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Wednesday, June 10, 2026

चर्चा प्लस | प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                          

     यदि मध्यप्रदेश में सरकारी योजनाओं को देखा जाए तो मन खुश हो जाता है। ‘‘अच्छे दिन’’ का सपना साकार होने की संभावना बढ़ जाती है। किन्तु विडम्बना यह है कि लोकहित की योजनाएं जितनी चुस्त-दुरुस्त हैं उनका क्रियान्वयन उतना ही सुस्त है। यदि सुस्त नहीं होता तो प्रदेश की तस्वीर आज कुछ और होती। बेशक तस्वीर बदल रही है किन्तु उस गति से नहीं जिस गति से बदलनी चाहिए थी। यहां तक कि जिनके लिए योजनाएं हैं उन्हें भी सभी लाभकारी योजनाओं का ज्ञान नहीं है। सुशिक्षित लोगों को भी नहीं। यह सोचने का विषय है कि इस खामी का जिम्मेदार कौन है?


हाल ही में एक सीनियर सिटिजन से मेरी चर्चा हो रही थी। मैंने उनसे पूछा कि आपने अपना सीनियर सिटिजन कार्ड बनवाया कि नहीं? वे मेरा मुंह ताकने लगे। उन्हें ऐसे किसी भी कार्ड की जानकारी नहीं थी। हां, आयुष्मान योजना की जानकारी अवश्य थी जिसके लिए उन्होंने आह भरते हुए कहा कि ‘‘अभी तो मैं पैंसठ का ही हुआ हूं। अभी मुझे आयुष्मान योजना के लिए पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा, यदि तब तक मैं जिन्दा रहा।’’ दरअसल वे नौकरी पेशा नहीं रहे। उनका अपना छोटा-सा व्यवसाय था। उनके बच्चे पढ़-लिख कर मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी पर चले गए हैं। अब पति-पत्नी ही बचे हैं। दोनों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आता रहता है। कुछ हद तक उनकी अपनी सेविंग से काम चल जाता है लेकिन जब कोई मंहगे मेडिकल टेस्ट कराने की नौबत आती है तो उन्हें अपने बच्चों से गुहार लगानी पड़ती है। वे अकेले नहीं, अनेक ऐसे सीनियर सिटिजन हैं जो सरकारी सहायता के लिए तरसते रहते हैं। इसका पहला कारण कि उन्हें अधिकांश योजनाओं का पता ही नहीं है। जिन बहुचर्चित, बहुप्रचारित योजनाओं का पता है वे उनके दायरे में नहीं आते हैं। जिन योजनाओं दायरे में आते भी हैं उनका लाभ लेने का रास्ता उन्हें नहीं पता। सभी सीनियर सिटिजन इतने ‘‘इंटरनेट मित्र’’ नहीं हैं कि वे ऑनलाईन आवेदन कर सकें। लगभग यही हाल उन सभी का है जिन्हें इंटरनेट पर सोशल मीडिया के कुछ एप्प चलाने के अलावा और कुछ नहीं बनता है। उन्हें कियोस्क केन्द्रों की शरण में जाना पड़ता है और पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
अभी माह भर पहले की बात है मैंने अपने एक परिचित से पूछा कि ‘‘आपको अपनी मध्यप्रदेश सरकार की नवांकुर योजना का पता तो होगा?’’
‘‘ये कौन-सी योजना है?’’ उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की और फिर अटकल लगाते हुए बोले। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए होगी यह योजना, है न!’’
उनकी इस अटकल पर मुझे हंसी भी आई और रोना भी। प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में उन उच्चशिक्षित, रोज अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति को पता नहीं है तो सामान्य लोगों से तो इसकी उम्मींद करना ही व्यर्थ है। मैं कुछ बोल पाती इसके पहले ही वे बोल उठे ‘‘मुझे तो बस, लाड़ली लक्ष्मी, जननी योजना और वो जो किसानों के बिल-विल माफ कर दिए जाते हैं, बस उन्हीं पता है।’’
उनके इस कथन में दम था क्योंकि जिन योजनाओं को बहुप्रचारित किया जाए, जिनकी तस्वीरें सबसे ज्यादा छापी जाएं उनके बारे में पता रहना स्वाभाविक है। अब हर योजना के लिए फीता काटने मंत्री महोदय तो आएंगे नहीं। फिर बाकी योजनाओं पर बड़ी खबर कैसे बनेगी? और आजकल तो यही चलन है कि जिस पर विवाद हो, टीवी के न्यूज चैनल्स पर वाद-विवाद हो, टॉक-शो हो, वही जानकारी के पन्ने पर अपनी जगह बना पाता है। खैर, बात चली है नवांकुर योजना की तो उस पर एक संक्षिप्त दृष्टि डाल ली जाए। इससे कम से कम मुझे भी इस योजना की प्रमुख बातें याद रह जाएंगी, जिन्हें मैं औरों से शेयर कर सकूंगी। 
दरअसल, नवांकुर योजना का मूल उद्देश्य प्रदेश में समाज एवं शासन के मध्य सेतु के रूप में कार्य करना है। विकास के कार्यों में समाज की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि समाज विकास के विभिन्न विषयों में दक्ष स्वैच्छिक संगठन उपलब्ध हों। अतः विभिन्न विषयों जैसे जल संरक्षण, सबको शिक्षा सहित भारतीय संस्कारों की शिक्षा, नशामुक्ति, सबको स्वास्थ्य, हरियाली/पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता एवं साफ सफाई, ऊर्जा संरक्षण, कृषि को लाभकारी बनाना, कुपोषण एवं परिवार नियोजन, सामाजिक समरसता तथा विवाद रहित समाज/ग्राम आदि पर विशेषज्ञता रखने वाले स्वैच्छिक संगठन प्रत्येक सेक्टर स्तर पर विकसित किये जायेगें। इन स्वैच्छिक संगठनों द्वारा सेक्टर में गठित प्रस्फुटन समितियों को उनके कार्यों में आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जायेगा, वहीं मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठयक्रम के छात्रों को इंटर्नशिप कराई जायेगी तथा पाठयक्रम संबंधी परामर्श प्रदान किया जावेगा। समाज की स्वैच्छिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने हेतु प्रति वर्ष प्रत्येक विकासखण्ड में 05 (प्रत्येक विकासखण्ड में प्रति सेक्टर हेतु 01 नवांकुर संस्था के मान से) का चयन कर प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि रूपये 01.00 लाख निरंतर (कार्य संतोषजनक पाए जाने पर) प्रदान की जावेगी। यह संस्थायें उस विकासखण्ड के सेक्टर हेतु लीड स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करेंगी। इस प्रकार योजनांतर्गत स्वैच्छिक संगठनों के उन्मुखीकरण एवं पोषण हेतु जिला स्तर पर गठित समिति के माध्यम से प्रदेश में 1565 स्वैच्छिक संगठनों का चयन किया जायेगा। है न बेहतरीन योजना। लेकिन यह सब कुछ कितने प्रतिशत होते दिख रहा है, यह विचारणीय है।
वैसे नवांकुर योजना का लक्ष्य है सेक्टर स्तर पर सक्रिय प्रस्फुटन समितियों/नवीन स्वयंसेवी संस्थाओं का उन्मुखीकरण एवं पोषण करना तथा सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करते हुये आत्म निर्भर मध्यप्रदेश का निर्माण करना। वहीं इसका उद्देश्य है ऐसे स्वैच्छिक संगठन का निर्माण करना जो विकास के प्रमुख विषयों में विशेषज्ञता रखते हो। विकास के प्रमुख विषयों पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने हेतु विषय विशेषज्ञ/स्वैच्छिक कार्यकर्ता तैयार करना। स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से योजनाओं के संचालन हेतु परियोजना निर्माण तथा क्रियान्वयन करना। सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में स्वैच्छिक संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए विकास प्रक्रिया में नागरिक समुदाय को शामिल करना। सामाजिक सुरक्षा एवं समरसता सुनिश्चित् करना। केन्द्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार एवं उनके क्रियान्वयन में सहयोग करना। नवीन व स्थानीय संस्थाओं का पोषण व उनका क्षमतावर्द्धन करना।
चयन हेतु पात्र संस्थाओं के लिए योजनांतर्गत चयन हेतु परिषद की वेबसाइट पर विज्ञप्ति जारी की करने का प्रावधान रखा गया। उन नगर/ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी रखा गया जिनके द्वारा संबंधित विकासखण्ड अंतर्गत लगातार तीन वर्ष तक कार्य किया गया हो तथा परिषद द्वारा संचालित कार्यक्रमों/अभियानों में उनकी निरन्तर भागीदारी रही हो। यह भी सुनिश्चित किया गया कि म.प्र. फमर््स एवं संस्थायें पंजीकरण अधिनियम 1973 के अंतर्गत वे ही पंजीकृत संस्थाएं मान्य होगी जिनमें 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित विकासखण्ड तथा 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित जिले के स्थानीय निवासी हो।
इस सुंदर नवांकुर योजना में नवकरीण ऊर्जा के तहत ऊर्जा साक्षरता अभियान और लोक सेवा प्रबंधन के तहत सी.एम. जनसेवा योजना भी है। यह कितने लोगों को पता है? और नवांकुर की तमाम योजना के अंतर्गत अब तक कितनी प्रगति हुई यह कितने लोगों को पता है? योजना तैयार करने वालों को? कागजी कार्यवाही करने वालों को? जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों एवं जनप्रतिनिधियों को? या फिर इन सबके बारे में कितना पता है उन लोगों को जिनके हित के लिए ये योजनाएं हैं। एक योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’। मेरी एक घरेलू सहायिका यानी कामवाली बहन से बात हुई तो पता चला कि वह अपनी बहू के लिए राजगार ढूंढ रही है लेकिन घर-घर जा कर चौका-बरतन का काम उससे नहीं कराना चाहती है। उसकी बहू को लाड़ली लक्ष्मी और बीपीएल के लाभ मिल रहे हैं किन्तु बिना मेहनत के हाथ आए पैसों का उसे मोल नहीं है। इसीलिए सास चाहती है कि बहू कुछ काम करके भी पैसे कमाए ताकि उसके खर्चों पर लगाम लगे। लेकिन परेशानी ये कि उसकी बहू को घर के कामों के अलावा कुछ नहीं आता है। मैंने उससे कहा कि सरकार की योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’, सो उसे सिलाई सीखने भेजो। वहीं से उसकी कमाई भी शुरू हो जाएगी। इस बारे में उस कामवाली बहन को तनिक भी जानकारी नहीं थी। उसे जानकारी थी तो बस लाड़ली लक्ष्मी योजना की, समूह सहायता योजना ही और साहूकार से कर्जा लेने की। सच तो यह था कि समूह सहायता योजना का वास्तविक स्वरूप भी उसे पता नहीं था। उसने मुझसे पूछा कि वह अपनी बहू को सिलाई सीखने कहां भेजे? सेंटर कहां है? मैं उसे क्या बताती क्योंकि मुझे भी सेंटर के बारे में पता नहीं था। मैंने उसे महिला बाल विकास के दफ्तर का पता बता दिया कि शायद उसे वहां से कोई जानकारी मिल जाए। उसी समय मुझे लगा कि आशा कार्यकर्ता की भांति ऐसी कार्यकर्ताएं भी होनी चाहिए जो योजनाओं की विस्तृत जानकारी घर-घर पहुंचा सकें। 
चलिए बात की जाए योजनाओं के क्रियान्वयन की तो अभी हाल ही में चल रहे जनगणना योजना को ही ले लीजिए। पहली बात तो इसे भरी गर्मी में आरंभ कर दिया गया जिससे गणना करने वालों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। उन्हें चिलचिलाती धूप में दर-दर भटकना पड़ा। उस पर गर्मी की सूनी दोपहर में सब लोग दरवाजा खोलने में भी झिझकते हैं। लिहाजा अभी भी अनेक घर ऐसे हैं जहां गणना करने वाले पहुंचे ही नहीं है, या फिर पड़ोसी से पूछ कर खानापूरी कर बैठे हैं। क्या इससे योजनाओं के लिए सही जानकारी मिल सकेगी? क्या गलत आंकड़ों के आधार पर नई सही योजनाएं बन सकेंगी? वस्तुतः सरकारी योजनाओं में कोई खामी नहीं है लेकिन उनके क्रियान्वयन में अनेक व्यवहारिक खामियां हैं जिन्हें किसी अधिकारी या कर्मचारी को सस्पेंड कर के दूर नहीं किया जा सकता है। खामियां दूर करने के लिए जरूरी है कि लोकहित की योजनाओं को लोक की आवश्यकता के अनुरूप व्यापक बनाया जाए। जिनके लिए यह योजनाएं बनाई जाती हैं उन तक जानकारी की पहुंच बनाई जाए। साथ कुछ योजनाओं को और अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है तथा मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बदले रोजगार के अवसर बढ़ाने जरूरत है। तभी लोकहितकारी योजनाएं अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर सकेंगी और गतिवान बन सकेंगी।    ------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 10.06.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, December 19, 2023

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली वागेश्वरी: बुन्देली भक्ति और लोक की काव्यात्मक प्रस्तुति | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 19.12.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लोकगायक देवीसिंह राजपूत के काव्य संग्रह "बुंदेली वागेश्वरी" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा     
बुंदेली वागेश्वरी: बुन्देली भक्ति और लोक की काव्यात्मक प्रस्तुति        
- समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह    - बुन्देली वागेश्वरी
कवि          - देवी सिंह राजपूत
प्रकाशक       - हाई टैक कम्प्यूटर सेंटर, मेडीकल कॉलेज के सामने, तिली रोड, सागर म.प्र
मूल्य          - 200/-
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  छांदासिक रचनाएं लय और भाव के कारण गेय तथा सरस होती है। ये रचनाएं गीत परंपरा की होती हैं। किसी कवि की भावनाएं संगीतमय होकर कोमलकान्त पदावली के माध्यम से जब अभिव्यक्त होती हैं तो उसे गीत कहते हैं। भारतीय साहित्य में गीत की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन समय के सम्पूर्ण भारतीय साहित्य ही गीतों के रूप में रचे गए हैं। अंग्रेजी में गीत के लिए ‘लिरिक’ शब्द का प्रयोग होता है। वस्तुतः, ‘लायर‘ वाद्ययंत्र पर गाए जाने वाले काव्य को ‘लिरिक’ कहा गया। अंग्रेजी का यह ‘लायर’ शब्द  ग्रीक शब्द ‘लूरा’ से विकसित हुआ। यह एक प्रकार का अति प्राचीन ग्रीक वाद्ययंत्र था, जिसके सहारे गीत गाए जाते थे। इन गीतों को ग्रीक में ‘लुरिकोस‘ कहते थे और अंग्रेजी में आकर इसका नाम ‘लिरिक’ हो गया तथा हिन्दी में ‘गीत’ के नाम से भावनाओं की अभिव्यक्ति की एक विधा है। गीत के इस परिचय को यहां देने का तारतम्य यह है कि गीतों का उद्भव लोक से हुआ और यह काव्य संग्रह जिस कवि के गीतों से सृजित हुआ है वह एक श्रेष्ठ लोकगीत गायक हैं। इसलिए इनके गीतों में लोक का सोंधापन स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। किन्तु यह नहीं भुलाया जा सकता है कि गीत सृजन भी एक गंभीर साधना है।
देवी सिंह राजपूत लोकगीत गायकी के क्षेत्र में समूचे बुंदेलखंड में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनकी बुंदेली लोकगीत गायन की यह विशेषता है कि उन्होंने भजन से ले कर जनजागरण जैसे विषयों के गीत स्वयं लिखे और गाए हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन के अनेक केन्द्रों सहित प्रत्यक्षतः मंच पर उनको सुनना एक अलग ही आनंद का अनुभव कराता है। वे अपने गायन से श्रोताओं को एक अदृश्य रस-बंधन में बांध लेते हैं। वे जिस बुंदेली लोक शैलीबद्ध गीतों के गायन के लिए जाने-पहचाने जाते हैं उनमें से कई गीत उनके इस प्रथम काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली वागेश्वरी’’ में संग्रहीत हैं। जैसा कि संग्रह का नाम है-‘‘बुंदेली बागेश्वरी’’, प्रथम गीत सरस्वती वंदना के रूप में मां वागेश्वरी अर्थात् देवी सरस्वती को समर्पित है। संग्रह का इस प्रथम गीत ‘‘मां बागेश्वरी वन्दना’’ में कवि की भक्ति भावना को सहजता से अनुभव किया जा सकता है-
वीणा वादनी मोरी माँ, हे बागेश्वरी मोरी मां।
वीणा वादनी पुस्तक धारणी
कमल नयन माँ कमल आसनी
दिल से करूं वन्दना, हे बागेश्वरी मोरी मां।
शब्द भाव और मीठी वाणी
रंग रस रसना तूं है कृपाणी
हम बालक करें वन्दना,हे बागेश्वरी मोरी मां।
श्वेताम्बरी माँ बुद्धि विधाता
तुमरी शरण हूं तेरे गुण गाता हूं
शब्दों की करूं मां वन्दना, हे बागेश्वरी मोरी मां
गायक को दे स्वर मयी मणियां
दूर से बतलाओ ना तुम डगरिया
कौन हमारा यहां मां, हे बागेश्वरी मोरी मां।

  यह माना जाता है कि भक्ति की भावना मनुष्य को धैर्य और संयम प्रदान करती है। यह मन को एकाग्र करने का भी काम करती है। विदेशी आक्रमणकारियों के भारत पर आधिपत्य कर लेने तथा मुस्लिम धर्म को बलपूर्वक स्थापित करने के सामाजिक एवं धार्मिक संघर्षमय काल में ही सर्वाधिक भक्ति रचनाओं का सृजन हुआ और वह काल हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल माना गया। वस्तुतः सच्ची भक्ति मानवता की भावना जगाती है जिससे पारस्परिक कलह दूर होते हैं। जब ईश्वर में मां अथवा पिता की कल्पना करते हैं तो उनके प्रति वंदना के भाव स्वतः जाग्रत होने लगते हैं। देवी सिंह राजपूत ने ‘‘बुन्देली देवी गीत’’ में देवी मां के प्रति इसी अपनत्व और आस्था को सरल शब्दों में व्यक्ति किया है-
मैंया अंगना आन पधारो, बिगड़े भाग सम्हारों
नौ दिन तेरी सेवा करु मैं तेरे
ध्यान में उपवास करूँ मैं करो उद्धार हमारो,
मैंया अंगना आन पधारो।
शैल पुत्री, ब्रह्मचारणी, चन्द्र घंटा
नो महामाई कुष्माण्डा और कात्ययानी माँ,
कालरात्री है रुप प्यारो गौरी और सिद्धदात्री,
नौ रात्री है प्यारो।
चैत क्वार में नव दुर्गा आने
सबई जनन पर कृपा बरसाने
जप-जप नाम तुम्हारो, मैंया अंगना आन पधारो,
बिगड़े भाग सम्हारों।

भक्ति के इसी क्रम में शिव वंदना भी है जिसमें कवि ने भगवान शिव के रूप और स्वरूप को पूरी गेयता के साथ सामने रखा है जिससे गीत में दृश्यात्मकता प्रभावी बन पड़ी है-
जै जै शिव शंकर, डमरु बारे।
है त्रिलोकी नाथ जें डमरु बारे।।
बिच्छु तैतइयों को अंग पे चढ़ाके
तन पे लगाए धूनी रमाके
जै बैठे जटा धारी,
जै जै शिव शंकर, डमरु बारे।

ऐसा नहीं है कि कवि ने अपने इस संग्रह में भक्ति भावना की ही काव्य रचनाएं सहेजी हों, उन्होंने इस संग्रह में लोकचार एवं लसोहित की अपनी रचनाओं को भी समुचित स्थान दिया है। जैसे एक रचना है ‘‘बेटी बचाओ’’। यह रचना एक दोहे से आरंभ हुई है -
बिटिया कम ना जानियो, बिटिया है वरदान।
जी घर  बिटिया  होत है,  होवे कन्यादान।।
इसके बाद अगली पंक्तियां हैं-
बिटिया ने मारो रे, भैया बिटिया जान से प्यारी
अपन तरे और दो कुल तारे घर भर खो सुख देती
जावें ममता भरी मताई-रामधई
बिटिया ने मारो, बिटिया जान से प्यारी
सीता राधा गौरा मैया इनई से शिक्षा ले लो
भैया दुनिया माँ में समाई-
रामधई बिटिया ने मारो, बिटिया जान से प्यारी
अगर मारोगे बिटिया को तुम
कहाँ से ममता लाओगे फिर तुम
अकल गई का मारी -
रामधई बिटिया ने मारो, बिटिया जान से प्यारी

लोक जागरण के प्रवाह में एक रचना साक्षरता पर भी आधारित है। यह भी लोकशैलीमें निबद्ध रचना है-
एक घन एक खो जोड़ के गुईयां बात करो कछु करवे की
गैंया बछियां छोड़ के गुईयाँ बात करो कछु करवे की ।
कछु मूरख मारे मिजाजजे अपनी मूछे ऐंठे
कछु सयाने एई बहाने चार जने पढ़वे बैठे
‘क’ कुटम्ब को ‘ख’ खुशियो को बात करो कछु करवे की
गैंया बछियां छोड़ के गुईयाँ बात करो कछु करवे की।

स्वस्थ और स्वच्छ भारत अभियान, श्रमिक कृषि विकास, साक्षरता अभियान, बालविवाह उन्मूलन, राष्ट्रीयता आदि को समर्पित गीतों से इस संग्रह की सामाजिक मूल्यवत्ता स्थापित हुई है। श्रृंगार, भक्ति के साथ-साथ हास्य एवं वीर रस के सुंदर गीतों का समावेश इस संग्रह को अधिक रुचिकर बनाने में सक्षम है।
संग्रह में सबसे बड़ी विसंगति इसके संग्रह के नाम को ले कर है। संग्रह की भूमिकाएं डाॅ. सुरेश आचार्य, डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया, उमाकांत मिश्र एवं मैंने लिखी है। सभी ने कवि द्वारा उपलब्ध पांडुलिपि के अनुसार पुस्तक के नाम में ‘‘बागेश्वरी’’ शब्द का प्रयोग किया है। स्वयं कवि की प्रथम रचना एवं आत्मकथन ‘‘बागेश्वरी’’ शब्द लिए हुए है किन्तु पुस्तक के मुखपृष्ठ पर ‘‘वागेश्वरी’’ शब्द प्रकाशित है। यह त्रुटि पाठक को भ्रमित कर सकती है कि सही शब्द कौन-सा है? इसके साथ ही रचनाओं में गेयता तो पर्याप्त है किन्तु शिल्प पक्ष अत्यंत कमजोर है। छांदासिक एवं गैर छांदासिक दोनों तरह की रचनाओं की प्रतिध्वनि तो इस संग्रह रचनाओं में मौजूद है किन्तु छंद अथवा छंदमुक्त गीत विधा का परिपालन नहीं मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने प्रत्येक रचना को अपनी गेयता के आधार पर आकार दिया है। फिर भी यह विश्वास किया जा सकता है कि लयबद्धता एवं भक्ति तथा लोक का सरोकार होने के कारण इस संग्रह की रचनाएं पाठकों के चित्त को सहज भाव से स्पर्श करेंगी।
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Friday, November 15, 2019

चर्चा प्लस ... संस्कृति से लोक नहीं अपितु लोक से बनती है संस्कृति - डाॅ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
संस्कृति से लोक नहीं अपितु लोक से बनती है संस्कृति
- डाॅ. शरद सिंह 


      समय में परिवर्तन के साथ सांस्कृतिक मूल्यों में भले ही संशोधन एवं परिवर्द्धन होता रहे किन्तु वह संस्कृति जो लोक से उत्पन्न होती है, सदा अक्षुण्ण रहती है। लोक संस्कृति को जन्म देता है, गढ़ता है, संवारता और सहेजता है। यही कारण है कि लोक जीवन में जल और पर्यावरण जैसे मूल तत्वों के प्रति सकारात्मक चेतना आज भी पाई जाती है। लिहाजा किसी भी संस्कृति को समझने के लिए उसके लोक को समझना जरूरी है।

 
Charcha Plus - Sanskriti Se Lok Nahin Apitu Lok Se Banti Hai Sanskriti -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh

भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चैरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। यहां कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।
लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मंा है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे।
एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बाम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। बुंदेलखण्ड में नर्मदा को मां का स्थान दिया गया है। नर्मदा स्नान करने नर्मदातट पर पहुंची मनुष्यों की टोली नर्मदा को देखते ही गा उठती है-
नरबदा मैया ऐसे तौ मिलीं रे
अरे, ऐसे तौ मिलीं के जैसे मिले मताई औ बाप रे
नरबदा मैया... हो....
जब नर्मदा माता है तो गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी? क्या उनसे कोई नाता नहीं रह जाता है? लोकमानस त्रिवेणी से भी अपने रिश्तों को व्याख्यायित करता है। बाम्बुलिया गीत का ही एक और अंश उदाहरणार्थ-
नरबदा मोरी माता लगें रे
अरे, माता तौ लगें रे, तिरबेनी लगें मोरी बैन रे
नरबदा मैया... हो...
भारतीय संस्कृति में मानवमूल्य की महत्ता इतनी सघन है कि प्रकृति को भी रक्तसंबंधियों से अधिक घनिष्ठ माना जाता है। इसके उदाहरण लोकसंस्कारों में देखे जा सकते हैं जो आज भी ग्रामीण अंचलों में निभाए जाते हैं-
कुआ पूजन - विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। इस अवसर पर रोचक गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें कहा गया है कि विवाह संस्कार के लिए पानी लाने जाते समय एक सांप रास्ता रोक कर बैठ जाता है। स्त्रियां उससे रास्ता छोड़ने का निवेदन करती हैं किन्तु वह नहीं हटता है। ठीक किसी हठी रिश्तेदार की तरह। जब स्त्रियां उसे विवाह में आने का निमंत्रण देती हैं तो वह तत्काल रास्ता छोड़ देता है।
सप्तपदी में जल विधान - विवाह में सप्तपदी के समय पर जो पूजन-विधान किया जाता है, उसमें भी जल से भरे मिट्टी के सात कलशों का पूजन किया जाता है। ये सातो कलश सात समुद्रों के प्रतीक होते हैं। इन कलशों के जल को एक-दूसरे में मिला कर दो परिवारों के मिलन को प्रकट किया जाता है।
पूजा-पाठ में जल का प्रयोग - पूजा-पाठ के समय दूर्वा से जल छिड़क कर अग्नि तथा अन्य देवताओं को प्रतीक रूप में जल अर्पित किया जाता है जिससे जल की उपलब्धता सदा बनी रहे।
मातृत्व साझा कराना - सद्यःप्रसूता जब पहली बार प्रसूति कक्ष से बाहर निकलती है तो सबसे पहले वह कुएं पर जल भरने जाती है। यह कार्य एक पारिवारिक उत्सव के रूप में होता है। उस स्त्री के साथ चलने वाली स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। इस तरह पह पेयजल को अपने मातृत्व से साझा कराती है क्योंकि जिस प्रकार नवजात शिशु के लिए मां का दूध जीवनदायी होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों के लिए जल जीवनदायी होता है।
जिस संस्कृति में पृथ्वी की रक्षा से ले कर पारिवारिक संबंधों की गरिमा तक समुचित ध्यान दिया जाता हो उस संस्कृति में मानवमूल्यों का पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहमान रहना स्वाभाविक है। वस्तुतः संस्कृति व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के सतत् विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है। मानव मूल्य संस्कृति से ही उत्पन्न होते हैं और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सत्य, शिव और सुन्दर के शाश्वत मूल्यों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में पाषाण जैसी जड़ वस्तु भी देवत्व प्राप्त कर सर्वशक्तिमान हो सकती है और नदियां एवं पर्वत माता, पिता, बहन, आदि पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं। ऐसी भारतीय संस्कृति की नाभि में मानवमूल्य ठीक उसी तरह अवस्थित है जैसे भगवान विष्णु की नाभि में कमल पुष्प और उस कमल पुष्प पर जिस तरह ब्रह्मा विद्यमान हैं, उसी तरह मानवमूल्य पर ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः’ की लोक कल्याणकारी भावना विराजमान है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 13.07.2019)
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