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Wednesday, October 27, 2021

चर्चा प्लस - हम क्यों दूर हैं कोयले और पेट्रोल के विकल्प से? - डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस
हम क्यों दूर हैं कोयले और पेट्रोल के विकल्प से?
- डाॅ. शरद सिंह
    पेट्रोल, कोयला जीवाश्म ईंधन हैं जिनका सदियों से निरंतर खनन किया जा रहा है। इस प्रकार के ईंधन के प्रयोग से कार्बन उत्सर्जन भी तेजी से होता है जो कि ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रहा है और पृथ्वी का तापमान बढ़ा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, भयानक बाढ़ें आ रही हैं और जंगल जल रहे हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों पर रोक लगाने पर जोर दे रहा है लेकिन भारत इसके लिए अभी तैयार नहीं है। क्या हमारा देश विकल्प ढूंढ रहा है या फिर कोई और बात है?


इसी वर्ष आगामी नवंबर में ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में जलवायु परिवर्तन पर होने वाले ‘‘सीओपी 26’’ नाम के शिखर सम्मेलन में आने वाले देशों से संयुक्तराष्ट्र संघ की ओर से कहा जाएगा कि वे वायुमंडल के तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने का कदम उठाएं। भारत दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद कार्बन उत्सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है और वह उन कई देशों के साथ है जो संयुक्त राष्ट्र में कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों पर पूरी तरह से रोक लगाने का विरोध कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भारत को ‘‘कार्बन फुटप्रिंट’’ बढ़ने से चिंता नहीं है। मौसम में होते निरंतर बदलाव इसी कार्बन फुटप्रिंट का परिणाम हैं और भारत इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं को झेलने में भी पूरी तरह सक्षम नहीं है। दरअसल, भारत जीवाश्म ईंधन पर पूरी तरह रोक लगाए जाने के लिए कुछ समय चाहता है। भारत सन् 2030 तक अपनी बिजली आपूर्ति का 40 प्रतिशत भाग रीन्यूएबल इनर्जी और परमाणु ऊर्जा से हासिल करना चाहता है। किन्तु क्या यह इतना आसान होगा हमारे देश के लिए?
‘‘सीओपी 26’’ का अर्थ है ‘‘कान्फ्रेंस आॅफ पार्टीज़’’। इसमें वे देश भाग लेंगे जिन्होंने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्तराष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेन्शन में सन् 1994 को एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे। चूंकि 31 अक्टूबर से 12 नवंबर में होने जा रही बैठक 26 वीं होगी इसलिए इसे ‘‘सीओपी 26’’ कहा जा रहा है। जब ग्लासगो में यह बैठक चल रही होगी, उस दौरान हमारा देश दीपावली पर कार्बन उत्सर्जन का एक और फुटप्रिंट बना चुका होगा। वायु प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड के अनुसार दीपावली पर पटाखों के कारण वायु प्रदूषण 20 गुना तक बढ़ जाता है। वहीं ध्वनि प्रदूषण 15 डेसीबल तक बढ़ जाता है। पिछले दिनों व्हाट्सएप्प पर एक फारवर्डेड मैसेज पढ़ने को मिला था कि जो लोग दीपावली पर पटाखे चलाने से प्रदूषण फैलने की बात करते हैं उन्हें पहले एसी का उपयोग बंद करने की बात करना चाहिए। यह गुमराह करने वाला संदेश या इस जैसे और भी अनेक संदेश होंगे जो लोगों को पर्यावरण की गंभीरता से परे धकेल कर उकसाते हैं। यदि कुछ लोग एसी चलाए जाने से होने वाले पर्यावरण के नुकसान को नहीं समझ पा रहे हैं तो क्या बाकी लोगों को भी नासमझी ओढ़ लेना चाहिए? यह तो कोई हल नहीं हुआ। यदि घर का हर सदस्य यह सोच ले कि मैं घर को क्यों साफ़ रखूं, जिसे रखना हो वो रखे, तो घर तो कूड़ादान बन जाएगा। इसीतरह प्रदूषित हवा सभी के लिए समान रूप से घातक होती है। बेशक, जिन्हें सांस संबंधी बीमारी है उनके लिए तो जानलेवा भी साबित हो जाती है। हवा को साफ़ रखना हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझना चाहिए। क्यों कि हर नागरिक को सांस लेने योग्य हवा की ज़रूरत होती है और हर नागरिक एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता है। अभी अधिक दिन नहीं हुए हैं कि हमने खुशियां मनाई कि कोरोना लाॅकडाउन के दौरान वायुप्रदूषण घटा। लेकिन यह खुशी हमारे परिश्रम की उपलब्धि नहीं थी बल्कि हमने अपनों के जीवन का बलिदान दे कर वायुप्रदूषण में गिरावट को पाया था। कोरोना ने लाॅकडाउन के लिए विवश किया। गाड़ियां थम गईं। रोजगार छूट गए। संक्रमितों ने अपने प्राण गंवा दिए। इन सबकी कीमत पर वायुप्रदूषण में गिरावट कोई खुशी का विषय नहीं हो सकती थी। उस पर यह गिरावट वक़्तीतौर पर पर रही। जैसे ही फिर गाड़ियां दौड़ने लगीं, कारखाने चलने लगे। जनजीवन सामान्य होने लगा, वैसे ही वायु में कार्बन का स्तर ऊंचा उठने लगा।
सवाल उठता है कि क्या है कार्बन फुटप्रिंट? तो कार्बन फुटप्रिंट का अर्थ है वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन की वह बढ़ती मात्रा जिसकी जिम्मेदार विशाल जनसंख्या और कारखाने हैं। कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए उन कारणों पर रोक लगाने की बात बार-बार उठती रही है जिनसे कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका है जीवाश्म ईंधन की। जैसे पेट्रोल और कोयला। इनके विकल्प के रूप में सौर ऊर्जा को हमेशा देखा गया है। इलेक्ट्रिक से चलने वाली कारें और दूसरे वाहन इस दिशा में हल सुझाते हैं। लेकिन अभी अमेरिका की कुल कारों में से सिर्फ दो प्रतिशत कारें इलेक्ट्रिक हैं। दुनिया में फिलहाल जितने भी इलेक्ट्रिक वाहन हैं, उनमें से आधे अकेले चीन में हैं। चीन से इस विकल्प को तेजी से अपनाया है। भारत में भी पेट्रोल के बदले बिजली से चलने वाले वाहनों का बाज़ार तेजी से बढ़या जा रहा है ताकि जीवाश्म ईंधन का उपयोग घटे और प्रदूषण का स्तर भी कम हो। लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी समस्या है बिजली की हर जगह और हर समय उपलब्धता। एक शोध के अनुसार समूचे विश्व में लगभग 77 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है। जिनके पास बिजली है, उनसे से अधिकतर को जीवाश्म ईंधन के द्वारा पैदा होने वाली बिजली मिलती है। पारंपरिक तरीके से बिजली बनाने के लिए भी कोयले की जरूरत पड़ती है। इसीलिए ग्रीन इलेक्ट्रिक यानी हरी बिजली को एक बेहतरीन विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
ग्रीन बिजली बनाने के लिए विंड टर्बाइन, सोलर पैनल, जियोथर्मल और न्यूक्लियर पावर की तकनीक मौजूद हैं। इनके जरिए कोयले और तेल के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से हटाने और उत्सर्जन घटाने में मदद मिल रही है। लेकिन इसमें तकनीक के साथ भौगोलिक स्थितियों पर भी ध्यान देना होता है। शायद इतने पर भी पर्याप्त और सस्ती बिजली न मिल पाए इसलिए कुछ और विकल्प वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाले हैं- क्लीन हाइड्रोजन और बायो फ्यूल। भारत में बिजली की कीमतें पहले ही बहुत अधिक हैं तथा बिजली पर निर्भरता बढ़ने पर यह और अधिक मंहगी पड़ सकती है। अतः एक से अधिक विकल्पों को साथ ले कर चलना होगा। 
हमारे देश में वैकल्पिक ऊर्जा से जुड़ी योजनाओं की कोई कमी नहीं है लेकिन सबसे बड़ी कमी है वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के व्यवस्थापन, वितरण और जागरूकता की। एक छोटा-सा उदाहरण याद कीजिए कि सन् 2001-2 में खाना पकाने के लिए घरेलू सोलर कूकर का बड़ा जोरों से प्रचार-प्रसार था। लोगों ने उसमें दिलचस्पी भी दिखाई लेकिन सब्सिडी के खेल ने सोलर कूकर को आमआदमी की पहुंच से दूर कर दिया। विशेष कार्ड धारकों को तो वह न्यूनतम कीमत पर दिया गया लेकिन सामान्य नागरिकों को उच्चतम कीमत चुकानी पड़ी। जिससे सोलर कुकर के प्रति रुझान कम हो गया। जबकि सोलर कुकर में मात्र एक बार का खर्च था, सिर्फ़ खरीदने का खर्च। इसके बाद न कोई रीफिलिंग और कोई बिल। कमोवेश यही दशा घरेलू सोलर पैनल्स की भी हुई। सौर ऊर्जा से मिलने वाली बिजली के द्वारा बिजली के पारंपरिं सं्रोत के उपयोग को कम किया जा सकता था। लेकिन इस दिशा में भी कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं मिले। इसके वही दो कारण थे- नौकरशाही और जनजागरूकता की कमी। आम नागरिक अभी भी इस बात से बेखबर है कि जलवायु परिवर्तित हो रहा है और मानव जीवन संकट की ओर बढ़ रहा है। इस पर समारोही चर्चाओं के अलावा कभी चर्चा नहीं होती है। पिछले दिनों किसान आंदोलन का समर्थ करने के विवाद से जिस विदेशी लड़की का नाम सामने आया वह थी ग्रेटा थनबर्ग। स्वीडेन में 3 जनवरी 2003 को जन्मी यह 18 साल की लड़की जलवायु परिवर्तन की गति रोकने के लिए संघर्ष कर रही है। उसे अपने आंतरिक मुद्दे से जोड़ने और अभद्रतापूर्वक विवादित बनाने में कोई कसर नहीं रखी गई जबकि चाहिए था कि उसके जलवायु परिवर्तन रोकने के अभियान को समर्थन दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि हम जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से ले ही नहीं रहे हैं। हमारे परिवारों में नाती-पोतों के जन्म होने पर खुशियां मनाई जाती हैं। उनके जीवनयापन के लिए धन-संपत्ति की व्यवस्था की जाती है लेकिन वे भविष्य में कैसी हवा में सांस लेंगे, कैसा पानी उन्हें मिलेगा, पानी मिलेगा भी या नहीं, जलवायु बदलने से उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं से वे कैसे जूझेंगे आदि प्रश्नों पर विचार ही नहीं करते हैं। जबकि यह प्राथमिक ही नहीं वरन बुनियादी प्रश्न हैं। आखिर जीवन है तो सबकुछ है और बेहतर जीवन तभी संभव है जब हमारी धरती की दशा बेहतर रहे।
हमारी सरकार यदि आज जीवाश्म ईंधन पर पूरी रोक का विरोध करने वाले देशों की लाॅबिंग में खड़ी है तो इसका कारण यही है कि वह जानती है कि हमारे देश में कुछ भी अच्छा कर पाना आसान नहीं है। वह राते-रात नोटबंदी भले ही कर दे लेकिन तत्काल हर नागरिक को वैकल्पिक ऊर्जा उपलब्ध नहीं करा सकती है। इसीलिए उसके पास संयुक्तराष्ट्र संघ से समय मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं है। भले ही इसके लिए दुनिया के सामने लज्जित होना पड़े लेकिन विवशता है कि हमारे देश में योजनाओं को ईमानदारी से अमलीजामा नहीं पहनाया जा पाता है। इस कटु सत्य के साथ, तमाम लज्जा के साथ, धीरे-धीरे ही सही लेकिन हमें जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की ओर बढ़ना ही होगा। साथ ही इस ज़रूरत को हर नागरिक को समझना भी होगा यदि वह अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ जलवायु देना चाहता है। 
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(सागर दिनकर, 27.10.2021)
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Wednesday, April 14, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा | डाॅ. शरद सिंह


चर्चा प्लस        
 बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा
         - डाॅ. शरद सिंह                                                                 
      हमारी परंपराएं हमें संस्कार देती हैं। खान-पान की परंपरा हमें खाद्य-अखाद्य और कब क्या खाना चाहिए, इस बात का बोध कराती हैं। बुंदेलखंड की व्यंजन-परंपरा बहुत समृद्ध है किन्तु बर्गर, पिज्जा, चाउमिन ने इस पर भी अपना दुष्प्रभाव डाला है। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती व्यंजन-परंपरा की ।
कोरोना आपदा के पहले भोपाल एक माॅल के ‘फूडजोन’ में यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ था कि वहां पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों का भी एक ‘काॅर्नर’ है। उसके बाद झांसी के में भी बुंदेली फूड जोन काॅर्नर देखने को मिला। संयोगवश उन्हीं दिनों ‘इपिक चैनल’ के प्रसिद्ध टीवी शो ‘नाॅदर्न फ्लेवर’ में बुंदेली शादियों में बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यजनों पर एक कार्यक्रम देखा जिसमें ‘सिंदोरा-सिंदोरी’ जैसे व्यंजन बनाने की विधि बताई गई थी। इन सबको देख कर मुझे वो दिन याद आ गए जब बचपन में मैं बिरचुन यानी सूखे बेर का चूरा खाती हुई इंद्रजाल काॅमिक्स पढ़ा करती थी। स्वादानुसार नमक या शक्कर डाल कर बेरचुन का गाढ़ा घोल भी बनाया जाता था। मेरी मां खाना बनाने वाली महराजिन ‘बऊ’ के साथ मिलकर छुट्टी के दिन खुरमा-पपड़ियां बनाया करती थीं। महीनों तक रखे जा सकने वाले खुरमा-पपड़िया को हम बच्चों से बचा कर रखने के लिए ढेर सारे जतन करने पड़ते थे मां को। उन दिनों लपटा और लप्सी भी हमारी जबान पर चढ़ा हुआ था। चीले की फरमाईश तो आए दिन होती थी। गुड़ डले हुए गुलगुलों का स्वाद कभी भुलाया नहीं जा सकता है। मेरे बचपन के समय इतनी मंहगाई नहीं थी। चार की चिरौंजी सस्ती मिलती थी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि गुलगुलों में चिंरौंजियां भी डाली जाती थीं। पारंपरिक व्यंजनों का यह शौक मुझे अपनी मां से विरासत में मिला। लेकिन अब इस व्यस्त ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब घर में कोई विशेष पारंपरिक व्यंजन बन पाता हो। रिश्तेदारों एवं परिचितों के बच्चे तो पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और चाउमिन पर फ़िदा रहते हैं। रहा शादी-विवाह के समारोहों का सवाल तो वहां भी बुंदेली छोड़ कर विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों के स्टाॅल लगे होते हैं, गोया बुंदेली व्यंजन रोज घरों पर बन रहे हों। यही कारण है कि बुंदेलखण्ड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर होते जा रहे हैं।


ऐसा नहीं है कि बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का कोई मौसमी नियम ही न हो। किस मौसम में क्या खाया जाना चाहिए, इसका निर्देश साहित्य तक में मिलता है। जैसे -
चैते गुड, वैसाखे तेल, जेठे पंथ, अषाढ़े बेल
साउन साग, भादौं दही, क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिसरी, फागुन चना
जो यह बारह देई बचाय, ता घर वैद कभऊं नइं जाए।।

अर्थात चैत्र मास में गुड़ का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड़ कफकारी होता है। वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है। ज्येष्ठ मास में गर्मी की भीषणता रहती है अतः हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए। और भाद्रपद में दही पित्त को कुपित करता है। आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है। कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है,  उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही यानी मट्ठे से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए। पौष मास में धनिया, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना खाना उचित नहीं होता है। इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती।


सावन हर्रै भादों चीत। क्वार मास गुड़ खायउ मीत।।

कातिक मूली अगहन तेल। पूस में करै दूध से मेल।।

माघ मास घिउ खींचरी खाय। फागुन उठि के प्रात नहाय।।

चैत मास में नीम बेसहनी। बैसाके में खाय जड़हनी।।

          अर्थात् सावन मास में हर्रै, भादों मास में चिरायता, क्वार मास में गुड़ कार्तिक में मूली, अगहन में तेल, पौष मास में दूध, माघ मास में घी और खिचड़ी, फागुन मास में प्रातः स्नान, चैत मास में नीम का सेवन, वैशाख मास में जड़हन का भात खाना चाहिए। अब इस तरह का खान-पान चलन से बाहर होता जा रहा है और इन कहावतों के बारे में भी कम ही लोगों को ज्ञान है।

  

रहा पारंपरिक व्यंजनों का प्रश्न तो, पूड़ी के लड्डुओं का स्वाद वह कभी नहीं भूल सकता है जिसने उन्हें अपने जीवन में एक भी बार खाया हो। ये त्यौहारों बनाए जाते हैं। (चूंकि ‘थे’ लिखने में अंतस कचोटता है अतः मैं ‘है’ ही लिखूंगी) बेसन की बड़ी एवं मोटी पूड़ियां तेल में सेंककर हाथों से बारीक मीड़ी जाती है। फिर उन्हें चलनी से छानकर थोड़े से घी में भूना जाता है। उसके बाद शक्कर या गुड़ डाल कर हाथों से बांधा जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए कालीमिर्च अथवा इलायची भी डाल दी जाती है। इसी तरह है हिंगोरा। बिना मठे की बेसन की कढ़ी जिसमें हींग का तड़का लगाया जाता है। आंवरिया भी इसी श्रेणी का एक व्यंजन है। आंवरिया अर्थात् आंवले की कढ़ी। इसमें सूखे आंवलों की कलियों को तेल में भूनकर सिल पर पीस लिया जाता है। फिर बेसन को पानी में घोलकर किसी बर्तन में चूल्हे पर चढ़ा देते हैं और कढ़ी पक जाने पर, चूल्हे से उतारने के पहले इसमें आंवलों का चूर्ण और नमक डाल देते हैं। इच्छानुसार इसमें लाल मिर्च, जीरा, प्याज एवं लहसुन आदि भी पीस कर डाला जाता है। फरा भी एक पारंपरिक बुंदेली व्यंजन है। इसमें गेहूं के आटे को मांड़ कर छोटी-छोटी पूड़िया बेल ली जाती हैं फिर इन्हें खौलते हुए पानी में सेंका जाता है। बफौरी, मीड़ा, निघौना, रस खीर, बेसन के आलू, फरा, अद्रेनी, थोपा, पूड़ी के लडडू, महेरी या महेई, करार, मांडे, एरसे या आंसे, लपटा, हिंगोरा, आंवरिया, ठोमर, ठड़ूला, डुबरी, कचूमर, कुम्हड़े की खीर, गुना, खाकड़ा, लप्सी, रसाजें, खींच, बिरचून, लुचई, गकरिआ, पपड़िया, टिक्कड़, बरी, बिजौरा, कचरिया, खुरमा-खुरमी, बतियां आदि अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो बुंदेली रसोई के अभिन्न अंग हुआ करते थे किंतु अब ये इतालवी या चाइनीज़ फूड तले दबते जा रहे हैं। जबकि इनमें से अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो ‘फास्ट फूड’ की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।


यूं तो हमारे देश में व्यंजनों की संख्या का निर्धारण आमतौर पर छप्पन प्रकार के व्यंजनों के रूप में किया जाता है, किंतु बुंदेलखंड में सौ से भी अधिक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते रहे हैं। दुख तो तब होता है जब इन व्यंजनों में से कुछ को ‘स्ट्रीट फूड’ की श्रेणी में गिना जाता है। जो बुंदेली रसोईघर के राजा-रानी हुआ करते थे वे आज ‘स्ट्रीट फूड’ के रूप में बिकते हैं। यही है बाज़ारवाद का चमत्कार जिसने पारंपरिक व्यंजनों को घरों से बेघर कर के माॅल के आलीशान फूडजोन में पहुंचा दिया है जहां इनमें से कुछ व्यंजनों का अस्तित्व तो बचा हुआ है लेकिन दस रुपए के सामान को सौ रूपए में खरीद कर यह झूठा गुमान भी पालने का शगल आ गया है कि हम अपने पारंपरिक व्यंजनों को लुप्त होने से बचा रहे हैं। यद्यपि बुंदेलखंड में आयोजित किए जाने वाले बुंदेली उत्सव इन पारंपरिक व्यंजनों को पुनः चलन में लाने में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं तथा साहित्यकार पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों को पुस्तकाकार सहेज भी रहे हैं किंतु ये तभी चलन में लौट सकते हैं जब ये एक बार फिर हर घर की रसोई का हिस्सा बन जाएं। (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 14.04 .2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 7, 2021

चर्चा प्लस - बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : त्योहार-परंपरा - डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस        
बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : त्योहार-परंपरा                   
     - डाॅ. शरद सिंह                              
          जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है। परिवर्तन गतिशीलता का द्योतक होता है लेकिन स्वस्थ परंपराओं में परिवर्तन क्षेत्र की जातीय पहचान को संकट में डाल देता है। युवा पीढ़ी ऐसे कई पारंपरिक त्योहारों से दूर होती जा रही है जिनका जीवन, पर्यावरण और संस्कारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती त्योहार-परंपरा की।
बुंदेलखंड में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं जिन्हें बड़े-बूढ़े, औरत, बच्चे सभी मिलकर मनाते हैं। लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ बेटियां ही मनाती हैं, विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं। ऐसा ही एक त्यौहार है मामुलिया। बड़ा ही रोचक, बड़ा ही लुभावना है यह त्यौहार। यह जहां एक और बुंदेली संस्कृति को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर भोली भाली कन्याओं के मन के उत्साह को प्रकट करता है। दरअसल मामुलिया बुंदेली संस्कृति का एक उत्सवी-प्रतीक है। आज के दौड़-धूप के जीवन में जब बेटियां पढ़ाई और अपने भविष्य को संवारने के प्रति पूर्ण रूप से जुटी रहती है उनसे कहीं सांस्कृतिक लोक परंपराएं छूटती जा रही है मामुलिया का भी चलन घटना स्वाभाविक है। आज बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां नहीं जानती मामुलिया। यूं तो मामुलिया मुख्य रूप से क्वांर मास में मनाया जाता है। इस त्यौहार में अलग-अलग दिन किसी एक के घर मामुलिया सजाई जाती है। जिसके घर मामुलिया सजाई जाने होती है, वह बालिका अन्य बालिकाओं को अपने घर निमंत्रण देती है। सभी बालिकाओं के इकट्ठे हो जाने के बाद वे बबूल या बेर के कांटों में रंग-बिरंगे फूल लगा कर उसे सजातीं हैं। यही सजी हुई शाख मामुलिया कहलाती है। मामुलिया को सजाने के बाद भुने चने, ज्वार की लाई, केला, खीरा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके बाद बालिकाएं हाथों में हाथ डालकर मामुलिया के चारों ओर घूमती हुई गाती है-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया....’’। इस प्रकार गांव भर में घूमती हुई बालिकाएं नदी अथवा तालाब के किनारे पहुंचती हैं। वे मामुलिया को नदी या तालाब में सिरा देती हैं। मामुलिया सिरा कर लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता। कहते हैं कि पीछे मुड़कर देखने से भूत लग जाता है। घर लौटने पर वह बालिका जिसके घर मामुलिया सजाई गई थी, शेष बालिकाओं को भीगे चने का न्योता देती है। मामुलिया बेटियों के पारस्परिक बहनापे का भी त्यौहार है। इस त्यौहार में बड़ों का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है अतः इससे बेटियों में सब कुछ खुद करने का आत्मविश्वास और कौशल बढ़ता है। इस प्रकार के त्यौहारों को उत्सवी आयोजन के रूप में मनाते हुए बचाया जा सकता है। जैसे दिसम्बर 2012 में झांसी महोत्सव में भी मामुलिया सजाने की प्रतियोगिता करा कर बेटियों को मामुलिया के बारे में जानकारी दी गई थी। इसी प्रकार 12 अक्टूबर 2016 को हमीरपुर आदिवासी डेरा में ‘बेटी क्लब’ द्वारा लोक परंपरा का खेल मामुलिया और सुअटा खेला गया।  इसका संरक्षण आवश्यक है। क्योंकि यह परंपरा बेटियों के सम्मान के लिए बनाई गई है। ग्राम बसारी, हटा आदि लोकोसत्वों में भी मामुलिया जैसी परम्पराओं पर ध्यान दिया जाता है किन्तु जरूरी है शहरी जीवन को इन रोचक परम्पराओं से जोड़ना।

दीपावली के कई दिन पहले से ही घर की दीवारों की रंगाई-पुताई, आंगन की गोबर से लिपाई और लिपे हुए आंगन के किनारों को ‘‘ढिग’’ धर का सजाना यानी चूने या छुई मिट्टी से किनारे रंगना। चौक और सुराती पूरना। गुझिया, पपड़ियां, सेव-नमकीन, गुड़पारे, शकरपारे के साथ ही एरसे, अद्रैनी आदि व्यंजन बनाया जाना। बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह त्यौहार धनतेरस से शुरु होकर भाई दूज पर समाप्त होता है। बुंदेलखंड में दीपावली के त्यौहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो अब सिमट-सिकुड़ कर ग्रामीण अंचलों में ही रह गई हैं। जीवन पर शहरी छाप ने अनेक परंपराओं को विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया है। इन्हीं में से एक परंपरा है- घर की चौखट पर कील ठुकवाने की। दीपावली के दिन घर की देहरी अथवा चौखट पर लोहे की कील ठुकवाई जाती थी। मुझे भली-भांति याद है कि पन्ना में हमारे घर भोजन बनाने का काम करने वाली जिन्हें हम ‘बऊ’ कह कर पुकारते थे, उनका बेटा लोहे की कील ले कर हमारे घर आया करता था। वह हमारे घर की देहरी पर ज़मीन में कील ठोंकता और बदले में मेरी मां उसे खाने का सामान और कुछ रुपए दिया करतीं। एक बार मैं उसकी नकल में कील ठोंकने बैठ गई तो मां ने डांटते हुए कहा था-‘‘यह साधारण कील नहीं है, इसे हर कोई नहीं ठोंकता है। इसे मंत्र पढ़ कर ठोंका जाता है।’’ मेरी मां दकियानूसी कभी नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी मंत्र-तंत्र पर विश्वास किया लेकिन परंपराओं का सम्मान उन्होंने हमेशा किया। आज भी वे दीपावली पर पूछती हैं कि कील ठोंकने वाला कोई आया क्या? लेकिन शहरीकरण की दौड़ में शामिल काॅलोनियों में ऐसी परंपराएं छूट-सी गई हैं। दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने के पीछे मान्यता थी कि ऐसा करने से साल भर बलाएं या मुसीबतें घर में प्रवेश नहीं कर पातीं हैं। बलाएं होती हों या न होती हों किन्तु घर की गृहणी द्वारा अपने घर-परिवार की रक्षा-सुरक्षा की आकांक्षा की प्रतीक रही है यह परंपरा।

दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा रही है। आज पारंपरिक रीत-रिवाजों को मानने वाले घरों अथवा गांवों में ही दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती (सुरैती) बनाई जाती है। सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाते हैं। दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के  चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में ‘पना’ कहा जाता है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।

बुंदेलखंड में दशहरा-दीपावली पर मछली के दर्शन को भी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते चांदी की मछली दीपावली पर खरीदने और घर में सजाने की मान्यता भी बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में है। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला से लगभग 40 किमी. दूर उपरौस, ब्लॉक मौदहा की चांदी की विशेष मछलियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि चांदी की मछली बनाने का काम देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। उपरौस कस्बे में बनने वाली इन मछलियों को मुगलकाल के बादशाह भी पसंद करते थे। अंग्रेजों के समय रानी विक्टोरिया भी इसकी कारीगरी देखकर चकित हो गयी थीं। जागेश्वर प्रसाद सोनी उसे नयी ऊंचाई पर ले गये। मछली बनाने वाले जागेश्वर प्रसाद सोनी की 14वीं पीढ़ी की संतान राजेन्द्र सोनी के अनुसार इस कला का उल्लेख इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी किताब ‘‘आइने अकबरी’’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां के लोगों के पास बढ़िया जीवन व्यतीत करने का बेहतर साधन है, इसके बाद उन्होंने चांदी की मछली का उल्लेख किया और इसकी कारीगरी की प्रशंसा भी की है। इसके बाद सन् 1810 में रानी विक्टोरिया भी इस कला को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी थीं। उन्होंने सोनी परिवार के पूर्वज स्वर्णकार तुलसी दास को इसके लिए सम्मानित भी किया था। राजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के समय चांदी की मछलियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। क्योंकि मछली को लोग शुभ मानते हैं और चांदी को भी। उनके अनुसार धीरे-धीरे ये व्यापार सिमटता जा रहा है। कभी लाखों रुपए में होने वाला ये कारोबार अब संकट में है और चांदी की मछलियों की परंपरा समापन की सीमा पर खड़ी है।  (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 07.04 .2021 को प्रकाशित)
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Thursday, April 1, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : सिमटते खेल | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस        
   बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : सिमटते खेल                
           - डाॅ. शरद सिंह
    बुंदेलखंड की संस्कृति परंपराओं की धनी है लेकिन जीवन की आधुनिक शैली ने इसकी स्वस्थ परंपराओं को भी ग्रहण लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कई बुंदेली परंपराएं आज अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। खेल, त्योहार, व्यंजन, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य आदि की परंपराएं प्रत्येक क्षेत्र के लोकाचार को दर्शाती हैं। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट पर ‘‘चर्चा प्लस’’ में क्रमशः चर्चा करूंगी। तो इस बार के चर्चाप्लस में कर रही हूं संकटग्रस्त खेलों की चर्चा।
बुंदेलखंड में भी ऐसी अनेक परंपराएं हैं जो इस क्षेत्र की विशेषताओं को दर्शाती हैं। लेकिन आधुनिक जीवन शैली में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने इन परंपराओं का समय छीन लिया है। अब परिवार के सदस्य काना-दुआ, सोलह गोटी खेलने अथवा लोकनाट्य देखने के बजाए सोशल मीडिया पर समय बिताना अधिक पसंद करते हैं। बेशक सोशल मीडिया का अपना अलग महत्व है लेकिन अपनी स्वस्थ परंपराओं को जीवित रखना भी ज़रूरी है, भले ही यह एक अनुष्ठान की तरह ही क्यों न हो।     
 
बुंदेलखंड में आज से पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक विद्यालयों में ग्रीष्मावकाश होना बच्चों के लिए किसी महा-उत्सव से कम नहीं होता था। वार्षिक परीक्षा के दौरान भी एक उत्साह मन में कुलबुलाता रहता था कि इस बार छुट्टियों में कहां जाना है और कितना खेलना है। एक मई से 30 जून तक होेने वाले ग्रीष्मावकाश में खेलों की बाढ़ आ जाती थी। जिनको घर से बाहर निकल कर खेलने की अनुमति रहती वे गिल्ली-डंडा, पिट्टू जैसे खेल खेलते। जिन्हें घर के भीतर रह कर खेलने को मिल पाता वे चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा, लंगड़ी धप्पा जैसे खेल खेलते। इन खेलों को खेलने के लिए उन्हें कहीं जा कर प्रशिक्षण प्राप्त नहीं करना पड़ता था। वे सहज प्रवृति से इन खेलों को खेलते। इन खेलों के दौरान बच्चों के बीच परस्पर प्रेम भी बढ़ता और कभी-कभी छोटे-मोटे झगड़े भी होते जो दूसरे दिन तक स्वयं ही समाप्त हो जाते। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। अब बच्चों के परीक्षा परिणाम मेरिट के ‘कटआॅफ’ पर टिके होते हैं। गरमी की छुट्टियां बाद में होती हैं, अगली कक्षा में दाखिला पहले हो जाता है। जिससे उनकी छुट्टियां पढ़ाई के बोझ से मुक्त नहीं हो पाती हैं। उस पर ‘समर कैम्प’ और ‘स्किल डेव्हलपमेंट क्लासेस’, ‘ग्रूमिंग क्लासेस’ ‘काम्पिटीशन क्रैश कोर्स’ आदि नाना प्रकार के शैक्षणिक कैम्प तथा कोर्स रहते हैं जिनमें शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चा ‘क्लासरूम इफैक्ट’ से मुक्त नहीं हो पाते हैं। वे पाश्चात्य ज्ञान भले ही अर्जित कर लें किन्तु अपनी परम्पराओं का ज्ञान उन्हें नहीं मिल पाता है और न ही स्वतः करने की उनकी स्किल  का विकास हो पाता है। जबकि पारंपरिक खेल बच्चों द्वारा ही ईजाद किए जाते रहे हैं और उनमें संशोधन, परिवर्द्धन भी बच्चों द्वारा ही किया जाता रहा ।

बुन्देली लोकसंस्कृति भी जीवन के अनुरुप मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने में सक्षम रही है। इस तथ्य का एक उदाहरण उन खेलों को के रूप में देखा जा सकता है जिन्हें बालिकाएं सहज भाव से बड़ी रूचि के साथ खेलती बुन्देली बालिकाएं जिन खेलों को खेलती हैं उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए तो उन खेलों की उपादेयता का पता चलता है। ये खेल अंतः क्रीड़ा (इनडोर गेम) तथा बर्हिक्रीड़ा (आउटडोर गेम) दोनों तरह के होते थे। जिन खेलों को कमरे, आन्तरिक आंगन, छज्जे, अटारी अथवा छत पर खेला जा सकता है वे इनडोर गेम की श्रेणी में आते थे। इसके विपरीत जिन खेलों को बाहरी आंगन, मैदानों, खलिहान के परिसर में खेला जाता था वे आउटडोर गेम कहलाते। 
बुन्देलखण्ड बालिकाओं में जो खेल अधिक लोकप्रिय हैं तथा परम्परागत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक प्रवाहित होते आ रहे हैं, वे हैं- चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा, लंगड़ी धप्पा अथवा गपई समुद्र, गुंइयां बट्ट, घोर-घोर रानी, घोड़ा पादाम साईं, रस्सी-कूद, अंगुल-बित्ता, रोटी-पन्ना, पुतरा-पुतरियां, छिल-छिलाव, आंख-मिंचउव्वल, लंगड़ी छुआउल, छुक-छुक दाना आदि। देश की स्वतंत्रता के पूर्व सुरक्षा की दृष्टि से बुंदेलखंड में बालिकाओं को घर से बाहर कम ही जाने दिया जाता था तथा देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बुन्देलखण्ड में विकास की दर अपेक्षाकृत धीमी रही। ऐसी स्थिति में स्वप्रेरित खेलों ने उनके जीवन को मनोरंजन के साथ-साथ सुदृढ़ता प्रदान की। 

बुंदेली खेलों में चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा जैसे खेल संकटों को दूर कर के उन पर विजय पाने का साहस और कौशल बढ़ाते तो वहीं लंगड़ी धप्पा अथवा गपई समुद्र,  घोड़ा पादाम साईं, रस्सी-कूद, अंगुल-बित्ता, छिल-छिलाव, आंख-मिंचउव्वल, लंगड़ी छुआउल जैसे खेल शारीरिक संतुलन के साथ-साथ व्यायाम और आपसी सामंजस्य की शिक्षा देते। घोर-घोर रानी जैसे खेल अन्याय का विरोध करना सिखाते। वहीं छुक-छुक दाना जैसे खेल छल-कपट के प्रति सचेत रहने की चेतना जगाते। रोटी-पन्ना, पुतरा-पुतरियां जैसे खेल गृहस्थ जीवन, पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं के प्रति सम्वेदनशील बनाते। इस प्रकार बुन्देली बालिकाओं के जीवन में पारम्परिक खेल जीवन के पाठ की भूमिका निभाते हैं।

बालकों में गिल्ली-डंडा, कबड्डी, कुश्ती लोकप्रिय रही। लेकिन आज बालक-बालिकाओं दोनों के हाथों में मनोरंजन के इलेक्ट्राॅनिक उपकरण आ जाने से उन पारंपरिक खेलों से वे दूर होते जा रहे हैं जो उनमें शारीरिक क्षमता का विकास करते तथा आपसी सहयोग भावना को बढ़ाते। अब तो हाथों में झेंगाबाॅक्स का रिमोट अथवा मोबाईल का स्क्रीन होता है और होता है अकेले रहने का जुनून। इस जुनून को पबजी जैसे खेल बढ़ावा दे कर मौत के मुंह तक पहुंचा देते हैं। बुंदेलखंड के बच्चे तो अब अपने पारम्परिक खेलों को ठीक से जानते ही नहीं हैं। यह दशा शहरों में ही नहीं गंावों में भी हो चली है। गिल्ली-डंडा की जगह क्रिकेट ने ले रखा है। अब पढ़ने वाले लड़के कंचे नहीं खेलते। लड़कियां भी चपेटा खेलने के बदले चैटिंग करने में रमी रहती हैं। यही कारण है कि जहंा एक ओर पारंपरिक खेल दम तोड़ रहे हैं वहीं बच्चों की स्वाभाविकता, मासूमियत और खिलंदड़ापन गुम होता जा रहा है। फिज़िकल फिटनेस के लिए पैसे दे कर जुंबा और जिम में भर्ती होने में शान समझा जाता है।   
   
फिर भी कुछ लोग हैं जो बुंदेलखंड के पारम्परिक खेलों को बचाने का उल्लेखनीय प्रयास कर रहे हैं। छतरपुर जिले के ग्राम बसारी में डाॅ. बहादुर सिंह परमार के अथक प्रयासों से विगत 22 वर्ष से लगातार बुंदेली उत्सव का आयोजन किया रहा है। खजुराहो के निकट होने के कारण इस उत्सव का आनंद लेने न केवल स्वदेशी अपितु विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं। बुंदेली खेलों को सहेजने की दिशा में इस उत्सव में बुंदेली खेल प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं। ऐसा ही एक बुंदेली उत्सव दमोह जिले की हटा तहसील में भी होता है। इस उत्सव में भी बुंदेली खेलकूद प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं। झांसी, हटा आदि स्थानों में भी बुंदेली उत्सव मनाया जाता है। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित गौर गौरव उत्सव में भी बुंदेली खेल आयोजित किए गए थे। ये खेल थे-गिल्ली-डंडा, पिट्टू, काना-दुआ, कुश्ती, कबड्डी, गिप्पी आदि। इस तरह के प्रयास देख कर अवश्य लगता है कि अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो विलुप्त होते बुंदेली खेलों के आत्र्तनाद को सुन रहे हैं और उसके अस्तित्व को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु खेलों का सीधा संबंध बच्चों से होता है और जब तक बच्चों को इन खेलों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक इन खेलों की दीर्घजीविता खतरे में रहेगी। (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 01.04 .2021 को प्रकाशित)
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Thursday, March 25, 2021

चर्चा प्लस | इस कोरोना काल में होली का त्योहार, बनाएं यादगार | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस   
 इस कोरोना काल में होली का त्योहार, बनाएं यादगार
     - डाॅ. शरद सिंह
        हमने हमेशा होलिका दहन किया है, हमने हमेशा एक-दूसरे के गालों पर गुलाल मला है। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा। तो क्या कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों के कारण इस बार होली फीकी रहेगी ? हरगिज़ नहीं, अगर हम चाहें तो अपनी इस बार की होली का पूरा आनन्द ले सकते हैं और इसे यादगार भी बना सकते हैं। यह कैसे संभव है? तो आइएआज का ‘चर्चा प्लस’ है इसी मुद्दे पर।
एक व्यक्ति हमेशा टूर पर दूसरे शहरों में जाता था। टूर पर जाने के लिए वह आॅनलाईन बुकिंग कराता। जाने का दिन और गाड़ी तय, लौटने का दिन और गाड़ी तय। हमेशा यही रूटीन। इसमें कुछ भी विशेष नहीं। लेकिन एक बार वह टूर पर बाहर गया और जब लौटने का समय आया तो पता चला कि किसी कारण से उसकी ट्रेन कैंसिल हो गई है। टिकट का पैसा तो आॅनलाईन रिफंड हो जाना था लेकिन समस्या थी वापस घर पहुंचने की। उसने प्राईवेट टैक्सी बुक की और टैक्सी पर सवार हो कर घर लौट पड़ा। दुर्योग से बीच रास्ते में टैक्सी में कुछ ख़राबी आ गई। कई घंटे भूखे-प्यासे रहते हुए सड़क के किनारे गुज़ारने पड़े। जैसे-तैसे टैक्सी में आई ख़राबी दूर हुई और वह व्यक्ति फिर चल पड़ा अपने घर की ओर। इस बीच उसके मोबाईल का चार्ज भी ख़त्म हो गया था। घरवालों से बात किए बिना घंटों गुज़र गए थे। उसे पता था कि उसके घरवाले उसकी चिन्ता में व्याकुल हो रहे होंगे। ड्राईवर के फ़ोन से घरवालों से बात करने का प्रयास किया तो नेटवर्क ने साथ नहीं दिया। तमाम विपरीत परिस्थितियों से जूझता हुआ अंततः वह अपने घर पहुंचा। उसके सकुशल घर पहुंचने पर उसके घर वाले खुश और वह भी खुश। जैसे खुशी की घटना हमेशा चर्चा का विषय बनी रहती है ठीक वैसे ही दुख और कष्ट की घटना भी हमेशा चर्चा का विषय बन कर रोचकता का कारण बना रहती है। वह व्यक्ति आज भी अपनी उस कष्टप्रद यात्रा के बारे में हंस-हंस कर चर्चा किया करता है। सभी रुचिपूर्वक उसके अनुभव भरे उसके संस्मरण सुना करते हैं। यही तो मंत्र होता है विपरीत परिस्थितियों पर विजय हासित करने का और उन्हें अपने अनुकूल ढाल कर यादगार बना लेने का।

इस बार होली का त्योहार आने के पहले ही कोरोना संक्रमण ने फिर अपने पांव पसारने शुरु कर दिए हैं। पिछले साल की तरह इस बार भी होली का त्योहार ऐसे समय में आ रहा है जब एक बार फिर से कोरोना वायरस महामारी का खतरा बढ़ गया है। पिछले कुछ दिनों से कोरोना के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार भी पहले की तरह होली का त्योहार फीका चला जाएगा? होली खेलने की दृष्टि से परिस्थितियां प्रतिकूल हैं। इसलिए जरूरी है कि अपने घर में परिवार के साथ ही होली मनाई जाए। टोलियों में और दूसरों के घर जाकर इस बार होली न खेंले। इससे कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। अक्सर होली में रंग लगाने में लोगों का हाथ, मुंह, आंख सभी संपर्क में आते हैं, इस बार इससे बचना होगा। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों पर नियंत्रण पाने के लिए भारत सरकार की ओर से जारी निर्देश का पालन किया जाना अनिवार्य है। सार्वजनिक स्थानों पर सामूहिक होली मिलन समारोह प्रतिबंधित रहेगा। सार्वजनिक होलिका दहन कार्यक्रम नहीं होगा। हर हाल में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन जरूरी है। सैनिटाइजर का उपयोग करना अनिवार्य है। निज-निवास में होली मिलन में सम्मिलित होने वाले व्यक्तियों की थर्मल स्क्रीनिंग जरूरी है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो आयोजनकर्ता और कार्यक्रम के अहम लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए होली अपने परिवार के साथ घर पर ही मनाना है और सैनिटाइजर का उपयोग करते हुए हर्बल कलर का प्रयोग करना है।

मध्यप्रदेश में ही विगत 7 दिनों के औसत के अनुसार, प्रदेश में प्रतिदिन औसत 1019 पॉजिटिव मामले आ रहे हों तो सतर्कता बरतनी जरूरी है। मध्यप्रदेश में कोरोना के मामले में लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में सरकार सख्ती के साथ-साथ लोगों को जागरूक भी कर रही है। रविवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने राज्य में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को लेकर कहा है कि महामारी की रोकथाम के लिए लॉकडाउन को छोड़कर दूसरे उपाय करने होंगे। इसलिए होली के चल समारोह और मेला प्रतिबंधित रहेंगे। मध्य प्रदेश सरकार ने दो दिन पहले कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए होली के त्यौहार को लेकर गाइडलाइन जारी की है। इसके अनुसार, होली, रंगपंचमी पर न सामूहिक भागीदारी के कार्यक्रम होंगे और न जुलूस निकाला जा सकेगा। होली पर सार्वजनिक कार्यक्रमों को अनुमति नहीं दी जाएगी। कोरोना की नई गाइडलाइन के मुताबिक, होली, रंगपंचमी पर सामूहिक भागीदारी के कार्यक्रम नहीं होंगे। खुले स्थान पर होने वाले बड़े कार्यक्रम भी नहीं होंगे। हालांकि व्यक्तिगत कार्यक्रमों को कहीं नहीं रोका जाएगा। होली के रंग खेलने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होंगे लोगों को अपने घरों में ही होली के रंग खेलनी पड़ेगी। यह तय किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति कोरोना की गाइडलाइन का पालन करता हुआ नहीं पाया जाएगा तो फिर उसके खिलाफ चालानी कार्रवाई की जाएगी।
तो ऐसी परिस्थियों से घबराना कैसा? क्यों न इस बार की होली को ऐसी यादगार बनाई जाए कि इस कोरोना संकट के गुज़रने के बाद हम सभी हंस-हंस के अपने अनूठे अनुभवों को आपस में साझा करते रहे। और आगे चल कर अपने नाती-पोतों को भी मज़े लेते हुए किस्से सुना सकें कि जब एक बार कोरोना आपदा में होली का त्योहार पड़ा तो हमने इस तरह होली मनाई थी। वैसे भी हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होली का त्योहार बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह रंगों का पर्व है। होली आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का त्योहार है। यह आपसी भाईचारा को दर्शाता है। पूर्णिमा की रात को होलिका दहन किया जाता है। उसकी अगली सुबह यानी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को रंग वाली होली खेली जाती है। ज्योतिष विद्वानों का कहना है कि इस साल होली के पर्व पर 500 साल बाद एक अदभुत संयोग बन रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि भी पड़ रही है। साथ ही इसी दिन ध्रुव योग का भी निर्माण भी हो रहा है।  इसी दिन सर्वार्थसिद्धि योग के साथ ही अमृतसिद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। अर्थात इस बार होली सर्वार्थसिद्धि योग के साथ- साथ अमृतसिद्धियोग में मनाई जायेगी। ऐसा दुर्लभ योग 500 साल बाद बन रहा है। इसके पहले यह दुर्लभ योग 03 मार्च 1521 को पड़ा था। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल होली 29 मार्च 2021 को मनाई जायेगी, इस दिन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि भी पड़ रही है। साथ ही इसी दिन ध्रुव योग का भी निर्माण भी हो रहा है।  इसी दिन सर्वार्थसिद्धि योग के साथ ही अमृतसिद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। अर्थात इस बार होली सर्वार्थसिद्धि योग के साथ- साथ अमृतसिद्धियोग में मनाई जायेगी। ऐसा दुर्लभ योग 500 साल बाद बन रहा है। इसके पहले यह दुर्लभ योग 03 मार्च 1521 को पड़ा था। 

तो चलिए तय किया जाए कि इस बार हम कैसे होली मनाएं यह दुर्लभ संयोग वाली होली यादगार बन जाए। हमारे पास आपसी संपर्क का सबसे अच्छे साधन के रूप में सोशल मीडिया तो है ही। तो हम सोशल मीडिया पर हंसी-खुशी के सकारात्मक, उत्साहवर्द्धक संदेश, चित्र, मीम आदि एक-दूसरे को भेज सकते हैं। यदि चाहें तो अच्छी क्वालिटी की डिब्बाबंद मिठाइयां होमडिलीवरी के द्वारा परस्पर भिजवा सकते हैं। सबसे अच्छा है कि परिवार के सभी लोग मिल कर कुछ अच्छा-अच्छा पकाएं और साथ बैठ कर उसे खाने का आनंद उठाएं। होली का सही माने में मजा लेना है तो स्वाद और सेहत दोनों को ध्यान में रखते हुए होली के व्यंजन घर पर ही बनाएं। होली पर घर में बनी ठंडाई, शरबत, गुझिया, कांजी वडा, पापड़ खाएं और इस त्योहार का मजा उठाएं। अगर आप अपने बढ़ते वजन को ले कर परेशान हैं लेकिन साथ ही होली का मजा भी लेना चाहते हैं तो हर चीज खाएं लेकिन सीमित मात्रा में। 

विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत यह भी है कि जो रंग या गुलाल ज्यादा चमकदार होते हैं उनमें ज्यादा कैमिकल मौजूद होते हैं। इसलिए ऐसे रंगों से बचें। क्योंकि रंगों व गुलाल को चमकीला बनाने के लिए उन में घटिया अरारोट या अबरक पीस कर मिला दिया जाता है। बाज़ार में घटिया क्वालिटी के जो रंग बेचे जाते हैं वे ज्यादातर औक्सीडाइज्ड मैटल होते हैं। हरा रंग कौपर सल्फेट, काला रंग लेड औक्साइड से तैयार किया जाता है। ये रंग बहुत ही खतरनाक होते हैं। आंखों को हरे रंग से बचाना बहुत ही जरूरी है। बेहतर यही है कि हर्बल रंगों से होली का आनंद लें। परिवार में एक-दूसरे को हर्बल गुलाल लगाएं। यह शर्तिया कहा जा सकता है कि कोरोना आपदा समाप्त होने के बाद हम अपनी इस होली को एक खास संस्मरण की तरह एक-दूसरे को सुनाएंगे और मजे लेंगे। आखिर होली यादगार होगी तभी तो याद रहेगी वर्षों तक। याद रखें इस बार की होली एक सेहतमंद होली हो। एक शानदार और एक यादगार होली।     
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  (दैनिक सागर दिनकर 25 .03 .2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, March 17, 2021

चर्चा प्लस | भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुवारे | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस 
भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुआरे 
- डाॅ. शरद सिंह
        यदि दुनिया में ‘पाप’ की कोई अवधारणा है तो सबसे बड़ा पाप है - किसी की भावनाओं से खेलना। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे पापियों की कोई कमी नहीं है जो दूसरों की भावनाओं को हथियार बना कर उन्हीं पर वार करते हैं। इंटरनेट की आभासीय दुनिया में सच और झूठ के बीच फ़र्क़ करना बहुत कठिन है। प्रेम और विश्वास के नाम पर छलावा इंटरनेट पर हमेशा सबसे ऊपर ट्रेंड करता रहता है।
कोरोना वायरस आपदा से जब दुनिया अचानक थम-सी गई तो इंटरनेट की दुनिया ने लोगों के बीच की पारस्परिक दूरियों को मिटाया। उन्हें एक-दूसरे से जुड़े रहने में मदद की। लेकिन इंटरनेट ने जीवन को जितना सुविधाजनक बनाया है, इस इंटरनेट से उतने ही ख़तरे बढ़े हैं। आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने वाले लोगों ने इसका इसका प्रयोग अपराध के हथियार के रूप में करने से बाज नहीं आते हैं। भारत इससे अछूता नहीं है। एक मां सोचती रही कि उसका लाड़ला बेटा घंटों अपने कमरे में बैठा पढ़ाई करता रहता है। उसने अपने पढ़ाकू बेटे के खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा। ‘‘मुझे डिस्टर्ब मत करो’’ जैसी झिड़कियां भी झेला। मगर जब भयावह सच्चाई सामने आई तो मां स्तब्ध रह गई। वह अपने जिस बेटे को पढ़ाकू समझती थी। जिसके लिए वह गवर्् से कहती फिरती थी कि मेरा बेटा दिन-रात पढ़ाई में जुटा रहता है, वही बेटा इंटरनेट जुआरी और शराबी निकला।  घटना छत्तीसगढ़ की है। वैसे इस तरह की घटना किसी भी राज्य, किसी भी जिले की हो सकती है। रायगढ़ में 17 साल के एक लड़के ने ऑनलाइन गेम के चक्कर में फंसकर 75 हजार रुपये का कर्ज़ ले लिया और इसी के चलते उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। उसने अपने दोस्त से ‘फ्री फायर’ गेम में गन के अपडेट और बाकी फीचर्स खरीदने के लिए पैसे लिए थे और जिसे वह लौटा नहीं पाया। इससे नाराज होकर उसके दोस्त ने उसे शराब पिलाकर उसका गला काट दिया। इंटरनेट पर ‘पब्जी’, ‘ब्लूव्हेल’ और ‘मोमो’ जैसे आत्मघाती गेमिंग ने कुछ साल पहले ही चेतावनी दे दी थी कि इस तरह के गेम एक नशे की तरह होते हैं और खेलने वाले के मन में चुनौती का जुनून जगा कर उन्हें आत्महत्या या हत्या करने तक को विवश कर देते हैं। युवाओं के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन कर सामने आई है इस तरह की गेमिंग।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डाटा के मुताबिक वर्ष 2017 में 21796 मामले आए, वर्ष 2018 में 27248 मामले आए और वर्ष 2019 में 44546 मामले सामने आए। आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि प्रति वर्ष साइबर क्राइम में वृद्धि होती जा रहा है। सरकार ने इनसे निपटने के लिए साइबर पुलिस स्टेशन, सूचना प्रौद्यिगिकी अधिनियम 2000 में साइबर क्राइम को खत्म करने के लिए कई प्रावाधान जोड़े हैं। लेकिन हमेशा की तरह सिर्फ़ कानून बन जाने से सबकुछ नहीं हो जाता है। महज़ सावधानी ही है जो किसी भी अपराधी से बचाए रखती है। इंटरनेट की दुनिया में अपराध का कोई एक चेहरा नहीं है। किसी भी उम्र, किसी भी लिंग का व्यक्ति इसका शिकार बन सकता है।  
एक युवती सोशल मीडिया एक युवक से दोस्ती कर बैठी। दोनों को परस्पर प्रेम हो गया। युवक ने मीठी और अपनेपन की बातों से लड़की का विश्वास जीता और उसे उकसा कर उसकी कुछ न्यूड फोटो हासिल कर लीं। इसके बाद ही युवती के उस कथित प्रेमी ने अपना असली चेहरा दिखा दिया। उसने युवती को धमकी दी कि अगर वह पैसे नहीं देगी तो तो वह उन न्यूड फोटो को सोशल मीडिया पर अपलोड कर देगा। युवती घबरा गई। आरोपी युवती को लगातार ब्लैकमेल करता रहा और रुपए ऐंठता रहा। उसने लगभग ढाई लाख रुपए ऐंठ लिए। उसके बाद जब युवती ने रुपए दे पाने में असमर्थता जताई तो उस युवक ने कुछ आपत्तिजनक काम कर के रुपए जुटाने के लिए दबाव डाला। जिसके लिए युवती तैयार नहीं हुई और उसने साहस का परिचय देते हुए पुलिस में इसकी शिकायत कर दी। पुलिस ने साईबर क्राईम शाखा की मदद से आरोपी को धर दबोचा। आरोपी को उसके किए की सज़ा तो जरूर मिलेगी लेकिन युवती के विश्वास और सम्मान को जो ठेस पहुंची, उससे उबर पाना उस युवती के लिए बहुत कठिन साबित होगा। लेकिन उसे यह सीख अवश्य मिल गई कि इंटरनेट पर सबकुछ अच्छा या सबकुछ सुरक्षित नहीं होता है। इंटरनेट पर अनेक फ्रेंडशिप साईट्स हैं जहां अपराधियों फ़र्ज़ी परिचय, फ़र्ज़ी तस्वीरें लगा कर अकाउंट खोल लिए जाते हैं। उनके निशाने पर युवक, युवती, बच्चे, बूढ़े सभी होते हैं। इन सबके साथ तरीका एक ही अपनाया जाता है- भावनाओं को भड़का कर अपने प्रभाव में ले लेना और अपने अनुसार चलने को उन्हें विवश करना। बच्चों को गेमिंग के लिए, युवक-युवतियों को प्रेम के नाम पर और बड़े उम्र के व्यक्तियों को उनके एकाकीपन में भावनात्मक सहारा देने का ढोंग कर के उनके साथ छल किया जाता है।  

जहां तक भावनाओं को भड़का कर छल करने का अपराध है तो अभी पिछले दिनों इसी प्रकार की घटना सामने आई जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया। इस घटना में एक पाकिस्तानी महिला एजेंट के हनीट्रैप में भारतीय सेना का एक जवान फंस गया। वह महिला एजेंट वीडियो कॉल पर न्यूड होकर उस जवान से अश्लील बातें किया करती थी। साईबर सुरक्षा के सामने यह तथ्य आने पर उस जवान को सेना की खुफिया जानकारी विदेशी मुल्क को देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अब इस बात की जांच की जा रही है कि उस महिला ने उस जवान से कहीं कोई खुफ़िया बातें तो नहीं जान ली हैं। जाहिर है कि वह पाकिस्तानी महिला ऐजेंट ने सेना के जवान की कमजोर मनोवृत्ति का फ़ायदा उठाया।

इंटरनेट पर सोशल मीडिया तो भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का गढ़ बना हुआ है। जिसके कारण कई बार माहौल गरमाने लगता है और पुलिस व्यवस्था को यथार्थ के बदले आभासीय दुनिया से उपजे खतरों के पीछे दौड़ना पड़ता है। महिलाओं और उसमें भी विशेषरूप से स्कूल-काॅलेज जाने वाली लड़कियों को इससे विशेष खतरा रहता है। बदनीयत लड़के पहले मित्र बनते हैं फिर अवसर पाते ही विशेष ऐंगल से ली गई सेल्फी या फिर मित्रता प्रेम में बदल चुकी हो तो भावुक पलों का मोबाईल-वीडियो बना लेते हैं और फिर उसे इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर लड़की को ब्लैकमेल करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे अपराध पहले नहीं होते थे। लेकिन एक पीढ़ी पहले तक ऐसे अपराधों को उंगलियों पर गिना जा सकता था। तब लड़की द्वारा लिखे गए प्रेमपत्र बदनीयत लड़कों के हथियार होते थे लेकिन वह उन्हें लड़की के माता-पिता या रिश्तेदारों तक ही भेजने की क्षमता रखता था। लेकिन आज एक अपलोड लड़की की गोपनीयता को पल भर में पूरी दुनिया के सामने सार्वजनिक कर सकता है। यह अपराध भावनाओं के साथ किया गया ऐसा अपराध है जो हत्या से भी अधिक जघन्य है। सिर्फ लड़की नहीं वरन किसी सभ्रांत पुरुष या लड़के की आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर उसका जीना हराम करने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि कभी कोई प्रोफेसर इस अपराध की चपेट में आता है तो कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता।

आज का युग कम्प्यूटर, मोबाईल और इंटरनेट का युग है। इंटरनेट की मदद के बिना किसी बड़े काम की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में अपराधी भी तकनीक के सहारे हाईटेक हो रहे हैं। वे अपराध करने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वल्र्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑनलाइन ठगी या चोरी भी इसी श्रेणी का अहम अपराध होता है। किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की श्रेणी में आते हैं। साइबर क्राइम दुनिया भर में सुरक्षा और जांच एजेंसियां के लिए परेशानी का कारण साबित हो रहा है। लेकिन कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाईल का प्रयोग करने वालों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनसे भी जाने-अनजाने में कोई साइबर क्राइम तो नहीं हो रहा है। जहां तक संभव हो आपत्तिजनक संदेशों को फार्वर्ड करने से बचने में ही भलाई है। साथ ही, संदिग्ध-संवेदनशील संदेशों को कुछ पल ठहर कर परखना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जाने-अनजाने हम अपनी भावुकता के हाथों ही ठगे जाएं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सोशल मीडिया के अपराधी दूसरों के दिमाग पर कब्जा कर के अपने अपराधों को अंजाम देते हैं। इसी लिए सतर्क रहते हुए सोशल मीडिया में मौजूद अपराधियों से अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को बचाए रखना जरूरी है। वरना हर साईबर अपराधी ऐसा मछुआरा के जिसके लिए हर इंटरनेट सर्फर जाल में फंसाने योग्य एक मछली है।
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(दैनिक सागर दिनकर 17.03.2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, June 17, 2020

चर्चा प्लस - अमल करने को कहते हैं, अमल करते नहीं खुद ही - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस

अमल करने को कहते हैं, अमल करते नहीं खुद ही
- डाॅ. शरद सिंह

अमल करने को कहते हैं
अमल करते नहीं खुद ही
अगर ग़ाफिल नहीं होते
ग़लत करते नहीं खुद ही

सुरखी उपचुनाव की तैयारियां गरमाने लगी हैं। राजनीतिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। कोरोना संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए जहां केन्द्रीय स्तर पर वर्चुअल रैली निकाली गई वहीं सागर जिले में ‘‘भीड़-जोड़’’ आयोजन हो गया। वैसे सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क को अनदेखा कर के जो भी राजनीतिक आयोजन हो रहे हैं उनके लिए यही कहा जा सकता है कि जोश में होश खोना यानी कोरोना को दावत देना। कोरोना को दावत देना यानी जान जोखिम में डालना।

जी हां, सुरखी उपचुनाव की तैयारियां गरमाने लगी हैं। राजनीतिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। कोरोना संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए जहां केन्द्रीय स्तर पर वर्चुअल रैलियां निकाली जा रही हैं, वहीं सागर जिले में ‘‘भीड़-जोड़’’ आयोजन हो गया। वैसे सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क को अनदेखा कर के जो भी राजनीतिक आयोजन हो रहे हैं, वे आग से खेलने से कम नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि कोई भी सार्वजनिक आयोजन प्रशासन की अनुमति के बिना तो होता नहीं है तो फिर प्रशासन ऐसी गंभीर चूक होने कैसे दे रहा है? माॅनीटरिंग की कमी और तुरंत संज्ञान में लेने में ऐसी ढील आमजनता के संदर्भ में तो देखने को नहीं मिलती है।

इस बार कांग्रेस की बात में दम है। मामला भले ही राजनीतिक मुद्दे के तौर पर हो लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण यह जनहित में अतिसंवेदनशील भी है। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री सुरेंद्र चौधरी और सागर जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश जैन आदि कांग्रेसी नेताओं ने आरोप लगाया है कि कोरोना वायरस को लेकर जारी केंद्रीय गाइड लाइन का खुला उल्लंघन कर मंत्री गोविंद सिंह राजपूत द्वारा बिना अनुमति के राजनैतिक आयोजन किया गया। कांग्रेसी नेताओं ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत पर प्रकरण दर्ज करने की मांग शासन प्रशासन से की। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सुरेंद्र चौधरी के अनुसार विगत 13 जून को मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने सैकड़ों लोगों को एकत्रित कर राहतगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण का कार्यक्रम आयोजित किया जो विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हुआ। सुरेंद्र चौधरी ने प्रमाण सहित यह बात सामने रखी और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर निशाना साधा कि भगवान महावीर स्वामी की जयंती मनाने वालों पर प्रकरण दर्ज कर दिया गया, बंडा में जैन मुनि जी के दर्शन करने पहुंचे लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया, यहां तक कि शवयात्रा में जाने वालों पर भी मामला दर्ज कर दिया गया लेकिन राहतगढ़ सहित अन्य स्थानों पर बिना अनुमति के भारतीय जनता पार्टी के राजनैतिक आयोजन कर शासन की गाइड लाइन की सरेआम धज्जियां उड़ाने की खुली छूट प्रशासन द्वारा दी गई। उल्लेखनीय है कि विगत मई माह में सागर जिले के बंडा में जैनमुनि प्रमाण सागर महाराज और अन्य मुनि विहार करते हुए पहुंचे थे। उनके दर्शनों के लिए बंडा के हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए। उस समय यह मामला बहुत गरमाया था। जब भीड़ का वीडियो सामने आया तो पुलिस व प्रशासन ने इस मामले की जांच शुरू की थी।

सागर जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश जैन ने भी जिला प्रशासन पर आक्षेप लगाया है कि आमजन पर तो गाइडलाइन का पालन करने के लिए सख्ती बरती जाती है जबकि भारतीय जनता पार्टी के लोग शासन की गाइड लाइन का पालन करने के बजाय बिना अनुमति के राजनैतिक आयोजन करते रहते हैं और प्रशासन मौन रहता है। भले ही यह आरोप राजनीति प्रेरित हो लेकिन ध्यान देने योग्य है। आखिर मामला जानलेवा कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलाव से जुड़ा हुआ है। इस समय कोई भी जोखिम उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यूं भी कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या को लेकर सागर की स्थिति अभी सुधरी नहीं है। संक्रमण रोकने की दृष्टि से जिले के अनेक क्षेत्र चौदह दिन से भी अधिक समय से कन्टेमेंट क्षेत्र बने हुए हैं। कन्टेमेंट क्षेत्र की जनता खामोशी से असुविधाओं का सामना कर रही है क्योंकि सवाल संक्रमण को फैलने से रोकने का है।

यहां याद दिलाना ज़रूरी है कि सागर कलेक्टर के आदेश के अनुसार बिना मास्क पहने बाहर निकलने वालों पर सख्त कार्रवाई के साथ ही जुर्माने का प्रावधान है। नियमों का पालन हो सके इसके लिए जिले के संबंधित अधिकारियों को भी निर्देश दिया जा चुका है। जिले में कन्टेमेंट का उल्लंघन करने और बिना काम के बाहर निकलने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के आदेश हैं। कोरोना से बचाव के लिए सुरक्षा नियमों का पालन हो सके इसके लिए जिले की पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है। यह सब कुछ प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया है आमजनता ने। लोगों के मन में संक्रमण का डर अभी भी मौजूद है। हो भी क्यों न, आखिर उन्होंने अपने बीच के लोगों को कोरोना से संक्रमित होते देखा है। फिर भी कुछ नासमझ अपनी नासमझी दिखा ही देते हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद करीब 70-80 फीसदी शहरवासी प्रतिदिन अपने घर से बाहर निकल रहे हैं। उनमें ऐसे भी लोग हैं जो बाजारों में खरीदारी के दौरान शारीरिक दूरी का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोग मास्क लगाने में भी लापरवाही कर रहे हैं। नतीजतन कोरोना संक्रमण की जकड़ में आ रहे हैं और संक्रमितों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं।

जब कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा अभी गहराया हुआ हो तो ऐसे में प्रत्येक राजनीतिक दल के नेताओं को अपनी जिम्मेदारी का ध्यान रखते हुए आपदा नियमों का गंभीरता से पालन करना चाहिए। भावी चुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी पड़ सकता है। इस समय संयम ही सबसे बड़ा शस्त्र है जिससे कोरोना को हराया जा सकता है।
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(दैनिक सागर दिनकर में 17.06.2020 को प्रकाशित)
Charcha Plus Column, Amal Karne Ko Kahate Hain, Amal Karte Nahi Khud Hi -  Sagar Dinkar, Dr (Miss) Sharad Singh, 17.06.2020

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Thursday, June 4, 2020

गुलामी की छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा में 'साउगोर’ (सागर) वल्द ‘इंडिया’ - डाॅ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh  
गुलामी की  छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा में
‘साउगोर’ (सागर) वल्द ‘इंडिया’
           - डाॅ. शरद सिंह
  दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख हमारे देश और मेरे शहर के नाम के मुद्दे पर है ... आप भी पढ़िए...
हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏
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गुलामी की  छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा में
‘साउगोर’ (सागर) वल्द ‘इंडिया’
           - डाॅ. शरद सिंह
            हमारे संविधान में देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत रखे जाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। दिल्ली निवासी याचिकाकर्ता का कहना है कि इंडिया शब्द से अंग्रेजों की गुलामी झलकती है जो कि भारत की गुलामी की निशानी है। इसलिए इस इंडिया शब्द की बजाय भारत का इस्तेमाल होना चाहिए। साथ ही याचिका में कहा गया है कि संविधान के पहले अनुच्छेद में लिखा है कि इंडिया यानी भारत। लेकिन आपत्ति यह है कि जब देश एक है तो उसके दो नाम क्यों है, एक ही नाम का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाए। याचिका में दावा किया गया है कि ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ शब्द हमारी राष्ट्रीयता के प्रति गौरव का भाव पैदा करते हैं इसलिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को संविधान के अनुच्छेद 1 में संशोधन के लिए उचित कदम उठाते हुए ‘इंडिया’ शब्द को हटाकर, देश को ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ कहने का निर्देश देने की मांग की गई है। यह अनुच्छेद इस गणराज्य के नाम से संबंधित है। याचिका में कहा गया है कि संविधान में यह संशोधन इस देश के नागरिकों की औपनिवेशिक अतीत से मुक्ति सुनिश्चित करेगा। याचिका में 1948 में संविधान सभा में संविधान के तत्कालीन मसौदे के अनुच्छेद एक पर हुई चर्चा का हवाला दिया गया है जिसमें उस समय देश का नाम ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ रखने पर ज़ोर दिया गया था।
Name of Sagar , Article - Dr Sharad Singh, Dainik Jagaran, 04.06.2020
      विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्ज़ा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। अभी कुछ अरसा पहले विश्वविख्यात जैन संत आचार्य विद्यासागर ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे हैं और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया है। 
भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ़ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया था कि ‘इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।’ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं ताकि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि  ‘हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?’ उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जिसके कारण सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया, क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ‘इंडिया दैट इज़ भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ‘गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ और ‘भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है। उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है।

   ठीक ऐसे ही गुलामी की छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा है सागर को। सागर के नाम की स्पेलिंग बहुप्रचलन के अनुरुप सही और सरलीकृत किए जाने की यह प्रतीक्षा कोई नई नहीं है। वर्षों व्यतीत हो गए बाट जोहते। लेकिन इस मुद्दे पर कोई पुरजोर प्रयास नहीं किया गया। सबसे अधिक परेशानी तब आती है जब कोई व्यक्ति सागर आने के लिए या सागर से जाने के लिए रेलवे रिजर्वेशन कराता है तो उसे रेलवे की साईट पर सागर ढूंढने पर भी नहीं मिलता है। दरअसल, अंग्रेजी में सागर की प्रचलित स्पेलिंग है ‘एस ए जी ए आर’। राज्य शासन में भी यही स्पेलिंग मान्य है। लेकिन अंग्रेजों ने इसे अपने उच्चारण के हिसाब से ‘साउगोर’ कहा। यानी स्पेलिंग रखी-‘एस ए यू जी ओ आर’। सेना छावनी तथा रेलवे में यही स्पेलिंग चलाई गई, जो आज भी कायम है जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आम व्यवहार में यह स्पेलिंग भारतीय उच्चारण के अनुरुप सरलीकृत हो कर सागर यानी ‘एस ए जी ए आर’ हो गई। आज पत्राचार से लेकर इंटरनेट की विभिन्न साईट्स में सागर की यही स्पेलिंग काम में लाई जा रही है। यह उच्चारण और शब्दों के अनुरुप है तथा लिखने में भी सरल है। फिर भी भारतीय रेलवे में आज भी सागर की स्पेलिंग अंग्रेजों वाली ‘साउगोर’ ही चल रही है। जिससे होता ये है कि जब किसी को सागर के लिए रेलगाड़ियों की जानकारी अथवा रिजर्वेशन कराना होता है तो प्रचलित स्पेलिंग से मध्यप्रदेश में स्थित यह सागर स्टेशन मिलता ही नहीं है। प्रायः कर्नाटक स्थित शिव सागर मिल जाता है। जिससे बड़ा भ्रम उत्पन्न हो जाता है।

    जिस प्रकार देश के दो नामों में से मात्र ‘भारत’ किए के पक्ष में याचिका दायर की गई है उसी प्रकार सागर के नाम की स्पेलिंग ‘साउगोर’ और ‘सागर’ में से हर स्थान पर ‘सागर’ (एस ए जी ए आर) ही होनी चाहिए। संदर्भगत उल्लेखनीय है कि इस लेख की लेखिका (डाॅ शरद सिंह) यानी मैं स्वयं सागर के नाम की अंग्रेजी स्पेलिंग सुधारे जाने के लिए विगत 5 वर्ष से आवाज उठा रही हूं। मेरी इस मांग को संज्ञान में लेते हुए चिंतक एवं समाजसेवी रघु ठाकुर ने भी अपनी ओर से प्रयास किया और दिल्ली रेल मंत्रालय को भी पत्र लिखा। इस संबंध में सांसद राज बहादुर सिंह ने भी आश्वस्त किया था कि वे इस दिशा में प्रयास करेंगे। मार्च 2020 में इस संबंध में निर्णय होने की संभावना थी किंतु कोरोना संकट के चलते इस कार्य में फिलहाल व्यवधान आ गया है। अब जरूरत है इस संबंध में पुरजोर आवाज़ उठाए जाने की। सच तो यह है कि जनआंदोलन के अभाव में ‘सागर’ वल्द ‘भारत’ आज भी ‘साउगोर’ वल्द ‘इंडिया’ के रूप में गुलामी की छाप ढो रहा है।        
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(दैनिक जागरण में 04.06.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, May 20, 2020

लोग कोरोना त्रस्त, अपराधी अपराध में मस्त - डाॅ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh

लेख 

लोग कोरोना त्रस्त, अपराधी अपराध में मस्त
  - डाॅ. शरद सिंह

         बुंदेली में एक कहावत है कि ‘एक तो दूबरे ऊपे से दो असाढ़ें’। यानी एक तो पहले ही बड़ा गहरा संकट और उस पर एक और संकट आ जाना। कोरोना महामारी से बढ़ कर इस समय कोई संकट नहीं है। यह एक ऐसा संकट है जिसने सभी लोगों को एक ही नाव पर सवार कर दिया है। सोशल डिक्टेंसिंग, प्रवासी मजदूरों का सैंकड़ों की तादाद में सागर, दमोह, टीकमगढ़ से हो कर गुरज़ना। शहर के भीतरी तबके में कोरोना ब्लास्ट। कुलमिला कर संकटों की कोई कमी नहीं। लम्बे हो चले लाॅकडाउन से उकताई हुई जनता। बिना थके डटे हुए कोरोना वारियर्स। इस सारे परिदृश्य के बीच निरंतर बढ़ते अपराध के आंकड़े देख कर अपराधियों को कोसने का मन करता है। एक तो लोग पहले से परेशान हैं और उस पर आए दिन चोरों के धावे। इन चोरों, अपराधियों को शर्म भी नहीं आती है क्या? पुलिसतंत्र जनता की सुरक्षा हेतु लाॅकडाउन को टूटने से बचाने, आमजन की मदद करने में व्यस्त है। अब महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों से उत्तर प्रदेश के लिए सागर से हो कर गुज़रने वाले प्रवासी श्रमिकों को सुरक्षित उत्तर प्रदेश की सीमा तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी पुलिस पर ही है। अब वे कोरोना से जुड़ी व्यवस्थाएं सम्हालें या चोरों और अपराधियों के पीछे भागें? जब पूरा शहर, पूरा समाज, पूरी मानवता जीवन-संकट के दौर से गुज़र रही हो तब अपराध घटित होना मानवता पर दाग़ लगने के समान है। 
सागर शहर के भगवानगंज इलाके में आॅटोपार्टस और हार्डवेयर की कई छोटी-बड़ी दूकानें हैं। उनमें से एक दूकान में पिछवाड़े से दरवाज़ा तोड़ कर अज्ञात बदमाश घुस गए। उन्होंने दूकान के लाॅकर में रखे एक लाख सत्तर हज़ार रुपयों पर हाथ साफ़ कर दिया। भगवानगंज से ही लगे हुए इलाके सदर में एक सूने मकान से चोरों ने लगभग 80 हज़ार रुपए के सोने-चांदी के ज़ेवर चुरा लिए। उल्लेखनीय है कि यह सदर क्षेत्र इनदिनों कोरोना ब्लास्ट का केन्द्र होने और कंटनमेंट जोन बनने के कारण 24 घंटे पुलिस की सख्त निगरानी में है। जिनके घर से जेवर चोरी गए वे दम्पत्ति पिछले दो माह से शहर से बाहर थे। इसी सप्ताह घर लौटने पर उन्हें वरदात का पता चला। चोरों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने सागर शहर के ही मोतीनगर थाना क्षेत्र में एक दालमिल के निकट के एक मंदिर के ताले तोड़ कर दानपेटी में रखी नगदी उड़ा दी। विडम्बना यह कि एक ओर मंदिर पुजारी संघ मंदिरों पर ताले डल जाने के कारण उत्पन्न अपने आर्थिक संकट के बारे में सरकार से गुहार लगाने को विवश हो गया और वहीं दूसरी ओर चोर-मंडली मंदिरों की दानपेटियों पर धावा बोल रही है। 
टीकमगढ़ में तो शराबी सीधे पुलिस से ही भिड़ गए। हुआ यूं कि लाॅकडाउन के कारण लोग अपने-अपने घरों में थे मगर कुंवरपुरा रोड स्थित ब्राह्मण कॉलोनी के सामने एक मकान में कुछ युवक शराब पीकर मोहल्ले में गाली-गलौज करने लगे। मना करने पर वे युवक लड़ने के लिए उतारू हो गए तो मोहल्ले के लोगों ने डायल 100 को सूचना दी। पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उन्हें थाने चलने को कहा तो वे पुलिस से ही भिड़ गए।

बात अपराधियों के हौसलों की कही जाए तो दमोह के गैसाबाद थाना के हिनौता कला में एटीएम में की गई डकैती की चर्चा आएगी ही। हिनौता कला में रात 9.05 बजे एटीएम बूथ में लूट की वारदारत को फिल्मी स्टाईल अंजाम दिया गया। एटीएम बूथ में लूट की वारदात को अंजाम देने के लिए पहुंचे बदमाशों ने पहले बूथ में डायनामाइट फिट किया फिर उसमें बाइक से तार जोड़कर विस्फोट किया। शायद उन्हें इस बात की जानकारी थी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे बंद हैं। विस्फोट के कारण एटीएम में रखे रुपए हवा में उड़ने लगे। अपराधी उन्हें बटोरने में जुट गए। उसी दौरान ग्रामीणों ने विस्फोट की आवाज़ सुन कर एटीएम की ओर रुख किया लेकिन डकैतों ने माउजर लहरा कर ग्रामीणों को धमकाया और वहां से रुपए ले कर निकल गए।
लाॅकडाउन के कारण अपराध का ग्राफ कुछ तो नीचे आया क्योंकि इस दौरान अधिकांश घर सूने नहीं रहे। लेकिन दूकानें चोरों कें लिए आसान निशाना रहीं। इस दौरान एक और तरह का अपराध तेजी से बढ़ा है। राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी और मार्च की तुलना में अप्रैल में महिलाओं संबंधी साइबर क्राइम की संख्या बढ़ी है। 25 मार्च से 25 अप्रैल तक साइबर अपराध की कुल 412 शिकायतें मिली हैं जिनमें 396 शिकायतें अश्लील प्रदर्शन, अश्लील वीडियो, धमकी, फिरौती की मांग से लेकर ब्लैकमेल करना तक की थीं।  महिलाओं की तस्वीरों में छेड़-छाड़ कर उनकी मॉर्फ्ड तस्वीरों को इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दिए जाने संबंधी शिकायतें मिलीं। जब पूरा देश बंद है, लोग घर से काम कर रहे हैं और इंटरनेट पर काफी समय बिता रहे हैं तो साईबर अपराधी भी सक्रिय हो गए हैं। हर किसी को जो इंटरनेट से जुड़ा है उसे भी सतर्क रहना होगा। 

लाॅेकडाउन 1.0, 2.0, 3.0 और अब 4.0 में आम जन-जीवन की अधिकांश गतिविधियां बंद रहीं लेकिन अपराधियों की गतिविधियां इस दौरान भी ज़ारी रहीं। चरित्र पर संदेह के कारण हत्या, आपसी रंजिश के कारण हत्या, बेटे द्वारा पिता की हत्या, प्रेमियों द्वारा आत्महत्या, आर्थिक तंगी से परेशान हो कर आत्महत्या, बलात्कार, मारपीट, चोरी-डकैती थमी नहीं। क्योंकि लोग कोरोना से त्रस्त है और अपराधी अपराध में मस्त हैं। 
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(दैनिक जागरण में 20.05.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, May 14, 2020

तीन पहियों पर सवार जीने की ज़द्दोज़हद- डाॅ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
तीन पहियों पर सवार जीने की ज़द्दोज़हद
- डाॅ. शरद सिंह
मित्रो, आज दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख जो समर्पित है लॉकडाउन में मुबंई से उ.प्र. ऑटो से घर लौटते मज़दूरों की दुर्दशा को...
❗हार्दिक आभार "दैनिक जागरण" 🙏
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लेख- 
प्रवासी मजदूरों की घर वापसी :
तीन पहियों पर सवार जीने की ज़द्दोज़हद
- डाॅ. शरद सिंह                                                                
      दृश्य 1:- सागर के भैंसा नाका के पास लम्बी कतार सोशल डस्टेंसिंग के साथ भोजन पाने के लिए। गुरुद्वारा कमेटी का लंगर भरसक प्रयास में जुटा हुआ है कि कोई भी मजदूर और उसका परिवार वहां से भूखा न गुज़रे। प्रतिदिन 10 से 12 हज़ार प्रवासी मज़दूर सागर से गुज़र रहे हैं जो महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश की ओर जा रहे हैं। सायकिल और पैदल के साथ ही सैंकड़ों आॅटोरिक्शा से भरी हुई हैं हाईवे। जिस हाईवे पर लम्बी दूरी की आॅटोरिक्शा चलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, उस हाईवे पर महाराष्ट्र के रजिस्ट्रेशन वाली आॅटोरिक्शा की लम्बी कतार देख कर अपनी आंखों पर यक़ीन करना कठिन हो जाता है। 
Dainik Jagaran, Article of Dr (Miss) Sharad Singh, 14.05.2020
      दृश्य 2:- सागर के लेहदरा नाके पर लगभग दो घंटे से अधिक समय तक लगी रही लम्बी कतार। लगभग एक-सी कहानी है सागर से हो कर गुज़रते हर मजदूर परिवार की, चाहे वह किसी फैक्ट्री में काम करता रहा हो, वह होटल में बरतन धोता रहा हो, साग-सब्जी की रेहड़ी लगाता रहा हो या फिर आॅटोरिक्शा चलाता रहा हो। 
जगप्रसाद मुंबई में आॅटो चलाते थे। लाॅकडाउन लागू होते ही उनकी आॅटो चलना बंद हो गई। लाॅकडाउन के पहले चरण में इस उम्मींद में वे वहीं टिके रहे कि शायद संकट जल्दी टल जाए। पर ऐसा हुआ नहीं। अपनी कमाई का आधा हिस्सा वे पहले ही अपने गंाव सीतापुर (उ.प्र.) भेज चुके थे। बचे हुए पैसों से कुछ दिन जैसे तैसे कटे। मुंबई जैसे शहर में जहां बिना पैसों और बिना रोजगार के एक पल टिकना कठिन हो वहां अपने चार बच्चे और पत्नी के साथ जगप्रसाद भला कितने दिन काट पाते। जमापूंजी खत्म होते-होते उन्होंने अपने साथियों की सलाह मानी और मुंबई छोड़ कर अपने गांव लौटने का फैसला किया। तब तक बस, ट्रेन पर लाॅडडाउन पूरी तरह लागू हो चुका था। कुछ ट्रकें चोरी-छिपे मजदूरों को महाराष्ट्र से बाहर पहुंचा रही थीं। लेकिन वे जितने पैसे मांगती थीं उतने जगप्रसाद के पास नहीं थे। सौभाग्य से जगप्रसाद का अपना आॅटोरिक्शा था। वे और उनके पांच साथी अपने-अपने आॅटोरिक्शा पर अपने परिवार ले कर मुंबई से निकल पड़े। वहां से निकलना आसान नहीं था। निकलने के पहले खोली (एक कमरे का मकान) मालिक ने खोली का किराया मांगा। उसने शर्त रखी कि या तो वे आॅटोरिक्शा छोड़ जाएं या फिर किराया चुका दें। जगप्रसाद और उसके साथियों ने किराया चुकाना उचित समझा। नतीजन उनके पास बच्चों के लिए दूध खरीदने के पैसे भी नहीं बचे। जो बचे थे उसे बचा कर रखना था आॅटोरिक्शा के ईंधन के लिए। चार छोटे बच्चे और उन बच्चों की कमजोर-सी मां। पांचों का दायित्व जगप्रसाद पर। मगर घर पहुंच कर अपने परिवार की जान बचाने की ललक ने उन्हें जीवटता प्रदान की और वे अपने ईष्टदेव का नाम ले कर मुंबई से निकल पड़े। जगप्रसाद ने मीडिया को बताया कि मध्यप्रदेश में प्रवेश करने के बाद उन्हें जगह-जगह पर सहायता मिली और भोजन-पानी मिलता रहा। सागर के बाद वे उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश कर जाएंगे। उन्हें पूरी उम्मींद है कि वे अपने गांव सकुशल पहुंच जाएंगे। वहां पहुंचने के बाद उनकी रोजी-रोटी का क्या होगा, इस सवाल का उत्तर फिलहाल उनके पास नहीं है क्योंकि घर लौटने वालों की संख्या अधिक है और गांव वही हैं जिन्हें वे रोजगार न मिलने के कारण छोड़ कर मुंबई गए थे। अब मुंबई ने उन्हें छोड़ दिया है, शायद गंाव उन्हें अपना ले। देश के प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पैकेज के बारे में अभी उन्हें कोई जानकारी नहीं है लेकिन शायद अपने गांव पहुंचने पर उन्हें कोई सहारा मिल जाए। अभी तो एक-एक आॅटो में पांच से सात लोग सवार हो कर दूरियां तय कर रहे हैं इनके साथ कई दुधमुंहे बच्चे भी हैं जिन्होंने अभी दुनिया को ठीक से देखा ही नहीं है।

सागर से गुज़रने वाले सैकड़ों आॅटोरिक्शा में सभी आॅटो मालिक नहीं हैं कुछ जान-परिचय में ‘लिफ्ट’ ले कर साथ चल पड़े हैं। ऑटो से उत्तर प्रदेश जाने वाले मजदूरों ने पत्रकारों को बताया कि महाराष्ट्र की बाॅर्डर पर चेक पोस्ट पर ऑटो नहीं निकलने दे रहे हैं। कुछ ऑटो में पुलिस ने लाठी मारी तो लौट गए, हम लोग यह सोचकर निकल आए कि यहां कोरोना से मरें या घर पहुंचने की ज़द्दोजहद में भूख-प्यास से मरें। एक बार किस्मत आजमा कर देख लें। शायद खुद को और अपने परिवार को बचा पाएं।  तन और मन की टूटन के आगे हार रहे हैं कुछ मजदूर। निजी और प्रशासनिक सहायता भी उनकी हताशा को सम्हाल नहीं पा रही है। वेे घर से निकले थे अपना गांव छोड़ कर। कुछ अपनों को साथ ले कर तो कुछ अपनों को वहीं छोड़ कर। मुंबई, देश की औद्यौगिक राजधानी का दर्ज़ा रखने वाली मुंबई। सपनों को पूरा करने वाली नगरी मुंबई। उसी मुंबई की ‘लाईफ लाईन’ का एक बड़ा अभिन्न हिस्सा वहां से विस्थापित हो गया है। वे जहां से भी गुज़रते हैं, वहां ऐसा दृश्य निर्मित हो जाता है मानो किसी एक देश के शराणार्थी किसी दूसरे देश जा रहे हों। गनीमत यही है कि इन विस्थापितों को दूसरे देश में नहीं अपितु अपने ही देश में प्रवासी मजदूर के रूप में दूरी नापनी पड़ रही है। अपना देश, अपने लोग होने के कारण उन्हें रास्ते में सहायता भी मिल रही है। कहीं भोजन, तो कहीं पानी तो कहीं दवाएं। लेकिन ये सब सहायताएं उनके घाव पर ठंडक तो रख रही हैं लेकिन घाव नहीं भर पा रही हैं। नाकाफी है यह सब कुछ इन प्रवासी मजदूरों की संख्या के सामने।  

जिस मुंबई ने उन्हें सहारा दिया था उसी ने उन्हें बेसहारा कर दिया। यह चुभन उनके दिल के घाव को नासूर बनाती जा रही है। फिर भी यह अच्छी बात है कि हौसला देने वाले उन्हें हौसला दे रहे हैं कदम-कदम पर सहायता के रूप में।      
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(दैनिक जागरण में 14.05.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 1, 2020

शून्यकाल ...भावनाओं से खेलते सोशल मीडिया के अपराधी - डाॅ. शरद सिंह

शून्यकाल ...
भावनाओं से खेलते सोशल मीडिया के अपराधी
 
- डाॅ. शरद सिंह


आज सोशल मीडिया पर जिस तरह भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है उसे देख कर सुदर्शन की कहानी ‘हार की जीत’ याद आती है। उस कहानी में डाकू खड्गसिंह एक अपाहिज बन कर सहायता मांगता हुआ बाबा भारती के पास पहुंचा और उनकी सद्भावनाओं से खिलवाड़ करता हुआ उनका घोड़ा ले उड़ा था। तब उसे रोक कर बाबा भारती ने कहा था कि “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।“ बाबा भारती कम से कम डाकू खड्गसिंह को यह कह तो सके लेकिन इंटरनेट की आभासीय दुनिया में फ़र्ज़ी आईडी वाले डाकुओं की कोई कमी नहीं है और ये डाकू जनता की भावनाओं पर बेख़ौफ़ डकैती डालते रहते हैं। 

शून्यकाल ...भावनाओं से खेलते सोशल मीडिया के अपराधी - डाॅ. शरद सिंह
      मुझे व्हाट्एप्प की मैसेजेस की भीड़ से घबराहट होती है। उस पर आमतौर पर ऊलजलूल संदेशों से भरे हुए व्हाट्एप्प ग्रुप से तो भगवान बचाए। संदेशों की ये बाढ़ मोबाईल की मेमोरी को तो डुबा ही देती है, साथ ही दिमाग की बत्ती भी गुल कर देती है। फिर भी कई ग्रुप एडमिन जागरूक होते हैं और वे सजगता के साथ अपने ग्रुप का संचालन करते हैं। ऐसे ही एक ग्रुप से मैं भी जुड़ी हूं। उस ग्रुप में विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवी हैं। लेकिन जब बात भावनाओं की हो तो तर्क पीछे छूट जाते हैं। पिछले दिनों इसी तरह का उदाहरण मेरे सामने आया। उस व्हाट्एप्प ग्रुप के एक सदस्य ने एक तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर में अपने माता-पिता के साथ दो बच्चे दिखाई दे रहे थे। एक लड़का और एक लड़की। अबोध आयु के।
तस्वीर के साथ संदेश लिखा था कि-‘‘यह परिवार एक नैनो में सफर कर रहा था देवास के पास कार का सीरियस एक्सीडेंट हो गया और दोनों मां-बाप एक्सपायर हो चुके हैं। दोनों बच्चे अपना पता एड्रेस बताने में असमर्थ हैं। कृप्या इस तस्वीर को फार्वर्ड करने की कुपा करें।’’
निश्चितरूप से बड़ा मार्मिक संदेश था जिसे पढ़कर कोई भी व्यक्ति बिना सोचे-विचारे उस पोस्ट को आगे बढ़ा देगा। मैंने भी उस पोस्ट को पढ़ा लेकिन देर से। तब तक उस व्हाट्एप्प ग्रुप के एडमिन चैतन्य सोनी जो एक जागरूक पत्रकार हैं, उस पर टिप्पणी कर चुके थे। मैंने उनकी टिप्पणी पढ़ी।
उनकी टिप्पणी थी कि -‘‘ये फोटो क्या नैनो कार में से मिली है?’’
फिर उनकी दूसरी टिप्पणी थी -‘‘शायद फेक है यह।’’
जाहिर है कि एक पत्रकार की नज़र ने उस जालसाजी को ताड़ लिया जो आम व्यक्ति नहीं ताड़ सकता है। मैंने भी ध्यान से देखा, वह फोटो बहुत ही अच्छी हालत में और एकदम साफ़सुथरी थी। लिहाजा उसका उस दुर्घटनाग्रस्त कार से मिलना तो संभव नहीं था। और जब बच्चे अपने घर का पता नहीं बता पा रहे थे तो वह फोटो व्हाट्एप्प मैसेज करने वाले को कहां से मिल गई? न जाने किस परिवार की फोटो का इस तरह दुरुपयोग किया गया था। उस व्हाट्एप्प ग्रुप में जिन्होंने उस पोस्ट को शेयर किया था, वे एक प्रबुद्ध व्यक्ति हैं लेकिन स्वाभाविक है कि भावुकता में वे इस पक्ष पर नहीं सोच सके होंगे और जब यह संदेश उनके पास आया होगा तो उन्होंने उसे ग्रुप में शेयर कर दिया। जब दुर्घटना और बच्चों के साथ किसी त्रासदी की बात हो तो कोई भी व्यक्ति व्याकुल हो उठेगा और जल्दी से जल्दी उनकी सहायता के लिए तत्पर हो जाएगा। इसमें उन प्रबुद्ध सदस्य का कोई दोष नहीं था। लेकिन यहीं प्रश्न उठता है कि यदि इसी तरह फर्जी संदेश सोशल मीडिया में पोस्ट और फार्वर्ड होते रहेंगे तो सच्ची घटना घटने पर अथवा सही संदेश पर कोई क्यों ध्यान देगा? दरअसल, चंद खुराफातियों ने संवेदनशील लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने का हथियार बना रखा है सोशल मीडिया को। वहीं इसे कानून की दृष्टि को देखा जाए तो यह साईबर क्राईम है।

2 अप्रैल 2018 को देश के विभन्न हिस्सों में प्रदर्शन के दौरान जो दंगे, आगजनी और मौतें हुईं उसमें भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए भड़काऊ संदेशों का बड़ा हाथ रहा। उसके बाद सभी संवेदनशील क्षेत्रों में प्रशासन के द्वारा इंटरनेट पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी। इससे उन भड़काऊ संदेश भेजने वालों का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन शेष जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आजकल ई-बैंकिग का चलन है। आपात या तुरंत पैसे भेजने के लिए ई-बैंकिंग या इंटरनेट पर आधारित अन्य माध्यम ही अपनाए जाते हैं। इंटरनेट को बंद किए जाने पर न जाने कितने लोगों को समय पर पैसे नहीं मिल पाए होंगे। न जाने कितने लोग बस, रेल या हवाई रिजर्वेशन न करा पाने पर अपने अवसरों से वंचित हो गए होंगे। इन सबसे बड़ा नुकसान व्यापार जगत को हुआ। ई-मार्केटिंग तो ठप्प हुई ही, साथ ही सामान्य बाज़ार भी लड़खड़ा गया। प्रशासन जानता था कि इंटरनेट सेवा रोकने से यह सब होगा लेकिन वह मजबूर था। क्योंकि यदि इंटरनेट सेवा जारी रहती तो भड़काऊ संदेश आग उगलते रहते और उसमें आमजनता की जान और माल जलते रहते। जो सुविधा इंसान को इंसान के करीब लाने और परस्पर मित्र बनाने के लिए ईजाद की गई, उसका इस तरह घृणित उपयोग किया जाना इंसानियत को लज्जित करता है।
विभिन्न धर्मों के देवी-देवता को ले कर अभद्र संदेशों का अदान-प्रदान अकसर होता रहता है। जिसके कारण कई बार माहौल गरमाने लगता है और पुलिस व्यवस्था को यथार्थ के बदले आभासीय दुनिया से उपजे खतरों के पीछे दौड़ना पड़ता है। महिलाओं और उसमें भी विशेषरूप से स्कूल-काॅलेज जाने वाली लड़कियों को इससे विशेष खतरा रहता है। बदनीयत लड़के पहले मित्र बनते हैं फिर अवसर पाते ही विशेष ऐंगल से ली गई सेल्फी या फिर मित्रता प्रेम में बदल चुकी हो तो भावुक पलों का मोबाईल-वीडियो बना लेते हैं और फिर उसे इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर लड़की को ब्लैकमेल करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे अपराध पहले नहीं होते थे। लेकिन एक पीढ़ी पहले तक ऐसे अपराधों को उंगलियों पर गिना जा सकता था। तब लड़की द्वारा लिखे गए प्रेमपत्र बदनीयत लड़कों के हथियार होते थे लेकिन वह उन्हें लड़की के माता-पिता या रिश्तेदारों तक ही भेजने की क्षमता रखता था। लेकिन आज एक अपलोड लड़की की गोपनीयता को पल भर में पूरी दुनिया के सामने सार्वजनिक कर सकता है। यह अपराध भावनाओं के साथ किया गया ऐसा अपराध है जो हत्या से भी अधिक जघन्य है। सिर्फ़ लड़की नहीं वरन किसी सभ्रांत पुरुष या लड़के की आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर उसका जीना हराम करने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि कभी कोई प्रोफेसर इस अपराध की चपेट में आता है तो कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता।
भारत में भी साइबर क्राइम मामलों में तेजी से बढ़त हो रही है। सरकार ऐसे मामलों को लेकर बहुत गंभीर है। भारत में साइबर क्राइम के मामलों में सूचना तकनीक कानून 2000 और सूचना तकनीक (संशोधन) कानून 2008 लागू होते हैं। मगर इसी श्रेणी के कई मामलों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), कॉपीराइट कानून 1957, कंपनी कानून, सरकारी गोपनीयता कानून और यहां तक कि आतंकवाद निरोधक कानून के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है। साइबर क्राइम के कुछ मामलों में आईटी डिपार्टमेंट की तरफ से जारी किए गए आईटी नियम 2011 के तहत भी कार्रवाई की जाती है। इस कानून में निर्दोष लोगों को साजिशों से बचाने के इतंजाम भी हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों, ई-मेल, चैट वगैरह के जरिए बच्चों या महिलाओं को तंग करने के मामले अक्सर सामने आते हैं। इन आधुनिक तरीकों से किसी को अश्लील या धमकाने वाले संदेश भेजना या किसी भी रूप में परेशान करना साइबर अपराध के दायरे में ही आता है। किसी के खिलाफ दुर्भावना से अफवाहें फैलाना, नफरत फैलाना या बदनाम करना भी इसी श्रेणी का अपराध है। इस तरह के केस में आईटी (संशोधन) कानून 2009 की धारा 66 (ए) के तहत सजा का प्रावधान है। दोष साबित होने पर तीन साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है। ई-मेल स्पूफिंग और फ्रॉड के मामलों में आईटी कानून 2000 की धारा 77 बी, आईटी (संशोधन) कानून 2008 की धारा 66 डी, आईपीसी की धारा 417, 419, 420 और 465 लगाए जाने का प्रावधान है।

आज का युग कम्प्यूटर, मोबाईल और इंटरनेट का युग है। इंटरनेट की मदद के बिना किसी बड़े काम की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में अपराधी भी तकनीक के सहारे हाईटेक हो रहे हैं। वे अपराध करने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वल्र्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑनलाइन ठगी या चोरी भी इसी श्रेणी का अहम अपराध होता है। किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की श्रेणी में आते हैं। साइबर क्राइम दुनिया भर में सुरक्षा और जांच एजेंसियां के लिए परेशानी का कारण साबित हो रहा है। लेकिन कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाईल का प्रयोग करने वालों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनसे भी जाने-अनजाने में कोई साइबर क्राइम तो नहीं हो रहा है। जहां तक संभव हो आपत्तिजनक संदेशों को फार्वर्ड करने से बचने में ही भलाई है। साथ ही, संदिग्ध-संवेदनशील संदेशों को कुछ पल ठहर कर परखना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जाने-अनजाने हम अपनी भावुकता के हाथों ही ठगे जाएं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सोशल मीडिया के अपराधी दूसरों के दिमाग पर कब्ज़ा कर के अपने अपराधों को अंजाम देते हैं। इसी लिए सतर्क रहते हुए सोशल मीडिया में मौजूद अपराधियों से अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को बचाए रखना जरूरी है।
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(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 10.02.2020)
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