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Saturday, August 23, 2025

संस्मरण | पद्मश्री रामसहाय पांडे - डॉ शरद सिंह | "चौमासा" पत्रिका में प्रकाशित

आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल की पत्रिका  "चौमासा" के मार्च - जून 2025 अंक में सागर गौरव मृदंग वादक व राई नर्तक पद्मश्री स्व. पं. रामसहाय पाण्डेय जी के जीवन पर आधारित है मेरा लेख ....👇
🚩 हार्दिक आभारी हूं "चौमासा" के संपादक मण्डल की। 🌹🙏🌹 
         लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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Friday, January 31, 2025

शून्यकाल | पहाड़ कोठी, मदार साहब और हनुमानजी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम  
शून्यकाल

 पहाड़ कोठी, मदार साहब और हनुमानजी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    .   स्मृतियां जीवन की अमूल्य निधि होती हैं। स्मृतियों में वह अतीत समाया होता है जो व्यक्ति की निजी थाती तो होता ही है साथ ही यदि उसे लेखबद्ध कर के पढ़ा जाए तो तत्कालीन पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक इतिहास बन जाता है। उस समय उसमें संबंधित व्यक्ति गौण हो जाता है और तत्कालीन घटनाएं एवं दशाएं प्रमुखता से मुखर हो उठती हैं। बिलकुल मुझे ऐसा ही लगता है जब मैं अपनी स्मृतियों को लेखबद्ध करती हूं।
         शहद से मीठे और पके आम जैसे रसीले बचपन के दिनों की सुनहरी आभा आज भी स्मृतियों की देहरी पर दमकती रहती है। बड़े ही खूबसूरत दिन थे। तब पहाड़ बहुत ऊंचे लगते थे और तालाब बहुत गहरे। हनुमान जी तब वैसे हनुमान जी नहीं लगते थे, जैसे अब लगते हैं। जी हां, मैं उसी पन्ना की बात कर रही हूं, वही शहर जहां मेरा बचपन व्यतीत हुआ। जहां मेरा घर था, वह हिरणबाग कहलाता था। यह कहा जाता था कि राजशाही के समय उस परिसर में हिरण पाले जाते थे। उस परिसर में आम, नीम वट और पीपल के अलावा नींबू, चांदनी, बगनविलास के पेड़ भी थे। जिनमें से कुछ धीरे-धीरे कटते चले गए और बाद में  आम, नीम, वट जैसे बड़े वृक्ष ही बचे। उस परिसर में दो बड़े कुएं थे, जिनमें हमेशा पानी लबालब भरा रहता था। इतना स्वच्छ पानी कि आस-पास के मोहल्ले की महिलाएं वहां से पीने का पानी भर कर ले जाया करती थीं। जब नाना जी से कोई कहानी सुनाते समय पनिहारिन का उल्लेख करते तो मेरे ज़ेहन में उन कुओं से पानी भरने वाली महिलाएं कौंध जातीं । फिर मेरे लिए कहानी की पनिहारिन की कल्पना करना आसान हो जाता । सीधे पल्ले की साड़ी, माथे तक घूंघट, कमर में चांदी की करधनी, हाथों में कांच की ढेर सारी चूड़ियां, सिर पर दो-दो घड़े और हाथों में लोहे की बाल्टियां। यानी ग़ज़ब का स्टेमिना। उनके घर से कुओं की दूरी कम से कम एक-दो किलोमीटर रहती ही थी। खूबसूरत ऊंची जगत वाले वे दोनों कुएं जिनमें पानी निकालने के लिए परंपरागत लकड़ी की घिर्रियां लगी हुई थीं ।
      हिरणबाग परिसर के मुख्य द्वार पर लोहे का बड़ा-सा फाटक था जिस पर चढ़कर  हम लोग झूला झूलते थे और डांट खाते थे। फाटक के बाहर चौराहा था। आज भी है। जिसका एक रास्ता छत्रसाल पार्क से होते हुए सिटी कोतवाली की तरफ जाता था। दूसरा रास्ता छोटे बाजार की ओर। दो रास्ते कुछ दूर समानांतर जाते थे जिनमें से एक रास्ता धर्म सागर तालाब की ओर जाता था और दूसरा पहाड़ कोठी की ओर ऊंचाई पर चढ़ता चला जाता था। पहाड़ कोठी नाम इसलिए पड़ा था क्योंकि वहां छोटा सा पहाड़ था जिस पर सरकारी कोठियां बनी हुई थीं। आज भी यथावत हैं। किंतु आज वह पहाड़ इतना बड़ा नहीं लगता है जितना बचपन में लगता था। आज वह पहाड़ इतना बड़ा रहा भी नहीं। बचपन के उस पहाड़ में अनेक वृक्ष थे। वह हरियाली से ढंका रहता था लेकिन आज उस पहाड़ की ढलान पर भी अनेक घर बन चुके हैं। पहाड़ कोठी की अपनी विशेषताएं थी। वहां एक्सक्यूटिव इंजीनियर, एक्साइज ऑफीसर तथा डीएफओ का बंगला था।  सबसे बड़ा कलेक्टर का बंगला था। इसके अलावा कुछ और छोटे-छोटे बंगले थे जो एसडीओ आदि को एलॉट किए जाते थे। वहां सबसे बड़ा भवन सर्किट हाउस था। यह सारे भवन आज भी मौजूद हैं।  
      एक्सक्यूटिव इंजीनियर के आलीशान बंगले में एक कुंड (चौपड़ा) बना हुआ था। जो बहुत ही डरावना लगता था। जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ती थी तो तत्कालीन एक्सक्यूटिव इंजीनियर की बेटी मेरे साथ पढ़ती थी। अब मुझे उसका नाम तो स्मरण नहीं है किंतु वह बंगला ज़रूर याद है। हम दो-तीन बच्चे अपनी उस सहेली के पास खेलने जाया करते थे। मां से अनुमति लेते समय यह हर बार सुनने को मिलता था कि  "ठीक है जाओ ! लेकिन कुंड की तरफ मत जाना। उस में झांकना भी मत। उससे दूर रहना।"
     .. इतनी सारी हिदायतें देकर मां जाने की इजाजत देती थीं। वह वाकई बहुत गहरा कुंड था। उसमें कई सीढ़ियां थीं। उसकी गहराई का अंदाज़ा कम से कम उस समय तो नहीं लगाया जा सकता था। जाहिर है, मुझे उस कुंड से डर  लगता था और मैं उसके पास जाने से हिचकती थी।
         पीडब्ल्यूडी के एक्सक्यूटिव इंजीनियर के उस बंगले के सामने राजाओं के जमाने की पुरानी बड़ी-सी तोप की बैरल रखी हुई थी। हम लोग अक्सर उस पर  बैठा करते थे। उस बैरल का मुंह शहर की ओर था। मानो वह शहर की सीमाओं की रक्षा करने के लिए सदा कटिबद्ध हो । एक्सक्यूटिव इंजीनियर के बंगले से आगे आखरी बंगला डीएफओ का था। बहुत ही बड़ा-सा बंगला। जिसमें बहुत सारे पेड़ लगे हुए थे। इन सभी बंगलों के सामने गार्ड्स पहरा देते थे। लेकिन हम बच्चों के लिए कहीं कोई रोक-टोक नहीं थी। उस समय बहुत ही सीधा सरल माहौल था। वे गार्ड्स भी हमसे हंसते मुस्कुराते मिलते थे और कभी कभी कुछ खाने को भी दे दिया करते थे। कभी चॉकलेट तो कभी कोई फल।  तनिक भी डर या अविश्वास का माहौल नहीं था। हम लोग कभी-कभी सर्किट हाउस भी चले जाया करते थे। जब कोई अधिकारी वहां ठहरा नहीं रहता था और कमरे खाली पड़े रहते थे तो वहां के केयरटेकर हम बच्चों को कमरे में जाने की इजाजत दे दिया करते थे। लेकिन इस शर्त के साथ कि हम किसी भी चीज को हाथ नहीं लगाएंगे, कोई तोड़फोड़ नहीं करेंगे, किसी तरह की गंदगी नहीं फैलाएंगे। हमें उनकी सारी शर्तें मंजूर रहतीं। हम वहां दीवार पर लगे बड़े-बड़े दर्पणों में अपने आप को देखते और खुश होते। फिर बाहर आकर सर्किट हाउस के परिसर में कुछ देर खेलते और फिर लौट जाते। वहां से धर्म सागर तालाब भी दिखाई देता था। जोकि बहुत सुंदर दृश्य होता था।
      डीएफओ के बंगले के आगे भी रास्ता था जो पहाड़ की चोटी तक जाता था। लेकिन बंगले के आगे का रास्ता कच्चा था। उस रास्ते में आगे चलकर एक मजार स्थापित थी जो "मदार साहब" कहलाती थी। निश्चित रूप से यह "मजार साहब" का ही अपभ्रंश थी। उस मजार पर हमेशा सुनहरे किनारों वाली हरे रंग की चादर चढ़ी रहती थी और वह पूरा क्षेत्र लोबान की सुगंध से महकता रहता था। हर शुक्रवार कोई न कोई मुस्लिम परिवार चादर चढ़ाने मदार साहब जाया करता था। पूरे बाजे गाजे के साथ। विशेष रूप से जिसकी मन्नत पूरी होती थी वह हाथठेले पर चादर और चढ़ावा रखवा कर और लाउडस्पीकर पर गाना बजाते हुए जुलूस के रूप में जाता था। उसमें परिवार की महिलाएं, पुरुष और बच्चे सभी शामिल रहते थे। लाउडस्पीकर पर हमेशा एक ही गाना बजाया जाता था जो वास्तव में ख्वाजा की इबादत में गाए जाने वाली कव्वाली थी। वह कव्वाली मुझे बहुत अच्छी लगती थी। इसीलिए आज भी उसके बोल याद हैं -
"भर दो झोली मेरी या मोहम्मद
लौटकर मै न जाऊंगा खाली..."
        अब तो इस कव्वाली हो अनेक कव्वालों द्वारा गाया जा चुका है। पर उस समय जो कव्वाली बजती थी वह शायद साबरी ब्रदर्स के द्वारा गाई गई थी।
     मदार साहब की बहुत मान्यता थी। सिर्फ मुस्लिम नहीं बल्कि सभी धर्म के लोग वहां मन्नतें मांगने और चादर चढ़ाने जाया करते थे। मदार साहब से और ऊपर जाने पर पहाड़ की चोटी पर पहुंचते थे जो लगभग समतल स्थान था। वहां अनेक ध्वंसावशेष मौजूद थे जिनमें से एकाध तो इस प्रकार गोलाकार थे कि जिससे यह लगता था कि संभवत वहां कभी बौद्ध स्तूप रहा होगा। यद्यपि इसके कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। किंतु यह असंभव भी नहीं है।
           पहाड़ कोठी से नीचे उतरते समय घुमावदार रास्ता था। एक गहरा अंधा मोड़ और दूसरा खुला मोड़। दूसरे मोड़ पर हनुमान जी का मंदिर था। जोकि नीचे से ऊपर जाते समय पहले पड़ता था। पत्थर की फर्शी से ढंका हुआ बड़ा-सा आंगन। जो सड़क से 4-5 सीढ़ियां नीचे था । आंगन में एक ओर हनुमान जी की मढ़िया थी। उस मढ़िया की फटकी (छोटा दरवाजा) हमेशा खुली रहती थी। तीन ओर लोहे के सींखचे थे। उन दिनों न हनुमान जी को इंसानों का डर था और न इंसानों की नीयत में खोट थी कि वे वहां से कुछ चुराने का प्रयास करते। वैसे देखा जाए तो हनुमान जी की उस मढ़िया में चुराने लायक कुछ था ही नहीं। एक आदद पत्थर की मूर्ति थी जिसे पुजारी जी सुबह मुंह अंधेरे नहला-धुला कर, उस पर सिंदूर का लेप कर दिया करते थे। सिंदूर के लेप के ऊपर हनुमान जी के चेहरे पर बड़ी-बड़ी सुंदर दो आंखें चिपका दी जाती थीं। सुबह मंदिर में घंटे बजाकर पूजा की जाती और प्रसाद बांटा जाता। आमतौर पर नारियल और चिरौंजी दाने का। शाम को भी आरती और पूजा होती। विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को वहां मेले जैसी भीड़ जुड़ती थी। अनेक श्रद्धालु शुद्ध मावे के पेड़े, बेसन के लड्डू या भोग के लड्डू (जो सिर्फ पूजा में चढ़ावे के लिए ही बनाए जाते थे इसीलिए उन्हें भोग के लड्डू कहा जाता था) चढ़ाते थे। साथ में नारियल भी। हनुमान जी  को चढ़ाने के बाद शेष प्रसाद वहां उपस्थित बच्चों और बड़ों सभी में समान रूप से बांट दिया जाता था। अनेक बच्चे प्रसाद पाने के लालच में ही मंगलवार और शनिवार को मंदिर पहुंच जाया करते थे।
        हनुमान जी का मंदिर मेरे घर से अधिक दूर नहीं था। कई बार मैं, वर्षा दीदी और कॉलोनी के अन्य बच्चे मंदिर प्रांगण में खेलने चले जाया करते थे। मंदिर प्रांगण में एक चिल्ली का वृक्ष था। उस वृक्ष में गर्मी के मौसम में फल सूखकर उड़ने के लिए तैयार हो जाते थे। चिल्ली के बीज का स्वाद चार की चिरौंजी जैसा होता था। मैं और वर्षा दीदी मंदिर प्रांगण में जाकर ढेर सारी चिल्लियां बटोर किया करते थे। फिर घर आकर उनमें से बीज निकालकर खाया करते थे। मां समझाती थीं कि "ज्यादा बीज मत खा लेना नहीं तो पेट दुखेगा।" लेकिन बचपन में ऐसी हिदायतओं की भला किसे परवाह रहती है? वैसे भी बचपन में पाचन शक्ति भी तगड़ी होती है। खेलना, कूदना और सब कुछ पचा लेना, यही तो विशेषता होती है बचपन की। मैं तो यूं भी बचपन से ही खिलंदड़ी किस्म की थी। अवसर पाते ही घर से बाहर कॉलोनी के बच्चों के साथ खेलने जा पहुंचती और तब तक खेलती रहती जब तक मां डांट कर, वापस घर चलने को नहीं कहतीं। यद्यपि मां की आज्ञा की अवहेलना मैंने कभी नहीं की इसलिए पहली डांट पर ही सीधे घर का रास्ता पकड़ लेती।
        आज उन बचपन के दिनों से समयनं बहुत दूर आ चुका है। लेकिन हनुमान जी और मदार साहब के बीच के सौहार्द्र की छाप आज भी मेरे मानस में मौजूद है। शांति, अपनत्व और हरियाली का संदेश देती चिल्लियां आज भी मेरे मन के आंगन में उड़ती रहती हैं।       
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Monday, December 2, 2024

वे सागर को साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय केंद्र बनाना चाहते थे- डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

स्मृति शेष जाने-माने कला मर्मज्ञ मुन्ना शुक्ला नहीं रहे, श्रुति मुद्रा संस्था की स्थापना की
वे सागर को साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय केंद्र बनाना चाहते थे
- डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

अभी तो नींद बाक़ी थी, अभी तो ख़्वाब बाक्री थे, 
तुम्हीं जो चल दिए तो सुबह के आने से क्या होगा ?

जब एक हंसमुख, मिलनसार एवं इरादे का पक्का व्यक्ति हमारे बीच से हमेशा के लिए चला जाता है तो उसके न होने पर विश्वास करना सबसे कठिन होता है। सागर का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाज 1 दिसम्बर 2024 का दिन कभी नहीं भूलेगा क्योंकि यह दिन एक ऐसे मनीषी से चिरविदा का दिन साबित हुआ जिसने ताउम्र सागर के सांस्कृतिक विकास का स्वप्न देखा और अपने इस सपने को साकार करने का हरसंभव प्रयास किया। यूं तो उनका नाम था शिवचंद्र शुक्ला, किन्तु सभी के लिए वे थे 'मुन्ना भैया' और 'मुत्रा शुक्ला'। साहित्य पर मेरी उनसे लम्बी-लम्बी चर्चाएं हुआ करती थीं। अधिकतर मोबाइल पर। आधुनिक कविता पर चर्चा करना उन्हें बहुत प्रिय था। वैसे साहित्य की लगभग सभी विधाओं की उन्हें गहरी जानकारी थी। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि 'मैं चाहता हूं कि सागर साहित्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाए। 
शिवचंद्र शुक्ला उर्फ मुत्रा भैया का जन्म 6 सितंबर 1957 को लखनऊ (उ.प्र.) में हुआ था। किन्तु सागर रक्त बन कर उनकी धमनियों में बहता था। सागर के सांस्कृतिक विकास के पक्ष में हमेशा उनका स्वर बुलंद रहा। उनके पिता पं. शिवकुमार शुक्ल धर्मशास्त्र, ज्योतिष, दर्शनशास्त्र, नाट्य संगीत एवं संगीत के प्रकाण्ड विद्वान थे। वस्तुतः सांस्कृतिक संस्कार उन्हें अपने पिता से मिले।
सागर में 1976-77 के दौरान डॉ अनिल वाजपेयी, डॉ दिनेश अत्री और डॉ. ओपी श्रीवास्तव द्वारा गठित साहित्यिक संस्था बुनियाद के वे सचिव रहे। उन्होंने 1994 में श्रुतिमुद्रा नामक संस्था का गठन किया जिसके वे सचिव रहे। श्रुति मुद्रा के अंतर्गत नृत्य आदि प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए सतत मंच उपलब्ध कराया तथा बुनियाद के अंतर्गत साहित्यिक विषय पर प्रतिवर्ष एक विशेष व्याख्यान आयोजित करते थे। वे वर्ष 2002 से आदर्श संगीत महाविद्यालय सागर की अध्यक्ष रहे। मुन्ना शुक्ला की पहचान एक कला समीक्षक के रूप में भी थी। संगीत, दर्शन एवं समाजशास्त्र जैसे विषयों पर तार्किक चर्चा एवं लेखन उनकी विशेषता थी। मुन्ना भैया ने अपने विचारों को अपने निजी जीवन में भी उतारा । उनके परिवार में साहित्य और संस्कृति की जो इन्द्रधनुषी छटा दिखती है मुन्ना वह भैया के विचारों का प्रतिफलन है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुन्ना शुक्ला का जाना सागर के कला, संगीत, संस्कृति एवं साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी रिक्तता का बोध करा रहा है, जिसकी पूर्ति संभव नहीं है। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !
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16 दिसम्बर 2023 की तस्वीर में बाएं से- डॉ कविता शुक्ला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह एवं मुन्ना शुक्ला जी।

हार्दिक आभार #दैनिकभास्कर 🙏
हार्दिक आभार अग्रज उमाकांत मिश्र जी🙏
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh 
#श्रद्धांजलि #tribute #mytribute

Wednesday, August 30, 2023

पुस्तक समीक्षा | एक फाॅरेस्ट ऑफिसर के रोचक संस्मरणों का रोचक सफ़रनामा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है 29.08.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक प्रेम नारायण मिश्रा की पुस्तक "उद्गार: एक फाॅरेस्ट  ऑफिसर  का सफ़रनामा" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
एक फाॅरेस्ट ऑफिसर  के रोचक संस्मरणों का रोचक सफ़रनामा
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक     - उद्गार: एक फाॅरेस्ट  ऑफिसर  का सफ़रनामा
लेखक     - प्रेम नारायण मिश्रा
प्रकाशक    - आईसेक्ट पब्लिकेशन ई-7127, एस.बी.आई. अरेरा कॉलोनी भोपाल-462016
मूल्य       - 300/-
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प्रेम नारायण मिश्रा साहित्य जगत के लिए एक नया नाम कहा जा सकता है किन्तु उनके वे अनुभव पुरातन एवं दीर्घकालिक हैं जिन्हें उन्होंने अपनी पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से विज्ञान विषय से स्नातक करने के बाद प्रेम नारायण मिश्रा ने फॉरेस्ट रेंजर कॉलेज कोयंबटूर से दो वर्ष की तकनीकी शिक्षा संबंधी डिग्री प्राप्त की। वन विभाग के अधिकारी पद पर रहते हुए उन्होंने पूर्व मध्य प्रदेश में वनों का निकटता से गहन अध्ययन एवं भ्रमण कर वनवासियों का सान्निध्य, वन्य प्राणियों की निकटता से अनुभूति का दीर्घ अनुभव प्राप्त किया। सेवानिवृत्ति के उपरान्त संस्मरण के रूप में अपने अनुभवों को लेखबद्ध किया है ‘‘उद्गार: एक फाॅरेस्ट ऑफिसर का सफरनामा’’ में।
जंगल हमें लुभाते हैं। अपने पास बुलाते हैं। साथ ही रहस्मयमय भी लगते हैं। शहरी क्षेत्र के लोगों के लिए वन, वनोपज, वनवासी ये तीनों सदैव कौतूहल का विषय होते हैं। किन्तु एक बार जिसने वन को करीब से देख लिया, वह उसे कभी विस्मृत नहीं कर पाता है। वन की प्राकृतिक विशेषताएं चेतन मन पर ही नहीं, वरन अवचेतन मन पर भी अपनी छाप छोड़ जाती हैं। ‘‘उद्गार: एक फाॅरेस्ट आफीसर का सफरनामा’’ जब मेरे हाथों में आई तो मेरी अनेक स्मृतियां ताज़ा हो उठीं। मेरा जंगल से विशेष संबंध रहा है। मेरा बचपन पन्ना के सघन वन में घूमते, उसे महसूस करते व्यतीत हुआ। किशोरावस्था में मनेन्द्रगढ़ के निकट के जंगलों विशेषरूप से ग्राम बिजुरी से मनेन्द्रगढ़ के बीच विस्तारित बोरीडण्ड के जंगलों में तेंदू के वृक्षों, फलों और भालुओं के बारे में जानने का अवसर मिला। बुंदेलखण्ड के सागौन के सरसराते वनों से हर्र, बहेरा, आंवला, तेंदू आदि के वृक्षों वाले मनेन्द्रगढ़ के वनों का सफर मेरे जीवन में नए अध्याय जोड़ता गया। सतपुड़ा के जंगल भी निकट से देखे हैं। पन्ना नेशनल पार्क को बनते देखा तो कान्हा नेशनल पार्क को विकसित अवस्था में देखा। इसीलिए जब यह पुस्तक मेरे हाथों में आई तो कई ऐसे परिचितों एवं मित्रों की भी स्मृतियां ताज़ा हो गईं जो वन विभाग में सेवारत थे। इस संदर्भ में प्रेम नारायण मिश्रा की यह पुस्तक जिन्होंने वन को निकट से नहीं देखा उन्हें वनों की सैर कराती है, जिन्होंने वनों को महसूस किया है, उनकी स्मृतियां जगा देती है। इस पुस्तक में वन विभाग में सेवारत रहते हुए आने वाली परेशानियों का भी विवरण है क्योंकि वे सभी उनकी स्वयं की झेली हुई परेशानियां हैं।
प्रेम नारायण मिश्रा के संस्मरण बचपन से आरम्भ होते हैं और शिक्षा, नौकरी के छोटे-बड़े अनुभवों से गुज़रते हुए सेवानिवृत्ति पर समाप्त होते हैं। यथार्थ भी यही है कि कैरियर की नींव अप्रत्यक्ष रूप से बचपन में ही पड़ने लगती है तथा एक नौकरीपेशा व्यक्ति के नौकरीकाल के अनुभवों का दौर उसकी सेवानिवृत्ति के साथ ही विराम की अवस्था में पहुंच जाता है। इसके बाद आरम्भ होता है जीवन का अगला, भिन्न अनुभवों वाला सेवानिवृत्ति का समय। चूंकि लेखक ने ‘‘एक फाॅरेस्ट ऑफिसर का सफरनामा’’ लिखा है अतः स्वाभाविक रूप से सेवानिवृत्ति पर पहुंच कर सफरनामा थम जाता है। लेखक मिश्रा ने अपने संस्मरणों को 16 अध्यायों में लेखबद्ध किया है।
पहले अध्याय में है बचपन, किशोरावस्था, ग्रामीण परिवेश, दादा-दादी का दुलार, वरिष्ठ कुटुम्बियों का सहयोग, कृषि की मोहकता, प्रारंभिक शिक्षा एवं विश्वविद्यालय की शिक्षा एवं माहौल का चित्रण। दूसरे अध्याय में कोयंबटूर वन विद्यालय में प्रशिक्षण के दो वर्षों का विवरण एवं बस्तर में पदस्थिति पर प्रारंभिक क्षेत्रीय प्रशिक्षण के स्थानों एवं कार्यों का विवरण है। इस अध्याय में लेखक ने बड़े सुंदर शब्दों में जानकारी दी है कि -‘‘देहरादून और कोयंबटूर फॉरेस्ट्री के दो ऐसे तीर्थस्थल हैं जहां जितनी बार भी जाओ कुछ नया सीखने को मिलता है। इस दौरान श्रीप्रकाश को समझ में आया कि शैक्षणिक बौद्धिकता और प्रशिक्षण की बौद्धिकता में क्या अंतर है। शैक्षणिकता जमीन है। प्रशैक्षणिक योग्यता आसमान है। जमीन से उठकर आसमान के सितारों का भ्रमण बगैर प्रशिक्षण संभव नहीं है। प्रशिक्षण के बाद बस्तर में वन अधिकारी की पदस्थिति हुई। प्रकृति ने दुत्कारा भी, पुचकारा भी।’’
इसी दूसरे अध्याय में वे अपने कुछ अनुभव इस प्रकार बताते हैं कि-‘‘केशकाल सिर्फ बसों का मेजबान था और कुछ फारेस्ट के उपज के व्यापारियों के मकान थे। रेस्ट हाउस फारेस्ट का अंग्रेजों के समय का था आलीशान। कोंडागाँव, दण्डकारण्य प्रोजेक्ट स्थापित था, रोशनी दिखी और बस्ती भी। बस्तर तो ऐसा गाँव था कि बस भी नहीं रुकती थी, लेकिन जगदलपुर 15 किमी ही था । सड़क बस, बैलगाड़ी के रास्ते से प्रथम श्रेणी ही आगे बड़ी थी। जगदलपुर ही एक ऐसा स्थान था जिसे राजा भंजदेव के पूर्वजों ने बसाया था। एक जिला मुख्यालय जगदलपुर जिसकी सीमा महाराष्ट्र को छूती 300 किमी की दूरी पर, आंध्रा तक 200 से 250 किमी, रायपुर 250 किमी, उड़ीसा 50 किमी थी। इंद्रावती नदी के किनारे बसी यह बस्ती छोटी ही थी। राजा का भवन, रेस्टहाउस, हवाई पट्टी यहाँ के आकर्षण थे। केवल एक्की दुक्की शासकीय बसें ही चारों ओर से संपर्क बनाती थी। भोपालपटनम 200 किमी से अधिक दूर जिससे आगे गोदावरी आंध्रा की एवं महराष्ट्र की सीमा बनती थी। 200 किमी कोंटा में कोलाव आंध्रा एवं उड़ीसा की सीमा बनाती और आगे भद्राचलम गोदावरी के तट पर आंध्रा का तालुक था। बस्तर बहुत बड़े भूखण्ड वाला इलाका था जिसमें अस्सी प्रतिशत फारेस्ट था और लगभग बीस प्रतिशत वर्जिन फारेस्ट था, जो मानवीय गतिविधि से अछूता था। सभी प्रकार के वन्य जीव प्रजातियाँ यहाँ उपलब्ध थी समूचे भूखंड की आबादी सिर्फ 10 लाख थी।’’
तीसरे अध्याय में जगदलपुर मुख्यालय परिक्षेत्र में पदस्थिति पर वहाँ के कार्यों, भौगोलिकता, क्षेत्रीय जनता एवं सहयोगी कर्मचारियों का विवरण है। चैथे अध्याय प्रथम प्रभारी अधिकारी के रूप में भानपुरी परिक्षेत्र में व्यतीत हुए जीवन की कहानी। वहां लेखक लगभग ढाई वर्ष कर्तव्यस्थ रहे थे। उस समय की एक लोमहर्षक घटना का विवरण इस चैथे अध्याय में लेखक ने दिया है-‘‘एक ठंडी रात की याद, सवारी बुलेट रॉयल एनफील्ड की, दहिकोंगा से मुनगापदर जाकर कैंप करना था। सुबह बाजार के दिन हुर्रा, महुआ की खरीद विभागीय तौर पर करानी थी। साथ में दूसरी बुलेट पर पुलिस सब इन्स्पेक्टर भानपुरी थाना के प्रभारी थानेदार श्री टी.एल. तारन पीछे-पीछे थे। पहाड़ी रास्ता समाप्त होने पर मुनगापदर ग्राम के नजदीक पहुँचने पर श्रीप्रकाश ने कुछ आश्वस्त होकर रफ्तार तेज कर गाड़ी चलाने लगे। रास्ते में रेत वाला एक पेच था। चूँकि रास्ता खाली था, श्रीप्रकाश को ध्यान ही नहीं रहा कि वह कब इस सोच में डूब गए कि कैंप आने वाला है, आराम से रिलेक्स करेंगे, थानेदार से गपशप होंगी, आगे क्या करना है, आदि। ध्यान ही नहीं रहा कि जमीन कैसी है, एक्सेलरेटर खिंचता रहा और ध्यान हटा और दुर्घटना घटीश् कि कहावत असल में चरितार्थ हो गई। रेत में गाड़ी पूरी चारों तरफ घूम गई और बुलेट की डिक्की एक तरफ और श्रीप्रकाश दूसरी तरफ। गाड़ी वजनदार थी और रास्ते पर ही रही। एक विशालकाय वृक्ष के तने से टकराकर श्रीप्रकाश धराशायी हो गए।’’

पांचवें अध्याय में 1972 से 1974 तक गोलापल्ली रिजर्व फॉरेस्ट स्टेट के प्रभारी अधिकारी रहते हुए बिताए गए समय का लेखाजोखा है जिसमें दुरूह-दुर्गम आंतरिक वन क्षेत्रों का लोमहर्षक विवरण है। छठें अध्याय में कोंटावन परिक्षेत्र अधिकारी के रूप में अनूभूत वर्ष 74-75 की जीवन का वृत्तांत है। सातवें अध्याय में वन्यअंचल गीदम परिक्षेत्र के वर्ष 1976 की रोचक घटनाएं सहेजी हैं। आठवें अध्याय में तोंगपाल परिक्षेत्र की भौगोलिक स्थिति एवं कार्य से जुड़े संस्मरण है। नौवें अध्याय में बुंदेलखंड वनपरिक्षेत्र में वर्ष 1980 में छतरपुर जिले के बक्सवाहा परिक्षेत्र के कार्यकाल का विवरण है। यह वहीं बक्सवाहा परिक्षेत्र है जहां के वनक्षेत्र में हीरों के भंडार पाए जाने का पता चला। सन् 2021 में राज्य सरकार ने एक निजी कंपनी को बक्सवाहा के जंगलों की कटाई करने की अनुमति दे दी है। अनुमान के अनुसार पता चला कि 382.131 हेक्टेयर के इस जंगल क्षेत्र के कटने से 40 से ज्यादा विभिन्न प्रकार के दो लाख 15 हजार 875 पेड़ों को काटना होगा। इससे इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ेगा। इस पर पर्यावरणविदों ने विरोध जताते हुए ग्रील ट्रिब्यूनल की मदद ली। लिहाजा कोर्ट के आगामी आदेश तक पेड़ न काटे जाने का आदेश पारित किया गया। इसी बक्सवाहा परिक्षेत्र में लेखक प्रेम नारायण मिश्रा ने वन्यजीवन के अनेक अनुभव प्राप्त किए जिन्हें उन्होंने सहजता से साझा किया है। बक्सवाहा एक ऐसा क्षेत्र है जिसने एक समय डाकुओं के आतंक को भी झेला था। लेखक श्री मिश्रा ने अपने तत्कालीन संस्मरण में लिखा है कि -‘‘मार्च 80 में छतरपुर जिले में बक्सवाहा क्षेत्र के जंगलों की सुरक्षा एवं दोहन कार्यों हेतु एवं तात्कालिक वनसंवर्धन कार्यों के सम्पादन हेतु प्रभारी अधिकारी की नियुक्ति हुई। यह क्षेत्र डाकुओं की स्थली थी। मुख्य डाकुओं के आत्मसमर्पण के पश्चात भी डाकुओं का अंत नहीं हुआ था। गैंग क्षेत्रवार वरदातें करती रहतीं थी। श्रीप्रकाश के इस दौरान ढाई वर्ष लगभग 8 स्थानांतरण हुए, ज्योतिष की जानकारी रखने वाले उनके साथी कहते हैं कि शनि की अढैया की बदौलत यह सब हुआ। इस दरम्यान श्रीप्रकाश ने बच्चों को पत्नी के साथ सागर में पत्नी के पिता के संरक्षण में छोड़ रखा था। पिछले ढाई वर्ष से अकेले ही विभिन्न जगहों पर रहते रहे। भोपाल में लाज होटल में, हरदा में लाज में इसी प्रकार अन्य जगहों में । बक्सवाहा में शासकीय आवास में अकेले ही रहे। विभागीय कालोनी अलग-थलग थी। आवास, रेस्ट हाउस, कर्मचारियों के आवास, कार्यालय, एवं प्रांगण में ही पानी के लिए कुँआ है। यहाँ नायब तहसीलदार, पहले सब इन्स्पेक्टर, फिर इन्स्पेक्टर थानेदार, अस्पताल में दो डॉक्टर ब्लाक ये सब बस्ती से सड़क के दूसरी तरफ थे। अक्सर सभी शाम को, श्रीप्रकाश जब मुख्यालय पर रहते तो इकट्ठे होते। यह बक्सवाहा के अधिकारियों का एक होने का स्वर्णिम काल था। अच्छे लोग भी संयोग से वहाँ इकट्ठे हो गए थे।’’

दसवें अध्याय में सागर स्थित नौरादेही अभ्यारण के प्रारंभिक कार्यकाल की झलक एवं जिला ग्रामीण विकास परियोजना (डी.आर.डी.ए.) के एक वर्ष की प्रतिनियुक्ति के कार्यकाल के अनुभवों का रोचक प्रस्तुतिकरण है। ग्यारहवें अध्याय में उस समय के संस्मरण है जब श्री मिश्रा गुना जिले में बतौर उप-वनमण्डल अधिकारी कार्यरत थे।  बारहवें अध्याय में शहडोल जिले में बतौर उप-वनमण्डल अधिकारी के कार्यकाल का विवरण है। तेरहवें अध्याय में उप-वनमंडल मनेन्द्रगढ़ जिला सरगुजा के कार्यकाल के दौरान के अनुभवों सहित उस वनपरिक्षेत्र के आंतरिक आंचलों का विवरण है। चैदहवें अध्याय में सागर जिले के सामाजिक वानकी के सेवाकाल के अंतिम समय के संस्मरण तथा उसी काल में किए गए अन्य कार्यों की जानकारियां हैं। चैदहवें अध्याय में लेख ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टीप की है जो वर्तमान परिदृश्य को सामने रखते हुए मन को झकझोरती है-‘‘ दरअसल कोई सोच नहीं हैं, कोई सिद्धांत नहीं है, देश के विकास की, देश के नागरिकों को संस्कारित करने की। कोई ऐसा आदर्श ही नहीं है देश की युवा पीढ़ी के लिए जिसका अनुसरण वह कर सके। सिनेमा के नायक आदर्श बन रहे हैं। उच्छृंखलता, असंस्कारिता बढ़ रही है। नागरिकता उसूलों की जानकारी शून्य हो गई है। जिसकी लाठी उसकी भैंस पूरी तरह चरितार्थ हो गई है। यदि नौकरशाही किसी प्रकार चाहे भी कुछ   नियमों को पालन करने की तो टुटपुँजिये नेता आड़े आ जाते हैं। जो ओहदों वाले नेताओं की चापलूसी कर अपना पूरा व्यवसाय अनैतिक ही चलाते हैं। चाहे किसी प्रकार हो और इस प्रकार जो होना चाहिए, उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। शॉर्टकट हर जगह जैसे भी संभव हो। इस कारण देश की बुनियादी तरक्की न होकर आडंबरी और कँगूरे चमकने वाली उन्नति हो रही थी।’’

पंद्रहवां अध्याय पूर्वावलोकन का है जिसमें महत्वपूर्ण एवं सुरम्य स्थलों के प्रति अपने अनुभवों एवं दृष्टिकोण को लेखक ने प्रस्तुत किया है। अंतिम सोलहवें अध्याय में उपसंहार के रूप में वर्ष 2020-22 तक के आने वाले बदलाव का एहसास तथा अन्य सामयिक विचारों को पिरोया है।

वन्यजीवन तथा वन्य जीवन से जुड़े अनुभवों में रुचि रखने वालों के लिए यह पुस्तक विशेष महत्व रखती है। यूं भी संस्मरण सच्चाई की देहरी से हो कर गुज़रते हैं अतः उनमें एक गहरा यथार्थबोध होता है जो किसी छायाचित्र के सामन पाठक के सामने प्रस्तुत होता है और खट्टे, मीठे, कड़वे अनेक स्वाद का रस्वादन करा देता है। लेखक प्रेम नारायण मिश्रा एक परंपरागत लेखक नहीं हैं अतः अपने अनुभवों को लेखबद्ध करने में उनकी प्रस्तुतिकरण की शैली वाचिक प्रतीत होती है, गोया कोई अपने अनुभव कह कर सुना रहा हो। इससे यह पुस्तक और अधिक रोचक हो उठी है। आज जब वनसंपदा गहरे संकट में है, पर्यावरण और जलवायु भी वनों के घटते क्षेत्रफल के कारण संकट से घिर गए है, ऐसे दौर में यह पुस्तक पाठकों को जंगलों से जोड़ने का काम कर सकती है।  इस पुस्तक को कम से कम एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि क्योंकि इसमें आत्मावलोकन का तीव्र आग्रह भी है।     
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Sunday, September 18, 2022

संस्मरण | भजियों-पकौड़ों का जादुई संसार | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 18.09. 2022
भजियों-पकौड़ों का जादुई संसार
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         अभी इसी वर्ष (2022 में) हिन्दी दिवस की बात है, मैं एक भावुकतापूर्ण समारोह से लौटी थी. उस समारोह को भावुकतापूर्ण इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसमें मैंने अपने दीदी डाॅ. वर्षा सिंह की स्मृति में युवा रचनाकारों के लिए एक सम्मान आरम्भ किया. लगभग सवा साल पहले कोरोना की दूसरी लहर में मैंने वर्षा दीदी को हमेशा के लिए खो दिया था. अब मैं युवा रचनाकारों में उनकी आकांक्षाओं एवं सपनों को फलता-फूलता और पूर्णता को प्राप्त होते हुए देखना चाहती हूं. अतः वह सम्मान समारोह मेरे लिए भावाकुल कर देने वाला साबित हुआ.


 बहरहाल, मैं बता रही थी कि मैं उस समारोह से लौट कर अपने घर के बाहरी दरवाजे का ताला खोलने ही जा रही थी कि काॅलोनी की ही एक भाभीजी ने मुझे आवाज दी. मैं ताला खोलती-खोलती रुक गई. भाभीजी मेरे पास आ कर कहने लगीं कि ‘‘कुछ मेहमान आ गए थे इसलिए मैं कार्यक्रम में नहीं आ सकी. प्लीज बुरा मत मानना!’’
‘‘नहीं, इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है. अब मेहमानों को क्या पता कि आपको कहीं जाना है.’’ मैंने उन्हें तसल्ली दी. मेरी बात सुन कर वे उत्साहित हो उठीं और बोलीं,‘‘मेरे घर चलो, मैंने भजिए-पकौड़े बनाए हैं.’’ मैंने उन्हें छेड़ने के लिए चुटकी ली,‘‘मेहमानों के बचे हुए भजिए हैं क्या?’’ मेरी बात सुन कर वे चिंहुक पड़ीं,‘‘मारूंगी! फालतू बात मत करो! मैंने भी कहां खाया है? उस समय तो तल-तल कर मेहमानों को खिलाती रही. फिर और तल कर कैसरोल में रख लिए कि जब तुम आओगी तो हम दोनों बैठ कर चाय-पकौड़ों का आनन्द लेंगे. और एक तुम हो!’’ कहती हुईं वे हंसने लगीं और मैं भी हंस पड़ी.

मैं उनके साथ उनके घर गई. मैंने सोचा था कि एकाध कैसरोल में भजिए होंगे लेकिन जब उन्होंने चार कैसरोल मेरे सामने ला कर रखे और उनके ढक्कन खोले तो मैं देख कर दंग रह गई। हर कैसरोल में दो-दो प्रकार के भजिए-पकौड़े थे. अकेले आलू और आलू-प्याज मिक्स के पकौड़े तो बहुप्रचलित हैं. पालक, बैंगन और फूल गोभी के पकौड़े भी बहुतायत बनाए जाते हैं. उन्होंने जो स्पेशल पकौड़े बनाए थे, वे थे करेले के पकौड़े. जरा भी कड़वे नहीं. बेहद कुरकुरे. इसी तरह चुकंदर (बीटरूट) के पकौड़े और सेब के पकौड़े तो अद्भुत थे. मैंने तो उनसे कहा कि उन्हें पकौड़ों की रेसिपी बुक लिखनी चाहिए. मगर उन्हें लिखने में कतई रुचि नहीं हैं. खैर, उनकी भजिए-पकौड़े बनाने में इसी तरह रुचि बनी रहे, यही मेरी दुआ है. 

भाभीजी के घर से लौट कर मुझे अपने बचपन के दिन याद आने लगे. उन दिनों मेरे घर भी तरह-तरह के भजिए बनाए जाते थे. यद्यपि उन दिनों पन्ना जैसी छोटी जगह में सीजनल सब्जियां ही मिला करती थीं. इसलिए फूल गोभी या चुकंदर के भजिए हर मौसम में नहीं बन सकते थे. लेकिन उन दिनों उन सब्जियों के भजिए बनते थे जो अब बाजार से तो गायब हो ही चुके हैं बल्कि कुछ तो वनस्पति के रूप में भी लुप्त होते जा रहे हैं. जैसे केनी के पत्तों के भजिए. केनी का पौधा अपने-आप बगीचे में किनारे-किनारे उग आता था. इसकी हल्की सफेद धारियों वाली मध्यम लम्बाई की पत्तियां होती थीं. इसे और क्या कहा जाता है मुझे पता नहीं है. मेरे घर में इसे केनी ही कहा जाता था. केनी के पकौड़ों के लिए मेरी और वर्षा दीदी की ड्यूटी होती थी कि हम पत्तियां तोड़ कर इकट्ठी करें. अब तो केनी के पौधे भूले-भटके ही दिखते हैं, वह भी खेतों के आस-पास. इसी तरह मुनगे (कोसें, ड्रमस्टिक) के फूलों के भजिए बनते थे, जिसके लिए हम दोनों बहनें लम्बा बांस ले कर फूल तोड़ने में जुट जाती थीं. हमारे घर के बगीचे में ही मुनगे था एक अदद पेड़ लगा था. अतः हमें कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता था. कुम्हड़े के फूलों के पकौड़े भी बड़े स्वादिष्ट लगते थे. पोई के पत्तों के पकौड़े भी बनाए जाते थे. पोई की बेल उत्तरप्रदेश में आज भी घरों में उगाई जाती है लेकिन मध्यप्रदेश में इसे लगाने और खाने का चलन नहीं के बराबर है. हमारे घर के बगीचे की बाड़ में पोई और कुंदुरू की बेलें फैली रहती थीं. कुंदरू तो इतनी अधिक तादाद में हो जाते थे कि हम उसे पड़ोसियों में भी बांट देते थे. लेकिन पोई में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती थी. हमारे घर में केले के पेड़ भी लगे थे. मां बताती थीं कि वे भुसावली केले के पेड़ थे. उन पेड़ों की ऊंचाई अधिक नहीं होती थी लेकिन उनमें केले के बड़े-बड़े घेर फलते थे. घेर में से केले खत्म होते-होते उसमें से फूल काट लिया जाता था और उसकी ऊपरी पंखुरियां अलग कर के भीतरी अपेक्षाकृत कोमल पंखुरियों की कभी सब्जी तो कभी पकौड़े बनाए जाते थे. कच्चे केले के पकौड़े भी बड़े स्वादिष्ट बनते थे। मुझे कुम्हड़े, नेनुआ (रेरुआ, फत्कुली) के पकौड़े बहुत प्रिय थे. मां जब भी पकौड़े बनातीं तो मेरे लिए इन दोनों में से जो भी घर में पाया जाता या फिर दोनों के पकौड़े बनातीं. बैंगन में विशेष रूप से काले बैंगन के पकौड़े बनाए जाते थे.

मुझे लगता है कि हर सब्जी के भजिए-पकौड़े बनाए जा सकते हैं. मैंने बचपन में फूलगोभी के पकौड़े नहीं खाए थे. क्योंकि मां ने कभी बनाए ही नहीं. वह तो बाद में मैंने ही फूलगोभी के पकौड़े अपने घर में बनाना शुरू किया. इसे बनाना सीखने का भी अपना एक मजेदार किस्सा है. हमारे सगेसंबंधी समान भाई साहब गणेश सिंह जी की पत्नीं यानी मेरी भाभीजी को पकौड़े बनाने में महारत हासिल रही है। वे लोग उन दिनों पन्ना के एमपीईबी के क्वार्टर्स में रहा करते थे, पन्ना-सतना मार्ग पर। हम लोग अकसर उनके घर जाया करते थे. उस समय तक वर्षा दीदी की भी एमपीईबी में नियुक्ति हो चुकी थी. इस तरह हमारा दोहरा रिश्ता हो गया था. एक बार जब हम लोग उनके घर गए तो भाभीजी ने फूलगोभी के पकौड़े बनाए. इससे पहले मैंने फूलगोभी के पकौड़े कभी नहीं खाए थे. मुझे उनका आकार-प्रकार देख कर लगा कि ये अवश्य अंदर से कच्चे होंगे. लेकिन जब मैंने खाया तो बस, खाती ही चली गई. हर पकौड़ा चाय की प्लेट के आकार जितना बड़ा था और अच्छी तरह से तला हुआ था. मुझे नए-नए व्यंजन बनाने का शौक तो बचपन से ही था, सो मैं सम्मोहित-सी उनके रसोईघर में जा पहुंचीं. वहां मैंने उन्हें फूलगोभी के पकौड़े बनाते देखा और उसे अपने दिल-दिमाग में नोट कर लिया. दूसरे दिन जब तक मैंने उसी पद्धति से फूलगोभी के पकौड़े बना कर आजमा नहीं लिए तब तक मुझे चैन नहीं पड़ा. सच्चाई तो ये है कि भाभीजी को भी पता नहीं था कि मैंने उनसे फूलगोभी के पकौड़े बनाना सीख लिया था. इसी तरह जिला अस्पताल में एक नर्स थीं. जिनका नाम था फ्लोरा सिल्वा. वे केरल की थीं. वे सांवली रंगत की थीं लेकिन उनका स्वभाव बहुत ही मधुर और आत्मीयता से परिपूर्ण था. मां से उनकी अच्छी मित्रता थी. हम दोनों बहनें उन्हीं से इंजेक्शन लगवाना पसंद करती थीं. क्योंकि उनका हाथ इतना सधा हुआ था कि हमें तनिक भी दर्द नहीं होता था. बचपन में हामिद बेग कम्पाउण्डर अंकल के बाद इंजेक्शन के मामले में फ्लोरा आंटी हमारी पहली पसंद थीं. फ्लोरा आंटी ने ही सबसे पहले हमें कटहल के पकौड़े खिलाए थे. इससे पहले हमने कटहल के पकौड़े कभी नहीं खाए थे. मां ने फ्लोरा आंटी से कटहल के पकौड़े बनाना सीखा और उसके बाद हमारे घर भी कटहल के पकौड़े बनने लगे. यद्यपि उसे बनाने में कुछ अधिक समय लगता था. यूं भी मुझे कटहल पसंद नहीं है इसलिए मुझे उसे सीखने में भी कभी रुचि नहीं रही. बदले में मां ने उन्हें कुंदुरू के पकौड़े बनाना सिखाया था. इस तरह देखा जाए तो भजियों-पकौड़ों ने अंतर्राज्यीय मित्रता कायम की और परस्पर एक-दूसरे के रसोईघर में अपनी जगह बना ली.

पहले महानगरों के जीवन पर आधारित कहानियों में ही ब्रेड-पकौड़ों के बारे में अधिकतर पढ़ने को मिलता था. मेरे बचपन में मेरे घर में कभी ब्रेड-पकौड़ा नहीं बना. जब मैंने काॅलेज में दाखिला लिया, तब भी पन्ना शहर में कोई ऐसा होटल नहीं था जिसमें ब्रेड-पकौड़ा मिलता. पहली बार मैंने सतना के बसस्टेंड पर ब्रेड-पकौड़ा खाया था. दरअसल मैं और वर्षा दीदी सुबह की बस से रीवा जा रहे थे. वह बस सुबह साढ़े पांच या छः बजे पन्ना से रीवा के लिए रवाना होती थी. लगभग आठ बजे बस सतना बसस्टेंड पहुंची. हमें भूख-सी लगने लगी थी. मगर बसस्टेंड के धूल-धूसरित वातावरण में खुला रखा खाद्यपदार्थ खाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. तभी वर्षा दीदी की दृष्टि पकौड़ों के ठेले पर पड़ी। कैरोसिन-स्टोव पर ब्रेड-पकौड़े तले जा रहे थे. दीदी बस से उतर कर झटपट दो पकौड़े खरीद लाईं. खौलते तेल से निकले ताजे पकौड़े हर तरह के प्रदूषण से मुक्त थे. वह ब्रेड-पकौड़ा इतना स्वादिष्ट लगा कि दीदी ने खिड़की से ही आवाज दे कर दो पकौड़े और मंगा लिए. वाकई बेहद नरम और खटमिट्ठी चटनी से भरे हुए ब्रेड-पकौड़े. शायद उनमें पनीर की छीलन भी डाली गई थी. उस दिन के बाद से तो मैं ब्रेड-पकौड़ों पर फिदा हो गई. 

पहले चाय-पकौड़े का मुहावरा चलन में नहीं था. भजियों और पकौड़ों के साथ टमाटर, आंवला, धनिया-मिर्च, अमचूर, इमली आदि की चटनी या अचार या फिर दही की चटनी अथवा मठा दिया जाता था. भजिया-पकौड़ों के बाद चाय के बदले कप भर मठा पीने का चलन अधिक था. लेकिन अब चाय के बिना पकौड़ों का मजा अधूरा लगता है. साथ में चटनी भले ही न हो लेकिन पकौड़ों के बाद में चाय जरूरी है. यही तो है कि समय के साथ चलन बदले हैं, मुहावरे बदले हैं लेकिन भजियों-पकौड़ों का बुनियादी स्वाद आज भी वही है. उनका जादुई संसार भी वही है पहले जैसा. बस, बदली हुई जीवनशैली में अब इन्हें खाने का चलन कम होता जा रहा है.                         
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Sunday, September 11, 2022

संस्मरण | जानवरों के बाड़े-सी आमसभा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 11.09. 2022
जानवरों के बाड़े-सी आमसभा
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       चुनाव और आमसभा का चोली- दामन का साथ होता है. चुनाव का समय निकट आते ही प्रत्येक राजनीतिक दल भीड़ जोड़ने की जुगत में लग जाता है. यह कोई आज की बात ही नहीं है, मेरे विचार से देश की स्वतंत्रता के बाद से प्रत्येक आमसभा चुनावों के समय यही परिदृश्य रहता रहा होगा. मैंने अपने अब तक के जीवन में कुल तीन आमसभाएं ही देखी, सुनी हैं, वह भी छोटे शहर या ग्रामीण अंचल में. सबसे पहली आमसभा में मुझे जाने का अवसर मिला था अपनी मां डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका जी के साथ. वे कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थीं. मेरी मां तो ईमानदार एवं समर्पित शिक्षिका थीं. लेकिन उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भारी क्रेज था. उनकी साड़ियों, उनकी हेयर स्टाईल सभी कुछ महिलाओं के बीच चर्चा का विषय बना रहता था. मेरी मां और उनके साथ की शिक्षिकाएं अकसर इस विषय पर बातचीत किया करती थीं. निश्चित रूप से उस दिनों छोटे शहरों की महिलाएं भी इंदिरा जी जैसी हेयरस्टाईल रखने के स्वप्न देखा करती रही होंगी, जो वास्तविक में उनके लिए संभव नहीं था.  मैं उस समय छोटी थी. स्कूल में पढ़ती थी. मुझे याद है कि जब यह पता चला कि इंदिरा गंाधी पन्ना में एक आमसभा में आने वाली हैं तो हमारे घर में ही मां की पांच-छः महिला सहकर्मियों की एक छोटी-मोटी टी-पार्टी हो गई. पार्टी में इस पर विचार-विमर्श किया गया कि उस आमसभा में कैसे पहुंचा जाए. उन दिनों पन्ना में मात्र पैडल रिक्शा चला करते थे और एक रिक्शे पर अगर तन्दुरुस्त सवारी हुई तो दो, यदि दुबली-पतली सवारी हुई तो तीन ही बैठ पाती थीं. सो, तय हुआ कि चार रिक्शे कर लिए जाएंगे क्यों कि मां ने स्पष्ट बता दिया कि मैं अपने साथ अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाऊंगी. यानी एक रिक्शे पर दो महिलाओं के साथ मुझे और वर्षा दीदी को भी सवारी करनी थी अतः तीसरी महिला के लिए उसमें गुंजाइश नहीं थी. उसमें भी हम दोनों को सीट के सामने लगी लकड़ी की पट्टी पर बैठना था. मां चाहती थीं कि हम दोनों बहनें उस ‘‘लौह महिला’’ को देखें. यह बात और है कि ‘‘आयरन लेडी’’ की उपाधि बाद में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थ्रेचर को दी गई लेकिन वास्तविक ‘लौह महिला’ निःसंदेह इंदिरा गांधी ही थीं. क्योंकि भारतीय राजनीति पर दीर्घकाल तक अपना प्रभाव जमाए रखने का काम एक लौह महिला ही कर सकती थी. बहरहाल, नीयत तिथि पर पर हम लोग सभा-स्थल पर पहुंचे. अपार जनसमूह था. ऐसा लग रहा था कि मानो पूरा पन्ना शहर ही नहीं वरन पूरा पन्ना जिला सभा स्थल में उमड़ पड़ा हो. हमें बहुत पीछे जगह मिली थी. उतनी दूर से इंदिरा जी की बहुत स्पष्ट झलक नहीं मिल पा रही थी. फिर भी सभी महिलाएं प्रसन्न थीं कि उन्होंने एक झलक तो पा ली. हम लोग पूरे समय सभा में नहीं रुके. भाषण सुनना हमारा उद्देश्य नहीं था, मात्र देखना उद्देश्य था और वह उद्देश्य पूरा हो गया था. शीघ्र ही हम अपने घर लौट आए. तब मुझे पता नहीं था कि यह भी मेरी मां और उनकी सखियों की योजना का एक हिस्सा था. हमारे घर में चाय-भजियों का दौर चलता रहा. लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद हम दोनों बहनों को घर के बाहर खड़े होने को कहा. बल्कि हमारे लिए मां ने दो कुर्सियां भी रख दी थीं और उन पर खड़ी करते हुए कहा था कि,‘‘देखना गिरना नहीं, सम्हल कर खड़ी रहना. अभी इंदिरा जी सर्किटहाउस जाएंगी और फिर कुछ ही देर में वहां से लौटेंगी भी, तब हम उन्हें फिर से देख सकेंगे.’’ तो सभास्थल से जल्दी लौट आने के पीछे यह थी योजना.
चूंकि जहां हमारा घर था हिरणबाग में, वह ठीक उस जगह पर था जहां से सर्किटहाउस के लिए रास्ता पहाड़ी की ओर चढ़ता था. उन दिनों उस रास्ते के किनारे कोई घर नहीं बने थे अतः दूर तक हम लोग उस रास्ते पर आने-जाने वालों को देख पाते थे. सचमुच कुछ देर बाद इंदिरा जी की कार उस रास्ते से गुजरी. उनके सर्किट हाउस जाते समय हमें निराशा हाथ लगी क्योंकि वे विपरीत दिशा में बैठी थीं किन्तु उनकी वापसी पर वे हमारी दिशा में ही थीं. तब हमने उन्हें देखा भी और हाथ हिला-हिला कर उनका अभिवादन भी किया.


दूसरी आम सभा बहुत बाद देखने को मिली. उन दिनों मैं दमोह में बीए फाईनल में पढ़ रही थी. उस दौरान हम स्टूडेंट्स को पता चला कि देश के दिग्गज नेता चंद्रशेखर वहां आमसभा करने आने वाले हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उनके भाषणों की भी बहुत प्रशंसा की जाती थी. उस समय चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री नहीं बने थे और कई लोग उनके भाषणों के मुरीद थे. मेरे सहपाठियों में दो-तीन को छोड़ कर राजनीतिक विषयों अथवा समसामयिक विषयों में किसी की तनिक भी रुचि नहीं थी. जब मैंने उनसे आमसभा में चलने को कहा तो सबने मना कर दिया. बस, सखी धर्म निभाती हुई मेरी मात्र एक सहेली मेरे साथ चलने को सहमत हुई. सो, मैंने और मेरी सहेली रीता धगट ने आमसभा में जाने का निर्णय किया. सभा दोपहर को थी और हमारा काॅलेज सुबह के समय का रहता था. काॅलेज के बाद हम दोनों वहां पहुंचीं. चंद्रशेखर जी का कुछ देर भाषण सुना. किन्तु पता नहीं क्यों मुझे उनका भाषण उतना प्रभावी नहीं लगा जितना कि मैंने सुन रखा था और सोच रखा था. संभवतः मैंने कुछ अधिक उम्मींद लगा ली थी. रीता को यूं भी भाषणबाजी में रुचि नहीं थी, वह तो मेरा साथ देने वहां पहुंच गई थी. उस दिन की आमसभा की उपलब्धि यह रही कि हमने सभास्थल के बाहरी हिस्से में खड़े चाट के ठेले पर जी भर कर चाट खाई. रीता ने तीखे गोलगप्पे भी खाए थे पर मैंने नहीं. क्योंकि मुझे गोलगप्पों के उस पानी से समस्या हो जाती है जिसमें बार-बार नंगे हाथों को डुबाया जाता है. मुझे तो लगता था कि मैं बाजार के गोलगप्पे कभी खा ही नहीं सकती हूं. फिर एक बार एक बड़े माॅल में गोलगप्पे खाने पड़ गए. डरते-डरते मैंने गोलगप्पे खाए कि अब तो पक्का बीमार पडूंगी. लेकिन आश्चर्य की बात थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ. तब मेरा ध्यान गया कि वहां के कर्मचारी दस्ताने पहने हुए थे, उस पर भी गोलगप्पे के पानी में बार-बार हाथ डुबाने के बजाए एक डिस्पोजल गिलास में पानी भर कर गोलगप्पों के साथ दे रहे थे. उस दिन मुझे समझ में आ गया कि गड़बड़ी कहां थी. नंगे हाथों को गोलगप्पे के पानी में बार-बार डुबाने से पानी में जो प्रदूषण पनपता होगा उससे मुझे फूडप्वाइजन होने लगता था. हां, तो हम लोगों ने उस दिन जम कर चाट खाई और इस तरह आमसभा के आनन्द की भरपाई की.

तीसरी आमसभा एक बार फिर पन्ना में देखने को मिली जिसने आमसभाओं में नेताओं और आम जनता के बीच की बढ़ती दूरियों को दिखा दिया. उस समय मैं पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश कर चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आने की सूचना मिली. वे पन्ना के एक ग्रामीण क्षेत्र में आने वाले थे. हमारे प्रवेश-पत्र जारी कर दिए गए. सूचना प्रकाशन विभाग की एक तयशुदा गाड़ी में हम कुछ पत्रकारों को सभा स्थल में पहुंचना था. यद्यपि देश की बड़ी-बड़ी समाचार ऐजेंसियों से भी बड़े-बड़े पत्रकार वहां पहुंचने वाले थे. सभास्थल पर राजीव गांधी के पहुंचने के लगभग तीन घंटे पहले हमें सभास्थल पर पहुंचा दिया गया. तरह-तरह के डिटेक्टर्स से कड़ी जांच-पड़ताल. वहां पहुंच कर मैं अवाक रह गई. वहां लकड़ी के मोटे-मोटे लट्ठों को आपस में बांध कर अनेक खंड बनाए गए थे. लट्ठे भी ऐसे कि उनके लिए समूचे हरे-भरे खड़े पेड़ों को काटा गया था. एक खंड पत्रकारों के लिए था तो दूसरा वीआईपी व्यक्तियों के लिए के लिए. एक खंड स्थानीय, छोटे नेताओं के लिए और इन सब के पीछे एक बड़ा खंड आम जनता के लिए. आमजनता में भी उतने ही व्यक्यिों को उसमें प्रवेश की अनुमति थी जितने उस खंड में समा सकें. शेष को बहुत दूर खड़े रहने की छूट थी. राजीव गांधी के सभास्थल पर पहुंचने के ठीक एक घंटे पहले सभी खंड लकड़ी के लट्ठों से ‘‘लाॅक’’ कर दिए गए. पुलिस बलों के अतिरिक्त पैरा मिलिट्री फोर्स भी वहां थी. विचित्र माहौल था. मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम सभी को जानवरों के बाड़े में जानवरों की भांति कैद कर दिया गया है. इससे पहले जिन दो आम सभाओं का मुझे अनुभव था उसमें इस तरह की व्यवस्था नहीं थी. मंच से लगभग दस मीटर की दूरी के बाद से ही आमजन के लिए पूरा मैदान समान रूप से खुला रहता था. किन्तु राजीव गांधी की सभा में ऐसा नहीं था. उस समय इस बाड़ाबंदी ने मेरे मन को भारी ठेस पहुंचाई थी. मुझे प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिल गया था कि किस प्रकार आमजन से बड़े नेताओं की दूरियां बढ़ने लगी हैं. हो सकता है कि इसे पहले इंदिरा जी के मारे जाने और तत्कालीन आतंकी गतिविधियों के भय के कारण इस प्रकार की व्यवस्था की गई हो. फिर भी जन के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि के सामने जन को बाड़े में बंद रखा जाए, यह लोकतांत्रिक स्वरूप उस समय मेरे लिए हजम करना कठिन था. इसके बाद मैं और किसी आमसभा में नहीं गई. मेरा मन भी नहीं हुआ. अब तो टीवी के पर्दे पर ही आमसभाओं की बारीकियां देखने को मिल जाती हैं, ‘‘विथ स्पेशलिस्ट्स स्पेशल कमेंट’’. जिसमें ढेर सारे कामर्शियल ब्रेक्स के साथ आग उगलती बहसों की कांव-कांव भी शामिल रहती है.             
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Sunday, September 4, 2022

संस्मरण | कॉमरेड का आकर्षण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 04.09. 2022

कॉमरेड का आकर्षण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह  
        उस दिन सुबह जब समाचारपत्र में 30 अगस्‍त 2022 को मिखाइल गोर्बाचोव के निधन होने का समाचार पढ़ा तो स्मृति के कई पन्ने अपने आप खुलने लगे। वे सोवियत संघ के अंतिम नेता थे।

          जिन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ रही थी उन दिनों लगभग हर दस में से एक विद्यार्थी साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित रहता था। उन दिनों "कामरेड" शब्द किसी बहुप्रचलित मुहावरे से कम नहीं था। उन दिनों भारत और सोवियत संघ के बीच बहुत गहरी मित्रता थी। अनेक सोवियत पत्र-पत्रिकाएं देश के छोटे-छोटे शहरों, गांवों और कस्बों तक उपलब्ध रहती थीं। बहुत बड़ी मात्रा में रूसी साहित्य बहुत ही कम कीमत में और बहुत सुंदर छपाई में उपलब्ध हो जाता था, वह भी हिंदी में। जब मैं बीए प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी उन दिनों मैंने टॉल्सटाय का उपन्यास "अन्ना करेनिना" पहली बार पढ़ा था। इसके बाद तो उसे कई बार पढ़ा। दोस्तोएव्स्की का "अपराध और दंड",  गोर्की का उपन्यास "मां" तथा गोर्की की आत्मकथा पढ़ी। लेव टॉल्सटाय, फ्योदोर दोस्तोएव्स्की और गोर्की के अतिरिक्त अलेक्सांद्र पुश्किन, मिख़ाइल लेर्मोन्तोव, इवान तुर्गनेव, एंटोन चेखव, बोरिस पास्तरनाक,अन्ना अख़्मातोवा, मरीना त्सवेताएवा, मिखाईल शोलोखोव आदि का साहित्य मैंने पढ़ा। उस दौरान व्लादीमीर इल्यिच लेनिन की जीवनी और उनकी लिखी किताबें "क्या किया जाना चाहिए?", "लोकतांत्रिक क्रांति में सामाजिक लोकतंत्र की दो रणनीतियां" तथा "राज्य और क्रांति" पढ़ी थीं। कार्ल मार्क्स की "पूंजी" और "कम्युनिस्ट घोषणा पत्र" भी उसी दौर में पढ़ी थी। ये सारी किताबें मैंने खरीद कर पढ़ीं थीं और इन्हें खरीदना इसीलिए संभव हो सका था क्योंकि इनकी कीमत बहुत कम रहती थी और  इन्हें खरीदने से मां कभी रोकती नहीं थीं। मैं दो पत्रिकाएं भी डाक से मंगाया करती थी। एक "सोवियत संघ" और दूसरी "सोवियत नारी"। दोनों का चिकना ग्लेज़्ड कागज और सुंदर फोटोग्राफी मन मोह लेती थी। मैं पूरे ध्यान से दोनों पत्रिकाएं पढ़ती थी और उन्हें सहेज कर भी रखती थी। मेरे पास बहुत सारे अंक इकट्ठे हो गए थे। वह तो जब पन्ना से सागर स्थान परिवर्तन करना पड़ा तो उस समय बचपन से सहेज कर रखी गईं ढेर सारी कॉमिक्स और यह दोनों सोवियत पत्रिकाएं छोड़नी पड़ीं। फिर भी किताबें में अपने साथ सागर ले आई थी। काफी अरसे तक रूसी लेखकों की वे किताबें मेरे पास रहीं। लेकिन एक बार एक चूहे ने उन्हें कुतर दिया और उसके बाद वह किताबें रद्दी में बेचनी पड़ीं। जिसका आज भी मुझे बहुत दुख है। उन किताबों की गंध और छुअन आज भी मैं भूली नहीं हूं। एक बार मेरी भी एक कहानी "सोवियत नारी" में प्रकाशित हुई थी और जाहिर है कि वह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी का दिन था। मैंने अपने सारे परिचितों को वह अंक दिखाया था। एक विदेशी पत्रिका में कहानी छपना और वह भी सोवियत पत्रिका में, उस समय बड़ी शाबाशी की बात थी। पारिश्रमिक की रकम भी उससे बहुत बड़ी थी, जो भारतीय अखबार उन दिनों रचनाओं के पारिश्रमिक के रूप में दिया करते थे। दोनों पत्रिकाओं की ओर से 15 दिसंबर तक नए साल का बेहद खूबसूरत कैलेंडर आ जाया करता था। उन कलैंडर्स के लिए पोस्टमैन को अलग से निवेदन करना पड़ता था ताकि वह किसी और को न दे दे।

        उन दिनों मैं और मेरे कुछ मित्र जिनमें पन्ना से बाहर के अधिक थे और साम्यवादी विचारधारा के थे, आपस में पूंजीवादी विरोधी तर्क और बहस किया करते थे। उन दिनों फोन तो हर किसी की पहुंच में था नहीं अतः हम लोग एक दूसरे को लंबे-लंबे पत्र लिखकर साम्यवाद और पूंजीवाद पर अपने-अपने विचार प्रकट करते थे। हमारी चिट्टियां "कॉमरेड" संबोधन से शुरू होती थीं और "लाल सलाम" पर खत्म होती थीं। जब कभी मां के साथ भोपाल जाने का अवसर मिलता तो मैं न्यू-मार्केट के उस सब-वे पर अवश्य जाती जहां हिंदी में अनूदित सोवियत किताबें मिलती थीं। अधिकांश किताबों का अनुवाद अमृत राय और मदनलाल "मधु" द्वारा किया गया होता था।

              जब मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष में थी, तब डॉ कमला प्रसाद जी से  मुझे साम्यवाद के भारतीय स्वरूप को समझने में मदद मिली। कमला प्रसाद जी के छोटे भाई और उनके भाई की पत्नी वे दोनों भी साम्यवादी विचारधारा के थे। उनके छोटे भाई उन दिनों छतरपुर के महाराजा कॉलेज में कार्यरत थे। पन्ना में प्रगतिशील लेखक संघ के द्वारा एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी जिसमें कमला प्रसाद जी तथा उनके भाई और भाई बहू तीनों आए थे। यद्यपि कुछ समय बाद यह दुखद खबर मिली थी कि उनके भाई ने सपत्नीक आत्महत्या कर ली थी। कारण पता नहीं चला था। इस घटना ने काफी दिन तक मेरे मन को विचलित रखा था क्योंकि दोनों से मैं मिल चुकी थी, दोनों प्रबुद्ध थे और बहुत सरल, सहज स्वभाव के थे।

   उसी दौरान बांदा (उप्र) के एक पत्रकार (दुख है कि मुझे उनका नाम याद नहीं है) वर्षा दीदी से मिलने आए और उन्होंने दीदी को निकोलाई आस्त्रोवस्की की "अग्निदीक्षा" पुस्तक भेंट की। दीदी ने तो उसे सरसरी तौर पर पढ़ा लेकिन मेरे लिए वह जीवनदर्शन बन गई। "अग्निदीक्षा" एक ऐसे सैनिक की जीवन कथा थी जो द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन सेना के विरुद्ध लड़ते हुए अपने दोनों पैर गंवा बैठा था। उड़ान भरने के अलावा उसके जीवन का और कोई सपना नहीं था, लेकिन दोनों पैर गंवाने के बाद यह संभव भी नहीं था। लंबे समय तक सेना के अस्पताल में रहने के दौरान उसने स्वयं को मानसिक रूप से तैयार किया और अपनी शारीरिक क्षमताओं को उस सीमा तक बढ़ाया जो उसके दर्द की सहन करने की सीमा से भी आगे था। एक दिन वह अपने नकली पैरों के सहारे फिर से पायलट बनने के सपने को पूरा कर सका। उसका संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ युद्ध समाप्त होते-होते उसकी आंखें कमजोर होने लगीं। फिर भी उसने हार नहीं मानी और न केवल एक लड़की को सहारा दिया बल्कि स्वयं भी उसने एक किताब लिखी। जबकि बेहद कमजोर आंखों के साथ लिखना उसके लिए सबसे दुष्कर कार्य था। इस पुस्तक ने उस समय मुझे संघर्ष करने का जो पाठ पढ़ाया वह आज तक मेरे काम आ रहा है। मैंने इस कथानक से यही सीखा था कि स्थिति कितनी भी विपरीत क्यों न हो कभी हार नहीं माननी चाहिए।
            उस दौर के प्रसिद्ध साम्यवादी नेता होमीदाजी से मिलने का भी मुझे अवसर मिला था। बहुत ही सादगी से रहने वाले व्यक्ति थे। उस समय मैं एक विद्यार्थी ही थी अतः होमीदाजी ने मुझसे पूछा था कि "तुम जनता के बारे में क्या समझती हो, कौन है जनता?" सुनने में यह प्रश्न सरल था लेकिन उत्तर उतना ही कठिन था। मैं हड़बड़ा गई कि क्या उत्तर दूं। तब उन्होंने मुझसे कहा था कि "जब तक तुम आम लोगों के नजदीक नहीं जाओगी, उनके जीवन के दुख दर्द नहीं समझोगी, तब तक यह नहीं समझ पाओगी कि जनता क्या है?" उनका यह वाक्य मुझे उस दौरान कई बार याद आया था जब मैं बीड़ी श्रमिक महिलाओं पर अपनी किताब "पत्तों में कैद औरतें" लिख रही थी। सचमुच मैं उन महिला श्रमिकों के पास पहुंच कर ही उनकी कठिनाइयों को महसूस कर सकी थी।
              बुंदेलखंड के साम्यवादी विधायक कपूरचंद घुवारा से कई बार मिलने का अवसर मिला। उन दिनों जब मैं ऐसे लोगों से मिलती थी तो अपना परिचय देते हुए शान से कहती थी कि "मैं कॉमरेड शरद सिंह"। अपना यह परिचय देते हुए मुझे बहुत अच्छा लगता था। उस समय स्वयं को बहुत जिम्मेदार और गंभीर महसूस करती थी। लेकिन वास्तविक जिम्मेदारियों और मुश्किलों की बढ़त के साथ जिंदगी की बहुत सारी सच्चाइयां सामने आती गईं, जिससे धीरे-धीरे हर तरह के "वाद" के प्रति मेरा आकर्षण कम होता गया।

         मुझे अच्छी तरह याद है कि सन 1986 में सोवियत संघ के राष्‍ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव पहली बार भारत आए थे। रेडियो पर आकाशवाणी से उनके आगमन का आंखों देखा हाल सुनाया जा रहा था। जबकि पिछले दो दिन से हमारे घर में नल में पानी नहीं आया था और संयोग यह कि जब आंखों देखा हाल सुनाया जा रहा था ठीक उसी दौरान तब नल में पानी सप्लाई किया जा रहा था। चूंकि उस पूरे क्षेत्र में एक साथ कई नल खुले हुए थे और उनमें भी कुछ नलों में मोटर का इस्तेमाल किया जा रहा था इसलिए पानी की बहुत पतली धार आ रही थी। अतः जितनी देर में मिखाईल गोर्बाचोव की आगवानी की गई, उतनी देर में एक टंकी पानी भी नहीं भर पाया था। देखा जाए तो यह व्यवस्था का वह चेहरा था जिसे किसी "वाद" के खांचे में नहीं रखा जा सकता था। धीरे-धीरे में कामरेड शरद सिंह से एक बार फिर सिर्फ शरद सिंह बन गई। जो जीवन मेरे सामने था उसके खुरदरी सच्चाइयां मुझे बिना किसी वाद के सहारे स्वीकार करनी थी और उनका सामना करना था। उस समय मेरा मन भी "पेरेस्त्रोइका" की ओर चल पड़ा था। विचारधाराओं की कट्टरता की कड़ियां खुलने लगी थीं। इन कड़ियों को खोलने में जॉर्ज ऑरवेल की "1984" का भी बड़ा योगदान रहा। इसके बाद ऑरवेल की "एनिमल फार्म" भी पढ़ी। लेकिन "1984" पुस्तक ने दिल-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी।

         वस्तुतः दबाव चाहे किसी भी विचारधारा का हो आम जनता के लिए उचित नहीं होता है। जब आम जनता अपने मौलिक अधिकारों के साथ रहती है तभी वह सही तरीके से जी पाती है। साम्यवाद और पूंजीवाद का संतुलित स्वरूप ही उसके लिए उत्तम होता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है। आज "कामरेड" या "लाल सलाम" जैसे शब्द मेरे जीवन में महाविद्यालयीन जीवन के साथ ही बहुत पीछे छूट गए हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि उस दौर में मैंने साम्यवाद और पूंजीवाद को भलीभांति न समझा होता अर्थात उन दोनों राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं की बारीकियों को नहीं समझा होता, तो आज शायद लोकतंत्र के बारे में मैं इतने अच्छे से नहीं समझ पाती।
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Sunday, August 28, 2022

संस्मरण | कविता का वशीकरण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 28.08. 2022
कविता का वशीकरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        वह दिन मैं कभी भूल नहीं सकती, जब मां ने स्कूल से लौट कर बताया कि आज एक पुराने परिचित घर आने वाले हैं। वर्षा दीदी ने पूछा कि कौन हैं वे? उन दिनों मैं शायद आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। मुझे भी जिज्ञासा हुई।

‘‘बहुत बड़े कवि हैं। तुम लोग उनकी कविताएं अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ती हो।’’ मां तो इतना कह कर नाश्ता-पानी के जुगाड़ में लग गईं। उन दिनों हमारे घर में चाय का चलन नहीं था। मां बुंदेली संस्कृति में रच-बस चुकी थीं। यद्यपि मालवा उनके मन और जीवन से गया नहीं था। घर में साड़ी के बजाए मालवी स्टाईल की लहंगा-चुन्नी पहनना पसंद करती थीं। आखिर अपनी जन्मभूमि को कोई कैसे भुला सकता है? वे मालव कन्या थीं। ‘‘मालविका’’ थीं। उनको यह उपनाम डाॅ. श्याम परमार ने उनकी लेखकीय प्रतिभा को देखते हुए दिया था। मजे की बात यह कि वर्षा दीदी का जन्म रीवा में हुआ था इसलिए वे स्वयं को ‘‘बघेली कन्या’’ कहा करती थीं। जबकि मेरा जन्म विशुद्ध बुंदेलखंड में पन्ना में हुआ सो मैं जन्मजात ‘‘बुंदेली कन्या’’ बन गई। तो, मैं बता रही थी नाश्ते के बारे में। तब बुंदेलखंड में अतिथि के लिए नाश्ते में पोहा नहीं बनाया जाता था। आमतौर पर घरों में सलोनी, पपड़िया, सेव आदि बना कर रख लिए जाते थे, यानी ये नाश्ते हमेशा मौजूद रहते थे। मां भी रविवार की छुट्टी में खाना बनाने वाली बऊ के साथ मिल कर इस तरह के आईटेम बना कर रख लिया करती थीं। लेकिन यदि किसी को नाश्ता ताज़ा बना कर कराना होता था तो भजिए और गुलगुले तले जाते। साथ में चिप्स और पापड़ भी रहते। पोहा हमारे घर उन दिनों कभी-कभार ही बनता था। लेकिन उस दिन मां पोहा बनाने में जुट गईं। घर में आलू, प्याज और धनिया पत्ती के अलावा और कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसे पोहे में डाला जा सकता था। उन दिनों पन्ना में हरी मटर सिर्फ़ सीजन में ही मिलती थी और हमारे फ्रिज होने का सवाल ही नहीं था। उस समय फ्रिज घोर विलासिता की वस्तु थी, अतः हम तो उसे ‘अफोर्ड’ करने की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। सो, डिब्बाबंद मटर भी घर में नहीं रख सकते थे। खैर उस समय मैंने ये सब नहीं सोचा होगा लेकिन अब उन दिनों को याद करती हूं तो उन दिनों के अभाव और उपलब्धता सभी कुछ याद आते हैं।

लगभग आधे घंटे बाद कुंडी खटखटाने की आवाज़ आई। सबसे पहले भाग कर मैं ही दरवाज़े पर गई। सामने देखा तो चकाचक सफेद धोती-कुर्ता पहने एक सज्जन खड़े थे। कुर्ते के ऊपर जैकेट और एक कंधे पर खादी का एक झोला।
‘‘ये मालविका जी का घर है न?’’ उन्होंने मुझसे प्रश्न किया। मैंने अपनी मुंडी हिला कर हामी भरी ही थी कि मां और वर्षा दीदी आ गईं।

‘‘आइए-आइए! बेटा इन्हें प्रणाम करो! ये श्रीकृष्ण सरल जी हैं, जिनकी कविताएं तुम लोगों ने याद कर रखी हैं।’’ मां ने परिचय कराया। ‘‘श्रीकृष्ण सरल’’ यह नाम सुन कर तो मैं अवाक हो कर उनकी ओर देखती रह गई। वे मुझे बिलकुल अपने नानाजी की तरह लगे। नानाजी भी सफेद धोती-कुर्ता पहनते थे। वे काफी देर हमारे घर पर रुके। उन्होंने नाश्ता किया और अपनी दो-तीन लम्बी-लम्बी कविताएं सुनाईं। जितना ओज उनकी कविताओं में था उतना ही ओज उनके काव्य-पाठ में था। उन्होंने हम दोनों बहनों को अपनी एक-एक गीत-पुस्तक भी भेंट की। यद्यपि उनकी वे पुस्तकें तो हमने चार दिन बाद पढ़ीं। साक्षात उनके मुख से देशभक्ति में डूबा गौरवगान सुनने के बाद ओजपूर्ण गीतों का जो असर हम दोनों बहनों पर हुआ, उसके कारण हम दोनों बहनें चार दिन तक ‘सरल’ जी जैसी कविता लिखने के प्रयास में जुटी रहीं। देखा जाए तो यह बचपना ही था क्योंकि देशभक्ति पूर्ण कविताएं तभी लिखी जा सकती हैं जब देश प्रेम की भावनाएं मन में हिलोरें ले रही हो। ऐसी कविताएं अंतःकरण से उपजती हैं, सुने-सुनाए आधार पर नहीं। बहरहाल, हमने जो कविताएं लिखीं, उन्हें मां ने देखा-पढ़ा। वर्षा दीदी की कविताओं में मां ने आवश्यक सुधार भी किए। मगर मैं बचपन से ही अड़ियल किस्म की रही हूं। मुझे अपनी रचनाएं जंचवाना पसंद नहीं था। मैंने मां को पढ़ने तो दी लेकिन सुधारने नहीं दी। मां ने भी सुधारने पर जोर नहीं दिया क्योंकि वे जानती थीं कि यदि वे जोर देंगी तो मैं अपनी कविताएं फाड़ कर फेंक दूंगी। वह तो मेरी आदत में तब थोड़ा परिवर्तन आया जब मैंने सन् 2004 में अपना पहना उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ लिखा। यह 2005 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास की पांडुलिपि वर्षा दीदी को इस वार्निंग के साथ पढ़ने को सौंपी थी कि इसमें जो भी गड़बड़ी आपको लगे उसे आप अलग नोट करिएगा। पांडुलिपि में काटा-पीटी की जरूरत नहीं है। दीदी तो बचपन से ही देखती आई थीं कि गलती निकाले जाने पर मैं किस तरह अपनी रचना का अंतिम संस्कार कर देती हूं अतः उन्होंने मेरी वार्निंग का पूरा ध्यान रखा। कहने का आशय यह कि श्रीेकृष्ण ‘‘सरल’’ जी की कविताएं सुन कर जुनून में आ कर मैंने जो कविता लिखी थी उसे मैंने उस वर्ष 26 जनवरी के समारोह में सुना कर दम लिया। मैंने भरसक प्रयास भी यही किया था कि मैं ‘‘सरल’’ जी की भांति अपनी कविता का पाठ करूं। स्कूल में मां के अलावा किसी को कविताकला का विशेष ज्ञान नहीं था इसलिए सभी से मुझे प्रशंसा मिली। यह तय है कि मां ने जरूर अपना सिर पीटा होगा मेरी कविता सुन कर।

इसी तरह का कविताई का एक बार और जूनून हम दोनों बहनों पर सवार हुआ था। तब मैं बीए फस्र्टईयर में पढ़ रही थी। एक रचनाकार के रूप में मेरी पहचान बनती जा रही थी। उन दिनों पन्ना में जबलपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार आया करते थे, जिनमें मेरी और दीदी की रचनाएं प्रकाशित होती रहती थींे। दीदी ने उन दिनों कुछ मंचों पर भी काव्यपाठ करना शुरू कर दिया था। यद्यपि मंचों का गिरता स्तर देख कर यह सिलसिला बहुत लम्बा नहीं चला। दीदी का कंठ बहुत मधुर था। उनमें अपनी आवाज से श्रोताओं को बांध लेने की क्षमता थी लेकिन मंचीय लटके-झटके उन्हें नहीं आते थे और मां को भी वह सब पसंद नहीं था। कुछ श्रेष्ठ मंचों पर श्रेष्ठ कवियों से भी भेंट हुई और आत्मीयता के तार जुड़े। जिनमें से एक थे बुंदेलखंड के ख्यातनाम कवि डाॅ. अवधकिशोर जड़िया जी। उन दिनों उनके घनाक्षरी छंदों की बड़ी धूम थी। बहुत ही सहज और सरल स्वभाव के हंसमुख व्यक्ति। अब तो उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। जिस समय की मैंने घटना बता रही हूं, उन दिनों बारिश के बाद और ठंड के आगमन से पहले का मौसम था। इसीलिए हम लोग घर के आगे वाले बरामदे में सो रहे थे। यही कोई सुबह के चार बजे का समय था। ऐसा लगा कि कोई दीदी का नाम ले कर जोर-जोर से पुकार रहा है। मां, दीदी और मैं तीनों हड़बड़ा कर उठ बैठे। सुबह की नींद यूं भी गहरी होती है अतः एकदम से कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ है? मां ने लपक कर लाईट जलाई। तब हमने देखा कि सामने डाॅ.अवधकिशोर जड़िया जी खड़े हुए थे।

‘‘सुप्रभात! देखो मैंने जगा दिया न सबको।’’ वे हंसते हुए बोले। फिर कहने लगे,‘‘अभी कवि सम्मेलन खत्म हुआ है। मैं सीधा वहीं से चला आ रहा हूं। मेरी बस छः बजे की है। अगर मैं आप लोगों से बिना मिले चला जाता तो आप लोग नाराज हो जाते।’’
‘‘हां-हां, बैठो न भैया!’’ मां ने तत्काल एक खाट का बिस्तर ठीक-ठाक किया और कहा। वे इत्मिनान से बिस्तर पर आलथी-पालथी मार कर बैठ गए। फिर दीदी से साधिकार बोले,‘‘जाओ वर्षा बेटा झटपट चाय तो बना लाओ!’’

चाय पीने के बाद वे हम लोगों को बताने लगे कि उन्होंने कविसम्मेलन में कौन-कौन सी कविताएं सुनाईं हैं। हम लोग भी उत्सुकता से उनकी कविताएं सुनने लगे। उन्होंने अपने बेहतरीन अंदाज में अपनी घनाक्षरियां सुनाईं। लगभग साढ़े पांच बजे वे छतरपुर की बस पकड़ने के लिए रवाना हो गए। लेकिन सुबह-सवेरे के कोरे-ताजे दिमाग में घनाक्षरी छंदों की गूंज ऐसी बैठी कि दो दिन तक हम दोनों बहनें घनाक्षरी लिखने में जुटी रहीं। जब हम लोगों ने जी भर की घनाक्षरियां लिख लीं और यह समझ में आ गया कि अब इससे अधिक नहीं लिखा जा सकता है, तब कहीं जा कर वह जुनून हम दोनों के सिर से उतरा।

सच तो यह है कि श्रीकृष्ण ‘‘सरल’’ और डाॅ. अवधकिशोर जड़िया जी के काव्य में जो पूर्णता (परफेक्शन) थी, उसने हमें वशीभूत कर लिया था। इतना गहरा असर और किसी के काव्यपाठ ने मुझ पर नहीं डाला। आज मैं इन दोनों घटनाओं के महत्व को समझ पाती हूं कि जिस रचना में पूर्णता होती है और जिस रचनाकार में सृजन के प्रति समर्पण (डिवोशन) होता है, उसी की प्रस्तुति सुनने वाले को सम्मोहित कर पाती है। यद्यपि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इन दोनों रचनाकारों के पहले या बाद में जिन कवि या कवयित्रियों की रचनाएं मैंने सुनीं वे प्रभावी नहीं थीं लेकिन इन दोनों कवियों के काव्य और प्रस्तुति में कुछ तो विशेष था जिसने मन को गहरे तक आंदोलित किया और दो-चार दिन तक हमारे मन मस्तिष्क को वशीभूत रखा।      
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Sunday, August 21, 2022

संस्मरण | मैचमेकिंग का असफल प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण 
मैचमेकिंग का असफल प्रयास
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    जब मैं पन्ना में स्कूल में पढ़ती थी तब मेरी सहपाठियों में सभी उत्तर भारतीय छात्र-छात्राएं थीं। फिर जब मैं अपने मामा जी के पास बिजुरी पढ़ने के लिए गई तो वहां पहली बार मुझे एक ऐसी सहेली मिली जो दक्षिण भारतीय थी। वह आयु में मेरे बराबर थी लेकिन उसकी शिक्षा में बीच में व्यवधान आ जाने के कारण मुझसे छोटी कक्षा में थी। यानी मैं 11वीं कक्षा में थी तो वह नवी कक्षा में पढ़ रही थी। लेकिन हम दोनों के बीच बहुत जल्दी घनिष्ट मित्रता हो गई। उसका नाम था सरोजिनी। उसका वास्तविक नाम लेने में मुझे कोई संकोच नहीं है क्योंकि मैं जानती हूं कि यदि उसे यह पता चले कि मैंने कहीं उसका उल्लेख किया है तो उसे कभी बुरा नहीं मानेगी। सरोजिनी के मामा जी पहले आर्मी में थे शार्ट सर्विस कमीशन में थे । फिर वहां से सेवानिवृत्त होकर रेलवे में काम करने लगे। किंतु किसी कारण से उन्हें रेलवे की नौकरी छोड़नी पड़ी और वह बिजुरी में आकर बस गए उनके साथ उनकी पत्नी और  दो बेटियां तथा एक बेटा था। सरोजिनी की मां का उसके पिता से  अलगाव हो चुका था। तभी से सरोजनी की मां अपने भाई के साथ रह रही थीं। इस तरह सरोजिनी भी अपने मामा जी के साथ रहती थी और मैं भी अपने मामा जी के पास रहती थी। बस अंतर यही था कि उसकी मां उसके साथ थीं, जबकि मेरी मां और मेरी दीदी मुझसे दूर थीं।
       यूं तो सरोजिनी सांवले रंगत की थी लेकिन उस के नाकनक्श गजब के सुंदर थे। वह देखने में किसी दक्षिण भारतीय सिने अभिनेत्री से कम दिखाई नहीं देती थी। जब वह अपने दक्षिण भारतीय शैली में लहंगा, ब्लाउज़, दुपट्टा पहनती और उस पर अपने घने लंबे काले बालों में सफेद मोंगरे  की वेणी लगाती, तो ऐसा लगता जैसे रेखा या वैजयंती माला साक्षात सामने आ गई हो। बेहद हंसमुख थी वह। किसी भी समस्या को बहुत गंभीरता से नहीं लेती थी। जबकि उसका जीवन आसान नहीं था। मैं जब भी मां और दीदी की याद में उदास होने लगती तो वह जबरदस्ती पकड़कर मुझे अपने घर ले जाती और अपनी मां के सामने खड़ा करके कहती, "लो, ये हैं मां। अब इनकी गोद में सिर रखकर रो लो, जितना रोना है।" उसकी बात सुनकर, मुझे झेंप भी लगती और हंसी भी आ जाती। 
       मैं शुरू में उसे मद्रासी मानती थी। क्योंकि उन दिनों दक्षिण भारतीय लोगों के लिए या तो "साउथ इंडियन" या फिर "मद्रासी" शब्द का प्रयोग किया जाता था। चाहे वह तमिलनाडु का हो, केरल का हो या कर्नाटक का, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उत्तर भारतीयों की दृष्टि में सब के सब मद्रासी थे। यह धारणा क्यों चली यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं भी शुरू में सरोजिनी को मद्रासी ही समझती थी। 
     वहां मेरे साथ एक सिंधी लड़की भी पढ़ती थी। बहुत ही अलग थी और मासूम सी। उसका घरेलू नाम मोना था और हम लोग भी उसे मोना के नाम से ही पुकारते थे। उसका बहुत बड़ा परिवार था। जहां तक मुझे याद है, उसके नौ भाई-बहन थे। इसलिए वह परिवार में उतना प्रेम नहीं पा सकी थी जितना प्रेम उसे हम दोनों से मिलता था। वह भी हम लोगों की सहेली बन गई थी। यद्यपि वह इतनी घनिष्ट सहेली नहीं थी जितनी कि मैं और सरोजनी। हम दोनों बहनों की तरह थे। सरोजिनी को मोना के कारण कई बार अपने घर में डांट खानी पड़ती थी। मोना मैं बहुत चंचलता थी। वह सोचती कम थी और करती ज़्यादा थी। इसीलिए सरोजिनी के घर में धूप में रखे गए अचार के मर्तबान को छू देने पर न केवल उसको डांट पड़ती बल्कि सरोजनी को भी डांट खानी पड़ती।  सरोजिनी ने मोना के संदर्भ में ही मुझे बताया था  कि हम लोग तमिल हैं और हमारे यहां खानपान की शुद्धता और पूजा-पाठ का विशेष ध्यान रखा जाता है। हम तीनों सहेलियों में सरोजिनी को उन बातों का ज्ञान अधिक था जो लड़कियों को होना चाहिए। लेकिन मित्रता के बावजूद वह कभी भी किसी विषय पर सीमा का उल्लंघन नहीं करती थी। हंसी-मज़ाक में भी हम लोग शालीनता का पालन करते थे।
     सरोजिनी के परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। उसके मामा को जितनी पेंशन मिलती थी, उससे उनके परिवार का गुज़ारा नहीं हो पाता था। मामी तनिक तेज स्वभाव की थीं। इसलिए जब-तब सरोजिनी की मां को उलाहना भी देती रहती थीं। यद्यपि कोई बड़ा मनमुटाव उनके बीच नहीं था। सरोजिनी की मां और मामा अतिरिक्त कमाई के लिए कपड़ा सिलने का काम करते थे। तुरपाई करना, बटन टांकना जैसे छोटे-मोटे काम सरोजिनी भी करती थी। उसके इस कामों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने सिलाई की पैर मशीन चलाना उसी से सीखा था। 
       सरोजिनी के मामा और मेरे मामा जी के बीच मित्रता थी इसीलिए हम लोगों का एक दूसरे के घर आना-जाना होता रहता था। एक दिन सरोजिनी ने बताया कि उस की शादी के लिए उसके मामा लड़का ढूंढ रहे हैं। मुझे यह सुनकर बड़ा अजीब लगा। वह मेरे ही उम्र की थी और शादी की कल्पना तो मेरे मस्तिष्क से भी कोसों दूर थी। मैंने यह बात अपने मामा जी को बताई। तब मेरे मामा जी ने सरोजिनी के मामा को समझाया कि कम से कम 11वीं क्लास तक तो सरोजिनी को पढ़ लेने दो, उसके बाद उसके विवाह के बारे में सोचना। तात्कालिक रूप से सरोजनी के मामा मान गए और मेरे वहां रहते तक फिर कभी सरोजिनी के विवाह की चर्चा नहीं हुई।
      11 वीं बोर्ड परीक्षा देने के बाद मैं वापस मां के पास पन्ना आ गई। वहां मैंने छत्रसाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आर्ट फैकल्टी में दाखिला लिया। पन्ना आने के बाद मुझे बिजुरी की बहुत याद आती थी। मैंने वहां पढ़ाई के साथ और भी बहुत कुछ सीखा और जाना था। विशेष रुप से मुझे सरोजिनी की याद आती थी। उन दिनों फोन सुविधा इतनी आसान नहीं थी कि मैं सरोजिनी से बात कर पाती। हम लोग एक-दूसरे को अंतर्देशीय पत्र लिखते थे, जिन्हें आने-जाने में ही काफी समय लग जाता था। मैंने मां से कहा कि मैं एक बार बिजुरी घूमने जाना चाहती हूं ताकि सरोजिनी से मिल सकूं। मां ने सहर्ष स्वीकृति दे दी और तय हुआ कि फर्स्ट ईयर की परीक्षा देने के बाद मैं  बिजुरी जाऊंगी। 
       फर्स्ट ईयर में मेरा एक लड़के से परिचय हुआ। वह भी दक्षिण भारतीय था। यद्यपि वह मुझसे सीनियर था। मैं फर्स्ट ईयर में थी, तो वह थर्ड ईयर में था। मैं खिलंदड़ी स्वभाव की थी इसलिए उसकी मंशा भांप नहीं सकी। वह तो मुझे तब आश्चर्य हुआ जब उसने प्रेम-पत्र लिखकर एक किताब में रख कर मुझे पकड़ा दिया। खै़र इसकी चर्चा में बाद में अलग से करूंगी क्योंकि यह भी एक दिलचस्प घटना है। इस घटना से पूर्व मैंने उसे बताया कि मैं बिजुरी जाने वाली हूं। उसके भी कोई रिश्तेदार रेलवे में पोस्टेड थे और चिरमिरी में रहते थे। उसने मुझसे कहा कि मैं बिजुरी में मिलने आऊंगा। मैंने भी सहज भाव से कह दिया कि आ जाना। जब मैं बिजुरी पहुंची तो सरोजनी से मिलने के बाद मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि सरोजिनी और उस लड़के में दोस्ती हो जाए तो कितना अच्छा है। दोनों दक्षिण भारतीय हैं। यदि एक-दूसरे को पसंद कर लेंगे तो बहुत अच्छा रहेगा। यूं भी सरोजनी के मामा जी उसकी शादी के लिए एक बार फिर सक्रिय हो उठे थे। मैंने पहले सरोजिनी को कुछ नहीं बताया, लेकिन जब वह लड़का आया तो मैंने सरोजिनी के हाथों  उसके पास चाय भिजवाई और मैंने सरोजनी से कहा कि तुम दोनों तो दक्षिण भारतीय हो, अपनी भाषा में एक दूसरे से खूब सारी बातें करना, तब तक मैं नाश्ता बनाती हूं। लेकिन 5 मिनट में ही सरोजिनी वापस आ गई और बोली तुम जाकर बातें करो नाश्ता में बना देती हूं। मैंने पूछा क्या हुआ? तुम दोनों अपनी भाषा में बात क्यों नहीं कर रहे हो? तो वह हंसने लगी और बोली कि हम दोनों की भाषा एक नहीं है। मैं तमिल हूं और वह कन्नड़ है। अब यह सोचने की बात थी कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ थी कि फर्स्ट ईयर की परीक्षा दे चुकी थी लेकिन फिर भी मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि तमिल और कन्नड़ अलग-अलग होते हैं या दक्षिण भारत में जो भाषाएं बोली जाती हैं वे सभी परस्पर एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। सरोजिनी इस मामले में बहुत चतुर थी। वह भांप गई कि मैं उस लड़के से क्यों बात करवाना चाह रही थी। उसने मुझसे कहा कि उसके मामा कभी किसी कन्नड़ लड़के से मेरा विवाह करना स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए इस बारे में कोई चर्चा मत करना। यानी कुल मिलाकर मैचमेकिंग का मेरा पहला और अंतिम प्रयास ही ध्वस्त हो गया। इसके बाद मैंने तौबा कर ली कि मैं ऐसी बेवकूफ़ी फिर कभी नहीं करूंगी। यद्यपि इससे यह जरूर लाभ हुआ कि मुझे दक्षिण भारत की संस्कृति और भाषा की विविधता के बारे में "प्रैक्टिकल तौर पर" पता चला जिसे बाद में किताबों में पढ़ कर मैंने और गहराई से जाना। तब मुझे यह महसूस हुआ कि हम दक्षिण भारतीयों को सिर्फ "मद्रासी" का संबोधन देकर कितना कम आंकते हैं। दक्षिण भारत में भी सांस्कृतिक विविधता और भाषाई विविधता पाई जाती है जो वहां की सांस्कृतिक समृद्धि की द्योतक है। वस्तुतः इस मैचमेकिंग प्रकरण ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए थे।        
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नवभारत | 21.08. 2022 
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Sunday, August 14, 2022

संस्मरण | तिरंगे पर मेरा वह भाषण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण | नवभारत | 14.08. 2022 
तिरंगे पर मेरा वह भाषण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
          जब मैं बिजुरी (तत्कालीन जिला शहडोल) में अपने मामाजी के पास रह कर ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी तब पता नहीं क्यों स्कूल के शिक्षक मुझे उतनी संज़ीदगी से नहीं लेते थे जितना कि वे ले सकते थे। कारण क्या था पता नहीं। शायद कोएजुकेशन हो कर भी छात्र प्रधान स्कूल में छात्राओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। कुछ शिक्षक तो उस ग्रामीण परिवेश से थे जहां लड़कियों की शिक्षा व्यर्थ की चीज मानी जाती थी। दो-चार शिक्षक ऐसे थे जो यह मानते थे कि छात्रों को आटाचक्की और सौदा आदि लाने के लिए भेजा जा सकता है, किन्तु छात्राएं किसी काम की नहीं होती हैं। ऐसे वातावरण में मेरा उसी स्कूल के एक वरिष्ठ शिक्षक की भांजी होना भी कोई मायने नहीं रखता था। वह स्कूल उस गांव का उच्चशिक्षा केन्द्र था और ग्यारहवीं कक्षा सबसे ऊंची कक्षा। स्कूल में एक्स्ट्रा कैरीकुलर नहीं के बराबर था। वहां सिर्फ़ वही दिवस मनाए जाते थे जिनके लिए जिला शिक्षा केन्द्र से कड़क आदेश आते थे। हां, राष्ट्रीय दिवस मनाना तो आवश्यक था ही और वह पूरे जोर-शोर से मनाया जाने वाला था, इस बात का अहसास मुझे तब हुआ जब कक्षा में यह नोटिस पढ़ी गई कि देश के स्वतंत्रता दिवस अर्थात् 15 अगस्त को गीत गायन, कवितापाठ और भाषण इत्यादि होगा।
जहां से मैं बिजुरी पहुंची थी यानी पन्ना के मनहर शासकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय से, वहां इससे अधिक कार्यक्रम होते थे। वहां कुर्सी रेस से ले कर सुई-धागा और जलेबी रेस भी होती थी। मगर बिजुरी के उस हायर सेकेन्ड्री स्कूल में समारोही मानसिकता के शिक्षकों की कमी थी। मेरे कमल सिंह मामाजी जैसे एक-दो शिक्षक थे जो समारोह के पक्ष में रहते थे, मगर प्राचार्य उन्हें भी यह कह कर शांत करा दिया करते थे कि ‘‘बच्चों में बूंदी बंटवा दो। एक के बजाए दो-दो पैकेट दे देना। इतना पर्याप्त है। उछलना-कूदना कराना जरूरी नहीं है।’’ वैसे, प्राचार्य खेल-कूद को बुरा नहीं समझते थे किन्तु अनुपयोगी जरूर समझते थे। यदि फिल्मी भाषा में कहा जाए तो यह उनके ‘‘संस्कार में कमी रह गई थी’’।

एक जुलाई को मेरा वहां दाखिला हुआ था और ठीक डेढ़ माह बाद 15 अगस्त आ गया। मैं उस समय तक पन्ना में रहती हुई कविता-कहानी लिखने लगी थी और अख़बारों के साहित्यिक परिशिष्टों में मेरी रचनाएं छपने भी लगी थीं। मगर ट्रेजडी यह थी कि मेरी जो भी रचनाएं छपीं वे रीवा, सतना और जबलपुर से प्रकाशित होने वाले अख़बारों में। अखबारों के वे संस्करण बिजुरी पहुंचते नहीं थे। यदि भूले-भटके उनमें से एकाध संस्करण वहां पहुंच जाता तय था कि मेरे स्कूल के शिक्षक उसे नहीं पढ़ते। क्यों कि अखबार पढ़ने में उनकी कोई रुचि नहीं रहती थी। सारांशतः यह कि वे नहीं जानते थे कि मैं थोड़ा-बहुत लिख लेती हूं और माईक पर अच्छा-खासा बोल लेती हूं। मैं उन दिनों बातूनी नहीं थी लेकिन दर्शक-दीर्घा से मुझे कभी डर नहीं लगा। 
जब 15 अगस्त के कार्यक्रम संबंधी नोटिस कक्षा में घुमाई गई और उसमें प्रस्तुति देने के लिए अपना नाम लिखाने के लिए कहा गया तो मैंने भी चट से अपना दायंा हाथ उठा दिया।

‘‘तुम किसमें भाग लोगी?’’ बाॅटनी वाले सर का पीरियड चल रहा था, सो उन्होंने आश्चर्य भरे स्वर में मुझसे पूछा।
‘‘मैं भाषण दूंगी!’’ मैंने फौरन उत्तर दिया। 
‘‘तुम दे लोगी भाषण? उस दिन दोनों शिफ्ट के टीचर और स्टूडेंट रहेंगे। बहुत भीड़ रहेगी।’’ अविश्वास भरे स्वर में मुझे डराने का प्रयास करते हुए बाॅटनी वाले सर ने मुझसे कहा।
‘‘जी, सर! मुझे अपना नाम लिखाना है।’’ मैं भी अपनी बात पर अड़ी रही। अतः नाम लिखाने की अनुमति सर को देनी ही पड़ी। भाषण के लिए दो विषय दिए गए थे- पहला विषय था ‘स्वतंत्रता दिवस’ और दूसरा विषय था ‘हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’। मैं समझ गई थी कि स्वतंत्रता दिवस आसान विषय है इसलिए अधिकांश प्रतिभागी उसी पर बोलेंगे। इसलिए मैंने ‘ हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’ के विषय को चुना। उन दिनों न तो इंटरनेट था और न फोन सुविधा कि मैं फोन पर बात कर के मां या वर्षा दीदी से सहायता ले लेती या नेट पर जानकारी सर्च कर लेती। नाम लिखाने की घटना 12 अगस्त की थी। मेरे पास मात्र दो दिन थे तैयारी करने के लिए। शाम को मामाजी जब स्कूल से घर लौटे तो मैंने उन्हें बताया। मेरी बात सुन कर वे चिंतित हो उठे,‘‘वो पहला वाला विषय ठीक था। अब इसकी विस्तृत जानकारी कहां जुटाओगी?’’
‘‘कल स्कूल के बाद पुस्तकालय में रुक जाऊंगी। आप भी तब तक आ ही जाएंगे, तो कल मुझे एक-दो किताबें दो दिन के लिए दिला दीजिएगा।’’ मैंने मामाजी से कहा। मामाजी राजी हो गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि बिजुरी के उस हायरसेकेंड्री स्कूल का वह पुस्तकालय बहुत सम्पन्न था। वहीं मैंने मीगुएल डी सर्वेंटीज़ की ‘डाॅन क्विकजोट’, चाल्र्स डिकेंस की ‘डेविड काॅपर फील्ड’, विलियम शेक्सपियर का नाटक ‘मर्चेंट आॅफ वेनिस’, जाॅन आफॅ आर्क की जीवनी, जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चंद्रगुप्त’ और समुद्रगुप्त’ आदि पढ़े थे। तो, दूसरे दिन मैं पुस्तकालय पहुंची। एक मध्यम आकार के कमरे में दस-बारह लोहे की आलमारियों वाला वह पुस्तकालय। उस दिन मामाजी ज़रा जल्दी स्कूल आ गए थे और उन्होंने मुझे किताब ढूंढने में मदद की। मैं किताबें ले कर घर आ गई और मामाजी अपनी दोपहर वाली शिफ्ट में वहीं रुक गए। इसके बाद दो दिन में मैंने अपने राष्ट्रीय ध्वज के बारे में सब कुछ कंठस्थ कर लिया। केमिस्ट्री और अल्जेबरा के कुछ फार्मूलों को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो मेरी यादाश्त अच्छी थी।

स्वतंत्रता दिवस का समारोह शुरू हुआ। ध्वजारोहण और प्राचार्य सहित शिक्षकों के भाषणों के उपरांत छात्र-छात्राओं की बारी आई। मैं अपना नाम पुकारे जाने की प्रतीक्षा करती रही। लम्बी प्रतीक्षा के बाद सबसे अंत में मेरा नाम पुकारा गया। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था अतः मैंने और अधिक जोश में भर कर एक सांस में तिरंगे का पूरा इतिहास सुना डाला। वहां उपस्थित सभी लोग चकित रह गए। विशेष रूप से वे शिक्षक महोदय जिन्हें मुझ पर विश्वास नहीं था। उन्हें डर था कि मैं भाषण नहीं दे सकूंगी। भीड़ देख कर डर जाऊंगी। इसीलिए उन्होंने मेरा नाम सबसे अंत में रखा था ताकि कार्यक्रम न बिगड़े, और शायद तब तक मैं मैदान छोड़ कर भाग जाऊं। उन्हें पता नहीं था कि मैं मैदान छोड़ने वालों में से नहीं हूं। इससे पहले वाले स्कूल में मैं तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में ईनाम भी जीत चुकी थी। ‘हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’ के उस भाषण ने स्कूल में मेरी धाक जमा दी। इसके बाद पूरे साल किसी ने मेरी भाषण देने की क्षमता पर संदेह नहीं किया। 

आज ‘‘हर घर तिरंगा’’ अभियान में सहभागी होते हुए बार-बार मुझे यह घटना याद आ जाती है कि तिरंगे के साथ मेरा मात्र नागरिक संबंध नहीं, वरन् बचपन का निजी संबंध भी है।     
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Sunday, August 7, 2022

संस्मरण | भय की पहली लहर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

आज नवभारत मेंं 07.08. 2022 को प्रकाशित ....
संस्मरण 
भय की पहली लहर
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        उन दिनों तत्कालीन जिला शहडोल के बिजुरी ग्राम में अपने मामा कमल सिंह चौहान जी के साथ रह कर ग्यारहवीं कक्षा की पढाई कर रही थी। वह काॅलरी एरिया था। बिजुरी ग्राम से कहीं अधिक बड़ी, सुव्यवस्थित काॅलोनी थी काॅलरी की। कोयला खदान में विभिन्न पदों पर काम करने वाले कर्मचारी मामाजी के मित्र थे। बिजुरी गांव और बिजुरी काॅलरी के बीच छोटे-छोटे कुछ खेत थे और खेतों के बीच एक लगभग चैकोर तालाब था। उस तालाब और खेत के बीच मेंड़नुमा पतला रास्ता था। उस रास्ते से हो कर ही मैं और मामाजी काॅलरी काॅलोनी जाया करते थे। शाम को तालाब में मेंढकों के टर्राने की आवाज़ें सुनाई देती थीं। पन्ना में तो ऐसे कच्चे तालाब थे नहीं। वहां तो बेहतरीन घाटों वाले तालाब थे। इसलिए वहां इस तरह मेंढकों की आवाज़ें कभी नहीं सुनी थीं। यह मेरे लिए नया अनुभव था। यद्यपि अभी कई नए अनुभव भविष्य की ओट में छिप कर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ अच्छे, कुछ बुरे। 
एक नया अनुभव यह भी था कि गांव के अधिकांश घरों की तरह मामाजी के घर में भी बिजली का कनेक्शन नहीं था। जीवन में पहली बार पूरे साल भर मैंने लालटेन में पढ़ाई की। किराए का घर था वह। एक बखरी जैसी जगह में। बखरी यानी जिसके चारों ओर घर बने हुए थे और बीच में बागीचा, कुंआ और बड़ा-सा आंगन था। बखरी के किसी भी घर में स्नानघर नहीं था यद्यपि देसी टाॅयलेट था। सुबह भोजन बनाने से पहले महिलाएं कुए पर जा कर नहा लेतीं और उनके बाद पुरुषवर्ग कुए पर जा कर नहाता। मगर मैंने अपने जीवन में कभी खुले में नहीं नहाया था। मामाजी जानते थे कि मैं कुए पर नहीं नहाऊंगी, इसलिए उन्होंने मेरे वहां पहुंचने से पहले ही पीछे के आंगन में बांस की टटियो और चादर से ढंका हुआ एक कच्चा बाथरूम बनवा दिया था। यद्यपि उस पर छत नहीं थी लेकिन वहां पास में कोई दुमंज़िला मकान भी नहीं था। कच्चे बाथरूम में नहाने का भी मेरा पहला अनुभव था। 
मेरे घर से सटा हुआ जो घर था उसमें एक सिंधी परिवार रहता था। काॅलरी क्षेत्र में उनका छोटा-सा जरनल स्टोर था। शायद पंजवानी सरनेम था। मामाजी ने बताया था कि उन पंजवानी अंकल का मन काम में नहीं लगता था, उन्हें जुआ खेलने की लत लग गई थी। लेकिन उनकी पत्नी जिन्हें मैं आंटी कह कर पुकारती थी। खाना पकाने में निपुण थीं। सिंधी स्टाईल की कमल-ककड़ी की सब्ज़ी उन्हीं के यहां पहली बार मैंने खाई थी और मैं उनकी बनाई उस सब्ज़ी की दीवानी हो गई थी। वे जब भी कमल-ककड़ी की सब्ज़ी बनती, मुझे जरूर खिलातीं। उन्हें मुझसे बहुत स्नेह था। जल्दी ही उन्हें दूकान बेच कर बिजुरी से जाना पड़ा। उनका जाना मुझे बहुत अखरा था। लेकिन उनके बाद जो किराएदार आए उनसे मेरी बहुत जल्दी पटरी बैठ गई। 
नए किराएदार मामाजी के परिचित थे। काॅलरी में रहते थे। उनकी पत्नी का मन काॅलोनी में नहीं लगा। इसलिए उन्हें जैसे ही मामाजी से हमारे पड़ोस वाले घर का पता चला। उन्होंने उसे किराए पर ले लिया। उनकी आयु अधिक नहीं थी। फिर भी विवाह हुए चार-पांच साल हो गए थे और उनके कोई बच्चे नहीं थे। मैं उन्हें भी अंकल-आंटी कहती थी। वे लोग रीवा के पास के किसी गांव के रहने वाले थे। परिहार सरनेम था उनका। आंटी से मेरी बहुत जल्दी दोस्ती हो गई। वे भी मुझे बहुत चाहती थीं। जब-तब दुनियादारी भी समझाती रहती थीं। जिनमें वे बातें भी होती थीं जिनकी मां ने मुझसे कभी चर्चा नहीं की थी। शायद मेरे थोड़ी और बड़ी होने पर चर्चा करतीं, लेकिन आंटी के ग्रामीण नज़रिए से तो मैं बड़ी हो चुकी थी और मुझे चैकन्ना रहना सीख लेना चाहिए था। यद्यपि उनकी इस तरह की बातें मेरे सिर के ऊपर से गुज़र जातीं। सिर्फ़ तीन साल छोड़ कर मैं बचपन से कोएजुकेशन में पढ़ी थी। बिजुरी में भी को-एजुकेशन था। इसलिए लड़कों को ले कर मेरे मन में एक मित्रवत खिलंदड़ापन ही रहा और कभी कोई ऊटपटांग भावना नहीं जगी। 
लगभग आधा साल गुज़र गया था। बोर्ड की परीक्षाओं का सेंटर बिजुरी के बजाए कोतमा में रहता था। मामाजी सीनियर टीचर थे अतः बोर्ड के काम के लिए प्रिंसिपल उन्हें ही कोतमा और शहडोल भेजा करते थे। उन्हीं दिनों एक नए टीचर मामाजी वाली शिफ्ट में कहीं से ट्रांसफर हो कर आए। उन्होंने गंाव में एक कमरा किराए पर ले लिया था। एक दिन मामाजी ने उन्हें खाने पर घर बुलाया। वे आए हम तीनों ने साथ खाना खाया। वे मुझसे मेरी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। मामाजी से बोले कि ‘‘यदि शरद को जरूरत हो तो मैं फ्री में ट्यूशन पढ़ा दूंगा।’’ मामाजी ने उन्हें बता दिया कि इसे ट्यूशन पढ़ना पसंद ही नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि उन्हें रात को खाना खाने के बाद दूध पीने की आदत है और घर में दूध ले कर रखने, गरम करने की सुविधा नहीं है। इस पर मामाजी ने कहा कि ‘‘कोई बात नहीं, दूधवाले से कह देना कि हमारे घर दे जाया करे। दोपहर में शरद आ जाती है। गरम कर के रख दिया करेगी। शाम को मेरे आने के बाद तुम ले जाया करना।’’ वे मान गए।
कुछ दिन बाद मामाजी को स्कूल के किसी काम से शहडोल जाना पड़ा। उन्होंने मुझे समझाया कि जब वे सर आएं तो दरवाजे से ही उन्हें दूध का डिब्बा पकड़ा देना और दरवाज़ा बंद कर के रखना। बस, एक ही दिन की बात थी। परिहार अंकल जरूर बारह घंटे की ड्यूटी पर चले जाया करते थे। वे आठ घंटे की ड्यूटी और चार घंटे ओवरटाईम करते थे। मगर आंटी पूरे समय घर पर रहती थीं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं थी। जब शाम हुई तो वे सरजी घर आए। मैंने दरवाजा खोला और दूध का डिब्बा लेने अंदर वाले कमरे में आई और जब पलट कर देखा तो वे पहले कमरे में कुर्सी पर आलथी-पालथी मार कर बैठे दिखाई दिए। दो कमरे का छोटा-सा घर था। एक दरवाज़ा बाहर सड़क पर खुलता था जिससे सरजी कमरे में पधार गए थे और दूसरा दरवाज़ा पीछे वाले आंगन की तरफ था जहां परिहार आंटी के घर का भी पिछला दरवाज़ा था। मैंने सरजी को दूध का डिब्बा दिया तो वे अजीब दृष्टि से मुझे देखने लगे। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन कहते है न, कि लड़कियों और महिलाओं में सिक्स्थ सेंस होती है। मुझे अचानक डर-सा लगने लगा। फिर भी मैंने हिम्मत करके कहा कि ‘‘सर! मामाजी ने कहा है कि दरवाज़ा बंद कर के रहना, तो आप जाइए, मुझे दरवाज़ा बंद करना है।’’
‘‘ठीक है पानी पिला दो।’’ सरजी ने कहा। मेरे मन में अज्ञात भय बढ़ गया। अब मुझे रहा नहीं गया और मैं पानी लाने के बहाने भीतर दूसरे कमरे से होती हुई सीधे परिहार आंटी के पास पहुंची और उन्हें सारा हाल बताया। ‘‘ठीक है, चलो! मैं देखती हूं।’’ उन्होंने कहा और वे मेरे साथ मेरे घर पहुंची और ऊंची आवाज में बोलीं,‘‘बिटिया, चलो अपने सरजी को पानी दे दो। फिर मेरे घर चलो। तुम्हारे अंकल आने वाले हैं। उनकी छुटटी का टाईम हो गया है।’’ आंटी ने चतुराई से काम लिया था क्योंकि अंकल रात दस बजे के पहले आने वाले नहीं थे, पर सरजी यह थोड़े ही पता था। आंटी की बात सुन कर सरजी ने दूध का डिब्बा उठाया और बिना पानी पिए ही वहां से दफ़ा हो गए। 
आज जब मैं ‘‘गुड टच और बेड टच’’ की शिक्षा के बारे में सुनती हूं तो मुझे लगता है कि हर बच्चे में सिक्स्थ सेंस होती है। बस, जरूरत होती है किसी ऐसे बड़े की जिससे समय रहते वह खुल कर बात कर सके और मदद ले सके। मुझे परिहार आंटी के रूप में एक ऐसी ही अघोषित अभिभावक मिल गई थीं जिन्होंने जीवन का पहला पाठ पढ़ने और भय की पहली लहर को समझने में मदद की। मेरे सिक्स्थ सेंस को जाने-अनजाने उन्हीं ने जगाया था जिससे मैं उन सरजी की कुभावना को एक अनजाने भय के रूप में ताड़ गई। वे आंटी अब कहां हैं, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे जीवन और मेरी आत्मरक्षा की दृढ़ता में उनका योगदान मैं कभी भुला नहीं सकती हूं।                
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Monday, August 1, 2022

संस्मरण | वह मेंढक राजकुमार नहीं था | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण : 
वह मेंढक राजकुमार नहीं था
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
           बचपन में मेंढकों की अनेक कहानियां सुनी थीं। कुएं के मेंढक से ले कर मेंढक राजकुमार और मेंढकी राजकुमारी तक की कहानियां। मुझे भी अपने जीवन में एक ऐसा मेंढक मिला जिसने मेरा हृदय परिवर्तन कर दिया और मेरे जीवन की दिशा ही मोड़ दी। वह मेंढक ही था, ख़ालिस मेंढक, कोई राजकुमार-वाजकुमार नहीं। लेकिन उसने यह बता दिया कि मैं क्या कर सकती हूं और क्या नहीं। यह भी कि मेरी सहन शक्ति कितनी है। घबराइए नहीं, मेंढक कोई काटने वाला प्राणी नहीं होता है। उसने मुझे कष्ट दे कर मेरी सहन शक्ति की पैमाइश नहीं की, वह तो खुद ही कष्ट में था। 
बात उस समय की है जब मैं शहडोल जिले के बिजुरी गांव में अपने मामाजी कमल सिंह चौहान के पास एक साल के लिए रहने गई थी। दरअसल, उन दिनों मामा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। वैसे कोई गंभीर बात नहीं थी लेकिन मेरी मां का बहनापा यह मानने को तैयार नहीं था कि उनके छोटा भाई पीलिया से ठीक होने के बाद की कमजोरी की अवस्था में अकेला रहे। मेरी वर्षा दीदी उस समय काॅलेज में पढ़ रही थीं और बिजुरी में काॅलेज नहीं था। इसलिए उनका मामाजी के पास रहना संभव नहीं था। मां स्वयं व्याख्याता थीं अतः उन्हें लम्बी छुट्टी नहीं मिल सकती थी। उन दिनों मेरे नानाजी संत श्यामचरण सिंह जीवित थे और हम लोगों के साथ ही रहते थे मगर वे  मोतियाबिंद ग्रस्त थे अतः उन्हें खुद सहारे की ज़रूरत पड़ती थी। यानी कुल मिला कर मैं ही थी जिसका 11वीं कक्षा में दाखिला होना था और बिजुरी में आदिमजाति विभाग द्वारा संचालित एकमात्र उच्चतर माध्यमिक विद्यालय था, जिसमें साईंस और आर्ट दोनों के विषय पढाए जाते थे। वर्षा दीदी ने बायोलाॅजी ग्रुप चुना था ताकि वे आगे चल कर डाॅक्टरी की पढ़ाई कर सकें। किन्तु एमबीबीएस डाॅक्टर बनना उनके भाग्य में नहीं था। जैसा कि मैंने घर में बड़ों को चर्चा करते सुन रखा था कि उन दिनों मेडिकल काॅलेज में दाखिले के लिए बहुत मोटी रकम देनी पड़ती थी, मां के लिए उतनी रकम दे पाना संभव नहीं हुआ और दीदी ने एमबीबीएस के बजाए बाॅटनी में एमएससी की ओर कदम बढ़ा दिए। लेकिन दीदी की किताबें, प्रैक्टिकल फाईल्स, उनका सोबर एटीट्यूड देख कर मुझे भी साईंस स्टूडेंट बनने का भूत सवार हो गया था। उन दिनों 9 वीं कक्षा से ही फैकल्टी और ग्रुप तय हो जाते थे। मैंने भी नौवीं से साईंस में बायो ग्रुप ले रखा था। वैसे भी मैथ्स तो मेरी आज भी बेहद कमजोर है। मैथ्स में मुझे रेखागणित ही सबसे अच्छी लगती थी, वरना मैं अंक गणित के बारे में सोचा करती थी कि यह भी कोई सवाल हुआ कि सौ लीटर वाली एक टंकी को एक नल एक घंटे में भर रहा है और दूसरा नल सवा घंटे में खाली कर रहा है तो एक घंटे बाद टंकी में कितना पानी बचेगा? कुल मिला कर यह बकवास सवाल था मेरी दृष्टि में। 
मुझे बायोग्रुप में बाॅटनी, जूलाॅजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री चारो अच्छे लगते थे। ड्राईंग में मुझे बचपन से रुचि थी इसलिए मेरी प्रैक्टिकल फाईल में सबसे बेहतरीन ड्राइंग रहती थी। बस, अपनी ख़राब रायटिंग के कारण लेबलिंग में मुझे अधिक समय खपाना पड़ता था। उन दिनों आमतौर पर 11 वीं कक्षा से ही जूलाॅजी के प्रैक्टिकल की शुरूआत होती थी। लगभग आधा सिलेबस हो जाने पर एक दिन जूलाॅजी वाले सर ने कक्षा में घोषणा की कि अगले दिन डिसेक्शन कराया जाएगा। सभी लोग मेंढक की एनाॅटामी के बारे में अच्छी तरह से पढ़ कर आएं। यह सुन कर मुझे बड़ा मजा आया क्यों कि मुझे मेंढक की एनाॅटामी लगभग कंठस्थ थी। मैंने मेंढक की रक्तवाहिनियों, स्नायुतंत्र और अस्थियों के अनेक चित्र अपनी प्रैक्टिकल फाईल में सजा-सजा कर बनाए थे। उन दिनों मोबाईल तो दूर, फोन की सुविधा भी नगरसेठ के घर या थाने में ही थी, वरना मैं उसी समय वर्षा दीदी को फोन कर के बताती कि कल मैं भी डिसेक्शन करने वाली हूं। मैं भी डिसेक्शन करूंगी, यह सोच-सोच कर खुद को किसी बड़े साईंटिस्ट से कम नहीं समझ रही थी। मेरी कक्षाएं सुबह की शिफ्ट में लगती थीं औैर मामाजी की ड्यूटी दोपहर की शिफ्ट में रहती थी। हम लोग रास्ते में ही आपस में मिलते थे, जहां बता पाना उचित नहीं था। इसलिए उन्हें यह खुशख़बरी देने के लिए मुझे शाम पांच बजे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 
जैसे-तैसे दूसरा दिन आया। मुझे जूलाॅजी के पीरियड का बेसब्री से इंतज़ार था। अंततः वह पीरियड भी आ गया। सर हम सभी छात्र-छात्राओं को, यानी साईंस पढ़ने वाले कुल जमा सात स्टूडेंट्स में छः छात्र और अकेली मैं छात्रा थी, हम सभी को लेकर प्रयोगशाला पहुचें। वह स्कूल की एकमात्र प्रयोगशाला थी जिसमें बाॅटनी, जूलाॅजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री चारो की एक-एक आलमारियां थीं और चारो विषयों के प्रैक्टिकल उसी कक्ष में हुआ करते थे।
प्रयोगशाला में टेबल पर अलग-अलग सात डिसेक्शन ट्रे रखी गई थीं। हम सर के निर्देशानुसार अपनी-अपनी ट्रे के सामने खड़े हो गए। ट्रे के बाजू में डिसेक्शन की कैंची, छुरी, कांटें, पिन्स आदि रखे हुए थे। सर एक बड़ी-सी बाल्टी ले कर आए जिसमें अर्द्धबेहोश मेंढक थे। सर ने कहा कि हम उनमें से एक-एक मेंढक उठाएं और अपनी-अपनी ट्रे में उसकी चारों टांगें पिन से टांक दें। मेंढक को नंगे हाथों से पकड़ना? उफ! ईईई! मेरी हिम्मत नहीं हुई। सर ने आंखें तरेरते हुए आदेश दिया कि ‘‘चलो उठाओ मेंढक! डिसेक्शन करना है या नहीं?’’
‘‘करना है!’’ मैंने मरे हुए स्वर में उत्तर दिया। उस समय के अनुभव को बयान कर पाना कठिन है कि मैंने कैसे मेंढक को अपने नंगे हाथों से उठा कर ट्रे में पिन किया। मुझे लगा कि इस तरह पिन करने से उसे दर्द होगा। मैंने यह बात सर से कह दी। तो उन्होंने उत्तर दिया कि अभी तो उसे चीरा लगा कर काटना है और उसके अंदर के अवयव देखना है। यह सब मेरे लिए भयानक अनुभव था। लेकिन असली टेज़ड्री तो अभी होनी बाकी थी। 
सर ने मेंढक को चीरा लगाने का तरीका बताया। यह इतनी सावधानी से करना था कि उसकी स्किन भर कटे, कोई नस न कटे। मगर मैं तो पहले से ही नर्वस थी। मेंढक की नस क्या मैं अपनी नस पर भी चाकू चला सकती थी। कांपते हाथों से मैंने चीरा लगाया। फिर वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। पूरी ट्रे मेंढक के रक्त से भर गई। मैंने उसकी कोई नस काट दी थी। इसके बाद तो मेरा सिर चकराने लगा। सर, ने मुझे डांटा या समझाया मुझे याद नहीं। इतना याद है कि उन्होंने मुझे जा कर कक्षा में बैठने को कहा और साथ ही यह भी कि ‘‘कोई बात नहीं, कल फिर से ट्राई करना।’’
पता नहीं कितनी देर बाद मैं स्थिरचित्त हो पाई। घर लौटने पर मैंने अपने दोनों हाथ साबुन घिस-घिस कर, रगड़-रगड़ कर धोए। मगर मेंढक की वह छुवन तो मानो मेरी उंगलियों और हथेलियों में चिपक गई थी। दो-तीन दिन तक मुझसे ढंग से खाना नहीं खाया गया। रह-रह कर रक्त भरी ट्रे और उसमें मौजूद चीरा लगा मेंढक मुझे दिखाई देता था। इस घटना के बाद मैंने जान लिया कि जूलाॅजी की थ्योरी तो मैं पढ़ सकती हूं लेकिन प्रैक्टिल करने का कलेजा मेरे पास नहीं है। मैंने तय कर लिया कि 11वीं उत्तीर्ण होते ही जूलाॅजी छोड़ दूंगी। इस तरह उस मेंढक ने अपनी जान देकर मुझे मेरी हक़ीकत से परिचित करा दिया कि मैं चीरा-फाड़ी, रक्तपात देख ही नहीं सकती हूं। यह मेरे वश का नहीं है। इधर केमिस्ट्री वाले सर के जबरिया ट्यूशन फंडे के कारण केमिस्ट्री से अरुचि हो ही चली थी और अब जूलाॅजी से सन्यास की भावना जाग उठी। अतः काॅलेज में पहुंच कर साईंस से अलगाव होना तय था। काॅलेज पहुंचते ही मैं एक उम्दा आर्ट स्टूडेंट बन गई। शरारती, खिलंदड़ी और मनमौजी। अब इतिहास की किताबों में रक्तपात था, मेरी आंखों के सामने नहीं और न मेरे हाथों से। वह मेंढक राजकुमार नहीं था लेकिन मेरा हृदय परिवर्तन और विषय परिवर्तन दोनों करा गया।           
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धन्यवाद #नवभारत 🙏
31.07.2022
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