Thursday, July 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

किसां के ‘‘सम्राट‘‘ कहाबे वारे प्रेमचंद जू को जनम जेई जुलाई मईना में 31 तारीख को 1880 में भओ रओ। उनको असली नांव धनपत राय हतो। उन्ने पैले नवाब राय के नांव से उर्दू में लिखो। काए से के ऊ टेम पे उर्दू ज्यादा चलत्ती। बे ओई नांव से लिखत रैते मनो एक सल्ल बींध गई। भओ का के उन्ने एक किताब लिखी जीको नांव हतो ‘‘सोजे वतन’’। बा 1909 में कानपुर के जमाना प्रेस से छपी रई। कोनऊं ने अंग्रेजन से कै दई के ‘‘सोजे वतन’’ में तो उनके खिलाफ लिखो गओ आए। फेर का हतो, ‘‘सोजे वतन’’ की कापियां जब्त कर ली गईं। जा दसा देख के ‘‘जमाना’’ अखबार के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने धनपतराय खों सलाय दई के उने अब नवाबराय के नांव की जांगा प्रेमचंद के नांव से लिखो चाइए। तभईं से धनपतराय प्रेमचंद के नांव से लिखन लगे। हम सबई जानत आएं के प्रेमचंद जू ने भौतई नोंनो साहित्य रचो। उन्ने किसानों की दसा पे किसां लिखीं। मजदूरन की दसा पे कलम चलाई औ लुगाइयन औ बच्चों पे भी किसांएं लिखीं, जैसे ‘‘बड़े घर की बेटी’’, ‘‘बूढ़ी काकी’’ औ ‘‘ईदगाह’’। प्रेमचंद जू ने फिल्मों के लाने भी लिखो मनो उने ई समाज के कमजोर लोगन पे लिखबो अच्छो लगत्तो। काए से के कमजोर लोगन पे भौतई कम लिखो जा रओ हतो। प्रेमचंद खों लगत्तो के बे चाए धन से कमजोर होंए, चाए जात से, चाए लुगाई होबे के कारन कमजोर होंए, उनके बारे में लिखो जाओ चाइए, जीसें समाज के सोच में तनक बदलाव आए।
खास बात जे सोई आए के प्रेमचंद जू खों बुंदेलखंड को इतिहास औ इते के रीत-रिवाज भौतई नोंने लगत्ते। जेई से उन्ने दो किसां बुंदेलखंड पे लिखीं। ईमें एक रई ‘‘राजा हरदौल’’ औ दूसरी ‘‘रानी सारंध्रा’’।  

‘‘राजा हरदौल’’ की किसां बुंदेलखंड में खींबई कई-सुनी जात आए। जा किसां ओरछा के राजा जुझार सिंह की आए। जुझार सिंह राजा भले हते, मनों हते बे पूरे सक्की-झक्की। औ संगे कान के कच्चे। उनके लोहरे भैया हते हरदौल जू। अब दोई से जलबे वारन की का कई जाए? कोनऊं ने एक दार जुझार सिंह खों पट्टी पढ़ा दई के आप तो राजकाज में उरझे रैत आओ औ उते तुमाओ लोहरो भैया हरदौल अपनी भौजी संगे नैन मट्क्का कर रैत आए। अकल को अंधरा राजा ने इत्तो ने सोचो के जोन भैया अपनी भौजी खों मताई घांई पूजत आए बा उनके संगे नैन मटक्का कैसे करहे? मनो संका को बीजा मन में परो नईं के देखत-देखत ऊकी बेल लहलहान लगत आए। जेई भओ राजा जुझार सिंह के संगे। ऐ बेर बे क ऊं लड़बे खों गए। उते से लड़ाई जीत के लौटे के कोनऊं ने फेर के उनके कान भर दए। ऊपर से जे औ पेल दऔ के जो लौं लाला हरदौल रैहें तब लौं जे अत्तें चलत रैहें। जुझार सिंह सो हतोई संका को मारो, सो ऊने अपनी रानी खों बुलाओ औ उनसे कई के अपने हाथन से लाला हरदौल के लाने खीर पकाओ। औ जो तुमाए दिल में खोट ने होए तो ऊ खीर में जहर मिला के अपने हाथन से हरदौल खों खवा देओ। जा सुन के रानी रोन लगी औ कैन लगी के ‘‘आपखों लाज नईं आ रई ऐसो कैए में? अरे, लाला हरदौल हमाओ बेटा घांईं आए। आप एक मताई से कै रए के अपने बेटा खों जहर खवा देओ, कछू होस बी आए आपखों?’’ मनो संका को अंधरो राजा अपनी रानी की कां सुनता? ऊने कई के यां तो तुम हरदौल खों जहर खवाओ ने तो हम तुमें छोड़ रए। फेर तुमाई मुतकी बदनामी हुइए। रानी रोन लगीं। ऊके भीतर मातई को कलेजा दुखन लगो। जा बात हरदौल खों पता परी तो उन्ने रानी खों समझाओ के जे मां-बेटा की मर्जादा को सवाल आए सो आप खुसी-खुसी हमें जहर वारी खीर खवा देओ। फेर जेई भओ के रानी को अपने करेजा पे फथरा रख के अपने बेटा घांई हरदौल खों जहर खवाने परो। जे बी कओ जात आए के हरदौल जू खों पान में जहर मिला के खवाओ गओ रओ। सो प्रेमचंद जू ने जेई किसां लिखी आए के हरदौल जू खों पान में जहर दओ गओ रओ। हरदौल जू तो ने रए, मनो बे मर के बी अमर हो गए। उतई राजा जुझार सिंह खों इज्जत ने मिली। उने संकालू आदमियन में गिनो जात आए। जबके उतई रानी की बी तारीफ करी जात आए।

दूसरी किसां आंए ‘‘रानी सारंध्रा’’। जे सोई अपने बुंदेलखंड पे आए। रानी  सारंध्रा ओरछा के राजा चम्पत राय की रानी औ महाराज छत्रसाल की मताई हतीं। ई किसां में प्रेमचंद जू ने राजा चम्पत राय की खींबईं प्रसन्सा करी आए। उनसे मुगल हरें डरात्ते। बे मुगलों की सेना खों धूरा चटा देत्ते। ऊंसई बीर रईं उनकी रानी सारंध्रा। बे अपने दपति औ बेटों खों युद्ध के लाने भेजत समै अपनी आंखन में अंसुवां ने आन देत्ती। बे उन ओरन को तिलक करतीं औ तलवार देके बिदा करतीं। संगे कैत्तीं के ‘‘अब बुंदेलन की लाज तुम ओरने के हाथन में आए। प्रान जाए मनो लाज ने जाने दइयो।’’ जा बात प्रेमचंद जू ने बी लिखी आए। बे रानी सारंध्रा के चरित्तर से खींबई प्रभावित रए। औ होते काए नईं, आखिर रानी सारंध्रा ने अपने बालक छत्रसाल को ऐसो लालन-पालन करो रओ के आगे चल के छत्रसाल ने केवल राजा बने, बाकी उन्ने बुंदेलखंड राज्य बना डारो। उन्ने सोई मुगलन के दांत खट्टे कर दए रए।

सो प्रेमचंद जू ने बुंदेलखंड के इतिहास से उन लोगन पे किसां लिखी जोन से बुंदेलन को सिर ऊंचो होत आए। मने जां एक तरफी प्रेमचंद जू ने दुखियारे, सोषन के शिकार औ कमजोरन पे किसां लिखीं उतईं बुंदेलखंड के गौरव औ बीरन पे बी किसां लिखी। जे अपन बुंदेलों के लाने गरब की बात आए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास, ईकी संस्कृति कित्ती नोंनी आए के इत्ते बड़े किसां लिखबे वारे प्रेमचंद जू बी इते की किसां लिखे बिना ने रए सके। मनो उन्ने बी इते की मरजादा खों समझी औ ऊंसई नोंनी किसां लिखीं। सो, आप ओरें सोई जे दोई किसां पढ़ियो जरूर, ईंसे प्रेमचंद जू की लेखनी को औ महत्व समझ में आहे। प्रेमचंद जू के जनमदिन पे उनको याद करत भए सबई खों हमाई जै-जै!!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 29, 2026

चर्चा प्लस | प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  

प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति 

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

                                      

    प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना।


31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य का ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। प्रेमचंद ने ‘‘नवाबराय’’ के नाम से उर्दू में साहित्य सृजन किया। यह नवाबराय नाम उन्हें अपने चाचा से मिला था जो उनके बचपन में उन्हें लाड़-प्यार में ‘‘नवाबराय’’ कह कर पुकारा करते थे। किन्तु अंग्रेज सरकार के कारण उन्हें अपना लेखकीय नाम ‘‘नवाबराय’’ से बदलकर ‘‘प्रेमचंद’’ करना पड़ा। हुआ यह कि उनकी ’सोज़े वतन’ (1909, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर लीं। उर्दू अखबार “ज़माना“ के संपादक मुंशी दयानरायण निगम ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए ‘‘नबावराय’’ के स्थान पर ’प्रेमचंद’ लिखने लगें। इसके बाद वे ‘‘प्रेमचंद’’ के नाम से लेखनकार्य करने लगे। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।

‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया। जुझार सिंह मुगल शासक शाहजहां के समकालीन थे। वे साहसी थे, वीर थे किन्तु उनकी संदेही प्रवृत्ति उनके इन गुणों को लांछित कर गई। इस वास्तविक घटना का सारांश यह है कि जब जुझार सिंह अपने दक्षिण भारत के अभियान पर गए तब उनका छोटा भाई हरदौल अपनी भाभी रानी कुलीना के साथ राज्य सम्हाल रहा था। दोनों का रिश्ता माता-पुत्र जैसा था। किन्तु कुछ ईर्ष्यालुओं ने जुझार सिंह के वापस आते ही रानी और हरदौल के मध्य अनैतिक संबंधों की चर्चा कर के जुझाार सिंह को भ्रमित कर दिया। संदेही जुझार सिंह अपने भाई और अपनी पत्नी की पवित्रता को नहीं देख सका और उसने अपनी पत्नी रानी कुलीना को आदेश दिया कि वह अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए हरदौर को विष खिला दे। रानी स्तब्ध रह गई। अपने पुत्र समान देवर को जहर देना उसके लिए कठिन था। तब हरदौल ने अपनी भाभी को समझाया की सम्मान से बड़ा जीवन नहीं होता है, वे विष मिला भोजन परोस दें। अंततः रानी के द्वारा विष मिले भोजन को खा कर हरदौल ने अपना बलिदान दे दिया। यह भी कथा है कि जुझार सिंह ने रानी द्वारा भोजन में विष न दे पाने के कारण रानी से ही विष मिला पान का बीड़ा बनवा कर हरदौल को खिला दिया था जिससे हरदौल की मृत्यु हो गई थी। ओरछा में लाला हरदौल की समाधि आज भी मौजूद है और यह परम्परा है कि बुंदेलखंड में विवाह का पहला कार्ड लाला हरदौल का नाम लिख कर उनकी समाधि पर पहुंचाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से लाला हरदौल वधूपक्ष के घर वधू के मामा के रूप में आते हैं और विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होता है।   

प्रेमचंद ने पान में विष मिला कर देने की कथा को अपनी कहानी में पिरोया है। उन्होंने ‘राजा हरदौल’ कहानी इन पंक्तियों से आरम्भ की है, ‘‘बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।’’ 

वे बुंदेलों के चरित्र की विशेषताओं को सामने रखते हुए हरदौल की ओर से यह संवाद लिखते हैं कि ‘खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।’ वहीं जुझार सिंह युद्ध के लिए विदा लेते समय अपनी रानी से कहता है, ‘प्यारी, यह रोने का समय नहीं है। बुंदेलों की स्त्रियां ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।’ इसी कहानी में प्रेमचंद ने एक ऐसी स्त्री के मनोभावों को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो अपने पुत्र, अपने भाई सरीखे देवर को विष देने के लिए विवश की जा रही है- ‘‘ रानी सोचने लगी, क्या हरदौल के प्राण लूं? निर्दोष, सच्चरित्र वीर हरदौल की जान से अपने सतीत्व की परीक्षा दूं? उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूं जो मुझे बहन समझता है? यह पाप किसके सिर पड़ेगा? क्या एक निर्दोष का खून रंग न लाएगा? आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन? नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा। यदि राजा मुझे कुलटा समझते हैं, तो समझें, उन्हें मुझ पर संदेह है, तो हो। मुझसे यह पाप न होगा। राजा को ऐसा संदेह क्यों हुआ? क्या केवल थालों के बदल जाने से? नहीं, अवश्य कोई और बात है। आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया। राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी। क्या आश्चर्य है, हरदौल से कोई अपमान भी हो गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझ पर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदल जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुख कहूं? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।’’

बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारंधा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएं बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं।’ 

‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बंुदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। कहानी के आरंभ में ही वे लिखते हैं-‘‘ अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’’ प्रेमचंद ने बुंदेलखंड की स्त्री के आत्मसम्मान को बखूबी परखा और फिर उसे इन शब्दों में व्यक्त किया-‘‘ वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुन्देलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-बुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’’

प्रेमचंद ने रानी सारंधा की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए इस तथ्य को अपनी कहानी में सुंदर ढंग से पिरोया है कि रानी सारंधा ने राजा चम्पतराय के मन में स्वाभिमान को पुनःजाग्रत किया। उन्होंने लिखा है-‘‘ सारंधा-ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी। यहां मैं एक जागीरदार की चेरी हूं। ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं यहां मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियां बड़े महंगे दामों मोल ली हैं।’’ चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मां-बाप का बालक मां की चर्चा सुन कर रोने लगता है उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गयीं। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारंधा को हृदय से लगा लिया।’’

प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 29.07.2026 को प्रकाशित)  

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Tuesday, July 28, 2026

पर्यावरण और जीवन के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति में एक जुनून जागने की जरूरत है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, मुख्य अतिथि, पर्यावरण जीवन संरक्षण परिषद, सागर द्वारा आयोजित परिचर्चा समारोह

"पर्यावरण और जीवन के संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति में एक जुनून जागने की जरूरत है। जब हर व्यक्ति इस बात को समझेगा कि पर्यावरण और जीवन को नुकसान पहुंचा कर हम स्वयं के लिए कितना खतरा उत्पन्न कर रहे हैं तो वह जागरूक होगा और पॉलिथीन के उपयोग जैसे हर कार्य करना बंद कर देगा जिससे पर्यावरण और जीवन को चोट पहुंचे। इस प्रकार की परिचर्चा एवं संगोष्ठियों के द्वारा पर्यावरण और जीवन के प्रति जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सकता है यह एक सार्थक कदम है।" - कल बतौर मुख्य अतिथि मैंने पर्यावरण जीवन संरक्षण परिषद, सागर द्वारा आयोजित परिचर्चा समारोह में अपने विचार रखे। मैंने कहा कि "पर्यावरण और जीव संरक्षण एक ऐसा  ज्वलंत  विषय है जिस पर गंभीरता से बार-बार विचार करने की आवश्यकता है।"
     परिचर्चा समारोह की अध्यक्षता की सेवानिवृत्त फॉरेस्ट कंजरवेटर (IFS) बी पी उपाध्याय जी ने। विशिष्ट अतिथि थीं श्रुतिमुद्रा सांस्कृतिक समिति सागर की अध्यक्ष डॉ. कविता शुक्ला जी।
      पर्यावरण जीवन संरक्षण परिषद, सागर संस्था के अध्यक्ष एवं से. नि. सहायक वन संरक्षक आदरणीय आर सी चौकसे जी तथा संस्था के संरक्षक से.नि. सहायक वन संरक्षक आदरणीय पी एन मिश्रा ने जी श्यामलम संस्था के श्री उमाकांत मिश्र जी के सहयोग से इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस सफल आयोजन में सहभागी संस्थाएं थीं- भारत विकास परिषद सागर, राष्ट्रीय कल्चुरी परिषद सीहोर व सागर, सहज योग संस्था सागर तथा क्लीन सागर - ग्रीन सागर संस्था, सागर।
      सरस्वती वंदना की श्री मुकेश तिवारी जी ने तथा सफल संचालन किया श्री यू .एस.बी.गौर जी ने।
     इस आयोजन में शामिल होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई क्योंकि  पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति मैं अत्यंत संवेदनशील हूं तथा मैं हमेशा चाहती हूं कि उस पर चर्चा, विचार -विमर्श और चिंतन किया जाए ताकि हम सभी एक आम नागरिक की हैसियत से जलवायु परिवर्तन की गति को कम करने में अपनी भूमिका समझ सकें।   
   समारोह में श्री संतोष श्रीवास्तव 'विद्यार्थी', श्रीमती सुनीला सराफ, श्रीमती वर्षा जी, श्री हरि शुक्ला, श्रीसंतोष पाठक आदि बड़ीसंख्या में साहित्यकार एवं समाजसेवी उपस्थित थे।

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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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खंडकाव्य    - मंगा (बुंदेली बोली का हास्य प्रधान प्रथम खण्ड काव्य)
लेखक      - श्री बाबू लाल खरे
प्रकाशक    - स्क्राईब पब्लिकेशन्स 303, कुबेर हाउस 162, कंचनबाग, इन्दौर (म.प्र.)
मूल्य       - 150/-
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बुंदेली में वर्षों से प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है विशेष रूप से पद्य साहित्य। किंतु बहुत सा साहित्य ऐसा रहा जो प्रकाश में नहीं आ सका। डॉ बहादुर सिंह परमार जैसे मनीषी जो बुंदेली संस्कृति और भाषा के उत्थान में निरंतर लगे हुए हैं, उन्होंने बहुत से ऐसी  पांडुलिपियां ढूंढ निकालीं जो अप्रकाशित अवस्था में साहित्यकारों के वंशजों के पास मौजूद थीं। उनके वंशज नहीं जानते थे कि उस कृति को किस तरह से प्रकाशित किया जाए अथवा कई वंशजों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह साहित्य कितना महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार बुंदेली में लिखी गई कई पुस्तक ऐसी हैं जो प्रकाशित तो हुई किंतु जिन पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए थी अथवा वे पाठकों के हाथ में पहुंचनी चाहिए थी किंतु नहीं पहुंच सकीं। ऐसी ही एक पुस्तक की जानकारी मुझे पिछले दिनों प्राप्त हुई। अनायास शशी खरे जी जोकि रायपुर में निवासरत हैं और  स्वयं साहित्यकार हैं, उनसे मेरा संपर्क हुआ। चर्चा के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिताश्री ने बुंदेली में प्रथम हास्य खंडकाव्य लिखा था जो प्रकाशित भी हुआ। उसके कुछ अंश आकाशवाणी भोपाल से प्रसारित हुए। डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के प्राध्यापक डॉ बलभद्र तिवारी ने अपने ग्रंथ में उसका उल्लेख भी किया। फिर भी यह खंडकाव्य उतना चर्चित नहीं हो सका कितना कि उसे होना चाहिए था। दुर्भाग्य से पुस्तक प्रकाशित होने से पूर्व उसके रचनाकार दिवंगत हो गए, किंतु सुधि परिजन ने उस खंड काव्य को सुरुचि पूर्वक प्रकाशित कराया। खंडकाव्य का नाम है “मंगा”। 
 इस खंडकाव्य की विशेष बात यह भी है कि इसमें सागर की बुंदेली बोली का प्रयोग हुआ है क्योंकि रचयिता डॉ खरे सागर जिले के निवासी थे। श्री बाबू लाल खरे का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले की रहली तहसील में स्थित चरगुवां नामक एक छोटे से ग्राम में 11 नवम्बर 1917 को हुआ। पिता का नाम श्री भगवानदास तथा माता श्रीमती लक्ष्मीबाई था। धनाभाव तथा उस समय आसपास कोई उच्च शिक्षा की सुविधा वाले शिक्षालय के अभाव के कारण इन्हे ग्राम से दो मील दूर स्थित गौरझामर के मिडिल स्कूल में केवल सातवीं (हिन्दी) तक ही शिक्षा प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त हो सका। शिक्षाकाल में ये प्रायमरी से लेकर अन्त तक अपनी कक्षा में सदा प्रथम स्थान और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते रहे। सन् 1933 ई. में नार्मल स्कूल बिलासपुर की प्रवेश परीक्षा में सागर जिले से केवल दो छात्र चुने गए, जिनमें से एक बाबू लाल थे। प्रायमरी टीचर्स ट्रेनिंग परीक्षा में पूरे मध्यप्रदेश व बरार में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उन्होंने ‘‘स्पेन्स मैडल’’ प्राप्त किया। जून 1935 में थोड़े दिनों तक  मिडिल स्कूल तखतपूर (बिलासपुर) में, अगस्त 1936 से म्युनिसिपल प्राथमिक शाला देवालानाका सागर में और दिसम्बर 1936 में गवर्नमेन्ट केन्टोन्मेन्ट स्कूल नं. 1, सदर बाजार सागर में अध्यापक रहने के पश्चात् ये सन् 1948 में नार्मल स्कूल सागर के प्रेक्टिसिंग स्कूल में अधिपाठक के रूप में स्थानान्तरित हुए। सन् 1940 में पिता के स्वर्गवासी होने से एक बड़े परिवार के पालन और शिक्षण का भार इन पर आ जाने के कारण इन्हें अत्यधिक अर्थाभाव रूग्णता और चिन्ताओं से अत्यधिक कष्ट झेलना पड़े। तीन छोटे भाईयों और दो बहनों की शिक्षा तथा विवाह के उत्तरदायित्व से निवृत हो कर बाबू लाल खरे ने सन् 1949 से स्वध्यायी छात्र के रूप में विशारद तथा मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। फलतः नार्मल स्कूल में अध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली। इसके पश्चात् उन्होंने साहित्य रत्न तथा सागर विश्वविद्यालय से इन्टर, बी.ए. तथा एम.ए. की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन्टर तथा एम.ए. में इन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम तथा बी.ए. में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। सन् 1956 में एम.ए. करने के पश्चात् इन्होंने पी.जी.बी.टी. कालेज जबलपुर से वी.टी. (बेसिक) परीक्षा (सन् 1957) में सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों में प्रथम श्रेणी तथा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए उत्तीर्ण की तथा विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक प्राप्त किया। अगस्त 1957 में म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयन के उपरांत शासकीय महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर चयन हुआ। इसके उपरांत विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में असि. प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग के पद पर कार्य किया। कुछ अवधि के लिए शासकीय महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य भी किया। बाबू लाल खरे ने ‘‘रस सिद्धान्त की परम्परा तथा शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा’’ विषय पर विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के तत्कालीन उप-कुलपति डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन के मार्ग-दर्शन में शोध कार्य प्रारंभ किया। दुर्भाग्यवश जिसके पूर्ण होने के पूर्व ही बाबू लाल खरे का निधन हो गया।  बाबू लाल खरे  का खंड काव्य “मंगा”  हास्यरस का होते हुए भी सामाजिक यथार्थ  कुछ चुटीले अंदाज में सामने रखता है।  इस खंडकाव्य में मुहावरेदार भाषा का स्वरूप और सहज भावभिव्यंजना  अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। सन् 1946 में आरम्भ हुआ खंडकाव्य ‘‘मंगा’’ में 1972 तक कई और अध्याय जुड़ने के बाद पूर्ण हुआ। करीब साठ दशक पहले रचा गया यह हास्य खण्ड काव्य आज भी समसामयिक व सटीक लगता है। इसमें खांटी व्यंजनात्मकता है, शिष्ट हास्य है तथा बुंदेली रीति-रिवाज की आकर्षक झलक है। 
‘‘मंगा’’ कथा है, बुंदेलखंड के सीधे-साधे, ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े, आलसी, अनपढ़ इंसान मंगा की। मंगा मेहनत नहीं करना चाहता है लेकिन ज़िन्दगी आराम से गुजारना चाहता है। इसीलिए दो स्त्रियों का पति बन कर उनकी मेहनत व कमाई के बूते चैन की जिंदगी गुजारने की उसकी इच्छा उस पर भारी पड़ती है। अपनी दुर्दशा से उबर कर, सही राह पर, मंगा किस तरह आता है, यही इस काव्य का मूल कथानक है। इस काव्य में संवाद भी हैं जो हास्य रस उत्पन्न करने में सक्षम हैं। व्यंग भी है और छिपा संदेश भी। कई स्थानों पर तो पढ़ कर हंसी रोके नहीं रुकती है। बानगी देखिए -
काट कूट कें गऔ सपरबे 
नरवा में जब बौ बूड़ौ, 
हाँत पाँव गये ठिठुर
काए कै पानी तौ बिकटई जूड़ौं।
सपरखोर कें मंगा नें, 
चाही कै बजाएँ हम बाजौ,
ठिठुरे हाँ ता बजी नें चुटकी,
अरे राम, हो गऔ का जौ!
पानी में गिर गऔ-जान कें 
झार चुटैया सें छूटी, 
इत्ती महँगी चीज हिरानी 
अरे बाप! किस्मत फूटी।
(पृ 9)
अनाज समाप्त हो जाने पर आलसी मंगा से उसकी पत्नी मुलिया अनाज लाने को कहती है लेकिन मंगा उसकी अनसुनी कर देता है तब मुलिया उसे खरी-खोटी सुनाती है। इस दृश्य में एक स्त्री के सहज भाव हैं जो अलसी पति से तंग आ चुकी है-
मुलिया बोली, का कएं तुमसें, कैसें हम जे दिन काटें।
कौन करम के है, तुमखों का हम बैठे-बैठे चाटें।
पुरुष प्रधान समाज की इस विडम्बना को कवि ने बड़ी बारीकी से प्रस्तुत कर दिया है कि पुरुष चाहे काम करे या न करे, दोष स्त्री के सिर पर ही मढ़ा जाता है। इसीलिए मुलिया की बात सुन कर मंगा अकड़ दिखाते हुए कहता है-
मंगा बोलौ - इतै पेट में कूँदत खूब बिलैयें हैं।
तें बैठी है सास्तर पड़बे कैसीं बरै लुगैयें हैं!
पहर भरे सें चल रइ तोरे थूथर की पैनी कैंची।
भाजी सी पौलबे खंगी है सोचत नइँ ऊँची-नैंची ।।
मुलिया की गुस्साँ बड़ बैठी जो मंगा नें दै डाँटौ ।
रोउन लगी, कही मंगा नें-पटा डार तें तौ भाटौं ।।
गोरा नोंनें भलाँ लुगाईं उनकीं रोउत तौ नइयाँ ।
जब देखौ घूमत बजार में डारें बइँयाँ में बइँयाँ ।।
चुवन लगत हैं तोरे नैनाँ तनक-तनक सी बातों में।
अब जानी कै लातों की देवी नें मान है बातों में।।
(पृ 34)
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। जब मुलिया के पास दाल नहीं गलती है तो मंगा गंगिया के आगे हाथ फैलाता लेकिन सीधे-सीधे नहीं, वरन प्रेम जताने का नाटक करते हुए-
अरे, प्रेम के भूके हैं हम तौ, सुन ले मोरी गंगा!
छोड़ौ बातें, खाबे दे जो हो बै सो, - बोलौ मंगा ।।
पानी-पानी भई गंगिया सुन कें बातें भोरी-सीं ।
खुवा खूब पकवान, मिठाई बचत हती जो थोरी सी ।।
रहे कछू दिन इतै मजे में फ़िर आ गई फाँके-मस्ती ।
मंगा नें सोची कै- जा तौ जुगत मिली अच्छी सस्ती ।।
थोरौ-भौत कछू तौ मुलिया नें जोरौ हुइऐ अब लौं ।
उतै कछू दिन रहौ, गंगिया लैहै जोर कछू जब लौं ।।
सो गंगा सें लड़े और मुलिया के घर फिर कें आये।
ऐंसई पारी-पारी सें दोई के खूब प्रान खाये ।।
(पृ 60)
‘‘मंगा’’ एक ऐसा खंडकाव्य है जो प्रकाशित हो कर भी पर्याप्त चर्चा में नहीं आ पाया। किन्तु अच्छी कृति पानी की भांति देर-सबेर अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है। प्रकाशन के बाद नेपथ्य में अर्थात समय के पन्नों में दब जाने के बाद एक बार फिर ‘‘मंगा’’ ने पाठकों के घर के दरवाजे पर दस्तक दी है। बुंदेली को समृद्ध करने वाली यह कृति बुंदेली के हर पाठक के लिए रोचक एवं हास्य से भरपूर है। इसमें बुंदेली की सोधी महक है और मिठास के साथ मिलनसारिता भी है। इस खंड काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें हर पन्ने पर फुटनोट्स में बुंदेली के हिन्दी शब्दार्थ दिए गए हैं। बुंदेली साहित्य की समृद्धि को जानने के लिए स्व. बाबू लाल खरे की इस कृति को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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आचरण,  28.07.2026
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Saturday, July 25, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | तला में कूंदे से कछू हल निकलहे का, जिनगी इत्ती फालतू की नोंई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली

टाॅपिक एक्सपर्ट
तला में कूंदे से कछू हल निकलहे का, जिनगी इत्ती फालतू की नोंई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   अभईं चार दिनां पैले हम घूमबे के लाने तनक देर को कारीडोर पे गए रए। ऊ दिनां तनक उमस हती सो कारीडोर पे तला की हवा खा के अच्छो सो लगो। उते रेलिंग पे कछू दूर लौं जाली लगी दिखानी सो बतकाव होन लगी के लोग इते से तला में कूंद-कूंद के अपनी जान देन लगे जेई से जाली लगाने पर रई। कारीडोर से तला को देखबे को मजा खराब हो जाहे। सो, हमने कई के ईसे का, जो इते जाली लगाई जाहे सो कूंदबे वारे उते से कूंद जाहें। कूंदने वारन खों का? मनों बात तो जे आए के जान काए खों दई जाए? जिनगी इत्ती फालतू की आए का? अरे, सबई की जिनगी में कोऊ ने कोऊ दुख पीरा लगी रैत आए। कभऊं-कभऊं ऐसो समै बी आत आए जबें मरबे को जी करन लगत आए। हमाई जिनगी में बी ऐसो समै आओ रओ, कोरोना के टेम पे। मनों हमने सोची के हमाई मताई औ दीदी ने अपनी जिनगी लगा दई हमें खुसी से राखने खों, तो अब उन ओरन के ने रैने पे का हमें सोई मर जाने चाइए? उनके किए-धरे पे पानी फेर दओ चाइए? कभऊं नईं। हमाए ऐसो करे से उनें दुख हुइए, बे जां बी हुइएं। संगे हमने जेबी सोची के जो हमाई घड़ी आ गई होती तो कोरोना से हम सोई निपट गए होते। जो ऊपरवारे ने हमें छोड़ दओ तो कछू सोच के छोड़ी हुइए। औ सई में, हमने जीने की हिम्मत करी तो मुतके लोगन ने हमाओ साथ दओ। सो, खुद को मारबे से कछू नई मिलत। जो खुद पे भरोसो राखो औ जीबे की हिम्मत करो, लोगन से बात करो, सो बा दुख, पीरा औ मुसीबत पांछे छूटत जात आए। अब तनक सोचियो के तुमने तो तला में कुद्दी लगा दई औ मर गए, मनों तुमाए पांछू रै गए मताई,बाप, बैन,भाई तुमाए लानें कित्ते कलपहें? सो, बहादुरी मरबे में नोंईं जीबे में आए। सो तला खों सुसाइड प्वाइंट ने बनाओ औ बहादुरी से जिंदा रओ!
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बतकाव बिन्ना की | ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती, सई न! अब आप सोचहो के कोन टेम पे? हम कब की कै रए? ऊ टेम की जब हम बालपन में रए। ऊंसई बी बे ओरें सब जने हमाई बात समझ जैहें जोन के बालपन में मोबाईल औ टीवी ने रओ। ऊ टेम पे बच्चा हरों के मन बैलाओ के दोई तरीका हते। एक तो खेलबे को औ दूसरो किसां सुनबे को। सो, आज बतकाव खेलबे की। का होत्तो के स्कूल से लौट के दिन को उजियारा रैत भर तो हम ओरें खेलत रैत्ते, मनों संझा होतई सात हमें डांट-डपट के घर के भीतरे बुला लओ जात्तो। 
‘‘चलो हात-मों धो लेओ। कपड़ा बदल लेओ औ पढ़बे बैठ जाओ।’’ हम ओरें सबई खों अपने-अपने घरे जेई सुनबे को मिलत्तो। 
अब पढ़बे के लाने तो बैठनेई परत्तो। जो ने बैठते तो मताई चार लपाड़े सूंट देतीं। बाकी हमाई मताई ऐसी ने हतीं औ ने हम ऐसे हते के मताई को कओ ने मानें। सो हमें तो डांट ने घलत्ती, पर हमाए संगी साथियन में लड़का हरों खो जरूर घल जात्ती। ऊंसई बी बिटियां ऐंड़ ने देती हती, ऊ टेम पे तनक बिगरे मोड़ा हरें ई ऐंड़ देत्ते औ मताई-बाप से कुटत्ते। हमाओ बालपन तो सरकारी कालोनी में गुजरो, जिते छै मकान हते। सो हम छैओ मकान के मोड़ा-मोड़ी संगे खेलत्ते। ऊ टेम पे हम ओरों में कोऊ खों जे ने सूझत्तो के जे मोड़ा आएं औ जे मोड़ियां आएं। हम सबरे बच्चा एक संगे खेलत्ते। जेई से हम गुल्ली-डंडा, कंचा, काना-दुआ, लुका-छिपी, खिपड़ी गद्दा, कबड्डी, खो-खो, नदी-पहार, पुतरा-पुतरियां बगैरा, मने मोड़ा औ मोड़ियन दोई को खेल खेलत्ते। बा तो बाद में जब मोड़ा हरें तनक बड़े भए तो उनें किरकेट में मन लगन लगो औ हम मोड़ियां खिपड़ी गद्दा खेलत रईं। बाकी हमने किरकेट बी खेलो। पर ज्यादा नोंईं। काए से के मताई को डर हतो के कई हम अपनों मूंड़ ने फुड़वा लें। बाकी तनक बड़े होबे पे हमने सायकिल खूब चलाई।
लेकन हम बात कर रए हते बालपन के खेल की। औ जे हमें ईंसे याद आ रए के जबे पानी बरसत्तो औ हम सबई घर पे होत्ते तो कभऊं काना-दुआ खेलत्ते, तो कभऊं चपेटा खेलत्ते। ऊ टेम पे जा कैरम-फैरम बी सबके घरे ने होत्ते। काना-दुआ घांई एक-दो गेम औ होत्ते। एक में तो गुना को आकार की लकीरें खेंची जात्तीं औ ऊमें आड़ी लकीरें सोई भरी जात्तीं। लकीरन के हर जोड़ पे गोटियां धरी जात्तीं। इमली के बीजा की चइयां से गोटिया चलाई जात्तीं। जो वारो गेम बे ओरें बी खेलत्ते जोन गइयां-बुकरियां चराबे के लाने हारे जात्ते। ई गेम को हम नांव भूल रए। जो कोनऊं खों याद आए सो हमें बताइयो। 
चपेटा खेलबे के लाने लाख के बने रंग-गिरंगा चपेटा उंगरियन से तौल-तौल के लए जात्ते। भारी चपेटा अच्छे माने जात्ते। मनों बे कभऊं जो उल्टे हात पे गिरत्ते तो उंगरियां ठन्ना जात्तीं। सो, मोए हरये चपेटा नोंने लगत्ते। घरे भीतरे बैठ के सांप-सीढ़ी खेलबे में बी खूबई मजो आउत्तो। मनो ऊ टेप पे मूंड़ भिन्ना जात्तो जबे निन्यानबे पे पौचों औ सांप के मों में पौंच के सूदे नीचे दस्सी पे आ गिरो। ऊ टेम पे बा सांप-सीढ़ी को आबिस्कार करबे वारे खों गरियाबे को जी करत्तो। अब इत्ते से गेम में इत्तो लंबो सांप बनाबे की का जरूरत हती? तनक छोटो सो सांप बना देते तो उनको का बिगर जातो? रस्ता में सो ऊंसई मुतके सांप मिलत्ते। खैर, अब हम तो ने बदल सकत्ते ऊकी डिजाइन। बाकी आतो भौत मजो रओ। 
एक और इनडोर गेम रओ जी को नांव हतो लंगड़ी-धप्पा। जे बरांडा औ आंगन , ने तो छतों पे खेलो जात्तो। ई में कम से कम आठ घर, ने तो दस-बारा जित्ते चाओ उत्ते घर बनाए जात्ते औ ऊपे हर घर में एक टांग से उचकत भए बा खिपरिया सरकानी रैत्ती जो खेल सुरू होबे पे फेंक के घरे डारी जात्ती। अब सोचो तो लगत आए के ऊ टेम पे सरीर कित्तो हरय रओ के फुदकत से उचकत रैत्ते जैसे लंगड़ी दुआ-छुअब्बल में होत्तो। अब तो दोई टांग से उत्तो नईं उचक सकत, एक की तो छोरो। औ जो कऊं कोसिस कर के देखी तो कओ घूंटा पिरान लगे।  
कंचा बी बड़े औ छोटे दोई किसम के होत्ते। रामधई! कंचा सो कभऊं दिमाग से निकरई ने पाओ। काए से के जब बी कभऊं कोनऊं के आफिस में कांच को पेपरवेट दिखानो तो हमें बालपन के कंचा याद आने लगत्ते। कंचा खेलबे में भी बड़े नियम-कायदा रैत्ते। कंचा को उंगरिया से चटका के घुच्चू में डारो जात्तो। जोन को कंचा घुच्चू में चलो गओ, बा जीतो कहात्तो औ जोन को कंचा घुच्चू से बायरे रै जात्तो ऊको उंगरिया से ठेल-ठेल के कंचा को घूच्चू में डारबे की कोसिस करने परत्ती। औ कऊं तब बी ने डार पाए तो एक टेम ऐसो आत्तो जबे हात की कोहनी से कंचा धकिया के घूच्चू में डारने परत्तो। ई चक्कर में कोहनी छिल जात्ती। घुच्चू में डारबे से पैले एक कंचा से दूसरो कंचा सोई पीटो जात्तो। औ जो हार गए सो अपनो कंचा जीतबे वारे को देने परत्तो। अब तो कंचा खेलबे वारे गांव-दिहात में ई दिखात आएं। बा बी भौतई कम। काए से के अब तो बच्च हरें बी मोबाईल में जुटे रैत आएं। 
गिल्ली डंडा सोई भौतई मजे को गेम रओ। दोई तरफी से नुक्कीदार गिल्ली औ एक से डेढ़ फुट को डंडा। देखो जाए तो ऊको मजा किरकेट से कम नईं रओ। औ किरकेट घांई ऊमें बी दूसरी टीम के बच्चा हरें घेर के ठाड़े रैत्ते। फेर जैसई गिल्ली उचकाई जात्ती ऊंसई ऊको लोकबे के लाने सबरे दौर परत्ते। सो उचकाबे वारो कोसिस करत्तो के ऊ तरफी गिल्ली उचकाई जाए जी तरफी कोऊ लोकबे वारो ने होए। कोऊ-कोऊ सिक्सर लगाबे वारी स्टाईल में गिल्ली खों सूंटत्ते। ईंसे उनकी गिल्ली तो कोऊं ने लोक पाउत्तो, मनों उनकी गिल्ली उते से गुजरबे वारों के कभऊं मूंड़ में घलत्ती तो कभऊं कोनऊं के घरे की खिरकी के कांच फोड़त्ती। ऊके बाद तो आप समझतई हो के का होत रओ हुइए? गुल्ली डंडा के बदले महाभारत होन लगत्ती। यां तक तो ठीक आए मनो एक-दो बेर तो ऐसो भओ के कोनऊं के आंख में घली औ ने तो मूंड़ फूटो। जेई सब से बाद में हमाई मताई ने हम ओरन खों गुल्ली-डंडा खेलबे की मनाई कर दई रई। दूसरे की आंख फूटे सो सल्ल औ अपनी फूटे सो सल्ल। 
अब का आए के बच्चा हरें मोबाईल औ लेपटाप पे गेम खेलत एक जांगा बैठे दिखात आएं। ने तो रील देखत रैत आएं। औ मताई-बाप सोई मोबाईल में जुटे रैत आएं सो बे बी जा नईं देख पाऊत आएं के उनको बच्चा ठलुआ बनो जा रओ। जोन उमर में कूंद-फांद के सरीर बनाओ चाइए ऊ उमर में एक जांगा पे पसरे रैबे से का हुइए? फेर होत का आए के जब उनई मोड़ा-मोड़ी को हारमोन बदलत आए तो उने समझ में आन लगत आए के हमें तो स्लिम औ सुंदर दिखने, सिक्स पैक बनाने। सो, बे पिल परत आएं जिम जा के। फेर भले चाए कछू हो जाए। उतई दूसरी बात के जब मोबाईल पे सब कछू बनो-बनाओ देख लेओ तो अपने लाने सोचबे को कछू नईं रै जात। मने कल्पना करबे की सक्ती नईं रै जात। पर का करो जाए, समै तो बदलत आए। जो समै को नियम आए। अब समै के संगे कछू नओ, कछू पुरानो ले के चलो तो सब ठीक रैहे। औ सम्हर के ने चलहो सो ने तो हम का उखार लेबी?      
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती। जे सोई बताइयो के आप ओरन ने अपने बालपन में इनमें से कोनऊ खेल खेलो के नईं? औ हां, जो गेम हमेंयाद ने आए बे सोई याद दिला दइयो। जै-जै!!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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