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Tuesday, November 12, 2024

पुस्तक समीक्षा | भावनाएं जब नदी बन कर बहती हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 12.11.2024 को 'आचरण' में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डाॅ. शिवा श्रीवास्तव  जी के काव्य संग्रह की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
भावनाएं जब नदी बन कर बहती हैं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - भावना के विविध रंग
कवयित्री     - डाॅ. शिवा श्रीवास्तव 
प्रकाशक     - वाची प्रकाशन, बी-59, गुलाब बाग, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059
मूल्य        - 300/- 
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     एक बार पाब्लो नरुदा से उनके एक प्रशंसक ने पूछा कि ‘‘आप कविता क्यों लिखते हैं?’’ पाब्लो नरुदा ने तत्काल उत्तर दिया कि ‘‘मैं कविता नहीं लिखता, कविता मुझे लिखती है।’’ वस्तुतः एकदम सटीक उत्तर था पाब्लो नरुदा का। जब किसी सृजनकर्ता के जीवन में उसकी सृजनात्मकता उसका पर्याय बनने लगती है तो ठीक वहीं से वह सृजन करने का दावेदार नहीं रह जाता, अपितु उसका सृजन उसे रचने लगता है। कुछ इसी दिशा की ओर बढ़ रही हैं कवयित्री डाॅ. शिवा श्रीवास्तव। उनके प्रथम काव्य संग्रह ‘‘भावना के विविध रंग’’ में संग्रहीत उनकी कविताएं इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं कि डाॅ. शिवा श्रीवास्तव की भावनाएं एक नदी की भांति प्रवाहित हो रही हैं और उन्हें उस दिशा की ओर ले जा रही हैं जहां उनका अस्तित्व काव्य को जीने लगेगा। संग्रह की भूमिका में समाजवादी चिंतक, कवि रघु ठाकुर ने शिवा श्रीवास्तव की कविताओं के बारे में लिखा है कि -‘‘उनकी कविताओं में पीड़ा, प्रेरणा व संकल्प तीनों हैं। मुझे खुशी होगी कि बौद्धिक जगत उनकी इस प्रतिभा को पहचाने, पीड़ित दुनिया, उनके विचारों से उद्वेलित हो, और समता के लक्ष्य को पाने की ओर विचार करे और आगे बढ़े। शिवा जी की कविताएं, भावनाओं की बाढ़ लाती है. फिर वे उन्हें बांधकर, नियंत्रित करती हैं और एक मार्ग रूपी नहर में छोड़कर जनहित का माध्यम बना देती है।’’ 
साहित्यकार मुकेश वर्मा ने अपने ‘‘प्राक्कथन’’ में इन कविताओं को ‘‘इस अराजक समय में एक कवि का जरूरी बयान यानी शिवा की कविताएं’’ कहा है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार जयंत सिंह तोमर शिवा श्रीवास्तव की कविताओं को ‘‘नीराजना’’ कहा है। नीराजना का एक अर्थ होता है कर्पूर की भांति जल कर सुगंध और प्रकाश देना तथा दूसरा अर्थ कि शस्त्र को धारदार बनाना। देखा जाए तो यह एक शब्द ही डाॅ शिवा की कविताओं का सटीक अर्थांकन कर देता है। इन कविताओं में भावनाओं का कर्पूर भी है और सदाकांक्षाओं की धार भी। 
डाॅ. शिवा श्रीवास्तव की कविताओं से गुज़रते हुए मैंने अनुभव किया कि कवयित्री के भीतर एक छटपटाहट है सब कुछ ठीक कर देने की। तमाम विसंगतियों को दुरुस्त कर एक बेहतर संसार बसाने की। ऐसे ही निरापद संसार का स्वप्न अपने बच्चों के लिए एक मां देखती है। ‘‘मां’’ एक स्त्री का समग्र स्वरूप भी होती है। कवयित्री ने अपना यह प्रथम काव्य संग्रह अपनी मां को समर्पित किया है। 
संग्रह की सम्पूर्ण 106 कविताएं विषयानुसार पांच खंडों में विभक्त हैं- खंड 1 अनुभूतियां, खंड 2 प्रेम, खंड 3 स्त्रियां, खंड 4 प्रकृति और नदियां, खंड 5 छोटी कविताएं। 
प्रथम खंड-अनुभूतियां को एक भावनात्मक सरिता का उद्गम माना जा सकता है जिसमें कवयित्री मन की तथा जग की भावनाओं को कोमल शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं। इस प्रथम खंड की दूसरी कविता मन को गहरे तक छू लेने का माद्दा रखती है। इसका शीर्षक है- ‘‘अम्मां के पल्लू की गांठ’’। इस कविता में ‘पल्लू की गांठ’ मां के दायित्वों का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती है। इसमें ‘हाईलाइटर’ का प्रयोग अनूठा एवं बेहद प्रभावी है। कविता का एक अंश देखिए-
वे गांठ का सहारा लेतीं थीं।
बाबा अपने दफ्तर के काम 
अम्मां से याद रखवाते 
या यूं कहें-पूरा घर ही उनसे 
अपने-अपने काम याद रखवाता था 
पल्लू में गांठ लगाना 
बिना भूले उन्हे, सबकुछ याद कराता था।
किसी डायरी में लिखे 
जरूरी कामों की सूची 
पर हाइलाइटर-सी वो गांठ 
बिना पन्ने पलटे ही दिख जाती थी।
दूसरे खंड प्रेम में प्रेमासिक्त वे रचनाएं हैं जो प्रेम को देह की नहीं वरन आत्मा की अनुभूति का विषय बनाती हैं। यूं भी एक स्त्री जब प्रेम की बात करती है अथवा प्रेम के बारे में सोचती है तो वह उसे देह से परे रख कर ही सोचती है। उसके लिए प्रेम प्रथम और देह दोयम होती है। उसके लिए एक अदद स्पर्श भी आत्मा को छूने के समान होता है। डाॅ. शिवा भी अपनी कविताओं में प्रेम के इसी निश्च्छल एवं निद्र्वंद्व स्वरूप को व्याख्यायित करती हैं। उनकी एक कविता है ‘‘वो क्षण’’। इस कविता को कवयित्री की प्रेम कविताओं के मर्म को जानने के लिए बानगी के रूप में चुना जा सकता है-
तुम्हारे स्पर्श मात्र से 
देर तक तपता रहा था मन... 
वो क्षण ठहरा कहां था 
ठहर सकता भी नहीं था 
उसे तो बीतना ही था 
सदा के लिए... 
स्मृति हो जाने को।
स्मृतियां इसे कभी नहीं मरने देंगी 
बार-बार जीवित करती रहेंगी..... 
डाॅ. शिवा श्रीवास्तव की कविताएं एक सुंदर शाब्दिक प्रवाह लिए हैं। इनमें प्रश्न हैं, उत्तर हैं, वर्णन हैं, व्याख्याएं हैं और अनुभूतियों का विपुल भंडार है। खंड 3 स्त्रियां की कविताएं उनके सृजन की इन्हीं विशेषताओं से परिचित कराती हैं। वे प्रकृति का मानवीकारण करती हैं किन्तु मानव के अस्तित्वबोध को उजागर करने के लिए। वे प्रश्न करती हैं नदियों के उद्गम पर किन्तु उसमें निहित है स्त्री का समूचा जीवन। जैसे उनकी कविता ‘‘नदियों के घर’’ की ये पंक्तियां देखिए -
क्या नदियों के उद्गम ही 
उनके घर होते हैं?
या/ बहते-बहते जिस 
अंतिम छोर पर 
विलीन हो जाती हैं,/वो?
या फिर पहाड़ की तलहटियों में 
कोई घर होता है उनका?/या
नदियों का कोई घर होता ही नहीं 
वे जन्म से विलीन होने की यात्रा को 
ही अपना घर मानती रहती हैं?
प्रकृति को भली-भांति पढ़ना जानती है कवयित्री। खंड 4 में उनकी कविताएं प्रकृति और नदियांे को समर्पित हैं। कवयित्री का तादात्म्य है प्रकृति के साथ इसीलिए प्रकृति के क्षरण पर उसे पार पीड़ा होती है। जो प्रकृति की आवाज़ सुन सकता है, वह एक पेड़ को बेरहमी से काटे जाने पर उसके रुदन का स्वर भी सुन सकता है। कोई भी चीत्कार, कोई भी मर्मांतक पीड़ा का स्वर एक संवेदनशील मन को दहला सकता है। फिर पेड़ कटने पर उसके रुदन का स्वर कवयित्री को सुनाई देना स्वाभाविक है। कविता ‘‘उस पेड़ के कट जाने पर’’ एक ऐसे ही रुदन से जन्मी है-
ये रुदन कैसा सुनाई दे रहा है 
कहां से ये आवाज आ रही है 
किसी पेड़ से डाली गिरी है चरमरा कर 
तने से टूटने पर, आंसूओं की धार है ये
तने से मजबूत डाली कैसे गिर गई? 
नहीं-नहीं कुल्हाड़ी चलाई है 
पत्ते चीखे चिल्लाए 
कुछ लड़ते हुए नीचे गिर आए... 
संग्रह के खंड 5 में छोटी-छोटी कुल बीस कविताएं हैं जो शब्दों की सीमितता के अनुसार भले ही छोटी हों किन्तु उनके भाव विस्तृत हैं। इस खंड की छठी कविता में कवयित्री की कोमल भावनाओं को तंरगायित होते हुए स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है-
यहां न आम्र बौर है 
न कोई पगडंडी 
मैं कनुप्रिया भी नहीं 
बस तुम्हारा भाव 
मुझे वो सब बना रहा है। 
‘‘भावना के विविध रंग’’ कविता संग्रह पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विषय में डाॅक्टरेट की उपाधि प्राप्त सशक्त कवयित्री डाॅ शिवा श्रीवास्तव की उन तमाम भावनाओं की शाब्दिक प्रस्तुति है जो उद्गम का पता बताती हैं, प्रवाह के दौरान तटों से टकराती हैं, चरैवेति कहती हुई द्रुतगामी रहती हैं तथा तलछट को भी टटोलती चलती हैं। कवयित्री में भाषिक कौशल है, शिल्पविधान की पकड़ है जिससे संग्रह की कविताएं पाठक के मानस पर गहरा प्रभाव डालने में सक्षम हैं। डाॅ. शिवा श्रीवास्तव के इस संग्रह को अवश्य पढा जाना चाहिए।  
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