Friday, September 17, 2021

Thursday, September 16, 2021

चर्चा प्लस | हिन्दी कब पाएगी राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 

हिन्दी कब पाएगी राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा

  - डॉ. शरद सिंह
     अभी तक हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है जबकि पं. मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, महात्मा गांधी से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राज्यों के बीच संपर्क की भाषा बनाने का अथक प्रयास किया। यहां तक कि थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’ लेकिन आज अंग्रेजी-भक्ति के आगे हिन्दी की उपेक्षा यथावत है। हिन्दी की चिंता दिवस, सप्ताह, पखवाड़े और मास में सिमट कर रह जाती है।

किसी भी देश की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी राष्ट्रभाषा होती है, जिसका प्रयोग लिखनें, पढ़नें और वार्तालाप करने में किया जाता है। राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है, जिसमे देश के सभी कार्यों का निष्पादन किया किया जाता है। देश के सभी सरकारी कार्य इसी भाषा में किये जाते है। इस संदर्भ में रोचक बात यह है कि हमारे देश के तीन नाम हैं-भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया। लेकिन अभाव है तो एक राष्ट्रभाषा का। भारत में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 343, अंग्रेजी के साथ हिंदी (देवनागरी लिपि में लिखित) को संघ की आधिकारिक भाषा यानी भारत सरकार की अनुमति देता है। अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिलने की।

पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगो को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी। बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
भारत में जो भी विदेशी आया उसे हिन्दी सीखना सबसे आसान लगा, वह चाहे अंग्रेज हो या मुग़ल, अफ़गान। चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो ने अपनी कविताओं में ‘हिन्दवी’ का प्रयोग किया जिसमें एक पंक्ति फारसी की तो दूसरी हिन्दी (हिन्दवी) की होती थी। वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजराती भाषी होते हुए भी धाराप्रवाह हिन्दी बोल लेते हैं। जिससे यह तथ्य सिद्ध होता है कि यदि हिन्दी के प्रति प्रेम और इच्छाशक्ति है तो हिन्दी को सीखना, बोलना और समझना सबसे आसान है, क्योंकि यह एक लचीली भाषा है। इसने विभिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्द समाहित हैं। इसकी प्रकृति सार्वभौमिक (यूनीवर्सल) भाषा की प्रकृति है। हिंदी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसका उच्चारण उसके लिखने से थोड़ा भी अलग हो। इसी वजह से अंग्रेजों ने हिंदी को ‘फोनेटिक लेंग्वेज़’ कहा था।
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं।
अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान उन्हांने दिया था, इसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है-‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया?’’
हिन्दी के संदर्भ में क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है। विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे। हिन्दी के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमने वह वातावरण निर्मित होने दिया है जहां अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दे कर ही इस बुनियादी बाधा को दूर किया जा सकता है। इससे भी पहले हमें छोड़ना होगा अपने उस दोहरेपन जिसके चलते हिन्दी की भलाई दिवस, सप्ताह और मास में सिमट कर रह जाती है और शेष दिनों में हम अंग्रेजी की सेवा करते रह जाते हैं।
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(सागर दिनकर, 16.09.2021)
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Tuesday, September 14, 2021

उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता उपन्यास | समीक्षा | डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 14.09. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई वरिष्ठ साहित्यकार डॉ श्याम सुंदर दुबे जी के उपन्यास "पहाड़ का पाताल" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता उपन्यास  
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - पहाड़ का पाताल
लेखक      - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32
मूल्य       - 550/-
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‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार, ललित निबंधकार, कवि समीक्षक एवं लोकविद् डॉ. श्याम सुंदर दुबे ने। इससे पूर्व उनके दो और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं-‘‘दाखि़ल-ख़ारिज़’’ और ‘‘सोनाफूल’’।  
जब उपन्यास की किसी चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। उपन्यास को जो लोग मनोरंजन का साधन मानते हैं वे मानों उपन्यास की मूल शक्ति और अनिवार्यता से परिचित नहीं है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उपन्यास विधा को आधुनिक युग की देन माना है। उनके अनुसार,‘‘नए गद्य के प्रचार के साथ-साथ उपन्यास प्रचार हुआ है। आधुनिक उपन्यास केवल कथा मात्र नहीं है और पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं की भांति कथा-सूत्र का बहाना लेकर उपमाओं, रूपकों, दीपकों और श्लेषों की छटा और सरस पदों में गुम्फित पदावली की छटा दिखाने का कौशल भी नहीं है। यह आधुनिक वैक्तिकतावादी दृष्टिकोण का परिणाम है।” आज हिन्दी में भी उपन्यास विधा पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं के समानांतर वर्तमान संदर्भों पर भी समुचित ध्यान देती है।
‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’
उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनर्भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।
विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि  ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’
यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’
इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।
उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनिसर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।
व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’
उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट का भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।
उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जनम दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’  
‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरुप हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं पठनीय है।      
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Wednesday, September 8, 2021

चर्चा प्लस | यह ज़ुनून है, प्रेम तो हरगिज़ नहीं | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस           
यह ज़ुनून है, प्रेम तो हरगिज़ नहीं
       - डाॅ शरद सिंह
इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक नहीं
चंद लम्हों में फ़ैसला न करो।
शायर सुदर्शन फ़ाकिर का यह शेर प्रेम की गंभीरता को बयान करता है। लेकिन इन दिनों प्रेम के नाम पर जो घटनाएं सामने आ रही हैं, उन्हें पढ़-सुन कर विश्वास होने लगता है कि वह जो कुछ भी हो मगर प्रेम तो हरगिज़ नहीं हो सकता। प्रेम में प्रेमी तो अपनी जान देने को तैयार रहते हैं लेकिन अगर कोई प्रेमी उस लड़की की जान ले ले जिससे वह प्रेम करने का दावा करता है तो यह प्रेम नहीं जुनून ही कहा जाएगा।    
     

बरसों पहले एक फिल्म देखी थी ‘‘लव स्टोरी’’। कुमार गौरव और विजेयता पंडित उसके हीरो-हिरोईन थे। उस फिल्म की पूरी कहानी तो अब मुझे याद नहीं है लेकिन उसमें एक सीन था जो मुझे उस समय भी अच्छा नहीं लगा था। कुमार गौरव और विजेयता पंडित एक ही हथकड़ी से बंधे होते हैं और विजेयता पंडित गुस्से में पत्थर से हथकड़ी तोड़ने का प्रयास करती है। पत्थर धोखे से कुमार गौरव के हाथ में लग जाता है और वह चोटिल होकर विजेयता पंडित के गाल पर एक थप्पड़ जड़ देता है। इससे पहले की फिल्मों में मैंने यही देखा था कि नायक स्वयं चाहे कितना भी कष्ट उठा ले पर नायिका पर कभी हाथ नहीं उठाता था। पहली बार ऐसा दृश्य किसी फिल्म में मैंने देखा था। यह कोई अच्छा दृश्य नहीं था। यदि उस समय तक दोनों में प्रेम नहीं भी था तो भी किसी लड़की पर बिना सोचे-समझे हाथ उठाना सरासर गलत लगा था मुझे। लेकिन अब तो एक तरफा कथित प्रेम के भयावह परिणाम सुनने को मिलने लगे हैं। भला यह कैसा प्रेम कि आप आपने प्रिय को ही मार डालें?

सागर नाम के हमारे इस विकासशील शहर में विकास की गति भले ही धीमी हो लेकिन अपराध के नए नमूने ने शहर को चैंका दिया। घटना इस प्रकार है कि सागर शहर में रहने वाले एक लड़के ने पड़ोस में रहने वाली लड़की को एक तरफा प्रेम के चलते उस समय गोली मार दी जब वह कॉलेज से लौटकर अपने घर जा रही थी। गोली लगने से लड़की की मौके पर ही मौत हो गई। बीच सड़क पर लड़की को गोली लगने से वहां दहशत का माहौल हो गया। घबरा कर स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस बल मौके पर पहुंची और सड़क पर लहूलुहान पड़े किशोरी के शव को कपड़े से ढंका गया। लड़की के भाई ने बताया कि आरोपी कई दिनों से बहन को परेशान करता था। जिसकी थाने में शिकायत भी की थी। इसी वजह से वह दुश्मनी रखने लगा था। उस लड़के पर छेड़छाड़ का मामला पहले से ही दर्ज है। इसे एक तरफा प्रेम नहीं एक तरफा जृनून ही कहा जाना चाहिए। प्रेम में हिंसा की कोई जगह नहीं होती है। जहां हिंसा की भावना है, वहां तय है कि प्रेम हो ही नहीं सकता है। किसी को जबर्दस्ती पाने की लालसा रखने और किसी को प्रेम करने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ होता है। प्रेम हिंसा नहीं समर्पण मांगता है। प्रेम में दुख देने नहीं अपितु सुख देने की भावना होती है।
सागर जैसे सौहाद्र्यपूर्ण, शांत शहर के लिए यह अपने-आप में (मेरी जानकारी में) पहली घटना है। लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह की घटनाएं यदाकदा पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। 27 दिसम्बर 2017 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में ग्यारहवीं में पढ़ने वाली एक नाबालिग को गोली मार दी गई। गोली मारने करने वाला 16 साल का किशोर था और वह पिछले 3 महीनों से लड़की को अपने प्रेम प्रस्ताव से परेशान कर रहा था। लड़की इंटर कॉलेज में ग्यारहवीं की छात्रा थी। आरोपित पीड़िता का पड़ोसी था। जब लड़की स्कूल जा रही थी तो रास्ते में लड़के ने उसे रोकने का प्रयास किया। जब लड़की नहीं रुकी तो आरोपित ने देशी तमंचा निकाला और उसके पेट से सटाकर गोली चला दी। इसी तरह 19 फरवरी 2021 को जौनपुर में बाइक सवार युवक ने एक शिक्षिका को गोली मारने के बाद खुद को भी गोली मार ली। मामला एक तरफा प्रेम का बताया गया। कहा गया कि शिक्षिका ने उसका प्रेम प्रस्ताव मानने से इंकार कर दिया जिससे उसने यह जघन्य अपराध कर डाला। भला यह कैसा प्रेम जिसका अंत हिंसा से हो, अपराध से हो।
हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि प्रेेम एक संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’ वहीं प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’
प्रेम की परिभाषा बहुत कठिन है क्योंकि इसका सम्बन्ध अक्सर आसक्ति से जोड़ दिया जाता है जो कि बिल्कुल अलग चीज है। जबकि प्रेम का अर्थ, एक साथ महसूस की जाने वाली उन सभी भावनाओं से जुड़ा है, जो मजबूत लगाव, सम्मान, घनिष्ठता, आकर्षण और मोह से सम्बन्धित हैं। प्रेम होने पर परवाह करने और सुरक्षा प्रदान करने की गहरी भावना व्यक्ति के मन में सदैव बनी रहती है। प्रेम वह अहसास है जो लम्बे समय तक साथ देता है और एक लहर की तरह आकर चला नहीं जाता। इसके विपरीत आसक्ति में व्यक्ति  पर प्रबल इच्छाएं या लगाव की भावनाएं हावी हो जाती हैं।
ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

प्रेम बलात् नहीं पाया जा सकता। दो व्यक्तियों में से कोई एक यह सोचे कि चूंकि मैं फलां से प्रेम करता हूं तो फलां को भी मुझसे प्रेम करना चाहिए, तो यह सबसे बड़ी भूल है। प्रेम कोई ‘एक्सचेंज़ आॅफर’ जैसा व्यवहार नहीं है कि आपने कुछ दिया है तो उसके बदले आप कुछ पाने के अधिकारी बन गए। यदि आपका प्रेम पात्र भी आपसे प्रेम करता होगा तो वह स्वतः प्रेरणा से प्रेम के बदले प्रेम देगा, अन्यथा आपको कुछ नहीं मिलेगा। बलात् पाने की चाह कामवासना हो सकती है प्रेम नहीं। यदि प्रेम स्वयं ही अपूर्ण है तो वह प्रसन्नता, आह्ल्लाद कैसे देगा? प्रेम तो पूजा की तरह, इबादत की तरह होता है। मंज़र लखनवी के शेर हैं-
दुनिया कहे कुछ है मगर  ईमान की  ये बात
होने की  तरह  हो  तो  इबादत है  मोहब्बत
है जिनसे उन आंखों की कसम खाता हूं ‘मंजर’
मेरे  लिए   परवाना-ए-जन्नत  है  मोहब्बत

सूफ़ी संत रूमी से जुड़ा एक किस्सा है कि शिष्य ने अपने गुरु का द्वार खटखटाया। गुरु ने पूछा कि ‘‘बाहर कौन है?’’ शिष्य ने उत्तर दिया-‘‘मैं।’’ अस पर भीतर से गुरू की आवाज आई ‘इस घर में मैं और तू एकसाथ नहीं रह सकते।’’ यह सुन कर दुखी होकर शिष्य जंगल में तप करने चला गया। साल भर बाद वह फिर लौटा। द्वार पर दस्तक दी। फिर वही प्रश्न किया गुरु ने-‘‘कौन है?’’ इस बार शिष्य ने जवाब दिया- ‘‘आप ही हैं।’’ और द्वार खुल गया।
संत रूमी कहते हैं- ‘प्रेम के मकान में सब एक-सी आत्माएं रहती हैं। बस प्रवेश करने से पहले मैं का चोला उतारना पड़ता है।’ इस बात को उन युवाओं को विशेष रूप से समझना चाहिए जो एक तरफा प्रेम को अपना अधिकार समझने लगते हैं और चाहते हैं कि उन्हें प्रेम है तो लड़की भी उन्हें प्रेम करे। अब ये ज़रूरी तो नहीं। जब प्रेम हठधर्मिता बन जाए तो वह प्रेम नहीं रहता। यही हठधर्मी भावना अपराध की भावना को जन्म देने लगती है। जबकि इस तरह का कोई भी अपराध दो परिवारों का सुख-चैन छीन लेता है। जो लड़की अपराध की शिकार होती है उसका परिवार तो दुख से टूटता-विखरता ही है, साथ ही उस लड़के के परिवार पर भी मुसीबत टूट पड़ती है जिसने लड़की पर प्राणघातक हमला किया होता है। वह लड़का पकड़े जाने पर जेल भेज दिया जाता है। वहीं, उस लड़के का पूरा परिवार जीवन भर के लिए पुलिस, कचहरी और कानून के चक्कर में फंस जाता है। कवि रहीम कहते हैं कि जिस प्रेम में देने के बदले में लेने की भावना हो, वह प्रेम सराहनीय नहीं हैे। असली प्रेम तो वह है, जिसमें प्राणों की बाजी तक लगा दी जाती है। यह सोचें बिना, कि हार होगी या जीत, व्यक्ति प्रेम के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है। वह यह आशा नहीं रखता कि उसके द्वारा सब कुछ न्योछावर कर देने के बदले में प्रेमी उसके लिए कितना और क्या करेगा । वह बदले में किसी भी चीज की आशा नहीं रखता। प्रेम का असली स्वरूप यही है, जहां प्रेमी निस्वार्थ भाव से अपने प्रेमी के लिए प्राण तक न्यौछावर कर देता है। युवाओं को कवि रहीम के इस दोहे से सबक लेना चाहिए कि -
यह न रहीम सराहिये, लेन देन की प्रीति।
प्राणन बाजी राखिए, हार होय कै जीति।।

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(सागर दिनकर, 08.09.2021)
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Tuesday, September 7, 2021

बुंदेली व्यंग्य | पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन | डॉ शरद सिंह | पत्रिका में प्रकाशित

आज 07 सितंबर 2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन" प्रकाशित हुआ ..आप भी पढ़ें..आंनद लें..😄
#ThankYou #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य
पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       "काए नोने भैया, किते जा रहे हैं?" सामने नोने भैया खों देख के मोसे पूंछे बिना न रहो गओ। काए से के नोने भैया की सुबो तो ग्यारा-बारा बजे होत है औ आज बे मोए सुबो साढ़े छह बजे जात लो दिखाने।
"अरे कहूं नई, इतई लो।" नोने भैया टालत भए बोले।
"इतई कितई? औ जे मूंड़ पे गमछा बांध रखो है, टुकनिया सोई लिए हो...का माटी खोदबे के लाने जा रए? मनो, अबे छबाई-लिपाई खों टेम सो आओ नइयां औ तुमने कुदाली भी नई रखी है...सांची-सांची बताओ के कहां जा रए?" मैंने सोई पीछा ने छोड़ी।
"अरे कहूं नईं, इतई हारे लों जा रए!" नोने भैया खों बतानई पड़ी।
"हारे? काए के लाने हारे जा रए? अबई सो बेर-मकोय खों सीजन नइयां, फेर तुम काए के लाने जा रए भुनसारे से?" मैंने पूछी।
"अरे, तुमाई भौजी सो ठेन कर रई कल्ल रातई से।""
"काए के लाने ठेन कर रईं?"
"अरे, बा ने जब से सुनी है के रसोई गैस के दाम पच्चीस रुपइया बढ़ गए, तभई से घरे रार मची है।" नोने भैया ने बताई।
"भौजी खों कौन ने बताई?" मैंने पूछी।
"हमई ने बताई, और कौन बताता? कल्ल रात हमने तुमाई भौजी से कह दई के गैस को उपयोग तनक सम्हर-सम्हर के करियो, काए से के गैस के दाम पच्चीस रुपए बढ़ गए हैं। हमने इत्ती कही के तुमाई भौजी सो बमक गईं। कहन लगीं के और कित्तो सम्हारें, जित्तो खाना बनने है, उत्तो तो बनहे ई। कहो तो खाना बनाना छोड़ दें । सो, हमने उनखों समझाई के परमेसरी, हमाओ मतलब जो न हतो। हमने तो खबर पढ़ी, सो तुमे सुना दई। ईपे बे बोलीं, सुनो अब इत्ती मैंहगी गैस में तो हमसे खाना ने पकाओ जेहे। सो, हमने पूछी के काए हम ओरन खों भूको मारबे को बिचार बना रईं का? सो, बे बोलीं, काए भूको मारहें हमाई तुम ओरन से कौनऊ दुस्मनी है का? अरे , हम तो जे कह रै के कल्ल भुनसारे उठ जइयो और हारे से चूल्हा में जलाबे जोग लकड़ियां ले आइयो।" नोने भैया ने बताई।
"मगर हारे में बे जंगल विभाग वारों ने लकड़ियां कान ने दईं, सो का कर हो?" मैंने पूछी।
 "हऔ, सो जेई तो हमने तुमाई भंजी से कही, परमेसरी बे जंगल विभाग वारे लकड़ियां ने काटन देहें। सो, बे बोलीं के हमने कब कही के तुमें लकड़ियां काट के लानी है? उते से बीन के लाइयो और एक टुकनियां संगे ले जइयो ताकि उते गोबर के कंडा-मंडा मिलें सो संगे बीन लाइयो। अब बिन्ना, हमें तुमाई भौजी खों हुकुम सो बजानेई है।" नोने भैया गहरी सांस लेत भए बोले।
"भैया, गलत नई कही भौजी ने। अब जेई तो करने पड़हे। गैस के दाम हर महीना पच्चीस-पच्चीस रुपइया बढ़हें, सो सबई जनन खों हारे जाने पड़हे। बाकी तुम तो जे सोचो भैया के हारे में तुमें सुद्ध हवा मिलहे। जोन से तुमाई सेहत अच्छी रैहे। तुम तो इको पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन मानो, रामधई!" मैंने नोने भैया खों समझाओ।
"हौ बिन्ना, सो संगे चलो तुम सोई।" नोने भैया हंसत भए बोले, "जे मंहगाई डायन जो न कराए सो कम है...।"
"गलत कै रए भैया, मंहगाई डायन नई, पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन!!!" मैंने नोने भैया खों याद दिलाओ और बे हंसत भए चल पड़े हारे लकड़ियां-कंडा बीनबे के लाने।
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पुस्तक समीक्षा | जीवन-अनुभवों का काव्यात्मक प्रतिबिम्ब है ‘‘निर्मल नाद’’ | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 07.09. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि निर्मल इटोरिया के काव्यसंग्रह "निर्मल नाद" की  समीक्षा...

आभार दैनिक "आचरण" 🙏


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पुस्तक समीक्षा
जीवन-अनुभवों का काव्यात्मक प्रतिबिम्ब है ‘‘निर्मल नाद’’ 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - निर्मल नाद
कवि        - निर्मल इटोरिया
प्रकाशक    - सुविधा प्रकाशन, घंटाघर, दमोह (म.प्र.)
मूल्य       - 150/-
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‘‘निर्मल नाद’’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो कवि के अपने जीवन के अनुभवों से गुज़रता हुआ इतिहास और वर्तमान के महत्वपूर्ण तथ्यों का लेखाजोखा प्रस्तुत करता है। हिन्दी साहित्य के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह का कहना है कि -‘‘जब कविता समय को पढ़कर उसे लेखबद्ध करने लगती है तो वह अपने समय की प्रतिनिधि कविता होती है।’’ कवि निर्मल इटोरिया के काव्य संग्रह ‘‘निर्मल नाद’’ में संग्रहीत उनकी काव्य रचनाएं भी उनके समय की प्रतिनिधि रचनाएं कहीं जा सकती हैं।
25 जनवरी 1938 को दमोह में एक व्यवसायी परिवार में जन्मे निर्मल इटोरिया ने 23 अगस्त 2013 को देह त्याग कर इस संसार से विदा ले लिया था। मृत्यु के पश्चात साहित्यकार नन्दलाल सिंह ने बड़े यत्न से उनकी ग़ज़लें, मुक्तक और कुण्डलिया छंद के छक्के एकत्र किए, सहेजे और उसे काव्य संग्रह का स्वरूप प्रदान किया। इस काव्य संग्रह को प्रकाशित कराने में निर्मल इटोरिया के पुत्रद्वय गिरीश एवं तरुण का योगदान महत्वपूर्ण है। क्योंकि आज के संवेदनहीन हो चले और पारिवारिक टूटन के दंश झेलते समय में पिता के जीवनकाल में ही पुत्र उनसे विमुख होने लगते हैं। अपने माता-पिता को ‘‘ओल्ड ऐज़ होम’’ भेजने के स्वप्न देखने लगते है, ऐसे समय में पुत्रों द्वारा अपने दिवंगत पिता की काव्य रचनाओं को संग्रह के रूप प्रकाशित कराना उल्लेखनीय बात है। ‘‘निर्मल नाद’’ निर्मल इटोरिया की तीसरी कृति है। इससे पूर्व उनके जीवनकाल में उनका मुक्तक संग्रह ‘‘चिड़ियों के सुरों में बांचता हूं मैं’’ तथा ग़ज़ल संग्रह ‘‘नज़दीक सबेरे हैं’’ प्रकाशित हुआ था।
‘‘निर्मल नाद’’ काव्य संग्रह दो कारणों से महत्वपूर्ण कृति है। पहला कारण कि इसमें सहेजी गई ग़ज़लें, मुक्तक एवं छंद कथ्य और काव्यात्मकता की दृष्टि से गंभीर संवाद करने में सक्षम हैं। दूसरा कारण यह है कि इस संग्रह के आरम्भ में कवि निर्मल इटोरिया के ‘‘मेरा जीवन: मेरा लेखन’’ शीर्षक उस लेख को शामिल किया गया है जो उन्होंने सन् 1998 को अपने साठ वर्ष की आयु पूरी होने पर लिखा था। इस लेख में उन्होंने अपने जन्म से साठ वर्ष की आयु तक के अपने अनुभवों को संक्षेप में लिखा है किन्तु संक्षिप्त होते हुए भी यह लेख अपने आप में एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन गया है। इस लेख में उनकी बाल्यावस्था के अनुभव हैं जिनमें वे लिखते हैं कि उनके पिता भागचंद जी गांधीवादी आंदोलन से जुड़ गए थे और प्रतिदिन चरखा चलाते थे। लेकिन फिर वे सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित इंडियन नेशनल आर्मी के एक समर्पित सैनिक बने। उस समय बालक निर्मल इटोरिया आई.एन.ए. की बाल शाखा में जाने लगे। वे लिखते हैं कि -‘‘15 अगस्त 1947 के स्वाधीनता समारोह में आई.एन.ए. के स्थानीय उच्च सैन्य अधिकारी श्री हरपाल सिंह जी ने मुझे टंडन बगीचा से लाल घोड़े पर बिठा कर सारा शहर घुमाया था।’’
इसी तरह अपने अनेक अनुभवों को साझा करते हुए कवि इटोरिया ने 1 अप्रैल 1970 की उस घटना की भी चर्चा की है जब डाकू मूरत सिंह ने उनके भाई का अपहरण कर लिया था और 54 दिन बाद बामुश्क़िल रिहा किया। जिससे नई पीढ़ी को तत्कालीन बुंदेलखंड में व्याप्त दस्यु-समस्या की गंभीरता का पता चल सकता है। कवि इटोरिया ने ओशो साहित्य पढ़ा। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय के अपने अध्ययनकाल के दौरान आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, डाॅ नामवर सिंह, डाॅ भटनागर और डाॅ बाबूराम सक्सेना से संपर्क का भी उल्लेख किया है। कवि इटोरिया के सारे अनुभव तत्कालीन समाज, राजनीति एवं साहित्यिक परिदृश्य से बखूबी परिचित कराते हैं। यही वह तत्व है जो इस काव्य संग्रह की महत्ता को द्विगुणित कर देता है।
कवि निर्मल इटोरिया की हिन्दी में लिखी गई ग़ज़लों में उर्दू शब्दों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग है। जो कि शुद्ध और यथोचित है। उन्होंने बड़े बहर और छोटे बहर दोनों तरह की ग़ज़लें लिखी हैं। आमतौर पर माना जाता है कि छोटे बहर की ग़ज़ल कहना कठिन काम होता है। लेकिन कवि इटोरिया ने छोटे बहर में भी दिलचस्प ग़ज़लें कही हैं। जैसे एक ग़ज़ल है जो उन्होंने अपने साठ वर्ष की आयु पूर्ण होने पर गोया खुद को चुटकी लेते हुए लिखी थी। स्वयं पर व्यंग्य करना सरल नहीं होता। इस ग़ज़ल के कुछ शेर देखिए-
‘‘निर्मल’’ भाई साठ के।
फिर भी उल्लू काठ के।
गली-गली  में  गूंजते
चर्चे  उनके  ठाठ  के।
घोबी  के  गदहे  बने
घर के रहे न घाट के।

स्वयं को अपने चुहल का निशाना बनाने से बेशक़ वे नहीं हिचके, लेकिन ऐसा करते हुए जिस मासूमियत से उन्होंने ग़ज़ल लिखी, उसे पढ़ कर मुस्कुराए बिना नहीं रहा जा सकता है-
दिल दिया आशिक का, बनियों के यहां पैदा किया।
या इलाही !  तूने  मेरे  साथ  ऐसा  क्यों  किया।
आदतें  दीं   बादशाहों  की,   फ़क़ीरी  साथ  दी
हमने  तो  तारीख़ में  अक़्सर  ये  देखा  वाक़िया।

इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसके जीवन में कभी न कभी दुरूह कठिनाइयां नहीं आई हों। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह कठिनाइयों का किस प्रकार सामना करता है। कवि इटोरिया ने अपने जीवन में कभी कठिनाइयों से हार नहीं मानी। यही बात उन्होंने अपनी इस ग़ज़ल में भी अभिव्यक्त की है, वे लिखते हैं कि -
कहकहे  मेरे  थम  नहीं पाये।
चाहे जीवन में लाख ग़म आये।
मेरी  मस्ती  में  नहीं  कोताही
रुपये-पैसे  भले ही कम आये।

एक सफल व्यवसायी और एक सजग साहित्यकार के रूप में देश के राजनीतिक उतार-चढ़ाव पर सदा उनकी गहरी दृष्टि रही। विशेषता यह कि राजनीति में जो बात उन्हें खटकी उस पर अपनी ग़ज़लों के माध्यम से वे उलाहना देने से नहीं चूके। ऐसा करते समय उनके तेवर स्व. दुष्यंत कुमार त्यागी से कम नहीं दिखते। उनकी यह ग़ज़ल देखिए-
नागफनी  बेखटके  तख़्तनशीन है।
फूल जेल में बंद, वाह क्या सीन है।
रेंग  रहे  हैं  सांप  सेंट्रल हाॅल में
सम्प्रदाय की खूब बज रही बीन है।

इसी तीखे तेवर की एक और उदाहरण देखिए जिसमें कवि इटोरिया के बेबाक उद्गार समाए हुए हैं। ऐसे उद्गार जिनमें आमजन की पीड़ा और आमजन के साथ किए जाने वाले छल-कपट पर तीखा कटाक्ष है-
बदन की झुर्रियों में  दर्द की तहरीर लिक्खी है।
सभी को क़ैद, सबके हाथ में जंजीर लिक्खी है।
हंसी की चिलमनों में जख़्म दिल के ढांपने वालों
तेरे चेहरे पे तेरी  हू-ब-हू  तासीर  लिक्खी है।
जिसे ताउम्र  तू  देता  रहा  फूलों के गुलदस्ते
तेरी गरदन पे तेरे दोस्त की  शमशीर रक्खी है।

अव्यवस्था के विरुद्ध अपना काव्यात्मक हस्ताक्षर करते हुए वे अपने साथी कवियों साहित्यकारों को भी झकझोरते हैं और आह्वान करते हैं कि हर ग़लत का विरोध करना ज़रूरी है। उनके ये शेर देखें-
सुर्खरू लपटों की, तुम अंगार की कविता लिखो।
आज के इस दौर में,  इंकार की कविता लिखो।
खूब कविता लिख चुके हो ज़न्नतों की, स्वर्ग की
अब यही मौजूं है, तुम संसार की कविता लिखो।

कवि निर्मल इटोरिया ने जिस वज़नदारी से ग़ज़लें लिखीं उसी वज़नदारी से मुक्तक भी लिखे। उदाहरण के लिए उनका यह मुक्तक -
अब  बग़ावत  ही   बचा है  रास्ता
कोशिशों से कुछ  नहीं हासिल हुआ।
खूब  बहसें   गर्म   संसद  हाॅल में
एक ही मसला न अब तक हल हुआ।

जहां तक कवि निर्मल इटोरिया के कुंडलिया छंद के छक्कों की बात है तो वे भी अव्यवस्थाओं, चाटुकारी, ग़लत परम्पराओं एवं राजनीति-समाज में आने वाली दुरावस्थाओं पर उंगली उठाते हैं-
बैठ गये हैं  मंच  पर   ऐसे  ओछे  लोग।
बने चिकित्सक जो स्वयं, हैं संक्रामक रोग।।
हैं  संक्रामक  रोग, चोर  दरबान  बने हैं।
जज वे, अपराधों में  जिनके  हाथ सने हैं।।
मगर ज़ुल्म  की  उम्र नहीं  लम्बी होती है।
विप्लव  होते  हैं  जब  मानवता  रोती है।।

‘‘निर्मल नाद’’ काव्य संग्रह की भूमिका साहित्यकार एवं पत्रकार नन्दलाल सिंह ने लिखी है तथा कवयित्री सुसंस्कृति परिहार द्वारा कवि इटोरिया को समर्पित एक कविता भी भूमिका के उपरान्त शामिल है। कुलमिला कर यह काव्य संग्रह जीवन-अनुभवों का काव्यात्मक प्रतिबिम्ब है जिसमें कवि निर्मल इटोरिया ने अपने अनुभवों के बहाने अपने समय को लिख दिया है। इस दृष्टि से निःसंदेह यह एक पठनीय काव्य संग्रह है जो अतीत की काव्यात्मक यात्रा कराने में सक्षम है।
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Thursday, September 2, 2021

चर्चा प्लस | राष्ट्रीय पोषण मास - लड़ाई जारी है कुपोषण से | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
राष्ट्रीय पोषण मास : लड़ाई जारी है कुपोषण से
- डाॅ शरद सिंह
    प्रति वर्ष 1 सितम्बर से 7 सितम्बर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है किन्तु इस वर्ष पूरा सितम्बर मास पोषण मास रहेगा। भारत जैसे विकासशील देश में कुपोषण की समस्या चुनौती भरी है। विशाल जनसंख्या, सीमित संसाधनों तथा आर्थिक भ्रष्टाचार के बीच का द्वंद्व समस्या को समूल समाप्त नहीं होने देता है। फिर भी प्रयास तो सतत जारी रहने चाहिए। इस बार की थीम भी यही है।        

 

भारत में 93.6 प्रतिशत बच्चों (6-23 माह) को पर्याप्त पोषक आहार नहीं मिल पाता है। यदि बच्चों को लंबे समय तक आवश्यक संतुलित आहार नहीं मिलता तो उनके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे वे आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। साथ ही आहार में पोषण की कमी शारीरिक और बौद्धिक विकास को भी प्रभावित करती है। इस साल राष्ट्रीय पोषण सप्ताह के लिए है- ‘‘कुपोषण से लड़ना जारी, पहले 1000 दिन फोकस’’।
राष्ट्रीय पोषण सप्ताह (एनएनडब्ल्यू), भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, खाद्य और पोषण बोर्ड द्वारा शुरू किया गया वार्षिक पोषण कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम पूरे देश में प्रतिवर्ष 1 से 7 सितंबर तक मनाया जाता है। पोषण सप्ताह मनाने का मुख्य उद्देश्य उत्तम स्वास्थ्य के लिए पोषण के महत्व पर जागरूकता बढ़ाना है, जिसका विकास, उत्पादकता, आर्थिक विकास और अंततः राष्ट्रीय विकास पर प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक वर्ष पोषण सप्ताह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाता है जिसमें इस अवधि के दौरान बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा और उनकी बेहतरी में उचित पोषण के महत्व के बारे में जन जागरूकता पैदा करने के लिए एक सप्ताह का अभियान चलाया जाता है। पोषण शिक्षा के द्वारा अच्छे स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 1982 में केन्द्रीय सरकार द्वारा पहली बार इस अभियान की शुरुआत की गयी क्योंकि राष्ट्रीय विकास के लिये मुख्य रुकावट के रुप में कुपोषण है। इसी लक्ष्य के लिये लोगों को बढ़ावा देने के लिये, खाद्य और पोषण बोर्ड की 43 ईकाई (महिला और बाल विभाग, स्वास्थ्य और एनजीओ) पूरे देश में कुशलता से कार्य कर रही है।
ज़मीनी सच्चाई एक अलग ही कहानी कहती है। उचित पोषण की कमी और भूख से होने वाली मृत्यु से जुड़े आंकड़े एक भयावह तस्वीर सामने रखते हैं। पोषण राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सन् 2020 के उत्तरार्द्ध में जारी तीन चैंका देने वाली रिपोटर््स सामने आई थीं जिनमें से एक नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) रिपोर्ट खुद भारत सरकार ने जारी की है। इस रिपोर्ट का पहला भाग 12 दिसंबर 2020 को जारी किया गया था। बाकी दो रिपोर्टों में से एक ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में जारी की गई। इसकी मान्यता पूरी दुनिया में है। इसे जर्मनी और आयरलैंड की दो नामी संस्थाएं संयुक्त तौर पर हर साल जारी करती हैं। तीसरी रिपोर्ट है- हंगर वॉच। जो भारत में काम कर रहे भोजन का अधिकार अभियान (राइट टू फूड कैंपेन) ने जारी की थी। इन तीनों रिपोर्टों का संकेत इस ओर था कि विश्व शक्ति बनने की चाह रखने वाले भारत में भूख आज भी सबसे बड़ी चिंता है।

हर साल खाद्य और पोषण बोर्ड राष्ट्रीय पोषण सप्ताह के लिए एक विषय को र्निदिष्ट करता है और देश के सभी चार क्षेत्रों में स्थित अपने 43 सामुदायिक खाद्य और पोषण विस्तार इकाइयों के माध्यम से कार्यशालाओं, क्षेत्र के अधिकारियों के उन्मुखीकरण प्रशिक्षण, जागरूकता सृजन का आयोजन करता है। सप्ताह के दौरान शिविर और सामुदायिक बैठकों का आयोजन किया जाता है। राज्य सरकारों, शैक्षिक संस्थानों और स्वयंसेवी संगठनों के संबंधित विभागों के सहयोग से कार्यशालाओं, व्याख्यान, फिल्म और स्लाइड शो, प्रदर्शिनयों का आयोजन करते हैं। शैक्षिक कार्यक्रमों के दौरान, स्वास्थ्य और पोषण के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसमें टीकाकरण, स्तनपान, स्वच्छता और स्वच्छता के सिद्धांतों, भोजन की तैयारी के दौरान पोषक तत्वों के संरक्षण सहित महत्व शामिल हैं।

ग्लोबल हंगरइंडेक्स 2020 - इस वैश्विक सूचकांक में दुनिया के 107 देशों में हुए इस सर्वेक्षण में भारत 94वें नंबर पर है, सूडान के साथ। यह स्थिति गंभीर स्तर की मानी जाती है। अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में भारत से कमजोर पाकिस्तान (88), नेपाल (73), बांग्लादेश (75) और इंडोनेशिया (70) जैसे देशों को हंगर- इंडेक्स में भारत से ऊपर जगह मिली। मतलब ये कि वहां हालात भारत से बेहतर हैं। हंगर-इंडेक्स में चीन दुनिया में सबसे संपन्न 17 देशों के साथ पहले नंबर पर है। अफगानिस्तान, नाइजीरिया और रवांडा जैसे गिनती के कुछ देश ही इस सूचकांक में भारत से पीछे हैं।

हंगर-वॉच की रिपोर्ट - भारत के 11 राज्यों में सर्वेक्षण के बाद राइड टू फूड कैंपेन ने यह रिपोर्ट जारी की। इसमें साल 2015 के बाद से 2020 तक भूख से कथित तौर पर हुई कम से कम 100 मौतों का भी जिक्र किया गया। रोजी-रोटी अधिकार अभियान के कार्यकर्ताओं ने झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के 3,994 लोगों से बातचीत कर यह रिपोर्ट तैयार की। इनमें शहरी और ग्रामीण दोनों आबादी को शामिल किया गया था। इस सर्वे में दावा किया गया कि लॉकडाउन के दौरान भारत के कई परिवारों को कई-कई रातें भूखे रह कर गुजारनी पड़ीं। इनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था। यह स्थिति लगभग 27 प्रतिशत लोगों की थी। लॉकडाउन से पहले जिन 56 प्रतिशत लोगों को रोज खाना मिलता रहा, उनमें से भी हर सात में से एक को सितंबर-अक्टूबर 2020 के महीने में कभी-कभी भूखे रहना पड़ा। लगभग 71 प्रतिशत लोगों के भोजन की पौष्टिकता में लॉकडाउन के दौरान कमी आई। इनमें से 40 प्रतिशत लोगों के भोजन की गुणवत्ता काफी खराब रही। दो-तिहाई लोगों के भोजन की मात्रा में कमी आई। 28 प्रतिशत लोगों के भोजन की मात्रा लॉकडाउन के बाद काफी कम हो गई है। लगभग 45 प्रतिशत लोगों को भोजन के लिए कर्ज लेना पड़ा। यह हालत सिर्फ निम्न आय वर्ग के लोगों की नहीं रही। 15,000 रुपये या इससे अधिक की मासिक आमदनी वाले 42 प्रतिशत लोगों को भी इस दौरान पहले की अपेक्षा अधिक कर्ज लेना पड़ा। इस सर्वे से यह भी पता चला है कि लॉकडाउन समाप्त होने का बावजूद आर्थिक संकट जारी है। यद्यपि लॉकडाउन के दौरान पीडीएस से मुफ्त मिले अनाज, मिड डे मील योजना के तहत मिले सूखा राशन और आंगनबाड़ी केंद्रों से मिली खाद्य सामग्री से लोगों को कुछ राहत अवश्य मिली।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे - भारत सरकार द्वारा 22 राज्यों में कराए गए इस सर्वेक्षण के परिणामों से पता चला कि देश में कुपोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। महिलाओं में एनीमिया की शिकायत आम है और बच्चे कुपोषित पैदा हो रहे हैं। इस कारण पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की लंबाई 13 राज्यों में सामान्य से कम है। 12 राज्यों में इसी उम्र के बच्चों का वजन लंबाई के अनुपात में सही नहीं है। यह सर्वे असम, बिहार, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, कर्नाटक, मिजोरम, केरल, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, हिमाचल प्रदेश, लक्ष द्वीप, दादरा एवं नगर हवेली और महाराष्ट्र आदि राज्यों के 6.1 लाख परिवारों के साथ किया गया था। सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार उम्र की तुलना में कम लंबाई वाले बच्चों की संख्या के मामले में बिहार 43 प्रतिशत, मेघालय के बाद देश में दूसरे नंबर पर है। गुजरात में यह आंकड़ा 39 प्रतिशत है। अर्थात् गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में बच्चों का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। वे कुपोषित हैं। इस कारण उनमें लंबाई कम होने की समस्या है। आयु के अनुपात से कम वजन वाले बच्चों की संख्या बिहार में सबसे अधिक 22.9 फीसदी है।
शिशु मृत्यु दर के मामले देश के अधिकतर राज्यों में कम हुए हैं। इसकी वजह टीकाकरण बताई गई है, लेकिन भूख और कुपोषण की स्थिति अभी चिंतनीय स्तर पर है। पोषण की कमी और बीमारियां कुपोषण के सबसे प्रमुख कारण हैं। अशिक्षा और गरीबी के चलते भारतीयों के भोजन में आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है जिसके कारण कई प्रकार के रोग, जैसे- एनीमिया, घेंघा व बच्चों की हड्डियां कमजोर होना आदि हो जाते हैं। कहते हैं कि पहला सुख निरोगी काया, अर्थात् जीवन का अगर सबसे बड़ा सुख कोई है तो वह है निरोगी रहना। लेकिन निरोगी रहने के लिए सबसे पहले खान−पान पर ध्यान देना जरूरी होता है। अगर आपके शरीर की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी होंगी तो कई बीमारियां आपको छू भी नहीं पाएंगी। लेकिन भारतवर्ष में बहुत से लोगों को शरीर की इन पोषण संबंधी जरूरतों के बारे में पता नहीं होता और इसलिए उन्हें जागरूक करने के लिए ही देश में हर साल एक से सात सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। लेकिन एक दिन, एक सप्ताह अथवा एक वर्ष पोषण संबंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस दिशा में लगातार प्रयास किए जाते रहने की आवश्यकता है।
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(सागर दिनकर, 02.09.2021)
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