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Friday, August 22, 2025

शून्यकाल | वास्तव में कौन था गीधराज जटायु ? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल     
वास्तव में कौन था गीधराज जटायु ?
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
         चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो किन्तु हर भारतीय ने कभी न कभी रामकथा पढ़ी या सुनी अथवा टीवी धारावाहिक के रूप में देखी अवश्य है। हम सभी जानते हैं कि रावण ने छलपूर्वक सीता का अपहरण किया था और उन्हें लेकर आकाशमार्ग से लंका की ओर चल पड़ा था। तब मार्ग में गीधराज जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रावण और जटायु में युद्ध भी हुआ था। वास्तव में जटायु था कौन? पक्षी या विशिष्ट मानव?  
                                                                      महाकाव्य ‘‘रामायण’’ में जटायु गिद्ध पक्षी के रूप में वर्णित है। वह अरुण और उनकी पत्नी श्येनि का छोटा पुत्र था। अरुण सूर्यदेव के रथ के सारथी माने जाते हैं। इससे पूर्व ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी विनीता के दो पुत्र हुए गरूड़ और अरुण। गरुड़ भगवान विष्णु की शरण में चले गए जबकि अरुण सूर्यदेव के सारथी बने।
     जटायु भी दो भाई थे- जटायु और संपाती। दोनों को पक्षीराज कहा जाता था। वे वीर और धर्मपरायण पक्षी योद्धा माने जाते थे। यह भी उल्लेख मिलता है कि जटायु गरुड़ के भतीजे थे। गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हैं। रामायण की कथा के अनुसार गिद्धराज जटायु ऐसे पहले योद्धा थे जिन्होंने सीता जी के हरण के दौरान सबसे पहले रावण के साथ युद्ध किया था। अपने साहस और पराक्रम का परिचय देते हुए गिद्धराज जटायु ने एक स्त्री की रक्षा के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दिए । जब रावण लंका जाते समय दंडकारण्य वन की ओर बढ़ रहा था, तो जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। 
      वैसे जटायु की सूर्यवंशियों से पुरानी मित्रता थी । अयोध्या के राजा एवं श्रीराम के पिता महाराज दशरथ और जटायु परस्पर मित्र थे। प्राप्त विवरण के अनुसार एक बार जब राजा दशरथ अपने राज्य का विस्तार करने के लिए विजय अभियान पर निकले थे तब दानवों ने उन पर अचानक आक्रमण कर दिया। दशरथ बुरी तरह घिर गए। इस बात की सूचना गीधराज जटायु को मिली एक राजा को दानवों ने लिया है तो वे अपनी सेना ले कर तत्काल दशरथ की सहायता के लिए निकल पड़े। जटायु की सेना ने दानवों को घेर लिया। जिससे स्थिति यह बनी कि दशरथ को घेरने वाले दानव स्वयं दोनों ओर से घिर गए। भीतर से दशरथ और बारि से जटायु और उसकी सेना। कुछ ही देर में दानवों ने हार मान ली। कुछ वहीं ढेर हो गए और कुछ वहां से प्राण बचा कर भाग खड़े हुए। राजा दशरथ ने अपरिचित जटायु के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और सहायता के बदले कुछ भी मांग लेने को कहा।
‘‘मुझे आपकी मित्रता चाहिए, और कुछ नहीं!’’ जटायु ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया।
इसके बाद दशरथ एवं जटायु सदा के लिए मित्र बन गए।  

राजा दशरथ एवं गीधराज जटायु की मित्रता के संबंध में एक और प्रसंग मिलता है जिसके अनुसार उस समय जटायु नासिक के पंचवटी के वन में रहा करते थे। एक दिन राजा दशरथ आखेट के के लिए निकले और एक हिरण का पीछा करते हुए पंचवटी के निकट जा पहुंचे। वहां उनकी गीधराज जटायु सो भेंट हुई और दोनों में मित्रता हो गई। 
     तीसरे प्रसंग के अनुसार जब राजा दशरथ इंद्र की सहायता के लिए देवासुर संग्राम में भाग लेने आए तब उनका सामना शंबरासुर नामक दैत्य से हुआ था। उस युद्ध में जटायु ने भी राजा दशरथ की सहायता की थी। एक पक्षी के द्वारा अपने प्रति इतनी कर्तव्यनिष्ठा व उसकी महानता को देखकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए थे व उन्हें अपना मित्र बनाया था। तब से राजा दशरथ व जटायु के बीच मित्रता हो गई थी।


चाहे युद्ध की कथा को सच माने अथवा आखेट की कथा को, पर इतना तो मानना होगा कि दशरथ एवं जटायु में मित्रता थी।
जटायु जितना अच्छा साहसी योद्धा था, उतना ही उदार और मानवीय गुणों से परिपूर्ण था। उसका अपना एक राज्य था जिस पर उसका शासन चलता था। राजा बनने के पूर्व एक बार संपाती और जटायु अपने पिता सूर्यदेव के सारथी अरुण से मिलने जा रहे थे। कुछ ही ऊंचाई पर पहुंचने के बाद जटायु से सूर्य की गर्मी सहन नहीं हुई और वे वापस आ गया। लेकिन, संपाती आगे बढ़ते रहा, कुछ समय बाद सूर्य की तेज गर्मी से उसके पंख जल गए। इसीलिए वह उड़ नहीं पाता था। किन्तु संपाती की दूरदृष्टि बहुत तेज थी। उसने सैंकड़ों योजन दूर समुद्र पार लंका में सीता को देख लिया था और हनुमान, अंगद, जांबवंत को बताया था कि सीता लंका में ही है। इसके बाद हनुमानजी देवी सीता की खोज में लंका पहुंचे थे। संपाती भी अपने भाई जटायु को राजकाज में सहयोग करता था। 

     श्रीराम को जब 14 वर्ष का वनवास हुआ, तब अपने वनवास के अंतिम चरण में वे पंचवटी के वनों में पहुंचे थे। वहीं पर उनका मिलन जटायु से हुआ था। जटायु अपने मित्र के पुत्र से मिल कर बहुत प्रसन्न हुए थे किन्तु अपने मित्र राजा दशरथ की मृत्यु का समाचार सुनकर उन्हें अत्यंत दुख भी हुआ था। जटायु ने ही भगवान राम, लक्ष्मण व माता सीता को वहां कुटिया बनाने के लिए उचित स्थान बताया व साथ ही उनकी रक्षा करने का वचन भी दिया।

      जब रावण ने मामा मारीच की सहायता से छल किया और मारीच सोने का मृग बन कर भगवान राम व लक्ष्मण को कुटिया से दूर ले गया तब सीता को कुटिया में अकेली रह गईं। रावण यही तो चाहता था। उसने साधु का वेश बनाया और भिक्षा मांगने के नाम पर कपट करते हुए सीता का अपहरण कर लिया। फिर वह सीता को अपने पुष्पक विमान से लंका ले जा रहा था तब जटायु ने उसे देख लिया। जटायु जानता था कि रावण उससे अधिक शक्तिशाली है। जटायु वृद्धावस्था में भी प्रवेश कर चुका था। किन्तु वह यह देख कर चुप नहीं बैठ सकता था कि एक स्त्री को छलपूर्वक अपहृत कर ले जाया जा रहा है। अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए जटायु ने आकाशमार्ग में ही रावण को रोका। रावण जटायु का एह साहस देख कर क्रोधित हो उठा। इसके बाद दोनों के मध्य आकाश में ही भीषण युद्ध हुआ। किन्तु रावण ने जटायु के पंख काट दिए जिससे  जटायु मरणासन्न की अवस्था में भूमि पर गिर पड़ा। रावण सीता को ले कर लंका की ओर बढ़ गया।
     जटायु समझ गया था कि उसकी मृत्यु सुनिश्चित है किन्तु उसने यमराज से यही प्रार्थना की कि वह एक बार श्रीराम को सीता के बारे में बता दे, फिर वह प्रसन्नतापूर्वक यह संसार त्याग देगा। श्रीराम व लक्ष्मण सीता की खोज में इधर-उधर भटकते हुए उस ओर पहुंचे जहां उन्हें करहाते हुए जटायु दिखाई दिया। जटायु ने राम और लक्ष्मण को रावण के द्वारा सीता के अपहरण की पूरी घटना बताई। जटायु ने यह भी बताया कि रावण सीता को किस दिशा में लेकर आगे बढ़ा है। साथ ही उसने आगे जाकर शबरी से मिलने को कहा और बताया कि शबरी के माध्यम से उन्हें महाराज सुग्रीव का पता मिलेगा। इतना कहकर जटायु ने प्राण त्याग दिए। रामचरित मानस में इस प्रकार वर्णन किया गया है-
तब कह गीध बचन धरि धीरा। 
सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। 
तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्हीं।।

जटायु की मृत्यु के बाद भगवान राम ने एक पुत्र की भांति उनका पूरे विधि विधान से अंतिम संस्कार किया। बाद में हनुमान और जांबवंत ने जटायु की मृत्यु का समाचार संपाती को दिया था। 

     यह वाल्मीकि कृत ‘‘रामायण’’ तथा उस पर आधारित तुलसी कृत ‘‘रामचरिस मानस’’ में उपलब्ध जटायु का वर्णन तथा विवरण है। जटायु की पत्नी अथवा पुत्र का दोनों में उल्लेख नहीं मिलता है। मृत्यु की सूचना भी उसके भाई को दी जाना बताई गई है। अतः संभव है कि जटायु अविवाहित रहा हो। 

अब प्रश्न उठता है कि क्या जटायु मात्र एक पक्षी था? वह भी ऐसा पक्षी जो मृत शरीर खा कर जीवनयापन करता है? यदि गंभीरता से इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो जटायु भी एक वनवासी समुदाय का प्रधान था जिसका अपना राज्य था, अपना सेना थी और वह एक सफल योद्धा था। ऐसा योद्धा जिसकी मित्रता राजा दशरथ से थी। उसके राज्य में विज्ञान भी प्रगति कर चुका था। इसीलिए रावण जब सीता को अपहृत कर के अपने पुष्पक विमान से आकाशमार्ग से ले जा रहा था तब जटायु ने भी हवाई हमला कर के उसके मार्ग को रोका। जब राक्षस राज रावण के पास विमान होना संभव था तो जटायु के पास भी संभव क्यों नहीं हो सकता है। यदि प्राचीन माया सभ्यता को देखा जाए तो वे नरबलि जैसे अमानवीय अनुष्ठान किया करते थे किसी नरभक्षी कबीले की भांति किन्तु उनकी नगरीय व्यवस्था अत्यंत उच्चकोटि की थी। उनके नगर में जल व्यवस्था के जो उपाय अपनाए गए थे वह आज भी वैज्ञानिकों एवं पुराविदों को चकित कर देते हैं। संभव जटायु जिस गीध समुदाय का था, वे अपनी वायुसेना के कारण गीध अथवा गिद्ध की पहचान को अपनाए रहे होंगे। तथा उनके समुदाय को गीध के रूप में जाना जाता रहा होगा। यूं भी उस समय एक शक्तिशाली राजा दूसरे शक्तिशाली राजा से मित्रता करता था, अपने से कमजोर से नहीं। अतः गीधराज की शक्ति भी राजा दशरथ के समकक्ष थी। अन्तर इतना ही था कि राजा दशरथ विशुद्ध नगरीय सभ्यता में थे और गीधराज जटायु वनांचल की सभ्यता में। जटायु में साहस, सम्मान और स्त्री की रक्षा की मानवीय भावना थी इसीलिए उसने रावण से टक्कर ली।
      यदि इस थ्योरी को स्वीकार किया जाए तो हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं कि नगरीय और वनांचल के लोगों के बीच सौहार्द, सम्मान और आत्मीयता का संबंध था। राक्षसी प्रवृत्ति के मायावी कपटी मनुष्यों के दोनों ही विरुद्ध थे। वस्तुतः यह एक विचारणीय विषय है जो अभी विशेषज्ञों द्वारा और गहन शोध की मांग करता है।      
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