Sunday, September 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    ईके पैले गांव देहात खों ले के हमाए बिचार कछू और हते। हमने पन्ना जिला के छोटे से छोटे गांव देखे। दमोए के मुतके गांव देखे। छतरपुर जिला के मुतके तो नोंई पर कछू गांव जरूर देखे। टीकमगढ़ के गांवन से सोई गुजरे। सागर जिला के गांवन में तो जब चाए तब घुमक्कड़ी के लाने निकरबो होई जात आए। अबे लौं मोए जेई लगत रओ के गांव देहात में सुबिदाओं की कमी आए। उते चाए दबाई के लाने होए, चाए सुद्ध पानी के लाने, भौत तकलीफ उठाने परत आए। औ बेरोजगारी सो ऐसी के उते से गरीब-गुरबा खों पेट भरे के लाने सहर में जा के मजूरी करने परत आए। उतईं जो किसान आएं उने जी-तोड़ मेनत करने परत आए। सो मोए हमेसई गांव के लाने दया माया रई। मनो पिछली शनिच्चर खों हमें बा देखने को मिलो जा के बारे में हमने कभऊं सोची ने हती।
का भओ के हमें जाने रओ सीताराम रसोई नांव की संस्था। काए से के उते गरीब-गुरबा बुजुरगन खों मुफत में भरपेट खाना खवाओ जात आए। हम सोई उते भोजन कराबे के लाने जात रैत आएं। ई दार बी गए। उते अपने सगे हातन से भोजन परोसो। उते की खाना पकाने वारी बाइयों खों धुतिया भेंट करी। काए से हमें बे भौतई अच्छी लगत आएं, बिलकुल अपनी बैन घांई। औ उनकी मेनत औ ब्यौहार भौतई अच्छो रैत आए। फेर हम ओरन ने सोची के ऊंसई घरे लौटबे से अच्छो आए के तनक चक्कर काट के, एकाद गंाव देहात से घूमत चलें। अच्छो लगहे। सो सीताराम रसोई से निकर के पैले बालाजी मंदिर में शनि भगवान के दर्शन करे। बा मंदिर सोई ऊंची पहरिया पे बनो आए, सो उते जा के भौतई अच्छो लगत आए। सो, उते बालाजी हनुमान भगवान औ शनिदेव के दरसन करे हमने। फेर हम ओरन ने रस्ता पकरी मंदिर के नैचे से पांछू वारी। हम ओरन खों पतो ने हतो के हम ओरें कोन तरफी जा रए? मनो जा तो पता रई के अपने जिला से बायरे नईं जा रए। कछू दूर तो साजी रस्ता रई, फेर मनों रोड को नक्सा बदल गओ। साजी सी रोड पे गड्ढा मिलन लगे। दचका खात भए कछू दूर औ चले तो रोड कनारे ‘‘प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत’’ लिखों भओ बोर्ड दिखानों। हमने प्रधानमंत्री योजना वारी मुतकी रोडें देखी आएं मनो ऐसी गड्ढा वारी रोड पैली दार देखी। रस्ता में एक बड़ो स्कूल औ एक फैक्टरी दिखानी। मनो रोड की दसा से उनको कोनऊं मेल ने हतो।
चलो कछू नईं, गांव आए। ऊ रोड पे भैंसन ने चल-चल के गड्ढा बना दओ हुइए। जा सोस के हमने खुद खों तसल्ली दई। इत्ते में एक फेमस गांव को बोर्ड दिखानों। कछू नईं। गांव के बायरे से निकरी रोड पे बी कऊं-कऊं गिलावो सो मचो हतो। बा बी कछू नईं। काए से के अब बरसात के दिनां में गिलावो ने हुइए तो का धूरा उड़हे? बा गांव बड़ो हतो। गांव के बायरे के हिस्सा में एक तरफी नोने-नोने खेत हते। तो दूसरी तरफी जंगल विभाग वारों के सगोना के जंगल हते। बा सब देख के भौतई अच्छो लग रओ तो। ऊ सीनरी देखत समै रोड के दचका लौं बिसर गए। तनक देर बाद लगो के अब कोनऊं से पूछ लेव चाइए के हम ओरें कोन तरफी जा रए? लग तो रई हती के जोन तरफी बढ़ रए बा रोड चक्कर काट के राजघाट बंधान लौं जात हुइए। फेर बी कोनऊं से पूछ लेबो सई लगो। हमने संग वारे भैयाजी जू से कई के कोऊ दाऊ दिखाएं सो उनसे पूछ लइयो। मनो भैया जू खों दाऊ से पैले तीन मोड़ा दिखा गए। 12 ने तो 14 बरस के रए हुइएं। तीनों में से एक सायकिल लए हतो। मनो तीनोंई गुटखा खा रए हते। भैया जू ने उनईं तीनों से पूछ लई के जा रोड कोन गांव खों जा रई? जा सुन के एक मोड़ा ने अपने कुकुरमुत्ता घांई बालन पे हात फेरत भओ बड़े स्टाईल से पूछो आप ओरन खों कां जाने? भैया जू बोले के हमें राजघाट जाने। जा सुन के बा मोड़ा बोलो के फेर तो तुम ओरें आगे ई रोड पे चलके दाएं मुड़ जइयो। तब लौं दूसरो मोड़ा गुटखा अपने मों में डार के खींसा निपोरत भओ बोलो के दाएं नईं बाएं मुड़ियो। इत्ते में तीसरो मोड़ा बोलो इते कां चले आए, पांछे लौट जाओ। भैया जू ठैरे बुंदेलखंड के बायरे के सो बे उन ओरन की कई उत्ती समझ ने पाए। मनो मोए समझ में आ गई के जे मोड़ा गांव के भले आएं मनों ठैरे चंटा-पंटा। पूरे आवारा टट्टू। सो हमने भैया जू से कई के इन ओरन खों पतो नइयां, आप तो आगूं चलो, रोड कऊं तो पौंचाहे। 
हम ओरन की गाड़ी बढ़ी औ पांछू से उन तीनों की हंसबे की आवाज सुना परी। हमाओ जी तो ऐसो करो के गाड़ी रुकवाएं औ उतर के उन ओरन खों दो-दो थपाड़ा लगाएं। जरा-जरा से लरका औ गुटखा खा-खा के गर्रा रए। मनो हमने अपनों गुस्सा पे काबू करो औ बढ़ लए।
कछू दूर पे एक दूसरो गांव आ गओ। उते जो दिखानों, बा हम देखतई रै गए। उते एक दलान में छै-सात लुगवा बैठे पत्ता खेल रए हते। मनो सई कएं तो उते जुआ चल रओ हतो। चलो कछू नईं, गांव ठैरो। टेम पास। मनो गांव वारन को इत्ती फुरसत कां से मिल गई? ऊपरे से जां हम ओरन की गाड़ी उते से निकरी तो बे सब हम ओरन खों देखन लगे। जे ई कोई बीस कदम बाद एक घर के बायरे पट्टा घांईं बनो चबूतरा पे छै-सात लोग औ दिखाने। बे सोई फुरसत से बैठे गपिया रए हते। उतई एक टपरा हतो। चाय को। ऊमें चार जने बैठे हते। बे ओरें मोबाईल पे कछू देखने में मगन हते। बाकी हम ओरन की गाड़ी उते से कढ़ी तो सब के सब हम ओरन की तरफी घूरन लगे। भैया जू ने हमसे पूछी के इन ओरन से रस्ता पूछी जाए? हमने कई के नईं, जे ठलुआ हरें को जाने का बताएं। इते तो गाड़ी बी ने रोको, बढ़त चलो। मनो उन ओरन खो देख के हमें लगो के इन ओरन खों कछू काम-धंदा नइयां का? इने तो फुरसत के मारे टेम नइयां। औ ईसे बुरई बात जे के इते की लुगाइन खों जो ऊ तरफी से निकरने परत हुइए तो कित्तो बुरौ लगत हुइए? कुल मिला के बा सो अच्छो माहौल ने दिखानों। 
हम सोसन लगे के कछू गांव खों ई गुटखा औ मोबाईल ने का कर डारो। मेनत करबे वारे की जांगा इने ठलुआ बना डारो। ऐसई बुरए माहौल में मोड़ियां औ लुगाइयां खतरा में पर जात आएं। जा सोस के हमाओ मन दुखी होन लगो। इत्ते में कोनऊं हम ओरन की गाड़ी के पांछू से हार्न बजात सुनाई परो। पीछे देखत के शीश में देखो तो मोटरसायकिल वारो दिखानों। ऊके हार्न से भैया जू को दिमाग गरम हो गओ। उन्ने साईड में गाड़ी रोकी औ ऊंसे बोले के तुमें जल्दी आए सो तुमई पैले कढ़ जाओ। हमने देखी के ऊके मोटरसायकिल पे ऊके पांछू लुगाई औ बच्चा सोई बैठे हते। हम भैया जू खों कछू समझा पाउते के इत्ते में बा मोटर सायकिल वारे ने पूछी के आप ओरन खों राजघाट जाने? भैया जू बोले हऔ। सो बा बोलो के तो फेर हमाए पांछू-पांछू आ जाओ, हम सोई ऊ तरफी जा रए। ऊकी जा बात सुन के भैया जू को गुस्सा ठंडो पर गओ। औ हम समझ गए के जा मोटर सायकिल वारो ऊ गुटखा छाप लरकों के इते से हमाई बात सुन के पछांरें आ रओ हुइए। औ हमें रस्ता बताबे के लाने हार्न बजा रओ हतो। 
सो हम ओरन ने ऊपे भरोसा करो औ अपनी गाड़ी ऊकी मोटरसायकिल के पांछू लगा दई। गांव से निकरतई सांत अच्छी रोड मिलन लगी औ हम ओरें ऊके पांछू-पांछू चल परे। सातेक किलोमीटर चलबे के बाद बड़ी रोड दिखानीं। बा मोटरसायकिल वारो रुको औ बोलो के अब आप ओरें बायीं तरफी मुड़ जाओ औ जेई बड़ी रोड पे चल हो तो दसेक किलोमीटर पे राजघाट दिखान लगहे। ऊको दूसरी तरफी जाने रओ सो बा दूसरी तरफी मुड़ गओ। भैया जू ने ऊको धन्यबाद करो। जोन रोड पे हम ओरन खों ऊने पौंचाओ रओ बा सागर से जैसीनगर वारी रोड हती। ऊपे पौंच के हम ओरन खों रस्ता याद आ गओ। काए से के ऊ रोड पे चल के हम ओरें पैले एक बेर सिलवानी गांव लौं गए रए। सो, फेर तो साजी रोड पे गाड़ी दौरा दई। रस्ता में एक मंदिर पे रामधुन सोई सुनाई परी। फेर राजघाट दिखान लगो। सो ऐसी रई ऊ दिनां की सैर।
मनों एक बात हमें पता परी के सबरे गंाव एक सी दसा के नईयां। कऊं-कऊं गुटखा औ मोबाईल की हवा कछू ज्यादाई लग गई आए। ऐसे गांवन में मुतके ठलुआ बी आएं जोन ताश पत्ती खेलत बैठे रैत आएं। उते रोड पे चलत लुगाइयां कमई दिखानीं। औ जो ऐसे ठलुआ रोड के लिंगे बैठे होंए तो लुगाइयां निकरें बी तो कैसे? सो हमें गांव को जा दूसरो चेहरा देखबे को मौका सोई मिल गओ। मनो ऐसो माहौल होन नईं चाइए। बाकी हम नईं चात के कछू जने के मारे पूरो गांव को नांव धरो जाए सो हमने गांव को नांव नईं लिखो। बाकी जोन उते के रैबे वारे आएं औ ने तों उते से कढ़े हुइएं सो बे समझ जैहें। बाकी बा मोटर सायकिल वारे घांईं अच्छे लोग अबे बी उते रैत आएं। जोन से गांव की इज्जत बनी रैत आए। जे नोनी बात आए।            
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के गांवन पे सई से ध्यान देबे की जरूरत आए के नईं? औ कछू नईं तो उते गुटखा औ दारू पे लगाम लगाओ चाइए। संगे ठलुआ हरों से कछू काम लओ जाओ चाइए। कओ, सई कई के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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