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Friday, May 3, 2024

मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह की तृतीय पुण्यतिथि

03 मई 2021... कोरोना का वह भयानक दौर... 5 दिनों का जीवन संघर्ष... उस दौर का अकेलापन मेरी जिंदगी का अकेलापन बन गया ... यही वह तारीख़ है जिसने मुझसे मेरी वर्षा दीदी को छीन लिया... बस, हर पल यही लगता है कि मुझे उनकी जगह होना चाहिये था... और मेरे बदले उन्हें यहां होना चाहिए था... दुनिया के लिए वे डॉ Varsha Singh थीं... कवयित्री थ़ी... ग़ज़लकार थीं... लेकिन मेरे लिए तो मेरी वह "दीदू" थीं जिनकी उंगली पकड़ कर मैंने चलना सीखा था... जिनसे हंसना, मुस्कुराना सीखा था... आज दीदी के बिना ज़िंदगी... ज़िंदगी नहीं लगती है...
 😢 दीदी! तुम्हारा साक्षात मेरे साथ न होना मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमी है... बस, तुम्हारे साथ होने के अहसास के सहारे ज़िंदा हूं...अपनी इस अभागी "बेटू" को याद रखना😞😢🥺
Love you Didu ❤️ 
& Miss you lot 💔
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Saturday, April 20, 2024

मां डॉ विद्यावती "मालविका जी की तृतीय पुण्यतिथि पर सीताराम रसोई में पुत्री डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा वृद्धजन को भोजन

प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी मैंने वृद्धजन की सेवा तथा अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित संस्था श्रीसीताराम रसोई में अपनी मां डॉ विद्यावती "मालविका" जी की स्मृति में वृद्धजन को भोजन परोसा। यद्यपि मेरी अत्यंत अल्प सहयोग राशि सागर में एक बूंद के समान है किंतु वृद्धजन को अपने हाथों से परोसना बहुत सुख देता है।
   🚩 भोजन आरंभ होने के पूर्व नियमानुसार प्रतिदिन वृद्धजन प्रार्थना करते हैं और भजन गाते हैं। आज मैंने भी उनके साथ खड़ताल बजाते हुए भजन गए। मैंने स्पष्ट महसूस किया कि मेरा इस तरह उनके साथ बैठकर गाना उनके भीतर प्रसन्नता और ऊर्जा का संचार कर रहा था। मुझे भी बहुत प्रसन्नता हो रही थी। अपनत्व की भावना हमेशा हर पक्ष को सुख प्रदान करती है।
🚩 मेरा मानना है कि अपने प्रियजन की स्मृति में इस प्रकार वृद्धाश्रम, भोजन दान स्थल, बालाश्रम आदि में अवश्य जाना चाहिए। हमारा थोड़ा सा सानिध्य उन्हें बहुत-सा अपनापन देकर खुशियां देता है और हमें भी आत्मिक शांति मिलती है।
🚩 मेरे घर से श्री सीताराम रसोई की दूरी बहुत अधिक है। मेरा घर शहर के एक छोर पर है तो श्री सीताराम रसोई  शहर के दूसरे छोर पर ... आभारी हूं श्री पंकज शर्मा जी की जो मां  के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मुझे श्री सीताराम रसोई तक पहुंचने में प्रतिवर्ष सहयोग करते हैं।
🚩 जब आज मैंने सीताराम रसोई से अपने छोटे भाई विनोद तिवारी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वे रेलवे स्टेशन में पानी पिलाने में व्यस्त है क्योंकि इस समय दो ट्रेन आई हुई हैं। फिर उन्होंने एक बड़ी सुंदर बात कही जो मेरे मन को बहुत गहरे तक छू गई। विनोद भाई ने कहा कि "दीदी, मां हमें देख रही होंगी कि उनकी बेटी सीताराम रसोई में वृद्धों को खाना खिला रही है और उनका बेटा रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को पानी पिला रहा है। वे हमें देखकर प्रसन्न हो रही होंगी।"
🚩 यह सच है कि मेरी मां की स्मृति में विनोद भाई की छवि रेलवे स्टेशन में यात्रियों को पानी पिलाने वाले जन सेवक की ही रही। क्योंकि जब वे अस्पताल में थी और हमें संशय था कि वे लोगों को पहचान पा रही हैं या नहीं? फिर भी जब विनोद भाई ने उनसे पूछा की "मां मुझे पहचाना?" तो वे मुस्कुरा कर बोलीं, "हां बेटा, तुम वही हो जो रेलवे स्टेशन में यात्रियों को पानी पिलाते हो।"  शायद नाम उन्हें विस्मरण हो रहा था किंतु विनोद भाई का कार्य उनकी स्मृति में अच्छी तरह रचा बसा था। निश्चित रूप से उनका आशीष विनोद भाई जैसे प्रत्येक कर्मठ और सच्चे जन सेवकों पर हमेशा बना रहेगा।
🚩 मेरे घर से श्री सीताराम रसोई की दूरी बहुत अधिक है। मेरा घर शहर के एक छोर पर है तो श्री सीताराम रसोई  शहर के दूसरे छोर पर ... आभारी हूं श्री पंकज शर्मा जी की जो मां  के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मुझे श्री सीताराम रसोई तक पहुंचने में प्रतिवर्ष सहयोग करते हैं।
🚩 आभारी हूं  श्री सीताराम रसोई परिवार की... जहां कर्मचारी महिलाएं हमेशा मुस्कुरा कर आत्मीयता से स्वागत करती हैं तथा बड़ी जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का निर्वाह करती हैं। यह संस्था अशक्त वृद्धों को उनके घर पर भोजन पहुंचाने का कार्य भी करती है।
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मां डॉ विद्यावती "मालविका" जी की तृतीय पुण्यतिथि - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

20 अप्रैल...आज मेरी मां डॉ विद्यावती "मालविका" जी की तृतीय पुण्यतिथि है ... 
    वही घर... वही घर की दीवारें... वही खिड़कियां... वही दरवाजे... बस, मां नहीं हैं जिन्हें मैं कभी "मैया" तो कभी "नन्ना" कह कर पुकारा करती थी... एक प्रतिष्ठित लेखिका... एक लोकप्रिय शिक्षिका ... लेकिन मेरे लिए तो सबसे पहले मेरी मां थीं ... आज मैं पुकारूं तो किसको? ... बस, महसूस करती हूं कि वे हमेशा की तरह मेरे साथ हैं... यह भ्रम ही सही, पर जीने के लिए सहारा है... वर्षा दीदी होतीं तो मां के विछोह की पीड़ा हम दोनों एक-दूसरे को ढाढस बंधा के झेल लेते ... किन्तु नियति की क्रूरता ... 
     मां! लिखना तुमसे सीखा, पढ़ना तुमसे सीखा और ज़िंदगी की हर कठिनाइयों से जूझना भी तुमसे ही सीखा ... 
     मां! तुम्हारी 'शरदू' तुम्हें हर पल याद करती है ... तुम भी अपनी इस 'शरदू' को याद रखना... मेरे साथ रहना...😢🥺😢
💔
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