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Monday, April 6, 2026
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Saturday, April 4, 2026
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Wednesday, April 1, 2026
चर्चा प्लस | राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस : हनुमान जन्मोत्सव विशेष:
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
हनुमान देवत्व का वानर रूप हैं जो मनुष्य के भीतर आत्मबल का संचार करते हैं तथा उन्हें संकट से उबरने में सहायता करते हैं। हनुमान जी का हिंदू धर्म और संस्कृति में अत्यंत उच्च और पवित्र स्थान है। उन्हें शक्ति, भक्ति, ज्ञान, और निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और भगवान श्री राम के सबसे अनन्य भक्त हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा 1 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से लेकर 2 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 41 मिनट तक रहने वाली है अतः उदया तिथि के चलते हनुमान जन्मोत्सव का त्योहार 2 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दुखों और कष्टों को दूर करने वाला। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की हर तरह की बाधा दूर होती है और व्यक्ति को निडरता प्राप्त होती है। वे नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और भय से रक्षा करते हैं अर्थात वे आत्मबल का विकास करते हैं।
भगवान हनुमान, जिन्हें अंजनेय, पवनपुत्र, केसरीनंदन और राम भक्त हनुमान के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में अटूट भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय सेवा भावना के प्रतीक हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा का उल्लेख शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में मिलता है। हर साल चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में इसी दिन बजरंगबली के जन्म का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और रुद्र के 11वें अवतार हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने धरती पर धर्म स्थापना के लिए जब रामावतार लिया तो हनुमान उनके सहायक बनकर बजरंगबली के रूप में धरती पर आए थे।
शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शिव ने भी उनके साथ पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से वानरराज केसरी और माता अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। माता अंजना को यह वरदान था कि उनके पुत्र को पवन देव का विशेष आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 37) में वर्णन है-“भगवान शंकर ने अपने अंश से रुद्र रूप में वानर स्वरूप में जन्म लिया। माता अंजना ने कठिन तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया, तब महादेव ने रुद्रांश के रूप में जन्म लेकर हनुमान स्वरूप धारण किया।”
यह जन्मकथा इस प्रकार है कि समुद्रमंथन के बाद जब भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने को कहा था जो उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को दिखाया था। उनकी बात का मान रखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु का आकर्षक रूप देखकर शिवजी आकर्षित होकर कामातुर हो गए और उन्होंने अपना वीर्य गिरा दिया। जिसे पवनदेव ने शिवजी के वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इस तरह माता अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ। उन्हें शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी हनुमान जी के जन्म की कथा विस्तार से मिलती है- माता अंजना, एक अप्सरा थीं, जो ऋषि के श्राप से राजा कुंजर की इच्छानुसार रूप धारण करने वाली पुत्री के रूप में कपि योनि में जन्मी थीं। एक दिन जब वे मानवी स्त्री का रूप धारण कर के एक पर्वत शिखर पर विचार रही थी द्य तब उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी जिसे वायुदेवता ने धीरे से हर लिया और काम से मोहित होकर उन्होंने अंजना का अव्यक्त रूप से आलिंगन कर लिया। पतिव्रता होने के कारण अंजना तुरंत ही समझ गई और बोली “कौन मेरे इस पतिव्रत का नाश करना चाहता है?“ तब पवन देव ने उत्तर दिया कि “मैं तुम्हारे पतिव्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। मैंने मानसिक संकल्प से तुम्हारे साथ समागम किया है जिससे तुम्हे बल पराक्रम से संपन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा।”
फिर एक दिन पवन देव के आशीर्वाद से उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। जन्म के बाद, हनुमान जी को असीमशक्ति, वेग और बल प्राप्त हुआ। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 -20 ) में वर्णन है- “वानरराज केसरी की पत्नी अंजना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जो महाबली, महातेजस्वी और अत्यंत बुद्धिमान था। पवन देव की कृपा से जन्म लेने के कारण उसे ‘पवनपुत्र’ कहा गया।”
एक और कथा है हनुमान जी के जन्म की- एक बार की बात है अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने के बाद राजा दशरथ ने प्रसाद रूपी खीर को अपनी तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को बांट दिया। तभी वहां एक कौवा आया और खीर का एक भाग लेकर उड़ गया। उड़ता हुआ वह उस जगह पहुंच गया, जहां अंजनी पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रही थीं। यह सब शिव और वायुदेव के इशारे पर हो रहा था।
अंजनी ने देखा कि कौवा खीर लेकर आया है। अंजनी को लगा कि यह शिवजी की कृपा है। उन्होंने खीर को पी लिया और इसी प्रसाद से उन्होंने एक बलवान पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र पवनदेव का था। अंजनी के पति वानर राज केसरी थे। इसलिए अंजनी के पुत्र को पवनपुत्र और केसरी नंदन दोनों नामों से जाना गया।
हनुमान जी के जन्म की कथा एक और रूप में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार शिव जी के उस वरदान से जो उन्होंने राजा केसरी और माता अंजना को दिया था. दरअसल एक बार राजा केसरी और माता अंजना ने शिव जी की कठिन तपस्या की, जब दोनों की तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए तो उन्होंने माता अंजना और केसरी से वरदान मांगने को कहा. जिस पर माता अंजना ने कहा कि -‘‘हे भोलेनाथ, हमें एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो बल में रुद्र, गति में वायु और बुद्धि में गणपति के समान तेजस्वी हो।’’ माता के वचनों से खुश होकर शिव जी माता को वरदान दिया और अपनी रौद्र शक्ति को पवन देव के रूप में यज्ञ कुंड में समाहित किया और उत्पन्न शक्ति को माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। जिस वजह से हनुमान जी का एक नाम पवनपुत्र भी हुआ। शिव शंकर की कृपा से अंजना गर्भवती हो गईं और चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन मंगलवार को भगवान रूद्र के 11वें अवतार के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी जन्म से ही बल, बुद्धि और विद्या में निपुण हैं।
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
बजरंग बली जब छोटे थे तब उन्हें बहुत भूख लगती थी। एक बार उन्होंने अपनी मां अंजनी से खाने के लिए मांगा। अंजनी तब कुछ काम कर रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि बाहर जाओ और फल खा लो। जितने भी पके हुए फल हैं, वो खाने योग्य हैं। बजरंग बली भूख से व्याकुल हो रहे थे। वे बाहर गए और फल खाने लगे। तभी उन्हें आसमान में उन्हें चमकता हुआ सूरज दिखाई दिया। बजरंग बली को लगा कि यह भी एक फल है। उन्होंने अपनी शक्ति से लंबी छलांग लगाकर सूर्य के पास पहुंच गए और उसे अपने मुंह में रख लिया। बजरंग बली की इस हरकत से धरती पर अंधेरा छा गया। इंद्रलोक तक हाहाकार मच गया। तब सभी देव इंद्र के पास गए और कहा कि एक वानर ने सूर्यदेव को अपने मुंह में रख लिया है। सभी देवों ने इंद्रदेव से इस समस्या का हल निकालने की विनती की। तब इंद्रदेव आए। उन्होंने वज्र लहराया और बजरंग बली की ठोड़ी पर प्रहार कर दिया। बजरंग बली बेहोश होकर गिर पड़े। उनके जबड़े पर चोट लग गई। इंद्र के इस कदम से पवन देव नाराज हो गए। तब इंद्र ने हनुमान को फिर से होश में लाए। ठोड़ी को हनु भी कहते हैं। मान का अर्थ विरूपित होता है। इस तरह बजरंग बली का नाम हनुमान पड़ गया।
अतुलित बल धामा क्यों कहा गया?
हनुमान जी का बल असीम, अतुलनीय और अपरिमित है, जिसे शब्दों में नहीं मापा जा सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 10,000 इंद्रों का बल हनुमान जी के शरीर के एक रोम (बाल) में निहित है। वे ‘‘अतुलितबलधामा’’ (अतुलनीय बल के धाम) कहे जाते हैं, जिनकी एक दहाड़ से तीनों लोक काँप उठते हैं। हनुमान चालीसा की दूसरी चैपाई में हनुमान जी को श्अतुलित बल धामाश् कहा गया है, जिसका अर्थ है - ‘‘अतुलनीय (जिसकी तुलना न की जा सके) शक्ति के निवास स्थान’’। उन्हें यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असीम शक्ति के स्वामी हैं।
इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं कि उन्हें बचपन में ही कई देवताओं से वरदान प्राप्त थे। इंद्र ने उन्हें वज्र के समान शरीर का, अग्नि ने निर्भयता का, और पवन देव ने वायु के समान वेग का आशीर्वाद दिया था। असीम शारीरिक शक्तिरू उन्होंने समुद्र को लांघकर लंका जाना, संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत उठा लाना, और युद्ध में राक्षसराज रावण की सेना को धूल चटाने जैसे कार्य किए, जो साधारण बल से परे हैं। वे ‘‘रामदूत’’ हैं और उनका मानना है कि उनका बल उनका अपना नहीं, बल्कि उनके हृदय में निवास करने वाले प्रभु राम का है। वे बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र और अहंकार शून्य हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधि का वरदान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो स्वयं शक्ति का रूप हैं।
हनुमान को संकटमोचन क्यों कहा गया?
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकटमोचन के नाम से क्यों जाना जाता है?
जब रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता माता का हरण किया था तो हनुमान ने ही उन्हें ढूंढ़कर अपने स्वामी श्रीराम को उनका पता बताया था। हनुमानजी हे श्रीराम का दूत बनकर रावण के पास गए थे और जब रावण ने उन्हें पकड़ लिया था तो वो अपनी बहादुरी से लंका में आग लगाकर बच निकलें थे। उन्होंने भगवान राम के वनवास काल में उनके मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं और संकटों को दूर कर अपनी सच्ची भक्ति का प्रमाण दिया था। हनुमानजी ने श्रीराम की रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने में बहुत सहायता की थी। सीता माता अपने रामजी के लिए हनुमानजी की स्वामी भक्ति और प्रेम को देखकर प्रसन्न हो उठी थीं और उन्होंने बजरंगबली को अमरता का वरदान दिया। अजर-अमर का वरदान पाकर बजरंगबली हनुमान निस्वार्थ भाव से अपने भक्तो की रक्षा करके उन्हें सभी संकटो से बचते हैं और इसलिए उन्हें संकट मोचन महाबली हनुमान के नाम से जाना जाता हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 01.04.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, March 31, 2026
पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”
संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”
डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”
गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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