Friday, October 23, 2026
बतकाव बिन्ना की | काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Thursday, October 22, 2026
चर्चा प्लस | बुंदेलखंड का दशहरा और उसकी रोचक परम्पराएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
बुंदेलखंड का दशहरा और उसकी रोचक परम्पराएं
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
दशहरा अपने आप में एक परंपरा है बुराई पर अच्छाई की विजय को स्मरण करने की। यूं तो समूचे देश में दशहरा मनाया जाता है फिर भी हर क्षेत्र में त्योहारों को मनाने की अपनी अलग परंपराएं और अपनी अलग शैली होती है। बुंदेलखंड में भी धूम-धाम से दशहरा मनाया जाता है लेकिन अपनी अलग परंपराओं के साथ। इस दिन सुबह से नीलकंठ के दर्शन करना अच्छा माना जाता है। दरअसल, कई रोचक परम्पराएं त्योहारों को और अधिक रोचक बना देती हैं और कभी-कभी कुछ परम्पराएं जानबूझ कर छोड़ दी जाती हैं, ताकि त्योहार अच्छे और अहिंसक संदेश दे सकें। तो चलिए आज की चर्चा में आनंद लीजिए बुंदेलखंड दशहरा और उसकी रोचक परंपराओं का!
बुंदेलखंड में दशहरा से जुड़ी कई अनूठी परम्पराएं है जिनमें से कुछ बंद कर दी गईं और कुछ आज भी जारी हैं। जो परंपराएं जारी हैं उनमें से एक है दशहरा पर पान खिलाने की परम्परा। आज भी यह परम्परा उत्साह के साथ बखूबी निभाई जा रही है। घरों में भी लोग पान लगा कर रखते हैं। घरों में आने वाले अतिथियों को भी पान खिलाकर इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। अतिथि भी अपने साथ पान लाते। परस्पर एक-दूसरे को पान का बीड़ा देते हुए कहते हैं-‘‘दशहरा का राम-राम पहुंचे जू !’’ दरअसल यह पान उस विजय का प्रतीक होता है जो दशहरे का मूल आधार है। राजाओं के समय में युद्ध के पूर्व चुनौती के रूप में एक राजा दूसरे के पास पान का बीड़ा भेजता था। उस बीड़े को स्वीकार करने का अर्थ होता था, चुनौती को स्वीकार करना। इसके बाद दोनों युद्ध करते थे। युद्ध में जो पक्ष विजयी होता वह विजय उत्साह में पान का बीड़ा चबाता और अपनी विजय का उत्सव मनाता। चूंकि दशहरा रावण पर राम की विजय का पर्व है इसलिए इस अवसर पर बुंदेलखंड में पान खाकर और खिला कर बुराई पर अच्छाई की विजय की खुशियां मनाई जाती हैं।
एक और परंपरा है मछली दर्शन और जाल डालने की। यह लगभग समाप्त होती जा रही है। बस, ग्रामीण अंचलों में अभी इसे देखा जा सकता है वरना शहरी क्षेत्र में पूरी तरह लुप्त हो गई है। बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में यह परंपरा दशहरे से दीपावली तक मनाई जाती है तो कहीं-कहीं सिर्फ़ दीपावली से पहले मछली दर्शन किए जाते हैं। मुझे याद है कि मेरे घर खाना पकाने वाली महाराजिन बऊ के बेटे-बेटियां सुबह से आ धमकते थे, दशहरे में भी और दीपावली में भी। वे घर के प्रत्येक सदस्य के सिर पर बारी-बारी से मछली के जाल का रूमाल ओढ़ाते थे और फिर कांच की बोतल में नन्हीं-सी मछली दिखा कर ‘मछली दर्शन’ कराते थे। बदले में मां उन्हें कुछ पैसे और मिठाई आदि दिया करती थीं। कभी-कभी कुछ ‘प्रोफेशनल किस्म’ के लोग भी मछली ले कर ‘मछली दर्शन’ कराने आ धमकते थे जो सीधे-सीधे मछली का दान मांगते।
दशहरे के दिन प्रातःकाल नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना बुंदेलखंड में शुभ माना जाता है। यह माना जाता है कि नीलकंठ विषपायी शिव का प्रतीक है और विषपायी शिव का बुंदेलखंड से गहरा संबंध है। ‘‘शिवपुराण’’ के अनुसार सागर मंथन में जब कालकूट विष निकला तो उसके विषाक्त प्रभाव से तीनों लोक संकट में पड़ गए। तब शिव ने उस कालकूट विष को पी कर अपने गले में रोक लिया जिससे उनका गला नीला पड़ गया। गले में रुके विष के प्रभाव से शिव को दाह का अनुभव होने लगा। तब वे समुद्र से हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। रास्ते में उन्हें विंध्य पर्वतमाला मिली और कालंजर पर्वत के ऊपर से गुजरते समय उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ। अतः विषपायी शिव कालंजर पर्वत पर ठहर गए। अतः समूचे बुंदेलखंड में विषपायी शिव के प्रतीक नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ माना जाता है। साथ ही यह भी मान्यता है कि जिस प्रकार शिव ने कालकूट विष से तीन लोकों को बचाया था, ठीक उसी प्रकार नीलकंठ पक्षी के दर्शन से सभी संकट दूर हो जाते हैं।
जब बात दशहरे की आती है तो याद आने लगता है मुझे मेरे बचपन का दशहरा और उसका हंगामा भरा माहौल। मुझे अच्छी तरह से याद है, जब मैं छोटी थी तो दशहरे का उत्साह किस तरह चारों ओर व्याप्त हो जाता था। उन दिनों मैं सागर संभाग के पन्ना नगर में रहती थी। वह मेरी जन्मस्थली भी है। हिरणबाग कहलाती थी वह कॉलोनी। मुझे अच्छा लगता था पन्ना का दशहरा उत्सव। बहुत ही भव्य आयोजन होता था। छत्रसाल पार्क के सामने वाले बड़े से मैदान में बहुत बड़ा रावण बनाया जाता था। उस समय की मेरे दो-ढाई फुट थी इसलिए रावण कुछ ज्यादा ही बड़ा दिखता था मुझे। बहरहाल, घर की दीवारों पर ‘व्हाईटवॉश’ (जो कि पी.डब्ल्यू. डी. की कृपा से होता था) और आंगन में गोबर से लिपाई जो कि मां स्वयं अपने हाथों से करती थीं, जिसमें मैं और वर्षा दीदी भी हाथ बंटाती थीं। इन सबके बीच प्रतीक्षा रहती थी दशहरे की उस रात की जिसमें रावण दहन किया जाता था। रामलीला वाले राम और लक्ष्मण धनुष ले कर आते थे। साथ ही पन्ना राजपरिवार से तत्कालीन महाराज नरेन्द्र सिंह आते थे।
छत्रसाल ग्राउंड में अच्छा-खासा मेला भर जाता था। वह वहां का दशहरा मैदान था। तरह-तरह की दूकानें, झूले और हम बच्चों के लिए ढेर सारा आकर्षण। दशहरा मैदान मेरे घर से लगभग पचास कदम की दूरी पर था। यानी कॉलोनी के कैम्पस से निकलो और दशहरा मैदान सामने नजर आता था। नन्हे-मुन्ने, छोटे शहरों के यही तो फायदे होते हैं। सब कुछ आस-पास। मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह अपने मामा कमल सिंह की उंगली पकड़ कर दशहरा मैदान पहुंचते थे। फिरकी, गुब्बारे, सीटी, चूड़ी और न जाने क्या-क्या ले डालते थे हम लोग। उस जमाने की यही हमारी गंभीर शॉपिंग होती थी। विशेष रूप से मेरी। मेरी तुलना में वर्षा दीदी को शॉपिंग का शौक हमेशा कम ही रहा है। इस मामले में वे हमेशा मुझसे पीछे रहीं।
मुझे आज भी याद है कि किस तरह पन्ना महाराज राम और लक्ष्मण का तिलक करते थे और फिर राम बना रामलीला का कलाकार धनुष पर तीर चढ़ता था। जब तीर के नुकीले सिरे पर आग लगा दी जाती थी तो वह जलता हुआ तीर रावण के पुतले की ओर छोड़ देता था। तीर लगते ही रावण का पुतला धू-धू कर के जल उठता था और हम सभी बच्चे प्रफुल्लित हो कर तालियां बजाने लगते थे। रावण के पुतले में भरे गए पटाखे जोरदार शोर के साथ फूटते थे। रावण के साथ ही मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी बनाए जाते थे जिनके कद रावण के पुतले से जरा छोटे होते थे। तीनों का एक साथ दहन किया जाता था।
घर लौटने पर मां आरती की थाली सजा कर मामाजी की आरती उतारती थीं, यह कहती हुईं कि -‘‘मेरा भाई रावण को मार कर आया है।’’ इसके बाद हमारे घर में परम्परागत शस्त्रपूजा होती थी। मुझे उस तलवार की धुंधली स्मृति है जो मेरे बचपन में शस्त्र के रूप में पूजी जाती थी। लेकिन मेरे नानाजी जो गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, उन्होंने बाद में घर में शस्त्रपूजन बंद करा दी और उस तलवार को हंसिए में ढलवा दिया गया जो वर्षों तक रसोईघर में सब्जी काटने के काम आता रहा। हमारे परिवार में मांसाहार नानाजी के समय से ही बंद कर दिया गया था। वे घोर अहिंसावादी थे। इसलिए बलि के प्रतीक स्वरूप कुम्हड़े को काटा जाता था किन्तु बाद में यह भी उचित नहीं लगा। नानाजी को लगा कि भले ही हम कुम्हड़े को काट रहे हैं किन्तु मन में बलि की कल्पना होने से हिंसा की भावना तो बनी रहेगी। अतः वह परम्परा भी समाप्त कर दी गई। बस, परस्पर पान की बीड़ा दिए जाने की परम्परा यथावत चलती रही।
यह सारी बातें मुझे इसलिए याद आ रही हैं क्यों कि सन् 2017 में झांसी प्रवास के दौरान मुझे हमीरपुर के विदोखर गांव के दशहरे के बारे में पता चला। कोई दशहरा इतना रक्तरंजित भी हो सकता है, यह जान कर मुझे हैरानी हुई। विदोखर में दशहरा मनाने की अपनी एक अलग ही परम्परा है। विदोखर में दशकों पहले हजारों लोग सवा मन सोना लुटाकर दशहरा मनाते थे। इस गांव में वह कुआं और राहिल देव मंदिर आज भी मौजूद है, जहां नरसंहार के बाद सोना लुटाए जाने की परंपरा शुरू हुई थी। यहां उन्नाव के गांव डोंडियाखेड़ा के लोग सोना लुटाने में अहम भूमिका निभाते थे। आपको याद दिला दूं कि यह वही जगह है जहां संत शोभन सरकार ने सोने का खजाना जमीन में दबे होने का दावा किया था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भारी हंगामा छाया रहा था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि औरंगजेब के समय विदोखर के ठाकुरों को बलात् मुसलमान बनाया गया था। जिन्हें बगरी ठाकुर कहा जाता था। लगभग 530 वर्ष पहले उन्नाव के डोंडियाखेड़ा से ठाकुर बड़ी संख्या में यहां व्यापार के लिए आते थे। ठाकुरों का यह जत्था एक बार हमीरपुर के इसी विदोखर गांव से गुजर रहा था, तभी कुआं देख पानी पीने के लिए रुक गया। इसी दौरान बगरी ठाकुर समाज के कुछ युवक यहां पहुंच गए। बगरी ठाकुर युवकों ने डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों को कुए से पानी नहीं पीने दिया और मारपीट कर की। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने स्वयं को अपमानित महसूस किया और बगरी ठाकुरों को सबक सिखाने की ठान ली। विदोखर में बगरी ठाकुर और आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर दशहरे का जश्न मनाते थे। इसी दौरान उन्नाव के डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने योजना के साथ बगरी ठाकुरों पर हमला बोल दिया। अचानक हमले से दशहरे के जश्न में डूबे बगरी ठाकुर संभल नहीं सके और इस भीषण युद्ध में सैकड़ों की संख्या में मारे गए। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने युद्ध जीत लिया और विदोखर के आसपास मौजूद 24 गांवों पर कब्जा कर लिया। युद्ध के बाद इन ठाकुरों ने बगरी ठाकुर के घरों से सोना-चांदी लूट लिया। इस दौरान उन्होंने लूटा हुआ सोना लुटाते हुए जमकर जीत का जश्न मनाया। बस, उसी समय से वहां सोना लुटाए जाने की परंपरा का आरम्भ हुआ। लगभग पांच दशक पहले तक विदोखर गांव के आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्रित होते थे। इसके बाद अनोखे ढंग से दशहरा मनाते हुए लोग सवा मन सोना इकट्ठा कर लुटाते थे। जितना सोना जिसके हाथ लगता था, वे अपने घर ले जाता था। अब मंहगाई के जामने में सवा मन सोना लुटाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है, इसलिए प्रतीक रूप में रत्ती भर सोना लुटाया जाता है। आज भी 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर मिट्टी के गोले बनाते हैं और इन्हीं में रत्ती भर सोना डालकर लुटाते हैं। जिसके हाथ सोने वाला मिट्टी का गोला लगता है, उसे सौभाग्यशाली माना जाता है। हो सकता था कि भविष्य में मेरे नानाजी की तरह किसी को यह परम्परा हिंसक घटना की याद दिलाने वाली लगे और इसे वह बंद करवा दे। यदि ऐसा होता है तो भी विदोखर में दशहरे का आनंद कम नहीं होगा।
एक और हिंसक परंपरा जुड़ी रही है बुंदेलखंड के दशहरे से। यद्यपि अब यह परंपरा पूरी तरह से बंद कराई जा चुकी है। यह परंपरा राजाशाही के समय में चलन में थी। गढ़कुंडार एवं दतिया रियासत में दशहरे पर ‘‘भैंसा वध’’ की परंपरा थी। इस परंपरा में एक भैंसे को मैदान में छोड़ दिया जाता था फिर कुछ लोग उसे दौड़ा कर तलवारों से उसका वध करते थे। जब वह भैंसा मर जाता था तो उसके मांस को प्रसाद के रूप में लोगों को बांटा जाता था। सन 1947 के बाद वीरसिंह जू देव द्वितीय ने इस हिंसक परंपरा को दोनों जगह पूरी तरह से बंद करवा दिया।
यूं भी हंसी-खुशी के वातावरण में हिंसा अर्थात् परपीड़ा का क्या काम? किसी एक को पीड़ा पहुंचा कर दूसरा खुश नहीं रह सकता है। उत्सव वही है जो मन को आनन्दित करे, उत्साह से भर दे। उत्सव में आडंबर का कोई महत्व नहीं होता। दशहरा तो यूं भी असत्य पर सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है। इसे तो सद् विचारों और सद्परम्पराओं के साथ ही मनाया जाना चाहिए। हमेशा दस सिर वाला रावण मारा जाए, एक सिर वाला इंसान नहीं और न ही कोई जानवर। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.10.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, October 20, 2026
दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
सदा सत्य की विजय हो 🚩
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
Happy Dussehra 🙏🚩🙏
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पुस्तक समीक्षा | भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड
लेखिका - वर्षा कौशल
प्रकाशक - साहित्य कलश पब्लिकेशन, 32/3, अमरशक्ति निवास, महिन्द्रा कॉलोनी, सामने महिन्द्रा कालेज, पटियाला - 147001
मूल्य - 300/-
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भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदा चिंतन के केन्द्र में रही है। साथ ही यह भी सच है कि समाज में नारी की स्थिति में गंभीर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। जहां प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को पढ़ने-लिखने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति थी, वहीं मध्यकाल में आक्रांताओं के कारण उन्हें न केवल पढ़ने- लिखने से दूर कर दिया गया अपितु घर की चौखट के भीतर रह कर कठोर एवं अमानवीय नियमों को ढोने के लिए विवश किया गया जिसमें विधवा के रूप में तिरस्कृत जीवन जीने, पति की मृत्यु पर सती हो जाने तथा युद्धकाल में जौहर करने तक की विवशता शामिल थी। इसे स्त्रियों का साहस कह कर भले ही महिमा मंडित किया जाए किन्तु वस्तुतः थी यह कुरीति ही। बुंदेलखंड के गांव-देहात में आज भी सती के पत्थर पाए जाते हैं जिनकी पूजा होती है। ऐसे विकट उतार-चढ़ाव भरे अतीत से आगे बढ़ कर आज समाज में स्त्रियों ने जो अपनी जगह बनाई है वह उसकी असली शक्ति, संघर्ष एवं अस्मिता की परिचायक है। स्त्रियों की इस रूपांतरण यात्रा को लेखिका वर्षा कौशल ने अपनी शोधात्मक पुस्तक ‘‘नारी : रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ में प्रस्तुत किया है।
वर्षा कौशल की पुस्तक पर अपनी ‘‘सम्मति’’ देते हुए मणिकुंडल सेवा संस्थान कानपुर के संस्थापक, संरक्षक उमाशंकर गुप्ता ने ‘‘नारी की स्थिति पर शोधपरक कृति’’ शीर्षक से लिखा है कि-‘‘प्रस्तुत पुस्तक में कानपुर एवं बुंदेलखंड के जनपदों में जनसंपर्क, विद्यालयों से संपर्क करके सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक वास्तविकता को प्रस्तुत करती है और सरकार तथा समाज को चाहिए कि गंभीर चिंतन कर महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए सार्थक प्रयास करें इस संदर्भ में श्रीमती वर्षा कौशल को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इतने महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी चलाई जिससे देश-प्रदेश में जन जागरण और उन्नति का एक नया अध्याय प्रारंभ होगा।’’
अपनी पुस्तक ‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ की सामग्री को लेखिका ने कुल सात अध्यायों में विभक्त किया है। प्रथम अध्याय में अतीत में प्रेरक महिलायें सुकला, अपाला, दुर्गावती, रत्नावली, सारंध्रा गणिका, मदालसा के बारे में है। द्वितीय अध्याय बुंदेलखंड की नारी के अंतर्गत बुंदेलखंड शब्द की विकास यात्रा, बुंदेलखंड की स्मरणीय महिलायें, शिक्षा के क्षेत्र में नारी की स्थिति, वर्तमान की दुःस्थिति, सुखद भविष्य का भाव लेखबद्ध किया है। तृतीय अध्याय नारी सशक्तिकरण का है जिसमें बाल्यकाल, ऐतिहासिक महिलाओं का बाल्यकाल दुर्गावती, मैना, महिला के स्वरूप एवं भूमिका पर शिक्षा का प्रभाव, ईश भक्ति में रत महिलाओं का बाल्यकाल कर्माबाई, विमला कुमारी, मल्हना, समाज की दिशादात्री महिलाओं का बाल्यकाल अमृता शेरगिल, जेन एडम्स, डॉ मुथु लक्ष्मी रेड्डी के संबंध में जानकारी दी गई है। चतुर्थ अध्याय में ऐतिहासिक महिलायें हैं जिनमें महारानी लक्ष्मीबाई, भक्ति रस में मग्न महिलायें रानी रासमणि, समाज की पथ प्रदर्शिका महिलायें अन्ना चेण्डी, श्रीमती एलीनर रूजवेल्ट, श्रीमती धनवंती रामराव के व्यक्तित्व एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है। पंचम अध्याय में वर्तमान में सशक्तिकरण के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति, अधिकार व अधिकार की सीमाएं महिला मानवाधिकार, हिंदू विवाह अधिनियम, मौलिक अधिकार, मूलाधिकार शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा विषयक अधिकार, संपत्ति का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार आदि की जानकारी दी गई है। छठां अध्याय स्त्रियों के समग्र अधिकारों पर दृष्टिपात का है जिसमें अतीत में महिलाओं का राजनैतिक योगदान, ग्रामीणांचल में राजनैतिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति समस्यायें, समाधान, उपलब्धि, सामाजिक परिवर्तन में भूमिका, शिक्षा का क्षेत्र, व्यावसायिक शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र के आधार पर विवेचन किया गया है। सातवां और अंतिम अध्याय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा है। इस अध्याय में बुंदेली लोक संस्कृति, जीवनयापन, भोजन, वस्त्र, परंपराओं का पालन, परिणाम, लोक संस्कृति विषयक महिलाओं की स्थिति, लोकगीत, लोकनृत्य का विवरण है। इसके बाद अंत में परिशिष्ट एवं संदर्भ ग्रंथ सूची रखी गई है। कुल मिला कर पुस्तक का स्वरूप अकादमिक शोध का है। संभवतः इसीलिए नारी की रूपांतरण यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पक्ष छूट गए हैं तथा बुंदेलखंड के परिचय की अपेक्षा बुंदेली स्त्रियों की दशा और दिशा को समुचित विस्तार नहीं मिल सका है क्योंकि अकादमिक शोध की अपनी सीमाएं होती हैं। वहीं स्वंतत्र शोध सीमाओं से परे जा कर भी विषय को खंगालता है। फिर भी लेखिका ने विषय को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने का पूरा एवं सफल प्रयास किया है।
नारी इंसाफ सेना परिवार के सहयोग से प्रकाशित इस पुस्तक की लेखिका वर्षा कौशल ने मास्टर ऑफ एक्सटेंशन एण्ड रुरल डेवलेपमेंट में एम. ए. तथा छत्रपति साहू जी महाराज वि. वि. कानपुर, योग शिक्षा में उपाधि प्राप्त की है। कानपुर निवासी वर्षा कौशल नारी इंसाफ सेना की राष्ट्रीय कमांडर हैं तथा वे भ्रष्टाचार व अनियमितताओं का विरोध एवं न्याय के पक्ष में आंदोलन व धरना प्रदर्शन करती हैं एवं समाज में गरीब व उपेक्षित समुदाय एवं जनमानस का अपेक्षित सहयोग करती हैं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को जमीनी यथार्थ से जोड़े रखा है।
अपनी पुस्तक के लेखन के संबंध में लेखिका वर्षा कौशल का कथन है कि ‘‘मुझे भी नारी इंसाफ सेना महिला संगठन के माध्यम से महिलाओं के बीच कार्य करने का अवसर मिला है। महिलाओं की समस्याओं को जानने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि नारी की सहायक नारी ही हो सकती है। कानून बना देने से ही सिर्फ नारी का हित नहीं हो सकता। नारी पगड़ी की तरह है जो कहने को तो शीश पर धारण की जाती है किंतु उस पगड़ी को बिखेरने के लिए समाज का अधिकांश वर्ग भिन्न-भिन्न वेश में प्रस्तुत होकर तत्पर है। कहावत है कि बेल (लता) और स्त्री बिना सहारे के नहीं रह सकती हैं और इस कहावत को चरितार्थ करने के लिए लोग विविध प्रसंगों और तर्कों से पुष्टि करने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग कर रहे हैं, तब मुझे लगा कि ऐसी कृति लिखी जाये जिसमें अतीत से वर्तमान तक की नारी की स्थिति रेखांकित हो सके और समाज में नारियों के योगदान की झांकी प्रस्तुत की जा सके। यह कृति आंकड़ों पर आधारित नहीं है क्योंकि आंकड़े और यथार्थ दोनों ही अलग-अलग हो चुके हैं।’’
सरस्वती बालिका विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, बांदा की शिक्षिका शैलजा तिवारी ने ‘‘धरातलीय अभिव्यक्ति’’ शीर्षक से पुस्तक पर अपनी अभिव्यक्ति इस प्रकार दी है-‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, हमारे समाज ने मनु स्मृति की इस सूक्ति को थोड़ा भी अपनाने का प्रयास किया होता तो शायद महिलाओं उत्पीड़न और अत्याचार से निजात मिल गई होती। लेकिन विडंबना है कि यह सूक्तियां सिर्फ हमारे धर्मग्रंथों तक ही सिमट कर रहा गईं हैं और नारी को सही मायने मे न्याय दिलाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। इस पुस्तक में नारियों द्वारा कई क्षेत्रों में किए गए कार्यों और संघर्षों का उल्लेख होने से उनसे प्रेरणा लेते हुए नारी में हीन भावना नहीं आ सकेगी।’’
‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ एक ऐसी पुस्तक है जिसमें अतीत से वर्तमान तक के नारी संघर्ष की सोदाहरण चर्चा करते हुए बुंदेलखंड की स्त्रियों की स्थिति पर भी चर्चा की गई है। लेखिका ने नारी की मनो एवं सामाजिक दशा तथा प्रतिक्रियाओं पर विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘‘जो महिला उपलब्धि प्राप्त कर लेती है वह अतीत की घटनाओं व्यवहार से मिले तनाव से मुक्त हो जाती है जब वह अपने माध्यम से किसी की समस्या का हल करती है तब उसे बहुत आत्म संतोष होता है जब महिला की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है तब वह प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए एक नए रूप में आती है। फूलन देवी ऐसी महिला का उदाहरण है जब उसके साथ किए गए अनाचार पर कहीं पर ग्राम में सुनवाई नहीं हुई बल्कि उसे और अपमानित किया गया तब वह बंदूक लेकर बीह में चली गई और जिस बेहमई ग्राम में उसके साथ अनाचार हुआ था उस गांव में उसने जाकर लोगों को एक पंक्ति में खा कर मार दिया था। इसी प्रकार पारिवारिक शोषण के शिकार महिला जब समाज में महिला उत्थान के लिए निकलती है तब उसके अनुभवजन्य व्यक्तव्य श्रोताओं में रोमांच उत्पन्न कर देते हैं। नारी का स्वभाव होता है कि जब वह बोध विरोध में आती है तो उसके प्रतिशोध की कोई सीमा नहीं होती। सूर्पनखा में सुंदर युवती के रूप में राम के समक्ष प्रस्तुत होकर प्रणय निवेदन किया था किंतु जब उसके नाक कान काटे गए तब वह अपने वास्तविक रूप में आकर प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगी थी और उसने रावण के समक्ष बात रखी इसके परिणाम स्वरुप सीता का हरण हुआ इसी प्रकार दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया था उसके परिणाम स्वरूप द्रौपदी ने दुशासन के शरीर के रक्त से अपने बाल धोये थे।’’
इसके साथ ही लेखिका ने महिलाओं को सशक्त बनाने में महिला समाख्या कार्यक्रम का अनुमोदन किया है-‘‘महिलाओं में चेतना या जागरूकता लाना वह प्रक्रिया है जिसमें महिलाओं को संगठित करके उन्हें प्रेरित करना है कि संसाधनों को प्राप्त करने के लिए उनके प्रति जो भेदभाव बढ़ता जा रहा है या जो भी बढ़े हैं वह उन्हें दूर कर सके। इसके लिए ‘‘महिला समाख्या’’ कार्यक्रम एक सशक्त माध्यम है।’’
लेखिका का प्रयास सराहनीय है तथा पुस्तक पठनीय है। विशेषरूप से शोधार्थियों के लिए उपयोगी है।
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Saturday, October 17, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | इते माता की धूम मची, औ उते आए हमाए नए रैवासी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Thursday, October 15, 2026
बतकाव बिन्ना की | बा कमा से कम नौरातें को तो लिहाज कर रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
शरद सिंह के उपन्यासों में चेतना के विविध आयाम
Wednesday, October 14, 2026
चर्चा प्लस | पं. दीनदयाल उपाध्याय ने क्यों बनाया था अटल बिहारी वाजपेयी को ‘‘राष्ट्रधर्म’’ का संपादक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने क्यों बनाया था अटल बिहारी वाजपेयी को ‘‘राष्ट्रधर्म’’ का संपादक
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता प्राप्त हो गई किन्तु इसके साथ ही विभाजन का दंश भी मिला था जिसने हर भारतीय की आत्मा को झकझोर दिया था। ऐसे समय में देश के नागरिकों में राष्ट्र के प्रति उत्साह की नवीन ऊर्जा का संचार करना आवश्यक था। यह याद दिलाना जरूरी था कि स्वतंत्रता प्राप्ति की एक बड़ा लक्ष्य पा लिया है किन्तु अब नवीन राष्ट्र को नए सिरे से स्थापना देने के लिए सबको जुटना होगा। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘‘राष्ट्रधर्म’’ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। अब आवश्यकता थी ‘‘राष्ट्रधर्म’’ के लिए एक योग्य संपादक की। पं. दीनदयाल उपाध्याय संपादक की खोज में जुट गए और उनकी खोज समाप्त हुई अटल बिहारी वाजपेयी पर। उन्होंने ऐसा क्या देखा था अटल जी में?
सन् 1946 में स्वतंत्रता संग्राम अपनी चरम स्थिति पर जा पहुंचा था। सन् 1947 के आरम्भिक महीनों में अंग्रेज सरकार को भी समझ में आ गया था कि अब उनके भारत से जाने का समय आ गया है। 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हो गया किन्तु इससे पहले देश के बंटवारे का दंश देश की आत्मा को घायल कर चुका था। बंटवारे से उपजा अविश्वास का वातावरण फन फैलाए था। ऐसे में सौहार्द स्थापित किया जाना आवश्यक था। इसी विकट समय सभी दुरूह प्रश्नों के उत्तर जन-जन तक पहुंचाने के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय ने समाचारपत्र को माध्यम बनाने का निश्चय किया और सन् 1947 में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड’ की स्थापना की थी जिसके अंतर्गत क्रमशः स्वदेश, राष्ट्रधर्म एवं पांचजन्य नामक पत्र प्रकाशित हुए।
‘राष्ट्रधर्म’ का प्रकाशन आरम्भ करने से पूर्व आवश्यकता थी एक अत्यंत योग्य संपादक की, जो पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को भली-भांति समझते हुए पत्रिका को सही स्वरूप प्रदान कर सके। चूंकि दीनदयाल उपाध्याय स्वयं संपादक पद पर रह कर बंधन स्वीकार नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण दायित्व अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपने का निर्णय किया। उपाध्याय जी ने अटल बिहारी को लखनऊ बुला दिया। अटल बिहारी ने भी ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादन का भार सहर्ष स्वीकार कर लिया।
अटल बिहारी वाजपेयी में राजनीतिक समझ, साहित्यिक प्रतिभा और लेखन की प्रभावी कला थी। उनकी ये विशेषताएं एक न एक दिन उन्हें सफलता के उच्चतम शिखर तक पहुंचाने वाली थीं। अटल बिहारी यदि चाहते तो वे तत्काल सफलता प्राप्त करने का कोई छोटा रास्ता भी चुन सकते थे किन्तु वे किसी भी ‘शाॅर्टकट’ में विश्वास नहीं रखते थे। उनका उस समय भी मानना था कि ‘‘जो श्रम करके प्राप्त किया जाए, वही सुफलदायी होता है और स्थायी रहता है।’’ कर्म के प्रति आस्था रखने वाले अटल बिहारी ने श्रम का मार्ग चुना। वे जनसेवक बनना चाहते थे। दिखावे के जनसेवक नहीं, वरन् सच्चे जनसेवक। वे जनता के सहभागी बन कर काम करना चाहते थे, जनता से दूर रह कर नहीं। उनकी यह अभिलाषा उनके भाषणों और लेखों में मुखर होती रहती। अतः जब पं. दीनदयाल उपाध्याय को एक पत्रिका प्रकाशित करने का विचार आया तो प्रश्न था कि उस पत्रिका का संपादक किसे बनाया जाए? क्योंकि पं. दीनदयाल स्वयं संपादन का भार ग्रहण नहीं करना चाहते थे। ऐसी स्थिति में उन्हें सबसे पहला नाम अटल बिहारी का ही सूझा।
राजधानी लखनऊ के राजेंद्र नगर स्थित आरएसएस मुख्यालय के ठीक बगल में राष्ट्रधर्म का काम शुरू हुआ था। सन 1947 में अटल बिहारी वाजपेयी ‘‘राष्ट्रधर्म’’ के पहले संपादक बने। देश स्वतंत्र होने के बाद राष्ट्रवाद की अलख जगाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना के अनुसार प्रकाशित राष्ट्रधर्म पत्रिका में लेखन और फिर उसकी छपाई का काम शुरू हुआ था। उस दौर में ट्रेडइल और विक्टोरिया फ्रंट जैसी छोटी मशीनों में पत्रिका और अखबारों की छपाई का काम होता था। धीरे-धीरे करके यह काम अटल जी के नेतृत्व में आगे बढ़ा और उनके नेतृत्व में लोगों को राष्ट्रवाद के विचार मिलने शुरू हो गए। राष्ट्रधर्म में लेखन और उसके वितरण का काम अटल बिहारी वाजपेयी खुद करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘‘राष्ट्रधर्म’’ को अपने धर्म की भांति सम्हाला। वे समाचार लिखते थे, लेख लिखते थे, संपादकीय लिखते थे और छपने के बाद उसे हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए लखनऊ की गलियों में साइकिल से भी राष्ट्रधर्म बांटने का काम भी किया करते थे। उनकी इस विशेषता को पहचानते हुए ही दीनदयान उपाध्याय ने ‘‘राष्ट्रधर्म’’ के लिए जब संपादक के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को चुना उस दौरान मनोहर आठवले ने उनसे पूछा कि ‘‘आप राष्ट्रधर्म के लिए संपादक ढूंढ रहे थे, कोई मिला कि नहीं?’’
इस पर दीनदयाल उपाध्याय ने संतोष भरे स्वर में उत्तर दिया कि ‘‘मैंने ‘राष्ट्रधर्म’ के लिए उसे चुन लिया है जिसे राष्ट्रधर्म की समझ है।’’
फिर जैसे ही दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी का नाम लिया तो मनोहर आठवले के मुख से निकला,‘‘उत्तम चयन!’’
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और 31 अगस्त 1947 को राष्ट्रधर्म का पहला अंक निकला. स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक 16वें दिन राष्ट्रधर्म का पहला अंक निकला था अतः उसे विशिष्ट होना ही था। अटल जी ने अपनी कविता ‘‘हिंदू तन मन हिंदू जीवन, हिन्दू रग-रग, हिन्दू मेरा परिचय’’ को राजधर्म के प्रथम अंक में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया। कविता के प्रथम दो बंद थे-
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार।
डमरू की वह प्रलयदृध्वनि हूँ, जिसमे नचता भीषण संहार।
रणचंडी की अतृप्त प्यास, मै दुर्गा का उन्मत्त हास।
मै यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुंआधार।
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मैं।
यदि धधक उठे जल, थल, अंबर, जड चेतन तो कैसा विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर्णभ मे घहर-घहर, सागर के जल मे छहर-छहर।
इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सोराभ्मय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
तथा, कविता के अंतिम दो बंद थे -
होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूँ सब को गुलाम?
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।
गोपाल-राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया?
कब दुनिया को हिन्दू करने घर-घर मे नरसंहार किया?
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी?
भूभाग नहीं, शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज।
मेरा इसका संबन्ध अमर, मैं व्यक्ति और यह है समाज।
इससे मैने पाया तनदृमन, इससे मैने पाया जीवन।
मेरा तो बस कर्तव्य यही, कर दू सब कुछ इसके अर्पण।
मै तो समाज की थाति हूँ, मै तो समाज का हूं सेवक।
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
यद्यपि यह प्रथम अंक निकालना भी कोई आसान काम नहीं था। पहले अंक की 3500, दूसरे अंक की आठ हजार और तीसरे अंक की 12000 प्रतियां निकली थीं। पत्रिका लोकप्रिय हुई, प्रसार बढ़ा, पाठक बढ़े किन्तु इसी के साथ काम भी बढ़ गया। अटल जी को अपने ही हाथ से कंपोजिंग करना रहता था और राष्ट्रधर्म के बंडल साइकिल पर लेकर उनको बांटने के लिए जाना पड़ता था। इतनी विषम परिस्थिति में अटल जी काम करते थे। किन्तु उनकी इसी जीवटता के कारण इस युवा संपादक की पहचान पूरे देश में स्थापित हो गई थी।
अटल बिहारी के संपादन में ‘राष्ट्रधर्म’ ने शीघ्र ही लोकप्रियता प्राप्त कर ली। उनके संपादकीय लेख लोग रुचि से पढ़ते। समाचारपत्र की प्रसार संख्या और प्रशंसकों की संख्या लगातार बढ़ने लगी। पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी, अमृतलाल नागर, महादेवी वर्मा एवं डाॅ. रामकुमार वर्मा भी अटल बिहारी के संपादकीय लेखों के प्रशंसक थे। ‘राष्ट्रधर्म’ का पहला अंक 31 अगस्त, 1947 को प्रकाशित हुआ। पाठकों द्वारा इसका भरपूर स्वागत हुआ। राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड ने आगे चल कर न केवल अटल बिहारी वाजपेयी वरन् वचनेश त्रिपाठी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चन्द्र मिश्र तथा राजीवलोचन अग्निहोत्री जैसे महानुभावों को पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित किया। इसी के साथ ‘राष्ट्रधर्म’ का वह उद्देश्य भी पूरा हुआ जिसके लिए इसका प्रकाशन आरम्भ किया गया था। उद्देश्य था राष्ट्रवासियों के मन में उत्साह संचार करना एवं नवीन लक्ष्यों की ओर ध्यानआकर्षित करना ताकि एक सृदुढ़ स्वतंत्र भारत आकार ले सके। ------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 14.10.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, October 13, 2026
पुस्तक समीक्षा | बुंदेली विरासत को सहेजती : आल्हा समर सारावली | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
बुंदेली विरासत को सहेजती : आल्हा समर सारावली
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - श्री ईश्वरीप्रसाद खरे कृत आल्हा समर सारावली
संपादक - संतोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक - वीरेंद्र बहादुर खरे (पौत्र), ओल्ड मीनार, ई-125, सोपनी स्ट्रीट, भोपाल (म.प्र.), दूरभाष - 9753442700
मूल्य - 150/-
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आल्हा काव्य बुंदेली जनमानस में रचा-बसा है। इसमें आल्हा और ऊदल दो भाइयों के वीरता भरे युद्ध का रोचक विवरण है। जागनेर के राजा एवं कवि जगनिक की यह रचना है जिसमें दोनों वीरों के 52 युद्धों की काव्यात्मक कथा है। यह ऐसा काव्य है जिसका पाठ अथवा गायन करते समय भुजाएं फड़क उठती हैं। इसमें ‘‘आल्हा’’ नामक एक विशिष्ट मात्रिक छंद का प्रयोग होता है, जो ढोलक की थाप के साथ वीरगति और प्रवाह में गाया जाता है। आल्हा को मां शारदा (मैहर मध्यप्रदेश स्थित) का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। मान्यता है कि आज भी मंदिर का पट खुलने से पूर्व आल्हा मां शारदा देवी को पुष्प अर्पित करते हैं। ब्रिटिश काल के दौरान भी भारतीय सैनिकों में जोश और युद्ध-कुशलता भरने के लिए आल्हा खंड का प्रयोग किया जाता था। इसी आल्हा काव्य को सारावली के रूप में पहले उर्दू में ‘‘जुल्उतुमरमजिया’’ के नाम से मुंशी मोहम्मद खां पुलिस इंस्पेक्टर के सहयोग से मुंशी ईश्वरी प्रसाद ने लिखा था। यह कृति एक लंबे समय संज्ञान से बाहर रही। फिर महोबा के साहित्यकार संतोष कुमार पटेरिया ने ‘‘आल्हा समर सारावली’’ के नाम से अनुवाद कर प्रकाशित कराया। मुंशी ईश्वरी प्रसाद के अवदान के प्रति साहित्य समाज द्वारा की गई अवहेलना के संबंध में लेखक वीरेन्द्र बहादुर खरे ने पुस्तक के आरंभ में ही ‘‘मुंशी ईश्वरी प्रसाद की साहित्य साधना’’ के अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि ‘‘19वीं सदी में बुन्देलखण्ड में एक ही समय में दो ईश्वरी साहित्य साधना में रत थे। उनमें से एक फागों के ऋतुराज लोकगायक ईश्वरी थे, जो कम से कम बुन्देलखण्ड में परिचय के मोहताज नहीं हैं। पर मैं जिन मुंशी ईश्वरी प्रसाद खरे महोबा निवासी के साहित्य अवदान की बात कहने जा रहा हूँ। उनका उल्लेख पाठ्य पुस्तकीय हिन्दी साहित्य के इतिहास में उल्लेख नहीं है। यहाँ तक कि स्वतंत्रता के बाद के बुन्देली साहित्य पर शोध करने एवं बुन्देलखण्ड के अज्ञात कवियों को प्रकाश में लाने का श्रेय लूटने वाले विद्वानों ने अपने लेखों में इनका उल्लेख तक नहीं किया। जबकि 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में किये गये शोधकार्यों में इनका उल्लेख है। पण्डित श्याम बिहारी एवं सुखदेव बिहारी मिश्र बंधुओं के मिश्रबंधु विनोद में एवं दीवान प्रतिपाल सिंह के प्रकाशित बुन्देलखण्ड का इतिहास प्रथम खण्ड में उनका उल्लेख है। उनकी मृत्यु के लगभग 75 वर्ष बाद मुंशी ईश्वरी प्रसाद का उल्लेख छतरपुर के विद्वान डॉ. बहादुर सिंह परमार एवं डॉ. हरि सिंह घोष द्वारा संपादित एवं आदिवासी लोककला अकादमी द्वारा प्रकाशित बुन्देलखण्ड की छंदबद्ध काव्य परम्परा प्रकाशन वर्ष 2005 में किया गया है। मुंशी ईश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव खरे का जन्म सन् 1829 में कन्नौज उ.प्र. में हुआ।’’
इस प्रकार ‘‘आल्हा समर सारावली’’ एक बार पुनः साहित्य जगत के संज्ञान में आई। मूल पुस्तक में इसके सृजन के संबंध में लिखा गया है कि ‘‘जाहिर महान की शूरता का कर्तव्य का सत्य बखान जिसको मुंशी ईश्वरी प्रसाद हेड मास्टर पेन्शिनियर वाल हमीरपुर व वर्तमान हाल निवासी महोबा ने अपनी किताब "जुल्दतुलरमजिया" जो कि आज्ञानुसार श्रीमान् जनाब मुंशी मोहम्मद खाँ सहिब इन्सपेक्टर पुलिस के जवान उर्दू में बनायी गई थी। उसका उल्था जबान हिन्दी में आज्ञानुसार श्रीमान् बनाफर वंश अवतंस जनाब ठाकुर सभासिंह साहिब रईस कस्बा कुलपहाड़ के प्रेमी स्वजन अवलोकन के हेतु किया।’’
पुस्तक की मूल सामग्री को इन शीर्षकों में प्रस्तुत किया गया है- चन्द्रब्रह्म का जन्म, चन्देलवंश की उत्पत्ति, बनाफर कौम की उत्पत्ति एवं कालिंजर, चंदेलवंश के राजा (राजा परमालदेव तक), माहिल परिहार का वृतान्त, चन्देलवंश के नियम भंग एवं मनियादेव, दस्सराज, वक्षराज, सैयद तालन का परिचय और करंगाराम का आक्रमण, मड़ौं की लड़ाई, पंडित ढौवा (ढेबा) का वृतांत और क्षत्रिय जाति की रीति, आल्हखण्ड में वर्णित अन्य युद्ध, राजा परमाल और पृथ्वीराज चैहान तृतीय के मध्य द्वेष, महोबा से आल्हा ऊदल का निष्कासन, अन्य युद्ध और आल्हा को कन्नौज से लाना, राजा समरजीत उर्फ रणजीत व अन्य जाति के राजवंश, बुन्देलवंश की उत्पत्ति और अर्जुनपाल, चम्पतराय आदि, सरदार दलेल खाँ का जगतराज पर आक्रमण, महोबा में पूर्व दिशा के स्थान, महोबा में पश्चिम दिशा के स्थान, महोबा बस्ती के अन्दर देव स्थान, शिलालेख व मूर्ति का चित्र, बनाफर वंशावली-स्व. दीवान प्रतिपाल सिंह।
पुस्तक के संपादक संतोष कुमार पटैरिया ने ‘‘भूमिका’’ में लिखा है कि ‘‘परम्परागत यह बात आती रही है कि बारहवीं शताब्दी में महोबा में चन्देल राजा परमर्दिदेव प्रथम उपाख्य परमाल (सन् 1165-1203 ई) के यहां जनकवि जगनिक ने आल्हखण्ड लिखा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’ में जगनिक की कृति परमाल रासो का उल्लेख किया है। बाबू श्याम सुन्दरदास ने दो पाण्डुलिपियों के संकलन को परमाल रासो नाम दिया है जो नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ने प्रकाशित किया है। आल्हखण्ड का कथानक भिन्न रूप में कई ग्रन्थों भविष्य महापुराण, जगतराज की दिग्विजय सहित आल्हा गायकों के गायन को लिपिबद्ध करके प्रकाशित पुस्तकों में भी मिलता है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर आल्हखण्ड की कथा की पुष्टि भी होती है। सन् 1881 में चौधरी घासीराम द्वारा लिखित आठ प्रसंग प्रकाशित हुये थे। सन् 1865 में फर्रुखाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी सर ईलियट ने आल्हखण्ड प्रकाशित कराया था जिसमें मुख्यतः कन्नौजी गायकी में कथानक निहित थे। फिर लगभग पैंतालीस वर्षों बाद सन् 1910 प्रस्तुत कृति आल्हा समरसारावली प्रकाशित हुई थी। कृतिकार श्री ईश्वरी प्रसाद खरे ने बचपन में कन्नौज में आल्हा गायन सुना। सन् 1872 व 1884 में जनरल कनिंघम ने बुन्देलखण्ड में पुरातात्विक स्थल व शिलालेख खोजे किन्तु उनका प्रकाशन न होने के कारण श्रद्धेय खरे जी को शिलालेखों में निहित इतिहास की जानकारी नहीं हो सकी। खरे जी ने आल्हखण्ड व महोबा के दर्शनीय स्थलों का वर्णन अपनी उर्दू में लिखी कृति जुल्द तुलरमजिया में मुहम्मद मुस्तफा खां पुलिस इंस्पेक्टर की प्रेरणा से किया फिर कुलपहाड़ के श्री सभा सिंह बनाफर की प्रेरणा से उसका हिन्दी में अनुवाद किया और ‘‘आल्हा समर सारावली’’ कृति को नाम दिया। ज्ञातव्य है कि उस समय श्री खरे जी कुलपहाड़ में सरकारी स्कूल में हेड मास्टर थे। उर्दू की पुस्तक के प्रकाशन का विवरण नहीं मिलता है।
इस कृति में लेखक ने आल्हखण्ड के पात्रों के बारे में उस समय प्रचलित कथानक के आधार पर लिखा है उस समय इतिहासकार लाला भगवानदीन थे संभव है कि लेखक ने हरिकेश कृत जगतराज की दिग्विजय भी पढ़ी हो, और जिससे जो जानकारी मिली, खरे जी ने उस जानकारी का उपयोग किया। शिलालेखों के आधार पर चन्देल राजाओं का शासनकाल निश्चित किया गया। अतः सन् 1165 से सन् 1203 तक राजा परमर्दिदेव प्रथम के शासन काल में आल्हा ऊदल हुये। ऊदल का निधन वर्तमान जनपद जालौन के बैरागढ़ में हुई अन्तिम लड़ाई में हुआ जो कि सन् 1182-83 में हुआ था। जनपद ललितपुर के मदनपुर में सड़क के किनारे बने शिव मंदिर में उत्कीर्ण शिलालेख सम्वत् 1239 का है। इससे यह सिद्ध होता है कि महोबा में लगभग सत्रह वर्ष तक रहे इसी अवधि में उनका कन्नौज में रहने का काल सम्मिलित है। बैरागढ़ के युद्ध के पूर्व ही परमर्दिदेव प्रथम कालिर्जिर दुर्ग में चले गये जहाँ 27 अप्रैल 1203 में रज्जब की पहली तारीख सोमवार को उनका निधन हुआ। इन सत्रह वर्षों में ही युद्धों में आल्हा ऊदल, ताल्हन सैयद, मलखान, ढेवा आदि की सहभागिता रही। इसी मध्य आल्हा का पुत्र इन्दल हुआ। हर काल में लोक कवियों ने आल्ह खण्ड में वर्णित प्रसंगों को विस्तार दिया और युद्धों की संख्या 52 तक पहुँच गई। सन् 1182 के श्रावणमास के कीर्तिसागर तट पर हुये युद्ध को भुजरियों की लड़ाई भी कहा जाता है। पृथ्वीराज चौहान जो कि चन्देलकाल में थे उन्हें इतिहास में पृथ्वीराज चौहान तृतीय कहा जाता है। उनके किसी भी शिलालेख में महोबा में हुए युद्ध का वर्णन नहीं है और न ही महोबा विजय का उल्लेख है। केवल वर्तमान जनपद ललितपुर के पुराने मदनपुर में शीघ्रतावश उत्कीर्ण किये गये तीन लघु शिलालेख वर्तमान में आल्हा ऊदल की कचहरी कहे जाने वाले भवन की भीतरी दीवारों में है। इसमें एक शिलालेख में जेजाभुक्ति के स्थान पर जेजाकभुक्ति लिखा है। शीघ्रता में कोई तिथि नहीं लिखी गई। भाषा यह है- "ओम ! अरूणोराजस्य पौत्रना श्री सोमेश्वर सुनुना जेजाकभुक्ति देसोयम पृथ्वी राजना लुंठितः सम्वत् 1239।’’
दरअसल जब हम साहित्य और इतिहास की कृतियों को सहेजने में भेदभाव करने लगते हैं तो ‘‘जुल्उतुमरमजिया’’ उर्फ़ ‘‘आल्हा समर सारावली’’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियां अवहेलना की चादर में ढंक कर रह जाती हैं और फिर धीरे-धीरे खो जाती हैं। ऐसी तमाम कृतियों को लुप्त अथवा नष्ट होने से बचाने के लिए आवश्यक है कि उनका पुनः प्रकाशन कराया जाए। यही महती कार्य किया है संतोष कुमार पटैरिया ने। उन्होंने ‘‘आल्हा समर सारावली’’ का संपादन करते हुए पुस्तक में स्व. श्री माधव प्रसाद स्वर्णकार का स्मरण करते हुए ‘‘महोबा नगर का मुकम्मिल इतिहास’’ तथा पं. हरिविष्णु अवस्थी का लेख भी रखा है।
वस्तुतः आल्हा ऊदल द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों के बारे में जानना एवं पढ़ना बुंदेलखंड के शौर्य एवं वीरता से स्वयं को जोड़ने के समान है। ये लड़ाइयां मात्र लड़ाइयां नहीं थीं यह भारतीय संस्कृति की वे मूल परिचायक थीं जिनमें आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की गाथा सिमटी हुई थी। प्रायः 52 युद्धों का काव्यात्मक इतिहास ‘‘आल्हा’’ पढ़ पाना सबके लिए संभव नहीं हो पाता है, ऐसे में ‘‘आल्हा समर सारावली’’ संक्षेप में और गद्य में उन चर्चित युद्धों का सम्पूर्ण विवरण संक्षेप में उपलब्ध कराता है, जिसे पढ़ कर ‘‘आल्हा’’ काव्य के कलेवर को जाना और समण जा सकता है। यह कृति बुंदेली विरासत को सहेजने की दिशा में अति महत्वपूर्ण है। यह पुस्तक न केवल पुरातन साहित्य को पुनः प्रकाश में लाने का कार्य करती है अपितु बुंदेला इतिहास के एक महत्वपूर्ण अंश को भी पुनः संरक्षित करती है।
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Thursday, October 8, 2026
बतकाव बिन्ना की | पितरों खों जिमाओ, मनों जियत भओ खों सोई पूछ लेओ करे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, October 7, 2026
चर्चा प्लस | अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
तितलियां ही तो है रंग-बिरंगी, नाज़ुक। बटरफ्लाई कैचर नेट में पकड़ने लायक़, पारदर्शी बोतल में कर क़ैद कर लेने लायक़ और किसी ट्रॉफी की तरह किताब के पन्नों में दबाकर रख लेने के लायक़। जिन्हें जब चाहे तब देख कर अपनी शक्ति का एहसास किया जा सके। जब शहरों में, गांव में, कस्बों में बहुत से बगीचे हुआ करते थे, बहुत से फूल खिला करते थे तब बहुत सी तितलियां उड़ा करती थीं। तब भी यही सुलूक होता था उनके साथ। आज बगीचे कम हैं, फूल कम हैं लेकिन सुलूक बदला नहीं है। मुट्ठी पर तितलियां भी किसी चौक- चौराहे पर जुड़ जाए तो टूट पड़ते हैं लोग उन पर। मगर तितलियों का साहस तो देखिए वे किताबें से निकल कर अपने पर खोलना चाहती हैं।
बचपन में बहुत से नसमझी वाले काम हो जाते हैं जैसे टिड्डे की टांग में धागा बांधकर उसे उचकाना, मेंढक की टांग में धागा बांधकर उसे लटका देना, किसी चीटें को पारदर्शी गिलास में बंद कर उसे छटपटाते हुए देखना और सुंदर, नाज़ुक तितलियों को पकड़ कर कभी उनके पंख नोच लेना तो कभी उन्हें जीते जी किताबों के पन्नों में दबाकर, भविष्य में देखने के लिए दफ़्न कर देना। बचपन की यही बचकानी नसमझ भरी गलतियां किसी किसी पर ऐसा प्रभाव डालती है कि वह बड़े होने पर भी तितली जैसी खूबसूरत हर चीज को अपने कब्जे में कर लेना चाहते हैं, मिटा देना चाहते हैं, दबा देना चाहते हैं। इसे चाहे तो साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर भी कह सकते हैं जिसकी नींव इंसान के बचपन में ही नहीं बल्कि पीढ़ियों पहले से पड़ चुकी रहती है। उसे पीढ़ी से जिसमें पूर्वजों ने वन्य पशुओं के सिर काटकर अपनी ड्राइंग रूम में ट्रॉफी बनाकर सजाने का चलन चलाया था। परिणाम यह हुआ कि शिकार हुए पशुओं की प्रजाति ही खतरे में पड़ गई। पूरी दुनिया को चिंता करनी पड़ी के लुप्त होने की कगार में खड़ी प्रजाति को कैसे बचाया जाए? कुछ दुर्भाग्यशाली प्रजातियां तो अब इतिहास के पन्नों भर में हैं। वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन नेचर) के अनुसार, कुछ विशिष्ट तितली प्रजातियाँ ही पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं, जिनमें लिब्याथी सिनिरास (1866 में), मोरेंट्स ब्लू (1879 में), यूरेनिया स्लोनस (20 वीं सदी के आरंभ में) और ज़ेरसेस ब्लू (1941 में) विलुप्त हो चुकी हैं। पर्यावरण प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 20% मूल्यांकित प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
हां, मनुष्य का स्वास्थ्य बढ़ जाता है और वह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने लगता है तो प्रजातियों पर संकट आना स्वाभाविक है।
बेटी बचाओ आंदोलन भी कुछ इन्हीं कारणों से चलाया गया। भारतीय समाज में बेटों की ललक इतनी अधिक बढ़ती चली गई की बेटियां कोख में ही मारी जाने लगीं। पुरुषों और महिलाओं का अनुपात गड़बड़ा गया। आज भी देश में कई स्थान ऐसे हैं जहां पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की कमी है। विवाह के लिए भी लड़कियां नहीं मिलती हैं। वे दूसरे राज्यों से खरीद कर लड़कियां लाते हैं ताकि वैवाहिक जीवन बिता सके और अपना वंश चल सकें। मनुष्य एक बुद्धिमान प्रजाति है। मनुष्यों में ही कुछ लोग समझ गए कि यदि बेटियों को इसी तरह कोख में मारा जाता रहा तो स्त्री प्रजाति ही संकट में पड़ जाएगी। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या सबसे कम (सबसे कम लिंगानुपात) वर्ष 1991 की जनगणना में पाई गई थी जो ऐतिहासिक रूप से सबसे कम दर्ज किया गया था। इसके बाद शासकीय स्तर पर प्रयास शुरू किए गए।
देश में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के रूप में एक संघीय कानून पारित किया गया। इस अधिनियम से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी की गई। ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान रखा गया। प्रत्येक आनुवांशिक परामर्श केंद्र, आनुवांशिक प्रयोगशाला या आनुवांशिक क्लिनिक परामर्श देने या प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का संचालन करने में लगे हुए, जैसे कि गर्भाधान से पहले और बाद में लिंग चयन की संभावनाओं के साथ इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) पीसीसीपीटी अधिनियम के दायरे में आता है, इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ तथा पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या फिर बढ़ने लगी। देखा जाए तो इससे स्त्री प्रजाति विलुप्ति के पन्नों में दर्ज़ होने से बच गई। फिर भी यह बहुत खुश होने वाली बात नहीं कहीं जा सकती है क्योंकि प्रतिबंधों की बाड़ उसके इर्द-गिर्द सदियों से खड़ी की जाती रही है।
स्त्रियों के लिए सबसे बड़ा प्रतिबंध रहा उसके साथ होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध खामोशी को अपनाने का। यदि राह चलते छेड़छाड़ की जाए तो वह प्रतिकार न करें सर झुका कर निकल जाए। यदि उसके साथ बलात्कार जैसी जागने वारदात हो तभी वह खामोश रहे क्योंकि समाज बलात्कार पीड़िता स्त्री को ही दोषी ठहराएगा। यदि जबरदस्ती प्रेम के नाम पर धोखा देकर उसे गर्भवती कर दिया जाए तो भी खामोश रहे क्योंकि उसे ही बदचलन ठहराया जाएगा। यदि घर की चौखट के भीतर परिवार के किसी पुरुष द्वारा उसे यौन अपराध का शिकार बनाया जाए तो भी वह मौन धारण किए रहे, क्योंकि इसमें भी स्त्री को ही दोषी ठहराया जाएगा। यही कारण है कि बलात्कार पीड़िता के प्रति उसके परिजन भी सहानुभूति रखने के बजाय भयभीत हो उठते हैं। यदि पीड़िता पुलिस में शिकायत करना भी चाहे तो परिजन उसे ऐसा करने से रोकते हैं। यदि परिजन साथ दे भी दें, तो समाज उन परिजन को भी कटघरे में खड़ा कर देता है कि “क्या आवश्यकता थी ढिंढोरा पीटने की जो हो गया सो हो गया।”
अपराधी बेटों को दोष नहीं किंतु पीड़िता बेटी को दोषी ठहराया जाना समाज की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। इसीलिए आज भी यह स्थिति है कि रात को कोई लड़की, कोई स्त्री घर से बाहर अकेली नहीं जाना चाहती है। जो लड़कियां शिक्षा अपने या नौकरी करने के लिए दूसरे शहरों में जाकर रहती हैं उन्हें भी कोई पुरुष सहारे के रूप में ढूंढना पड़ता है फिर चाहे वह सहारा ही उनके लिए मुसीबत क्यों न बन जाए।
नौकरी पेशा स्त्री यो का जीवन भी दोधारी तलवार पर चलता रहता है। स्त्री के लिए नौकरी करने का मतलब सिर्फ नौकरी करना नहीं होता है साथ में उसे घर की पूरी जिम्मेदारियां वहन करनी पड़ती हैं। एक पुरुष यदि नौकरी करके घर लौटता है तो घर में मौजूद स्त्री चाहे वह पत्नी, बहन या मां हो, चाय नाश्ता बना कर देती है। वहीं, यदि एक स्त्री काम करके कार्यस्थल से घर लौटती है तो उसे घर लौट कर सबके लिए न केवल चाय नाश्ता बल्कि रात का खाना भी बनाना पड़ता है। बहुत सी कामकाजी महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें कार्य स्थल पर आपत्तिजनक टीका टिप्पणी अथवा अनचाहे दबाव का सामना करना पड़ता है और ठीक वहीं दूसरी ओर घर में ताने सुनने पड़ते हैं। यह तमाम बातें पूरे समाज को विदित है। कुछ भी छुपा हुआ नहीं है फिर भी स्त्री की स्थिति में परिवर्तन कोई नहीं चाहता है।
वैवाहिक संबंध हो तो दहेज का दानव लड़की के कंधे पर बिठा दिया जाता है। जिससे मां-बाप उसके पैदा होने के साथ ही इस चिंता में डूब जाते हैं कि कल यह जब बड़ी होगी तो इसके लिए ढेर सारे दहेज का इंतजाम करना पड़ेगा। यदि ढेर सारा दहेज नहीं दिया गया तो लालची ससुराल वाले तरह-तरह से परेशान करेंगे और हो सकता है कि उसे मौत के घाट ही उतार दें। यह सब भी पूरा समाज जानता है। दहेज विरोधी कानून भी देश में लागू है लेकिन दहेज की प्रथा आज भी जारी है, सिर्फ तरीका बदल गए हैं। परंपरा रही कि दूल्हा बारात लेकर आता था लेकिन अब कई वैवाहिक बंधन के दौरान दुल्हन को “बारात” लेकर जाना पड़ता है।
नई पीढ़ी की लड़कियों को यह बंधन मंजूर नहीं हैं। उनका यही कहना है कि यह हमारा अपना जीवन है और इसे हमें अपनी तरह से जीने दो। हमें हमारे शहर में वे सड़क दो जिस पर हम निर्भय होकर चल सकें। हमें वह समाज दो जो हमारी प्रताड़ना के समय हमारे साथ खड़ा हो और हमें समर्थन दे। वे पुरुष प्रजाति की विरोधी नहीं हैं, वे सिर्फ उन पुरुषों की विरोधी हैं जो उनको किसी न किसी रूप में मानसिक एवं शारीरिक के प्रताड़ना देते हैं।
दुर्भाग्य से आज भी स्थिति यह है कि जब बेटियां अपने विरुद्ध होने वाली अपराध के बारे में साहस करके आवाज उठाती हैं तो समाज दो फड़ में बंट जाता है। कोई उनके कपड़ों पर उंगली उठाता है तो कोई उनके आवाज उठाने पर उंगली उठाता है तो कोई उन्हें बदचलन ही ठहर देता है। गोया स्त्रियों को अपनी फट होने वाले किसी भी अपराध को लेकर आवाज उठाने या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अधिकार नहीं है। की अगुवाई में हुई थी। ओलंपिक स्तर की भारतीय महिला पहलवानों विनेश फोगाट और साक्षी मलिक द्वारा यौन शोषण के विरुद्ध पहली बार आधिकारिक तौर पर 18 जनवरी 2023 को आवाज़ उठाई गई थी। इस दिन देश के शीर्ष पहलवानों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली पुलिस ने अप्रैल 2023 के आखिर में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया और जून 2023 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। अगस्त 2026 में, दिल्ली की एक अदालत (राउज़ एवेन्यू कोर्ट) ने पर्याप्त सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बृजभूषण शरण सिंह को इन आरोपों से बरी कर दिया गया। एक सीधी चोट स्त्री समाज पर की जब विश्व स्तर की महिला खिलाड़ियों को न्याय नहीं मिल सकता तो एक सामान्य स्त्री को न्याय कैसे मिलेगा?
अपने जीवन में कभी ना कभी यौन शोषण का शिकार हुई महिलाओं ने “#मी टू” की मुहिम चलाई। यह विश्व व्यापी मुहिम थी। अनेक महिलाओं ने अपनी पीड़ा खुलकर बयान की। अनेक नामचीन पुरुष बेनकाब हुए। फिर भी वह हर स्त्री सामने नहीं आ सकी जो कभी ना कभी प्रताड़ना का शिकार बनी थी। सदियों के डर और बंधन का पहाड़ एक झटके में बिखर नहीं सकता था।
तितलियां पंख लेकर पैदा होती हैं। प्रकृति या कहें, ईश्वर भी उन्हें उनकी सुंदरता के साथ निर्भय होकर उड़ते हुए देखना चाहता है। युवा पीढ़ी की लड़कियां भी अपने अधिकारों को पाना चाहती हैं। जिस तरह तितली अपने पंख फैला कर उड़ना शुरू करती है, इसी तरह लड़कियां भी खुलकर सामने आकर अपनी बात रखने का साहस कर रही हैं। जो पहले कभी देखा न गया हो और अचानक दिखाई देने लगे तो समाज में अनेक लोगों को परेशानी का अनुभव होने लगता है। बेशक यह भी सही है कि जो पहले कभी किया न हो और अचानक किया जाने लगे तो उसमें कुछ गड़बड़ियां भी होती हैं, कुछ अनाड़ीपन भी होता है और कुछ आक्रोश की अधिकता भी रहती है। फिर भी ऐसा लगता है की आज की तितलियां किताब में एक स्मृति चिन्ह की तरह दबाकर अपना जीवन खोने के बजाय पंख खोलकर उड़ने का विकल्प चुनना चाहती हैं। इसी संदर्भ में निदा फ़ाज़ली का यह शेर याद आता है-
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं,
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 07.10.2026 को प्रकाशित)
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Tuesday, October 6, 2026
पुस्तक समीक्षा | पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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वार्षिकांक - बघेली अंजोर
संपादक - डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’
प्रकाशक - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी - 486661 (म.प्र.)
मूल्य - 100/-
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मध्य प्रदेश के सीधी से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘बघेली अँजोर’’ का यह दूसरा वर्ष है तथा इसका पांचवा अंक (जुलाई- सितम्बर, 2026) वार्षिक अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका के संपादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उप सम्पादक गीता शुक्ला ‘‘गीत’’। प्रधान सह सम्पादक रामलाल मिश्र और शिवी शुक्ला हैं। यह पत्रिका उत्तर भारत की बोलियां के उत्थान के उद्देश्य से प्रकाशित की जा रही है जिसमें वर्तमान में पांच बोलियां शामिल हैं - बघेली, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी। पत्रिका में इसके उद्देश्य के संबंध में टीप लिखी गई है- ‘‘बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य संस्कृति की पूर्णतया अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका।’’
आज जब भारतीय भाषाओं को संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है ऐसे समय में बोलियां के पक्ष में खड़े होना संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हिंदी और उर्दू धीरे-धीरे हिंग्लिश और एंग्लो-उर्दू के हवाले होती जा रही है। बोलियों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। किंतु यह अच्छी बात है कि बोलियां लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं। बोलियों में लचीलापन होता है। वे विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों के शब्द ग्रहण करके भी अपनी मौलिकता बनाए रखती हैं। बोलियां इस कठिन दौर में भी अपनी यथावत पकड़ बनाए हुए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि व्यक्ति चाहे जितना भी पढ़ लिख जाए, अनेक भाषाओं का ज्ञाता बन जाए लेकिन जब उसे अपनी मूल संस्कृति से जुड़ना या उसे अभिव्यक्त करना होता है तो वह अपनी बोलियांे का ही सहारा लेता है। यानी बोलियां उसकी मूल अस्मिता, मूल क्षेत्रियता की पहचान होती हैं। अमेरिका या कनाडा में बसा हुआ व्यक्ति भी जब गर्व से कहता है कि मैं भारत के बुंदेलखंड का हूं, बघेलखंड का हूं या फिर भोजपुरी हूं तो इस उद्घोष में उसके क्षेत्र की बोली भी समाई रहती है।
‘‘बघेली अंजोर’’ के संपादकीय ‘‘कहब जरूरी है’’ में संपादक डॉ. ‘विकल’ ने “अक्षराणामकारोऽस्मि” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘अक्षराणामकारोऽस्मि’’ के सबसे बड़े जानकार औ समझै खातिर सबसे जादा जिम्मेदार हमरे साहित्यकारन क कहा जाय सकत है। दुइ-चारि लाइन से लै के कुछ किताबन तक के लिखड्या-पढ़ड्या अपने आप क सबसे बड़ा मानै लागत हैं। ओतनी दार उँ इया बिसरि जात हैं, के जउने अच्छर के साधना-आराधना उँ कै रहे हैं, उहे ब्रम्ह आय, उहे परम सत्ता आय, उहै भगमान आय। त फेर ओके सामने अहंकार काहे के? हँसी आबति है, दुक्खी लागत है इया देखि के, जब दुसरे बोली-भाखा के नाम पर, सहर, जिला, प्रदेस के नाम पर दुसरे क छोट बताय के ओकर हँसी उड़ायी जाति है। एतनै नहीं, ओकर जरि काटै म सगली ताकत झोंकि दीन जाति है। जउन हम कै रहेन है, उहै उत्तम है औ बाँकी सब घटिया। माने हमरे मन्दिर बाले भगमान असली औ बाँकी सब मन्दिरन के भगमान नकली?”
डॉ. विकल ने अपने संपादकीय में बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है। सचमुच, बोलियों को बहनों की तरह मिलकर रहना चाहिए। कोई भी बोली न तो बड़ी है और न छोटी। प्रत्येक की अपनी स्वतंत्र अस्मिता है लेकिन साथ ही शब्दों का बहानापा भी है, यह भूलना नहीं चाहिए। संपादकीय बघेली में लिखा गया है बघेली सरल बोली है, समझ में आ जाने वाली। किंतु संपूर्ण पत्रिका वर्तमान में पांच बोलियों का प्रतिनिधित्व कर रही है इसलिए यदि संपादकीय खड़ी बोली में होता तो अधिक उत्तम रहता विशेषरूप से वार्षिकांक का। वैसे, पांचों बोलियां आपस में इतनी घुली-मिली हैं कि इनमें से सभी को संपादकीय में कही गई बातें भलीभांती समझ में आ जाएंगी। किन्तु यह बघेली और उसकी निकटवर्ती बोलियों के अतिरिक्त भी अन्य बोली बोलने वाले पाठकों के हाथों में भी जाएगी और वे उत्सुकतावश इसे पढ़ने का प्रयास करेंगे।
वार्षिकांक के लिए रचनाओं का सटीक चयन किया गया है। इसका प्रथम आलेख लोकोक्तियों पर है। लोकोक्ति अर्थात लोक की उक्ति। लोक की वही उक्ति स्थायित्व पाती है जिसमें कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया हो। जिसमें संदेश हो, शिक्षा हो, चुटीलापन हो और जो स्मृति में अपना स्थान बना कर जबान पर चढ़ जाए और बार-बार बोली जाए। डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘‘चन्द्र’’ ने ‘‘लोकोक्तियाँ: हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ शीर्षक से लिखे गए लेख में लिखा है कि ‘‘लोकोक्तियाँ समय के अनुसार ढलती और बदलती भी रहती हैं। जिन्हें कल तक कोई भी नहीं पूछता था, जो चलन में नहीं थीं, वे भी कभी-कभी अपने को पाव-सेर से आगे पसेरी के भाव से स्थापित होने का दावा करती हैं। शायद इसीलिए कहा गया हो, कि ‘जेऊ रोड चलै न पाबै ओऊ रोड पसेरी तामैं’।’’
दूसरा आलेख अवधी की काव्यात्मक विशेषता के रूप में बरवै छंद पर लिखा गया है। आलेख “बरवै काव्य-परम्परा” में डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी ने अवधी काव्य में बरवै छंद के व्यापक प्रयोग पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “अवधी काव्य के व्यवहृत छन्दों में बरवै का स्थान विशेष है। वह अवधी का दुलारा छन्द है।’’
इस वार्षिकांक में कुल चार आलेख हैं - ‘‘लोकोक्तियाँः हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ - डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘चन्द्र’, ‘‘बरवै काव्य-परम्परा’’ - डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी, ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ - डॉ. संजय अलंग, ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’- डॉ. अक्षय पाण्डेय। ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ डॉ. संजय अलंग का शोधात्मक लेख है जिसमें उन्होंने गोण्ड जनजाति की उत्पत्ति, गोण्ड साम्राज्य, गोण्ड संस्कृति, रीतिरिवाज़, बोली, जीवनशैली आदि की विस्तृत जानकारी दी है। डॉ. अक्षय पाण्डेय ने अपने लेख ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’ में इस तथ्य को उद्धृत किया है कि ‘‘नवगीत में मिथकों और सांस्कृतिक प्रतीकों का पुनर्पाठ मिलता है।’’
वार्षिकांक में चार कहानियां हैं। जिनमें गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ की बघेली कहानी ‘‘बुढ़ाई के गइलि’’, डॉ. शेषमणि शुक्ल की अवधी कहानी ‘‘जइसि नियति वइसि बरक्कति’’, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बुंदेली कहानी ‘‘बुकरिया’’ तथा डॉ. विष्णुदेव तिवारी की भोजपुरी कहानी ‘‘सेहुँड़ आ कदम्ब’’ है।
रामनाथ साहू के छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘‘आमापाली के इस्कूल’’ का अंश, जो छत्तीसगढ़ी बोली का साहित्यिक समृद्धि को रेखांकित करता है। चार लघु कथाएं भी शामिल की गई हैं। बघेली में समरजीत वर्मा ‘बारी’ की लघुकथा ‘‘गरीबी रेखा के कार्ड, बालश्रमिक’’, बुंदेली में सिद्ध नारायण दुबे की ‘‘मैंने कओ तो का, पड़ोसी धर्म’’, छत्तीसगढ़ी में डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथा ‘‘भगवान के नाव म, डर’’ तथा भोजपुरी में अनीता मिश्र ‘‘सिद्धि’’ की लघुकथा ‘‘माई के सपना, मोबाइल वाला मास्टर’’।
डाॅ. विकल ने साहित्य की लगभग सभी बहुप्रचलित विधाओं को इस वार्षिकांक में स्थान देते हुए व्यंग्य और रेखाचित्र को भी स्थान दिया है। अवधी में अजय प्रधान की व्यंग्य ‘‘जीजा से फूफा’’ चुटीला और रोचक व्यंग्य है। लेखिका सुधा वर्मा का छत्तीसगढ़ी रेखा चित्र ‘‘फाफी’’। यह फाफी नामक महिला पर संवेदनात्मक रेखाचित्र है।
‘‘बघेली अंजोर’’ में एक स्थाई स्तम्भ रहता है ‘‘पुरखिन के कोठार से’’। इसमें इस बार डॉ. दुर्गेश दीक्षित की बुंदेली कहानी ‘‘तीसमारखाँ’’ दी गई है। समीक्षा के स्तम्भ में डाॅ. दया दीक्षित के बुंदेली उपन्यास की समीक्षा ‘‘मेरी दृष्टि में: ओरछा की गणेशकुँवरि’’ डॉ. सुषमा त्रिपाठी द्वारा की गई है। इसी स्तम्भ में गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ के लघुकथा संग्रह ‘‘को बनाइस’’ की समीक्षा डाॅ. सुषमा त्रिपाठी ने की है।
‘‘अड़ोस-पड़ोस’’ स्तम्भ में भगवती प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध ‘‘हरियरी’’ तथा ‘‘चलत-चलाबत’’ में डाॅ. सुधाकर तिवारी की रचना ‘‘अनन्या, राघव और रामायण’’ है। इसके साथ ही ‘‘रपट’’ के अंतर्गत रीवा शहर के प्रतिष्ठित कृष्णा राजकपूर आडिटोरियम में जनवरी-फरवरी 2026 में हुए पाँच दिवसीय छठवें चित्रांगन इंटरनेशनल फिल्म एवं थिएटर फेस्टिवल 2026 की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है।
कोई भी वार्षिकांक विशेष रूप से जो बोलियों पर केंद्रित हो, काव्य विधा के बिना हो ही नहीं सकता है। डाॅ. ‘विकल’ ने विभिन्न बोलियों में लिखे गए गीत और ग़ज़ल को पर्याप्त स्थान दिया है। गीत विधा में अनूप ‘‘अशेष’’ का ‘‘घुँघरा कस हो, पानी में’’ (बघेली), प्रदीप सारंग का ‘‘करमै पाठ पढ़ावै, बदरिया छाय रही’’ (अवधी), महेश कटारे ‘‘सुगम’’ का ‘‘हा हा दैया, का रै गी है’’ (बुन्देली), मिनेश कुमार साहू का ‘‘मुड़ी-पीरा माटी महतारी के, मुड़ी उल्हापाना (छत्तीसगढ़ी) तथा भालचन्द त्रिपाठी का ‘‘के समझावे, सुख के बिहान मंगली’’ (भोजपुरी) गीत है। ग़ज़लों के क्रम में रामसखा नामदेव की बघेली, डॉ. अशोक अज्ञानी की अवधी, राज सागरी की बुन्देली, जितेन्द्र कुमार ‘‘साहिर’’ की छत्तीसगढ़ी तथा मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़ल है।
‘‘बघेली अंजोर’’ का यह वार्षिकांक एक समृद्ध विशेषांक है जिसके लिए डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उनका संपादक मंडल प्रशंसा का पात्र है। बोलियों के उत्थान एवं संरक्षण की दिशा में ‘बघेली अंजोर’’ यूं भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, उस पर इस वार्षिकांक ने उसकी महत्ता पर चार चांद लगा दिए हैं। वार्षिक अंक का मूल्य 100 रुपए है तथा पत्रिका की वार्षिक राशि मात्र 280 रुपए है। सरकारी विज्ञापन अथवा किसी प्रतिष्ठान के विज्ञापन के बिना इस प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक उच्चकोटि का मिशन ही कहा जाएगा। उस पर यह वार्षिकांक न केवल बघेली और उसकी समीपवर्ती बोलियों को नवीन पटल देता है अपतिु बोलियों में हो रहे नवीन सृजन का भी साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यह एक संग्रहणीय वार्षिकांक है।
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