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Tuesday, November 16, 2021

पुस्तक समीक्षा | एक शायर को बेमिसाल श्रद्धांजलि है ‘‘यारां’' | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 16.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई शायर स्व. यार मुहम्मद "यार" के ग़ज़ल संग्रह "यारां" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
एक शायर को बेमिसाल श्रद्धांजलि है ‘‘यारां’'
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह  - यारां
कवि        - यार मुहम्मद ‘‘यार’’
प्रकाशक     - श्यामलम, सागर (म.प्र.)
मूल्य         - निःशुल्क
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काम  ऐसा  जहां  में  कर जायें
ख़ुश्बू-सी बन के हम बिखर जायें

यह शेर है सागर के लोकप्रिय शायर यार मोहम्मद ‘‘यार’’ का। बेशक़ यार साहब ने अपनी शायरी से सभी के दिलों में जगह बनाई और इस दुनिया को छोड़ने के बाद भी यादों में बसे हुए हैं लेकिन इस उपभोक्तावादी दुनिया में जहां स्वार्थपरता सिरचढ़ कर बोलती है, वहां एक मरहूम शायर के प्रति किए गए अपने वादे को पूरा करना अपने आप में एक ऐसा काम है जो हर दृष्टि से प्रशंसनीय है। 28 फरवरी 1938 को जन्मे शायर यार मोहम्मद ‘‘यार’’ ने सन् 2016 की 03 फरवरी को इस दुनिया से विदा ले ली। उनके जाने के बाद 06 फरवरी 2016 को सागर नगर की साहित्य, संस्कृति और कला के लिए समर्पित अग्रणी संस्था श्यामलम द्वारा ‘‘यार’’ साहब के सम्मान में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस आयोजन के दौरान ही ‘‘यार’’ साहब की ग़ज़लों को संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने का निर्णय लिया गया और संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने इस संबंध में विधिवत घोषणा की। इस संबंध में उन्होंने ‘‘यारां’’ का आमुख लिखते हुए चर्चा की है कि -‘‘06 तारीख को हमने उन्हें श्रद्धांजलि दी, उन्हें याद किया। बात आई उनकी रचनाओं के प्रकाशन की। इमरान भाई (सार साहब के पुत्र) ने बताया कि एक संग्रह ज़रूर छापा गया था किन्तु उसमें बेशुमार शाब्दिक त्रुटियां होने की वज़ह से अब्बा ने उनका वितरण रोक दिया था। मैंने उसे दुरुस्त करा कर नए सिरे से प्रकाशित करने का निर्णय लिया। तत्संबंधी घोषणा भी श्रद्धांजलि सभा में की। श्रद्धापूर्वक स्मरण करना चाहूंगा, सभा में मौजूद मंचासीन अतिथि शिवशंकर केशरी और निर्मलचंद ‘निर्मल’ का जिन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, लेकिन उसको फलीभूत होते देखने वे आज हमारे बीच नहीं हैं।सोचा था छोटा सा काम है, अगले वर्ष इसी तारीख़ में उसका प्रकाशन कर कवमोचन करा लिया जाएगा। लेकिन भाषाई दुरुस्तीकरण की प्रक्रिया को पूरा करते-करते आज पांच साल बीत गए। हांलाकि इस अवधि में जो किया जाना संभव था, मैंने किया।’’
अपने वादे को पांच दिन में भूल जाने वाले आज के माहौल में पांच साल तक वादे के अमल में जुटे रहना बड़ा जीवट वाला काम है। अंततः श्यामलम संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने अपने वादे को पूरा किया और यार मुहम्मद ‘‘यार’’ साहब की चालीस ग़ज़लों का एक खूबसूरत संग्रह प्रकाशित कर कर दम लिया। इस संग्रह के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्य जुड़े हुए हैं। पहला तथ्य तो यह कि यह श्यामलम संस्था का पुस्तक प्रकाशन की दिशा में प्रथम सोपान है। दूसरा तथ्य यह कि ‘‘यारां’’ पर कोई शुल्क अंकित नहीं किया गया है। यह निःशुल्क है। इस संबंध में उमाकांत मिश्र का कहना है कि मैं ‘‘श्रद्धा कभी बेची नहीं जाती है। यह श्यामलम की ओर से यार साहब को श्रद्धांजलि है।’’ यह भावना स्तुत्य है। क्योंकि लेखन एवं प्रकाशन की दुनिया से जुड़े सभी लोग जानते हैं कि पुस्तक प्रकाशन में अच्छा-खासा खर्च आता है। यह सारा व्यय मूल रूप से श्यामलम संस्था और संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र द्वारा उठाया गया है। साहित्य और साहित्यकार की उनकी प्रतिबद्धता की राह में ‘‘यारां’’ मील का पत्थर है।
समीक्ष्य ग़ज़ल संग्रह के नामकरण के संबंध में उमाकांत मिश्र आमुख में ने जानकारी दी है कि डाॅ. सुरेश आचार्य ने संग्रह का नाम ‘‘यारां’’ रखा। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी, उर्दू और संस्कृत के गहनज्ञाता हैं। उनके द्वारा यार साहब के ग़ज़ल संग्रह को ‘‘यारां’’ नाम दिया जाना उनकी शायरी को तो प्रतिबिम्बित करता ही है, साथ ही जो ‘‘यार’’ साहब के स्वभाव से परिचित हैं वे समझ सकते हैं कि यह नाम ‘‘यार’’ साहब के याराना स्वभाव को भी रेखांकित करता है। इस ग़ज़ल संग्रह से जुड़ा तीसरा तथ्य यह है कि इसमें कठिन प्रतीत होने वाले उर्दू शब्दों का प्रत्येक पृष्ठ के फुटनोट में अर्थ दिया गया है ताकि इन ग़ज़लों को पढ़ने वालों को इनके मर्म को समझने में तनिक भी असुविधा न हो। शाब्दिक त्रुटिहीनता का हरसंभव प्रयास किया गया है। क्योंकि यही वह संवेदनशील पक्ष था जिसके कारण ‘‘यार’’ साहब ने अपनी प्रकाशित पुस्तक को वितरित करने से रोक दिया था जबकि उसके प्रकाशन में वे धन व्यय कर चुके थे। अतः उनकी इस भावना का संग्रह में सावधानीपूर्वक ध्यान रखा गया है। संग्रह में एक संक्षिप्त भूमिका साहित्यकार पी. आर. मलैया द्वारा लिखी गई है जिसमें उन्होंने ‘‘यार’’ साहब की शायरी की खूबियों पर प्रकाश डाला है।
यार मुहम्मद ‘‘यार’’ सागर के मदार चिल्ला, लाजपतपुरा वार्ड में जन्मे थे। अलीगढ़ यूनीवर्सिटी से सम्बद्ध उर्दू अदब से उन्होंने मेट्रिक किया। उन्हें पहलवानी का शौक था। सागर नगर के प्रमुख पहलवानों में उनकी गिनती होती थी। पहलवानी के साथ ही उन्हें शायरी का भी शौक रहा। वे उस्ताद मियां मेहर (नवाब साहब) के शागिर्द रहे। उन्होंने हिन्दी, उर्दू और बुंदेली में शायरी की। वे सामाजिक समरसता एवं कौमी एकता में विश्वास रखते थे। ‘‘यार’’ साहब ने नातिया मुशायरों में भी अनेक बार भाग लिया। कई सम्मानों से उन्हें सम्मानित भी किया गया।
शायरी अपने शायर की भावनाओं की प्रतिनिधि होती है और साथ ही उसका सकल जग से भी सरोकार होता है। यार मुहम्मद ‘‘यार’’ की शायरी में दीन-दुखियों के प्रति उनकी संवेदनाएं स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। उनके ये चंद शेर देखें-
धूप से इस जहां  को  बचा लीजिये
अपने दामन का साया अता कीजिये 
आपके नाम  की  माला जपता रहूं
रंग अपना यूं  मुझ  पे चढ़ा दीजिये
आप ही आप मुझको नज़ा आएं बस
आंखों में खाके-पा को लगा दीजिए 

‘‘यार’’ साहब जब ग़ज़ल के अस्ल इश्क़िया मिजाज़ को थामते हैं तो उनकी इश्क़िया ग़ज़ल भी एक गरिमा के साथ सामने आती है। उदाहरण देखें-
उसका फ़साना दिल को जलाने के लिए है
हर बात मेरी  दिल को  लुभाने के लिए है
हर सांस  यूं  तो  मेरी  ज़माने के लिए है
ये  जान  मगर  उनपे  लुटाने  के लिए है
मैं जानता हूं, दिल से  तुझे  चाहता है  वो
नाराज़गी  तो  मुझको  सताने  के लिए है

इश्क़ की बात करते हुए ‘‘यार’’ साहब लौकिक और अलौकिक प्रेम को एकसार करते हुए सूफ़ियाना अंदाज़ में जा पहुंचते हैं। वे इश्क़ को दुनिया की सबसे बड़ी नेमत करार देते हैं और प्रेम के व्यक्तिगत अनुभव को पीढ़ियों के प्रेम तक ले जाते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखिए-
इश्क़ में राज़े-मुहब्बत है  समझता क्या है
इश्क़ गर हो न तो इंसान में रक्खा क्या है
इक तक़ाज़ा ही तो इंसानियत का है बाक़ी
वर्ना  इंसान से इंसान  का  रिश्ता क्या है
तेरे जल्वों का करिश्मा है ये  रौशन आंखें
नूर आंखों में अगर हो न तो जंचता क्या है
साये-दामन में  शाम  आपके गुज़र जाए
और बस इसके सिवा मेरी तमन्ना क्या है
‘‘यार’’ अज्दाद की इस घर में ख़ुश्बुएं बसतीं
वर्ना  अपना  दरो-दीवार से  रिश्ता क्या है

‘अज्दाद’ अर्थात् पुरखों की ख़ुश्बूओं वाले घर को ही अपना घर मानना ‘‘यार’’ साहब का संयुक्त परिवार और पीढ़ियों में विश्वास रखने को दर्शाता है। उनकी वतनपरस्ती भी इन्हीं शेरों में बखूबी झलकती है।
यार मुहम्मद ‘‘यार’’ के कई शेर ऐसे हैं जिनमें उनकी कलम दुख-सुख, मिलन-विरह, के बीच अपने बाहर-भीतर के सफर की कश्मकश को बड़ी सुंदरता और गहराई से शब्दांकित करती है। वे आत्मीयजन के व्यवहार में होने वाले क्रमिक परिवर्तन को भी बखूबी सामने रखते हैं -
पहले थे  मेहरबां, बदगुमां हो गये
अब वो  मेरे लिए आस्मां  हो गये
बिन मेरे वो जो रहते नहीं थे ज़रा
कितने अब फ़ासले दरम्यां हो गये
हमने उनके लिए जान भी दी मगर
आज वो  ग़ैर के  राज़दां हो गये
साथ ले-ले के अपने चले जो मुझे
दूर वो सबके सब  कारवां हो गये

‘‘यार’’ साहब के शेरों में दुनियावी चलन की सच्ची तस्वीर पूरे तल्ख़ रौ में उभर कर सामने आती है। लेकिन खूबी यह है कि वे आज के असंवेदी माहौल के प्रति मात्र उलाहना ही नहीं देते हैं, वरन सकारात्मक सुझाव भी देते हैं-
क्या नहीं बिक रहा  आज संसार में
दिल का सौदा भी होता है बाज़ार में
क्या मिलेगा  हमें  बोलो  तकारर में
बात  बन  जाएगी,  दोस्तो  प्यार में
लालो-गौहर से भी बेशक़ीमत  है ये
वक़्त को  हम  गंवाएं  न  बेकार में

सागर नगर के ही नहीं वरन् उर्दू अदब के एक नामचीन शायर यार मुहम्मद ‘‘यार’’ ने शायरी को समृद्ध किया। साथ ही उनके इस योगदान को संग्रह के रूप में दस्तावेज़ बनाने में श्यामलम संस्था ने जो महती कार्य किया वह साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। ‘‘यार’’ साहब की शायरी को निश्चित रूप से पढ़ा जाना चाहिए जो कि अब ‘‘यारां’’ के प्रकाशन से आसान हो गया है। ‘‘यारां’’ के अगले संस्करण को समूल्य किया जा सकता है, बढ़ती मंहगाई एवं संस्था के सीमित साधनों को देखते हुए श्यामलम संस्था को इस पर विचार करना चाहिए। इससे उनके श्रद्धांजलि के पवित्र उद्देश्य पर कोई आंच नहीं आएगी। बहरहाल, इस ग़ज़ल संग्रह का श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित होना तथा निःशुल्क रखा जाना अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। बारम्बार प्रशंसनीय है। 
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Wednesday, August 25, 2021

चर्चा प्लस | एक ऐसा शायर जो राष्ट्रपति जियाउल हक़ से नहीं डरा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस           
एक ऐसा शायर जो राष्ट्रपति जियाउल हक़ से नहीं डरा
    - डाॅ शरद सिंह
   25 अगस्त 2008 को उस शायर ने इस दुनिया से विदा ले ली थी जो भारत और पाकिस्तान की दोस्ती को महत्व देता था और जिसने पाकिस्तानी राष्ट्रपति जियाउल हक़ की हुकूमत के आगे घुटने टेकने से इनकार कर दिया था। बदले में उसे देशनिकाला झेलना पड़ा। उस शायर का नाम है अहमद फ़राज़।   

    

कहते हैं कि जो काम राजनीतिज्ञ नहीं कर पाते हंै वह काम साहित्यकार कर सकता है। हर देश का साहित्यकार अपने देश का अघोषित राजदूत होता है। वह सच्चे अर्थों में जनमत की आवाज़ होता है। पाकिस्तानी राजनीतिज्ञ भले ही न चाहें कि भारत के साथ उनके देश के संबंध मधुर हो जाएं लेकिन वहां की आम जनता हमेशा भारत के साथ अच्छे संबंध चाहती है। आम जनता की इसी इच्छा को समय-समय पर अभिव्यक्ति देते रहते हैं वहां के शांति पसंद साहित्यकार। ऐसे साहित्यकारों में एक अग्रणी नाम रहा है अहमद फ़राज़ का। रूमानियत के शायर, प्रगतिशीलता के शायर और भावनाओं को एक कलाकृति की तरह अपने शब्दों के ढांचे में उतार देने वाले शायर अहमद फ़राज़।
एक दिलचस्प घटना है जिससे पता चलता है कि अहमद फ़राज़ और एक भारतीय शायर के विचार  किस तरह एक जैसे थे। पश्चिम एशिया के अरबी बोलने वाले देशों में एक ‘‘जश्ने-शोरा’’ नाम का एक काव्योत्सव हांेता है। उसमें विभिन्न देशों से अलग-अलग भाषाओं के सुप्रसिद्ध शायर आमंत्रित किए जाते हैं। उसी में पाकिस्तान से उर्दू का प्रतिनिधित्व करने गए थे अहमद फराज और हिन्दुस्तान से उर्दू का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे थे शायर रिफ़त सरोश। यह वह समय था, जब इराक की लड़ाई ईरान से चल रही थी। विभिन्न देशों के शायर बगदाद में मौजूद थे। इराकी सरकार को लगा कि यह बढ़िया अवसर है, दुनिया भर के शायरों को ईरान की ज्यादतियों को दिखाने का. इसलिए उन्होंने काव्योत्सव के एक दिन पहले जंग के मोर्चे पर ले जाने के लिए एक बस की व्यवस्था की। सभी को एक-एक यूनीफॉर्म पहनने को दिया। इसका कारण यह बताया गया कि युद्ध के मोर्चे पर जा रहे हैं तो युद्ध की पोशाक होनी चाहिए। सुरक्षा की दृष्टि से यह आवश्यक है। सभी देशों के शायर पोशाक लेकर बस में जा बैठे। जब भारत से पहुंचे रिफत सरोश भी अड़ गए-‘‘आपकी फौजी वर्दी पहनकर हर्गिज नहीं जाऊंगा। कभी अगर फौजी वर्दी पहनने का अवसर आया भी तो अपने देश के लिए पहनूंगा, इराक या ईरान की नहीं।’’ रिफत सरोश को वसपस होटल भेज दिया गया। वे जब होटल पहुंचे तो वहां अहमद फ़राज़ लाॅबी में पहले से बैठे दिखे। रिफत सरोश ने उनसे पूछा कि आपको भी वे लोग साथ नहीं ले गए? तो अहमद फ़राज़ ने हंस कर उत्तर दिया-‘‘निहायत अहमक़ाना ज़िद थी। मैं भी इसी वजह वापस आ गया था। मैं क्यों पहनूं किसी दूसरे मुल्क की वर्दी।’ फिर उन्होंने एक अपना शेर पढ़ा -
जिसको देखो वही जंजीर-ब-पा लगता है
शहर का शहर हुआ दाखिले-जिन्दा जानां।
अहमद फ़राज़ को राष्ट्रपति जियाउल हक की नीतियां पसंद नहीं थीं। उनकी नीतियों को फराज़ जनविरोधी कहते थे। उन्होंने उन नीतियों के विरोध में शायरी भी की। इससे पहले उन्हें पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान ‘‘हिलाल-ऐ-इम्तियाज’’ से सम्मानित किया जा चुका था। लेकिन सन् 2006 में उन्होंने यह सम्मान सरकार की नीतियों के विरोध में वापस कर दिया। स्थितियां बिगड़ गईं। उन्हें देशनिकाला दे दिया गया। लेकिन इन सबसे उनके प्रशंसकों की संख्या घटी नहीं अपितु और बढ़ गई। प्रशंसकों के सिलसिले में एक दिलचस्प घटना यह भी है कि एक बार अमेरिका में उनका मुशायरा था। मुशायरे के समापन पर एक लड़की उनके पास ऑटोग्राफ लेने आयी। नाम पूछने पर लड़की ने अपना नाम बताया-‘‘फ़राज़ा’’। अहमद फ़राज़ ने चैंककर कहा, ‘‘यह क्या नाम हुआ?” तो उस लड़की ने बताया कि, ‘‘मेरे मम्मी-पापा के आप पसंदीदा शायर हैं। उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फ़राज़ रखेंगे। मैं पैदा हो गई तो उन्होंने मेरा नाम फ़राज़ा रख दियाए आपके नाम पर।” इस घटना पर अहमद फ़राज़ ने यह शेर कहा था-
और ‘‘फ़राज’’  चाहिए  कितनी  मोहब्बतें तुझे
मांओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया


14 जनवरी 1931 को जन्मे अहमद फ़राज़ का असली नाम सैयद अहमद शाह था। उनका जन्म पाकिस्तान के नौशेरां शहर में हुआ था। उन्होंने पेशावर विश्वविद्यालय में फारसी और उर्दू विषय का अध्ययन किया था। अहमद फराज ने रेडियो पाकिस्तान में भी नौकरी की और फिर अध्यापन से भी जुड़े। फ़राज़ बचपन में पायलट बनना चाहते थे। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्हें बचपन में पायलट बनने का शौक था पर उनकी मां ने इसके लिए मना कर दिया। वे अंत्याक्षरी की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया करते थे। लेखन के प्रारंभिक काल में वे इकबाल की रचनाओं से प्रभावित रहे। फिर धीरे धीरे प्रगतिवादी कविता को पसंद करने लगे। अली सरदार जाफरी और फैज अहमद फैज के पदचिन्हों पर चलते हुए उन्होंने जियाउल हक के शासन के समय कुछ ऐसी गजलें लिखकर मुशायरों में पढ़ीं जिनके कारण उन्हें ग़िरफ़्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद वे आत्म-निर्वासन में ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप में 6 साल तक रहे। उन्हें क्रिकेट खेलने का भी शौक था। लेकिन शायरी का शौक उन पर ऐसा छाया कि वे अपने समय के गालिब कहलाए। उन्होंने नज़्में भी लिखीं लेकिन उनकी ग़ज़लों ने उन्हें भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में ख्याति दिलाई।
अहमद फ़राज़ भारत को अपना दूसरा घर कहते थे। हिन्दुस्तानी मुशायरों में उन्हें जो सम्मान दिया जाता था, उसकी प्रशंसा करते वे नहीं थकते थे। वे कहते थे-‘‘भारत आ कर मुझे लगता है कि मैं अपने भाइयों के बीच बैठा हूं।’’ एक बार एक पत्रकार ने उनसे कश्मीर विवाद को ले कर भारत और पाकिस्तान के संबंधों के बारे में प्रश्न किया तो अहमद फ़राज़ ने पूरी गंभीरता से उत्तर देते हुए कहा-‘‘भले ही खूबसूरत है लेकिन है तो ज़मीन का एक टुकड़ा ही, उसे ले कर आपस में लड़ना सही नहीं है। अम्न और चैन का रास्ता ही सबसे सही रास्ता होता है।’’
अहमद फ़राज़ की शायरी में जो नज़ाकत और नफ़ासत है, वह उन्हें एक अलग ही मुक़ाम देती है। अनेक पाकिस्तानी एवं भारतीय ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लें गाई हैं। उनकी एक प्रसिद्ध ग़ज़ल है-
रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने  के लिए आ
किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फा है तो  जमाने  के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया  ही  निभाने के लिए आ
जैसे  तुझे  आते हैं  न  आने  के  बहाने
ऐसे ही  किसी  रोज न  जाने के लिए आ


अहमद फ़राज़ अविभाजित भारत में जन्में थे और उनकी शायरी की लोकप्रियता भी अविभाजित रही। वे जितने पाकिस्तान में पसंद किए गए, उतने ही भारत में भी। उनके एक मशहूर शेर देखिए-
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस  तरह  सूखे  हुए  फूल  किताबों  में मिलें


25 अगस्त 2008 को किडनी फेल होने के कारण इस्लामाबाद के एक अस्पताल में अहमद फ़राज़ का निधन हो गया। लेकिन वे अपनी शायरी के दम पर सभी के दिलों में ज़िन्दा हैं। उनके ये दो शेर आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं -
तुम तकल्लुफ को भी इख़लास समझते हो ‘फराज’
दोस्त  होता  नहीं   हर   हाथ  मिलाने  वाला।

और दूसरा शेर -
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई  हमारी  तरह  उम्र  भर  सफ़र में रहा।

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(सागर दिनकर, 25.08.2021)
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