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Monday, December 2, 2024

वे सागर को साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय केंद्र बनाना चाहते थे- डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

स्मृति शेष जाने-माने कला मर्मज्ञ मुन्ना शुक्ला नहीं रहे, श्रुति मुद्रा संस्था की स्थापना की
वे सागर को साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय केंद्र बनाना चाहते थे
- डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

अभी तो नींद बाक़ी थी, अभी तो ख़्वाब बाक्री थे, 
तुम्हीं जो चल दिए तो सुबह के आने से क्या होगा ?

जब एक हंसमुख, मिलनसार एवं इरादे का पक्का व्यक्ति हमारे बीच से हमेशा के लिए चला जाता है तो उसके न होने पर विश्वास करना सबसे कठिन होता है। सागर का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाज 1 दिसम्बर 2024 का दिन कभी नहीं भूलेगा क्योंकि यह दिन एक ऐसे मनीषी से चिरविदा का दिन साबित हुआ जिसने ताउम्र सागर के सांस्कृतिक विकास का स्वप्न देखा और अपने इस सपने को साकार करने का हरसंभव प्रयास किया। यूं तो उनका नाम था शिवचंद्र शुक्ला, किन्तु सभी के लिए वे थे 'मुन्ना भैया' और 'मुत्रा शुक्ला'। साहित्य पर मेरी उनसे लम्बी-लम्बी चर्चाएं हुआ करती थीं। अधिकतर मोबाइल पर। आधुनिक कविता पर चर्चा करना उन्हें बहुत प्रिय था। वैसे साहित्य की लगभग सभी विधाओं की उन्हें गहरी जानकारी थी। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि 'मैं चाहता हूं कि सागर साहित्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाए। 
शिवचंद्र शुक्ला उर्फ मुत्रा भैया का जन्म 6 सितंबर 1957 को लखनऊ (उ.प्र.) में हुआ था। किन्तु सागर रक्त बन कर उनकी धमनियों में बहता था। सागर के सांस्कृतिक विकास के पक्ष में हमेशा उनका स्वर बुलंद रहा। उनके पिता पं. शिवकुमार शुक्ल धर्मशास्त्र, ज्योतिष, दर्शनशास्त्र, नाट्य संगीत एवं संगीत के प्रकाण्ड विद्वान थे। वस्तुतः सांस्कृतिक संस्कार उन्हें अपने पिता से मिले।
सागर में 1976-77 के दौरान डॉ अनिल वाजपेयी, डॉ दिनेश अत्री और डॉ. ओपी श्रीवास्तव द्वारा गठित साहित्यिक संस्था बुनियाद के वे सचिव रहे। उन्होंने 1994 में श्रुतिमुद्रा नामक संस्था का गठन किया जिसके वे सचिव रहे। श्रुति मुद्रा के अंतर्गत नृत्य आदि प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए सतत मंच उपलब्ध कराया तथा बुनियाद के अंतर्गत साहित्यिक विषय पर प्रतिवर्ष एक विशेष व्याख्यान आयोजित करते थे। वे वर्ष 2002 से आदर्श संगीत महाविद्यालय सागर की अध्यक्ष रहे। मुन्ना शुक्ला की पहचान एक कला समीक्षक के रूप में भी थी। संगीत, दर्शन एवं समाजशास्त्र जैसे विषयों पर तार्किक चर्चा एवं लेखन उनकी विशेषता थी। मुन्ना भैया ने अपने विचारों को अपने निजी जीवन में भी उतारा । उनके परिवार में साहित्य और संस्कृति की जो इन्द्रधनुषी छटा दिखती है मुन्ना वह भैया के विचारों का प्रतिफलन है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुन्ना शुक्ला का जाना सागर के कला, संगीत, संस्कृति एवं साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी रिक्तता का बोध करा रहा है, जिसकी पूर्ति संभव नहीं है। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !
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16 दिसम्बर 2023 की तस्वीर में बाएं से- डॉ कविता शुक्ला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह एवं मुन्ना शुक्ला जी।

हार्दिक आभार #दैनिकभास्कर 🙏
हार्दिक आभार अग्रज उमाकांत मिश्र जी🙏
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh 
#श्रद्धांजलि #tribute #mytribute

Monday, February 26, 2024

विदा पंकज उधास 😢 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अलविदा पंकज उधास 😞😢
सुप्रसिद्ध भजन और ग़ज़ल गायक पंकज उधास जी एक उम्दा गायक एक सरल स्वभाव इंसान, उनसे भेंट हुई थी आजतक के साहित्य महोत्सव के दौरान, जब हम दोनों अपने-अपने सत्र के आरंभ होने की प्रतीक्षा में बैठे थे और बातें चल निकली थीं, आज उनके निधन का समाचार दुख दे गया..

#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh 
#पंकजउधास #PankajUdhas #tribute #श्रद्धांजलि

Monday, March 20, 2023

बड़े भाई स्व. अशोक रायकवार जी को विनम्र श्रद्धांजलि - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जो चले जाते हैं उनकी
स्मृतियां रह जाती हैं
हमारे साथ, 
और इन्हीं स्मृतियों में रहते हैं
हमारे अपने
तो, हम क्यों सोचें कि वे चले गए
नहीं वे कहीं नहीं गए
वे थे हमारे साथ
वे हैं हमारे साथ
वे रहेंगे हमारे साथ
अपने विचारों के रूप में
हमारे मार्ग दर्शक बन कर...। 🙏

... ये शब्द मेरे अंतर्मन के वे शब्द है जिन्होंने मात्र 13 दिन के अंतराल में मेरी मां और दीदी के जाने के बाद मुझे हिम्मत दी ... ये मेरे भीतर से ही उपजे शब्द जिन्होंने मुझे टूटने से बचाया आज इन्हीं शब्दों को अपनी हार्दिक संवेदनाओं के साथ मैंने सौंपा रायकवार परिवार को ... 
    आज शाम थी स्थानीय रवींद्र भवन में बड़े भाई स्व.अशोक गोपीचंद रायकवार जी श्रद्धांजलि सभा... जिन्हें एक सड़क दुर्घटना ने असमायिक हमसे छीन लिया था.... अशोक भैया मेरी वर्षा दीदी के सहकर्मी रहे, इन दिनों पेंशनर्स समाज का कार्यभार संभाल रहे थे, साथ ही साहित्य और समाज सेवा में भी उनकी गहन रुचि थी... हर व्यक्ति के सुख-दुख में सदा साथ खड़े रहने वाले....
🙏 आपकी उपस्थिति मेरे मानस में सदा बनी रहेगी अशोक भैया 🙏
#डॉसुश्रीशरदसिंह #श्रद्धांजलि #विनम्रश्रद्धांजलि 
#DrMissSharadSingh 
🙏 हार्दिक आभार प्रिय बहन Usha Verman इन महत्वपूर्ण पलों को अपने मोबाईल कैमरे से सहेजने के लिए 🙏

Saturday, October 29, 2022

श्रद्धांजलि लेख | चित्रकार नील पवन बरुआ जिन्होंने भारतीय चित्रकला को अपनी एक अलग कला-स्थापना दी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

श्रद्धांजलि लेख

चित्रकार नील पवन बरुआ जिन्होंने भारतीय चित्रकला को अपनी एक अलग कला-स्थापना दी

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
  साहित्यकार एवं कला समीक्षक
 29 अक्टूबर 2022, हमने नील पवन बरुआ के रूप में एक ऐसे कलाकार को खो दिया जिसने रंगों में भावनाओं को जिया। उनका आर्ट आधुनिक और पारंपरिक लोक कला का एक ऐसा मिश्रण था कि उनके पेंटिंग के सामने से गुज़रते समय व्यक्ति ठिठक कर वहीं रुक जाता। मुझे चित्रकला से बेहद लगाव है। मैंने चित्रकला की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली है किंतु बचपन से ही मुझे चित्रकारी का शौक रहा और आज भी किसी जगह मुझे चित्रकला प्रदर्शनी का पता चलता है और संभव होता है तो मैं उसे देखने जरूर जाती हूं। क्योंकि यह अवसर मेरे पास बहुत कम होते हैं इसलिए मैंने इसका एक रास्ता ढूंढ निकाला और मैं अक्सर पेंटिंग्स की वर्चुअल एग्जीबिशन जरूर प्रवेश करती हूं। यह ऑनलाइन एक बहुत अच्छा अवसर रहता है, जब आप घर बैठे विभिन्न कलाकारों की चित्रकला को निकट से देख पाते हैं। ऐसी ही एक वर्चुअल एग्जीबिशन साइट पर एक बार मुझे नील पवन बरुआ की पेंटिंग्स देखने का अवसर मिला। उनकी पेंटिंग ने मुझे इतना अधिक प्रभावित किया कि मैंने फिर इंटरनेट पर ढूंढ-ढूंढ कर उनकी पेंटिंग्स देखी और उनकी कला को समझने का प्रयास किया। उनकी पेंटिंग्स में मैंने पाया कि वे अधिकतर गहरे रंगों और गहरे शेड्स का प्रयोग करते थे किंतु वह चटक नहीं होते थे बल्कि गहरी भावनात्मक एकता को परिलक्षित करते थे। उनकी पेंटिंग्स में मैंने यह विशेषता पाई कि वे अपनी पेंटिंग्स में आधुनिक कला और पारंपरिक लोक कला का बेजोड़ सम्मिश्रण करते हैं। यह प्रस्तुति बहुत कम चित्रकारों की कला में देखने को मिलती है। प्रायः कलाकार या तो लोक से जुड़ा होता है अथवा मॉडर्न आर्ट को आत्मसात कर लेता है लेकिन नील पवन बरुआ ने अपनी पेंटिंग्स में आधुनिक और लोक को इतने संतुलित रूप में प्रस्तुत किया है कि यह दोनों पक्ष एक दूसरे के पूरक बनकर उभरते हैं। कोई भी एक पक्ष दूसरे पक्ष को कमतर नहीं बनाता है।
       2021 में नागरिक पुरस्कार "असम गौरव" से सम्मानित बरुआ का जन्म 1 जून 1936 को जोरहाट के तिओक में हुआ था। 1971 में गुवाहाटी में असम फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट सोसाइटी की स्थापना करने वाले कलाकार ने एक अनोखा काम किया था, जब उन्होंने सिगरेट और माचिस के पैकेट पर मिनिएचर पेंटिंग शुरू की थी।
     बरुआ  का व्यक्तिगत जीवन बहुत ही असामान्य रहा।  गायिका  दीपाली बोरठाकुर जिन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था, उनसे बरुआ को प्रथम दृष्टि में ही प्रेम हो गया। सन 1976 में बरुआ ने दीपाली बोरठाकुर से विवाह कर लिया। जिस चीज ने उनकी प्रेम कहानी को अद्वितीय और शाश्वत बनाया, वह थी एक दूसरे के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से जुड़ा बलिदान और समर्पण।  राज्य की कोकिला के रूप में जानी जाने वाली बोरठाकुर एक दुर्लभ मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित थीं, जिससे वे लकवाग्रस्त हो गई थीं, जिससे वे व्हीलचेयर तक सीमित हो गई थीं।  दुख ने उनकी आवाज भी छीन ली। लेकिन इससे कुछ नहीं बदला।  एक सच्चे साथी की तरह बरुआ ने अपनी पत्नी दीपाली की एक बच्चे की तरह देखभाल की। वे कभी उन्हें अकेला नहीं छोड़ते थे। बरुआ कहते थे कि उनकी पत्नी के प्रति उनका प्रेम और निष्ठा उनके कलात्मक प्रयास का एक हिस्सा थी। यद्यपि दिसंबर, 2018 उनका प्रेम उनसे सदा के लिए बिछड़ गया। इसके बाद वे अकेले पड़ गए। किंतु उन्होंने अपने भीतर मौजूद प्रेम की भावना को अपनी पेंटिंग्स में बखूबी उतारा।
     नील पवन बरुआ असम के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक रहे। उन्हें किसी एक विचार या अवधारणा से बंध कर रहना पसंद नहीं था। वे विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहते थे जैसे- मिट्टी के बर्तनों, कविता, मुखौटा बनाने, वृंदावानी वस्त्र की कला को पुनर्जीवित करना आदि।
   एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी इस प्रवृत्ति के बारे में स्वीकार करते हुए कहा था कि "मैं बिना किसी पूर्वकल्पित विचार या धारणा के अनायास काम करता हूं।"         
 
      वे अपनी पेंटिंग्स के बारे में कहते थे कि "मेरी पेंटिंग मेरे बोहेमियन दृष्टिकोण को दर्शाती है। जब मैं कैनवास पर अपना काम शुरू करता हूं तो मैं कभी किसी विषय के बारे में नहीं सोचता। इसके पूरा होने के बाद ही मुझे इसके बारे में पता चलता है।"  यद्यपि उनकी अधिकांश रचनाएँ अमूर्त हैं, वे आधुनिकता से उत्पन्न होने वाली जटिलताओं और भ्रम से लेकर प्रकृति को उसकी प्राचीन महिमा में चित्रित करने तक हैं।  प्रकृति के परे भी देखते थे लेकिन प्रकृति को आधार बनाकर। यही उनके चित्रकला की मूल विशेषता थी।
      कई बार व्यक्ति को अपनी विशिष्टताओं के बारे में स्वयं भी पता नहीं रहता है। विशेष रूप से हमारे देश में कला की किसी भी विधा से जुड़ने वाले व्यक्ति की प्रतिभा को शुरू में न तो ठीक से पहचाना जाता है न उस पर ध्यान दिया जाता है जिससे वह स्वयं भी नहीं जान पाता है कि वह भविष्य में किस दिशा की ओर बढ़ेगा। इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण नील पवन बरुआ के जीवन के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने अपने चित्रकार बनने के बारे में स्वयं कहा था कि "मैं संयोग से एक चित्रकार बन गया पसंद से नहीं, क्योंकि मेरे पास तब करने के लिए और कुछ नहीं था। जब मैं लगभग 24 साल का था तब मैंने पेंटिंग शुरू कर दी थी। औपचारिक शिक्षा के लिए मेरी नापसंदगी भी इसके लिए जिम्मेदार थी। कई प्रयासों के बाद मैंने आखिरकार मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। खेतों और सामाजिक कार्यों में काम करना मुझे कॉलेज की शिक्षा से अधिक आकर्षित करता था। हालांकि मुझे कक्षाओं में जाने में मज़ा नहीं आता था, लेकिन मैं एक शौकीन था  पाठक। प्रोमोथनाथ बोस द्वारा लिखित एक पुस्तक ने मुझे प्रभावित किया। वहां मुझे शांतिनिकेतन के बारे में पता चला।" 
     इसके बाद भी शांतिनिकेतन गए और जहां से उन्हें चित्रकला की बारीकियों का अनुभव होना शुरू हुआ। लेकिन उन्होंने किसी पूर्ववर्ती चित्रकार का अनुकरण करने के बजाय अपनी एक अलग कला-स्थापना की।
     84 वर्ष की आयु में  इस संसार से विदा लेने के पूर्व उन्होंने जिस विशेषता के साथ रंगों को कैनवास पर आकार दिया, उनकी वह चित्रकला प्रेमियों के हृदय में उन्हें सदैव जीवित रखेगी।
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सागर, मध्यप्रदेश
लेखिका : डॉ (सुश्री) शरद सिंह चित्रकला में गहरी दिलचस्पी रखती है तथा कला समीक्षक के रूप में इन्होंने विभिन्न चित्रकारों के चित्रकला पर समीक्षात्मक लेख एवं टिप्पणियां लिखी है। इनकी अपनी स्वयं की पेंटिंग्स का अपना एक ब्लॉग और एक फेसबुक भी संचालित है- 
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श्रद्धांजलि लेख | चित्रकार नील पवन बरुआ जिन्होंने भारतीय चित्रकला को अपनी एक अलग कला-स्थापना दी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | साहित्यकार एवं कला समीक्षक
युवा प्रवर्तक के लिंक पर जाकर आप पूरा लेख पढ़ सकते हैं👇
https://yuvapravartak.com/71643/


Sunday, February 6, 2022

श्रद्धांजलि | आज ज्योति कलश नहीं, छलक रहे हैं आंसू | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

स्वर साम्रज्ञी लता मंगेशकर जी को मे री विनम्र श्रद्धांजलि "युवा प्रवर्तक" पर...
https://yuvapravartak.com/?p=60557
श्रद्धांजलि
आज ज्योति कलश नहीं, छलक रहे हैं आंसू
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      "यदि लता जी को सुरों की अपदस्थ अप्सरा कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। वे स्वरों की वह अप्सरा थीं जिन्हें स्वर्ग से पृथ्वी पर भेज दिया गया था ताकि वे पृथ्वीवासियों विशेष रूप से भारतवासियों को सुरों से परिचित करा सकें।"

यह अतिशयोक्ति नहीं है कि हर भारतीय को संगीत के संस्कार अगर किसी से मिले हैं तो उनमें अग्रणी नाम है  लता मंगेशकरजी का । लता जी के स्वर के द्वारा सबने जाना कि संगीत की मधुरता और संगीत का उतार-चढ़ाव क्या होता है। बिना संगीत शिक्षा लिए भी हर भारतीय ने संगीत का ज्ञान अर्जित किया और उसका श्रेय महिला स्वरों में लता मंगेशकर जी को ही दिया जा सकता है। मैंने भी अपने बचपन से ही लता जी के गाने सुने, उन्हें दोहराने  का प्रयास किया और उस पर अपने नन्हे पैरों से थिरकी भी| 
    मुझे याद है कि हमारे महिला समिति शिशुमंदिर स्कूल में वार्षिकोत्सव होने वाला था। मैं उस समय तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। मेरी शिक्षिका ने मुझे लता जी के गाने - 
"राधा न बोले, न बोले, न बोले रे, 
घूंघट के पट ना खोले रे 
राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे ..."
पर नृत्य अभ्यास कराया। जबकि वर्षा दीदी ने लता जी का क्लासिकल गाने "ज्योति कलश छलके" का अभ्यास किया। मेरी दीदी वर्षा सिंह जी का स्वर बहुत मधुर था। उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी लेकिन लता जी के गाने गा-गा कर उन्हें स्वरों के उतार-चढ़ाव का अच्छा ज्ञान हो गया था। मंच पर नृत्य प्रस्तुत करते समय मैं तो एकाध स्टेप भूल गई थी लेकिन वर्षा दीदी ने बिना भूलचूक गाना गाया और प्रथम स्थान पाया। आज वर्षा दीदी होतीं तो उनकी आंखों से भी आंसू छलक पड़ते।
     मैंने भी अपने कच्चे स्वर से लता मंगेशकर जी के न जाने कितने गाने गाए और गुनगुनाए हैं, हर भारतीय की तरह। उनके स्वर के बिना कभी बॉलीवुड के संगीत संसार की कल्पना ही नहीं की। समय के साथ फ़िल्म संगीत की दुनिया में नए स्वर जुड़ते गए लेकिन लता जी का स्थान अक्षुण्ण रहा, फ़िल्म संगीत संसार में भी और दिलों में भी। लता जी ने कभी कोई गाना सिर्फ़ गले से नहीं गाया वरन दिल से गाया। तभी तो जब आज यह गाना सुनाई देता है -"ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं, हम क्या करें..", तो दिल में हूक-सी उठती है और आंखें भर आती हैं। इस गाने को उन्होंने मोहम्मद रफ़ी साहब के साथ गाया था और अपने स्वर से इसमें इतनी संवेदना भर दी कि आज भी यह मन को आंदोलित करने की क्षमता रखता है।
      लता मंगेशकर जी की यह खूबी थी कि वे गीत के मर्म और नायिका की आयु के साथ बेहतरीन तालमेल बिठा लेती थीं। उनके गानों को जब आशा पारेख या वहीदा रहमान पर फिल्माया जाता था तो ऐसा लगता था जैसे आशा पारेख या वहीदा रहमान गा रही होंं, वहीं जब उन्होंने अपनी किशोर आयु की भांजी पद्मिनी कोल्हापुरे के लिए "ये गलियां ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा' गाना गाया तो ऐसा लगा कि जैसे पद्मिनी कोल्हापुरे ही गा रही हो। यानी स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी के लिए "जेनरेशन गैप" जैसा कुछ नहीं था, वे अपने स्वरों को नायिका के उम्र के अनुरूप ढालने की अद्भुत क्षमता रखती थीं। ऐसी विलक्षण क्षमता प्रायः देखने को नहीं मिलती है। यदि लता जी को सुरों की अपदस्थ अप्सरा कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। वे स्वरों की वह अप्सरा थीं जिन्हें स्वर्ग से पृथ्वी पर भेज दिया गया था ताकि वे पृथ्वीवासियों विशेष रूप से भारतवासियों को सुरों से परिचित करा सकें।
       आज 06 जनवरी 2022 को लता मंगेशकर जी ने हमने विदा ले ली और स्वर्ग लौट गईं लेकिन वे अपने स्वर के रूप में हमारे साथ, हमारे दिलों में रहेंगी। विदा लता जी !!!
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Tuesday, November 16, 2021

पुस्तक समीक्षा | एक शायर को बेमिसाल श्रद्धांजलि है ‘‘यारां’' | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 16.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई शायर स्व. यार मुहम्मद "यार" के ग़ज़ल संग्रह "यारां" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
एक शायर को बेमिसाल श्रद्धांजलि है ‘‘यारां’'
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह  - यारां
कवि        - यार मुहम्मद ‘‘यार’’
प्रकाशक     - श्यामलम, सागर (म.प्र.)
मूल्य         - निःशुल्क
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काम  ऐसा  जहां  में  कर जायें
ख़ुश्बू-सी बन के हम बिखर जायें

यह शेर है सागर के लोकप्रिय शायर यार मोहम्मद ‘‘यार’’ का। बेशक़ यार साहब ने अपनी शायरी से सभी के दिलों में जगह बनाई और इस दुनिया को छोड़ने के बाद भी यादों में बसे हुए हैं लेकिन इस उपभोक्तावादी दुनिया में जहां स्वार्थपरता सिरचढ़ कर बोलती है, वहां एक मरहूम शायर के प्रति किए गए अपने वादे को पूरा करना अपने आप में एक ऐसा काम है जो हर दृष्टि से प्रशंसनीय है। 28 फरवरी 1938 को जन्मे शायर यार मोहम्मद ‘‘यार’’ ने सन् 2016 की 03 फरवरी को इस दुनिया से विदा ले ली। उनके जाने के बाद 06 फरवरी 2016 को सागर नगर की साहित्य, संस्कृति और कला के लिए समर्पित अग्रणी संस्था श्यामलम द्वारा ‘‘यार’’ साहब के सम्मान में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस आयोजन के दौरान ही ‘‘यार’’ साहब की ग़ज़लों को संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने का निर्णय लिया गया और संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने इस संबंध में विधिवत घोषणा की। इस संबंध में उन्होंने ‘‘यारां’’ का आमुख लिखते हुए चर्चा की है कि -‘‘06 तारीख को हमने उन्हें श्रद्धांजलि दी, उन्हें याद किया। बात आई उनकी रचनाओं के प्रकाशन की। इमरान भाई (सार साहब के पुत्र) ने बताया कि एक संग्रह ज़रूर छापा गया था किन्तु उसमें बेशुमार शाब्दिक त्रुटियां होने की वज़ह से अब्बा ने उनका वितरण रोक दिया था। मैंने उसे दुरुस्त करा कर नए सिरे से प्रकाशित करने का निर्णय लिया। तत्संबंधी घोषणा भी श्रद्धांजलि सभा में की। श्रद्धापूर्वक स्मरण करना चाहूंगा, सभा में मौजूद मंचासीन अतिथि शिवशंकर केशरी और निर्मलचंद ‘निर्मल’ का जिन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, लेकिन उसको फलीभूत होते देखने वे आज हमारे बीच नहीं हैं।सोचा था छोटा सा काम है, अगले वर्ष इसी तारीख़ में उसका प्रकाशन कर कवमोचन करा लिया जाएगा। लेकिन भाषाई दुरुस्तीकरण की प्रक्रिया को पूरा करते-करते आज पांच साल बीत गए। हांलाकि इस अवधि में जो किया जाना संभव था, मैंने किया।’’
अपने वादे को पांच दिन में भूल जाने वाले आज के माहौल में पांच साल तक वादे के अमल में जुटे रहना बड़ा जीवट वाला काम है। अंततः श्यामलम संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने अपने वादे को पूरा किया और यार मुहम्मद ‘‘यार’’ साहब की चालीस ग़ज़लों का एक खूबसूरत संग्रह प्रकाशित कर कर दम लिया। इस संग्रह के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्य जुड़े हुए हैं। पहला तथ्य तो यह कि यह श्यामलम संस्था का पुस्तक प्रकाशन की दिशा में प्रथम सोपान है। दूसरा तथ्य यह कि ‘‘यारां’’ पर कोई शुल्क अंकित नहीं किया गया है। यह निःशुल्क है। इस संबंध में उमाकांत मिश्र का कहना है कि मैं ‘‘श्रद्धा कभी बेची नहीं जाती है। यह श्यामलम की ओर से यार साहब को श्रद्धांजलि है।’’ यह भावना स्तुत्य है। क्योंकि लेखन एवं प्रकाशन की दुनिया से जुड़े सभी लोग जानते हैं कि पुस्तक प्रकाशन में अच्छा-खासा खर्च आता है। यह सारा व्यय मूल रूप से श्यामलम संस्था और संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र द्वारा उठाया गया है। साहित्य और साहित्यकार की उनकी प्रतिबद्धता की राह में ‘‘यारां’’ मील का पत्थर है।
समीक्ष्य ग़ज़ल संग्रह के नामकरण के संबंध में उमाकांत मिश्र आमुख में ने जानकारी दी है कि डाॅ. सुरेश आचार्य ने संग्रह का नाम ‘‘यारां’’ रखा। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी, उर्दू और संस्कृत के गहनज्ञाता हैं। उनके द्वारा यार साहब के ग़ज़ल संग्रह को ‘‘यारां’’ नाम दिया जाना उनकी शायरी को तो प्रतिबिम्बित करता ही है, साथ ही जो ‘‘यार’’ साहब के स्वभाव से परिचित हैं वे समझ सकते हैं कि यह नाम ‘‘यार’’ साहब के याराना स्वभाव को भी रेखांकित करता है। इस ग़ज़ल संग्रह से जुड़ा तीसरा तथ्य यह है कि इसमें कठिन प्रतीत होने वाले उर्दू शब्दों का प्रत्येक पृष्ठ के फुटनोट में अर्थ दिया गया है ताकि इन ग़ज़लों को पढ़ने वालों को इनके मर्म को समझने में तनिक भी असुविधा न हो। शाब्दिक त्रुटिहीनता का हरसंभव प्रयास किया गया है। क्योंकि यही वह संवेदनशील पक्ष था जिसके कारण ‘‘यार’’ साहब ने अपनी प्रकाशित पुस्तक को वितरित करने से रोक दिया था जबकि उसके प्रकाशन में वे धन व्यय कर चुके थे। अतः उनकी इस भावना का संग्रह में सावधानीपूर्वक ध्यान रखा गया है। संग्रह में एक संक्षिप्त भूमिका साहित्यकार पी. आर. मलैया द्वारा लिखी गई है जिसमें उन्होंने ‘‘यार’’ साहब की शायरी की खूबियों पर प्रकाश डाला है।
यार मुहम्मद ‘‘यार’’ सागर के मदार चिल्ला, लाजपतपुरा वार्ड में जन्मे थे। अलीगढ़ यूनीवर्सिटी से सम्बद्ध उर्दू अदब से उन्होंने मेट्रिक किया। उन्हें पहलवानी का शौक था। सागर नगर के प्रमुख पहलवानों में उनकी गिनती होती थी। पहलवानी के साथ ही उन्हें शायरी का भी शौक रहा। वे उस्ताद मियां मेहर (नवाब साहब) के शागिर्द रहे। उन्होंने हिन्दी, उर्दू और बुंदेली में शायरी की। वे सामाजिक समरसता एवं कौमी एकता में विश्वास रखते थे। ‘‘यार’’ साहब ने नातिया मुशायरों में भी अनेक बार भाग लिया। कई सम्मानों से उन्हें सम्मानित भी किया गया।
शायरी अपने शायर की भावनाओं की प्रतिनिधि होती है और साथ ही उसका सकल जग से भी सरोकार होता है। यार मुहम्मद ‘‘यार’’ की शायरी में दीन-दुखियों के प्रति उनकी संवेदनाएं स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। उनके ये चंद शेर देखें-
धूप से इस जहां  को  बचा लीजिये
अपने दामन का साया अता कीजिये 
आपके नाम  की  माला जपता रहूं
रंग अपना यूं  मुझ  पे चढ़ा दीजिये
आप ही आप मुझको नज़ा आएं बस
आंखों में खाके-पा को लगा दीजिए 

‘‘यार’’ साहब जब ग़ज़ल के अस्ल इश्क़िया मिजाज़ को थामते हैं तो उनकी इश्क़िया ग़ज़ल भी एक गरिमा के साथ सामने आती है। उदाहरण देखें-
उसका फ़साना दिल को जलाने के लिए है
हर बात मेरी  दिल को  लुभाने के लिए है
हर सांस  यूं  तो  मेरी  ज़माने के लिए है
ये  जान  मगर  उनपे  लुटाने  के लिए है
मैं जानता हूं, दिल से  तुझे  चाहता है  वो
नाराज़गी  तो  मुझको  सताने  के लिए है

इश्क़ की बात करते हुए ‘‘यार’’ साहब लौकिक और अलौकिक प्रेम को एकसार करते हुए सूफ़ियाना अंदाज़ में जा पहुंचते हैं। वे इश्क़ को दुनिया की सबसे बड़ी नेमत करार देते हैं और प्रेम के व्यक्तिगत अनुभव को पीढ़ियों के प्रेम तक ले जाते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखिए-
इश्क़ में राज़े-मुहब्बत है  समझता क्या है
इश्क़ गर हो न तो इंसान में रक्खा क्या है
इक तक़ाज़ा ही तो इंसानियत का है बाक़ी
वर्ना  इंसान से इंसान  का  रिश्ता क्या है
तेरे जल्वों का करिश्मा है ये  रौशन आंखें
नूर आंखों में अगर हो न तो जंचता क्या है
साये-दामन में  शाम  आपके गुज़र जाए
और बस इसके सिवा मेरी तमन्ना क्या है
‘‘यार’’ अज्दाद की इस घर में ख़ुश्बुएं बसतीं
वर्ना  अपना  दरो-दीवार से  रिश्ता क्या है

‘अज्दाद’ अर्थात् पुरखों की ख़ुश्बूओं वाले घर को ही अपना घर मानना ‘‘यार’’ साहब का संयुक्त परिवार और पीढ़ियों में विश्वास रखने को दर्शाता है। उनकी वतनपरस्ती भी इन्हीं शेरों में बखूबी झलकती है।
यार मुहम्मद ‘‘यार’’ के कई शेर ऐसे हैं जिनमें उनकी कलम दुख-सुख, मिलन-विरह, के बीच अपने बाहर-भीतर के सफर की कश्मकश को बड़ी सुंदरता और गहराई से शब्दांकित करती है। वे आत्मीयजन के व्यवहार में होने वाले क्रमिक परिवर्तन को भी बखूबी सामने रखते हैं -
पहले थे  मेहरबां, बदगुमां हो गये
अब वो  मेरे लिए आस्मां  हो गये
बिन मेरे वो जो रहते नहीं थे ज़रा
कितने अब फ़ासले दरम्यां हो गये
हमने उनके लिए जान भी दी मगर
आज वो  ग़ैर के  राज़दां हो गये
साथ ले-ले के अपने चले जो मुझे
दूर वो सबके सब  कारवां हो गये

‘‘यार’’ साहब के शेरों में दुनियावी चलन की सच्ची तस्वीर पूरे तल्ख़ रौ में उभर कर सामने आती है। लेकिन खूबी यह है कि वे आज के असंवेदी माहौल के प्रति मात्र उलाहना ही नहीं देते हैं, वरन सकारात्मक सुझाव भी देते हैं-
क्या नहीं बिक रहा  आज संसार में
दिल का सौदा भी होता है बाज़ार में
क्या मिलेगा  हमें  बोलो  तकारर में
बात  बन  जाएगी,  दोस्तो  प्यार में
लालो-गौहर से भी बेशक़ीमत  है ये
वक़्त को  हम  गंवाएं  न  बेकार में

सागर नगर के ही नहीं वरन् उर्दू अदब के एक नामचीन शायर यार मुहम्मद ‘‘यार’’ ने शायरी को समृद्ध किया। साथ ही उनके इस योगदान को संग्रह के रूप में दस्तावेज़ बनाने में श्यामलम संस्था ने जो महती कार्य किया वह साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। ‘‘यार’’ साहब की शायरी को निश्चित रूप से पढ़ा जाना चाहिए जो कि अब ‘‘यारां’’ के प्रकाशन से आसान हो गया है। ‘‘यारां’’ के अगले संस्करण को समूल्य किया जा सकता है, बढ़ती मंहगाई एवं संस्था के सीमित साधनों को देखते हुए श्यामलम संस्था को इस पर विचार करना चाहिए। इससे उनके श्रद्धांजलि के पवित्र उद्देश्य पर कोई आंच नहीं आएगी। बहरहाल, इस ग़ज़ल संग्रह का श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित होना तथा निःशुल्क रखा जाना अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। बारम्बार प्रशंसनीय है। 
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Thursday, April 30, 2020

ऋषि कपूर के निधन पर त्वरित टिप्पणी- बहुमुखी अभिनेता एवं साहसी व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धांजलि! - डॉ (सुश्री) शरद सिंह,

Dr. Sharad Singh
 कल इरफान खान और आज ऋषि कपूर...😢 ऋषि कपूर के निधन पर मेरी त्वरित टिप्पणी वेब मैगजीन 'युवा प्रवर्तक' ने प्रकाशित की है... लिंक है..
http://yuvapravartak.com/?p=30896

हार्दिक आभार 'युवा प्रवर्तक' 🙏

ऋषि कपूर के निधन पर त्वरित टिप्पणी-

       बहुमुखी अभिनेता एवं साहसी व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धांजलि!
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

     विश्वास करना कठिन है कि हमने ऋषि कपूर को खो दिया। कल ही तो इरफान खान को अंतिम विदाई दी और आज ऋषि कपूर के जाने का समाचार.....धैर्य की परीक्षा कठिन से कठिनतर होती जा रही है।
       ऋषि कपूर एक वर्सेटाईल अभिनेता थे। कपूर खानदान की कसावट में पले-बढ़े होने के बावजूद उन्होंने जिन्दगी को अपने ढंग से जिया। ‘श्री 420’ में चाईल्ड आर्टिस्ट के रूप में रूपहले पर्दे पर पहली बार आने वाले ऋषि कपूर जब ‘बॉबी’ में ‘राजा’ के रोल में पहली बार हीरो बने तो वे सही मायने में यूथ आईकॉन बन गए। भला कौन भुला सकता है ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ के ‘अकबर इलाहाबादी’ को या ‘कर्ज’ के ‘मोण्टी’ या ‘प्रेमरोग’ के ‘देवधर देव’ को। फिल्म ‘मंटो’ के ‘प्रोड्यूसर’ और ‘मुल्क’ के ‘मुराद अली मोहम्मद’ को भी भुलाया नहीं जा सकता है। ऋषि कपूर द्वारा अभिनीत पात्र इस तरह अमर हो गए हैं कि स्वयं ऋषि कपूर भी सदा बसे रहेंगे हमेशा अपने प्रशंसकों के दिलों में। उनके अभिनय की ही नहीं बल्कि उनकी बुद्धिजीविता का लोहा भी सभी मानते थे। ट्विटर पर उनकी राजनीतिक टिप्पणियां खलबली मचा दिया करती थीं। वे अपनी मन की कहने से कभी हिचकते नहीं थे। बॉलीवुड को विविधतापूर्ण अभिनय और राजनीतिक टिप्पणियां करने का साहस देने वाले अभिनेता ऋषि कपूर को विनम्र श्रद्धांजलि!
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सागर (मध्यप्रदेश)



फिल्म अभिनेता इरफान खान को श्रद्धांजलि...‘मैं मरा नहीं, बस सोया हूं’ -डॉ शरद सिंह

Dr. Sharad Singh
फिल्म अभिनेता इरफान खान को श्रद्धांजलि स्वरूप मेरा लेख जो आज वेब मैगजीन युवा प्रवर्तक ने दिनांक 30.04.2020 को प्रकाशित किया है...आप भी पढ़िए और इस लिंक पर भी विजिट कीजिए... http://yuvapravartak.com/?p=30886
हार्दिक आभार युवा प्रवर्तक 🙏
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 श्रद्धांजलि स्वरूप लेख-

जाना एक संघर्षशील, भावप्रवण अभिनेता इरफान खान का

‘मैं मरा नहीं, बस सोया हूं’         
                       -डॉ शरद सिंह
         सिनेमा के रुपहले पर्दे पर एक कलाकार जितनी बार मरता है, वह उतनी ही सदियां जोड़ता जाता है अपने जीवन में। सच तो यह है कि एक संवेदनशील, भावप्रवण अभिनेता कभी मरता नहीं हैं, अपने चाहने वालों के दिलों में जिन्दा रहता है सदियों तक। इरफान खान नामक इंसान की दैहिक मृत्यु भले ही हो गई किन्तु अभिनेता इरफान खान अपने अभिनय के नाना रूपों में आज भी ज़िन्दा हैं और हमेशा रहेंगे। इरफान खान ने मुंबई के अस्पताल में अंतिम सांस ली। एक लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे इरफान खान को बीते दिनों ही अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। इरफान का जाना बॉलीवुड को स्तब्ध कर गया है। यह संवेदनशील कलाकार देश में सुख और शांति चाहता था। कश्मीर में 2013 में हैदर फिल्म की शूटिंग के दौरान इरफान क्रू मेंबर से चर्चा करते हुए कहा करते थे कि  इतनी खूबसूरत जगह को कैसे हिंसा की आग में झोंक दिया गया।
यूं तो इरफान खान को सन् 2018 में न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से पीड़ित होने का पता चला था। एक भयावह बीमारी। मगर इरफान भयभीत नहीं हुए। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में हंस कर कहा था,‘‘यह बीमारी मुझे मार भले ही दे लेकिन डरा नहीं सकती है।’’ यह आत्मविश्वास ही था जो उन्हें लंदन में ईलाज के दौरान अवसाद से घिरने नहीं दिया। वे लगभग स्वस्थ हो कर लौटे और फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ को पूरी करने में जुट गए। वे ‘शो ऑफ’ करने वाले अभिनेता नहीं थे। हॉलीवुड निर्देशक कॉलिन ट्रेवोर ने भी ट्वीट कर इरफान को श्रद्धांजलि दी है। 'इरफान खान को खोने का गहरा दुख है। एक विचारशील व्यक्ति जिसे आस-पास की दुनिया यहां तक कि दर्द में भी खूबसूरत लगती थीं।’ इरफान खान ने ट्रेवोर के निर्देशन में बनी फिल्म जुरासिक वर्ल्ड में सीईओ और मालिक साइमन मसरानी की भूमिका निभाई थीं। उन्होंने इस बात का बढ़-चढ़ कर ढिंढोरा नहीं पीटा कि उन्होंने हॉलीवुड की ‘‘जुरासिक वर्ल्ड’’ में लीड रोल किया था। वे सादगी पसंद थे। हंसमुख और किसी हद तक अंतर्मुखी। वे अपने दुख-कष्ट को दूसरों के सामने रोना पसंद नहीं करते थे। उनका उसूल था कि खुशी बांटने से खुशी मिलती है, तो खुशी ही बांटी जाए, दुख नहीं।
इरफान खान जन्म 7 जनवरी 1967 को जयपुर (राजस्थान) में हुआ था। उनके पिता का टायर का कोराबार किया करते था। इरफान ने एमए की पढ़ाई के दौरान ही दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप हासिल कर ली थी। इरफान सन् 1984 से ही अभिनय के क्षेत्र से जुड़ गए। इरफान खान का अभिनय का सफ़र दिल्ली में थिएटर से आरम्भ हुआ। इसके बाद इरफान ने दिल्ली से मुंबई का सफर तय करने का फैसला लिया। मुंबई पहुंचकर ’चाणक्य’, ’भारत एक खोज’, ’सारा जहां हमारा’, ’बनेगी अपनी बात’, ’चंद्रकांता’ और ’श्रीकांत’ जैसे सीरियल में काम किया। थिएटर और टीवी सीरियल्स में काम करके इरफान अपनी पहचान हासिल कर ही रहे थे तभी फिल्ममेकर मीरा नायर ने अपनी फिल्म ’सलाम बॉम्बे’ में एक कैमियो रोल दिया, लेकिन जब फिल्म रिलीज़ हुई तो उनका शॉट काट दिया गया था।
इरफान खान का बॉलीवुड में कभी कोई गॉड फादर नहीं था। और ना ही उन्हें किसी और का कोई सपोर्ट था। इरफान ने अपने शुरुआती कैरियर में टेलीविजन धारावाहिकों से पहचान बनाई थी। लेकिन एनएसडी से पढ़ाई करने के बाद इरफान के सपने धारावाहिकों तक ही सीमित नहीं थे। उन्हें विश्व में ख्याति प्राप्त करना थी जिसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और अपना मुकाम हासिल किया।
इरफान खान का कहना था कि उनके कैरियर में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती उनका चेहरा था। अपने एक पुराने इंटरव्यू में इरफान ने खुद इस बारे में कहा था। इरफान ने बताया था कि शुरुआती दौर में उनका चेहरा लोगों को विलेन की तरह लगता था। वो जहां भी काम मांगने जाते थे, निर्माता और निर्देशक उन्हें खलनायक का ही किरदार देते। जिसके चलते उन्हें कैरियर के शुरुआती दौर में सिर्फ निगेटिव रोल ही मिले। लेकिन उनकी मेहनत और दमदार एक्टिंग ने इस चुनौती का सामना किया। इसके लिए उन्होंने छोटी बजट की फिल्मों में हाथ आजमाया जहां उन्हें हीरो के रूप में पहचान बनाने का मौका मिला।
इसके बाद साल 1990 में इरफान ने फिल्म ’एक डॉक्टर की मौत’ में काम किया। जिसेकी समीक्षाकारों  ने बहुत प्रशंसा की। उसके बाद इरफान ने ’द वॉरियर’ और ’मकबूल’ जैसी फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पहली बार 2005 की फिल्म ’रोग’ में लीड रोल किया। उसके बाद फिल्म ’हासिल’ के लिए इरफान खान को उस साल का ’बेस्ट विलेन’ का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। इरफान खान ने ’स्लमडॉग मिलियनेयर’ फिल्म में भी पुलिस इंस्पेक्टर का विशेष रोल निभाया। इस फिल्म को कई अवार्ड मिले। इसके बाद इरफान के लिए हॉलीवुड के दरवाज़े भी खुल गए। जहां उन्होंने तीन फिल्में कीं जिनमें एक थी ‘‘जुरासिक वर्ल्ड’’। इस बीच इरफान ने 23 फरवरी 1995 को एनएसडी ग्रेजुएट सुतपा सिकदर से शादी की और उनके दो बेटे बाबिल और अयान हुए।
इरफान खान ने अपने 30 साल के फिल्मी कैरियर में 50 से अधिक हिंदी फिल्मों में काम किया है। इरफान खान ने कई यादगार किरदारों को निभाया और हाल ही में उनकी फिल्म ’अंग्रेजी मीडियम’ रिलीज हुई थी। इरफान खान के कुछ खास रोल हैं जिनके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। जैसे सन् 2001 में फिल्म ‘‘द वॉरियर’’ में इरफान खान की इस ब्रिटिश इंडियन फिल्म की कहानी सामंती राजस्थान के योद्धा की है जो युद्ध से मुंह मोड़ने की कोशिश करता नजर आता है. इस फिल्में उनका स्टाईल लोगों को बहुत भाया। सन् 2012 में ‘‘पान सिंह तोमर’’ में एथलीट से डैकेत बने एक शख्स की कहानी में उनका किरदार इतना जानदार था कि उसने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाकर रख दी। यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति के जीवन पर आधारित थी जो प्रतिभावान होते हुए भी परिस्थितियों के हाथों की कठपुतली बनता चला गया। मध्यप्रदेश के मुरैना में जन्में पान सिंह तोमर ने भारतीय सेना में नौकरी की। सूबेदार पद पर रहा। मगर घर, परिवार और गांव के प्रपंच ने उसे ऐसा फंसाया कि वह बागी डकैत बन कर चम्बल के बीहड़ों में उतर गया। उसे पकड़ने के लिए जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने पुलिस फोर्स को आदेश दिया था तब पानसिंह ने भी अर्जुन सिंह को चुनौती दे डाली थी। एथलीट पान सिंह तोमर, सात बार भारतीय राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। वह राष्ट्रीय स्तर का एथलीट था मगर उसकी किस्मत में लिखा था पुलिस एन्काउन्टर में मारा जाना। ऐसे पानसिंह तोमर का किरदार निभाने के लिए इरफान स्वयं चम्बल के बीहड़ों में गए। पान सिंह के रिश्तेदारों एवं परिचितों से मिले। उन्हें लगा कि ऐसे जीवट चरित्र को निभाने के लिए सिर्फ़ स्क्रिप्ट का सहारा नहीं लिया जा सकता है। यदि पात्र को जीवन्त करना है तो उसकी ज़मीन से जुड़ना होगा। उसके अनुभवों को महसूस करना होगा। बॉलीवुड में ऐसे विरले अभिनेता हैं जो अपने अभिनय के लिए अनुभव जुटाने निकल पड़ते हैं। इरफान की मेहनत रंग लाई। फिल्म ‘‘पानसिंह तोमर’’ सुपरहिट रही। इरफान खान को फिल्म ’पान सिंह तोमर’ के लिए नेशनल अवॉर्ड से सरफराज़ किया गया और साथ ही उन्हें भारत सरकार की तरफ से पद्मश्री अवॉर्ड भी दिया गया।
इरफान ने सन् 2013 में फिल्म ‘‘किस्सा’’ में एक ऐसा शख्स का रोल किया जो अपने वंश को आगे बढ़ाना चाहता है। इसके लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। इससे एकदम अलग, सन् 2013 में ‘‘द लंच बॉक्स’’ में उन्होंने ऐसे व्यक्ति का जीवन प्रस्तुत किया जिसकी पत्नी का निधन हो चुका है, और उसे वाया लंच बॉक्स एक विवाहिता से प्रेम हो जाता है। विलेन जैसे चेहरे वाले इरफान के लिए प्रेम का अंतर्द्वन्द्व अभिनीत करना बहुत बड़ी चुनौती थी लेकिन इस चुनौती को उन्होंने न केवल स्वीकार किया बल्कि रोल में ऐसी जान डाल दी कि हर मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा व्यक्ति अपने आप में उस प्रेमी को तलाशने लगा।
’स्लमडॉग मिलेनियर’ में भी इरफान अपने अभिनय के दम पर सब पर छाए रहे। बहुत ही संवेदनशील घटना आरुषी हत्याकांड पर आधारित फिल्म ‘‘तलवार’’ में सन् 2015 में इरफान खान ने सीबीआई अफसर का किरदार बहुत ही कमाल के अंदाज में निभाया और इस पात्र को अविस्मरणीय बना दिया। यह एक सेमी निगेटिव रोल था मगर इरफान ने इसे बहुत ही पॉजिटिव तरीके से निभाया।
लंदन में ईलाज के दौरान अपने अनुभवों को इरफान लिखते रहे और अपने मित्रों, परिचितों से भी साझा करते रहे। उसी दौरान उन्होंने अपने थिएटर के जमाने के एक डॉयलॉग को ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब मुझे मरने का एक सीन दिया गया तो उसे मैंने किया। उस पर समीक्षक ने लिखा कि ‘इरफान बहुत अच्छे ढंग से मरे।’ तब मैंने उन्हें फोन किया और कहा कि ‘‘मैं मरा नहीं, बस सोया हूं।’’ आज ऐसा प्रतीत होता है कि गोया इरफान खान अपने चाहने वालों के आंसू पोंछते हुए यही कह रहे हों कि ‘‘मैं मरा नहीं, बस सोया हूं।’’ निसंदेह इरफान खान अपने चाहने वालों के दिलों में हमेशा रहेंगे जीवित, क्योंकि अभिनेता कभी मरता नहीं है, वह जिन्दा रहता है अपने किरदारों में।
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*सागर (मध्यप्रदेश)*







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