Thursday, July 2, 2026
बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, July 1, 2026
चर्चा प्लस | हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक दिन अचानक सभी के मोबाईल पर रेड अर्लट बजा। चेतावनी थी मौसम विभाग की ओर से। साथ ही मैसेज भी था कि तीन घंटे में तेज हवाएं चलेंगी। तीन क्या, तेरह घंटे निकल गए लेकिन रेड अलर्ट वाली तेज हवाएं नहीं चलीं। बहरहाल, लोगों को रेड अर्लट बजने का अनुभव तो हुआ। लेकिन यदि सही में तेज तूफानी हवाएं चलतीं तो आमजन को क्या करना चाहिए इसका उन्हें कोई पता नहीं था। चूंकि तूफानी हवाएं नहीं चलीं तो मामला हंसी-मजाक में दब गया। लेकिन प्रकृति कभी मजाक नहीं करती। इसका जाता उदाहरण वेनेजुएला में आया भूकंप है। गूगल के मौसम विभाग ने चेतावनी भी दी थी किन्तु हताहतों की संख्या दस हजार से अधिक रही। क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि वे अपना बचाव कैसे करें? वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट पर स्थित है। भूकंपों की यह श्रृंखला 7.2 तीव्रता के भूकंप से शुरू हुई और 39 सेकंड बाद पास ही में 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आया। वेनेजुएला सम्हल नहीं सका। क्या हम सम्हल सकेंगे?
24 जून 2026 को वेनेजुएला में शाम के समय दो शक्तिशाली भूकंप आए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार पहले 7.1 और दूसरे 7.5 तीव्रता के भूकंप ने काराकास में कई इमारतें गिरा दीं। लोग सड़कों पर आ गए। सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई। पहला भूकंप 7.1 तीव्रता का था, जिसका केंद्र मोरॉन समुदाय के पश्चिम में था। ये देश के कैरेबियन तट पर स्थित है, काराकास से करीब 168 किलोमीटर दूर। इसकी गहराई 13 किलोमीटर थी। कुछ मिनट बाद दूसरा और भी बड़ा 7.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसकी गहराई 10 किलोमीटर थी। केंद्र मोरॉन से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में था। इन भूकंपों ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। लोग सड़कों पर निकल आए, इमारतों की दीवारें गिर गईं और धूल के गुबार उठते दिखे। इसके साथ ही कई राज्यों में झटके महसूस किए गए, खासकर काराकास के अल्तामिरा इलाके में भारी नुकसान हुआ। लोगों से बाहर रहने और आफ्टरशॉक्स से सावधान रहने की अपील की गई।
भूकंप पृथ्वी की टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति से होते हैं। वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट और साउथ अमेरिकन प्लेट की सीमा पर स्थित है। भूगर्भीय वैज्ञानिकों के अनुसार कैरेबियन प्लेट साउथ अमेरिकन प्लेट के सापेक्ष पूर्व दिशा में लगभग 20 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से खिसक रही है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ट्रांसफॉर्म बाउंड्री है, जहां प्लेट्स एक-दूसरे के बगल से गुजरती हैं, जैसे सैन सेबेस्टियन और एल पिलार फॉल्ट स जब प्लेट्स फंस जाती हैं और तनाव बढ़ता है, तो अचानक फिसलन होती है, जिससे भूकंप आता है। इस बार के भूकंप उथले थे (10-13 किमी गहराई), इसलिए उनका प्रभाव ज्यादा था। उथले भूकंप सतह पर ज्यादा कंपन पैदा करते हैं। यह क्षेत्र सदियों से सक्रिय है। सन 1812 और 1900 में भी काराकास के आसपास 7$ तीव्रता के भूकंप आए थे. इस प्लेट बाउंड्री का बड़ा हिस्सा श्लॉक्डश् है यानी तनाव जमा हो रहा है, जो 8 तीव्रता तक के भूकंप पैदा कर सकता है। इस डबलेट इवेंट (फोरशॉक के तुरंत बाद मेनशॉक) ने ऊर्जा रिलीज की, जो क्षेत्र की जटिल भू-संरचना का नतीजा है। उत्तर पश्चिम और दक्षिण पूर्व दिशा की सहायक फॉल्ट्स भी यहां सक्रिय हैं, जो स्ट्राइक-स्लिप मोशन पैदा करती हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि वेनेजुएला ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ का हिस्सा नहीं है, जहां भूकंप, विशेष रूप से उच्च तीव्रता वाले भूकंप, अपेक्षाकृत आम हैं। यही कारण है कि इस तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला जैसे स्थान पर जापान की तुलना में कहीं अधिक नुकसान पहुंचा। क्योंकि ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ में या उसके निकट होने कारण जापान इस प्रकार की घटनाओं के लिए कहीं अधिक तैयार रहता है। वहां बच्चों को भी स्कूल में प्रशिक्षण्या दिया जाता है कि भूकंप की चेतावनी मिलने पर स्वयं को किस तरह सुरक्षित रहना है। हमारे देश में आम नागरिकों को नही पता कि बाढ़, भूकेप या ट्विस्टर आने पर किस तरह अपना बचाव करना है?
ऐसा नहीं है कि कैरेबियन प्लेट में पहले कभी भूकंप नहीं आए, कैरेबियन प्लेट के दक्षिणी भाग में बड़े भूकंप आते रहते हैं। पिछले 100 वर्षों में इस क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता के पांच भूकंप आ चुके हैं। सितंबर 2025 में, उत्तरी वेनेजुएला में दो भूकंपों का एक साथ कहर बरपा लेकिन इसकी तीव्रता वर्तमान भूकंप से कम थी यानी रिक्टर स्केल पर 6.2/6.3 तीव्रता। यद्यपि 6.3 तीव्रता का भूकंप भी बड़ा होता है, लेकिन यह प्रायः व्यापक, विनाशकारी क्षति का कारण नहीं बनता है। 7.5 तीव्रता का भूकंप अन्य भूकंपों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। इसमें खराब ढंग से निर्मित या बिना सुदृढ़ीकरण वाली इमारतों को भारी नुकसान पहुंचता है। जिससे अधिक जनहानि भी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष की घटना तीव्रता और उत्सर्जित ऊर्जा के आधार पर पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 63 गुना अधिक शक्तिशाली थी । उत्तरी वेनेजुएला में आए इस भूकंप से प्रभावित क्षेत्र के बारे में यूएसजीएस के आकलन के अनुसार, ष्कुल मिलाकर, इस क्षेत्र की आबादी भूकंप के झटकों के प्रति संवेदनशील संरचनाओं में रहती है, हालांकि कुछ संरचनाएं भूकंप प्रतिरोधी भी हैं। सबसे अधिक संवेदनशील भवन प्रकार बिना सुदृढ़ीकरण वाली ईंटों की चिनाई और मिट्टी के ब्लॉक से निर्मित हैं।
2018 में, 7.3 तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के कम आबादी वाले क्षेत्र (काराकास क्षेत्र में नहीं) के तट से काफी दूर उत्तर में आया था। इस घटना के परिणामस्वरूप मध्यम स्तर की क्षति हुई और कुछ लोगों की मौत हुई।
सन 1997 में, कैरियाको के उत्तर में अंतर्देशीय क्षेत्र में 6.9 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 81 लोगों की मौत हुई थी। सन 1967 में, तटरेखा के पास 6.6 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 240 लोगों की मौतें हुई और ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट इमारतों के ढहने सहित व्यापक क्षति हुई थी। सन् 97 वर्ष पूर्व, सन् 1929 में, समुद्र तट से दूर 6.7 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप सुनामी भी आई थी। ताजा भूकंप यानी जून 2026 में आए दोहरे भूकंपों की घटना वेनेजुएला के आबादी वाले हिस्सों में, समुद्र तट से दूर नहीं, बल्कि अंतर्देशीय क्षेत्र में हुई, यह एक 7.5 तीव्रता के भूकंप से होने वाले दोहरे भूकंपों की तुलना में अधिक समय तक चली और इसलिए पिछली सदी में आए किसी भी भूकंप की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली रही। यूएसजीएस का अनुमान है कि मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक हो जाएगी और संभावित रूप से 10,000 से भी अधिक हो सकती है।
वेनेजुएला में आए भीषण भूकंप का भारतीय उपमहाद्वीप की जियोलॉजिकल (भूगर्भीय) संरचना से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार यह भारत के लिए सजग रहने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की एक बहुत बड़ी चेतावनी जरूर है।
वेनेजुएला में जो तबाही हुई, वह हमें निम्नलिखित कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के लिए सबक देती है कि भारत में हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्व के राज्य, अंडमान-निकोबार, गुजरात, कच्छ और दिल्ली-एनसीआर अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय ज़ोन 4, 5 में आते हैं। इन क्षेत्रों के नीचे इंडियन प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिससे कभी भी वेनेजुएला जैसे या उससे भी बड़े तीव्र झटके (8.0$ मैग्नीट्यूड) आ सकते हैं।
वेनेजुएला के भूकंप के कुछ दिन दिल्ली, एमसीआर और उत्तर भारत के कई शहरों में भूकंप के झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में आए भूकंप का केंद्र धरती की सतह से काफी उथला था (10 से 20 किलोमीटर की गहराई), जिसके कारण धरती की सतह पर कंपन बहुत भयानक हुआ। हिमालय और उत्तर भारत के भूकंप भी अक्सर उथले होते हैं, जो अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वेनेजुएला में भारी तबाही का एक बड़ा कारण वहां की इमारतों का भूकंपरोधी न होना था। ठीक इसी तरह, दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य संवेदनशील शहरों में अधिकांश निर्माण अनियोजित हैं। यदि भारत में ऐसा भूकंप आता है, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। भूकंपीय संवेदनशीलतारू नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, भारत के 29 प्रमुख शहर उच्च भूकंप जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
प्रकृति में होने वाले निरंतर परिवर्तन जिन्हें हम जलवायु परिवर्तन भी कहते हैं लगातार किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की चेतावनी दे रहा है लेकिन हम कागजी कार्यवाहियों में व्यस्त हैं। न तो गगनचुंबी इमारतों की ठीक से जांच होती है कि वे भूकंपरोधी हैं या नहीं और न भूकंप के समय सुरक्षित रहने का उपाय आमजन को सिखाया जाता है। यह कटु सत्य है कि जिन शहरों में इमारतों के आग से बचाव के उपाय की ही जांच नहीं की जाती है वहां प्राकृतिक आपदा से बचाव कहां सिखाया जाएगा? अब खुद आमजन को प्राकृतिक आपदा से बचना सीखना होगा जबकि यह आपदाप प्रबंधन तथा जिला प्रशासनों का दायित्व है। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 01.07.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, June 30, 2026
पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य - 200/-
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हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।
श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।
पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”
वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”
दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।
चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है। यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।
संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।
सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।
संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है। जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है। यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।
11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।
कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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Saturday, June 27, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | डिवाइडर ने भओ टकरौंदा हो गओ, रोजीना दो-चार टकरा रये | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Thursday, June 25, 2026
बतकाव बिन्ना की | सबरे लड़इयों को ब्याओ भओ जा रओ, मनो पानी ने बरस रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
चर्चा प्लस | हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
Wednesday, June 24, 2026
देव जागेश्वर नाथ शिव मंदिर बांदकपुर भ्रमण | ट्रैवलर डॉ (सुश्री) शरद सिंह
Tuesday, June 23, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | मानसून खों ने कोसों, इते तो ऊंसईं सब काम लेट होत आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।
भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।
यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।
यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।
“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं। विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।
कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/- साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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Sunday, June 21, 2026
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Thursday, June 18, 2026
बतकाव बिन्ना की | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, June 17, 2026
चर्चा प्लस | जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हम पशुओं का सम्मान करते हैं। हम गाय को अपनी माँ मानते हैं। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई माँ समान गाय को ज़रा भी चोट पहुँचाए। जब हम कुत्तों को सड़कों पर घूमते हुए देखते हैं, तो हमें उन पर दया आती है। जब किसी गाड़ी की टक्कर से किसी कुत्ते की मौत हो जाती है, तो उसकी बेरहम मौत पर हमें दुख होता है। जानवरों के लिए हमारे मन में कोमल भावनाएँ होती हैं, लेकिन इस जीव दया की भावना के चलते क्या हम मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बढ़ता नहीं जा रहा है? आवारा कुत्तों को न मारा जाए यह एक अच्छी मानवीय भावना है किन्तु वहीं जब 3 साल की नन्हीं बालिका माही का 55 टांकों वाले चेहरे की तस्वीर देखने को मिलती है तो आत्मा कांप उठती है। क्या गुज़री होगी उस नन्हीं बच्ची पर। उसका क्या दोष था जो उसे आवारा कुत्तों के हमले की मर्मांतक पीड़ा झेलनी पड़ी। तो क्या उन आवारा कुत्तों को पूरा दोष था जो भेड़ियों के कुल के हैं और जिनके डीएनए भेड़ियों से 99 प्रतिशत मिलते हैं? इस विषय पर गंभीरता से सोचना जरूरी है और हल निकालना भी।
लगभग हर भारतीय शहर, गांव और कस्बों में आवारा कुत्ते पीढ़ियों से घूम रहे हैं। बेशक वे हमारे मित्र हैं, वफादार हैं लेकिन उस स्थिति में जब वे हमारे पालतू हों। वैसे पालतू कुत्तों के द्वारा अपने मालिक को काट लिए जाने की भी अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं। मगर समस्या उनकी नहीं बल्कि उन कुत्तों की है जो सड़कों पर दबंगई से आवारा घूमते हैं। पहले यह कानून था कि नगरपालिका द्वारा जगहर की गोलियां दे कर कुत्तों की संख्या को नियंत्रित कर दिया जाता था किन्तु जब से माननीय मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवाया कि आवारा कुत्तों को ज़हरीली गोलियाँ देकर नहीं मारा जाना चाहिए, तब से उनकी संख्या काफ़ी बढ़ गई है। यह जीव दया के पक्ष में एक अच्छा निर्णय था। मैं खुद जानवरों को मारने के विरुद्ध हूँ। किसी जानवर को ज़हर देकर मारना मानवीय तरीका नहीं है। लेकिन इस कानून को लाते समय क्या यह सोचा गया कि इसके परिणाम क्या होंगे? यह तो पता नहीं किन्तु आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी किए जाने का कानून पास हुआ। लेकिन समस्या यह है कि हमारे देश में कई अच्छे प्रावधान तो हैं, पर उनके लागू होने में कई कमियाँ हैं। इन्हीं कमियों की वजह से कुत्ते आज भी गाँवों और शहरों में बड़ी संख्या में घूम रहे हैं और अपनी बदकिस्मती का जीवन जीते हुए मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हैं।
समाचार पत्रों में आए दिन आवारा कुत्तों द्वारा गंभीर रूप से काटे जाने की घटनाएं पढ़ने को मिलती रहती हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के माहिदपुर तहसील के देवलवाड़ी गांव में 3 वर्ष की मासूम माही अपने पिता के साथ अपने घर के बाहर आंगन में थी, तभी एक कुत्ते ने उन पर हमला कर दिया। नन्हीं माही को इतनी बुरी तरह से काटा कि उसका चेहरा लहूलुहान हो गया। चिकित्सकों को उसके घावों को सीने के लिए 55 टांके लगाने पड़े। ज़रा सोचिए कि 3 साल की नन्हीं बच्ची और 55 टांके! अखबार में छपी तस्वीर देख कर आंखों में आंसू आ गए। क्या यह जीव दया का उल्लंघन नहीं है? किन्तु आवारा कुत्तों को क्या पता कि जीव दया क्या होती है। वे तो स्वभाव से ही वन्य पशुओं के समान हैं।
यह वैज्ञानिक सत्य है कि कुत्ते भेड़ियों के कुल के हैं। कुत्तों और भेड़ियों के डीएनए में 99 प्रतिशत समानता है। वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार, पालतू कुत्ता और ग्रे भेड़िया दोनों ‘‘कैनिडे’’ कुल का हिस्सा हैं। ये आपस में प्रजनन करके स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकते हैं। वैसे कुत्ते सीधे तौर पर आधुनिक भेड़ियों के वंशज नहीं हैं, बल्कि आज के कुत्ते और भेड़िये दोनों ही एक विलुप्त हो चुके प्राचीन भेड़ियों के वंशज हैं। मनुष्यों के साथ रहते-रहते वे मनुष्य-मित्र बन जाते हैं। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो उनके व्यवहार में परिस्थितिजन्य भिन्नता मौजूद रहती है। जैसे जिन पालतू कुत्तों को घूने-फिरने की आजादी, लोगों से मेल-मिलाप की छूट और अपने मालिक से अधिक प्रेम मिलता है वे प्रायः शांत और मिलनसार स्वभाव के हो जाते हैं। किन्तु जिन पालतू कुत्तों को अधिकतर पिंजरे में या जंजीरों से बांध कर रखा जाता है तथा रात में ही चौकीदारी के लिए बाहर लाया जाता है वे अधिक खूंखार यानी एग्रेसिव होते हैं। फिर भी दोनों ही स्थिति के पालतू कुत्तों को समय पर भोजन-पानी और दवाएं मिलती रहती हैं। कम से कम दिन में दो बार उन्हें पट्टा बांध कर घर के बाहर घुमाया भी जाता है। हमारे देश में विशेषरूप से उन्हें पौटी कराने के लिए। जोकि शर्मनाक बात है। क्योंकि एक ओर तो अपने पालतू कुत्तों को सब कुछ अच्छे से अच्छा दिया जाता है, वहीं पौटी कराने के लिए किसी भी गंदी जगह पर ले जाता जाता है। जिनसे उन कुत्तों को भी बीमारियां होने का खतरा रहता है और मनुष्यों को भी गंदगी का सामना करना पड़ता है।
खैर, आवारा कुत्तों की स्थिति पालतू कुत्तों से भिन्न होती है। उन्हें हर उस व्यक्ति की ओर आशा भरी दृष्टि से देख कर दुम हिलाना होता है जिनसे उन्हें रोटी के कुछ टुकड़े मिलने की उम्मींद होती है। ये कुत्ते भोजन की आशा में स्वयं को वफादार और चौकीदार बनाने में जुटे रहते हैं। इसीलिए ये आवारा कुत्ते हमें अच्छे लगते हैं। हम उन्हें बचा हुआ भोजन देकर सोच लेते हैं कि उससे उनका पेट भर गया होगा। जबकि सच्चाई यह नहीं होती है। दिन भर दाने-दाने के लिए भटकने वाले कुत्ते जहां एक ओर अपने समुदाय में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए संघर्ष करने हैं वहीं निरंतर भटकते रहने के कारण उन्हें जितनी भूख लगती है, उतना खाना नहीं मिलता है। उस स्थिति में तो और भी नहीं जब कुत्तों की संख्या अधिक हो। यहीं से शुरू होता है उनके भेड़िए वाले डीएनए का कुलबुलाना। भेड़िए समूह में रहते हैं जिसका नेता उनमें सबसे शक्तिशाली यानी अल्फा भेड़िया होता है। उस अल्फा भेड़िए के नेतृत्व में ही शेष भेड़िए शिकार करते हैं। आवारा कुत्तों में भी कमजोर कुत्ते उस शक्तिशाली कुत्ते के साथ समूह बना लेते हैं जिसके बल पर उन्हें भोजन का कुछ हिस्सा मिल सके। आवारा कुत्तों के हर झुंड में एक अल्फा डॉग होता है। यह खूंखार, अवसरवादी और आक्रामक होता है। चूंकि आवारा कुत्ते मनुष्यों की बस्ती में रहते हैं और वे जानते हैं कि उन्हें मनुष्यों से ही भोजन मिलेगा, इसलिए वे मनुष्यो से ‘‘बना कर चलते’’ हैं। लेकिन जब उनका अपना झुंड बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो वे अपनी भूख मिटाने के लिए अवसर वादी बन जाते हैं। साथ ही उनके भीतर की हिंसक प्रवृत्ति जागने लगती है। अकसर यह देखने में आता है कि आवारा कुत्ते छोटे बछड़ों को घेर कर उसे काटने का प्रयास करते हैं। ऐसे मुसीबत में फंसे बछड़ों को कभी गाय बचा लेती है तो कभी मनुष्य। फिर भी कई बार नन्हें बछड़े कुत्तों का शिकार हो जाते हैं। पानी की तलाश में गांव में घुस आने वाले हिरण जैसे मासूम पशु भी आवारा कुत्तों के शिकार बन जाते हैं। क्योंकि बात वही है कि आवारा कुत्तों के भीतर का भेड़िया जाग उठा होता है।
मनुष्य आखिर मनुष्य होता है और पशु अंततः पशु। जो मनुष्य हिंसक हो जाता है उसे भी ‘‘पशुवत’’ ही कहा जाता है। तो आवारा कुत्तों के हिंसक होने और अचानक किसी कमजोर प्राणी पर हमला कर देने को उसकी हिंसक प्रवृत्ति नहीं तो और क्या कहेंगे?
अब प्रश्न यह है कि इन आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और इनके बढ़ते आतंक से बचने का उपाय क्या है? बेशक नसबंदी का उपाय लागू किया गया है जो पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इसके उदाहरण कुत्तों के झुंड के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल विचार इस बात पर होना चाहिए कि जीव दया की भावना भी बनी रहे, कुत्तों को भी कष्ट न हो और मनुष्य भी सुरक्षित रहें। जाहिर है कि इ सके लिए हमें विदेशों विशेषरूप से अमरीका, योरोप, चीन, जापान आदि की ओर देखना और उनसे सीखना होगा कि वहां की सड़कें आवारा कुत्तों से कैसे मुक्त हैं? हमारे मंत्रियों एवं अधिकारियों के दल प्रायः विभिन्न ज्ञान की प्राप्ति के लिए सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राएं करते रहते हैं किन्तु इस विषय का हल क्यों नहीं ढूंढ कर ला सके? या फिर इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई?
विदेशों में सड़कों पर कोई भी आवारा पशु घूमता दिखाई नहीं देता है। क्योंकि वहां परिस्थितिवश आवारा हुए कुत्तों के लिए डॉग शेल्टर होते हैं जहां उन्हें रख कर उनकी देखभाल की जाती है। हम स्वयं को जीव दया का सबसे कट्टर समर्थक मानते हैं किन्तु हमीं जीव दया का सही तरीका नहीं जानते हैं। यदि कोई पशु आवारा घूम रहा है और दाने-दाने के लिए मोहताज जीने को विवश है तो उसे रोटी के दो टुकड़े दे कर जीव दया का दम नहीं भर सकते हैं। सही जीव दया तो तब होगी जब हम उनके लिए रहने की उचित व्यवस्था, खाने का उचित प्रबंध कर सकें। इस बिन्दु पर विदेशी हमसे अधिक जीव दया वाले हैं। अमरिका और योरोप में तो कुत्ता पालने की बाकायदा परमीशन लेनी पड़ती है और इस बात के लिए प्रशासन को आश्वस्त करना पड़ता है कि वे जो भी पशु पालेंगे, उसका हर प्रकार से पूरा ध्यान रखेंगे। यदि वे अपनी बात पर खरे नहीं उतरते हैं और अपने पालतू पशु को पीड़ा पहुंचाते हैं तो प्रशासन उनसे उनका पालतू पशु छीन कर ले जाता है और शेल्टर होम के हवाले कर देता है। हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। देश में कुछ एनजीओ हैं जो डॉग शेल्टर होम चलाते हैं वरना अधिकतर एनजीओ भी आवारा कुत्तों को नियमित खाना खिला कर अपने कर्तव्य को पूर्ण समझ लेते हैं।
यदि कुत्ते सड़कों पर आवारा घूमेंगे और भूखे रहेंगे तो अपना झुंड बनाएंगे ही ताकि मिल कर शिकार द्वारा अपने लिए भोजन जुटा सकें। यही उनकी डीएनए प्रकृति है। इसमें उनका कोई दोष नहीं है। विपरीत परिस्थिति में उनके भीतर का भेड़िया जागने लगता है और वे एग्रेसिव हो कर वह कर बैठते हैं जो हम मनुष्यों को लगता है कि उन्हें नहीं करना चाहिए। जो कुत्ते पीढ़ियों से मनुष्यों के बीच रह रहे हैं उन्हें जंगल में नहीं खदेड़ा जा सकता है और न निर्ममता से मौत के घाट उतारा जा सकता है। लेकिन जलवायु में बढ़ती गर्मी और अधिक संख्या के कारण भोजन की कमी का दबाव आवारा कुत्तों को हमलावर बनाने लगा है। लिहाजा, अब समय आ गया है कि कुत्तों को मनुष्यों से एक निश्चित दूरी पर पहुंचा दिया जाए। यह तभी संभव है जब हर शहर, गाव, कस्बे में डॉग शेल्टर होम बनाए जाएं। क्योंकि विचारणीय बात है कि यदि आवारा कुत्तों की वर्तमान पीढ़ी को नसबंदी द्वारा संतति के अयोग्य बना भी दिया जाए तो क्या यह पीढ़ी मनुष्यों पर हमला करना छोड़ देगी? नहीं! भूख, मौसमी परेशानियां और उनकी बढ़ी हुई संख्या का दबाव उन्हें एग्रेसिव तथा हमलावर बनाता रहेगा।
यदि धार्मिक दृष्टि से विचार करें तो कुत्ता उन कालभैरव का वाहन है जो बस्ती से बाहर पहाड़ों में निवास करते हैं। हम अपने स्वार्थ में उन्हें शहर में ला कर आवारा जीवन जीने को विवश कर चुके हैं और अब वे जब हमारे लिए कालदूत बनते जा रहे हैं तो हमें भी इस पर पुनः विचार करना चाहिए कि उनका असली स्थान कहां है। अब पहाड़ों अथवा जंगलों में नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि वे हमारे स्वभाव के अनुरूप ढल गए हैं, उनका वन्य स्वभाव शांत आचरण में बदल चुका है। लेकिन उनके भीतर की हिंसा को जगाने वाले तत्वों का तोड़ ध्यान में रखते हुए उनके लिए सबसे उपयुक्त जगह है डॉग शेल्टर होम। जब सड़कों पर से आवारा कुत्ते हट जाएंगे तो उनका आतंक भी समाप्त हो जाएगा और फिर प्रत्येक माही सुरक्षित जी सकेगी। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 17.06.2026 को प्रकाशित)
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