Wednesday, September 16, 2026

चर्चा प्लस | श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                              एकदंत, मोहासुरपति, विध्नराज, धूम्रवर्ण, गजानन आदि 108 नाम हैं श्री गणेश के जिन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। जिा देवता का अवतरण ही अत्यंत रोचक ढंग से हुआ हो और जिन्होंने एक अलग ही स्वरूप पाया, ऐसे देव श्रीगणेश के हर नाम के पीछे एक कहानी मौजूद है। ये कहानियां श्रीगणेश के स्वरूप को तो समझाती ही है, साथ ही इस बात से भी आगाह करती हैं कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी रूप, रंग या व्यवसाय को हो उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हर व्यक्ति अपने गुणों के कारण पूज्य बन सकता है।  

हिन्दू संस्कृति में श्रीगणेश एकमात्र ऐसे देवता है जिनका मुख हाथी का तथा शेष शरीर मनुष्यों  अथवा देवताओं जैसा है। उनका यह स्वरूप मानव और वन्यजीवन के बीच घनिष्ठ अटूट संबंधों को दर्शाता है। वन्य पशुओं में हाथी को सबसे अधिक बलशाली, सबसे अधिक बुद्धिमान, सबसे अधिक स्मरणशक्ति वाला तथा सबसे अधिक धैर्यवान माना जाता है। हाथी तब तक किसी पर प्रहार नहीं करता है जब तक कि उसके परिवार अथवा उस पर संकट न आए। हाथी दीर्घायु होता है तथा विशुद्ध शाकाहारी होता है। अलौकिक शक्ति के धनी होते हुए भी श्रीगणेश में समस्त गजतत्व मौजूद हैं। सृष्टि की योग्य कृति मानव तथा वन्य समुदाय की सर्वश्रेष्ठ रचना गज के सम्मिश्रण वाले श्री गणेश की शक्तियों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी ने ही महाभारत को अबाधगति से लिपिबद्ध किया था।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितं।
उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।
श्रीगणेश के एक नहीं अपितु 108 नाम हैं, जिनका जाप किया जाता है। प्रत्येक नाम का अपना एक अलग महत्व है। जैसे - अखुरथ- जिनके पास रथ के रूप में एक चूहा है, अलमपता- सदा सनातन भगवान, अमितःअतुलनीय प्रभु, अनंतचिद्रुपमयं- अनंत और चेतना-व्यक्तित्व, अवनीश- पूरी दुनिया के भगवान, अविघ्न- सभी बाधाओं को दूर करने वाला, बालगणपति- प्रिय और प्यारा बच्चा, भालचंद्र- चंद्रमा-कलक वाले भगवान, भीम- विशाल और विशाल, भूपति- देवताओं के स्वामी, भुवनपति - जगत के स्वामी, बुद्धिनाथ- ज्ञान के देवता, बुद्धिप्रिया- ज्ञान और बुद्धि को प्यार करने वाले भगवान, बुद्धिविधता- ज्ञान और बुद्धि के देवता, शूपर्णकर्ण- बड़े कान वाले भगवान, शुबनः सर्व मंगलमय प्रभु, शुभगुणकानन- वह जो सभी गुणों का स्वामी है, श्वेता- वह जो सफेद रंग की तरह पवित्र हो, सिद्धिधाता- सफलता और सिद्धियों के दाता, सिद्धिप्रिया- वह जो इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा करती है, सिद्धिविनायक- सफलता के दाता, स्कंदपुर्वजा- स्कंद (भगवान मुरुगन) के बड़े भाई, सुमुख- जिसका मुख प्रसन्न है, सुरेश्वरम- सभी प्रभुओं के भगवान, स्वरूप - सौंदर्य के प्रेमी, तरुण- अजेय भगवान, उद्दंड- बुराइयों और दोषों की दासता, उमापुत्र- देवी उमा (पार्वती) के पुत्र, वक्रतुंड - घुमावदार सूंड वाले भगवान, वरगणपति - वरदानों के दाता, वरप्रदा- इच्छाओं और इच्छाओं का दाता, वरदविनायक - सफलता प्रदान करने वाले, वीरगणपति- वीर प्रभु, विद्यावारिधि- ज्ञान और बुद्धि के देवता, विघ्नहर्ता- विघ्नों का नाश करने वाले, विघ्नराज- सभी बाधाओं के भगवान, विघ्नस्वरूप- विघ्नों का रूप धारण करने वाले, विकट- विशाल और राक्षसी, विनायक- सभी लोगों के भगवान आदि।
श्रीगणेश के कुछ नामों की रोचक कथाएं भी देख ली जाएं। ये ही तो हमारी पौराणिक विरासत हैं-

एकदंत की कथा
श्रीगणेश के एकदंत होने की कई कथाएं मिलती हैं-
एक कथा- एक बार विष्णु के अवतार परशुराम शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यानावस्थित थे तथा वे कोई व्यवधान नहीं चाहते थे। शिवपुत्र गणेश ने परशुराम को रोक दिया और मिलने की अनुमति नही दी। इस बात पर परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्री गणेश को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। श्रीगणेश ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ। इसी युद्ध में परशुरामजी के फरसे से उनका एक दांत टूट गया।
दूसरी कथा- भविष्य पुराण में कथा है जिसके अनुसार कार्तिकेय ने श्रीगणेश का दन्त तोडा था। श्रीगणेश अपनी बाल अवस्था में अति नटखट हुआ करते थे। एक बार उन्होंने खेल-खेल में अपने ज्येष्ठ भाई कार्तिकेय को परेशान करना शुरू कर दिया। कार्तिकेय को श्रीगणेश पर गुस्सा आ गया और वे गणेश से लड़ पड़े। इसी लड़ाई-झगड़े में गणपति का एक दांत टूट गया।
तीसरी कथा- एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत लिखने के लिए किसी बुद्धिमान लेखक की जरुरत थी। उन्होंने इस कार्य के लिए श्रीगणेश को चुना। श्रीगणेश इस कार्य के लिए मान तो गए। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखाते समय रुकेंगे नहीं और न ही बोलना बंद करेंगे। वेदव्यास ने शर्त स्वीकार कर ली। तब श्री गणेश जी ने अपने एक दांत को तोड़कर उसकी कलम बना ली और उसी से वेद व्यास जी के वचनों पर महाभारत लिखी।
चौथी कथा- गजमुखासुर नामक एक महाबलशाली असुर हुआ जिसने अपनी घोर तपस्या से यह वरदान प्राप्त कर दिया की उसे कोई अस्त्र शास्त्र मार नही सकता। यह वरदान पाकर उसने तीनो लोको में अपना प्रभुत्व जमा लिया। सब उससे भयभीत रहने लगे। तब उसका वध करने के लिए सभी देवताओं ने श्रीगणेश को मनाया। गजानंद ने गजमुखासुर को युद्ध के ललकारा और अपना एक दांत तोड़कर हाथ में पकड़ लिया। गजमुखासुर को अपनी मृत्यु नजर आने लगी। वह मूषक रूप धारण करके युद्ध से भागने लगा। गणेशजी ने उसे पकड़ लिया और अपना वाहन बना लिया।

मोहासुरपति
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं को प्रताड़ित करने के लिए भेजा। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया। तभी से श्रीगणेश मोहासुरपति कहलाए।

लंबोदर
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर मोहित हो गए। भावावेश में उनका स्खलन हो गया, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

विकट
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

विघ्नराज
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी भेंट शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

धूम्रवर्ण
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वह शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए। उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।

श्रीगणेश अन्य देवताओं की भांति शारीरिक दृष्टि से सुंदर नहीं हैं किन्तु उनकी अपरिमित बुद्धि के कारण उन्हें प्रथमपूज्य देवता का पद प्राप्त है। यही वह बात है जिसे हम मनुष्यों को सीखना चाहिए कि जाति, धर्म, आकार, प्रकार, सुंदरता, असुंदरता का कोई अर्थ नहीं है, यदि किसी चीज का अर्थ है तो वह है सर्वकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में और यही सत्य हमारे जीवन में उनके अस्तित्व को रोचक बनाता है।


-------------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 16.09.2026 को प्रकाशित) 
------------------------
#DrMissSharadSingh
#डॉसुश्रीशरदसिंह #चर्चाप्लस #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar 

Tuesday, September 15, 2026

पुस्तक समीक्षा | इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली” | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली”
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
-------------------
पुस्तक - छत्रसाल वंशावली
लेखक  - सन्तोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक  - शतरंग प्रकाशन एस-43, विकासदीप बिल्डिंग, द्वितीय तल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001
मूल्य       - 200/-
-------------------


बुंदेलखंड का अपना एक गौरवशाली इतिहास है जिसमें महाराज छत्रसाल का उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में किया जाता है। समूचे बुंदेलखंड में महाराज छत्रसाल का मान सम्मान आज भी बरकरार है। इसीलिए महाराज छत्रसाल के व्यक्तित्व एवं कार्यों को लेकर जब कोई विवाद की स्थिति निर्मित की जाती है तो बुंदेलखंड के जनमानस को गहरी ठेस पहुंचती है। ऐसी स्थिति में महाराज छत्रसाल के संबंध में उत्पन्न किए गए भ्रम का निवारण आवश्यक हो जाता है और इस प्रकार के अनेक भ्रम का निवारण करने वाली पुस्तक है “छत्रसाल वंशावली”। जो इसी वर्ष 2026 में प्रकाशित हुई है।

28 अगस्त 1958 को जन्में उत्तर प्रदेश महोबा के संतोष कुमार पटैरिया संस्कृत विषय में एम.ए. तथा ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि प्राप्त हैं। उन्हें हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से, हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से सम्मानित किया जा चुका है। अभी तक ‘जय पीपल देव’, ‘लोक कवि ईसुरी’, उ.प्र. का स्वतंत्रता संग्राम महोबा, ‘आल्हा समर सारावली’ कृति प्रकाशित हो चुकी हैं। “छत्रसाल वंशावली” उनकी नवीनतम कृति है। यह गहन शोधपरक एवं इतिहास को उसके वास्तविक रूप में सामने रखने के उद्देश्य से लिखी गई है।

इस कृति की आधार सामग्री के संबंध में संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में लिखा है कि - “यह पाण्डुलिपि चरखारी के श्री देवनंदन तिवारी के माध्यम से प्राप्त हुई है। इसमें 19 रानियों और अधिकतम सभी सन्तानों का विवरण है। सम्वत् 1962 (सन् 1905) में श्री दरयाव सिंह जैवार द्वारा लिखी इस पाण्डुलिपि की विशेषता है कि इसमें निःसंतान रानियां, गोद लिये बच्चे और छत्रसाल के अतिरिक्त उनके पुत्रों के वैवाहिक संबंधों को भी लिखा गया है। मेरे पुस्तकालय में जो भी ग्रन्थ उपलब्ध थे उनमें निहित रानियों और पुत्रों के नाम ग्रन्थ के संन्दर्भ के साथ दिये गये हैं जिससे इतिहासकारों को तुलना करने में सुविधा रहेगी। तालव्य श का प्रयोग नहीं किया जाता था किन्तु मैंने नामों के शुद्ध अक्षर लिखे हैं जहाँ शब्द पठनीय नहीं हो सका वहां--रेखा खींच दी है। राजा छत्रसाल के पुरातात्विक साक्ष्य बहुत हैं। बुंदेलाकालीन स्मारकों मंदिर आदि की पहचान यह है कि गुम्बद के नीचे उल्टे और सीधे कमल बने हैं ज्ञातव्य है कि बुन्देलखण्ड में नीले कमल होते थे जिन्हें जयपुर राजघरानों में भेजा जाता था। नीलकमल को पुण्डरीक कहते हैं। मैं तपः पुरुष श्री गोविन्द सिंह बुन्देला, दीवान प्रतिपाल सिंह कृत बुन्देलखण्ड का इतिहास के सम्पादक डॉ. बहादुर सिंह परमार, शतरंग प्रकाशन, लखनऊ के प्रति हार्दिक आभारी हूँ। पुस्तक में श्री भगवान दास गुप्त की कृति का पत्र लिया गया है।”

   ‌‌बुंदेली संस्कृति के अध्येयता एवं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, छतरपुर के प्रो. बहादुर सिंह परमार ने हमेशा बुंदेली संस्कृति एवं इतिहास पर शोध कार्य को बढ़ावा दिया है। वह स्वयं भी उन पांडुलिपियों को ढूंढते रहते हैं जो किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो पाई किंतु उनमें महत्वपूर्ण लेखन किया गया है। ऐसी पांडुलिपियों को ढूंढ कर वे स्वयं प्रकाशित करवाने का कार्य भी करते हैं। प्रो. बहादुर सिंह परमार ने पुस्तक में अपनी सम्मति देते हुए लिखा है कि - “बुन्देलखंड केशरी महाराजा छत्रसाल एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनसे प्रेरणा ग्रहण कर न्याय, संघर्ष, सर्वधर्म समभाव के साथ अपने धर्म के प्रति गहन आस्था सीखी जाती है जिन्होंने आततायी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष कर स्वराज्य की भावना वीर शिवाजी से सीख लेकर अपनायी। इनके बारे में तथाकथित लोग अनेक लोक-श्रुतियाँ बताते हैं। खासतौर पर उनकी संतानों और रानियों के बारे में। उनके समकालीन परिस्थितियों को नजर अंदाज कर आज के परिवेश से सोचते हैं जो न्याय संगत नहीं है। सोशल मीडिया पर महोबा के आदरणीय संतोष पटैरिया ने सूचना दी कि उन्हें एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें महाराजा छत्रसाल की सन्तानों तथा रानियों के बारे में विवरण है। मैंने उनसे अनुरोध किया कि इसे प्रकाश में आना चाहिए। उन्होंने इस बात से सहमति व्यक्त की। मैंने उनसे वायदा किया था कि इस कार्य में जो मुझसे सहयोग बनेगा अवश्य करेंगे।”

   बुंदेलखंड के पितृपुरुष महाराज छत्रसाल की वंशावली के वास्तविक एवं विस्तृत स्वरूप को इतिहासकारों एवं जिज्ञासु पाठकों के सामने लाने के लिए संतोष कुमार पटैरिया ने चरखारी उत्तर प्रदेश के देवनंदन तिवारी की पांडुलिपि को आधार सामग्री के रूप में ग्रहण करते हुए इस विषय से संबंधित अन्य पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, विद्वानों के सहयोग से तथ्यों की सत्यता को परखा तथा इसके उपरांत इस पुस्तक का कलेवर तैयार हुआ। पुस्तक की सामग्री को पांच अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। जिसमें प्रथम अध्याय ‘सम्मति’ तथा दूसरा ‘भूमिका’ का है। ‌
तीसरा अध्याय “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” का है जिसमें दो पाठ हैं - (अ) पुत्रन को ब्याह तथा
(ब) सरीला, जैतपुर, चरखारी, पन्ना आदि सहित विवरण।
   चतुर्थ अध्याय में “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष (हिन्दी)” के अंतर्गत तीन पाठ रखे गए हैं - (अ) पाण्डुलिपि के अनुसार वंशवृक्ष, (ब) बुन्देलों का संक्षिप्त विवरण, तथा (स) विवरण में निहित ग्राम / नगर के नाम।
     पंचम अध्याय में अन्य ग्रन्थों में छत्रसाल की रानियों और पुत्रों के विवरण की जानकारी दी गई है।
     
        लेखक संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में महाराज छत्रसाल के जन्म से संबंधित संक्षिप्त विवरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि “वीर छत्रसाल ने लगभग बारह वर्ष की अवस्था में अपने माता पिता खोये थे। चम्पतराय बुन्देला के सारवाहन, अंगदराय, रतन, छत्रसाल और गोपाल पुत्र थे। सन् 1649 में खेलसर में बाकी खाँ द्वारा सारवाहन मारे गये थे। उनके निधन के बाद छत्रसाल का जन्म हुआ था। व्यक्ति के प्रसिद्ध होने पर उसकी जन्मतिथि और बचपन का विवरण खोजा जाता है और फिर कई मत सामने आते हैं इस प्रकार जन्मतिथि ही निश्चित नहीं हो पाती है। लिखने वाले आसपास के काल की घटनाओं को अनदेखी करते हुये अपना मत लिख देते हैं। इम्पीरियल गजेटियर में तो सन् 1643 ई. में छत्रसाल के जन्म का उल्लेख है। छत्रसाल के राजकवि श्री गोरेलाल 'लाल' थे उन्होंने अपनी कृति छत्रप्रकाश में आठवें अध्याय में छत्रसाल के नामकरण के बारे में लिखा है-
ईस नखत अनुरूप अरू, अरथवंत परिनााम। जनम पत्र तातें लिख्यौ, छत्रसाल यह नाम।।
    ईस नक्षत्र से शिव के नक्षत्र आर्द्रा से आशय है। छत्रप्रकाश में जन्मतिथि तो दृष्टिगत नहीं हुई है किन्तु यह उल्लेख किया है कि सारवाहन के निधन से दुखी माँ को स्वप्न हुआ था कि मैं आपके यहाँ पुनः जन्म लूँगा। श्री भीखराम शर्मा पन्ना के पास छत्रसाल का जन्मांक था जो जन सामान्य तक पहुँच सका। छत्रसाल की जन्मतिथि सम्वत् 1707 का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु लाल कवि ने छत्रसाल की ग्यारहवें वर्ष की अवस्था में चम्पतराय के लालकुंवरि के निधन का उल्लेख किया है।”

      महाराज छत्रसाल के निधन के संबंध में लेखक ने भूमिका में ही यह भी जानकारी दी है कि “वैराग्य की ओर अग्रसर छत्रसाल को कुछ लोगों द्वारा मिले तथ्य के आधार पर छत्रसाल सम्वत् 1788 पौष सुदी तृतीया को धुबेला महल की कुछ दूरी पर बने मंदिर में अपना अंगरखा उतारकर अज्ञात स्थान पर चले गये। एक दिन प्रतीक्षा के बाद मंदिर के समीप ही उनकी सांकेतिक अन्त्येष्टि की गई। उसी स्थान पर बाजीराव पेशवा प्रथम द्वारा स्मारक बनवाना आरंभ किया था जो पूर्ण नहीं हो सका। छत्रसाल के प्रस्थान के सोलह वर्षों बाद सम्वत् 1804 में माघ सुदी एकादशी को लगभग 95 वर्ष की अवस्था में भूषण का निधन हुआ था। कृष्णकवि ने तो प्रयागराज के पंडा द्वारा लिखा गया विवरण उद्धृत किया है जिसमें अस्थियां लाने वालों का उल्लेख है। जगतराज के राजकवि हरिकेश थे इन्होंने जगतराज की दिग्विजय काव्य विविध छंदों में लिखा है। चरखारी रियासत द्वारा इस कृति की लीथो मुद्रण पद्धति से 250 प्रतियां प्रकाशित की गई थी। कृति को हिन्दी साहित्य, इतिहास में छत्रप्रकाश के समान स्थान नहीं मिला। इस कृति में चंपतराय, छत्रसाल जगतराज और उनके पुत्रों का विवरण है। चंदेलवंश बनाफर वंश का भी विवरण देते हुए आल्हा ऊदल विषयक इतिहास भी दिया गया है।”    
   “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” में बुंदेली बोली में बुंदेलावंश की 19 रानियां का विवरण है। यह अध्याय इस विवरण से आरंभ होता है - “श्री महाराजाधिराज श्रीराजा श्री महाराज छत्रसाल जू देव के बाउन कुंवर कौ हाल वा ब्याहु सादी को हाल लिख्यते ।। महाराज छत्रसाल जू दव की जेठीरानी वेरछा वारे पमार दिमान गुपाल सिंह को बेटी रानी भानकुंवर तिनके महाराजा हिरदेसाह ।।1।।
दूसरी रानी सहरा के धंधरे दिमान हिरदेसाह की बेटी रानी दानकुंवर तिनके महाराजा जगतराज ||2||
तीसरी रानी रामपुरवाले वघेले राजा धनसिंह की बेटी रानी उदेत कुंवर तिनके दिमान नवल सिंह ।।३।।”
       अध्याय "पुत्रन को ब्याह" में  हिरदेसाह के जन्म से विवरण आरंभ किया गया है -
“महाराजा हिरदेसाह को जन्म सम्वत् 1736 में भयौ और महाराजा हिरदेसाह ब्याहे रीमा (रीवा) वाले बघेले लाल राजाराम रानी विचित्रकुंवर तिनके महाराजा मन्नासिंह ||1 ||
वा. महाराजा प्रथीं सिंह साहगढ़ वाले ||2||
वा दूसरी रानी वरेठीवारे पमार दिमान देवी सिंह की बेटी रानी गंजकदवा । ।३ ।।
तीसरी रानी उदगुवा वारे पमार दिमान जैसिंह की बेटो रानी रामकुंवर तिनके दिमान अमरसिंह मलारा (मलहरा) वारे ।।4। |”
        अध्याय “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष” में महाराज छत्रसाल के वंश की रानियों एवं उनकी संतानों का विवरण है। जैसे - “ रानियाँ देवकुँवर, कमलावती के नाम भी मिलते हैं। भानकुँवर पत्नी श्री गोपाल सिंह पमार, बेरछा कृष्णकविकृत बुन्देल भास्कर पृष्ठ 46 के अनुसार भानकुंवर के विवाह की तिथि वैशाख शुक्ल 3 सम्वत् 1621 |
हिरदेशाह जन्म सम्वत् 1736
पहली पत्नी विचित्र कुँवर पुत्री श्री राजाराम बघेल, रीवा के पुत्र मन्ना सिंह और पृथ्वी सिंह शाहगढ़ दूसरी रानी नृपकुँवर पुत्री श्रीदेवी सिंह पमार बरेठी मेदनीमल्ल पहले रूद्रपुर बाद में गंजकदवा तीसरी रानी रामकुँवर पुत्री जौ सिंह पमार, उदगुवाँ अमर सिंह, मलहरा, मनेश कुँवर जाट जाति की, मालम सिंह, लुगासी
छत्रसाल की दूसरी रानी दानकुँवर पुत्री श्री हृदयशाह धंधेरे सहरा के पुत्र जगतराज
तीसरी रानी उदेतकुँवर पुत्री श्री धन सिंह बघेला रामपुरा इनके पुत्र नवल सिंह, भारतीचंद्र
चौथी रानी महाराजकुँवर पुत्री श्री हरि सिंह, धंधेरे, मौहार (निःसंतान)।”
      इसी अध्याय में अन्य जाति की रानियां से उत्पन्न पुत्रों का भी उल्लेख किया गया है। अंत में संख्यात्मक जानकारी देते हुए लेखक ने लिखा है- 19 रानियां से 41 पुत्र तथा 11 अन्य रानिया से अर्थात कुल 52 पुत्र।
     इसके बाद प्राप्त पांडुलिपि के अनुसार महाराज छत्रसाल का वंश वृक्ष दिया गया है। लेखक ने बुंदेली के धार्मिक प्रतीक और देवताओं का भी संक्षिप्त विवरण दिया है साथ ही पांडुलिपि में मिले ग्राम और नगरों के नाम का उल्लेख किया है।
       बुंदेलखंड के इतिहास लेखन में दीवान प्रतिपल से का अभिन्न योगदान है अतः लेखक संतोष कुमार पटेरिया ने दीवान प्रतिपाल सिंह द्वारा लिखित बुंदेलखंड का इतिहास में उद्धृत छत्रसाल की रानियों, रानियां के पिता के नाम, जाति एवं स्थान के नाम की तालिका भी शामिल की है।
     इसी क्रम में कृष्ण कवि द्वारा लिखा गया “बुंदेलखंड का इतिहास (पन्ना खण्ड) से उदित जानकारी भी रखी है।
     इतिहास के संदर्भ में वर्तमान स्थिति शोध की कमी के कारण आए दिन विवादों से घिरी रहती है। कुछ विवाद फिल्म कारों के द्वारा भी जाने-अनजाने खड़े कर दिए जाते हैं। जैसे फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' में महाराज छत्रसाल और मस्तानी के इतिहास को नाटकीय रूप से पेश किया गया है, जिसपर इतिहासकारों और वंशजों द्वारा कई विवाद और आपत्तियां जताई गई। इसमें मस्तानी की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि को लेकर विवाद की स्थिति रही। फिल्म और इतिहास में मस्तानी की माता को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया। कुछ इतिहासकार उन्हें महाराज छत्रसाल और उनकी फारसी-मुस्लिम पत्नी (रोहानी बेगम) की पुत्री मानते हैं, जबकि कुछ इसे लेकर अन्य दावे करते हैं। इसके साथ ही फिल्म में दिखाया गया है कि मस्तानी खुद संदेश लेकर बाजीराव के पास जाती हैं और समय रहते बाजीराव आकर युद्ध का पासा पलट देते हैं। वहीं ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि जैतपुर के युद्ध में बंगश ने छत्रसाल को हरा दिया था और उन्हें नजरबंद कर लिया था, जिसके बाद गुप्त संदेश वाहक (रघुनाथ पंडित) बाजीराव के पास मदद के लिए पहुंचे थे।
     ऐसी भ्रामक स्थितियां उत्पन्न हो चुकने के बाद साथ ही जब शोधात्मक पठन-पाठन का चलन काम होता जा रहा है, यह पुस्तक स्पष्ट करती है की महाराज छत्रसाल के वश में कौन-कौन हुए, उनकी कितनी रानियां थी और कितने पुत्र थे। इस प्रकार यह पुस्तक महाराज छत्रसाल से जुड़े कई भ्रम खंडित करती है। यही कारण है जो इस पुस्तक की इतिहास संबंधी उपादेयता को बढ़ा देता है। यह पुस्तक शोधार्थियों तथा बुंदेलखंड के इतिहास एवं छत्रसाल वंशावली में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या भले ही मात्र 68 है किंतु यह नवीन शोधों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म प्रदान करने में सक्षम है।  
-------------------------    
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह
#DrMissSharadSingh #bookreview #bookreviewer
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण

Wednesday, September 9, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अब तो दारू से तौबा करो भैया हरों | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अब तो दारू से तौबा करो भैया हरों
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
  जा खबर सबई ने पढ़ी औ सबई ने सुनी के अपने सागर जिला में जहरीली दारू पी के मुतके आदमी मर गए औ अबे मरत जा रए। ऊपे मुतके बीमार डरे। कोऊ-कोऊ घरे तो जे दसा सुनी के उते कोऊ कमाबे वारों ने बचो। जेई लाने तो कई जात आए के पैले आदमी दारू पीबो सुरू करत आए, फेर दारू आदमी खों पी जात आए। अखीर जहरीली दारू पी गई मुतके आदमियन खों। अब ईकी जांच-पड़ताल हो रई के इत्ती मौतन को जिम्मेवार को आए? चलो, अपन सोई पड़ताल कर लइए! काए से के मरबे वारन के पांछू रै गए उनके मोड़ा-मोड़ी को रोबो देखो-सुनो नईं जा रओ।

 सो ध्यान से पढ़ियो! ताजा बात तो जेई पता परी आए के जोन कारीगर दारू बनाउत्तो बा तीरथ करबे खों चलो गओ सो ऊके बदले कोनऊं अनारी ने दारू बनाई जीसे बा बिगर गई औ जहरीली बन गई। लेओ, सुनबे में कित्ती जरा सी बात आए। मनो इत्तई में तो मुतके जनों को हो गओ राम नाम सत्त। बाकी हम तो जेई जानत आएं के सबसे बड़े दोषी बे दारू पीबे वारे आएं। माफ करियो, काए से मरबे वारे औ कष्ट में रैबे वारों के दोष नईं गिनाए जात, मनो जे तो माननेई परहे के जो बे दारूखोरी ने करते तो उनकी जा दसा ने होती। जे तो तै आए के सरकार दारूबंदी कभऊं ने करहे काए से ऊको मोटो रेवेन्यू मिलत आए। दारू बनावे वारन से गलती भई मनो उन्ने कट्टा दता के तो ने पिलाई रई। सो बचे कोन? बेई दारूखोर जोन अपने परिवार के हींसा को पइसा दारू में उड़ात रए औ अब अपने बेई परिवार खों अकेलो कर गए। सो, भैया हरों अब तो जाग जाओ औ दारूखोरी से तौबा कर लेओ। काए से के दारू आप ओरन की जिनगी औ परिवार से बड़ी कभऊं नईं हो सकत। सो, भैया हरों बिनती आए के चाए खुसी होए, चाए गम, दारू के लाने ने उठें कदम!
----------------------------
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
----------------------------
#टॉपिकएक्सपर्ट #डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #पत्रिका #बुंदेलीकॉलम #patrika #rajsthanpatrika #topicexpert #बुंदेली  

चर्चा प्लस | ‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
9 सितंबर हिमालय दिवस पर विशेष:
‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                               कहा जाता है कि धरती पर एक पत्ता भी हिलता है तो नक्षत्रों तक उसका प्रभाव होता है, फिर हिमालय तो इसी पृथ्वी पर है और संकटों से घिरता जा रहा है। हिमालय पर गहराने वाले संकट हमारे अस्तित्व के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ इसका ताज़ा उदाहरण है। कभी भूस्खलन तो कभी ग्लेशियर्स के पिघलने से आने वाली बाढ़ हमें निरंतर चेतावनी दे रही है। हिमालय के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए ही मनाया जाता है ‘‘हिमालय दिवस’’। इसकी इस बार की थीम है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। इस थीम की गहराई में उतरना जरूरी है।   

युग-युग से है अपने पथ पर,

देखो कैसा खड़ा हिमालय
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय
जो-जो भी बाधाएं आएं,
उन सबसे ही लड़े हिमालय
इसलिए तो दुनिया भर में,
हुआ सभी से बड़ा हिमालय

- कवि सोहनलाल द्विवेदी की ‘‘हिमालय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां हिमालय पर्वत की विशालता, अडिगता एवं उपादेयता का सम्मानजनक वर्णन करती है। मात्र काव्यात्मक नहीं बल्कि भौगोलिक रूप से हिमालय हमारे देश के लिए गहन पर्यावरणीय महत्व रखता है। हम भारतवासियों को ही नहीं अपितु समूची दुनिया को इसकी उच्चता और विशालता पर गर्व रहा है। हिमालय की उच्चतम चोटी तक पहुंचने की चुनौती ने हमेशा पर्वतारोहियों को आकर्षित किया है। आज हमारा यही हिमालय जलवायु परिर्वतन के संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान ने जिस प्रकार दुनिया के सभी तत्वों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, उसी प्रकार हिमालय के ग्लेशियर्स भी उस तापमान के कारण अपनी स्थिरता को अपेक्षाकृत तेजी से खो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी हाल ही में नेपाल में आई भूस्खलन वाली बाढ़ का मूल कारण ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना ही था। हिमालय पर जमी बर्फ हवाओं के मापमान को नियंत्रित कर के ऋतुओं में परिवर्तन लाती है। इस बर्फ का असमय पिघलने लगना ऋतुओं के पैटर्न को भी प्रभावित करने लगा है।
हिमालय दिवस प्रतिवर्ष 9 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिवस की पहली बार आधिकारिक घोषणा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा सन 2014 में की गई थी। यह दिवस घोषित करने का उद्देश्य था हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना। इसके पीछे कारण था सन 2010 की अचानक आई बाढ़ और 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा। इनके बाद पहाड़ों की बढ़ती पारिस्थितिक संकट के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने तथा जागरूकता लाने के लिए ‘‘हिमालय दिवस’’ घोषित किया गया।

हिमलय प्राचीनतम भू-संरचनाओं में से एक है। इस विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण लगभग 40 से 50 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब टेक्टानिक प्लेटों की गति के कारण दो बड़े भू-भाग, भारतीय भूभाग और यूरेशिया, आपस में टकरा गए थे और हिमालय का उदय हुआ था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हिमालय का उल्लेख मिलता है। शिवपुराण में हिमालय को जहां शिवस्थली कहा गया है वहीं उसे देवी पार्वती के के पिता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारतीय संस्कृति में हिमालय सदा ही पूज्य रहा है। किन्तु मानवीय लालच एवं लापरवाहियों के कारण हिमालय संकट के कगार पर आ पहुंचा है। इसीलिए इस वर्ष के लिए थीम रखी गई है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। यह थीम संकट की गंभीरता को दर्शाती है।

हिमालय उपमहाद्वीप के लिए एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करता है और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करता है। इन पहाड़ों में अद्वितीय वनस्पतियां, जीव-जंतु और प्रमुख नदी प्रणालियां मौजूद हैं जो लाखों लोगों की आजीविका का सहारा हैं। इन सभी पर संकट का अर्थ है हिमालय पर संकट। इसीलिए हिमालय दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में खराब शहरी नियोजन, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते भूस्खलन जैसी समस्याओं से निपटने पर केंद्रित रहते हैं।
हिमलय पर गहराते जलवायु संकट से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाई गई हैं जिनका सही क्रियान्वयन हिमालय के अस्तित्व को बचाए रख सकता है। दशकों से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में विकास ने पहाड़ों को बाधाओं के रूप में या मानकीकृत किए जाने वाले भूदृश्यों के रूप में माना है। लेकिन हिमालय न तो एकसमान है और न ही सुगम है। इसकी भौगोलिक विविधता एवं महत्ता को ध्यान में रखते हुए ‘‘विश्व पृथ्वी दिवस 2026’’ को एक श्वेत पत्र जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि हिमालय में संकट केवल पर्यावरणीय ही नहीं बल्कि व्यवस्थागत भी है। जलवायु परिवर्तन के पैटर्न में बदलाव, जल प्रणालियों की अनिश्चितता और शासन व्यवस्था के खंडित रहने के कारण यह क्षेत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। रिपोर्ट में अधिक डेटा या तीव्र विस्तार की मांग नहीं की गई है, बल्कि पहाड़ों के साथ हमारे सोचने, योजना बनाने और निर्माण करने के तरीके में मौलिक बदलाव की बात कही गई। ‘‘हिमालय का भविष्य: विकास और लचीलेपन पर पुनर्विचार’’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट, सीपी कुकरेजा फाउंडेशन फॉर डिजाइन एक्सीलेंस द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र में व्याप्त व्यवस्थागत संकटों के समाधान हेतु प्रस्तुत की गई थी। इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, शासन और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों की भागीदारी वाली हिमालयी गोलमेज सम्मेलन से प्राप्त अंतर्दृष्टियों पर आधारित इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि हिमालय क्षेत्र एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां पारंपरिक विकास मॉडल अब व्यवहारिक नहीं रह गए हैं।
इस श्वेत पत्र में हिमालयी क्षेत्र के महत्व पर बल दिया गया। इस ओर भी ध्यान दिलाया गया कि हिमालय वैश्विक आबादी के लगभग एक चैथाई हिस्से, यानी लगभग दो अरब लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जो जल, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसमें क्षेत्र में विकास और लचीलेपन के पुनर्मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि वर्तमान अवसंरचना और शहरी विकास अक्सर पारिस्थितिक सीमाओं और भूवैज्ञानिक अस्थिरता की अनदेखी की गई है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन, बदलते जलवैज्ञानिक पैटर्न और खंडित शासन व्यवस्था के कारण उत्पन्न व्यवस्थागत विफलताओं और बढ़ते आपदा जोखिमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। एक सतत भविष्य सुनिश्चित करने के लिए, इसमें एकीकृत, डेटा-आधारित नियोजन की ओर संक्रमण का प्रस्ताव रखा गया, जो जलक्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करता है और स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान को समाहित करता है। यह मानकीकृत इंजीनियरिंग से हटकर संदर्भ-विशिष्ट डिज़ाइन की ओर बढ़ने का आह्वान करता है जिसमें दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी गई है।
रिपोर्ट का मूल सिद्धांत यह है कि हिमालय को अलग-थलग पारिस्थितिक या इंजीनियरिंग समस्याओं के समूह के बजाय एक परस्पर जुड़ी प्रणाली के रूप में समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि यद्यपि क्षेत्र के भूविज्ञान और जलविज्ञान के ज्ञान में विस्तार हुआ है, फिर भी जमीनी स्तर पर परिणाम असंगत और अक्सर विनाशकारी हुए हैं। 2013 और 2023 के बीच हुई गंभीर घटनाओं, जैसे कि केदारनाथ बाढ़, चमोली आपदा और जोशीमठ का धंसना, को असामान्य ही घटना नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप और भू-दृश्य की अंतर्निहित संवेदनशीलता के बीच संरचनात्मक असंतुलन के अनुमानित परिणामों के रूप में देखा गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और बाढ़ के पूर्व पैटर्न अब भविष्य की स्थितियों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। 1950 के दशक से वर्षा की तीव्रता में लगभग 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और कम समय में भारी वर्षा होना अब आम बात हो गई है।
हिमालय की भौगोलिक संरचना में परिवर्तन उसके साथ की जा रही छेड़छाड़ है। हिमालय में 70 प्रतिशत से अधिक सड़कें पहाडियों को काटकर बनाई जाती हैं, जिनमें ढलान को स्थिर करने के लिए उचित उपाय नहीं किए जाते। ढलान गिरने की कई घटनाएं पानी के कारण होती हैं। जब निर्माण कार्य प्राकृतिक जल निकासी को अवरुद्ध कर देता है, तो पानी जमा हो जाता है, मिट्टी में दबाव बढ़ जाता है और भूस्खलन हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में, जल प्रवाह का प्रबंधन संरचना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

पर्वतीय क्षेत्र में वन एक आवश्यक प्राकृतिक संरचना के रूप में कार्य करते हैं और भूस्खलन के खतरे को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। यद्यपि जनसंख्या के बदलते पैटर्न इन भू-भागों पर असमान दबाव डाल रहे हैं। लोग उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों से दूर जा रहे हैं, जबकि निचले इलाकों में स्थित शहर अधिक भीड़-भाड़ वाले होते जा रहे हैं।

पर्यटन को भी हिमालय के पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला कारण माना गया है। शिमला और मनाली जैसे स्थानों में मौसमी जनसंख्या वृद्धि वहां की स्थायी जनसंख्या से पांच से दस गुना अधिक होती है। इससे अपशिष्ट उत्पादन स्थानीय प्रणालियों की क्षमता से दो से तीन गुना अधिक हो जाता है। रिपोर्ट में दबाव कम करने और अधिक संतुलित आर्थिक अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाने का सुझाव दिया गया है।
हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और करोड़ों लोगों को जीवनदायिनी जल संसाधन प्रदान करता है। हिमालय को ‘‘एशिया का जल स्तंभ’’ कहा जाता है। यह भारत की जलवायु और पर्यावरण को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में से एक है। उत्तरी भारत और पड़ोसी देशों में फैली यह विशाल पर्वत श्रृंखला मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने, नदी प्रणालियों को बनाए रखने, कृषि को सहारा देने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हिमालय का महत्व केवल इसके मनमोहक दृश्यों तक ही सीमित नहीं है। यह क्षेत्र मीठे पानी की आपूर्ति, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देकर लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। यह क्षेत्र जैविक और आनुवंशिक विविधता का समृद्ध भंडार भी है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत मूल्यवान बनाता है। यद्यपि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालय लगातार पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, पर्यावासों का क्षरण और चरम मौसम की घटनाएं इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रही हैं। भारत में पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता सुनिश्चित करने के लिए हिमालय की भूमिका और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को इस बार हिमालय दिवस पर समझना अत्यंत आवश्यक है।
एवरेस्ट विजेता सर एडमंड हिलेरी ने कहा था-‘‘हिमालय मैंने जैसे तुम्हें देखा है, तुम सदा वैसे ही रहना।’’        
-----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 09.09.2026 को प्रकाशित) 
------------------------
#DrMissSharadSingh
#डॉसुश्रीशरदसिंह #चर्चाप्लस #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar 

Tuesday, September 8, 2026

पुस्तक समीक्षा | ‘नीरद’ की ग़ज़लों के सरोकार का विस्तार है मन से जन तक - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा 
‘नीरद’ की ग़ज़लों के सरोकार का विस्तार है मन से जन तक 
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
-------------------
ग़ज़ल संग्रह - सांझ के घुंधलके
कवि       - अशोक कुमार ‘नीरद’
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य       - 299/- 
-------------------
हिंदी साहित्य की काव्य विधा में समकालीन हिंदी ग़ज़ल ने अपना विशेष स्थान बना लिया है। अनेक वर्षों की लंबी यात्रा करने के उपरांत हिंदी ग़ज़ल के कर्म में नित नए नाम जुड़ते गए हैं। जिनमें से कुछ समर्पित ग़ज़लकारो का नाम वरिष्ठता क्रम में लिया जाता है तो कुछ का कनिष्ठ के रूप में। किंतु इन सभी का योगदान हिंदी ग़ज़ल को समृद्ध करने में रहा है। वरिष्ठ ग़ज़लकारों में एक नाम अशोक कुमार नीरद का भी है। इन्होंने सन 1968 से ही ग़ज़लों से अपना नाता जोड़ लिया था। ग़ज़ल में सब समय प्रयोग धर्मिता को अपनाते हुए अपनी ग़ज़ल की कहानी में इन्होंने निरंतर परिवर्तन लाया जिससे आज भी इनकी ग़ज़लें समसामयिक मूल्य तथा वर्तमान परिवेश में सटीक बैठती हैं। 
ग़ज़ल विधा के लिए समर्पित भाव से कार्यरत वरिष्ठ ग़ज़लकार हरेराम समीप जी अशोक कुमार नीरद के सृजन के संबंध में कहते हैं कि “अशोक कुमार ‘नीरद’ की ग़ज़लों से गुज़्रते हुए अनेक मर्मस्पर्शी अशआर मिलते हैं, तब लगता है जैसे उन्होंने शेर-दर-शेर अपना दिल उतार कर रख दिया है। उनकी ग़ज़लों में अनुभूतियों की अनेक परतें मिलती हैं। उनकी ग़ज़लों में जीवन के सभी पक्ष मौजूद हैं। कुछ भी नहीं छूटा है। चाहे वे सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियाँ हों, असुरक्षा और आतंक का अँधेरा हो, या प्रेम और प्रतिरोध का उजास। चाहे टूटते रिश्ते, अकेलापन या भूख, गरीबी, शोषण, उत्पीड़न या कमरतोड़ महँगाई। इतना ही नहीं, आज के समाज में व्याप्त उपभोक्तावाद पर भी नीरद की कलम ने अनूठे अशआर ईजाद किए हैं। नीरद की ग़ज़लें वास्तव में आम आदमी की ग़ज़लें हैं। नीरद अपनी ग़ज़लों में उस बेजुबान तक पहुँचना चाहते हैं जो अपना दुःख और परेशानी किसी से नहीं कह पा रहा है। इस तरह वे दुखी जन के अधिवक्ता की तरह वंचित के आत्मसंघर्ष में उसके साथ खड़े रहना चाहते हैं।”
    समकालीन हिंदी ग़ज़लों को लेकर अशोक कुमार नीरद का दृष्टिकोण स्पष्ट है। वे हिंदी ग़ज़ल को आमजन की अभिव्यक्ति के रूप में एक सशक्त विद्या मानते हैं। उनके अद्यतन गजल संग्रह सांझ के धुंधलके के आरंभिक पृष्ठों में  मुंबई के साहित्यकार अनिल गौड़ द्वारा उनसे लिया गया साक्षात्कार है जिसमें हिंदी ग़ज़ल पर विस्तृत चर्चा की गई है। इस साक्षात्कार के बानगी के तौर पर कुछ प्रश्नोत्तर देखें जिनमें उन्होंने हिंदी ग़ज़ल सार्वभौमिक कैसे बन सकती है इसकी चर्चा की है - 
अनिल गौड़- आप हिंदी ग़ज़ल किसे मानते हैं?
नीरद - ग़ज़ल एक फॉर्मेट है और विधा भी। ग़ज़ल उर्दू से ही हिन्दी में आयी है। जाहिर है उसका कलेवर और पिंगल तो वही रहेगा जो उर्दू में है। उर्दू के पिंगल का अनुपालन करते हुए हिन्दी की कहन, प्रकृति, शिल्प, सौष्ठव और मुहावरेबंदी करके कही गयी हिन्दी संस्कारों से संपृक्त ग़ज़ल को ही हिन्दी ग़ज़ल कहेंगे।
अनिल गौड़ - हिंदी ग़ज़ल को अपनी पहचान विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए? विषय, भाषा, कथन शैली में नवीनता कैसे आ सकती है?
नीरद -हिन्दी ग़ज़ल की सार्वभौमिक पहचान तब ही बनेंगी जब वो अपने प्रांजल और परिष्कृत रूप में पाठकध्श्रोता के सामने आए और पढ़ते-सुनते ही हृदय में उतर कर विभोर कर सके। इसके लिए जो ग़ज़लें कही जा रही हैं उनपर खुले मन से विमर्ष होना चाहिए ताकि ग़ज़लकारों को ये समझ आ सके कि वो कहाँ खड़े हैं। निरंतर चर्चा-परिचर्चा का परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा। रहा भाषा का प्रश्न तो भाषा ऐसी सहज, सरल होनी चाहिए जो जनसामान्य बोलता समझता है यानि हिन्दी ग़ज़ल की भाषा का जनतांत्रिक होना ही ग़ज़ल के उत्कर्ष, नयेपन ओर प्रसार का निश्चित रूप से कारक होगा। रही विषय और कथन-शैली की बात तो यह ग़ज़लकार की रुचि और सामथ्र्य पर, उसके अध्ययन, मनन, चिंतन और दृष्टिकोण पर आधारित है।
‘‘सांझ के घुंधलके’’ ग़ज़ल संग्रह में 101 गजलें हैं। सभी ग़ज़लें गहरी कहन रखती हैं। वस्तुतः ‘नीरद’ के अनुभव का दायरा विस्तृत है और संवेदनाओं से सरोकार अनंत, इसीलिए उनकी ग़ज़लें मन से जन तक विस्तार पाती हैं। उनकी ग़ज़लों की भाषा आम बोलचाल की भाषा है इसलिए इनकी संप्रेषणीयता स्पष्ट है। इस संबंध में इसी संग्रह में ‘‘साँझ के धुँधलके - भारतीय समाज के अंतर्विरोधों का मुखर प्रतीक’’ शीर्षक से दिल्ली के साहित्यकार वीरेन्द्र कुमार शेखर ने ‘नीरद’ की ग़ज़लों बुनावट और भाषा पर कुछ इस प्रकार टिप्पणी की है- ‘‘नीरद की भाषा में न तो कोई बनावटीपन है, न कोई बौद्धिक दुरूहता। वे सीधे, स्पष्ट और सशक्त शब्दों में लिखते हैं-क्योंकि वे मानते हैं कि कविता को यदि आत्मा से निकलना है, तो उसे कृत्रिम लहजे की ज़रूरत नहीं। इसी कारण से उनकी रचनाएँ दुरूहता से नहीं, बल्कि सरस बौद्धिकता और भावबोध से भरपूर हैं। वे कठिन बातों को सहज ढंग से कह पाने की विलक्षण क्षमता रखते हैं- जो किसी भी श्रेष्ठ साहित्यिक प्रतिभा की निशानी होती है।’’
यही भाषाई खूबी हिन्दी ग़ज़ल को समसामयिक बनाती है। संग्रह की पहली ग़ज़ल में ग़ज़लकार ‘नीरद’ उस सांझ के धुंधलके की बात करते हैं जिसमें सूरज भी विवश दिखाई देता है। शेर देखिए-
साँझ  के  धुँधलके ही  दीखते  क्षितिज  पर हैं 
जिनको कहते सूरज हम किस क़दर वो कातर हैं
क्यों  रहस्य  से  आखि़र  आवरण नहीं उठता 
क्यों  नहीं  सवालों  का  पार  पाते  उत्तर हैं

‘नीरद’ पारस्परिक संबंधों में घुलती जा रही स्वार्थपरता पर भी उंगली रखते हैं। यह स्वार्थ ही तो है जिसमें हर व्यक्ति दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है, चाहे वह घनिष्ठ मित्र ही क्यों न हो। इसी होड़ के चलते मित्रघात भी आम बात हो चती है।
बिजुरिया नीड़ पर मेरे गिराई है 
मुहिम यह दोस्तों ने ही चलाई है
जहां अपने बिरानेपन को जीते हों 
वो  रिश्ते  भूलने  में ही भलाई है

अशोक कुमार ‘नीरद’ ने अपनी ग़ज़लों में यथोचित मुहावरों का भी प्रयोग किया है। यह प्रयोग कथ्य को और अधिक सहज और कटाक्ष पूर्ण बना देता है। आज जीवन में आए दिन ऐसे मामले उत्पन्न हो जाते हैं जिन्हें देख कर, सुन कर या उनसे गुज़र का हमारे हाथों के तोते उड़ जाते हैं, यानी हम ठगे से रह जाते हैं। हाथों से तोते उड़ने के मुहावरे का यह उम्दा प्रयोग देखिए-
हमारे हाथों के उड़ते ही रोज़ तोते हैं 
किसी भी हाल में लेकिन कभी न रोते हैं
जिसे थे लोग दिया करते बद्दुआ हरदम 
मुराद पाने अब उसके मुरीद होते हैं
कि जिनको भोग नई पौध तृप्ति पाएगी 
फलों के ऐसे ही हम बीज आज बोते हैं
लेखन का दीर्घकालीन अनुभव भी सृजन में सटीकता ला देता है। 21 नवंबर 1945 को मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नगर बुरहानपुर में जन्मे अशोक कुमार ‘नीरद’ ने सन 1968 में सागर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। जीवन के उतार-चढ़ावों से गुज़रते हुए 2012 में मुंबई पहुंचे और तब से अँधेरी (पूर्व), मुंबई में ही निवासरत हैं। ‘नीरद’ ने बारह वर्ष की उम्र से लेखन प्रांरभ, प्रायः गीत, गजल, मुक्तक, दोहा, छंद, आदि सभी विधाओं में, सन् 1968 से हिन्दी-ग़ज़लें कहना आरंभ कर दिया था। उनके छह ग़ज़ल संग्रह हैं- जुगनू को सूरज का भ्रम है (सन् 2008), ग़ज़ल के स्वर (सन् 2012), दीवारों के जाल (सन् 2022), अंकुर बोलते हैं (सन् 2024), पैमाने नये आये (सन् 2025) एवं साँझ के धुँधलके (सन् 2026) में। पहला गीत संग्रह ‘‘विश्वास का सवेरा’’ 2012 में तथा दूसरा गीत संग्रह ‘‘आशा के अक्षत’’ सन् 2025 में प्रकाशित हुआ। उनकी ग़ज़लों की स्वीकार्यता पाठ्यक्रमों में भी देखी जा सकती है। मुंबई विश्वविद्यालय के बी ए के पाठ्यक्रम में कुछ बर्षों से कुछ ग़ज़लें सम्मिलित। कवयित्री बहिणाबाई चैधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगाँव के बी ए के पाठ्यक्रम में भी कुछ ग़ज़लों का समावेश किया गया है।
अनिल गौड़ को साक्षात्कार देते हुए हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के प्रति आश्वस्ति प्रकट करते हुए ‘नीरद’ कहते हैं कि ‘‘आज का युग अति व्यस्तता का युग है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। ग़ज़ल का सबसे धनात्मक पहलू यह है कि शेर के दो मिसरे वो बात कह जाते है जो दो पेज की कविता नहीं कह पाती। निस्संदेह हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य उज्जवल है। आनेवाले समय में हिन्दी- ग़ज़ल हिन्दी की प्रमुख विधा के आसन पर विराजेगी।’’
यद्यपि उस प्रकार के सृजन के प्रति उनके मन में खिन्नता भी जागती है जो सतही तौर पर किया जाता है। जिस प्रकार वे साहित्य के नाम पर परोसी जा रही विकृति की भत्र्सना करते हैं ठीक उसी प्रकार हिंसा को वीरता का नाम दिए जाने को भी वे धिक्कारते हैं-
देखकर नूतन सृजन को सर बहुत चकरा रहा है 
नाम पर साहित्य के क्या-क्या परोसा जा रहा है
क्रूर हिंसा लग रही है वीरता अब आदमी को 
बुजदिली पर अपनी सीना तान कर इठला रहा है

फिर भी वे आशावादी हैं और उस पक्ष को रेखांकित करते हैं जो अभी हारा नहीं है तथा सतत संघर्षरत है। 
हो भले ही त्रस्त, बेचारा नहीं है 
हारकर भी आदमी हारा नहीं है
टस से मस होना नहीं सीखा है 
इसने ये मेरा ईमान है, पारा नहीं है
इस प्रकार देखा जाए तो ग़ज़ल संग्रह ‘‘सांझ के धुंधलके’’ की सभी ग़ज़लें सशक्त है तथा विचारों को उद्वेलित करने में सक्षम हैं। इस प्रकार की गहन विश्लेष्णात्मक कलेवर की ग़ज़लें ग़ज़ल विधा के भविष्य के प्रति भी आश्वस्त करती हैं।  
-------------------------     
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह 
#DrMissSharadSingh #bookreview #bookreviewer 
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण

Sunday, September 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    ईके पैले गांव देहात खों ले के हमाए बिचार कछू और हते। हमने पन्ना जिला के छोटे से छोटे गांव देखे। दमोए के मुतके गांव देखे। छतरपुर जिला के मुतके तो नोंई पर कछू गांव जरूर देखे। टीकमगढ़ के गांवन से सोई गुजरे। सागर जिला के गांवन में तो जब चाए तब घुमक्कड़ी के लाने निकरबो होई जात आए। अबे लौं मोए जेई लगत रओ के गांव देहात में सुबिदाओं की कमी आए। उते चाए दबाई के लाने होए, चाए सुद्ध पानी के लाने, भौत तकलीफ उठाने परत आए। औ बेरोजगारी सो ऐसी के उते से गरीब-गुरबा खों पेट भरे के लाने सहर में जा के मजूरी करने परत आए। उतईं जो किसान आएं उने जी-तोड़ मेनत करने परत आए। सो मोए हमेसई गांव के लाने दया माया रई। मनो पिछली शनिच्चर खों हमें बा देखने को मिलो जा के बारे में हमने कभऊं सोची ने हती।
का भओ के हमें जाने रओ सीताराम रसोई नांव की संस्था। काए से के उते गरीब-गुरबा बुजुरगन खों मुफत में भरपेट खाना खवाओ जात आए। हम सोई उते भोजन कराबे के लाने जात रैत आएं। ई दार बी गए। उते अपने सगे हातन से भोजन परोसो। उते की खाना पकाने वारी बाइयों खों धुतिया भेंट करी। काए से हमें बे भौतई अच्छी लगत आएं, बिलकुल अपनी बैन घांई। औ उनकी मेनत औ ब्यौहार भौतई अच्छो रैत आए। फेर हम ओरन ने सोची के ऊंसई घरे लौटबे से अच्छो आए के तनक चक्कर काट के, एकाद गंाव देहात से घूमत चलें। अच्छो लगहे। सो सीताराम रसोई से निकर के पैले बालाजी मंदिर में शनि भगवान के दर्शन करे। बा मंदिर सोई ऊंची पहरिया पे बनो आए, सो उते जा के भौतई अच्छो लगत आए। सो, उते बालाजी हनुमान भगवान औ शनिदेव के दरसन करे हमने। फेर हम ओरन ने रस्ता पकरी मंदिर के नैचे से पांछू वारी। हम ओरन खों पतो ने हतो के हम ओरें कोन तरफी जा रए? मनो जा तो पता रई के अपने जिला से बायरे नईं जा रए। कछू दूर तो साजी रस्ता रई, फेर मनों रोड को नक्सा बदल गओ। साजी सी रोड पे गड्ढा मिलन लगे। दचका खात भए कछू दूर औ चले तो रोड कनारे ‘‘प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत’’ लिखों भओ बोर्ड दिखानों। हमने प्रधानमंत्री योजना वारी मुतकी रोडें देखी आएं मनो ऐसी गड्ढा वारी रोड पैली दार देखी। रस्ता में एक बड़ो स्कूल औ एक फैक्टरी दिखानी। मनो रोड की दसा से उनको कोनऊं मेल ने हतो।
चलो कछू नईं, गांव आए। ऊ रोड पे भैंसन ने चल-चल के गड्ढा बना दओ हुइए। जा सोस के हमने खुद खों तसल्ली दई। इत्ते में एक फेमस गांव को बोर्ड दिखानों। कछू नईं। गांव के बायरे से निकरी रोड पे बी कऊं-कऊं गिलावो सो मचो हतो। बा बी कछू नईं। काए से के अब बरसात के दिनां में गिलावो ने हुइए तो का धूरा उड़हे? बा गांव बड़ो हतो। गांव के बायरे के हिस्सा में एक तरफी नोने-नोने खेत हते। तो दूसरी तरफी जंगल विभाग वारों के सगोना के जंगल हते। बा सब देख के भौतई अच्छो लग रओ तो। ऊ सीनरी देखत समै रोड के दचका लौं बिसर गए। तनक देर बाद लगो के अब कोनऊं से पूछ लेव चाइए के हम ओरें कोन तरफी जा रए? लग तो रई हती के जोन तरफी बढ़ रए बा रोड चक्कर काट के राजघाट बंधान लौं जात हुइए। फेर बी कोनऊं से पूछ लेबो सई लगो। हमने संग वारे भैयाजी जू से कई के कोऊ दाऊ दिखाएं सो उनसे पूछ लइयो। मनो भैया जू खों दाऊ से पैले तीन मोड़ा दिखा गए। 12 ने तो 14 बरस के रए हुइएं। तीनों में से एक सायकिल लए हतो। मनो तीनोंई गुटखा खा रए हते। भैया जू ने उनईं तीनों से पूछ लई के जा रोड कोन गांव खों जा रई? जा सुन के एक मोड़ा ने अपने कुकुरमुत्ता घांई बालन पे हात फेरत भओ बड़े स्टाईल से पूछो आप ओरन खों कां जाने? भैया जू बोले के हमें राजघाट जाने। जा सुन के बा मोड़ा बोलो के फेर तो तुम ओरें आगे ई रोड पे चलके दाएं मुड़ जइयो। तब लौं दूसरो मोड़ा गुटखा अपने मों में डार के खींसा निपोरत भओ बोलो के दाएं नईं बाएं मुड़ियो। इत्ते में तीसरो मोड़ा बोलो इते कां चले आए, पांछे लौट जाओ। भैया जू ठैरे बुंदेलखंड के बायरे के सो बे उन ओरन की कई उत्ती समझ ने पाए। मनो मोए समझ में आ गई के जे मोड़ा गांव के भले आएं मनों ठैरे चंटा-पंटा। पूरे आवारा टट्टू। सो हमने भैया जू से कई के इन ओरन खों पतो नइयां, आप तो आगूं चलो, रोड कऊं तो पौंचाहे। 
हम ओरन की गाड़ी बढ़ी औ पांछू से उन तीनों की हंसबे की आवाज सुना परी। हमाओ जी तो ऐसो करो के गाड़ी रुकवाएं औ उतर के उन ओरन खों दो-दो थपाड़ा लगाएं। जरा-जरा से लरका औ गुटखा खा-खा के गर्रा रए। मनो हमने अपनों गुस्सा पे काबू करो औ बढ़ लए।
कछू दूर पे एक दूसरो गांव आ गओ। उते जो दिखानों, बा हम देखतई रै गए। उते एक दलान में छै-सात लुगवा बैठे पत्ता खेल रए हते। मनो सई कएं तो उते जुआ चल रओ हतो। चलो कछू नईं, गांव ठैरो। टेम पास। मनो गांव वारन को इत्ती फुरसत कां से मिल गई? ऊपरे से जां हम ओरन की गाड़ी उते से निकरी तो बे सब हम ओरन खों देखन लगे। जे ई कोई बीस कदम बाद एक घर के बायरे पट्टा घांईं बनो चबूतरा पे छै-सात लोग औ दिखाने। बे सोई फुरसत से बैठे गपिया रए हते। उतई एक टपरा हतो। चाय को। ऊमें चार जने बैठे हते। बे ओरें मोबाईल पे कछू देखने में मगन हते। बाकी हम ओरन की गाड़ी उते से कढ़ी तो सब के सब हम ओरन की तरफी घूरन लगे। भैया जू ने हमसे पूछी के इन ओरन से रस्ता पूछी जाए? हमने कई के नईं, जे ठलुआ हरें को जाने का बताएं। इते तो गाड़ी बी ने रोको, बढ़त चलो। मनो उन ओरन खो देख के हमें लगो के इन ओरन खों कछू काम-धंदा नइयां का? इने तो फुरसत के मारे टेम नइयां। औ ईसे बुरई बात जे के इते की लुगाइन खों जो ऊ तरफी से निकरने परत हुइए तो कित्तो बुरौ लगत हुइए? कुल मिला के बा सो अच्छो माहौल ने दिखानों। 
हम सोसन लगे के कछू गांव खों ई गुटखा औ मोबाईल ने का कर डारो। मेनत करबे वारे की जांगा इने ठलुआ बना डारो। ऐसई बुरए माहौल में मोड़ियां औ लुगाइयां खतरा में पर जात आएं। जा सोस के हमाओ मन दुखी होन लगो। इत्ते में कोनऊं हम ओरन की गाड़ी के पांछू से हार्न बजात सुनाई परो। पीछे देखत के शीश में देखो तो मोटरसायकिल वारो दिखानों। ऊके हार्न से भैया जू को दिमाग गरम हो गओ। उन्ने साईड में गाड़ी रोकी औ ऊंसे बोले के तुमें जल्दी आए सो तुमई पैले कढ़ जाओ। हमने देखी के ऊके मोटरसायकिल पे ऊके पांछू लुगाई औ बच्चा सोई बैठे हते। हम भैया जू खों कछू समझा पाउते के इत्ते में बा मोटर सायकिल वारे ने पूछी के आप ओरन खों राजघाट जाने? भैया जू बोले हऔ। सो बा बोलो के तो फेर हमाए पांछू-पांछू आ जाओ, हम सोई ऊ तरफी जा रए। ऊकी जा बात सुन के भैया जू को गुस्सा ठंडो पर गओ। औ हम समझ गए के जा मोटर सायकिल वारो ऊ गुटखा छाप लरकों के इते से हमाई बात सुन के पछांरें आ रओ हुइए। औ हमें रस्ता बताबे के लाने हार्न बजा रओ हतो। 
सो हम ओरन ने ऊपे भरोसा करो औ अपनी गाड़ी ऊकी मोटरसायकिल के पांछू लगा दई। गांव से निकरतई सांत अच्छी रोड मिलन लगी औ हम ओरें ऊके पांछू-पांछू चल परे। सातेक किलोमीटर चलबे के बाद बड़ी रोड दिखानीं। बा मोटरसायकिल वारो रुको औ बोलो के अब आप ओरें बायीं तरफी मुड़ जाओ औ जेई बड़ी रोड पे चल हो तो दसेक किलोमीटर पे राजघाट दिखान लगहे। ऊको दूसरी तरफी जाने रओ सो बा दूसरी तरफी मुड़ गओ। भैया जू ने ऊको धन्यबाद करो। जोन रोड पे हम ओरन खों ऊने पौंचाओ रओ बा सागर से जैसीनगर वारी रोड हती। ऊपे पौंच के हम ओरन खों रस्ता याद आ गओ। काए से के ऊ रोड पे चल के हम ओरें पैले एक बेर सिलवानी गांव लौं गए रए। सो, फेर तो साजी रोड पे गाड़ी दौरा दई। रस्ता में एक मंदिर पे रामधुन सोई सुनाई परी। फेर राजघाट दिखान लगो। सो ऐसी रई ऊ दिनां की सैर।
मनों एक बात हमें पता परी के सबरे गंाव एक सी दसा के नईयां। कऊं-कऊं गुटखा औ मोबाईल की हवा कछू ज्यादाई लग गई आए। ऐसे गांवन में मुतके ठलुआ बी आएं जोन ताश पत्ती खेलत बैठे रैत आएं। उते रोड पे चलत लुगाइयां कमई दिखानीं। औ जो ऐसे ठलुआ रोड के लिंगे बैठे होंए तो लुगाइयां निकरें बी तो कैसे? सो हमें गांव को जा दूसरो चेहरा देखबे को मौका सोई मिल गओ। मनो ऐसो माहौल होन नईं चाइए। बाकी हम नईं चात के कछू जने के मारे पूरो गांव को नांव धरो जाए सो हमने गांव को नांव नईं लिखो। बाकी जोन उते के रैबे वारे आएं औ ने तों उते से कढ़े हुइएं सो बे समझ जैहें। बाकी बा मोटर सायकिल वारे घांईं अच्छे लोग अबे बी उते रैत आएं। जोन से गांव की इज्जत बनी रैत आए। जे नोनी बात आए।            
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के गांवन पे सई से ध्यान देबे की जरूरत आए के नईं? औ कछू नईं तो उते गुटखा औ दारू पे लगाम लगाओ चाइए। संगे ठलुआ हरों से कछू काम लओ जाओ चाइए। कओ, सई कई के नईं?  
---------------------------
बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn 

Wednesday, September 2, 2026

चर्चा प्लस | कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  

कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 


        एक कामर्शियल विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के ब्रालेट पहनने पर पक्ष और विपक्ष में जितनी तलवारें खिंची यदि उसकी आधी भी बहस प्राकृति संकट को ले कर होती तो नेपाल जैसी विभीषिका से बचा जा सकता था। हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के असंतुलित दोहन से स्थितियां दिन पर दिन बदतर हो रही हैं। जोशी मठ हासदे से ले कर हाल ही में नेपाल में आई कीचड़ की बाढ़ ने जता दिया कि प्रकृति नाराज़ है और वह बार-बार चेतावनी दे रही है किन्तु हमारी वर्तमान राष्ट््रीय चिंता तो एक विज्ञापन में पहना गया ब्रालेट है। विज्ञापन को नकारने के बजाए उसे पूरी पब्लीसिटी देना गोया राष्ट््रीय कर्तव्य है। क्या 903 लोगों की मौतें और चार हजार से अधिक लोगों का लापता हो जाना मामूली बात है? जबकि अभी संकट की दस्तक मात्र है।         

ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त  के रुख़  पे  तबाही की इबारत लिख गया।
     - शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से नेपाल तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
       मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। आज बाढ़ें भयावह रूप लेती जा रही हैं। लेकिन इस बारे में चिंता करने के बजाय कृति सेनन के ब्रालेट की चिंता में समय खपाना जागरूकता की निशानी बन गया है। एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति की तौहीन बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे स्त्री की आजादी से जोड़ कर इसकी पैरवी कर रहा है। सोशल मीडिया कृति सेनन और कंगना रनौत की कम और पूरे कपड़ों के साथ टांके गए पोस्टों से भारा पड़ा है। इक्का-दुक्का पोस्ट नेपाल के हादसे पर भी दिख जाती है गोया कुछ लोग स्वयं को जागरूक दिखाना चाहते हैं। अन्यथा इस तरह की आपदा की जड़ तक पहुंचने में भला किसको दिलचस्पी है? 
6 फरवरी 2023 को जब टर्की में विनाशकारी भूकंप आया था तब मुझे एक आश्चर्यजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा था। भूकंप की खबर पढ़ने के बाद जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई थी। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया था कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा था कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।
भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं थीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?
तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई थी। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए थे। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है। भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं है। चाहे भारत हो या नेपाल हो बड़े बांधों से पैदा होने वाले संकट को अनदेखा करना, ग्लेशियर्स के तेजी से पिघलने को अनदेखा करना ही हमें विनाश का आईना दिखा देगा। नेपाल में आया ‘‘मड फ्लड’’ अर्थात कीचड़ की बाढ़ के पीछे असली कारण ग्लेशियर्स पिघलने से अचानक जलस्तर बढ़ना था। ग्लेशिर्यस क्यों तेजी से पिघल रहे हैं? क्योंकि पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, क्योंकि इससे मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव हो रहा है। दुख की बात ये है कि यह सब हमारे संज्ञान में है, फिर भी प्रकृति को चोट पहुंचाने से हम बाज नहीं आ रहे हैं। 
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।
वैज्ञानिकों ने हमेशा इस ओर ध्यान दिलाया और चेतावनी भी दी। प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है।
6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आई थी कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी 2023 को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया। 
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है।


नेपाल की ओर से बह कर आने वाली नदियां हों या चीन से उतरने वालीं, भारत के लिए संकट पैदा करने में सक्षम है। नेपाल आपदा के बाद यह आशंका जताई भी गई थी कि कहीं चीने को अपने दो बंाधों ये यदि बंधान खोले तो और अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इस गंभीर समाचार पर कितने लोगों ने ध्यान दिया? शायद गिनती के लोगों ने। अधिकांश का सरोकार तो ब्रालेट पहनी अभिनेत्री के विज्ञापन से था। उन्हें संस्कृति की चिंता थी जिसे उस विज्ञापन को अनदेखा कर के, उसे अप्रभावकारी साबित कर के भी संस्कृति के पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता था। जबकि कोई भी संस्कृति तभी तक है जब तक उस संस्कृति के लोग सुरक्षित हैं और जीवित हैं। अतः पहली और प्रखर चिंता होनी चाहिए थी प्राकृतिक आपदा की, बालेट की नहीं। 
दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते, लेकिन ग्लेशिर्य के पिघलने की गति को कम कर सकते हैं। इस तरह प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो हमें प्रकृति-मित्र बनना होगा। प्रकृति की चिंता करनी होगी।                                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 02.09.2026 को प्रकाशित) 
------------------------
#DrMissSharadSingh
#डॉसुश्रीशरदसिंह #चर्चाप्लस #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar