Tuesday, June 13, 2023
पुस्तक समीक्षा | प्रेम के संवाद रचती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
Tuesday, November 30, 2021
पुस्तक समीक्षा | संवाद के विविध स्वर रचता काव्य संग्रह | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
Tuesday, October 5, 2021
जीवन से संवाद का आग्रह करती कविताएं | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह
Tuesday, August 31, 2021
पुस्तक समीक्षा | शुभाकांक्षाओं से संवाद करती काव्य रचनाएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
प्रस्तुत है आज 31.08. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवयित्री जयन्ती खरे 'जया' के काव्यसंग्रह "सस्मिता" की समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
शुभाकांक्षाओं से संवाद करती काव्य रचनाएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - सस्मिता
कवयित्री - जयन्ती खरे ‘‘जया’’
प्रकाशक - साहित्य सदन, जया भवन,तिली अस्पताल रोड, तिली वार्ड, सागर (म.प्र.)
मूल्य - 80/-
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एक लोरी जगी थी सुलाने मुझे
किन्तु लोरी स्वयं जागरण बन गई।
इन पंक्तियों की कवयित्री जयन्ती खरे ‘‘जया’’ का सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह ‘‘सस्मिता’’ सुंदर भावनाओं की एक हृदयग्राही प्रस्तुति है। ‘‘सस्मिता’’ का अर्थ होता है मुस्कुराहट सहित और संग्रह की कविताएं एक मुस्कुराहट की तरह हृदय को प्रफुल्लित करने में समर्थ हैं। कवयित्री जयन्ती खरे ‘‘जया’’ का जन्म 18 जुलाई 1944 को हुआ था और 27 अगस्त 2008 को उन्होंने इस संसार से विदा ले ली। किन्तु अपनी कोमलकांत रचनाओं के रूप में सदा के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा गई हैं। इस संग्रह की काव्य रचनाओं की चर्चा के पूर्व इसके एक संवेदनशील पक्ष पर ध्यान देना आवश्यक है कि इसे जयन्ती खरे के जीवनसाथी जगदीशचंद्र श्रीवास्तव ने प्रकाशित कराया है ताकि वे अपनी अद्र्धांगिनी के काव्यात्मक पक्ष को सहेज सकें। पाठकों और साहित्यप्रेमियों तक पहुंचा सकें। निश्चितरूप से यह कार्य प्रशंसनीय है क्योंकि वर्तमान समय असंवेदनशील हो चला है, पारिवारिक विखंडन बढ़ रहा है, छोटी-छोटी बातों में ‘‘ब्रेकअप’’ हो जाते हैं, पारस्परिक संबंधों को दीर्घ समय तक प्रेमपूर्ण बनाए रखना कठिन हो चला है। भावनात्मक दृष्टि से ऐसे विपरीत समय में ‘‘सस्मिता’’ काव्य संग्रह पारस्परिक संबंधों में उष्मा संचरण का कार्य कर सकता है। इस संग्रह की रचनाएं एक अलग ही धरातल पर शब्द-संसार रचती हैं।
‘‘सस्मिता’’ का तानाबाना जयन्ती खरे ‘‘जया’’ ने अपने जीवनकाल में ही बुनना आरम्भ कर दिया था। जोकि उनके द्वारा लिखी गई प्रस्तावना से स्पष्ट होता है। उन्होंने संग्रह की प्रस्तावना में लिखा है कि-‘‘यह काव्यकृति प्रस्तुत करते हुए प्रफुल्लित हूं। विद्या देवी के पावन मंदिर में इसे आरती स्वरूप मानिए। जीवन का स्वर्णकाल छात्राओं के बीच बीता। उनकी बाल्यावस्था की प्रच्छाया का मैंने पूर्ण आनन्द लिया। विद्याधन के अतिरिक्त घरेलू जीवन के सुसंस्कार भी उन्हें सौंपे। शैक्षणिक जगत में माता सरस्वती का सानिध्य निरंतर मिलता रहा। भावनाओं केउद्वेलन ने लिखने का सामथ्र्य दिया, काव्यधारा प्रस्फुटित हुई। यह एक सहज प्रभाव रहा। वैसे काव्य लेखन मुझे विरासत में मिला। मेरे पूज्य पिता श्री अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ प्रदेश के प्रख्यात साहित्यकार रहे। यही गुण ग्राह्यता मुझमें रही। अपने परिवेश में जो देखा, सुना, अनुभूत किया, उसी की प्रच्छाया ही मेरा काव्य लेखन है।’’
कवयित्री जयन्ती खरे के पिता अम्बिका प्रसाद ‘‘दिव्य’’ एक उच्चकोटि के साहित्यकार थे। उन्होंने कविताए,ं कहानियां, उपन्यास लिखे साथ ही चित्रकारी में भी उनका रुझान था। ‘‘खजुराहो की अतिरूपा’’ उनकी एक प्रसिद्ध कृति है। ऐसे विद्वत साहित्यकार की पुत्री होते हुए कोमल संवेदनाओं का जयंती खरे में पाया जाना स्वाभाविक था। लेकिन जयन्ती खरे ने अपने पिता की लेखकीय छाया को अपने ऊपर नहीं पड़ने दिया, बल्कि अपने अनुभवों को सहेजते हुए अपना स्वतंत्र कल्पनालोक रचा। लेकिन अपने जीवनकाल में वे अपने इस संग्रह को प्रकाशित नहीं करा सकीं। उनके निधन ने उनके परिवार पर वज्राघात किया और सबकुछ मानो बिखर गया। पुस्तक प्रकाशित कराने के विचार के संबंध में उनके पति जगदीशचंद्र श्रीवास्तव ने लिखा है कि -‘‘एक लम्बी शोकावधि व्यतीत करने के उपरान्त बड़े यत्न से जयन्ती जी की डायरी में लिखी हुई तथा यत्र-तत्र बिखरी हुई रचनाओं को समेट, सहेजकर एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने का मेरे मन में विचार आया।’’ वे पुस्तक के नामकरण के संबंध में जानकारी देते हैं कि ‘‘मैं अकसर जयंती जी के मुख से सुनता रहता था कि बेटी सस्मिता मैं तेरे ही नाम का काव्य संग्रह छपवाऊंगी, जिसका ‘सस्मिता’ काव्य संग्रह नाम रखूंगी। लेकिन इसके पहले ही असमय काल के ग्रास में समा गई, मैंने उनके इस कथन को पूर्ण करने का प्रयास किया।’’ इस तरह देखा जाए तो यह पुस्तक पारिवारिक अंतर्संबंधों की प्रगाढ़ता की काव्यात्मक प्रतीक है।
‘‘सस्मिता’’ काव्य संग्रह की भूमिका लिखी है वरिष्ठ कवयित्री, समीक्षक एवं स्तम्भकार डाॅ. वर्षा सिंह ने। उन्होंने लिखा है-‘‘ कवयित्री जयन्ती खरे जया के काव्य में वह समग्रता दिखाई देती है जो उनकी रचनाओं की काव्यात्मकता को विश्वसनीय बनाती है। यूं तो जयन्ती जी से मेरा घनिष्ठ पारिवारिक परिचय रहा है किन्तु उनके भीतर की कवयित्री को मैंने तब जाना और समझा जब सन् 1997 में दैनिक भास्कर के सागर संस्करण के लिए मेरी माता जी डाॅ. विद्यावती मालविका ने ‘सागर संभाग की कवयित्रियां’ शीर्षक धारावाहिक लेखमाला में जयन्ती जी के काव्यपक्ष को बड़ी बारीकी से रेखांकित किया।’’ डाॅ. वर्षा सिंह जयन्ती खरे के रचनाकर्म के बारे में आगे लिखती हैं कि ‘‘सस्मिता काव्य संग्रह जयन्ती जी की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का पिटारा है। इस संग्रह की काव्य रचनाएं छायावाद से प्रयोगवाद तक की यात्रा को स्पर्श करती हैं। उन्होंने अपने काव्य के केन्द्र में स्त्री को रखते हुए सौंदर्यबोध, प्रकृति चित्रण, पारिवारिक परिवेश, सामाजिक मूल्यवत्ता तथा सांस्कृतिक समन्वय को महत्व दिया है।’’
जयन्ती खरे की कविताओं को पढ़ते हुए जयशंकर प्रसाद युगीन छायावाद का सहसा स्मरण हो जाता है। कोमल भावनाओं को कोमल शब्दों को पिरोना जयन्ती खरे की उन कविताओं को छायावादी सांचे में उतार देता है जिनमें वे मनोउद्गार व्यक्त करने के लिए प्रकृति के तत्वों को आधार बनाती हैं। यह पंक्तियां देखिए-
कि जब कविता करती अभिसार
किरण दल छिपने लगता है
कि रवि शरमाने लगता है।
उषा आती है घूंघट डाल
नील अम्बर का बना दुकूल
डुलाता अंचल मंद समीर
ऋतु सुऋतु बन जाती अनुकूल
सघन छाया वन से गिरिराज
चंदेवा कसने लगता है
पथिक सुख पाने लगता है।
छायावादी काव्य में व्यक्तिगत भावनाओं की प्रधानता है। वहां कवि अपने सुख-दुख एवं हर्ष-शोक को ही वाणी प्रदान करते हुए खुद को अभिव्यक्त करता है। यहां सौन्दर्य का अभिप्राय काव्य सौन्दर्य से नही, सूक्ष्म आतंरिक सौन्दर्य से है। बाह्य सौन्दर्य की अपेक्षा आंतरिक सौन्दर्य के उद्घाटन मे उसकी दृष्टि अधिक रमती है। प्रकृति पर मानव व्यक्तितत्व का आरोप छायावाद की एक प्रमुख विशेषता है। छायावादी कवियों ने प्रकृति को अनेक रूपों मे देखा है। छायावाद नामकरण का श्रेय मुकुटधर पाण्डेय को जाता है. हिन्दी साहित्य के आधुनिक चरण मे द्विवेदी युग के पश्चात हिन्दी काव्य की जो धारा विषय वस्तु की दृष्टि से स्वच्छंद प्रेमभावना, प्रकृति मे मानवीय क्रियाकलापों तथा भाव-व्यापारों के आरोपण और कला की दृष्टि से लाक्षणिकता प्रधान नवीन अभिव्यंजना-पद्धति को लेकर चली, उसे छायावाद कहा गया। जयशंकर प्रसाद ने छायावाद की व्याख्या इस प्रकार की हैं-‘‘छायावाद कविता वाणी का वह लावण्य है जो स्वयं मे मोती के पानी जैसी छाया, तरलता और युवती के लज्जा भूषण जैसी श्री से संयुक्त होता है। यह तरल छाया और लज्जा श्री ही छायावाद कवि की वाणी का सौंदर्य है।’’ इस तारतम्य में जयन्ती खरे ‘‘जया’’ के इस गीत का अंश देखिए कि कितनी सुंदरता से उन्होंने छायावादी प्रवृतियों को अपनाया-
मैं प्रतिबिम्ब बनी दुनिया की
दुनिया भरी समेट हृदय में।
जब आया आनंद कहीं से
मानस में सागर लहराया
ज्वार उठे उत्तुंग गगन को
मन में मन भी नहीं समाया
मैं प्रतिबिम्ब बनी सागर की
सागर भरा समेट प्रणय में।
छायावादी काव्य मे वेदना और करुणा की अधिकता पाई जाती है। छायावादी कवियों ने जीवन के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है। इसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद है। सम्पूर्ण जगत मानव चेतना से स्पंदित दिखाई देता है। यही विशेषता जयंती खरे की काव्य रचनाओं में भी देखी जा सकती है-
मैं गीत बनाती उन भावों के
जिनको कहीं न भवन मिले।
भटक रहे जो अंतरिक्ष में
जिनकी कोई रूप न रेखा
जिनने देखा नहीं विश्व को
नहीं विश्व ने जिनको देखा
मैं मूर्ति बनाती उन सपनों की
जिनको कहीं न नयन मिले।
जयन्ती खरे ने देशभक्ति की कविताएं भी लिखीं। उनकी कविताओं में मातृभूमि भारत का स्नेहिल गुणगान है। देश की प्रतिष्ठा को सम्पूर्ण विश्व के ऊपर देखने की इच्छा उनकी कविता में परिलक्षित होती है। उनकी ये पंक्तियां देखिए-
भारत के अनुरूप बनेगें हम उसके श्रृंगार
उच्च बनेंगे हिमगिरि जैसे, चूमेंगे आकाश
खड़े दिखेंगे पृथक सभी से, करके पूर्ण विकास
देवों से हम बात करेंगे, देखेगा संसार
जयन्ती खरे ‘‘जया’’ की काव्य रचनाएं देश के प्रति, जगत के प्रति, प्रत्येक मानव के प्रति, प्रकृति के प्रति तथा स्वयं के प्रति शुभाकांक्षाओं से संवाद करती रचनाएं हैं। ‘‘सस्मिता’’ काव्य संग्रह की सभी रचनाएं मन को बहुत स्नेह से स्पर्श करती हैं और फिर पढ़ने वाले को अपना बना लेती हैं। जयन्ती खरे के भावसंसार को समझना और उसमें सकारात्मक भाव बनाए रखना ही उनकी कविताओं के मर्म को समझने का मनस्वी मार्ग है। माधुर्य और बिंब-प्रतिबिंब छायावादी प्रभावयुक्त होते हुए भी समसामयिकता से सुगमता से जुड़ जाते हैं। ऐसा मधुर काव्यसृजन आजकल बिरले ही देखने को मिलता है। संग्रह की कविताएं अपनी प्रवाहमयी, लयात्मक भाषा-शैली के माध्यम से गुनगुनाते हुए हृदय-मार्ग से भीतर तक उतर जाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मानवीय चेतना के पक्षधर पाठकों को यह पसंद आने योग्य काव्यसंग्रह है।
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण
Friday, April 26, 2019
मतदाता जागरूकता पर आयोजित संवाद में डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
हार्दिक धन्यवाद नवदुनिया !!!
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
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| Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019 |
Friday, September 22, 2017
चर्चा प्लस ... मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’ क्या रचेगा नया इतिहास ? - डाॅ. शरद सिंह
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| Dr (Miss) Sharad Singh |
मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’
क्या रचेगा नया इतिहास ?
- डाॅ. शरद सिंह
(मेरा कॉलम 'सागर दिनकर' में 20.09.2017)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22 सितम्बर को अपने संसदीय क्षेत्र बनारस पहुंचने वाले हैं। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम के अंतर्गत बातचीत करेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए तरक्की के कई नए रास्ते खोलेगा।
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| Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper |
लगभग 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिला सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी। इसके बाद 24 अक्तूबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर पहली बार अपनी राय सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश में ’महापरिवर्तन रैली’ के दौरान बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि - ‘‘हमें अपनी बेटियों, मांओं और बहनों को बचाना ज़रूरी है, इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए। मांओं और बहनों का सम्मान करना चाहिए। अब ये ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा आ गया है. जैसे कोई हिंदू, कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में लिप्त होता है तो उसे जेल जाना पड़ता है उसी तरह से मेरी मुसलमान बहनों का क्या अपराध कि कोई फ़ोन पर तलाक़ कह देता है और उनकी ज़िंदगी तबाह हो जाती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है कि महिलाओं पर किसी तरह की ज़्यादती नहीं होनी चाहिए और धर्म के आधार पर किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में बातचीत होनी चाहिए। सरकार ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी है। वो लोग जो ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहते हैं, ऐसे लोग जनता को भड़का रहे हैं। हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी ट्रिपल तलाक़ से बर्बाद होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कुछ पार्टियां वोट बैंक की ख़ातिर 21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति अन्याय करने पर उतारू हैं। ये किस तरह का इंसाफ़ है। राजनीति और चुनाव की अपनी जगह है लेकिन मुस्लिम महिलाओं को संविधान के मुताबिक़ अधिकार देना सरकार की और देश के लोगों की ज़िम्मेदारी है। तलाक़ के मुद्दे पर बहस में मुस्लिम समुदाय के उऩ पढ़े लिखे लोगों को हिस्सा लेना चाहिए जो क़ुरान की अच्छी जानकारी रखते हों। मुस्लिम समुदाय में भी प्रगतिशील सोच रखने वाले पढ़े लिखे लोग हैं। शिक्षित मुस्लिम महिलाएं भी इस मुद्दे पर अपने विचार रख सकती हैं।’’
तमाम मतभेदों के बावजूद भी विरोधी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शायद आज भी नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और के नेतृत्व की सरकार होती तो इस प्रकार का फैसला नहीं आ पाता क्योंकि जिस दृढ़ता के साथ केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखा, उससे सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में और भी आसानी हो गई। केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम अदालत में अपना पक्ष दृढ़ता पूर्वक रखते हुए कहा था कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों। ’’शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकारी के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए। तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।’’
तीन तलाक के प्रकरण में हुआ फैसला इस लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष को मजबूती देता है क्यों कि लोग अभी शाहबानो प्रकरण को भूले नहीं हैं। राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानून बनाकर पलट दिया था। मध्य प्रदेश के जिला इंदौर की शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने सन् 1978 में तलाक दे दिया था। तलाक के समय शाहबानो के पांच बच्चे थे। इनके भरण−पोषण के लिए उन्होंने निचली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया, बाद में यह मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सभी जगह शाहबानो के ही पक्ष में फैसले सुनाए गए। उस समय मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी पुरुष समुदाय शाहबानो की अपील का विरोध किया। विरोध के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया, जिसमें शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया गया। इस कानून में कहा गया था, ’हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।’ उस समय राजीव गांधी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसीलिये उच्चतम न्यायालय के धर्म−निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इसके आधार पर शाहबानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला संसद ने पलट दिया।
22 अगस्त 2017 को जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया तब शाहबानो के बेटे जमील अहमद ने उन दुख भरे दिनों को याद करते हुए कहा था कि ‘‘38 साल पहले जब कोर्ट ने अम्मी (शाहबानो) को भरण−पोषण के 79 रुपए अब्बा से दिलवाए थे, तो लगा था जैसे दुनिया भर की दौलत मिल गई, जो खुशी उस समय मिली थी, वही आज फिर महसूस हो रही है। जब फैसले को लेकर विवाद बढ़ने लगा तो अम्मी इतनी आहत हुईं कि उन्होंने भरण पोषण की राशि ही त्याग दी। अब ऐसा नहीं हो पायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा कर मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। जो मशाल 38 साल पहले अम्मी ने जलाई थी, उसकी रोशनी आज पूरे देश और समाज को रोशन कर रही है।’’
बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के समाज हित में यह बात स्वीकार की जा सकती है कि उस समय मोदी की सरकार होती तो शायद मुस्लिम महिलाओं को 40 वर्षों तक यूं भटकना नहीं पड़ता। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के मुस्लिम वोट के किले में सेंध लगा दी है। लेकिन यदि महिलाओं के मानवीयहित को ध्यान में रखा जाए तो इस प्रकार की राजनीति में बुरा क्या है जब इससे किसी बड़े पक्ष को बुनियादी अधिकार मिल रहा हों।
इस तारतम्य में 22 सितम्बर 2017 को बनारस में होने वाले संवाद कार्यक्रम को देखा जा रहा है। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाके के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। यद्यपि वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख समाचार ऐजेंसियों के अनुसार मुस्लिम बाहुल शक्करतालाब इलाके में कट्टरपंथियों के सक्रिय होने से महिलाओं को धमकाने का दौर शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ’संवाद’ कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम महिलाओं को धमकाए जाने का मामला सामने आया। कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छुक महिलाओं को कट्टरपंथी घर-घर जाकर मारने-पीटने के साथ सामाजिक बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं। यह जानकारी स्वयं मुस्लिम महिला फाउंडेशन की महिला कचहरी में सामने रखी गई। प्रशासन को भी इस बारे में जानकारी दी जा चुकी है।
वरुणापार इलाके में रविवार को मुस्लिम महिला फाउंडेशन की ओर से आयोजित महिला कचहरी में शामिल हुई शबाना ने बताया कि कट्टरपंथियों के इशारे पर युवकों की टोली घरों में बार-बार जाकर महिलाओं को पीएम कार्यक्रम में न जाने की बात कह धमका रही है। गुड़िया, रेशमा, शहनाज और आफरीन के अलावा एक दर्जन अन्य महिलाओं ने भी धमकाए जाने की जानकारी दी। महिलाओं ने बताया कि धमकी देने वाले कह रहे हैं कि मोदी कार्यक्रम के दिन घर से बाहर कदम रखते ही हाथ-पैर तोड़ दिया जाएगा। इस पर मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने महिला कचहरी में कहा कि धमकी देने वाले कायर हैं। मुस्लिम महिलाएं जागरुक हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर वे अपनी परेशानी जरूर बताएंगी। इस मसले पर सर्वसम्मति से तय किया गया ज्यादा से ज्यादा महिलाएं हर कीमत पर प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगी। धमकी देने वालों के खिलाफ लिखित रिपोर्ट एसएसपी को दी जाएगी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सेवा प्रमुख डा. राजीव श्रीवास्तव का कहना है कि धमकी देकर मुस्लिम महिलाओं में डर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के ‘‘संवाद कार्यक्रम’’ के प्रति उत्साही मुस्लिम महिलाओं का साहस देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। एक ओर भारतीय मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष दूसरी ओर सरकार की महिलाओं के हित में सकारात्मक सोच और तीसरी भारतीय न्यायायिक व्यवस्था का मानवीय दृष्टिकोण - इन तीनों ने शक्तियों ने मिल कर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में ‘तीन तलाक’ से मुक्ति का जो द्वार खोला है वह उन महिलाओं के सुखद और सुरक्षित भविष्य की ओर एक बड़ा और मज़बूत क़दम है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रगति के नए द्वार खोलेगा और रचेगा नया इतिहास।
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#शाहबानो #डीरेका_ऑडिटोरियम
Monday, January 18, 2016
डॉ. शरद सिंह के उपन्यास ‘‘कस्बाई सिमोन’’ पर पाठक मंच, सागर द्वारा एक सफल संवाद का आयोजन ...
On my novel "Kasbai Simon"..... a successful review & discussion organised by Pathak Manch, Sagar -17.01.2016
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