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Tuesday, June 13, 2023

पुस्तक समीक्षा | प्रेम के संवाद रचती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 13.06.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त के काव्य संग्रह "अन्जानी राहें" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
प्रेम के संवाद रचती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - अन्जानी राहें
कवि       - लक्ष्मीचन्द्र गुप्त
प्रकाशक    - मंगलम् प्रकाशन सर्किट हाउस मार्ग, छतरपुर (म.प्र.)
मूल्य       - 250/-
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‘‘वक्त की लय को देख न पाई। नियति के क्रम को समझ न पाई। इस पल कुछ, उस पल कुछ जान न पाई। जब आप चल दिए तब सुध आई। आपकी कोई बात नहीं, कोई सौगात नहीं। आपसे अधिक मीठा कुछ लगता नहीं। ममता, प्रेम के कोष को क्या दे सकती हूं? प्रेम, विश्वास, भावना के श्रद्धासुमन अर्पित करती हूं। पूज्य तुम्हें माना है मैंने, नित अर्चना करती हूं। उठ प्रभात नित नव किसलय संग, आपको वंदन करती हूं। प्यार की डोरी विंध जाती, जब भी अभिनंदन. करती हूं। बीते लम्हे संग उन यादों के, हे मेरे प्रिय तुम्हें वंदन करती हूं।’’ - ये काव्यात्मक शब्द हैं श्रीमती तारा गुप्ता के जिन्होंने अपने बिछड़े हुए जीवनसाथी की कविताओं को संग्रह के रूप में प्रकाशित कराते हुए स्मरण के तौर पर व्यक्त किए हैं।
साहित्यकार, चाहे वह गद्यकार हो या पद्यकार, कई बार ऐसा होता है कि उसके जीवनकाल में उसकी रचनाएं एक सीमित दायरे में सिमट कर रह जाती हैं। कभी वह संकोचवश, कभी आर्थिक कारणों से अथवा कभी आवश्यकता का अनुमान न लगा पाने के कारण अपनी रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने से वंचित रह जाता है। साथ ही वंचित रह जाता है उन रचनाओं से पाठकों का एक बड़ा वर्ग। कई रचनाकारों की रचनाएं उनके दिवंगत होने के उपरांत उनके परिजन, उनके हितैषी, उनके इष्टमित्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराते हैं और कई रचनाकार और उनकी रचनाएं विस्मृति की गर्त में समा जाती हैं। जहां तक इष्टमित्रों द्वारा अपने दिवंगत मित्र की रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का संदर्भ है तो मैं यहां एक प्रसंग का उल्लेख कर रही हूं। सागर नगर के चर्चित शायर यार मोहम्मद ‘यार’ का 2016 में निधन हो गया। उनकी अनेक उम्दा शायरी बिखरी पड़ी थी जिन्हें संग्रह के रूप में समेटे जाने की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में उनके मित्र जो कि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘श्यामलम’ के अध्यक्ष भी हैं, उमाकांत मिश्र ने ‘‘यारां’’ के नाम से उनकी शायरी का संग्रह प्रकाशित कराया। उस पर प्रशंसनीय यह कि उसका कोई मूल्य न रखते हुए उसे पाठकों को निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। जबकि उमाकांत मिश्र स्वयं कोई पूंजीपति नहीं हैं, मध्यवर्गीय व्यक्ति हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि श्रेष्ठ भावनाएं हर बाधा के बीच से रास्ता निकाल ही लेती हैं। इसी क्रम में यह प्रसन्नता का विषय है कि कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त की अर्द्धांगिनी तारा गुप्ता ने उनकी कविताओं को ‘‘अन्जानी राहें’’ के रूप में प्रकाशित करा कर भावनात्मक एवं साहित्यक दोनों दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कार्य किया है।      
पुस्तक की भूमिका गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने लिखी है। उन्होंने लिखा है कि -‘‘गुप्त जी की अधिकांश कविताएं प्रकृति, समाज और व्यक्तिगत सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। सामाजिक विद्रूपताओं पर बड़े प्यार से चोट की है उन्होंने। अपनों के बीच रहकर व्यक्ति कैसे घुट-घुट कर जीता है इस प्रकार की संवेदनाओं से परिपूर्ण कवितायें पठनीय हैं।’’
संग्रह ‘‘अन्जानी राहें’’ की कविताएं पढ़ने के बाद यह टीस मन में उठती है कि इस कवि को तो अभी और सृजन करना चाहिए था, इसने इतनी जल्दी सबसे विदा क्यों ले ली? लेकिन जीवन और मृत्यु किसी के वश में नहीं। किन्तु यह भी सच है कि एक रचनाकार कभी मरता नहीं है, वह अपने विचारों एवं अपनी भावनाओं को अपनी रचनाओं में इस तरह पिरो जाता है कि उसकी उपस्थिति सदा बनी रहती है और वह सदा सबसे संवाद करता रहता है। कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताएं पाठकों से एक मधुर संवाद करती हैं। इन कविताओं में प्रेम के विविध पक्ष हैं। संयोग, वियोग, अनुनय, उलाहना आदि सभी कुछ। प्रेम की राहें हमेशा अन्जानी ही होती हैं। प्रेम किस सोपान को प्राप्त करेगा, इसका अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता है। लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताओं में छायावाद और रहस्यवाद दोनों की झलक मिलती है। क्योंकि वे प्रेम की ऐसी काव्यात्मक प्रस्तुति सामने रखते हैं जिसमें खुला निवेदन भी है और गोपन भी है। उदाहरणस्वरूप उनकी कविता ‘‘हर लहर मैंनें किनारों से मिलती देखी’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
हर लहर मैंने किनारों से मिलती देखी।
हर शाम सुबहो में बदलती देखी।।
कब तक रहोगी मौन, बता दो तेरी कविते
हर बात प्यार की तेरे अधरों पर मचलती देखी।।
जीता तो हूं, मगर जी नहीं पाता।
पीता भी हूं, तो पी नहीं पाता ।।
क्या करूं, मजबूर हूं, निगाहों के पहरे यहां
मिलता हूं पर तुम से मिल नहीं पाता ।।

लक्ष्मीचन्द्र गुप्त ने कुछ चुटीली कविताएं भी लिखी हैं जो इस संग्रह में मौजूद हैं। जैसे उनकी एक कविता है ‘‘बाकी वे सब हैं बोर’’। यह अत्यंत रोचक कविता है। इस कविता से कवि की सृजनात्मक तीक्ष्णता का भी पता चलता है। यह कविता इस प्रकार है-
जरूरी नहीं प्यारे
केवल जरूरी है
जैसे
लिखना जरूरी है।
ताकि
पटक सकूं मुट्ठियां
मचा सकूं शोर
कि हमें छोड़कर
बाकी वे सब हैं बोर।

कविता में व्यंजना का प्रयोग करते हुए विसंगतियों पर गहरी चोट की जा सकती है। इसीलिए व्यंजना को अपनाते हुए कवि ने अपनी कविता ‘‘इस कवि में सामर्थ कहां है’’ में साहित्यजगत में व्याप्त दुरावस्था पर कटाक्ष किया है-
समझ गया उद्देश्य आपका,
बाध्य नही, पर बतला सकता।
मेरी कविता का अर्थ, कविता से पूछो,
इस कविता में अर्थ कहां है?
सीधी-साधी कविता का भी अर्थ बताता हूं।
इस कवि में सामर्थ कहां है।
मैं यों ही नहीं बहला सकता  
मैं तो अनर्थ से अर्थ निकालता,
बड़े-बड़े बाजारों में क्या,
छोटा दर्पण बिक सकता है?
बड़ी-बड़ी सरिता धारा में,
नीर कहीं क्या रूक सकता है?
कहते तो है, धरा गगन भी,
सावन भादों मिल जाते हैं।
साहित्य-गगन में रवि-कवियों संग
तुच्छ कवि क्या टिक सकता है?

वैसे लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताओं में प्रेम केन्द्रीय भाव है। प्रेमपत्रों के युग में पत्र के साथ कोई फूल या कोई उपहार भेजने का भी चलन था। उसी परिपाटी के तारतम्य में कवि ने ‘‘अनामिका के नाम एक पत्र’’ कविता में लिखा है कि -
पत्र के मैं साथ बोलो और क्या मैं भेज सकता।
भाव का भन्डार केवल कल्पना मैं भेज सकता ।।
पास मेरे कुछ नहीं अनुकूल कह संतोष करता -
संपदा की देवि को-कंकड़ दिखाना तुच्छ लगता ।।
हो भरा ज्यों सिंधु बोलो, बिन्दु का अस्तित्व क्या है।
सूर्य के सम्मुख कहो तुम इंदु का अस्तित्व क्या है।।
मौन तो अनुगामिनी है साधना की कल्पना -
भक्ति के सम्मुख कहो आस्तिक का अस्तित्व क्या है ।।
तुम स्वयं जब मेघ हो तो मेह की अभिलाष क्या है।

कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त ने प्रकृति का मानवीयकरण करते हुए छायावादी परम्परा का भी अवगाहन किया है। वे अपनी कविता ‘‘पनिहारी प्रीतम’’ में प्रकृति के तत्वों में प्रेम और प्रेयसी के सवरूप को देखते हैं-
पनिहारी प्रीतम
पनघट पर।
पनिहारी की गागर से घट से।
कुछ छलका।
कुछ बिजली सी चमकी,
शीतल कुछ झलका, अलिका मन से।

‘‘अन्जानी राहें’’ एक ऐसी धरोहर कृति है जो हिन्दी काव्य जगत को समृद्ध करने में सक्षम है। इसके प्रकाशन के लिए तारा गुप्त एवं प्रवीण गुप्त साधुवाद के पात्र हैं क्योंकि साहित्य का सृजन जितना महत्वपूर्ण होता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है उसे सहेजना।
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview  #bookreviewer  #आचरण #DrMissSharadSingh

Tuesday, November 30, 2021

पुस्तक समीक्षा | संवाद के विविध स्वर रचता काव्य संग्रह | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 30.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी के काव्य संग्रह "संवाद शीर्षक से" समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
संवाद के विविध स्वर रचता काव्य संग्रह  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - संवाद शीर्षक से
कवि        - ईश्वर दयाल गोस्वामी
प्रकाशक     - उत्कर्ष प्रकाशन, 142, शाक्यपुरी, कंकर खेड़ा, मेरठ कैण्ट (उप्र)
मूल्य        - 150/-
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कोरोना काल साहित्य जगत के समक्ष भी एक अवरोध बन कर सामने आया लेकिन साहित्य तो जल की धारा के समान है जो अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है। एक राह पर अवरोध उत्पन्न हो जाए तो दूसरी राह निकल ही आती है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटें तो अंग्रेजों के जमाने में देशभक्ति के पक्ष में साहित्य लिखना प्रतिबंधित था। लेखक की पहचान हो जाने पर उसे कठोर दंड दिया जाता। अतः उस दौर में लेखकों, कवियों ने छद्म नाम से रचनाएं लिखीं। ताकि जब तक अंग्रेज सरकार असली सृजनकर्ता को ढूंढ पाए तब तक रचना में निहित संदेश जन-जन तक पहुंच जाए। कोरोना काल में जब रचनाकार परस्पर प्रत्यक्ष नहीं मिल पा रहे थे तब आॅनलाईन गोष्ठियों, संगोष्ठियों एवं कविसम्मेलनों का रास्ता निकाला गया। लेकिन साहित्य सृजन का एक पक्ष और भी है जिसे तात्कालिक क्षति पहुंची। वह पक्ष उन पुस्तकों का है जो कोरोना काल के ठीक पहले अथवा थोड़े पहले प्रकाशित हुई थीं। उनमें से कई पुस्तकें पर्याप्त चर्चा का विषय नहीं बन सकीं और कोरोना काल की गत्र्त में समा गईं। साहित्य जगत में अनेक साहित्यकार अभी भी ऐसे हैं जो इंटरनेट और आधुनिक तकनीक से भली-भांति परिचित नहीं हैं। ऐसे साहित्यकार भी अपनी कृतियों को सब के सामने नहीं ला सके। कुछ पुस्तकों की चर्चा हुई लेकिन उतनी नहीं जितनी कि उन पर चर्चा होनी चाहिए थी। ऐसी ही एक पुस्तक है ‘‘संवाद शीर्षक से’’। यह एक काव्य संग्रह है जिसमें कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने अपनी समकालीन कविताएं, नवगीत, गीत तथा गीतिकाओं को संग्रहीत किया है। यह सन् 2017 में प्रकाशित हुई। सागर जिले की रहली तहसील के छिरारी गांव में निवासरत ईश्वर दयाल गोस्वामी के इस काव्य संग्रह की सन् 2018-19 में तनिक चर्चा हुई लेकिन 2020 आते-आते कोरोना काल ने परिदृश्य ही बदल दिया। साहित्य के सतत् संवाद में एक ठहराव-सा आ गया। परिदृश्य बदलते-बदलते नवीन कृतियों की बाढ़ में तनिक पुरानी कृतियां पीछे छूटने लगीं। किन्तु सच यही है कि साहित्य कभी पुराना नहीं होता है, उसकी समसामयिकता सदा बनी रहती है। ‘‘संवाद शीर्षक से’’ की समसामयिकता भी अक्षुण्ण है।
‘‘संवाद शीर्षक से’’ काव्य संग्रह में रचनाओं को शैलीगत विभाजन करते हुए कुल पांच खण्डों में प्रस्तुत किया गया है। पहला खण्ड है समकालीन कविताओं का। जिसमें कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने अपनी समकालीन कविताओं को प्रस्तुत किया है। ये कविताएं समाज, परिवार, परिवेश और प्रेम से सीधा संवाद करती हैं। ‘‘प्रेम’’ शीर्षक की ही कविता देखें जिसमें प्रेम का एक नितांत व्यवहारिक स्वरूप कवि ने शब्दबद्ध किया है-
तुम्हें पाना ही
सब कुछ नहीं है
जीवन सार्थक
भी नहीं होता
केवल तुम्हें /पा लेने से!
बल्कि बहुत 
कुछ त्यागना
सहना और 
खोना पड़ता है
तुम्हें पाने के बाद/तुम्हारे लिए।

समकालीन कविता अथवा अतुकांत कविता लिखना जितना सहज लगता है, वस्तुतः उतना होता नहीं है। गद्य की पंक्तियों को तोड़-तोड़ कर लिख देना मात्र नहीं है समकालीन कविता। इस प्रकार की कविताओं की अपनी एक अलग संवाद क्षमता होती है। एक अलग लयबद्ध शिल्प होता है और होती है शब्दों की मज़बूत पकड़। दृश्यात्मकता भी इस तरह की कविताओं की खूबी होती है। इसी संदर्भ में उदाहरण के लिए ‘‘भय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां पढ़ कर महसूस कीजिए इसमें निहित मर्म को-
ये केवल किवाड़ नहीं
ये जब बोलते हैं
तो सहम जाती है मां
ये जब हिलते हैं 
तो ठिठक से जाते हैं पिता
इनका बंद रहना अखरता है
हर किसी को / मित्रों को
रिश्तेदारों को।
ये हिलें या हिलाए जाएं
ये खुलें या खोले जाएं
तो एक अनचाहा-सा
अनजाना-सा
भय आ कर सिमट जाता है
सांकल और कुंदे के दरमियान।

संग्रह में दूसरा खंड है नवगीत का। नवगीत के संस्थापक कवियों में राजेन्द्र प्रसाद सिंह और शंभुनाथ सिंह का नाम लिया जाता है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ‘‘नई कविता’’ के समानांतर रचे जा रहे गीतों की भिन्न प्रकृति एवं रचना विधान को रेखांकित करने वाले नए गीतों के प्रथम संकलन ‘‘गीतांगिनी’’ (1958) का संपादन किया और उसकी भूमिका में ‘‘नवगीत’’ के रूप में नए गीतों का नामकरण एवं लक्षण निरूपित किया। इसके बाद डॉ. शंभुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित तीन खंडों में ‘‘नवगीत दशक’ शीर्षक पूरे भारत से चुने हुए तीस प्रमुख नवगीतकारों की दस-दस नवगीत रचनाओं के ऐतिहासिक समवेत संकलन का प्रकाशन हुआ। जिससे नवगीत को सुदृढ़ स्थापना मिली। नवगीत के पुरोधा कवियों में से एक देवेन्द्र शर्मा ‘‘इन्द्र’’ ने नवगीत का सटीक परिचय दिया है कि - ‘‘प्रत्येक नवगीत पहले गीत है, किन्तु प्रत्येक गीत नवगीत नहीं है।’’ नवगीत के मूल चरित्र को आत्मसात करते हुए कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने नवगीत को साधने का प्रयास किया। फिर संभवतः उनका स्वयं ही मोहभंग हो गया नवगीत से। उनके तीन नवगीत ही इस संग्रह में हैं। ‘‘आदमी’’ शीर्षक नवगीत की ये कुछ पंक्तियां बानगी स्वरूप प्रस्तुत हैं-
श्यामपट पर/ अक्षरों-सा
नहीं चमकता आदमी।
अक्षरों पर श्यामपट-सा
काला दिखता
ज़हर जमाने का 
है काग़ज़ पर लिखता
अंधकार में /जुगनू जैसा
नहीं चमकता आदमी।

संग्रह के तीसरे खंड में गीत रखे गए हैं। ईश्वर दयाल गोस्वामी के गीत नवगीत की अपेक्षा सशक्त हैं फिर भी उनके कुछ गीतों में नवगीत का द्वंद्व दिखाई देता है। वे गीत में नवगीत के शिल्प को आरुढ़ कर बैठते हैं। किन्तु उनके कुछ गीत बेहद सशक्त और मर्मस्पर्शी हैं। इन्हीं में से एक है ‘‘फिर से बचपन आ जाता’’ गीत। पंक्तियां देखिए-
जाने क्यों लगता है मुझको
फिर से बचपन आ जाता
खोई हुई खुशी जीवन की
और प्यार मैं पा जाता।

रोज बनाना नए घरौंदे
और मिटाना फिर उनको
बचपन की वो भोली सूरत
अच्छी लगती थी सबको
उसे याद कर अब भी मेरा
मन गुलाब-सा खिल जाता।

अरबी-फ़ारसी से उर्दू में और उर्दू से हिन्दी में ग़ज़ल कब और कैसे आई यह एक लम्बी चर्चा का विषय है। चूंकि समीक्ष्य संग्रह में कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने अपनी ग़ज़लों को ‘‘गीतिका’’ नामक चौथे खंड में सहेजा है इसलिए यहां उल्लेख करना समीचीन होगा कि सबसे पहले कवि गोपाल दास ‘‘नीरज’’ ने हिन्दी गजल को ‘‘गीतिका’’ नाम दिया था। ‘‘फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन’’ - यह है उर्दू में बहरे-‘रमल’ अथवा हिन्दी में ‘गीतिका’ छंद। हिन्दी के गणों के अनुसार इस छन्द के गण होंगे- रगण, तगण, मगण, यगण और रगण। यानीकि उर्दू में इस छन्द या बहर को ‘रमल’ और हिन्दी में ‘गीतिका’ कहेंगे। यह विवाद भी हमेशा रहा है कि हिन्दी ग़ज़ल को गीतिका कहना उचित है या नहीं। बहरहाल, यदि ‘‘संवाद शीर्षक से’’ की गीतिकाओं को देखें तो वे निःसंदेह अपने शीर्षक से ही नहीं वरन् समूचे समाज से संवाद करती दिखाई पड़ती हैं। जैसे एक गीतिका है ‘‘बेटियां’’। इसके कुछ बंद देखें-
दो नदियों का मेल कराती हैं बेटियां
प्यार  की  धारा  बहाती  हैं बेटियां 
संजीदगी से करती हैं कठिनाइयों को पार
सहयोग का दस्तूर चलाती हैं बेटियां

इसी छंद में आबद्ध एक और गीतिका है ‘‘लेखनी’’। इसकी भी चंद पंक्तियां देखें-
कर्त्तव्य का  ही  बोध  कराती है लेखनी
इस देह  को  मनुष्य  बनाती है लेखनी
अंतर की वेदना न कवि क्यों मुखर करे
पथ-पथ पे नेह पुष्प  बिछाती है लेखनी 

संग्रह के पांचवे खंड में ‘‘विविध’’ के रूप में कुछ और रचनाएं हैं जिनके बारे में संभवतः स्वयं कवि गोस्वामी सुनिश्चित नहीं हो सके उन्हें वे किस विधा खंड में रखें। ईश्वर दयाल गोस्वामी में काव्यात्मक सृजन की विपुल संभावनाएं हैं। बस, उन्हें आवश्यकता है ठहर का विचार करने की कि वे काव्य के किस शिल्प को पूरी तरह पहले साधना चाहते हैं। वैसे, विविधता पूर्ण काव्यात्मक संवाद करता यह काव्य संग्रह पठनीय है, स्वागत योग्य है और कवि की भावी सृजनधर्मिता के प्रति विश्वास जगाता है।     
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Tuesday, October 5, 2021

जीवन से संवाद का आग्रह करती कविताएं | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 05.10. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि अजयश्री के काव्य संग्रह "चौका-बरतन" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
जीवन से संवाद का आग्रह करती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

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कविता संग्रह  - चौका-बरतन
कवि         - अजयश्री
प्रकाशक      - रश्मि प्रकाशन, महाराजापुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ (उप्र)-226023
मूल्य         - 110/-
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अजयश्री एक प्रतिभावान कवि हैं। कविता के साथ ही कहानी, उपन्यास, नाटक, पटकथा आदि विविध विधाओं में उन्होंने अपनी कलम चलाई है तथा ख्याति अर्जित की है। उनका ताज़ा काव्य संग्रह ‘‘चौका-बरतन’’ जनजीवन से जुड़ी 35 कविताओं का संग्रह है। वे लखनऊ के परिवार कल्याण विभाग में गीत एवं नाट्य अधिकारी हैं तथा उनके द्वारा कुष्ठरोग पर बनाई गई शाॅर्ट फिल्म ‘‘काश’’ को नवादा फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट स्टोरी श्रेणी में तृतीय पुरस्कार भी मिल चुका है। जैसा कि संग्रह के नाम से ही अनुमान हो जाता है कि इन कविताओं में रोज़मर्रा के जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को पिरोया गया है। अजयश्री की कविताएं नई कविता के मानकों को स्वीकार करती हुई भाव-प्रवणता से युक्त हैं। नई कविता की यह विशेषता रही है कि इसने तमाम खुरदुरेपन को आत्मसात करते हुए जीवन को जीवन के रूप में देखा, इसमें कोई सीमा निर्धारित नहीं की। इसलिए अपने कथ्य और दृष्टि में विस्तार पाती है। नई कविता का धरातल पूर्ववर्ती काव्य- धाराओं से व्यापक है, इसलिए इसमें विषयों की विविधता है। एक अर्थ में यह पुराने मूल्यों और प्रतिमानों के प्रति विद्रोही प्रतीत होती है और इनसे बाहर निकलने के लिए व्याकुल रहती है। नई कविता ने धर्म, दर्शन, नीति, आचार सभी प्रकार के मूल्यों को चुनौती दी। इसमें मानव को उसके समस्त सुख-दुखों, विसंगतियों और विडंबनाओं को उसके परिवेश सहित स्वीकार किया गया है। इसमें न तो छायावाद की तरह समाज से पलायन है और न ही प्रयोगवाद की तरह मनोग्रंथियों का नग्न वैयक्तिक चित्रण या घोर व्यक्तिनिष्ठ अहंभावना। ये कविताएं ईमानदारी के साथ व्यक्ति की क्षणिक अनुभूतियों को, उसकी समग्र पीड़ा को संवेदनापूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। ठीक इसी तरह अजयश्री की कविताएं गहरे सामाजिक अभिप्राय वाली हैं। उनमें मनुष्यता को बचाए रखने का एक निरंतर संघर्ष दिखाई है। इन कविताओं में जीवन के भरे-पूरे दृश्य, उसके अन्तर्विरोध, उसकी विडम्बनाएं, देशज रंग, स्मृतियां, घर, परिवेश अनेक रूपों में विद्यमान हैं।
अजयश्री अपनी कविता ‘‘दाल-रोटी’’ के बहाने पारिवारिक संबंधों की विवशताओं एवं दोहरेपन को सामने रखते हुए कहते हैं-
नमक चीनी 
में  उलझी
जिंदगी, 
सुलझती नहीं 
रिश्तांे सी ! 
एक चिंगारी है 
चूल्हे में 
जो उम्र की 
रोटियां सेक 
रही है। 
ज़रूरी नहीं 
रसोई में  
पकनेवाला 
हर भोजन 
स्वादिष्ट हो !
‘‘चौका बरतन’’ कविता में एक गृहणी की दिनचर्या का बहुत ही बारीकी से दृश्यांकन प्रस्तुत करती है। यह कविता अपने आप में एक सुंदर दृश्यचित्र रचती है। जिसमें सूरज उगने से पूर्व और सूरज डूबने के बाद के रात के पहरों तक की कार्यप्रणाली को व्यक्त की गई है -
सूरज के लाल होकर 
झांकने से पहले, 
जल जाती है 
उसके कर्मों की आग 
बाबूजी की चाय 
अम्मा का काढ़ा 
मुन्नी और बबलू का 
ककहरा-पहाड़ा
सब अपने-अपने 
बर्तनों में उबलने लगते हैं।
छोटी ननद की अंगड़ाई 
पियाजी की तन्हाई वाला 
बर्तन कोई नहीं देखता...
जैसे-जैसे सूरज की किरणें 
धरा पर पड़़ती जाती है। 
उसके कर्मों की परिधि 
भी बढ़ती जाती हैं।
नई कविता की अपनी अनेक चुनौतियां होती हैं। जिनमें सबसे बड़ी चुनौती इासे सपाटपन से बचाना और शब्दों का सही चयन है। इस सम्बन्ध में डॉ. नगेन्द्र के विचार बहुत सटीक है, उनके अनुसार- ‘‘जहां पूर्ववर्ती कवि बौद्धिकता की अभिव्यक्ति रागात्मकता के माध्यम से करते थे, वहां इन्होंने (नई कविता वालों ने) रागात्मक तत्त्व के लिए बौद्धिकता को अपनाकर क्रम-विपर्यय का उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है! दूसरे, इसमें भाषा का सर्वथा वैयक्तिक प्रयोग किया गया है।’’ प्रयोगवादी कवि शब्दों को प्रचलित अर्थ में ग्रहण करना उचित नहीं समझता! वह शब्द के साधारण अर्थ में बड़ा अर्थ भरना चाहता है और इसी प्रयास में वह साधारण अर्थ को भी खो देता है!’’ अजयश्री ने शब्दों के चयन में पर्याप्त सावधानी बरती है। उनके शब्द गुरुतर अर्थ के साथ वही भावबोध रखते हैं जो वे पाठकों के समक्ष रखना चाहते हैं। इस बिन्दु पर अजयश्री अपनी कविताओं को उस भय से मुक्त रखते हैं जिसे डॉ. नगेन्द्र ने प्रकट किया था। इसी तारतम्य में अजयश्री की ‘‘जी गया वो’’ महत्वपूर्ण है-
आज मर गया वो
हां, सचमुच मर गया...
पहली बार नहीं मरा 
काफी दिनों से ही मर रहा
सबसे पहले जन्म लेते ही मरा
कृश-काया झूलती छातियों में
श्वेत अमृत नहीं रक्त बहा
जब खेलना शुरू किया फिर मरा
अमीरी गरीबी ऊंच-नीच के बीच
पढ़ना चाहा तो बाल मजदूरी और
लाचारी ने मारा
विवाह हुआ तो रस्मो रिवाज
दुनियादारी ने मारा
उम्र ढली तो परिस्थितियों और
स्वार्थों ने मारा
सबकी जुबां पर बस ये ही
काश मर जाता..!
आज मर गया जिंदगी से हारा
पर जी गया मरते ही बेचारा...।
कवि ने रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी बातों को भी अपनी कविता में बड़े विस्तार से स्थान दिया है। जैसे ‘‘चप्पल’’ कविता को ही ले लीजिए। इसकी चार पंक्तियां देखिए-
अस्तित्व में आते ही
आ जाती हैं चप्पलें
उम्र भर रहता है
उनका साथ।
चाहे राजनेता  हो अथवा स्वर नाम धन्य बड़ा नाम कहलाने वाले साहित्यकार अक्सर यथार्थ को महसूस किए बिना यथार्थ के पक्ष में झूठी बातें करके तालियां बटोरने का काम करते हैं। जनजीवन से सरोकार रखने का  ढोंग करने  वाले ऐसे लोगों को  कवि ने ललकारा है। ‘‘आसमान पर’’ शीर्षक कविता में कवि ने लिखा है-
लकीर खींचने वालों
पहले धरती पर
पैर  तो टीका लो
कद बढ़ जाने से
सोच का विस्तार नहीं होता
बनना है अगर इंद्रधनुष
तो पहले रंगों की
भाषा को समझो।
वस्तुतः अजयश्री अभिव्यक्ति के अपने मौलिक मुहावरे गढ़ते हैं और उन्हें कविता में पिरो कर वर्तमान को रेखांकित करते हैं। जैसे ‘‘दिल सहम जाता है’’ कविता में वे लिखते हैं-चार लोग एक कमरे में/ और सन्नाटा छा जाता है/सब खो जाते हैं अपने-अपने सचल दूरभाष यंत्र में’’। वास्तविक संवाद को त्याग कर आभासीय संवाद में खोने का यह दृश्य देख कर कवि का सहमना स्वाभाविक है। इसी तरह के कई बिम्ब कवि ने अपनी कविताओं में सहेजे हैं जो उनके कवित्व की गंभीरता से परिचित कराते हैं। अजयश्री ने अपनी कविताओं के द्वारा संवाद का नया पाठ गढ़ा है जो जीवन की सच्चाइयों से पलरयन करने का नहीं अपितु उसका सामना करने का आह्वान करता है। काव्य संग्रह ‘‘चौका-बरतन’’ हर पाठक से संवाद करने में सक्षम है, पठनीय है और चिंतन की प्रचुरता से परिपूर्ण है।  
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Tuesday, August 31, 2021

पुस्तक समीक्षा | शुभाकांक्षाओं से संवाद करती काव्य रचनाएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 31.08. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवयित्री जयन्ती खरे 'जया' के काव्यसंग्रह "सस्मिता" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
शुभाकांक्षाओं से संवाद करती काव्य रचनाएं 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - सस्मिता
कवयित्री    - जयन्ती खरे ‘‘जया’’
प्रकाशक    - साहित्य सदन, जया भवन,तिली अस्पताल रोड, तिली वार्ड, सागर (म.प्र.)
मूल्य       - 80/-
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एक  लोरी  जगी  थी सुलाने मुझे 
किन्तु लोरी स्वयं जागरण बन गई।

इन पंक्तियों की कवयित्री जयन्ती खरे ‘‘जया’’ का सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह ‘‘सस्मिता’’ सुंदर भावनाओं की एक हृदयग्राही प्रस्तुति है। ‘‘सस्मिता’’ का अर्थ होता है मुस्कुराहट सहित और संग्रह की कविताएं एक मुस्कुराहट की तरह हृदय को प्रफुल्लित करने में समर्थ हैं। कवयित्री जयन्ती खरे ‘‘जया’’ का जन्म 18 जुलाई 1944 को हुआ था और 27 अगस्त 2008 को उन्होंने इस संसार से विदा ले ली। किन्तु अपनी कोमलकांत रचनाओं के रूप में सदा के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा गई हैं। इस संग्रह की काव्य रचनाओं की चर्चा के पूर्व इसके एक संवेदनशील पक्ष पर ध्यान देना आवश्यक है कि इसे जयन्ती खरे के जीवनसाथी जगदीशचंद्र श्रीवास्तव ने प्रकाशित कराया है ताकि वे अपनी अद्र्धांगिनी के काव्यात्मक पक्ष को सहेज सकें। पाठकों और साहित्यप्रेमियों तक पहुंचा सकें। निश्चितरूप से यह कार्य प्रशंसनीय है क्योंकि वर्तमान समय असंवेदनशील हो चला है, पारिवारिक विखंडन बढ़ रहा है, छोटी-छोटी बातों में ‘‘ब्रेकअप’’ हो जाते हैं, पारस्परिक संबंधों को दीर्घ समय तक प्रेमपूर्ण बनाए रखना कठिन हो चला है। भावनात्मक दृष्टि से ऐसे विपरीत समय में ‘‘सस्मिता’’ काव्य संग्रह पारस्परिक संबंधों में उष्मा संचरण का कार्य कर सकता है। इस संग्रह की रचनाएं एक अलग ही धरातल पर शब्द-संसार रचती हैं।
‘‘सस्मिता’’ का तानाबाना जयन्ती खरे ‘‘जया’’ ने अपने जीवनकाल में ही बुनना आरम्भ कर दिया था। जोकि उनके द्वारा लिखी गई प्रस्तावना से स्पष्ट होता है। उन्होंने संग्रह की प्रस्तावना में लिखा है कि-‘‘यह काव्यकृति प्रस्तुत करते हुए प्रफुल्लित हूं। विद्या देवी के पावन मंदिर में इसे आरती स्वरूप मानिए। जीवन का स्वर्णकाल छात्राओं के बीच बीता। उनकी बाल्यावस्था की प्रच्छाया का मैंने पूर्ण आनन्द लिया। विद्याधन के अतिरिक्त घरेलू जीवन के सुसंस्कार भी उन्हें सौंपे। शैक्षणिक जगत में माता सरस्वती का सानिध्य निरंतर मिलता रहा। भावनाओं केउद्वेलन ने लिखने का सामथ्र्य दिया, काव्यधारा प्रस्फुटित हुई। यह एक सहज प्रभाव रहा। वैसे काव्य लेखन मुझे विरासत में मिला। मेरे पूज्य पिता श्री अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ प्रदेश के प्रख्यात साहित्यकार रहे। यही गुण ग्राह्यता मुझमें रही। अपने परिवेश में जो देखा, सुना, अनुभूत किया, उसी की प्रच्छाया ही मेरा काव्य लेखन है।’’

कवयित्री जयन्ती खरे के पिता अम्बिका प्रसाद ‘‘दिव्य’’ एक उच्चकोटि के साहित्यकार थे। उन्होंने कविताए,ं कहानियां, उपन्यास लिखे साथ ही चित्रकारी में भी उनका रुझान था। ‘‘खजुराहो की अतिरूपा’’ उनकी एक प्रसिद्ध कृति है। ऐसे विद्वत साहित्यकार की पुत्री होते हुए कोमल संवेदनाओं का जयंती खरे में पाया जाना स्वाभाविक था। लेकिन जयन्ती खरे ने अपने पिता की लेखकीय छाया को अपने ऊपर नहीं पड़ने दिया, बल्कि अपने अनुभवों को सहेजते हुए अपना स्वतंत्र कल्पनालोक रचा। लेकिन अपने जीवनकाल में वे अपने इस संग्रह को प्रकाशित नहीं करा सकीं। उनके निधन ने उनके परिवार पर वज्राघात किया और सबकुछ मानो बिखर गया। पुस्तक प्रकाशित कराने के विचार के संबंध में उनके पति जगदीशचंद्र श्रीवास्तव ने लिखा है कि -‘‘एक लम्बी शोकावधि व्यतीत करने के उपरान्त बड़े यत्न से जयन्ती जी की डायरी में लिखी हुई तथा यत्र-तत्र बिखरी हुई रचनाओं को समेट, सहेजकर एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने का मेरे मन में विचार आया।’’ वे पुस्तक के नामकरण के संबंध में जानकारी देते हैं कि ‘‘मैं अकसर जयंती जी के मुख से सुनता रहता था कि बेटी सस्मिता मैं तेरे ही नाम का काव्य संग्रह छपवाऊंगी, जिसका ‘सस्मिता’ काव्य संग्रह नाम रखूंगी। लेकिन इसके पहले ही असमय काल के ग्रास में समा गई, मैंने उनके इस कथन को पूर्ण करने का प्रयास किया।’’ इस तरह देखा जाए तो यह पुस्तक पारिवारिक अंतर्संबंधों की प्रगाढ़ता की काव्यात्मक प्रतीक है।
‘‘सस्मिता’’ काव्य संग्रह की भूमिका लिखी है वरिष्ठ कवयित्री, समीक्षक एवं स्तम्भकार डाॅ. वर्षा सिंह ने। उन्होंने लिखा है-‘‘ कवयित्री जयन्ती खरे जया के काव्य में वह समग्रता दिखाई देती है जो उनकी रचनाओं की काव्यात्मकता को विश्वसनीय बनाती है। यूं तो जयन्ती जी से मेरा घनिष्ठ पारिवारिक परिचय रहा है किन्तु उनके भीतर की कवयित्री को मैंने तब जाना और समझा जब सन् 1997 में दैनिक भास्कर के सागर संस्करण के लिए मेरी माता जी डाॅ. विद्यावती मालविका ने ‘सागर संभाग की कवयित्रियां’ शीर्षक धारावाहिक लेखमाला में जयन्ती जी के काव्यपक्ष को बड़ी बारीकी से रेखांकित किया।’’ डाॅ. वर्षा सिंह जयन्ती खरे के रचनाकर्म के बारे में आगे लिखती हैं कि ‘‘सस्मिता काव्य संग्रह जयन्ती जी की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का पिटारा है। इस संग्रह की काव्य रचनाएं छायावाद से प्रयोगवाद तक की यात्रा को स्पर्श करती हैं। उन्होंने अपने काव्य के केन्द्र में स्त्री को रखते हुए सौंदर्यबोध, प्रकृति चित्रण, पारिवारिक परिवेश, सामाजिक मूल्यवत्ता तथा सांस्कृतिक समन्वय को महत्व दिया है।’’

जयन्ती खरे की कविताओं को पढ़ते हुए जयशंकर प्रसाद युगीन छायावाद का सहसा स्मरण हो जाता है। कोमल भावनाओं को कोमल शब्दों को पिरोना जयन्ती खरे की उन कविताओं को छायावादी सांचे में उतार देता है जिनमें वे मनोउद्गार व्यक्त करने के लिए प्रकृति के तत्वों को आधार बनाती हैं। यह पंक्तियां देखिए-
कि जब कविता करती अभिसार
किरण दल छिपने लगता है
कि रवि शरमाने लगता है।
उषा आती है घूंघट डाल
नील अम्बर का बना दुकूल
डुलाता अंचल मंद समीर
ऋतु सुऋतु बन जाती अनुकूल
सघन छाया वन से गिरिराज
चंदेवा कसने लगता है
पथिक सुख पाने लगता है।

छायावादी काव्य में व्यक्तिगत भावनाओं की प्रधानता है। वहां कवि अपने सुख-दुख एवं हर्ष-शोक को ही वाणी प्रदान करते हुए खुद को अभिव्यक्त करता है। यहां सौन्दर्य का अभिप्राय काव्य सौन्दर्य से नही, सूक्ष्म आतंरिक सौन्दर्य से है। बाह्य सौन्दर्य की अपेक्षा आंतरिक सौन्दर्य के उद्घाटन मे उसकी दृष्टि अधिक रमती है। प्रकृति पर मानव व्यक्तितत्व का आरोप छायावाद की एक प्रमुख विशेषता है। छायावादी कवियों ने प्रकृति को अनेक रूपों मे देखा है। छायावाद नामकरण का श्रेय मुकुटधर पाण्डेय को जाता है. हिन्दी साहित्य के आधुनिक चरण मे द्विवेदी युग के पश्चात हिन्दी काव्य की जो धारा विषय वस्तु की दृष्टि से स्वच्छंद प्रेमभावना, प्रकृति मे मानवीय क्रियाकलापों तथा भाव-व्यापारों के आरोपण और कला की दृष्टि से लाक्षणिकता प्रधान नवीन अभिव्यंजना-पद्धति को लेकर चली, उसे छायावाद कहा गया। जयशंकर प्रसाद ने छायावाद की व्याख्या इस प्रकार की हैं-‘‘छायावाद कविता वाणी का वह लावण्य है जो स्वयं मे मोती के पानी जैसी छाया, तरलता और युवती के लज्जा भूषण जैसी श्री से संयुक्त होता है। यह तरल छाया और लज्जा श्री ही छायावाद कवि की वाणी का सौंदर्य है।’’ इस तारतम्य में जयन्ती खरे ‘‘जया’’ के इस गीत का अंश देखिए कि कितनी सुंदरता से उन्होंने छायावादी प्रवृतियों को अपनाया-
मैं प्रतिबिम्ब बनी दुनिया की
दुनिया भरी समेट हृदय में।
जब आया आनंद कहीं से
मानस में सागर लहराया
ज्वार उठे उत्तुंग गगन को
मन में मन भी नहीं समाया
मैं प्रतिबिम्ब बनी सागर की
सागर भरा समेट प्रणय में।

छायावादी काव्य मे वेदना और करुणा की अधिकता पाई जाती है। छायावादी कवियों ने जीवन के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है। इसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद है। सम्पूर्ण जगत मानव चेतना से स्पंदित दिखाई देता है। यही विशेषता जयंती खरे की काव्य रचनाओं में भी देखी जा सकती है-
मैं गीत बनाती उन भावों के
जिनको कहीं न भवन मिले।
भटक रहे जो अंतरिक्ष में
जिनकी कोई रूप न रेखा
जिनने देखा नहीं विश्व को
नहीं विश्व ने जिनको देखा
मैं मूर्ति बनाती उन सपनों की
जिनको कहीं न नयन मिले।

जयन्ती खरे ने देशभक्ति की कविताएं भी लिखीं। उनकी कविताओं में मातृभूमि भारत का स्नेहिल गुणगान है। देश की प्रतिष्ठा को सम्पूर्ण विश्व के ऊपर देखने की इच्छा उनकी कविता में परिलक्षित होती है। उनकी ये पंक्तियां देखिए-
भारत के अनुरूप बनेगें हम उसके श्रृंगार
उच्च बनेंगे हिमगिरि जैसे, चूमेंगे आकाश
खड़े दिखेंगे पृथक सभी से, करके पूर्ण विकास
देवों से हम बात करेंगे, देखेगा संसार

जयन्ती खरे ‘‘जया’’ की काव्य रचनाएं देश के प्रति, जगत के प्रति, प्रत्येक मानव के प्रति, प्रकृति के प्रति तथा स्वयं के प्रति शुभाकांक्षाओं से संवाद करती रचनाएं हैं। ‘‘सस्मिता’’ काव्य संग्रह की सभी रचनाएं मन को बहुत स्नेह से स्पर्श करती हैं और फिर पढ़ने वाले को अपना बना लेती हैं। जयन्ती खरे के भावसंसार को समझना और उसमें सकारात्मक भाव बनाए रखना ही उनकी कविताओं के मर्म को समझने का मनस्वी मार्ग है। माधुर्य और बिंब-प्रतिबिंब छायावादी प्रभावयुक्त होते हुए भी समसामयिकता से सुगमता से जुड़ जाते हैं। ऐसा मधुर काव्यसृजन आजकल बिरले ही देखने को मिलता है। संग्रह की कविताएं अपनी प्रवाहमयी, लयात्मक भाषा-शैली के माध्यम से गुनगुनाते हुए हृदय-मार्ग से भीतर तक उतर जाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मानवीय चेतना के पक्षधर पाठकों को यह पसंद आने योग्य काव्यसंग्रह है।
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Friday, April 26, 2019

मतदाता जागरूकता पर आयोजित संवाद में डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019
25.04.2019 को नवदुनिया समाचार पत्र द्वारा आयोजित संवाद कार्यक्रम में श्री मनोहर दुबे आयुक्त सागर संभाग की अध्यक्षता में नगर के प्रबुद्ध नागरिकों ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के संबंध में व्यक्तिगत रूप से किए जा रहे प्रयासों के बारे में चर्चा की जिसमें मैंने भी अपने प्रयासों का विवरण देते हुए अपने विचार साझा किए। तस्वीरें तथा समाचार उसी अवसर के....  
 हार्दिक धन्यवाद नवदुनिया !!!
Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Dr (Miss) Sharad Singh at Navdunia Matdada Jagrukta Samvad, 25.04.2019

Friday, September 22, 2017

चर्चा प्लस ... मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’ क्या रचेगा नया इतिहास ? - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 
मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’
क्या रचेगा नया इतिहास ? 

- डाॅ. शरद सिंह

(मेरा कॉलम 'सागर दिनकर' में 20.09.2017)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22 सितम्बर को अपने संसदीय क्षेत्र बनारस पहुंचने वाले हैं। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम के अंतर्गत बातचीत करेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए तरक्की के कई नए रास्ते खोलेगा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

लगभग 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिला सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी। इसके बाद 24 अक्तूबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर पहली बार अपनी राय सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश में ’महापरिवर्तन रैली’ के दौरान बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि - ‘‘हमें अपनी बेटियों, मांओं और बहनों को बचाना ज़रूरी है, इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए। मांओं और बहनों का सम्मान करना चाहिए। अब ये ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा आ गया है. जैसे कोई हिंदू, कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में लिप्त होता है तो उसे जेल जाना पड़ता है उसी तरह से मेरी मुसलमान बहनों का क्या अपराध कि कोई फ़ोन पर तलाक़ कह देता है और उनकी ज़िंदगी तबाह हो जाती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है कि महिलाओं पर किसी तरह की ज़्यादती नहीं होनी चाहिए और धर्म के आधार पर किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में बातचीत होनी चाहिए। सरकार ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी है। वो लोग जो ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहते हैं, ऐसे लोग जनता को भड़का रहे हैं। हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी ट्रिपल तलाक़ से बर्बाद होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कुछ पार्टियां वोट बैंक की ख़ातिर 21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति अन्याय करने पर उतारू हैं। ये किस तरह का इंसाफ़ है। राजनीति और चुनाव की अपनी जगह है लेकिन मुस्लिम महिलाओं को संविधान के मुताबिक़ अधिकार देना सरकार की और देश के लोगों की ज़िम्मेदारी है। तलाक़ के मुद्दे पर बहस में मुस्लिम समुदाय के उऩ पढ़े लिखे लोगों को हिस्सा लेना चाहिए जो क़ुरान की अच्छी जानकारी रखते हों। मुस्लिम समुदाय में भी प्रगतिशील सोच रखने वाले पढ़े लिखे लोग हैं। शिक्षित मुस्लिम महिलाएं भी इस मुद्दे पर अपने विचार रख सकती हैं।’’
तमाम मतभेदों के बावजूद भी विरोधी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शायद आज भी नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और के नेतृत्व की सरकार होती तो इस प्रकार का फैसला नहीं आ पाता क्योंकि जिस दृढ़ता के साथ केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखा, उससे सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में और भी आसानी हो गई। केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम अदालत में अपना पक्ष दृढ़ता पूर्वक रखते हुए कहा था कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों। ’’शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकारी के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए। तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।’’
तीन तलाक के प्रकरण में हुआ फैसला इस लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष को मजबूती देता है क्यों कि लोग अभी शाहबानो प्रकरण को भूले नहीं हैं। राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानून बनाकर पलट दिया था। मध्य प्रदेश के जिला इंदौर की शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने सन् 1978 में तलाक दे दिया था। तलाक के समय शाहबानो के पांच बच्चे थे। इनके भरण−पोषण के लिए उन्होंने निचली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया, बाद में यह मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सभी जगह शाहबानो के ही पक्ष में फैसले सुनाए गए। उस समय मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी पुरुष समुदाय शाहबानो की अपील का विरोध किया। विरोध के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया, जिसमें शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया गया। इस कानून में कहा गया था, ’हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।’ उस समय राजीव गांधी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसीलिये उच्चतम न्यायालय के धर्म−निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इसके आधार पर शाहबानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला संसद ने पलट दिया।
22 अगस्त 2017 को जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया तब शाहबानो के बेटे जमील अहमद ने उन दुख भरे दिनों को याद करते हुए कहा था कि ‘‘38 साल पहले जब कोर्ट ने अम्मी (शाहबानो) को भरण−पोषण के 79 रुपए अब्बा से दिलवाए थे, तो लगा था जैसे दुनिया भर की दौलत मिल गई, जो खुशी उस समय मिली थी, वही आज फिर महसूस हो रही है। जब फैसले को लेकर विवाद बढ़ने लगा तो अम्मी इतनी आहत हुईं कि उन्होंने भरण पोषण की राशि ही त्याग दी। अब ऐसा नहीं हो पायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा कर मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। जो मशाल 38 साल पहले अम्मी ने जलाई थी, उसकी रोशनी आज पूरे देश और समाज को रोशन कर रही है।’’
बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के समाज हित में यह बात स्वीकार की जा सकती है कि उस समय मोदी की सरकार होती तो शायद मुस्लिम महिलाओं को 40 वर्षों तक यूं भटकना नहीं पड़ता। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के मुस्लिम वोट के किले में सेंध लगा दी है। लेकिन यदि महिलाओं के मानवीयहित को ध्यान में रखा जाए तो इस प्रकार की राजनीति में बुरा क्या है जब इससे किसी बड़े पक्ष को बुनियादी अधिकार मिल रहा हों।
इस तारतम्य में 22 सितम्बर 2017 को बनारस में होने वाले संवाद कार्यक्रम को देखा जा रहा है। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाके के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। यद्यपि वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख समाचार ऐजेंसियों के अनुसार मुस्लिम बाहुल शक्करतालाब इलाके में कट्टरपंथियों के सक्रिय होने से महिलाओं को धमकाने का दौर शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ’संवाद’ कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम महिलाओं को धमकाए जाने का मामला सामने आया। कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छुक महिलाओं को कट्टरपंथी घर-घर जाकर मारने-पीटने के साथ सामाजिक बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं। यह जानकारी स्वयं मुस्लिम महिला फाउंडेशन की महिला कचहरी में सामने रखी गई। प्रशासन को भी इस बारे में जानकारी दी जा चुकी है।
वरुणापार इलाके में रविवार को मुस्लिम महिला फाउंडेशन की ओर से आयोजित महिला कचहरी में शामिल हुई शबाना ने बताया कि कट्टरपंथियों के इशारे पर युवकों की टोली घरों में बार-बार जाकर महिलाओं को पीएम कार्यक्रम में न जाने की बात कह धमका रही है। गुड़िया, रेशमा, शहनाज और आफरीन के अलावा एक दर्जन अन्य महिलाओं ने भी धमकाए जाने की जानकारी दी। महिलाओं ने बताया कि धमकी देने वाले कह रहे हैं कि मोदी कार्यक्रम के दिन घर से बाहर कदम रखते ही हाथ-पैर तोड़ दिया जाएगा। इस पर मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने महिला कचहरी में कहा कि धमकी देने वाले कायर हैं। मुस्लिम महिलाएं जागरुक हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर वे अपनी परेशानी जरूर बताएंगी। इस मसले पर सर्वसम्मति से तय किया गया ज्यादा से ज्यादा महिलाएं हर कीमत पर प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगी। धमकी देने वालों के खिलाफ लिखित रिपोर्ट एसएसपी को दी जाएगी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सेवा प्रमुख डा. राजीव श्रीवास्तव का कहना है कि धमकी देकर मुस्लिम महिलाओं में डर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के ‘‘संवाद कार्यक्रम’’ के प्रति उत्साही मुस्लिम महिलाओं का साहस देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। एक ओर भारतीय मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष दूसरी ओर सरकार की महिलाओं के हित में सकारात्मक सोच और तीसरी भारतीय न्यायायिक व्यवस्था का मानवीय दृष्टिकोण - इन तीनों ने शक्तियों ने मिल कर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में ‘तीन तलाक’ से मुक्ति का जो द्वार खोला है वह उन महिलाओं के सुखद और सुरक्षित भविष्य की ओर एक बड़ा और मज़बूत क़दम है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रगति के नए द्वार खोलेगा और रचेगा नया इतिहास।
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Monday, January 18, 2016

डॉ. शरद सिंह के उपन्यास ‘‘कस्बाई सिमोन’’ पर पाठक मंच, सागर द्वारा एक सफल संवाद का आयोजन ...

मेरे उपन्यास ‘‘कस्बाई सिमोन’’ पर पाठक मंच, सागर द्वारा एक सफल संवाद का आयोजन किया गया... 17.01.2016
On my novel "Kasbai Simon"..... a successful review & discussion organised by Pathak Manch, Sagar -17.01.2016

Dr Sharad Singh novel Kasbai Simon... a successful review & discussion  organised by Pathak Manch, Sagar -17.01.2016

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