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Saturday, August 23, 2025

संस्मरण | पद्मश्री रामसहाय पांडे - डॉ शरद सिंह | "चौमासा" पत्रिका में प्रकाशित

आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल की पत्रिका  "चौमासा" के मार्च - जून 2025 अंक में सागर गौरव मृदंग वादक व राई नर्तक पद्मश्री स्व. पं. रामसहाय पाण्डेय जी के जीवन पर आधारित है मेरा लेख ....👇
🚩 हार्दिक आभारी हूं "चौमासा" के संपादक मण्डल की। 🌹🙏🌹 
         लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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Sunday, April 14, 2024

लेख | सागर की निर्भीक पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक थे : स्व. भोलाराम भारतीय | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

🚩'नयादौर' के संपादक भाई काशीराम रैकवार जी के विशेष आग्रह पर भाई स्व. भोलाराम भारती जी पर मेरे द्वारा लिखा गया लेख आज 'नया दौर', 'आचरण', 'सागर दिनकर' तथा 'दी लीला टाइम्स' में प्रकाशित हुआ है। 🚩
🌹हार्दिक आभार भाई काशीराम रैकवार जी🙏
🌹हार्दिक आभार आचरण 🙏
🌹हार्दिक आभार सागर दिनकर 🙏
हार्दिक आभार दी लीला टाइम्स 🙏---     -----------------------------------
लेख
सागर की निर्भीक पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक थे : स्व. भोलाराम भारतीय  
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                       
          पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ माना गया है क्योंकि पत्रकार हमेशा समाज के हित में सोचता है, लिखता है, आवाज़ उठाता है। स्व. भोलाराम भारतीय सागर नगर के एक ऐसे ही जुझारू पत्रकार थे जिन्होंने हमेशा समाज और शहर के हित में आवाज़ उठाई। वे सागर को समस्यामुक्त एवं विकसित शहर के रूप में देखना चाहते थे। वे राजनीति को भी स्वच्छ देखना चाहते थे। उन्होंने अपने लम्बे पत्रकारिता जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे किन्तु एक आधार स्तम्भ की भांति अपनी कलम के साथ डटे रहे। उन्होंने जो लिखा पूरी तार्किकता के साथ लिखा।    

    सबसे पहले कुछ संस्मरणात्मक बातें... सन् 1980 के लगभग भोलाराम भारतीय जी से परिचय हुआ था। वे ‘‘गौरदर्शन’’ साप्ताहिक का प्रकाशन कर रहे थे जिसके लिए पोस्टकार्ड द्वारा उन्होंने मेरी और वर्षा दीदी की रचनाएं मंगाई थीं। यह एक औपचारिक परिचय था। संयोगवश कुछ अरसे बाद अपनी मां डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’ जी के साथ मेरा सागर आना हुआ। भाई भोलाराम भारतीय जी से भेंट हुई और फिर इतवारी टौरी स्थित उनके निवास पर भाभीजी से भी परिचय हुआ। इसके बाद संपर्क निरंतर बना रहा। सन 1988 में सागर में आ कर बस जाने के बाद सतत पारिवारिक संबंध बना रहा। जब वर्षा दीदी का तीसरा ग़ज़ल संग्रह ‘‘हम जहां पर हैं’’ प्रकाशित हुआ तो नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों जैसे डाॅ. आर.डी.मिश्र जी, पद्मश्री डाॅ लक्ष्मी नारायण दुबे जी आदि ने कहा कि इस ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण होना चाहिए। उस समय ‘‘श्यामलम संस्था’’ जैसी कोई संस्था शहर में विद्यमान नहीं थी और श्यामलम अध्यक्ष उमाकांत मिश्र जी भी सरकारी सेवा में किसी अन्य शहर में थे। मैं और वर्षा दीदी तय नहीं कर पा रहे थे कि आयोजन कैसे और कहां किया जाए? जब हम लोगों ने भाई भोलाराम भारतीय से इस समस्या पर विचार विमार्श किया तो वे तत्काल बोल उठे,‘‘मेरे घर में बड़ा हाॅल है, वहीं से लोकार्पण कार्यक्रम कर लेते हैं।’’
      उन दिनों भाई भोलाराम भारतीय जी का शंकरगढ़ क्षेत्र में अपना निवास निर्मित हुआ था। हम लोगों के घर से अधिक दूर भी नहीं था। कुछ ही देर में पूरी रूपरेखा तैयार हो गई। छोटा-सा सादा आमंत्रणपत्र छपवाना तय हुआ। जिसे छपवाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने ली। 13 जून 1993 को लोकार्पण के अवसर पर भाई भोलाराम भारतीय जी के निवास पर हाॅल में दरी बिछी हुई थी। धीरे-धीरे सभी अतिथियों का आगमन हुआ। पद्मश्री डाॅ. लक्ष्मीनारायण दुबे, डाॅ. आर.डी. मिश्र, डाॅ. सुरेश आचार्य, चिकित्सक डाॅ. एन.पी.शर्मा, पत्रकार रामशंकर तिवारी, कवि माधव शुक्ल मनोज, कवि दिनकर राव दिनकर, कवि दादा निर्मल चंद निर्मल, कवि ऋषभ समैया ‘जलज’, ‘‘आचारण’’ संपादक एवं विधायक सुनील जैन, ‘‘आचरण’’ की प्रबंध संपादक निधि जैन सहित साहित्य एवं पत्रकारिता क्षेत्र के अनेक लोग पधारे। साथ ही मेरी मां डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’, मामा कमल सिंह चौहान तथा भाई भोलाराम भारतीय जी के परिजन उपस्थित थे। पूरा कार्यक्रम बहुत अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। यह सब भाई भोलाराम भारतीय जी के सहयोग के बिना संभव नहीं था। उन्होंने आयोजन की पूरी जिम्मेदारी इस तरह से निभाई जैसे उनका अपना आयोजन हो। इस संस्मरण को सामने रखने का उद्देश्य मात्र यही है कि जो लोग उन्हें नहीं जान पाए वे भी उनके प्रभाव एवं उनकी सहृदयता को जाने और समझें।    
     भाई भोलाराम भारतीय जी को मैंने जब भी देखा, उत्साह एवं ऊर्जा से भरा हुआ ही देखा। वे आयु में मुझसे बहुत बड़े थे किन्तु हम लोगों के बीच व्यवस्था, राजनीति आदि पर जोरदार बहसें होती थीं। मैंने उनकी बातों में अव्यवस्था के प्रति हमेशा आक्रोश देखा। लाखा बंजारा झील के लिए वे बड़ी पीड़ा के साथ कहते थे कि ‘‘ये लोग इस तालाब को मिटा कर ही मानेंगे। किसी को परवाह नहीं है। जबकि ये हमारे शहर की पहचान है।’’ इस संबंध में उन्होंने एक लेख भी लिखा था जिसका शीर्षक उनके आक्रोश को बखूबी व्यक्त करता था। लेख का शीर्षक था-‘‘तालाब के प्रति निर्वाचित राजनैतिक नेतृत्व की आपराधिक उदासीनता’’।
वे नगर एवं क्षेत्र के उन नेताओं से भी क्षुब्ध रहते थे जो सक्षम होते हुए भी क्षेत्र के विकास की अवहेलना करते थे। वे बातों-बातों में कटाक्ष करते थे कि ‘‘इन्हें तो नेता कहलाने का भी कोई हक नहीं हैं। नेता वो कहलाता है जो नेतृत्व करे, ये तो बस, अपना घर भरना जानते हैं।’’ वे ऐसे नेताओं को अपनी कलम के द्वारा ललकारते रहते थे। 14 मई 2002 को उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था-‘‘बौने कद के जनप्रतिनिधियों से कराहती सागर की जनता’’। इस लेख में उन्होंने लिखा था-‘‘सागर जिले की उद्योग विहीनता, बेरोजगारी बढ़ती गरीबी आदि के विरूद्ध सांसद व विधायकों ने लोकसभा व विधानसभा में एक भी मुखर अभिव्यक्ति भाजपाई सांसद व विधायक ने नहीं की है। कारण बहुत साफ है कि बोने कद के लोग जब पद पर पहुंच जाते हैं तो अपने कद के अनुसार रोजमर्रा के छोटेमोटे कार्यों को जनता व अखबारों में जिंदा रहना चाहते हैं। जबकि पद के अनुरूप केंद्रीय व राज्य योजनाओं से सागर के विकास व जनसुविधाओं को बढ़ाने के प्रयास व संघर्ष करना चाहिए। इसके लिए राजनैतिक दक्षता जनता में निष्ठा एवं राजनैतिक हित से उठकर समग्र विकास की मंशा आवश्यक होती है। जिसकी संकीर्णतावादी विचारधारा का भाजपा के अंदर काफी अभाव है। सागर जिले का एकमात्र बीड़ी उद्योग अपनी संकट गृस्तता से अपनी आखरी सांसे गिन रहा है। परंतु सांसद द्वारा इस सवाल पर एक भी दिन संसद में कोई सजग पहल नहीं की है। इस राजनैतिक नेतृत्व के बौने व्यक्तित्व का प्रमाण है कि देश में सबसे अधिक बीड़ी मजदूर सागर जिले में हैं। और सबसे ज्यादा कल्याणकोष साग्र जिले से केंद्र शासन को जाता है। परंतु बीडी मजदूरों को तीस व पचास विस्तार वाले केंद्र अस्पताल मैंगलूर (कर्नाटक) केरल, बारांगल (आंध्रप्रदेश) में खुल गए हैं। परंतु सागर जिले में नहीं है क्योकि इन प्रदेशों में प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक नेतृत्व पद के अनुरूप स्तर के व्यक्तित्व के नेता हैं।’’ 
        भोलाराम भारतीय जी किसी राजनीकि दल नहीं अपितु जनता के पक्ष में खड़े रहते थे। बात चाहे किसी भी दल की हो, उन्हें जो बात अनुचित लगती थी वे बिना किसी संकोच के उसे विवेचनात्मक ढंग से सामने रख देते थे। 21 जुलाई 2011 को उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि नारेबाजी से भ्रष्टाचार कभी नहीं हट सकता है, इसके लिए नीतिगत परिर्वतन आवश्यक है। ‘‘भ्रष्टाचार से मुकाबला: नारों से नहीं नीति परिवर्तन से संभव’’ शीर्षक से लिखे अपने लेख में उन्होंने लिखा था कि-‘‘दुभाग्यपूर्ण है कि मंत्रीमंडल में 90 प्रतिशत मंत्री जेल में हों यह कांग्रेस व प्रजातंत्र के लिए शर्म की बात है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद व प्रयास सराहनीय है किन्तु उनकी ‘एप्रोच’ चिन्हित भ्रष्टाचारियों को ‘एक्सपोज’ करना है, भ्रष्टाचार से निजात मांगना नहीं है। क्योंकि जिन नीतियों एवं रास्तों से भ्रष्टाचार जन्म लेता है वह उनकी समझ से बाहर है। प्रथमतः मौजूदा चुनाव प्रणाली एवं प्रकिया से राजनैतिक भ्रष्टाचार जन्म लेता है। विधायक या सांसद का चुनाव जीतने के लिए करोड़ों, अरबों रूपये खर्च करके एवं जिनसे पैसा लेकर संसद में पहुँच रहे हैं उनकी सेवा एवं हित रक्षा उनका कर्तव्य बन जाता है और यहाँ से नौकरशाही धनाढ्य तबका एवं राजनीति की काकस की कोख से भ्रष्टाचार जन्म लेता है। इसके लिए आवश्यक है कि तमाम कानूनी उपायों के साथ साथ मौजूदा चुनाव प्रणाली एवं निर्वाचन अधिनियम तथा निर्वाचन नियमावली में महत्वपूर्ण संशोधन करके अनुपातिक चुनाव व्यवस्था एवं खर्च की सीमा घटाए जाने तथा अपराध पृष्ठभूमि के लोगों की चुनावी भूमि से वर्जना जैसे उपायों से तात्कालिक भ्रष्टाचार की कोख से प्रारंभिक नसबंदी संभव हो सकती है।’’ 
नवोदित एवं युवा पत्रकारों को भोलाराम भारतीय जी के लेखों को पढ़ना चाहिए, समझना चाहिए तभी वे पत्रकारिता के सही तेवर को जान सकेंगे। दैनिक ‘‘आचरण’’ में प्रकाशित उनके लेख सन 2011 में प्रकाशक भुवनेश्वर प्रसाद केशरवानी ने संग्रह के रूप में प्रकाशित किया। इस पुस्तक का नाम है-‘‘ खून टपकेगा तो जम जाएगा’’। पूर्व विधायक सुनील जैन के अप्रत्यक्ष सहयोग से प्रकाशित इस संग्रह को भारतीय जी ने निःशुल्क रखते हुए मूल्य के आगे लिखा-‘‘आपका प्रेम एवं सहयोग’’। 
09 जून 1942 को जन्मे भोलाराम भारतीय ने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की थी। उन्होंने देश के कई बड़े मंचों पर भी काव्यपाठ किया। फिर उन्हें 1963 में पत्रकारिता रास आ गई। साप्ताहिक चेतना भोपाल, बिग्रेडियर उज्जैन, मुक्ति बोध करेली, बैंक्टेश्वर समाचार मुंबई, साप्ताहिक आगामी कल आदि समाचारपत्रों से होते हुए भोपाल से प्रकाशित दैनिक मध्यदेश का प्रतिनिधित्व किया। इसी बीच सागर से प्रकाशित ‘‘दैनिक राही’’ में सह-संपादक का कार्य किया तथा बाद में नईदुनिया इंदौर, नवभारत जबलपुर के संवाददाता रहे। कुछ दिनों के लिए नवभारत में संपादकीय में कार्य किया। तत्पश्चात सागर से ही नवभारत भोपाल एवं एम.पी. क्रानीकल का कार्य संभाला। 14 जनवरी 1971 को सागर में उन्होंने अपने स्वयं के समाचारपत्र ‘‘साप्ताहिक गौर दर्शन’’ का प्रकाशन आरम्भ किया। चार-चार अखबारों का एक साथ प्रतिनिधत्व करने के कारण लोग उन्हें ‘‘फोर मेन’’ कहने लगे थे। धीरे-धीरे सभी अखबारों को छोड़कर सिर्फ नई दुनिया इन्दौर से 1999 तक सम्बद्ध रहे। बीच में दैनिक नई दुनिया भोपाल को भी सेवायें प्रदान कीं। नई दुनिया को छोड़ने के बाद सागर से प्रकाशित दैनिक ‘‘आचरण’’ से जुड गए। जहां वे अपने अंतिम समय तक कार्यरत रहे। साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें कई पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया। 
       एक बार मैंने भाई भोलाराम भारतीय जी से पूछा था कि आपने अपने अखबार का नाम ‘‘गौर दर्शन’’ क्यों रखा, ‘‘सागर दर्शन’’ भी रख सकते थे?’’ तो उनका उत्तर था,‘‘मैं डाॅ गौर के जीवन दर्शन पर चलना चाहता हूं। जैसे उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं के बदले अपने क्षेत्र की भलाई के बारे में सोचा और यहां विश्वविद्यालय बनवा दिया, मैं भी अपने क्षेत्र के विकास के लिए अपनी क्षमता के अनुसार सबकुछ करना चाहता हूं।’’    
          वस्तुतः भाई भोलाराम भारतीय सागर की पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक थे। सागर में आज जो पत्रकारिता की फसल लहलहा रही है, उसकी उर्वर जमीन तैयार करने वालों में उनकी अहम भूमिका थी। 14 अप्रैल 2015 को सागर की निर्भीक पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक भाई भोलाराम भारतीय जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया किन्तु उनके विचार सदैव जीवित रहेंगे। यह प्रसन्नता का विषय है कि उनके दत्तक पुत्र सुनील भारतीय प्रति वर्ष ‘‘पुण्य स्मरण’’ आयोजन द्वारा उनके विचारों को प्रतिध्वनित करते रहते हैं। 
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Thursday, January 18, 2024

लेख | रामलला की प्राणप्रतिष्ठा है भावनात्मक एकता का प्रमाण | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

लेख 
रामलला की प्राणप्रतिष्ठा है भावनात्मक एकता का प्रमाण 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 

मेरा लेख आज दैनिक "आचरण" में ...
हार्दिक धन्यवाद "आचरण" 
एवं जनसंपर्क विभाग सागर 🙏

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Wednesday, January 17, 2024

लेख | रामलला की प्राणप्रतिष्ठा है भावनात्मक एकता का प्रमाण | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | स्वदेश ज्योति

लेख
रामलला की प्राणप्रतिष्ठा है भावनात्मक एकता का प्रमाण 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 

मेरा लेख दैनिक "स्वदेश ज्योति" में ...
हार्दिक धन्यवाद "स्वदेश ज्योति" सागर 🙏
हार्दिक धन्यवाद जनसंपर्क विभाग सागर 🙏

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Tuesday, August 15, 2023

लेख | याद रखें उन चुनौतियों को जो मिली थीं आजादी के तुरंत बाद | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

🇮🇳 "आचरण" में आज प्रकाशित मेरा लेख...

" याद रखें उन चुनौतियों को जो मिली थीं आजादी के तुरंत बाद "
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

         दो सौ वर्ष की दीर्घ गुलामी के बाद सन् 1947 में देश ने स्वतंत्रता प्राप्त की। इस स्वतंत्रता को पाने के लिए अनेक सतरों पर संर्घर्ष किए गए। किसी ने सशस्त्र विरोध का रास्ता अपनाया तो किसी ने निःशस्त्र विरोध किया तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन का रास्ता अपनाया। ये सभी रास्ते देश को स्वतंत्रता दिलाने के लक्ष्य की ओर जाते थे। जहां भगत सिंह, गुरुदेव, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने प्राणों की बलि दे कर आजादी का मार्ग प्रशस्त किया वहीं महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे देशभक्तों ने अहिंसा, अनशन तथा लेखन का रास्ता अपनाया। किन्तु ब्रिटिश सरकार ‘‘जिस फूट डालो और राज करो’’ के सिद्धांत पर दो सौ साल भारत पर राज करती रही, उसी सिद्धांत को अप्रत्यक्ष रूप से अपनाते हुए जाते-जाते अखंड भारत को दो टुकड़ों में विभक्त कर गई। भारत का एक हिस्सा पाकिस्तान के रूप में अलग राष्ट्र बन गया। सबसे दुख का विषय यह है कि यह विभाजन रक्त की नदियां बहा गया। यदि विभाजन के समय की तस्वीरें देखें तो उस समय की दशा पल भर में समझ में आ जाती है। मानव जीवन का मानो को मोल नहीं रह गया था। हजारों बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर हो गए और हजारों नागरिक मारे गए। ऐसे कठिन दौर से गुज़र कर देश ने स्वतंत्रता की सांस ली। लेकिन इस स्वतंत्रता की सांस के साथ अनंक चुनौतियां मुंह बाए खड़ी थीं। यहां उन विस्तृत चुनौतियों के बारे में संक्षेप में चर्चा की जा रही है।
राज्यों का विलय - 
जिस समय देश आजाद हुआ उस समय देश में 565 छोटी-बड़ी रियासतें मौजूद थीं। इन रियासतों के राजा अपनी स्वतंत्र सत्ता चाहते थे जबकि जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व में गठित देश की प्रथम सरकार चाहती थी कि रियासतें समाप्त कर दी जाएं और सभी एक देश के नागरिक की तरह मिल कर रहें। एक देश और एक राष्ट्रध्वज रहे। किन्तु रियासतों के राजा अपना अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं थे। तो सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने अपने राज्य को स्वतंत्र रखने की घोषणा कर दी। उसके बाद फिर हैदराबाद, जूनागढ़, मणिपुर और भी काफी सारी रियासतों ने आजाद रहने की घोषणा कर दी। इससे देश की अखंडता के लिए संकट पैदा हो गया। तब ‘‘लौह पुरुष’’ कहलाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल को यह दायित्व सौंपा गया कि वे रियासतों का विलय कराएं। दृढ़निश्चयी सरदार वल्लभ भाई पटेल ने रियासतों के विलय का अभियान छेड़ दिया। अनेक कठिनाइयों के बाद रियासतों का विलय हो सका। किन्तु कश्मीर ऐसी रियासत थी जिसने विलय की बात इस शर्त पर मानना मंजूर किया कि उसका अपना ध्वज रहेगा और उसका अपना शासन रहेगा। कश्मीर की भौगोलिक स्थिति अतिसंवेदनशील थी। उस पर अधिक दबाव डालने से वह पाकिस्तान के पक्ष में जा सकता था अतः तात्कालिक रूप से उसकी शर्त मान ली गई। धारा 370 के अंतर्गत उसे विशेष राज्य का दर्जा दिया गया। आगे चल कर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बात का विरोध किया। उन्होंने इस बात का भी विरोध किया कि कश्मीर में दो ध्वज नहीं फहराए जाने चाहिए। अर्थात वहां भी सिर्फ़ तिरंगा फहराया जाए, कश्मीर रियासत का ध्वज नहीं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी। अंततः सभी रियासतें भारत का अखंड हिस्सा बन गईं और देश एक सुदृढ़ राष्ट्र बनने की राह पर आगे बढ़ने लगा।

संविधान निर्माण - 
एक स्वतंत्र देश का अपना संविधान होना आवश्यक था। संविधान निर्माण भी एक चुनौती बन कर नवोदित देश के सामने खड़ा था। यद्यपि संविधान की संरचना स्वतंत्रतापूर्व ही तैयार कर ली गई थी। इसकी प्रथम बैठक भी स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व हुई थी। 6 दिसम्बर 1946 केा संविधान सभा की स्थापना हुई। 9 दिसम्बर 1946 संविधान सभागृह (संसद भवन सेंट्रल हॉल) में संविधान सभा की पहली बैठक हुई। संविधान सभा को संबोधित करने वाले प्रथम व्यक्ति जे.बी. कृपलानी थे। इसकी अध्यक्षता सच्चिदानन्द सिन्हा ने की। स्वतन्त्र देश की मांग करते हुए मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया। 11 दिसम्बर 1946 राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष, हरेंद्र कुमार मुखर्जी उपाध्यक्ष निर्वाचित। 22 जुलाई 1947 संविधान सभा ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया। 15 अगस्त 1947 भारत को स्वतन्त्रता मिली। भारत से अलग होकर पाकिस्तान नामक देश बना। 29 अगस्त 1947 संविधान मसौदा समिति बनी, जिसके अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर बनाए गए। 26 नवम्बर 1949 संविधान सभा ने भारतीय संविधान को स्वीकार किया और उसके कुछ धाराओं को लागू भी किया गया। 24 जनवरी 1950 संविधान सभा की बैठक हुई जिसमें संविधान पर सभी ने अपने हस्ताक्षर करके उसे मान्यता दी। 26 जनवरी 1950 सम्पूर्ण भारतीय संविधान लागू हुआ।

आर्थिक दशा - 
भारतीय अर्थव्यवस्था स्वतंत्रता प्राप्ति के समय अल्पविकसित अर्थव्यवस्था थी। इसमें प्रतिव्यक्ति आय तथा औद्योगिक विकास का स्तर निम्न था । कृषि पर अधिक निर्भरता थी तथा आधारभूत संरचना बहुत पिछड़ी हुई अवस्था में थी। आयातों पर अधिक निर्भरता थी तथा गरीबी, बेरोजगारी व निरक्षरता जैसी सामाजिक चुनौतियाँ भारत में विद्यमान थीं। देश के विभाजन ने उद्योग-धंधों को गहरी चोट पहुंचाई थी। ऐसी स्थिति में कुटीर उद्योगों के साथ बड़े उद्योगों की भी आवश्कता थी। उस कठिन दौर में जमशेदजी टाटा जैसे उद्योगपति सामने आए और उन्होंने बड़े उद्योगों के द्वारा देश को आर्थिक विकास की दिशा दी। बड़े-बड़े बांध बनाए गए जिससे सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था हो सके। सरकार ने पंचवर्षीय योजना के आर्थिक माॅडल को अपनाया जिससे देश को आर्थि रूप से आत्मनिर्भर बनने में सहायता मिली।

साम्प्रदायिक सद्भाव - 
अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक वैमन्स्यता की की जो फसल बोयी थी उसे स्वंतत्र भारत को अपने आरंभिक वर्षों में बड़े पैमान पर झेलनी पड़ी। साम्प्रदायिक दंगे देश की शांति के लिए खतरा थे। एक बार फिर आपसी भाईचारे एवं अपनत्व को मजबूत करने की जरूरत थी। देश के बंटवारे ने एक और साम्प्रदायिक विडम्बना खड़ी कर दी थी। पाकिसतान देश के रूप में पश्चिमी पाकिस्तान था जबकि पूर्वी पाकिस्तान भारत को पार कर के बंगाल की खाड़ी की ओर था। पूर्वी पाकिस्तान के निवासी भी स्वयं को अलग देश के रूप में आकार देना चाहते थे। भारत की सुरक्षा भी इसी में निहित थी कि पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से आजाद होने दिया जाए। इसीलिए जब 1972 में पूर्वी पाकिस्तान ने बांग्लादेश के रूप में अपना देश बनाने के लिए युद्ध किया, जिसमें भारत ने बांग्लादेश का समर्थन किया। बांग्लादेश नया देश बन गया। इससे साम्प्रदायिक दंगों में भी कमी आई और धीरे-धीरे देश में शांति और स्थिरता आने लगी।    

सामाजिक दशा - 
जिस समय देश आजाद हुआ उस समय समाज में अनेक कुरीतियां व्याप्त थीं। दासी प्रथा, बाल विवाह, अस्पृश्यता आदि कुरीतियां समाप्त नहीं हुई थीं। समाज के चहुंमुखी विकास के लिए आवश्यक था कि इन सामाजिक बुराइयों को समाप्त किया जाए। स्त्रियों में अशिक्षा का बोलबाला था। उनके कानूनी अधिकारी सीमित थे। इसीलिए डाॅ अंबेडकर ने हिन्दूकोड बिल प्रस्तावित किया। दासी प्रथा समाप्त करने के लिए बनाई गई कमेटी में डाॅ. हरीसिंह गौर भी शामिल थे। दलित वर्ग तथा अल्पसंख्यकों की दशा सुधारने के लिएमहत्वपूर्ण कदम उठाए गए। समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कुछ कानून पेश किए। जैसे सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया गया तथा दण्ड का प्रावधान निर्धारित किया गया।  
शरणार्थियों को स्थाईत्व - विभाजन के बाद नवोदित भारत के समक्ष शरणार्थियों को बसाने और उन्हें रोजगार देने की बहुत बडी चुनौती थी। देश के अन्य नागरिकों के साथ उन्हें सम्मानजनक जीवन देना तथा आर्थिक सहायता देना आवश्यक था। इसके लिए एक बड़ी पूंजी की आवश्यकता थी। क्योंकि अनेक शराणार्थी अपना सब कुछ छोड़ कर जैसे-तैसे जान बचा कर भारत आए थे। उनके पास किसी भी प्रकार का धंधा शुरू करने के लिए पैसा नहीं था। अतः नवोदित सरकार ने स्ािाई शरणार्थी शिविर बनाए जहां उन्हें बसाया गया। उनके बच्चों के लिए सकूल खोले गए और उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान किए गए।

पड़ोसी देशों से सद्भाव एवं सुरक्षा -
 पाकिस्तान एक पड़ोसी देश का रूप ले चुका था। वह अधिक से अधिक भारतीय भूमि हथिया लेना चाहता था। उसने कश्मीर पर अपना दावा किया। बात अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनाईटेड नेशन्स तक पहुंची किन्तु यूनाईटेड नेशन्स ने भारत का साथ देते हुए कश्मीर के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। पाकिस्तान शांति से बैठने वालों में से नहीं था। दूसरा अवसरवादी पड़ोसी चीन था जो संकट बन कर उभरा। भारत-चीन मैत्री का नारा लगाते हुए वह आक्रमणकारी बन बैठा। 29 अप्रैल 1954 को पंचशील समझौते हस्ताक्षर हुए थे। ये समझौता चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर ये समझौता हुआ था। लेकिन चीन ने उस समझौते को भुला कर भारतीय भू-भाग पर हमला कर दिया। चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू कर दिए। नवोदित भारत की सामरिक स्थिति चीन के सामने अत्यंत कमजोर थी, फिर भी भारतीय सेना के वीरों ने डट कर सामना किया।
  
भाषाई विविधता - 
भारत भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं भाषाई विविधताओं से भरा देश है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह विविधता पहली बार एकता के सूत्र में बंधी। किन्तु सबका एकसूत्र होना आसान नहीं था। सबसे अधिक आड़े आया भाषाई विवाद। राष्ट्र के मुद्दे पर एकमत नहीं बन सका। हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने के प्रस्ताव का दक्षिण भारत की ओर से कड़ा विरोध किया गया। परिणामस्वरूप विदेशी भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहा। फिर भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया जिससे शांति की स्थापना संभव हो सकी। जब विविधता अधिक हो तो थोड़ी-बहुत टकराहट होना स्वाभाविक है किन्तु विविधता धीरे-धीरे एकता के सौंदर्य में ढलती चली गई। इसी विविधता ने विश्व के समक्ष भारत को एक विशिष्ट देश का स्वरूप दिया।

विश्व के समक्ष एक सुदृढ़ देश - 
नवोदित भारत के समक्ष आंतरिक चुनौतियों के साथ ही बाह्य अर्थात वैश्विक चुनौतियां भी थीं। उसे एक सुदृढ़ देश के रूप में विश्वपटल पर स्वयं को स्थापित करना था। उस समय विश्व राजनीतिक एवं आर्थिक विचारों की दृष्टि से दो ध्रुवों में बंट चुका था- एक था सोवियत संघ का समाजवाद और दूसरा अमेरिका का पूंजीवाद। भारत को दोनों के बीच संतुलन बना कर चलना था। तत्कालीन परिस्थितियों में सोवियत संघ के साथ भारत की मित्रता हुई और दोनों ने पारस्परिक आर्थिक तथा सामरिक सहयोग किया। जिससे अमेरिका एशिया में अपने सैनिक अड्डे अधिक संख्या में स्थापित नहीं कर सका। इससे विश्व में सामरिक संतुलन बना रहा। इसी के साथ भारत की विदेश नीति ने उसे विश्व पटल पर एक मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित कर दिया।

इस प्रकार अपनी स्वतंत्रता के बाद नवोदित भारत ने अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए स्वयं को न केवल स्थापित किया बल्कि आर्थिक, सामाजिक, एवं सामरिक दृष्टि से निरंतर विकास करता गया। विभाजन के रक्त की नदी से नहा कर मिली स्वतंत्रता, भाईचारे के नाम पर आक्रमण, आर्थिक एवं सामरिक निर्बलता, सामाजिक कुरीतियां आदि सभी चुनौतियों का डट कर सामना करते हुए नवोदित भारत ने स्वयं को आज ‘‘विश्व गुरु’’ के मुकाम तक पहुंचा दिया है। वस्तुतः भारत का विकट चुनौतियों से शांति एवं धैर्य के साथ डट कर किया गया संघर्ष एक आदर्श उदाहरण है पूरी दुनिया के लिए।
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Thursday, May 11, 2023

लेख | नारी स्वाभिमान एवं बुंदेली संस्कृति के चितेरे कथाकार डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

🚩बुंदेली संस्कृति एवं साहित्य के संरक्षक बाबूजी स्व. नर्मदा प्रसाद गुप्त जी की पुण्यतिथि पर विशेष लेख "प्रवीण प्रभात" में आज... जानिए उनके कथाकार पक्ष को...
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लेख
नारी स्वाभिमान एवं बुंदेली संस्कृति के चितेरे कथाकार स्व. नर्मदा प्रसाद गुप्त
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
 उपन्यासकार एवं वरिष्ठ साहित्यकार
       सागर (म.प्र.)-470004    

       बुंदेली संस्कृति को लेखबद्ध कर संजोने में जो नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह स्व. नर्मदा प्रसाद गुप्त जी का नाम है। 01 जनवरी, 1931 को जन्मे नर्मदा प्रसाद गुप्त ने हिंदी और अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद ‘‘बुदेलखंड का मध्ययुगीन काव्य: एक ऐतिहासिक अनुशीलन’’ विषय में पी.एचडी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने लगभग 10 वर्ष अंग्रेजी और 25 वर्ष तक हिंदी के अध्यापन का दायित्व निभाया। सन् 1958 ई. से वे साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश करते चले गए। उन्होंने अपना सृजन कार्य कविता और कहानी से प्रारम्भ किया। उनकी लगभग 35 कहानियां विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। सन् 1962 में ‘‘आल्हा’’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास लिखा। डाॅ. गुप्त ने हिन्दी साहित्य, लोकसाहित्य तथा लोककला पर अनेक शोधात्मक लेख लिखे। उन्होंने प्रथम बार लोकगीतों और लोकगाथाओं के पाठ का सम्पादन कर उन्हें संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके द्वारा संपादित सबसे चर्चित पुस्तक रही ‘‘बुन्देलखंड का साहित्यिक इतिहास’’। उन्होंने ‘‘मामुलिया’’ त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया तथा बुन्देलखंड साहित्य अकादमी की स्थापना की। उन्हें अनेक सम्मानों से समय-समय पर सम्मानित किया गया।

डाॅ. नर्मदा प्रसाद गुप्त की कहानियों में भी बुंदेलखंड की गरिमा और नारी अस्मिता के प्रति उनका सकारात्मक आह्वान स्पष्ट दिखाई देता है। इस लेख में मैं उनकी कुछ कहानियों पर संक्षिप्त चर्चा करने जा रही हूं जिनसे सभी को उनकी कहानियों के मूल स्वर से परिचित होने का अवसर मिलेगा। कहानियों की चर्चा आरम्भ करने से पूर्व यह बात मैं करना आवश्यक समझती हूं कि इन कहानियों में बुंदेलखंड का इतिहास, वर्तमान तथा स्त्री के प्रति सामाजिक वैचारिकी को दृढ़तापूर्वक रेखांकित किया गया है। इससे सुगमता से समझा जा सकता है कि डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त बुंदेली संस्कृति के मात्र गौरव-गायक नहीं थे, वरन वे बुंदेली समाज में आए उसे कलुष को भी मिटना चाहते थे जिनके कारण लगभग हर काल में स्त्रियों को अवहेलना और प्रताड़ना सहनी पड़ी। इसीलिए मैं सबसे पहले उस कहानी की चर्चा करने जा रही हूं जिसका नाम है ‘‘लाखा पातुर’’।  
बुंदेलखंड में ‘‘पातुर’’ नृत्यांगनाओं अर्थात नाचनेवालियों को कहा जाता है। इन स्त्रियों के प्रति पुरुषप्रधान सामाजिक दृष्टिकोण संतुलित नहीं रहता है। ये स्त्रि़यां कलानिपुण होते हुए भी समाज के लांछन का निशाना बनी रहती हैं। ‘‘लाखा पातुर’’ कहानी में कथाकार नर्मदा प्रसाद गुप्त ने राजाशाही के समय की एक ऐसी नृत्यांगना की कथा बुनी है जिसे एक प्रस्तर मूर्तिकार से प्रेम हो जाता है। इसी के समानांतर वर्तमान परिवेश का कथाप्रसंग भी चलता है जिसमें कथानायक एक चित्रकार है और उसे चित्रकला के लिए सम्मानस्वरूप मुख्यमंत्री से बीस हज़ार रुपए मिलते हैं। अर्थात् समानान्तर दो कालखंड किन्तु स्त्री के प्रति सोच लगभग एक जैसी, भले ही वह व्यक्ति कलानिष्णात है। पुराने कालखंड के प्रसंग के कुछ संवाद देखिए-
‘‘देवराज तुम जानते हो कि राजनर्तकी के चारों ओर पत्थर की मोटी-मोटी प्राचीरें हैं जिनमें वह बंदी बनाकर रखी जाती है। उसका भी मन होता है कि वह खुले में नाचे, पर उसके पांव मर्यादा की रस्सियों से जकड़ी रहते हैं .... वे तभी खुलते हैं जब कोई राजा या सामंत बोली लगाए। जब बोली ही लगना है तो लाखों की लगे। न कोई लाख देगा न लाखा नाचेगी।’’
‘‘तो क्या नाचना छोड़ देगी? फिर राजनर्तकी की देह का बोझ होती रहेगी। आत्मा तो मर ही जाएगी। लोक से दूर रहकर कलाकार जीवित नहीं रह सकता इस विवाद को छोड़ो मुझे जाने दो।’’
‘‘पत्थरों में प्राण डालने वाले शिल्पी क्या तुम मुझे जीवन नहीं दे सकते?’’ लाखा फफक-फफक कर रो उठी थी।
देवराज ने जाते-जाते चेतावनी-सी दी थी, ‘‘लाखा पत्थर तो निर्दोष होते हैं उन्हें चाहे जैसा गढ़ लो।’’
‘‘तो क्या मैं पापिन हूं?’’ लाखा ने चींखकर सिर पकड़ लिया था। राजा और महात्मात्य ने तेजी से आकर स्थिति संभाल ली थी, लेकिन देवराज पहले ही जा चुका था।
जिस कलाकार से संवेदना की अपेक्षा की जाती है वह एक स्त्री की अपेक्षा पत्थर को निर्दोष मान रहा है। यह कथाकार की स्त्री-अस्मिता के प्रति संवेदना का सशक्त आह्वान है जो वस्तुस्थिति जता कर समाज को लज्जित कर, परमार्जित करना चाहता है।

दूसरी कहानी है- ‘‘एक और दुर्गावती’’। यह सती प्रथा की दूषित परंपरा का स्मरण कराते हुए पुरुषों द्वारा स्त्री की अनचाही उपेक्षा की कथा प्रस्तुत करती है। एक प्रोफेसर जो अतीत को खंगालने में इतना अधिक व्यस्त हो गया कि अपने वर्तमान में मौजूद अपनी पत्नी की आशाओं एवं आकांक्षाओं को ही भुला बैठा। ठीक वैसे ही जैसे पुराने समय में युद्धोन्मादी राजा अपनी रानियों के जीवन तक को भुला कर उनसे जौहर की आशा रखते थे। इस जौहर प्रथा को इतने महिमा मंडित रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा कि यह दूषित परंपरा सदियों तक चलती रही। इस कथा में प्रोफेसर अपने असिस्टेंट बलराम और प्रहलाद के साथ एक किले की छानबीन करते समय जौहर की घटना के साक्ष्य ढूंढने लगता है। उस समय कुछ संवाद उभर कर एक दृश्य रचते हैं। यह एक छोटा-सा दृश्य कथानक के समूचे स्वरूप की महत्वपूर्ण कड़ी के समान है-
बलराम ने अफसोस-सा जाहिर करते हुए कहा- ‘‘सर, जौहर के बाद कोई नहीं बचा और किला उजड़ गया। आज तक न जाने कितने राजा आए, पर कोई भी आबाद नहीं रह सका। लोग कहते हैं कि सती का शाप लगा है इस किले को।’’
      प्रहलाद बारूदखाने की गहराई का अंदाजा लगा रहे थे और प्रोफेसर उसमें डूबने लगे थे। शाप...आखिर शाप तो उनके घर को भी लगा है। सविता उनसे ऊबकर हृदयेश का आसरा चाहती है। उसने तलाक की अरजी दे दी है। कारण कुछ नहीं, केवल इतना कि उसके पति किताबों, गुफाओं, लेखों सबके चक्कर में उसकी देखभाल नहीं कर पाते। पति का प्यार नहीं दे पाते। वह अपने ही घर में ऐसे रहती रही है, जैसे उसकी शादी न हुई हो। आज तक पत्नी की जिंदगी को तरसती रही। पत्नी की जिन्दगी....। सविता की धुंधली-सी छाया उस बारूदखाने में डोलने लगी और प्राफेसर अचानक फुसफुसा पडे-सविता...!
प्रोफेसर की आवाज सुनकर प्रहलाद ने कहा था- सर, चलें। सविता जी इंतजार कर रही होगी।
कहानी के इस अंश से स्पष्ट हो जाता है कि कथाकार ने अतीत की स्त्री के अस्तित्व के समापन और वर्तमान की स्त्री के अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष को दर्शाने के लिए जौहर की प्रथा को एक रूपक के रूप में प्रयोग किया है। यहां सहसा सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की ‘‘रोज’’ कहानी याद आ जाती है जिसमें कथानायिका अपने अत्यंत व्यस्त रहने वाले चिकित्सक पति के साथ एक नीरस जीवन व्यतीत करने को विवश है, किन्तु उसमें साहस नहीं है कि वह अपने पति को इस बात से आगाह कर सके अथवा उससे मुक्ति ले सके। किन्तु ‘‘एक और दुर्गावती’’ में प्रोफेसर की पत्नी तलाक की अर्जी दे कर अपने महत्व की घोषणा कर देती है और इस पर प्रोफेसर को भी अपनी भूल का अहसास हो पाता है।

तीसरी कहानी है-‘‘ठांड़ी जरै मथुरावाली’’। इस कहानी में सामाजिक परिवेश है, स्त्री है, पारिवारिक संबंध हैं, प्रेम संबंध हैं और लोकगीत के रूप में लोक संस्कृति भी है। जब संबंधों में उलझने पैदा होने लगें तो बुद्धि भी छटपटा कर रह जाती है। यह समझना कठिन हो जाता है कि जो कदम उठाया जा रहा है, वह सही है या नहीं? कथा का यह छोटा-सा यह अंश देखिए-
‘‘नहीं, मुझे आज ही पहुंचना है। प्रेमा आंखों में गीलापन लिए फर्श की तरफ देखती रही। वह भी पैर के नाखून से लिखने लगा था। गोविन्द कुछ रोष में जाने लगे कि उसने द्वार तक उनको भेज दिया और नमस्कार कहकर अपने कमरे में आ बैठा। सोचने लगा कि विष-लता अब खूब लहलहा उठी है, आगे क्या होगा। मां पीछे लौटना नहीं चाहती और बाबूजी को मालूम नहीं कि कथा अपने आप बढ़ती जा रही है। गोविन्द जाने क्या-क्या कह गए, लेकिन मां बड़े संयम से सुनती रही प्रेमा ने बहुत साहस दिखाया। मुमकिन है कि उसके शब्द मां के लिए मरहम का काम करे और समस्या हल हो जाए।’’
‘‘ठांड़ी जरै मथुरावाली’’ की कथानायिका की स्थिति को व्यक्त करने के लिए कथाकार ने बड़ी सुंदरता से लोकगीत का प्रयोग किया है-
जा रे मुगल पानी भर के ल्याव,
प्यासी भरै मथुरावली  
गेलों मुगल पानी गओ घर में है लई आग  
ठांडी जरे मथुरावली
नाक की बेरार तोये दऊं ढोलिया,
ऊंचे चढ़ ढोल बजाव, ठांडी जरै मथुरावली  
अंगजरे जैसे लाकडी, केस जरें जैसे घास
ठांडी जरै मथुरावली  
रोय चले बांके बालमा, बिहेंस चले राजा बीर  
ठांडी जरै मथुरावली
राखी बहना पगड़ी की लाज...ठांडी जरे मथुरावली ।

डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त ने ओरछा की सुप्रसिद्ध नर्तकी पर कहानी लिखी है-‘‘प्रवीणराय’’। एक ऐसी नृत्यांगना जो इतिहास में स्त्री के साहस और बुद्धिकौशल की प्रतीक के रूप में दर्ज़ है। प्रवीणराय को राजनीति की शतरंज की बिसात पर एक प्यादे की भांति चलाने का प्रयास किया गया किन्तु वह एक विजयी रानी की तरह अकबर के दरबार से ओरछा लौटी, वह भी अकबर को मुंहतोड़ जवाब दे कर। लेकिन अकबर के दरबार तक पहुंचने के पहले उसे अपनी क्रोध पर किस तरह काबू में करना पड़ा इसका विवरण भी कथाकार डाॅ. गुप्त ने इस कहानी में दिया है। यह एक झलक देखिए-  
‘‘प्रवीण, युद्ध केवल तलवार से नहीं लड़ा जाता, कलम भी पैनी होती है। अपनी कलम और कला से सैकडों को जीत सकती हो। फिर एक बादशाह को नहीं? और उस बादशाह को, जो कलम और कला का सम्मान करता है। उठो तैयार हो जाओ।’’
प्रवीण ने साहस बटोर कर कहा था- ‘‘आचार्य में सबके लिए तैयार हूं पर अपनी प्रतिष्ठा और सतीत्व के मूल्य पर नहीं।’’  
‘‘किन्तु आंच आने पर तुम वहां भी कटार का सहारा ले सकती हो। अकेले सूने में मरने से क्या बनता है? ऐसे मरो कि दो-चार याद रखें।’’ इतना ही कहा था कि वह तैयारी करने लगी।
कितना विश्वास करती है प्रवीण। इंद्रजीत से भी नहीं पूछा और घोड़े पर बैठकर चल दी। पतिराम साथ था, नहीं तो और भी मुसीबत होती। किसी तरह आ ही गए, लेकिन बात रह जाए तब तो। प्रवीण का भरोसा है, वह बादशाह को कैसे जीतती कौन से दांव से नृत्य, वीणा या कविता से? अगर कविता से जीतती तो भाषा की जीत सारे देश पर छा जाएगी। कविराज ने मन ही मन एक गौरव का एहसास किया और दर्द से चारों तरफ देखकर अपनी नजरें रहीम पर गड़ा दीं।

डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त द्वारा लिखी गई अन्य कहानियों में जैसे ‘‘चैपड़’’, ‘‘पैजना के कंकरा’’ आदि में बुंदेली जीवन के अतीत और वर्तमान का तुलनात्मक दृश्य इतने मंजे हुए ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि कथाकार की कथालेखन की सिद्धहस्तता में तनिक भी संदेह नहीं रह जाता है। डाॅ. गुप्त की कहानियां जिस प्रकार बुंदेली संस्कृति, समाज, राजनीति आदि के परिवेश को धरोहर के रूप में संजोती हैं, ठीक उसी प्रकार से डाॅ. गुप्त की कहानियों को संजोए रखने की महती आवश्यकता है। क्योंकि ये कहानियां महज कथारस की कहानियां नहीं है वरन नारी स्वाभिमान एवं बुंदेली संस्कृति के चितेरे कथाकार द्वारा लिखी गईं ऐतिहासिक एवं सामाजिक मूल्यों की कहानियां हैं।
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Tuesday, December 13, 2022

सागर का नाट्य परिदृश्य | लेख | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, नाट्यलेखिका एवं साहित्यकार

Dr (Miss) Sharad Singh, Author,
Novelist, Social Activist &
Drama Writer

लेख

सागर का नाट्य परिदृश्य

- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

नाट्यलेखिका एवं साहित्यकार


(इस लेख की लेखिका के दो नाटक संग्रह ‘‘आधी दुनिया पूरा धूप’’ तथा ‘‘गदर की चिंगारियां’’ प्रकाशित हो चुके हैं। इनके नाटक ‘‘छुईमुई डाॅट काॅम’’ का प्रसार भारती द्वारा देश के बड़े पांच शहरों में मंचन कराया जा चुका है। ये दूरदर्शन, रेडियो तथा यूनीसेफ के लिए भी नाटक लिख चुकी हैं।)                      

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सागर की भूमि साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए अत्यंत उर्वर है। इस भूमि में कई नाटक रचे गए, कई नाटक मंचित हुए और कई रंगकर्मी देश की बड़ी-बड़ी नाट्य संस्थाओं एवं मिल्मी दुनिया तक पहुंचे हैं। लेकिन इस माटी का मोह उन्हें बार-बार सागर खींच लाता है। चाहे मुकेश तिवारी हों या गोविन्द नामदेव या फिर संगीत श्रीवास्तव ये सभी सागर आ कर नाट्यमंचन द्वारा अपने अतीत की स्मृतियों को ताज़ा करते हैं तथा युवा रंगकर्मियों को मार्ग दिखाते हैं। सागर में इप्टा की इकाई भी रही है जिसके अंतर्गत नुक्कड़ नाटक खेले गए किन्तु आज यहां इप्टा की सागर इकाई के बारे में जानकारी देने वालों की भी कहै। कारण कि लोग धीरे-धीरे अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त होते चले गए। सागर के समूचे नाट्य परिदृश्य को जानने के लिए अतीत में झांकने पर पता चला कि आज सागर के नाट्य कौशल को जिस नाट्य संस्था ‘‘अथग’’ के रूप में ख्याति प्राप्त है, इससे पहले एक और नाट्य संस्था यहां बड़ी मेहनत से काम कर चुकी है, जिसका नाम था ‘‘प्रयोग’’। इस संस्था के बारे में सबसे पहले उमाकांत मिश्र जी ने मुझे बताया जो स्वयं उसके नाटकों में अभिनय किया करते थे। फिर जयशेखर परोचे ने चर्चा की। इस संस्था से जुड़े अनिल शर्मा के बारे में उनके भतीजे जो पत्रकारिता विभाग में रहे हैं, डाॅ राकेश शर्मा से चर्चा के दौरान उन्होंने डाॅ विनोद दीक्षित से चर्चा करने का सुझाव दिया। डाॅ विनोद दीक्षित ने बताया कि डाॅ. कल्पना सैनी प्रयोग संस्था की सेक्रेटरी रह चुकी हैं,अतः मुझे उनसे जानकारी लेनी चाहिए। डाॅ. कल्पना सैनी से फोन पर चर्चा के दौरान उन्होंने अपने पति योगेन्द्र सैनी से संवाद कराया। डाॅ. योगेन्द्र सैनी ने मुझे संस्था के बारे में अत्यंत विस्तृत जानकारी दी।

यह पूरा सिलसिला बताने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि मैंने प्रयास किया है कि सागर का समूचा नाट्य परिदृश्य इस छोटे से लेख में आ जाए किन्तु इसे लिखते समय मुझे लग रहा है कि सागर का नाट्य परिदृश्य एक महासागर है और इसे छोटे- से इस लेख रूपी गागर में नहीं समाया जा सकता है। फिर भी प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख जानकारियां। जो नाम, संदर्भ, प्रसंग छूट रहे हैं, वे इरादतन नहीं वरन सीमावश छूट रहे हैं। 

सागर के वरिष्ठ रंगकर्मी रविंद्र दुबे कक्का से प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर में पंडित स्वर्गीय श्री लोकनाथ सिला कारी द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ‘‘दीवान हरदौल जू’’े नाम से एक नाटक लिखा गया था। 50 के दशक में लिखे गए इस नाटक का मंचन सागर के तत्कालीन रंगकर्मी लक्ष्मी नारायण सिलाकारी, सेन बंधुओं और सर्राफ आदि ने मिलकर किया था। इसी प्रकार इसी समय काल में एक और नाटक का मंचन भी सागर स्थित राधा टॉकीज से लगकर बने एक हॉल में किया गया था, जिसमें अभिनेता और अभिनेत्री के रूप में राजा दुबे एवं रामकली मिश्रण थे। इसके बाद एक उसी दौर में प्रभात भट्टाचार्य के निर्देशन में कालीबाड़ी मंदिर परिसर गोपालगंज में मंचित किया गया था। इस तरह एक दीर्घ परंपरा जुड़ी हुई है सागर के नाटय जगत से।


प्रयोग थिएटर ग्रुप

प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर में अन्वेषण थिएटर ग्रुप के पूर्व एक और थिएटर संस्था थी जिसका नाम था - प्रयोग थिएटर ग्रुप। इसे सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के पुत्र विजय चौहान ने स्थापित किया था। इस संबंध में हटा के लोक संस्कृतविद डाॅ श्यामसुंदर दुबे ने भी बताया। युवा उत्सव में चेखव की कहानी का मंचन किया था। प्रयोग संस्था के बैनर तले नाटक ‘‘अंधायुग’’ एवं ‘‘फरार फौज’’ का मंचन भी किया था और इस प्रस्तुति की एक खास बात यह थी कि जीप को चलाकर मंच पर लाया गया था जो अपने आप में सागर के मंच के लिए पहली घटना थी। नाटक ‘‘फरार फौज’’ में डॉ. विजय चौहान, जितेंद्र कुमार शर्मा, सत्येंद्र कुमार तिवारी, विवेकदत्त झा, मल्लिकार्जुन, रमेश दुबे, हंसराज नामदेव, कैलाश चंद्र सिंह आदि ने भी अभिनय किया था। इसमें रमेश दुबे ने मंच एवं मंच से प्रयोग किया था।

प्रयोग थिएटर ग्रुप में सचिव रह चुकी डाॅ. कल्पना सैनी तथा उनसे भी पहले से इस ग्रुप में से संबद्ध रहे उनके पति डाॅ. योगेन्द्र सैनी से विस्तृत चर्चा में प्रयोग संस्था के बारे में अनेक महत्वपूर्ण जानकारी मिली। उस समस्त जानकारी को इस सीमित लेख में दे पाना संभव नहीं है। अतः उस बारे में कभी अलग से स्वतंत्र लेख लिखूंगी। फिर भी कुछ बातें यहां देना चाहती हूं। जैसा कि डाॅ. योगेन्द्र सैनी जी ने बताया कि आरम्भ में महिला पात्र के लिए अभिनेत्रियां नहीं मिलती थीं अतः ऐसे नाटकों का चयन किया जाता था जिसमें सिर्फ़ पुरुष पात्र हों। प्रयोग के द्वारा ‘‘अंधेर नगरी चैपटराजा’’ और ‘‘मैकबेथ’’ जैसे नाटकों का सफलतापूर्वक कई बार मंचन किया गया। उस दिनों नाटकों के लिए किसी भी प्रकार की ग्रांट की व्यवस्था नहीं थी अतः नाट्यदल अपनी क्षमता के अनुसार पैसे कंट्रीब्यूट कर के मंचन के लिए सुविधाएं जुटाता था। बाद में कुछ महिलाएं इसमें बतौर अभिनेत्री जुड़ीं जिन्हें घर पहुंचाने का जिम्मा संस्था के पुरुषों का रहता था। इस संस्था उमाकांत मिश्र, अनिल शर्मा आदि भी जुड़े रहे। वर्तमान में श्यामलम संस्था का संचालन कर रहे उमाकांत मिश्र ने उत्पल दत्त लिखित नाटक ‘‘फरार फौज’’ का ब्रोशर उपलब्ध कराया। यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। ‘‘फरार फौज’’ नाटक का अनुवाद किया था - महेश प्रसाद जयसवाल, नरेन्द्र सिंह, मिहिर चटर्जी तथा विवेकदत्त झा ने। इसका निर्देशन भी मिहिर चटर्जी ने किया था। इसमें बलभद्र तिवारी, रघु ठाकुर, विष्णु पाठक, विवेकदत्त झा, श्रीनाथ शर्मा एवं उमाकांत मिश्र आदि का व्यवस्था से ले कर अभिनय तक सहयोग था।

बाद में प्रो. विजय सिंह चौहान अमेरिका चले गए और इसी तरह कई अन्य सदस्य भी अपनी-अपनी आजीविका के कारण दूसरे शहरों में चले गए। परिणामतः प्रयोग संस्था बंद हो गई। 


अन्वेषण थिएटर ग्रुप 

सागर शहर के गोविंद नामदेव का चयन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में हो गया था और वहां से निकलने के बाद वह वही रंग मंडल में शामिल होकर रंग कर्म करने लगे थे उनका जब भी सागर घर आना होता था तो वह सागर में स्थानीय शौकिया रंग कर्मियों को रंगकर्म की बारीकियों से अवगत कराया करते थे इसी से प्रेरणा लेकर मुकेश तिवारी, आशुतोष राणा, श्रीवर्धन त्रिवेदी, महेश मेवाती भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में चयनित हुए और रंगकर्म की विधा में प्रवीणता प्राप्त की। मुकेश तिवारी ने वहां से अध्ययन करने के बाद सागर आकर सबसे पहले नाटक ‘‘कोर्ट मार्शल’’ का निर्देशन किया। सन 1992 में अन्वेषण थिएटर ग्रुप की नींव पड़ी। अन्वेषण थिएटर ग्रुप यानी ’’अथग’’ शौकिया रंग कर्मियों का दल के रूप में मुकेश, पंकज तिवारी, राकेश सोनी, जगदीश शर्मा, आनंद जैन, रविंद्र दुबे कक्का, के निर्देशन में अनेक नाट्य प्रस्तुति सागर सहित दमोह, जबलपुर, बालाघाट, भोपाल, दिल्ली, चंडीगढ़ आदि जगहों पर लगातार करते हुए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से प्राप्त ग्रांट से 18 कलाकारों का संपूर्ण रंगमंडल बना चुका है, जिसके गुरु गोविंद नामदेव हैं।

यहां प्रस्तुत अन्वेषण थिएटर ग्रुप की सम्पूर्ण जानकारी ग्रुप के वरिष्ठ रंगकर्मी रविन्द्र दुबे ‘कक्का के सौजन्य से प्राप्त है। उनका यह सहयोग इस लेख की लेखिका के लिए अति महत्वपूर्ण रहा है। इसमें उनके उस लेख के आधार पर साभार समाहित कर रही हूं जो डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित ‘‘ये है बुंदेलखंड (भाग-दो)’’ में प्रकाशित हुआ था। बा व कारंत ने सन 1997 में प्रस्तुति परक कार्यशाला में बुंदेलखंड के साथ ही अविभाजित मध्यप्रदेश के सुदूर क्षेत्रों से आए जैसे भोपाल, इटारसी बालाघाट, दुर्ग, भिलाई के रंग कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया था। जयंत देशमुख द्वारा बनाए गए मुक्ताकाश मंच पर सिविल लाइन स्थित मलैया बंगला में लगातार 9 दिन तक इसकी प्रस्तुतियां की गई थी जिन्हें देखने गोविंद नामदेव के साथ मुंबई से सिने अभिनेता अनुपम खेर भी आए थे। हबीब तनवीर जी ने भी भारत भवन के रंग कर्मियों को सागर लाकर अन्वेषण थिएटर ग्रुप के साथ 10 दिवसीय 1998 में आल्हा गायन और रंग कार्यशाला की थी इसमें उन्होंने ‘‘मुद्राराक्षस’’ और ‘‘जिन लाहौर नहीं देख्या, ओ जन्माई नई’’ का पाठ और अभ्यास कराया था। इसमें प्रमुख रूप से अनूप जोशी, विभा मिश्रा, सरोज शर्मा आदि वरिष्ठ रंगकर्मी भी शामिल हुए थे।

मुकेश तिवारी ने अन्वेषण थिएटर ग्रुप में प्रस्तुति पर 35 दिवसीय कार्यशाला आयोजित की थी, कि जिसके अंतर्गत 1996 में ‘‘मुख्यमंत्री’’ नामक नाटक का मंचन किया गया था। अन्वेषण थिएटर ग्रुप को भारतीय रंग महोत्सव में 2003 में प्रथम बार भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। इसके बाद दूसरी बार 2024 में जगदीश शर्मा निर्देशित नाटक ‘‘सुदामा के चावल’’ की प्रस्तुति भारतीय रंग महोत्सव में की गई। अन्वेषण थिएटर ग्रुप के द्वारा 1997-98 में रंग कबीर नाट्य समारोह, 1999 में तीन दिवसीय नाट्योत्सव, 2000 में पांच दिवसीय ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव, 2018 में चार दिवसीय अन्वेषण नाट्य समारोह आयोजित कर के बाहर के थिएटर ग्रुपों की प्रस्तुतियां सागर में की गई। 

वीर मधुकर शाह बुंदेला के गौरवपूर्ण कार्य और उनके जीवन पर फिल्म अभिनेता गोविंद नामदेव एक नाटक लिखा -‘‘मधुकर कौ कटक’’। इसका निर्देशन भी उन्होंने किया। उनके सह निर्देशक कर थे  मुंबई से आए डायरेक्टर संतोष तिवारी। एनएसडी, अथग और सागर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में जो एक माह की वर्कशॉप की गई, उसी के प्रशिक्षणार्थियों को अभिनय के लिए चुना गया। यद्यपि कुछ अन्य लोग भी शामिल किया गया। इस नाटक ने सागर के जनमानस में गहरी पैंठ बनाई। 

अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सदस्य रहे राकेश सोनी ने सागर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में सेवारत रहते हुए विश्वविद्यालय के छात्रों को लेकर रंगकर्म जारी रखा तथा अनेक बार राष्ट्रीय युवा महोत्सव में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अन्वेषण थिएटर ग्रुप ने अनेक रंगकर्मियों को न केवल प्रशिक्षित किया अपितु मंच भी प्रदान किया। अथग ने आशीष ज्योतिषी, पंकज सिंह जार्ज, पदम सिंह, अवधेश कुशवाहा, असरार अहमद, अमजद खान, कपिल नाहर, आशुतोष तिवारी, जयशेखर परोची, राकेश शुक्ला, शिवकांत ढिमोले, अतुल श्रीवास्तव, आशीष चौबे, बृजेश शर्मा, सचिन नायक आदि को स्थापना  दी। 

तथागत नाट्य संस्था

अन्वेषण थिएटर ग्रुप द्वारा गोविंद नामदेव के निर्देशन में आयोजित की गई प्रस्तुति पर कार्यशाला 2013 में नए-नए अनेक रंग कर्मियों ने भाग लिया था इसमें लगभग 55 लोगों ने प्रशिक्षण पाया था। गोविंद नामदेव की कार्यशाला से प्रशिक्षण पाकर निकले कुछ तरुण रंग कर्मियों की टोली ने अन्य ऊर्जावान साथियों को जोड़ कर एक नाट्य ग्रुप बनाया जिसका नाम रखा तथागत नाट्य संस्था। इस संस्था में शुभम उपाध्याय, राहुल वर्मा आशीष तिवारी अप्रतिम मिश्रा विश्वनाथ पटेल संजय आशा डीप गंगा साहू दीक्षा साहू आदित्य, निर्मलकर आदि रंगकर्मी रहे हैं। 

रंग थिएटर फोरम 

थिएटर फोरम कलर के विभिन्न क्षेत्रों के प्रगतिशील कलाकारों का समूह है। क्षेत्र के प्रमुख हिंदी थिएटर समूह में से एक रंग थिएटर फोरम सौंदर्य वाली रूप से नवीन और सामाजिक रूप से प्रासंगिक थिएटर के लिए प्रतिबद्ध है। 2008 में इसकी स्थापना के बाद से रंग थिएटर फोरम ने रंगमंच के प्रशिक्षण के क्षेत्र में अद्भुत कार्य करते हुए देश के अनेक हिस्सों में कार्यशाला का आयोजन किया है जिसमें देश-विदेश के अनेक जाने-माने विद्वानों ने प्रशिक्षण दिया है। थिएटर कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नए कलाकारों को रंगकर्म के लिए आत्मनिर्भर बनाना है तथा  समकालीन मुद्दों और प्रचलित सामाजिक समस्याओं पर एक संवाद के निर्माण करने हेतु प्रशिक्षित करना है। रंग थिएटर फोरम ने विभिन्न सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य के नाटकों का मंचन करते हुए क्षेत्रीय रंगमंच के दृश्य में भी खुद को स्थापित किया है। यह समूह समकालीनता के साथ मनोरंजन के बेहतरीन साधन प्रदान करते हुए हमारी समय की रूपरेखा को रेखांकित कर रहा है।

रंग थिएटर फोरम आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार एवं संस्कृतविद्  के नाटकों का भी मंचन कर चुका है। राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत को आधुनिकता का संस्कार देने वाले विद्वान माने जाते हैं। उनके द्वारा लिखी गई कथा ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ एक असाधारण कृति है। संस्कृत के महान गद्यकार महाकवि दंडी पद लालित्य के लिए विख्यात हैं। ‘‘दशकुमार चरित’’ उनकी चर्चित कृति है। परंतु राधावल्लभ त्रिपाठी को उनकी एक और संस्कृत कृति ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ की जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपि हाथ लग गई। इस कृति को हिंदी में औपन्यासिक रूप देकर डॉ त्रिपाठी ने एक और मूल कृति के स्वरूप की रक्षा की है और वहीं दूसरी ओर उसे एक मार्मिक कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। इस कृति से उस युग का नया परिदृश्य उद्घाटित होता है। नाट्य शास्त्र संस्कृत नाटक कार्यशाला 03.23 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय में ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ का मंचन रंग  थिएटर फोरम द्वारा किया गया था।

फोरम द्वारा 01-15 फरवरी 2021 को प्रोडक्शन वर्कशॅाप आयोजित किया गया था जिसमें संगीत श्रीवास्तव जैसे रंगकर्मी ने आ कर प्रशिक्षण दिया था। संगीत श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से वर्ष 2013 में रंगमंच तकनीक और परिकल्पना में विशेषज्ञता के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त की। उसके बाद वे परिकल्पना प्रशिक्षक तथा मार्गदर्शक के रुप में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ गए। साथ ही मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भारतेंदु नाट्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सिक्किम केंद्र आदि नाट्य प्रशिक्षण केंद्रों के शैक्षणिक कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे हैं। संगीत श्रीवास्तव ने भारत और विदेश में कई प्रसिद्ध प्रस्तुति निर्माताओं के साथ एक प्रकाश परिकल्पक एवं दृश्य रचनाकार के रूप में सहयोग किया है। एक परिकल्प प्रस्तुति निर्माता और मिक्स मीडिया कलाकार के रूप में 14 देशों में 300 से अधिक प्रस्तुतियां कर चुके हैं। ऐसे रंगकर्मी का आ कर प्रशिक्षण देना सागर के युवा रंगकर्मियों के लिए विशेष अनुभव रहा।


रंग प्रयोग थिएटर ग्रुप

लोक एवं शास्त्रीय रंगमंच तथा लोक संगीत के संवर्धन के उद्देश्य से नगर के सृजन कर्मियों ने सन 2001 में रंग प्रयोग की स्थापना की रंग प्रयोग ने अपनी यात्रा के दौरान लोक एवं शास्त्रीय प्रदर्शनकारी कलाओं के प्रति ना केवल अभिरुचि को जगाया अपितु कार्यशाला हूं उच्च समूह एवं परीक्षाओं के माध्यम से इनके सघन प्रशिक्षण का कार्य भी किया क्षेत्रीय एवं भाषिक सीमाओं को दरकिनार कर मध्य प्रदेश की समस्त लोक एवं शास्त्रीय शैलियों पर केंद्रित प्रस्तुतियां रंग प्रयोग की विशिष्ट पहचान बन चुकी है सन 2001 में 45 दिवसीय नाट्य कार्यशाला तथा नाटक एक था गधा उर्फ अल्लाह दादा की प्रस्तुति नाटक जंगल के शहर की ओर का मंचन बाल प्रतिभाओं के प्रोत्साहन हेतु छह दिवसीय राज्यस्तरीय उत्सव सागर उत्सव 2003 नगर की प्रतिभाओं को अभिनय प्रशिक्षण हेतु श्री आलोक चटर्जी तथा छाऊ नृत्य प्रशिक्षण हेतु श्री माधव वारिक द्वारा सात दिवसीय सघन प्रशिक्षण कार्यशाला। नाटक ‘‘बोझा’’ का मंचन सिने  एवं टेली तकनीक का प्रयोग। ईदगाह जैसे नाटक का मंचन। राजकुमार रायकवार के निर्देशन में यह संस्था सागर तथा सागर से बाहर  निरंतर नाटक करती रहती है।


थर्ड आई परफॉर्मर्स

नाट्य संस्था ‘‘थर्ड आई परफॉर्मर्स’’ की स्थापना 24 मार्च 2020 को शहरी एवं राष्ट्रीय पटल पर कला एवं  कलाओं द्वारा शिक्षा के विकास पर ध्यान केंद्रित करने हेतु किया गया। संस्था का मुख्य उद्देश प्रदर्शनकारी कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन करने के साथ  लोक कलाओं तथा बुंदेली संस्कृति का प्रचार प्रसार करना भी है। सर्व समाज में निर्धन एवं पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए लोक कल्याण में भागीदारी भी हमारा उद्देश्य है ,कोरोना काल के पूर्व संस्था द्वारा 50 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के तहत नाटक पीयूष मिश्रा द्वारा लिखित ‘‘गगन दमामा बाज्यो’’ तैयार कराया गया, जिसमे लगभग 40 प्रतिभागियों ने भाग लिया। डा. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक शाखा के संयुक्त तत्वाधान में शहर के विविन्न प्रायोजकों के साथ मिलकर इस नाटक की प्रस्तुति स्वर्ण जयंती सभागार हाल में की गई। वर्ष  2021 को 23 मार्च शहीद दिवस के उपलक्ष्य में संस्था द्वारा एक बार फिर नाटक ‘‘गगन दमामा बाज्यो’’ की तीन प्रस्तुति विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में की गईं । अपनी स्थापना से ही यह संस्था नाट्यकला एवं शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने हेतु प्रयासरत है। 

अन्य नाट्य संस्थाएं

सागर में बंसी कॉल के साथ रंग कर्म करने के बाद आकर राजेश शिल्पाचार्य, पद्मसिंह, आनंद,  राजेश पंडित और राजकुमार रैकवार ने सागर में रंगकर्म की धारा प्रवाहित करने में अपना योगदान दिया। सागर में थर्डबेल, भारतीय नाट्य कला मंच, सरस, रंग प्रयोग, रंग खोज, युवा थिएटर ग्रुप, नाट्य परिषद, तरुण सांस्कृतिक आर्ट, दर्पण थिएटर ग्रुप आदि जैसे रंगकर्मियों के समूहों ने समय-समय पर नाटकों का मंचन करके सागर में नाट्य-मंचन की परंपरा को बनाए रखने में अपना महत्वूर्ण योगदान दिया है।

सागर में नाट्यविधा के सम्पन्नता से परिपूर्ण वर्तमान परिदृश्य को देख कर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि यहां नाट्य विधा अभी और परवान चढ़ेगी और देश के नक्शे में अपनी अलग पहचान स्थापित करेगी।

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(12.12.2022) 

Saturday, October 29, 2022

श्रद्धांजलि लेख | चित्रकार नील पवन बरुआ जिन्होंने भारतीय चित्रकला को अपनी एक अलग कला-स्थापना दी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

श्रद्धांजलि लेख

चित्रकार नील पवन बरुआ जिन्होंने भारतीय चित्रकला को अपनी एक अलग कला-स्थापना दी

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
  साहित्यकार एवं कला समीक्षक
 29 अक्टूबर 2022, हमने नील पवन बरुआ के रूप में एक ऐसे कलाकार को खो दिया जिसने रंगों में भावनाओं को जिया। उनका आर्ट आधुनिक और पारंपरिक लोक कला का एक ऐसा मिश्रण था कि उनके पेंटिंग के सामने से गुज़रते समय व्यक्ति ठिठक कर वहीं रुक जाता। मुझे चित्रकला से बेहद लगाव है। मैंने चित्रकला की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली है किंतु बचपन से ही मुझे चित्रकारी का शौक रहा और आज भी किसी जगह मुझे चित्रकला प्रदर्शनी का पता चलता है और संभव होता है तो मैं उसे देखने जरूर जाती हूं। क्योंकि यह अवसर मेरे पास बहुत कम होते हैं इसलिए मैंने इसका एक रास्ता ढूंढ निकाला और मैं अक्सर पेंटिंग्स की वर्चुअल एग्जीबिशन जरूर प्रवेश करती हूं। यह ऑनलाइन एक बहुत अच्छा अवसर रहता है, जब आप घर बैठे विभिन्न कलाकारों की चित्रकला को निकट से देख पाते हैं। ऐसी ही एक वर्चुअल एग्जीबिशन साइट पर एक बार मुझे नील पवन बरुआ की पेंटिंग्स देखने का अवसर मिला। उनकी पेंटिंग ने मुझे इतना अधिक प्रभावित किया कि मैंने फिर इंटरनेट पर ढूंढ-ढूंढ कर उनकी पेंटिंग्स देखी और उनकी कला को समझने का प्रयास किया। उनकी पेंटिंग्स में मैंने पाया कि वे अधिकतर गहरे रंगों और गहरे शेड्स का प्रयोग करते थे किंतु वह चटक नहीं होते थे बल्कि गहरी भावनात्मक एकता को परिलक्षित करते थे। उनकी पेंटिंग्स में मैंने यह विशेषता पाई कि वे अपनी पेंटिंग्स में आधुनिक कला और पारंपरिक लोक कला का बेजोड़ सम्मिश्रण करते हैं। यह प्रस्तुति बहुत कम चित्रकारों की कला में देखने को मिलती है। प्रायः कलाकार या तो लोक से जुड़ा होता है अथवा मॉडर्न आर्ट को आत्मसात कर लेता है लेकिन नील पवन बरुआ ने अपनी पेंटिंग्स में आधुनिक और लोक को इतने संतुलित रूप में प्रस्तुत किया है कि यह दोनों पक्ष एक दूसरे के पूरक बनकर उभरते हैं। कोई भी एक पक्ष दूसरे पक्ष को कमतर नहीं बनाता है।
       2021 में नागरिक पुरस्कार "असम गौरव" से सम्मानित बरुआ का जन्म 1 जून 1936 को जोरहाट के तिओक में हुआ था। 1971 में गुवाहाटी में असम फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट सोसाइटी की स्थापना करने वाले कलाकार ने एक अनोखा काम किया था, जब उन्होंने सिगरेट और माचिस के पैकेट पर मिनिएचर पेंटिंग शुरू की थी।
     बरुआ  का व्यक्तिगत जीवन बहुत ही असामान्य रहा।  गायिका  दीपाली बोरठाकुर जिन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था, उनसे बरुआ को प्रथम दृष्टि में ही प्रेम हो गया। सन 1976 में बरुआ ने दीपाली बोरठाकुर से विवाह कर लिया। जिस चीज ने उनकी प्रेम कहानी को अद्वितीय और शाश्वत बनाया, वह थी एक दूसरे के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से जुड़ा बलिदान और समर्पण।  राज्य की कोकिला के रूप में जानी जाने वाली बोरठाकुर एक दुर्लभ मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित थीं, जिससे वे लकवाग्रस्त हो गई थीं, जिससे वे व्हीलचेयर तक सीमित हो गई थीं।  दुख ने उनकी आवाज भी छीन ली। लेकिन इससे कुछ नहीं बदला।  एक सच्चे साथी की तरह बरुआ ने अपनी पत्नी दीपाली की एक बच्चे की तरह देखभाल की। वे कभी उन्हें अकेला नहीं छोड़ते थे। बरुआ कहते थे कि उनकी पत्नी के प्रति उनका प्रेम और निष्ठा उनके कलात्मक प्रयास का एक हिस्सा थी। यद्यपि दिसंबर, 2018 उनका प्रेम उनसे सदा के लिए बिछड़ गया। इसके बाद वे अकेले पड़ गए। किंतु उन्होंने अपने भीतर मौजूद प्रेम की भावना को अपनी पेंटिंग्स में बखूबी उतारा।
     नील पवन बरुआ असम के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक रहे। उन्हें किसी एक विचार या अवधारणा से बंध कर रहना पसंद नहीं था। वे विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहते थे जैसे- मिट्टी के बर्तनों, कविता, मुखौटा बनाने, वृंदावानी वस्त्र की कला को पुनर्जीवित करना आदि।
   एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी इस प्रवृत्ति के बारे में स्वीकार करते हुए कहा था कि "मैं बिना किसी पूर्वकल्पित विचार या धारणा के अनायास काम करता हूं।"         
 
      वे अपनी पेंटिंग्स के बारे में कहते थे कि "मेरी पेंटिंग मेरे बोहेमियन दृष्टिकोण को दर्शाती है। जब मैं कैनवास पर अपना काम शुरू करता हूं तो मैं कभी किसी विषय के बारे में नहीं सोचता। इसके पूरा होने के बाद ही मुझे इसके बारे में पता चलता है।"  यद्यपि उनकी अधिकांश रचनाएँ अमूर्त हैं, वे आधुनिकता से उत्पन्न होने वाली जटिलताओं और भ्रम से लेकर प्रकृति को उसकी प्राचीन महिमा में चित्रित करने तक हैं।  प्रकृति के परे भी देखते थे लेकिन प्रकृति को आधार बनाकर। यही उनके चित्रकला की मूल विशेषता थी।
      कई बार व्यक्ति को अपनी विशिष्टताओं के बारे में स्वयं भी पता नहीं रहता है। विशेष रूप से हमारे देश में कला की किसी भी विधा से जुड़ने वाले व्यक्ति की प्रतिभा को शुरू में न तो ठीक से पहचाना जाता है न उस पर ध्यान दिया जाता है जिससे वह स्वयं भी नहीं जान पाता है कि वह भविष्य में किस दिशा की ओर बढ़ेगा। इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण नील पवन बरुआ के जीवन के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने अपने चित्रकार बनने के बारे में स्वयं कहा था कि "मैं संयोग से एक चित्रकार बन गया पसंद से नहीं, क्योंकि मेरे पास तब करने के लिए और कुछ नहीं था। जब मैं लगभग 24 साल का था तब मैंने पेंटिंग शुरू कर दी थी। औपचारिक शिक्षा के लिए मेरी नापसंदगी भी इसके लिए जिम्मेदार थी। कई प्रयासों के बाद मैंने आखिरकार मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। खेतों और सामाजिक कार्यों में काम करना मुझे कॉलेज की शिक्षा से अधिक आकर्षित करता था। हालांकि मुझे कक्षाओं में जाने में मज़ा नहीं आता था, लेकिन मैं एक शौकीन था  पाठक। प्रोमोथनाथ बोस द्वारा लिखित एक पुस्तक ने मुझे प्रभावित किया। वहां मुझे शांतिनिकेतन के बारे में पता चला।" 
     इसके बाद भी शांतिनिकेतन गए और जहां से उन्हें चित्रकला की बारीकियों का अनुभव होना शुरू हुआ। लेकिन उन्होंने किसी पूर्ववर्ती चित्रकार का अनुकरण करने के बजाय अपनी एक अलग कला-स्थापना की।
     84 वर्ष की आयु में  इस संसार से विदा लेने के पूर्व उन्होंने जिस विशेषता के साथ रंगों को कैनवास पर आकार दिया, उनकी वह चित्रकला प्रेमियों के हृदय में उन्हें सदैव जीवित रखेगी।
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सागर, मध्यप्रदेश
लेखिका : डॉ (सुश्री) शरद सिंह चित्रकला में गहरी दिलचस्पी रखती है तथा कला समीक्षक के रूप में इन्होंने विभिन्न चित्रकारों के चित्रकला पर समीक्षात्मक लेख एवं टिप्पणियां लिखी है। इनकी अपनी स्वयं की पेंटिंग्स का अपना एक ब्लॉग और एक फेसबुक भी संचालित है- 
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श्रद्धांजलि लेख | चित्रकार नील पवन बरुआ जिन्होंने भारतीय चित्रकला को अपनी एक अलग कला-स्थापना दी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | साहित्यकार एवं कला समीक्षक
युवा प्रवर्तक के लिंक पर जाकर आप पूरा लेख पढ़ सकते हैं👇
https://yuvapravartak.com/71643/


Tuesday, February 23, 2021

आत्मनिर्भरता का संदेश देता सागर का माटी शिल्प | लेख| डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
प्रस्तुत है मेरा यह लेख, जिसे जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन, सागर द्वारा अपने फेसबुक पेजों पर भी अपलोड किया गया है। 

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तथा,

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लेख :

आत्मनिर्भरता का संदेश देता सागर का माटी शिल्प

   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह        

       जब मनुष्य ने आकृतियां बनाना आरंभ किया होगा तब सबसे पहले उसने मिट्टी का ही सहारा लिया होगा । खाने के उपयोग में लाए जाने वाले बर्तन, बच्चों के खिलौने,  महिलाओं के पहनने वाले आभूषण सभी वस्तुएं मिट्टी से ही बनाना शुरू किया होगा। मनुष्यों ने बुंदेलखंड में प्रागैतिहासिक काल से मनुष्यों का निवास स्थान रहा है। अनेक स्थानों से प्रागैतिहासिक कालीन खिलौने और आभूषण के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो यह साबित करते हैं बुंदेलखंड में मिट्टी से बनाई जाने वाली कलाकृतियों की परंपरा बहुत पुरानी है। यह आत्मनिर्भरता की ओर मज़बूत क़दम है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज की  मिट्टी से अनेक कलाकृतियां बनाई जाती हैं। जिनमें कुछ सजावटी होती हैं तो कुछ बच्चों के खेलने के लिए खिलौनों के रूप में, कुछ दैनिक जीवन में उपयोग में लाए जाने वाले बर्तनों के रूप में तथा कुछ आभूषण के रूप में।


         सागर ज़िले में बच्चों के खेलने के लिए हाथी, पक्षी,  गुड्डे-गुड़िया आदि खिलौने बनाए जाते हैं। कुछ खिलौने आमतौर पर कुछ विशेष त्योहारों के समय बनाए और बेंचे जाते हैं। जैसे संक्रांति के समय मिट्टी के घोड़े और हाथी बनाए जाते हैं, जिनमें  पाहिए लगे होते हैं। इनकी सुंदरता देखते ही बनती है। इनमें लगाम और महावत सहित सुंदर चित्रकारी भी होती है।  ये हाथी, घोड़े इस प्रकार के होते हैं कि जिनमें सुतली बांधकर बच्चे आसानी से दौड़ा सकते हैं। खिलौने  के रूप में बैलगाड़ी की बनाई जाती है। इसी प्रकार बालिकाओं को घरेलू कामकाज की शिक्षा देने वाले खिलौनों में गेहूं पीसने की चक्की  बनाई जाती है। इसमें बाक़ायदे  दो पाट होते हैं।  गेहूं अथवा अनाज डालने के लिए छेद भी बना होता है। साथ ही चक्की में  मूठ फंसाने  के लिए भी छेद होता है। बच्चों के खेलने के लिए गुड्डा और गुड़िया बनाई जाती हैं जिन्हें पुतरा- पुतरियां कहते हैं।  यह पुतरा- पुतरिया  खेलने के काम आती हैं और अक्षय तृतीया के समय इनका विवाह भी रचाया जाता है, जो सामाजिक संस्कारों की शिक्षा देने का एक बेहतरीन माध्यम बनता है।  मिट्टी की इन पुतरा- पुतरियों  को सुंदर कपड़े पहनाए जाते हैं तथा हाथ से बने सुंदर ज़ेवरों से सजाया जाता है। बच्चों के खेलने के लिए है पानी भरने के लिए छोटे-छोटे घड़े, रसोई घर के बर्तन, चूल्हा आदि बनाया जाता है। आजकल आधुनिक युग में  छोटे-छोटे गैस के सिलेंडर की बनाए जाते हैं,  जिन्हें बड़ी खूबसूरती से लाल रंग से रंगा जाता है जिससे वे देखने में असली कुकिंग गैस के सिलेंडर जैसे दिखाई देते हैं।


       धार्मिक आयोजनों के  लिए मिट्टी की बनी कलाकृतियां बनाई जाती हैं।  दीपावली के दिए तो सर्वविदित है और यह लगभग सभी जगह बनाए जाते हैं किंतु कुछ कलाकृतियां ऐसी हैं जो देवी-देवताओं की हैं और जिनका संबंध बुंदेलखंड से ही है। जैसे  महालक्ष्मी की पूजा के लिए महालक्ष्मी की प्रतिमा बनाई जाती है। यह प्रतिमा गज पर सवार महालक्ष्मी की होती है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसे पूर्ण पकाया नहीं जाता है अर्थात  इसमें कच्चा रहता है किंतु इसकी साज-सज्जा बहुत ही सुंदर ढंग से की जाती है।  चटक रंग का प्रयोग करते हुए साड़ी, कपड़े और सोने के रंग के आभूषण उकेरे जाते हैं।  हाथी को भी सजाया जाता है। ग्वालन की मूर्तियां बनाई जाती है जो पूजा के दौरान दीप स्तंभ यानी कैंडल स्टैंड का काम भी करती हैं। इनमें पांच या पांच से अधिक दिए बनाए जाते हैं जिनमें तेल भरकर बाती लगाकर प्रज्वलित किया जाता है। देश के अन्य प्रांतों की भांति सागर ज़िले में भी  मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। पूजा के उपयोग के लिए अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनाने में बुंदेलखंड के कलाकारों को महारत हासिल है।


        दैनिक जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं में मिट्टी से बनाई जाने वाली अनेक वस्तुएं हैं जैसे घड़े, नांद और तसले आदि।  ये दो प्रकार के होते हैं-  लाल रंग के और काले रंग के।  लाल रंग के बर्तनों में अधिक छिद्र होते हैं और इन पर हल्की रंगों से अथवा सफेद रंग से चित्रकारी की जाती है।  वही काले रंग के बर्तन ग्लेज़्ड होते हैं।  इस प्रकार के बर्तनों का उपयोग आमतौर पर दही जमाने, भोजन पकाने, दूध-दही रखने  और अचार आदि  अधिक दिनों तक रखी जाने वाली खाद्य वस्तुओं  को रखने के लिए होता है।




          ज़िले के ग्रामीण अंचलों में मिट्टी की गुरियां बनाई जाती हैं। इन गुरियों से तरह-तरह की मालाएं बनाई जाती हैं।  आजकल इस तरह की माला तथा आभूषणों का चलन बढ़ गया है।  इनकी मांग  शहरों की दुकानों से लेकर एंपोरियम तक होती है।  ड्राइंग रूम को सजाने के लिए छोटे-छोटे घरों  की आकृतियां,  फेंगशुई में प्रचलित कछुए,  लाफिंग बुद्धा,  विंड चाइम्स, लैंपशेड आदि अनेक  वस्तुएं यहां के कलाकार बनाते हैं।  यह आमतौर पर बाजार हाट में अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाकर बेचते हैं।   मेलों में भी  इस प्रकार की वस्तुएं बेची जाती हैं।  सागर ज़िले का माटी शिल्प बुंदेली कला-संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है और सागर ज़िले को आत्मनिर्भर बनने में अपना योगदान देता है।

(माटीशिल्प की सभी फोटो : डॉ शरद सिंह)

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सागर, मध्यप्रदेश

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