Tuesday, September 7, 2021

बुंदेली व्यंग्य | पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन | डॉ शरद सिंह | पत्रिका में प्रकाशित

आज 07 सितंबर 2021 को #पत्रिका समाचार पत्र में मेरा बुंदेली व्यंग्य "पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन" प्रकाशित हुआ ..आप भी पढ़ें..आंनद लें..😄
#ThankYou #Patrika
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बुंदेली व्यंग्य
पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       "काए नोने भैया, किते जा रहे हैं?" सामने नोने भैया खों देख के मोसे पूंछे बिना न रहो गओ। काए से के नोने भैया की सुबो तो ग्यारा-बारा बजे होत है औ आज बे मोए सुबो साढ़े छह बजे जात लो दिखाने।
"अरे कहूं नई, इतई लो।" नोने भैया टालत भए बोले।
"इतई कितई? औ जे मूंड़ पे गमछा बांध रखो है, टुकनिया सोई लिए हो...का माटी खोदबे के लाने जा रए? मनो, अबे छबाई-लिपाई खों टेम सो आओ नइयां औ तुमने कुदाली भी नई रखी है...सांची-सांची बताओ के कहां जा रए?" मैंने सोई पीछा ने छोड़ी।
"अरे कहूं नईं, इतई हारे लों जा रए!" नोने भैया खों बतानई पड़ी।
"हारे? काए के लाने हारे जा रए? अबई सो बेर-मकोय खों सीजन नइयां, फेर तुम काए के लाने जा रए भुनसारे से?" मैंने पूछी।
"अरे, तुमाई भौजी सो ठेन कर रई कल्ल रातई से।""
"काए के लाने ठेन कर रईं?"
"अरे, बा ने जब से सुनी है के रसोई गैस के दाम पच्चीस रुपइया बढ़ गए, तभई से घरे रार मची है।" नोने भैया ने बताई।
"भौजी खों कौन ने बताई?" मैंने पूछी।
"हमई ने बताई, और कौन बताता? कल्ल रात हमने तुमाई भौजी से कह दई के गैस को उपयोग तनक सम्हर-सम्हर के करियो, काए से के गैस के दाम पच्चीस रुपए बढ़ गए हैं। हमने इत्ती कही के तुमाई भौजी सो बमक गईं। कहन लगीं के और कित्तो सम्हारें, जित्तो खाना बनने है, उत्तो तो बनहे ई। कहो तो खाना बनाना छोड़ दें । सो, हमने उनखों समझाई के परमेसरी, हमाओ मतलब जो न हतो। हमने तो खबर पढ़ी, सो तुमे सुना दई। ईपे बे बोलीं, सुनो अब इत्ती मैंहगी गैस में तो हमसे खाना ने पकाओ जेहे। सो, हमने पूछी के काए हम ओरन खों भूको मारबे को बिचार बना रईं का? सो, बे बोलीं, काए भूको मारहें हमाई तुम ओरन से कौनऊ दुस्मनी है का? अरे , हम तो जे कह रै के कल्ल भुनसारे उठ जइयो और हारे से चूल्हा में जलाबे जोग लकड़ियां ले आइयो।" नोने भैया ने बताई।
"मगर हारे में बे जंगल विभाग वारों ने लकड़ियां कान ने दईं, सो का कर हो?" मैंने पूछी।
 "हऔ, सो जेई तो हमने तुमाई भंजी से कही, परमेसरी बे जंगल विभाग वारे लकड़ियां ने काटन देहें। सो, बे बोलीं के हमने कब कही के तुमें लकड़ियां काट के लानी है? उते से बीन के लाइयो और एक टुकनियां संगे ले जइयो ताकि उते गोबर के कंडा-मंडा मिलें सो संगे बीन लाइयो। अब बिन्ना, हमें तुमाई भौजी खों हुकुम सो बजानेई है।" नोने भैया गहरी सांस लेत भए बोले।
"भैया, गलत नई कही भौजी ने। अब जेई तो करने पड़हे। गैस के दाम हर महीना पच्चीस-पच्चीस रुपइया बढ़हें, सो सबई जनन खों हारे जाने पड़हे। बाकी तुम तो जे सोचो भैया के हारे में तुमें सुद्ध हवा मिलहे। जोन से तुमाई सेहत अच्छी रैहे। तुम तो इको पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन मानो, रामधई!" मैंने नोने भैया खों समझाओ।
"हौ बिन्ना, सो संगे चलो तुम सोई।" नोने भैया हंसत भए बोले, "जे मंहगाई डायन जो न कराए सो कम है...।"
"गलत कै रए भैया, मंहगाई डायन नई, पच्चीस रुपइया मंहगे वारे अच्छे दिन!!!" मैंने नोने भैया खों याद दिलाओ और बे हंसत भए चल पड़े हारे लकड़ियां-कंडा बीनबे के लाने।
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