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Sunday, September 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    ईके पैले गांव देहात खों ले के हमाए बिचार कछू और हते। हमने पन्ना जिला के छोटे से छोटे गांव देखे। दमोए के मुतके गांव देखे। छतरपुर जिला के मुतके तो नोंई पर कछू गांव जरूर देखे। टीकमगढ़ के गांवन से सोई गुजरे। सागर जिला के गांवन में तो जब चाए तब घुमक्कड़ी के लाने निकरबो होई जात आए। अबे लौं मोए जेई लगत रओ के गांव देहात में सुबिदाओं की कमी आए। उते चाए दबाई के लाने होए, चाए सुद्ध पानी के लाने, भौत तकलीफ उठाने परत आए। औ बेरोजगारी सो ऐसी के उते से गरीब-गुरबा खों पेट भरे के लाने सहर में जा के मजूरी करने परत आए। उतईं जो किसान आएं उने जी-तोड़ मेनत करने परत आए। सो मोए हमेसई गांव के लाने दया माया रई। मनो पिछली शनिच्चर खों हमें बा देखने को मिलो जा के बारे में हमने कभऊं सोची ने हती।
का भओ के हमें जाने रओ सीताराम रसोई नांव की संस्था। काए से के उते गरीब-गुरबा बुजुरगन खों मुफत में भरपेट खाना खवाओ जात आए। हम सोई उते भोजन कराबे के लाने जात रैत आएं। ई दार बी गए। उते अपने सगे हातन से भोजन परोसो। उते की खाना पकाने वारी बाइयों खों धुतिया भेंट करी। काए से हमें बे भौतई अच्छी लगत आएं, बिलकुल अपनी बैन घांई। औ उनकी मेनत औ ब्यौहार भौतई अच्छो रैत आए। फेर हम ओरन ने सोची के ऊंसई घरे लौटबे से अच्छो आए के तनक चक्कर काट के, एकाद गंाव देहात से घूमत चलें। अच्छो लगहे। सो सीताराम रसोई से निकर के पैले बालाजी मंदिर में शनि भगवान के दर्शन करे। बा मंदिर सोई ऊंची पहरिया पे बनो आए, सो उते जा के भौतई अच्छो लगत आए। सो, उते बालाजी हनुमान भगवान औ शनिदेव के दरसन करे हमने। फेर हम ओरन ने रस्ता पकरी मंदिर के नैचे से पांछू वारी। हम ओरन खों पतो ने हतो के हम ओरें कोन तरफी जा रए? मनो जा तो पता रई के अपने जिला से बायरे नईं जा रए। कछू दूर तो साजी रस्ता रई, फेर मनों रोड को नक्सा बदल गओ। साजी सी रोड पे गड्ढा मिलन लगे। दचका खात भए कछू दूर औ चले तो रोड कनारे ‘‘प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत’’ लिखों भओ बोर्ड दिखानों। हमने प्रधानमंत्री योजना वारी मुतकी रोडें देखी आएं मनो ऐसी गड्ढा वारी रोड पैली दार देखी। रस्ता में एक बड़ो स्कूल औ एक फैक्टरी दिखानी। मनो रोड की दसा से उनको कोनऊं मेल ने हतो।
चलो कछू नईं, गांव आए। ऊ रोड पे भैंसन ने चल-चल के गड्ढा बना दओ हुइए। जा सोस के हमने खुद खों तसल्ली दई। इत्ते में एक फेमस गांव को बोर्ड दिखानों। कछू नईं। गांव के बायरे से निकरी रोड पे बी कऊं-कऊं गिलावो सो मचो हतो। बा बी कछू नईं। काए से के अब बरसात के दिनां में गिलावो ने हुइए तो का धूरा उड़हे? बा गांव बड़ो हतो। गांव के बायरे के हिस्सा में एक तरफी नोने-नोने खेत हते। तो दूसरी तरफी जंगल विभाग वारों के सगोना के जंगल हते। बा सब देख के भौतई अच्छो लग रओ तो। ऊ सीनरी देखत समै रोड के दचका लौं बिसर गए। तनक देर बाद लगो के अब कोनऊं से पूछ लेव चाइए के हम ओरें कोन तरफी जा रए? लग तो रई हती के जोन तरफी बढ़ रए बा रोड चक्कर काट के राजघाट बंधान लौं जात हुइए। फेर बी कोनऊं से पूछ लेबो सई लगो। हमने संग वारे भैयाजी जू से कई के कोऊ दाऊ दिखाएं सो उनसे पूछ लइयो। मनो भैया जू खों दाऊ से पैले तीन मोड़ा दिखा गए। 12 ने तो 14 बरस के रए हुइएं। तीनों में से एक सायकिल लए हतो। मनो तीनोंई गुटखा खा रए हते। भैया जू ने उनईं तीनों से पूछ लई के जा रोड कोन गांव खों जा रई? जा सुन के एक मोड़ा ने अपने कुकुरमुत्ता घांई बालन पे हात फेरत भओ बड़े स्टाईल से पूछो आप ओरन खों कां जाने? भैया जू बोले के हमें राजघाट जाने। जा सुन के बा मोड़ा बोलो के फेर तो तुम ओरें आगे ई रोड पे चलके दाएं मुड़ जइयो। तब लौं दूसरो मोड़ा गुटखा अपने मों में डार के खींसा निपोरत भओ बोलो के दाएं नईं बाएं मुड़ियो। इत्ते में तीसरो मोड़ा बोलो इते कां चले आए, पांछे लौट जाओ। भैया जू ठैरे बुंदेलखंड के बायरे के सो बे उन ओरन की कई उत्ती समझ ने पाए। मनो मोए समझ में आ गई के जे मोड़ा गांव के भले आएं मनों ठैरे चंटा-पंटा। पूरे आवारा टट्टू। सो हमने भैया जू से कई के इन ओरन खों पतो नइयां, आप तो आगूं चलो, रोड कऊं तो पौंचाहे। 
हम ओरन की गाड़ी बढ़ी औ पांछू से उन तीनों की हंसबे की आवाज सुना परी। हमाओ जी तो ऐसो करो के गाड़ी रुकवाएं औ उतर के उन ओरन खों दो-दो थपाड़ा लगाएं। जरा-जरा से लरका औ गुटखा खा-खा के गर्रा रए। मनो हमने अपनों गुस्सा पे काबू करो औ बढ़ लए।
कछू दूर पे एक दूसरो गांव आ गओ। उते जो दिखानों, बा हम देखतई रै गए। उते एक दलान में छै-सात लुगवा बैठे पत्ता खेल रए हते। मनो सई कएं तो उते जुआ चल रओ हतो। चलो कछू नईं, गांव ठैरो। टेम पास। मनो गांव वारन को इत्ती फुरसत कां से मिल गई? ऊपरे से जां हम ओरन की गाड़ी उते से निकरी तो बे सब हम ओरन खों देखन लगे। जे ई कोई बीस कदम बाद एक घर के बायरे पट्टा घांईं बनो चबूतरा पे छै-सात लोग औ दिखाने। बे सोई फुरसत से बैठे गपिया रए हते। उतई एक टपरा हतो। चाय को। ऊमें चार जने बैठे हते। बे ओरें मोबाईल पे कछू देखने में मगन हते। बाकी हम ओरन की गाड़ी उते से कढ़ी तो सब के सब हम ओरन की तरफी घूरन लगे। भैया जू ने हमसे पूछी के इन ओरन से रस्ता पूछी जाए? हमने कई के नईं, जे ठलुआ हरें को जाने का बताएं। इते तो गाड़ी बी ने रोको, बढ़त चलो। मनो उन ओरन खो देख के हमें लगो के इन ओरन खों कछू काम-धंदा नइयां का? इने तो फुरसत के मारे टेम नइयां। औ ईसे बुरई बात जे के इते की लुगाइन खों जो ऊ तरफी से निकरने परत हुइए तो कित्तो बुरौ लगत हुइए? कुल मिला के बा सो अच्छो माहौल ने दिखानों। 
हम सोसन लगे के कछू गांव खों ई गुटखा औ मोबाईल ने का कर डारो। मेनत करबे वारे की जांगा इने ठलुआ बना डारो। ऐसई बुरए माहौल में मोड़ियां औ लुगाइयां खतरा में पर जात आएं। जा सोस के हमाओ मन दुखी होन लगो। इत्ते में कोनऊं हम ओरन की गाड़ी के पांछू से हार्न बजात सुनाई परो। पीछे देखत के शीश में देखो तो मोटरसायकिल वारो दिखानों। ऊके हार्न से भैया जू को दिमाग गरम हो गओ। उन्ने साईड में गाड़ी रोकी औ ऊंसे बोले के तुमें जल्दी आए सो तुमई पैले कढ़ जाओ। हमने देखी के ऊके मोटरसायकिल पे ऊके पांछू लुगाई औ बच्चा सोई बैठे हते। हम भैया जू खों कछू समझा पाउते के इत्ते में बा मोटर सायकिल वारे ने पूछी के आप ओरन खों राजघाट जाने? भैया जू बोले हऔ। सो बा बोलो के तो फेर हमाए पांछू-पांछू आ जाओ, हम सोई ऊ तरफी जा रए। ऊकी जा बात सुन के भैया जू को गुस्सा ठंडो पर गओ। औ हम समझ गए के जा मोटर सायकिल वारो ऊ गुटखा छाप लरकों के इते से हमाई बात सुन के पछांरें आ रओ हुइए। औ हमें रस्ता बताबे के लाने हार्न बजा रओ हतो। 
सो हम ओरन ने ऊपे भरोसा करो औ अपनी गाड़ी ऊकी मोटरसायकिल के पांछू लगा दई। गांव से निकरतई सांत अच्छी रोड मिलन लगी औ हम ओरें ऊके पांछू-पांछू चल परे। सातेक किलोमीटर चलबे के बाद बड़ी रोड दिखानीं। बा मोटरसायकिल वारो रुको औ बोलो के अब आप ओरें बायीं तरफी मुड़ जाओ औ जेई बड़ी रोड पे चल हो तो दसेक किलोमीटर पे राजघाट दिखान लगहे। ऊको दूसरी तरफी जाने रओ सो बा दूसरी तरफी मुड़ गओ। भैया जू ने ऊको धन्यबाद करो। जोन रोड पे हम ओरन खों ऊने पौंचाओ रओ बा सागर से जैसीनगर वारी रोड हती। ऊपे पौंच के हम ओरन खों रस्ता याद आ गओ। काए से के ऊ रोड पे चल के हम ओरें पैले एक बेर सिलवानी गांव लौं गए रए। सो, फेर तो साजी रोड पे गाड़ी दौरा दई। रस्ता में एक मंदिर पे रामधुन सोई सुनाई परी। फेर राजघाट दिखान लगो। सो ऐसी रई ऊ दिनां की सैर।
मनों एक बात हमें पता परी के सबरे गंाव एक सी दसा के नईयां। कऊं-कऊं गुटखा औ मोबाईल की हवा कछू ज्यादाई लग गई आए। ऐसे गांवन में मुतके ठलुआ बी आएं जोन ताश पत्ती खेलत बैठे रैत आएं। उते रोड पे चलत लुगाइयां कमई दिखानीं। औ जो ऐसे ठलुआ रोड के लिंगे बैठे होंए तो लुगाइयां निकरें बी तो कैसे? सो हमें गांव को जा दूसरो चेहरा देखबे को मौका सोई मिल गओ। मनो ऐसो माहौल होन नईं चाइए। बाकी हम नईं चात के कछू जने के मारे पूरो गांव को नांव धरो जाए सो हमने गांव को नांव नईं लिखो। बाकी जोन उते के रैबे वारे आएं औ ने तों उते से कढ़े हुइएं सो बे समझ जैहें। बाकी बा मोटर सायकिल वारे घांईं अच्छे लोग अबे बी उते रैत आएं। जोन से गांव की इज्जत बनी रैत आए। जे नोनी बात आए।            
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के गांवन पे सई से ध्यान देबे की जरूरत आए के नईं? औ कछू नईं तो उते गुटखा औ दारू पे लगाम लगाओ चाइए। संगे ठलुआ हरों से कछू काम लओ जाओ चाइए। कओ, सई कई के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Friday, August 28, 2026

बतकाव बिन्ना की | तनक सोचियो के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
तनक सोचियो के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

अपने इते राखी को त्योहार जेई लाने मनाओ जात आए के भैया हरें अपनी बैंनों से राखि बंधवा के उनकी रच्छा को बचन दैवें। भैया हरंे मनों अपनो बचन निभाउत बी आएं। पर का आए के आजकाल बिटियां सुरच्छित ने रै गईं। कछू बुरए आदमियन औ लरकन के मारे। लरका हरों को सोचबो जे चाइए के हरेक मोड़ी कोनऊं ने कोनऊं भैया की बैन होत आए। सो हर मोड़ी की इज्जत करो चाहिए औ ऊकी रच्छा के लाने ठाड़े रैबो चाइए। तनक सोचबे वारी बात आए के जो कोनऊं मोड़ी के साथ कोऊ बदमास गलत काम करे सो बा पूरो परिवार के लाने गलत कहाओ, काए से के बिटियां तो घर की इज्जत मानी जात आएं। सो जबे कोऊ बदमास कोनऊं मोड़ी खों परेसान कर रओ होए तो सो जे सोच के आगे नईं बढ़ने के जे कोन हमाई बैन आए, के जे कोन हमाए परिवार की लुगाई आए? जो ऐसी सोच होए तो राखी को त्योहार मनाए से फायदा काए को? बैन से राखी बंधाई, ऊके पांव परे, नेग के पइसा दए औ हो गओ काम पूरो, मन गओ त्योहार। जे त्योहार ऐसो हल्को नोंई। ईको मनाए को मतलब भूलो नईं चाइए। तनक सोचो के मुगलों को राजा हुमायूं जोन के लाने राखी बंधाए को कोनऊ मतलब ने हतो, ऊने बी राखी को मान राखो औ जोन को बैन मानो, ऊकी रच्छा करबे को दौर परो तो। चलो जोन को जा किसां पतो नईयां उनके लाने बताए दे रई।
जे बात आए सन 1535 की। जे सांची किसां आए काए से ईके बारे में राजस्थान को इतिहास लिखबे वारे कर्नल टाड ने औ इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा जू ने सोई अपनी किताबन में लिखो आए। का भओ के महाराज राणा संागा के मारे जाबे के बाद उनकी महारानी करणावती जू ने राजकाज को भार सम्हारो। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने देखो के रानी सो अकेली पर गई आएं सो ऊने हमला कर दओ। खींब लड़ाई भईं। मनो जबे रानी खों लगो के अब कोनऊं से सहायता मांगने परहे तो उन्ने बादशाह हुमायूं को राखी के संगे चिट्ठी भेजी के आओ औ अपनी ई बैन औ ऊके राज की रच्छा करो। हुमायूं खों जैसी जा चिट्ठी मिली बा निकर परो अपनी बैन करणावती जू की रच्छा के लाने। मनो ऊ टेम पे कोनऊं हवाई जहाज तो हतो नईं, सो सेना संगे मेवाड़ पौंचबे में ऊको देरी हो गई। उते सुल्तान बहादुर शाह मेवाड़ के महलन में घुस परो। रानी करणावती ने देखी के अब लड़े से कछू हात ने लगहे सो उन्ने सैंकड़ां खांड़ राजपूती लुगाइयन के संगे आगी में कूंद के जौहर कर लओ। उन्ने अपनी जान दे दई, मनो आन ने दई। जा खबर जबे हुमायूं लौं पौंची तो ऊको भौतई दुख पौंचो। ऊने मेवाड़ पे कब्जा करे बैठे सुल्तान बहादुर शाह पे चढ़ाई कर दई औ ऊंसे मेवाड़ छीन के बैन रानी करणावती दोई बेटों खों सौंप दओ। आगे चल के हुमायूं को बेटा अकबर सोई राखी को त्योहार मनवाऊत रओ।
जा किसां याद राखबे की जरूरत आए जीसें हमें ग्यान रए के एक मुगल बादशाह ने राखी को मान रखो सो हमाए लरका आजकाल राखी को मान काए नईं राख सकत? औ जो नईं मान राख पा रए उने मान राखबो सिखाओ चाइए। कोनऊं खो हक नोंई के कोऊ की बैन के संगे बदसलूकी कर सके। चाए कोऊ प्रेमिका होए, चाए घरवारी होए, चाए रोड पे जा रई लुगाई होए बे ओरें बी कोनऊं ने कोनऊं की बैन होत आएं। उनकी रच्छा करबो बी सबको धरम आए। फेर बा लुगाई चाए कोनऊं जात धरम की काए ने होए। राखी को त्योहार जोई तो सिखात आए। 
राखी हमाओ कोनऊं नओ त्योहार नोंई। ईके बारे में पुराणों में किसां मिलत आए। पैले राखी रच्छा के लाने बांधी जात रई वा बी खाली लुगाइयन की नोंई देवता हरों की रच्छा के लाने बी। ‘‘भविष्य पुराण’’ में लिखो आए के देवों औ राच्छसों के बीच भौतई जम के लड़ाई भई। इत्ती भैंकर के 12 बरस लौं चली। इन्द्र देव जू राच्छसों से खींबईं टक्कर लेत रए मनो एक समै ऐसो आओ के लगो के अब इन्द्र देव जू हार जाहें। उनकी हार मनों सबई देवों की हार। सो इन्द्रणी ने सोची के कछू उपाय करो चाइए। उन्ने तीनों लोकों की सक्तियों खों याद करो औ एक राखी बनाई। ऊ राखी में तीनों लोकों की सक्तियां डार के इन्द्र देव के हात में बांध दई। ईके बाद इन्द्र देव औ सबरे देवता राच्छसों ने लड़े औ जीत गए। कई जात आए के तभईं से रच्छा के लाने रक्ष्छा को धागा मने राखी बांधी जान लगी। 
‘‘विष्णु पुराण’’ में सोई एक किसां मिलत आए के विष्णु जू ने वामन को रूप धर के राजा बलि से तीन लोक नप्प के ले लए रए। मगर बदले में राजा बलि ने कई रई के आपको जो चाउंने आप ले लेओ, मनो ईके बाद आपको हमाए महल में रैने परहे। भगवान विष्णु ने राजा बलि की कई मान लई हती। पर जबे विष्णु जू छीर सागर ने लौटे तो लक्ष्मी जू परेसान हो उठीं। उन्ने विष्णु जू के पास खबर भिजाई के अब लौट आओ, मनो बचन तो बचन ठैरो, विष्णु भगवान ने लौटबे से मना कर दओ। उनके ने लौटने से शेषनाग सोई दुखी हो गओ। छीरसागर के सबरे पिरानी दुखी हो गए। तब लक्ष्मी जू ने जुगत लगाई औ बे राजा बलि के पास राखी ले के पौंची। राजा बलि जा देख के भौतई खुस भओ। खुद लक्ष्मी जू उनके लिंगे राखी बांधवे खों आई हतीं, ईसे बढ़ के नोंनी का बात हो सकत्ती? ऊने खुसी-खुसी राखी बंधाई औ हीरा-मोती देन लगो। तब लक्ष्मी जू बोलीं के, ‘‘नईं भैया, हमें जे हीरा-मोती नईं चाऊने। जो तुम हमें राखी को नेंग देओ चात आओ तो हमाओ पति हमें नेग में लौटा देओ।’’
राजा बलि बचन को पक्को हतो। ऊने मना ने करी, तुरतईं विष्णु भगवान से कई के आप हमाई बैन के संगे जा सकत हो, अब हम आपको ने रोकबी। सो, ई तरां से लक्ष्मी जू ने राजा बलि खों राखी बांध के ऊके बचन से विष्णु जू खों छुड़ाओ रओ। 
एक औ किसां आए जीके बारे में सबई जानत आएं। जा किसां ‘महाभारत’ की आए। का भओ के एक बेर राजसूय यज्ञ के टेम पे किसन भगवान की उंगरियां उनईं के सुदरसन चक्र से कट गई। मुतको खून बहन लगो। जा देख के उतई ठांड़ीं द्रौपदी ने तुरतईं अपनी चुन्नी फाड़ी औ ऊकी पट्टी बना के किसन भगवान की उंगरिया में बांध दई। खून बहनों बंद हो गओ। जा देख के किसन भगवान ने द्रौपदी से कई के ‘‘तुमने अपनी चुन्नी की पट्टी से हमाओ खून बहनों बंद कर के हमाई जान की रच्छा करी आए सो ईके बदले जो कछू तुमें हमसे मांगने होए सो मांग लेओ।’’
‘‘हमें अबे कछू नईं चाउनें, जबे चाउने हुइए सो मांग लेबी।’’ कै के द्रौपदी ने कछू बी लेबे से मना कर दओ। ईपे किसन भगवान ने कई के ‘‘तुमाई जे रच्छा की पट्टी हम पे करज रई, जबे तुमें कछू बी मांगने होए सो मांग लइयो।’’
भौत दिनां बाद जब द्रौपदी पे संकट आओ। दुस्सासन भरे दरबार में ऊको चीरहरन करन लगो तब द्रौपदी ने किसन भगवान खों पुकारो औ बोई बचन उनको याद दिलाओ के आज हमाई इज्जत की रच्छा करबे की जरूरत आए। आप आओ औ अपनों बचन निभाओ। सबई जानत आएं के किसन भगवान दरबार में ऐसे पौंचे के द्रौपदी खों तो दिखाने मगर औ कोऊ उनें ने देख पा रओ तो। उन्ने द्रौपदी की धुतिया इत्ती बढ़ा दई के दुस्सासन खेंचत-खेंचत थक के गिर परो, मनों धुतिया उतार ने पाओ। जो हतो राखी के बचन को चमत्कार।
सो, राखी के बारे में जबे सोचियो सो ऊकी असली महत्ता समझियो। राखी को मतलब अकेलो जो नईं होत के राखी बंधाई, मिठाई खाई औ बदले में कछू रुपैया, नें तो गिफ्ट दओ औ मन गई राखी। राखी कोनऊं सौदा नोंई। ईमें रच्छा की भावना होनी चाइए। लुगाइन के लाने इज्जत औ सम्मान से बड़ो कोनऊं गिफ्ट नईं होत, जे छुड्डा में बांध के राखबे की बात आए। 
ऐई संगे बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के राखी बंधाबे को असल मतलब का आए।   
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, August 20, 2026

बतकाव बिन्ना की | काकरोच सोई तभईं होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
काकरोच सोई तभईं होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


भैयाजी के इते तो मनो गदर मची हती। भैयाजी हाथ में दवा छिरकवे को स्प्रे लए हते और भौजी अपने हाथ में चप्पल ले के ठाड़ी हतीं।
‘‘जो का हो रओ भैयाजी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, घरे मुतके काकरोच हो गए। जिते देखो उतई से मूंड़ निकार के झांकन लगत आएं।’’ भैयाजी दरवाज़ा की दरार में दवा छिरकत भए बोले। इत्तई में बा दरार से एक काकरोच बिलबिलात भओ बायरे निकरो। भौजी पे आव देखी ने ताव औ अपनी हाथ में लई चप्पल से चटाक दीनां ऊं काकरोच खों दे मारो। बा बिचारो उतई चपट गओ। हो गओ ऊको नाम नाम सत्त!
‘‘जो का करो भौजी? ऐसे काए मार दओ ऊको?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘काए ने मारो जाए? जे बिमारियन की जड़ आएं।’’ भौजी अपनी सफलता पे मुस्कुरात भईं बोलीं।
‘‘बा तो ठीक आए, पर भैयाजी तो सोई दवा छिरक रए। दवा से ई तो बा मर जातो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे जा कओ के हमने ऊको झट्टई मुक्ति दोआ दई, ने तो कछू देर तो बा छटपटात रैतो।’’ भौजी मुस्कात भईं बोलीं।
‘‘मनो भौजी आपकी जा हरकत कऊं काकरोच पार्टी वारन खों पता पर गई तो बे भौतई नाराज हुइएं।’’ मैंने भौजी को तनक डराओ।
‘‘बे काए खों नाराज हुइएं? हमने तो असली काकरोच मारो, बे तो नकली वारे ठैरे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अब चाए नकली होंए औ चाए असली, पर नांव तो धरे आएं काकरोच पार्टी। बा बी राजनीति वारी पार्टी। औ जां राजनीति घुसी उते दोंदरा मचत देर नई लगत। कओ कोऊ आपको ट््रोल करन लगे।’’ मैंने कई।
‘‘सो नांव धरे से का हुइए? का बे असली वारे काकरोच हो जैहैं का?’’ भौजी निष्फिकर भाव से बोलीं।
‘‘फेर बी!’’ मैंने कई।
‘‘फेर बी का? जे ठैरे घिनऊं से कीरा औ बा ठैरे आजकाल के ज्वान। उने जो पुसाओ बा उन्ने नांव धर लओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो उनें कोऊ पसंद नई कर रओ।’’ मैंने कई।
‘‘ने करे, ऊसे का हुइए? उने जोन करने सो करहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘उते जंतर-मंतर में नईं देखो रओ का के बा काकरोच वारन ने कैसी दोंदरा मचाई हती?’’ अब के भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘काए नईं देखी? जोन टीवी वारन ने ने दिखाई बा बी सोसल मीडिया वारन ने दिखा दई रई। औ सई कई जाए तो उन ओरन से जेन जी वारों खों दम मिलत रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जे बात! जेई तो हम कए रए के बे ओरें ज्वान ठैरे। औ उन्ने नांव ऊंसई नईं धरो रओ, बा का आए के हमने कऊं पढ़ो रओ के कोऊ सयानपत्ती वारे ने बेरोजगारन खों काकरोच कए दओ रओ। बस, ओई से इन ओरन खों सूझी औ इन्ने काकरोच पार्टी नांव धर लओ।’’ भौजी बोलीं।
मोए भौजी की नालेज पे बड़ो प्राउड फील भओ।
‘‘भौजी, आप तो बड़ी अपडेट होत जा रईं।’’मैंने भौजी की तारीफ करी।
‘‘बा जो कंगना घांईं लुगाइयां भक्ति दिखाने के लाने बात बेबात फुदक रईं तो हम ओरन खों तो अपडेट भओ ई चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘उनकी फुदकवे की ने कओ भौजी, बे अपनी माननीय सांसद आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सो का, ईसे का हो गओ? उने तो एकई जने दिखा रओ। काए से बोई एक ठो खों गरिया-गरिया के अपनी भक्ति दिखाई जा सकत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘तुम ओरें बी, कां की राजनीति की बतकाव ले बैठीं? अपन ओरन के बतकाव करे से कछू नईं भओ जा रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ने होए, का कछू होए जेई के लाने बतकाव करी जात आए?’’ भौजी भैयाजी से बोलीं। उने भैयाजी को ऐसो कैबो ने पुसाओ।
‘‘अब तुम काए काकरोच बनी जा रईं? तनक गम्म खाओ।’’ भैयाजी भौजी से बोले।
‘‘हम काए खों काकरोच बनहें? जो हमें कछू बनने हुइए तो हम जेन-जी बनहें, नें तो अल्फा-जी बनहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ई उम्मर में जेन-जी?’’ भैयाजी भौजी को मजाक उड़ात भए बोले।
‘‘काए? जेन-जी खों आप उम्मर से जेई लाने जोर रए के बे सबरे पढ़ाई की उमर वारे मोड़ा-मोड़ी आएं। पर आप जे ने भूलो के उनके संगे उनके मताई-बाप सोई उते पौंच गए रए। सो का हम उने सपोर्ट कर के जेन-जी नईं कहा सकत?’’ भौजी बोलीं।
भौजी के जे तेवर देख के मोए भारी अचरज भओ। काए से के जंतर-मंतर को मामलो निपटे तो अब मुतको टेम हो गओ। मनो ऐसो लग रओ हतो के भौजी पे ऊको गहरो असर परो। तभईं तो बे जेन-जी होबे की बात कर रईं।
‘‘भौजी, मोए आप जेन-जी से कछू ज्यादई प्रभावित दिखा रईं। मोए नईं पतो रओ के उनको आप पे इत्तो गहरो असर परहे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘काए हमाए पे परो असर भर तुम ओरन खों दिखा रओ औ उन ओरन पे परो असर नईं दिखा रओ जोन पैले गरियात फिरे औ फेर जेन-जी के जीततई साथ उने काकरोच से अलग बोल के उनकी जयकारे करत फिर रए।’’ भौजी तुरतईं बोलीं।
‘‘बात तो आप सई कए रईं भौजी! मोए का, खुद जेन-जी वारों को पतो ने रओ हुइए के एक दिनां उनईं खों तरीफ की जयमाल पहनाई जान लगहे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई तो राजनीति आए बिन्ना! राजनीति की थारी में गोल वारे भटईं-भटा रैत आएं। तनक में इते लुढ़के, तनक में उते लुढ़के। औ जोन लुढ़वो जानत आए बोई सफल रैत आए।’’ अब की भैयाजी मोसे बोले।
‘‘सई में भैयाजी, अपन ओरन खों लुढ़कवो ने आओ।’’ मैंने तनक दुखी होत भए कई।
‘‘अपन पब्लिक आएं बिन्ना! पैले तो अपन लुढ़कवो कभऊं सीख नईं सकत, औ दूसरो के जो सीख बी लें तो कां लुढ़कहें? अपन खों तो कोऊ तरफी जाओ कटनेई परहे।’’ भैयाजी ने बड़ो गंभीर उत्तर दओ।
‘‘ठीक कै रए भैयाजी! पर एक बात तो समझबे वारी आए के जे जो काकरोच वारे आएं उन्ने बड़ो सोच के जे नांव धरो। काए से काकरोच सोई तभई होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए। राजनीति में काकरोच के पनपबे से समझ जाओ चाइए के ब्यवस्था में भौतई गंदगी मच गई आए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना! ने पेपर लीक होतो औ ने काकरोच वारे मूंड उठाउते। बे तो मनो जताओ चात आएं के जो आप हमें नईं देखो चात हो तो जा ब्यवस्था की गंदगी साफ कर लेओ।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘सई कई भौजी! ब्यवस्था में तो कुल्ल गदर मची आए। कऊं फोकट के पइसा बांटे जा रए तो कऊं एकई चीज पे चार दार टैक्स ले के खून चूसो जा रओ। ऊपे बी अपने एमपी में तो चाए डीजल-पेट््रोल होए, चाए चूला की गैस, दूसरे प्रदेसों से ज्यादई रैत आए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई लाने तो अपने एमपी के लाने स्लोगन बनाओ गओ रओ के -‘एमपी अजब है,गजब है’। बा स्लोगन बनाबे वारो भौतई बुद्धिमान रओ। भले ऊने पयग्टन के लाने जे लिखो, मनो होत सबरी दसा पे फिट आए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
इत्ते में एक काकरोच औ दरार से निकर आओ औ भौजी ने ऊको बी अपनी चप्पल से तिया-पांचा कर दओ।
सो, बे ओरे हो गए असली वारे काकरोच मारबे में बिजी औ मैंने अपनी दुकान उते से बढ़ा लई ने तो बा स्प्रे की बदबू से मोरो मूंड़ चकरान लगतो। 
ऐई साथ बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के जो ब्यवस्था सुदर जाए तो काकरोच घांईं पार्टी रए पाहें? पर ईके पैले जे साई सोचने परहे के का सच्ची में ब्यवस्था सुदर पाहे?   
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, August 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      अपने बुंदेलखंड में भौतई पैले से साहित्त रचो जा रओ। इते की कवित्त किसाओं की सो बातई कछू औ ठैरी। इनें सुन के, पढ़ के बांहें फड़कन लगत आएं। इमें बहादुरी की बात जो होत आए। बुंदेला ऊंसई अपनी बहादुरी के लाने जाने जाऊत रहे। बे न मुगलों से डराने औ ने अंग्रेजन से। दोई खों छठी को दूद याद करा दओ रओ। जे ई कोई 12 मीं सताब्दी से 20 मीं सताब्दी लौं खास-खास तीन तरां के बहादुरी के साहित्त रचे गए। जोन में पैलो हतो रासो, दूसरो, कटक औ तीसरो राछरे। बाकी जे तीनोईं मों जबानी गाए जात्ते। बा तो बाद में कछू बिद्वान जनों ने इनखों इकट्ठो के, छपा के इतिहास घांईं पक्को कर दओ। मने लिखे में ले आए। ने तो पैले जे खाली गाए जात्ते। औ जे सोचो के जोन इनको सुनत्तो, ऊको जे याद रै जात्ते औ फेर बा याद रखे वारे गाऊत्ते। जीको साहित्त की भासा में ‘‘वाचिक परम्परा’’ कओ जात आए। माने मों बोले की परम्परा।  
  
बुंदेली की बहादुरी की कवित्त किसां में सबसे फेमस रई जगनिक को लिखों गओ ‘‘आल्हाखंड’’। आज बी ईको बड़े मन से गाओ जात आए। जोन जगनिक ने ‘‘आल्हाखंड’’ लिखो उनईं ने ‘‘विजयपाल रासो’’ सोई लिखो। ‘‘विजयपाल रासो में राजा विजयपाल राठौर के शिकार पे जाबे की किसां आए। होत का आए के राजा विजयपाल राठौर शिकार पे जात आएं औ उते उनें राजा पृथ्वीराज के सैनिक टकरा जात आएं। दोई में भिड़ परत आएं। पृथ्वीराज जा खबर पा के खोखियां जात आए औ कन्नौज पे हमला बोल देत आए। ऊ टेम पे जगनिक जू दोई राजा में सुलह कराबे की कोसिस करत आएं। रासो तो मानों कई ठों लिखी गईं। एक आए ‘वीर सहदेव चरित’। ईको कवि केशवदास ने लिखो रओ। रासो की जेई परंपरा में जोगीदास भांडेरी को ‘दलपत राव रासो’, लाल कवि को ‘छत्र प्रकाश’, कवि सबसुख को ‘‘भगवंत सिंह रासो’’, गुलाब चतुर्वेदी को ‘करहिया का रासो’, श्रीधर को ‘पारीछत रासो’ औ आनंद सिंह कुड़रा को ‘बाघाट रासो’ गिनाएं जा सकत आएं। 
बहादुरी की कबित्त किसां मने कटक गाथाएं सोई रासो एवं राछरे  घांई आएं। इनमें सोई राजा-महाराजा की बहासदुरी की किसां कही गईं। पन्ना के महाराज छत्रसाल के समै पे एक कवि भए जिनको नांव रओ कवि दान। उन्ने जो छत्रसाल जू की बड़वारी में बहादुरी को जो कवित्त रखे आए ऊको नांव आए ‘‘छत्रसाल जू देव कौ कटक बंध’’। ई कटक में महाराज छत्रसाल औ मोहम्मद खान के बीच भए जुद्ध को पूरो विवरन आए। ईमें महाराजा छत्रसाल औ बुंदेली सैनिकों की बहादुरी को बखान करो गओ आए। दतिया के बिद्वान स्व. बाबूलाल गोस्वामी जू ने ‘छत्रसाल जूदेव कटक बंध’ को संपादन करो औ 1992 में भानु प्रिंटर्स दतिया से इको छपाओ।

भग्गी दाऊजू श्याम ने सोई कटक लिखो। साल 1900 में भग्गी दाऊ ने ‘झांसी कौ कटक’ लिखी। ईको 1969 में डॉ. भगवान दास महौर जू ने ‘लक्ष्मी बाई रासो’ के संगे ईको छपाओ। भग्गी दाऊजू श्याम झांसी के जनकवि कहाऊत्ते। उन्ने 1857 की लड़ाई सोई लड़ी रई। जेई से उन्ने ‘झांसी कौ कटक’ में रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के गुन गाए। बाकी अपने बुंदेलखंड में 1857 से पैले बी अंग्रेजन को तगड़ो विरोध करो गओ रओ। ईको प्रमान ‘‘पारीछत कौ कटक’’ में मिलत आए। ई कटक में जैतपुर के महाराज पारीछत औ अंग्रेजों के बीच भओ जुद्ध को ब्यौरा दऔ गऔ आए। जा जुद्ध 1841 में भओ रओ। बेरमा नदी के किनारे बिलगांव में महाराज पारीछत ने अंग्रेजन खों से जुद्ध कर के उनको मजा चखा दओ रओ। जे बात औ आए के कछू जनों की गद्दारी के मारे राजा पारीछत जीत ने पाए औ पकर के जेल में डार दए गए। उनें बंदी बना के कानपुर की जेल में रखो गओ जां 1853 में उनें फांसी दे दई गई। जो मानो जात आए के ‘पारीछत कौ कटक’ कवि बृजकिशोर ने लिखो रओ। तनक ईकी कछू लकीरें देखो-
कर कूंच जैतपुर से बगौरा में मेले।
चौगान पकर गये मन्त्र अच्छौ खेले।।
बकसीस भई ज्वानन खाँ पगड़ी सेले।
सब राजा दगा दै गये नृप लड़े अकेले।।
कर कुमुक जैतपुर पै चढ़ आऔ फिरंगी।
हुसयार रहो राजा दुनियाँ है दुरंगी।।
जब आन परी सिर पै कोऊ न भऔ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।
एक कोद अर्जन्ट गऔ, एकवोर जन्डैल।
डांग बगोरा की घनी, भागत मिलै न गैल।।

भैरोंलाल को लिखो ‘भिलसांय कौ कटक’ में बघेल राजा ठाकुर रणमत सिंह औ अंग्रेजों के मध्य पुटरा नांव की जांगा 1857 में भए जुद्ध को हाल लिखो गओ आए। ऊ टेम पे, मने 1857 में ठा. रणमत सिंह की रीवा जागीर पन्ना रियासत में आत्ती। रणमत सिंह बघेल क्षत्रिय हते। मनों कोनऊं के लगाई-बुझाई से पन्ना औ रीवा रियासतन में इन गई। सन् 1850 में दोनों रियासतें लड़बे खों ठाड़ी हो गईं मनो अंगरेजन के कारन लड़ाई टल गई। ईके बाद रणमत सिंह जू जागीर छोड़कर अपने कुछ साथियों के संगे सागर आ गए। जां वे अंग्रेजी सेना में भरती हो के लेफ्टिनेंट हो गए। कछू दिनां बाद उने परमोशन पे नौगांव भेज दओ गओ। जां उने केप्टन के बना दओ गओ। तभईं 1857 की लड़ाई छिड़ गई। अंगरेजन ने उने आदेस दओ के बे बुंदेला क्रांतिकारी बख्तबली औ मर्दन सिंह खों पकड़बे को काम करें। मनों रणमत सिंह जू ने ऐसो कछू ने करो औ उन ओरन खों पकरबे के लाने यां-वां भगत फिरबे को ढोंग करत रए। मगर जे बात कां लौं छिपती, सो रणमत सिंह जू औ उनके सिपाइयों को बर्खास्त कर कर दओ गओ। संगे उनकी गिरफ्तारी को आदेश जारी कर दओ गओ। अंग्रेज फौज में रैते भए रणमत सिंह जू ने जेई कोई 300 लोगों की अपनी एक टुकड़ी बना लई रई। सो जब बे ओरे सेना से निकारे गए सो उन सबई ने खुल के बुंदेलन को साथ दओ। मगर अपने इते तो जित्ती बहादुरी की किसां आएं उत्तई धोखा की किसां मिलत आए। मे राणमत सिंह जू खों सोई धोखे से बंदी बना के बांदा जेल भेज दओ गओ। जां उनें 1 अगस्त 1859 को फांसी दे दी गई। जे पूरी किसां ‘‘भिलसांय कौ कटक’ में मिलत आए। 

बुंदेलखंड की कटक खों नओ मंच देबे के लाने 2013 में बॉलीवुड के हीरो औ नाटकों के निरदेशक गोविंद नामदेव जू ने एनएसडी, अथग औ सागर विश्वविद्यालय के संगे मिल के एक वर्कशाप करो। ऊके बाद गोविंद नामदेव जू के डायरेक्सन में, 30 दिसंबर 2013 को लगातार तीन दिनां को मंचन करो। ई कटक में बुंदेला वीर मधुकर शाह बुंदेला की की बीरता को बखान आए। ललितपुर जिला के नाराहट में पैदा भए बुंदेला वीर मधुकर शाह जू ने अंगरेजन के बिरुद्ध बुन्देला विद्रोह छेड़ दओ रओ। बे खूब लड़े। मनों मधुकर शाह खों सोई सोऊत में धोके से पकरवा दओ गओ। उने सागर की बड़ी जेल में रखो गऔ औ ऊतई फांसी दे दी गई। ऊ टेम बे केवल 21 बरस के रए। 

ऐसे बीरन के बारे में लिखो गओ आए कटक। सो इनखों जरूर पढ़ो जाओ चाइए। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास कित्तो गजब को आए, बो चाए बहादुरी को होए चाए कटक घांईं साहित्त को होए। सो अपनों जै बुंदेलखंड!!    
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Thursday, July 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
प्रेमचंद जू ने सोई लिखी बुंदेलखंड की दो किसां
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

किसां के ‘‘सम्राट‘‘ कहाबे वारे प्रेमचंद जू को जनम जेई जुलाई मईना में 31 तारीख को 1880 में भओ रओ। उनको असली नांव धनपत राय हतो। उन्ने पैले नवाब राय के नांव से उर्दू में लिखो। काए से के ऊ टेम पे उर्दू ज्यादा चलत्ती। बे ओई नांव से लिखत रैते मनो एक सल्ल बींध गई। भओ का के उन्ने एक किताब लिखी जीको नांव हतो ‘‘सोजे वतन’’। बा 1909 में कानपुर के जमाना प्रेस से छपी रई। कोनऊं ने अंग्रेजन से कै दई के ‘‘सोजे वतन’’ में तो उनके खिलाफ लिखो गओ आए। फेर का हतो, ‘‘सोजे वतन’’ की कापियां जब्त कर ली गईं। जा दसा देख के ‘‘जमाना’’ अखबार के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने धनपतराय खों सलाय दई के उने अब नवाबराय के नांव की जांगा प्रेमचंद के नांव से लिखो चाइए। तभईं से धनपतराय प्रेमचंद के नांव से लिखन लगे। हम सबई जानत आएं के प्रेमचंद जू ने भौतई नोंनो साहित्य रचो। उन्ने किसानों की दसा पे किसां लिखीं। मजदूरन की दसा पे कलम चलाई औ लुगाइयन औ बच्चों पे भी किसांएं लिखीं, जैसे ‘‘बड़े घर की बेटी’’, ‘‘बूढ़ी काकी’’ औ ‘‘ईदगाह’’। प्रेमचंद जू ने फिल्मों के लाने भी लिखो मनो उने ई समाज के कमजोर लोगन पे लिखबो अच्छो लगत्तो। काए से के कमजोर लोगन पे भौतई कम लिखो जा रओ हतो। प्रेमचंद खों लगत्तो के बे चाए धन से कमजोर होंए, चाए जात से, चाए लुगाई होबे के कारन कमजोर होंए, उनके बारे में लिखो जाओ चाइए, जीसें समाज के सोच में तनक बदलाव आए।
खास बात जे सोई आए के प्रेमचंद जू खों बुंदेलखंड को इतिहास औ इते के रीत-रिवाज भौतई नोंने लगत्ते। जेई से उन्ने दो किसां बुंदेलखंड पे लिखीं। ईमें एक रई ‘‘राजा हरदौल’’ औ दूसरी ‘‘रानी सारंध्रा’’।  

‘‘राजा हरदौल’’ की किसां बुंदेलखंड में खींबई कई-सुनी जात आए। जा किसां ओरछा के राजा जुझार सिंह की आए। जुझार सिंह राजा भले हते, मनों हते बे पूरे सक्की-झक्की। औ संगे कान के कच्चे। उनके लोहरे भैया हते हरदौल जू। अब दोई से जलबे वारन की का कई जाए? कोनऊं ने एक दार जुझार सिंह खों पट्टी पढ़ा दई के आप तो राजकाज में उरझे रैत आओ औ उते तुमाओ लोहरो भैया हरदौल अपनी भौजी संगे नैन मट्क्का कर रैत आए। अकल को अंधरा राजा ने इत्तो ने सोचो के जोन भैया अपनी भौजी खों मताई घांई पूजत आए बा उनके संगे नैन मटक्का कैसे करहे? मनो संका को बीजा मन में परो नईं के देखत-देखत ऊकी बेल लहलहान लगत आए। जेई भओ राजा जुझार सिंह के संगे। ऐ बेर बे क ऊं लड़बे खों गए। उते से लड़ाई जीत के लौटे के कोनऊं ने फेर के उनके कान भर दए। ऊपर से जे औ पेल दऔ के जो लौं लाला हरदौल रैहें तब लौं जे अत्तें चलत रैहें। जुझार सिंह सो हतोई संका को मारो, सो ऊने अपनी रानी खों बुलाओ औ उनसे कई के अपने हाथन से लाला हरदौल के लाने खीर पकाओ। औ जो तुमाए दिल में खोट ने होए तो ऊ खीर में जहर मिला के अपने हाथन से हरदौल खों खवा देओ। जा सुन के रानी रोन लगी औ कैन लगी के ‘‘आपखों लाज नईं आ रई ऐसो कैए में? अरे, लाला हरदौल हमाओ बेटा घांईं आए। आप एक मताई से कै रए के अपने बेटा खों जहर खवा देओ, कछू होस बी आए आपखों?’’ मनो संका को अंधरो राजा अपनी रानी की कां सुनता? ऊने कई के यां तो तुम हरदौल खों जहर खवाओ ने तो हम तुमें छोड़ रए। फेर तुमाई मुतकी बदनामी हुइए। रानी रोन लगीं। ऊके भीतर मातई को कलेजा दुखन लगो। जा बात हरदौल खों पता परी तो उन्ने रानी खों समझाओ के जे मां-बेटा की मर्जादा को सवाल आए सो आप खुसी-खुसी हमें जहर वारी खीर खवा देओ। फेर जेई भओ के रानी को अपने करेजा पे फथरा रख के अपने बेटा घांई हरदौल खों जहर खवाने परो। जे बी कओ जात आए के हरदौल जू खों पान में जहर मिला के खवाओ गओ रओ। सो प्रेमचंद जू ने जेई किसां लिखी आए के हरदौल जू खों पान में जहर दओ गओ रओ। हरदौल जू तो ने रए, मनो बे मर के बी अमर हो गए। उतई राजा जुझार सिंह खों इज्जत ने मिली। उने संकालू आदमियन में गिनो जात आए। जबके उतई रानी की बी तारीफ करी जात आए।

दूसरी किसां आंए ‘‘रानी सारंध्रा’’। जे सोई अपने बुंदेलखंड पे आए। रानी  सारंध्रा ओरछा के राजा चम्पत राय की रानी औ महाराज छत्रसाल की मताई हतीं। ई किसां में प्रेमचंद जू ने राजा चम्पत राय की खींबईं प्रसन्सा करी आए। उनसे मुगल हरें डरात्ते। बे मुगलों की सेना खों धूरा चटा देत्ते। ऊंसई बीर रईं उनकी रानी सारंध्रा। बे अपने दपति औ बेटों खों युद्ध के लाने भेजत समै अपनी आंखन में अंसुवां ने आन देत्ती। बे उन ओरन को तिलक करतीं औ तलवार देके बिदा करतीं। संगे कैत्तीं के ‘‘अब बुंदेलन की लाज तुम ओरने के हाथन में आए। प्रान जाए मनो लाज ने जाने दइयो।’’ जा बात प्रेमचंद जू ने बी लिखी आए। बे रानी सारंध्रा के चरित्तर से खींबई प्रभावित रए। औ होते काए नईं, आखिर रानी सारंध्रा ने अपने बालक छत्रसाल को ऐसो लालन-पालन करो रओ के आगे चल के छत्रसाल ने केवल राजा बने, बाकी उन्ने बुंदेलखंड राज्य बना डारो। उन्ने सोई मुगलन के दांत खट्टे कर दए रए।

सो प्रेमचंद जू ने बुंदेलखंड के इतिहास से उन लोगन पे किसां लिखी जोन से बुंदेलन को सिर ऊंचो होत आए। मने जां एक तरफी प्रेमचंद जू ने दुखियारे, सोषन के शिकार औ कमजोरन पे किसां लिखीं उतईं बुंदेलखंड के गौरव औ बीरन पे बी किसां लिखी। जे अपन बुंदेलों के लाने गरब की बात आए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास, ईकी संस्कृति कित्ती नोंनी आए के इत्ते बड़े किसां लिखबे वारे प्रेमचंद जू बी इते की किसां लिखे बिना ने रए सके। मनो उन्ने बी इते की मरजादा खों समझी औ ऊंसई नोंनी किसां लिखीं। सो, आप ओरें सोई जे दोई किसां पढ़ियो जरूर, ईंसे प्रेमचंद जू की लेखनी को औ महत्व समझ में आहे। प्रेमचंद जू के जनमदिन पे उनको याद करत भए सबई खों हमाई जै-जै!!!    
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Wednesday, July 29, 2026

चर्चा प्लस | प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  

प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति 

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

                                      

    प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना।


31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य का ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। प्रेमचंद ने ‘‘नवाबराय’’ के नाम से उर्दू में साहित्य सृजन किया। यह नवाबराय नाम उन्हें अपने चाचा से मिला था जो उनके बचपन में उन्हें लाड़-प्यार में ‘‘नवाबराय’’ कह कर पुकारा करते थे। किन्तु अंग्रेज सरकार के कारण उन्हें अपना लेखकीय नाम ‘‘नवाबराय’’ से बदलकर ‘‘प्रेमचंद’’ करना पड़ा। हुआ यह कि उनकी ’सोज़े वतन’ (1909, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर लीं। उर्दू अखबार “ज़माना“ के संपादक मुंशी दयानरायण निगम ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए ‘‘नबावराय’’ के स्थान पर ’प्रेमचंद’ लिखने लगें। इसके बाद वे ‘‘प्रेमचंद’’ के नाम से लेखनकार्य करने लगे। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।

‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया। जुझार सिंह मुगल शासक शाहजहां के समकालीन थे। वे साहसी थे, वीर थे किन्तु उनकी संदेही प्रवृत्ति उनके इन गुणों को लांछित कर गई। इस वास्तविक घटना का सारांश यह है कि जब जुझार सिंह अपने दक्षिण भारत के अभियान पर गए तब उनका छोटा भाई हरदौल अपनी भाभी रानी कुलीना के साथ राज्य सम्हाल रहा था। दोनों का रिश्ता माता-पुत्र जैसा था। किन्तु कुछ ईर्ष्यालुओं ने जुझार सिंह के वापस आते ही रानी और हरदौल के मध्य अनैतिक संबंधों की चर्चा कर के जुझाार सिंह को भ्रमित कर दिया। संदेही जुझार सिंह अपने भाई और अपनी पत्नी की पवित्रता को नहीं देख सका और उसने अपनी पत्नी रानी कुलीना को आदेश दिया कि वह अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए हरदौर को विष खिला दे। रानी स्तब्ध रह गई। अपने पुत्र समान देवर को जहर देना उसके लिए कठिन था। तब हरदौल ने अपनी भाभी को समझाया की सम्मान से बड़ा जीवन नहीं होता है, वे विष मिला भोजन परोस दें। अंततः रानी के द्वारा विष मिले भोजन को खा कर हरदौल ने अपना बलिदान दे दिया। यह भी कथा है कि जुझार सिंह ने रानी द्वारा भोजन में विष न दे पाने के कारण रानी से ही विष मिला पान का बीड़ा बनवा कर हरदौल को खिला दिया था जिससे हरदौल की मृत्यु हो गई थी। ओरछा में लाला हरदौल की समाधि आज भी मौजूद है और यह परम्परा है कि बुंदेलखंड में विवाह का पहला कार्ड लाला हरदौल का नाम लिख कर उनकी समाधि पर पहुंचाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से लाला हरदौल वधूपक्ष के घर वधू के मामा के रूप में आते हैं और विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होता है।   

प्रेमचंद ने पान में विष मिला कर देने की कथा को अपनी कहानी में पिरोया है। उन्होंने ‘राजा हरदौल’ कहानी इन पंक्तियों से आरम्भ की है, ‘‘बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।’’ 

वे बुंदेलों के चरित्र की विशेषताओं को सामने रखते हुए हरदौल की ओर से यह संवाद लिखते हैं कि ‘खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।’ वहीं जुझार सिंह युद्ध के लिए विदा लेते समय अपनी रानी से कहता है, ‘प्यारी, यह रोने का समय नहीं है। बुंदेलों की स्त्रियां ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।’ इसी कहानी में प्रेमचंद ने एक ऐसी स्त्री के मनोभावों को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो अपने पुत्र, अपने भाई सरीखे देवर को विष देने के लिए विवश की जा रही है- ‘‘ रानी सोचने लगी, क्या हरदौल के प्राण लूं? निर्दोष, सच्चरित्र वीर हरदौल की जान से अपने सतीत्व की परीक्षा दूं? उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूं जो मुझे बहन समझता है? यह पाप किसके सिर पड़ेगा? क्या एक निर्दोष का खून रंग न लाएगा? आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन? नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा। यदि राजा मुझे कुलटा समझते हैं, तो समझें, उन्हें मुझ पर संदेह है, तो हो। मुझसे यह पाप न होगा। राजा को ऐसा संदेह क्यों हुआ? क्या केवल थालों के बदल जाने से? नहीं, अवश्य कोई और बात है। आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया। राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी। क्या आश्चर्य है, हरदौल से कोई अपमान भी हो गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझ पर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदल जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुख कहूं? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।’’

बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारंधा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएं बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं।’ 

‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बंुदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। कहानी के आरंभ में ही वे लिखते हैं-‘‘ अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’’ प्रेमचंद ने बुंदेलखंड की स्त्री के आत्मसम्मान को बखूबी परखा और फिर उसे इन शब्दों में व्यक्त किया-‘‘ वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुन्देलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-बुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’’

प्रेमचंद ने रानी सारंधा की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए इस तथ्य को अपनी कहानी में सुंदर ढंग से पिरोया है कि रानी सारंधा ने राजा चम्पतराय के मन में स्वाभिमान को पुनःजाग्रत किया। उन्होंने लिखा है-‘‘ सारंधा-ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी। यहां मैं एक जागीरदार की चेरी हूं। ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं यहां मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियां बड़े महंगे दामों मोल ली हैं।’’ चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मां-बाप का बालक मां की चर्चा सुन कर रोने लगता है उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गयीं। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारंधा को हृदय से लगा लिया।’’

प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 29.07.2026 को प्रकाशित)  

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Saturday, July 25, 2026

बतकाव बिन्ना की | ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती, सई न! अब आप सोचहो के कोन टेम पे? हम कब की कै रए? ऊ टेम की जब हम बालपन में रए। ऊंसई बी बे ओरें सब जने हमाई बात समझ जैहें जोन के बालपन में मोबाईल औ टीवी ने रओ। ऊ टेम पे बच्चा हरों के मन बैलाओ के दोई तरीका हते। एक तो खेलबे को औ दूसरो किसां सुनबे को। सो, आज बतकाव खेलबे की। का होत्तो के स्कूल से लौट के दिन को उजियारा रैत भर तो हम ओरें खेलत रैत्ते, मनों संझा होतई सात हमें डांट-डपट के घर के भीतरे बुला लओ जात्तो। 
‘‘चलो हात-मों धो लेओ। कपड़ा बदल लेओ औ पढ़बे बैठ जाओ।’’ हम ओरें सबई खों अपने-अपने घरे जेई सुनबे को मिलत्तो। 
अब पढ़बे के लाने तो बैठनेई परत्तो। जो ने बैठते तो मताई चार लपाड़े सूंट देतीं। बाकी हमाई मताई ऐसी ने हतीं औ ने हम ऐसे हते के मताई को कओ ने मानें। सो हमें तो डांट ने घलत्ती, पर हमाए संगी साथियन में लड़का हरों खो जरूर घल जात्ती। ऊंसई बी बिटियां ऐंड़ ने देती हती, ऊ टेम पे तनक बिगरे मोड़ा हरें ई ऐंड़ देत्ते औ मताई-बाप से कुटत्ते। हमाओ बालपन तो सरकारी कालोनी में गुजरो, जिते छै मकान हते। सो हम छैओ मकान के मोड़ा-मोड़ी संगे खेलत्ते। ऊ टेम पे हम ओरों में कोऊ खों जे ने सूझत्तो के जे मोड़ा आएं औ जे मोड़ियां आएं। हम सबरे बच्चा एक संगे खेलत्ते। जेई से हम गुल्ली-डंडा, कंचा, काना-दुआ, लुका-छिपी, खिपड़ी गद्दा, कबड्डी, खो-खो, नदी-पहार, पुतरा-पुतरियां बगैरा, मने मोड़ा औ मोड़ियन दोई को खेल खेलत्ते। बा तो बाद में जब मोड़ा हरें तनक बड़े भए तो उनें किरकेट में मन लगन लगो औ हम मोड़ियां खिपड़ी गद्दा खेलत रईं। बाकी हमने किरकेट बी खेलो। पर ज्यादा नोंईं। काए से के मताई को डर हतो के कई हम अपनों मूंड़ ने फुड़वा लें। बाकी तनक बड़े होबे पे हमने सायकिल खूब चलाई।
लेकन हम बात कर रए हते बालपन के खेल की। औ जे हमें ईंसे याद आ रए के जबे पानी बरसत्तो औ हम सबई घर पे होत्ते तो कभऊं काना-दुआ खेलत्ते, तो कभऊं चपेटा खेलत्ते। ऊ टेम पे जा कैरम-फैरम बी सबके घरे ने होत्ते। काना-दुआ घांई एक-दो गेम औ होत्ते। एक में तो गुना को आकार की लकीरें खेंची जात्तीं औ ऊमें आड़ी लकीरें सोई भरी जात्तीं। लकीरन के हर जोड़ पे गोटियां धरी जात्तीं। इमली के बीजा की चइयां से गोटिया चलाई जात्तीं। जो वारो गेम बे ओरें बी खेलत्ते जोन गइयां-बुकरियां चराबे के लाने हारे जात्ते। ई गेम को हम नांव भूल रए। जो कोनऊं खों याद आए सो हमें बताइयो। 
चपेटा खेलबे के लाने लाख के बने रंग-गिरंगा चपेटा उंगरियन से तौल-तौल के लए जात्ते। भारी चपेटा अच्छे माने जात्ते। मनों बे कभऊं जो उल्टे हात पे गिरत्ते तो उंगरियां ठन्ना जात्तीं। सो, मोए हरये चपेटा नोंने लगत्ते। घरे भीतरे बैठ के सांप-सीढ़ी खेलबे में बी खूबई मजो आउत्तो। मनो ऊ टेप पे मूंड़ भिन्ना जात्तो जबे निन्यानबे पे पौचों औ सांप के मों में पौंच के सूदे नीचे दस्सी पे आ गिरो। ऊ टेम पे बा सांप-सीढ़ी को आबिस्कार करबे वारे खों गरियाबे को जी करत्तो। अब इत्ते से गेम में इत्तो लंबो सांप बनाबे की का जरूरत हती? तनक छोटो सो सांप बना देते तो उनको का बिगर जातो? रस्ता में सो ऊंसई मुतके सांप मिलत्ते। खैर, अब हम तो ने बदल सकत्ते ऊकी डिजाइन। बाकी आतो भौत मजो रओ। 
एक और इनडोर गेम रओ जी को नांव हतो लंगड़ी-धप्पा। जे बरांडा औ आंगन , ने तो छतों पे खेलो जात्तो। ई में कम से कम आठ घर, ने तो दस-बारा जित्ते चाओ उत्ते घर बनाए जात्ते औ ऊपे हर घर में एक टांग से उचकत भए बा खिपरिया सरकानी रैत्ती जो खेल सुरू होबे पे फेंक के घरे डारी जात्ती। अब सोचो तो लगत आए के ऊ टेम पे सरीर कित्तो हरय रओ के फुदकत से उचकत रैत्ते जैसे लंगड़ी दुआ-छुअब्बल में होत्तो। अब तो दोई टांग से उत्तो नईं उचक सकत, एक की तो छोरो। औ जो कऊं कोसिस कर के देखी तो कओ घूंटा पिरान लगे।  
कंचा बी बड़े औ छोटे दोई किसम के होत्ते। रामधई! कंचा सो कभऊं दिमाग से निकरई ने पाओ। काए से के जब बी कभऊं कोनऊं के आफिस में कांच को पेपरवेट दिखानो तो हमें बालपन के कंचा याद आने लगत्ते। कंचा खेलबे में भी बड़े नियम-कायदा रैत्ते। कंचा को उंगरिया से चटका के घुच्चू में डारो जात्तो। जोन को कंचा घुच्चू में चलो गओ, बा जीतो कहात्तो औ जोन को कंचा घुच्चू से बायरे रै जात्तो ऊको उंगरिया से ठेल-ठेल के कंचा को घूच्चू में डारबे की कोसिस करने परत्ती। औ कऊं तब बी ने डार पाए तो एक टेम ऐसो आत्तो जबे हात की कोहनी से कंचा धकिया के घूच्चू में डारने परत्तो। ई चक्कर में कोहनी छिल जात्ती। घुच्चू में डारबे से पैले एक कंचा से दूसरो कंचा सोई पीटो जात्तो। औ जो हार गए सो अपनो कंचा जीतबे वारे को देने परत्तो। अब तो कंचा खेलबे वारे गांव-दिहात में ई दिखात आएं। बा बी भौतई कम। काए से के अब तो बच्च हरें बी मोबाईल में जुटे रैत आएं। 
गिल्ली डंडा सोई भौतई मजे को गेम रओ। दोई तरफी से नुक्कीदार गिल्ली औ एक से डेढ़ फुट को डंडा। देखो जाए तो ऊको मजा किरकेट से कम नईं रओ। औ किरकेट घांई ऊमें बी दूसरी टीम के बच्चा हरें घेर के ठाड़े रैत्ते। फेर जैसई गिल्ली उचकाई जात्ती ऊंसई ऊको लोकबे के लाने सबरे दौर परत्ते। सो उचकाबे वारो कोसिस करत्तो के ऊ तरफी गिल्ली उचकाई जाए जी तरफी कोऊ लोकबे वारो ने होए। कोऊ-कोऊ सिक्सर लगाबे वारी स्टाईल में गिल्ली खों सूंटत्ते। ईंसे उनकी गिल्ली तो कोऊं ने लोक पाउत्तो, मनों उनकी गिल्ली उते से गुजरबे वारों के कभऊं मूंड़ में घलत्ती तो कभऊं कोनऊं के घरे की खिरकी के कांच फोड़त्ती। ऊके बाद तो आप समझतई हो के का होत रओ हुइए? गुल्ली डंडा के बदले महाभारत होन लगत्ती। यां तक तो ठीक आए मनो एक-दो बेर तो ऐसो भओ के कोनऊं के आंख में घली औ ने तो मूंड़ फूटो। जेई सब से बाद में हमाई मताई ने हम ओरन खों गुल्ली-डंडा खेलबे की मनाई कर दई रई। दूसरे की आंख फूटे सो सल्ल औ अपनी फूटे सो सल्ल। 
अब का आए के बच्चा हरें मोबाईल औ लेपटाप पे गेम खेलत एक जांगा बैठे दिखात आएं। ने तो रील देखत रैत आएं। औ मताई-बाप सोई मोबाईल में जुटे रैत आएं सो बे बी जा नईं देख पाऊत आएं के उनको बच्चा ठलुआ बनो जा रओ। जोन उमर में कूंद-फांद के सरीर बनाओ चाइए ऊ उमर में एक जांगा पे पसरे रैबे से का हुइए? फेर होत का आए के जब उनई मोड़ा-मोड़ी को हारमोन बदलत आए तो उने समझ में आन लगत आए के हमें तो स्लिम औ सुंदर दिखने, सिक्स पैक बनाने। सो, बे पिल परत आएं जिम जा के। फेर भले चाए कछू हो जाए। उतई दूसरी बात के जब मोबाईल पे सब कछू बनो-बनाओ देख लेओ तो अपने लाने सोचबे को कछू नईं रै जात। मने कल्पना करबे की सक्ती नईं रै जात। पर का करो जाए, समै तो बदलत आए। जो समै को नियम आए। अब समै के संगे कछू नओ, कछू पुरानो ले के चलो तो सब ठीक रैहे। औ सम्हर के ने चलहो सो ने तो हम का उखार लेबी?      
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के ऊ टेम पे लाईफ कित्ती नोंनी हती। जे सोई बताइयो के आप ओरन ने अपने बालपन में इनमें से कोनऊ खेल खेलो के नईं? औ हां, जो गेम हमेंयाद ने आए बे सोई याद दिला दइयो। जै-जै!!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, July 15, 2026

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  
महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता      
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                                                          
        महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। इसीलिए माना जाता है कि यदि महात्मा गांधी के विचारों को समझना है तो उनके समग्र विचारों को जानना जरूरी है जैसे कला और सौंदर्य के संबंध में उनके विचार।


अधिकांश लोग महात्मा गांधी को एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही देखते और समझते हैं। उनकी दृष्टि में माहत्मा गांधी वे व्यक्ति थे जिन्होंने बड़े-बड़े अहिंसक आंदोलन किए और देश को स्वतंत्रता दिलाई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी में विशेष राजनीतिक सूझ-बूझ थी लेकिन इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों को ले कर उनमें अगाध जिज्ञासा थी तथा उनका अपना मौलिक दृष्टिकोण था। सादा जीवन जीने वाले महात्मा गांधी को कला और सौंदर्य की अद्भुत समझ थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंट्उ विथ ट्रू’ में कला के बारे में लिखा है- ‘‘मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता जबकि प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाह्य रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।’’
दरअसल किसी भी कला के तीन आधार तत्व होते हैं- 1. जातीय तत्ववाद  2. कल्पनात्मक विस्तार 3. ऐतिहासिक परम्परा। जातीय तत्ववाद में मानव जाति समूह का अथवा जातीय दर्शन एवं चिन्तन होता है। कभी-कभी यह तत्व अवचेतन में रहकर कला पर अपना प्रभाव डालता है तो कभी अपने जातीय तत्वों को जानबूझ कर कला में पिरोया जाता है। यह तत्व सामाजिक रुढ़ियों और जातिगत ऐतिहासिक परम्परा के रूप में भी गतिमान रहता है। कल्पनात्मक विस्तार वैचारिक परिपक्वता को दर्शाता है। कला के संदर्भ में कल्पना मूर्त और अमूर्त के मध्य संबंध स्थापन का कार्य करती है। कल्पना का हृदय से सीधा संबंध होता है इसलिए यह कला के रूप में प्रकट होने के बाद प्रायः चकित कर देती है। ऐतिहासिक परम्परा कला के विकास को वातावरण प्रदान करती है, उसे दिशा देती है। भारतीय कलाओं के आधार में मनुष्य और सृष्टि का अटूट संबंध है पाया जाता है यह संबंध सार्वभौमिक सम्पूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है।
महात्मा गांधी कला में प्राकृतिक तत्वों को असीमित मानते थे। उनके अनुसार मानवीय कला प्राकृतिक कला के सामने कुछ भी नहीं है। वे कला की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि -‘‘‘हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों, मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश को निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की कला कभी नहीं कर सकती।’’

कला के महत्व के साथ ही महात्मा गांधी  ने कला के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। वे मानते थे कि कला का कोई न कोई उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य ही कला की गुणवत्ता को सिद्ध करता है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इन्कार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि यह प्राकृतिक सौन्दर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती हैं। ’’

भारतीय दृष्टिकोण से कला की यही परिभाषा हो सकती है। हम केवल उसके लक्ष्य से ही यह लक्षण नहीं बना रहे हैं। काव्य की जो परिभाषा अपने यहाँ है, उसे यदि व्यापक रूप से लगाइए तो वह काव्य की ही परिभाषा नहीं रह जाती; चित्र, मूर्ति, कविता, संगीत आदि कलामात्र की परिभाषा हो जाती है। वस्तुतः कलामात्र की परिभाषा को ही काव्य की परिभाषा बनाने के लिए, एक देशीय रूप देकर काव्य की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। अर्थात्, काव्य की परिभाषा पूर्ण व्याप्ति तभी होती है जब हम वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” के स्थान परकृ“कृतिरसात्मिका कला कहें वा रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” के बदले रमणीयार्थप्रतिपादिका कृतिः कला”
महात्मा गांधी कला में सत्य को ढूंढते थे। यदि कला में सत्यता है तो वह सभी के लिए उपयोगी हो सकती है। उनके अनुसार ‘‘सत्य का शोध पहली चीज है, सौन्दर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि  उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था। ऐसे ही मोहम्मद साहब भी थे जिनकी ‘कुरान’ सम्पूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है, कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौन्दर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौन्दर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा।’’

महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए। मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं लेकिन मैं उनको उतना महत्त्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर मैं उन कार्यकलापों के महत्त्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। जीवन सब कलाओं से बढ़कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या?’’
सत्य महात्मा गांधी का प्रिय विषय था। वे निरंतर सत्य की खोज में लगे रहते थे। वे कहते थे कि -‘‘मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौन्दर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौन्दर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौन्दर्य के दर्शन करने लगेंगे, तब सच्ची कला का उदय होगा।’’

जर्मन दार्शनिक हेगेल का मानना थ कि ‘‘सौंदर्य संवोदी रूप में सत्य या विचार की अभिव्यक्ति है।’’ वे यह भी मानते थे कि सौंदर्य केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना और परम सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। हेगेल के दर्शन में सौंदर्य मात्र बाहरी दिखावट अथवा इंद्रियों को प्रसन्न करने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना या आत्मा की बाहरी दुनिया में अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार शुद्ध विचार या सत्य जब किसी कला माध्यम के द्वारा साकार होता है तो वही सौंदर्य है। कला में सौंदर्य प्रकृति की नकल करने से नहीं अपितु उसमें अपनी दृष्टि को शामिल करना भी है। ठीक इसी प्रकार महात्मा गांधी ने कला के साथ सौंदर्य के महत्व एवं विशेषताओं को देखा और परखा। वे कला, सौंदर्य और सत्य को परस्पर पूरक मानते थे। महात्मा गांधी के अनुसार -‘‘‘सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाह्य रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य से आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौन्दर्य नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन कहते हैं कि उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया और आपको याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अन्दर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौन्दर्य के दर्शन का अभ्यस्त था।’’

महात्मा गांधी ने वास्तविक सुंदर कृति की बड़े सरल शब्दों में व्याख्या की है। वे इस बारे में भी प्रकाश डालते हैं कि सुंदर कृति कब जन्म लेती है-‘‘सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि ‘तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है, लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।’’
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी ने न केवल राजनीतिक मसलों का हल निकाला बल्कि कला और सौंदर्य का भी गहराई आकलन किया और इन दोनों तत्वों को जनोपयोगी तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना। इसीलिए वे मानते थे कि जो कला और सौंदर्य आमजन के मन में शांति, सुंदरता और जीवंतता का बोध कराए वही सच्ची कला और सौंदर्य है। महात्मा गांधी ने जितने सुंदर ढंग से कला और सौंदर्य की व्याख्या की है, उसे पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई दार्शनिक विषय के मर्म को आत्मसात कर के अपने विचार व्यक्त कर रहा हो। महात्मा गांधी के इन विचारों को जाने बिना उनके वैचारिक व्यक्तित्व को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है।                                    ---------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 15.07.2026 को प्रकाशित) 
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Thursday, July 9, 2026

बतकाव बिन्ना की | ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की 
ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      चलो आज अपन ओरें एक नीतिकथा पे बिचार करें। अब आप ओरें जा गिचड़ ने करन लगियो के कोन की नीति पे? काए से के आजकाल राजनीति में नीति सो दिखात नईंया। बाकी अपन को का करने राजनीति से? अपन तो ठैरे मतदाता। अपन खों तो बस वोट देने रैत आए। आगे से अपन खों का लेबो-देबो के मैंगाई बढ़े, चाए मंदर में चढ़ाबे की चोरी होए, चाए लुगाइन के संगे, बच्चियन के संगे कछू होत रए, अपन खों का करने? जबे वोट देने रओ तो सो दे दओ रओ। ऊंसई बी सोचबे वारी बात आए के अपन कहाऊंत आएं ‘मतदाता’, सो, देबे वारे खों कभऊं देबे के बाद कछू मांगो नईं चाइए। अच्छो नईं मानों जात। ‘मतदान’ में दान कर दओ सो कर दओ। अब जोन खों दान दओ, का ओई से कछू मांगों थोड़ेई जा सकत आए। जे अपने संस्कार नोंईं। औ अपन ठैरे कछू ज्यादई संस्कारी। जेई से जोन खों वोट देके जिताऊत आएं ऊंसे जे लौं नईं पूछ पाऊत आएं के तुमने जो-जो करबे की कई रई बा करी काए नईं? जा पूछबे में सो ऐसई लगहे जैसे भिखारी खों भीख देबे के बाद ऊको ठेन करी जाए के तुमने भीख के बदले आसीसें काए ने दईं? नईं भैया! अपन ठैरे संस्कारी सो अपन ऐसो नईं पूछ सकत। अपन ठैरे संस्कारी।  बाकी छोड़ो जे सब! हम सुनाबे जा हते एक ठो नीतिकथा, सो, बा सुनो औ गुनो!
का भओ के एक जंगल में एक शेर रैत्तो जो उते को राजा रओ। ऊके दरबार में एक कौवा, एक तेंदुआ औ एक लोमड़ी रैत्ती। शेर शिकार करत्तो औ अपनों भरपेट खा के, अफर के बाकी बा तीनों के लाने छोड़ देत्तो। तीनोंई शेर की भौतई चमचोंई करत्ते। काए से के उने पतो रओ के जबलौं शेर रार करत रैहे तबलौं फोकट को खाबे खों मिलत रैहे। उनें आड़ी के काड़ी ने टारने परहे।  
एक दार का भओ के ऊ जंगल में कऊं से एक ऊंट आ गओ। ऊको देख के कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी की बांछें खिल गईं। उन्ने सोची के जो शेर ई ऊंट को शिकार कर ले, तो उन तीनों को बी चार-छै दिनां को इंतजाम हो जैहे। सो, बा तीनों जने ऊंट खों घेर-घार के शेर के पास लेवा गए।
“जो को आ? जो अपने इते को तो ने दिखा रओ?” शेर ने पूछी।
“को जाने कां से आ गओ?” कौवा ने कई।
“हमें तो लगत आए के जो दूसरो जंगल से इते जासूसी करबे खों आओ आए।” तेंदुआ ने कई।
’ईको तो मार के खा लओ चाइए।” चतुरा लोमड़ी ने तुरतईं कई।
बा तीनों की बतकाव सुन के ऊंट कंपन लगो। ऊने शेर के पांव पकर लए।
“महराज, हमाई जान बख्श दई जाए। हम तो आपकी सरण में जे लाने आए के आप हमें अपने इते जियन खान देहो। मालक, हम जो झूठ बोलें तो हमाए मों में कीरा परें। मालक, जो आप अपने सरण में आए भए को जो  आप मार के खा जैहो तो आपकी भौतई बदनामी हुइए। सरण में आए भए खों मारो नईं जात आए, जा आप सोई जानत हो। बाकी आपकी मरजी।” कै के ऊंट शेर के पावन पे लोट गओ।
शेर ने सोची के ऊंट कै तो सई रओ आए। सो शेर ने ऊंट खों अपनी सरण में लेत भए अपनी सेवा में रख लओ। तीनों चमचों खों जा बात बुरई लगी, मनों ऊपर से उन्ने शेर के जैकारे लगाए
कछू दिनां गुजरे। एक दिनां शेर की तबीयत बिगर गई। हप्ता खांड़ लौन ने सुदरी। तीनों चमचे भूके मरन लगे। काए से उने तो शेर के करे शिकार में से खाबे की आदत रई। सो उन्ने शेर से कई के “मालक! आप तो शिकार कर नईं पा रए औ हम तीनों  भूक से मरे जा रए। सो, अब ऊंट खों मार के खा लओ जाए, जेई उपाय बचो आए।”
“अरे, हम तो सोच रए हते के जा ऊंट तो हमाओ सरण वारो ठैरो, सो ऊको तो हम नईं मार सकत, मनों तुम तीनों खों मार के न खा लओ जाए?” शेर ने कई।
शेर की बात सुन के तीनों कंपन लगे। औ उते भाग खड़े भए। ईके बाद शेर उन तीनों चमचों से छुटकारो मिल गओ। फेर शेर औ ऊंट खुसी-खुसी रैन लगे।
सो, जा हती बा नीति कथा जोन में बताओ गओ के एक राजा खों चापलूसन के कए में नईं आओ चाइए। 
अब तनक ज ईं किसां खों आज के हिसाब से सोची जाए तो किसां कैसी हुइए? 
तो सुनियो अब ई किसां को नओ वर्जन......
नओ वर्जन में किसां ऐसी हुइए के शेर हतो राजा औ राजा खों चापलूसन की घनी जरूरत रैत आए। जो चापलूस चौबीस घंटा ऊकी जैकारे ने करें तो ऊको राजा होबे की फीलिंग ने आहे। सो शेर जू खों सोई अपने तीनों चमचा कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी भौतई पोसात्ते। बा उन्हई की सलाय पे चलत्तो। ऊको पतो रओ के ऊकी परजा तो कऊं नईं जा रई, चाए बा ऊको गरो मसकत रए, चार मार के खात रए। परजा सो लात-जूता खात बनीं रैहे औ जैकारे लगात रैहे। सो, बा राजा शेर शिकार करत्तो औ खुद खात्तो, संगें अपने तीनों चमचों खो खिलाउत्तो।
एक दिनां ऊके जंगल में कऊं से ऊंट आ गओ। कौवा बोलो के - “मालक जे दूसरो जंगल को जासूस आए इको मार के खा लओ जाए।”
“नईं मालक, जो जे दूसरो जंगल को मेम्बर आए तो ईको अपने राज में मेम्बरशिप दे दई जाए औ कछू अच्छो सो पद दे दओ जाए, ईंसे उते औ मेम्बर फूट के इते आ जाहें। ईसे आपको राज सबसे बड़ो राज कहा हे।” तेंदुआ बोलो। काए से के ऊके दिल में चल रई हती के जो शेर अपनों राज बड़ो कर लैहे तो कल को ऊके टपकबे पे ऊ जा बड़े राज को मालक बन जैहे।
“हऔ महराज! दोई अपनी-अपनी जांगा सई कै रए। मनो अबे जा ऊंट तनक दूबरो आए। अबे खाबे जोग ईमें कछू खास नइयां, सो, ईको अबे अपने राज में कछू पोर्टफोलियो दे के खान-पियन देओ। फेर जब जे मुटा जाहे, तब सोचबी के कोन दिनां काटने औ कोन दिनां खाने।” लोमड़ी ने सोई अपनो एक्सपर्ट कमेंट दओ। ऊंट ने सोई मोका ताक के अपने जंगलवारों खों खूब गरियाओ औ अपनी पार्टी मने अपनों जंगल बदल लओ।
सो ई तरां ऊंट खों नए जंगल में जांगा मिल गई। फेर चारो परजा के मूंड़ पे तबला बजाऊत भए खत रए, मुटियात रए। अबे लौं ने राजा शेर बिमार परो ने ऊंट के खाए जाबे की नोबत आई। सबरे अपनी सात पीढ़ी के लाने जोग मसकत जा रए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आज के टेम पे ई नीतिकथा मने किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 8, 2026

चर्चा प्लस | गंभीर चिंतन आवश्यक है विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस     
गंभीर चिंतन आवश्यक है विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    
    स्त्री के लिए ‘लेखिका’ शब्द है और पुरुषों के लिए ‘‘लेखक’’ शब्द। लेकिन फिसलन यह कि ‘‘महिला लेखिका’’ शब्द का प्रयोग भी कर दिया जाता है। अर्थात् एक स्त्री के लिए विशेषण का दोहरा जेंडर। विशेष यह की कई बार हिन्दी के विद्वान प्राध्यापकों की लेखनी एवं उद्बोधन में भी यह प्रयोग पढ़ने-सुनने को मिल जाता है। इसी तरह एक विशेषण प्रत्यय प्रचलन हिन्दी में भी चलन में आया है - ‘‘कारा’’। जैसे ‘‘ग़ज़लकारा’’। यहां तक कि मैंने स्वयं अपने लिए संबोधन सुना है ‘‘कहानीकारा’’, ‘‘उपन्यासकारा’’। देखा जाए तो भाषा और स्त्री दोनों को भाषाई दोष की काराओं में बंदी बनाया जा रहा है। यह बात हंसी में नहीं उड़ाई जा सकती है क्योंकि थर्ड जेंडर राईटर्स के रूप में रचनाकार- संसार का विस्तार हो रहा है। इस समय विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।


वर्ष 2009 में नरेन्द्र कोहली की छः भागों की एक उपन्यास श्रृंखला आई थी जिसका नाम था ‘‘तोड़ो, कारा तोड़ो’’। यह स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित थी। मेरी इस चर्चा का इस उपन्यास से मात्र इतना ही संबंध है कि इस उपन्यास के नाम में ‘‘कारा’’ शब्द आया है और कारा अर्थात् बंधन। जिसे तोड़ने का आह्वान किया गया है उपन्यास में। इस ‘‘कारा’’ से ही बना है शब्द ‘‘कारावास’’ जिसका शाब्दिक अर्थ है बंदीगृह। स्त्री-जीवन से भी कारा शब्द का गहरा संबंध है। स्त्री-जीवन अनेक काराओं से अर्थात् बंधनों से जकड़ा हुआ है। इस बंधन की बुनियाद उसके बचपन में ही पड़ जाती है जब उसकी प्रत्येक चेष्टा पर ‘‘ऐ लड़की’’ कह कर अंकुश पर अंकुश लगाए जाते हैं। कृष्णा सोबती ने इसी संबंध में एक उपन्यास लिख डाला था जिसका नाम ही है-‘‘ऐ लड़की’’। स्त्री जीवन की काराओं का आरम्भिक रूप है कि ‘‘ऐ लड़की तू ये न कर’’, ‘‘ऐ लड़की तू वो न कर’’, ‘‘ऐ लड़की तू यहां मत जा’’, ‘‘ऐ लड़की तू वहां मत जा’’, ‘‘ऐ लड़की तू यह मत पहन’’, ‘‘ऐ लड़की तू वह मत पहन’’, ‘‘ऐ लड़की तू इससे बात मत कर’’,‘‘ऐ लड़की तू उससे बात मत कर’’ आदि-आदि अनेक बंधन। स्त्रियों ने इन अनावश्यक काराओं से मुक्त होने के लिए दुनिया भर में लंबा संघर्ष किया है। यह संघर्ष आज भी जारी है। किन्तु जिस अपनी पहचान और अस्तित्व की स्थापना के लिए अनेक स्त्रियां संघर्षरत हैं वहीं कथित प्रबुद्ध स्त्रियां अपने कार्य से जुड़े अस्तित्व की पहचान के साथ ‘‘कारा’’ जोड़े जाने पर कोई आपत्ति नहीं कर रही हैं।
चलिए बता दूं कि यह मुद्दा कहां से दिमाग़ में आया। वस्तुतः फेसबुक पर एक साहित्यिक कार्यक्रम का पोस्टर देखा। जिसमें कवियों के साथ कवयित्रियों, शायराओं की तस्वीरें थीं और उनके नाम के साथ उनकी विधा को स्पष्ट करते हुए ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द लिखा गया था। अब यह ‘‘ग़ज़लकारा’’ क्या होता है? ‘‘ग़ज़लगो’’, ‘‘शायरा’’, ‘‘कवयित्री’’ जैसे शब्द प्रचलन में रहे हैं लेकिन इधर कुछ समय से ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द वाया सोशल मीडिया तेजी से प्रचलन में आया है। अभी कुछ समय पहले एक कार्यक्रम में मेरा लेखकीय परिचय देते हुए एक संचालक महोदय ने मेरे लिए कहा था कि ‘‘ये चर्चित कहानीकारा हैं, उपन्यासकारा हैं, स्तम्भकारा हैं।’’ अपने परिचय के साथ तीन-तीन ‘‘कारा’’ सुन कर मुझे लगा कि इसके बाद बस, कारागार ही शेष बचता है।
एक ओर स्त्रियों और पुरुषों की समानता के लिए आवाज़ उठाई जाती है। बुद्धिजीवी साहित्यिक वर्ग यहां तक कहता है कि ‘‘लेखक’’, ‘‘साहित्यकार’’ ‘‘कवि’’ आदि शब्दों को लिंगभेद से अलग कर के देखा जाना चाहिए और चाहे स्त्री रचनाकार हो अथवा पुरुष रचनाकार दोनों के लिए एक समान सम्बोधन होना चाहिए। जैसे अंग्रेजी में ‘‘राईटर’’, ऑथर’’ जैसे शब्द दोनों के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। जहां जेंडर स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है वहां ‘‘मेल राईटर’’, ‘‘फीमेल राईटर’’ का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में भी स्त्री लेखक, पुरुष लेखक जैसे शब्द प्रचलन में आ चुके हैं। लेकिन मजे की बात है कि इन शब्दों के प्रयोग में हिन्दी के प्राध्यापकों एवं शोधकर्ताओं तक को गलती करते पाया है। कई बार लिखा हुआ पढ़ने में आया ‘‘महिला लेखिका’’। बोलने में भी कई बार लोग ‘‘महिला लेखिका’’ बोल देते हैं किन्तु इसे ज़बान की फिसलन मान कर अनदेखा किया जा सकता है किन्तु लिखे हुए अथवा मुद्रित सामग्री में ‘‘महिला लेखिका’’ को कैसे फिसलन मान लेंगे? अब कोई ऐसी त्रुटि करने वाले से पूछे कि यदि आप ‘‘महिला लेखिका’’ शब्द ही प्रचलन में लाना चाहते हैं तो फिर साथ में ‘‘पुरुष लेखिका’’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? आखिर तय तो करना पड़ेगा कि आप महिला को ‘‘महिला’’ और ‘‘लेखिका’’ के दोहरे जेंडर सूचक शब्द में बांधना चाहते हैं या फिर सही और उचित संबोधन देना चाहते हैं?
यूं भी अब बात स्त्री या पुरुष सर्जकों की नहीं रह गई है। थर्ड जेंडर की कृतियां भी सामने आने लगी हैं। महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा ‘‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’’ मराठी, गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है। आर. रेवती दक्षिण भारत में रहने वाली ट्रांसजेंडर सर्जक है। उनकी प्रथम पुस्तक तमिल में प्रकाशित हुई थी जिसका अंग्रेजी अनुवाद का नाम था ‘‘अवर लाइव्स, अवर वर्ड्स’’। फिर 2010 में उनकी दूसरी पुस्तक आई ‘‘दी ट्रुथ अबाउट मी: ए हिजड़ा लाईफ स्टोरी’’। आर. रेवती से प्रभावित हो कर ट्रांसजेंडर प्रियाबाबू ने 2007 में ‘‘नान सर्वनान अल्ला’’ और ट्रांसजेंडर विद्या ने ‘‘आई एम विद्या’’ पुस्तक लिखी। तो प्रश्न यह उठता है कि थर्ड जेंडर के साहित्य सर्जकों के लिए किस तरह का संबोधन प्रयोग में लाया जाएगा? क्या बेहतर यही नहीं होगा कि साहित्य सर्जकों को जेंडर सूचक शब्दों की कारा से मुक्त रखा जाए। यदि ‘‘लेखक’’ शब्द सभी के लिए प्रयोग किया जाना है तो वह स्त्री, पुरुष और थर्ड जेंडर तीनों के लिए प्रयोग में लाया जाए।
इस विषय पर मेरा ध्यान हमेशा ही आकृष्ट हुआ है। सन् 2005 में मेरे उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका में मैंने हिन्दी व्याकरण में जेंडर की बात उठाते हुए लिखा था कि- ‘‘अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ पर्सन अर्थात व्यक्ति शब्द जुड़ा होता है। यह पर्सन पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी। किंतु हिंदी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष। फिर स्त्री के लिए जगह कहां है? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित है? क्या स्त्री की पहचान मात्र लिंग तक सीमित है? मैं न तो व्याकरण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न ही आधिकारिक व्याख्याकार हूं, लेकिन एक औरत होने के नाते मुझे यह बात सदैव चुभती है।’’
यह बात विस्मृत करने की नहीं है कि भाषा का सीधा संबंध संस्कार से होता है। भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व की परिचायक होती है। भाषा और संस्कार का अंतर्सम्बन्ध घनिष्ठ है। कोई व्यक्ति किस प्रकार की भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग बोलचाल में कर रहा है, उसी से उसके संस्कारों का पता चल जाता है। यदि कोई व्यक्ति बात-बात में अपशब्दों का प्रयोग करता है तो तत्काल समझ में आ जाता है उस व्यक्ति को अच्छे संस्कार नहीं मिले हैं। वहीं कोई व्यक्ति सम्य, शालीन भाषा का प्रयोग करता है तो हम उसे संस्कारवान मानने में देर नहीं करते हैं। इसी बात को यदि और सरल शब्दों में कहा जाए तो भाषा संस्कार का ‘‘आईडी कार्ड’’ होती है। कहने का आशय यही है कि इस ग्लोबल होते समय में भाषा के संस्कार को बचाए और बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।      
खैर, बात चल रही थी, ‘‘ग़ज़लकारा’’ की। इस शब्द ने मुझे इतना परेशान किया कि मैंने अपनी शंका-समाधान के लिए एक जाने-माने शायर से इस बारे में पूछा कि उर्दू में ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द होता है क्या? वे उर्दू और हिन्दी दोनों भाषाओं में समान रूप से ग़ज़ल कहते हैं इसलिए मुझे उनसे अपना उत्तर मिलने की पूरी उम्मीद थी। उन्होंने भी वहीं उत्तर दिया जिसका मुझे पता था कि उर्दू में ऐसा कोई शब्द नहीं होता है। फिर उन्होंने विस्तार से समझाया कि ‘‘ग़ज़ल लिखी नहीं जाती बल्कि कहीं जाती है इसीलिए ग़ज़ल कहने वाले को ग़ज़लगो कहा जाता है। गजलकार शब्द हिंदी में प्रचलन में आ गया है जो उचित नहीं है। क्योंकि ग़ज़ल स्वतः बनती है, उसमें किसी प्रकार की कलाकारी नहीं की जाती है। जहां कलाकारी हो वही कार शब्द उचित लगता है जैसे अदाकार या अदाकारा।’’
इस बारे में मैंने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर से भी चर्चा कर डाली। उन्होंने भी ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द पर आपत्ति जताई कि ‘‘यह सर्वथा गलत है।’’ एक ग़ज़ल विधा के ज्ञाता और दूसरे भाषाशास्त्र के ज्ञाता, इन दोनों से चर्चा करने के उपरांत मुझे विश्वास हो गया कि मैं सही दिशा में चिंतन कर रही हूं। दरअसल प्रश्न मात्र ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द का ही नहीं है, प्रश्न है भाषा और स्त्री दोनों की अस्मिता का, उनकी पहचान का। इस प्रकार के शब्द गढ़ने वाले स्वयं को साहित्य का विद्वान कहते हैं और उसे अनदेखा करने वाले उन्हें अनजाने में प्रोत्साहन देते हैं। यह तो हुई भाषा में दोषपूर्ण शब्दों के समावेश की। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है स्त्री की बौद्धिक विशेषता के लिए दिए जा रहे संबोधन की। स्त्री समाज जहां एक ओर अपनी काराओं को तोड़ कर स्वयं की क्षमता प्रमाणित करने में जुटा हुआ है, वहीं संबोधन में ‘कारा’ का विशेषण प्रफुल्लित हो कर स्वीकार किया जा रहा है। कवियों के लिए तो यूं भी प्रचलित है कि ‘‘जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि’’, तो क्या कवि समुदाय इन काराओं तक पहुंच नहीं पा रहा है अथवा देख कर अनदेखा कर रहा है या फिर इस ओर सोचना ही व्यर्थ मानता है? बेशक़ प्रश्न अनेक हैं। क्या करूं, दिल है कि प्रश्न किए बिना मानता ही नहीं। वैसे, फिलहाल तो दिल यही कहना चाहता है (नरेन्द्र करेहली जी से क्षमायाचना सहित) कि ‘‘प्रिय रचनाकार बंधु-बांधवी, तोड़ो कारा तोड़ो और संबोधन के लिए चलन में उचित शब्द जोड़ो’’।                        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.07.2026 को प्रकाशित) 
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Thursday, July 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       हमें एक घटना याद आ रई, बरसो पैले की। का भओ रओ के पन्ना के जुगल किसोर मंदर में में एक दार चोरी भई। किसोर जू के मुकुट, मुरली औ सबरे जेवर ऊ भड़या ने चुरा लए। संकारे मंदर खुलो तो पुजारी जू ने हल्ला मचाओ। भीड़ लग गई। पुलिस आ गई। सबरे ऊ भड़या खों गरयान लगे के जीने बी जुगल किसोर जू के जेवर चुराए ऊकी ठठरी बंधे, ऊको कीरा परें, ऊपे जुगल किसोर जू की गाज गिरे। जांच सुरू करी गई। पब्लिक तो ऊंसई खोंखिया रई हती सो ऊने सोई पुलिस पे दबाव डारो। पुलिस के लाने सोई जे बड़े सरम की बात हती। सो पुलिस वारे ऊ भड़या खों पकरबे के लाने जुट परे। दोई दिनां में जा साबित हो गओ के जो पुलिस चाए तो कोनऊं बदमास बच नईं सकत। ऊ भड़या पकरो गओ औ किसोर जू के सबरे जेवर उतई मंदर के कुंआ में मिले। काए से के ऊ भड़या ने बा जेवर बांध के कुआ में लटका दए रए। ऊकी सेाच से के पुलिस को तो पतो परहे नईं। मनो पुलिस औ ऊके कुत्ता ने सूंघ-सांघ के बा जेवर ढूंढ निकारे। इत्तोई नोंई, पुलिस ने ऊ भड़या खों भी पकर लओ। जबे पब्लिक खों भड़या के बारे में पता परी तो सबरे अकबका के रए गए। काए से के बा भड़या और कोऊ नईं मंदर को पुजारी ई रओ। पब्लिक ने ऊ पुजारी खों औ गरियाओ। ऊ पे केस चलो। मनो सायद बा ऊ टेम पे जमानत पे छूटो रओ। सायद ईसे कहने पर रए के जा भौत पैले की बात आए। हम हते लोहरे ऊ टेम पे, सो जित्ती याद आ रई बता रए। फेर पता परी के ऊ पुजारी खों अपने करम पे इत्तो पछताओ भओ के ऊने ओई कुंआ में कूंद के अपने प्रान दे दए। इत्तई नईं, कछू समै बाद पता परी के ऊके घरे औ दो-तीन मौतें भईं। सो सबई कैत्ते के किसोर जू ने ऊको दंड दओ। बाकी काम बी तो ऊने बुरौ करो रऔ।
एसईं एक घटना औ भई रई। छतरपुर में हरपालपुर की रस्ता पे एक छोटो सो मंदर रओ। अब तो बा बड़ो बन गओ हुइए। मनो ऊ टेम पे बा छोटो सो रओ। ऊकी मानता ऊ टेम पे बी रई। अब हमें जे ध्यान नोंई के बा किसन जू को मंदर रओ के रामजी को, मनो इन्हई दोई में से एक को रओ हुइए। काए से के कोऊ ने मनौती पूरी होबे पे उते चांदी को मुकुट चढ़ाओ रओ। मुकुट चढाए चार दिनां भए नईं के एक दारूखोर भड़या रात को मंदर में घुसो औ बा मुकुट ले भगो। ऊको दारू के लाने पइसा चाउने रए सो ऊने जे न सोची के भगवान को मुकुट आए के कोन को आए? ऊने तो उठाओ औ चलतो बनो। दूसरे दिनां कोऊ ने बताओ के मंदर के लिंगे बा दारूखोर को घूमत देखो रओ। अब सबरे ऊको ढूंढबे में जुटे। ऊको कऊं पतो ने परो। बाद में पता परी के बा रातई खों कोनऊं टिरक में चढ़ के कानपुर भाग गओ रओ। इते पुलिस छतरपुर औ हरलपालपुर में ऊको ढूंढत फिरई हती, मनो बा तो उते कानपुर में दारू सूंट रओ हतो। फेर एक दिनां बड़ो गजब को भओ। बा दारूखोर भड़या गांव लौट आओ। ऊने बा मुकुट बी मंदर खों दे दओ। पुलिस ने ऊंसे पूछी के अब तक कां रए औ अब काए लौटे औ संगे जा मुकुट लौटाबे की तुमें काए सूझी? सो ऊ भड़या ने मजे की किसां सुनाई। ऊने बताई के ऊके लिंगे पइसा ने हते औ ऊको दारू की तलब लग रई हती। सो ऊने बिगैर कछू सोचे-बिचारे मंदर में से मुकुट चुरा लओ औ कानपुर भाग गओ। उते एक चोरी को समान खरीदबे वारे खों मुकुट बेंचो औ पईसा ले के दारू पियन लगो। रात की बेरा जब बा सोओ सो ऊको लगो के कोनऊं सीना पे चढ़ो बैठो। साना पे चढ़ो बा मानुस बिगैर मुकुट के भगवान की मूरत घांई दिखा रओ तो। दो रातें औ जेई भओ। ईंसे बा दारूखोर डरा गओ। ऊके मन में आई के ऊसे गलती हो गई, अब ऊको मुकुट वापस कर दओ चाइए। मनो बा तो ऊको बेंच चुको हतो। ऊने सोची के अब का करो जाए? जो कऊं बा ऊ चोरबजार वारे से मांगबे जैहे सो बा न लौटाहे। सो ऊ दारूखोर ने बा चोरबजार वारे के इते सेंध लगाई औ मुकुट ले भगो। ईके बाद बा वापस गांव वापस पौंचो औ ऊने मुकुट सोई मंदर खों लौटा दओ। चोरी करबे के कारन ऊको सजा तो भई, मनो कर्री ने भई। उते के लोग कैत्ते के जो बा मुकुट ने लौटातो तो भगवान ऊको पटक-पटक के मारते। बाकी बा चोरबजार वारो सोई पकरो गओ। ऊके तो पइसा बी गए औ मुकुट बी गओ। औ पुलिस के डंडा परे सो अलग से। अब बुरए काम को बुरौ अंत तो होतई आए।
सो जे दो किसां सो हमें याद आ रई। अब आप ओरन जानतई आओ के जे किसां हमें याद काए आई? ठीक समझे आप ओरें! अरे रामलला के इते चंदा के पइसा में गड़बड़ी भई सो हमें जे दोईं घटना याद आ गईं। ऊंसई अपने इते जब कछू होत आए तो मुतकी पुरानी बातें याद आन लगत आएं। जैो कोऊं के इते कोनऊं दिल के दौरा से सांत हो गओ होए तो सबरे जने जो उते जुटत आएं बे अपनी-अपनी सुनान लगत आएं के हमाए फूफा के संगे बी ऐसोई भओ रओ, तो हमाई मौसी के संगे बी ऐसई भओ रओ। मनो कोनऊं के इते समै के पैले मोड़ा या मोड़ी पैदा हो जाए सो सबई खों याद आन लगत आए के हमाए इते बी ऐसो भओ रओ। ऐसे समै सबई जनमपतरी खोल के बैठ जात आएं के कोन के इते सतमासी भई औ कोन के इते अठमासा भओ। जो कोऊ एक खों मलेरिया हो जाए सा बाकी सब जनों खों अपनों-अपनों मलेरिया याद आन लगत आए। सो जे तो बड़ी बात आए। इत्ते नोंने रामलला। इत्तो नोंनो मंदर। इत्ते अच्छे से प्रानप्रतिष्ठा भई रई के आज लौं आंखन के आगे दिखात आए। बाकी हम आज लौं रामलला के दरसनों के लाने ने जा पाए। हमने एक भैयाजी से तो यां तक कै रखी आए के जो हमें संगे ने लिवा गए अरै दरसन ने कराई तो आपके लाने पाप परहे। बाकी सांची तो जा आए के जबे रामलला को बुलावो आहे तभई उते जाबे खों मिलहे औ तभईं दरसन हो पाहें। 
बाकी जब से हमने बा खबर सुनी के उते चंदा के पइसा को घपला हो गओ, तभई से हमें जे दोई किसां याद आन लगीं। सो का आए के जोन ने रामलला के चंदा के पइसा डकारे उनें पचहे नईं, जे बात तो तै कहाई। एक तो भड़याई ऊंसई बुरऔ काम आए, ऊपे से मंदर में भड़याई? ईसे बढ़के औ कछू बुरौ काम होई नईं सकत आए। सो हम अपने जी खों जेई तसल्लसी दे रए के एक न एक दिनां सबरे भड़या हरों खों सजा जरूर मिलहे। इते अंधेर बी औ देर बी आए, मनो उते देर भले होए पर अंधेर ने हुइए।         
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के बे ओरें कित्ते ढीठ आएं के इत्ते पापुलर मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो? रामलला के पइसा चुरात समै उनको जी ने कांपो? अब रामलला उनखों दंड दैहें के नईं?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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