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Wednesday, August 28, 2024

चर्चा प्लस | देश-विभाजन के विरोध में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधी जी को पत्र लिखा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
देश-विभाजन के विरोध में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधी जी को पत्र लिखा 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                          
           यह माना जाता है कि महात्मा गांधी देश के विभाजन के पक्ष में थे किन्तु वस्तुतः वे आरंभ में विभाजन के पक्ष में नहीं थे। वहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी आरंभ से अंत तक देश के विभाजन का विरोध करते रहे। विभाजन के विरोध में उन्होंने महात्मा गांधी को एक पत्र भी लिखा था जिसमें उन्होंने विभाजन के विचारों पर रोक लगाने के लिए ठोस तर्क भी दिए थे। इस महत्वपूर्ण पत्र ने महात्मा गांधी को भी विभाजन के विरोध में सहमत कर दिया था। क्या थे वे तर्क?     
        श्यामा प्रसाद मुखर्जी तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से बहुत चिन्तित थे। अंग्रेज ‘फूट डालो और राज करो’ की अपनी कुत्सित नीति को अपना कर हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच मतभेद बढ़ाती जा रही थी। यह ऐसा समय था जब दोनों पक्षों को धैर्य वं विवेक से काम लेना चाहिए था किन्तु मुस्लिम लीग मुस्लिम राष्ट्र की संकल्पना को ले कर अपनी गतिविधियां बढ़ाता जा रहा था। जिससे वातावरण में कटुता बढ़ती जा रही थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वयं हिन्दू समर्थक थे किन्तु वे वैचारिक दृष्टि से अतिवादी नहीं थे। वे शांति एवं एकता के पक्षधर थे। 
सन् 1940 में लाहौर में हिन्दू महासभा का अधिवेशन होना था। इस सम्मेलन में सभा के अध्यक्ष वीर सावरकर को आना था किन्तु अस्वस्थता के कारण वे सम्मेलन में नहीं आ सके। तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सभा का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तथा सम्मेलन की सफलता का दायित्व भी सौंपा गया जिसे उन्होंने भली-भांति निभाया। आर्य समाज की ओर से 20 से 22 फरवरी सन् 1944 को दिल्ली में आॅल इंडिया आर्यन कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य देश के संभावित बंटवारे के विरूद्ध जनमत तैयार करना था। क्योंकि मुस्लिम लीग की हिन्दू विरोधी गतिविधियां बढ़ती जा रही थीं। सिंध प्रांत में मुस्लिम लीग के प्रशासन ने स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगा दिया था। अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आमंत्रित किया गया। अपने अध्यक्षीय भाषण में बोलते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि -             ‘‘मनुष्य को कायर बना देने वाली विषाक्त और हीन भावना का मूलोच्छेदन कर लोगों में व्यक्तिगत आत्मसम्मान, देश के प्रति अक्षुण्ण गौरव, दृढ़ वैचारिकता एवं देश की संस्कृति तथा सभ्यता के प्रति अनुराग को जगा कर आर्य समाज ने देश की बड़ी सेवा की है। कोई भी व्यक्ति जो भारत की एकता का विध्वंस करना चाहता है या विभाजन का सक्रिय समर्थन करता है, वह देश द्रोह के सबसे बड़े जुर्म का अपराधी है और उसका किसी भी मूल्य पर सामना करना चाहिए।’’
श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा आॅल इंडिया आर्यन कांग्रेस के अधिवेशन के मंच से दिए गए संदेश ने लोगों के मन में उत्साह का संचार किया और लोगों ने देश के बंटवारे के विरुद्ध अपना स्वर तेज कर दिया। क्रिप्स मिशन और देश के बंटवारे के विरोध के कारण मुस्लिम लीग तथा मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत को बंाट कर पाकिस्तान बनाए जाने की मांग को धीमा कर दिया। किन्तु तभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक बड़ा झटका यह जान कर लगा कि कुछ ही दिन पहले जेल से छूट कर आए महात्मा गंाधी ब्रिटिश सरकार द्वारा सुझाए गए तथा मुस्लिम लीग के हित में तैयार किए गए ‘सी. आर. फार्मूले’ के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना से मिलने का समय तय कर रहे हैं।  श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लगा था कि कम से कम महात्मा गांधी ‘सी. आर. फार्मूले’ की सिफारिश नहीं करेंगे। किन्तु अब वे देख रहे थे कि महात्मा गांधी सी. आर. फार्मूले पर मोहम्मद अली जिन्ना से चर्चा करने को तैयार हैं और इससे देश के बंटवारे की दिशा में एक कदम और उठ जाएगा। गंभीरता से सोचने-विचारने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने महात्मागांधी को एक पत्र लिखा -
   77, आशुतोष मुखर्जी रोड,
   कलकत्ता,
   19 जुलाई, 1944
   प्रिय महात्मा जी,
पत्रवाहक श्री मनोरंजन चैधरी आपके पास बंगाल की स्थिति के संबंध में कुछ नोट और पर्चे ले कर आ रहे हैं। अगस्त 1942 से राजनीति और खाद्यान्न के प्रश्नों पर बंगाल में जो घटनाएं हुई हैं, ये उन पर प्रकाश डालेंगे। आपके विचारार्थ सभी प्राप्तव्य सामग्री इनके हाथ भेजी जा रही है।
सच तो यह है कि श्री राजगोपालाचारी द्वारा श्री जिन्ना को दिए गए प्रस्ताव से हमें बहुत क्षोभ हुआ हैं हम उचित हिन्दू-मुस्लिम समझौते के लिए बहुत उत्सुक हैं, किन्तु श्री राजगोपालाचारी जो रास्ता अपना रहे हैं उससे लक्ष्य प्राप्ति होगी, हमें विश्वास नहीं। अपने अनुभवों के आधार पर आप भी जानते ही होंगे कि श्री जिन्ना कोई खेल खेलने के इच्छुक नहीं हैं। वे स्वयं को भारतीय नहीं मानते और समग्र भारत की स्वतंत्रता से, जिसके लिए भारतियों की कई पीढ़ियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया है, उनका कोई संबंध नहीं है। हमारे लिए बंगाल और भारत का संभावित बंटवारा घृणास्पद है।
अतः हमें बहुत दुख हुआ है कि बिना विभिन्न दृष्टिकोण को परखे आप भी उक्त प्रस्ताव से सहमत दिखाई पड़ रहे हैं। हम आपको कांग्रेस से महान मानते हैं और इस स्थिति में आपकी कोई भी स्वीकृति हम सबके लिए उद्वेगजनक हो सकती है। 
बंगाल की विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के बहुत से लोगों की इस विषय पर जो विचारधारा है, मनोरंजन बाबू आपको अवगत कराएंगे।
हमें भय है कि श्री जिन्ना इस प्रस्ताव का अनुचित लाभ उठाते हुए हिन्दुस्तान और तथाकथित पाकिस्तान के क्षेत्रों में और लाभ पाने का प्रयास करेंगे। उत्पीड़न और उलझन की जिसका परिणाम होगा। ब्रिटिश सरकार आपके कथनानुसार इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी, क्योंकि उसे अपनी सत्ता का मोह है। श्री जिन्ना भी सक्रिय नहीं होंगे, क्यों कि वे नहीं चाहते हें कि गतिरोध समाप्त हो, किन्तु आपका विभाजन का सिद्धांत मान लेने का प्रस्ताव रहेगा, जिससे हमारी भावी कठिनाइयां और बढे़ंगी। 
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप अपने निर्णय पर पुनर्विचार कीजिए। यदि श्री जिन्ना और मुस्लिम लीग को आपकी शर्तें मान्य नहीं हैं तो आप उनका अनुमोदन छोड़ कर अखण्ड भारत का समर्थन कीजिए। भारत विभाजन की किसी भी योजना के विरुद्ध केवल सन् 1942 के ‘हरिजन’ में आपने अपने विचार स्पष्टतम रूप में रखे थे। आपने ठीक ही लिखा था कि ऐसे किसी प्रस्ताव से हम लोगों में नए झगड़े उत्पन्न होने की आशंका रहेगी।
मेरा विचार है कि आपको भारत की स्वाधीनता के लिए  सभी दलों और जातियों के सहयोगब से अपनी योजना प्रस्तुत करनी चाहिए। जो लोग अल्पमतों के हितों की पूर्ण सुरक्षा के साथ पूरे भारत की स्वाधीनता के समर्थक हैं, उन्हें इस योजना को लोकप्रिय बनाने का आह्वान करना चाहिए। अनेक मुसलमान आज यह समझ रहे हैं कि पाकिस्तान बनना असंभव और एक छल है। ब्रिटिश सरकार भी मात्र अपनी सुविधानुसार श्री जिन्ना को समर्थन देती है। ऐसे नाजुक समय में आप श्री जिन्ना को, जो केवल मुस्लिम दृष्टिकोण से ही सोचते हैं, प्रोत्साहित कर रहे हैं। इससे लीग के इतने मुसलमानों को, जो राष्ट्रीय भावना से प्रेरित हो कर भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे हैं, उन्हें बड़ा आघात पहुंचा है।
मुझे आशा है कि जिन प्रांतों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, आप वहां उनकी शोचनीय परिस्थिति से अवगत होंगे ही। आपका कथन है कि उन शर्तों की स्वीकृति देते समय आपने अपने को एक हिन्दू नहीं अपितु भारतीय माना है। यदि आप एक भारतीय होने के नाते मुसलमानों की मांग का विशेष ध्यान रख कर श्री जिन्ना को प्रसन्न करने के लिए तैयार हैं, तब मैं एक हिन्दू होने के नाते हिन्दुओं के न्यायोचित और वैध अधिकारों की रक्षा करने के लिए आपसे क्यों न निवेदन करूं? यदि आप एक भारतीय हैं और आपका हिन्दू या मुसलमानों की किसी भी समस्या से संबंध नहीं है तो आपको अनिवार्य रूप से मुस्लिम लीग की अवहेलना कर देनी चाहिए और उन लोगों को सहयोग देना चाहिए जो केवल भारतीय हैं, और कुछ नहीं।
मैं तिलक जयंती के संबंध में एक अगस्त को पूना आ रहा हूं, वहां तीन दिन ठहरूंगा। इसके पूर्व मनोरंजन बाबू आपके  दर्शन करेंगे और यदि आपने उन्हें मेरे लिए कोई संदेश देने की कृपा की तो मुझे बतलाएंगे।
आशा है आप प्रसन्न होंगे!
सद्भावना सहित
भवदीय -
श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’
अगस्त माह में तिलक जयंती पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूना गए। वहां से लौटते समय उन्होंने महात्मा गंाधी से भेंट की। उन्होंने गंाधी जी से विभाजन के मुद्दे पर चर्चा की तथा इस पर उनके विचार जानने चाहे। 
इस पर महात्मा गंाधी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आश्वस्त किया कि -‘‘मेरे जीते जी भारत का विभाजन नहीं होगा।’’
महात्मा गंाधी के आश्वस्त करने के बाद भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूर्ण आश्वस्त नहीं हुए। उन्हें इस बात का अनुमान था कि यदि जिन्ना ‘सी. आर. फार्मूले’ पर सहमत हो गए तो महात्मा गंाधी भी उन्हें समर्थन देने से पीछे नहीं हटेंगे। इसके आगे की घटनाएं इस बात को सिद्ध करती हैं कि कई बार परिस्थितियां व्यक्ति से अनचाहा इतिहास लिखवा देती हैं। यही हुआ महात्मा गांधी के आश्वासन और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के साथ। देश का विभाजन हुआ जिसकी पीड़ा आज तक हर भारतीय के हृदय को चीरती रहती है।
(विस्तृत जानकारी के लिए आप पढ़ सकते हैं सामायिक प्रकाशन, नईदिल्ली से ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व’’ श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’।) 
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Friday, May 10, 2024

शून्यकाल | जो हुआ, श्यामा प्रसाद मुखर्जी वह कभी नहीं चाहते थे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम "शून्यकाल"

जो हुआ, श्यामा प्रसाद मुखर्जी वह कभी नहीं चाहते थे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                              
        हमारे देश की स्वतंत्रता उस आग के दरिया से गुज़र का पार लगी है जिसे हम विभाजन की विभीषिका के रूप में जानते हैं। उस दौरान लगभग 30 लाख लोग मारे गये, कुछ दंगों में, तो कुछ यात्रा की कठिनाइयों के कारण। इस जानहानि की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन विभाजन के पूर्व ही जो भयावह संकेत मिलने लगे थे उसे श्यामाप्रसाद मुखर्जी भांप गए थे। वे मुस्लिम लीग की गतिविधियों पर अंकुश लगाना चाहते थे। वे भारत को अखण्ड देखना चाहते थे। वे शांति चाहते थे। उन्होंने प्रयास भी किए लेकिन....
सही-सही आंकड़े आज भी किसी को पता नहीं हैं। लेकिन जो अनुमान लगाए जाते हैं और तत्कालीन छायाचित्रों में शरणार्थियों की बाढ़ का जो दृश्य दिखाई देता है, वह अपने आंकड़े खुद ही बयान कर देता है।  यह माना जाता है कि देश के विभाजन दौरान पाकिस्तान से भारत और भारत से पाकिस्तान आने-जाने वाले शरणार्थियों में लगभग 30 लाख लोग मारे गये, कुछ दंगों में, तो कुछ यात्रा की कठिनाइयां न झेल पाने के कारण। विभाजन के बाद के महीनों में दोनों नए देशों के बीच विशाल जन स्थानांतरण दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा जनस्थानांतरण माना जाता है। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। लेकिन इन सबसे परे अनुमानित मौतों के आंकड़े आज तक पीड़ा देते हैं। सुदृढ़ भारत के स्वप्नद्रष्टा डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इस दुरास्वप्न के संकेत मिलने लगे थे। दुर्भाग्यवश उनके विचारों को उस समय गंभीरता से नहीं लिया गया। जिसका दंश कश्मीर की अशांति के रूप में अकसर हमें कष्ट पहुंचाता रहता है। 
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  ने अल्प आयु में ही बहुत बड़ी राजनैतिक ऊंचाइयों को पा लिया था। भविष्य का भारत उनकी ओर एक आशा भरी दृष्टि से देख रहा था। जिस समय लोग यह अनुभव कर रहे थे कि भारत एक संकटपूर्ण स्थिति से गुजर रहा है, उन्होंने अपनी दृढ़ संकल्पशक्ति के साथ भारत के विभाजन की पूर्व स्थितियों का डटकर सामना किया। देश भर में विप्लव, दंगा-फसाद, साम्प्रदायिक सौहाद्र्य बिगाड़ने के लिये भाषाई एवं दलीय आधार पर खूनी संघर्ष की घटनाओं से पूरा देश आक्रान्त था किन्तु इन विषम परिस्थितियों में भी डटकर, सीना तानकर ‘एकला चलो’ के सिद्धान्त का पालन करते हुए डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अखण्ड राष्ट्रवाद का पावन नारा लेकर महासमर में संघर्ष करते रहे।
डाॅ. मुखर्जी ने यह अनुमान लगा लिया था कि यदि मुस्लिम लीग को निरंकुश रहने दिया गया तो उससे बंगाल और हिन्दू हितों को भयंकर क्षति पहुंचेगी। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग सरकार का तख्ता पलटने का निश्चय किया और बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्तमन्त्री बने। इसी समय वे वीर सावरकर के प्रखर राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मलित हुए। 
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। इसलिए उन्होंने सक्रिय राजनीति कुछ आदर्शों और सिद्धान्तों के साथ प्रारम्भ की थी। तत्कालीन शासन व्यवस्था में सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों के विशद जानकार के रूप में उन्होंने समाज में अपना विशिष्ट स्थान अर्जित कर लिया था। एक राजनीतिक दल की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के कारण जब बंगाल की सत्ता मुस्लिम लीग की झोली में डाल दी गई और सन् 1938 में आठ प्रदेशों में अपनी सत्ता छोड़ने की आत्मघाती और देश-विरोधी नीति अपनायी गयी तब डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से देशप्रेम और राष्ट्रप्रेम का अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया और राष्ट्रप्रेम का सन्देश जन-जन में फैलाने की अपनी पावन यात्रा का श्रीगणेश किया। 
मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहां साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से विफल कर दिया। उनके प्रयत्नों से हिन्दुओं के हितों की रक्षा हुई। सन् 1942 में जब ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनैतिक दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया और देश नेतृत्वहीन और दिशाहीन दिखाई देने लगा। ऐसी कठिन परिस्थितियों में डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के पक्ष मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर भारत को नयी दिशा दी।
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वे मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और एक ही हमारी विरासत है। परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया। वहीं मोहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को एक अलग राष्ट्र के लिए मुस्लिम समुदाय के समर्थन के प्रदर्शन के रूप में प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के रूप में घोषित किया। कलकत्ता और बॉम्बे के शहरों में दंगे फैल गए जिसके परिणामस्वरूप लगभग 5000-10,000 लोग मारे गए और 15,000 घायल हो गए। 9 दिसंबर 1946 को मुस्लिम लीग ने, जिसने पहले कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया था, अब इस आधार पर अपना समर्थन वापस ले लिया कि विधानसभा में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों की उचित सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षडयंत्र को कुछ नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे खण्डित भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल हुए। राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने प्रतिपक्ष के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निर्वहन को चुनौती के रूप में स्वीकार किया और शीघ्र ही अन्य राष्ट्रवादी दलों और तत्वों को मिलाकर एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बडा दल था। 
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहां का मुख्यमन्त्री वजीरे-आजम अर्थात् प्रधानमंत्री कहलाता था। संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डाॅ. मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। वे जानते थे कि यदि आज एक राज्य पृथक्करण का रास्ता थाम लेगा तो अन्य प्रांतों में भी अलगाव की आग धधक उठेगी और देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ‘‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’’ 
उन्होंने तात्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। इस प्रकार देश की एकता और अखण्डता के लिए समर्पित डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूप में एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व सदा के लिए सो गया किन्तु उनके द्वारा जलाई गई देशप्रेम की अलख आज भी सतत् रूप से जल रही है। 
उल्लेखनीय है कि मैंने अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व: श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’ में उनके जीवन और विचारों पर विस्तृत शोधात्मक तथ्य प्रस्तुत किए हैं। यह पुस्तक दिल्ली के सामयिक प्रकाशन से 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तकालयों, पुस्तक की दुकानों तथा ऑनलाईन भी उपलब्ध है। दरअसल, मुझे लगता है कि युवा पीढ़ी को अतीत के उन तथ्यों से परिचित होना चाहिए जिन पर वर्तमान की स्थितियां टिकी हुई हैं। साथ ही इन तथ्यों को बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी राजनीतिक चश्में के पढ़ा जाना चाहिए तभी हम अपने अतीत की भूलों को भी पहचान कर उन्हें वर्तमान में सुधार सकेंगे।   
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Friday, November 3, 2023

शून्यकाल | डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां का पत्र पं. नेहरू के नाम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"दैनिक नयादौर" में मेरा कॉलम ...
शून्यकाल
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां का पत्र पं. नेहरू के नाम   
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                            
   एक वृद्धा मां का पुत्र यदि संदेहास्पद स्थितियों में दिवंगत हो जाए, वह भी नज़रबंदी में तो उस मां पर क्या गुज़रेगी, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। वह व्यथित मां एक सर्वोच्च पदासीन व्यक्ति से न्याय की गुहार करेगी ही। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद उनकी मां योगमाया ने अपने पुत्र की संदेहास्पद मृत्यु की जांच किए जाने की मांग तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहार लाल नेहरू को पत्र लिख कर की थी। यह पत्राचार कई पत्रों तक चला। मां योगमाया का प्रथम पत्र यहां प्रस्तुत है ताकि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के अतीत को महसूस किया जा सके। लगभग पूरा पत्राचार सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व’’ श्रृंखला की मेरी छः पुस्तकों में से पुस्तक ‘‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’ में मौजूद है।  
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे ही राष्ट्रवादी नेता थे जो जीवनपर्यन्त राष्ट्र के लिए समर्पित रहे। वे महान शिक्षाविद, चिन्तक तथा प्रखर देशभक्त थे। 6 जुलाई, 1901 को कोलकाता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ। उनके पिता श्री आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। किन्तु डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपनी मां योगमाया के सबसे अधिक निकट थे। अपनी बाल्यावस्था से उन्होंने सत्यनिष्ठा, जनसेवा एवं देशभक्ति की भावना उन्हें अपनी मां से मिली। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सदैव न्याय के पक्ष में खड़े रहे। इसीलिए जब ढाका में दंगे भड़के तो वे ढाका गए और उन्होंने निर्भीकता पूर्वक दंगाप्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। मां को पुत्र का ढाका जाना भयभीत अवश्य किया किन्तु उन्होंने रोका नहीं। मां योगमाया को श्यामा प्रसाद जी के कश्मीर रवाना होने का भी समाचार मिला था किन्तु तब उन्होंने नहीं सोचा था कि यह उनके पुत्र की अंतिम यात्रा सिद्ध होने वाली है। 
मां योगमाया देवी को जब अपने पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु (23 जून 1953) हो जाने का समाचार मिला तो वे स्तब्ध रह गईं। उन्हें इस समाचार पर विश्वास ही नहीं हुआ। फिर जब मां योगमाया को पुत्र की मृत्यु की संदेहास्पद परिस्थितियों के बारे में पता चला तो वे शेख अब्दुल्ला सरकार की भूमिका से क्रोधित और व्यथित हो उठीं। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को एक पत्र लिखा, जिसका प्रमुख अंश इस प्रकार हैं -

‘‘प्रिय श्री नेहरू,
आपका दिनांक 30 जून का पत्र डाॅ. विधानचन्द्र राय ने 2 जुलाई को मेरे पास भेजा। संवेदना एवं सहानुभूति के संदेश के लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। राष्ट्र मेरे प्रिय पुत्र के निधन का शोक मना रहा है। उन्हें एक शहीद की मृत्यु प्राप्त हुई है। उनकी मां होने के नाते मुझे जो शोक है, वह इतना गहरा और अनन्य है कि शब्दों में उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता।
मैं आपसे सांत्वना प्राप्त करने के लिए आपको यह पत्र नहीं लिख रही हूं। किन्तु मैं आपसे न्याय की मांग करती हूं। मेरे पुत्र की मृत्यु नजरबन्दी में - बिना मुकदमा चलाए नजरबन्दी में हुई। आपने अपने पत्र में यह समझाने की कोशिश की है कि कश्मीर सरकार ने वह सब कुछ किया जो किया जाना चाहिए था। आपकी धारणा उन आश्वासनों और सूचनाओं पर आधारित है, जो आपको प्राप्त हुई हैं। मैं पूछती हूं कि ऐसी सूचना का क्या मूल्य है जब यह ऐसे व्यक्तियों द्वारा दी गई हो जिन पर खुद मुकदमा चलना चाहिए। आपका कहना है कि आप मेरे पुत्र की नजरबन्दी के दौरान कश्मीर गए थे। परन्तु मुझे हैरानी है कि उनसे व्यक्तिगत रूप से वहां मिलने और उनके स्वास्थ्य तथा प्रबन्ध के बारे में अपने आपको संतुष्ट कर लेने से आपको किसने रोका था?
उनकी मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई है। क्या यह अत्यधिक आश्चर्यजनक एवं स्तब्धकारी नहीं है कि जब से उन्हें वहां नजरबन्द किया गया, उसके बाद मुझे, जो मैं उनकी मां हूं, सबसे पहली सूचना जो कश्मीर सरकार से मिली वह यह थी कि आपके पुत्र अब इस संसार में नहीं रहे और वह भी उनकी मृत्यु के कम से कम दो घंटे के उपरान्त? और यह संदेश कितने निर्दयतापूर्ण संक्षिप्त तरीके से भेजा गया था। उन्होंने लिखा था कि उन्हें अस्पताल ले जाया गया है, उनकी मृत्यु के दुखद समाचार के बाद हमारे पास पहुंचा। मेरे पास इस बात की पक्की जानकारी है कि मेरा पुत्र अपनी नजरबन्दी के दौरान लगभग आरंभ से ही अस्वस्थ था। कश्मीर की सरकार अथवा आपकी सरकार को भी मेरे पास अथवा मेरे परिवार के पास वह सभी जानकारी भेजने के लिए क्यों नहीं कहा गया, जो कुछ भी आपके या उनके पास थी?
यह बात भी साफ है कि कश्मीर सरकार ने श्यामा प्रसाद के स्वास्थ्य के बारे में उसके पिछले इतिहास को जानने की कभी परवाह नहीं की और आवश्यकता पघ्ने पर ‘नर्सिंगहोम’ की व्यवस्था करने तथा आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की चिंता नहीं की। यहां तक कि उनके बार-बार बीमार होने को भी एक चेतावनी के रूप में नहीं लिया गया। किसी प्रकार की भी चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने में अनावश्यक विलम्ब, अत्यधिक नासमझ तरीके से उन्हें अस्पताल ले जाया जाना, यहां तक कि अस्पताल में उनके साथ उनके दो नजरबन्द सहयोगियों को उपस्थित रहने की अनुमति देने से इनकार करना, सम्बंधित अधिकारियों के क्रूर व्यवहार के कुछ जीते-जागते उदाहरण हैं।
मेरा उन (कश्मीर सरकार) पर यह आरोप है कि उन्होंने अपने इस नियत कर्तव्य का पालन करने में घोर उपेक्षा की और वे इसके निर्वहन में विफल रहे। यह एक ऐसा विषय है, जिसकी जांच होनी चाहिए। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने जो पत्र दिनांक 15 जून को लिखा था वह हमें कश्मीर सरकार द्वारा 24 जून को अर्थात् उनका शव भेजने के एक दिन बाद एक पैकेट में डालकर भेजा गया, और यह पैकेट गत 27 जून को हमें मिला? मुझे आपसे यह सुनकर आश्चर्य और शर्म महसूस होती है कि उन्हें किसी कारागार में नहीं, अपितु श्रीनगर की सुप्रसिद्ध डल झील के किनारे एक निजी बंगले में ठहराया गया था। क्या कोई सोच सकता है कि एक सोने के पिंजरे में कैदी खुश रहता है? स्वतंत्र भारत का एक निर्भीक सपूत बिना मुकदमा चलाए, नजरबंदी में अत्यधिक दुखान्त एवं रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुआ है। 
मैं, उस महान दिवंगत आत्मा की मां, यह मांग करती हूं कि इसकी एक स्वतंत्र एवं सक्षम व्यक्तियों द्वारा अविलम्ब एक पूर्णतया निष्पक्ष एवं खुली जांच होनी चाहिए। मैं यह जरूर चाहती हूं कि एक स्वतंत्र देश में घटित इस महान दुखान्त घटना के बारे में भारत की जनता स्वयं निर्णय करे कि इसके असली कारण क्या थे और आपकी सरकार ने इसमें क्या भूमिका अदा की? यदि किसी व्यक्ति द्वारा, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, कहीं कोई गलती की गई है तो न्याय अपना काम करे और जनता सावधान हो जाए ताकि स्वतंत्र भारत में फिर कभी किसी मां को उसी पीड़ा और शोक के साथ आंसू न बहाने पड़ें।
आपने मुझे अपने योग्य सेवा से बिना किसी हिचकिचाहट के सूचित करने की महती कृपा की है। मेरी ओर से, भारत की माताओं की ओर से हमारी यही मांग है। भगवान आपको साहस दे कि आप सत्य को प्रकाश में आने दें।
मेरे आशीर्वाद सहित, शोकाकुल, भवदीया,
हस्ताक्षर:- योगमाया देवी’’

पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनके पत्र का उत्तर दिया जिससे मां योगमाया संतुष्ट नहीं हुईं और वे लगातार पं. नेहरू से पत्राचार करती रहीं। एक वृद्धा मां जिसने अपने 52 वर्षीय पुत्र को संदेहास्पद स्थितियों में मृत्यु के हाथों खोया हो, तथा उसकी जांच की मांग बार-बार ठुकराई जाती रही हो, ऐसी मां के हृदय की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त कर पाना संभव नहीं है। वस्तुतः इतिहास में कई ऐसे प्रश्न हैं जो आज तक अनुत्तरित हैं। बस, इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी राष्ट्र के निर्माण में राष्ट्रवादी व्यक्तित्वों के प्रयासों एवं बलिदान की सबसे अहम भूमिका रही है।          
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Wednesday, November 30, 2022

चर्चा प्लस | श्यामा प्रसाद मुखर्जी वह कभी नहीं चाहते थे, जो हुआ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
श्यामा प्रसाद मुखर्जी वह कभी नहीं चाहते थे, जो हुआ...
        - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       हमारे देश की स्वतंत्रता उस आग के दरिया से गुज़र का पार लगी है जिसे हम विभाजन की विभीषिका के रूप में जानते हैं।  उस  दौरान लगभग 30 लाख लोग मारे गये, कुछ दंगों में, तो कुछ यात्रा की कठिनाइयों के कारण। इस जानहानि की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन विभाजन के पूर्व ही जो भयावह संकेत मिलने लगे थे उसे श्यामाप्रसाद मुखर्जी भांप गए थे। वे मुस्लिम लीग की गतिविधियों पर अंकुश लगाना चाहते थे। वे भारत को अखण्ड देखना चाहते थे। वे शांति चाहते थे। उन्होंने प्रयास भी किए लेकिन.....
सही-सही आंकड़े आज भी किसी को पता नहीं हैं। लेकिन जो अनुमान लगाए जाते हैं और तत्कालीन छायाचित्रों में शरणार्थियों की बाढ़ का जो दृश्य दिखाई देता है, वह अपने आंकड़े खुद ही बयान कर देता है।  यह माना जाता है कि देश के विभाजन दौरान पाकिस्तान से भारत और भारत से पाकिस्तान आने-जाने वाले शरणार्थियों में लगभग 30 लाख लोग मारे गये, कुछ दंगों में, तो कुछ यात्रा की की कठिनाइयां न झेल पाने के कारण। पाकिसतान से आने वालों को पता नहीं क्यों घर छोड़ कर निकलते समय एक धुंधली आशा फिर भी थी कि वे एक दिन अपने घरों को लौट सकेंगे। उस दौर में कोई अपने घर की चाबी पड़ोसी को देकर आया था और कोई अपने नौकर को, सोचा था कि कुछ दिन तक ऐसा चलेगा। इसके बाद वह दोबारा से पाकिस्तान वापस चले जाएंगे लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सका। एक बार आए लोग दोबारा जाने की स्थिति में कभी नहीं आ सके। विभाजन के बाद के महीनों में दोनों नए देशों के बीच विशाल जन स्थानांतरण दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा जनस्थानांतरण माना जाता है। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। लेकिन इन सबसे परे अनुमानित मौतों के आंकड़े आज तक पीड़ा देते हैं। सुदृढ़ भारत के स्वप्नद्रष्टा डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी  को  इस दुरास्वप्न के संकेत मिलने लगे थे। दुर्भाग्यवश उनके विचारों को उस समय गंभीरता से नहीं लिया गया। जिसका दंश कश्मीर की अशांति के रूप में अक्सर हमें कष्ट पहुंचाता रहता है।
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  ने अल्प आयु में ही बहुत बड़ी राजनैतिक ऊंचाइयों को पा लिया था। भविष्य का भारत उनकी ओर एक आशा भरी दृष्टि से देख रहा था। जिस समय लोग यह अनुभव कर रहे थे कि भारत एक संकटपूर्ण स्थिति से गुजर रहा है, उन्होंने अपनी दृढ़ संकल्पशक्ति के साथ भारत के विभाजन की पूर्व स्थितियों का डटकर सामना किया। देश भर में विप्लव, दंगा-फसाद, साम्प्रदायिक सौहाद्र्य बिगाड़ने के लिये भाषाई एवं दलीय आधार पर खूनी संघर्ष की घटनाओं से पूरा देश आक्रान्त था किन्तु इन विषम परिस्थितियों में भी डटकर, सीना तानकर ‘एकला चलो’ के सिद्धान्त का पालन करते हुए डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अखण्ड राष्ट्रवाद का पावन नारा लेकर महासमर में संघर्ष करते रहे।
डाॅ. मुखर्जी ने यह अनुमान लगा लिया था कि यदि मुस्लिम लीग को निरंकुश रहने दिया गया तो उससे बंगाल और हिन्दू हितों को भयंकर क्षति पहुंचेगी। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग सरकार का तख्ता पलटने का निश्चय किया और बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्त मंत्री बने। इसी समय वे वीर सावरकर के प्रखर राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मलित हुए।
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। इसलिए उन्होंने सक्रिय राजनीति कुछ आदर्शों और सिद्धान्तों के साथ प्रारम्भ की थी। सार्वजनिक जीवन में पदार्पण करने के पश्चात् उन्होंने अपनी प्रखर विचारधारा से, सम्मेलनों, जनसम्पर्क एवं सभाओं के माध्यम से, अपने ज्वलन्त उद्बोधनों से, जनता के मन में एक नयी ऊर्जा व नये प्राण का संचार किया। उनकी लोकप्रियता और उनकी ख्याति दिनों-दिन बढ़ती गयी। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी महान शिक्षाविद्, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। डाॅ. मुखर्जी की ‘जनसंघ’ के विचार किसी भी प्रकार से संकुचित नहीं थे। वे जनसंघ के रूप में आमजन के लिए एक सशक्त संघीय प्रणाली को स्थापित करना चाहते थे। राष्ट्र और राष्ट्र का आमजन उनके लिए प्रमुख था, राजनीतिक विचारधारा नहीं। एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में वे सदैव भारत के हित में कार्य करते रहे। एक समर्पित राष्ट्रभक्त के रूप में उनका उदाहरण दिया जाता है। भारतीय इतिहास उन्हें एक जुझारू कर्मठ विचारक और चिन्तक के रूप में स्वीकार करता है। भारत के लाखों लोगों के मन में एक निरभिमानी देशभक्त की उनकी छवि अमिट रूप से अंकित है। वे आज भी बुद्धिजीवियों और मनीषियों के आदर्श हैं। वे लाखों भारतवासियों के मन में एक पथप्रदर्शक एवं प्रेरणापुंज के रूप में आज भी समाए हुए हैं।
तत्कालीन शासन व्यवस्था में सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों के विशद जानकार के रूप में उन्होंने समाज में अपना विशिष्ट स्थान अर्जित कर लिया था। एक राजनीतिक दल की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के कारण जब बंगाल की सत्ता मुस्लिम लीग की झोली में डाल दी गई और सन् 1938 में आठ प्रदेशों में अपनी सत्ता छोड़ने की आत्मघाती और देश-विरोधी नीति अपनायी गयी तब डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से देशप्रेम और राष्ट्रप्रेम का अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया और राष्ट्रप्रेम का सन्देश जन-जन में फैलाने की अपनी पावन यात्रा का श्रीगणेश किया।
मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहां साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से विफल कर दिया। उनके प्रयत्नों से हिन्दुओं के हितों की रक्षा हुई। सन् 1942 में जब ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनैतिक दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया और देश नेतृत्वहीन और दिशाहीन दिखाई देने लगा। ऐसी कठिन परिस्थितियों में डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के पक्ष मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर भारत को नयी दिशा दी।
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वे मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और एक ही हमारी विरासत है। परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया। वहीं मोहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को एक अलग राष्ट्र के लिए मुस्लिम समुदाय के समर्थन के प्रदर्शन के रूप में प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के रूप में घोषित किया। कलकत्ता और बॉम्बे के शहरों में दंगे फैल गए जिसके परिणामस्वरूप लगभग 5000-10,000 लोग मारे गए और 15,000 घायल हो गए। 9 दिसंबर 1946 को मुस्लिम लीग ने, जिसने पहले कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया था, अब इस आधार पर अपना समर्थन वापस ले लिया कि विधानसभा में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों की उचित सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षडयंत्र को कुछ नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे खण्डित भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल हुए। राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने प्रतिपक्ष के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निर्वहन को चुनौती के रूप में स्वीकार किया और शीघ्र ही अन्य राष्ट्रवादी दलों और तत्वों को मिलाकर एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बडा दल था।
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहां का मुख्यमन्त्री वजीरे-आजम अर्थात् प्रधानमंत्री कहलाता था। संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डाॅ. मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। वे जानते थे कि यदि आज एक राज्य पृथक्करण का रास्ता थाम लेगा तो अन्य प्रांतों में भी अलगाव की आग धधक उठेगी और देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ‘‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’’
उन्होंने तात्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन पर उनके मित्र कवि हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने उनकी स्मृतियों को समर्पित करते हुए एक कविता लिखी थी, जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं -

एक महामानव चला गया...
हे मित्र! हम अनुभव करेंगे
तुम्हारी उपस्थिति की कमी का
हम अनुभव करेंगे तुम्हारी
उस वाणी का
जो हर बार तुम्हारे मुख से निकल कर
तुम्हारे विचारों की गर्जना करती थी
हम कैसे, किस भाषा में व्यक्त करें
अपने इस दुख को
और हम कैसे भूल सकेंगे
इस शोकपूर्ण दिन को?

इस प्रकार देश की एकता और अखण्डता के लिए समर्पित डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूप में एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व सदा के लिए सो गया किन्तु उनके द्वारा जलाई गई देशप्रेम की अलख आज भी सतत् रूप से जल रही है।
      उल्लेखनीय है कि मैंने अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व: श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’ में उनके जीवन और विचारों पर विस्तृत शोधात्मक तथ्य प्रस्तुत किए हैं। यह पुस्तक दिल्ली के सामयिक प्रकाशन से 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तकालयों, पुस्तक की दूकानों तथा ऑनलाईन भी उपलब्ध है। दरअसल, मुझे लगता है कि युवा पीढ़ी को अतीत के उन तथ्यों से परिचित होना चाहिए जिन पर वर्तमान की स्थितियां टिकी हुई हैं। साथ ही इन तथ्यों को बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी राजनीतिक चश्में के पढ़ा जाना चाहिए तभी हम अपने अतीत की भूलों को भी पहचान कर उन्हें वर्तमान में सुधार सकेंगे।        
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