम निपटाओ औ भाग आए रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मैंने नईं देखो कोलकाता, मनो जाबे को जी भी नईं करत। मोए ऊंसई भीर से घबराट होत आए। मनो उते के साहित्य में उते के बारे में खूब पढ़ो। देसी-बिदेसी सबई ने कोलकाता के बारे में खूब लिखो। एक किताब मैंने पढ़ी रई डोमनिक लैपियर की। ऊको नांव आए ‘‘सिटी ऑफ ज्वाय’’। ऊमें ऊने कोलकाता के बारे में खूबई खोल के लिखो आए। बाकी मोए तो जेई लगत आए के जां पे इत्ते बरस जिज्जी को मने एक लुगाई को राज रओ उते सोनागाछी की रेड लाईट बुझ ने सकी। मैंने कऊं पढ़ी रई के जैसे एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी मुंबई की धारावी आए ऊंसई सोनागाछी एशिया की सबसे बड़ी लुगाइयन की मंडी आए।’’ मैंने कई।
‘‘ऐसो का? मनो कल को जे ने बोलियो के एशिया में सबसे ज्यादा दारू को अहाता अपने प्रदेस में आए।’’ भौजी ने मोसे कई।
‘‘अरे, जो का कै रईं आप? ऐसो ने कओ। ने तो बे अहाता वारे मारहें औ रेबेन्यू वारे अलग मारहें। आप तो अपनी दार-रोटी चलन देओ।’’ मैंने भौजी खों हंस के समझाओ। 
‘‘जिज्जी खों इतई ने बुला लेवें? इते बे दारू चढ़ा के अपनो गम भुला लैहें।’’ भैयाजी ने सोई हंस के चुटकी लई। उनकी बात सुन के मोए औ भौजी खों खींबई हंसी आई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ई के बाद अब आगे का हुइए? मैं मैंगाई की नईं राजनीति की कै रई।  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, May 6, 2026

चर्चा प्लस | क़त्ल उनका जिन्होंने हमें ज्ञान, ध्यान और जीवन दिया | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
क़त्ल उनका जिन्होंने हमें ज्ञान, ध्यान और जीवन दिया        
- डॉ (सुश्री) शरद 
सिंह                                                                                     आज जंगल का इलाका तेज़ी से सिकुड़ रहा है। यहाँ तक कि हम अपने घर को बड़ा करने के लिए आँगन में लगे पेड़ भी काट देते हैं। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि हमारे धर्म और संस्कृति के विकास में पेड़ों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह नहीं भूलना चाहिए कि रावण द्वारा अगवा की गई सीता ने अशोक के पेड़ के नीचे ही शरण ली थी। वनवास के दौरान, अर्जुन को अपने गांडीव धनुष को छिपाने और सुरक्षित रखने के लिए शमी के पेड़ में जगह मिली थी। भगवान बुद्ध का जन्म साल के पेड़ के नीचे हुआ था और उन्हें पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। यानी, पेड़ों ने हमारे पूर्वजों को ज्ञान प्राप्त करने के लिए ध्यान करने की जगह दी और उनके हथियारों को सुरक्षित रखकर, भविष्य में उन्हें सुरक्षा प्रदान की। ये वृक्ष ही हैं जो हमें प्राणवायु आक्सीजन देते हैं। हम ऐसे पेड़ों को कटने कैसे दे रहे हैं?


       हमारी भारतीय संस्कृति एक गौरवशाली संस्कृति है। हमारे भारत में अनेक ऋषि-मुनि हुए हैं, जिन्होंने हमें ज्ञान दिया और जीवन जीने का सही तरीका सिखाया। भारतीय संस्कृति में जीवन को जिन चार आश्रमों में बांटा गया है - ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम - उनमें से वानप्रस्थ आश्रम में वन में रहने का एक काल निर्धारित है। बचपन और जवानी के बाद, गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को पूरा करने के उपरांत वानप्रस्थ को अपनाना एक परंपरा थी। चाहे स्त्री हो या पुरुष, वे अपनी इच्छा अनुसार वन में चले जाते थे और प्रकृति के सानिध्य में रहते हुए, गृहस्थ जीवन और संन्यास जीवन के बीच एक सेतु (कड़ी) का काम करते थे। वन में रहते हुए भी वे अपने परिवार से जुड़े रहते थे। उनके सगे-संबंधी उनसे मिलने वन तक पहुँचते थे, जिन्हें वे प्रकृति की उपयोगिता, महत्व और उसके संरक्षण का ज्ञान देते थे। यदि हम भारत के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डालें, तो हमें ज्ञात होगा कि वृक्षों ने हमारे देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों को ध्यान-साधना के लिए एक उपयुक्त स्थान प्रदान किया। वृक्षों के नीचे बैठकर ही ध्यान किया जाता था और तपस्या की जाती थी। साथ ही, वृक्ष विश्राम के लिए छाया और अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए स्थान भी प्रदान करते थे।
ऋग्वेद के अनुसार, शमी के वृक्ष में अग्नि उत्पन्न करने की क्षमता होती है; और ऋग्वेद में वर्णित एक किंवदंती के अनुसार, आदिम काल में सर्वप्रथम ‘‘पुरु’’ (जो चंद्रवंशियों के पूर्वज थे) ने शमी और पीपल की टहनियों को आपस में रगड़कर अग्नि प्रज्वलित की थी।
शास्त्रों में पीपल के पेड़ को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इस एक पेड़ को मोक्ष के लाखों-करोड़ों उपायों के बराबर माना गया है। यहाँ तक कि गीता में भी, श्री कृष्ण ने पीपल को सबसे श्रेष्ठ कहा है। भविष्य पुराण में ऐसे कई पेड़ों का उल्लेख है जिन्हें पापकारी माना जाता है। वृक्षायुर्वेद में पेड़ों के औषधीय महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।
वनस्पति जगत में पीपल ही एकमात्र ऐसा पेड़ है जिसमें कीड़े नहीं लगते। यह पेड़ सबसे अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है, जिसे आज विज्ञान ने भी स्वीकार कर लिया है। जिस पेड़ के नीचे बैठकर भगवान बुद्ध ने तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त किया था, वह पीपल का पेड़ ही है; और श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पेड़ों में पीपल सबसे श्रेष्ठ है।
भविष्य पुराण में ही यह बताया गया है कि शीशम, अर्जुन, जयंती, करवीर, बेल और पलाश के पेड़ लगाने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, और पेड़ लगाने वाले के तीनों जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति सौ पेड़ लगाता है, वह ब्रह्मा का स्वरूप बन जाता है; और जो एक हज़ार पेड़ लगाता है, वह विष्णु का स्वरूप बन जाता है। अशोक के पेड़ के बारे में लिखा है कि इसे लगाने से किसी प्रकार का शोक या दुख नहीं होता। घर में अशोक का पेड़ लगाने से अन्य अशुभ पेड़ों के दोष समाप्त हो जाते हैं। बिल्व वृक्ष को श्श्रीवृक्षश् के नाम से भी जाना जाता है। इस पेड़ को अत्यंत शुभ माना जाता है। वास्तव में, इसमें देवी लक्ष्मी का वास होता है और यह लंबी आयु प्रदान करता है। भविष्य पुराण में ही यह बताया गया है कि वट वृक्ष (बरगद) मोक्ष प्रदान करता है, आम का पेड़ मनोकामना पूरी करता है, सुपारी का पेड़ फलदायी सिद्ध होता है, जामुन का पेड़ धन-संपत्ति देता है, बकुल का पेड़ पापों का नाश करता है, तिनिश का पेड़ शक्ति और बुद्धि प्रदान करता है, और कदंब का पेड़ प्रचुर मात्रा में लक्ष्मी प्रदान करता है।
आंवले का पेड़ लगाने से आपको अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि गूलर के पेड़ में भगवान दत्तात्रेय का वास होता है। पारिजात के पेड़ के बारे में बताया गया है कि भगवान कृष्ण इसे स्वर्ग से लेकर आए थे। शास्त्रों में यह कहा गया है कि जो व्यक्ति पेड़ों को काटता है, वह मूक (गूंगा) हो जाता है और उसे अनेक प्रकार के रोग घेर लेते हैं। जो लोग अश्वत्थ (पीपल, वट वृक्ष और श्रीवृक्ष) को क्षति पहुँचाते हैं, उन्हें श्ब्रह्महत्याश् के पाप का भागी माना जाता है। इसी तरह, शास्त्रों में बरगद के पेड़ के बारे में भी विस्तार से बताया गया है। श्वृक्षायुर्वेदश् में कहा गया है कि जो व्यक्ति विधि-विधान से दो बरगद के पेड़ लगाता है, उसे मृत्यु के बाद श्शिवलोकश् की प्राप्ति होती है।
जब हम महाभारत की कथा पढ़ते या सुनते हैं, तो उसमें ‘‘शमी’’ के पेड़ का ज़िक्र आता है। शमी का पेड़ वही है जिसने अर्जुन के ‘‘गांडीव’’ धनुष को आश्रय दिया था। अपने 12 वर्षों के वनवास के बाद, एक वर्ष के ‘‘अज्ञातवास’’ के दौरान, पांडवों ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र इसी पेड़ में छिपा दिए थे जिनमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी शामिल था। कुरुक्षेत्र में कौरवों से युद्ध करने जाने से पहले भी, पांडवों ने अपने सभी हथियार शमी के पेड़ में ही छिपाए थे; उन्होंने उस पेड़ की पूजा की थी और उससे शक्ति तथा विजय की कामना की थी। आज भी भारत के कई क्षेत्रों में, दशहरा के दिन शमी के पेड़ की पूजा की जाती है और जीवन की हर कठिनाई पर विजय पाने के लिए प्रार्थनाएँ की जाती हैं।
शमी शम्यते पापं शमी शत्रु विनाशिनी
अर्जुनस्य धनुर्धारी, रामस्य प्रियदर्शिनी
करिष्यमन्यत्रय यथा कलम सुखं मया
तत्रानिर्विघ्नकत्रित्वं भव श्रीरामपूजिता

अर्थात - हे शमी, तुम पापों को नष्ट करने वाले और शत्रुओं का संहार करने वाले हो। तुम अर्जुन के धनुष को धारण करने वाले हो और श्री राम को प्रिय हो। जिस प्रकार श्री राम ने तुम्हारी पूजा की थी, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी पूजा करता हूँ। मेरे विजय-पथ में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करके मेरी विजय को मंगलमय बनाओ।
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में हुआ था, जब कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने मायके देवदह जा रही थीं; रास्ते में लुम्बिनी वन में एक श्सालश् वृक्ष के नीचे उनका जन्म हुआ। वर्षों बाद, भगवान बुद्ध ने एक ‘‘पीपल’’ वृक्ष के नीचे बैठकर कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप उन्हें ‘‘बुद्धत्व’’ की प्राप्ति हुई। इसीलिए उस पीपल वृक्ष को ‘‘बोधि वृक्ष’’ कहा जाने लगा।
प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को ‘‘वट’’ वृक्ष के नीचे तथा 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी को ‘‘साल’’ वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसी प्रकार, मध्य के 22 तीर्थंकरों को भी अलग-अलग वृक्षों के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। जिन वृक्षों के नीचे बैठकर इन महापुरुषों ने ज्ञान प्राप्त किया था, उन्हें ‘‘केवली वृक्ष’’ कहा जाता था।
ये वे वृक्ष हैं, जिन्होंने हमारे पूर्वजों को ज्ञान-प्राप्ति हेतु ध्यान करने के लिए स्थान प्रदान किया और उनके अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित रखकर भविष्य में उन्हें सुरक्षा प्रदान की। ऐसे वृक्षों को हम भला कैसे कटने दे सकते हैं?
हमारा वातावरण सभी प्रकार की हानिकारक गैसों से भरा हुआ हैए जिनमें कार्बन डाइऑक्साइडए कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड शामिल हैं। सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या और दुनिया भर में कारखानों की बढ़ती संख्या वातावरण में इन हानिकारक गैसों के स्तर को बढ़ा रही है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं और वह शुद्ध और ताज़ी ऑक्सीजन देते हैं जिसकी हमें इंसानों को अपने जीवित रहने के लिए ज़रूरत होती है। पेड़ हमारे पर्यावरण को साफ रखने के लिए अन्य हानिकारक गैसों को भी सोख लेते हैं। यही कारण है कि जिन इलाकों में पेड़ों की संख्या ज़्यादा होती हैए वहाँ प्रदूषण कम होता है।
जंगल वन्यजीवों के लिए आवास का काम करते हैं। पेड़ पक्षियों और जानवरों की कई प्रजातियों को आश्रय देते हैं। इस प्रकारए वे जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। वनों की कटाईए जो आजकल मुख्य चिंताओं में से एक हैए के कारण जैव विविधता का नुकसान हुआ है। जानवर और पक्षी अपना आवास खो रहे हैं और उनके लिए जीवित रहना मुश्किल हो रहा है। शोधकर्ताओं का दावा है कि जैव विविधता के और नुकसान से पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जानवर और पौधे अपनी कई ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक.दूसरे पर निर्भर रहते हैं। ज़्यादा पेड़ लगाने और वनों की कटाई से बचने से जैव विविधता को बढ़ावा देने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हमें अपनी ज़रूरतों के लिए पेड़ों से लकड़ी मिलती है। लकड़ी की किस्मों के साथ.साथ उसमें कई खासियतें भी पाई जाती हैं। लकड़ी के मामले में देवदार के पेड़ सबसे मज़बूत होते हैं। लेकिन ये पेड़ खास तौर पर पहाड़ी इलाकों में पाए जाते हैं। ये पेड़ 3500 से 12000 फीट की ऊँचाई पर पाए जाते हैं। चीड़ के पेड़ की लकड़ी बहुत मज़बूत और कठोर होती है। महोगनी एक ऐसी लकड़ी है जिसका इस्तेमाल फर्नीचरए जहाज़ए वाद्य यंत्रए बंदूक के कुंदे आदि बनाने में किया जाता है। साथ ही, इसकी लकड़ी पानी से खराब नहीं होतीए इसलिए इससे नाव भी बनाई जाती हैं। आबनूस जैसी लकड़ियाँ पानी में डूब जाती हैंए भले ही वे पूरी तरह से सूखी और अच्छी तरह से उपचारित हों, जबकि बोलसा लकड़ी कॉर्क से भी हल्की होती है। चंदन के पौधे को पूरी दुनिया में सबसे कीमती पौधा माना जाता है। भारत में चंदन की कीमत बहुत ज़्यादा है। चंदन का इस्तेमाल बहुत खास चीज़ों में किया जाता है, जिनमें पूजा.पाठ और हवन आदि शामिल हैं।
पेड़ों से मिलने वाली कई चीज़ें हमारे लिए ज़रूरत बन गई हैं, जिसकी वजह से हम पेड़ों की कटाई और उससे पैदा होने वाले खतरे के प्रति लापरवाह हो गए हैं। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि पेड़ों को काटना हमारे अपने जीवन के लिए खतरा है। धरती पर जीवन को बनाए रखने के लिए पेड़ों की कटाई को रोकना बहुत ज़रूरी है। पेड़ों की कमी को पूरा करने के लिए हमें और भी ज़्यादा पेड़ लगाने होंगे। हर किसी को पेड़ लगाने चाहिए और पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देना चाहिए। आखिर यही तो वे वृक्ष हैं जिन्होंने हमें ध्यान, ज्ञान और छाया दी और हम इन्हें निर्ममता से काट कर इनके प्रति कृतघ्न और हत्यारे बन रहे हैं, वह भी अपनी भावी पीढ़ियों तक के भविष्य को दांव पर लगा कर। क्या यह उचित है? ज़रा सोचिए!
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(दैनिक, सागर दिनकर में 06.05.2026 को प्रकाशित) 
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