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शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Thursday, October 8, 2026
बतकाव बिन्ना की | पितरों खों जिमाओ, मनों जियत भओ खों सोई पूछ लेओ करे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, October 7, 2026
चर्चा प्लस | अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
तितलियां ही तो है रंग-बिरंगी, नाज़ुक। बटरफ्लाई कैचर नेट में पकड़ने लायक़, पारदर्शी बोतल में कर क़ैद कर लेने लायक़ और किसी ट्रॉफी की तरह किताब के पन्नों में दबाकर रख लेने के लायक़। जिन्हें जब चाहे तब देख कर अपनी शक्ति का एहसास किया जा सके। जब शहरों में, गांव में, कस्बों में बहुत से बगीचे हुआ करते थे, बहुत से फूल खिला करते थे तब बहुत सी तितलियां उड़ा करती थीं। तब भी यही सुलूक होता था उनके साथ। आज बगीचे कम हैं, फूल कम हैं लेकिन सुलूक बदला नहीं है। मुट्ठी पर तितलियां भी किसी चौक- चौराहे पर जुड़ जाए तो टूट पड़ते हैं लोग उन पर। मगर तितलियों का साहस तो देखिए वे किताबें से निकल कर अपने पर खोलना चाहती हैं।
बचपन में बहुत से नसमझी वाले काम हो जाते हैं जैसे टिड्डे की टांग में धागा बांधकर उसे उचकाना, मेंढक की टांग में धागा बांधकर उसे लटका देना, किसी चीटें को पारदर्शी गिलास में बंद कर उसे छटपटाते हुए देखना और सुंदर, नाज़ुक तितलियों को पकड़ कर कभी उनके पंख नोच लेना तो कभी उन्हें जीते जी किताबों के पन्नों में दबाकर, भविष्य में देखने के लिए दफ़्न कर देना। बचपन की यही बचकानी नसमझ भरी गलतियां किसी किसी पर ऐसा प्रभाव डालती है कि वह बड़े होने पर भी तितली जैसी खूबसूरत हर चीज को अपने कब्जे में कर लेना चाहते हैं, मिटा देना चाहते हैं, दबा देना चाहते हैं। इसे चाहे तो साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर भी कह सकते हैं जिसकी नींव इंसान के बचपन में ही नहीं बल्कि पीढ़ियों पहले से पड़ चुकी रहती है। उसे पीढ़ी से जिसमें पूर्वजों ने वन्य पशुओं के सिर काटकर अपनी ड्राइंग रूम में ट्रॉफी बनाकर सजाने का चलन चलाया था। परिणाम यह हुआ कि शिकार हुए पशुओं की प्रजाति ही खतरे में पड़ गई। पूरी दुनिया को चिंता करनी पड़ी के लुप्त होने की कगार में खड़ी प्रजाति को कैसे बचाया जाए? कुछ दुर्भाग्यशाली प्रजातियां तो अब इतिहास के पन्नों भर में हैं। वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन नेचर) के अनुसार, कुछ विशिष्ट तितली प्रजातियाँ ही पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं, जिनमें लिब्याथी सिनिरास (1866 में), मोरेंट्स ब्लू (1879 में), यूरेनिया स्लोनस (20 वीं सदी के आरंभ में) और ज़ेरसेस ब्लू (1941 में) विलुप्त हो चुकी हैं। पर्यावरण प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 20% मूल्यांकित प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
हां, मनुष्य का स्वास्थ्य बढ़ जाता है और वह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने लगता है तो प्रजातियों पर संकट आना स्वाभाविक है।
बेटी बचाओ आंदोलन भी कुछ इन्हीं कारणों से चलाया गया। भारतीय समाज में बेटों की ललक इतनी अधिक बढ़ती चली गई की बेटियां कोख में ही मारी जाने लगीं। पुरुषों और महिलाओं का अनुपात गड़बड़ा गया। आज भी देश में कई स्थान ऐसे हैं जहां पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की कमी है। विवाह के लिए भी लड़कियां नहीं मिलती हैं। वे दूसरे राज्यों से खरीद कर लड़कियां लाते हैं ताकि वैवाहिक जीवन बिता सके और अपना वंश चल सकें। मनुष्य एक बुद्धिमान प्रजाति है। मनुष्यों में ही कुछ लोग समझ गए कि यदि बेटियों को इसी तरह कोख में मारा जाता रहा तो स्त्री प्रजाति ही संकट में पड़ जाएगी। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या सबसे कम (सबसे कम लिंगानुपात) वर्ष 1991 की जनगणना में पाई गई थी जो ऐतिहासिक रूप से सबसे कम दर्ज किया गया था। इसके बाद शासकीय स्तर पर प्रयास शुरू किए गए।
देश में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के रूप में एक संघीय कानून पारित किया गया। इस अधिनियम से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी की गई। ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान रखा गया। प्रत्येक आनुवांशिक परामर्श केंद्र, आनुवांशिक प्रयोगशाला या आनुवांशिक क्लिनिक परामर्श देने या प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का संचालन करने में लगे हुए, जैसे कि गर्भाधान से पहले और बाद में लिंग चयन की संभावनाओं के साथ इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) पीसीसीपीटी अधिनियम के दायरे में आता है, इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ तथा पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या फिर बढ़ने लगी। देखा जाए तो इससे स्त्री प्रजाति विलुप्ति के पन्नों में दर्ज़ होने से बच गई। फिर भी यह बहुत खुश होने वाली बात नहीं कहीं जा सकती है क्योंकि प्रतिबंधों की बाड़ उसके इर्द-गिर्द सदियों से खड़ी की जाती रही है।
स्त्रियों के लिए सबसे बड़ा प्रतिबंध रहा उसके साथ होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध खामोशी को अपनाने का। यदि राह चलते छेड़छाड़ की जाए तो वह प्रतिकार न करें सर झुका कर निकल जाए। यदि उसके साथ बलात्कार जैसी जागने वारदात हो तभी वह खामोश रहे क्योंकि समाज बलात्कार पीड़िता स्त्री को ही दोषी ठहराएगा। यदि जबरदस्ती प्रेम के नाम पर धोखा देकर उसे गर्भवती कर दिया जाए तो भी खामोश रहे क्योंकि उसे ही बदचलन ठहराया जाएगा। यदि घर की चौखट के भीतर परिवार के किसी पुरुष द्वारा उसे यौन अपराध का शिकार बनाया जाए तो भी वह मौन धारण किए रहे, क्योंकि इसमें भी स्त्री को ही दोषी ठहराया जाएगा। यही कारण है कि बलात्कार पीड़िता के प्रति उसके परिजन भी सहानुभूति रखने के बजाय भयभीत हो उठते हैं। यदि पीड़िता पुलिस में शिकायत करना भी चाहे तो परिजन उसे ऐसा करने से रोकते हैं। यदि परिजन साथ दे भी दें, तो समाज उन परिजन को भी कटघरे में खड़ा कर देता है कि “क्या आवश्यकता थी ढिंढोरा पीटने की जो हो गया सो हो गया।”
अपराधी बेटों को दोष नहीं किंतु पीड़िता बेटी को दोषी ठहराया जाना समाज की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। इसीलिए आज भी यह स्थिति है कि रात को कोई लड़की, कोई स्त्री घर से बाहर अकेली नहीं जाना चाहती है। जो लड़कियां शिक्षा अपने या नौकरी करने के लिए दूसरे शहरों में जाकर रहती हैं उन्हें भी कोई पुरुष सहारे के रूप में ढूंढना पड़ता है फिर चाहे वह सहारा ही उनके लिए मुसीबत क्यों न बन जाए।
नौकरी पेशा स्त्री यो का जीवन भी दोधारी तलवार पर चलता रहता है। स्त्री के लिए नौकरी करने का मतलब सिर्फ नौकरी करना नहीं होता है साथ में उसे घर की पूरी जिम्मेदारियां वहन करनी पड़ती हैं। एक पुरुष यदि नौकरी करके घर लौटता है तो घर में मौजूद स्त्री चाहे वह पत्नी, बहन या मां हो, चाय नाश्ता बना कर देती है। वहीं, यदि एक स्त्री काम करके कार्यस्थल से घर लौटती है तो उसे घर लौट कर सबके लिए न केवल चाय नाश्ता बल्कि रात का खाना भी बनाना पड़ता है। बहुत सी कामकाजी महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें कार्य स्थल पर आपत्तिजनक टीका टिप्पणी अथवा अनचाहे दबाव का सामना करना पड़ता है और ठीक वहीं दूसरी ओर घर में ताने सुनने पड़ते हैं। यह तमाम बातें पूरे समाज को विदित है। कुछ भी छुपा हुआ नहीं है फिर भी स्त्री की स्थिति में परिवर्तन कोई नहीं चाहता है।
वैवाहिक संबंध हो तो दहेज का दानव लड़की के कंधे पर बिठा दिया जाता है। जिससे मां-बाप उसके पैदा होने के साथ ही इस चिंता में डूब जाते हैं कि कल यह जब बड़ी होगी तो इसके लिए ढेर सारे दहेज का इंतजाम करना पड़ेगा। यदि ढेर सारा दहेज नहीं दिया गया तो लालची ससुराल वाले तरह-तरह से परेशान करेंगे और हो सकता है कि उसे मौत के घाट ही उतार दें। यह सब भी पूरा समाज जानता है। दहेज विरोधी कानून भी देश में लागू है लेकिन दहेज की प्रथा आज भी जारी है, सिर्फ तरीका बदल गए हैं। परंपरा रही कि दूल्हा बारात लेकर आता था लेकिन अब कई वैवाहिक बंधन के दौरान दुल्हन को “बारात” लेकर जाना पड़ता है।
नई पीढ़ी की लड़कियों को यह बंधन मंजूर नहीं हैं। उनका यही कहना है कि यह हमारा अपना जीवन है और इसे हमें अपनी तरह से जीने दो। हमें हमारे शहर में वे सड़क दो जिस पर हम निर्भय होकर चल सकें। हमें वह समाज दो जो हमारी प्रताड़ना के समय हमारे साथ खड़ा हो और हमें समर्थन दे। वे पुरुष प्रजाति की विरोधी नहीं हैं, वे सिर्फ उन पुरुषों की विरोधी हैं जो उनको किसी न किसी रूप में मानसिक एवं शारीरिक के प्रताड़ना देते हैं।
दुर्भाग्य से आज भी स्थिति यह है कि जब बेटियां अपने विरुद्ध होने वाली अपराध के बारे में साहस करके आवाज उठाती हैं तो समाज दो फड़ में बंट जाता है। कोई उनके कपड़ों पर उंगली उठाता है तो कोई उनके आवाज उठाने पर उंगली उठाता है तो कोई उन्हें बदचलन ही ठहर देता है। गोया स्त्रियों को अपनी फट होने वाले किसी भी अपराध को लेकर आवाज उठाने या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अधिकार नहीं है। की अगुवाई में हुई थी। ओलंपिक स्तर की भारतीय महिला पहलवानों विनेश फोगाट और साक्षी मलिक द्वारा यौन शोषण के विरुद्ध पहली बार आधिकारिक तौर पर 18 जनवरी 2023 को आवाज़ उठाई गई थी। इस दिन देश के शीर्ष पहलवानों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली पुलिस ने अप्रैल 2023 के आखिर में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया और जून 2023 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। अगस्त 2026 में, दिल्ली की एक अदालत (राउज़ एवेन्यू कोर्ट) ने पर्याप्त सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बृजभूषण शरण सिंह को इन आरोपों से बरी कर दिया गया। एक सीधी चोट स्त्री समाज पर की जब विश्व स्तर की महिला खिलाड़ियों को न्याय नहीं मिल सकता तो एक सामान्य स्त्री को न्याय कैसे मिलेगा?
अपने जीवन में कभी ना कभी यौन शोषण का शिकार हुई महिलाओं ने “#मी टू” की मुहिम चलाई। यह विश्व व्यापी मुहिम थी। अनेक महिलाओं ने अपनी पीड़ा खुलकर बयान की। अनेक नामचीन पुरुष बेनकाब हुए। फिर भी वह हर स्त्री सामने नहीं आ सकी जो कभी ना कभी प्रताड़ना का शिकार बनी थी। सदियों के डर और बंधन का पहाड़ एक झटके में बिखर नहीं सकता था।
तितलियां पंख लेकर पैदा होती हैं। प्रकृति या कहें, ईश्वर भी उन्हें उनकी सुंदरता के साथ निर्भय होकर उड़ते हुए देखना चाहता है। युवा पीढ़ी की लड़कियां भी अपने अधिकारों को पाना चाहती हैं। जिस तरह तितली अपने पंख फैला कर उड़ना शुरू करती है, इसी तरह लड़कियां भी खुलकर सामने आकर अपनी बात रखने का साहस कर रही हैं। जो पहले कभी देखा न गया हो और अचानक दिखाई देने लगे तो समाज में अनेक लोगों को परेशानी का अनुभव होने लगता है। बेशक यह भी सही है कि जो पहले कभी किया न हो और अचानक किया जाने लगे तो उसमें कुछ गड़बड़ियां भी होती हैं, कुछ अनाड़ीपन भी होता है और कुछ आक्रोश की अधिकता भी रहती है। फिर भी ऐसा लगता है की आज की तितलियां किताब में एक स्मृति चिन्ह की तरह दबाकर अपना जीवन खोने के बजाय पंख खोलकर उड़ने का विकल्प चुनना चाहती हैं। इसी संदर्भ में निदा फ़ाज़ली का यह शेर याद आता है-
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं,
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 07.10.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, October 6, 2026
पुस्तक समीक्षा | पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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वार्षिकांक - बघेली अंजोर
संपादक - डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’
प्रकाशक - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी - 486661 (म.प्र.)
मूल्य - 100/-
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मध्य प्रदेश के सीधी से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘बघेली अँजोर’’ का यह दूसरा वर्ष है तथा इसका पांचवा अंक (जुलाई- सितम्बर, 2026) वार्षिक अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका के संपादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उप सम्पादक गीता शुक्ला ‘‘गीत’’। प्रधान सह सम्पादक रामलाल मिश्र और शिवी शुक्ला हैं। यह पत्रिका उत्तर भारत की बोलियां के उत्थान के उद्देश्य से प्रकाशित की जा रही है जिसमें वर्तमान में पांच बोलियां शामिल हैं - बघेली, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी। पत्रिका में इसके उद्देश्य के संबंध में टीप लिखी गई है- ‘‘बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य संस्कृति की पूर्णतया अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका।’’
आज जब भारतीय भाषाओं को संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है ऐसे समय में बोलियां के पक्ष में खड़े होना संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हिंदी और उर्दू धीरे-धीरे हिंग्लिश और एंग्लो-उर्दू के हवाले होती जा रही है। बोलियों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। किंतु यह अच्छी बात है कि बोलियां लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं। बोलियों में लचीलापन होता है। वे विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों के शब्द ग्रहण करके भी अपनी मौलिकता बनाए रखती हैं। बोलियां इस कठिन दौर में भी अपनी यथावत पकड़ बनाए हुए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि व्यक्ति चाहे जितना भी पढ़ लिख जाए, अनेक भाषाओं का ज्ञाता बन जाए लेकिन जब उसे अपनी मूल संस्कृति से जुड़ना या उसे अभिव्यक्त करना होता है तो वह अपनी बोलियांे का ही सहारा लेता है। यानी बोलियां उसकी मूल अस्मिता, मूल क्षेत्रियता की पहचान होती हैं। अमेरिका या कनाडा में बसा हुआ व्यक्ति भी जब गर्व से कहता है कि मैं भारत के बुंदेलखंड का हूं, बघेलखंड का हूं या फिर भोजपुरी हूं तो इस उद्घोष में उसके क्षेत्र की बोली भी समाई रहती है।
‘‘बघेली अंजोर’’ के संपादकीय ‘‘कहब जरूरी है’’ में संपादक डॉ. ‘विकल’ ने “अक्षराणामकारोऽस्मि” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘अक्षराणामकारोऽस्मि’’ के सबसे बड़े जानकार औ समझै खातिर सबसे जादा जिम्मेदार हमरे साहित्यकारन क कहा जाय सकत है। दुइ-चारि लाइन से लै के कुछ किताबन तक के लिखड्या-पढ़ड्या अपने आप क सबसे बड़ा मानै लागत हैं। ओतनी दार उँ इया बिसरि जात हैं, के जउने अच्छर के साधना-आराधना उँ कै रहे हैं, उहे ब्रम्ह आय, उहे परम सत्ता आय, उहै भगमान आय। त फेर ओके सामने अहंकार काहे के? हँसी आबति है, दुक्खी लागत है इया देखि के, जब दुसरे बोली-भाखा के नाम पर, सहर, जिला, प्रदेस के नाम पर दुसरे क छोट बताय के ओकर हँसी उड़ायी जाति है। एतनै नहीं, ओकर जरि काटै म सगली ताकत झोंकि दीन जाति है। जउन हम कै रहेन है, उहै उत्तम है औ बाँकी सब घटिया। माने हमरे मन्दिर बाले भगमान असली औ बाँकी सब मन्दिरन के भगमान नकली?”
डॉ. विकल ने अपने संपादकीय में बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है। सचमुच, बोलियों को बहनों की तरह मिलकर रहना चाहिए। कोई भी बोली न तो बड़ी है और न छोटी। प्रत्येक की अपनी स्वतंत्र अस्मिता है लेकिन साथ ही शब्दों का बहानापा भी है, यह भूलना नहीं चाहिए। संपादकीय बघेली में लिखा गया है बघेली सरल बोली है, समझ में आ जाने वाली। किंतु संपूर्ण पत्रिका वर्तमान में पांच बोलियों का प्रतिनिधित्व कर रही है इसलिए यदि संपादकीय खड़ी बोली में होता तो अधिक उत्तम रहता विशेषरूप से वार्षिकांक का। वैसे, पांचों बोलियां आपस में इतनी घुली-मिली हैं कि इनमें से सभी को संपादकीय में कही गई बातें भलीभांती समझ में आ जाएंगी। किन्तु यह बघेली और उसकी निकटवर्ती बोलियों के अतिरिक्त भी अन्य बोली बोलने वाले पाठकों के हाथों में भी जाएगी और वे उत्सुकतावश इसे पढ़ने का प्रयास करेंगे।
वार्षिकांक के लिए रचनाओं का सटीक चयन किया गया है। इसका प्रथम आलेख लोकोक्तियों पर है। लोकोक्ति अर्थात लोक की उक्ति। लोक की वही उक्ति स्थायित्व पाती है जिसमें कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया हो। जिसमें संदेश हो, शिक्षा हो, चुटीलापन हो और जो स्मृति में अपना स्थान बना कर जबान पर चढ़ जाए और बार-बार बोली जाए। डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘‘चन्द्र’’ ने ‘‘लोकोक्तियाँ: हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ शीर्षक से लिखे गए लेख में लिखा है कि ‘‘लोकोक्तियाँ समय के अनुसार ढलती और बदलती भी रहती हैं। जिन्हें कल तक कोई भी नहीं पूछता था, जो चलन में नहीं थीं, वे भी कभी-कभी अपने को पाव-सेर से आगे पसेरी के भाव से स्थापित होने का दावा करती हैं। शायद इसीलिए कहा गया हो, कि ‘जेऊ रोड चलै न पाबै ओऊ रोड पसेरी तामैं’।’’
दूसरा आलेख अवधी की काव्यात्मक विशेषता के रूप में बरवै छंद पर लिखा गया है। आलेख “बरवै काव्य-परम्परा” में डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी ने अवधी काव्य में बरवै छंद के व्यापक प्रयोग पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “अवधी काव्य के व्यवहृत छन्दों में बरवै का स्थान विशेष है। वह अवधी का दुलारा छन्द है।’’
इस वार्षिकांक में कुल चार आलेख हैं - ‘‘लोकोक्तियाँः हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ - डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘चन्द्र’, ‘‘बरवै काव्य-परम्परा’’ - डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी, ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ - डॉ. संजय अलंग, ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’- डॉ. अक्षय पाण्डेय। ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ डॉ. संजय अलंग का शोधात्मक लेख है जिसमें उन्होंने गोण्ड जनजाति की उत्पत्ति, गोण्ड साम्राज्य, गोण्ड संस्कृति, रीतिरिवाज़, बोली, जीवनशैली आदि की विस्तृत जानकारी दी है। डॉ. अक्षय पाण्डेय ने अपने लेख ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’ में इस तथ्य को उद्धृत किया है कि ‘‘नवगीत में मिथकों और सांस्कृतिक प्रतीकों का पुनर्पाठ मिलता है।’’
वार्षिकांक में चार कहानियां हैं। जिनमें गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ की बघेली कहानी ‘‘बुढ़ाई के गइलि’’, डॉ. शेषमणि शुक्ल की अवधी कहानी ‘‘जइसि नियति वइसि बरक्कति’’, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बुंदेली कहानी ‘‘बुकरिया’’ तथा डॉ. विष्णुदेव तिवारी की भोजपुरी कहानी ‘‘सेहुँड़ आ कदम्ब’’ है।
रामनाथ साहू के छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘‘आमापाली के इस्कूल’’ का अंश, जो छत्तीसगढ़ी बोली का साहित्यिक समृद्धि को रेखांकित करता है। चार लघु कथाएं भी शामिल की गई हैं। बघेली में समरजीत वर्मा ‘बारी’ की लघुकथा ‘‘गरीबी रेखा के कार्ड, बालश्रमिक’’, बुंदेली में सिद्ध नारायण दुबे की ‘‘मैंने कओ तो का, पड़ोसी धर्म’’, छत्तीसगढ़ी में डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथा ‘‘भगवान के नाव म, डर’’ तथा भोजपुरी में अनीता मिश्र ‘‘सिद्धि’’ की लघुकथा ‘‘माई के सपना, मोबाइल वाला मास्टर’’।
डाॅ. विकल ने साहित्य की लगभग सभी बहुप्रचलित विधाओं को इस वार्षिकांक में स्थान देते हुए व्यंग्य और रेखाचित्र को भी स्थान दिया है। अवधी में अजय प्रधान की व्यंग्य ‘‘जीजा से फूफा’’ चुटीला और रोचक व्यंग्य है। लेखिका सुधा वर्मा का छत्तीसगढ़ी रेखा चित्र ‘‘फाफी’’। यह फाफी नामक महिला पर संवेदनात्मक रेखाचित्र है।
‘‘बघेली अंजोर’’ में एक स्थाई स्तम्भ रहता है ‘‘पुरखिन के कोठार से’’। इसमें इस बार डॉ. दुर्गेश दीक्षित की बुंदेली कहानी ‘‘तीसमारखाँ’’ दी गई है। समीक्षा के स्तम्भ में डाॅ. दया दीक्षित के बुंदेली उपन्यास की समीक्षा ‘‘मेरी दृष्टि में: ओरछा की गणेशकुँवरि’’ डॉ. सुषमा त्रिपाठी द्वारा की गई है। इसी स्तम्भ में गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ के लघुकथा संग्रह ‘‘को बनाइस’’ की समीक्षा डाॅ. सुषमा त्रिपाठी ने की है।
‘‘अड़ोस-पड़ोस’’ स्तम्भ में भगवती प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध ‘‘हरियरी’’ तथा ‘‘चलत-चलाबत’’ में डाॅ. सुधाकर तिवारी की रचना ‘‘अनन्या, राघव और रामायण’’ है। इसके साथ ही ‘‘रपट’’ के अंतर्गत रीवा शहर के प्रतिष्ठित कृष्णा राजकपूर आडिटोरियम में जनवरी-फरवरी 2026 में हुए पाँच दिवसीय छठवें चित्रांगन इंटरनेशनल फिल्म एवं थिएटर फेस्टिवल 2026 की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है।
कोई भी वार्षिकांक विशेष रूप से जो बोलियों पर केंद्रित हो, काव्य विधा के बिना हो ही नहीं सकता है। डाॅ. ‘विकल’ ने विभिन्न बोलियों में लिखे गए गीत और ग़ज़ल को पर्याप्त स्थान दिया है। गीत विधा में अनूप ‘‘अशेष’’ का ‘‘घुँघरा कस हो, पानी में’’ (बघेली), प्रदीप सारंग का ‘‘करमै पाठ पढ़ावै, बदरिया छाय रही’’ (अवधी), महेश कटारे ‘‘सुगम’’ का ‘‘हा हा दैया, का रै गी है’’ (बुन्देली), मिनेश कुमार साहू का ‘‘मुड़ी-पीरा माटी महतारी के, मुड़ी उल्हापाना (छत्तीसगढ़ी) तथा भालचन्द त्रिपाठी का ‘‘के समझावे, सुख के बिहान मंगली’’ (भोजपुरी) गीत है। ग़ज़लों के क्रम में रामसखा नामदेव की बघेली, डॉ. अशोक अज्ञानी की अवधी, राज सागरी की बुन्देली, जितेन्द्र कुमार ‘‘साहिर’’ की छत्तीसगढ़ी तथा मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़ल है।
‘‘बघेली अंजोर’’ का यह वार्षिकांक एक समृद्ध विशेषांक है जिसके लिए डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उनका संपादक मंडल प्रशंसा का पात्र है। बोलियों के उत्थान एवं संरक्षण की दिशा में ‘बघेली अंजोर’’ यूं भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, उस पर इस वार्षिकांक ने उसकी महत्ता पर चार चांद लगा दिए हैं। वार्षिक अंक का मूल्य 100 रुपए है तथा पत्रिका की वार्षिक राशि मात्र 280 रुपए है। सरकारी विज्ञापन अथवा किसी प्रतिष्ठान के विज्ञापन के बिना इस प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक उच्चकोटि का मिशन ही कहा जाएगा। उस पर यह वार्षिकांक न केवल बघेली और उसकी समीपवर्ती बोलियों को नवीन पटल देता है अपतिु बोलियों में हो रहे नवीन सृजन का भी साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यह एक संग्रहणीय वार्षिकांक है।
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