Sunday, January 30, 2022

पद्मश्री रामसहाय पांडे जी के नागरिक अभिनंदन समारोह में डॉ (सुश्री) शरद सिंह

30 जनवरी 2022 ... आज का दिन अत्यंत सार्थक रहा। सागर के गौरव आदरणीय रामसहाय पांडे जी जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है, उनका आज सागर नगर की जनता की ओर से नगर विधायक भाई श्री शैलेंद्र जैन जी, नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री भूपेंद्र सिंह जी, सांसद श्री राजबहादुर सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष श्री गौरव सीरोठिया जी ने नागरिक अभिनंदन  किया जिसमें मैं भी सहभागी रही।      
      अभिनंदन-पत्र का लेखन तथा वाचन का अवसर अभिनंदन समारोह समिति सागर ने मुझे सौंपा जो मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता का विषय रहा... क्योंकि दादा रामसहाय पांडे जी से मेरा प्रथम परिचय उस समय हुआ था जब मैं अपना पहला उपन्यास "पिछले पन्ने की औरतें" लिखने के लिए बेड़िया समाज और राई नृत्य के बारे में जानकारी जुटा रही थी। तब मुझे स्व. विष्णु पाठक जी ने दादा रामसहाय पांडे जी से मिलने की सलाह दी। उनसे मिली जानकारी से मुझे राई नृत्य की बारीकियों को समझने में बहुत मदद मिली थी। आज उनके नागरिक अभिनंदन में शामिल होने और साक्षी बनने पर मुझे गौरव का अनुभव हुआ।
      मैं अत्यंत आभारी हूं भाई शैलेंद्र जैन जी की जो नागरिक अभिनंदन समारोह समिति सागर के संयोजक है तथा बड़े भाई उमाकांत मिश्र जी की जिन्होंने मुझे अभिनंदन-पत्र के लेखन तथा वाचन महत्वपूर्ण है अवसर प्रदान किया। इस नागरिक अभिनंदन समारोह की संपूर्ण परिकल्पना भाई शैलेंद्र जैन जी की थी जो इस बात का द्योतक है कि वे नगर के विकास तथा नागरिकों के सम्मान के बारे में कितनी आत्मीयता से जुड़े रहते हैं।
       आज के समारोह की सबसे बड़ी विशेषता समारोह के अंतिम चरण में सामने आई जब दादा रामसहाय पांडे जी ने इस वयोवृद्ध अवस्था में भी संपूर्ण ऊर्जा के साथ राई नर्तकियों के साथ मृदंग बजाते हुए अपने नृत्य का प्रदर्शन किया। सभी उपस्थितजन आवाक् देखते रह गए और नृत्य समाप्त होने पर सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा।
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Article | Just think twice while handing over anything to nature | Dr (Ms) Sharad Singh | MP Chronicle


⛳Friends ! Today my article "Just think twice while handing over anything to nature !" has been published in the Sunday edition of #MP_Chronicle. Please read it. 
🌷Hearty thanks MP Chronicle🙏
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Article
Just think twice while handing over anything to nature !
-    Dr (Ms) Sharad Singh

Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad SingH

It is for us to decide whether we want good or bad from nature.  Because nature returns us a manifold of what we entrust to it. It is the nature of Nature.

4 weeks ago I found a sprouted potato in my fridge so I planted it in the soil in a poly bag.  Only water was given.  Today when I searched its roots, I found 5-6 small potatoes.  And if I will be take it late, I will probably got as big potatoes as I planted one.

We entrust a grain of wheat to nature and a plant grows from that grain.  There are dozens of wheat spikes in that one plant.  There are hundreds of grains of wheat in those dozens of earrings.  This is yet another example of how nature returns us manifold.  This is the nature of nature.  That is why when we entrust nature with something good, it gives us good, but when we entrust something bad, it returns us bad.  You will remember the Mumbai floods. In Mumbai, we handed over choked drains from polythene bags to rain water.  As a result we got floods.

When we are continuously giving pollution to nature and playing with the greenhouse of the atmosphere, then how can we expect pure air from nature? Many harmful gases and particles are present in the smoke coming out of factories, which enter the atmosphere and spread air pollution.  The air quality is deteriorating due to the continuous mixing of nitrogen, sulphur, carbon monoxide and carbon dioxide gases in the air.  Air pollution is extremely dangerous for the health of humans and other living beings.  Air pollution is considered to be the biggest responsible factor for haze and acid rain in the atmosphere.  Air pollution is continuously giving rise to the problem of global warming by damaging the ozone layer.  It is dangerous to the health of organisms and ecosystems.  Most of the air pollution is caused by chemicals, dust, vehicular smoke and harmful gases present in the environment. According to an estimate, the amount of oxygen it takes to breathe 1135 people in a minute is equal to the pollution spread by a motor vehicle.  Nitrogen oxides and nitrogen dioxide are also produced by the burning of diesel and petrol in vehicles, which combine with hydrocarbons in sunlight to produce a chemical haze.  Carbon monoxide gas emitted from air conditioners and vehicles in cities is also increasing air pollutants.

With the increase in the amount of acid in the soil due to the use of chemical fertilizers, now there is a shortage of micronutrients like zinc and boron.  Its adverse effect is falling on the soil, it is also affecting the health of human beings.  By adding chemical fertilizers, the land gives one or two yields, after that the land is not able to uniform the production continuously, the main reason for this is that due to the misuse of the power of the land due to the use of chemical fertilizers in large quantities, there is a decrease in the continuous production. By using chemical fertilizers and seeds, we may get a quick crop, but it will neither be a good crop, nor beneficial for the farmers.

In the greed of growing vegetables in large quantities, some people are not missing out on using oxytocin, a drug used by animals. Doctors say that instead of organic manure, the consumption of these green vegetables grown on the strength of chemical elements can harm health. This can lead to fatal diseases like cancer, digestive and heart disease. Vegetables such as fresh, green gourd, luffa, pumpkin, nanua, brinjal, capsicum etc. are being grown in abundance in the shops even in the off season.  Many such medicines and injections have come in the market with hybrid seeds, using which such vegetables are produced much ahead of time.  But their side effects have also been seen on human hormones.

Same is the case with milk production.  In order to increase the milk of cows and buffaloes, injections called oxytocin are being used indiscriminately.  Due to this, the milk becomes thick but it is also harmful for human beings.

That is why we should always remember that whatever we give to nature, it returns us by multiplying it manifold, so we should give the best to nature if we want to get good for ourselves.
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(30.01.2022)
#ClimateCahnge  #MyClimateDiary
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ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर" ...😀😊😛
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व्यंग्य
ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

ग्लैमर एक ऐसी चीज है जो बड़े-बड़े तपस्वियों के तप भंग करने का माद्दा का रखता है। पुराणों में अनेक ग्लैमर सुंदरियों की चर्चा है जैसे उर्वशी, मेनका, रंभा, संभा आदि-आदि। ग्लैमर का महत्व देवताओं के राजा इन्द्र बखूबी जानते थे। इसीलिए जब उन्हें किसी ऋषि का तप भंग करना होता था तो वे अपनी सभा की ग्लैमर सुंदरी को उसके पास नाचने, गाने, रिझाने भेज दिया करते थे। महर्षि विश्वामित्र भी इससे अछूते नहीं रहे। मेनका स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा थी। महान तपस्वी ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के निर्माण के लिए जब तपस्या शुरू की तो उनके तप से देवराज इन्द्र ने घबराकर उनकी तपस्या भंग करने के लिए मेनका को भेजा। मेनका ने अपने रूप और सौंदर्य से तपस्या में लीन विश्वामित्र का तप भंग कर दिया। दरअसल, इन्द्र ने कभी नहीं चाहा कि कोई उसकी बराबरी कर सके। वाह, कितना अच्छा बाज़ारवादी था इन्द्र। प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी उसकी। आजकल बाज़ारवाद में भी तो यही होता है। अपने प्रोडक्ट की साख बनाए रखने के लिए दूसरे की साख को सिलबट्टे में पीस दिया जाता है। लेकिन यहां बात सिलबट्टे की नहीं हो रही है। यूं भी सिलबट्टा आउटडेटेड हो चला है। इलेक्ट्रिक ग्राइंडर के जमाने में सिलबट्टे को कौन पूछे। अगर बाहों की मसल्स बनानी ही है तो चमचमाते जिम और होमजिम तो हैं ही।
खैर, बात हो रही थी ग्लैमर की। तो अब ग्लैमर की दुनिया में गोबर को भी शानदार जगह मिल गई है। निश्चित रूप से यह गायों के लिए बड़ी खुशखुबरी है। उन्हें गर्व होगा यह जान कर। वरना विलायती फंड से फंडित होने वाले बड़े-बड़े अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में ‘‘काऊ डंग’’ को अस्पृश्य समझा जाता है। मुझे भी यह बात पता नहीं थी क्योंकि मैं तो हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूल की छात्रा रही हूं। लेकिन मेरी एक सहेली की बेटी उन दिनों विलायती फंड से फंडित होने वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ती थी। एक दिन मेरे घर में दाल-बाटी बनी तो मैंने सहेली को सपरिवार आमंत्रित किया। मेरी सहेली ने स्पष्टशब्दों में मुझे बताया कि वह और उसके पतिदेव तो आ जाएंगे लेकिन उसकी बेटी नहीं आएगी।
‘‘क्यों, क्या वह बहुत व्यस्त है? एक्जाम-वेक्जाम हैं क्या?’’ मैंने उससे जानना चाहा।
‘‘अरे नहीं, है तो फ़ुर्सत में लेकिन मुझे पता है कि वह नहीं आएगी।’’ मेरी सहेली ने अटपटा सा उत्तर दिया।
‘‘ऐसा क्यों? क्या वह मुझसे नाराज़ है?’’ मैंने पूछा।
‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है।‘‘ मेरी सहेली मुझे छोटा-सा उत्तर दे कर रह गई। इस पर मुझे गुस्सा आने लगा।
‘‘बात क्या है? साफ़-साफ़ बताओ!’’ मैंने उससे धमकाने की मुद्रा में पूछा।
‘‘उसे बाटियां पसंद नहीं हैं।’’ मेरी सहेली ने बताया। मगर मुझे यह बात हज़म नहीं हुई। भला कौन होगा जिसे दाल-बाटी पसंद न हों। जिसके मुंह में दांत न हों और नकली बत्तीसी भी न लग पाई हो वह भी दाल में बाटियों को मीड़-मीड़ कर चाव से खाता है। यानी मामला कुछ और है।
‘‘मुझे तुम्हारी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है, सही-सही बताओ!’’ मैंने फिर कठोरता से पूछा। तब कहीं जा कर उसने झिझकते हुए बताया कि-‘‘वो... बात ये है कि बाटियां गोबर के कंडे में बनती हैं न, और इसीलिए मेरी बेटी को पसंद नहीं है। वह तो बाटियां देखते ही चिढ़ जाती है कि ये तो काऊ डंग (गोबर) पर बनी हैं, मैं नहीं खा सकती इन्हें। वह तो गोबर या कंडे को हाथ भी लगाना पसंद नहीं करती है। बस, यही कारण है।’’
‘‘यानी उसने आज तक दाल-बाटी खाई ही नहीं?’’ मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मालवा में रहने वाला जैसे दाल-बाफले खाए बिना नहीं रह सकता है, वैसे ही बुंदेलखंड में रहने वाला दाल-बाटी का स्वाद न चखे, यह कैसे संभव है?
‘‘नहीं, उसके लिए माइक्रोवेव ओवन में बना दिया करती हूं।’’
‘‘पर, वह स्वाद कहां जो कंडे की आग में सिकीं बाटियों में होता है। तुम अपनी बेटी को समझाती क्यों नहीं कि गोबर और कंडा पवित्र वस्तुएं हैं। कंडा तो हवन-पूजन में भी काम में लाया जाता है।’’ मैंने सहेली को उलाहना दिया।
‘‘मैं कई बार समझा चुकी हूं। लेकिन उसके स्कूल में उसे यही सिखाया जाता है कि गोबर ‘‘काऊ डंग’’ होता है। तुम समझ रही हो न!’’ सहेली ने अपनी विवशता प्रकट करते हुए मुझसे कहा।
‘‘ठीक है, मैं समझ गई।’’ अब जबर्दस्ती तो किसी को कुछ खिलाया नहीं जा सकता है। मैंने भी कहा,‘‘उसके लिए मैं कुछ और बना लेती हूं। उसे भी साथ ले आना।’’
इसीलिए जब मैंने ऑन लाईन शाॅपिंग साईट पर ‘‘काऊ डंग केक’’ शब्द पढ़ा और उसके साथ लगा प्रोडक्ट का फोटो देखा तो कुछ जानी-पहचानी-सी चीज लगी। एक और क्लिक करके उस प्रोडक्ट के विवरण पर गई तो मैंने पाया कि यह तो गोबर के कंडों यानी उपलों का विज्ञापन था। करीने से पैक किए गए। एक साईज़ के। किसी खाने की वस्तु के समान। अत्यंत आकर्षक। मार्केटिंग पर एकदम खरे उतरने वाले। उन्हें देख कर मेरी आंखों में आंसू आ गए। ये दुख के नहीं, खुशी के आंसू थे। कम से कम अब मैं उस बालिका का तप भंग करने में क़ामयाब हो जाऊंगी।
चाहे मैं ऑन लाईन शाॅपिंग करूं या न करूं लेकिन अपनी सहेली की बेटी को एक दिन खाने पर अपने घर आमंत्रित ज़रूर करूंगी और उसे यही बताऊंगी कि अब जो मैंने बाटियां बनाई हैं वे लोकल गायों के लोकल गोबर से बने कंडों पर नहीं सेंकी हैं बल्कि ऑन लाईन शाॅपिंग कर मंगाए गए ‘‘काऊ डंग केक’’ की आग में सेंकी गई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इंटरनेट मार्केटिंग जेनरेशन वाली वह बालिका उन बाटियों को सहर्ष ग्रहण कर लेगी। आखिर उस ‘‘काऊ डंग केक’’ के पीछे उच्चकोटि के मार्केटिंग डिवीज़न ने महीनों काम किया होगा। आकार, प्रकार, प्रचार, प्रसार सब का ध्यान रखते हुए उसे ग्लैमरस बनाया  होगा। तब कहीं जा कर एक मल्टी नेशनल ऑन लाईन शाॅपिंग साईट पर उसे लांच किया गया होगा। लिहाज़ा, ‘‘काऊ डंग केक’’ के इस ग्लैमर से वह बालिका अछूती कैसे रह सकेगी? अब तो उसे बाटियां खाने में कोई समस्या नहीं होगी। वाकई मैं नतमस्तक हूं ग्लोबल होते गोबर के ग्लैमर के सामने। 
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(नवभारत, 30.01.2022)
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Wednesday, January 26, 2022

गणतंत्र दिवस पर पाठक मंच की गोष्ठी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रो, गणतंत्र दिवस पर साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद भोपाल की स्थानीय इकाई सागर पाठक मंच की पुस्तक समीक्षा गोष्ठी अपराह्न को इंस्टिट्यूट (जेजे) सिविल लाइंस में आयोजित हुई। जिसमें हेमंत शर्मा की पुस्तक "एकदा भारतवर्षे" पर  चर्चा हुई।गोष्ठी में शामिल होने से कड़ाके की ठंड भी नहीं रोक पाई साहित्यप्रेमियों को🌷🇮🇳🌷 
नगर के नवोदित उपन्यासकार प्रदीप पाण्डेय जी ने अपने प्रथम उपन्यास "पक्षद्रोह" की प्रति मुझे भेंट की। 📖📙📚
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गणतंत्र दिवस पर प्रगतिशील लेखक संघ मकरोनिया इकाई की काव्य गोष्ठी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रो, गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में प्रगतिशील लेखक संघ मकरोनिया इकाई की काव्य गोष्ठी आज दोपहर को मुक्ताकाश में आयोजित हुई । धूप के बावज़ूद हवा में ग़ज़ब की ठंडक घुली हुई थी लेकिन कविताओं के जोश ने ठंड का अहसास कम कर दिया था। 🌷🇮🇳🌷

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चर्चा प्लस | हमारे गणतंत्र को हैं हमसे अनेक आशाएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस  
हमारे गणतंत्र को हैं हमसे अनेक आशाएं 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
        ‘हम भारत के लोग...’ हमने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं एवं विश्वास के साथ संविधान की संरचना को स्वीकार किया और सच्चे गणतंत्र की राह में आगे बढ़ने की शपथ ली। हमने तो हमेशा अपने गणतंत्र से अनेकानेक आशाएं रखीं लेकिन क्या कभी सोचा कि हमने उन आशाओं का क्या किया जो हमारे गणतंत्र को हमसे रही होंगी? क्या हम गणतंत्र की आशाओं पर खरे उतरे हैं या फिर हमने अपने गणतंत्र को अपना निजीतंत्र बनाते जा रहे हैं। अपनी वैश्विक छवि के साथ-साथ सबसे नीचे की पंक्ति के नागरिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में कभी-कभी हमे आत्मावलोकन भी करना चाहिए। 
    
एक लम्बी परतंत्रता के बाद स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर मिले स्वीकार्य थी। कीमत भी हमने चुकाई। भारतीय भू-भाग का बंटवारा हुआ। अमानवीयता का तांडव देखना पड़ा। उसके बाद ग़रीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक तनाव ने स्वतंत्रता की खुशी को कई-कई बार हताहत किया। फिर भी स्वतंत्रता विजयी रही और हमने अपना संविधान गढ़ा तथा उसे स्वयं पर लागू किया। इसके  पहले संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके। एक ऐसा गणतंत्र जिसमें नागरिकों को बराबरी का दजर्र मिले। जिसमें शासन की शक्ति किसी एक राजा अथवा अधिनायक के पास न हो कर जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों के हाथ में हो।

गंणतंत्र के साथ सुनहरी आशाएं जागीं। देश तरक्की करेगा तो हम भी तरक्की करेंगे। या फिर इसके उलट कि हम तरक्की करेंगे तो देश भी तरक्की करेगा। लेकिन इस ‘हम भारत के लोग’ में से ‘हम’ पर ‘मैं’ का प्रभाव बढ़ता गया और ‘मैं’ ने ‘हम’ को निर्बल बना दिया। कभी-कभी उन्मादी भी। हमने अपनी परम्पराओं को सहेजा संवारा और उनसे सबक लिया। समयानुसार सड़ी-गली परम्पराओं को काट कर फेंका भी लेकिन उन्माद की अवस्था में पहंुचते ही हम सत्य, अहिंसा और परमार्थ के समरकरण को भुला कर हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। जीव मात्र के प्रति उदार विचार की परम्परा के पोषक हम यदि जलीकट्टू का समर्थन करने लगते हैं तो वहीं हमारा ‘अहिंसा परमोधर्म’ का आह्वान टूटने लगता है। हमने अपने संविधान में अहिंसा को प्र्याप्त जगह दी है। परमोधर्म को भी उच्च स्थान दिया है फिर हिंसा को अपनी गौरवमयी परम्परा कहते हुए संविधान की धाराओं को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं?

9 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की पहली बैठक में विभिन्न जातियों, धर्मों, आर्थिक, राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे और सामाजिक आधार को फैलाने की कोशिश की गई थी ताकि भारत अपने आप में जिस तरह से अद्वितीय विविधता को समेटे है उसी के अनुरूप नए गणतंत्र का निर्माण हो सके। भारतीय संविधान में नैतिकता और राजनीतिक परिपक्वता को आधार बनाया गया। लेकिन समूचे देश में महिलाओं साथ बढ़ते दुव्र्यवहार को देखते हुए यह लगने लगता है कि हमारे तंत्र से अब नैतिकता का लोप होने लगा है। गोया भारतीय स्त्री बर्बरयुग के किसी नए संस्करण को जी रही हो। भारत इस समय मानव तस्करी का वैश्विक मार्ग बन चुका है। यह बर्बरता भी हमारे संवैधानिक उसूलों का सिर झुकाने को प्र्याप्त है।
गणतांत्रिक भारत में देश की विविधता और जटिलता को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में अपनाया गया और ऐसा करते समय विभिन्न क्षेत्रों में बहुलतावाद का सम्मान किया गया। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र में संघीय ढांचे और धार्मिक मामलों में धर्मनिरपेक्षता के सहारे एक नए गणतंत्र के मायनों को स्पष्ट किया गया। गणतंत्र के गठन के बाद से ही नीति निर्धारकों की प्राथमिकता देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना थी।
यह सच है कि कोई भी तंत्र हो उसकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन गणतंत्र की परिकल्पना मैं संवैधानिक समस्याओं के लिए कई रास्ते खुले रखे गए। संशोधनों के द्वारा संवैधानिक ढांचे में लचीलापन भी बनाए रखा गया। फिर भी प्रत्येक नए चुनाव में चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का या फिर किसी पंचायत अथवा निगम का, गरिमा के सीमाएं चटकती मिली हैं। गणतंत्रता के क्या है मायने आज हमारे देश में। इतने लम्बे अरसे में कितने नियमों का ईमानदारी से हमने निर्वाह किया है और कितने ऐसे संवैधानिक नियम है जिनको हमने संविधान के पन्नों पर लिख कर भुला दिया है। हमारा देश भारतवर्ष एक जनतांत्रिक देश है। जहां जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है। गणतंत्र दिवस हमारे देश के इतिहास का वो दिन है, जिस दिन संविधान पूर्णरुपेण लागू किया गया था। देश की समस्त गतिविधियां इन संवैधानिक नियमों के आधार पर ही सुचारु ढंग से संचालित होती है। संविधान हमे जीने के तौर तरीके सीखाता है। एक सभ्य और कर्मठ राष्ट्र के सपने को साकार करता है हमारा संविधान। देश की गणतंत्रत को बनाये रखने हेतु प्रशासन के साथ साथ जनता का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। संविधान के नियम सबों के लिए बराबर होते है। वो किसी भी प्रकार के जातिभेद या वर्चस्व की भावना से ऊपर होता है। फिर भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार के संकट आज भी मुंहबाए खड़े हैं। अगर हम सिर्फ अपनी उन्नति के बारे में सोचते है तो ये हमारी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। हमे अपने देश और समाज के विषय में भी सोचने की जरूरत है। हमें ऐसे कार्यों की ओर स्वयं को अग्रसर करना है, जिनमें स्वयं के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति भी सम्मिलित हो। जैसे हमारा संविधान हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ देता है। वैसे ही हमें भी देश के प्रति अपनी भावना परिलक्षित करनी चाहिए। युवावर्ग जो कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और उसके भविष्य का एकमात्र कार्यवाहक होता है।युवाओं की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और कर्मठता ही राष्ट्र की अखण्डता रुपी महल के लिए ईंट का कार्य करते है। एक एक ईंट मिलकर ही एक विशाल महल का निर्माण करता है। आज जबकि हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके है। तकनीक के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी अब बदल चुकी है। ऐसे समय में गणतंत्र दिवस को सिर्फ एक राष्ट्रीय दिवस अथवा एक दिन का उत्सव मान कर, टीवी के छोटे पर्दे पर झांकियां देख कर, नेताओं के भाषण सुन कर भुला देना और दूसरे दिन से यह भी याद न रखना कि हमारा कोई संविधान भी है, हमारा कोई गणतंत्र भी है जिसके प्रति हम उत्तरदायी हैं, यह हमारी नासमझी ही नहीं अपराध भी है।

हमारे गणतंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण अंग तंत्र है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है जैसे तंत्र अनियंत्रित होता जा रहा है। उसे अपनी मनमानी करने से रोकने का दायित्व जिनका है कहीं कहीं तो वे खुद ही भ्रष्टाचार की मिसाल निकल आते हैं। तंत्र के इस कथन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज के दौर में सत्ता दल का राजनैतिक हस्तक्षेप प्रशासनिक अमले पर इतना अधिक रहता हैं कि वे चाहकर भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम नहीं कर सकते हैं। कोई भी जनप्रतिनिधि जब एक बार अपने राजनैतिक हित साधने के लिये तंत्र का उपयोग कर लेता हैं तो फिर गणतंत्र के मूल्यों में गिरावट आने लगती है। आर्थिक मुद्रास्फीति से कहीं अधिक घातक होती है नैतिकता की स्फीति।किसी भी समस्या को हल करने के लिये गण को तंत्र का साथ देने और तंत्र को त्वरित निराकरण के प्रयास करने आवश्यक होते हैं। आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या हैं। हालांकि विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी, अंर्तराष्ट्रीय बाजार की उथल पुथल, नोटबंदी के बाद की आर्थिक स्थिति ने देश को भी हिला कर रख दिया है। लेकिन इतना कह देने मात्र से सरकार के कर्तव्यो की इतिश्री नहीं हो जाती है। और ना ही केन्द्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण़ करके बच सकतीं है। गण चुस्त और दुरुस्त रहें तथा तंत्र पूरी मुस्तैदी से देश के विकास और आम आदमी की खुशहाली के लिये संकल्पित हो, तभी देश एक बार फिर अपने स्वर्णिम मुकाम पर पहुंच सकेगा। बहरहाल, अब समय आ गया है कि हमें खुद को धोखा देने से रोकना होगा और सही मायने में खुद के लिए तय करना होगा कि हम अपने गणतंत्र के अनुरूप एक सही तथा अच्छे नागरिक कैसे साबित हो सकते हैं।
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गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳❤️


Happy Republic Day 🌷🇮🇳🌷
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Tuesday, January 25, 2022

"रांगोली में उतारा संदेश कि जहां बेटियां हैं, वहां रंग भी है और उमंग भी" - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

"रांगोली में उतारा संदेश कि जहां बेटियां हैं, वहां रंग भी है और उमंग भी" - डाॅ. शरद सिंह
"बेटियां परिवार के जीवन को खुशियों से रंग देती हैं। जिस घर में बेटियां नहीं होतीं वहां भाई के सूने हाथ रंग-बिरंगी राखी को तरसते हैं। बेटियां परिवार में, समाज में सांस्कृतिक उमंग की सरिता प्रवाहित करती हैं। रांगोली में उतारा संदेश कि जहां बेटियां हैं, वहां रंग भी है और उमंग भी। ... पोट्रेट रांगोली अपने-आप में तेजी से विकसित होती एक स्वतंत्र चित्रकला है। कैनवास पर रंगों से चित्र बनाने से कहीं अधिक कठिन होता है रांगोली द्वारा पोट्रेट बनाना। कैनवास पर चाहे एक्रेलिक हो, तैलरंग हो अथवा जलरंग उसे आपास में डिज़ॉल्व या मेल्ट करना आसान होता है और आसानी से लाईट एण्ड शेड्स की छटा दिखाई जा सकती है किन्तु रांगोली में लाईट और शेड्स तथा रंगों का पारस्परिक प्रभाव उत्पन्न करना चुनौती भरा होता है। एक रंग पर दूसरे रंग का इस प्रयोग सावधानी से प्रयोग पड़ता है जिससे शेड्स उभर कर सामने आएं और आधार रंग को भी प्रभावित न करें।"- ये मेरे विचार थे "उमंग" रांगोली आयोजन में, कल 25.01.2022 को, नवनिर्मित महाकवि पद्माकर ऑडीटोरियम परिसर में।
संस्कृति मंत्रालय के द्वारा मनाया जा रहा आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत राष्ट्रीय बालिका दिवस पर सागर नगर की चित्रकला की प्रतिनिधि संस्था ‘‘रंग के साथी’’ द्वारा रंगोली उत्सव ‘उमंग’ का आयोजन किया गया। इस आयोजन की थीम थी महिला स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ तथा महिला सशक्तिकरण। इस आयोजन में सबसे अधिक जिस विधा ने आकर्षित किया वह थी पेाट्रेट रांगोली।
 आयोजन में बालक-बालिकाओं द्वारा बनाई गई रांगोली इस बात को प्रमाणित कर रही थी कि इन कलाकारों ने इस बारीकी को भली-भांति समझ लिया है। बहुत सुंदर नयनाभिराम पोट्रेट रांगोली देखने को मिली।
मोतीनगर चौराहे पर स्वतंत्रता सेनानी रानी अवंतिबाई की प्रतिमा के निकट महाकवि पद्माकर आऑडीटोरियम के परिसर में विभिन्न स्कूल-काॅलेज की 100 से अधिक बालिकाओं ने रांगोली द्वारा अपनी भावनाओं एवं कला का प्रदर्शन किया। इसमें मुख्य रांगोली ‘‘रंग के साथी’’ ग्रुप की कलाकार लक्ष्मी पटेल, दिव्या नायक, हिमानी चैरसिया, विशाखा नामदेव, साधना रायकवार, आयुषी जैन, मीनाक्षी सिंधई एवं अपराजिता पचैरी सहित 10 कलाकारों द्वारा बनाई गई थी जिसका आकार 15 गुणा 20 फीट था। इसमें रानी अवंतीबाई लोधी को रांगोली द्वारा चित्रित किया गया था। इसे बनाने में 20 किलो रांगोली और छः घंटे का समय लगा। इसके अतिरिक्त किसी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को तो किसी ने बेटियों के उज्ज्वल भविष्य को अपनी रांगोली का विषय बनाया था। रानी अवंती बाई लोधी को इस आयोजन की केन्द्रीय रांगोली बनाए जाना विशेष उद्देश्यपूर्ण रहा क्योंकि रानी अवंतीबाई लोधी वह शक्तिपुंज रही हैं जिन्होंने अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीतियों के समक्ष झुकने से मना कर दिया था। उनके पति रामगढ़ के राजा विक्रमादित्य सिंह के अस्वस्थ होने पर लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अंतर्गत राजा को विक्षिप्त घोषित कर दिया गया और दोनों पुत्रों अमान सिंह और शेर सिंह के अवयस्क होने का बहाना लेकर रामगढ़ को हड़पने की चाल चली। तब रानी ने  अंग्रेजों की इस गलत नीति का विरोध करने का विचार किया और अपनी ओर से क्रांति का संदेश देने के लिए अपने आसपास के सभी राजाओं और प्रमुख जमींदारों को चिट्ठी के साथ कांच की दो काली चूड़ियां भिजवाईं। उस चिट्ठी में लिखा था- ‘‘देश की रक्षा करने के लिए या तो कमर कसो या चूड़ी पहनकर घर में बैठो।’’ शीघ्र ही क्रांति का बिगुल बज उठा और रानी अवंतीबाई ने तलवार खींच ली। यद्यपि इस संघर्ष में उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा लेकिन उन्होंने गलत नीति निडरता से विरोध किया। ऐसी यशस्वी रानी का पोट्रेट रांगोली में बनाने से बालिकाओं में यह संदेश गया कि अन्याय का प्रतिरोध करो और निडर बनो। इस प्रकार की रांगोली सजाने का कार्य बहुत ही सार्थक रहा। इस आयोजन में रांगोली देखने तथा बालिकाओं के पक्ष में समर्थन देने के लिए श्यामलमकला संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र, पाठकमंच सागर इकाई के अध्यक्ष राजकुमार तिवारी, वनमाली सृजनपीठ सागर इकाई की अध्यक्ष डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, महिला काव्य मंच सागर इकाई की अध्यक्ष अंजना चतुर्वेदी तिवारी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष डाॅ. साधना मिश्र आदि नगर की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं के अनेक प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इस अवसर पर ‘‘रंग के साथी’’ ग्रुप सागर के सचिव असरार अहमद ने बताया कि सागर में चित्रकला को ले कर हमेशा बहुत उत्साह रहता है। हम जब भी कोई आयोजन करते हैं तो बड़ी संख्या में प्रतिभागी उसमें शामिल होते हैं। इस बार बेटियों से जुड़े विषय के कारण और अधिक उत्साह देखने को मिल रहा है।’’ इस अवसर पर ग्रुप की अध्यक्ष अंशिता बजाज वर्मा प्रतिभागियों को हर संभव सहयोग दिया तथा रांगोली बनाने के लिए उनका उत्साहवर्द्धन किया। 
🌷 रंग के साथी ग्रुप को हार्दिक बधाई 💐
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पुस्तक समीक्षा | यथार्थ की तस्वीर दिखातीं कविताएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 25.01.2022 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि कैलाश तिवारी ‘विकल’ के काव्य संग्रह "बतरस" की समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
यथार्थ की तस्वीर दिखातीं कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - बतरस
कवि        - कैलाश तिवारी ‘विकल’
प्रकाशक    - अनुकथन प्रकाशन, अजंता प्रेस, बण्डा-बेलई, जिला सागर (म.प्र.)
मूल्य       - 100 रुपए
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ये कविताएं
दुनिया भर की कविताओं से
बहुत अलग हैं 
इन कविताओं में वो जीवन
धड़क रहा है
जिसको पाने
हर अच्छे मानव के मन में
ललक रही है।
- ये पंक्तियां उस काव्यात्मक भूमिका की अंश हैं जिसे प्रतिष्ठित शायर मायूस सागरी ने बतौर पुस्तक-भूमिका लिखी हैं। इस काव्यात्मक भूमिका को पढ़ कर इस बात का अनुमान हो जाता है कि संग्रह की कविताओं में कुछ अलग हट कर बात कही गई है। यह काव्य संग्रह है ‘‘बतरस’’ और कवि हैं कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’। संग्रह में एक और भूमिका है जो साहित्यकार स्व. महेन्द्र फुसकेले द्वारा लिखी गई है। उन्होंने अपनी भूमिका के आरम्भ में ही लिखा है कि -‘‘बतरस का मूल स्वर राजनीतिक है, जो सामाजिक बदलाव चाहती है।’’
बतरस शब्द से ही ध्वनित होता है, जिसमें बातों का रस हो। यह रस किसी भी प्रकार का, किसी भी स्वाद का हो सकता है। मीठे रस की जो मिठास एक सामान्य व्यक्ति को मधुर लगती है, वह मधुमेह के मरीज को विष के समान हानिकारक लगेगी। वहीं जो करेले का रस सभी को कड़वा और अरुचिकर लगता है, वही कड़वा रस मधुमेह के मरीज के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक होने के कारण उसे रुचिकर होता है। इसी तरह यदि कविता में अव्यवस्था के यथार्थ को पिरोया जाए तो पीड़ितवर्ग को वह अपनी आवाज़ के सामन प्रतीत होती है किन्तु वहीं यथार्थ भरी कविता अव्यवस्था फैलाने वालों को अपने विरोधस्वरूप नागवार गुज़रती है। सच कहना ताकतवर की बदसूरती को आईना दिखाने के समान होता है और आईना दिखाने का साहस सब में नहीं होता है। ऐसे ताकतवरों को झूठ बोलने वाले आईने पसंद होते हैं जो हर बार यही कहे कि ‘‘इस दुनिया में आप से सुंदर और कोई नहीं।’’ लेकिन एक सच्चा साहित्यकार कभी चाटुकारिता नहीं करता है और हमेशा यथार्थ के पक्ष में ही खड़ा दिखाई देता है। कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’ के भीतर का कवि भी अपनी कविताओं के माध्यम से यथार्थ का उद्घोष करता है।
‘‘बतरस’’ कविता संग्रह की कविताओं में व्यंजनात्मकता के साथ ही चुनौती भरी हुंकार भी है। इसमें संग्रहीत कुल अड़तीस कविताओं में गांव, शहर, रोज़मर्रा का जीवन, विसंगतियों के प्रति क्षोभ, प्रतिरोध आदि के अनेक रंग मौजूद हैं। जिसके मूल स्वर में सब कुछ सुधारे जाने की ललक ध्वनित है। इसीलिए इन कविताओं में एक तीखापन भी है। इसी संदर्भ मेें ‘‘एक तुम हो’’ शीर्षक कविता देखिए-
मुख्यमंत्री
चुनता है मंत्री
अपने खास-म-खास
जिन्हें चुन कर भेजती है जनता
फिर मंत्री
अपने लिए चुनता है जनता,
उद्योगपति, अफ़सर, सप्लायर
मालदार, ठेकेदार
एन.जी.ओ, मीडियाकर्मी/कलाबाज़,
और टुकड़खोर, मजमेबाज़,
इसी तरह सब चुनते हैं
अपने-अपने लिए जनता
सेवा तो सेवा है
अस न बस करनी है।
वस्तुतः कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’ की कविता, काव्य के साथ समय की आलोचना भी है। जो प्रकारांतर से एक स्पष्ट विचारधारा को सामने लाती है, जिसके तार उनकी सारी कविताओं से जुड़े हैं। यह एक अच्छी बात है कि वे कहीं भी अपनी विचारधारा से विचलित नहीं हुए हैं। उनकी एक कविता है ‘‘अपराधी कौन’’ जो पूंजीवाद के चरित्र को खंगालती दिखाई देती है-
मंदिर-मूर्ति
है बिड़ला की
जितनी चीज़ें बनाती फैक्ट्री
उतने बनते मंदिर-मूर्तियां
भगवान बिड़ला के हैं
या / बिड़ला हैं भगवान
ये तो सब जाने राम
हम तो बस इतना जानते हैं
हम हैं निर-अपराध।
आजीविका के लिए हाट-बाज़ार में दूकानें लगाना, श्रम की मंडी में खड़े हो कर अपने श्रम की बोली लगवाना यह भी एक सच है ग्राम्य जीवन का। गंावों से श्रमिक शहरों में आते हैं जिनमें से कोई गिट्टी फोड़ता है तो कोई माल ढोता है तो कोई मिट्टी खोदने का काम करता है लेकिन उन सबके मन में यही आशा होती है कि वे अपने श्रम से अपने परिवार के भरण-पोषण का जुगाड़ कर लेंगे। ‘‘श्रम विक्रेता’’ कविता के आरंभिक अंश में गंावों के नामों का उल्लेख करते हुए बड़ी सुंदरता से इस तथ्य को कवि ने सामने रखा है -
कोई रीठी, कोई सलैया से
कोई माजरखेड़ा, कोई पटना-बुजुर्ग
या ख़ुर्द से
हर कोई अपनी-अपनी
पोटली में
बांध कर लाया है
मिट्टी की ख़ुश्बू
आशा का दो मुट्ठी चून।
‘‘विकल’’ ने मां पर कविता लिखी है, बिन्ना ख़ाला पर कविता लिखी है, वे ज़र्दा-चूना को भी नहीं भूले हैं। वे जहां ब्राह्माण्ड की बात करते हैं वहीं सड़े आलुओं-सी सड़ी व्यवस्था को जीवन से बाहर फेंक देना चाहते हैं। ‘‘विकल’’ की कविताएं ठहर कर सोचने को विवश करती हैं, अपने भीतर की भीरुता को आंकने का आग्रह करती हैं और आह्वान करती हैं यथार्थ को समझने, परखने और सुधारने का। यक़ीनन, ‘‘बतरस’’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो बाज़ारवाद के प्रभाव में चिंतन की क्षमता खोती जा रही मानसिकता को झकझोरने में सक्षम है। इस संग्रह की कविताओं को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।          
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