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शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Thursday, April 9, 2026
बतकाव बिन्ना की | जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, April 8, 2026
चर्चा प्लस | हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
आज दुनिया जिन सबसे बड़ी समस्याओं का सामना कर रही है, उनमें से एक प्लास्टिक कचरे की समस्या है। इस प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा हमारे घरों से ही निकलता है। यह न केवल प्रदूषण फैलाता है, बल्कि नालियों को भी जाम कर देता है, जिससे बाढ़ जैसी गंभीर स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। यह आवारा जानवरों की जान ले लेता है, और इससे निकलने वाला जहरीला धुआँ इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के लिए कौन जिम्मेदार हैकृमैं, आप, वह (पुरुष), वह (स्त्री) या वे? हम एक-दूसरे पर दोष डालकर बच नहीं सकते, क्योंकि जलवायु हम सभी की साझा संपत्ति हैय इसलिए इसे सही बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। जलवायु परिवर्तन हर इंसान और सभी जीवित प्राणियों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अब हमें यह तय करना होगा कि क्या हम इस धरती पर अन्य जीवित तत्वों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, या फिर इस धरती से जीवन को ही मिटा देना चाहते हैं। एक बार सोचिए, क्योंकि यह कोई विज्ञान-कथा (साईफाई) नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह सच है कि हम प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद नहीं कर सकते, लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस समस्या से निपटने के लिए हम क्या कर सकते हैं?
जलवायु क्या है? आसान शब्दों में कहें तो, जलवायु किसी खास इलाके में मौसम का लंबे समय तक चलने वाला पैटर्न है। मौसम हर घंटे, हर दिन, हर महीने या यहाँ तक कि हर साल बदल सकता है। किसी इलाके के मौसम के पैटर्न, जिन्हें आम तौर पर कम से कम 30 सालों तक ट्रैक किया जाता है, उस इलाके की जलवायु माने जाते हैं। अगर पूरी धरती का मौसम बदल रहा हैकृजिसे हम जलवायु परिवर्तन कहते हैंकृतो इसका मतलब है कि पिछले तीस सालों में हमने इतनी गलतियाँ और लापरवाही की है कि मौसम में बदलाव सिर्फ किसी एक इलाके में ही नहीं, बल्कि पूरी धरती पर देखा जा रहा है। और भी साफ शब्दों में कहें तो, आज जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसके लिए हम और सिर्फ हम ही जिम्मेदार हैं।
जरा सोचिए कि किसी दिन हमारे पास साँस लेने के लिए साफ हवा, पीने के लिए साफ पानी और खाने के लिए साफ खाना न होय धरती और महासागरों की गर्म सतहों से लावा फूट रहा होय और समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से धरती का जमीनी हिस्सा पानी में डूब गया हो। तो फिर हम क्या करेंगे? हम अपनी जान कैसे बचाएँगे? यह कोई साइंस-फिक्शन कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह हमारे भविष्य के जीवन का वह नजारा है, जिसकी पटकथा हम खुद ही लिख रहे हैं।
हमारी जलवायु हमारी गतिविधियों पर निर्भर करती है। अगर आज वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमने अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाली जहरीली गैसों पर रोक नहीं लगाई। हमने ऐसे वाहनों का इस्तेमाल किया, जिनसे सालों तक जहरीला धुआँ निकलता रहा। हम उन जंगलों को काटते रहे, जिनके पेड़ हवा को साफ करते थे। अगर आज जल प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी वजह यह है कि हमने अपनी गंदी नालियों के पानी को तालाबों और नदियों के साफ पानी में मिलने दिया। हमने फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले कचरे और गंदे पानी को नदियों में मिलने दिया। हमने नदियों से रेत का अवैध खनन करके उनके प्राकृतिक बहाव को बिगाड़ दिया। हमने जमीन में ऐसे जहरीले पदार्थ डाले कि ट्यूबवेल का जमीन के नीचे का पानी भी दूषित होने लगा। पानी बचाने के बजाय, हमने उसे बर्बाद किया। हमने इतनी ज्यादा बर्बादी की कि आज कई जगहों पर पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। अगर जमीन की बात करें, तो हमने जमीन को भी कहाँ बख्शा है? हमने सालों तक अपने खेतों में जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक डालकर मिट्टी की उर्वरता को कम कर दिया है। जमीन को प्रदूषित करने में प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का भी बहुत बड़ा हाथ है। हमने बहुत अधिक औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति की है, लेकिन हमने कचरा निपटान की मूलभूत आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया है।
प्लास्टिक कचरा, या प्लास्टिक प्रदूषण, श्पृथ्वी के पर्यावरण में प्लास्टिक की चीजों (प्लास्टिक की बोतलें और भी बहुत कुछ) का जमाव है, जो वन्यजीवों, वन्यजीवों के रहने की जगहों और इंसानों पर बुरा असर डालता है। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है। यह देखा गया है कि प्लास्टिक कचरे को ठिकाने लगाना एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इसे इकट्ठा करने और अलग करने का सिस्टम ठीक नहीं है। जितना प्लास्टिक बनता है, उसका सिर्फ 60ः ही रीसायकल हो पाता हैय बाकी 9400 टन प्लास्टिक पर्यावरण में ही पड़ा रहता है, जिससे जमीन, हवा और पानी प्रदूषित होते हैं।
हरे रंग के कूड़ेदान गीले और बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए होते हैं, जिसमें रसोई का कचरा, जैसे सब्जियों और फलों के छिलके शामिल हैं। नीले कूड़ेदान प्लास्टिक के रैपर और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे को ठिकाने लगाने के लिए होते हैं। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे प्रदूषण रुकता है और जीवाश्म ईंधन की खपत की माँग कम होती हैय साथ ही, प्राकृतिक संसाधन और ऊर्जा भी बचती है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान दे रही हैं। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है।
प्लास्टिक पर्यावरण को पाँच तरीकों से नुकसान पहुँचाता है। पहला, यह रासायनिक प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक प्रदूषण के माध्यम से भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। प्लास्टिक मूल रूप से तेल और गैस से बनता है। इन गैर-नवीकरणीय संसाधनों की खुदाई से बेंजीन, टोल्यूनि, एथिलबेंजीन, जाइलीन, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और कई अन्य जैसे हानिकारक रसायन उत्पन्न होते हैं। दूसरा, यह माइक्रो-प्लास्टिक बनाता है। माइक्रो-प्लास्टिक अब लगभग हर जगह पाए जाते हैं। ये छोटे कण जलमार्गों, मिट्टी, पौधों, जानवरों और मनुष्यों को प्रदूषित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक के प्रभावों का अभी नया अध्ययन किया जा रहा है। यह देखा गया है कि माइक्रो-प्लास्टिक मिट्टी की गुणवत्ता, उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों और अपघटन के लिए जिम्मेदार छोटे कीड़ों को प्रभावित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक बड़े जानवरों को भी कई तरीकों से प्रभावित करते हैं, जैसे उनके क्छ। को नुकसान पहुँचाना, उनकी वृद्धि को रोकना, प्रजनन अंगों को क्षति पहुँचाना और भी बहुत कुछ।
तीसरा, प्लास्टिक कचरा ऐसे अपशिष्ट के रूप में जमा होता रहता है जो अपने आप विघटित नहीं होता। चैथा, जब यह प्लास्टिक कचरा सीवेज प्रणाली तक पहुँचता है, तो उसे जाम कर देता है। कुछ साल पहले मुंबई में आई बाढ़ का एक मुख्य कारण प्लास्टिक कचरे से जाम हुई सीवेज प्रणाली ही थी।
चौथा, कूड़ेदान में फेंके जाने के बाद, हमारे देश में आवारा जानवर अन्य खाद्य पदार्थों के साथ प्लास्टिक कचरा भी खा लेते हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ खाने से गायों की मौत की घटनाएँ भी सामने आती हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ पचती नहीं हैं और उनकी आँतों में फँसकर उनके लिए जानलेवा साबित होती हैं।
पाँचवाँ, दुनिया के कई देश अवैध रूप से प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंक देते हैं। समुद्री दुनिया में बड़ी संख्या में कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। प्लास्टिक कचरा समुद्री जीवन को भारी नुकसान पहुँचाता है। इस कारण समुद्री तट भी प्रदूषित हो जाते हैं।
देखा जाए तो प्लास्टिक कचरे से पानी, जमीन और हवाकृसभी को नुकसान पहुँचता है। इसीलिए, प्लास्टिक कचरे से बचने का सबसे अच्छा तरीका है प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना। लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक की उपयोगिता हमारे जीवन में इस तरह एक जरूरत बन गई है कि हम इसे पूरी तरह से छोड़ नहीं सकते। इसलिए, यह जरूरी है कि हम अपने इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक कचरे को सही तरीके से संभालना सीखें। तभी हम प्लास्टिक कचरे के बुरे प्रभावों से बच पाएँगे। हाँ, हमें अपने घरों के प्लास्टिक कचरे को अलग रखना चाहिए और उसे नीले रंग के कूड़ेदान में डालना चाहिए, जो इसी काम के लिए बनाया गया है। इससे प्लास्टिक कचरे का निपटारा करने वालों को आसानी होगी और हम प्लास्टिक कचरे के हानिकारक प्रभावों से बच पाएँगे। यह छोटा सा कदम हमें एक बड़े खतरे से बचा सकता है।
नदियों की तरह, हमने समुद्रों और महासागरों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिसके कारण समुद्रों और महासागरों में रहने वाली कई महत्वपूर्ण प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। महासागर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निकलने वाली अधिकांश अतिरिक्त गर्मी को सोख लेते हैं, जिससे महासागरों का तापमान बढ़ रहा है। महासागरों के बढ़ते तापमान का समुद्री प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों पर बुरा असर पड़ता है। बढ़ते तापमान के कारण कोरल ब्लीचिंग होती है और समुद्री मछलियों तथा स्तनधारियों के प्रजनन स्थलों को नुकसान पहुँचता है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में दुनिया ने अपने लगभग 14 प्रतिशत कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) खो दिए हैं। शोध में बताया गया है कि महासागरों का अम्लीकरण, समुद्र के बढ़ते तापमान और अत्यधिक मछली पकड़ना, प्रदूषण, अनियंत्रित पर्यटन तथा खराब तटीय प्रबंधन जैसे स्थानीय दबाव, कोरल पारिस्थितिक तंत्रों के लिए मिलकर एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।
इस समय हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा ग्लोबल वार्मिंग है। ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य से निकलने वाले विकिरण से बचाती है और पृथ्वी के तापमान को संतुलित रखती हैय प्रदूषण के कारण इसे पहुँचने वाले नुकसान से ओजोन परत कमजोर हो रही है और पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसका परिणाम ग्लेशियरों का पिघलना और मौसम में बढ़ती अनिश्चितता है, जिसे हम अभी अपनी आँखों से देख रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण झीलों के जल स्तर में कमी आई है, समुद्र का जल स्तर बढ़ा है, और नदियों तथा वर्षा के पैटर्न में बदलाव आया हैय साथ ही, इसने प्लवक (चसंदाजवद) से लेकर स्तनधारियों तक, सभी जलीय जीवों पर नकारात्मक प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। पिछले 30 वर्षों में क्रिल (छोटे समुद्री जीव) की संख्या में औसतन 80ः की कमी आई है। कोरल ब्लीचिंग (मूंगा विरंजन) में भी भारी वृद्धि हुई है। हमारे देश के जल क्षेत्र में पाई जाने वाली हिंद महासागर मूल की मछलियों की संख्या अब तक 30 तक पहुँच चुकी है। समुद्री कछुओं के प्रजनन क्षेत्र सिकुड़ गए हैं, क्योंकि समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण उनके तटीय आवास नष्ट हो रहे हैं। समुद्री बर्फ के पिघलने या कम होने के कारण, कई समुद्री स्तनधारियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में विकसित किए गए गणितीय कंप्यूटर मॉडलों के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि यदि कार्बन की सांद्रता (घनत्व) दोगुनी हो जाती है, तो वैश्विक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। जलवायु की इस बुरी स्थिति के लिए हम सभी जिम्मेदार हैंकृहम सभी का अर्थ है, हम सभी मनुष्य। एक-दूसरे पर दोषारोपण करके हम अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर सकते। लेकिन हम अपनी उन गतिविधियों में सुधार अवश्य कर सकते हैं, जो जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। हमारी गतिविधियों के कारण जलवायु में आ रही गिरावट यह साबित करती है कि हमारी जलवायु का भविष्य हमारे ही हाथों में है अब यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे संवारते हैं या बिगाड़ते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.04.2026 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 1, 2026
चर्चा प्लस | राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस : हनुमान जन्मोत्सव विशेष:
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
हनुमान देवत्व का वानर रूप हैं जो मनुष्य के भीतर आत्मबल का संचार करते हैं तथा उन्हें संकट से उबरने में सहायता करते हैं। हनुमान जी का हिंदू धर्म और संस्कृति में अत्यंत उच्च और पवित्र स्थान है। उन्हें शक्ति, भक्ति, ज्ञान, और निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और भगवान श्री राम के सबसे अनन्य भक्त हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा 1 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से लेकर 2 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 41 मिनट तक रहने वाली है अतः उदया तिथि के चलते हनुमान जन्मोत्सव का त्योहार 2 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दुखों और कष्टों को दूर करने वाला। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की हर तरह की बाधा दूर होती है और व्यक्ति को निडरता प्राप्त होती है। वे नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और भय से रक्षा करते हैं अर्थात वे आत्मबल का विकास करते हैं।
भगवान हनुमान, जिन्हें अंजनेय, पवनपुत्र, केसरीनंदन और राम भक्त हनुमान के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में अटूट भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय सेवा भावना के प्रतीक हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा का उल्लेख शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में मिलता है। हर साल चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में इसी दिन बजरंगबली के जन्म का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और रुद्र के 11वें अवतार हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने धरती पर धर्म स्थापना के लिए जब रामावतार लिया तो हनुमान उनके सहायक बनकर बजरंगबली के रूप में धरती पर आए थे।
शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शिव ने भी उनके साथ पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से वानरराज केसरी और माता अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। माता अंजना को यह वरदान था कि उनके पुत्र को पवन देव का विशेष आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 37) में वर्णन है-“भगवान शंकर ने अपने अंश से रुद्र रूप में वानर स्वरूप में जन्म लिया। माता अंजना ने कठिन तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया, तब महादेव ने रुद्रांश के रूप में जन्म लेकर हनुमान स्वरूप धारण किया।”
यह जन्मकथा इस प्रकार है कि समुद्रमंथन के बाद जब भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने को कहा था जो उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को दिखाया था। उनकी बात का मान रखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु का आकर्षक रूप देखकर शिवजी आकर्षित होकर कामातुर हो गए और उन्होंने अपना वीर्य गिरा दिया। जिसे पवनदेव ने शिवजी के वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इस तरह माता अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ। उन्हें शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी हनुमान जी के जन्म की कथा विस्तार से मिलती है- माता अंजना, एक अप्सरा थीं, जो ऋषि के श्राप से राजा कुंजर की इच्छानुसार रूप धारण करने वाली पुत्री के रूप में कपि योनि में जन्मी थीं। एक दिन जब वे मानवी स्त्री का रूप धारण कर के एक पर्वत शिखर पर विचार रही थी द्य तब उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी जिसे वायुदेवता ने धीरे से हर लिया और काम से मोहित होकर उन्होंने अंजना का अव्यक्त रूप से आलिंगन कर लिया। पतिव्रता होने के कारण अंजना तुरंत ही समझ गई और बोली “कौन मेरे इस पतिव्रत का नाश करना चाहता है?“ तब पवन देव ने उत्तर दिया कि “मैं तुम्हारे पतिव्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। मैंने मानसिक संकल्प से तुम्हारे साथ समागम किया है जिससे तुम्हे बल पराक्रम से संपन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा।”
फिर एक दिन पवन देव के आशीर्वाद से उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। जन्म के बाद, हनुमान जी को असीमशक्ति, वेग और बल प्राप्त हुआ। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 -20 ) में वर्णन है- “वानरराज केसरी की पत्नी अंजना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जो महाबली, महातेजस्वी और अत्यंत बुद्धिमान था। पवन देव की कृपा से जन्म लेने के कारण उसे ‘पवनपुत्र’ कहा गया।”
एक और कथा है हनुमान जी के जन्म की- एक बार की बात है अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने के बाद राजा दशरथ ने प्रसाद रूपी खीर को अपनी तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को बांट दिया। तभी वहां एक कौवा आया और खीर का एक भाग लेकर उड़ गया। उड़ता हुआ वह उस जगह पहुंच गया, जहां अंजनी पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रही थीं। यह सब शिव और वायुदेव के इशारे पर हो रहा था।
अंजनी ने देखा कि कौवा खीर लेकर आया है। अंजनी को लगा कि यह शिवजी की कृपा है। उन्होंने खीर को पी लिया और इसी प्रसाद से उन्होंने एक बलवान पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र पवनदेव का था। अंजनी के पति वानर राज केसरी थे। इसलिए अंजनी के पुत्र को पवनपुत्र और केसरी नंदन दोनों नामों से जाना गया।
हनुमान जी के जन्म की कथा एक और रूप में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार शिव जी के उस वरदान से जो उन्होंने राजा केसरी और माता अंजना को दिया था. दरअसल एक बार राजा केसरी और माता अंजना ने शिव जी की कठिन तपस्या की, जब दोनों की तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए तो उन्होंने माता अंजना और केसरी से वरदान मांगने को कहा. जिस पर माता अंजना ने कहा कि -‘‘हे भोलेनाथ, हमें एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो बल में रुद्र, गति में वायु और बुद्धि में गणपति के समान तेजस्वी हो।’’ माता के वचनों से खुश होकर शिव जी माता को वरदान दिया और अपनी रौद्र शक्ति को पवन देव के रूप में यज्ञ कुंड में समाहित किया और उत्पन्न शक्ति को माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। जिस वजह से हनुमान जी का एक नाम पवनपुत्र भी हुआ। शिव शंकर की कृपा से अंजना गर्भवती हो गईं और चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन मंगलवार को भगवान रूद्र के 11वें अवतार के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी जन्म से ही बल, बुद्धि और विद्या में निपुण हैं।
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
बजरंग बली जब छोटे थे तब उन्हें बहुत भूख लगती थी। एक बार उन्होंने अपनी मां अंजनी से खाने के लिए मांगा। अंजनी तब कुछ काम कर रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि बाहर जाओ और फल खा लो। जितने भी पके हुए फल हैं, वो खाने योग्य हैं। बजरंग बली भूख से व्याकुल हो रहे थे। वे बाहर गए और फल खाने लगे। तभी उन्हें आसमान में उन्हें चमकता हुआ सूरज दिखाई दिया। बजरंग बली को लगा कि यह भी एक फल है। उन्होंने अपनी शक्ति से लंबी छलांग लगाकर सूर्य के पास पहुंच गए और उसे अपने मुंह में रख लिया। बजरंग बली की इस हरकत से धरती पर अंधेरा छा गया। इंद्रलोक तक हाहाकार मच गया। तब सभी देव इंद्र के पास गए और कहा कि एक वानर ने सूर्यदेव को अपने मुंह में रख लिया है। सभी देवों ने इंद्रदेव से इस समस्या का हल निकालने की विनती की। तब इंद्रदेव आए। उन्होंने वज्र लहराया और बजरंग बली की ठोड़ी पर प्रहार कर दिया। बजरंग बली बेहोश होकर गिर पड़े। उनके जबड़े पर चोट लग गई। इंद्र के इस कदम से पवन देव नाराज हो गए। तब इंद्र ने हनुमान को फिर से होश में लाए। ठोड़ी को हनु भी कहते हैं। मान का अर्थ विरूपित होता है। इस तरह बजरंग बली का नाम हनुमान पड़ गया।
अतुलित बल धामा क्यों कहा गया?
हनुमान जी का बल असीम, अतुलनीय और अपरिमित है, जिसे शब्दों में नहीं मापा जा सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 10,000 इंद्रों का बल हनुमान जी के शरीर के एक रोम (बाल) में निहित है। वे ‘‘अतुलितबलधामा’’ (अतुलनीय बल के धाम) कहे जाते हैं, जिनकी एक दहाड़ से तीनों लोक काँप उठते हैं। हनुमान चालीसा की दूसरी चैपाई में हनुमान जी को श्अतुलित बल धामाश् कहा गया है, जिसका अर्थ है - ‘‘अतुलनीय (जिसकी तुलना न की जा सके) शक्ति के निवास स्थान’’। उन्हें यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असीम शक्ति के स्वामी हैं।
इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं कि उन्हें बचपन में ही कई देवताओं से वरदान प्राप्त थे। इंद्र ने उन्हें वज्र के समान शरीर का, अग्नि ने निर्भयता का, और पवन देव ने वायु के समान वेग का आशीर्वाद दिया था। असीम शारीरिक शक्तिरू उन्होंने समुद्र को लांघकर लंका जाना, संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत उठा लाना, और युद्ध में राक्षसराज रावण की सेना को धूल चटाने जैसे कार्य किए, जो साधारण बल से परे हैं। वे ‘‘रामदूत’’ हैं और उनका मानना है कि उनका बल उनका अपना नहीं, बल्कि उनके हृदय में निवास करने वाले प्रभु राम का है। वे बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र और अहंकार शून्य हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधि का वरदान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो स्वयं शक्ति का रूप हैं।
हनुमान को संकटमोचन क्यों कहा गया?
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकटमोचन के नाम से क्यों जाना जाता है?
जब रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता माता का हरण किया था तो हनुमान ने ही उन्हें ढूंढ़कर अपने स्वामी श्रीराम को उनका पता बताया था। हनुमानजी हे श्रीराम का दूत बनकर रावण के पास गए थे और जब रावण ने उन्हें पकड़ लिया था तो वो अपनी बहादुरी से लंका में आग लगाकर बच निकलें थे। उन्होंने भगवान राम के वनवास काल में उनके मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं और संकटों को दूर कर अपनी सच्ची भक्ति का प्रमाण दिया था। हनुमानजी ने श्रीराम की रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने में बहुत सहायता की थी। सीता माता अपने रामजी के लिए हनुमानजी की स्वामी भक्ति और प्रेम को देखकर प्रसन्न हो उठी थीं और उन्होंने बजरंगबली को अमरता का वरदान दिया। अजर-अमर का वरदान पाकर बजरंगबली हनुमान निस्वार्थ भाव से अपने भक्तो की रक्षा करके उन्हें सभी संकटो से बचते हैं और इसलिए उन्हें संकट मोचन महाबली हनुमान के नाम से जाना जाता हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 01.04.2026 को प्रकाशित)
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