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Friday, October 31, 2025

शून्यकाल | प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल 
जन्मदिन विशेष 
प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

      स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल एक सच्चे देशभक्त थे। आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में उन्होंने भारतीय गणराज्य में रियासतों के एकीकरण का दुरूह कार्य जिस कुशलता से कर दिखाया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। स्वभाव से वे निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासनप्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय गुण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था तथा देश सेवा उनकी साधना थी। उनका राजनैतिक योगदान देश के व्यापक हित से जुड़ा हुआ होने के कारण ही उन्हें ‘भारतीय बिस्मार्क’ भी कहा जाता है।


   वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते।
       सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। करमसाड गांव के आस-पास दो उपजातियों का निवास था- लेवा और कहवा। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के पुत्रों लव और कुश से मानी जाती है। वल्लभ भाई पटेल का परिवार लव से उत्पन्न लेवा उपजाति का था जो पटेल उपनाम का प्रयोग करते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्रा नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े। नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
        बचपन से ही संषर्घमय जीवन व्यतीत करने के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्वभाव में कठोरता तो आई ही थी, साथ ही साथ कठिन से कठिन समस्याओं को सहज ढंग से सुलझाने की क्षमता का भी विकास उनमें हुआ था। उनके स्वभाव में गम्भीरता थी और इच्छाशक्ति में लोहे जैसी मजबूती। वल्लभ भाई बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे किन्तु उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इंग्लैंड जा सकें। उन्होंने वकालत करके धन जोड़ा और जब इंग्लैंड जाने का समय आया तो उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें पहले इंग्लैंड जाने दें। अनुपम त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वल्लभ भाई ने अपने बड़े भाई को अपने बदले इंग्लैंड जाने दिया और स्वयं उनके लौटने के कुछ समय बाद इंग्लैंड गये।
         इंग्लैंड जा कर उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई अच्छे अंकों से पूरी की। भारत वापस आ कर एक बार फिर वकालत आरम्भ की और वकालत के क्षेत्र में ख्याति एवं प्रतिष्ठा अर्जित की। आरम्भ में वल्लभ भाई महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे किन्तु जब वे गांधी जी के निकट सम्पर्क में आए तो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल अहिंसा एवं सत्याग्रह को अपनाया अपितु पाश्चात्य वस्त्रों को सदा के लिए त्याग कर धोती-कुर्ता की विशुद्ध भारतीय वेश-भूषा अपना ली।
         स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
        महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे।
        वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू के बीच संबंध


सरदार पटेल और नेहरू की प्रकृति में असमानता थी, एक ओर पटेल एक साधारण किसान परिवार से ग्रामीण परिवेश में पले बड़े हुए, वहीं नेहरू को पारिवारिक विरासत का धनी कहा जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति का अनुसरण करके ही कार्य कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है पटेल और नेहरू दोनों के लिए मार्गदर्शी महात्मा गाँधी ही थे और जो कुछ सामंजस्य या वैचारिकता का आदान-प्रदान रहता उसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी, क्योंकि महात्मा गाँधी समय की नजाकत को पहले ही भांप लेते थे। सरदार पटेल भी ऐसा कोई कार्य नहीं करते थे जिससे गाँधीजी को ठेस पहुँचे परन्तु जब मामला राष्ट्रहित का होता या भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए मत भिन्न होता तो वे गाँधीजी को इससे सचेत करते थे और आव यकता होने पर विरोध भी जताते थे। पटेल और नेहरू दोनों को ही आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है और दोनों में अनेक समानताओं के होते हुए भी वैचारिक भिन्नता थी। दोनों में ही राष्ट्र भक्ति, नेतृत्व क्षमता, आदर्शों के प्रति आस्था थी। डॉ. बी.के. केसकर ने कहा था- नेहरू और पटेल दो विरोधी तत्वों का एक ऐसा मिश्रण थे, जो एक-दूसरे के पूरक थे। नेहरू की विचारधारा साम्यवाद से प्रभावित थी जबकि पटेल ने किसी भी विचारधारा को अपने पर हावी नहीं होने दिया। इन विपरीत स्वभावों से जुड़ी दोनों धुरियों को महात्मा गाँधी ने एक साथ बांधे रखने का कार्य किया था। हालाकि सरदार पटेल और नेहरू दोनों का सपना एक मजबूत भारत का निर्माण करना था परन्तु पटेल वास्तविक  एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण से समस्या पर विचार करते थे और प्रत्येक समस्या के भविष्य के परिणामों का अंदाजा लगा लेते थे। उदाहरण के तौर पर जूनागढ़ और हैदराबाद के मामले में पटेल ने नेहरू की इच्छा के विरूद्ध जाकर कार्यवाही की और भारत में मिला लिया। क मीर के मामले में नेहरू ने अपनी अन्तर्राष्ट्रीय नीति के कारण बिना पटेल से विचार विमर्श किए समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए जिसके पटेल सख्त विरोधी रहे और समस्या आज तक बनी हुई है। इसी प्रकार चीन की मित्रता पर भी पटेल ने कभी विश्वास नहीं किया बल्कि संभावित खतरों की ओर पहले ही ईशारा कर दिया था। नेहरू ने 1 अगस्त 1947 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ। इस पत्र का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तम्भ हैं। इसी के उत्तर में पटेल ने नेहरू को लिखा कि एक अगस्त के पत्र के लिए धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग व प्रेम रहा है तथा 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आ है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको इस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी ने नहीं किया है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए में आपका कृतज्ञ हूँ।”
      सरदार पटेल वचन के पक्के तथा सहयोग से काम करने वाले व्यक्ति थे जबकि जवाहरलाल नेहरू महत्वाकांक्षी अधिक थे लेकिन महत्वाकांक्षी होते हुए भी पटेल की योग्यता पर पूर्ण वि वासी थे। गाँधीजी की मृत्यु उपरांत 3 फरवरी 1948 को पं. नेहरू ने पटेल को लिखा-"बापू की अन्तिम अभिलाषा यह थी हम दोनों ने अब तक जिस तरह कन्धे से कन्धा मिलाकर काम किया है, उसी तरह आगे भी करते रहें। हमारे मतभेदों में से भी हमारे बीच महत्व के विषयों में जो मतैक्य है, वह स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है और उसी में से एक दूसरे के प्रति हमारा आदर भाव भी प्रकट हुआ है।"
          वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते। वस्तुतः वल्लभ भाई पटेल के जीवन के बारे में पढ़ना भारतीय संस्कृति एवं भारतीय मूल्यों को पढ़ने के समान है।  
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Wednesday, December 15, 2021

चर्चा प्लस | सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि 15 दिसम्बर विशेष
सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
  सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय राजनीति के एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कठोर निर्णयों पर अमल करते हुए देश का राजनीतिक नक्शा ही बदल दिया। रियासतों में बंटा देश एक झंडे अर्थात् तिरंगे के तले आ गया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। इसके बाद वे समूचे जनमानस के ‘सरदार’ बन कर देश की सेवा करते रहे। बुंदेलखंडवासी इस पर गर्व कर सकते हैं कि ऐसे लौह व्यक्तित्व का  बुंदेलखंड से पुराना नाता रहा है।  
   बुंदेलखंड से लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाता उनके पिता झावेर भाई के समय से रहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। सन् 1857 के पूर्व ही अंग्रेजों के विरुद्ध विभिन्न राज्यों में सुगबुगाहट आरम्भ हो चुकी थी। मराठा नाना साहब एवं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की असम्मानजनक शर्तें मानने से स्पष्ट मना कर दिया था। धीरे-धीरे युद्ध की स्थितियां निर्मित होती जा रही थीं। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्र नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े।
नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
नाना साहब ने अपनी सेना की एक टुकड़ी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल कर दी। इस टुकड़ी में झावेर भाई थे जो रानी लक्ष्मी बाई की सेना के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए झांसी से ग्वालियर की ओर बढ़ रहे थे। उस दौरान झावेर भाई ने बुंदेलखंड में एक योद्धा के रूप में अनेक दिन बिताए। दुर्भाग्यवश, रानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजों से घिर गयीं और वीरगति को प्राप्त हुईं तथा झावेर भाई को इन्दौर के महाराजा की सेना ने बंदी बना लिया। अपनी चतुराई और शतरंज के कौशल के सहारे झावेर भाई महाराजा इन्दौर की क़ैद से आजाद हुए।
स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे। महात्मा गांधी और मोतीलाल नेहरू दोनों ही बल्लभ भाई पटेल पर अगाध विश्वास करते थे। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के बाद अपने एक भाषण में स्वीकार किया था कि -‘‘वल्लभ भाई दांडी में मेरे साथ उपस्थित नहीं हो सके क्यों कि सरकार ने उन्हें बंदी बना कर जेल में डाल दिया था, लेकिन उनका उत्साह और उनकी आशाएं दांडी में जनसमूह के रूप में मेरे साथ थीं। यदि मैं नमक कानून तोड़ने में सफल रहा तो इस सफलता की जमीन वल्लभ भाई द्वारा तैयार की गई थी।’’
वल्लभ भाई महात्मा गंाधी को जितना आदर देते थे, महात्मा गांधी भी उन्हें उतनी ही स्नेह करते थे। वे प्रत्येक मामले में एक बार वल्लभ भाई से सलाह ले लेना उचित समझते थे। महात्मा गांधी जानते थे कि वल्लभ भाई व्यवहारिक दृष्टि से उचित सलाह देंगे। जब से वल्लभ भाई ने स्वदेशी वस्त्रों को अपने पहनावे के रूप में अपनाया था तब से ही महात्मा गंाधी का लगाव वल्लभ भाई के प्रति बढ़ गया था। वे समझ गए थे कि वल्लभ भाई कोई अवसरवादी नेता नहीं हैं, वरन् उनमें नेतृत्व और त्याग की क्षमता जन्मजात है। दांडी-यात्रा की सफलता ने महात्मा गांधी के मन में वल्लभ भाई की छवि को और अधिक प्रखर बना दिया।
सरकार एक आर्डीनेंस निकालकर कांग्रेस की समस्त संगठन को गैर कानूनी घोषित कर चुकी थी और कांग्रेस के अध्यक्ष होने के नाते पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू गिरफ्तार किए जा चुके थे। पं. मोतीलाल जी जेल जाते हुए सरदार पटेल जी को अपना स्थानापन्न नियुक्त कर गए थे। इसलिए 26 जून 1930 को जेल से बाहर आते ही वल्लभ भाई कांग्रेस संगठन को सुदृढ़ करने और सत्याग्रह-संग्राम को तीव्र करने में संलग्न हो गए।
सरदार पटेल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान 1917 में खेड़ा किसान सत्याग्रह, 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1924 में बोरसद सत्याग्रह के उपरांत 1928 में बारदोली सत्याग्रह में देकर अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम की। इसी बारदोली सत्याग्रह में उनके सफल नेतृत्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी और वहां के किसानों ने वल्लभ भाई पटेल को ‘‘सरदार’’ की उपाधि दी। वहीं 1922, 1924 तथा 1927 में सरदार पटेल अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गये। 1930 के गांधी के नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तैयारी के प्रमुख शिल्पकार सरदार पटेल ही थे। 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में सरदार पटेल को अध्यक्ष चुना गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सरदार पटेल को जब 1932 में गिरफ्तार किया गया तो उन्हें गांधी के साथ 16 माह जेल में रहने का सौभाग्य हासिल हुआ। 1939 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब देशी रियासतों को भारत का अभिन्न अंग मानने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया तभी से सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण की दिशा में कार्य करना प्रारंभ कर दिया तथा अनेक देशी रियासतों में प्रजा मण्डल और अखिल भारतीय प्रजा मण्डल की स्थापना करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रजा मण्डल की संकल्पना को अपनाते हुए बुंदेलखंड में भी इसकी इकाइयां गठित की गई थीं। लगातार कठोर परिश्रम ने वल्लभ भाई पटेल के स्वास्थ्य को प्रभावित किया था। स्वास्थ्य खराब होने के बाद भी परिस्थितिवश उन्हें अनेक यात्राएं करनी पड़ीं। लगातार दौरों और विपरीत परिस्थितियों में परहेज संभव नहीं हो पाता था। इन सबका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर पड़ता गया। 15 दिसम्बर 1950 को प्रातः वल्लभ भाई पटेल के सीने में दर्द उठा। तत्काल चिकित्सकों को बुलाया गया। चिकित्सकों ने हरसंभव प्रयास किया किन्तु दुर्भाग्यवश  9 बजकर 37 मिनट पर हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया। सरदार पटेल के निधन का समाचार विद्युतगति से पूरे देश में फैल गया और समूचा राष्ट्र गहरे शोक में डूब गया। उसी दिन सायंकाल उनके एकमात्र पुत्र डाह्याभाई पटेल ने उनके शव को अग्नि को समर्पित किया। शोक संतप्त राष्ट्र ने ‘लौह पुरुष’ को श्रद्धांजलि अर्पित की।
समूचा बुंदेलखंड वल्लभ भाई पटेल का स्मरण करता ही है तथा चैक-चैराहों, तिराहों में उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसी प्रकार सागर संभागीय मुख्यालय की रजाखेड़ी नगरपालिका के बजरिया तिराहे पर भी सरदार वल्लभ भाई पटेल की एक प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा सरदार पटेल के व्यक्तित्व और विचारों का बुंदेलखंड पर प्रभाव का प्रतीक है क्योंकि इस प्रतिमा का निर्माण सन् 2015 में लगभग 6 लाख रुपए के निजी खर्च पर कराया गया। इससे पूर्व लगभग साल भर पहले से प्रतिमा के लिए प्लेटफार्म का निर्माण शुरू कर दिया गया था। प्रतिमा जयपुर से बनवाई गई। इस प्रतिमा का निर्माण एवं स्थापना कुर्मी समाज युवा संगठन के जिलाध्यक्ष विजय पटेल ने अपने पिता स्व. शिब्बू दाऊ पटेल की स्मृति में कराया। विजय पटेल इसका कारण बताते हैं कि वे सदा सरदार पटेल के विचारों से प्रभावित रहे जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। इसीलिए अपने पिता की स्मृति में उन्होंने सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित कराने का निर्णय लिया। वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे, उनके विचार आज भी बुंदेलखंड की विकासयात्रा का पथप्रदर्शन कर रहे हैं।
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Friday, November 15, 2019

बुंदेलखंड से पुराना नाता था सरदार वल्लभ भाई पटेल का - डॉ. शरद सिंह ... नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड से पुराना नाता था सरदार वल्लभ भाई पटेल का
- डॉ. शरद सिंह

(नवभारत में प्रकाशित) 
बुंदेलखंड से लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाता उनके पिता झावेर भाई के समय से रहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। सन् 1857 के पूर्व ही अंग्रेजों के विरुद्ध विभिन्न राज्यों में सुगबुगाहट आरम्भ हो चुकी थी। मराठा नाना साहब एवं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की असम्मानजनक शर्तें मानने से स्पष्ट मना कर दिया था। धीरे-धीरे युद्ध की स्थितियां निर्मित होती जा रही थीं। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्र नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े। 
Navbharat -  Bundelkhand Se Purana Nata Tha Sardar Vallabh Bhai Patel Ka  - Dr Sharad Singh
        नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
नाना साहब ने अपनी सेना की एक टुकड़ी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल कर दी। इस टुकड़ी में झावेर भाई थे जो रानी लक्ष्मी बाई की सेना के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए झांसी से ग्वालियर की ओर बढ़ रहे थे। उस दौरान झावेर भाई ने बुंदेलखंड में एक योद्धा के रूप में अनेक दिन बिताए। दुर्भाग्यवश, रानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजों से घिर गयीं और वीरगति को प्राप्त हुईं तथा झावेर भाई को इन्दौर के महाराजा की सेना ने बंदी बना लिया। अपनी चतुराई और शतरंज के कौशल के सहारे झावेर भाई महाराजा इन्दौर की क़ैद से आजाद हुए।
सागर संभागीय मुख्यालय की रजाखेड़ी नगरपालिका के बजरिया तिराहे पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा सरदार पटेल के व्यक्तित्व और विचारों का बुंदेलखंड पर प्रभाव का प्रतीक है। क्यों कि इस प्रतिमा का निर्माण सन् 2015 में लगभग 6 लाख रुपए के निजी खर्च पर कराया गया। इससे पूर्व लगभग साल भर पहले से प्रतिमा के लिए प्लेटफार्म का निर्माण शुरू कर दिया गया था। प्रतिमा जयपुर से बनवाई गई। इस प्रतिमा का निर्माण एवं स्थापना कुर्मी समाज युवा संगठन के जिलाध्यक्ष विजय पटेल ने अपने पिता स्व. शिब्बू दाऊ पटेल की स्मृति में कराया। विजय पटेल इसका कारण बताते हैं कि वे सदा सरदार पटेल के विचारों से प्रभावित रहे जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। इसीलिए अपने पिता की स्मृति में उन्होंने सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित कराने का निर्णय लिया।
स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे।
सरदार पटेल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान 1917 में खेड़ा किसान सत्याग्रह, 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1924 में बोरसद सत्याग्रह के उपरांत 1928 में बारदोली सत्याग्रह में देकर अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम की। इसी बारदोली सत्याग्रह में उनके सफल नेतृत्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी और वहां के किसानों ने वल्लभ भाई पटेल को ‘‘सरदार’’ की उपाधि दी। वहीं 1922, 1924 तथा 1927 में सरदार पटेल अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गये। 1930 के गांधी के नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तैयारी के प्रमुख शिल्पकार सरदार पटेल ही थे। 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में सरदार पटेल को अध्यक्ष चुना गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सरदार पटेल को जब 1932 में गिरफ्तार किया गया तो उन्हें गांधी के साथ 16 माह जेल में रहने का सौभाग्य हासिल हुआ। 1939 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब देशी रियासतों को भारत का अभिन्न अंग मानने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया तभी से सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण की दिशा में कार्य करना प्रारंभ कर दिया तथा अनेक देशी रियासतों में प्रजा मण्डल और अखिल भारतीय प्रजा मण्डल की स्थापना करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रजा मण्डल की संकल्पना को अपनाते हुए बुंदेलखंड में भी इसकी इकाइयां गठित की गई थीं। वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे, उनके विचार आज भी बुंदेलखंड की विकासयात्रा का पथप्रदर्शन कर रहे हैं।
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