Wednesday, May 20, 2026

चर्चा प्लस | अब जरूरी है आमजन को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
अब जरूरी है आमजन को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
     मौसम में अनियमितताएँ, नई बीमारियों का फैलना, बदलते मौसमी चक्रों का अनाज उत्पादन पर बुरा असर, इंसानों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में बदलाव आदि कुछ ऐसे संकेत हैं जो मानव जीवन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से होने वाले खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं। इसके बावजूद, आम नागरिक अभी भी जलवायु परिवर्तन के बारे में सोचते भी नहीं हैं, क्योंकि उन्हें जलवायु परिवर्तन और इसके खतरनाक प्रभावों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसलिए, आम नागरिकों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़ी साक्षरता सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
पर्यावरण के सभी हिस्सों में से, जलवायु का मानव जीवन पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। क्योंकि जलवायु का इंसानों के पहनावे, खाने-पीने की आदतों, जीवनशैली और जन-स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत में कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जलवायु में होने वाले बदलावों से सबसे ज़्यादा प्रभावित होती है। जलवायु हमारे जीवन के लगभग हर पहलू पर असर डालती है - हमारे भोजन के स्रोतों से लेकर हमारे परिवहन के बुनियादी ढांचे तक, हम कैसे कपड़े पहनते हैं, और हम छुट्टियों पर कहाँ जाते हैं, इन सभी पर। इसका हमारी आजीविका, हमारे स्वास्थ्य और हमारे भविष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जलवायु किसी खास जगह पर मौसम की स्थितियों का लंबे समय तक बना रहने वाला पैटर्न है। इसके अलावा, जलवायु प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई मानवीय गतिविधियों जैसे उद्योग, व्यापार, परिवहन और संचार प्रणाली आदि पर भी असर डालती है।

जलवायु परिवर्तन में इतनी शक्ति है कि यह लोगों के जीवन को तबाह भी कर सकता है और बेहतर भी बना सकता है। समय-समय पर इसके प्रभावों के बारे में कई भविष्यवाणियाँ की गई हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों पर 2018 की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन भूख और विस्थापन का एक मुख्य कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 और 2050 के बीच, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले कुपोषण, मलेरिया, दस्त और बढ़ती गर्मी की वजह से होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि होगी। कई कॉर्पाेरेट संस्थानों, अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों आदि ने लोगों के बीच जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता पैदा करने की पहल की है। इन सबके बावजूद, जिस गति से काम होना चाहिए, उस गति से काम नहीं हो रहा है। सरकारी प्रयासों में गरीबी उन्मूलन, स्वच्छता, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों को प्राथमिकता दी जा रही है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों की कमी के कारण ही केरल में बाढ़ आई थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव भारत सहित कई विकासशील देशों पर ज़्यादा पड़ेंगे। विश्व बैंक का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन अगले तीस वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद  को 2.8 प्रतिशत तक कम कर देगा, और देश की लगभग आधी आबादी के जीवन स्तर में गिरावट का कारण बनेगा। इस संदर्भ में, स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या वे लोग जो जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना रखते हैं, इसके बुरे प्रभावों के बारे में जागरूक हैं? क्या उन्हें पता है कि यह बदलाव उनके स्वास्थ्य, आजीविका, उनके परिवारों और समुदायों के जीवन पर किस तरह असर डालने वाला है?

     यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यह पूरी तरह से असंभव नहीं है। जब मिलकर प्रयास किए जाते हैं, तो ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है। इसके लिए, व्यक्तियों और सरकारों, दोनों को ही इसे हासिल करने की दिशा में कदम उठाने होंगे। हमें ग्रीनहाउस गैसों को कम करने से शुरुआत करनी चाहिए। इसके अलावा, उन्हें पेट्रोल की खपत पर भी नज़र रखनी चाहिए। हाइब्रिड कार का इस्तेमाल शुरू करें और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करें। साथ ही, नागरिक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर सकते हैं या मिलकर कारपूल कर सकते हैं। इसके बाद, रीसाइक्लिंग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब आप खरीदारी करने जाएं, तो अपना कपड़े का थैला साथ ले जाएं। आप एक और कदम उठा सकते हैं, वह है बिजली का इस्तेमाल सीमित करना, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन रुकेगा। सरकार की ओर से, उन्हें औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण रखना चाहिए और उन्हें हवा में हानिकारक गैसें छोड़ने से रोकना चाहिए। पेड़ों की कटाई तुरंत बंद होनी चाहिए और पेड़ लगाने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। संक्षेप में, हम सभी को यह समझना चाहिए कि हमारी पृथ्वी की हालत ठीक नहीं है। इसे इलाज की ज़रूरत है और हम इसे ठीक करने में मदद कर सकते हैं। आज की पीढ़ी को ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कष्ट न उठाना पड़े। इसलिए, हर छोटा कदमकृचाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, बहुत मायने रखता है और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में काफी महत्वपूर्ण है।
हालाँकि, हमारे देश ने हमेशा जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता दिखाते हुए वैश्विक स्तर पर पहल की है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों के साथ मिलकर ‘‘लाइफ़’’ नाम से एक आंदोलन शुरू किया, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर अपनाए जा रहे बेहतरीन तरीकों को बढ़ावा देकर लोगों और समुदायों के बीच जलवायु- अनुकूल व्यवहार परिवर्तन के समाधानों को बढ़ावा देना है। ‘‘लाइफ़’’ अभियान का यह विचार भारत के प्रधानमंत्री ने 2021 में ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2026 के दौरान प्रस्तुत किया था। इसके तहत, पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली को बढ़ावा देने के उपायों का विस्तार किया जाएगा और संसाधनों की अंधाधुंध खपत और बर्बादी के बजाय संसाधनों के सावधानीपूर्वक और विवेकपूर्ण उपयोग पर ज़ोर दिया जाएगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘‘लाइफ़’’ का विज़न एक ऐसी जीवनशैली अपनाना है जो हमारे ग्रह के साथ सामंजस्य में हो और उसे कोई नुकसान न पहुँचाए। जो लोग ऐसी जीवनशैली अपनाते हैं, उन्हें ‘‘ग्रह-अनुकूल लोगों’’ का दर्जा दिया जाता है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘‘मिशन लाईफ अतीत से प्रेरणा लेकर और वर्तमान में कार्रवाई करके भविष्य पर ध्यान केंद्रित करता है। ‘‘कम करना, दोबारा इस्तेमाल करना और रीसायकल करना’’  हमारे जीवन के मूल सिद्धांत हैं। चक्रीय अर्थव्यवस्था हमारी संस्कृति का केंद्र है, और भारत का वन क्षेत्र बढ़ रहा है; साथ ही शेर, बाघ, तेंदुए, हाथी और गैंडों की आबादी भी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि स्थापित बिजली क्षमता का 40प्रतिशत तक हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित स्रोतों से आ सकता है। अपने लक्ष्य तक पहुँचने की भारत की प्रतिबद्धता निर्धारित समय से नौ साल पहले ही पूरी हो गई है।’’

जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार हैं तो मैं चाहती हूँ कि हम अपनी अगली पीढ़ी को एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी सौंपें, ताकि पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनी रहे। भारतीय संस्कृति ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ की विचारधारा पर आधारित है, यानी पूरी पृथ्वी ही हमारा परिवार है। मैं हमेशा अपने प्राचीन ग्रंथों से उन सांस्कृतिक मूल्यों को चुनकर लोगों को याद दिलाने की कोशिश करती हूँ, जिनमें पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संरक्षण का ज़िक्र है। हमारी भारतीय संस्कृति दुनिया की दूसरी सभ्यताओं के मुकाबले प्रकृति के प्रति ज़्यादा विचारशील रही है। आज भी, हम सब कुछ सही करना चाहते हैं, लेकिन उसे सही ढंग से कर नहीं पाते। मैं आपको अपने ही एक फ़ैसले का उदाहरण देकर यह बात समझाती हूँ। यह फ़ैसला लेते समय मुझे दुख हुआ, लेकिन मैं मजबूर थी। तब मैंने खुद को दिलासा दिया कि जब भी मुझे मौका मिलेगा, मैं अपना फ़ैसला बदल लूँगी। फिर भी, मन में एक कसक सी रह गई है।
हुआ यूँ कि मैंने एक स्कूटर खरीदने का फ़ैसला किया। मैं एक इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदना चाहती थी। इस तरह मैं जीवाश्म ईंधन की बर्बादी से बच सकता था और पर्यावरण को भी जीवाश्म ईंधन से होने वाले प्रदूषण से बचा सकता था। जब मैंने इलेक्ट्रिक स्कूटरों के बारे में पूछताछ शुरू की, तो मुझे पता चला कि जहाँ पेट्रोल से चलने वाले स्कूटर 1 लाख रुपये तक में मिल रहे थे, वहीं इलेक्ट्रिक स्कूटरों की शुरुआती कीमत ही 1.5 लाख रुपये थी। अगर किसी अच्छी कंपनी के इलेक्ट्रिक स्कूटर में लगी बैटरी को पाँच साल बाद बदलना पड़े, तो उसमें 25-30 हज़ार रुपये का खर्च आएगा। अच्छी बात यह थी कि बिजली का खर्च पेट्रोल के खर्च से कम पड़ने वाला था। लेकिन मेरे शहर में उस समय चार्जिंग स्टेशन थे ही नहीं। अगर मैं घर पर स्कूटर चार्ज करना भूल जाऊँ और बीच रास्ते में ही ‘‘लो-बैटरी’’ का सिग्नल मिलने लगे, तो मैं कहाँ जाऊँगी और उसे कैसे चार्ज करूँगी? क्या मुझे किसी के दरवाज़े पर जाकर उनसे यह गुज़ारिश करनी पड़ेगी कि वे मुझे अपना स्कूटर चार्ज करने दें? या फिर मुझे अपने स्कूटर को वहाँ से किसी दूसरे वाहन पर लादकर ले जाने का इंतज़ाम करना पड़ेगा। यह एक बहुत ही व्यावहारिक बात है। स्कूटर बेचने वाले लोग इस बारे में बात करना बिल्कुल पसंद नहीं करते। अगर हम फिर भी उनसे इस बारे में बात करते हैं, तो वे हँसकर कहते हैं कि ‘‘यह एक छोटा शहर है, यहाँ ऐसी कोई समस्या कभी पैदा नहीं होगी।’’ ज़ाहिर है, अगर घर से निकलने से पहले कार को पूरी तरह चार्ज कर लिया जाए, तो ऐसी कोई दिक्कत नहीं आएगी। हर समय इतना ज़्यादा चौकन्ना रहने की ज़रूरत नहीं है। यहाँ मैं किसी भी ईवी बनाने वाली कंपनी, किसी ईवी एजेंसी या उनके सेल्सपर्सन पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहती। इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। वे भी ईवी के पक्ष में हैं, ताकि सड़कों पर प्रदूषण-मुक्त गाड़ियाँ चल सकें। अगर कोई गलती है, तो वह हमारे सिस्टम की धीमी रफ़्तार है। जिस तेज़ी से बाज़ार में ईवी गाड़ियाँ उतारी गई हैं, उस तेज़ी से चार्जिंग स्टेशन नहीं बनाए गए हैं। मेरे शहर जैसे छोटे शहरों में एक-दो साल पहले तक कोई चार्जिंग स्टेशन नहीं था। गाँवों में चार्जिंग स्टेशन लगाने में अभी भी काफ़ी समय लगेगा। 

मैंने व्यावहारिक रूप से सोचा और अपने लिए एक पेट्रोल से चलने वाला स्कूटर खरीद लिया। इसे खरीदते समय मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं अपने सिद्धांतों को तोड़ रही हूँ। जैसे मैं कोई अपराध कर रही हूँ। लेकिन मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। गाड़ी चाहे कोई भी हो, दिन या रात में किसी भी समय उसकी ज़रूरत पड़ सकती है। 

इन सब बातों का मतलब यह है कि हम जलवायु परिवर्तन की जिस तेज़ी से हो रहा है, और हम जिस उत्साह से उसकी रफ़्तार धीमी करना चाहते हैं, उन दोनों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को कम करने के लिए हमें अपने प्रयासों में व्यावहारिक रूप से तेज़ी लाने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी जिस चीज़ की कमी है, वह है आम लोगों के बीच पर्याप्त जागरूकता लाना। जब तक हर नागरिक जलवायु संरक्षण के बारे में जागरूक नहीं होगा, तब तक सभी प्रयासों की गति धीमी ही रहेगी। अब वह समय आ गया है, जब आम लोगों को यह पता होना चाहिए कि यदि ध्रुवों पर मौजूद ग्लेशियर तेज़ी से पिघलते हैं, तो इसका असर हर इंसान, हर जानवर और हर पौधे पर पड़ता है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 20.05.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, May 19, 2026

बोध कथा | पहले मन को करो चंगा - शरद सिंह | नया हिन्दुस्तान


आज "नया हिन्दुस्तान" समाचारपत्र में ...

हार्दिक आभार नया हिन्दुस्तान एवं सामयिक प्रकाशन 🙏

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बोध कथा | पहले मन को करो चंगा

- शरद सिंह

गुरु नानक देव किशोरावस्था में संतों की सेवा करते समय खाना-पीना तक भूल जाते थे। इससे उनकी सेहत गिरने लगी। वे दुबले हो गए। पुत्र की ऐसी दशा देख कर उनके पिता ने गांव के सबसे योग्य वैद्य हरिदास को बुलाया।

     वैद्य गुरु नानक देव की नाड़ी देखने लगे। जब उन्होंने वैद्य से पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो वैद्य ने जवाब दिया कि वे उनकी नाड़ी की गति से उनके रोग का पता लगा लगा रहे हैं। इससे उनका सही इलाज हो सकेगा। नानक साहब ने वैद्य से कहा कि उनका शरीर बीमार नहीं है। हां, अगर उनका मन बीमार हो, तो क्या वे उसका इलाज कर देंगे? वैद्य उनकी बात समझ नहीं पाया और उन्हें फटी हुई आंखों से देखने लगा। यह देख गुरु नानक ने वैद्य से कहा कि पहले वे अपने तन-मन का इलाज करें।

     यह सुन कर वैद्य ने गुरु नानक से कहा कि वे यह क्या कह रहे हैं। उन्हें तो कोई बीमारी नहीं है। वे तो एकदम स्वस्थ और प्रसन्न हैं। उन्हें लगा कि ऐसा कहकर बालक नानक उनका अपमान कर रहे हैं।

     गुरु नानक देव ने शांत स्वर में फिर कहा, 'वैद्यजी, आप अत्यंत गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।'

बताओ 'मैं, और गंभीर बीमारी से पीड़ित हूं? यह तुम क्या कह रहे हो?' वैद्य को क्रोध आ गया। 'मैं सच कह रहा हूं।' गुरु नानक देव ने कहा। 'ऐसा है, तो कि मुझे कौन-सी बीमारी है?' वैद्य ने पूछा।

'वैद्यजी, आपको जन्म और मृत्यु की चिंता की बीमारी है। जन्म और मृत्यु की चिंता से बड़ी बीमारी इस दुनिया में दूसरी नहीं है। इस बीमारी का इलाज नब्ज देख कर नहीं किया जा सकता है। इस बीमारी को दूर करने की औषधि भी आपके औषधि विज्ञान के पास नहीं है।' गुरु नानक देव ने कहा।

वैद्य उनकी तरफ देखने लगे। गुरु नानक ने वैद्य से कहा, 'मन स्वस्थ हो, तो तन की बीमारी शीघ्र दूर हो सकती है, किंतु यदि मन अस्वस्थ है, तो तन की बीमारी लाख उपाय करने पर भी दूर नहीं की जा सकती। मन की बीमारी मृत्यु के भय से पैदा होती है और मृत्यु होने के भय से ही बढ़ती जाती है। यह भय ईश्वर रूपी चिकित्सक की शरण में जाने पर ही दूर हो सकता है।'

गुरु नानक देव की बात सुन कर वैद्य हरिदास की आंखें खुल गईं। उसे अपनी नासमझी पर लज्जा आई। उन्होंने उनके पिता से कहा, 'भाई मेहता कालू, आपका पुत्र सच कह रहा है कि मुझे तन की बीमारी दूर करने का ज्ञान तो है, किंतु मन की बीमारी दूर करने का ज्ञान नहीं है। आपको अपने पुत्र के विषय में चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह बीमार नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रेम में डूबा हुआ है। यह तन और मन दोनों की बीमारी का इलाज है।' इसके बाद पिता मेहता कालूराय अपने पुत्र गुरु नानक देव के भक्तिपूर्ण व्यवहार के प्रति चिंतित होने के बदले गर्व का अनुभव करने लगे।

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(साभारः 'श्रेष्ठ सिख कथाएं', सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली)


पुस्तक समीक्षा | नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - एक दीप और जलाना
कवि      - बद्रीलाल ‘दिव्य’
प्रकाशक - साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर
मूल्य - 200/- 
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आज मानव समाज के सामने सबसे बड़ा संकट है बाजारवाद का और बाजारवाद की मूल प्रवृत्ति होती है मनुष्य के भीतर भौतिक वस्तुओं को पाने की अदम्य में लालसा को जगा देना। जब मनुष्य ‘‘और-और-और’’ पाने की लालसा के शिकंजे में फंस जाता है तो फिर उसे गलत और सही में अंतर दिखाई देना बंद हो जाता है। फिर ठीक यहीं से भ्रष्टाचार का आरंभ होता है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति ने व्यवस्थाओं को दीमक की तरह धीरे-धीरे खोखला कर दिया है। यदि एक स्थान से भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास किया जाए तो दूसरे स्थान पर उसकी लकीरें दिखाई देने लगते हैं। आज लगभग हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को भूलकर दूसरे के हिस्से का सब कुछ हड़प कर जाना चाहता है। देखा जाए तो यह एक निराशाजनक स्थिति है। घोर निराशा के अंधकार में हर संवेदनशील व्यक्ति आशा की किरण देखना चाहता है। साहित्य की किसी भी विद्या से जुड़ा व्यक्ति संवेदनाओं से सरोकार रखता है और जो संवेदनाओं से सरोकार रखता है वह सदा मानव हित, जनकल्याण और देश की प्रगति के बारे में चिंतन मनन करता है। इसीलिए कवि अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन व्यवस्थाओं को चुनौती देते हुए ये पंक्तियां कही थीं-
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, 
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, 
गीत नया गाता हूं।

विपरीत परिस्थितियों में नए गीत गाने का हौसला उस कवि में बखूबी पाया जाता है जो दूसरों की पीड़ा से द्रवित होता है और देश में खुशहाली लाने की प्रबल इच्छा रखता है। कोटा राजस्थान के कवि बद्रीलाल मेहरा ‘दिव्य’ इसी प्रकार के कवि हैं जो अंधकार में आशा का दीप जलाकर प्रकाश बिखरने की अभिलाषा रखते हैं। उनका काव्य संग्रह “एक दीप और जलाना” निराशा से उपजी आशावादी कविताओं का संग्रह है। कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ मूलत: राजस्थानी उपभाषा के कवि हैं। किंतु हिंदी में भी उनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 

“एक दीप और जलाना” काव्य संग्रह में कुल 41 कविताएं हैं। संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. (डॉ.) अनिता वर्मा ने लिखा है कि “कवि बद्री लाल ‘दिव्य’ ने अपनी अनुभूतियों के साथ जीवन के विविध रंग महसूस किए हैं, देखें है। उसकी चेतना का संसार अब व्यक्तिगत न होकर संसार का है। वह अपनी संवेदनाओं, दृष्टि की व्यापकता में सबको समाहित कर लेता है। यही सृजन की सार्थकता और सृजन का उद्देश्य है। प्रस्तुत कविताओं में जीवन के विविध रंग बिखरे पडे हुए हैं। जिनमें प्रेम, आत्ममंथन, द्वन्द्व, प्रकृति, पर्यावरण, आमजन, सभी को केन्द्र में रखकर कवि की चेतना का विस्तार विविध स्वरूपों व मनोभाव के साथ उद्घाटित हुआ है।”

   वहीं कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ ने अपने संग्रह की कविताओं के बारे में लिखा है कि ‘‘एक दीप और जलाना’’ मेरा आठवाँ काव्य संग्रह है। हम दीपावली पर लाखों दीप जलाते है लेकिन कभी-कभी एक छोटा-सा दीप उन दीपों की महत्ता में चार चांद लगा देता है। इस काव्यं संग्रह के लेखन के पीछे मेरा मूल उद्देश्य यही है कि देश में शान्ति और सद्भावना रूपी दीप जले ताकि देश में एकता स्थापित हो सके। भले ही देश में सत्य अहिंसा, भाईचारा, मानवता, आदि के लाखों दीप सजे हो, उनमें शान्ति और सद्भावों का एक दीप भी जरूरी है।” कवि की यह सद्भाव पूर्ण आकांक्षा उनके इस संग्रह का मूल तत्व है। संग्रह की पहली कविता ही इस बात का साक्क्ष्य प्रस्तुत करती है जिसका शीर्षक है “हम दीपक जलाएं”। यह कविता यद्यपि श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता में दीपक जलाने का आह्वान करती है किंतु श्री राम का आगमन भी तो अंधकार में प्रकाश की उज्जवल किरणों के समान है। श्री राम भारतीय संस्कृति में आस्था विश्वास और दृढ़ निश्चय के प्रतीक है अन्याय के विरुद्ध न्याय की स्थापना के संवाहक हैं इसीलिए श्री राम के आगमन को सदा सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के रूप में लिया जाता है। कवि ने लिखा है-
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ।
दीपक जलायें हम, गृह-मंदिर सजाएँ।।
राम जी का स्वागत, दौड़-दौड़ करेगें।
राम जी कृपालु भय, पीर सबकी हरेगें।।
भैया भरत मिलने को, रूदन मचाएँ।
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ ।।

असत्य पर सत्य की विजय को स्थापित करके अयोध्या लौटने वाले श्रीराम, लक्ष्मण और सीता माता के स्वागत में आमजन द्वारा दीप जलने के क्रम में कवि ने कहा है कि “एक दीप और जलाना”। यह दीप उन सभी मूल्यों को स्थायित्व प्रदान करने की भावना का है जिससे मानव जीवन को उच्चता मिलती है। श्रेष्ठ मानव जीवन वही है जिसमें सहजता हो, सरलता हो, जीवन मूल्य हो और असीम संवेदनाएं हों। “एक दीप और जलाना” कविता में कवि दिव्य’ ने लिखा है कि-
सत्य, अहिंसा, मानवता के, 
चाहे लाखों दीप सजाना। 
मगर शान्ति-सद्भावों का, 
एक दीप और जलाना ।।

जिस प्रकार श्रीराम अन्याय के विरुद्ध न्याय की विजय का घोष करते हैं इस प्रकार पक्षियों का जीवन दासता से रहित उन्मुक्त जीवन का प्रतीक है। यदि मनुष्य स्वतंत्रता की अभिलाषा रखता है तो उसे सबसे पहले पक्षी का जीवन ही याद आता है। मनुष्य भी एक स्वतंत्र प्राणी है जिसने स्वयं के लिए अनंत श्रृंखलाओं की संरचना कर डाली। सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक जीन-जैक्स रूसो ने कहा था कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा रहता है।’’ यह जंजीरें मनुष्य ने स्वयं गढ़ी हैं और जब इन जंजीरों का कसाव बढ़ जाता है तो उससे मुक्त होने के लिए व्यक्ति छटपटाने लगता है क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति भी पक्षियों के सम्मान उन्मुक्तता की प्रवृत्ति है। “हम पंछी उन्मुक्त” शीर्षक कविता में कवि ने लिखा है-
प्राचीरों को तोड़ चले, 
हम पंछी उन्मुक्त है।
पिंजरे में कैद सभी हम, 
क्यों मानवता सुषुप्त है।।

व्यक्ति तभी स्वतंत्र रह सकता है जब वह अनुकूल वातावरण में जीवन जी रहा हो। ऐसा वातावरण जिसमें महंगाई की मार न हो, पूंजीपतियों के द्वारा लूट न हो, राजनीतिक छल कपट न हो और सामाजिक समानता हो तभी व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह पाती है। इसीलिए वर्तमान पर दृश्य को देखते हुए कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘यह कैसी आजादी’ में तर्जनी उठाई है-
नियम कानून सब टांगे खूंटी। 
जनता मंहगाई से रूठी ।।
पूँजीपतियों की हो रही मस्ती।
हत्या लूट कितनी है सस्ती ।।

भारतीय जीवन दर्शन की सनातन संस्कृति के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य जन्म के साथ ही कुछ प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक ऋणों (कर्तव्यों) से बंधा होता है। इन ऋणों से मुक्त होने के लिए जीवन में सदाचार, त्याग और सेवा का मार्ग अपनाना आवश्यक माना गया है। ये तीन ऋण देव, ऋषि तथा पितृ ऋण के नाम से जाने जाते हैं । इसमें पितृ ऋण का आशय मात्र पिता के ऋण से नहीं अपितु माता और पिता दोनों के ऋण से उऋण होना है। जो इन ऋणों का महत्व समझता है, वही देश और समाज के लिए विशेष कार्य कर सकता है। कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘कैसे तेरा ऋण उतारूँ’ मैं मां के ऋण को वर्णित किया है-
सौ-सौ जीवन, मैं तुझ पर वारूँ।
हे माँ! कैसे तेरा ऋण उतारूँ।।
तूने मुझको जन्म दिया है, 
तेरा मैंने दुग्ध पिया है।
तेरा अमृत-सम दुग्ध पीकर, 
कौन नहीं यहाँ जीवन जीया है।।

कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की कविताओं में जहां व्यवस्थाओं के प्रति उलाहना है, वहीं उनका समाधान भी  सुझाया गया है। यही बात संग्रह की कविताओं को विशिष्ट बनाती है। इन कविताओं में भाव सौंदर्य के साथ भाषाई सौंदर्य भी है जो कविता के प्रवाह को बांधे रखता है। ‘एक दीप और जालना’ कविता संग्रह विपरीत समय में आशा का संचार करने वाली कविताओं का संग्रह है इस दृष्टि से इन कविताओं को कम से कम एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए। 
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Thursday, May 14, 2026

बतकाव बिन्ना की | जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘आज मोए जे कहनात खींबई याद आ रई के- जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने भैयाजी से कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी हंसन लगे। जा देख के मोए अचरज बी भओ औ गुस्सा बी आओ। भला ईमें हंसबे वारी बात का आए?
‘‘आप काए हंस रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बुरौ ने मानियो मगर मोए हंसी जा बात पे आई के जे कहनात तुमें कछू ज्यादई पुसात आए। जब देखो जेई कहनात कैत रैत हो।’’ भैयाजी ऊंसई हंसत भए बोले।
‘‘अब का करो जाए भैयाजी! जब दसई नईं बदलत तो कहनात कां से बदल जैहे?’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब? कोन सी दसा? का कैबो चा रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘देख नईं रै के कैसो दोंदरा मचो आए।’’ मैंने कई।
‘‘का हो गओ?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए पूछी।
‘‘होने का आए? मोए कछू नई भओ।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें नईं कछू भओ, सो कोन की कै रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप अखबार नईं पढ़त का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए नईं पढ़त? संकारे से सबसे पैले अखबारई बांचत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊमें पढ़ो नईं के जनगणना वारों में से कछू को फटकारो गओ के काम धीमो काय चल रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो, ईमें का खास आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘ईमें आपके लाने कछू खास नई दिखा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई बता देओ के ईमें का खास आए? अरे, बे ओरें समै पे काम पूरो नईं कर पाए हुइएं सो उने फटकारो गओ। कओ चिट्ठी पकरा दी गई होए। जे तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी तनक लापरवाई से बोले।
‘‘भैयाजी आप मोए एक बात बताओ।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ पूछो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें जे बताओ आप के जो कऊं अपनी भौजी कऊं टीचर होतीं औ उनकी ड्यूटी ई काम में लग जाती तो आप का करते?’’ मैंने पूछी।
‘‘करते का? सूदे कलक्टर आफिस जाते औ तुमाई भौजी की ड्यूटी कटवा के आते।’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘काए? उने ड्यूटी काए नईं करन देते?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, इत्ती घाम में बे कां फिरतीं? चाए कछू हो जातो, हम तो जान नईं देते।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जे का बात भई भैयाजी? अपनी भौजी, भौजी औ दूसरी लुगाई कछू नईं? औ लुगाई की तो छोड़ो लुगवा हरों की बी कछू नईं?’’ मैंने भैयाजी खों आड़े हाथो लओ।
‘‘तुम मनो कैबो का चा रईं?’’ भैयाजी तनक झेंपत भए बोले।
‘‘मैं जे कै रई भैयाजी के इत्ती गरमी पर रई, घाम चटक रओ औ सरकार को गिनती कराबे की परी। अरे करा लइयो तनक साजे मोसम में। मनो नईं उने तो ई गरमी में ई कराने।’’ मोए बोलत-बोलत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘तुम काए खिजियां रई? अब राजकाज में जा सब तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोए समझाबे की कोसिस करी।
‘‘खिजियाबे वारी बातई आए भैयाजी! अब आपई सोचो के अपन ओरें जो घरै रैत आएं तो  दुफारी को दोरे बंद कर के, कूलर चला के पर जात आएं। फेर कोनऊं दोरे की घंटी टनटनाए उठ के दोरे खोलबे को जी नईं करत। फेर ई गरमी में गली-मोहल्ला इत्तो सूनो हो जात आए के कोनऊं अनजाने के लाने दोरे खोलबे में डर लगत आए। उनके मों पे थोड़े लिखो रैत आए के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं औ। अबई चार दिनां पैले की घटना मैंने आपके लाने सुनाई हती के दो जने एक फटफटिया पे चढ़ के आए रए। उन्ने मोरे घर के दोरे की घंटिया बजाई। मैंने खिरकी से तनक झांक के देखो सो मोए लगो के यां तो पोस्टमेन, ने तो कूरिया वारो हुइए। मैंने बैठक को दोरो खोलो औ बरांडे में पौंची तो मोए तनक डाउट भओ। मैंने उन ओरन से पूछी के का काम आए? सो उनमें से एक बोलो जोन फटफटिया से उतर के ठाड़ो हतो, ‘‘नमस्ते! आप कैसी हो? जब आपकी जिज्जी हतीं तो हम आपके इते आत रए।’ इत्तो बोल के बा सोचो के हम ऊकी बातन में आ जाहें औ बरांडे को गेट खोल दैहें। लेकन मैंने ऊसे साफ-साफ कई के भैया, हमने आपको पैचानों नईं। तो बा बोलो के अरे, आपकी जिज्जी हमें पैचानत्तीं, आप सोई पैचानत्तीं। फेर बा पलट के अपने संगवारे से कछू बोलो औ फेर मोरी तरफी देखन लगो। सो मैंने कई के भैया, हमने आपको खों पैचानो नईयां। आप जो जिज्जी के समै पे आत रए तो जिज्जी के गए पे काए नईं आए रए? जा सुन के बा बोलो के हम काम के लाने बायरे चले गए रए। बाकी हमने जिज्जी के बारे में सुनी रई। औ आज इते से निकरे तो सोची के आपसे मिलत चलें। मैंने कई के मगर मैंने आप ओरन खों नईं चीन्हों आए सो आप ओरें फेर आइयो। इत्तो कै के मैंने दोरे बंद कर लए। मैंने खींब देर सोची मनो मोए तनक बी याद ने आई के बे ओरें कौन हते? मैंने ई बारे में जोन के बी बताओ बे सबई बोले के अच्छो करो के दोरे नईं खोले, को जाने को हते बे ओरें। बा बी दुफारी के सन्नाटा में। अब ऐसे में को आ चीन्ह पा रओ के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं ऊंसई चोर-उचक्का आएं। सो, अब आपई बताओ के ऐसे में बा गिनती करबे वारों के लाने घरों के दोरे नईं खुल रए तो ईमें उन ओरन को का दोस? औ ने ना खोलबे वारन को कोनऊं दोस। काए से दुफारी में घरे लुगाइयां, बच्चा औ बुड्ढा हरें रैत आएं। अरे अच्छो मोसम रए तो मोहल्ला में मुतके जने घूमत रैत आएं, ऐसे घाम में को आ मूंड चटकात फिरहे? पूरो सूनो डरो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! ऐसे में उनको काम धीमो सो चलहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मैं कै रई के एक तो ऐसे बुरए मोसम में जो काम करा रए औ जो काम ठीक से हो नई पा रओ तो खटिया खड़ी कर रए। अब जे दसा देख के जेई कहनात सो याद आहे के जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने कई।
‘‘हम समझ गए के तुम सोई एक जमाना में टीचर रईं, जेई से तुमें उनके लाने दुख हो रओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘मैं तो कच्ची वारी टीचर रई औ मोरी कभऊं ऐसी ड्यूटी नई लगी। मनों, जे इंसानियत की बात आए।’’ मैंने कई। 
‘‘बा तो ठीक आए बिन्ना, मनो नौकरी मने नौकर घांई जिनगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, नौकर बनाओ, जे तो गुलामी घांईं कहानो।’’ मैंने चिढ़ के कई।
‘‘अच्छा चलो, ने तिन्नाओ। हमाए-तुमाए सोचे से कछू ने हुइए, बोलने तो उनई को परहे। भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रए आप।’’ मैंने भैयाजी से कई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के पक्को करबे, पईसा बढ़ाबे के लाने तो सबई कट्ठे ठाड़ें हो जात आएं, सो ईके लाने काए नईं बोलत कोऊ?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                  
     वेदों में यह माना जाता है कि हमें ब्रह्मांड में मौजूद सभी प्रकार के जल की रक्षा करनी चाहिए। नदियों के जल को सबसे अधिक संरक्षित माना गया है, क्योंकि उससे खेतों की सिंचाई होती है, जिसके कारण जीवों का जीवन चलता रहता है। नदियों का बहता हुआ जल पवित्र माना जाता है। इसीलिए वेदों में कहा गया है कि नदियों को प्रदूषित नहीं करना चाहिए। वैदिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद आने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। इसी संदर्भ में माना गया है कि स्वर्ग तक केवल वैतरणी को पार करने के बाद ही पहुंचा जा सकता है, इसलिए यदि जो वैतरणी को पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता और उसकी आत्मा प्यासी भटकती रहती है।


   हिंदू वैदिक, पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैतरणी नदी (स्टिक्स नदी) में भयानक कीड़े, मगरमच्छ और वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध रहते हैं। मृत्यु के बाद, जब यमदूत पापी आत्मा को लेकर वैतरणी नदी से गुज़रते हैं, तो नदी का पानी उबलने लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है यानी जो जीवन में बुरे कर्म करता है, धार्मिक कार्य, दान-पुण्य नहीं करता, उस पापी आत्मा को वैतरणी नदी पार करने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। जो व्यक्ति नदी के जल को हानि पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद मिलने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। चूंकि स्वर्ग तक पहुंचने के लिए वैतरणी नदी को पार करना अनिवार्य है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति वैतरणी पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह नदी पृथ्वी के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी प्रवाहित होती है। जिस नदी की यहां बात की जा रही है, वह यमलोक से नरक तक बहती है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नदी का नाम वैतरणी नदी है। यह 100 योजन अर्थात् 120 किलोमीटर लंबी है और रक्त (खून) से भरी हुई है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इस नदी का एक हिस्सा पृथ्वी से होकर यमलोक तक जाता है, और वहां से नरक के द्वार तक पहुंचता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा को यमलोक में यमराज के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यदि उसके कर्मों के अनुसार उसे नरक की प्राप्ति होती है, तो यमदूत उस पापी आत्मा को इस नदी के पास ले जाते हैं। किसी भी पापी आत्मा को देखते ही नदी का रक्त उबलने लगता है और नदी से एक भयानक गर्जना उठने लगती है। वहीं, जो व्यक्ति अपने जीवन में दान-पुण्य करता है, तथा प्रकृति और नदी के जल को कोई हानि नहीं पहुंचाता, वैतरणी नदी उसकी आत्मा की रक्षा करती है। हमारे विद्वान पूर्वजों ने नदीजल संरक्षण को पारलौकिक जीवन से जोड़ कर जो भय पैदा किया वह नदीजल संरक्षण में सहायक रहा। किन्तु आधुनिकता ने इन प्राचीन संदेशों की अनदेखी की है और नदियों को गंभीर क्षति पहुंचाया है। हमारे पूर्वजों ने संभवतः इसी कारणवश धार्मिक ग्रंथों में वैतरणी नदी के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है, ताकि मनुष्य प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाने से भयभीत हों; वे अच्छे कर्म करें, प्रकृति का संरक्षण करें, जल बचाए और जैव विविधता की रक्षा करें।

जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय नदियों की जलवायु की स्थिति लगातार खराब हो रही है, जिसमें अनिश्चितकालीन वृद्धि, अत्यधिक वृद्धि, ज्वालामुखी का पिघलना और पानी की कमी मुख्य चुनौतियाँ हैं। बढ़ते तापमान के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे नदियां समय से पहले सूख रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 2070-2100 तक मानसून में नदियों का तापमान 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को पानी देने वाले हिमालयी ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना इन नदियों का प्रवाह प्रभावित कर रहा है।  बारिश के पैटर्न में बदलाव से बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। भारत में बाढ़ की दर बढ़ी है। वहीं अनियमित बारिश से सूखा और बंजरपन भी बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह का 71 प्रतिशत भाग जल से ढंका हुआ है, लेकिन मात्र 1 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। गंगा, यमुना और साबरमती जैसी नदियां पूरे भारत में पूजनीय हैं। नदी का जल वाणिज्यिक और औद्योगिक विकास, जलविद्युत उत्पादन, कृषि, नए बहुउद्देशीय बांधों और पर्यटन स्थलों के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि कीटनाशकों, भारी धातुओं, जैविक अपशिष्ट, रासायनिक अपशिष्ट और सीधे सीवेज के निर्वहन जैसे विभिन्न प्रदूषकों की उपस्थिति ने नदी के जल की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाया है। भारत में, नदी जल प्रदूषण एक प्रमुख समस्या है जिसने न केवल मानव और पशु स्वास्थ्य को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया है।

सन 2023 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में पांच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई थी। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया था कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। दरअसल, हिमनद यानी ग्लेसियर्स पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है।’’
इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा। गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियां झेलम, चिनाब, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियां सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहां पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है।

हमारे पूर्वज नदी जल के महत्व को हमसे कहीं अधिक समझते थे। ‘‘जलमेव जीवनं’’ भारतीय संस्कृति में जल और जलाशयों के महत्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे वैदिक साहित्य में जल के स्रोतों, सभी जीवों के लिए जल के महत्व, जल की गुणवत्ता और उसके संरक्षण पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है। वेदों में जल को ‘‘विश्वभेषजं’’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि सभी औषधियां जल में ही समाहित हैं (अर्थात् शुद्ध जल सभी जीवों के लिए अत्यंत लाभकारी, हितकारी और महत्वपूर्ण है)। वर्तमान में भी जल चिकित्सा के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ऋग्वेद में जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-‘‘अप्सवमृतमप्सु भेषजं।’’

- इसका अर्थ है कि जल में अमृत है, जल में औषधि है। वास्तव में, आर्य संस्कृति नदियों के किनारों पर ही फली-फूली और विकसित हुई। बड़े-बड़े प्राचीन नगर नदियों के किनारों पर ही समृद्ध हुए। जैसे सरयू के तट पर अयोध्या, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जयिनी, त्रिवेणी के तट पर प्रयाग, यमुना के तट पर मथुरा आदि। पंजाब को ‘‘सप्तसिंधु’’ प्रदेश कहा जाता है। वैदिक काल में, सरस्वती नदी के तट के समीप रहते हुए और इस नदी के जल का सेवन करते हुए, ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया।
पवित्र नदियों की महिमा का गान हजारों नामों से किया जाता है। ऋग्वेद के दशम मंडल के ‘‘नदी सूक्त’’ में भारत की नदियों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है-
गंगे च यमुने चौव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
- इसका अर्थ है, हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी नदियों! आप सभी मेरे स्नान के लिए इस जल में पधारें।
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा।
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका।।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी।
पूर्णाः पूर्णजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तु मे मङ्गलं।।

आदिग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित वेदों में, जल को एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व मानते हुए उसकी स्तुति की गई है। अथर्ववेद में जल को लाभकारी बताते हुए कहा गया है कि ‘‘जो जल मरुस्थल में है, जो जल तालाब में है, जो जल घड़े में लाया जाता है, जो जल वर्षा से प्राप्त होता है, ये सभी जल हमारे लिए कल्याणकारी हों। कुओं का जल हमें समृद्धि प्रदान करे। संचित जल हमें समृद्धि दे, वर्षा का जल हमें समृद्धि दे।’’ औषधि के रूप में जल का स्थान चिकित्सा विज्ञान, औषध-शास्त्र और विभिन्न देशों की चिकित्सा पद्धतियों में सर्वाेच्च है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ-साथ, सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसके दर्शन का विस्तार से वर्णन किया गया है। जल समस्त रोगों की औषधि है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो जल स्वर्ण के समान कांतिमान है, अत्यंत सुंदर है, जो पवित्रता प्रदान करता है, जिससे सवितादेव और अग्निदेव का जन्म हुआ, जो सर्वाेत्तम वर्ण वाला और ‘‘अग्निगर्भ’’ है, वह जल हमारे रोगों को दूर करने में सक्षम है; सभी को सुख और शांति की प्राप्ति हो। ऋग्वेद में जल-संस्कृति का निरंतर प्रवाह देखने को मिलता है। ऋग्वेद की जल-संस्कृति और परंपरा का विकास अथर्ववेद में भी परिलक्षित होता है। जल ही एक सुखी और समृद्ध जीवन का आधार है। शतपथ ब्राह्मण में जल को ‘‘आपो वै प्राणाः’’ (जल ही प्राण है) कहकर जीवन के रूप में वर्णित किया गया है। समस्त देवता जल में ही प्रतिष्ठित हैं। देवताओं तक हमारी स्तुतियों को पहुँचाने का माध्यम भी जल ही है।
वस्तुतः, प्रवाहित जल अर्थात् नदी के जल को सर्वाधिक पवित्र मानते हुए, वेदों में नदी जल के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है; क्योंकि नदी ही वह एकमात्र तत्व है जो जीवन के इस पार और उस पार ‘‘दोनों लोकों में’’ विद्यमान रहती है, और मनुष्य को सुख तथा स्वर्ग की प्राप्ति कराती है। यही कारण है कि शास्त्रों में नदी जल को बचाने का आह्वान किया गया है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 14.05.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, May 12, 2026

पुस्तक समीक्षा | पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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दोहा संग्रह - पीड़ा से सम्वाद
कवि      - डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया
प्रकाशक - नवदीप प्रकाशन, 821-बी, गुरु रामदास नगर एक्सटेंशन, गुरुद्वारा रोड, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092
मूल्य - 225/- 
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दोहा हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय, प्राचीन और सशक्त काव्य विधाओं में से एक है। इसका प्रयोग आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक नीति, प्रेम, भक्ति, और लोक-व्यवहार की बात कहने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कि अपभ्रंश से हिंदी तक की यात्रा में सिद्ध कवि सरहपा ने इसका प्रयोग सबसे पहले किया। कबीर, रहीम, रैदास और तुलसीदास ने दोहे के माध्यम से अमर साहित्य रचा। उन्होंने अपने दोहों में जीवन के हर आवश्यक पक्ष पर विचार किया। दोहा छंद अपनी लघुता में गहन अर्थ समाहित करने की क्षमता अर्थात गागर में सागर भरने की विशेषता के कारण आधुनिक हिंदी साहित्य में भी अत्यंत लोकप्रिय और महत्वपूर्ण बना हुआ है। परंपरा और आधुनिकता के सेतु के रूप में, यह आज भक्ति व नीति के साथ-साथ व्यंग्य, समसामयिक सामाजिक विषयों, और जीवन के अनछुए पहलुओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्त कर रहा है। आधुनिक काल के दोहाकार सामाजिक विद्रूपताओं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी की समस्याओं पर चोट करने के लिए दोहा विधा का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं। पारंपरिक क्लिष्ट भाषा के बजाय, आज के दोहे सीधी, सरल और मारक हिंदी भाषा में लिखे जा रहे हैं, जो सीधे पाठकों के दिल को छूते हैं। 

डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया गीत एवं छांदासिक काव्य के सिद्ध हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अनेक दोहे लिखे हैं जिनमें कुछ शताधिक दोहे तो एक ही विषय पर केन्द्रित रहे हैं। उनका दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ जीवन के विविध पक्षों पर लिखे गए दोहों का संग्रह है। पीड़ा जीवन का एक शाश्वत पक्ष है। इस धरती पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है और न होगा जो यह दावे से कह सके कि उसने पीड़ा का अनुभव कभी नहीं किया। यह अवश्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव में भिन्नता होती है। यथा किसी को प्रेम में पीड़ा मिलती है तो किसी को अर्थाभाव के कारण, किसी को अपनों से अवहेलना के कारण तो कभी शारीरिक कष्ट के कारण। पीड़ा का कारण कुछ भी हो किन्तु उसकी तीव्रता का चरमबिन्दु सभी में लगभग एक-सा होता है। फिर भी पीड़ा के मूल भाव एवं प्रकृति को जान कर पीड़ा की तीव्रता को कम किया जा सकता है। अपने दोहों के माध्यम से डॉ. सीरोठिया ने यही कहना चाहा है जिसे उन्होंने ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ नाम दिया है। वस्तुतः पीड़ा से सम्वाद वही व्यक्ति कर सकता है जो पीड़ा की समग्रता को समझता हो, जानता हो। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि पेशे से चिकित्सक रहे डॉ. सीरोठिया को हिन्दी साहित्य से अगाध प्रेम है। इसीलिए उन्होंने एमबीबीएस होते हुए भी, शासकीय चिकित्सक होते हुए भी हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया क्योंकि वे हिन्दी और उसके साहित्य को भली-भांति जानना और समझना चाहते थे। इसी के साथ गीत एवं छांदासिक विधाओं में निंरतर सृजन कार्य करते रहे। डॉ. सीरोठिया के सृजन में सतहीपन नहीं है, वरन एक गंभीरता की अनुभूति होती है क्योंकि उन्होंने अपने सृजनकर्म को ‘‘टाईम पास’’ या त्वरित ‘‘नेम-फेम’’ के साधन के रूप में नहीं लिया अपितु काव्य की जिस विधा को अपनाया, उसमें पूरी तरह रमते चले गए।    
 
संग्रह के बर्ल्ब में डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया की अपने सृजन के प्रति यह टिप्पणी बहुत अर्थपूर्ण है-‘‘किसी भी काव्य की रचना मानसिक वृत्तियों एवं विभिन्न प्रकार के सम्वेदनों के सामंजस्य से होता है। एक-एक भाव के लिए शब्द का चयन, और उसे सौन्दर्ययुक्त आकर्षक बनाने, अलंकृत करने का तन्मय भाव ही काव्य को सजीव बनाता है। कई बार यह किसी चित्र को बनाकर उसमें प्राण भरने जैसा कठिन भी होता है। कवि और काव्य का महिमा वर्णन हमें वेदों में भी मिलता है, यजुर्वेद में तो कवि को परमेश्वर के समतुल्य सम्मान दिया गया है। खैर, मेरे लिए काव्य साधना किसी सम्मान के लिए नहीं, स्वान्तः सुखाय की एक सहज प्रक्रिया मात्र है। मूक हृदय की मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो विधान करती आयी है, मेरे लिए वही कविता है।’’

यूं तो संत कबीर ने यह दोहा किसी और संदर्भ में कहा है किन्तु यदि साहित्य सृजन की सार्थकता पर इसे लागू किया जाए तो कवि के हृदय में साहित्य के प्रति सम्मान एवं लगन के रूप में भी इसे समझा जा सकता है-
सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप ।।

डॉ. सीरोठिया के इस दोहा संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें दोहों का मूल आधार भले ही जीवन की जटिलताएं है, किन्तु इसमें विषय की विविधता है। किसी को इनमें प्रेम-संयोग मिलेगा, तो किसी को प्रेम-वियोग, किसी को सामाजिक समरसता, तो किसी को विसंगतियों के दृश्य दिखाई देंगे। जैसे संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रो. डॉ. रघुनांदन प्रसाद तिवारी, डी.लिट., पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली ने ‘‘सामाजिकता समरसता के सशक्त और समर्थ दोहे’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘दोहा-संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ मेरे हाथ में है। इस संग्रह को पढ़ते हुए एवं अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि डॉ. सीरोठिया तन्मयी भाव के रचनाकार हैं। डॉ. सीरोठिया की रचनाओं में विषय के साथ जुड़ने की अद्भुत क्षमता है। डॉ. सीरोठिया जिस तदाकार भाव से काव्य रचना करते हैं वह मन को छू जाता है।’’

यह ‘‘तन्मयी भाव’’ डॉ. सीरोठिया के रचनाकर्म को स्थापना दिलाने में सक्षम है। प्रत्येक रचना तब हृदय को स्मर्श कर पाती है जब उसके भाव एवं विषय से तादात्म्य स्थापित कर लिया गया हो। इस संग्रह के दोहों की एक विशेषता यह भी है कि इनमें समस्याओं के साथ समाधान भी सुझाया गया है। जिससे इनकी उपादेयता और अधिक बढ़ जाती है। 

‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ दोहा संग्रह के कुल दोहों को विषयवार 11 शीर्षकों में बांटा गया है- 1. मन से मन की बात 2. बाँटो सबको प्यार 3. इन्सान-सूरत और सीरत 4. दोस्त और दोस्ती 5. सपन करें साकार 6. समय बड़ा अनमोल 7. उपकार और उपकारी 8. कलह 9. निन्दा और निन्दक 10. जल, जंगल, जमीन 11. कभी-कभी ऐसे भी। इन शीर्षकों को पढ़ कर ही समझ में आने लगता है कि कवि ने जीवन के हर बिन्दु को परस्पर जोड़कर इस संग्रह के दोहों की रेखा खींची है। दरअसल पीड़ा का सबसे बड़ा कारण होता है छल, कपट, धोखा। जब समय विपरीत हो और लोग मुंह फेर लें तो पीड़ा का जन्मना स्वाभाविक है-
समय बदलते ही यहाँ, अक्सर बदलें लोग। 
देता है धोखा बहुत, अपनेपन का रोग।।
चली जिन्दगी, उमर भर, इच्छाओं के साथ। 
लेकिन फिसली रेत सी, अब हैं खाली हाथ।।
यदि व्यौहार एवं आचरण में अपनत्व हो तो बड़े से बड़ा दुख भी कम हो जाता है। इसीलिए तुलसीदास ने लिखा है कि -
आवत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ वहां न जाइए, चाहे कंचन बरसे मेह।।

इसीलिए डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया अपने दोहों में कहते हैं कि-
घर आये हर अतिथि को, दें समुचित सम्मान । 
संस्कार कहते यही, रखिये सबका ध्यान।।
सबसे होना चाहिए, सुख कारक व्यौहार । 
इससे फलता-फूलता, है अपना परिवार।। 

बाजारवाद के इस खुरदुरे समय में प्रायः देखने को मिलता है कि लोग विलासिता की वस्तुएं अथवा एक अदद बड़ा अवसर पाने मात्र को आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान गिरवी रखने में तपिक भी हिचकते नहीं है। ऐसे लोगों का आह्वान करते हुए डॉ सीरोठिया लिखते हैं-
जिसने खुद का ही नहीं, कभी किया सम्मान। 
उसको फिर संसार में, मिलता है अपमान।। 
वृक्ष अकेले ही सहें, हर मौसम की मार। 
देते हैं फल-फूल वह, निज गुण के अनुसार।। 

गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में मित्रघात भी आम बात हो चली है। ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल जाती हैं जिनमें कभी किसी दोस्त के द्वारा धोखा दिए जाने अथवा एक तरफा प्रेम में पड़ कर जघन्य अपराध कर बैठने का विवरण होता है। जबकि मित्रता और प्रेम परस्पर विश्वास एवं एक-दूसरे की भावनाओं के सम्मान का विषय होता है। जैसे संत कबीर ने कहा है-‘‘प्रेम ने बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।’’ अर्थात प्रेम न किसी खेत की बाड़ में उगता है और न बाजार में बिकता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ नहीं पाता है वह स्वयं की और दूसरों की पीड़ा का कारण बनता है। अतः डॉ. सीरोठिया लिखते हैं कि- 
कभी दोस्त का ना करें, भूले से अपमान । 
आदर और समानता, का नित रक्खें ध्यान।।
मुश्किल में है डालता, इक तरफा का प्यार। 
कभी-कभी कारण बने, दुख का यही अपार।।
संत होना वैराग्यधारी होना नहीं है। संत होना सद्गुणों से युक्त होना है। जो संत है वहीं जगत का उद्धार कर जगत पर उपकार कर सकता है- 
सन्तों का इस जगत पर, सदा रहा उपकार। 
दुनिया को इनसे मिलें, सुन्दर, सरल विचार।।

डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के दोहे बेहद सरल, सुबोध और जनभाषा में हैं, जिन्हें आम आदमी आसानी से समझ सकता है। उनके दोहे कम शब्दों में समूचा जीवन दर्शन प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। डॉ. सीरोठिया ने प्रेम, सौंदर्य, विरह, नैतिकता, राजनीति, दर्शन, और अध्यात्म जैसे विविध विषयों पर दोहे लिखे हैं जो निराशा के क्षणों में उनके दोहे ‘‘हार न मानने’’ की प्रेरणा देते हैं। जैसे-
सच के सूरज की नहीं, कभी हुई है रात। 
हों विरोध की आँधियाँ, धोखे की बरसात।।

दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ पठनीय संग्रह है क्योंकि यह मानवीय चेतना और संवेदना के साथ दोहों के समकालीन सरोकारों को गहनता से रेखांकित करता है। 
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Saturday, May 9, 2026

गैरकामकाजी महिलाओं को सम्मान एवं आर्थिक अधिकार मिले - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

☢️"तुम दिन भर घर में पड़ी रहती हो और करती ही क्या हो?"
☢️"मैं दिन भर परिवार के लिए खटता रहता हूं लेकिन तुम्हें क्या?"
☢️ "घर से बाहर जाकर काम करो तब समझ में आए कि पैसा कमाना कितना कठिन है!"
☢️"तुम नहीं समझोगी!"

 - ऐसी सोच रखने वाले पुरुषों के द्वारा महिलाओं को कब आगे किया जाता है जब- 

👉किसी भी टिकट विंडो पर महिलाओं को जल्दी टिकट में मिलने की उम्मीद होती हो।
👉 जब राजनीतिक क्षेत्र में महिला सीट आरक्षित कर दी गई हो। (फिर सीट मिलने के बाद महिला का पति उस सीट के अधिकारों का उपयोग कर सके)
👉 जब महिलाओं को स्टार्टअप या लोन के लिए अधिक छूट और सुविधा दी जा रही हो।
👇
⛔️वरना आज भी अनेक परिवारों में महिलाएं आर्थिक अधिकार नहीं रखती हैं, निर्णय लेने का अधिकार नहीं रखती हैं तथा परिवार के पुरुषों के हाथों की कठपुतली बनकर रहती हैं।
⛔️ समाज जानता है, समझता है फिर भी ख़ामोश रहता है।
⛔️ स्त्री परिवार के टूटने के डर से, लांछन लगने के डर से,  तथा असुरक्षित महसूस करने के कारण निर्बल की भांति जीवन जीती है। विशेष रूप से समाज के मध्यम वर्ग की महिलाएं।

🤷 क्या गैर कामकाजी महिलाओं को परिवार में समान रूप से सम्मान और आर्थिक अधिकार नहीं मिलना चाहिए??❓

❗️हां ! हर महिला को सम्मान और आर्थिक बराबरी मिलनी चाहिए चाहे वह गैर कामकाजी घरेलू महिला  ही क्यों न हो❗️
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