Thursday, April 27, 2023
बतकाव बिन्ना की | "इते की झेल ने पाओ हुइए बेचारो | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Friday, April 7, 2023
बतकाव बिन्ना की | मोय बतइयो के कोन-कोन की मुंडी कन्फुजिआई ? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Friday, January 6, 2023
बतकाव बिन्ना की | कओ, कैसी दुलैया से पालो परो | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
"कओ, कैसी दुलैया से पालो परो" मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
कओ, कैसी दुलैया से पालो परो - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
जब मैं भैयाजी के घरे पौंची सो बे कंडा (उपला) थाप रए हते और संगे गाना गा रए हते-
‘‘धना ऐसी दुलैया से पालो परो...’’
‘‘काए भैयाजी जो का कर रए?’’ मैंने पूछी।
‘‘देख रईं, फेर बी पूछ रईं! तुम सोई पक्की बुंदेलखंडी आओ।’’ भैयाजी कंडा थापत भए बोले।
‘‘लेओ, मोरो जनम बुंदेलखंड में भओ, सो का मैं बिलायत की कहाबी? पक्की बुंदंलन ठैरी।’’ मैंने सोई पहलवानन घांई अपनो बाजू दिखात भई कही।
‘‘रैन देओ! जो ऐसी पैलवानी आ रई सो जे कंडा थपवा देओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन ने कई के पैलवानी आ रई। बा सो मैंने स्टाईल मारी हती। बाकी आप जे बताओ के जे ई ऐसे जड़कारे में कंडा काए थाप रए? सूरज भगवान सो चंदा घांई ठंडे हो परे, ऐसे में आपके जे कंडा कैसे सूखहें?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। ऊ टेम पे बी सीत ऐसी गिर रई हती के ने पूछो। सो मैंने भैयाजी से कही,‘‘जे कंडा-मंडा छोड़ो आप, कहूं ठंड बैठ गई सो आड़े डरे दिखा हो।’’
‘‘अरे का करो जाय बिन्ना! हमाई मति मारी गई रई के हमने तुमाई भौजी से फरमाईस कर दई के तनक बाटी, भर्त औ लसोन-धना चटनी सो बना लेओ आज।’’
‘‘फेर?’’
‘‘फेर का? बे खुनक परीं औ कैन लगीं के हमने जित्ते कंडा थापे रए ऊंमें से आधे सो आपने एक जनवरी से अब लों ताप डारे। अब जो बाटी बनवाने होय सो कहूं से कंडा ले के आओ। ने तो हमाए लिंगा नईयां कंडा-मंडा। सो हमने समझाओ उनें, के जित्ते होंय उन्हई से बाटी बना देओ। फेर हम लान देबी तुमाए लाने कंडा। इत्तो सुन के बे बमक परीं औ कैन लगीं के हमाए लाने लाहो, हां, काए से के हम सो कंडा खात आएं, कंडा पे सोत आएं और कंडा ओढ़त आएं। हमने देखी के बात हती सो बिगरी जा रई हती। सो, हमने तुमाई भौजी से कही के तनक गम्म खाओ! तुम जो लो बाटी बनाओे, उत्ते में हम कहूं और से कंडा को जुगाड़ कर दे रए। सो, बे कैन लगीं के चलो, कहूं नहीं जाने! का हम समझत नइंयां, तुमें सो घर से भागबे को बहाना चाउंने रैत आए। तुम तो चलो उते बैठो, औ बा परो है मुतको गोबर, सो ऊको कंडा थाप डारो। सो बिन्ना हम समझ गए के अब कंडा थापे बिना बाटी का, गांकडें लो नईं मिलहें। सो बैठ के कंडा थाप रए। देख लेओ हमाई दसा।’’ भैयाजी पिल्लू-सी सूरत बना के बोले।
‘‘ठीक तो करी भौजी ने, अब आप कंडा थापहो सो आप को पता परहे के लुगाइयां कित्तो काम करत आएं। आप ओरन को का, आओ औ फरमाईस सुना दई के हमें जे खाने, बो खाने। अब घरवारी कैसे-कैसे कष्ट उठा रई, जे नईं दिखात आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जे सो तुम सही कै रईं। अबे हमें समझ में आ रई के तुमाई भौजी ऐसे जड़कारें में बी कैसे कंडा थापत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोरी बात पे हामी भर दई।
‘‘भैयाजी, वैसे आप गा का रै हते? मोय लगत आए के मैंने पैले कभऊं रेडियो पे जो गाना सुनो रओ। ऊ टेम पे भोपाल से सोई बुंदेली लोकगीत बजत्ते। ऊ टेम पे हमाओ कालेज सुबै को रैत्तो, सो दुफैर में रोटी जींमत भई रेडियो लगा लेत्ती।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, हमने सोई खूबई लोकगीत सुने रहे रेडियो पे। अब सो टेमई नईं मिलत। बाकी ऊ टेम के लोकगीत अबे लों बिसरें नइयां। बेई सो हम गा रए हते। बाकी कोनऊं फिलम बन रई होती, सो जो गाना हमाई दसा पे फिट बैठतो।’’ कैत भए भैयाजी फेर के लोकगीत गान लगे-
धना ऐसी दुलैया से पालो परो....
हमने कई जो धना लड़ुआ बना दे
लड़ुआ बना दे, तनक लड़ुआ बना दे
तिल, गुड़ लों मेंक-मांक, मिचकूं परीं
धना ऐसी दुलैया से पालो परो....
हमने कई जो धना बाटी बना दे
बाटी बना दे तनक बाटी बना दे
कंडा लों मेंक-मांक, मिचकूं परी ,,,,
‘‘जे आप गलत गा रए। कछु औ हतो ऊ गाने में।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, सो जे हमाओ वर्जन आए। ई में का? लोकगीत को जेई सो मजा आए के अपनो टाईप को बना के गा लेओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘कहूं नईं! बाकी मोय लगत आए के ईको बे लोकगीत गायक देसराज पटेरिया जी ने गाओ रओ। आप को कछु खयाल आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ तुमने ठीक कही! उन्हईं ने गाओ रओ जो गाना। खूबई बजत्तो। औ ऊ टेम पे हम सो खाली मटका बजा-बजा के गाउत रैत्ते। का बे बी दिना हते!’’ भैयाजी ठंडी सांस भरत भए बोले।
‘‘काए कंडा थप गए होंय सो भीतरे कढ़ आओ, ने तो जड़ा जेहो औ हमई को तुमाई सेवा करनी परहे।’’ भौजी ने भीतरे से टेर लगाई।
‘‘राधे-राधे भौजी!’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘अरे बिन्ना, आओ-आओ! बाटी बना रए, सो तुम सोई खा लइयो।’’ भौजी चहकत भईं मोसे बोलीं। फेर भैयाजी से कैन लगीं,‘‘अच्छे से हाथ धो लओ न? सो चलो आओ जो लों बाटियां सिंक रईं तुम भंटें को भर्त बना डारो। जे भंटा भुन गए औ जो तुमें लसोन-धना की चटनी खाने होय सो, बांट लेओ। बाकी सिलबट्टा पे बांटियो, मिक्सी में नोईं। तुमईं को मिक्सी की चटनी नईं पोसात। सो बा धरो सिलबट्टा।’’
‘‘चटनी को का करने? भर्त के आंगू चटनी की कोन को परी।’’ भैयाजी ने तुरतईं अपनी फरमाईस में कटौती कर दई। ने तो उनें भर्त बी चाउंने रओ औ चटनी सोई चाउंने रई।
भैयाजी की दसा देख के मोय औ भौजी दोई को हंसी फूट परी। इत्ते में भौजी गान लगीं-
कओ, कैसी दुलैया से पालो परो...
हमने कई जो तनक चटनी सो बांट लेओ
चटनी सो बांट लेओ, चटनी सो बांट लेओ
सिल-बट्टा देख-देख मिचकूं परे
कओ, कैसी दुलैया से पालो परो...
‘‘औ जे हमाओ वर्जन आए!’’ भौजी भैयाजी से ठिठोली करत भईं बोलीं।
रामधई बड़ो मजो आओ।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मोय सो बिना कछु करे-धरे बाटी-भर्त खाबे खों मिल रओ हतो तो मोरी सो लाटरी लगी कै सकत हो आप ओरें। जेई तो मौसम आए बाटियन को। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(05.01.2023)
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Thursday, December 29, 2022
बतकाव बिन्ना की | ई साल का करी आप ओरन ने? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Thursday, December 1, 2022
बतकाव बिन्ना की | हाय दैया, जो का कै दओ उन्ने | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
"हाय दैया, जो का कै दओ उन्ने !" मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
हाय दैया, जो का कै दओ उन्ने !
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘काए भैयाजी! जे संत टाईप के लोगन को सोई मुंडा काए फिर जात आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। मोए बड़ो बुरौ सो लग रओ हतो।
‘‘काए का हो गई बिन्ना? कोन ने का कै दई?’’ भैयाजी मुस्क्यात भए पूछन लगेे।
‘‘काए आपको पतो नइयां?’’ मैंने भैयाजी से पूछीे।
‘‘अब मोए का पतो के तुम कोन के बारे में का कै रईं? कछू आगे बोलो सो पतो परे।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘लेओ, सगरो इत्तो दोंदरा मचो परो आए, औ एक आप हो के आपको कछू पतो नइयां। आपने सुनी नईं का, के बाबा रामदेव ने का कही?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘नईं मोए नईं पतो। बो का आए के मोए दो-तीन दिना से अखबार देखबे खों बी टेम नई मिलो। काए, का कै दई बाबा रामदेव ने? बे तो अच्छे नोने से दिखात आएं। बे तो योग सोई सिखात है न?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ! बे बाबा योगवारे आएं औ बिजनेसमैन सोई आएं। उनको योग सिखाबे को अकेलो काम नोईं, आप जानत्तो आओ, के उनकी फैक्टरी में खात-पीयत की चीजें, दवाएं-मवाएं सबई कछू बनत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों याद दिलाई।
‘‘हऔ-हऔ, तुम ठीक कै रईं। बाकी जे बताओ के भओ का आए? तुम उनके का कैबे के बारे में कै रईं? ऐसो का कै दओ उन्ने?’’ भैयाजी बोले।
‘‘अबे का भओ, के एक दिना बे महाराष्ट्र के ठाणे में एक सभा में बोल रए हते। ऊ मंच पे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री की घरवाली सोई हतीं। अब बाबा रामदेव को कोजाने का सूझी के बे बोल परे के-लुगाइयां साड़ी औ सूट में अच्छी लगत आएं। औ मोरे घांई कछू ने पहने सो औ अच्छी लगत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों बताओ।
‘‘हैं? जो का कै दई उन्ने?’’ भैयाजी सो सुन के भड़भड़ा गए। फेर सम्हलत भए बोले,‘‘सांची कै रईं? उन्ने ऐसी कही? मोए सुन के भरोसो सो नई हो रओ।’’
‘‘ठीक जेई कही उन्ने। मोरी ने मानो सो इन्टरनेट खोल के देख लेओ, जेई खबर ट्रेंड करत भई दिख जेहे।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, हमें ट्रेंड-मेंड नई देखने! तुम झूठी थोड़े कैहो। बाकी बात तो उन्ने ठीक नई कई। खूबई बवाल मचो हुइए।’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘औ का! कोनऊ बाॅलीवुड को हीरो-मीरो ने कई होती, तो मनो इत्तो बुरौ ने लगतो। अब बाबा हरें ऐसी बात कहें सो अच्छो कौन लगत आए। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने तो तुरतईं एक ट्वीट करो के- महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री जी की पत्नी के सामने स्वामी रामदेव द्वारा महिलाओं पर की गई टिप्पणी अमर्यादित और निंदनीय है। इस बयान से सभी महिलाएं आहत हुई हैं। बाबा रामदेव जी को इस बयान पर देश से माफी मांगनी चाहिए।’’
‘‘फेर?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘फेर का? बाबा रामदेव जी खों माफी मांगनी परी। बाकी उन्ने जे सोई कै दई के उनकी बात खों गलत ढंग से रखो गओ आए। उनकी मंशा लुगाइयन को अपमान करबे की नई रई। मनो, ईके बाद बी मामलो ठंडो नई परो आए। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग बाबाजी पे कार्रवाई की मांग कर रओ आए। अब देखो का होत है?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ अपने इते?’’ भैयाजी ने पूछई लओ। मोए जेई को डर हतो।
‘‘अपने इते, कछू नईं! बे ओरें सो कर रईं, जो करने आए।’’ मैंने भैयाजी खों टालत भई कही।
‘‘जेई सो सल्ल आए!’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे कछू सल्ल नईं!’’ मैंने भैयाजी खों टोंकी। उनको मुद्दा से भटकबे में देर नईं लगत। सो मैंने उने आगे की बात बताई के,‘‘बे बाबाजी इत्तई पे नईं ठैरे!’’
‘‘सो, औ का कै दई उन्ने?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘उन्ने आगे कही के- हम तो लोक-लज्जा के लिए (कपड़े) पहन लेते हैं, बच्चों को कौन कपड़े पहनाता था पहले, हम तो आठ-दस साल तक तो ऐसे ही नंगे घूमते रहते थे, ये तो अब जाकर के पांच-पांच लेयर कपड़ों की बच्चों पर आ गई है।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘हाय दैया! जे का कै दओ बाबा जी ने! ऐसो कहूं नईं होत। आठ-दस बरस के मोड़ा नंगू नईं फिरत आएं।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे भैयाजी, मनो बालकन के लाने कई सो, कई। पर लुगाइयन के लाने काय कई? मोय सो जे समझ में नईं आत के जो हम ओरें कछू जींस-वींस पैन लेवैं, सो सल्ल औ धुतिया पैनें सो सल्ल। ऊपे जे बाबाजी कछू ने पैहनत की बात करके, एक ठइयां औ सल्ल बिंधा रए। अभईं हम लुगाइयां उनकी घांई ‘कछू नईं’ टाईप को जो पैहन लैबंे सो, आधे से सो आड़े डरे दिखाहें। सब ओरें हम लुगाइयन के ओढ़बे-पैहनबे के पांछू काए परे रैत आएं? अरे, हुन्ना-लत्ताई देखत रैहो के कभऊं जे सोई देख लओ करो के हम ओरें कित्तो काम करत आएं।’’ मोए कैत-कैत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘सांची कै रईं बिन्ना! हमाए सोई जेई विचार आएं, के मोड़ियन की औ लुगाइयन की काबीलियत देखो जाओ चाइए। अब वो सब छोड़ दओ जाओ चाइए के ब्याओ के लाने गोरी मोड़ी चाउने। अरे, गोरी हो के काली हो, मोड़ी सोई इंसान होत आए। जब करिया मोड़ा को ब्याओ में कोनऊं बिधौना नई रैत सो सांवरी मोड़ी में काए की दिक्कत कहानी? जे ई लाने सो मोड़ियन खों खूब पढ़ाओ जाओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ठीक कै रए आप भैयाजी! मोड़ी अपने पांवन पे ठाढ़ी रै, सो ऊको खुद पे भरोसो सो रैत आए। जेई लाने तो सरकार सोई बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कैत रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का बिन्ना! बाकी जे ईजूल-फिजूल की बातन को सो विरोध करो जाओ चाइए। सो, हमाए लाने कछू करबे को होय सो बताइयो हमें। हम हरदम तुम ओरन के संगे ठाड़े मिलहें, रामधई!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! कछू जरूरत परहे, सो जरूर बताबी। बाकी बाबाजी ने माफी सो मांग लई आए। मनो तनक ढंग से मांग लई होती सो मामलो सुलट जातो।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ बिन्ना! अब हम जा के तुमाई भौजी खों जे सबई बता रए! उने सोई पता परे के लुगाइयन के लाने का कैसो कओ जा रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उने पतो हुइए!’’ मैंने कही। मगर जबलों भैयाजी बढ़ लिए।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रई बात बाबाजी की, सो उनकी बात मोय सोई नई पोसाई। उनको ऐसो नई बोलो चाइए। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(01.12.2022)
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Thursday, November 24, 2022
बतकाव बिन्ना की | अपने किसान भैया भौतई जिगरा वारे आएं | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Thursday, November 17, 2022
बतकाव बिन्ना की | मोए सोई काल से करेला नई खाने | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
"मोए सोई काल से करेला नई खाने" मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
मोए सोई काल से करेला नई खाने
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘बिन्ना, तुमने कछु छोड़ो के नईं?’’ भैयाजी ने आतई साथ मोसे पूछी।
‘‘मोए का छोड़ने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कछु बी! मने जो तुम चाओ! चाय तो कटहल छोड़ सकत हो, ने तो नाॅनवेज छोड़ सकत हो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जो का कै रै भैयाजी? तबीयत सो ठीक आए न तुमाई? कोनऊ दिमागी बुखार सो नई हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे मोए कछु नई भओ! मोरी तबीयत सोई चंगी आए। बाकी तुम बताओ के तुम का छोड़ रईं?’’ भैयाजी ने फेर पूछी।
‘‘अब जो आप गिना रए हो, सो जानतई हो के मैं ठैरी पक्की वेजेटेरियन मने शुद्ध शाकाहारी। मैंने कभऊं नानवेज को हाथ लो नई लगाओ औ आप छोड़बे की कै रै? बाकी कटहल सोई जेई से मोसे खाओ नई जात, के बो सोई बनबे के बाद नानवेज घाईं दिखात आए। औ आप कै रै के कटहल छोड़ दो, नानवेज छोड़ दो। अरे, जोन को कभऊं छियो लो नईं, उनखों छोड़बे की का बात भई?’’ मोए कछु समझ में नई आ रई हती के भैयाजी मनो कैबो का चा रै आएं।
‘‘बात जे आए बिन्ना के आज एक सभा हती, जीमें सब ओरन से कसम ख्वाई गई के सब जने अपने मन से कछु एक चीज छोड़ देबें। सो हमने सोई कसम खा लई के काल से हम करेला ने खेबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे का बात भई? आप सो ऊंसई करेला नईं खात हो। सो करेला छोड़बे की काए कही?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ऐसोई करो जात आए बिन्ना! जब कोनऊं ई टाईप की कसम ख्वाए, सो बो चीज छोड़बे की कसम खा लई जानी चाइए जो तुमे पैलई से नईं पोसात! ईसे का होत आए के छोड़बे वाली कसम सध जात आए। कभऊं टूटत नइयां।’’ भैयाजी सयापन से बोले।
‘‘खूब कही भैयाजी आपने! मनो अपन ओरन खों दारू ने पीने की कसम सोई खा लेनी चाइए। काए से के अपन ओरें दारू-मारू खों छीयत बी नइयां।’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘हऔ! जे तुमने ठीक कही। अबकी अगली सभा में मोए दारू छोड़बे की कसम खा लेने है, देख लइयो!’’ भैयाजी उचकत भए बोले।
‘‘मैं सो ठिठोली कर रई हती औ आपने सो ठानई लई।’’ मैंने खों टोकों।
‘‘ईमें ठिठोली की का बात? अब तुम्हई बताओ बिन्ना के शराबबंदी पे उन ओरन से कसमें ख्वाई जाती आएं जिनको शराब से कोनऊ लेबो-देबो नइयां। अब हम तुमें का बताए! बे जो उते तिगड्डा के लिंगे बजरंगबली की मढ़िया आए न, उतई बे तिवारन बहनजी रैत आएं। बे प्रायमरी स्कूल में पढ़ाती आएं। बे एक दिना बता रई हती के उनके स्कूल में सबई से कसमें ख्वाई गईं के कोनऊं शराब खों हाथ नई लगाहे। ने तो पीहे औ ने पियन देहे। अब तुमई सोचो बिन्ना के बे तिवारन बहनजी ने कभऊं सपरे-खोंरे बिगर पानी लो ने पियो हुइए औ उनको कसम खानी परी के बे कभऊं दारू खों हाथ ने लगेहें। मने हम जो कैबो चा रै के जे टाईप की कसमें ऐसई चलत आएं। अब का हुइए के तिवारन बहनजी खों कभऊं दारू छीने नईयां औ ने तो उनके तिवारी जी कभऊं छीहें। कहबे को कहो जेहे के जित्ते लुगवा-लुगाइयन खों कसमें ख्वाई गईं, उनमें से दो जने ने कसम खाबे के बाद दारू के तरफी कभऊं देखो लो नईं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप सही कै रै भैयाजी! आंकड़े बढ़ो चाइए, काम बढ़े चाए नई बढ़े। ने तो दारू के ठेका के दुआरे ठाड़े हो के दारू पियन वारों से कसमें ख्वाई जानी चाइए के बे दारू छोड़ दें। मनो अब कोनऊं पढ़ो लिखो सभ्य सो आए। ऊने कभऊं कोनऊं खों मां-बैन की गाली लो नई दई, मने ऊको ऐसी गालियां आती लो नइयां, और ऐसे लोगन से कसमें ख्वा लई जाएं के बे कभऊं मां-बैन की गाली ने देहें, सो ईसे का होने। अरे, कसमें सो उनसे उठवाओ जाओ चाइए जो मां-बैन की गालियों के बिगर एक लाईन नईं बोलत आएं। है के नईं भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, मनो जे संकल्प-मंकल्प में सोई जेई होत आए। अपने जो जे सयाने हरें रैत आएं बे बोई चाज छोड़बे के लाने संकल्प ले लेत आएं जोन उने अच्छी नई लगत। ईसे का होत आए के घरे बा खाबे के लाने उनपे कोनऊं जोर नईं डाल सकत आए। जैसे हमें करेला नईं पोसात, पर तुमाई भौजी जब देखो तब हमाए पांछू परी रैत आएं के करेला खाओ चाइए। जे भौत फायदेमंद रैत आए, बगैरा-बगैरा। अरे, मोए नई पोसात सो नईं पोसात। अब का हुइए के हमने तुमाई भौजी को बता दओ आए के हमने करेला नई खाबे की कसम खा लई आए। सो, अब बे हमें करेला ख्वाने के लाने हमाओ मगज ने खाहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप सोई चतुर कहाने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का? जब जे नेता हरें चतुराई दिखा सकत आएं सो हम, तुम काए नई दिखा सकत?’’ भैयाजी बोले।
‘‘और का!’’ मैंने कही।
‘‘जेई लाने सो हम तुमसे कै रै के अगली बेरा जब सभा हुइए सो हमाए संगे चलियो औ अच्छे मंच पे ठाड़े हो के माईक के ऊपरे से संकल्प ले लइयो के काल से हम ने तो नानवेज खाबी औ न कटहल खाबी! औ कोनऊं चीज जो ने पोसाए बो छोड़ सकत हो।’’ भैयाजी खुस होते भए बोले।
‘‘कैने को सो कै दूं, बाकी मोसे जे चीटिंग ने हुइए!’’ मैंने भैयाजी से कही। फेर मैंने उन्हें बताई के ‘‘मोरी तो जेई से एक संगवारी से बिगाड़ होत-होत बची। बे बोली के तुम कसम खाओ के कभऊं मां-बैन की गाली ने देहो! मैंने उनसे कही के मैंने सपने लो में कभऊं ऐसी गाली नई दई, सो काए के लाने कसम खाऊं! आप सो उन ओरन को कसमें ख्वाओ जो जे टाईप की गालियां बकत आएं। उनको मोरी बात सुन के बुरौ लग गओ! औ बे कैन लगीं के जे मतलब के तुम गाली देबे को समर्थन करत हो। उनकी बात सुन के सो मोरा मुंडा घूम गओ! मनो मैंने जे न कही के मैं कभऊं कतल ने करबी, सो का ईको मतलब हो गओ के मैं कतल को समर्थन करती होऊं!’’
‘‘अरे, जे सब सो चलत रैत आए! ऐसे टेम पे सो तुमे सोई उनकी मन की कर देओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनके आकड़े बढ़ाबे के लाने मैं झूठ कै देओ? मोसे नईं हो सकत। मनो आप जो कछू छोड़बे की कै रए सो मैं सोच के बताबी की मोए का छोड़ने आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ज्यादा ने सोचो, तुमें जो कटहल या नानवेज की नई कैने, सो अंडा ने खाबे की कसम खा लइयो!’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘सो, ईसे सो औ अच्छो आए के दारू छोड़बे की कसम खा लई जाए जोन को कभऊं ने हाथ लआगो आए औ ने कभऊं लगाने है।’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जेई सो हम सोच रए। चलो, हम पता लगाबी के दारू छोड़बे की कसमों वारी सभा कबे औ कां हो रई। अपन दोई चलबी। बढ़िया कसमें खाबी औ अपनी फोटू-वोटू खेंच के अपने सोशल मीडिया पे डार देबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपको सो कछु नईं, बाकी मोरे लाने कहूं लोग जे न समझ परें के जे दारू आएं औ जेई लाने अब छोड़बे की कसम खा रईं। रैन देओ, ईसे अच्छो आए के मैं सोई करेला-मरेला टाईप को कछू छोड़ देओं, जो मोय कम पोसात आए।’’ मैंने भैयाजी कही।
‘‘हऔ, एक-दो दिना में सोच लइयो! बाकी नशाबंदी की कसम खैहो सो बो नेता हरन के समर्थन में कही जेहे। आजकाल जेई को सीजन चल रओ।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘रैन देओ भैयाजी! मोए कच्ची में ने बिधाओ! मैंने सोच लई के मोए सोई काल से करेला नई खाने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रही जे जे कसम-बसम की सो ईमें कछू नई धरो! जो कछू करने होय, सो उते करो जाओ चाइए जिते जरूरत आए! मने शराब के अहाता के लिंगे जा के कसमें उठवाओ औ पूरी कराओ सो कछू बात होय। है के नई? तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(17.11.2022)
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Friday, November 11, 2022
बतकाव बिन्ना की | आज को समै डरबे को नईं, लड़बे को आए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
"आज को समै डरबे को नईं, लड़बे को आए" मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
आज को समै डरबे को नईं, लड़बे को आए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘काए बिन्ना, जे अपने इते का हो रओ?’’ भैयाजी चाय सुड़कत भए मोसे पूछन लगे।
‘‘का हो रओ भैयाजी! कौन के बारे में कै रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, जेई! अपने बुंदेलखंड में इत्ती मारा-मारी पैले नई रई, जित्ती अब होन लगी। जाने कोन की छायरी पर गई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मोए कछु समझ में ने आ रई के आप कैबो का चा रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे जेई सब! अभईं ऊ दिनां एक वीडियो वायरल भओ रओ जीमें एक मोड़ा खों दो-तीन लुगाइयां ई लाने चप्पलन से पीट रई हतीं के ऊने उनकी घर की मोड़ी भगा लई रई। अब तुमई बताओ बिन्ना के बा मोड़ा का ऊ मोड़ी खों अपनी कैंया पे ले के भागो रओ के अपनी पीठ पे लाद के? अरे, बा मोड़ी सोई ऊके संगे निंगत-निंगत भगी हुइए।’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘आज-काल निंगत-निंगत को भगत आए भैयाजी? जोन खों भागने रैत आए बो कहूं ने कहूं से एकाध फटफटिया को जुगाड़ करई लेत आए। ऐसई टेम पे तो जे मोड़ा हरन के दोस्त उनके काम आउत आएं।’’ मोए कैने कछू हती औ मैं कै कछू और बैठी।
‘‘हऔ तो, मनो बा मोड़ी निंग के ने गई हुइए सो फटफटिया पे बा मोड़ा के पांछू बैठ के भगी हुइए। कैबो को मतलब जे के भगे दोई संग-साथ औ पिटो अकेलो मोड़ा।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे न कओ भैयाजी, बा मोड़ी की घरे धुनाई भई हुइए। ऊके घरे झांकबे को गओ? बाकी होत जेई आए के एक तरफा मोड़ा को बहला-फुसला के भगा ले जाने वारो कहो जात आए औ दूसरी तरफी मोड़ी खों भागबे के कारण घरे-भीतरे कुटने परत आए। बाकी आप काए जे सब सोच रए? जे भागा-भागी कोनऊं पैली बार सो हुई नइयां।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, अब तुम कैहो के हमने सोई तुमाई भौजी से लवमैरीज करी रई, मनो ऐसे भगा के नई लाए रए उनकों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, मैं जे नईं कै रई! आप गलत समझ रए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘चलो ठीक, मनो हम ओरन की उम्मर बी नोहरी नई रई। दोई बालिग रए।’’ भैयाजी सफाई देत से बोले।
‘‘आप ठीक कै रए भैयाजी, पर जे लोहरी उम्मर ऐसी रैत आए के ऊमें गलत-सही कोन समझ परत आए?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हौ, बाकी मोए फिकर भागबे-भगाबे वारन की नईं बल्कि जे सड़क पे ऐसे कूटत-पीटत की वीडियो बनाबे वरन की आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनकी काए की फिकर? उनको को का करहे।’’ मैंने कही।
‘‘उनको सो कोई कछु न करहे, मनो ई तरहा को रोग कोनऊ और खों ने लग जाए। जे मार-कुटव्वल को वीडियो बनाबो औ ऊको वायरल करबो ठीक नइयां। ईसे गलत लोगन खों गलत तरीका सूझन लगत आएं। अबे लों अपने इते ई टाईप के वीडियो नई बनाए जात्ते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, ठीक कै रए आप! अपने इते सो अच्छे-नोने हंसी मजाक के वीडियो बनत आएं और लोकनृत्य के वीडियो बनत आएं। जे टाईप के वीडियो की सो इन ओरन खों इंटरनेट देख के सूझी हुइए। ’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का? बाकी मोए एक फिकर और हो रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कैसी फिकर?’’ मैंने पूछी।
‘‘जेई के अपने इते सोई आॅनर किलिंग होन लगी। अरे, मोड़ा-मोड़ी भगत तो पैले बी हते। मनो, जब बे ओरें पकरे जात्ते सो दो लपड़ा मार के उनकी अकल ठिकाने लगा दई जात्ती। ऐसो जान से थोड़े मारो जात्तो!’’ भैयाजी ने कही।
‘‘हऔ, जे सो आपने ठीक कई। मोरे संगे काॅलेज में एक मोड़ी पढ़त्ती, बा एक मोड़ा के संगे भाग गई हती। दोई के परिवारवालन ने खूबई ढूंढ-खोज करी। अखीर में बे ओरे जबलपुर में पकरे गए। दोई पकर के अपने-अपने घरे ले जाए गए औ दोई की अच्छी धुनाई भई। बाकी मोड़ी को घर से निकरबो बंद करा दओ गओ। औ बा मोड़ा खों सोई वार्निंग दे दई गई के जो कहूं मोड़ी के घर के लिंगे दिखे, सो टागें तोड़ दई जेहें।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘हमें जे समझ में नई आई, के जब उन ओरन खों भागने रओ सो कहूं दूर भागते। जे का, के इते से भगे औ जबलपुर में जा ठैरे। अरे, उते तो मुतके मिलते चींन्हे वारे। खैर, हो सकत आए के उनके पास दूर भागबे जोग पइसा ने रओ होय।’’ भैयाजी बोले। फेर कैन लगे,‘‘मगर बिन्ना, हमें जे नईं बूझ परत के जो मोड़ा-मोड़ी की चिल्लम-चिल्ली में सबरे घरवारे अकबर बादशाय काए बन जात आएं - के सलीम कछू कर लेओ पर हम तुमें अनारकली से ब्याओ न करन देहें।’’
भैयाजी ने बोली गंभीरता से, पर मोरी हंसी फूट परी। जे देख के भैयाजी सोई हंस परे।
‘‘सो, आप जेई लाने इत्ते फिकर में डूबे हते के मोड़ा-मोड़ी खों आज लों अकबर बादशाय से जूझने परत आए?’’ मैंने हंस के भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ, जे सो आए, बाकी मोरी चिन्ता जे बात की बी आए के अपने बुंदेलखंड में किसम-किसम के अपराध बढ़त जा रए। कहूं कोऊ कोनऊं के गरे से चेन खींच रओ, सो कहूं कोनऊं की हत्या कर रओ, कहूं कोनऊं होटल-मोटल से गलत काम करने वारी मोड़ियां पकरी जा रईं। ऊपे बे मोड़ियां सोई बांगलादेस और नेपाल से लाई गई भईं। जे कोनऊं मामूली बात नोईं। जब बे ओरे उते की मोड़ियां इते ला सकत आएं सो, इते की मोड़ियां उते ले सकत आएं। है के नईं? तुमई बोलो, का हम गलत कै रए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप सही कै रै भैयाजी! जे सो फिकर वारी बात आए। औ कई बेरा सो इतई की पढ़बे-लिखबे वारी मोड़ियां पकरी गईं। जे सोई चिंता वारी बात आए। मताई-बाप को तनक ध्यान सो रखो चाइए। के छोटी जांगा से बिटियां शहर पढ़बे पौंची तो, मनोे बे कौन सी पढ़ाई पढ़ रईं?’’ मैंने भैयाजी कही।
‘‘जे जो टीवी, इंटरनेट को तड़क-भड़क आए न, जेई ने माहौल बिगार रखो आए। पैले एक-दो ठइयां टाॅकीज रैत्तीं। ऊमें मईना-मईना लो एक फिलम चलत्ती। सो फैशन बी रोज-रोज नई बदलत्तो। अब सो, आज के एपीसोड में उन्ने जे टाईप के जूता पैने और जे टाईप के हुन्ना-लत्ता पैने औ काल दूसरे एपीसोड में दूसरई टाईप के जूता, हुन्ना-लत्ता। सबई कछू नओ-नओ। सो उने देख-देख के रोज नओ स्टाईल को सबई कछू चाउने। बाजार वारे सो टीवी सीरियल के जरिए अपनी दूकानदारी कर लेत आएं, मनो जिनको जे सबई कछू चाउने औ खींसा मे पइसा ंनइयां, सो गलत काम करहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! मनो अब करो का जा सकत आए? समै सो बदलबे को नाम आए। पैलऊं मोड़ा हरें रेडियो पे गाना सुन-सुन के मोड़ियन को छेड़त्ते। मनो चिंता की बात जे आए के अब मामलो कछू ज्यादई गंभीर दिखात आए। अब बदमास मोड़ा हरें अपने मोबाईल पे चोरी-चुपके मोड़ियन की उल्टी-सूदी फोटू-वीडियो खींच के वायरल करन की धमकी दे के मोड़ियन खों डरात रैत आएं।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ बिन्ना! जे सोई बड़ी ओछी बात आए। ऐसो नई करो जाओ चाइए। औ जो कोनऊं ऐसो करे ऊको मों करिया कर के जूतन की माला पिन्हा के जूलूस निकारो जाओ चाइए।’’ भैयाजी तिनकत भए बोले।
‘‘जेई लाने भैयाजी, आज को समै डरबे को नईं बल्कि गलत से लड़बे को आए, जे बात मोड़ियन खों याद रखो चाइए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ बिन्ना! कछू होय हम सो एक बात जानत आएं के अपने बुंदेलखंड में चाए जैसो विकास होय पर अपराध बढ़ो नई चाइए।’’ कैत भए भैयाजी ने अपनी दूकान बढ़ा लई।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। मनो जे सो सबई चात आएं के इते को विकास होय, चाए ने होय, मनो जे किसम-किसम के अपराध नई बढ़ो जाओ चाइए। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(10.11.2022)
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #बुंदेलखंड #बिन्ना #भैयाजी #बतकाव #BatkavBinnaKi #DrMissSharadSingh #Bundeli
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Saturday, November 5, 2022
बतकाव बिन्ना की | ने पूछो के अपने इते विकास कबे हुइए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Thursday, October 27, 2022
बतकाव बिन्ना की | पुरखन ने जी जराओ औ इन्ने दिल जीत लए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Friday, October 21, 2022
बतकाव बिन्ना की | चलो चले गुंइयां कातिक नहाबे | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात
Tuesday, September 7, 2021
बुंदेली व्यंग्य | पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन | डॉ शरद सिंह | पत्रिका में प्रकाशित
Thursday, August 26, 2021
बुंदेली व्यंग्य | पैले बनीं, के पैले खुदीं | डॉ शरद सिंह | पत्रिका में प्रकाशित
Friday, July 23, 2021
बुंदेली व्यंग्य | जै हो पेगासस भैया की | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
ब्लॉग साथियों, आज 23.07.2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "जै हो पेगासस भैया की " प्रकाशित हुआ है... आप भी पढ़ें...आंनद लें....
#Thank you #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य
जै हो पेगासस भैया की
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
नोने भैया मूंड़ औंधाए भये बैठे हते अपने दुआरे पे। भौजी ने कही हती के जा के भटा-मटा ले आओ, सो तुमाये लाने भर्त बना देवें।
‘‘हऔ, लाए देत हैं। पैले अच्छी-सी चाय-माय तो पिला देओ। जब देखों बस काम ई की कैत रैत हो। कछु तो सरम कर लौ करे।’’ नोने भैया ने भौजी से कही।
‘‘जे देखो, कछु करत न धरत के औ बोल ऐसे रै के मनो घर-बाहरै को सबई काम जे ई तो करत होंए। हुंह! चाय पी के भटा ले अइयो, ने तो आज सब्जी न मिलहे खाबे खों।’’ भौजी ने सोई ठोंक के सुना दई।
‘‘हऔ तो, चलो चाय तो देओ, मंत्री हरन की घोषणा घंई बोल के न रै जाओ।’’ नोने भैया ने कहीं और ताज़ो अख़बार ले के बैठ गए। पैलई ख़बर पढ़ के उनको मत्था घूम गओ। ख़बर हती पेगासस फोन हैकिंग की।
जो का, जे पेगासस लिस्ट में सोई सबरे बड़े-बड़े नाम दए हैं। ग़रीब की तो कोई पूछ-परख करत ई नईयां। ग़रीबन के इते ने तो कभऊं कोई छापा-वापा पड़त आए, ने तो कोनऊ मंत्री-मिनिस्टर आउत है औ अब जे देखो, पेगासस से भी बड़े लोगन की जासूसी कराई जा रई। अरे, कभऊं कोनऊ गरीबन की बातें सुन लओ करे। छोटो-मोटो सस्तो सो एंडरायड फोन तो गरीबन के एऐंडर सोई पाओ जात आए। मनो उनको तो कोनऊं स्टेटस ई नइयां। नोने भैया चाय सुड़कत भए सोसत रये। चाय ख़तम भई सो कप-बसी उतई छोड़ के बाहरे दुआरे पे पसर गए।
दरअसल, नोने भैया ने भौजी को ‘हऔ’ तो कै दई बाकी बे भटा-मटा लेबे कहूं गए नईं। अखबार पढ़ के उनको मन उदास हो गओ। मोए का पतो रहो के नोने भैया उदासे डरे हैं। नोने भैया के दुआरे से निकलत भए मैंने उनसे राम-राम कर लई। बे तो मनो कोनऊं से बतकाव करन चाह रए हते।
‘‘काए भैया सब ठीक आए।’’ मैंने नोने भैया से का पूछी, मनो भिड़ के छत्ते में अपनों हाथ दे दओ।
‘‘बिन्ना हमाए इते छापो पड़वा देओ।’’ नोने भैया मोए चौंकात भए बोले।
‘‘का? का कै रए?’’ मोए कछु समझ में न आओ।
‘‘अरे बिन्ना, ई दुनिया में हमाई तो कोनऊं पूछ-परख है नईं। मनो हमाए इते बी छापो-वापो पड़ जातो तो बिरादरी में तनक इज्जत बढ़ जाती।’’ नोने भैया बोले।
‘‘जो का कै रए, भैया? सुभ-सुभ बोलो!’’
‘‘अरे बिन्ना, हम सुभ-सुभ ई बोल रए। तुम देखत नईयां का, के जोने के इते छापो पड़ जात है, उनकी इज्जत बढ़ जात है। सबई समझ जात आएं के जे खतो-पीतो पिरानी आए। एक हम आएं ठट्ठ, कोनऊं पूछ-बकत नईं।’’ नोने भैया कलपत भए बोले।
‘‘जो का उल्टो-सूधो बक रए हो भैया! ऐसो कहूं नईं होत।’’ मैंने विरोध करी।
‘‘चलो, छापो-वापो को छोड़ो, हमाई आज की पीड़ा सुनो।’’ नोने भैया ने कही।
‘‘हऔ, बोलो!’’
‘‘बोलने का आए, जे देखो हमाए पास सोई एंडरायड मोबाईल फोन आए, पर हमाई बात कोई ने न सुनी।’’ नोने भैया ने दूसरो सुर पकड़ लओ।
‘‘एंडरायड फोन से का होत है, तुम सोई कभऊं कोनऊं खों फोव-वोन कर लओ करे। तुम ने लगेओ सो, दूसरो ई कहां तक तुमाए लाने घंटी मारत रैहे?’’ मैंने नोने भैया को समझाई।
‘‘अरे, हम तो दो-तीन दिना से खटोले कक्का से रोजई बतकाव कर रै आएं पर जे देखो नासपिटे पेगासस की, हमाई ने तो कोनऊं न बात सुनी, ने तो फोन हैक करो और तो और हमाओ डाटा तक ने चुराओ, नासपिटे ने।’’ नोने भैया मों लटकात भए बोले।
‘‘उदास न हो भैया! बड़े-बड़े लोगन को फोन हैक करो जात है। हमाए-तुमाए फोन में का रखो? अपन ओरन के पास बेई घिसी-पिटी बातें रैत आएं कि आज डीजल मैंहगो हो गओ तो कल पेट्रोल के दाम बढ़ गए। आज टमाटर पचास रुपए किलो बिको तो गिल्की साठ रुपए किलो। हमाई इन बातन से कोनऊं को कोऊ मतलब नईयां।’’ मैंने नोने भैया को समझाई।
‘‘बात तो सही कै रईं बिन्ना, बाकी मैंहगाई के बारे में कोऊ काए नहीं बात करत है। अपन ओरन के कष्टन की कोनऊं को फिकर नईयां।’’ नोने भैया दुखी होत भए बोले।
‘‘मैंहगाई-फहंगाई में कछु नई रखो, पेगासस में तुमें अपना नाम जुड़वाने है तो मंत्री-मिनिस्टर से सांठ-गांठ करो। उनसे ऐसे बतियाओ के मनो कोई भेद की बात कर रए। तुमाओ रसूख जम जाए, तब कहीं काम बनेगा।
‘‘अरे, का बिन्ना! तुमने का हमें बाबाजी को ठुल्लू समझ रखो है? हमने बताई न कि हम दो-तीन दिना से खटोले कक्का से राजनीति पे बहसें कर रैं हैं, पर बात नईं बनी। खटोले कक्का राजनीति से संन्यास ले चुके हैं, बाकी, बे ठैरे मंत्री जी के चच्चा, सो हमने बोल-चाल के लाने उनई को पकड़ रखो है। काए से के मंत्री जी सो हमने बोलहें न।’’ नोने भैया ने अपनी चतुराई बघारी।
‘‘गम्म न करो भैया, कोन जाने अगली लिस्ट में तुमाओ नाम सोई दिखा जाए।’’ मोए उनको झूठी तसल्ली देनी पड़ी।
‘‘नासपिटे जे पेगासस को, इसे जो न बनो के ऊपरे के बजाए तरे से लिस्ट बनाए। जोन को देखो ऊपरई वालन खों देखत आए। नाम ऊपर वारे कमाएं औ मैंहगाई के मोटे-मोटे दाम हम चुकाएं। अभ्भई हमने भी सोच लई कि हमें व्हाट्सएप्प अनवरसिटी में भर्ती हो जाने है, कछु उल्टो-सूधो लिखबो सीख जाएं तो कहो काम बन जाए।’’ नोने भैया ने अपनी परेसानी को खुदई हल निकार लओ।
‘‘भली सोची भैया! सो, अब तुम लग जाओ पोस्ट-मोस्ट में औ हमें जान देओ।’’ मैंने नोने भैया से कही औ चलबे को हुई कि नोने भैया बोल उठे,‘‘देख लइयो, नासपिटे पेगासस की अगली लिस्ट में हमाओ नाम सोई हुइए। औ हम सोई कछु बड़े कहान लगहें।’’
‘‘हऔ भैया, मोरी दुआ तुमाए संगे है।’’ मैंने कही औ वहां से दौड़ लगा दई।
बाकी नोने भैया खों बड़ी आसा है पेगासस से कि उनको फोन कोई हैक कर के उनको रसूख दिला देगा। जै हो सेंधमार पेगासस भैया की!
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