Tuesday, October 27, 2026

पुस्तक समीक्षा | जाति प्रथा पर एक पुस्तक जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा      
जाति प्रथा पर एक पुस्तक जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए  
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - जाति प्रथा: राम मनोहर लोहिया 
संपादक    - रघु ठाकुर
प्रकाशक    - आकार बुक्स, 28 ई पाॅकेट-4, मयूर विहार फेज1, दिल्ली-110091
मूल्य       - 250/-
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आज जाति व्यवस्था को ले कर मानो संक्रमण काल चल रहा है। यद्यपि आज जातिगत स्थितियां देश की स्वतंत्रतापूर्व की स्थितियों से भिन्न हैं किन्तु जाति प्रथा का पोषण निरंतर बना हुआ है। देश को स्वतंत्र हुए दशको गुज़र चुके हैं, किन्तु हम जाति प्रथा से मुक्त नहीं हो सके हैं। जबकि यह सभ्यसमाज का सबसे बड़ा कलंक है। एक ऐसा कलंक जो समाज को कभी भी वैचारिक प्रगति नहीं दे सकता है। आज जातिगत जनगणनाएं होती हैं। जातिगत योजनाएं बनाई जाती हैं। यहां तक कि लोकतांत्रिक चुनावों में भी जातिगत आधार पर विजय की रणनीतियां तैयार की जाती हैं। महात्मा गांधी जाति व्यवस्था को धीरे-धीरे समाप्त करना चाहते थे, वहीं डाॅ. राम मनोहर लोहिया जाति प्रथा के कलंक को शीघ्र मिटाना चाहते थे। वे जानते थे कि जब तक समाज विभिन्न जातियों में बंटा रहेगा तब तक देश और समाज सही अर्थ में विकसित नहीं हो सकेगा। 
‘‘जाति प्रथा’’, यह पुस्तक है जिसमें राम मनोहर लोहिया के विचारों को गांधीवादी चिंतक एवं समाज विमर्श के वरिष्ठ लेखक रघु ठाकुर ने संपादित किया है। रघु ठाकुर स्वयं लोहियावादी विचारों के प्रबल समर्थक हैं। उनका जमीनी कार्यों का दीर्घ जीवनानुभव है। उन्होंने सुदूर ग्रामीण अंचलों से ले कर महानगरों तक में व्याप्त जाति प्रथा और उसके दुष्प्रभावों को बहुत करीब से देखा है। न केवल देखा है अपितु उन परिस्थितियों का आकलन तथा विवेचन भी किया है। रघु ठाकुर समतामूलक समाज को स्थापित होते देखना चाहते हैं। समाजविमर्श को ले कर अब तक गद्य एवं पद्य की उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘‘जाति प्रथा’’ पुस्तक में रघु ठाकुर ने डाॅ. राम मनोहर लोहिया के उन विचारों एवं भाषणों को प्रस्तुत किया है जो जाति प्रथा उन्मूलन के संबंध में हैं। यह पुस्तक डाॅ. राम मनोहर लोहिया के विचारों को बारीकी से समझने में मदद करती है। रधु ठाकुर ने पुस्तक के संबंध में आरम्भ में ही लिखा है कि -‘‘डॉ. राम मनोहर लोहिया के 8 लेख व भाषण इस पुस्तक में शामिल हैं। वैसे तो ये लेख व भाषण लगभग 60 वर्ष पुराने हैं, परन्तु मूल विचार के संदर्भ में आज भी जीवन्त और प्रासंगिक हैं। लोहिया ने अपने इन लेखों में न केवल जाति प्रथा का सच उजागर किया है, बल्कि इसके साथ-साथ इस बुराई को कैसे नष्ट किया जाये, यह भी रास्ता बताया है।’’
संपादक रघु ठाकुर ने आगे लिखा है कि -‘‘जाति प्रथा भारत की विदेशी गुलामी का मुख्य कारण रही है। भारत एक विशाल देश था परन्तु चन्द हमलावरों ने इस पर कब्जा किया था, क्योंकि मुल्क जातियों में बंटा हुआ था और जातियों ने समाज के बड़े हिस्से को जाति के नाम पर थोपे गए व्यवसाय में बांध दिया था। अगर भारत में जाति व्यवस्था नहीं होती तो भारत जैसा विशाल देश कभी भी विदेशी हुकूमतों या हमलावरों का गुलाम नहीं बन सकता था। लोहिया ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए, जातिवाद ने भारतीय समाज को जिस जड़ता में बांध दिया था, उसे मुक्त कराकर राष्ट्रीय जीवन में हलचल पैदा करने की पहल की थी। इस जड़ता को तोड़ने व भागीदारी की इच्छा को जगाने के लिए लोहिया ने कई राजनैतिक प्रयोग भी किए थे। जिनमें से एक था ग्वालियर की महारानी के खिलाफ सुक्खो रानी जमादारिन को लोकसभा में खड़ा करना। इस एक घटना ने देश के करोड़ों शोषितों, वंचितों और समाज में दलित अनुसूचित जाति के नाम पर एक निम्न कर्म से बांध दिए गए करोड़ों लोगों के मन में हलचल पैदा की और राष्ट्रीय कार्यों में भागीदारी की भूख पैदा की। ऐसा ही प्रयोग लोहिया ने रायबरेली में भी किया था जहां प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाई स्व. फिरोज गाँधी के खिलाफ स्व. नन्द किशोर जी को खड़ा किया था जो नाई समाज से थे।’’
हमारे भारतीय समाज में यह जाति प्रथा आई कहां से और कब से? यह माना जाता है कि कर्म के आधार पर जातियों का जन्म हुआ किन्तु यदि ऋग्वैदिक काल में देखें तो यह तर्क खोखला प्रतीत होता है। ऋग्वेद में एक ऐसे युवक का उल्लेख है जो अपना परिचय देते हुए बताता है कि -‘‘मेरे पिता एक वैद्य हैं, मेरी मां अनाज पीसती हैं, मैं एक कवि हूं। हम सभी अलग-अलग तरीकों से धन के लिए प्रयास करते हैं।’’ इस परिचय में तो एक ही परिवार के सभी सदस्यों के कर्म अलग-अलग हैं। इसका आशय है कि ऋग्वैदिक काल में कर्म के आधार पर समाज बंटा हुआ नहीं था और न ही इस प्रकार के बंटवारे की कोई अनुवांशिक व्यवस्था थी। यह कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल में इस प्रकार की भावानाओं का उदय होने लगा तथा स्मृतियों के आते तक जाति प्रथा जोंक समाज की देह से चिपक चुकी थी और उसने पारस्परिक समता का रक्त चूसना आरंभ कर दिया था। 
देख जाए तो ऋग्वैदिक काल के विचारों की दोषपूर्ण व्याख्या ने लगभग उसी काल से जाति प्रथा के बीज बो दिए थे। वर्ण-व्यवस्था ऋग्वैदिक काल में थी। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार ब्राह्मण की उत्पत्ति ब्रह्म (भगवान) के मुख से राजन्य (क्षत्रिय) की बाहु से, वैश्य की जांघ से और शूद्र की पैरों से बताई गई है। ऋग्वेदकाल में चार वर्ण अस्तित्व में थे। ऋग्वैदिक काल में कुछ वर्ग तथा व्यवसाय अस्तित्व में थे। किन्तु वे वंशानुगत नही थे। रुचि एवं योग्यता के आधार पर कोई भी पुरोहित, योद्धा अथवा व्यवसायी बन सकता था। ऋग्वेद में विभिन्न वर्गों व व्यवसायों के बीच साथ भोजन ग्रहण करने तथा परस्पर वैवाहिक विभिन्न वर्गों व व्यवसायों के बीच साथ भोजन ग्रहण करने तथा परस्पर वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। वर्ण की गलत व्याख्या के कारण जाति का उद्भव हुआ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि वर्णों को जाति के नाम से जाना जाने लगा। ब्राह्मण को ब्राह्मण जाति, क्षत्रिय को क्षत्रिय जाति, वैश्य को वैश्य जाति तथा शूद्र को शूद्र जाति से जाना जाने लगा। वर्ण के जाति में परिवर्तित होने का मुख्य कारण बना जन्म एवं वंशानुगत व्यवसाय । प्रत्येक जाति का एक परम्परागत (वंशानुगत) निश्चित व्यवसाय होता था जो एक पीढी से दूसरी पीढी को हस्तांतरित होता रहता था। कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति अपना व्यवसाय बदल लेता था जिसकी अनुमति थी। जिस कारण अनेक उपजातियों का उदय हुआ । 
गलतियां इंसान ही करता है और उन्हें सुधारने की क्षमता भी इंसान के पास होती है, बशर्ते वह अपनी क्षमताओं को अमल में लाए और अपनी गलती सुधारने की दृढ़ इच्छाशक्ति रखे। डाॅ. राम मनोहर लोहिया जाति प्रथा रूपी गलती को सुधारना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने सक्रियता से प्रयास किया। सुव्यवस्थित ढंग से संपादन करते हुए पुस्तक के आरम्भ में डाॅ. राम मनोहर लोहिया का संक्षिप्त परिचय दिया गया है जिससे युवा पाठक जो लोहिया के व्यक्तित्व से परिचित नहीं हैं उनके बारे में कुछ बुनियादी बातें जान सकें। जैसे उनका जन्म 23 मार्च 1910 तथा मृत्यु 12 अक्टूबर 1967 को हुई। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में जन्म और प्रारंभिक शिक्षा । बाद में बम्बई के मारवाड़ी उच्च विद्यालय से माध्यमिक शिक्षा। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पाने के पश्चात जर्मनी के होमबोल्ट विश्वविद्यालय, बर्लिन, से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की उपाधि। जर्मनी से लौटने के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी। 1934 में कांग्रेस के अंदर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। कांग्रेस के विदेश विभाग के 1937 से 1939 सचिव रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन मे जयप्रकाश नारायण के साथ भूमिगत रेडियो का संचालन और बाद में लाहौर जेल गए। गोवा मुक्ति आंदोलन, 1946 का नेतृत्व किया। सन 1948 में कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना। बाद में सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी एवं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में कार्य किया। 1963 में लोकसभा के उप-चुनाव विजयी हुए। ‘‘मैनकाइंड’’ एवं ‘‘जन’’ के संपादक के अलावा कई महत्वपूर्ण विचारोत्तेजक रचनाएं लिखीं। 
इस पुस्तक में प्रो. अशोक पंकज का प्राक्कथन, मदन जैन के ‘‘दो शब्द’’ के उपरांत जिन शीर्षकों में कलेवर को बांटा गया है वे हैं-‘‘जाति प्रथा के संबंध में - रघु ठाकुर’’, जिसके उपशीर्षक हैं- 1.जाति प्रथा का नाश क्यों और कैसे? 2. जाति 3. जाति प्रथा और गुलामी 4. छोटी जातियां और लासा 5.सुक्खो रानी और ग्वालियर महारानी 6. विशेष अवसर क्यो? 7. द्रौपदी या सावित्री? 8. अवसर से योग्यता। ये लेख डाॅ. राम मनोहर लोहिया द्वारा विभिन्न स्थानों में दिए गए भाषणों का संपादिक अंश हैं। इन लेखों से लोहिया के सामाजिक उत्थान के विचारों का पता चलता है। बानगी के लिए दो उद्धरण देखिए जिनमें एक है ‘‘जाति’’ शीर्षक भाषण-लेख से। लोहिया ने 17 जुलाई 1959 को हैदराबाद में अपने लम्बे उद्बोधन में कहा था कि -‘‘ सवाल उठता है कि फिर इसको (जाति) खतम कैसे किया जाए? में समझता हूं कि इस पर तो ज्यादा बहस करने की जरूरत नहीं कि इसको खतम किए बिना हिंदुस्तान तरक्की कर नहीं सकता में समझता हूं कि हिंदुस्तान की दुर्गाति का सबसे बड़ा कारण जाति प्रथा है। हिंदुस्तान बार-बार विदेशियों के कब्जे में गया और हमले हम इतने झेल नहीं पाये, इसका भी सबब जाति प्रथा है, पर अकेला नहीं। मैं वह गलती करना नहीं चाहता जो दूसरे लोग कर चुके हैं कि यही सबब बताऊँ। कई सबब हैं, पर उनमें यह शायद सबसे बड़ा है। वैसे दुनिया के सभी मुल्कों पर हमले हुए बहुत से देश परतंत्र हुए हैं। लेकिन जितनी बार हिंदुस्तान परतंत्र हुआ है, उतनी बार और कोई बड़ा सभ्य मुल्क नहीं हुआ। यह बिलकुल तय बात है। इस पर किसी को कोई शक नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह तो इतिहास की बात है। ऐसा क्यों हुआ है? क्यों हम इतनी बार परतंत्र होते गए? यह भी सही है कि जब हमारे पुरखे अच्छे-भले और ताकतवर और फैले हुए दिमाग के थे, तब जाति प्रथा कुछ बोली रहती भी तो बाहरी हमलों का मुकाबला कुछ अच्छी तरह से कर लिया करते थे। कभी-कभी ऐसे जमाने भी आए कि 400-500 वर्ष तक हिंदुस्तान की तरफ किसी बाहरी आदमी ने तिरछी आँखें करके देखने की हिम्मत तक नहीं की थी, लेकिन कम समय तक ज्यादातर हमले आते रहे और जब सिलसिल चलता था तो फिर एक के बाद एक, एक के बाद एक। कहीं यह गलती मत कर बैठना कि मैं कह रहा हूँ कि हिंदू-मुसलमानों के हमलों के नीचे आ गए, यह बात नहीं। बात यह है कि जब पहली दफे मुसलमानों का जो हमला हुआ, मुसलमान नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह तो गलत बात होगी, कहो पठान, या अफगान या तुर्क क्योंकि मुसलमान भी तो एक दफे राजा बनने के बाद फिर दुबारा मुसलमान के हाथ से हारा, तिबारा हारा, चैबारा हारा, दफे हारा।’’
22 जून 1962 में नैनीताल में समाजवादी युवजन सभा शिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए ‘‘द्रौपदी या सावित्री’’ पर चर्चा करते हुए डाॅ. लोहिया ने कहा था कि ‘‘सावित्री के लिए हिंदू नारी और हिंदू नर, दोनों का दिल एकदम से आलोड़ित हो उठता है कि वाह, क्या गजब की औरत थी। औरत भी खुद आलोड़ित हो उठती है। मैंने कई दफा पूछा कि अगर हिंदू किंवदंती में ऐसी पतिव्रता का किस्सा मौजूद है कि यम के हाथों से अपने पति को छुड़ा लाए, तो कोई किस्सा हमको ऐसा भी बताओ, किसी पत्नीव्रत का कि जो अपनी औरत को मर जाने पर यम के हाथों से उसको छुड़ा लाया हो और फिर से उसको जीवित कराया हो। आखिर मजा तो तभी आता है जब ऐसा किस्सा दुतरफा होता है। जाहिर है कि कोई किस्सा ऐसा है नहीं।’’ 
पुस्तक के अंतिम भाग में दो परिशिष्ट हैं जिनमें पुस्तक के संपादक रघु ठाकुर के विचार हैं - 1. ई.डब्ल्यू.एस. के लिए आरक्षण का निर्णय कितना तार्किक? तथा, 2. जातिगत जनगणना।
यह पुस्तक ‘‘जाति प्रथा’’ शीर्षक की होते हुए भी मात्र जाति प्रथा पर ही प्रहार नहीं करती है वरन भारतीय संस्कृति में रचती-बसती गई कुरीतियों पर भी चोट करती है। यह पुस्तक दलितों एवं स्त्रियों सहित सभी मनुष्यों की बात करती है। वस्तुतः जातिप्रथा वह वायरस है जो अनेक सामाजिक बीमारियों की जड़ है। इस पुस्तक को पढ़ा जाना इसलिए भी जरूरी है कि इससे जाति प्रथा के उद्गम, विकास एवं समापन के प्रयासों के बारे में तार्किक जानकारी मिलेगी जो समाज से जाति प्रथा के कलंक को मिटाने के लिए दिशा प्रदान करेगी। महत्वपूर्ण विचार सदा प्रासंगिक होते हैं। लोहिया के महत्वपूर्ण विचारों को संपादित रूप में प्रस्तुत कर के लेखक रघु ठाकुर ने समता मूलक समाज संबंधी विचारों को सहेजने का विशिष्ट कार्य किया है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए।                          
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Saturday, October 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | दिवारी आ रई, पटाखा फोरबे वारे बच्चा हरों को तनक ध्यान राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
दिवारी आ रई, पटाखा फोरबे वारे बच्चा हरों को तनक ध्यान राखियो
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
दिवारी आत-आत घर को महौल बदल जात आए। लिपाई, पुताई, ढिग धराई सबई कछू समै पे निपटाबे की परी रैत आए। इत्तोई नोंई, खुरमा, पपरियां, गूझा, बरफी बनन लगत आए। मनो जोन घरे बनावे वारी अकेली होए सो बा यां तो खाना पकाबे वारी से मदद ले लेत आए। ने तो आजकाल मिठाई की दुकान वारे सोई घर घांई मुतको सामान मिलत आए। बाकी घर के बने की बात औ रैत आए। लेकन लरका-बच्चा को तो खाली खाबे औ पटाखा फोरबे से मतलब रैत आए। उने तो दसेरा से पटाखा पाबे की धुन सवार हो जात आए। फेर दिवारी नजीक आत-आत सो बे औ पगलान लगत आए। औ पगलाए काए नईं अकेरी दिवारी के टेम पे उने पटाखा फोरबे मिलत आएं। सो उने पटाखा जरूर द्वाएं जाएं मनो पटाखा द्वाबे औ चलाबे के टेम पे बच्चा हरों खों ध्यान राखबो जरूरी आए। ईके लाने सबसे अच्छो आए के उनें पटाखा के लाने रुपइया देबे की जांगा खुदई जा के उने पटाखा द्वा दए जाएं। ईसे का हुइए के उनकी उम्मर के हिसाब से उने पटाखा मिलहें। ने तो होत का आए के लोहरे हरन खों लगत आए के हमाए दाऊ तो बम घाल रए, सो हम सोई बम घांले। उने बम घालबे को खतरा को पता कोन रैत आए। 
    बच्चा हरों खों पटाखा द्वाबे के समै जा बी ध्यान राखबे जरूरी आए के बे कऊं चाइनीज वारे ने होंए। ऊंसे तो सरकार ने चाइनीज पटाखों पे रोक लगा रखी आए मानों कोऊ ओई टाईप को बेच रओ होए तो कमा से कम बच्चा हरों को तो ने मिले। काए से चाइनीज पटाखा औ बड़े पटाखा बच्चन के लाने ठीक नईं रैत। औ बच्चा हरों भर को काए, दिल के मरीजन के लाने, सांस की बीमारी वारन के लाने, मां बनबे वारी लुगाइयन के लाने ठीक नईं रैत आए। सो, अच्छो तो जे आए के बच्चा हरों खों खुदई जा के उनके जोग पटाखा द्वाओ औ खुदई की निगरानी में चलवाओ। एक बात  औ के पटाखा खरीदत समै मैंगाई को ध्यान सोई राखियो। कऊं पटाखा के चक्कर में घर को बजट ने बिगरे। ईंसे पटाखा बी चलहे औ सब कछू अच्छो-अच्छो रैहे।
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Friday, October 23, 2026

बतकाव बिन्ना की | काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की    
      
काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे?                              
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘काए भौजी, लिपाई-पुताई हो गई का?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अभई कां, दिवारी के पैलऊं हुईए!’’ भौजी बोलीं।
‘‘नईं, मैं वो वारी लिपाई-पुताई की नई कै रई, अभईं दशहरा के लाने कछु ने करहो का?’’ मैंने भौजी से साफ-साफ पूछी।
‘‘ने करबी का? आंगन देखो कैसो फूटो सो डरो आए, पर तुमाए भैयाजी खों कछु दिखाए तब न!’’ भौजी खिजियात भईं बोलीं।
‘‘सो, ई बेरा उनके जिम्मे है का जे काम?’’ मैंने पूछी।
‘‘हौ, बे करहें? आड़ी की काड़ी सो टरत नइयां उनसे, लिपाई-पुताई करहें? खूब कही तुमने बिन्ना!’’ भौजी भैयाजी के लाने ताना मारत भई बोलीं।
‘‘सो, फेर काए उनके लाने परखीं बैठीं? कछु मोरे जोग काम हो सो कहो!’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘तुम का कर पैहो? तुमने सो कभऊं गोबर न छुओ हुइए।’’ भौजी हंसत भईं बोलीं।
‘‘जे लो, तुमने सोई खूब कही भौजी! हमने सोई लिपाई-पुताई करी आए। मनो दीवारन की नई, पर आंगन की खूब करी, ढिग सोई धरत्ती। उते पन्ना में हमाओ सरकारी मकान घनो छोटो रओ, पर आंगन खूबई बड़ो हतो। मैं और मोरी दीदी, दोई जनी गोबर बीन लातत्तीं औ पैलऊ लीपत्तीं, फेर ऊके किनार पे ढिग धरत्तीं।’’ मैंने भौजी को बताई।
‘‘अरे, वाह! बाकी अब तो तुमाए ऐंगर आंगन ई नइयां। सो, प्रैक्टिस छूट गई हुइए!’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे तुम भी भौजीं, कहूं लीपनो-पोतनों कोऊं कभऊं भूलत आए? बाकी अब गोबर छीबे में जरूर अच्छो नईं लगत। काए से के अब गोबर कछु औरई तरहा से बतास आए।’’ मैंने भौजी से सांची बात कै दई।
‘‘हौ सो, अब पैलऊं जैसो कहां से बसाहे? पैलऊं गाइयां हरें घास-पात खात्तीं। मनो अब सो उने पन्नी लो खाने परत आए। जेई लाने हम सो डेयरी वाले यादव भैया के हियंा से गोबर मंगा लेत आएं। औ जेई सो सल्ल बिधींे कहानी। हम तीन दिनां से तुमाए भौयाजी के लाने ठेन कर रए के यादव डेयरी से हमाए लाने गोबर लान देओ, मगर तुमाए भौयाजी सुनें तब न!’’ भौजी घूमत-फिरत फेर के भैयाजी पे आ गईं।
तभईं भैयाजी प्रगट भए।
‘‘राम-राम भैयाजी!’’
‘‘राम-राम बिन्ना!’’
‘‘कां हो आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कहूं नईं, इतई लों!’’ भैयाजी बोले।
‘‘इने कहां जाने? गए हुइएं सट्टा लगाबे!’’ भौजी कुड़कुड़ात भई बोलीं।
‘‘सट्टा? आप कब से खेलन लगे?’’ मोए भारी अचरज भओ जे सुन के।
‘‘अरे नईं! हम कां खेलत आएं सट्टा-मट्टा!’’ फेर भौजी से बोले,‘‘तुम औ, बिन्ना से झूठ काए बोल रईं? जे का सोचहे?’’
‘‘हम कां झूठ बोल रए? ऊ दिनां तुम ओरें सट्टा की बात नई कर रए हते का? जो दिनां समाज को अध्यक्ष चुनो जाने रओ। बो तुमाओ करिया छुटकुल कै रओ हतो के हमने सो खड़से पे सट्टा लओ आए, बेई बनहें। औ तुम सोई कै रए हते के दिग्गी राजा के सो कोनऊं चांस नई दिखा रओ। काय कै रए हते के नईं?’’ भौजी ने तमक के पूछी।
‘‘हऔ, कै रए हते! मनो हम सो बतकाव ई कर रए हते, हम कौन सट्टा लगा रए हते? बा तो छुटकुल हरें जुटे हते।’’ भैयाजी सफाई देत भए बोले।
‘‘हऔ, सो तुम सो बड़े दूध के धुले कहाने! का पतो, सट्टा लगाओ होय, औ हार गए सो चिमा रए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे नईं मोरी मैयां, ऐसो नईयां! अध्यक्ष पे सट्टा लगे के मोए जुधिष्ठिर बनने आए का, के राज-पाट सबई कछु हार गए।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘राज-पाट का हार हो? बाकी कभऊं मोए दांव पे लगाबे की सोचीं सो जेई मुंगरिया से तुमाओ मूंड़ कुचर देबी!’’ भौजी पास रखी मुंगरिया ठोंकत भईं बोलीं।
‘‘अरे मालकन! गम्म खाओ! हम कभऊं कछु ऐसो-वैसो ने करबी।’’ भैयाजी अपने दोई हाथ जोड़त भए बोले।
‘‘खैर, जे सब आप ओरें छोड़ो! भैयाजी आप आ कां से रए हो? दो दिनां से दिखाने बी नईं, कहूं बिजी हो का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कहूं नईं! बो दशहरा के लाने रावण बनाओ जाने रओै, सो बोई के लाने तैयारी चलत रई। बे ओरें बोले के पटाखों को इंतेजाम कर दइयो, सो हमने हामी भर दई हती। फेर पटाखन के लाने गए हते।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘भैयाजी, रावण बनाबे में पटाखो लगाबो का जरूरी होत आए?’’ मैैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जरूरी सो कछू नईं, पर अच्छो लगत आए। जब बे फट्ट-फट्ट फूटत आएं, सो ऐसो लगत आए के मनो रावण ई के मूंड फूट रए होएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बाकी रावण को तो रामजी ने मार दओ रओ, सो अब जे मूंड कां से आत रैत आएं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुम औ! ऐसे पूंछ रईं जैसे पैलऊं कभऊं रावण मरत देखो नइयां! बिन्ना, जे तो प्रतीक आए! अब तुम लो सब जानत भईं, अनजान बन रईं।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे, मोरो मतलब जो नइयां, मैं सो जे पूछो चाह रई के हम ओंरे कब तक लो हर बरस रावण मारत रैबी? रावण कभऊं फाईनली मरहे के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे बिन्ना! जब लो ई धरती पे रावण घांईं लोग रैहें, तब लों रावण फाईनली कां मरहे।’’ भैयाजी बोल।
‘‘सो हम जित्ती ताकत रावण को पुतरा बनाबे में लगात आएं उत्ती ताकत समाज से रावण हरों खों मारबे में काए नईं लगात?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब जे सब छोड़ो!’’ भैयाजी टरकान लगे।
‘‘अरे काए छोड़ो? बिन्ना सांची सो कै रई के जित्तो टेम तुमने पटाखे ढूंढबे में हरजा कर दए, उत्ते टेम सो तुम कभऊं एक जागां टिकतई नइयां! ऊ दिनां दमोए वारी चाची खों हस्पताल में भरती कर करा के, दवा-दारू रख के ऐसे उते से भागे हो के हम कां कहें? अरे, तनक देर रुक लेते सो सब को सहूरी बंधती। मगर तुमाए लाने सो रावण के पुतरा के लाने पटाखें लाने को टेम है, मनो गोबर लाने को टेम नइयां।’’ भौजी बोलीं।
भौजी के इत्ते नोने लेक्चर की अखीरी लाईन सुन के मोए लगो के भौजी ने गोबर की बतकाव कर के इत्तो गंभीर टाॅपिक को गुड़-गोबर कर दओ।
‘‘हऔ, लान देबी! चाय पिला देओ! फेर जात हों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘तुमने सई कई भौजी! अपन ओरें हर साल रावण को पुतरा सो फूंकत रैत आएं पर जो कभऊं कोनऊं आजकाल के रावण के बारे में सुनी परत आए सो जेई कैन लगत अरएं के अपन अकेले का कर सकत आएं?’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘औ सांची सो आए! आजकाल के रावण हरों से कोनऊं अकेले नईं निपट सकत!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हौ, औ रामचन्दर जी सो अजोध्या से पूरी सेना ले के गए रए न बनवास के लाने? अरे, बे और उनके लोहरे भैया लछमन के अलावा औ कौन रओ उनके संगे? बाकी उन्ने हिम्मत ने हारी औ छोटे-बड़े भूल के सबई खों अपने संगे लओ, तभईं सो रावण खों मार पाए। औ एक अपन ओरें आएं जो संगे चलबो ई भूले जा रए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘कै सो तुम ठीक रईं बिन्ना! बाकी आजकाल जो दसा आए ऊमें हम का, कोनऊं बता नईं सकत के रावण फाईनली कबे मरहे! जब लों जनता औ कानून संगे ने चलहे, तब तक कछु नईं हो सकत।’’ भैयाजी दुखी होत भए बोले।
‘‘दुखी न हो भैयाजी! मैंने आपके लाने दुखी करबे को जे सब नईं कही। बा सो दुनियादारी देख के कै आई। अब आप सो उठो औ भौजी के लाने गोबर लान देओ! चलो उठो आप, गम्म ने खाओ!’’ मैंने भैयाजी से कही।        
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रावण को पुतरा में चाए पटाखो भरो जाए, चाए बम, मोए का करने? बात सो तब बनहे जब अपन ओरें मिल के ई समाज से रावण हरों खों फाईनली मार देबी!
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के समाज में आज बी जियत भए रावनों खों कैसे मारो जाए? तनक सोचियो! 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Thursday, October 22, 2026

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड का दशहरा और उसकी रोचक परम्पराएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
बुंदेलखंड  का दशहरा और उसकी रोचक परम्पराएं
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                                दशहरा अपने आप में एक परंपरा है बुराई पर अच्छाई की विजय को स्मरण करने की। यूं तो समूचे देश में दशहरा मनाया जाता है फिर भी हर क्षेत्र में त्योहारों को मनाने की अपनी अलग परंपराएं और अपनी अलग शैली होती है। बुंदेलखंड में भी धूम-धाम से दशहरा मनाया जाता है लेकिन अपनी अलग परंपराओं के साथ। इस दिन सुबह से नीलकंठ के दर्शन करना अच्छा माना जाता है। दरअसल, कई रोचक परम्पराएं त्योहारों को और अधिक रोचक बना देती हैं और कभी-कभी कुछ परम्पराएं जानबूझ कर छोड़ दी जाती हैं, ताकि त्योहार अच्छे और अहिंसक संदेश दे सकें। तो चलिए आज की चर्चा में आनंद लीजिए बुंदेलखंड दशहरा और उसकी रोचक परंपराओं का! 


बुंदेलखंड में दशहरा से जुड़ी कई अनूठी परम्पराएं है जिनमें से कुछ बंद कर दी गईं और कुछ आज भी जारी हैं। जो परंपराएं जारी हैं उनमें से एक है दशहरा पर पान खिलाने की परम्परा। आज भी यह परम्परा उत्साह के साथ बखूबी निभाई जा रही है। घरों में भी लोग पान लगा कर रखते हैं। घरों में आने वाले अतिथियों को भी पान खिलाकर इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। अतिथि भी अपने साथ पान लाते। परस्पर एक-दूसरे को पान का बीड़ा देते हुए कहते हैं-‘‘दशहरा का राम-राम पहुंचे जू !’’ दरअसल यह पान उस विजय का प्रतीक होता है जो दशहरे का मूल आधार है। राजाओं के समय में युद्ध के पूर्व चुनौती के रूप में एक राजा दूसरे के पास पान का बीड़ा भेजता था। उस बीड़े को स्वीकार करने का अर्थ होता था, चुनौती को स्वीकार करना। इसके बाद दोनों युद्ध करते थे। युद्ध में जो पक्ष विजयी होता वह विजय उत्साह में पान का बीड़ा चबाता और अपनी विजय का उत्सव मनाता। चूंकि दशहरा रावण पर राम की विजय का पर्व है इसलिए इस अवसर पर बुंदेलखंड में पान खाकर और खिला कर बुराई पर अच्छाई की विजय की खुशियां मनाई जाती हैं।
एक और परंपरा है मछली दर्शन और जाल डालने की। यह लगभग समाप्त होती जा रही है। बस, ग्रामीण अंचलों में अभी इसे देखा जा सकता है वरना शहरी क्षेत्र में पूरी तरह लुप्त हो गई है। बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में यह परंपरा दशहरे से दीपावली तक मनाई जाती है तो कहीं-कहीं सिर्फ़ दीपावली से पहले मछली दर्शन किए जाते हैं। मुझे याद है कि मेरे घर खाना पकाने वाली महाराजिन बऊ के बेटे-बेटियां सुबह से आ धमकते थे, दशहरे में भी और दीपावली में भी। वे घर के प्रत्येक सदस्य के सिर पर बारी-बारी से मछली के जाल का रूमाल ओढ़ाते थे और फिर कांच की बोतल में नन्हीं-सी मछली दिखा कर ‘मछली दर्शन’ कराते थे। बदले में मां उन्हें कुछ पैसे और मिठाई आदि दिया करती थीं। कभी-कभी कुछ ‘प्रोफेशनल किस्म’ के लोग भी मछली ले कर ‘मछली दर्शन’ कराने आ धमकते थे जो सीधे-सीधे मछली का दान मांगते।
दशहरे के दिन प्रातःकाल नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना बुंदेलखंड में शुभ माना जाता है। यह माना जाता है कि नीलकंठ विषपायी शिव का प्रतीक है और विषपायी शिव का बुंदेलखंड से गहरा संबंध है। ‘‘शिवपुराण’’ के अनुसार सागर मंथन में जब कालकूट विष निकला तो उसके विषाक्त प्रभाव से तीनों लोक संकट में पड़ गए। तब शिव ने उस कालकूट विष को पी कर अपने गले में रोक लिया जिससे उनका गला नीला पड़ गया। गले में रुके विष के प्रभाव से शिव को दाह का अनुभव होने लगा। तब वे समुद्र से हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। रास्ते में उन्हें विंध्य पर्वतमाला मिली और कालंजर पर्वत के ऊपर से गुजरते समय उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ। अतः विषपायी शिव कालंजर पर्वत पर ठहर गए। अतः समूचे बुंदेलखंड में विषपायी शिव के प्रतीक नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ माना जाता है। साथ ही यह भी मान्यता है कि जिस प्रकार शिव ने कालकूट विष से तीन लोकों को बचाया था, ठीक उसी प्रकार नीलकंठ पक्षी के दर्शन से सभी संकट दूर हो जाते हैं।      
जब बात दशहरे की आती है तो याद आने लगता है मुझे मेरे बचपन का दशहरा और उसका हंगामा भरा माहौल। मुझे अच्छी तरह से याद है, जब मैं छोटी थी तो दशहरे का उत्साह किस तरह चारों ओर व्याप्त हो जाता था। उन दिनों मैं सागर संभाग के पन्ना नगर में रहती थी। वह मेरी जन्मस्थली भी है। हिरणबाग कहलाती थी वह कॉलोनी। मुझे अच्छा लगता था पन्ना का दशहरा उत्सव। बहुत ही भव्य आयोजन होता था। छत्रसाल पार्क के सामने वाले बड़े से मैदान में बहुत बड़ा रावण बनाया जाता था। उस समय की मेरे दो-ढाई फुट थी इसलिए रावण कुछ ज्यादा ही बड़ा दिखता था मुझे। बहरहाल, घर की दीवारों पर ‘व्हाईटवॉश’ (जो कि पी.डब्ल्यू. डी. की कृपा से होता था) और आंगन में गोबर से लिपाई जो कि मां स्वयं अपने हाथों से करती थीं, जिसमें मैं और वर्षा दीदी भी हाथ बंटाती थीं। इन सबके बीच प्रतीक्षा रहती थी दशहरे की उस रात की जिसमें रावण दहन किया जाता था। रामलीला वाले राम और लक्ष्मण धनुष ले कर आते थे। साथ ही पन्ना राजपरिवार से तत्कालीन महाराज नरेन्द्र सिंह आते थे।
छत्रसाल ग्राउंड में अच्छा-खासा मेला भर जाता था। वह वहां का दशहरा मैदान था। तरह-तरह की दूकानें, झूले और हम बच्चों के लिए ढेर सारा आकर्षण। दशहरा मैदान मेरे घर से लगभग पचास कदम की दूरी पर था। यानी कॉलोनी के कैम्पस से निकलो और दशहरा मैदान सामने नजर आता था। नन्हे-मुन्ने, छोटे शहरों के यही तो फायदे होते हैं। सब कुछ आस-पास। मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह अपने मामा कमल सिंह की उंगली पकड़ कर दशहरा मैदान पहुंचते थे। फिरकी, गुब्बारे, सीटी, चूड़ी और न जाने क्या-क्या ले डालते थे हम लोग। उस जमाने की यही हमारी गंभीर शॉपिंग होती थी। विशेष रूप से मेरी। मेरी तुलना में वर्षा दीदी को शॉपिंग का शौक हमेशा कम ही रहा है। इस मामले में वे हमेशा मुझसे पीछे रहीं।
मुझे आज भी याद है कि किस तरह पन्ना महाराज राम और लक्ष्मण का तिलक करते थे और फिर राम बना रामलीला का कलाकार धनुष पर तीर चढ़ता था। जब तीर के नुकीले सिरे पर आग लगा दी जाती थी तो वह जलता हुआ तीर रावण के पुतले की ओर छोड़ देता था। तीर लगते ही रावण का पुतला धू-धू कर के जल उठता था और हम सभी बच्चे प्रफुल्लित हो कर तालियां बजाने लगते थे। रावण के पुतले में भरे गए पटाखे जोरदार शोर के साथ फूटते थे। रावण के साथ ही मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी बनाए जाते थे जिनके कद रावण के पुतले से जरा छोटे होते थे। तीनों का एक साथ दहन किया जाता था।
घर लौटने पर मां आरती की थाली सजा कर मामाजी की आरती उतारती थीं, यह कहती हुईं कि -‘‘मेरा भाई रावण को मार कर आया है।’’ इसके बाद हमारे घर में परम्परागत शस्त्रपूजा होती थी। मुझे उस तलवार की धुंधली स्मृति है जो मेरे बचपन में शस्त्र के रूप में पूजी जाती थी। लेकिन मेरे नानाजी जो गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, उन्होंने बाद में घर में शस्त्रपूजन बंद करा दी और उस तलवार को हंसिए में ढलवा दिया गया जो वर्षों तक रसोईघर में सब्जी काटने के काम आता रहा। हमारे परिवार में मांसाहार नानाजी के समय से ही बंद कर दिया गया था। वे घोर अहिंसावादी थे। इसलिए बलि के प्रतीक स्वरूप कुम्हड़े को काटा जाता था किन्तु बाद में यह भी उचित नहीं लगा। नानाजी को लगा कि भले ही हम कुम्हड़े को काट रहे हैं किन्तु मन में बलि की कल्पना होने से हिंसा की भावना तो बनी रहेगी। अतः वह परम्परा भी समाप्त कर दी गई। बस, परस्पर पान की बीड़ा दिए जाने की परम्परा यथावत चलती रही।
यह सारी बातें मुझे इसलिए याद आ रही हैं क्यों कि सन् 2017 में झांसी प्रवास के दौरान मुझे हमीरपुर के विदोखर गांव के दशहरे के बारे में पता चला। कोई दशहरा इतना रक्तरंजित भी हो सकता है, यह जान कर मुझे हैरानी हुई। विदोखर में दशहरा मनाने की अपनी एक अलग ही परम्परा है। विदोखर में दशकों पहले हजारों लोग सवा मन सोना लुटाकर दशहरा मनाते थे। इस गांव में वह कुआं और राहिल देव मंदिर आज भी मौजूद है, जहां नरसंहार के बाद सोना लुटाए जाने की परंपरा शुरू हुई थी। यहां उन्नाव के गांव डोंडियाखेड़ा के लोग सोना लुटाने में अहम भूमिका निभाते थे। आपको याद दिला दूं कि यह वही जगह है जहां संत शोभन सरकार ने सोने का खजाना जमीन में दबे होने का दावा किया था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भारी हंगामा छाया रहा था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि औरंगजेब के समय विदोखर के ठाकुरों को बलात् मुसलमान बनाया गया था। जिन्हें बगरी ठाकुर कहा जाता था। लगभग 530 वर्ष पहले उन्नाव के डोंडियाखेड़ा से ठाकुर बड़ी संख्या में यहां व्यापार के लिए आते थे। ठाकुरों का यह जत्था एक बार हमीरपुर के इसी विदोखर गांव से गुजर रहा था, तभी कुआं देख पानी पीने के लिए रुक गया। इसी दौरान बगरी ठाकुर समाज के कुछ युवक यहां पहुंच गए। बगरी ठाकुर युवकों ने डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों को कुए से पानी नहीं पीने दिया और मारपीट कर की। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने स्वयं को अपमानित महसूस किया और बगरी ठाकुरों को सबक सिखाने की ठान ली। विदोखर में बगरी ठाकुर और आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर दशहरे का जश्न मनाते थे। इसी दौरान उन्नाव के डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने योजना के साथ बगरी ठाकुरों पर हमला बोल दिया। अचानक हमले से दशहरे के जश्न में डूबे बगरी ठाकुर संभल नहीं सके और इस भीषण युद्ध में सैकड़ों की संख्या में मारे गए। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने युद्ध जीत लिया और विदोखर के आसपास मौजूद 24 गांवों पर कब्जा कर लिया। युद्ध के बाद इन ठाकुरों ने बगरी ठाकुर के घरों से सोना-चांदी लूट लिया। इस दौरान उन्होंने लूटा हुआ सोना लुटाते हुए जमकर जीत का जश्न मनाया। बस, उसी समय से वहां सोना लुटाए जाने की परंपरा का आरम्भ हुआ। लगभग पांच दशक पहले तक विदोखर गांव के आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्रित होते थे। इसके बाद अनोखे ढंग से दशहरा मनाते हुए लोग सवा मन सोना इकट्ठा कर लुटाते थे। जितना सोना जिसके हाथ लगता था, वे अपने घर ले जाता था। अब मंहगाई के जामने में सवा मन सोना लुटाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है, इसलिए प्रतीक रूप में रत्ती भर सोना लुटाया जाता है। आज भी 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर मिट्टी के गोले बनाते हैं और इन्हीं में रत्ती भर सोना डालकर लुटाते हैं। जिसके हाथ सोने वाला मिट्टी का गोला लगता है, उसे सौभाग्यशाली माना जाता है। हो सकता था कि भविष्य में मेरे नानाजी की तरह किसी को यह परम्परा हिंसक घटना की याद दिलाने वाली लगे और इसे वह बंद करवा दे। यदि ऐसा होता है तो भी विदोखर में दशहरे का आनंद कम नहीं होगा।
एक और हिंसक परंपरा जुड़ी रही है बुंदेलखंड के दशहरे से। यद्यपि अब यह परंपरा पूरी तरह से बंद कराई जा चुकी है। यह परंपरा राजाशाही के समय में चलन में थी। गढ़कुंडार एवं दतिया रियासत में दशहरे पर ‘‘भैंसा वध’’ की परंपरा थी। इस परंपरा में एक भैंसे को मैदान में छोड़ दिया जाता था फिर कुछ लोग उसे दौड़ा कर तलवारों से उसका वध करते थे। जब वह भैंसा मर जाता था तो उसके मांस को प्रसाद के रूप में लोगों को बांटा जाता था। सन 1947 के बाद वीरसिंह जू देव द्वितीय ने इस हिंसक परंपरा को दोनों जगह पूरी तरह से बंद करवा दिया।
यूं भी हंसी-खुशी के वातावरण में हिंसा अर्थात् परपीड़ा का क्या काम? किसी एक को पीड़ा पहुंचा कर दूसरा खुश नहीं रह सकता है। उत्सव वही है जो मन को आनन्दित करे, उत्साह से भर दे। उत्सव में आडंबर का कोई महत्व नहीं होता। दशहरा तो यूं भी असत्य पर सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है। इसे तो सद् विचारों और सद्परम्पराओं के साथ ही मनाया जाना चाहिए। हमेशा दस सिर वाला रावण मारा जाए, एक सिर वाला इंसान नहीं और न ही कोई जानवर।                                -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.10.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, October 20, 2026

दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


सदा सत्य की विजय हो 🚩

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
Happy Dussehra 🙏🚩🙏
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पुस्तक समीक्षा | भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड
लेखिका  - वर्षा कौशल
प्रकाशक - साहित्य कलश पब्लिकेशन, 32/3, अमरशक्ति निवास, महिन्द्रा कॉलोनी, सामने महिन्द्रा कालेज, पटियाला - 147001
मूल्य       - 300/-
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भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदा चिंतन के केन्द्र में रही है। साथ ही यह भी सच है कि समाज में नारी की स्थिति में गंभीर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। जहां प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को पढ़ने-लिखने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति थी, वहीं मध्यकाल में आक्रांताओं के कारण उन्हें न केवल पढ़ने- लिखने से दूर कर दिया गया अपितु घर की चौखट के भीतर रह कर कठोर एवं अमानवीय नियमों को ढोने के लिए विवश किया गया जिसमें विधवा के रूप में तिरस्कृत जीवन जीने, पति की मृत्यु पर सती हो जाने तथा  युद्धकाल में जौहर करने तक की विवशता शामिल थी। इसे स्त्रियों का साहस कह कर भले ही महिमा मंडित किया जाए किन्तु वस्तुतः थी यह कुरीति ही। बुंदेलखंड के गांव-देहात में आज भी सती के पत्थर पाए जाते हैं जिनकी पूजा होती है। ऐसे विकट उतार-चढ़ाव भरे अतीत से आगे बढ़ कर आज समाज में स्त्रियों ने जो अपनी जगह बनाई है वह उसकी असली शक्ति, संघर्ष एवं अस्मिता की परिचायक है। स्त्रियों की इस रूपांतरण यात्रा को लेखिका वर्षा कौशल ने अपनी शोधात्मक पुस्तक ‘‘नारी : रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ में प्रस्तुत किया है।    

वर्षा कौशल की पुस्तक पर अपनी ‘‘सम्मति’’ देते हुए मणिकुंडल सेवा संस्थान कानपुर के संस्थापक, संरक्षक उमाशंकर गुप्ता ने ‘‘नारी की स्थिति पर शोधपरक कृति’’ शीर्षक से लिखा है कि-‘‘प्रस्तुत पुस्तक में कानपुर एवं बुंदेलखंड के जनपदों में जनसंपर्क, विद्यालयों से संपर्क करके सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक वास्तविकता को प्रस्तुत करती है और सरकार तथा समाज को चाहिए कि गंभीर चिंतन कर महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए सार्थक प्रयास करें इस संदर्भ में श्रीमती वर्षा कौशल को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इतने महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी चलाई जिससे देश-प्रदेश में जन जागरण और उन्नति का एक नया अध्याय प्रारंभ होगा।’’

अपनी पुस्तक ‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ की सामग्री को लेखिका ने कुल सात अध्यायों में विभक्त किया है। प्रथम अध्याय में अतीत में प्रेरक महिलायें सुकला, अपाला, दुर्गावती, रत्नावली, सारंध्रा गणिका, मदालसा के बारे में है। द्वितीय अध्याय बुंदेलखंड की नारी के अंतर्गत बुंदेलखंड शब्द की विकास यात्रा, बुंदेलखंड की स्मरणीय महिलायें, शिक्षा के क्षेत्र में नारी की स्थिति, वर्तमान की दुःस्थिति, सुखद भविष्य का भाव लेखबद्ध किया है। तृतीय अध्याय नारी सशक्तिकरण का है जिसमें बाल्यकाल, ऐतिहासिक महिलाओं का बाल्यकाल दुर्गावती, मैना, महिला के स्वरूप एवं भूमिका पर शिक्षा का प्रभाव, ईश भक्ति में रत महिलाओं का बाल्यकाल कर्माबाई, विमला कुमारी, मल्हना, समाज की दिशादात्री महिलाओं का बाल्यकाल अमृता शेरगिल, जेन एडम्स, डॉ मुथु लक्ष्मी रेड्डी के संबंध में जानकारी दी गई है। चतुर्थ अध्याय में ऐतिहासिक महिलायें हैं जिनमें महारानी लक्ष्मीबाई, भक्ति रस में मग्न महिलायें रानी रासमणि, समाज की पथ प्रदर्शिका महिलायें अन्ना चेण्डी, श्रीमती एलीनर रूजवेल्ट, श्रीमती धनवंती रामराव के व्यक्तित्व एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है। पंचम अध्याय में वर्तमान में सशक्तिकरण के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति, अधिकार व अधिकार की सीमाएं महिला मानवाधिकार, हिंदू विवाह अधिनियम, मौलिक अधिकार, मूलाधिकार शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा विषयक अधिकार, संपत्ति का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार आदि की जानकारी दी गई है। छठां अध्याय स्त्रियों के समग्र अधिकारों पर दृष्टिपात का है जिसमें अतीत में महिलाओं का राजनैतिक योगदान, ग्रामीणांचल में राजनैतिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति समस्यायें, समाधान, उपलब्धि, सामाजिक परिवर्तन में भूमिका, शिक्षा का क्षेत्र, व्यावसायिक शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र के आधार पर विवेचन किया गया है। सातवां और अंतिम अध्याय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा है। इस अध्याय में बुंदेली लोक संस्कृति, जीवनयापन, भोजन, वस्त्र, परंपराओं का पालन, परिणाम, लोक संस्कृति विषयक महिलाओं की स्थिति, लोकगीत, लोकनृत्य का विवरण है। इसके बाद अंत में परिशिष्ट एवं संदर्भ ग्रंथ सूची रखी गई है। कुल मिला कर पुस्तक का स्वरूप अकादमिक शोध का है। संभवतः इसीलिए नारी की रूपांतरण यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पक्ष छूट गए हैं तथा बुंदेलखंड के परिचय की अपेक्षा बुंदेली स्त्रियों की दशा और दिशा को समुचित विस्तार नहीं मिल सका है क्योंकि अकादमिक शोध की अपनी सीमाएं होती हैं। वहीं स्वंतत्र शोध सीमाओं से परे जा कर भी विषय को खंगालता है। फिर भी लेखिका ने विषय को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने का पूरा एवं सफल प्रयास किया है।
नारी इंसाफ सेना परिवार के सहयोग से प्रकाशित इस पुस्तक की लेखिका वर्षा कौशल ने मास्टर ऑफ एक्सटेंशन एण्ड रुरल डेवलेपमेंट में एम. ए. तथा छत्रपति साहू जी महाराज वि. वि. कानपुर, योग शिक्षा में उपाधि प्राप्त की है। कानपुर निवासी वर्षा कौशल नारी इंसाफ सेना की राष्ट्रीय कमांडर हैं तथा वे भ्रष्टाचार व अनियमितताओं का विरोध एवं न्याय के पक्ष में आंदोलन व धरना प्रदर्शन करती हैं एवं समाज में गरीब व उपेक्षित समुदाय एवं जनमानस का अपेक्षित सहयोग करती हैं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को जमीनी यथार्थ से जोड़े रखा है।
अपनी पुस्तक के लेखन के संबंध में लेखिका वर्षा कौशल का कथन है कि ‘‘मुझे भी नारी इंसाफ सेना महिला संगठन के माध्यम से महिलाओं के बीच कार्य करने का अवसर मिला है। महिलाओं की समस्याओं को जानने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि नारी की सहायक नारी ही हो सकती है। कानून बना देने से ही सिर्फ नारी का हित नहीं हो सकता। नारी पगड़ी की तरह है जो कहने को तो शीश पर धारण की जाती है किंतु उस पगड़ी को बिखेरने के लिए समाज का अधिकांश वर्ग भिन्न-भिन्न वेश में प्रस्तुत होकर तत्पर है। कहावत है कि बेल (लता) और स्त्री बिना सहारे के नहीं रह सकती हैं और इस कहावत को चरितार्थ करने के लिए लोग विविध प्रसंगों और तर्कों से पुष्टि करने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग कर रहे हैं, तब मुझे लगा कि ऐसी कृति लिखी जाये जिसमें अतीत से वर्तमान तक की नारी की स्थिति रेखांकित हो सके और समाज में नारियों के योगदान की झांकी प्रस्तुत की जा सके। यह कृति आंकड़ों पर आधारित नहीं है क्योंकि आंकड़े और यथार्थ दोनों ही अलग-अलग हो चुके हैं।’’
सरस्वती बालिका विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, बांदा की शिक्षिका शैलजा तिवारी ने ‘‘धरातलीय अभिव्यक्ति’’ शीर्षक से पुस्तक पर अपनी अभिव्यक्ति इस प्रकार दी है-‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, हमारे समाज ने मनु स्मृति की इस सूक्ति को थोड़ा भी अपनाने का प्रयास किया होता तो शायद महिलाओं उत्पीड़न और अत्याचार से निजात मिल गई होती। लेकिन विडंबना है कि यह सूक्तियां सिर्फ हमारे धर्मग्रंथों तक ही सिमट कर रहा गईं हैं और नारी को सही मायने मे न्याय दिलाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। इस पुस्तक में नारियों द्वारा कई क्षेत्रों में किए गए कार्यों और संघर्षों का उल्लेख होने से उनसे प्रेरणा लेते हुए नारी में हीन भावना नहीं आ सकेगी।’’

‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ एक ऐसी पुस्तक है जिसमें अतीत से वर्तमान तक के नारी संघर्ष की सोदाहरण चर्चा करते हुए बुंदेलखंड की स्त्रियों की स्थिति पर भी चर्चा की गई है। लेखिका ने नारी की मनो एवं सामाजिक दशा तथा प्रतिक्रियाओं पर विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘‘जो महिला उपलब्धि प्राप्त कर लेती है वह अतीत की घटनाओं व्यवहार से मिले तनाव से मुक्त हो जाती है जब वह अपने माध्यम से किसी की समस्या का हल करती है तब उसे बहुत आत्म संतोष होता है जब महिला की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है तब वह प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए एक नए रूप में आती है। फूलन देवी ऐसी महिला का उदाहरण है जब उसके साथ किए गए अनाचार पर कहीं पर ग्राम में सुनवाई नहीं हुई बल्कि उसे और अपमानित किया गया तब वह बंदूक लेकर बीह में चली गई और जिस बेहमई ग्राम में उसके साथ अनाचार हुआ था उस गांव में उसने जाकर लोगों को एक पंक्ति में खा कर मार दिया था। इसी प्रकार पारिवारिक शोषण के शिकार महिला जब समाज में महिला उत्थान के लिए निकलती है तब उसके अनुभवजन्य व्यक्तव्य श्रोताओं में रोमांच उत्पन्न कर देते हैं। नारी का स्वभाव होता है कि जब वह बोध विरोध में आती है तो उसके प्रतिशोध की कोई सीमा नहीं होती। सूर्पनखा में सुंदर युवती के रूप में राम के समक्ष प्रस्तुत होकर प्रणय निवेदन किया था किंतु जब उसके नाक कान काटे गए तब वह अपने वास्तविक रूप में आकर प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगी थी और उसने रावण के समक्ष बात रखी इसके परिणाम स्वरुप सीता का हरण हुआ इसी प्रकार दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया था उसके परिणाम स्वरूप द्रौपदी ने दुशासन के शरीर के रक्त से अपने बाल धोये थे।’’
इसके साथ ही लेखिका ने महिलाओं को सशक्त बनाने में महिला समाख्या कार्यक्रम का अनुमोदन किया है-‘‘महिलाओं में चेतना या जागरूकता लाना वह प्रक्रिया है जिसमें महिलाओं को संगठित करके उन्हें प्रेरित करना है कि संसाधनों को प्राप्त करने के लिए उनके प्रति जो भेदभाव बढ़ता जा रहा है या जो भी बढ़े हैं वह उन्हें दूर कर सके। इसके लिए ‘‘महिला समाख्या’’ कार्यक्रम एक सशक्त माध्यम है।’’
लेखिका का प्रयास सराहनीय है तथा पुस्तक पठनीय है। विशेषरूप से शोधार्थियों के लिए उपयोगी है।                    
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Saturday, October 17, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | इते माता की धूम मची, औ उते आए हमाए नए रैवासी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
इते माता की धूम मची, औ उते आए हमाए नए रैवासी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

“ऊंची पहरिया पे माई को ठिकानो, कैसे मिलन खों आऊं मोरी मैया…” ऐसईं भक्तें गाई जात आएं देवी मैया के दरबार में पौंचबे के लाने। मनों जे तो सोची जाए के साल में नौ-नौ दिनां के लाने माता खुदई आ जात आएं दरसन देबे के लाने। हम नौरातों की कै रए। सो, आजकाल नौरातों में माता के मुतके दरबार सजे। इनमें से कछू तो डेढ़-दो सौ बरस से सजते आ रए। बड़ा बजार, पुरव्याऊ, सदर सबई कऊं एक से बढ़ के एक छबि आए माता की। औ नोनी बात जे के सबई जात-धरम के लोग ईमें मिल के सहयोग करत आएं। मनो ई दार नओ जे भओ आए के दो नए रैवासी अपने इते आ गए आएं।
   हऔ, अपने इते वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व (नौरादेही) में दो चीतां नए निवासी बन के पधारे आएं। जीमें एक को नांव वियोम औ दूसरे को नीरा आए। जो दोई की जोड़ी बन जैहे तो अपने इते इन ओरन के लल्ला-लल्ली हुइएं। वैसे कओ जात आए के नर चीते के लाने जेई कछू 39 से 78 वर्ग किलोमीटर  को घूमत को  एरिया  लगत आए जोन को ऊकी ‘टेरिटरी’ कओ जात आए। उतई मादा चीतां के लाने 800 से 1,000 वर्ग किलोमीटर या ऊंसे भी ज्यादा को इलाको लगत आए। मनो जो अपनों टाइगर रिज़र्व सागर, दमोए और नरसिंहपुर जिला लौं फैलो आए। सो, ईको एरिया जेई कछू 2,339 वर्ग किलोमीटर को आए। मनो ईको डर नोंई के संकारे दोरे की कुंडी खोली औ चीता के दरसन मिल गए। साल भरे बाद से बे उतई नौरादेही में देखबे खों मिलहें। तब लौं माई के शेर खों निहारो औ बोलो, जै माता दी!
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