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Thursday, April 27, 2023

बतकाव बिन्ना की | "इते की झेल ने पाओ हुइए बेचारो | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"इते की झेल ने पाओ हुइए बेचारो !" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
इते की झेल ने पाओ हुइए बेचारो !                
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      मोरी औ भौजी की बतकाव चल रई हती। भौजी पिलानिंग बना रई हतीं के कऊं घूमबे के लाने जाओ चाइए। औ बातई बात में हम ओरें रमझिरिया, भीमकुंड से ले के लेह-लद्दाख औ काठमांडू लों हो आए। मनो, गए कऊं नई, बस सरकारी पिलानिंग घांई पिलानिंग करत-करत टेम पास करत रए। हम दोई जनी ने ऐसो मुतके बार करो आए, के पिलानिंग सो खूब करी मनो आए-गए कऊं नई। जे टेम पे हम ओरन की बतकाव चल रई हती ऊ टेम पे मोरी नज़र परी के भैयाजी बेर-बेर अपनो मोबाईल पे टकटकी बांधत त्ते औ सोच में पर जात्ते। सो, जो भौजी बात खतम कर के चाय-पानी खों उठीं के मैंने भैयाजी की सुध लई।
‘‘जा बेर-बेर अपने मोबाईल पे का देख रए भैयाजी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कछू नहीं!’’ भैयाजी उदासे-से बोले।
‘‘कछू तो जरूर फिकर वारी चीज देख रए, तभईं तो आपको मों लटको दिखा रओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ, मनो दुख सो हो रओ!’’ भैयाजी ने मान लओ।
‘‘काय को दुख? ऐसो का देख लओ, के जी दुखा गओ?’’ भैयाजी को स्वीकारबो सुन के मोय चिन्ता भई। कोनऊं गंभीर बात तो नोंईं?
‘‘कछू बताओ भैयाजी! आप सो मोय डरा रए। ऐसो का हो गओ जो आप को दुख लग रओ।’’ मैंने भैयाजी से फेर के पूछी।
‘‘होने को का, तुमने चीता की वीडियो देखी?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘चीता की वीडियो? मैंने सो नेशनल जियोग्राफी चैनल औ एनिमल प्लैनेट चैनल पे हाजार खांड बेर चीता के वीडियो देखे आएं।’’ मैंने तनक शान मारी, काय से के मोय पतो आए के भैयाजी ने जे दोई चैनल कभऊं चालू नईं कराए।
‘‘हम बे वारी वीडियो की नई कै रए।’’ भैयाजी बोले। उनकी आवाज मनो मरी-मरी सी लग रई हती।
‘‘सो, कौन से वीडियो की कै रए आप?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे जे वारी, जा इमें देखों बेचारो चीता कैसो लड़खड़ात भओ दिखा रओ....’’ भैयाजी बतान लगे के मैं बीचई में बोल परी।
‘‘सो गरमी के मारे लड़खड़ा रओ हुइए। उन ओरन खों भौतई गरमी लगत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बा गरमी से नोईं लड़खड़ा रओ। लेओ, तुमई देख लेओ अपनी सगी आंखन से।’’ कैत भए भैयाजी ने अपनो मोबाईल मोरी आंखन के आंगू कर दओ।
‘‘अई, जो का?’’ मोरे मों से निकरो। मैंने भैयाजी से उनको मोबाईल अपने हाथ में ले के बा वीडियो देखी। ऊमें लोहा की जाली के ऊ तरफी एक चीता चलत में लड़खड़ात भओ दिखा रओ हतो। बा दो-चार कदम चलो औ उतई गिर परो। बा वीडियो के संगे खबर दई गई रई के गिरत साथई चीता के प्रान निकर गए। बा वीडियो देख के मोरो मुंडा सोई खराब हो गओ।
‘‘जे तो भौतई बुरौ भओ!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ, जेई से सो हमाओ मन खराब हो गओ।’’ भैया जी बोले।
‘‘मनो जा ई खबर में बताओ गओ आए के जा चीता खों हार्टफेल हो गओ रओ। बाकी मैंने सो पैली बेर सुनी के कोनऊं जीता खों हार्टफेल भओ। काय से के उन ओरन खों ले के कहनात चलत आए के- शेर-चीता घांईं करेजो। जे इत्तो कमजोर करेजा को कैसे निकरो?’’ मोय अचरज भई।
‘‘जेई सो सोचबे वारी बात आए बिन्ना! काय से के जा न्यूज में बताओ गओ आए के जा चीता नमीबिया से कूनो नेशलन पार्क लाओ गओ रओ। सो उते नमीबिया के हाल अपने इते के हाल से कोन से अच्छे आएं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हाल से का मतलब?  बा उते जंगल में रैत रओ, औ इते ला के इते जंगल में राखो गओ। मनो उते के मुकाबले इते जांगा जरूर कम रई। पर जंगल सो जंगल ठैरो, चाय बड़ो होय चाय छोटो।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, जेई सो हम सोच रए के बा बिचारो इते आ के ऐसो कैसो गिर-गुरा के मर गओ? कओ जा रओ के ऊको हार्टफेल भओ। बा का कहाउत आए डाक्दर हरन की भाषा में- कार्डिएक आर्टरी फेल।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ! जे सो हमने जेई सुनी रई के ई टाईप से इंसान मरत आंए। मनो अब जे चीता सोई मर गओ।’’ मैंने कई। मोय दुख बी हो रओ हतो औ अचरज बी।
‘‘हम बताएं के भओ का आए बिन्ना, अपने संगवारन से बिछड़ के जा चीतो को रो-रो के कलेजा कमजोर पर गओ हुइए। ऊपे इते की दसा देख के ऊको लओ हुइए के आसमान से गिरे सो खजूर पे अटके। इते केा भ्रष्टाचार, इते की राजनीति, इते की मैंगाई, इते की मारामारी देख के ऊको दिल दुखी हो गओ हुइए। करत-करत इत्तो कमजोर हो गओ के सह ने सको बेचारो, औ टें बोल गओ।’’ भैयाजी ने चीते खों हार्टफेल होबे के कारन गिना डारे।  
‘‘जे सो आपने सही कई भैयाजी! मनो बा चीता को एकाध बेरा संसद औ कोनऊं विधान सभा को फेरा लगवा दओ जातो सो ऊको करेजो तनक मजबूत हो गओ रैतो। ऊको इते के दांवपेंच औ बेसर्मी समझ में आ जाती, ऊको हार्ट मट्ठर हो जातो औ बा बेचारो जिन्दा रैतो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ, जेई हम सोच रए हते के अब की बेरा जो नओ चीता लाओ जाए, सो ऊको पैले कोनऊं नेताजी के इते चार दिनां राखो जाओ चाइए। फेर ऊको संसद औ विधान सभा में घुम्मी कराओ जाओ जाए। ईसे ऊको करेजा तनक दमदार हो जेहे। ने तो जेई वारे घांई हाल हुइए के ने गाज गिरी, ने बाज औ भई चिरैया टें।’’ भैयाजी बोले। फेर बे कछू सोचत भए बोले के ‘‘बिन्ना काल दुफैरी में आइयो, जो लौं हम एक दरखास्त बना के तैयार राखबी, तुम ऊको पीएम हाउस खों ईमेल कर दइयो।’’
‘‘पीएम हाउस? आप का करहो, पोस्टमार्टम रपट लेके? चीता खों मरने हतो सो मर गओै, आपके कछू करबे से बा जी ने जेहे। सो आप ने मंगाओ पोस्टमार्टेम की रपट।’’ मैंने भैया जी से कई।  
‘‘अरे हम पोस्टमार्टम की रपट की नई कै रए बिन्ना! हम सो पीएम हाउस मने परधानमंत्री भवन की कै रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो उते चिट्ठी लिख के का करहो? अपने परधानमंत्री जी सोई दुखी हुइएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ, उनको सो दुखी होबो बनत आए, काय से के बेई सो मंगा लाए हते जे चीता हरें। सबसे पैले उनई ने देखो रओ। सो बे का दुखी ने हुइएं? जेई से सो हमें एक चिट्ठी उनके लाने लिखनी आए के जीमें पैले सो हम उनके अंसुआ पोंछहें, उनको सहूरी बंधाहें, औ फेर सलाह देहैं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप देहो उनको सलाह? जो का कै रै? उनके लाने सलाहकारन की भर्ती करी जात आए। औ आप चले हो उनको सलाह देबे के लाने। अपनों भी टेम खोटो करहो औ उनको टेम बी।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘अरे, हमें ज्यादा कछू नईं, बस, इत्तो लिखने आए के बा चीता इते की झेल ने पाओ हुइए, सो अगली बेरा कछू मुस्टंडा टाईप को चीता मंगइयो जो इते के महौल खों झेल पाए। औ इते के रंग में रंग के रंगदारी करन लगे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जै हो आपकी भैयाजी! जो ऐसो कछू लिखने होय सो जे मीडिया के लाने भेजियो पीएम हाऊस नोईं। बाकी मोय चलन देओ, ने तो आप मोय सोई कच्ची में बिधा देहो।’’ मैंने उते से खिसकबे में ई अपनी भलाई जानी।
बा चीता के लाने मोय सोई दुख भओ। बाकी अब ‘‘शेर-चीता सो करेजो’’ वारी कहनात बदलबे की सोचने परहे। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Friday, April 7, 2023

बतकाव बिन्ना की | मोय बतइयो के कोन-कोन की मुंडी कन्फुजिआई ? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"‘मोय बतइयो के कोन-कोन की मुंडी कन्फुजिआई"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
मोय बतइयो के कोन-कोन की मुंडी कन्फुजिआई               
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

जो मैं भैयाजी के घरे पौंची सो बे कोनऊं से गिचड़ करत मिले।
‘‘सो उन्ने जे काय नईं कै दई सूदी-सूदी के जे सब कछू बीपीएल वारी लुगाइयन के लाने आए। बेफालतू में सबरी उचकत फिर रईं। जभईं उने पतो परत आए के बे तो हजार रुपैया पाने के जोग नइयां सो उनखों मों टुंइयां सो रै जात आए। मनो कोनऊं की भावनाओं से ऐसो नई खेलो जाओ चाइए।’’ बे दूसरे भैयाजी की पीठ मोरी तरफी हती सो मैं एकदम पैचान ने पाई। बाकी आवाज सो पैचानी-सी लगी।
‘‘का बैस चल रई भैयाजी?’’ मैंने दोई जने से पूछी। बे दूसरे भैयाजी ने मोरी आवाज सुनी सो मुड़ के मोरी तरफी देखी।
‘‘अरे आओ बिन्ना! कां से अवाई हो रई?’’ बे रायकवार दाऊ हते।
‘‘कहूं से नईं। घरई से चली आ रई। बाकी आप ओरन की का गिचड़ चल रई? उते नुक्कड़ लो आवाजें सुनाई पड़ रईं।’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, जे दाऊं खों कछू समझ में सो आत नइयां, बस, लगे रैत आएं दोंदरा देबे में।’’ अब की भैयाजी बोले।
‘‘सो हो का गओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘भओ जे आए बिन्ना, के जो अबे चल रओ ने, के सबई बहनों खों हर माह हजार रुपैया सरकार की तरफी से दै जैहें। हमाई घरवारी की उम्मर अबई साठ की होबे में पांच मईना बाकी आए, सो ऊने ठेन करी के जाओ औ हमाए लाने फारम ला के भर देओ। अब हमें नई मिलो टेम। मनो बेई टेम पे हमाए मोहल्ला में जे फारम भरवाबे के लाने शिविर लगाओ गओ। हमाई घरवारी बड़ी सज-संवर के उते शिविर में जा पौंचीं। इते मोय कछू खबर नईं। उन्ने सोची के अब हम सो कर नई पा रै, सो शिविर में जा के बेई अपनों फारम-वारम भर-भरा देबें।’’ रायकवार दाऊ तनक सांस लैबे खों रुके।
‘‘फेर का भओ? भर गओ उनको फारम?’’ मैंने दाऊ से पूछी।
‘‘अरे कां! बे पैले उते भीड़ में धक्का-मुक्का खाउत रईं। फेर लेन लगवा दई गई, सो चार घंटा लेन में ठाड़ी रईं। करत-करत जो उनको टेम आओ सो बा शिविर वारो अधिकारी पूछन लगो के तुमाओ ब्याओ हो गओ? सो जे तन्ना के बोलीं के ईसे तुमें का? तब ऊ अधिकारी ने बताई के जे उन्हई लुगाइयन खों मिलने आए जिनको बयाओ हो गओ होय। जे लाने हमने तुमसे पूछी, औ कोनऊं मतलब नईं हमाओ। जे सुन के हमाई घरवारी को गुस्सा तनक ठंडो भओ। ईके बाद ऊ अधिकारी ने कुल्ल बातें पूछीं। मने तुमाए इते खेती जोग जमीन कित्ती आए? तुमाए इते मोटर सायकिल तो नइयां? तुमाए कुल्ल कुनबा में कोनऊं के पास चार पहिया गाड़ी तो नइयां। मने जेई टाईप के मुतके सवाल। हमाई घरवारी जित्ती जानत्ती उत्ती बतात गई। ऊने बिचारी ने बता दई के हमाओ लोहरो देउरा उते दिल्ली में रैत आए जीके पास चार पहिया गाड़ी पाई जात आए। कुल्ल पूछा-पांछी के बाद ऊ अधिकारी ने कै दई के तुमें जे रुपइया नईं मिल सकत। तुम ईके जोग नइयां। जे सुन के हमाई घरवारी को मनो चक्कर आ गओ। बे उतई धड़ाम से गिर परीं।’’ रायकवार दाऊ बतात जा रए हते।
‘‘अरे? ऐसो भओ? चक्कर काय आ गओ उनको?’’ मैंने पूछी।
‘‘अब चक्कर ने आहे सो का आहे? धनी उते घंटा भर भीड़ में ठुकत रईं, फेर लेन में चार घंटा ठाड़ी रईं औ अखीर में पतो परो के कछू नईं मिलने। मनो खाओ ने पियो औ गिलास फोड़ो बारा आना।’’ रायकवार बोले।
‘‘अरे रे रे! जे तो बड़ो बुरौ भओ!’’ मैंने रायकवार दाऊ के लाने दुख प्रकट करो।
‘‘जेई से तो हम कै रै के दुनिया भरे की सल्ल से अच्छो रैतो के पैलई बता देते के जे योजना गरीबी रेखा से नीचे वारन के लाने आए।’’ रायकवार दाऊ भड़कत भए बोले।
‘‘हऔ, जैसे जे पैलई बता दओ के जे जो योजना आए, जे सिरफ 23 साल से 60 साल तक की बहनों के लाने आए। ऊमें भी जोन को ब्याओ हो गओ होय।’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘काय भैयाजी, मोरी घांईं बहनों ने सरकार को का बिगारो के जोन को ब्याओ नई हो पाओ? क्वांरी बहनों के लाने सो औरई ज्यादा जरूरत कहाई, काय से के उनको सो पूछबे वारो कोऊ नइयां। मनो कई घरों में सो भौजी हरें अपनी बिनब्यायी ननद को जीनों हराम करो रैत आएं। सो अगर उनें हजार रुपैया मिलते सो उनकी भौजी उनें प्रेम से राखतीं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सो का! बाद में सरकार ने बिनब्यायी बहनों के लाने सोई घोषण कर दई आए। अब तुम खुस हो जाओ।’’ भैयाजी मोसे बोले।
‘‘काय खों खुस हो जाओं? बाकी नियम सो बेई रैने। जैसे दाऊ बता रै के उनके इते भौजी खों ठेंगा मिलो, ऊंसई मोय ठेंगा मिलहे।’’ मैंने कई।
‘‘सो तुमाए इते कोन चार पहिया ठाड़ी?’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो का? मुतकी बातें आएं ऊमें आपखों पतो नइयां।’’ मैंने भैया जी से कई।
‘‘जेई सो हम इनसे कै रए के दिखाबे के दांत और औ खाबे के और।’’ रायकवार दाऊ ताव खात भए बोले।
‘‘ई बारे में सो आप कछू ने कओ दाऊ! का है के मैंने पढ़ी रई के अपने इते सरकार ने घोषणा करी हती के मताई-बाप के ने रैने पे उनकी बिनब्यायी मोड़ियन खों 25 बरस की उमर के बाद बी परिवार पेंशन दई जैहे। मैंने पता करी सो पता परी के जे अपने मुख्यमंत्री जी ने घोषणा भर करी रई। मनो ऊ घोषणा पे कोनऊं आदेश नई निकारो गओ। मैंने सो इते से ले के भोपाल में सचिवालय लों तरे-ऊपरे कर दओ रओ। मनो नतीजा रओ ठनठन गोपाल।’’
‘‘जो 25 बरस को का? हमें समझ नईं परी!’’ रायकवार दाऊ ने पूछी।
‘‘पैले जे नियम बनाओ गओ रओ के बिनब्यायी बिटियन खों 25 की उमर लौं पेंशन दई जैहे। ईके बाद उनको चाय ब्याओ होय, चाय ने होय, उनकी पेंशन बंद कर दई जैहे। मनो 25 के बाद सो बे हवा पी के जिंदा रैहें।’’ मोय सोई बतात-बतात गुस्सा सो आन लगो।
‘‘सो ईमें बी तो जोई आए के 23 के पैले सो मनो जो हुइए सो हुई, मनो 60 के बाद का हुइए? औ जोन को ब्याओ नई भओ बे का हजार रुपैया पाबे के लाने अपनो ब्याओ कराबे के लाने घूमहें?’’ रायकवार दाऊ बोले।
‘‘अरे जे सब छोड़ो तुम ओरें! जित्तो बतकाव करहो, उत्तई मुंडा खराब हुइए। तुम ओरें सो उनकी सोचो के भाजपा वारे नेता के कांग्रेसी भैया ने उन बहनन खों पंद्रा-पंद्रा सौ रुपइया बांट दए, जोन खों ईको लाभ मिल नई पाने हतो। सो भजपा वारे भैया खों नगर निगम के पद से बाहरे को रास्ता दिखा दओ गओ।’’ भैयाजी बतान लगे।
‘‘जे सो वई बात भई के कोऊ करे औ कोऊ भरे।’’ रायकवार दाऊ बोले।
‘‘औ का, तुम ओरे जे सब में ने परो! जो तुमाए लिंगे होय सो ऊमेंई मौज करो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, हमें सोई पता परी रई के अब बिनब्यायी बहनों के लाने सोई पइसा दओ जाने आए सो हमने इंटरनेट पे वा के बारे में पूरी जानकारी लई। ऊकी योग्यता के नियम पढ़त-पढ़त मोरी सोई मुंडी कन्फुजिया गई। जे कओ के मोए चक्कर ने आए। ने तो कोनऊं पानी छिड़कबे वारो बी ने हतो मोरे लिंगे।’’ मैंने कई।
‘‘बेफालतू की बातें ने करो! अच्छी-अच्छी बात करो! कछू की जरूरत परे सो हमसे कइयो। हम सो बैठे तुमाए लाने। हम कोनऊं राजनीति वारे भैया नोईं।’’ भैयाजी मूंछन पे ताव देत भए बोले।
‘‘जो का कै रै भैयाजी? सम्हर के!’’ मैंने भैयाजी खों टोकीं।
‘‘अईई! तुम ओरन के चक्कर में हम सोई कछू के कछू कैन लगे। चलो, अब तुम ओरे बढ़ लेओ इते से। फेर कछू देर बाद भले चले आइयो, मनो अबई टरो।’’ भैयाजी हड़बड़ात भए बोले।
उनकी दसा देख के मोरी औ रायकवार दाऊ की हंसी फूट परी।  
‘‘हंस लेओ, हंस लेओ! कर लेओ दंत निपोरी! तुम दोई ने मिल के हमाओ मुंडा सोई कन्फुजिया दओ। जे नईं के कछू फिल्मन की बातें करो, कछू धरम-करम की बातें करो। जब देखों राजनीति के पांछू लट्ठ लिए घूमत रैत आओ।’’ भैयाजी अपनी खीझ मिटाबे के लाने हम दोई को घुट्टी पिलान लगे।
‘‘अरे आप काय के लाने इत्ते घबड़ा रै? हम ओंरे सो ऊंसई बतकाव कर रै हते। अब का बतकाव बी ने करें?’’ मैंने कई।
‘‘ऐसी बतकाव कोन काम की के कोनऊं को गटा बिंधा देबे।’’ भैयाजी कैसऊं बी सम्हर नई पा रए हते। सो मैेने उते से बढ़बे में मेईं भलाई समझी।
रायकवार दाऊ सोई समझ गए सो बे सोई बोले,‘‘अब जा रए। फेर आबी।’’
भैयाजी कन्फुजिआए से ठाड़े रए औ हम दोई जने अपनी-अपनी गैल सरक लिए।
बाकी, औ मोय बतइयो के कोन-कोन की मुंडी कन्फुजिआई? मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Friday, January 6, 2023

बतकाव बिन्ना की | कओ, कैसी दुलैया से पालो परो | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"कओ, कैसी दुलैया से पालो परो"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की 
कओ, कैसी दुलैया से पालो परो                                                                                  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
          जब मैं भैयाजी के घरे पौंची सो बे कंडा (उपला) थाप रए हते और संगे गाना गा रए हते-
‘‘धना ऐसी दुलैया से पालो परो...’’
‘‘काए भैयाजी जो का कर रए?’’ मैंने पूछी।
‘‘देख रईं, फेर बी पूछ रईं! तुम सोई पक्की बुंदेलखंडी आओ।’’ भैयाजी कंडा थापत भए बोले।
‘‘लेओ, मोरो जनम बुंदेलखंड में भओ, सो का मैं बिलायत की कहाबी? पक्की बुंदंलन ठैरी।’’ मैंने सोई पहलवानन घांई अपनो बाजू दिखात भई कही।
‘‘रैन देओ! जो ऐसी पैलवानी आ रई सो जे कंडा थपवा देओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन ने कई के पैलवानी आ रई। बा सो मैंने स्टाईल मारी हती। बाकी आप जे बताओ के जे ई ऐसे जड़कारे में कंडा काए थाप रए? सूरज भगवान सो चंदा घांई ठंडे हो परे, ऐसे में आपके जे कंडा कैसे सूखहें?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। ऊ टेम पे बी सीत ऐसी गिर रई हती के ने पूछो। सो मैंने भैयाजी से कही,‘‘जे कंडा-मंडा छोड़ो आप, कहूं ठंड बैठ गई सो आड़े डरे दिखा हो।’’
‘‘अरे का करो जाय बिन्ना! हमाई मति मारी गई रई के हमने तुमाई भौजी से फरमाईस कर दई के तनक बाटी, भर्त औ लसोन-धना चटनी सो बना लेओ आज।’’
‘‘फेर?’’
‘‘फेर का? बे खुनक परीं औ कैन लगीं के हमने जित्ते कंडा थापे रए ऊंमें से आधे सो आपने एक जनवरी से अब लों ताप डारे। अब जो बाटी बनवाने होय सो कहूं से कंडा ले के आओ। ने तो हमाए लिंगा नईयां कंडा-मंडा। सो हमने समझाओ उनें, के जित्ते होंय उन्हई से बाटी बना देओ। फेर हम लान देबी तुमाए लाने कंडा। इत्तो सुन के बे बमक परीं औ कैन लगीं के हमाए लाने लाहो, हां, काए से के हम सो कंडा खात आएं, कंडा पे सोत आएं और कंडा ओढ़त आएं। हमने देखी के बात हती सो बिगरी जा रई हती। सो, हमने तुमाई भौजी से कही के तनक गम्म खाओ! तुम जो लो बाटी बनाओे, उत्ते में हम कहूं और से कंडा को जुगाड़ कर दे रए। सो, बे कैन लगीं के चलो, कहूं नहीं जाने! का हम समझत नइंयां, तुमें सो घर से भागबे को बहाना चाउंने रैत आए। तुम तो चलो उते बैठो, औ बा परो है मुतको गोबर, सो ऊको कंडा थाप डारो। सो बिन्ना हम समझ गए के अब कंडा थापे बिना  बाटी का, गांकडें लो नईं मिलहें। सो बैठ के कंडा थाप रए। देख लेओ हमाई दसा।’’ भैयाजी पिल्लू-सी सूरत बना के बोले।
‘‘ठीक तो करी भौजी ने, अब आप कंडा थापहो सो आप को पता परहे के लुगाइयां कित्तो काम करत आएं। आप ओरन को का, आओ औ फरमाईस सुना दई के हमें जे खाने, बो खाने। अब घरवारी कैसे-कैसे कष्ट उठा रई, जे नईं दिखात आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जे सो तुम सही कै रईं। अबे हमें समझ में आ रई के तुमाई भौजी ऐसे जड़कारें में बी कैसे कंडा थापत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोरी बात पे हामी भर दई।
‘‘भैयाजी, वैसे आप गा का रै हते? मोय लगत आए के मैंने पैले कभऊं रेडियो पे जो गाना सुनो रओ। ऊ टेम पे भोपाल से सोई बुंदेली लोकगीत बजत्ते। ऊ टेम पे हमाओ कालेज सुबै को रैत्तो, सो दुफैर में रोटी जींमत भई रेडियो लगा लेत्ती।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, हमने सोई खूबई लोकगीत सुने रहे रेडियो पे। अब सो टेमई नईं मिलत। बाकी ऊ टेम के लोकगीत अबे लों बिसरें नइयां। बेई सो हम गा रए हते। बाकी कोनऊं फिलम बन रई होती, सो जो गाना हमाई दसा पे फिट बैठतो।’’ कैत भए भैयाजी फेर के लोकगीत गान लगे-
धना ऐसी दुलैया से पालो परो....
हमने कई जो धना लड़ुआ बना दे
लड़ुआ बना दे, तनक लड़ुआ बना दे
तिल, गुड़ लों मेंक-मांक, मिचकूं परीं
धना ऐसी दुलैया से पालो परो....
हमने कई जो धना बाटी बना दे
बाटी बना दे तनक बाटी बना दे
कंडा लों मेंक-मांक, मिचकूं परी ,,,,

‘‘जे आप गलत गा रए। कछु औ हतो ऊ गाने में।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, सो जे हमाओ वर्जन आए। ई में का? लोकगीत को जेई सो मजा आए के अपनो टाईप को बना के गा लेओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘कहूं नईं! बाकी मोय लगत आए के ईको बे लोकगीत गायक देसराज पटेरिया जी ने गाओ रओ। आप को कछु खयाल आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ तुमने ठीक कही! उन्हईं ने गाओ रओ जो गाना। खूबई बजत्तो। औ ऊ टेम पे हम सो खाली मटका बजा-बजा के गाउत रैत्ते। का बे बी दिना हते!’’ भैयाजी ठंडी सांस भरत भए बोले।
‘‘काए कंडा थप गए होंय सो भीतरे कढ़ आओ, ने तो जड़ा जेहो औ हमई को तुमाई सेवा करनी परहे।’’ भौजी ने भीतरे से टेर लगाई।
‘‘राधे-राधे भौजी!’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘अरे बिन्ना, आओ-आओ! बाटी बना रए, सो तुम सोई खा लइयो।’’ भौजी चहकत भईं मोसे बोलीं। फेर भैयाजी से कैन लगीं,‘‘अच्छे से हाथ धो लओ न? सो चलो आओ जो लों बाटियां सिंक रईं तुम भंटें को भर्त बना डारो। जे भंटा भुन गए औ जो तुमें लसोन-धना की चटनी खाने होय सो, बांट लेओ। बाकी सिलबट्टा पे बांटियो, मिक्सी में नोईं। तुमईं को मिक्सी की चटनी नईं पोसात। सो बा धरो सिलबट्टा।’’
‘‘चटनी को का करने? भर्त के आंगू चटनी की कोन को परी।’’ भैयाजी ने तुरतईं अपनी फरमाईस में कटौती कर दई। ने तो उनें भर्त बी चाउंने रओ औ चटनी सोई चाउंने रई।
भैयाजी की दसा देख के मोय औ भौजी दोई को हंसी फूट परी। इत्ते में भौजी गान लगीं-
कओ, कैसी दुलैया से पालो परो...
हमने कई जो तनक चटनी सो बांट लेओ
चटनी सो बांट लेओ, चटनी सो बांट लेओ
सिल-बट्टा देख-देख मिचकूं परे
कओ, कैसी दुलैया से पालो परो...
‘‘औ जे हमाओ वर्जन आए!’’ भौजी भैयाजी से ठिठोली करत भईं बोलीं।
रामधई बड़ो मजो आओ।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मोय सो बिना कछु करे-धरे बाटी-भर्त खाबे खों मिल रओ हतो तो मोरी सो लाटरी लगी कै सकत हो आप ओरें। जेई तो मौसम आए बाटियन को। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(05.01.2023)
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Thursday, December 29, 2022

बतकाव बिन्ना की | ई साल का करी आप ओरन ने? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"ई साल का करी आप ओरन ने?"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
ई साल का करी आप ओरन ने?                                                                               - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह  
          भुनसारे जब मोरी नींद खुली सो पैलऊं जेई खयाल आओ जी में के ई साल मैंने का खास करी? वोई बेरा मोरी नजर घड़ी पे पड़ गई, मनो कुल्ल छै बजे हते। अब मैंने सोची के जे लेखा-जोखा सुभै छै बजे से करबे से अच्छो है के तनक औ सो लओ जाए। ई साल को जो टेम निकर गओ, अब बो कहूं भगो जा नईं रओ। सात बजे उठ के सोई सोची जा सकत आए। सो मैंने पल्ली मूंड़ लों खेंची औ गुड़प हो गई। काए से के मोरे इते सुभै के नल सात बजे के बाद आउत आएं सो पानी भरबे की कोनऊं जल्दी ने हती। सोओ जा सकत्तो। बाकी मोरे संगे जेई रोज को होत आए। पांच बजे नींद खुलत आए, तनक सो खयाल आत आए के उठो जाए। तनक कसरत-मसरत कर लई जाए। मनो फेर लगत आए के जे ठंड में कसरत करे से कहूं कछु हो गओ, सो का करबी? जब गर्मी परहे सो दूनी कसरत कर लेबी। सो अलारम बंद के, घड़ी की तरफी से मों फेर के निन्दू अम्मा की गोदी में दुबक जात हों। फेर सात बजे नींद खुलत आए। मनो खुद से नईं, नासमिटे अलारम की टें-टें, पीं-पीं से। मगर बो का है के सबरे दार्शनिक खयाल भुनसारेई आउत आएं। का करने? कोन के लाने करने? का हुइए ईंसे? औ जागबे से ई बैराग्य होन लगत आए। मोरे संगे सो जेई होत आए, बाकी आप ओरन की आप जानों!
रामधई भारी जी से सुभै साढ़े सात पे बिस्तर छोड़ने परत आए। जे नल वारे टेम औ काए नईं बढ़ा देत? दस-एक बजे खोलते, सो अच्छो रैतो। खैर, अकेली मोरी को सुनहे? कछु जनें, जनीं सो ऐसी आएं के भुनसारे से ट्रेकसूट पैहन के दौड़बे निकर परत आएं। को जाने का मजो आत आए? अरे, ठंड पर रई सोबे के लाने। सूरज भैया सोई देर से जागत आएं और जे दौड़बे वारे मों अंधेरे निकर परत आएं। मैंने खुद सो नईं देखी, बाकी सो के उठबे के बाद सुनी आए उनके बारे में। कई जनी भौतई अच्छी आएं, जो दुफैरी में धूप तापत-तापत सबरी खबर सुना देत आएं। मोरी मानें सो जे अपने रिर्पोटर हरों खों खबर के लाने कहूं भटकबे की जरूरत नाइयां, बे सो बस इत्तो करें के लुगाइयन की दुफैर की मंडली में शामिल हो जाएं, सो पूरे मोहल्ला भरे की खबरें हाथ लग जेहें।
खैर, मैंने जगबे के बाद सोची के मैंने ई साल का-का करो? आधा-पौन घंटा मूंड़ खुजात सोचत रई, पर कछु याद नईं परी। औ मोई मति मारी गई रई के मैं जे सोचबे को काम घर के आंगूं धूप में ठाड़ी-ठाड़ी कर रई हती। मोरो ध्यान नईं गओ रओ, मनो उते से टुकटुक की मम्मी एक बेरा निकरीं। बे मंदिर जा रई हुइएं। दूसरी बेरा उन्ने मोए लौटत में देखी, सो उनसे कऐ बिना नई रओ गओ औ बे बोल परीं-‘‘काए जिज्जी, मूंड में जुंआ पर गए का?’’
‘‘नईं तो?’’ मैं चैंकी।
‘‘नईं, हमने जात बेरा देखी सो आप अपनो मूंड़ खुजा रई हतीं, औ लौटत बेरा में सोई खुजात मिलीं। जेई से हमें लगो। बाकी आप प्याज खो मींड के ओको रस निकार के मूंड़ पे लगइयो, सो सबरे जुंआ मर जेहें।’’ टुकटुक की मम्मी मोरी कछु सुने बिगर बोलत चली गईं।
मोए भौतई गुस्सा आओ। उनपे नईं, खुद पे, के काए के लाने बाहरे ठाड़ी हो के मूंड़ खुजात भई सोच रई हती। अरे, जे सोचबे को काम अंदर बी कर सकत्ती। अब बे आज दुफैरी की सभा में सबखों जेई बताहें के शरद जिज्जी के मूंड़ में जुआं पर गए। बाकी अब का हो सकत्तो? तीर सो कमान से निकर गओ रओ। जे सोच के मोरे मूंड़ में सच्ची की खुजरी होन लगी। फेर मोए खयाल आओ के ई साल में अपनो करो धरो सो कछु याद नई आ रओ, सो काय न भैयाजी औ भौजी से पूछी जाए।
मैं भैयाजी के घरे पौंची। बे ठैरे औ लेट-लतीफ। बे कुल्ला-मुखारी कर के टाॅवेल से मों पोंछत मिले।
‘‘भैयाजी गुडमाॅर्निंग!’’ मैंने कहीं।
‘‘गुड मार्निंग बिन्ना!’’ भैयाजी खुस होत भए बोले।
‘‘भैयाजी! जे अंग्रेज कित्ते समझदार आएं के चाए दुफैरी हो चली होय, मनो भुनसारे के बाद पैली बार मिल रए होंय सो गुडमार्निंग कही जात है। मनो रात खों नौ बजे बी गुड ईवनिंग रैत आए। ईसे जे फीलिंग आउत आए के अबे कछु देर नईं भई।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ बिन्ना! तभई सो कहो जात आए के उनके राज में कभऊं सूरज नईं डूबत्तो! अब डूबतई कां से, बा सो गुडमार्निंग औ गुड ईवनिंग मेंई उलझो रैत्तो। मनो जे छोड़ो, अपनी कओ, के का हाल-चाल आए?’’ भैयाजी ने पूंछी।
‘‘हाल औ चाल दोई ठीक आएं। बाकी आप सो जे बताओ के आपने ई साल का खास करो?’’
‘‘खास? कछु नईं!’’ भैयाजी बोले।
‘‘ऐसो नईं हो सकत। कछु सो खास करो हुइए। मनो कोनऊं से झगड़ा करो होय, कोनऊं की मदद करी होय, औ नईं सो बे संकल्प पूरे करे होंय जो साल के पैलऊं दिनां लए रैएं।’’ मैंने भैयाजी से पूंछी।
‘‘हूं! ऐसो तो कछु याद नई परत। बाकी रई संकल्प की बात, सो बे कभऊं कोनऊं के पूरे नईं होत। हऔ, हमने सोची रई के ई साल कोनऊं सो टंटा ने करबी औ साल भर टंटाई करबे परो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काय को टंटा?’’
‘‘अरे, मकान को नामांतरण कराने रओ। जूता के तल्ला घिस गए हमाय तो। एक दिनां हमें गुस्सा चढ़ी सो हमने दफ्तर में जा के दारी-मतारी करी सो, दूसरे दिनां काम हो गओ। बाकी हमाओ टंटा ने करबो वारो संकल्प धरो रै गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ कछू?’’
‘‘औ का?’’ भैयाजी सोचन लगे। फेर उचकत भए बोले,‘‘अरे हऔ, बा रामचरण खों यूरिया दिलवाबै गए रए।’’
‘‘आप दिलवा रै हते? अरे, बे सो रामचरण भैया जाई रै हते, सो आप संगे चले गए रए।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, सो का? हम ऊके संगे गए, या बो हमाए संगे, बात सो एकई कहाई।’’ भैयाजी खों मोरी बात तनक बुरई लगी।
‘‘हऔ, चलो मान लई। बाकी आपको उते दिसा मैदान के लाने लोटा-परेड सोई करनी परी हती।’’ खीं-खीं करत भईं मैंने बोलई दई।
‘‘तुम कछु भूलत आओ के नोईं?’’भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘सो, औ बताओ भैयाजी के आपने ई 2022 के साल में का खास करो?’’ मैंने फेर पूछी।
‘‘जे का बताहें? हम बताउत आएं तुमें बिन्ना!’’ हम ओरन की बातें सुनत-सुनत भौजी से रओ नई गओ, औ बे बोल परीं। बे बतान लगीं,‘‘तुमाए भैयाजी ने कभऊं कछु खास करो आए जो ई साल में कर लेते? हमाए संगे ब्याओ करबे के अलाबा अपनी कुल्ल जिनगी में कछु खास नईं करो इन्ने।’’
‘‘जे औ सुन लो इनकीं!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, सो का हम झूठ कै रए? हमने परोंई कही रई के पूरौ साल कढ़ गऔ औ तुमने कछू खास नईं करो। अब जो बचो-खुचो समै आए ऊमें तुम सोई तनक पदयात्रा कर लेओ। कछु सेहत बन जेहे, कछू नांव हो जेहे औ जो कहूं अगली साल कछू कोनऊं फेर बदल हुइए सो तुमाओ भाग खुल जेहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बड़ीे दूर की कही भौजी आपने!’’ मोरे मों से कै आओ।
‘‘जे सो हमें जेई टाईप से ठेन करत रैंत आएं, बिन्ना! बाकी अबकी साल जरूर कछू खास करबी, ऐसो सोच रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन टेम पे सोची? भुनसारे? के दुफैर की गुडमाॅर्निंग पे?’’ मैंने हंसत भई पूंछी।
भैयाजी सो ने बोल पाए, मनो भौजी ठठा के हंस परीं।  
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मोय का करने के कोन ने ई साल में कछु खास करो के नईं। मोय पतो आए के मैंने कछु खास नईं करो! हो सकत के अगली साल कछु खास हो जाए। तो अब अगली साल, मनो अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। औ सोचो के आप ओरन खों का कछु खास करने अगली साल में। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की नईं साल की पैलऊं से राम-राम! नई साल में आप सबई लाने सब कछू अच्छो-अच्छो होय, जेई मोरी दुआ आए !!!
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(29.12.2022)
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Thursday, December 1, 2022

बतकाव बिन्ना की | हाय दैया, जो का कै दओ उन्ने | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

 "हाय दैया, जो का कै दओ उन्ने !"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।

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बतकाव बिन्ना की     
हाय दैया, जो का कै दओ उन्ने !

- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            ‘‘काए भैयाजी! जे संत टाईप के लोगन को सोई मुंडा काए फिर जात आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। मोए बड़ो बुरौ सो लग रओ हतो।
‘‘काए का हो गई बिन्ना? कोन ने का कै दई?’’ भैयाजी मुस्क्यात भए पूछन लगेे।
‘‘काए आपको पतो नइयां?’’ मैंने भैयाजी से पूछीे।
‘‘अब मोए का पतो के तुम कोन के बारे में का कै रईं? कछू आगे बोलो सो पतो परे।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘लेओ, सगरो इत्तो दोंदरा मचो परो आए, औ एक आप हो के आपको कछू पतो नइयां। आपने सुनी नईं का, के बाबा रामदेव ने का कही?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘नईं मोए नईं पतो। बो का आए के मोए दो-तीन दिना से अखबार देखबे खों बी टेम नई मिलो। काए, का कै दई बाबा रामदेव ने? बे तो अच्छे नोने से दिखात आएं। बे तो योग सोई सिखात है न?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ! बे बाबा योगवारे आएं औ बिजनेसमैन सोई आएं। उनको योग सिखाबे को अकेलो काम नोईं, आप जानत्तो आओ, के उनकी फैक्टरी में खात-पीयत की चीजें, दवाएं-मवाएं सबई कछू बनत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों याद दिलाई।
‘‘हऔ-हऔ, तुम ठीक कै रईं। बाकी जे बताओ के भओ का आए? तुम उनके का कैबे के बारे में कै रईं? ऐसो का कै दओ उन्ने?’’ भैयाजी बोले।
‘‘अबे का भओ, के एक दिना बे महाराष्ट्र के ठाणे में एक सभा में बोल रए हते। ऊ मंच पे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री की घरवाली सोई हतीं। अब बाबा रामदेव को कोजाने का सूझी के बे बोल परे के-लुगाइयां साड़ी औ सूट में अच्छी लगत आएं। औ मोरे घांई कछू ने पहने सो औ अच्छी लगत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों बताओ।
‘‘हैं? जो का कै दई उन्ने?’’ भैयाजी सो सुन के भड़भड़ा गए। फेर सम्हलत भए बोले,‘‘सांची कै रईं? उन्ने ऐसी कही? मोए सुन के भरोसो सो नई हो रओ।’’
‘‘ठीक जेई कही उन्ने। मोरी ने मानो सो इन्टरनेट खोल के देख लेओ, जेई खबर ट्रेंड करत भई दिख जेहे।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, हमें ट्रेंड-मेंड नई देखने! तुम झूठी थोड़े कैहो। बाकी बात तो उन्ने ठीक नई कई। खूबई बवाल मचो हुइए।’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘औ का! कोनऊ बाॅलीवुड को हीरो-मीरो ने कई होती, तो मनो इत्तो बुरौ ने लगतो। अब बाबा हरें ऐसी बात कहें सो अच्छो कौन लगत आए। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने तो तुरतईं एक ट्वीट करो के- महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री जी की पत्नी के सामने स्वामी रामदेव द्वारा महिलाओं पर की गई टिप्पणी अमर्यादित और निंदनीय है। इस बयान से सभी महिलाएं आहत हुई हैं। बाबा रामदेव जी को इस बयान पर देश से माफी मांगनी चाहिए।’’
‘‘फेर?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘फेर का? बाबा रामदेव जी खों माफी मांगनी परी। बाकी उन्ने जे सोई कै दई के उनकी बात खों गलत ढंग से रखो गओ आए। उनकी मंशा लुगाइयन को अपमान करबे की नई रई। मनो, ईके बाद बी मामलो ठंडो नई परो आए। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग बाबाजी पे कार्रवाई की मांग कर रओ आए। अब देखो का होत है?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ अपने इते?’’ भैयाजी ने पूछई लओ। मोए जेई को डर हतो।
‘‘अपने इते, कछू नईं! बे ओरें सो कर रईं, जो करने आए।’’ मैंने भैयाजी खों टालत भई कही।
‘‘जेई सो सल्ल आए!’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे कछू सल्ल नईं!’’ मैंने भैयाजी खों टोंकी। उनको मुद्दा से भटकबे में देर नईं लगत। सो मैंने उने आगे की बात बताई के,‘‘बे बाबाजी इत्तई पे नईं ठैरे!’’
‘‘सो, औ का कै दई उन्ने?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘उन्ने आगे कही के- हम तो लोक-लज्जा के लिए (कपड़े) पहन लेते हैं, बच्चों को कौन कपड़े पहनाता था पहले, हम तो आठ-दस साल तक तो ऐसे ही नंगे घूमते रहते थे, ये तो अब जाकर के पांच-पांच लेयर कपड़ों की बच्चों पर आ गई है।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘हाय दैया! जे का कै दओ बाबा जी ने! ऐसो कहूं नईं होत। आठ-दस बरस के मोड़ा नंगू नईं फिरत आएं।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे भैयाजी, मनो बालकन के लाने कई सो, कई। पर लुगाइयन के लाने काय कई? मोय सो जे समझ में नईं आत के जो हम ओरें कछू जींस-वींस पैन लेवैं, सो सल्ल औ धुतिया पैनें सो सल्ल। ऊपे जे बाबाजी कछू ने पैहनत की बात करके, एक ठइयां औ सल्ल बिंधा रए। अभईं हम लुगाइयां उनकी घांई ‘कछू नईं’ टाईप को जो पैहन लैबंे सो, आधे से सो आड़े डरे दिखाहें। सब ओरें हम लुगाइयन के ओढ़बे-पैहनबे के पांछू काए परे रैत आएं? अरे, हुन्ना-लत्ताई देखत रैहो के कभऊं जे सोई देख लओ करो के हम ओरें कित्तो काम करत आएं।’’ मोए कैत-कैत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘सांची कै रईं बिन्ना! हमाए सोई जेई विचार आएं, के मोड़ियन की औ लुगाइयन की काबीलियत देखो जाओ चाइए। अब वो सब छोड़ दओ जाओ चाइए के ब्याओ के लाने गोरी मोड़ी चाउने। अरे, गोरी हो के काली हो, मोड़ी सोई इंसान होत आए। जब करिया मोड़ा को ब्याओ में कोनऊं बिधौना नई रैत सो सांवरी मोड़ी में काए की दिक्कत कहानी? जे ई लाने सो मोड़ियन खों खूब पढ़ाओ जाओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ठीक कै रए आप भैयाजी! मोड़ी अपने पांवन पे ठाढ़ी रै, सो ऊको खुद पे भरोसो सो रैत आए। जेई लाने तो सरकार सोई बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कैत रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का बिन्ना! बाकी जे ईजूल-फिजूल की बातन को सो विरोध करो जाओ चाइए। सो, हमाए लाने कछू करबे को होय सो बताइयो हमें। हम हरदम तुम ओरन के संगे ठाड़े मिलहें, रामधई!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! कछू जरूरत परहे, सो जरूर बताबी। बाकी बाबाजी ने माफी सो मांग लई आए। मनो तनक ढंग से मांग लई होती सो मामलो सुलट जातो।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ बिन्ना! अब हम जा के तुमाई भौजी खों जे सबई बता रए! उने सोई पता परे के लुगाइयन के लाने का कैसो कओ जा रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उने पतो हुइए!’’ मैंने कही। मगर जबलों भैयाजी बढ़ लिए।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रई बात बाबाजी की, सो उनकी बात मोय सोई नई पोसाई। उनको ऐसो नई बोलो चाइए। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(01.12.2022)
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #बुंदेलखंड #बिन्ना #भैयाजी #बतकाव #BatkavBinnaKi #DrMissSharadSingh #Bundeli
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Thursday, November 24, 2022

बतकाव बिन्ना की | अपने किसान भैया भौतई जिगरा वारे आएं | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"अपने किसान भैया भौतई जिगरा वारे आएं"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की      
अपने किसान भैया भौतई जिगरा वारे आएं                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            ‘‘काए भैयाजी! बड़ी हांफी-सी आ रई, काए कां से भगत चले आ रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। ठंड परन लगी मनो उनके माथे पे पसीना चुचुआ रओ हतो।
‘‘ने पूछो बिन्ना! रामधई गोड़े दुखन लगे, कम्मर पिरान लगी। जे कै लेओ के हाड़-गोड़ सबई कछू पिरा रए।’’ भैयाजी ऊंसई हांफत-हांफत बोले।
‘‘चलो लेओ! जो ठंडो पानी पियो! कछु अच्छो लगहे।’’ मैंने भैयाजी को पानी को गिलास थमा दओ।
‘‘अरे मोरी बिन्ना! जे ठंडे पानी से कछू न हुइए। चाय-माय पिलाओ सो कछू जान में जान आए।’’ भैयाजी कही।
‘‘हऔ, चाय सोई पिला दे रई।’’ मैंने भैयाजी से हंस के कही औ चाय बनाबे के लाने किचन में चली गई।
‘‘लेओ, जे रही आपकी चाय!’’ मैंने भैयाजी खों कप पकरा दओ। तब लों भैयाजी सुस्ता चुके हते।
‘‘चलो, अब आप बताओ के किते से आ रए जो इत्ते थक गए? मों देख के ऐसो लग रओ के मनो कोनऊं ने कुचर-कुचर के मारो होय।’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ऐसई समझ लेओ बिन्ना! अपने जे किसान भैया हरें बड़े जिगरा वारे कहाने, ने तो हमाए तो दोई दिना में राम नाम सत्त भओ जा रओ हतो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ऐसो ने कहो भैयाजी! शुभ-शुभ बोलो! राम नाम सत्त होएं आपके दुस्मन के। मनो जे किसान भईयन की बात कां से आ गई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘आने कां से? अरे, तुमने अखबार में पढ़ो हुइए के आजकाल सरकार किसानों के लाने यूरिया बांट रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, आप को का करने? आपके कोन से खेत आएं?’’ मैंने भैयाजी खों टोकों।
‘‘मोय नई चायने रओ। बाकी मोरो संग वारो आए न वो, रामचरण, ऊके खेत आएं। ऊने मोसे कई के संगे चलो! उते लेन में लगे-लगे जी सो उकता जात आए। अपन दोई रैहें सो चाए बतकाव करहें, चाए काना-दुआ खेलहें। तुमाओ खर्चा-पानी हमाई तरफी से। हमसे सोई सोची के आजकाल कछु खास काम सो है नईं, सो रामचरण के संगे घूम आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अच्छो करो!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘का अच्छो करो! हमाई मति मारी गई रई के ऊकी बातन में आ गए। वा सो हर साल जात रैत आए, सो ऊको सब पतो आए। मनो हमें सो कछु पतो नई रओ। हमने सोची के ऊके संगे जाबी, घूमबी, फिरबी। दोई जने बतकाव करबी औ अच्छो माल-टाल छानबी। काए से के ऊकी घरवारी ने मुतकी चीजें बना के संगे बांध दई रई।’’ भैयाजी बातन लगे।
‘‘फेर?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘फेर का! काल दुफारी बाद लो उते पौंचे। कछु नईं तो एक-डेढ़ किलोमीटर लम्बी लेन लगी रई। हम दोई जने ट्रेक्टर की ट्राली पे बैठ के काना-दुआ खेलने लगे। इत्ते में दो-चार जने औ आ गए। बे ओरें चा रए हते के ऊमें पइसा लगाओ जाए। बाकी हमने कै दई के हमें जुआ-पट्टी नईं करने! टेम पास की खेलने होय सो खेलो, ने तो फूटो इते से। बे ओरे हम ओरन से पैले से उते मौजूद रए, सो बे पैलऊं भौत बोर हो चुके रए। सो, बे बिना पइसा की खेलबे खों राजी हो गए। दिन ढर गओ, रात हो आई, मनो हम ओरन को नंबर ने आओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘फेर?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर जे के, रात को खुल्ले में हम दोई जने डरे हते। गरम हुन्ना-लत्ता सो ले गए रए, फेर बी जाड़ो लगत रओ। जेई में एक बड़ी उम्मर के किसान भैया हते सो उनकी तबीयत बिगर गई। हम ओरने को लगो के कहूं बे निपट ने जाएं। सो, दो-तीन जने उनको ले के अस्पताले दौड़े। अपने रामचरण भैया के बे पैचान वारे हते सो रामचरण सोई उनके संगे चलो गओ। औ जात-जात मोसे कै गओ के ऊको नंबर को खयाल मोय रखने परहे। सो, जे चिंता में मोय नींद लो नई आई। रई बिछावन की, सो, बा ट्राली पे चाए कोनऊ टाईप को गद्दा डाल लओ जाए, रैतो सो पथरई घांई। अखीर लोहा, सो लोहा ठैरो। ऊ पे जे ठंड के दिना में, खुल्ले में लोहा औरई जुड़ान लगत आए। ने तो मोसे लेटत बन रओ हतो औ ने बैठत बन रओ हतो। कैसऊं ने कैसऊं रात कटी। भुनसारे होतई साथ समस्या जे आई के, अब जो दिसामैदान के लाने निकरत हों सो कऊं रामचरण को नंबर ने आ जाए, औ अपने रामचरण भैया तबलों लौटे ने हते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे तो वाकई बड़ी वारी समस्या आ गई रई।’’ मैंने भैयाजी से कही। औ कहत साथ मोय हंसी सोई आ गई।
‘‘तुमें हंसी-ठींठीं सूझ रई! तुम उते होतीं, सो पता परती।’’ भैयाजी खिझात भए बोले। फेर आगे बतान लगे, ‘‘बो तो कओ के कछू देरी में रामचरण आ गओ। सो हम दिसामैदान खों दौड़े। जबलों हम कुल्ला-मुखारी कर के लौटे, रामचरण ने चाय बना लई हती। बो सयानों आती बेरा अपने संगे दूध, चायपत्ती लेत आओ रओ। ने तो उते होटल की कट से बी कट चाय पी के सो हमाओ कछू न होतो। रामधई! हम दोई जने ने उते लुटिया भर-भर के चाय पी। रामचरण की घरवारी ने निमकी, शकरपारे रख दए रए, सो बे खाए। मनो फेर के दुफारी होन लगी पर रामचरण को नंबर ने आओ। हमने रामचरण से कही के भैया, जे दो बोरी यूरिया के लाने काय अपने दो दिना खराब कर रए? चलो, दूकान से ले लइयो। सो बो कैन लगो के ई समै पे कहूं ने मिलहे। इतई से लेने परहे। जो तुम थक गए हो सो घरे लौट जाओ! बाकी हम तो यूरिया ले केई लौटबी। हमने ऊसे कही के ऐसे कैसे हो सकत आए? संगे आएं हैं सो संगे लौटबी।’’  
‘‘औ का! बिलकुल सही कई आपने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अरे का बिन्ना! कैने को सो कै दई, मनो रात में जो ठंड लगी रई, ऊसे हाथ-गोड़े पिरा रए हते। घर में अच्छी-साजी गद्दा-पल्ली पे सोअत आएं, पर उते तो पथरा घांईं लोहा की ट्रली हती। मोरो तो जी सो घबड़ान लगो रओ, मनो रामचरण खों छोड़ के आओ बी नईं जा रओ हतो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘फेर कबे मिलो यूरिया?’’ मैंने भैयाजी कही।
‘‘आज भुनसारे नंबर लगो। हमने दोई बोरी लादी ट्राली में औ उते से ऐसे भागे, मानो कोनऊं भूत दिखा गओ होय। ऊने पैले मोरे घर मोय पोंचाओ, फेर बो अपने घरे चलो गओ। तुमाई भौजी को हमने आपबीती सुनाई सो बे हमाए अंसुवा पोंछन के बजाए बिगर परीं के कोन ने कई रई जाबे की। अब कहूं तुमाई तबीयत बिगर गई सो का हुइए! अब तुम तो जानते हो बिन्ना के जब तुमाई भौजी बिगरत आएं सो उते से भागबे मेंई भलाई रैत आए। तभई तो हम तुमाए इते भाग आए। तुमाई भौजी ने सो हमें चाय की बी नईं पूछी।’’ भैयाजी बोले।
 ‘‘खैर, भौजी की छोड़ो आप, उनको कैबो बी सही आए। आपको खेत में, खुल्ला में सोबे की आदत सो आए नईं। कहूं कछू ज्यादा ठंड-मंड लग जाती, सो सल्ल बींध जाती। मनो भैयाजी, आपने सही कई, के अपने किसान भैया हरें भौतई जिगरा वारे आएं।’’ मैंने भैयाजी से कही।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मनों जे यूरिया-मूरिया बांटबे को कोनऊं और सही तरीका होने चाइए। अच्छो रै के खुल्ला बाजार में सब्सिडी दे के कम दोम पे बिकन देंवें। जोन खों जब लगे सो वो तभई उठा ले। बाकी ईकी बारीकी सो अपने किसान भैया जानत हुइएं, मोरे सो न खेत आएं औ न मैंने कभऊं खेती करी। बाकी जे है के दूसरन की पीड़ा में मोरो जी दुखत आए। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(24.11.2022)
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Thursday, November 17, 2022

बतकाव बिन्ना की | मोए सोई काल से करेला नई खाने | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

 "मोए सोई काल से करेला नई खाने"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की     
मोए सोई काल से करेला नई खाने                            
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            ‘‘बिन्ना, तुमने कछु छोड़ो के नईं?’’ भैयाजी ने आतई साथ मोसे पूछी।
‘‘मोए का छोड़ने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कछु बी! मने जो तुम चाओ! चाय तो कटहल छोड़ सकत हो, ने तो नाॅनवेज छोड़ सकत हो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जो का कै रै भैयाजी? तबीयत सो ठीक आए न तुमाई? कोनऊ दिमागी बुखार सो नई हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे मोए कछु नई भओ! मोरी तबीयत सोई चंगी आए। बाकी तुम बताओ के तुम का छोड़ रईं?’’ भैयाजी ने फेर पूछी।
‘‘अब जो आप गिना रए हो, सो जानतई हो के मैं ठैरी पक्की वेजेटेरियन मने शुद्ध शाकाहारी। मैंने कभऊं नानवेज को हाथ लो नई लगाओ औ आप छोड़बे की कै रै? बाकी कटहल सोई जेई से मोसे खाओ नई जात, के बो सोई बनबे के बाद नानवेज घाईं दिखात आए। औ आप कै रै के कटहल छोड़ दो, नानवेज छोड़ दो। अरे, जोन को कभऊं छियो लो नईं, उनखों छोड़बे की का बात भई?’’ मोए कछु समझ में नई आ रई हती के भैयाजी मनो कैबो का चा रै आएं।
‘‘बात जे आए बिन्ना के आज एक सभा हती, जीमें सब ओरन से कसम ख्वाई गई के सब जने अपने मन से कछु एक चीज छोड़ देबें। सो हमने सोई कसम खा लई के काल से हम करेला ने खेबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे का बात भई? आप सो ऊंसई करेला नईं खात हो। सो करेला छोड़बे की काए कही?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ऐसोई करो जात आए बिन्ना! जब कोनऊं ई टाईप की कसम ख्वाए, सो बो चीज छोड़बे की कसम खा लई जानी चाइए जो तुमे पैलई से नईं पोसात! ईसे का होत आए के छोड़बे वाली कसम सध जात आए। कभऊं टूटत नइयां।’’ भैयाजी सयापन से बोले।
‘‘खूब कही भैयाजी आपने! मनो अपन ओरन खों दारू ने पीने की कसम सोई खा लेनी चाइए। काए से के अपन ओरें दारू-मारू खों छीयत बी नइयां।’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘हऔ! जे तुमने ठीक कही। अबकी अगली सभा में मोए दारू छोड़बे की कसम खा लेने है, देख लइयो!’’ भैयाजी उचकत भए बोले।
‘‘मैं सो ठिठोली कर रई हती औ आपने सो ठानई लई।’’ मैंने खों टोकों।
‘‘ईमें ठिठोली की का बात? अब तुम्हई बताओ बिन्ना के शराबबंदी पे उन ओरन से कसमें ख्वाई जाती आएं जिनको शराब से कोनऊ लेबो-देबो नइयां। अब हम तुमें का बताए! बे जो उते तिगड्डा के लिंगे बजरंगबली की मढ़िया आए न, उतई बे तिवारन बहनजी रैत आएं। बे प्रायमरी स्कूल में पढ़ाती आएं। बे एक दिना बता रई हती के उनके स्कूल में सबई से कसमें ख्वाई गईं के कोनऊं शराब खों हाथ नई लगाहे। ने तो पीहे औ ने पियन देहे। अब तुमई सोचो बिन्ना के बे तिवारन बहनजी ने कभऊं सपरे-खोंरे बिगर पानी लो ने पियो हुइए औ उनको कसम खानी परी के बे कभऊं दारू खों हाथ ने लगेहें। मने हम जो कैबो चा रै के जे टाईप की कसमें ऐसई चलत आएं। अब का हुइए के तिवारन बहनजी खों कभऊं दारू छीने नईयां औ ने तो उनके तिवारी जी कभऊं छीहें। कहबे को कहो जेहे के जित्ते लुगवा-लुगाइयन खों कसमें ख्वाई गईं, उनमें से दो जने ने कसम खाबे के बाद दारू के तरफी कभऊं देखो लो नईं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप सही कै रै भैयाजी! आंकड़े बढ़ो चाइए, काम बढ़े चाए नई बढ़े। ने तो दारू के ठेका के दुआरे ठाड़े हो के दारू पियन वारों से कसमें ख्वाई जानी चाइए के बे दारू छोड़ दें। मनो अब कोनऊं पढ़ो लिखो सभ्य सो आए। ऊने कभऊं कोनऊं खों मां-बैन की गाली लो नई दई, मने ऊको ऐसी गालियां आती लो नइयां, और ऐसे लोगन से कसमें ख्वा लई जाएं के बे कभऊं मां-बैन की गाली ने देहें, सो ईसे का होने। अरे, कसमें सो उनसे उठवाओ जाओ चाइए जो मां-बैन की गालियों के बिगर एक लाईन नईं बोलत आएं। है के नईं भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, मनो जे संकल्प-मंकल्प में सोई जेई होत आए। अपने जो जे सयाने हरें रैत आएं बे बोई चाज छोड़बे के लाने संकल्प ले लेत आएं जोन उने अच्छी नई लगत। ईसे का होत आए के घरे बा खाबे के लाने उनपे कोनऊं जोर नईं डाल सकत आए। जैसे हमें करेला नईं पोसात, पर तुमाई भौजी जब देखो तब हमाए पांछू परी रैत आएं के करेला खाओ चाइए। जे भौत फायदेमंद रैत आए, बगैरा-बगैरा। अरे, मोए नई पोसात सो नईं पोसात। अब का हुइए के हमने तुमाई भौजी को बता दओ आए के हमने करेला नई खाबे की कसम खा लई आए। सो, अब बे हमें करेला ख्वाने के लाने हमाओ मगज ने खाहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप सोई चतुर कहाने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का? जब जे नेता हरें चतुराई दिखा सकत आएं सो हम, तुम काए नई दिखा सकत?’’ भैयाजी बोले।
‘‘और का!’’ मैंने कही।
‘‘जेई लाने सो हम तुमसे कै रै के अगली बेरा जब सभा हुइए सो हमाए संगे चलियो औ अच्छे मंच पे ठाड़े हो के माईक के ऊपरे से संकल्प ले लइयो के काल से हम ने तो नानवेज खाबी औ न कटहल खाबी! औ कोनऊं चीज जो ने पोसाए बो छोड़ सकत हो।’’ भैयाजी खुस होते भए बोले।
‘‘कैने को सो कै दूं, बाकी मोसे जे चीटिंग ने हुइए!’’ मैंने भैयाजी से कही। फेर मैंने उन्हें बताई के ‘‘मोरी तो जेई से एक संगवारी से बिगाड़ होत-होत बची। बे बोली के तुम कसम खाओ के कभऊं मां-बैन की गाली ने देहो! मैंने उनसे कही के मैंने सपने लो में कभऊं ऐसी गाली नई दई, सो काए के लाने कसम खाऊं! आप सो उन ओरन को कसमें ख्वाओ जो जे टाईप की गालियां बकत आएं। उनको मोरी बात सुन के बुरौ लग गओ! औ बे कैन लगीं के जे मतलब के तुम गाली देबे को समर्थन करत हो। उनकी बात सुन के सो मोरा मुंडा घूम गओ! मनो मैंने जे न कही के मैं कभऊं कतल ने करबी, सो का ईको मतलब हो गओ के मैं कतल को समर्थन करती होऊं!’’
‘‘अरे, जे सब सो चलत रैत आए! ऐसे टेम पे सो तुमे सोई उनकी मन की कर देओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनके आकड़े बढ़ाबे के लाने मैं झूठ कै देओ? मोसे नईं हो सकत। मनो आप जो कछू छोड़बे की कै रए सो मैं सोच के बताबी की मोए का छोड़ने आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ज्यादा ने सोचो, तुमें जो कटहल या नानवेज की नई कैने, सो अंडा ने खाबे की कसम खा लइयो!’’ भैयाजी हंसत भए बोले। 
‘‘सो, ईसे सो औ अच्छो आए के दारू छोड़बे की कसम खा लई जाए जोन को कभऊं ने हाथ लआगो आए औ ने कभऊं लगाने है।’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जेई सो हम सोच रए। चलो, हम पता लगाबी के दारू छोड़बे की कसमों वारी सभा कबे औ कां हो रई। अपन दोई चलबी। बढ़िया कसमें खाबी औ अपनी फोटू-वोटू खेंच के अपने सोशल मीडिया पे डार देबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपको सो कछु नईं, बाकी मोरे लाने कहूं लोग जे न समझ परें के जे दारू आएं औ जेई लाने अब छोड़बे की कसम खा रईं। रैन देओ, ईसे अच्छो आए के मैं सोई करेला-मरेला टाईप को कछू छोड़ देओं, जो मोय कम पोसात आए।’’ मैंने भैयाजी कही।
‘‘हऔ, एक-दो दिना में सोच लइयो! बाकी नशाबंदी की कसम खैहो सो बो नेता हरन के समर्थन में कही जेहे। आजकाल जेई को सीजन चल रओ।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘रैन देओ भैयाजी! मोए कच्ची में ने बिधाओ! मैंने सोच लई के मोए सोई काल से करेला नई खाने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रही जे जे कसम-बसम की सो ईमें कछू नई धरो! जो कछू करने होय, सो उते करो जाओ चाइए जिते जरूरत आए! मने शराब के अहाता के लिंगे जा के कसमें उठवाओ औ पूरी कराओ सो कछू बात होय। है के नई? तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(17.11.2022)
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Friday, November 11, 2022

बतकाव बिन्ना की | आज को समै डरबे को नईं, लड़बे को आए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

 "आज को समै डरबे को नईं, लड़बे को आए"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की     
आज को समै डरबे को नईं, लड़बे को आए                            
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            ‘‘काए बिन्ना, जे अपने इते का हो रओ?’’ भैयाजी चाय सुड़कत भए मोसे पूछन लगे।
‘‘का हो रओ भैयाजी! कौन के बारे में कै रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, जेई! अपने बुंदेलखंड में इत्ती मारा-मारी पैले नई रई, जित्ती अब होन लगी। जाने कोन की छायरी पर गई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मोए कछु समझ में ने आ रई के आप कैबो का चा रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे जेई सब! अभईं ऊ दिनां एक वीडियो वायरल भओ रओ जीमें एक मोड़ा खों दो-तीन लुगाइयां ई लाने चप्पलन से पीट रई हतीं के ऊने उनकी घर की मोड़ी भगा लई रई। अब तुमई बताओ बिन्ना के बा मोड़ा का ऊ मोड़ी खों अपनी कैंया पे ले के भागो रओ के अपनी पीठ पे लाद के? अरे, बा मोड़ी सोई ऊके संगे निंगत-निंगत भगी हुइए।’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘आज-काल निंगत-निंगत को भगत आए भैयाजी? जोन खों भागने रैत आए बो कहूं ने कहूं से एकाध फटफटिया को जुगाड़ करई लेत आए। ऐसई टेम पे तो जे मोड़ा हरन के दोस्त उनके काम आउत आएं।’’ मोए कैने कछू हती औ मैं कै कछू और बैठी।
‘‘हऔ तो, मनो बा मोड़ी निंग के ने गई हुइए सो फटफटिया पे बा मोड़ा के पांछू बैठ के भगी हुइए। कैबो को मतलब जे के भगे दोई संग-साथ औ पिटो अकेलो मोड़ा।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे न कओ भैयाजी, बा मोड़ी की घरे धुनाई भई हुइए। ऊके घरे झांकबे को गओ? बाकी होत जेई आए के एक तरफा मोड़ा को बहला-फुसला के भगा ले जाने वारो कहो जात आए औ दूसरी तरफी मोड़ी खों भागबे के कारण घरे-भीतरे कुटने परत आए। बाकी आप काए जे सब सोच रए? जे भागा-भागी कोनऊं पैली बार सो हुई नइयां।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, अब तुम कैहो के हमने सोई तुमाई भौजी से लवमैरीज करी रई, मनो ऐसे भगा के नई लाए रए उनकों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, मैं जे नईं कै रई! आप गलत समझ रए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘चलो ठीक, मनो हम ओरन की उम्मर बी नोहरी नई रई। दोई बालिग रए।’’ भैयाजी सफाई देत से बोले।
‘‘आप ठीक कै रए भैयाजी, पर जे लोहरी उम्मर ऐसी रैत आए के ऊमें गलत-सही कोन समझ परत आए?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हौ, बाकी मोए फिकर भागबे-भगाबे वारन की नईं बल्कि जे सड़क पे ऐसे कूटत-पीटत की वीडियो बनाबे वरन की आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनकी काए की फिकर? उनको को का करहे।’’ मैंने कही।
‘‘उनको सो कोई कछु न करहे, मनो ई तरहा को रोग कोनऊ और खों ने लग जाए। जे मार-कुटव्वल को वीडियो बनाबो औ ऊको वायरल करबो ठीक नइयां। ईसे गलत लोगन खों गलत तरीका सूझन लगत आएं। अबे लों अपने इते ई टाईप के वीडियो नई बनाए जात्ते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, ठीक कै रए आप! अपने इते सो अच्छे-नोने हंसी मजाक के वीडियो बनत आएं और लोकनृत्य के वीडियो बनत आएं। जे टाईप के वीडियो की सो इन ओरन खों इंटरनेट देख के सूझी हुइए। ’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का? बाकी मोए एक फिकर और हो रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कैसी फिकर?’’ मैंने पूछी।
‘‘जेई के अपने इते सोई आॅनर किलिंग होन लगी। अरे, मोड़ा-मोड़ी भगत तो पैले बी हते। मनो, जब बे ओरें पकरे जात्ते सो दो लपड़ा मार के उनकी अकल ठिकाने लगा दई जात्ती। ऐसो जान से थोड़े मारो जात्तो!’’ भैयाजी ने कही।
‘‘हऔ, जे सो आपने ठीक कई। मोरे संगे काॅलेज में एक मोड़ी पढ़त्ती, बा एक मोड़ा के संगे भाग गई हती। दोई के परिवारवालन ने खूबई ढूंढ-खोज करी। अखीर में बे ओरे जबलपुर में पकरे गए। दोई पकर के अपने-अपने घरे ले जाए गए औ दोई की अच्छी धुनाई भई। बाकी मोड़ी को घर से निकरबो बंद करा दओ गओ। औ बा मोड़ा खों सोई वार्निंग दे दई गई के जो कहूं मोड़ी के घर के लिंगे दिखे, सो टागें तोड़ दई जेहें।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘हमें जे समझ में नई आई, के जब उन ओरन खों भागने रओ सो कहूं दूर भागते। जे का, के इते से भगे औ जबलपुर में जा ठैरे। अरे, उते तो मुतके मिलते चींन्हे वारे। खैर, हो सकत आए के उनके पास दूर भागबे जोग पइसा ने रओ होय।’’ भैयाजी बोले। फेर कैन लगे,‘‘मगर बिन्ना, हमें जे नईं बूझ परत के जो मोड़ा-मोड़ी की चिल्लम-चिल्ली में सबरे घरवारे अकबर बादशाय काए बन जात आएं - के सलीम कछू कर लेओ पर हम तुमें अनारकली से ब्याओ न करन देहें।’’
भैयाजी ने बोली गंभीरता से, पर मोरी हंसी फूट परी। जे देख के भैयाजी सोई हंस परे। 
‘‘सो, आप जेई लाने इत्ते फिकर में डूबे हते के मोड़ा-मोड़ी खों आज लों अकबर बादशाय से जूझने परत आए?’’ मैंने हंस के भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ, जे सो आए, बाकी मोरी चिन्ता जे बात की बी आए के अपने बुंदेलखंड में किसम-किसम के अपराध बढ़त जा रए। कहूं कोऊ कोनऊं के गरे से चेन खींच रओ, सो कहूं कोनऊं की हत्या कर रओ, कहूं कोनऊं होटल-मोटल से गलत काम करने वारी मोड़ियां पकरी जा रईं। ऊपे बे मोड़ियां सोई बांगलादेस और नेपाल से लाई गई भईं। जे कोनऊं मामूली बात नोईं। जब बे ओरे उते की मोड़ियां इते ला सकत आएं सो, इते की मोड़ियां उते ले सकत आएं। है के नईं? तुमई बोलो, का हम गलत कै रए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप सही कै रै भैयाजी! जे सो फिकर वारी बात आए। औ कई बेरा सो इतई की पढ़बे-लिखबे वारी मोड़ियां पकरी गईं। जे सोई चिंता वारी बात आए। मताई-बाप को तनक ध्यान सो रखो चाइए। के छोटी जांगा से बिटियां शहर पढ़बे पौंची तो, मनोे बे कौन सी पढ़ाई पढ़ रईं?’’ मैंने भैयाजी कही।
‘‘जे जो टीवी, इंटरनेट को तड़क-भड़क आए न, जेई ने माहौल बिगार रखो आए। पैले एक-दो ठइयां टाॅकीज रैत्तीं। ऊमें मईना-मईना लो एक फिलम चलत्ती। सो फैशन बी रोज-रोज नई बदलत्तो। अब सो, आज के एपीसोड में उन्ने जे टाईप के जूता पैने और जे टाईप के हुन्ना-लत्ता पैने औ काल दूसरे एपीसोड में दूसरई टाईप के जूता, हुन्ना-लत्ता। सबई कछू नओ-नओ। सो उने देख-देख के रोज नओ स्टाईल को सबई कछू चाउने। बाजार वारे सो टीवी सीरियल के जरिए अपनी दूकानदारी कर लेत आएं, मनो जिनको जे सबई कछू चाउने औ खींसा मे पइसा ंनइयां, सो गलत काम करहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! मनो अब करो का जा सकत आए? समै सो बदलबे को नाम आए। पैलऊं मोड़ा हरें रेडियो पे गाना सुन-सुन के मोड़ियन को छेड़त्ते। मनो चिंता की बात जे आए के अब मामलो कछू ज्यादई गंभीर दिखात आए। अब बदमास मोड़ा हरें अपने मोबाईल पे चोरी-चुपके मोड़ियन की उल्टी-सूदी फोटू-वीडियो खींच के वायरल करन की धमकी दे के मोड़ियन खों डरात रैत आएं।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ बिन्ना! जे सोई बड़ी ओछी बात आए। ऐसो नई करो जाओ चाइए। औ जो कोनऊं ऐसो करे ऊको मों करिया कर के जूतन की माला पिन्हा के जूलूस निकारो जाओ चाइए।’’ भैयाजी तिनकत भए बोले।
‘‘जेई लाने भैयाजी, आज को समै डरबे को नईं बल्कि गलत से लड़बे को आए, जे बात मोड़ियन खों याद रखो चाइए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ बिन्ना! कछू होय हम सो एक बात जानत आएं के अपने बुंदेलखंड में चाए जैसो विकास होय पर अपराध बढ़ो नई चाइए।’’ कैत भए भैयाजी ने अपनी दूकान बढ़ा लई।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मनो जे सो सबई चात आएं के इते को विकास होय, चाए ने होय, मनो जे किसम-किसम के अपराध नई बढ़ो जाओ चाइए। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(10.11.2022)
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Saturday, November 5, 2022

बतकाव बिन्ना की | ने पूछो के अपने इते विकास कबे हुइए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

 "ने पूछो के अपने इते विकास कबे हुइए"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की      
 ने पूछो के अपने इते विकास कबे हुइए                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            ‘‘जे बताओ बिन्ना के अपने बुंदेलखण्ड में विकास कबे हुइए?’’ भैयाजी आतई साथ पूछन लगे।
‘‘तनक गम्म खाओ भैयाजी! तनक सांस ले लेओ! काय के लाने इत्ते हाईपर हो रए?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अरे, कोनऊ का गम्म खाए? विकास की बातें सो खूब होत रैत आएं मनो ढंग को विकास तो कहूं दिखात लो नइयां।’’ भैयाजी को मूड मोए ठीक सो नई दिखानो।
‘‘हो का गओ भैयाजी? कोनऊं से कोऊ गिचड़ हो गई का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, काए की गिचड़? गिचड़ करबे खों टेम कोन के पास कहानो, सबई भैराने से फिर रए।’’ भैयाजी भन्नात भए बोले।
‘‘मनो, का हो गओ? कछु तो बताओ!’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कहूं कछु होत नई दिखा रओ, जेई सो सल्ल आए।’’ भैयाजी भिनकत भए बोले।
‘‘सो, आप का देखो चात हो?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम विकास देखो चात आएं। जोन विकास की बातें करी जा रईं बोई विकास हमें देखने आए। पर बो सो कहूं दिखात नईयां।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब ऐसो बी नइयां भैयाजी! आप घरे से बाहरे निकरो, अपने गली-मोहल्ला से बाहरे निकरो सो विकास दिखा जेहे।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘काए, हमाओ घर औ हमाओ मोहल्ला का विकास की रेंज से बाहर को कहानो, जो इते विकास न हो रओ औ न होत भओ दिखा रओ।’’ भैयाजी तिनकत भए बोले।
‘‘को जाने?’’ मोसे कै आई, फेर मैंने तुरतईं बात सम्हारी, ‘‘अब जे सो नगर पालिका वारे जाने, के नगर निगम वारे जाने! जे बारे में सो बेई ओरें बता सकत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ओ काए, अपने इते के विधायक, मंत्री हरें? बे काए नईं बता सकत?’’ भैयाजी ने ऊंसई भिन्नात भए मोसे पूछी।
‘‘हऔ, काए ने बताहें! आप पूछ के देखो।’’ मैंने कही।
‘‘कोऊ कछू ने बताहे! कोनऊं को कछु दिखातई नईयां!’’ भैयाजी बड़बड़ात भए बोले।
‘‘ने पूछो के अपने इते विकास कबे हुइए, जब होने हुइए सो हो जेहे! मनो, जे ठीक-ठीक सो बताओ के आप का देखबो चात हो औ का दिखाबो चात हो? मोय कछु समझ में ने आ रई के आप काय के लाने इत्तो दोंदरा दे रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब का बताएं बिन्ना! अपने बुंदेलखंड में सो जे हाल आए के अपने नेता हरें जुगाड़ लगा के अच्छो-अच्छो अवार्ड ले आत आएं के कछु नीचे वारन को शरम-वरम आए औ कछु साफ-सफाई रखन लगें। मनो कछु होत-जात नइयां। जिते पे स्वच्छता राखने को बैनर लगो रैत आए ठीक उतई पे कचरों फिकों रैत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ईमें नओ का आए? जेई से सो अपने पुरखा हरें बो कहनात कै गए के दिया तरे अंदयारो रैत आए। बे ओरें का मूरख हते के जो इत्तो नोनो ज्ञान दे गए। अब सफाई-मफाई की बात पुरानी लगन लगी, अब कछु नओ सो होन चाइए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘नओ का?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘नओ, मने कछु नओ!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अरे, बिन्ना खुल के बताओ!’’ भैयाजी खिझात भए बोले,‘‘मोरो मुंडा पैलऊ से पिरा रओ औ तुम हो के कछु बी अल्लम-गल्लम बोले जा रईं।’’
‘‘मैंने सो अबे कछु कही नईयां औ आप मोपे बरस रए! अब सो पैले जे बताओ के हो का गओ आए जो आप भिनभिनात फिर रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘चलो, सो सुनो! के हम गए रए भुनसारे माॅर्निंग वाॅक पे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भुनसारे माॅर्निंग वाॅक? संझा की माॅर्निंग वाॅक सोई होत आए का?’’ च्योंटी लए बिगर मोसे रओ नई गओ औ मैंने पूछई लओ।
‘‘अरे, तुम सोई! तुमें हमाई बात सुनने आए के हमाई बातन की टांगे तोड़ने?’’ भैयाजी खिझात भए बोले।
‘‘दोई करने आए!’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘नईं, ऐसो न चलहे! जो सुनने होय सो कान दे के सुनो!’’ भैयाजी तिनकत भए बोले।
‘‘हऔ-हऔ, मैं कान दे के सुन रई! अब टांग न अड़ाबी! चलो, आप बोलो!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘भओ का, के हम भुनसारे वाॅक पे निकरे! कछु अंदियारो सो रओ। हमें सुरता आई के काल दुफैरी को उल्टे हाथ पे गड्ढा खोदो जा रओ हतो। हमने उन ओरन से पूछी रई के जे काए के लाने खोद रए सो बे ओरे बोले के इते से पानी की पाईप लाईन डारी जेहे। हमसे रई नई गई सो हमने उन ओरने से कहीं के तुम ओरें पाईप लाईन डारबे के लाने जेई परखे रैत आओ के कबे सड़क बने औ कबे हम चलके ऊको खोद के लाईन डारें! हमाई बात सुन के बे लेबर हरें बोले के अब ईमें हम का करें, हमें सो जो काम दओ जात आए सो हम करत रैत आएं। अबई उन्ने कही रई के रोड़ के किनारे-किनारे खोदो, सो हम किनारे पे खोद रए, जो बे मालिक हरें कैते के बीचों-बीच से रोड़ पटा देओ, सो हम बीचई में खोदन लगते। हमें सो जो कहो जाए, बेई हमें करने परत आए। ने तो मजूरी ने मिलहे। सो बिन्ना जे बात उन ओरने ने सांची कही।’’ भैयाजी तनक ठैरत भए बोले।
‘‘फेर, फेर का भओ?’’ मैंने पूछी। काए से के अब लो मोए भैयाजी को दोंदरा समझ में ने आव रओ।
‘‘फेर का! हम जो भुनसारे निकरे सो हमें याद आई के उल्टे हाथ पे गड्ढा खोदो जा रओ हतो। सो, हम सीधे हाथ पे बढ़े। ऊ तरफा को रोड़ को बलब फ्यूज हतो, सो हमें ठीक से दिखा नई रओ हतो। सो, हम चार कदम बढ़े ई हते के एक गड्डा में जा गिरे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे! आपको लगी सो नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘लगी काए नईं? जे देखो हमाओ घूंटा छिल गओ। बो तो कहो के गड्ढा भौत गहरो नई रओ ने तो हमाई तो उतई कबर बन जाती।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ऐसो ने कहो आप! शुभ-शुभ बोलो।’’ मोय भैयाजी की चिंता भई।
‘‘अरे, फिकर ने करो! हड्डी-मड्डी नई टूटी। तनक छिलो भर आए। बाकी जेई सो हम कै रए बिन्ना के जो कोन टाईप को विकास को काम होत रैत आए के पैले सड़क बनाई, जब सड़क बन गई सो ऊको खोद-खाद के लाईन डारी जान लगी। कभऊं केबल के लाने, सो कभऊं पानी लाने औ कभऊं नाली के लाने। ऊपे कभऊं ई तरफे, सो कभऊं ऊ तरफे। औ काम चलत आए चिंटियां चाल से। जब लों चाए कोनऊं के हाथ टूंटें, चाए पैर टूटें औ चाए मूंड़ फूटें, कोनऊं को फिकर नइयां। जेई लाने सो हम कै रए के मोए सो लगत आए के अपने इते मनो सही ढंग से विकास कभऊं ने हुइए।’’ भैयाजी बात बदलबे के लाने बोले।
‘‘अब इत्ते निराश ने हो भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘का निराश ने होएं? अपने इते के सबरे शहर सो मचे से डरे आएं।’’ भैयाजी निराश होत भए बोले।
‘‘जो दिनां जे सब पूरो हो जेहे, तब कहियो!’’ मैंने भैयाजी खों ढांढस बंधाई।
‘‘हऔ, बिन्ना! जबलों सही-सलामत रहबी सो कहबी!’’ कैत भय भैयाजी बढ़ लिए।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब पैले सड़क बने, चाए पैले गढ़ा खुदें, मोय का? मोय सोई विकास के लाने टैक्स भरनई परहे। मनो फिकर नइयां काय से के कोनऊं को विकास सो हुइयेई! तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(04.11.2022)
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Thursday, October 27, 2022

बतकाव बिन्ना की | पुरखन ने जी जराओ औ इन्ने दिल जीत लए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"पुरखन ने जी जराओ औ इन्ने दिल जीत लए" ( संदर्भ ऋषि सुनक का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनना) मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
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बतकाव बिन्ना की         
पुरखन ने जी जराओ औ इन्ने दिल जीत लए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
        
‘‘लेओ मिठाई खाओ!’’ भैयाजी ने मिठाई को डब्बा मोरे आंगू बढ़ा दओ।
‘‘ने ख्वाओ भैयाजी, मिठाई खा-खा के जी सो भर गओ आए। तीन-चार दिना से जेई चल रओ। जिते जाओ उते दिवारी की मिठाई, ने तो जोन घरे आए सो दिवारी की मिठाई संगे ले आए। अब ने खाओ जेहे।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘न बिन्ना! जे सो खाने ई पड़हे!’’ भैयाजी जिद सी करत भए बोले।
‘‘काए? जे कोनऊ स्पेसल मिठाई आए का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ, स्पेसलई समझो।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘मने, का हो गओ? दिवारी पे कछु खेल-खाल लओ का जो जीतबे की मिठाई ख्वा रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, राम को नाव लेओ बिन्ना! जो का कै रईं? हमने तो मुतकी साल से दिवारी पे जुआ-सुआ नई खेलो।’’ भैयाजी सफाई देत भए बोले।
‘‘हऔ, सो पैलऊं तो खेलत्ते!’’ मैंने याद कराई।
‘‘हऔ सो पैलऊं की पैलऊं ठैरी! बो तो जबलों तुमाई भौजी ने हमें अपनी कसम दई तभई से जुआ को नाम नई लओ हमने! अब तो मनो इन्टरनेट पे जुआ चलन लगे, सो हम ऊ तरफी नईं ढूंकत!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जे सो सांची कही आपने। बड्डे-बड्डे हीरो हरें जुआपट्टी के विज्ञापन करत दिखात आएं। इन ओरन को कछु सरम नईं आत का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जो सरम आती सो काए के लाने ऐसे विज्ञापन करते? बे तो लाखों कमा रए, मनो बाकी सो अपनो घर फूंक रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘खैर, आप सो जे बताओ के जे मिठाई मोए काए ख्वा रए? जो जे दिवारी की नई, सो काए की आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुम आजकाल खबरे नईं सुन-पढ़ रईं का?’’ जवाब देने की जांगा भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘हऔ काए नईं पढ़ रई। दिवारी के दूसरे दिना अखबार नई छपे रए सो उनके डिजिटल एडीशन में पढ़ लए रए।’’ मैंने शान दिखात भई बताई।
‘‘फेर सो तुमें समझ जाओ चाइए के हम तुमें जे मिठाई काए के लाने ख्वा रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब जे बुझव्वल ने बुझाओ भैयाजी! आप सो सीधे बोलो के जे मिठाई काए के लाने?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘जे लाने के हमाओ तिरंगा फहर गओ ब्रिटेन पे।’’ भैयाजी उचकत भए बोले।
‘‘जो का कै रए?’’ मोए कछु समझ में ने आई।
‘‘औ का!’’
‘‘कोनऊ मैच जीत लओ का? मोए जे किरकेट-मिरकेट में कछु मन नई लगत, सो मोए ई बारे में कछु पतो नइयां।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अरे, बिन्ना तुम सोई!’’ भैयाजी खिझात भए बोले,‘‘ तुम सोई गजबई कर रईं। अरे, तुमे पतो नइयां का, के अपने भारतीय मूल के ऋषि सुनक उते के प्रधानमंत्री बन गए।’’
‘‘हऔ, मोए पतो आए! जे तो बड़ी खुसी की बात आए। मनो ईमें अपनो तिरंगा फहरबे की बात कां से आ गई? बे उते यूनियनजैक फहरा रए, तिरंगा काए के लाने फहराहें?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ तो, उन्ने तिरंगा फहराओ नईं, मनो भओ जेई टाईप को।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कहूं नईं! बे उते के नागरिक ठैरे सो उते के प्रधानमंत्री बने। उते की जनता ने जेई लाने उनको समर्थन दओ। ईमें तिरंगा फहरबे की बात कां से आई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘मनो बे आएं सो भारतीय मूल के!’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे सो हमने मानी आपकी बात के बे आएं तो भारतीय मूल के। मनो उनको प्रधानमंत्री बनाबे के लाने उते की जनता औ पार्लियामेंट को गुनगान करो चाइए, के उन्ने एक बिदेसी मूल के अपने नागरिक पे भरोसा करो औ उनको मौका दओ।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, सो ईमें का? ऋषि सुनक जे जोग आंए सो उनको मौका दओ गओ!’’ भैयाजी तिनकत भए बोले, ‘‘तुम काए उल्टो-सुल्टो बोल रईं?’’
‘‘मैं उल्टो नईं बोल रई। मैं सो जे कै रई के जिन अंग्रेजन के पुरखा हरन ने हमाई जमीन पे कब्जा करो औ हमें 200 बरस गुलाम बनाए रए, उनकी जे पीढ़ी ने अपने सुनक पे भरोसा जता के अपन ओरन के दिल पे कब्जा कर लओ। औ जेई तरां से अपने पुरखा हरन के पाप को प्रायश्चित सोई कर लओ।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जे तो तुमने सांची कई। अंग्रेजन ने दिल तो खुस कर दओ।’’ भैयाजी खुस होत भए बोले।
‘‘मनो, उनकी जांगा अपने ओरें होते सो कभऊं ऐसो ने करते।’’ मैंने कही।
‘‘मने?’’
‘‘मने जे के अपन उनके लाने बिदेसी-बिदेसी की ठेन कर कर के उनको कोनऊं कोनिया में पटक देते। औ अपने ओरे जे कर बी चुके आएं।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ हम समझ गए के तुम का कहबो चा रईं! बाकी बे इते की बहू रईं औ जे इते के दमाद आएं।’’ भैयाजी तर्क देत भए बोले।
‘‘हऔ, औ अपन ओरें बहू औ दमाद में फरक करबो सो खूबई अच्छे से जानत आएं। दमाद के पांव परे जात आएं औ बहू से पांव पड़ाए जात आएं। सांची कई न मैंने?’’ मैंने भैयाजी को तानो मारो।
‘‘सो का, बहू तो बहू आए औ दमाद तो दमाद आए। बाकी तुम जे नेता हरन घांई काए गिचड़ रईं? अपने ओरें कोनऊं टीवी डिबेट में नईं बैठे।’’ भैयाजी बात बदलबे के लाने बोले।
‘‘काए की नेतागिरी? मोए का करने राजनीति से? मैं सो जे लाने कै रई के ऊ टेम पे अपन ओरन ने खूबई विरोध करो रओ, जब के कऔ जात आए के ब्याओ के बाद लड़की को घर ऊको सासरो होत आए। मनो अपन ओरन ने ऊ टेम पे अपनी जे सारी बातें भुला दई रईं। औ अब जब अपने इते के दमाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गए, सो अपन ओरें फूले फिर रए। बहू औ दमाद में जो अंतर अपन ने राजनीति में सोई दिखा दओ।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ सो तुम का चात हो के अपने सुनक भैया खों उते प्रधानमंत्री नईं बनाओ जाओ चाइए रओ?’’ भैयाजी तनक गुस्सा होते भए बोले।
‘‘मैंने जे कब कई? मैं सो जे कैत हों के सबई जांगा ऐसई दिल खुलो रखो जाओ चाइए। औ कोनऊं अपनई की बात नइयां, अमरीका ने सोई अपन ओरन घांई करो रओ। जब बो हाॅलीवुड को हीरो अर्नाल्ड श्वेजनेगर की उते के राष्ट्रपति बनबे की बात चली रई सो ऊके लाने बी बिदेसी कै के ऊकी उम्मीदवारी पैलई ठुकरा दई गई रई। मनो अंग्रेजन ने दिखा दओ के समै के संगे बे ओरें पूरे बदल गए आएं। उनके पुरखा हरन ने अपन ओरन खों जी जराओ औ इन्ने दिल जीत लए। संगे दुनिया के सबई देसन के लाने एक अच्छो उदाहरण रख दओ।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, बिन्ना! को जाने कल को जेई रस्ता से कमला हैरिस अमरीका की राष्ट्रपति बन जाएं।’’ भैयाजी भारी खुस होत भए बोले। उन्ने फेर के मिठाई को डब्बा मोरे आंगू बढ़ा दओ,‘‘लेओ, जेई बात पे मिठाई खाओ के आज ऋषि सुनक औ काल कमला हैरिस!’’
‘‘औ अपने इते...?’’ मैंने भैयाजी को चुटकी लई।
‘‘नेता घांईं गिचड़ ने करो!’’ भैयाजी हंसत भए बोले।    
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मनो आए सो जे मिठाई खाबे वारी बात के अपने इते को मूल को और अपने इते को दमाद ब्रिटेन को प्रधानमंत्री बन गओ। एक नओ इतिहास लिख गओ। जे जो परम्परा चलन में आ जाए सो, देसन के बीच की रार सोई मिटन लगहे औ तब सच्चो ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ कहो जा सकहे। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(27.10.2022)
#बतकावबिन्नाकी  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली  #बुंदेलखंड  #बतकाव #BatkavBinnaKi #DrMissSharadSingh  #Bundeli
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Friday, October 21, 2022

बतकाव बिन्ना की | चलो चले गुंइयां कातिक नहाबे | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"चलो चले गुंइयां कातिक नहाबे..."  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
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बतकाव बिन्ना की         
चलो चले गुंइयां कातिक नहाबे...
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
        
‘‘का हो रओ भैयाजी?’’मैंने भैयाजी से पूछी। बे अपने घरे की बाहरी दीवार की पुताई रए हते।
‘‘तुम सो अकबर-बीरबल घांई बतकाव कर रईं बिन्ना!’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘का मतलब?’’
‘‘मतलब जे के एक दफा अकबर ने बीरबल से पूछी के बीरबल, जे बताओ के हमारे राज्य में सबसो बड़ो अंधरा को आ? बीरबल ने कही के आप हमें दो दिना को टेम देओ हम सबसे बड़े अंधरा को केवल नामई नई बताहें बल्कि आपखों ऊसे सजीवन मिलवा देहें। बाकी आपको हमाए घरे आने परहे ऊसे मिलबे के लाने। अकबर ने कही ठीक है, अब हम दो दिना बाद तुमाए घरे आबी। ठीक दो दिना बाद अकबर बादसाय पौंच गए बीरबल के घरे। ऊ बेरा बीरबल अपने घरे के बाहरे के अंगना में बैठे नरियल की रस्सी से अपनी खटिया गांथ रए हते। अकबर ने देखी औ बीरबल से पूछी, का हो रओ बीरबल? बीरबल बोलो के महाराज आपके लाने सबसे बड़ो अंधरा दिखाने रओ सो जेई से हम इते खटियां गांथत बैठे आएं। अकबर ने पूछी के कां है बो सबसे बड़ो अंधरा? मोए जल्दी मिलाओ ऊसे। बीरबल ने कही के आपकी बगल में जो दरपन धरो ऊमें आप देखो सो आपखों आपके राज्य को सबसे बड़ो अंधरा दिखा जेहे। अकबर ने तुरतई दरपन में देखो। ऊको अपनो चेहरा दिखाई दओ। अकबर बोलो, जो का आए बीरबल? अंधरा कां हैं, ईमें सो हमई दिखा रए। ई पे बीरबल मुस्क्यात भओ बोलो के गुस्ताख़ी मुआफ होय हुजूर! अपने राज्य के सबसे बड़े अंधरा सो आपई हो। का मतलब? अकबर बादसाय भड़क गओ। गुस्सा ने करो हुजूर, आपई बताओ के आप इते आए, आपने हमें खटिया गांथत देखो, फेर बी हमसे पूछी के का हो रओ बीरबल? मनो आप हमें देख न पाए के हम का कर रए। आप ठैरे अपने राज्य के बादसाय औ आप ई खों हम काम करत भए न दिखाने, मतलब जे के आप अपने राज्य के सबसे बड़े अंधरा कहाने। अकबर ने सुनी सो बीरबल की तारीफें करन लगो।’’ भैयाजी ने मोए पूरी किसां सुना दई।
‘‘हऔ, मनो हम आपकी तारीफें न करबी। काए से के आप हमें इनडायरेक्ट में अंधरा कै रए।’’ मैंने मों बनात भई कही।
भैयाजी हंसन लगे। मोय सोई हंसी आ गई।
‘‘अब जो मैं जे पूछूं सो आप कहोगे के तुमाए जैसो बहरा नई देखो....’’ मैंने बात अधूरी छोड़ दई।
‘‘अरे नई, पूछो, का पूछने!’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप का गा रए हते? मोए ऐसो लगो के आप कातिक गीत गा रए हते।’’मैंने कही।
‘‘हऔ! तुमने सही पैचानों। आज मोए पुरानो कातिक गीत याद आ गओ। काम करत टेम कछु गात-गुनगुनात रओ सो मन लगो रैत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कुल्ल दिनां बाद मैंने जो गीत सुनो। ने तो आजकाल सो सबई लोकगीतन में ऊंटपटांग सैंया, बैंया के अलावा कछु रैत नइयां।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘सही कही बिन्ना! पुराने लोकगीतन की, जा जे कओ के असली लोकगीतन की बातई कछु और आए।’’ कहत भए भैयाजी फिर के कातिक गीत गुनगुनान लगे-
‘‘चलो चले गुंइयां कातिक नहाबे
कातिक नहाबे/हुन्ना धुआबे
रइयो चैकन्नी कहूं कान्हा ने आएं
कान्हा जो आएं, हुन्ना ले जाएं
चलो चले गुंइयां कातिक नहाबे.....’’
‘‘बड़ो अच्छो गात हो आप तो! कभऊं रेडियो के लाने ट्राई करो आपने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ऊंहूं! नई करो! अब इत्तो बी नई बनत हमसे! बाकी चलो एक और गीत सुनो-
गंगा से न्यारो, जमुना से न्यारो
तला हमाओ सबरों से न्यारो
चलो चलें कातिक नहाबे के लाने...
लछमी बी आएं इते, दुर्गा सो आएं
राधा बी आएं इते सीता सो आएं
देबन ने डोला सोई इतई उतारो
तला हमाओ सबरांे से न्यारो
चलो चलें कातिक नहाबे के लाने...

‘‘भौतई नोनो भैयाजी! ई टाईप के लोकगीत सो अब सुने नईं परत। आप खों खूबई याद ठैरे।’’ मैंने भैयाजी की तारीफ करी।
‘‘जे सब हमाई अम्मा गात रईं। औ तुमें पतो बिन्ना, के हमाई अम्मा भुनसारे चार बजे उठ के कतकारियों के संगे नहाबे के लाने घर से निकर पड़त्तीं। मनो ई बेरा सो अबे लों कछु ठंड नईं परी, ने तो पैलऊं सो कभऊं-कभऊं कातिक में भौतई ठंड पड़त्ती। पर हमाई मताई ने कभऊं नागा नई करो। बे चार बजे भुनसारे तला जात्तीं औ नहा के आउत्तीं। एकाध बेरा हम सोई पांछू गए बाकी एक दिनां में हमाओ जोश ठंडो पर गओ। अम्मा नहा के लौटत्तीं, फेर घर को काम करत भईं कातकिया गात रैत्तीं। बेई हमें कछु-कछु याद हैं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘अब सो त्योहार-बार भौतई कछु बदल गओ।’’ मैंने कही।
‘‘अब हमने खुदई सो बदलो आए, कोनऊं और ने थोड़ी बदले। हम चाएं सो अबे ऊंसई मना सकत आएं। तुमें याद हुइए के एक बेरा मलिया मेले में अपने मंत्री गोपाल भार्गव भैया ने दिवारी गाई रई औ संगे नाचे रए। खूबई वायरल भओ रओ उनको बा वारो वीडियो। रामधई अच्छो सो लगत आए जब अपन ओरें देखत हैं के अपने भैया हरें ऊंची-ऊंची कुर्सी लो पौंच के बी अपनी बुंदेली परम्पराओं खों भूलत नईयां।’’ भैयाजी तारीफ करत भए बोले।
‘‘भूलबो बी नई चाइए। अखीर जेई माटी में बे ओरें बी जन्में और जेई माटी की जे सगरी परम्पराएं आएं। जेई से सो मोए शिवराज सिंह भैया पोसत आएं के बे सोई अपनी परम्पराएं कभऊं नईं भूलत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कही।  
 ‘‘जेई सो हम कै रए के तनक सो फेर-बदल कर के हम अपनी परंपराएं बचा सकत आएं। जैसे तुमाई भौजी खों लेओ, बे तला सो नई जात नहाबे के लाने, पर भुनसारे हमसे पैलई नहा-धो लेत आएं। त्योहार आत आए सो ऊके मुताबिक ब्यंजन बनाउन लगत आएं। अब आज बे एरसे औ अद्रैनी बना रईं। काल औ परे उन्ने गूझा, पपड़ियां औ सेव-नमकीन बना लए हते। ई से निपट के दो दिनां बाद पूजा के लाने दीवार पे सुरैती बनाहें। देखो बिन्ना, मनो त्योहार के लाने कछु मीठा-नमकीन सो लगतई है। जो जे मीठा-नमकीन हमाए पुराने स्टाईल को होय सो आहा हा, कैनेई का !’’ भैयाजी चटखारा लेत भए बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, आप सांची कै रै! तभई तो जे देखो के बड़े-बड़े माॅल हरों में ई टेम पे रसगुल्ल, गूझा, पपड़ियां, मगज के लड्डू मिल रए। काए से के उन बाजार वारन खों सांेई पतो के परंपरा वारे त्योहारन पे परम्परा वारी मिठाई-नमकीन लगत आए।’’ मैंने कही।
‘‘सो चलो बिन्ना तुम सोई एक बुरुश पकरो, काए से के जे दीवार हमें चार बजे लों निपटाने आए। ने तो तुमाई भौजी हमें चार बजे की चाय ने देहें। सो चलो, तुम सोई मोरो हाथ बंटाओ।’’
हम दोई भैया-बहन कातकिया गात भए पुताई करन लगे।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मनो भैयाजी के संगे पुताई करत-करत कातकिया गाबे में बड़ो मजो आ रओ हतो। आप ओंरन खों सोई अपनी परम्पराओं घांई कछु ने कछु करो चाइए। खूबई अच्छो लगहे। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम! औ दिवाली सियाराम !!!
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(21.10.2022)
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Tuesday, September 7, 2021

बुंदेली व्यंग्य | पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन | डॉ शरद सिंह | पत्रिका में प्रकाशित

आज 07 सितंबर 2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन" प्रकाशित हुआ ..आप भी पढ़ें..आंनद लें..😄
#ThankYou #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य
पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       "काए नोने भैया, किते जा रहे हैं?" सामने नोने भैया खों देख के मोसे पूंछे बिना न रहो गओ। काए से के नोने भैया की सुबो तो ग्यारा-बारा बजे होत है औ आज बे मोए सुबो साढ़े छह बजे जात लो दिखाने।
"अरे कहूं नई, इतई लो।" नोने भैया टालत भए बोले।
"इतई कितई? औ जे मूंड़ पे गमछा बांध रखो है, टुकनिया सोई लिए हो...का माटी खोदबे के लाने जा रए? मनो, अबे छबाई-लिपाई खों टेम सो आओ नइयां औ तुमने कुदाली भी नई रखी है...सांची-सांची बताओ के कहां जा रए?" मैंने सोई पीछा ने छोड़ी।
"अरे कहूं नईं, इतई हारे लों जा रए!" नोने भैया खों बतानई पड़ी।
"हारे? काए के लाने हारे जा रए? अबई सो बेर-मकोय खों सीजन नइयां, फेर तुम काए के लाने जा रए भुनसारे से?" मैंने पूछी।
"अरे, तुमाई भौजी सो ठेन कर रई कल्ल रातई से।""
"काए के लाने ठेन कर रईं?"
"अरे, बा ने जब से सुनी है के रसोई गैस के दाम पच्चीस रुपइया बढ़ गए, तभई से घरे रार मची है।" नोने भैया ने बताई।
"भौजी खों कौन ने बताई?" मैंने पूछी।
"हमई ने बताई, और कौन बताता? कल्ल रात हमने तुमाई भौजी से कह दई के गैस को उपयोग तनक सम्हर-सम्हर के करियो, काए से के गैस के दाम पच्चीस रुपए बढ़ गए हैं। हमने इत्ती कही के तुमाई भौजी सो बमक गईं। कहन लगीं के और कित्तो सम्हारें, जित्तो खाना बनने है, उत्तो तो बनहे ई। कहो तो खाना बनाना छोड़ दें । सो, हमने उनखों समझाई के परमेसरी, हमाओ मतलब जो न हतो। हमने तो खबर पढ़ी, सो तुमे सुना दई। ईपे बे बोलीं, सुनो अब इत्ती मैंहगी गैस में तो हमसे खाना ने पकाओ जेहे। सो, हमने पूछी के काए हम ओरन खों भूको मारबे को बिचार बना रईं का? सो, बे बोलीं, काए भूको मारहें हमाई तुम ओरन से कौनऊ दुस्मनी है का? अरे , हम तो जे कह रै के कल्ल भुनसारे उठ जइयो और हारे से चूल्हा में जलाबे जोग लकड़ियां ले आइयो।" नोने भैया ने बताई।
"मगर हारे में बे जंगल विभाग वारों ने लकड़ियां कान ने दईं, सो का कर हो?" मैंने पूछी।
 "हऔ, सो जेई तो हमने तुमाई भंजी से कही, परमेसरी बे जंगल विभाग वारे लकड़ियां ने काटन देहें। सो, बे बोलीं के हमने कब कही के तुमें लकड़ियां काट के लानी है? उते से बीन के लाइयो और एक टुकनियां संगे ले जइयो ताकि उते गोबर के कंडा-मंडा मिलें सो संगे बीन लाइयो। अब बिन्ना, हमें तुमाई भौजी खों हुकुम सो बजानेई है।" नोने भैया गहरी सांस लेत भए बोले।
"भैया, गलत नई कही भौजी ने। अब जेई तो करने पड़हे। गैस के दाम हर महीना पच्चीस-पच्चीस रुपइया बढ़हें, सो सबई जनन खों हारे जाने पड़हे। बाकी तुम तो जे सोचो भैया के हारे में तुमें सुद्ध हवा मिलहे। जोन से तुमाई सेहत अच्छी रैहे। तुम तो इको पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन मानो, रामधई!" मैंने नोने भैया खों समझाओ।
"हौ बिन्ना, सो संगे चलो तुम सोई।" नोने भैया हंसत भए बोले, "जे मंहगाई डायन जो न कराए सो कम है...।"
"गलत कै रए भैया, मंहगाई डायन नई, पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन!!!" मैंने नोने भैया खों याद दिलाओ और बे हंसत भए चल पड़े हारे लकड़ियां-कंडा बीनबे के लाने।
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Thursday, August 26, 2021

बुंदेली व्यंग्य | पैले बनीं, के पैले खुदीं | डॉ शरद सिंह | पत्रिका में प्रकाशित

मित्रो, 15 अगस्त 2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "पैले बनीं, के पैले खुदीं " प्रकाशित हुआ था... आप भी पढ़ें...आंनद लें....
#Thank you #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य    
पैले बनीं, के पैले खुदीं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
        ‘‘काए, नोने भैया! आज का हो गओ, जो ऐसो मों लटकाए बैठे हो?’’ मैंने पूछी नोने भैया से। काए से के नोने भैया को मों तभई लटकत आए जबे उने कोनऊ गम्म खान लगत आए। 
‘‘कछु नईयां!’’ नोने भैया मरी-सी आवाज में बोले।
‘‘ये लेओ, अब अपनी जे बिन्ना से ने छिपाओ। तुमाए मों पे तुमाई चिन्ता की फिलम चल रई है, बाकी डिस्क तनक गड़बड़ आए सो साफ नई दिखा रओ के पर्दा पे का चल रओ आए।’’ मैंने कही। मोरी बात सुन के नोने भैया ने मुस्का दओ।
‘‘जे भई न बात! चलो अब बता भी देओ। जे कोनऊ जेम्सबांड की फिलम नइयां के अखीरी में पता चले के कतल कोन करो हतो।’’ मैंने तनक और पिंची-सी करी। सो, काम कर गई पिंची।
‘‘हऔ, जे तो शाहरुख की फिलम आए जीमें सुरुअई से सबई खों पता रैत है के कौन ने कतल करो।’’ नोने भैया बोले।
‘‘सो, अब बताओ के का भओ? मुतकी पहेलियां-सी ने बुझाओ।’’
‘‘हमें जे समझ में ने आ रई बिन्ना के हमाई सिटी स्मार्ट कब लौं बनहें?’’ नोने भैया कहत भए, फेर के चिन्ता में डूब गए। 
‘‘ऐं, सो तुम जे आ सोच रए हो? हमने तो सोची के कोनऊ गंभीर बात आए।’’ मोए बड़ो अचरज भओ।
‘‘काए, जे का गंभीर बात नइयां?’’
‘‘तुम काए चिन्ता कर रए? हो जे हे स्मार्ट। और होत्तो जा रई आए, तुमें दिखात नइयां का? बे उते सिविल लाईन के पांछू आई लव सागर लिखो है। सबरे उते जा के सेल्फी-सेल्फी खेलत हैं। तुमने तो सोई अपनी फोटू खिंचवाई हती उते’’ मैंने सुरता कराई।
‘‘हऔ, ओ बोई के पांछू वारी घास-पतूले की दीवार गिर गई हती, बा भुला गईं?’’ नोने भैया चिढ़ के बोले।
‘‘बे तो अपनी सिटी में मुतकी जांगे लगी हैं, कोऊ कहां-कहां लो सम्हारे? एकाध गिर गई सो फेर के खड़ी कर दई। अब ईमें मूंड़ खराब करबे की का बात है?’’ मैंने पूछी।
‘‘चलो घास-पतूला की छोड़ो, झील की बोलो?’’ 
‘‘का बोले?’’
‘‘झील तो ने सुधरी बाकी गिलावा मच गओ। हाय, कित्ती नोनी झील हती, अब का हो के रै गई। सुंगरा बी न लोटें अब तो उते।’’ नोने भैया बोले।
‘‘अब ऐसो बी ने कहो। सब ठीक हो जेहे।’’
‘‘तुमें का बताएं, बिन्ना! हमने अपने अनवरसिटी वारे दिनन में नाव पे सैर करी हती ऊ झील में, वो बी एक मोड़ी के संगे। हमाए साथ पढ़त्ती।’’ नोने भैया खयालन में डूबत भए बोले।
‘‘सो अब वो कहां गई? कहीं हमाई भौजी तो ने आए वो?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, भली कहीं! कहां वो गोरी-चिट्टी पहाड़न औ कहां तुमाई भौजी, करिया-सी भंटा-सी।’’ नोने भैया ठंडी आह भरत बोले।
‘‘जो का कै रए भैया? भौजी के लाने कछू और कही तो सो हमसे चुप ने रई जेहे, उनके ऐंगर सबलो हाल सुना देबी।’’ हमें नोने भैया की लवस्टोरी ने पोसाई।
‘‘अरे, बा तो ऊंसई कै दई हमने। अब तो खबरई नईयां ऊकी। बाकी जे झील को नास कर दओ, सबने मिल के।’’ नोने भइया को सुर फेर के झील पे पोंच गओ।
‘‘अरे झील को छोड़ो भैया, तुमें सड़कें ने दिखा रईं का? उने देख के तो लगत आए के बे सिमेंट या डामल की नोईं, गिलावे की बनी आएं। जैसे बरफ वारी स्लेज गाड़ी चलत आए न, ऊंसई गिलावे वारी स्लेज गाड़ी मंगा लेओ चइए।’’ मोसे बी चुप ने रओ गओ। 
‘‘जे कही तुमने हमाए मन की बात, बिन्ना! जुग-जुग जियो! जे ई सब तो हम सोच रए के कां तो हमाई सिटी स्मार्ट बनबे जा रई हती और कां अब गिलावा सिटी बन के रै गई आए। जो का हो रओ?’’ नोने भैया चहक के बोले। उने मोरो समर्थन जो मिल गओ।
‘‘गम्म खाओ भैया! एक दिना हमाई सिटी सोई बन जेहे स्मार्ट। अभई तो हमाई सड़कें हड्डियन के डाक्टर की फ्रेंडली आएं।’’ 
‘‘हऔ, भली कही! ऊंसई हमाए इते अंडा-मुर्गी को खेल चलत रैत आए। पैले सड़क बनत है, फेर टेलीफोन वारे, मोबाईल वारे, पाईप वारे, नाली वारे, जे वारे-बे वारे, सबरे वारे जमीन खोदत की मशीन ले के सड़कई खोद देत आएं। फेर पाईप, नाली, तार को काम हो जात आए तो फेर के सड़क बनत है। ओ, सड़क बन के तैयार ने हो पाए के फेर के कोनऊ ने कोनऊ सड़क खोदबे के लाने दनदनानत भओ आ जात है। जेई समझ में न आ पात है के पैले सड़क बनी, के पैले सड़क खुदी? रामधई, सोच-सोच के मूंड़ पिरान लगत आए।’’ नोने भैया अपनो मूंड़ पकड़त भए बोले।
‘‘येल्लो, अब सोच-सोच के तुमई पिछड़ रए? अरे भैया, स्मार्ट बनने है तो सोच-फिकर छोड़ो। तुम सोई अपने घरे घास-पतूला लगाओ, ऊमें पानी डारो और खुस हो जाओ। स्मार्ट सिटी के लाने सोचबे खों हमाए नेता औ अधिकारी तो हैं, तुम ने फिकर करो! जे ऊंसई बरसात को सीजन आए, सो भुंटा खाओ औ खुस हो जाओ!’’
‘‘हऔ, बिन्ना! जे सही कही। अबई हम तुमाई भौजी से भुंटा भूंजबे के लाने कहत हैं, मनो पैले भुंटा लाने पड़हे।’’ नोने भैया ने भुंटा की सुनी सो स्मार्ट सिटी की भूल गए। और गिलावा में फिसलत भए चल पड़े भुंटा लाने। हम सबई तो हमाए नोने भैया घांई आएं के भुंटा याद आ गओ तो पिराबलम भूल गए। अब कहां की झील, कहां की सड़कें, कहां के गढ़ा और कहां को गिलाबो! सो भैया, सबई जने भुंटा खाओ औ खुस हो जाओ!     
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Friday, July 23, 2021

बुंदेली व्यंग्य | जै हो पेगासस भैया की | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


ब्लॉग साथियों, आज 23.07.2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "जै हो पेगासस भैया की " प्रकाशित हुआ है... आप भी पढ़ें...आंनद लें....
#Thank you #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य    
  जै हो पेगासस भैया की
              - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
नोने भैया मूंड़ औंधाए भये बैठे हते अपने दुआरे पे। भौजी ने कही हती के जा के भटा-मटा ले आओ, सो तुमाये लाने भर्त बना देवें।
‘‘हऔ, लाए देत हैं। पैले अच्छी-सी चाय-माय तो पिला देओ। जब देखों बस काम ई की कैत रैत हो। कछु तो सरम कर लौ करे।’’ नोने भैया ने भौजी से कही।
‘‘जे देखो, कछु करत न धरत के औ बोल ऐसे रै के मनो घर-बाहरै को सबई काम जे ई तो करत होंए। हुंह! चाय पी के भटा ले अइयो, ने तो आज सब्जी न मिलहे खाबे खों।’’ भौजी ने सोई ठोंक के सुना दई।
‘‘हऔ तो, चलो चाय तो देओ, मंत्री हरन की घोषणा घंई बोल के न रै जाओ।’’ नोने भैया ने कहीं और ताज़ो अख़बार ले के बैठ गए। पैलई ख़बर पढ़ के उनको मत्था घूम गओ। ख़बर हती पेगासस फोन हैकिंग की।
जो का, जे पेगासस लिस्ट में सोई सबरे बड़े-बड़े नाम दए हैं। ग़रीब की तो कोई पूछ-परख करत ई नईयां। ग़रीबन के इते ने तो कभऊं कोई छापा-वापा पड़त आए, ने तो कोनऊ मंत्री-मिनिस्टर आउत है औ अब जे देखो, पेगासस से भी बड़े लोगन की जासूसी कराई जा रई। अरे, कभऊं कोनऊ गरीबन की बातें सुन लओ करे। छोटो-मोटो सस्तो सो एंडरायड फोन तो गरीबन के एऐंडर सोई पाओ जात आए। मनो उनको तो कोनऊं स्टेटस ई नइयां। नोने भैया चाय सुड़कत भए सोसत रये। चाय ख़तम भई सो कप-बसी उतई छोड़ के बाहरे दुआरे पे पसर गए।
दरअसल, नोने भैया ने भौजी को ‘हऔ’ तो कै दई बाकी बे भटा-मटा लेबे कहूं गए नईं। अखबार पढ़ के उनको मन उदास हो गओ। मोए का पतो रहो के नोने भैया उदासे डरे हैं। नोने भैया के दुआरे से निकलत भए मैंने उनसे राम-राम कर लई। बे तो मनो कोनऊं से बतकाव करन चाह रए हते।
‘‘काए भैया सब ठीक आए।’’ मैंने नोने भैया से का पूछी, मनो भिड़ के छत्ते में अपनों हाथ दे दओ।
‘‘बिन्ना हमाए इते छापो पड़वा देओ।’’ नोने भैया मोए चौंकात भए बोले।
‘‘का? का कै रए?’’ मोए कछु समझ में न आओ।
‘‘अरे बिन्ना, ई दुनिया में हमाई तो कोनऊं पूछ-परख है नईं। मनो हमाए इते बी छापो-वापो पड़ जातो तो बिरादरी में तनक इज्जत बढ़ जाती।’’ नोने भैया बोले।
‘‘जो का कै रए, भैया? सुभ-सुभ बोलो!’’
‘‘अरे बिन्ना, हम सुभ-सुभ ई बोल रए। तुम देखत नईयां का, के जोने के इते छापो पड़ जात है, उनकी इज्जत बढ़ जात है। सबई समझ जात आएं के जे खतो-पीतो पिरानी आए। एक हम आएं ठट्ठ, कोनऊं पूछ-बकत नईं।’’ नोने भैया कलपत भए बोले।
‘‘जो का उल्टो-सूधो बक रए हो भैया! ऐसो कहूं नईं होत।’’ मैंने विरोध करी।
‘‘चलो, छापो-वापो को छोड़ो, हमाई आज की पीड़ा सुनो।’’ नोने भैया ने कही।
‘‘हऔ, बोलो!’’
‘‘बोलने का आए, जे देखो हमाए पास सोई एंडरायड मोबाईल फोन आए, पर हमाई बात कोई ने न सुनी।’’ नोने भैया ने दूसरो सुर पकड़ लओ।
‘‘एंडरायड फोन से का होत है, तुम सोई कभऊं कोनऊं खों फोव-वोन कर लओ करे। तुम ने लगेओ सो, दूसरो ई कहां तक तुमाए लाने घंटी मारत रैहे?’’ मैंने नोने भैया को समझाई।
‘‘अरे, हम तो दो-तीन दिना से खटोले कक्का से रोजई बतकाव कर रै आएं पर जे देखो नासपिटे पेगासस की, हमाई ने तो कोनऊं न बात सुनी, ने तो फोन हैक करो और तो और हमाओ डाटा तक ने चुराओ, नासपिटे ने।’’ नोने भैया मों लटकात भए बोले।
‘‘उदास न हो भैया! बड़े-बड़े लोगन को फोन हैक करो जात है। हमाए-तुमाए फोन में का रखो? अपन ओरन के पास बेई घिसी-पिटी बातें रैत आएं कि आज डीजल मैंहगो हो गओ तो कल पेट्रोल के दाम बढ़ गए। आज टमाटर पचास रुपए किलो बिको तो गिल्की साठ रुपए किलो। हमाई इन बातन से कोनऊं को कोऊ मतलब नईयां।’’ मैंने नोने भैया को समझाई।
‘‘बात तो सही कै रईं बिन्ना, बाकी मैंहगाई के बारे में कोऊ काए नहीं बात करत है। अपन ओरन के कष्टन की कोनऊं को फिकर नईयां।’’ नोने भैया दुखी होत भए बोले।
‘‘मैंहगाई-फहंगाई में कछु नई रखो, पेगासस में तुमें अपना नाम जुड़वाने है तो मंत्री-मिनिस्टर से सांठ-गांठ करो। उनसे ऐसे बतियाओ के मनो कोई भेद की बात कर रए। तुमाओ रसूख जम जाए, तब कहीं काम बनेगा।
‘‘अरे, का बिन्ना! तुमने का हमें बाबाजी को ठुल्लू समझ रखो है? हमने बताई न कि हम दो-तीन दिना से खटोले कक्का से राजनीति पे बहसें कर रैं हैं, पर बात नईं बनी। खटोले कक्का राजनीति से संन्यास ले चुके हैं, बाकी, बे ठैरे मंत्री जी के चच्चा, सो हमने बोल-चाल के लाने उनई को पकड़ रखो है। काए से के मंत्री जी सो हमने बोलहें न।’’ नोने भैया ने अपनी चतुराई बघारी।
‘‘गम्म न करो भैया, कोन जाने अगली लिस्ट में तुमाओ नाम सोई दिखा जाए।’’ मोए उनको झूठी तसल्ली देनी पड़ी।
‘‘नासपिटे जे पेगासस को, इसे जो न बनो के ऊपरे के बजाए तरे से लिस्ट बनाए। जोन को देखो ऊपरई वालन खों देखत आए। नाम ऊपर वारे कमाएं औ मैंहगाई के मोटे-मोटे दाम हम चुकाएं। अभ्भई हमने भी सोच लई कि हमें व्हाट्सएप्प अनवरसिटी में भर्ती हो जाने है, कछु उल्टो-सूधो लिखबो सीख जाएं तो कहो काम बन जाए।’’ नोने भैया ने अपनी परेसानी को खुदई हल निकार लओ।
‘‘भली सोची भैया! सो, अब तुम लग जाओ पोस्ट-मोस्ट में औ हमें जान देओ।’’ मैंने नोने भैया से कही औ चलबे को हुई कि नोने भैया बोल उठे,‘‘देख लइयो, नासपिटे पेगासस की अगली लिस्ट में हमाओ नाम सोई हुइए। औ हम सोई कछु बड़े कहान लगहें।’’
‘‘हऔ भैया, मोरी दुआ तुमाए संगे है।’’ मैंने कही औ वहां से दौड़ लगा दई।
बाकी नोने भैया खों बड़ी आसा है पेगासस से कि उनको फोन कोई हैक कर के उनको रसूख दिला देगा। जै हो सेंधमार पेगासस भैया की!   
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