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Wednesday, October 15, 2025

चर्चा प्लस | असंवेदनशील सियासत की बिसात पर खड़ी स्त्री-अस्मिता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

दैनिक, सागर दिनकर में 15.10.2025 को प्रकाशित  
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चर्चा प्लस 
असंवेदनशील सियासत की बिसात पर खड़ी स्त्री-अस्मिता
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

      मेडिकल की एक छात्रा के साथ गैंग रेप का अपराध अत्यंत दुखद, अत्यंत घृणित। कानून और समाज के मुंह पर किसी जोरदार तमाचे से काम नहीं यह कांड। किंतु इससे भी अधिक शर्मनाक है ऐसी घटना पर राजनीतिक विवाद। अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए घटिया बयानबाजी वह भी एक महिला नेता के द्वारा। जरूरी क्या है कुर्सी या स्त्री की अस्मिता? पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर रेप कांड पर हो रही बयान बाजी ने भारतीय राजनीति के खोखलेपन को भी उजागर कर दिया है। दरअसल, जो राजनीति जनता के पक्ष में होनी चाहिए वह जनता के कमजोर कंधों पर सवार होकर जनता के विरुद्ध ही की जा रही है।

पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक मेडिकल छात्रा के साथ दुष्कर्म के मामले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान ने विवाद खड़ा कर दिया। ममता बनर्जी ने सवाल उठाया कि छात्रा आधी रात को हॉस्टल से बाहर क्यों थी? साथ ही नसीहत दे डाली कि  छात्राओं को देर रात बाहर नहीं निकलना चाहिए। उनकी इस बात की बीजेपी ने कड़ी आलोचना की और इस्तीफे की मांग की। पश्चिम बंगाल गैंगरेप पर बयान देते हुए ममता बनर्जी ने सवाल पूछा था कि आधी रात छात्रा हॉस्टल से बाहर कैसे गई? उनके इस सवाल पर सियासी घमासान शुरू हो गया। बीजेपी ने उन्हें श्नारीत्व के नाम पर कलंकश् बताया। यह बयान है भी शर्मनाक। अपने राज्य में स्त्रियों की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी पर पर्दा डालने के लिए स्त्रियों को ही घर में कैद रहने की सलाह दिया जाना और वह भी एक स्त्री के द्वारा, इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता है।

पश्चिम बंगाल में ही अस्पताल में कार्यरत महिला डॉक्टर के साथ हुए गैंग रेप को अभी लोग भूले नहीं हैं, उस पर ऐसी घटना की पुनरावृत्ति राज्य की कमजोर सुरक्षा व्यवस्था को रेखांकित करती है। ममता बनर्जी ने छात्राओं से देर रात बाहर न निकलने की अपील की है। विशेषरूप से जो छात्राएं दूसरे राज्य से पश्चिम बंगाल में आईं हैं, उन्हें हॉस्टल के नियमों का पालन करने के लिए कहा गया है। सीएम ममता बनर्जी का यह बयान दुर्गापुर रेप कांड के बाद सामने आया।
ओडिशा से दुर्गापुर के एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ने आई एमबीबीएस की छात्रा खाना खाने के लिए अपने दोस्त के साथ बाहर निकली थी, तभी 3 लोगों ने उसका अपहरण कर लिया और जंगल में ले जाकर दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। अब तक इस मामले में पांचों आरोपी पकड़े जा चुके हैं। प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया है, लेकिन उनके बयान पर विपक्ष और महिला संगठनों ने नाराजगी जताई है।

ओडिशा के बालासोर जिले के जलेश्वर की रहने वाली 23 वर्षीय युवती के साथ शुक्रवार रात उस समय सामूहिक बलात्कार किया गया, जब वह अपनी एक दोस्त के साथ निजी मेडिकल कॉलेज के बाहर खाना खाने गई थी। ममता बनर्जी ने जब यह बयान दिया तब यह कहा गया था कि छात्रा अपनी एक सहेली के साथ रात के खाने के लिए बाहर गई थी। ममता बनर्जी ने रविवार को राज्य के निजी कॉलेजों से कहा कि वे महिलाओं को देर रात बाहर न निकलने दें। उन्होंने पूछा कि कथित दुर्गापुर मेडिकल कॉलेज सामूहिक बलात्कार मामले की पीड़िता रात 12:30 बजे परिसर के बाहर कैसे थी। ममता बनर्जी के शब्दों में ‘‘वह एक निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी। सभी निजी मेडिकल कॉलेज किसकी जिम्मेदारी हैं? वे रात 12:30 बजे कैसे बाहर आ गए? जहां तक मुझे पता है, यह घटना जंगल वाले इलाके में हुई। जांच जारी है।’’

 राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन से इस घटना रिपोर्ट मांगी है, लेकिन इस सब से इतर गैंगरेप कब हुआ इसको लेकर बहस छिड़ी हुई है? क्योंकि राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि रात में लड़कियों को बाहर नहीं जाने देना चाहिए था। ममता बनर्जी ने कहा था कि रात 12:30 बजे बाहर कैसे थी? तो वहीं दूसरी तरफ यह दावा किया जा रहा है कि घटना आधी रात से काफी पहले हुए थी। इस मुद्दे पर बीजेपी भी टीएमसी सरकार को घेर रही है। राज्य के प्रधान सचिव नारायण स्वरूप निगम ने कहा कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन से रिपोर्ट की मांग की है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। घटना के बाद छात्राओं ने कॉलेज परिसर में विरोध प्रदर्शन किया और अधिकारियों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया।
राष्ट्रवाद, बौद्धिकवाद, स्त्रीविमर्श जैसे बड़े-बड़े भारी-भरकम से लगने वाले शब्द कभी-कभी बहुत छोटे और हल्के लगने लगते हैं। जब एक युवती सामूहिक दुष्कर्म किया जाता है और उसका वास्ता देकर सभी लड़कियों से रात को बाहर न निकलने की सलाह दी जाती है। क्या देश की कानून व्यवस्था इतनी लाचार हो गई है की लड़कियां रात को घर से बाहर नहीं निकल सकतीं? क्या रात को घर से बाहर निकलने पर उन्हें गैंगरेप जैसे अपराध का सामना करना पड़ेगा? यदि यह दोनों ही परिस्थितियों मौजूद है तो फिर कानून व्यवस्था कहां है और क्या कर रही है?  स्त्री अधिकारों के समर्थक कथित बुद्धिजीवी इस विषय पर लगभग खामोश है। क्या बौद्धिक सरोकार भोथरे हो चले हैं या सोशल मीडिया तक सिमट कर रह गए है? जब बुद्धिजीवी तय न कर पा रहे हों कि ऐसी अमानवीय घटनाओं पर उन्हें क्या कदम उठाने चाहिए तो यह परिदृश्य अनेक सवाल खड़े करता है।

आज भारतीय समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें इतिहास और संस्कृति ही नहीं बल्कि वर्तमान से भी उसका रिश्ता अरूप होता चला जा रहा है। यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि इतिहास, विचार और साहित्य से लेकर मूल्यों तक की घोषणाएं की जा रही हैं और हम उन घोषणाओं की वास्तविकता को परखने के बदले उनकी व्याख्या और बहस के लम्बे-चैड़े आयोजन करने में लगे हुए हैं। इस दौर में स्त्री, दलित और जनजातीय समाज लगातार बहस होती है लेकिन परिणाम उस गति से सामने नहीं आते हैं जिसक गति से आने चाहिए। यहां भी बौद्धिकवर्ग दो फड़ में बंटा नजर आता है। समाज के भौतिक सरोकारों से जीवन में मूल्य और आदर्श संकटग्रस्त हो गये हैं। ऐसे दौर में साहित्यिक और सांस्कृतिक उपक्रम समाज को जोड़ने का काम करते हैं। साहित्य और संस्कृति का सीधा सरोकार मूल्य और जीवन की उच्चताओं से होता है। इसीलिए बौद्धिकता के जरिए संस्कृति से जुड़ा जा सकता है और आगामी पीढ़ी को आसन्न संकट से बचाया जा सकता है। लेकिन आज साहित्य जगत में साहित्य की स्थापना नहीं, वरन् व्यक्ति की स्थापना पर ध्यान अधिक रहता है। जहां व्यक्तिवाद होगा वहां समाज सरोकारित साहित्य पर बाजार का साहित्य हावी हो जाएगा। दुर्भाग्य से यही हो रहा है। जबकि मनुष्य मूलतः अनुभव से सीखता है और साहित्य में जीवन के अनुभव का निचोड़ होता है। उदाहरण के लिए यदि प्रेमचंद की कहानियों को लें तो प्रेमचंद की कहानियां सामाजिक बोध कराने के साथ ही अंतरचेतना को जगाती हैं। लेकिन आज के दौर को देख कर लगता है कि यदि आज प्रेमचंद होते तो शायद उन्हें भी व्यक्ति-स्थापना की पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ता। कहने का आशय यह है कि जब बुद्धिजीवी आत्मकेन्द्रित हो जाएगा (भले ही जगत्उद्धार या सरोकार का थोथा दावा करता रहे) तो समाज के सरोकारों को कैसे साध पाएगा?

सोशल मीडिया पर स्वस्थ समाज का ज्ञान बांटने वाले बुद्धिजीवी ट्रूडो और कैटी पेरी के अंतरंग दृश्य को तो धूमधाम से शेयर करके “शर्म-शर्म” की दुहाई देते हैं जबकि उसे संस्कृति या उसे समाज से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि पहले अपने समाज की स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है जहां लड़कियां, स्त्रियां सुरक्षित नहीं हैं।
 खतरे सिर्फ रात के अंधेरे के नहीं है दिनदहाड़े के खतरे भी मौजूद हैं। तो क्या लड़कियां दिन में भी ना निकलें? कपड़ों की दुकान से कपड़े ना खरीदें, उनका ट्रायल रूम इस्तेमाल न करें? वर्तमान इलेक्ट्राॅनिक प्रगति ने जहां स्त्रियों को अनेक सहूलियतें दी हैं वहीं उनकी अस्मिता के लिए नए तरह के संकट बढ़ा दिए हैं। उन्हें सबसे अधिक भय कैमरे का रहता है। वह कैमरा कोई भी हो सकता है। चेंजिंग रूम में चुपके से लगाया गया हिडेन कैमरा या फिर मोबाईल फोन का चलता-फिरता कैमरा। लगभग हर माह एक न एक घटना समाचार के रूप में पढ़ने-सुनने को मिल जाती है। मोबाईल फोन के कैमरे ने स्त्री अस्मिता पर हमलावरों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि कर दी है। प्रेमालाप के नाम पर नवयुवक अपनी साथी युवतियों के एम.एम.एस. बना लेते हैं और उसे इन्टरनेट पर सार्वजनिक करने की धमकी दे कर उन्हें ब्लैकमेल करने लगते हैं। गर्ल्स हाॅस्टल के बाथरूम, सार्वजनिक आउटलेट, होटल के कमरे आदि में छिपे कैमरे कई बार पकड़े जा चुके हैं। यह सब इसलिए कि ऐसी अश्लील फिल्में इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हैं और उकसाती हैं अधकचरे मस्तिष्क को।
उंगलियों पर गिने जा सकते हैं वे बौद्धिक लोग जिन्होंने स्त्रीजाति के सम्मान और सुरक्षा के प्रश्न पर अपने सम्मान लौटाए या धरना प्रदर्शन किया। बेशक उनमें भी कई राजनीति प्रेरित थे किन्तु सोशल मीडिया से बाहर निकल कर आवाज उठाना और प्रत्यक्ष, खुली प्रतिक्रिया देना भी बौद्धिक स्तर पर प्रतिवाद का ही एक तरीका है। क्या बौद्धिकवर्ग को इस बात पर एकजुट हो कर अपनी सच्ची बौद्धिकता का परिचय नहीं देना चाहिए कि भारतीय क्षेत्र में इंटरनेट पर पोर्न साईट्स बैन कर दी जाएं, महिलाओं-बच्चों के प्रति जघन्य अपराध करने वाले अपराधियों को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में जल्दी से जल्दी सजा सुनाई जा कर सजा दे भी दी जानी चाहिए। क्योंकि सजा सुनाए जाने और सजा देने में वर्षों का फासला कानून व्यवस्था से भरोसा उठाने लगता है और तब एन्काउंटर को समर्थन मिलना स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आता है। 

आज जब आपराधिक असंवेदनशीलता अपने चरम पर जा पहुची है तब ऐसे कठोर समय में बौद्धिक सरोकार का तटस्थ रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। समाज में स्त्रियों को एक सुरक्षित निडर वातावरण देने की बजाय उन्हें डर कर रहने और दुबक कर बैठने की सलाह दी जाए तो यह 21वीं सदी का माहौल तो नहीं कहा जा सकता है। बेहतर है की राजनीति की बरसात पर स्त्रियों की अस्मिता को दांव पर लगाने की बजाय एक स्वस्थ और निडर माहौल बनाने के लिए सभी एकजुट हों।  
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