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Wednesday, April 30, 2025

चर्चा प्लस | कश्मीर की दशा पर जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जवाहरलाल नेहरू को खुलकर चिट्ठियां लिखी थीं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
कश्मीर की दशा पर जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जवाहरलाल नेहरू को खुलकर चिट्ठियां लिखी थीं
           - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
     कश्मीर प्राकृतिक रूप से जितना सुंदर है उतना ही राजनीतिक रूप से प्रताड़ित होता रहा है। उसे लगभग हमेशा अशांति के दंश झेलने पड़े हैं। यदि विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की आपबीती सुनी जाए तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और शरीर में सिहरन दौड़ जाती है। इधर एक अरसे से कश्मीर में आतंकी गतिविधियों ने गुपचुप पांव पसार रखे हैं। उनके मंसूबों का पता तब चलता है जब वे कोई चोट पहुंचा देते हैं। कश्मीर का अतीत भी कम पीड़ा भरा नहीं रहा। कश्मीर में 1952 में एक आंदोलन हुआ था जिसके दौरान पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को क्रमशः पांच पत्र लिख कर कड़ा विरोध जताया था।  
      राजनीतिक दृष्टि से कश्मीर हमेशा शतरंज की बिसात पर बैठा मिला है। यदि कश्मीर के अतीत में झांक कर देखा जाए, वह भी बहुत पहले नहीं, मात्र स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के पहले दशक में तो वहां भी कश्मीर दुर्भाग्य की आग में झुलसता दिखाई देगा। अगस्त-सितम्बर 1951 में कश्मीर में संविधान सभा के चुनाव निर्धारित हुए। शेख अब्दुल्ला इन चुनावों को भारत के निर्वाचन आयोग की देख-रेख में कराने को सहमत नहीं हुए अतः शेख प्रशासन स्वयं ही इनका प्रबंधन कर रहा था। नेशनल कांफ्रेंस के अतिरिक्त प्रजा परिषद तथा निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपने नामांकन दाखिल किये किन्तु बिना किसी ठोस आधार के उनमें से अधिकांश के नामांकन रद्द कर दिये गये। कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये थे क्योंकि कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस को ही अपना प्रतिनिधि मानती थी। परिणाम यह हुआ कि नेशनल कांफ्रेंस के 75 में से 73 प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिये गये। दो स्थानों पर हुए चुनाव में भी नेशनल कांफ्रेंस विजयी रही। यह लोकतंत्र का खुला उपहास था। यहीं से जम्मू और लद्दाख के लोगों के मन में अपने भविष्य को लेकर आशंकाएं बलवती होने लगीं।

अगस्त, 1952 में प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार पं. नेहरू ने यह भी स्वीकार किया कि राज्य का अपना अलग झंडा होगा। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति नहीं, बल्कि वह विधानसभा द्वारा चुना जायेगा। भारतीय संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य संबंधी प्रावधान पूरी तौर पर लागू नहीं होंगे। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का अधिक्षेत्र नहीं होगा, केवल अपीलीय मामले उसके समक्ष प्रस्तुत होंगे। युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण को छोड़ कर किसी भी स्थिति में केन्द्र द्वारा बिना राज्य की सहमति के आपात स्थिति लागू नहीं की जा सकेगी। इन तमाम बातों से राज्य की जनता के मन में संदेह के बादल उत्पन्न हुए और पूरे देश में भ्रम की स्थिति निर्माण हुई।

*प्रजा परिषद का आंदोलन*
शेख अब्दुल्ला के राष्ट्रविरोधी मंसूबे और केन्द्र सरकार की समझौतापरस्त नीतियां जहां देशभर में राष्ट्रीय जनमानस को उद्वेलित कर रही थीं, वहीं राज्य के अधिकांश नागरिकों को भयाक्रांत कर रही थीं। विशेष रूप से राज्य की हिन्दू-सिख जनता को अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा था। शेख की मनमानी का विरोध करने वाले हर व्यक्ति का उत्पीड़न किया जा रहा था।
       शेख अब्दुल्ला के दबाव में हुए दिल्ली समझौते, राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत राजप्रमुख को असंवैधानिक ढंग से बदल कर ‘सदरे रियासत’ की घोषणा आदि घटनाक्रम ने राज्य में अनिश्चितता और आशंका का वातावरण उत्पन्न कर दिया। परिणामस्वरूप प्रजा परिषद को निर्णायक आन्दोलन की ओर बढ़ने को बाध्य होना पड़ा। 23 नवंबर 1952 को जम्मू में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पं. प्रेमनाथ डोगरा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही पूरे जम्मू संभाग में प्रत्यक्ष आंदोलन प्रारंभ हो गया। हर दिन हजारों की संख्या में अहिंसक आंदोलनकारी सड़कों पर निकल पड़ते। पुलिस के अमानवीय अत्याचार भी उन्हें रोक न पाते। संघर्ष बढ़ता जा रहा था और आगे चल कर प्रतिक्रियास्वरूप इसके हिसक हो जाने की भी प्रबल संभावना थी। डाॅ. मुखर्जी नहीं चाहते थे चंद लोगों की सत्तालोलुपता के कारण हजारों निर्दोषों का रक्त बहे।
       दिल्ली में आंदोलन की आग जम्मू में आंदोलन अपने चरम पर था। हर दिन आंदोलनकारियों पर लाठी और गोली चल रही थी। 30 दिसम्बर, 1952 को सुन्दरवनी में शेख की मिलीशिया ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां चलायीं जिसमें 25 वर्षीय विष्णुलाल और 20 वर्षीय रामजी दास नामक सत्याग्रहियों की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गयी। 3 महिलाओं सहित 25 लोग घायल हुए। बेलीराम नामक एक युवक, जो गोली लगने से घायल हो गया था, का सिर एक भारी पत्थर से कुचल कर उसकी हत्या कर दी गयी।
      जब यह समाचार दिल्ली पहुंचा तो अगले ही दिन पूरी दिल्ली में जुलूस और विरोध प्रदर्शनों का क्रम शुरू हो गया। हौजकाजी में पुलिस ने कठोरतापूर्वक लाठियां बरसाईं जिसमें 60 लोग घायल हुए। आंसू गैस के गोले भी दागे गये। इसने विरोध को और अधिक गति दे दी। इस समय कानपुर में भारतीय जनसंघ का वार्षिक अधिवेशन जारी था। जनसंघ ने एक तथ्यान्वेषी शिष्टमण्डल जम्मू भेजने की घोषणा की किन्तु भारत सरकार ने उसे वहां जाने की अनुमति नहीं दी।
 
      जवाहरलाल नेहरू को प्रथम पत्र कश्मीर में हिन्दुओं पर बढ़ते जा रहे अत्याचार को देखते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1 जनवरी 1953 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को प्रथम पत्र लिखा-
‘‘हमने कानपुर में जनसंघ अधिवेशन में कश्मीर के विषय पर विचार-विमर्श किया था और सभी की इच्छा थी कि मैं इस पर आपसे और शेख अब्दुल्ला से सीधे विचार-विनिमय करूं। मैं जानता हूं कि आप इस विषय में हमसे सहमत नहीं हैं। फिर भी मैं इस आशा से आपको यह पत्र लिखने को प्रेरित हुआ हूं कि आप खुले मस्तिष्क से उन लोगों का दृष्टिकोण समझने की कोशिश करेंगे जो आपसे सहमत न हों। यह बहुत आवश्यक है कि जिन परिस्थितियों ने इस आंदोलन को प्रेरणा दी, उसका निष्पक्ष भाव से अध्ययन किया जाए और शीघ्र ही ऐसा शांतिपूर्ण समझौता किया जाए जो इससे सम्बद्ध सभी के लिए न्यायोचित हो।

     प्रजा परिषद के नेताओं और अन्य लोगों ने बारम्बार यह प्रयास किया है कि वैधानिक ढंग से कोई शांतिपूर्ण समझौता हो जाए। आपको, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद, राज्यमंत्री शेख अब्दुल्ला को पत्र भेजे गए। इनमें से कुछ के साथ साक्षात्कार करने का प्रयत्न भी किया गया, जिनका अधिकतर अवसर ही नहीं दिया गया।     समय-समय पर सभाएं होती रहीं और गूढ़ विचार-विनिमय के बाद जनता के समक्ष प्रजा परिषद तथा इसके समर्थकों के दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए। प्रकटरूप से संबंधित अधिकारियों ने जनता के इन विचारों पर कोई ध्यान नहीं दिया बल्कि इनसे घृणा का व्यवहार किया। दूसरी ऐसी बातों की ओर जो विवादास्पद थीं, अधिकारियों ने अनावश्यक तत्परता से ध्यान दे कर एक संकटप्रद स्थिति पैदा कर दी।
आप और शेख अब्दुल्ला को अब तक यह समझ लेना चाहिए था कि यह अंादोलन बलप्रयोग अथवा आतंक से नहीं दबेगा। जम्मू और कश्मीर की समस्या पर पार्टी की दृष्टि से विचार नहीं करना चाहिए। यह एक राष्ट्रीय समस्या है, जिसके लिए एक संयुक्त अभिमत बनाने का प्रयत्न होना चाहिए।
जम्मू और कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है ओर इस हेतु शेष भारत के लोगों का इस राज्य के मामलों में रुचि लेना बिलकुल स्वाभाविक और उचित है।

         जम्मू के लोग किसी भी परिस्थिति में भारत के साथ अपना संबंध तोड़ने को तैयार नहीं हैं। विलय के इस मूलप्रश्न को हमेशा के लिए सुलझाने में जितनी देर होगी उतनी ही गुत्थियां तथा अशांति की संभावनाएं बढ़ेंगी।
क्या यह मांग करना जम्मू वासियों का पैतृक अधिकार नहीं है कि वे उसी संविधान से अनुशासित होंगे जो शेष भारत में व्यवहार में है। इन लोगों का यह नारा ‘एक प्रधान, एक विधान, एक निशान’ उनकी देशानुराग पूर्ण भावनाओं की अभिव्यक्ति है, जिसके द्वारा वे अपना संघर्ष चला रहे हैं।’’

*पत्र का उत्तर*
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस पत्र का उत्तर देते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि -‘‘मैं बिलकुल तैयार हूं और मुझे विश्वास है कि शेख अब्दुल्ला भी जम्मूवासियों की शिकायत सुनने और यथासंभव उन्हें दूर करने के लिए तैयार हैं। किन्तु प्रजा परिषद की मांगे मूलभूत संवैधानिक प्रश्न हैं जो किन्हीं कारणों से मानी नहीं जा सकती है। वे एक बड़े कठिन और विवादग्रस्त  संवैधानिक प्रश्न को युद्ध द्वारा सुलझाना चाहते हैं। यह सहज ही प्रकट है कि इन तरीको सं वांछित परिणाम नहीं निकल सकता।
     आपको यह समझ लेना चाहिए कि मैं जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को सुलझाने को उत्सुक हूं, लेकिन यह प्रश्न अब इतना उलझ गया है कि इसे आज्ञा या लोकसभा के कानून द्वारा हल करना कोई हंसी-खेल नहीं है, जैसाकि कुछ लोग समझते हैं। जम्मू समस्या को हल करने का सीधा तरीका यह है कि पहले आंदोलन बिलकुल बंद कर दिया जाए और तब शिकायतों पर विचार किया जाए। मुझे आशा है आप इस ओर अपने प्रभाव से प्रजा परिषद् का मार्गदर्शन करेंगे। यदि आप चाहते हैं तो मैं आपसे मिल कर प्रसन्न होऊंगा, किन्तु मैं दस दिनों के लिए मुम्बई और कोलकाता जा रहा हूं।’’  
 
  *एक राजनीतिक चूक*
        इस प्रकार अपने पत्र में जवाहरलाल नेहरू ने प्रजापरिषद को ही दोषी ठहराया। इसके बाद अपने एक भाषण में भी प्रजा परिषद के आंदोलन को साम्प्रदायिक ठहराया। इस तरह एक राजनीतिक चूक ने कश्मीर की स्थिति को किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचने से रोक दिया।
        सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली के लिए ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व’’ श्रृंखला में श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जीवनी लिखते समय मुझे इन पत्रों की जानकारी मिली। कश्मीर की स्थिति को दर्शाते इस पत्राचार के उस प्रथम पत्र को जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखा था तथा प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया उत्तर मैंने ‘‘चर्चा प्लस’’ की इस कड़ी में रखा है। शेष चार पत्रों के लिए आप मेरी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व: श्यामाप्रसाद मुखर्जी’’ पढ़ सकते हैं जो अमेजन एवं फ्लिपकार्ट से भी मंगाई जा सकती है। मुझे लगता है कि कश्मीर के वर्तमान की पीड़ा को समझने के लिए उसके अतीत को जानना भी आवश्यक है। तब अहसास होगा कि वहां दर्द की जड़े कितनी गहरी हैं।
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Thursday, August 8, 2019

कश्मीर की आंच को महसूस किया था बुंदेलखंड ने भी - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह …. नवभारत में प्रकाशित


Dr (Miss) Sharad Singh
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
 
 
    धारा 370 एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा रहा है जो कई दशकों से प्रतीक्षा कर रहा था सुलझाए जाने का। धारा 370 के हटते ही कश्मीर का देश में विधिवत् सम्मिलन हो सकता था। प्रसन्नता है कि एक बार फिर मोदी सरकार ने अपनी दृढ़ता का परिचय दिया। एक बड़ी राजनीतिक त्रुटि को सुधारते हुए कश्मीर में शांति स्थापना और वहां के विस्थापित एवं पीड़ित नागरिकों को एक खुशहाल ज़िन्दगी देने के लिए जरूरी था कि कश्मीर को धारा 370 से मुक्त कर के भारत के अन्य राज्यों की भांति आजादी से सांस लेने दिया जाए। 
      सदियों से कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों को 1990 में आतंकवाद की वजह से घाटी छोड़नी पड़ी या उन्हें जबरन निकाल दिया गया। कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बेरहमी से सताया गया। उनकी बेरहमी से हत्याएं की गई। उनकी स्त्रियों, बहनों और बेटियों के साथ दुष्कर्म किया गया। उनकी लड़कियों का जबरन निकाह मुस्लिम युवकों से कराया गया। कश्मीर के पंडितों को बिना किसी गलती के ही अपने घर से बेघर हो गया। उन्हें शायद अपनी शांतिप्रियता के कारण ही यह दिन देखने पड़ा कि सब कुछ होते हुए भी वे और उनके बच्चे सड़क पर आ गए। राजनेताओं की उपेक्षा ने भी हाशिए पर ला दिया। सदियों से कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों को 1990 में आतंकवाद की वजह से घाटी छोड़नी पड़ी या उन्हें जबरन निकाल दिया गया। कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बेरहमी से सताया गया। उनकी बेरहमी से हत्याएं की गई। उनकी स्त्रियों, बहनों और बेटियों के साथ दुष्कर्म किया गया। उनकी लड़कियों का जबरन निकाह मुस्लिम युवकों से कराया गया। यह अत्याचार कई वर्षो तक चला, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने कभी भी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में रुचि नहीं दिखाई। आज भी ये जम्मू और दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में बदहाल अवस्था में रह रहे हैं, लेकिन सरकारें इनकी समस्याओं के समाधान के नाम पर चुप्पी साधे बैठी रहीं हैं। 4 जनवरी 1990 को कश्मीर के प्रत्येक हिंदू घर पर एक नोट चिपकाया गया, जिस पर लिखा था- कश्मीर छोड़ के नहीं गए तो मारे जाओगे। सबसे पहले हिंदू नेता एवं उच्च अधिकारी मारे गए। फिर हिंदुओं की स्त्रियों को उनके परिवार के सामने सामूहिक दुष्कर्म कर जिंदा जला दिया गया या निर्वस्त्र अवस्था में पेड़ से टांग दिया गया। बालकों को पीट-पीट कर मार डाला। कश्मीर से 3.5 लाख हिंदू पलायन कर गए। भारत के विभाजन के तुरंत बाद ही कश्मीर पर पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर आक्रमण कर दिया और बेरहमी से कई दिनों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किए गए, क्योंकि पंडित नेहरू ने सेना को आदेश देने में बहुत देर कर दी थी। इस देरी के कारण जहां पकिस्तान ने कश्मीर के एक तिहाई भू-भाग पर कब्जा कर लिया, वहीं उसने कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कर उसे पंडित विहीन कर दिया। 
    पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर आतंकी वारदातें की गई। आतंकियों के निशाने पर कश्मीरी पंडित रहे, जिससे उन्हें अपनी पवित्र भूमि से बेदखल होना पड़ा और अब वे अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं। पिछले 23 वर्षो से जारी आतंकवाद ने घाटी के मूल निवासी कहे जाने वाले लाखों कश्मीरी पंडितों को निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है। 24 अक्टूबर, 1947 की बात है, पठान जातियों के कश्मीर पर आक्रमण को पाकिस्तान ने उकसाया, भड़काया और समर्थन दिया। तब तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद का आग्रह किया। नेशनल कांफ्रेंस (नेकां), जो कश्मीर सबसे बड़ा लोकप्रिय संगठन था व उसके अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला थे, ने भी भारत से रक्षा की अपील की। पहले अलगाववादी संगठन ने कश्मीरी पंडितों से केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए कहा था, लेकिन जब पंडितों ने ऐसा करने से इनकार दिया तो उनका संहार किया जाने लगा। ’जेहाद’ और ’निजामे-मुस्तफा’ के नाम पर बेघर किए गए लाखों कश्मीरी पंडितों के वापस लौटने के सारे रास्ते बंद कर दिए। ऐसे में जातिसंहार और निष्कासन के शिकार कश्मीरी पंडित घाटी में अपने लिए ’होम लैंड’ की निरंतर मांग करते रहे हैं। 
 
     मेरा जन्म बुंदेलखंड के एक छोटे से जिला मुख्यालय पन्ना में हुआ था। छः सरकारी मकानों की एक कॉलोनी थी जिसका नाम था हिरणबाग। दरअसल, वह एक बाग था जिसमें राजाशाही के समय हिरण पाले जाते थे। अधिग्रहण के बाद पीडब्ल्यूडी ने वहां छः मकान बनवाए जो मात्र सरकारी शिक्षिकाओं को एलॉट किए जाते थे। मेरी मां डॉ विद्यावती भी शिक्षिका रहीं अतः रीवा से स्थानांतरित होने पर उन्हें भी हिरणबाग में एक मकान एलॉट किया गया। वहीं मेरा जन्म हुआ। हमारे पड़ोस में शिक्षिका राजकुमारी दर रहा करती थीं। गोरी-चिट्टी और कुछ अलग बोली-लहजे वालीं। वे कश्मीरी थीं। जब तक वे हिरणबाग में रहीं तब तक मेरा उनके घर आना-जाना बना रहा। बड़े होने पर किसी चर्चा के दौरान मुझे पता चला था कि वे कश्मीरी विस्थापित पंडित थीं। जिन्हें अपने माता-पिता के साथ सन् 1947 के बाद कश्मीर छोड़ कर भागना पड़ा था और आजीविका उन्हें पन्ना जैसे सुदूर क्षेत्र में ले आई थी। इसके बाद संयोगवश एक और आत्मीय कश्मीरी पंडित भुवनपति शर्मा से मेरा परिचय हुआ जो सदा के लिए मेरे बड़े भाई बन गए। वे दूरदर्शन में डिप्टी कंट्रोलर (प्रोग्राम) के पद से सेवानिवृत्त हुए और अब अमेरिका के वर्जीनिया राज्य में रह रहे हैं। जब भी उनसे मुलाक़ात होती तो यह सोच कर दुख होता कि यह सहज, शालीन, मिलनसार व्यक्ति भी एक विस्थापित कश्मीरी है। राजनीतिक एवं धार्मिक अंधत्व कितना दुखदाई होता है, इस पीड़ा को मैंने बुंदेलखंड में रहते हुए इन दो व्यक्तियों के जीवन से महसूस किया। कश्मीर का जिक्र आते ही मैंने इन दोनों शख़्सियतों की आंखों में आंसू देखे थे। मात्र मैंने ही नहीं वरन् समूचे बुंदेलखंड ने विस्थापित कश्मीरियों की पीड़ा की आंच को महसूस किया है। आज यह सोच कर ही खुशी हो रही है कि इन दोनों को ही नहीं वरन् प्रत्येक उस कश्मीरी को राहत मिली होगी जो कभी अपनी मातृभूमि कश्मीर लौटने के बारे में सोच भी नहीं पाता रहा होगा। 
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#बुंदेलखंड #कश्मीर #धारा370


Wednesday, August 7, 2019

चर्चा प्लस ... 70 साल बाद कश्मीर से अलविदा धारा 370 - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

70 साल बाद कश्मीर से अलविदा धारा 370
- डॉ. शरद सिंह


महान विचारक सुकरात ने कहा था कि ‘‘ज़िन्दगी नहीं बल्कि एक अच्छी ज़िन्दगी मायने रखती है।‘‘ कश्मीर अभी तक ज़िन्दगी जी रहा था किन्तु अब अच्छी ज़िन्दगी जिएगा। लगभग 70 साल पहले हुई राजनीतिक त्रुटि को इस प्रकार दृढ़तापूर्वक सुधारे जाने के लिए निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह प्रशंसा के पात्र हैं। दैनिक सागर दिनकर के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मैंने 17.01.2018 को जो लेख मैंने धारा 370 पर लिखा था उसका शीर्षक ही था कि ‘‘धारा 370 की ऐतिहासिक भूल अब सुधरनी ही चाहिए’’। मैं यह नहीं कहती हूं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अथवा गृहमंत्री अमित शाह ने मेरा लेख पढ़ा, वरन् उन्होंने उस चाहत को पढ़ा जो हर भारतीय के दिल पर लिखी हुई थी।

Charcha Plus - 70 साल बाद कश्मीर से अलविदा धारा 370  -  Goodbye Article 370 ... Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
       70 साल बाद आखिर वह हो ही गया जिसे 70 साल पहले हो जाना चाहिए था। प्रत्येक भारतीय आज यही कह रहा है कि-‘‘धन्यवाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जी!’’
धारा 370 एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा रहा है जो कई दशकों से प्रतीक्षा कर रहा था सुलझाए जाने का। मोदी सरकार ने अडिग रहते हुए जिस प्रकार ट्रिपल तलाक और नोटबंदी जटिल मामलों को सुलझाया एवं लागू किया, उसी प्रकार की दृढ़ता की अपेक्षा थी धारा 370 के संदर्भ में। क्योंकि इस धारा के हटते ही कश्मीर का देश में विधिवत् सम्मिलन हो सकेगा। प्रसन्नता है कि एक बार फिर मोदी सरकार ने अपनी दृढ़ता का परिचय दिया। देश की आजादी के बाद कश्मीर को मिले विशेष दर्जे पर मैं यहां चर्चा कर रही हूं कुछ ऐसे तथ्यों और बिन्दुओं की जिन्हें मैंने अपनी पुस्तकों ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्यामाप्रसाद मुखर्जी’’ तथा ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व सरदार वल्लभभाई पटेल’’ में लेखबद्ध किया है। अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्यामाप्रसाद मुखर्जी’’ में मैंने तथ्यों के आधार पर उल्लेख किया है कि 8 मई 1953 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीरयात्रा के लिए विदा देने आए जनसमूह सहित पत्रकारों से कहा था-‘‘जवाहरलाल नेहरू ने बार-बार यह घोषणा की है कि भारत में जम्मू और कश्मीर का विलय शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है, फिर भी यह अद्भुत बात है कि कोई भारतीय नागरिक भारत सरकार से अनुमति लिए बिना भारत के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। यह अनुमति कम्युनिस्टों को भी मिली है जो राज्य में अपना वही विघटनकारी खेल खेल रहे हैं। किन्तु उन लोगों को जाने की अनुमति नहीं है जो भारतीय हैं और राष्ट्रीयता की दृष्टि से सोचते और करते हैं। .... मैं नहीं सोचता कि भारत सरकार को मुझे भारतीय यूनियन के किसी भी हिस्से में जिसमें स्वयं पं. नेहरू के अनुसार जम्मू और कश्मीर भी शामिल है, जाने से रोकने का कोई अधिकार है। वैसे अगर कोई कानून के प्रतिकूल आचरण करता है तो उसे इसके परिणाम अवश्य भुगतने होंगे।’’ उस दिन पं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी दिल्ली से अम्बाला जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचे। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन्हें विदाई देने के लिए भारतीय जनसंघ, हिन्दू महासभा, आर्य समाज तथा अन्य संगठनों के हजारों कार्यकर्ता उपस्थित थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, वैद्य गुरूदत्त, प्रो. बलराज मधोक भी उनके साथ रवाना होने के लिए आ पहुंचे। इस अवसर पर अनेक प्रमुख समाचार पत्रें के प्रतिनिधि वहां उपस्थित थे। उन्होंने यह भी कहा था कि -‘‘ शेख अब्दुल्ला ने पं. नेहरू पर दबाव बना कर राज्य में अलग प्रधान, अलग विधा और अलग निशान का प्रावधान करा लिया है।’’

डॉ. मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहां का मुख्यमन्त्री (वजीर-ए-आजम) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश की अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प लेते हुए घोषणा की - ‘‘स्वतंत्र भारत में सदा एक देश, एक निशान, एक प्रधान ही होगा और हमें अलगाववादी तत्वों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कटिबद्ध रहना होगा।’’
धारा 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार दिया गया। अनुच्छेद 35 ए, धारा 370 का ही हिस्सा है। इस धारा के कारण से कोई भी दूसरे राज्य का नागरिक जम्मू-कश्मीर में न तो संपत्ति खरीद सकता है और न ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता था। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर ले तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते थे। साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं। भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। यहां के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। एक नागरिकता जम्मू-कश्मीर की और दूसरी भारत की होती थे। यहां दूसरे राज्य के नागरिक सरकारी नौकरी नहीं कर सकते थे। यहां तक कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश भी सीधे वहां प्रभावी नहीं हो सकते थे।
जिस प्रकार नोटबंदी और ट्रिपल तलाक जैसे मामलों में केन्द्र सरकार ने तत्परता दिखाई और कड़ाई से कदम उठाए उसके बाद यह सोच बनना स्वाभाविक था कि उस ऐतिहासिक भूल को भी यह सरकार सुधारने की दिशा में कोई न कोई कठोर कदम उठाएगी जिसे ‘धारा 370’ के रूप में जाना जाता है। स्वयं भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से इस तरह की मांगे समय-समय पर उठती रही हैं। विगत वर्ष यानी 2017 के दिसम्बर माह में शिवसेना के अरविंद सावंत ने कहा कि ‘‘तीन तलाक के खिलाफ विधेयक से समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद पैदा होती है। अगर समान नागरिक संहिता लागू हो गई और कश्मीर से धारा 370 हट गई तो बहुत सारी चीजें ठीक हो जाएंगी।’’
इससे पूर्व दिसम्बर 2013 में राजनाथ सिंह ने कहा था -‘‘संसद में इस बात पर बहस हो कि क्या धारा 370 जम्मू कश्मीर के लिए किसी तरह से फायदेमंद है या वहां के लोगों को राजनीतिक रूप से सशक्त करने का काम करती है? अगर ऐसा नहीं है, तो इसे तुरंत निरस्त कर देना चाहिए।’’

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि राष्ट्रवादी नेता चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के प्रश्न को हल करने का दायित्व सरदार वल्लभ भाई पटेल को सौंपा जाना चाहिए किन्तु जवाहरलाल नेहरू इस पक्ष में नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का मामला अपने हाथ में ही रखा। यदि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर की रियासत को भी वल्लभ भाई के हवाले दिया होता तो कश्मीर की समस्या 21 वीं सदी का मुंह कभी नहीं देख पाती।
एक बड़ी राजनीतिक त्रुटि को सुधारते हुए कश्मीर में शांति स्थापना और वहां के विस्थापित एवं पीड़ित नागरिकों को एक खुशहाल ज़िन्दगी देने के लिए जरूरी था कि कश्मीर को धारा 370 से मुक्त कर के भारत के अन्य राज्यों की भांति आजादी से सांस लेने दिया जाए। कश्मीर के साथ ही लद्दाख को भी ध्यान में रखा जाना एक और महत्वपूर्ण निर्णय है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 07.08.2019)
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Monday, August 5, 2019

कश्मीर... एक सपना आज सच हुआ - डॉ शरद सिंह

 प्रिय मित्रो, दैनिक सागर दिनकर, 17.01.2018 में अपने कॉलम "चर्चा प्लस" में लिखा था...आज उसे पूरा होते देख खुशी हो रही है....
Dr (Miss) Sharad Singh on Article 370 in Column Charcha Plus, Sagar Dinkar, 17.01.2018