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Sunday, September 18, 2022
संस्मरण | भजियों-पकौड़ों का जादुई संसार | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
संस्मरण | नवभारत | 18.09. 2022
भजियों-पकौड़ों का जादुई संसार
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
अभी इसी वर्ष (2022 में) हिन्दी दिवस की बात है, मैं एक भावुकतापूर्ण समारोह से लौटी थी. उस समारोह को भावुकतापूर्ण इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसमें मैंने अपने दीदी डाॅ. वर्षा सिंह की स्मृति में युवा रचनाकारों के लिए एक सम्मान आरम्भ किया. लगभग सवा साल पहले कोरोना की दूसरी लहर में मैंने वर्षा दीदी को हमेशा के लिए खो दिया था. अब मैं युवा रचनाकारों में उनकी आकांक्षाओं एवं सपनों को फलता-फूलता और पूर्णता को प्राप्त होते हुए देखना चाहती हूं. अतः वह सम्मान समारोह मेरे लिए भावाकुल कर देने वाला साबित हुआ.
बहरहाल, मैं बता रही थी कि मैं उस समारोह से लौट कर अपने घर के बाहरी दरवाजे का ताला खोलने ही जा रही थी कि काॅलोनी की ही एक भाभीजी ने मुझे आवाज दी. मैं ताला खोलती-खोलती रुक गई. भाभीजी मेरे पास आ कर कहने लगीं कि ‘‘कुछ मेहमान आ गए थे इसलिए मैं कार्यक्रम में नहीं आ सकी. प्लीज बुरा मत मानना!’’
‘‘नहीं, इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है. अब मेहमानों को क्या पता कि आपको कहीं जाना है.’’ मैंने उन्हें तसल्ली दी. मेरी बात सुन कर वे उत्साहित हो उठीं और बोलीं,‘‘मेरे घर चलो, मैंने भजिए-पकौड़े बनाए हैं.’’ मैंने उन्हें छेड़ने के लिए चुटकी ली,‘‘मेहमानों के बचे हुए भजिए हैं क्या?’’ मेरी बात सुन कर वे चिंहुक पड़ीं,‘‘मारूंगी! फालतू बात मत करो! मैंने भी कहां खाया है? उस समय तो तल-तल कर मेहमानों को खिलाती रही. फिर और तल कर कैसरोल में रख लिए कि जब तुम आओगी तो हम दोनों बैठ कर चाय-पकौड़ों का आनन्द लेंगे. और एक तुम हो!’’ कहती हुईं वे हंसने लगीं और मैं भी हंस पड़ी.
मैं उनके साथ उनके घर गई. मैंने सोचा था कि एकाध कैसरोल में भजिए होंगे लेकिन जब उन्होंने चार कैसरोल मेरे सामने ला कर रखे और उनके ढक्कन खोले तो मैं देख कर दंग रह गई। हर कैसरोल में दो-दो प्रकार के भजिए-पकौड़े थे. अकेले आलू और आलू-प्याज मिक्स के पकौड़े तो बहुप्रचलित हैं. पालक, बैंगन और फूल गोभी के पकौड़े भी बहुतायत बनाए जाते हैं. उन्होंने जो स्पेशल पकौड़े बनाए थे, वे थे करेले के पकौड़े. जरा भी कड़वे नहीं. बेहद कुरकुरे. इसी तरह चुकंदर (बीटरूट) के पकौड़े और सेब के पकौड़े तो अद्भुत थे. मैंने तो उनसे कहा कि उन्हें पकौड़ों की रेसिपी बुक लिखनी चाहिए. मगर उन्हें लिखने में कतई रुचि नहीं हैं. खैर, उनकी भजिए-पकौड़े बनाने में इसी तरह रुचि बनी रहे, यही मेरी दुआ है.
भाभीजी के घर से लौट कर मुझे अपने बचपन के दिन याद आने लगे. उन दिनों मेरे घर भी तरह-तरह के भजिए बनाए जाते थे. यद्यपि उन दिनों पन्ना जैसी छोटी जगह में सीजनल सब्जियां ही मिला करती थीं. इसलिए फूल गोभी या चुकंदर के भजिए हर मौसम में नहीं बन सकते थे. लेकिन उन दिनों उन सब्जियों के भजिए बनते थे जो अब बाजार से तो गायब हो ही चुके हैं बल्कि कुछ तो वनस्पति के रूप में भी लुप्त होते जा रहे हैं. जैसे केनी के पत्तों के भजिए. केनी का पौधा अपने-आप बगीचे में किनारे-किनारे उग आता था. इसकी हल्की सफेद धारियों वाली मध्यम लम्बाई की पत्तियां होती थीं. इसे और क्या कहा जाता है मुझे पता नहीं है. मेरे घर में इसे केनी ही कहा जाता था. केनी के पकौड़ों के लिए मेरी और वर्षा दीदी की ड्यूटी होती थी कि हम पत्तियां तोड़ कर इकट्ठी करें. अब तो केनी के पौधे भूले-भटके ही दिखते हैं, वह भी खेतों के आस-पास. इसी तरह मुनगे (कोसें, ड्रमस्टिक) के फूलों के भजिए बनते थे, जिसके लिए हम दोनों बहनें लम्बा बांस ले कर फूल तोड़ने में जुट जाती थीं. हमारे घर के बगीचे में ही मुनगे था एक अदद पेड़ लगा था. अतः हमें कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता था. कुम्हड़े के फूलों के पकौड़े भी बड़े स्वादिष्ट लगते थे. पोई के पत्तों के पकौड़े भी बनाए जाते थे. पोई की बेल उत्तरप्रदेश में आज भी घरों में उगाई जाती है लेकिन मध्यप्रदेश में इसे लगाने और खाने का चलन नहीं के बराबर है. हमारे घर के बगीचे की बाड़ में पोई और कुंदुरू की बेलें फैली रहती थीं. कुंदरू तो इतनी अधिक तादाद में हो जाते थे कि हम उसे पड़ोसियों में भी बांट देते थे. लेकिन पोई में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती थी. हमारे घर में केले के पेड़ भी लगे थे. मां बताती थीं कि वे भुसावली केले के पेड़ थे. उन पेड़ों की ऊंचाई अधिक नहीं होती थी लेकिन उनमें केले के बड़े-बड़े घेर फलते थे. घेर में से केले खत्म होते-होते उसमें से फूल काट लिया जाता था और उसकी ऊपरी पंखुरियां अलग कर के भीतरी अपेक्षाकृत कोमल पंखुरियों की कभी सब्जी तो कभी पकौड़े बनाए जाते थे. कच्चे केले के पकौड़े भी बड़े स्वादिष्ट बनते थे। मुझे कुम्हड़े, नेनुआ (रेरुआ, फत्कुली) के पकौड़े बहुत प्रिय थे. मां जब भी पकौड़े बनातीं तो मेरे लिए इन दोनों में से जो भी घर में पाया जाता या फिर दोनों के पकौड़े बनातीं. बैंगन में विशेष रूप से काले बैंगन के पकौड़े बनाए जाते थे.
मुझे लगता है कि हर सब्जी के भजिए-पकौड़े बनाए जा सकते हैं. मैंने बचपन में फूलगोभी के पकौड़े नहीं खाए थे. क्योंकि मां ने कभी बनाए ही नहीं. वह तो बाद में मैंने ही फूलगोभी के पकौड़े अपने घर में बनाना शुरू किया. इसे बनाना सीखने का भी अपना एक मजेदार किस्सा है. हमारे सगेसंबंधी समान भाई साहब गणेश सिंह जी की पत्नीं यानी मेरी भाभीजी को पकौड़े बनाने में महारत हासिल रही है। वे लोग उन दिनों पन्ना के एमपीईबी के क्वार्टर्स में रहा करते थे, पन्ना-सतना मार्ग पर। हम लोग अकसर उनके घर जाया करते थे. उस समय तक वर्षा दीदी की भी एमपीईबी में नियुक्ति हो चुकी थी. इस तरह हमारा दोहरा रिश्ता हो गया था. एक बार जब हम लोग उनके घर गए तो भाभीजी ने फूलगोभी के पकौड़े बनाए. इससे पहले मैंने फूलगोभी के पकौड़े कभी नहीं खाए थे. मुझे उनका आकार-प्रकार देख कर लगा कि ये अवश्य अंदर से कच्चे होंगे. लेकिन जब मैंने खाया तो बस, खाती ही चली गई. हर पकौड़ा चाय की प्लेट के आकार जितना बड़ा था और अच्छी तरह से तला हुआ था. मुझे नए-नए व्यंजन बनाने का शौक तो बचपन से ही था, सो मैं सम्मोहित-सी उनके रसोईघर में जा पहुंचीं. वहां मैंने उन्हें फूलगोभी के पकौड़े बनाते देखा और उसे अपने दिल-दिमाग में नोट कर लिया. दूसरे दिन जब तक मैंने उसी पद्धति से फूलगोभी के पकौड़े बना कर आजमा नहीं लिए तब तक मुझे चैन नहीं पड़ा. सच्चाई तो ये है कि भाभीजी को भी पता नहीं था कि मैंने उनसे फूलगोभी के पकौड़े बनाना सीख लिया था. इसी तरह जिला अस्पताल में एक नर्स थीं. जिनका नाम था फ्लोरा सिल्वा. वे केरल की थीं. वे सांवली रंगत की थीं लेकिन उनका स्वभाव बहुत ही मधुर और आत्मीयता से परिपूर्ण था. मां से उनकी अच्छी मित्रता थी. हम दोनों बहनें उन्हीं से इंजेक्शन लगवाना पसंद करती थीं. क्योंकि उनका हाथ इतना सधा हुआ था कि हमें तनिक भी दर्द नहीं होता था. बचपन में हामिद बेग कम्पाउण्डर अंकल के बाद इंजेक्शन के मामले में फ्लोरा आंटी हमारी पहली पसंद थीं. फ्लोरा आंटी ने ही सबसे पहले हमें कटहल के पकौड़े खिलाए थे. इससे पहले हमने कटहल के पकौड़े कभी नहीं खाए थे. मां ने फ्लोरा आंटी से कटहल के पकौड़े बनाना सीखा और उसके बाद हमारे घर भी कटहल के पकौड़े बनने लगे. यद्यपि उसे बनाने में कुछ अधिक समय लगता था. यूं भी मुझे कटहल पसंद नहीं है इसलिए मुझे उसे सीखने में भी कभी रुचि नहीं रही. बदले में मां ने उन्हें कुंदुरू के पकौड़े बनाना सिखाया था. इस तरह देखा जाए तो भजियों-पकौड़ों ने अंतर्राज्यीय मित्रता कायम की और परस्पर एक-दूसरे के रसोईघर में अपनी जगह बना ली.
पहले महानगरों के जीवन पर आधारित कहानियों में ही ब्रेड-पकौड़ों के बारे में अधिकतर पढ़ने को मिलता था. मेरे बचपन में मेरे घर में कभी ब्रेड-पकौड़ा नहीं बना. जब मैंने काॅलेज में दाखिला लिया, तब भी पन्ना शहर में कोई ऐसा होटल नहीं था जिसमें ब्रेड-पकौड़ा मिलता. पहली बार मैंने सतना के बसस्टेंड पर ब्रेड-पकौड़ा खाया था. दरअसल मैं और वर्षा दीदी सुबह की बस से रीवा जा रहे थे. वह बस सुबह साढ़े पांच या छः बजे पन्ना से रीवा के लिए रवाना होती थी. लगभग आठ बजे बस सतना बसस्टेंड पहुंची. हमें भूख-सी लगने लगी थी. मगर बसस्टेंड के धूल-धूसरित वातावरण में खुला रखा खाद्यपदार्थ खाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. तभी वर्षा दीदी की दृष्टि पकौड़ों के ठेले पर पड़ी। कैरोसिन-स्टोव पर ब्रेड-पकौड़े तले जा रहे थे. दीदी बस से उतर कर झटपट दो पकौड़े खरीद लाईं. खौलते तेल से निकले ताजे पकौड़े हर तरह के प्रदूषण से मुक्त थे. वह ब्रेड-पकौड़ा इतना स्वादिष्ट लगा कि दीदी ने खिड़की से ही आवाज दे कर दो पकौड़े और मंगा लिए. वाकई बेहद नरम और खटमिट्ठी चटनी से भरे हुए ब्रेड-पकौड़े. शायद उनमें पनीर की छीलन भी डाली गई थी. उस दिन के बाद से तो मैं ब्रेड-पकौड़ों पर फिदा हो गई.
पहले चाय-पकौड़े का मुहावरा चलन में नहीं था. भजियों और पकौड़ों के साथ टमाटर, आंवला, धनिया-मिर्च, अमचूर, इमली आदि की चटनी या अचार या फिर दही की चटनी अथवा मठा दिया जाता था. भजिया-पकौड़ों के बाद चाय के बदले कप भर मठा पीने का चलन अधिक था. लेकिन अब चाय के बिना पकौड़ों का मजा अधूरा लगता है. साथ में चटनी भले ही न हो लेकिन पकौड़ों के बाद में चाय जरूरी है. यही तो है कि समय के साथ चलन बदले हैं, मुहावरे बदले हैं लेकिन भजियों-पकौड़ों का बुनियादी स्वाद आज भी वही है. उनका जादुई संसार भी वही है पहले जैसा. बस, बदली हुई जीवनशैली में अब इन्हें खाने का चलन कम होता जा रहा है.
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Sunday, September 11, 2022
संस्मरण | जानवरों के बाड़े-सी आमसभा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
संस्मरण | नवभारत | 11.09. 2022
जानवरों के बाड़े-सी आमसभा
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
चुनाव और आमसभा का चोली- दामन का साथ होता है. चुनाव का समय निकट आते ही प्रत्येक राजनीतिक दल भीड़ जोड़ने की जुगत में लग जाता है. यह कोई आज की बात ही नहीं है, मेरे विचार से देश की स्वतंत्रता के बाद से प्रत्येक आमसभा चुनावों के समय यही परिदृश्य रहता रहा होगा. मैंने अपने अब तक के जीवन में कुल तीन आमसभाएं ही देखी, सुनी हैं, वह भी छोटे शहर या ग्रामीण अंचल में. सबसे पहली आमसभा में मुझे जाने का अवसर मिला था अपनी मां डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका जी के साथ. वे कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थीं. मेरी मां तो ईमानदार एवं समर्पित शिक्षिका थीं. लेकिन उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भारी क्रेज था. उनकी साड़ियों, उनकी हेयर स्टाईल सभी कुछ महिलाओं के बीच चर्चा का विषय बना रहता था. मेरी मां और उनके साथ की शिक्षिकाएं अकसर इस विषय पर बातचीत किया करती थीं. निश्चित रूप से उस दिनों छोटे शहरों की महिलाएं भी इंदिरा जी जैसी हेयरस्टाईल रखने के स्वप्न देखा करती रही होंगी, जो वास्तविक में उनके लिए संभव नहीं था. मैं उस समय छोटी थी. स्कूल में पढ़ती थी. मुझे याद है कि जब यह पता चला कि इंदिरा गंाधी पन्ना में एक आमसभा में आने वाली हैं तो हमारे घर में ही मां की पांच-छः महिला सहकर्मियों की एक छोटी-मोटी टी-पार्टी हो गई. पार्टी में इस पर विचार-विमर्श किया गया कि उस आमसभा में कैसे पहुंचा जाए. उन दिनों पन्ना में मात्र पैडल रिक्शा चला करते थे और एक रिक्शे पर अगर तन्दुरुस्त सवारी हुई तो दो, यदि दुबली-पतली सवारी हुई तो तीन ही बैठ पाती थीं. सो, तय हुआ कि चार रिक्शे कर लिए जाएंगे क्यों कि मां ने स्पष्ट बता दिया कि मैं अपने साथ अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाऊंगी. यानी एक रिक्शे पर दो महिलाओं के साथ मुझे और वर्षा दीदी को भी सवारी करनी थी अतः तीसरी महिला के लिए उसमें गुंजाइश नहीं थी. उसमें भी हम दोनों को सीट के सामने लगी लकड़ी की पट्टी पर बैठना था. मां चाहती थीं कि हम दोनों बहनें उस ‘‘लौह महिला’’ को देखें. यह बात और है कि ‘‘आयरन लेडी’’ की उपाधि बाद में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थ्रेचर को दी गई लेकिन वास्तविक ‘लौह महिला’ निःसंदेह इंदिरा गांधी ही थीं. क्योंकि भारतीय राजनीति पर दीर्घकाल तक अपना प्रभाव जमाए रखने का काम एक लौह महिला ही कर सकती थी. बहरहाल, नीयत तिथि पर पर हम लोग सभा-स्थल पर पहुंचे. अपार जनसमूह था. ऐसा लग रहा था कि मानो पूरा पन्ना शहर ही नहीं वरन पूरा पन्ना जिला सभा स्थल में उमड़ पड़ा हो. हमें बहुत पीछे जगह मिली थी. उतनी दूर से इंदिरा जी की बहुत स्पष्ट झलक नहीं मिल पा रही थी. फिर भी सभी महिलाएं प्रसन्न थीं कि उन्होंने एक झलक तो पा ली. हम लोग पूरे समय सभा में नहीं रुके. भाषण सुनना हमारा उद्देश्य नहीं था, मात्र देखना उद्देश्य था और वह उद्देश्य पूरा हो गया था. शीघ्र ही हम अपने घर लौट आए. तब मुझे पता नहीं था कि यह भी मेरी मां और उनकी सखियों की योजना का एक हिस्सा था. हमारे घर में चाय-भजियों का दौर चलता रहा. लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद हम दोनों बहनों को घर के बाहर खड़े होने को कहा. बल्कि हमारे लिए मां ने दो कुर्सियां भी रख दी थीं और उन पर खड़ी करते हुए कहा था कि,‘‘देखना गिरना नहीं, सम्हल कर खड़ी रहना. अभी इंदिरा जी सर्किटहाउस जाएंगी और फिर कुछ ही देर में वहां से लौटेंगी भी, तब हम उन्हें फिर से देख सकेंगे.’’ तो सभास्थल से जल्दी लौट आने के पीछे यह थी योजना.
चूंकि जहां हमारा घर था हिरणबाग में, वह ठीक उस जगह पर था जहां से सर्किटहाउस के लिए रास्ता पहाड़ी की ओर चढ़ता था. उन दिनों उस रास्ते के किनारे कोई घर नहीं बने थे अतः दूर तक हम लोग उस रास्ते पर आने-जाने वालों को देख पाते थे. सचमुच कुछ देर बाद इंदिरा जी की कार उस रास्ते से गुजरी. उनके सर्किट हाउस जाते समय हमें निराशा हाथ लगी क्योंकि वे विपरीत दिशा में बैठी थीं किन्तु उनकी वापसी पर वे हमारी दिशा में ही थीं. तब हमने उन्हें देखा भी और हाथ हिला-हिला कर उनका अभिवादन भी किया.
दूसरी आम सभा बहुत बाद देखने को मिली. उन दिनों मैं दमोह में बीए फाईनल में पढ़ रही थी. उस दौरान हम स्टूडेंट्स को पता चला कि देश के दिग्गज नेता चंद्रशेखर वहां आमसभा करने आने वाले हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उनके भाषणों की भी बहुत प्रशंसा की जाती थी. उस समय चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री नहीं बने थे और कई लोग उनके भाषणों के मुरीद थे. मेरे सहपाठियों में दो-तीन को छोड़ कर राजनीतिक विषयों अथवा समसामयिक विषयों में किसी की तनिक भी रुचि नहीं थी. जब मैंने उनसे आमसभा में चलने को कहा तो सबने मना कर दिया. बस, सखी धर्म निभाती हुई मेरी मात्र एक सहेली मेरे साथ चलने को सहमत हुई. सो, मैंने और मेरी सहेली रीता धगट ने आमसभा में जाने का निर्णय किया. सभा दोपहर को थी और हमारा काॅलेज सुबह के समय का रहता था. काॅलेज के बाद हम दोनों वहां पहुंचीं. चंद्रशेखर जी का कुछ देर भाषण सुना. किन्तु पता नहीं क्यों मुझे उनका भाषण उतना प्रभावी नहीं लगा जितना कि मैंने सुन रखा था और सोच रखा था. संभवतः मैंने कुछ अधिक उम्मींद लगा ली थी. रीता को यूं भी भाषणबाजी में रुचि नहीं थी, वह तो मेरा साथ देने वहां पहुंच गई थी. उस दिन की आमसभा की उपलब्धि यह रही कि हमने सभास्थल के बाहरी हिस्से में खड़े चाट के ठेले पर जी भर कर चाट खाई. रीता ने तीखे गोलगप्पे भी खाए थे पर मैंने नहीं. क्योंकि मुझे गोलगप्पों के उस पानी से समस्या हो जाती है जिसमें बार-बार नंगे हाथों को डुबाया जाता है. मुझे तो लगता था कि मैं बाजार के गोलगप्पे कभी खा ही नहीं सकती हूं. फिर एक बार एक बड़े माॅल में गोलगप्पे खाने पड़ गए. डरते-डरते मैंने गोलगप्पे खाए कि अब तो पक्का बीमार पडूंगी. लेकिन आश्चर्य की बात थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ. तब मेरा ध्यान गया कि वहां के कर्मचारी दस्ताने पहने हुए थे, उस पर भी गोलगप्पे के पानी में बार-बार हाथ डुबाने के बजाए एक डिस्पोजल गिलास में पानी भर कर गोलगप्पों के साथ दे रहे थे. उस दिन मुझे समझ में आ गया कि गड़बड़ी कहां थी. नंगे हाथों को गोलगप्पे के पानी में बार-बार डुबाने से पानी में जो प्रदूषण पनपता होगा उससे मुझे फूडप्वाइजन होने लगता था. हां, तो हम लोगों ने उस दिन जम कर चाट खाई और इस तरह आमसभा के आनन्द की भरपाई की.
तीसरी आमसभा एक बार फिर पन्ना में देखने को मिली जिसने आमसभाओं में नेताओं और आम जनता के बीच की बढ़ती दूरियों को दिखा दिया. उस समय मैं पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश कर चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आने की सूचना मिली. वे पन्ना के एक ग्रामीण क्षेत्र में आने वाले थे. हमारे प्रवेश-पत्र जारी कर दिए गए. सूचना प्रकाशन विभाग की एक तयशुदा गाड़ी में हम कुछ पत्रकारों को सभा स्थल में पहुंचना था. यद्यपि देश की बड़ी-बड़ी समाचार ऐजेंसियों से भी बड़े-बड़े पत्रकार वहां पहुंचने वाले थे. सभास्थल पर राजीव गांधी के पहुंचने के लगभग तीन घंटे पहले हमें सभास्थल पर पहुंचा दिया गया. तरह-तरह के डिटेक्टर्स से कड़ी जांच-पड़ताल. वहां पहुंच कर मैं अवाक रह गई. वहां लकड़ी के मोटे-मोटे लट्ठों को आपस में बांध कर अनेक खंड बनाए गए थे. लट्ठे भी ऐसे कि उनके लिए समूचे हरे-भरे खड़े पेड़ों को काटा गया था. एक खंड पत्रकारों के लिए था तो दूसरा वीआईपी व्यक्तियों के लिए के लिए. एक खंड स्थानीय, छोटे नेताओं के लिए और इन सब के पीछे एक बड़ा खंड आम जनता के लिए. आमजनता में भी उतने ही व्यक्यिों को उसमें प्रवेश की अनुमति थी जितने उस खंड में समा सकें. शेष को बहुत दूर खड़े रहने की छूट थी. राजीव गांधी के सभास्थल पर पहुंचने के ठीक एक घंटे पहले सभी खंड लकड़ी के लट्ठों से ‘‘लाॅक’’ कर दिए गए. पुलिस बलों के अतिरिक्त पैरा मिलिट्री फोर्स भी वहां थी. विचित्र माहौल था. मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम सभी को जानवरों के बाड़े में जानवरों की भांति कैद कर दिया गया है. इससे पहले जिन दो आम सभाओं का मुझे अनुभव था उसमें इस तरह की व्यवस्था नहीं थी. मंच से लगभग दस मीटर की दूरी के बाद से ही आमजन के लिए पूरा मैदान समान रूप से खुला रहता था. किन्तु राजीव गांधी की सभा में ऐसा नहीं था. उस समय इस बाड़ाबंदी ने मेरे मन को भारी ठेस पहुंचाई थी. मुझे प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिल गया था कि किस प्रकार आमजन से बड़े नेताओं की दूरियां बढ़ने लगी हैं. हो सकता है कि इसे पहले इंदिरा जी के मारे जाने और तत्कालीन आतंकी गतिविधियों के भय के कारण इस प्रकार की व्यवस्था की गई हो. फिर भी जन के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि के सामने जन को बाड़े में बंद रखा जाए, यह लोकतांत्रिक स्वरूप उस समय मेरे लिए हजम करना कठिन था. इसके बाद मैं और किसी आमसभा में नहीं गई. मेरा मन भी नहीं हुआ. अब तो टीवी के पर्दे पर ही आमसभाओं की बारीकियां देखने को मिल जाती हैं, ‘‘विथ स्पेशलिस्ट्स स्पेशल कमेंट’’. जिसमें ढेर सारे कामर्शियल ब्रेक्स के साथ आग उगलती बहसों की कांव-कांव भी शामिल रहती है.
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Sunday, September 4, 2022
संस्मरण | कॉमरेड का आकर्षण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
संस्मरण | नवभारत | 04.09. 2022
कॉमरेड का आकर्षण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
उस दिन सुबह जब समाचारपत्र में 30 अगस्त 2022 को मिखाइल गोर्बाचोव के निधन होने का समाचार पढ़ा तो स्मृति के कई पन्ने अपने आप खुलने लगे। वे सोवियत संघ के अंतिम नेता थे।
जिन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ रही थी उन दिनों लगभग हर दस में से एक विद्यार्थी साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित रहता था। उन दिनों "कामरेड" शब्द किसी बहुप्रचलित मुहावरे से कम नहीं था। उन दिनों भारत और सोवियत संघ के बीच बहुत गहरी मित्रता थी। अनेक सोवियत पत्र-पत्रिकाएं देश के छोटे-छोटे शहरों, गांवों और कस्बों तक उपलब्ध रहती थीं। बहुत बड़ी मात्रा में रूसी साहित्य बहुत ही कम कीमत में और बहुत सुंदर छपाई में उपलब्ध हो जाता था, वह भी हिंदी में। जब मैं बीए प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी उन दिनों मैंने टॉल्सटाय का उपन्यास "अन्ना करेनिना" पहली बार पढ़ा था। इसके बाद तो उसे कई बार पढ़ा। दोस्तोएव्स्की का "अपराध और दंड", गोर्की का उपन्यास "मां" तथा गोर्की की आत्मकथा पढ़ी। लेव टॉल्सटाय, फ्योदोर दोस्तोएव्स्की और गोर्की के अतिरिक्त अलेक्सांद्र पुश्किन, मिख़ाइल लेर्मोन्तोव, इवान तुर्गनेव, एंटोन चेखव, बोरिस पास्तरनाक,अन्ना अख़्मातोवा, मरीना त्सवेताएवा, मिखाईल शोलोखोव आदि का साहित्य मैंने पढ़ा। उस दौरान व्लादीमीर इल्यिच लेनिन की जीवनी और उनकी लिखी किताबें "क्या किया जाना चाहिए?", "लोकतांत्रिक क्रांति में सामाजिक लोकतंत्र की दो रणनीतियां" तथा "राज्य और क्रांति" पढ़ी थीं। कार्ल मार्क्स की "पूंजी" और "कम्युनिस्ट घोषणा पत्र" भी उसी दौर में पढ़ी थी। ये सारी किताबें मैंने खरीद कर पढ़ीं थीं और इन्हें खरीदना इसीलिए संभव हो सका था क्योंकि इनकी कीमत बहुत कम रहती थी और इन्हें खरीदने से मां कभी रोकती नहीं थीं। मैं दो पत्रिकाएं भी डाक से मंगाया करती थी। एक "सोवियत संघ" और दूसरी "सोवियत नारी"। दोनों का चिकना ग्लेज़्ड कागज और सुंदर फोटोग्राफी मन मोह लेती थी। मैं पूरे ध्यान से दोनों पत्रिकाएं पढ़ती थी और उन्हें सहेज कर भी रखती थी। मेरे पास बहुत सारे अंक इकट्ठे हो गए थे। वह तो जब पन्ना से सागर स्थान परिवर्तन करना पड़ा तो उस समय बचपन से सहेज कर रखी गईं ढेर सारी कॉमिक्स और यह दोनों सोवियत पत्रिकाएं छोड़नी पड़ीं। फिर भी किताबें में अपने साथ सागर ले आई थी। काफी अरसे तक रूसी लेखकों की वे किताबें मेरे पास रहीं। लेकिन एक बार एक चूहे ने उन्हें कुतर दिया और उसके बाद वह किताबें रद्दी में बेचनी पड़ीं। जिसका आज भी मुझे बहुत दुख है। उन किताबों की गंध और छुअन आज भी मैं भूली नहीं हूं। एक बार मेरी भी एक कहानी "सोवियत नारी" में प्रकाशित हुई थी और जाहिर है कि वह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी का दिन था। मैंने अपने सारे परिचितों को वह अंक दिखाया था। एक विदेशी पत्रिका में कहानी छपना और वह भी सोवियत पत्रिका में, उस समय बड़ी शाबाशी की बात थी। पारिश्रमिक की रकम भी उससे बहुत बड़ी थी, जो भारतीय अखबार उन दिनों रचनाओं के पारिश्रमिक के रूप में दिया करते थे। दोनों पत्रिकाओं की ओर से 15 दिसंबर तक नए साल का बेहद खूबसूरत कैलेंडर आ जाया करता था। उन कलैंडर्स के लिए पोस्टमैन को अलग से निवेदन करना पड़ता था ताकि वह किसी और को न दे दे।
उन दिनों मैं और मेरे कुछ मित्र जिनमें पन्ना से बाहर के अधिक थे और साम्यवादी विचारधारा के थे, आपस में पूंजीवादी विरोधी तर्क और बहस किया करते थे। उन दिनों फोन तो हर किसी की पहुंच में था नहीं अतः हम लोग एक दूसरे को लंबे-लंबे पत्र लिखकर साम्यवाद और पूंजीवाद पर अपने-अपने विचार प्रकट करते थे। हमारी चिट्टियां "कॉमरेड" संबोधन से शुरू होती थीं और "लाल सलाम" पर खत्म होती थीं। जब कभी मां के साथ भोपाल जाने का अवसर मिलता तो मैं न्यू-मार्केट के उस सब-वे पर अवश्य जाती जहां हिंदी में अनूदित सोवियत किताबें मिलती थीं। अधिकांश किताबों का अनुवाद अमृत राय और मदनलाल "मधु" द्वारा किया गया होता था।
जब मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष में थी, तब डॉ कमला प्रसाद जी से मुझे साम्यवाद के भारतीय स्वरूप को समझने में मदद मिली। कमला प्रसाद जी के छोटे भाई और उनके भाई की पत्नी वे दोनों भी साम्यवादी विचारधारा के थे। उनके छोटे भाई उन दिनों छतरपुर के महाराजा कॉलेज में कार्यरत थे। पन्ना में प्रगतिशील लेखक संघ के द्वारा एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी जिसमें कमला प्रसाद जी तथा उनके भाई और भाई बहू तीनों आए थे। यद्यपि कुछ समय बाद यह दुखद खबर मिली थी कि उनके भाई ने सपत्नीक आत्महत्या कर ली थी। कारण पता नहीं चला था। इस घटना ने काफी दिन तक मेरे मन को विचलित रखा था क्योंकि दोनों से मैं मिल चुकी थी, दोनों प्रबुद्ध थे और बहुत सरल, सहज स्वभाव के थे।
उसी दौरान बांदा (उप्र) के एक पत्रकार (दुख है कि मुझे उनका नाम याद नहीं है) वर्षा दीदी से मिलने आए और उन्होंने दीदी को निकोलाई आस्त्रोवस्की की "अग्निदीक्षा" पुस्तक भेंट की। दीदी ने तो उसे सरसरी तौर पर पढ़ा लेकिन मेरे लिए वह जीवनदर्शन बन गई। "अग्निदीक्षा" एक ऐसे सैनिक की जीवन कथा थी जो द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन सेना के विरुद्ध लड़ते हुए अपने दोनों पैर गंवा बैठा था। उड़ान भरने के अलावा उसके जीवन का और कोई सपना नहीं था, लेकिन दोनों पैर गंवाने के बाद यह संभव भी नहीं था। लंबे समय तक सेना के अस्पताल में रहने के दौरान उसने स्वयं को मानसिक रूप से तैयार किया और अपनी शारीरिक क्षमताओं को उस सीमा तक बढ़ाया जो उसके दर्द की सहन करने की सीमा से भी आगे था। एक दिन वह अपने नकली पैरों के सहारे फिर से पायलट बनने के सपने को पूरा कर सका। उसका संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ युद्ध समाप्त होते-होते उसकी आंखें कमजोर होने लगीं। फिर भी उसने हार नहीं मानी और न केवल एक लड़की को सहारा दिया बल्कि स्वयं भी उसने एक किताब लिखी। जबकि बेहद कमजोर आंखों के साथ लिखना उसके लिए सबसे दुष्कर कार्य था। इस पुस्तक ने उस समय मुझे संघर्ष करने का जो पाठ पढ़ाया वह आज तक मेरे काम आ रहा है। मैंने इस कथानक से यही सीखा था कि स्थिति कितनी भी विपरीत क्यों न हो कभी हार नहीं माननी चाहिए।
उस दौर के प्रसिद्ध साम्यवादी नेता होमीदाजी से मिलने का भी मुझे अवसर मिला था। बहुत ही सादगी से रहने वाले व्यक्ति थे। उस समय मैं एक विद्यार्थी ही थी अतः होमीदाजी ने मुझसे पूछा था कि "तुम जनता के बारे में क्या समझती हो, कौन है जनता?" सुनने में यह प्रश्न सरल था लेकिन उत्तर उतना ही कठिन था। मैं हड़बड़ा गई कि क्या उत्तर दूं। तब उन्होंने मुझसे कहा था कि "जब तक तुम आम लोगों के नजदीक नहीं जाओगी, उनके जीवन के दुख दर्द नहीं समझोगी, तब तक यह नहीं समझ पाओगी कि जनता क्या है?" उनका यह वाक्य मुझे उस दौरान कई बार याद आया था जब मैं बीड़ी श्रमिक महिलाओं पर अपनी किताब "पत्तों में कैद औरतें" लिख रही थी। सचमुच मैं उन महिला श्रमिकों के पास पहुंच कर ही उनकी कठिनाइयों को महसूस कर सकी थी।
बुंदेलखंड के साम्यवादी विधायक कपूरचंद घुवारा से कई बार मिलने का अवसर मिला। उन दिनों जब मैं ऐसे लोगों से मिलती थी तो अपना परिचय देते हुए शान से कहती थी कि "मैं कॉमरेड शरद सिंह"। अपना यह परिचय देते हुए मुझे बहुत अच्छा लगता था। उस समय स्वयं को बहुत जिम्मेदार और गंभीर महसूस करती थी। लेकिन वास्तविक जिम्मेदारियों और मुश्किलों की बढ़त के साथ जिंदगी की बहुत सारी सच्चाइयां सामने आती गईं, जिससे धीरे-धीरे हर तरह के "वाद" के प्रति मेरा आकर्षण कम होता गया।
मुझे अच्छी तरह याद है कि सन 1986 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव पहली बार भारत आए थे। रेडियो पर आकाशवाणी से उनके आगमन का आंखों देखा हाल सुनाया जा रहा था। जबकि पिछले दो दिन से हमारे घर में नल में पानी नहीं आया था और संयोग यह कि जब आंखों देखा हाल सुनाया जा रहा था ठीक उसी दौरान तब नल में पानी सप्लाई किया जा रहा था। चूंकि उस पूरे क्षेत्र में एक साथ कई नल खुले हुए थे और उनमें भी कुछ नलों में मोटर का इस्तेमाल किया जा रहा था इसलिए पानी की बहुत पतली धार आ रही थी। अतः जितनी देर में मिखाईल गोर्बाचोव की आगवानी की गई, उतनी देर में एक टंकी पानी भी नहीं भर पाया था। देखा जाए तो यह व्यवस्था का वह चेहरा था जिसे किसी "वाद" के खांचे में नहीं रखा जा सकता था। धीरे-धीरे में कामरेड शरद सिंह से एक बार फिर सिर्फ शरद सिंह बन गई। जो जीवन मेरे सामने था उसके खुरदरी सच्चाइयां मुझे बिना किसी वाद के सहारे स्वीकार करनी थी और उनका सामना करना था। उस समय मेरा मन भी "पेरेस्त्रोइका" की ओर चल पड़ा था। विचारधाराओं की कट्टरता की कड़ियां खुलने लगी थीं। इन कड़ियों को खोलने में जॉर्ज ऑरवेल की "1984" का भी बड़ा योगदान रहा। इसके बाद ऑरवेल की "एनिमल फार्म" भी पढ़ी। लेकिन "1984" पुस्तक ने दिल-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी।
वस्तुतः दबाव चाहे किसी भी विचारधारा का हो आम जनता के लिए उचित नहीं होता है। जब आम जनता अपने मौलिक अधिकारों के साथ रहती है तभी वह सही तरीके से जी पाती है। साम्यवाद और पूंजीवाद का संतुलित स्वरूप ही उसके लिए उत्तम होता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है। आज "कामरेड" या "लाल सलाम" जैसे शब्द मेरे जीवन में महाविद्यालयीन जीवन के साथ ही बहुत पीछे छूट गए हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि उस दौर में मैंने साम्यवाद और पूंजीवाद को भलीभांति न समझा होता अर्थात उन दोनों राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं की बारीकियों को नहीं समझा होता, तो आज शायद लोकतंत्र के बारे में मैं इतने अच्छे से नहीं समझ पाती।
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Sunday, August 28, 2022
संस्मरण | कविता का वशीकरण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
संस्मरण | नवभारत | 28.08. 2022
कविता का वशीकरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
वह दिन मैं कभी भूल नहीं सकती, जब मां ने स्कूल से लौट कर बताया कि आज एक पुराने परिचित घर आने वाले हैं। वर्षा दीदी ने पूछा कि कौन हैं वे? उन दिनों मैं शायद आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। मुझे भी जिज्ञासा हुई।
‘‘बहुत बड़े कवि हैं। तुम लोग उनकी कविताएं अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ती हो।’’ मां तो इतना कह कर नाश्ता-पानी के जुगाड़ में लग गईं। उन दिनों हमारे घर में चाय का चलन नहीं था। मां बुंदेली संस्कृति में रच-बस चुकी थीं। यद्यपि मालवा उनके मन और जीवन से गया नहीं था। घर में साड़ी के बजाए मालवी स्टाईल की लहंगा-चुन्नी पहनना पसंद करती थीं। आखिर अपनी जन्मभूमि को कोई कैसे भुला सकता है? वे मालव कन्या थीं। ‘‘मालविका’’ थीं। उनको यह उपनाम डाॅ. श्याम परमार ने उनकी लेखकीय प्रतिभा को देखते हुए दिया था। मजे की बात यह कि वर्षा दीदी का जन्म रीवा में हुआ था इसलिए वे स्वयं को ‘‘बघेली कन्या’’ कहा करती थीं। जबकि मेरा जन्म विशुद्ध बुंदेलखंड में पन्ना में हुआ सो मैं जन्मजात ‘‘बुंदेली कन्या’’ बन गई। तो, मैं बता रही थी नाश्ते के बारे में। तब बुंदेलखंड में अतिथि के लिए नाश्ते में पोहा नहीं बनाया जाता था। आमतौर पर घरों में सलोनी, पपड़िया, सेव आदि बना कर रख लिए जाते थे, यानी ये नाश्ते हमेशा मौजूद रहते थे। मां भी रविवार की छुट्टी में खाना बनाने वाली बऊ के साथ मिल कर इस तरह के आईटेम बना कर रख लिया करती थीं। लेकिन यदि किसी को नाश्ता ताज़ा बना कर कराना होता था तो भजिए और गुलगुले तले जाते। साथ में चिप्स और पापड़ भी रहते। पोहा हमारे घर उन दिनों कभी-कभार ही बनता था। लेकिन उस दिन मां पोहा बनाने में जुट गईं। घर में आलू, प्याज और धनिया पत्ती के अलावा और कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसे पोहे में डाला जा सकता था। उन दिनों पन्ना में हरी मटर सिर्फ़ सीजन में ही मिलती थी और हमारे फ्रिज होने का सवाल ही नहीं था। उस समय फ्रिज घोर विलासिता की वस्तु थी, अतः हम तो उसे ‘अफोर्ड’ करने की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। सो, डिब्बाबंद मटर भी घर में नहीं रख सकते थे। खैर उस समय मैंने ये सब नहीं सोचा होगा लेकिन अब उन दिनों को याद करती हूं तो उन दिनों के अभाव और उपलब्धता सभी कुछ याद आते हैं।
लगभग आधे घंटे बाद कुंडी खटखटाने की आवाज़ आई। सबसे पहले भाग कर मैं ही दरवाज़े पर गई। सामने देखा तो चकाचक सफेद धोती-कुर्ता पहने एक सज्जन खड़े थे। कुर्ते के ऊपर जैकेट और एक कंधे पर खादी का एक झोला।
‘‘ये मालविका जी का घर है न?’’ उन्होंने मुझसे प्रश्न किया। मैंने अपनी मुंडी हिला कर हामी भरी ही थी कि मां और वर्षा दीदी आ गईं।
‘‘आइए-आइए! बेटा इन्हें प्रणाम करो! ये श्रीकृष्ण सरल जी हैं, जिनकी कविताएं तुम लोगों ने याद कर रखी हैं।’’ मां ने परिचय कराया। ‘‘श्रीकृष्ण सरल’’ यह नाम सुन कर तो मैं अवाक हो कर उनकी ओर देखती रह गई। वे मुझे बिलकुल अपने नानाजी की तरह लगे। नानाजी भी सफेद धोती-कुर्ता पहनते थे। वे काफी देर हमारे घर पर रुके। उन्होंने नाश्ता किया और अपनी दो-तीन लम्बी-लम्बी कविताएं सुनाईं। जितना ओज उनकी कविताओं में था उतना ही ओज उनके काव्य-पाठ में था। उन्होंने हम दोनों बहनों को अपनी एक-एक गीत-पुस्तक भी भेंट की। यद्यपि उनकी वे पुस्तकें तो हमने चार दिन बाद पढ़ीं। साक्षात उनके मुख से देशभक्ति में डूबा गौरवगान सुनने के बाद ओजपूर्ण गीतों का जो असर हम दोनों बहनों पर हुआ, उसके कारण हम दोनों बहनें चार दिन तक ‘सरल’ जी जैसी कविता लिखने के प्रयास में जुटी रहीं। देखा जाए तो यह बचपना ही था क्योंकि देशभक्ति पूर्ण कविताएं तभी लिखी जा सकती हैं जब देश प्रेम की भावनाएं मन में हिलोरें ले रही हो। ऐसी कविताएं अंतःकरण से उपजती हैं, सुने-सुनाए आधार पर नहीं। बहरहाल, हमने जो कविताएं लिखीं, उन्हें मां ने देखा-पढ़ा। वर्षा दीदी की कविताओं में मां ने आवश्यक सुधार भी किए। मगर मैं बचपन से ही अड़ियल किस्म की रही हूं। मुझे अपनी रचनाएं जंचवाना पसंद नहीं था। मैंने मां को पढ़ने तो दी लेकिन सुधारने नहीं दी। मां ने भी सुधारने पर जोर नहीं दिया क्योंकि वे जानती थीं कि यदि वे जोर देंगी तो मैं अपनी कविताएं फाड़ कर फेंक दूंगी। वह तो मेरी आदत में तब थोड़ा परिवर्तन आया जब मैंने सन् 2004 में अपना पहना उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ लिखा। यह 2005 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास की पांडुलिपि वर्षा दीदी को इस वार्निंग के साथ पढ़ने को सौंपी थी कि इसमें जो भी गड़बड़ी आपको लगे उसे आप अलग नोट करिएगा। पांडुलिपि में काटा-पीटी की जरूरत नहीं है। दीदी तो बचपन से ही देखती आई थीं कि गलती निकाले जाने पर मैं किस तरह अपनी रचना का अंतिम संस्कार कर देती हूं अतः उन्होंने मेरी वार्निंग का पूरा ध्यान रखा। कहने का आशय यह कि श्रीेकृष्ण ‘‘सरल’’ जी की कविताएं सुन कर जुनून में आ कर मैंने जो कविता लिखी थी उसे मैंने उस वर्ष 26 जनवरी के समारोह में सुना कर दम लिया। मैंने भरसक प्रयास भी यही किया था कि मैं ‘‘सरल’’ जी की भांति अपनी कविता का पाठ करूं। स्कूल में मां के अलावा किसी को कविताकला का विशेष ज्ञान नहीं था इसलिए सभी से मुझे प्रशंसा मिली। यह तय है कि मां ने जरूर अपना सिर पीटा होगा मेरी कविता सुन कर।
इसी तरह का कविताई का एक बार और जूनून हम दोनों बहनों पर सवार हुआ था। तब मैं बीए फस्र्टईयर में पढ़ रही थी। एक रचनाकार के रूप में मेरी पहचान बनती जा रही थी। उन दिनों पन्ना में जबलपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार आया करते थे, जिनमें मेरी और दीदी की रचनाएं प्रकाशित होती रहती थींे। दीदी ने उन दिनों कुछ मंचों पर भी काव्यपाठ करना शुरू कर दिया था। यद्यपि मंचों का गिरता स्तर देख कर यह सिलसिला बहुत लम्बा नहीं चला। दीदी का कंठ बहुत मधुर था। उनमें अपनी आवाज से श्रोताओं को बांध लेने की क्षमता थी लेकिन मंचीय लटके-झटके उन्हें नहीं आते थे और मां को भी वह सब पसंद नहीं था। कुछ श्रेष्ठ मंचों पर श्रेष्ठ कवियों से भी भेंट हुई और आत्मीयता के तार जुड़े। जिनमें से एक थे बुंदेलखंड के ख्यातनाम कवि डाॅ. अवधकिशोर जड़िया जी। उन दिनों उनके घनाक्षरी छंदों की बड़ी धूम थी। बहुत ही सहज और सरल स्वभाव के हंसमुख व्यक्ति। अब तो उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। जिस समय की मैंने घटना बता रही हूं, उन दिनों बारिश के बाद और ठंड के आगमन से पहले का मौसम था। इसीलिए हम लोग घर के आगे वाले बरामदे में सो रहे थे। यही कोई सुबह के चार बजे का समय था। ऐसा लगा कि कोई दीदी का नाम ले कर जोर-जोर से पुकार रहा है। मां, दीदी और मैं तीनों हड़बड़ा कर उठ बैठे। सुबह की नींद यूं भी गहरी होती है अतः एकदम से कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ है? मां ने लपक कर लाईट जलाई। तब हमने देखा कि सामने डाॅ.अवधकिशोर जड़िया जी खड़े हुए थे।
‘‘सुप्रभात! देखो मैंने जगा दिया न सबको।’’ वे हंसते हुए बोले। फिर कहने लगे,‘‘अभी कवि सम्मेलन खत्म हुआ है। मैं सीधा वहीं से चला आ रहा हूं। मेरी बस छः बजे की है। अगर मैं आप लोगों से बिना मिले चला जाता तो आप लोग नाराज हो जाते।’’
‘‘हां-हां, बैठो न भैया!’’ मां ने तत्काल एक खाट का बिस्तर ठीक-ठाक किया और कहा। वे इत्मिनान से बिस्तर पर आलथी-पालथी मार कर बैठ गए। फिर दीदी से साधिकार बोले,‘‘जाओ वर्षा बेटा झटपट चाय तो बना लाओ!’’
चाय पीने के बाद वे हम लोगों को बताने लगे कि उन्होंने कविसम्मेलन में कौन-कौन सी कविताएं सुनाईं हैं। हम लोग भी उत्सुकता से उनकी कविताएं सुनने लगे। उन्होंने अपने बेहतरीन अंदाज में अपनी घनाक्षरियां सुनाईं। लगभग साढ़े पांच बजे वे छतरपुर की बस पकड़ने के लिए रवाना हो गए। लेकिन सुबह-सवेरे के कोरे-ताजे दिमाग में घनाक्षरी छंदों की गूंज ऐसी बैठी कि दो दिन तक हम दोनों बहनें घनाक्षरी लिखने में जुटी रहीं। जब हम लोगों ने जी भर की घनाक्षरियां लिख लीं और यह समझ में आ गया कि अब इससे अधिक नहीं लिखा जा सकता है, तब कहीं जा कर वह जुनून हम दोनों के सिर से उतरा।
सच तो यह है कि श्रीकृष्ण ‘‘सरल’’ और डाॅ. अवधकिशोर जड़िया जी के काव्य में जो पूर्णता (परफेक्शन) थी, उसने हमें वशीभूत कर लिया था। इतना गहरा असर और किसी के काव्यपाठ ने मुझ पर नहीं डाला। आज मैं इन दोनों घटनाओं के महत्व को समझ पाती हूं कि जिस रचना में पूर्णता होती है और जिस रचनाकार में सृजन के प्रति समर्पण (डिवोशन) होता है, उसी की प्रस्तुति सुनने वाले को सम्मोहित कर पाती है। यद्यपि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इन दोनों रचनाकारों के पहले या बाद में जिन कवि या कवयित्रियों की रचनाएं मैंने सुनीं वे प्रभावी नहीं थीं लेकिन इन दोनों कवियों के काव्य और प्रस्तुति में कुछ तो विशेष था जिसने मन को गहरे तक आंदोलित किया और दो-चार दिन तक हमारे मन मस्तिष्क को वशीभूत रखा।
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