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Friday, December 13, 2024

शून्यकाल | अपने समय का एक साहित्यिक आईना है निराला का यह पत्र | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
अपने समय का एक साहित्यिक आईना है निराला का यह पत्र 
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
      निराला की स्पष्टवादिता ने जहां उन्हें विशेष बनाया, वहीं कई लोग उनकी इसी स्पष्टवादिता से रुष्ट भी हो गए। लेकिन सच कहने या लिखने में निराला ने कभी कोताही नहीं बरती। उनका एक पत्र बेहद चर्चित रहा जो उन्होंने जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखा था। जानकीवल्लभ वे कवि थे जिन्हें संस्कृत से हिन्दी में स्वयं निराला लाए थे। निराला का उनको लिखा यह पत्र तत्कालीन साहित्य जगत की सच्चाई से अवगत कराता है। इसे पढ़ कर साहित्य जगत की वर्तमान दशा और दिशा को भी समझने का प्रयास किया जा सकता है।
     सूर्यकांत त्रिपाठी ‘‘निराला’’ और आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री हिन्दी जगत के वे कवि थे जिन्होंने कविता के नए मानक गढ़े और अपने साहित्यिक तथा व्यक्तिगत जीवन को अपने ढंग से जिया। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री हिंदी व संस्कृत के कवि, लेखक एवं आलोचक थे। वे छायावादोत्तर काल के सुविख्यात कवि थे। जानकीवल्लभ का जन्म बिहार के मैगरा गांव में 05 फरवरी 1916 को हुआ था। वे स्वाभिमानी थे तथा परिस्थितियों से समझौता करना उन्हें पसंद नहीं था। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था। वे एकमात्र ऐसे कवि थे जिन्हें दो बार पद्मश्री दिए जाने की घोषणा की गई और दोनों बार उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया। पहली बार 1994 में पद्मश्री दिए जाने की घोषणा की गई जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद 2010 में उन्हें पुनः पद्मश्री सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई जिसे एक बार फिर उन्होंने लेने से मना कर दिया। यह सम्मान उन्हें अपने वैचारिक उसूलों के विरुद्ध प्रतीत हुआ था। 07 अप्रैल 2011 को मुजफ्फरपुर के निराला निकेतन में उन्होंने ने अंतिम सांस ली।
प्रारंभ में उन्होंने संस्कृत में कविताएं लिखीं। फिर महाकवि निराला की प्रेरणा से हिंदी में आए। दरअसल, लखनऊ में निराला ने जब ‘‘काकली’’ को पढ़ा तो मुग्ध हो गए। उन्होंने उस समय की मशहूर पत्रिका ‘‘माधुरी’’ के संपादक रूप नारायण पांडेय से जानकी वल्लभ की तारीफ की और तत्काल बनारस आ गए। वे जानकीवल्लभ शास्त्री को ढूंढते-खोजते बीएचयू पहुंचे और उनसे मिलकर बहुत प्रभावित हुए। जानकीवल्लभ शास्त्री भी निराला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने निराला पर ही एक लंबी कविता लिख डाली, जिसे पढ़ने के बाद दोनों के बीच निकटता बढ़ गई। निराला ने ही उन्हे संस्कृत के साथ हिदी में कविता रचने के लिए प्रेरित किया। निराला की प्रेरणा से जानकीवल्लभ शास्त्री ने हिदी में ‘‘रूप-अरूप’’ नाम से 1939 में अपना पहला कविता संग्रह प्रकाशित करवाया। उन पर निराला का प्रभाव बहुत गहरा था। 1935 में जब निराला ने अपनी ‘‘राम की शक्ति-पूजा’’ भेजी तो जानकी वल्लभ इसे कंठस्थ कर गए। वे जीवनपर्यत उनकी इस कविता को गाकर ही अपने काव्यपाठ की शुरुआत करते थे। जानकी वल्लभ शास्त्री वर्ष 1932 से 38 तक बीएचयू में रहे। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने उनके आगे बढ़ने और बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया था। 
05 सितंबर 1968 को निराला ने जानकीवल्लभ शास्त्री को लखनऊ से एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने अपने विचारों के साथ ही तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य की खुल कर चर्चा की। वह पत्र इस प्रकार है-
भूसामंडी, हाथीखाना,
लखनऊ 
05-09-1968
प्रिय जानकीवल्लभ जी,
अभी-अभी आपका पत्र मिला। हिंदी से आपको प्रेम होगा। कोई फर्ज-अदाएगी समझेंगे तो अपने आप लिखेंगे। मैं एक पाठक की हैसियत से जितना आनंद प्राप्त कर सकूंगा, आपकी चीजें पढ़कर प्राप्त करना मेरे लिए इतनी ही सुविधा है। रही बात व्याकरण सीखने की, यह आपकी तबियत पर है। विषय कोई नीरस नहीं, इतना मैं कुछ-कुछ समझ सका हूं।
मुझे अपनी चीजों की अनुकूलता-प्रतिकूलता बहुत कम अनुकूल-प्रतिकूल कर सकती है। यूं दूसरों की तरह कमजोरियां मुझमें भी हैं क्योंकि दूसरों की तरह आदमी मैं भी हूँ।
मैं देखता हूं, चीज ख़ुद अपने में कहां तक बन-संवर कर खड़ी हो सकी है। जिन लोगों ने उत्तर लिखने के लिए कहा है, उन्होंने अपनी तरफ से कहा है। न तो मैंने अपने भाव दिए हैं, न उत्तर देखने के लिए मुझे कोई औत्सुक्य है। जो लोग मुझसे लिखने के लिए कहते हैं। ये दूसरी जगह यह भी कहते हैं कि चूंकि निराला जी की इच्छा है, इसलिए लिखेंगे। उनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऊंचे दर्जे के हैं। लिखने के लिए वे जो कुछ भी लिखें। कुछ का कहना है, यह जो तुलसी-सूर आदि पर लिखा है, यह अच्छा नहीं किया निराला जी ने। पर वे भूल जाते हैं, निराला ने शेख़ी भी नहीं बघारी। उसी भूमिका में अपने सस्वर व ढलने की बात भी उसमें लिखी है और खुले तौर पर प्रभाव को स्वीकार किया है।
यह सब तो जो कुछ होगा, होता रहेगा। आपने और नहीं तो इधर के ‘विशाल भारत’ और ‘वीणा’ के अंक तो देखे होंगे। उनमें लिखा है, रवि बाबू प्रमुख बंगालियों ने हिंदी की मुख़ालफत करनी शुरू कर दी है... उनका कहना है, हिंदी में तुलसीदास के सिवा और क्या रक्खा है? सिर्फ बंगला राष्ट्रभाषा होने की योग्यता रखती है, कांग्रेस हिंदी का प्रचार बंद करे।
क्या आप बता सकते हैं रवि बाबू प्रमुख बंगालियों की ऐसी स्पद्र्धा का क्या कारण है? क्या इसीलिए नहीं कि रवि बाबू के डंके की चोट ने हिंदी की मूर्खमंडली को विवश कर दिया है कि वह रवि बाबू के गू को भी सार देखे और खड़ी बोली के सार-पदार्थ को भी गू?
मेरी किताबें कब निकलेंगी मैं नहीं जानता। मुमकिन दो महीने में ‘‘तुलसीदास’’ और ‘‘अनामिका’’ निकल जाय।
आपके प्रश्नों के उत्तर मैं अभी नहीं लिख सकूंगा। क्योंकि बहुत काम पड़ा हुआ है पूरा करने में लगा हूं। एक नया उपन्यास भी लिख रहा हूं। इसलिए अभी यहाँ न आइए। ‘साहित्य’ सभी का है। इसलिए अलग रहने की बात किसी ‘साहित्याचार्य’ की नहीं हो सकती। आपकी तरह मैं भी साधारण व्यक्ति हूं। फर्क इतना ही है कि आपकी तरह असाधारण व्यक्तियों की ओर स्नेह मेरा कम बहता है। न असाधारण कोई कुछ मुझे नजर आता है, जब उत्कृष्ट और अपकृष्ट के दर्शन पर विचार करता हूं। कुछ काल बाद निश्चित होकर मैं आपको अच्छी तरह लिखूंगा। आपके प्रश्नों के उत्तर दूंगा।
मैंने चाहा था, आपको नई हवा खिलाऊं। कोशिश की थी। पर आपने एक स्थिति से दूसरी स्थिति को समझना चाहा। मेरी आदत किसी का बिगाड़ना नहीं। जब दर्द पैदा होता है, तब हर आदमी दवा के लिए दौड़ता है। सोचकर मैं चुप हो गया।
लिखना पढ़ना आपका धर्म है, और कोई धर्म मनुष्य के स्वभाव में घर कर लेता है, तब छूटता नहीं। लिहाजा, क्या कहूं।
आपका ‘निराला’

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री तथा निराला के बीच पत्राचार होता रहता था। निराला उन साहित्यकारों से दुखी रहते थे जो अधकचरा साहित्य रच कर भी अपनी पीठ ठोंकते रहते थे और स्वयं को महान साबित करने के जुगाड़ में लगे रहते थे। साहित्य की श्रेष्ठता के आधार पर नहीं वरन व्यक्ति के आधार पर उठाने-गिराने का खेल चलता रहता है। इस विषय पर इस पत्र में निराला का दुख और क्षोभ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कमोवेश आज की स्थिति उस समय से बहुत भिन्न नहीं है किन्तु आज निराला या जानकीवल्लभ जैसे व्यक्तित्व नहीं हैं। 
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