Saturday, June 13, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | तनक बतइयो के जे हादसा ओ मारकाट पे लगाम को लगाहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Wednesday, June 10, 2026
चर्चा प्लस | प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यदि मध्यप्रदेश में सरकारी योजनाओं को देखा जाए तो मन खुश हो जाता है। ‘‘अच्छे दिन’’ का सपना साकार होने की संभावना बढ़ जाती है। किन्तु विडम्बना यह है कि लोकहित की योजनाएं जितनी चुस्त-दुरुस्त हैं उनका क्रियान्वयन उतना ही सुस्त है। यदि सुस्त नहीं होता तो प्रदेश की तस्वीर आज कुछ और होती। बेशक तस्वीर बदल रही है किन्तु उस गति से नहीं जिस गति से बदलनी चाहिए थी। यहां तक कि जिनके लिए योजनाएं हैं उन्हें भी सभी लाभकारी योजनाओं का ज्ञान नहीं है। सुशिक्षित लोगों को भी नहीं। यह सोचने का विषय है कि इस खामी का जिम्मेदार कौन है?
हाल ही में एक सीनियर सिटिजन से मेरी चर्चा हो रही थी। मैंने उनसे पूछा कि आपने अपना सीनियर सिटिजन कार्ड बनवाया कि नहीं? वे मेरा मुंह ताकने लगे। उन्हें ऐसे किसी भी कार्ड की जानकारी नहीं थी। हां, आयुष्मान योजना की जानकारी अवश्य थी जिसके लिए उन्होंने आह भरते हुए कहा कि ‘‘अभी तो मैं पैंसठ का ही हुआ हूं। अभी मुझे आयुष्मान योजना के लिए पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा, यदि तब तक मैं जिन्दा रहा।’’ दरअसल वे नौकरी पेशा नहीं रहे। उनका अपना छोटा-सा व्यवसाय था। उनके बच्चे पढ़-लिख कर मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी पर चले गए हैं। अब पति-पत्नी ही बचे हैं। दोनों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आता रहता है। कुछ हद तक उनकी अपनी सेविंग से काम चल जाता है लेकिन जब कोई मंहगे मेडिकल टेस्ट कराने की नौबत आती है तो उन्हें अपने बच्चों से गुहार लगानी पड़ती है। वे अकेले नहीं, अनेक ऐसे सीनियर सिटिजन हैं जो सरकारी सहायता के लिए तरसते रहते हैं। इसका पहला कारण कि उन्हें अधिकांश योजनाओं का पता ही नहीं है। जिन बहुचर्चित, बहुप्रचारित योजनाओं का पता है वे उनके दायरे में नहीं आते हैं। जिन योजनाओं दायरे में आते भी हैं उनका लाभ लेने का रास्ता उन्हें नहीं पता। सभी सीनियर सिटिजन इतने ‘‘इंटरनेट मित्र’’ नहीं हैं कि वे ऑनलाईन आवेदन कर सकें। लगभग यही हाल उन सभी का है जिन्हें इंटरनेट पर सोशल मीडिया के कुछ एप्प चलाने के अलावा और कुछ नहीं बनता है। उन्हें कियोस्क केन्द्रों की शरण में जाना पड़ता है और पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
अभी माह भर पहले की बात है मैंने अपने एक परिचित से पूछा कि ‘‘आपको अपनी मध्यप्रदेश सरकार की नवांकुर योजना का पता तो होगा?’’
‘‘ये कौन-सी योजना है?’’ उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की और फिर अटकल लगाते हुए बोले। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए होगी यह योजना, है न!’’
उनकी इस अटकल पर मुझे हंसी भी आई और रोना भी। प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में उन उच्चशिक्षित, रोज अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति को पता नहीं है तो सामान्य लोगों से तो इसकी उम्मींद करना ही व्यर्थ है। मैं कुछ बोल पाती इसके पहले ही वे बोल उठे ‘‘मुझे तो बस, लाड़ली लक्ष्मी, जननी योजना और वो जो किसानों के बिल-विल माफ कर दिए जाते हैं, बस उन्हीं पता है।’’
उनके इस कथन में दम था क्योंकि जिन योजनाओं को बहुप्रचारित किया जाए, जिनकी तस्वीरें सबसे ज्यादा छापी जाएं उनके बारे में पता रहना स्वाभाविक है। अब हर योजना के लिए फीता काटने मंत्री महोदय तो आएंगे नहीं। फिर बाकी योजनाओं पर बड़ी खबर कैसे बनेगी? और आजकल तो यही चलन है कि जिस पर विवाद हो, टीवी के न्यूज चैनल्स पर वाद-विवाद हो, टॉक-शो हो, वही जानकारी के पन्ने पर अपनी जगह बना पाता है। खैर, बात चली है नवांकुर योजना की तो उस पर एक संक्षिप्त दृष्टि डाल ली जाए। इससे कम से कम मुझे भी इस योजना की प्रमुख बातें याद रह जाएंगी, जिन्हें मैं औरों से शेयर कर सकूंगी।
दरअसल, नवांकुर योजना का मूल उद्देश्य प्रदेश में समाज एवं शासन के मध्य सेतु के रूप में कार्य करना है। विकास के कार्यों में समाज की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि समाज विकास के विभिन्न विषयों में दक्ष स्वैच्छिक संगठन उपलब्ध हों। अतः विभिन्न विषयों जैसे जल संरक्षण, सबको शिक्षा सहित भारतीय संस्कारों की शिक्षा, नशामुक्ति, सबको स्वास्थ्य, हरियाली/पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता एवं साफ सफाई, ऊर्जा संरक्षण, कृषि को लाभकारी बनाना, कुपोषण एवं परिवार नियोजन, सामाजिक समरसता तथा विवाद रहित समाज/ग्राम आदि पर विशेषज्ञता रखने वाले स्वैच्छिक संगठन प्रत्येक सेक्टर स्तर पर विकसित किये जायेगें। इन स्वैच्छिक संगठनों द्वारा सेक्टर में गठित प्रस्फुटन समितियों को उनके कार्यों में आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जायेगा, वहीं मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठयक्रम के छात्रों को इंटर्नशिप कराई जायेगी तथा पाठयक्रम संबंधी परामर्श प्रदान किया जावेगा। समाज की स्वैच्छिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने हेतु प्रति वर्ष प्रत्येक विकासखण्ड में 05 (प्रत्येक विकासखण्ड में प्रति सेक्टर हेतु 01 नवांकुर संस्था के मान से) का चयन कर प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि रूपये 01.00 लाख निरंतर (कार्य संतोषजनक पाए जाने पर) प्रदान की जावेगी। यह संस्थायें उस विकासखण्ड के सेक्टर हेतु लीड स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करेंगी। इस प्रकार योजनांतर्गत स्वैच्छिक संगठनों के उन्मुखीकरण एवं पोषण हेतु जिला स्तर पर गठित समिति के माध्यम से प्रदेश में 1565 स्वैच्छिक संगठनों का चयन किया जायेगा। है न बेहतरीन योजना। लेकिन यह सब कुछ कितने प्रतिशत होते दिख रहा है, यह विचारणीय है।
वैसे नवांकुर योजना का लक्ष्य है सेक्टर स्तर पर सक्रिय प्रस्फुटन समितियों/नवीन स्वयंसेवी संस्थाओं का उन्मुखीकरण एवं पोषण करना तथा सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करते हुये आत्म निर्भर मध्यप्रदेश का निर्माण करना। वहीं इसका उद्देश्य है ऐसे स्वैच्छिक संगठन का निर्माण करना जो विकास के प्रमुख विषयों में विशेषज्ञता रखते हो। विकास के प्रमुख विषयों पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने हेतु विषय विशेषज्ञ/स्वैच्छिक कार्यकर्ता तैयार करना। स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से योजनाओं के संचालन हेतु परियोजना निर्माण तथा क्रियान्वयन करना। सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में स्वैच्छिक संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए विकास प्रक्रिया में नागरिक समुदाय को शामिल करना। सामाजिक सुरक्षा एवं समरसता सुनिश्चित् करना। केन्द्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार एवं उनके क्रियान्वयन में सहयोग करना। नवीन व स्थानीय संस्थाओं का पोषण व उनका क्षमतावर्द्धन करना।
चयन हेतु पात्र संस्थाओं के लिए योजनांतर्गत चयन हेतु परिषद की वेबसाइट पर विज्ञप्ति जारी की करने का प्रावधान रखा गया। उन नगर/ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी रखा गया जिनके द्वारा संबंधित विकासखण्ड अंतर्गत लगातार तीन वर्ष तक कार्य किया गया हो तथा परिषद द्वारा संचालित कार्यक्रमों/अभियानों में उनकी निरन्तर भागीदारी रही हो। यह भी सुनिश्चित किया गया कि म.प्र. फमर््स एवं संस्थायें पंजीकरण अधिनियम 1973 के अंतर्गत वे ही पंजीकृत संस्थाएं मान्य होगी जिनमें 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित विकासखण्ड तथा 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित जिले के स्थानीय निवासी हो।
इस सुंदर नवांकुर योजना में नवकरीण ऊर्जा के तहत ऊर्जा साक्षरता अभियान और लोक सेवा प्रबंधन के तहत सी.एम. जनसेवा योजना भी है। यह कितने लोगों को पता है? और नवांकुर की तमाम योजना के अंतर्गत अब तक कितनी प्रगति हुई यह कितने लोगों को पता है? योजना तैयार करने वालों को? कागजी कार्यवाही करने वालों को? जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों एवं जनप्रतिनिधियों को? या फिर इन सबके बारे में कितना पता है उन लोगों को जिनके हित के लिए ये योजनाएं हैं। एक योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’। मेरी एक घरेलू सहायिका यानी कामवाली बहन से बात हुई तो पता चला कि वह अपनी बहू के लिए राजगार ढूंढ रही है लेकिन घर-घर जा कर चौका-बरतन का काम उससे नहीं कराना चाहती है। उसकी बहू को लाड़ली लक्ष्मी और बीपीएल के लाभ मिल रहे हैं किन्तु बिना मेहनत के हाथ आए पैसों का उसे मोल नहीं है। इसीलिए सास चाहती है कि बहू कुछ काम करके भी पैसे कमाए ताकि उसके खर्चों पर लगाम लगे। लेकिन परेशानी ये कि उसकी बहू को घर के कामों के अलावा कुछ नहीं आता है। मैंने उससे कहा कि सरकार की योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’, सो उसे सिलाई सीखने भेजो। वहीं से उसकी कमाई भी शुरू हो जाएगी। इस बारे में उस कामवाली बहन को तनिक भी जानकारी नहीं थी। उसे जानकारी थी तो बस लाड़ली लक्ष्मी योजना की, समूह सहायता योजना ही और साहूकार से कर्जा लेने की। सच तो यह था कि समूह सहायता योजना का वास्तविक स्वरूप भी उसे पता नहीं था। उसने मुझसे पूछा कि वह अपनी बहू को सिलाई सीखने कहां भेजे? सेंटर कहां है? मैं उसे क्या बताती क्योंकि मुझे भी सेंटर के बारे में पता नहीं था। मैंने उसे महिला बाल विकास के दफ्तर का पता बता दिया कि शायद उसे वहां से कोई जानकारी मिल जाए। उसी समय मुझे लगा कि आशा कार्यकर्ता की भांति ऐसी कार्यकर्ताएं भी होनी चाहिए जो योजनाओं की विस्तृत जानकारी घर-घर पहुंचा सकें।
चलिए बात की जाए योजनाओं के क्रियान्वयन की तो अभी हाल ही में चल रहे जनगणना योजना को ही ले लीजिए। पहली बात तो इसे भरी गर्मी में आरंभ कर दिया गया जिससे गणना करने वालों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। उन्हें चिलचिलाती धूप में दर-दर भटकना पड़ा। उस पर गर्मी की सूनी दोपहर में सब लोग दरवाजा खोलने में भी झिझकते हैं। लिहाजा अभी भी अनेक घर ऐसे हैं जहां गणना करने वाले पहुंचे ही नहीं है, या फिर पड़ोसी से पूछ कर खानापूरी कर बैठे हैं। क्या इससे योजनाओं के लिए सही जानकारी मिल सकेगी? क्या गलत आंकड़ों के आधार पर नई सही योजनाएं बन सकेंगी? वस्तुतः सरकारी योजनाओं में कोई खामी नहीं है लेकिन उनके क्रियान्वयन में अनेक व्यवहारिक खामियां हैं जिन्हें किसी अधिकारी या कर्मचारी को सस्पेंड कर के दूर नहीं किया जा सकता है। खामियां दूर करने के लिए जरूरी है कि लोकहित की योजनाओं को लोक की आवश्यकता के अनुरूप व्यापक बनाया जाए। जिनके लिए यह योजनाएं बनाई जाती हैं उन तक जानकारी की पहुंच बनाई जाए। साथ कुछ योजनाओं को और अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है तथा मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बदले रोजगार के अवसर बढ़ाने जरूरत है। तभी लोकहितकारी योजनाएं अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर सकेंगी और गतिवान बन सकेंगी। ------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 10.06.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, June 9, 2026
पुस्तक समीक्षा | उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल”
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास - पहाड़ का पाताल
लेखक - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32
मूल्य - 550/-
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पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि पहाड़ जितना धरातल के ऊपर दिखाई देता है उससे कहीं अधिक धरातल के नीचे होता है। ठीक यही स्थिति व्यवस्था और मनुष्यों के चरित्र की होती है। ऊपर से जो कुछ जितना दिखाई देता है उससे कहीं अधिक अप्रत्यक्ष रहता है। अतः यदि पहाड़ है तो उसका पाताल भी होगा ही। कभी-कभी यह पाताल चौंकाता है, चमतना को झकणेर देता है। यही कहता है डॉ. श्यामसुंदर दुबे का उपन्यास ‘‘पाताल का पहाड़’’।
जब किसी उपन्यास की चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। ‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार,ललित निबंधकार एवं लोकविद डॉ.श्यामसुंदर दुबे ने।
‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’
उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनः भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।’’
विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’
यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’
इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।
उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनियर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।
व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’
उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट कर भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।
उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जन्म दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’
‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरूप हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं बारम्बार पठनीय है।
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चर्चा प्लस
बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली जिसमें मौसम के पैटर्न बदलने के गंभीर आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे। समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ रिपोर्ट का अंश। कितने लोगों ने पढ़ा? इसके आंकड़े बता पाना मुश्किल है लेकिन यह तो तय है कि उससे बहुत कम लोगों ने जितनों ने ‘‘हनी ट्रैप ’’, ‘‘ट्विशा केस’’ अथवा ‘‘मेलोडी’’ के समाचार पर अपनी आंखें गड़ाए रखी होंगी। कितने आश्चर्य के बात है न कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसके निरंतर कटने का हमें अहसास नहीं है लेकिन चटखारे भरे समाचारों पर हमारा पूरा ध्यान केन्द्रित रहता है। दरअसल, हमारा मौसम जिस तरह घातक रूप से अपना पैटर्न बदल रहा है, ठीक उसी प्रकार इंसानी स्वभाव भी बदल रहा है।
मौसम में परिवर्तन होना एक स्वाभाविक एवं स्वस्थ प्राकृतिक क्रिया है। किन्तु जब मौसम अपनी प्रकृति के विपरीत चलने लगे तो स्थिति स्वाभाविक नहीं रह जाती है। जैसे यदि कोई नदी अपना रास्ता बदल कर बहने लगे तो वह गांव, शहर, खेत सबकुछ बरबाद कर सकती है। मौसम का चक्र भी अपनी गति या प्रकृति को बदलता है तो यह मानना होगा कि विनाश की दस्तक पड़ना शुरू हो गई है। अब यह इस पर निर्भर है कि हम उस दस्तक को कितनी देर से अथवा कितनी जल्दी सुनते हैं। जब बात आती है जलवायु परिवर्तन अथवा मौसम के परिवर्तन की तो लोगों का रवैया लापरवाह हो जाता है। वे साशल मीडिया पर घंटों ‘‘हनी ट्रैप’’ के किस्से ढूंढ-ढूंढ के पढ़ सकते हैं, ‘‘मेलोडी चॉकलेट’’ से जुड़े किस्से पर वाद-विवाद में पूरा-पूरा दिन बिता सकते हैं, हाई प्रोफाईल ‘‘ट्विशा मर्डर केस’’ पर परिणाम विहीन चिंन्तन में सिर खपा सकते हैं लेकिन उस संकट की ओर ध्यान देने का समय नहीं निकाल पाते हैं जिसके शिकंजे में धीरे-धीरे पूरी पृथ्वी और पूरी मानव सभ्यता जकड़ती जा रही है। अभी भी स्थिति पर नियंत्रण पाने का समय है किन्तु उस पर विचार करने का हमारे पास न तो समय है और न इच्छा। हम आभासीय दुनिया के गुलाम बन कर स्वयं को बुद्धिजीवी मानने का भ्रम पाल चुके हैं। जबकि बुद्धिजीवी का असल दायित्व होता है कि वह सबसे पहले पृथ्वी और सकल मानवता के बारे में गंभीरता से सोचे।
हाल ही में समाचार पत्रों में यह रिपोर्ट पढ़ी कि हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है। बर्फबारी के महीने माने जाने वाले जनवरी-फरवरी से ज्यादा बर्फ अब मार्च-अप्रैल में गिर रही है। इसका सीधा असर वाटर बैंक माने जाने वाले ग्लेशियरों पर पड़ेगा। इस पैटर्न के कारण ट्री लाइन भी लगातार ऊपर को खिसक रही है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ताजा शोध जर्मनी की एप्लाइड जियोमेटिक्स शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है। हिमालय में सर्दियों की तुलना में गर्मियों में ज्यादा हो रही बर्फबारी का कारण पश्चिमी विक्षोभ में आई असमानता है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर होने से बारिश और बर्फबारी में कमी आ रही है। गर्मियों में इसके बढ़ने से बर्फबारी के साथ बारिश, ओलावृष्टि और आपदाओं के खतरे बढ़े हैं। पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी के मुताबिक, हिमालय में मौसम के बदले पैटर्न से आर्थिक और सामाजिक नुकसान का खतरा भी बढ़ा है। पश्चिमी विक्षोभ में आ रही असमानता से हर साल खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। इससे अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं। पर्यटन और हॉर्टिकल्चर प्रभावित होगा। ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया, तो आपदाओं के खतरे ज्यादा बढ़ेंगे। मार्च-अप्रैल में हो रही बर्फबारी से ग्लेशियर खतरे में हैं। डॉ. पंकज चौहान बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में धरती का तापमान अधिक रहता है। इससे बर्फ जिस गति से पड़ रही है, उसी गति से पिघल रही है और ग्लेशियर कमजोर पड़ रहे हैं। ये भविष्य में स्रोत-जलधाराओं को प्रभावित करेंगे। साथ ही आपदा के खतरों को भी बढ़ाएंगे। बर्फबारी के बदले पैटर्न ने हिमालय में ट्री लाइन को भी प्रभावित किया है। अलग-अलग घाटियों में ट्री लाइन पहले की तुलना में ऊपर खिसकी है। मध्य हिमालय में औसत ट्री लाइन 3600 मीटर तक मानी जाती है, लेकिन अब ये 3800 मीटर तक पहुंच रही है।
दूसरी ओर एक समाचार और भी पढ़ा जिसमें दूसरे ग्रहों में मानव बस्तियां बसा कर मानव एवं पृथ्वी की प्रजातियों को बचाने के अभियान की चर्चा थी। मुझे आद आया किस्सा ‘‘नूह की नाव’’ का। नूह की नाव की कहानी ‘‘कुरान’’ और ‘‘बाईबल’’ में दर्ज़ है। कहानी के अनुसार, जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बढ़े, तो ईश्वर/अल्लाह/याहोवा ने एक विनाशकारी जलप्रलय (महाबाधा) द्वारा दुष्ट दुष्टों को सजा देने का निर्णय लिया। ईश्वर ने अपने भक्त नूह को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया, क्योंकि वही एकमात्र नेक इंसान थे। पानी से बचने के लिए नाव को सील कर के वाटरप्रूफ बना दिया गया था। इसमें तीन मंजिलें थीं। नूह ने ईश्वर के निर्देशों के अनुसार अपने परिवार (पत्नी, तीन पुत्र और उनके अनुयायी) को पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव-जंतु, पशु-पक्षियों के नर और मादा जोड़े के साथ नाव में सुरक्षित रख लिया। जब सभी लोग और जानवर नाव में सुरक्षित चले गए। फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई और धरती जलमग्न हो गई। नाव के बाहर का सारा जीवन नष्ट हो गया। कई दिनों तक पानी में तैरने के बाद, जब बाढ़ का पानी कम होने लगा, तो नाव अरारत पर्वत (माउंट अरारत) की चोटियों पर जा टिकी और वहीं से धरती पर जीवन का पुनः विकास हुआ।
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में शूकर या वराह रूप में पृथ्वी पर जल प्रलय (रसतल) से भगवान विष्णु के तीसरे अवतार की कथा है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में दिति के पुत्र और दैत्य हिरण्यक्ष ने घोर तपस्या कर अपार शक्तियां प्राप्त कर लीं। उसने सभी लोकों पर अधिकार कर लिया और पृथ्वी को समुद्र तट (रसातल) की गहराई में छिपा दिया। पृथ्वी के जलमग्न होने से हाहाकार मच गया। तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर, उनके नासिका (नाक) से भगवान विष्णु एक छोटे से वराह (शूकर) के रूप में प्रकट हुए। देखते ही देखते वराह भगवान का आकार अत्यंत विशाल हो गया। वे समुद्र में गहरे उतर गए। हिरण्याक्ष ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी, लेकिन भगवान वराह ने उन्हें अपने वध से परास्त कर दिया। वराह भगवान ने अपने विशाल दांत (थूथनी) से पृथ्वी को स्थिर किया और जल के ऊपर उसे अपने मूल स्थान पर स्थापित कर दिया।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी महाकाव्य ‘‘कामायनी’’ की शुरुआत ही जल प्रलय (प्रलय प्रवाह) से की है। महाकाव्य के पहले सर्ग, जिसका नाम ‘‘चिंता’’ है, में शामिल हैं मनु हिमालय के विशाल शिखर पर बैठ कर प्रलय का दृश्य देख रहा है। ‘‘कामायनी’’ के अनुसार देव संस्कृति में भोग-विलासिता की भारी वृद्धि हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपना भीषण रूप दिखाया और जल प्रलय (महाजल-प्लावन) के द्वारा पूरी तरह से देव संस्कृति नष्ट हो गई। इस प्रलय के बाद केवल मनु ही जीवित बचा और उसने मानव जाति के पुनर्विकास को सुनिश्चित किया।
जल प्रलय और हिमयुग की अनेक कथाएं हैं। हॉलीवुड ने तो ‘‘आईस एज़’’ नाम से फिल्मों की एक श्रृंखला ही बना डाली। जिनमें डायनोसार युग के विशाकाय पशुओं के लुप्त होने की कड़ी और आई एज़ की भयावहता को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। दिलचस्प बात है कि इन फिल्मों को बच्चों से ले कर वयस्कों तक ने बहुत पसंद किया लेकिन उसमें कहे गए संदेश की गंभीरता को नहीं समझा। शायद हम मौसम को ले कर तात्कालिक चर्चा से आगे बढ़ने की प्रवृति खोते जा रहे हैं। जबकि वैज्ञानिक मानव व्यवहार में आते जा रहे परिवर्तन का आलन करते हुए निरंतर इस तथ्य से आगाह कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन में बदलाव का प्रभाव मानव व्यवहार पर भी पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई जलवायु और चरम मौसम का मानव व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इन लोगों में मानसिक तनाव और आक्रामकता बहुतायत है।। साथ ही, सीमित औपचारिकता के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के कारण मानवीय निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। अत्यधिक गर्मी और लू के दिनों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, जिससे लोगों में हिंसक व्यवहार और अपराध की दर में वृद्धि देखी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं, मधुमेह और मधुमेह के कारण होने वाले नुकसान से लोगों में ‘‘इको-एंजाइटी’’ (पर्यावरण चिंता), अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का खतरा बढ़ जाता है। खराब मौसम और राजनीतिक संकट के कारण लोगों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है, जिससे वे कई बार जोखिम और निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। रहने लायक जगह और पानी की कमी के कारण एक बड़े वर्ग का शहरों की ओर पलायन होना है। इससे भीड़-भाड़ वाले इलाकों में रहने लायक जगह और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। नई पीढ़ी के शारीरिक विकास और लंबाई में भी बदलाव आ रहे हैं। हम आजकल अकसर पढ़ते हैं कि कम आयुवर्ग में भी हार्ट के साईलेंट अटैक की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन घटनाओं के कारण में कुछ प्रतिशत प्रभाव जलवायु परिवर्तन का भी है। हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी का जितना श्रेय गरीबी और बेरोजगारी को है उतना ही उस एग्रेसिवनेस को जिसके चलते जल्दी गुस्सा आता है और इंसान बिना सोचे समझे हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है।
प्रश्न यह है कि कैसे रोका जा सकता है मौसम के पैटर्न में बदलाव और मानव स्वाभाव में आते जा रहे परिवर्तनों को? मौसम के पैटर्न (जलवायु परिवर्तन) और मानव स्वभाव में आ रहे नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के लिएव्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर ठोस कदम उठाना आवश्यक है। प्राकृतिक गैसों के उपयोग को कम करके मौसम में ही सुधारा जा सकता है। ग्रेड और तेल की जगह सौर ऊर्जा (सौर ऊर्जा), पवन ऊर्जा (पवन ऊर्जा), और पनबिजली के उपयोग को बढ़ावा देना। वनों की कटाई को रोकें और अधिक से अधिक वृक्षों की कटाई करें, ताकि कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक रूप से अवशोषित हो सके। सतत कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) यानी रासायनिक खादों के बजाय जैविक खेती का उपयोग करें, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और जल संरक्षण हो सके।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीक की लता और तनाव के कारण मानव स्वभाव में आक्रामकता और शरीर में कमी आ रही है। इसके लिए योग, ध्यान (मेडिटेशन) और प्राणायाम का दैनिक अवलोकन का हिस्सा। इससे मानसिक शांति और साहस बढ़ता है। स्क्रीन और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग सीमित करें। इसके बजाय परिवार, दोस्तों और प्रकृति के साथ वास्तविक समय जोड़ें। डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। यदि मन शांत रहेगा तो भौतिकता की अंधी दौड़ में पड़ कर प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और स्वयं तथा आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित कर सकेगा। यह समय है उन वैदिक मूल्यों की ओर जाने की जहां प्रकृति एवं पृथ्वी के संरक्षण के साथ मानव व्यवहार में आने वाले नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के उपाय सुझाए गए हैं। जरूरत है कि वैदिक ग्रंथों को मात्र धार्मिक ग्रंथों के रूप में देखने के बजाए जीवन रक्षक मूल्यों के रूप में देखने की। मौसम के पैटर्न और मानव स्वभाव में परिवर्तन को सुधारने कोई परग्रहवासी नहीं आएगा, इसे हमें ही सुधारना होगा।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 27.05.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, May 26, 2026
पुस्तक समीक्षा | छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - हरा पत्ता - उर्मिला शिरीष की कहानी
सम्पादक - हरि भटनागर, बृजनारायण शर्मा
प्रकाशक - रचना समय, 197, सेक्टर-बी, सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड भोपाल - 462042 (मध्यप्रदेश)
मूल्य - 100/-
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हिंदी साहित्य जगत अथवा हिंदी साहित्य से संबंधित पत्रिकाओं में ऐसी उदारता कम ही देखने को मिलती है जब किसी रचनाकार की किसी एक रचना को केंद्र में रखकर पूरी एक पुस्तिका प्रकाशित की जाए। मेरे संज्ञान में यह किसी भी पत्रिका का पहला अवदान है कि एक पुस्तिका जिसमें सिर्फ एक कहानी पर सामग्री केंद्रित रखी गई हो, अन्यथा किसी रचनाकार के समग्र साहित्य अथवा किसी एक संग्रह पर पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। वरिष्ठ कथाकार एवं अनुभवी संपादक हरि भटनागर के संपादन में ‘‘रचना समय’’ ने वह पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कथाकार उर्मिला शिरीष की एक चर्चित कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ पर समीक्षात्मक लेखों सहित कहानी को प्रकाशित किया गया है। यह कहानी पूर्व में मैं उर्मिला शिरीष के कहानी संग्रह में पढ़ चुकी हूं इसीलिए जब ‘‘रचना समय’’ की यह पुस्तिका मेरे हाथों में आई तो मुझे सुखद लगा क्योंकि यह कहानी मुझे भी उस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी लगी थी। यह एक ऐसी कहानी है जो पाठक का ध्यान अपनी ओर न केवल आकर्षित करती है बल्कि देर तक सोचने को विवश करती है। “उस बहार का इंतज़ार” कहानी संग्रह की चौथी कहानी है “हरा पत्ता”। उर्मिला शिरीष के 11 कहानियों के संग्रह की समीक्षा करते समय मैंने कहानी “हरा पत्ता” के संबंध में लिखा था- “यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।”
“यह पुस्तिका” शीर्षक से संपादक हरि भटनागर ने लिखा है तोलस्तोय की एक कहानी है “हाऊ मच लैंड डज़ ए मेन नीड” की याद दिलाई है कि किस प्रकार एक इंसान जमीन पाने के लालच में दौड़ता चला जाता है और अंत में एक बड़ी जमीन उसके हिस्से में आती है किन्तु इसके साथ ही वह थक कर मर चुका होता है। हरि भटनागर कहा है कि लालच की इस अंतहीन दौड़ में एक ठहराव आना ही चाहिए और यही तो कहानी ‘हरा पत्ता’’ का आग्रह है।
जैसा कि मैंने पहले ही उद्धृत किया कि इस पुस्तिका में एक कहानी है और उस कहानी पर छः साहित्यकारों के विचार हैं जिनसे कहानी के प्रत्येक पक्ष पर भरपूर प्रकाश पड़ता है। क्रमवार सबसे पहले कहानी है, उसके बाद उससे संबंधित 6 लेख इस प्रकार हैं- उर्मिला शिरीष की कहानी: हरे पत्ते का यथार्थ - सूरज पालीवाल, एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी: हरा पत्ता - अरुण होता, हरा पत्ता: कहानी को इस तरह ‘‘देखिए’’ - सुधांशु गुप्त, ग्लोबलाइज़ेशन द्वारा रचे गये यथार्थ के, प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता - हरियश राय, समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक - प्रज्ञा, घर छूटने से मुरझाया: हरा पत्ता - अंकित नरवाल।
कहानी हरा पत्ता उस बुजुर्ग दंपति की कथा है जिसने बड़ी मेहनत और आशाओं के साथ अपनी संतान को पाल-पोसकर इस योग्य बनाया कि वह विदेश में जाकर नौकरी कर सके तथा वहां सुखपूर्वक रह सके। संतान ने भी सोचा कि उसके माता-पिता उसके पास आकर रहें और उसके साथ विदेश में ही बस जाएं। यहीं से शुरू होता है हरे पत्ते का खेल। हरा पत्ता यानी “ग्रीन कार्ड” जो कि विदेश में बसने के लिए जरूरी है। लंबी-चौड़ी लिखा-पढ़ी, जांच-पड़ताल और एंबेसी के धक्के खाने के बाद आखिर वह दिन आ जाता है जब ग्रीन कार्ड पानी के लिए अंतिम औपचारिकता निभाई जाने वाली रहती है। यह औपचारिकता भी आसान नहीं है। वृद्ध पिता लंबी कतार में प्रतीक्षा करते हुए चिंतन करता है और उसके मन में प्रश्न उठता है कि वह अपना देश छोड़कर हमेशा के लिए विदेश जाने का जो कदम उठा रहा है क्या वह उचित है अथवा नहीं? एक मंथन, पत्नी द्वारा एक प्रतिरोध, बच्चों के रूठ जाने का भय इन सब से पार पाना आसान नहीं था। कहानी का अंत चौंकाता है और पढ़ने वाले के मन में अनेक विचार चस्पा करता हुआ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंचता है। इस कहानी के पात्र मेच्योर हैं विचारशील है और उनमें जिंदगी की गहरी समझ है। लेखिका ने जिस प्रकार एक लंबे संघर्ष और एक गहरे अंतर्द्वंद्व के बाद जिस प्रकार निर्णय तक पहुंचा है वह रोचकता से भरा हुआ है। पाठक जिज्ञास होकर सोचता है कि अब यह लोग क्या करेंगे? प्रश्न विकट है। निर्णय के लिए वह मानसिक कठोरता आवश्यक है जो एक झटके से उभरती है और बहुत कुछ कह जाती है।
सूरज पालीवाल ने अपने लेख “हरे पत्ते का यथार्थ” लिखते हुए इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि हमारी अर्थव्यवस्था पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के मुकाबले कितनी कमजोर है। इसी कहानी से उदाहरण देते हुए स्मरण कराया है जब विदेश में बसी संतान अपने पिता के पास पैसे भेजते थे तो नोटों की गड्डियों से उनके हाथ भर जाते थे जबकि अपने देश में बेरोजगारी का अंतहीन सिलसिला है। यही कारण है कि चाहे माता-पिता हो या संतान सभी को हरे पत्ते का यानी ग्रीन कार्ड का लालच आकर्षित करता है। पूरे परिवार का सुखद भविष्य उसमें प्रतिबिंब की भांति चमकता है। सूरज पालीवाल ने कहानी की सार्थकता को रेखांकित करते हुए यह लिखा है कि यह कहानी मात्र एक पिता का उद्घोष नहीं बल्कि डॉलर की व्यर्थता के यथार्थ को भी सामने रखती है।
“एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी हरा पत्ता” - यह उद्घोष करते हुए अरुण होता ने कहानी को वैचारिक स्तर पर टटोला है। उन्होंने हरा पत्ता को एक सहज और स्वाभाविक कहानी ठहराया है जिसमें संवाद धर्मिता के साथ भाषाई सौंदर्य भी है। अरुण होता ने कहानी में दो संस्कृतियों की सामाजिक, आर्थिक एवं परिवेशगत भिन्नताओं को पूरी गंभीरता से लेखबद्ध करने को कहानी की विशेषता कहा है।
“हरा पत्ता कहानी को इस तरह देखिए” - यह सुधांशु गुप्त का आग्रह है। उन्होंने एक अलग ही दृष्टि से कहानी को खंगाला है। उन्होंने उदाहरण के लिए स्मरण दिलाया है मुंबई में आकर बसने वाले उन हजारों लोगों के बारे में जो गांव से लगाव तो रखते हैं किंतु एक बार मुंबई में बसने के बाद कभी गांव लौट कर नहीं जाते। अपने गांव की यादों के साथ वह महानगर भी उनका अपना हो जाता है। इसी प्रकार विदेश में बसने वाले अपने देश लौटने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन लौटने के नाम पर उनके पांव ठिठक जाते हैं। सुधांशु गुप्त ने कहानी के अंत को लेखिका की सदेच्छा के रूप में पाया है।
“ग्लोबलाइजेशन द्वारा रचे गए यथार्थ के प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता” ठहराते हुए हरियश राय कहानी के कथानक में उभरे द्वंद्व के लिए उस ग्लोबलाइजेशन को जिम्मेदार मानते हैं जो 1990 से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। हमारा देश भी उससे अछूता नहीं है। डॉलर के हाथों गिरवी रखे रूपयों के समान बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास गिरवी युवाओं का जीवन मुक्त होने के लिए छटपटाता है लेकिन साथ ही उन्हें अपने बंधन से मोह भी होने लगता है। इसी प्रकार अपने देश में छूट गए वृद्ध माता-पिता के समक्ष भी एक द्वंद्व खड़ा रहता है। जिसमें एक ओर उनकी संतान है जो विदेश में बस गई है और उन्हें अपने पास रहने को आमंत्रित कर रही है और दूसरी ओर उनका अपना देश है जहां उनकी अपनी संस्कृति, अपने लोग और अपनी चिरपरिचित समस्याएं हैं। दोनों के बीच चुनाव करने की स्थिति बहुत कठिन है। इस कठिनाई को पार करते हुए देखकर हरियश राय इस ग्लोबलाइजेशन के विरुद्ध प्रतिरोध की कहानी मानते हैं।
“समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक” शीर्षक से प्रज्ञा ने कहानी के यथार्थ को एक मजबूत धरातल ठहराया है। उन्होंने भौतिकवाद में जकड़ते जा रहे भारतीय समाज की दशा की ओर भी इंगित किया है। उन्होंने कथाकार कि उसे सचेत दृष्टि की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है जो देसी विस्थापन और ग्लोबल विस्थापन के बीच सरकार होती घबराई हुई दुनिया का दृश्य रचती है। यही वर्तमान का यथार्थ है। प्रज्ञा के अनुसार यह कहानी विकास की अंधी दौड़ के बीच एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है।
“घर छूटने से मुरझाया हरा पत्ता” अंकित नरवाल इन शब्दों के साथ हमेशा के लिए देश छोड़ने और ग्रीन कार्ड धारक बनाकर विदेश में बस जाने को लेकर अपने देश के प्रति जगे हुए मुंह से उपजे वैचारिक ऊहापोह को इस कहानी का केंद्र मानते हैं। पहले बच्चे विदेश जाकर अपने लिए जमीन तलाश करते हैं और फिर उसे खाली जमीन में अपनापन भरने के लिए अपने माता-पिता को भी अपने पास बुला लेना चाहते हैं लेकिन क्या माता-पिता के लिए अपनी जड़ों से कट कर जाना इतना आसान है? इसीलिए अंकित नरवाल कहानी “हरा पत्ता” को तय शुदा अंत वाली कहानी परंपरा का अंत करने वाली कहानी निरूपित किया है।
उर्मिला शिरीष एक सशक्त कहानीकार हैं। उनकी कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ ग्रीन कार्ड के संदर्भ में वर्तमान सामाजिक संकट को बहुत गहराई से रेखांकित करती है और यह पुस्तिका जिसमें इस कहानी पर 6 विद्वानों के विचार संकलित किए गए हैं अपने आप में कहानी पर समग्र समीक्षात्मक कलेवर प्रस्तुत करते हैं। ‘‘रचना समय’’ तथा उसके संपादक हरि भटनागर, बृज नारायण शर्मा तथा उप संपादक सौमित्र बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक महत्वपूर्ण कहानी को पाठकों के चिंतन-मनन के लिए सामने रखते हुए समीक्षात्मक लेखों सहित एक पुस्तिका के रूप में प्रस्तुत किया है। यह हिंदी साहित्य में एक अच्छी पहल है जिसे सतत जारी रहना चाहिए।
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