Tuesday, September 28, 2021

ममत्व में डूबी कोमल लोरियां और बाल कविताएं | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 28.09. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवयित्री पुष्पा चिले के काव्य संग्रह "परियों की पाती" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
ममत्व में डूबी कोमल लोरियां और बाल कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - परियों की पाती
कवयित्री      - पुष्पा चिले
प्रकाशक      - संदर्भ प्रकाशन, जे-154, हर्षवर्द्धन नगर, भोपाल (म.प्र.)
मूल्य         - 200/-
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जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै, दुलरावै, जोइ-जोइ कछु गावै।।
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै।। 

कवि सूरदास की ये पंक्तियां लोरी काव्य का एक अद्वितीय उदाहरण हैं जिनमें कवि कहते हैं कि यशोदा मैया पालने में हरि को झुला रही हैं और साथ में कुछ-कुछ गाती भी जा रही हैं। वे गीत गाते हुए नींद को उलाहना दे रही हैं कि उनके लाल को नींद क्यों नहीं आ रही है? यह एक बहुत ही सुंदर ओर बहुत ही मधुर लोरी है। वस्तुतः लोरी और बाल काव्य दोनों ही बच्चों के लिए सृजित किए जाते हैं। निःसंदेह लोरी का उद्देश्य गीत गा कर बच्चे को सुलाने का होता है। जबकि समग्र बालगीत का उद्देश्य बच्चों को रोचक शब्दों में शिक्षा देना होता है। इस तरह देखा जाए तो दोनों ही तरह के काव्य के केन्द्र में बालमन होता है तथा ये कविताएं ममत्व से सराबोर होती हैं। कवयित्री पुष्पा चिले के काव्य संग्रह ‘‘परियों की पाती’’ में दोनों ही तरह का बाल काव्य मौज़ूद है। इसमें लोरियां भी हैं और बालगीत भी। पुष्पा चिले एक प्रतिभाशाली साहित्यकार हैं। उन्होंने कहानियां और उपन्यास लिखे हैं और बालगीत भी लिखे हैं। बालगीत और लोरियां लिखने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली इस संबंध में उन्होंने ‘‘आत्मकथ्य’’ में लिखा है कि भोपाल में उनकी भेंट ‘‘अपना बचपन’’ के संपादक महेश श्रीवास्तव से हुई और उनसे बालगीत लिखने की प्रेरणा उन्हें मिली। 
बाल साहित्य में कविताओं की बहुलता है। सूरदास जैसा महान कवि कृष्ण की बाल लीलाओं का जैसा जीवंत वर्णन करता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सूरदास की कविताओं में दसवें स्वतंत्र रस के रूप में वात्सल्य रस प्रकट होता है। सूर, तुलसी आदि मध्यकालीन कवि कृष्ण एवं राम के बाल स्वरूप और बाल क्रिया-कलापों का सौंदर्यात्मक रूप प्रस्तुत करते हैं। बाल-कविता के क्षेत्र में श्रीधर पाठक, विद्याभूषण विभु, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, सोहनलाल द्विवेदी आदि अनेक रचनाकारों की रचनाएं लोकप्रिय रही हैं। हरिवंश राय बच्चन, भवानीप्रसाद मिश्र, प्रभाकर माचवे जैसे कवियों ने भी बाल कविताएं लिखीं। 1947 से 1970 तक के समय को हिंदी बाल-कविता की ऊंचाइयों का समय या ‘‘गौरव युग’’ माना गया है।
‘बाल कविता’ यानी बच्चों के लिए लिखी गयी कविता, जिसमें बच्चों की शिक्षा, जिज्ञासा, संस्कार एवं मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर रचना की गई हो। वह चाहे मां की लोरियों के रूप में हो या बच्चों के आपस के खेल-खेल में हो। पुष्पा चिले ने भी लोरी लिखते समय बालमनोविज्ञान के साथ ही ममत्व का भी पूरा ध्यान रखा है। इसका एक उदाहरण देखिए ‘‘सपनों की बिंदिया’’ शीर्षक लोरी गीत से-
मेरी लाड़ो की अंखियों में आ जाना
निंदिया, सपनों की बिंदिया लगा जाना।
अभी सोई है राजदुलारी
भागती रहती है सुकुमारी
तुम उसकी थकान मिटा जाना
मेरी लाड़ो की अंखियों में आ जाना।

रोते हुए बच्चों को मनाना और चुप कराना आसान काम नहीं होता है। एक रोता हुआ बच्चा पूरी तरह से हट की अवस्था में होता है। वह अपनी बात मनवा कर ही चुप होता है। वहीं बच्चा अथवा बचची यदि शैशवास्था में हो और पालने में रो रही हो तो उसे चुप कराना और भी कठिन कार्य होता है। एक मां अथवा ममत्व से परिपूर्ण कोई व्यक्ति ही उसे अपने ममतामय शब्दों से उसे चुप करा सकता है। बेशक़ वे शब्द शिशु को समझ में नहीं आते हैं लेकिन उन शब्दों से ध्वनित ममतामय भाव उसमें शांति का संचार करते हैं। एक शिशु बालिका को रोने से चुप कराने के लिए जिन मधुर शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए, वे शब्द पुष्पा चिले की इन पंक्तियों में देखे जा सकते हैं-
काहे रोती लली, मेरी लाड़ली
नन्हीं कली, मेरी वारुणी।
देखो पलना में झूमर लगे हैं
तेरे रोने से वे भी डरे हैं
कैसे बज रहे लली
कैसे सज रहे लली
कैसे प्यार से तुझको निहारें कली
पर तू सुनती नहीं उनकी बात री
नन्हीं सी कली मेरी वारुणी।  

 आज बाज़ारवाद ने अपना प्रभाव इतना बढ़ा दिया है कि सपनों से भरा कोमल बचपन कहीं खोता जा रहा है। आज ‘‘प्ले स्टेशन’’ पर ‘‘वर्चुअल फाईट’’ जैसे वर्चुअल गेम्स बाल साहित्य से बच्चों को दूर करने तथा उनके मन में उग्रता भरने की ख़तरनाक भूमिका निभा रहे हैं। फिर भी साहित्यकारों ने निराशा को नहीं ओढ़ा है और बच्चों के लिए कोमल साहित्य रच रहे हैं। इसी क्रम में पुष्पा चिले की ‘‘परियों की पाती’’ को भी गिना जा सकता है। वे बालमन को कल्पनालोक में ले जाने को तत्पर हैं-
बंदर मामा ब्याह रचाएं
आए बाराती सज के
दूल्हा की टोपी लहराए
अचकन दम-दम दमके
दुल्हन का जोड़ा ले आई
दर्जिन चिड़िया सिल के
बाज रहे हैं ढोल,नगारे
और बजे मिरदंग
सारे बाराती नाचे-गाएं
और करें हुड़दंग। 

बालिकाओं का गुड़ियों से प्रेम सर्वविदित है। जिस तरह उनकी मां उन्हें संवारती हैं, सजाती हैं, ठीक उसी तरह बालिकाएं भी अपनी गुड़िया को संवारती, सजाती हैं। गुड़ियां भी नाना प्रकार की होती हैं। घरेलू कपड़ों से बनाई गई गुड़िया से ले कर आज के समय की ‘सेमीरोबो’ ‘टाॅकिंग डाॅल’’ तक। फिर भी आधुनिक बाज़ारवादी युग में बालिकाओं को सबसे अधिक आकर्षित किया ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ ने। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ के डिज़ाइनरों ने इन गुड़ियाओं के साथ कल्पना की अनेक संभावनाएं भी बनाए रखीं। कहने का आशय की इन गुड़ियाओं को सजाया जा सकता है, अपने मन के कपड़े पहनाए जा सकते हैं, उनके बाल संवारे जा सकते हैं और ये सुंदर तो हैं ही। इसलिए बालिकाओं के बीच ये अत्यंत लोकप्रिय हैं। पुष्पा चिले ने भी ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ के प्रति एक बालिका के अनुराग को अपनी ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ शीर्षक कविता में बड़ी सुंदरता से पिरोया है-
जब से आई बाॅर्बी डाॅल 
अन्वी बिटिया करे कमाल
बड़े सबेरे उसे जगाती
ब्रश कराती और नहलाती
तौलिए से पोंछ उसे 
ड्रेसिंग टेबल के पास बिठाती
 
बाल साहित्य का सृजन एक चुनौती भरा काम है। वस्तुतः बाल साहित्य बच्चों की मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार लिखा जाना चाहिए, जिससे बच्चों के मानसिक प्रशिक्षण के साथ उनके ज्ञान में भी वृद्धि हो। बच्चों की दुनिया हमारी दुनिया से सर्वथा भिन्न होती है। उनके देखने, समझने तथा परखने का ढंग हमारे ढंग से अलग होता है। इसलिए बच्चों का साहित्य लिखने के लिए बच्चा बनना पड़ता है ताकि उनके स्तर पर उतरकर उनकी भावनाओं, रुचियों तथा उनके मनोविज्ञान के साथ तारतम्य बिठा सके। जहां तक बाल साहित्य और शिक्षा के अंतर्संबंध का प्रश्न है तो बच्चों में पशु-पक्षियों एवं जलचरों के प्रति संवेदना जगाना उनकी बाल्यावस्था से ही आवश्यक है और यह संवेदना जगाने का काम घर के उदाहरणों से ही शुरु किया जा सकता है। जैसे छोटे से ‘फिशबाऊल’ में क़ैद मछली के प्रति संवेदना हो अथवा पिंजरे में क़ैद पक्षियों के प्रति संवेदना हो। इस तारम्य में संग्रह में एक बड़ी सुंदर कविता है ‘‘मछली गुहार’’ -
मछली रानी करे गुहार
सुनो बात और करो विचार
कहती, बहुत हैं कष्ट हमारे
मछली-घर हैं जेल हमारे
शोभा तुम्हारे घर की बढ़ती
हम हर पल हैं मौत से लड़तीं
जैसे पंछी उड़ें गगन में
हम तैरें नदी-समन्दर में
हम अपने संसार में खुश हैं
करते क़ैद हमें क्यों घर में।

आज टीवी और इंटरनेट के युग में जब बाल साहित्य संकट के दौर से गुज़र रहा है और मंा के स्वर में लोरी सुनने के बजाए बच्चों को ‘‘अलेक्सा’’ के स्वर में लोरी सुननी पड़ती है, हिन्दी बालगीतों का स्थान ‘‘इंग्लिश राईम्स’’ ने ले लिया है तो ऐसे कठिन समय में हिन्दी बाल साहित्य के सृजन की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। यदि हिन्दी में लोरियों और बालगीतों की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में रहेगी तो उसे पढ़ा और गाया भी जाएगा। इस दिशा में कवयित्री पुष्पा चिले ने लोरियां और बालगीत रच कर हिन्दी साहित्य को अनुपम उपहार दिया है। आशा है कि उनका यह काव्य संग्रह ‘‘परियों की पाती’’ बाल काव्य-साहित्य सृजन के लिए अन्य साहित्यकारों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन सकेगा।  
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