पुस्तक समीक्षा
ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- चलो ढूंढें जवाब अपने
कवि - कृष्ण बक्षी
प्रकाशक - बोधी प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006
मूल्य - 150/-
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हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में कृष्ण बक्षी की एक विशेष पहचान है। जीवन से उनके गहरे सरोकार रहे हैं जो उनकी ग़ज़लों में साफ़ देखे जा सकते हैं। यूं भी ग़ज़ल साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जिसके प्रत्येक शेर अपनी लयात्मकता के साथ स्वतंत्र संवाद करता है। इसलिए एक ग़ज़ल ही अपने आप में जीवन की पूरी कथा कह सकती है बशर्ते कहने वाले ने ग़ज़ल को पूरी तरह साधा हो। कृष्ण बक्षी वे ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल को न केवल साधा बल्कि उस पर अपनी छाप भी छोड़ी। ‘‘चलो ढूंढें जवाब अपने’’ कृष्ण बक्षी का एक ऐसा ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी ग़ज़लें जीवन के अनुत्तरित रह जरने वाले सवालों के जवाब ढूंढती दिखाई देती हैं। आधुनिक जीवन में जटिलताओं की कमी नहीं है। रोजी-रोटी की समस्या, सिर पर छत की समस्या, बच्चों के लालन-पालन की समस्या। उस पर भी कुछ समस्याएं इंसान स्वयं पैदा कर लेता है जैसे जाति, धर्म, रंग और समुदाय के भेद की समस्या। ऐसा क्यों होता है? इंसान सुकून पाना चाहता है लेकिन अपनी मुश्क़िलें भी खुद ही बढ़ाता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसे ही ‘क्यों’ का जवाब ढूंढती है कृष्ण बक्षी की यह ग़ज़ल-
न दरिया में रवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अलहदा कैसे कर दोगे रगों में सबकी बहता है
जो खूं हिंदोस्तानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवां पीढ़ी
भटकती-सी जवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
- ये अशआर हैं शायर कृष्ण बक्षी की गजल ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ से। यह ग़ज़ल उनके जिस ताजा ग़जल संग्रह में संग्रहीत है, उसका नाम भी है ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’।
वर्तमान परिदृश्य देखते हुए कवि कृष्ण बक्षी महसूस करते हैं कि समाज में हर स्तर पर हर ओर प्रश्नों का अंबार लगा हुआ है, जिनका जवाब ढूंढें बिना हल नहीं निकाला जा सकता है। जो प्रश्न अव्यवस्थाओं को देखकर, असंवेदनाओं को देखकर और विसंगतियों को देखकर मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, वही व्याकुलता का कारण बनते हैं। इसलिए भी उनका जवाब ढूंढना ज़रूरी है। यूं भी प्रश्नों से घिरा हुआ समाज कभी सही ढंग से विकास नहीं कर पाता है।
ग़म ही रह जाते हैं अक्सर गुनगुनाने के लिए
छोड़ देता है कोई जब टूट जाने के लिए
छीन कर के चुलबुल आपन ले गए सारी हंसी
तुमने छोड़ी तक खुशी न मुस्कुराने के लिए
इसी ग़ज़ल में जो कि आरंभ में इश्क़िया गजल होने का एहसास कराती है, वहीं आगे के शेर ज़िंदगी की पथरीली सच्चाइयों से सामना कराते हैं। जैसे ये शेर हैं-
पी गया है चिमनी यों का उनको जहरीला धुआं
घर से जो मजदूर निकले कारखाने के लिए
खूब इस्तेमाल तुमने कर लिया आवाम का
काम आया है फ़क़त जो सर झुकाने के लिए
कवि ने सत्ता के खोखले वादों और दावों पर जहां तंज कसा हैं, वहीं सत्ता के इर्द-गिर्द झूठ के मायाजाल को भी उजागर किया है। एक ऐसा मायाजाल जो आमजन को वोटर संख्या अथवा सभाओं की भीड़ से अधिक कुछ नहीं मानती है। कवि कृष्ण बक्षी की गजलों में भाषाई समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। प्रचलन में मौजूद शब्दों और मुहावरों को बड़ी सुंदरता से और सटीकता से अपने शेरों में पिरो देते हैं। जैसे यह गजल है ‘‘सभाओं ने हमें’’ -
हर कसौटी पर कसा है विपदाओं ने हमें
खूब जांचा खूब परखा आपदाओं ने हमें
सिर्फ हम मोहरे रहे जलसे, जुलूसों के
दांव पर रक्खा हमेशा ही सभाओं ने हमें
साजिशों वाली अंधेरी कोठरी में क्यूं
बांध रक्खा है अभी तक बादशाहों ने हमें
इस संग्रह की ग़ज़लें अपने प्रश्नों के जवाब मांगने के साथ ही हमारे आसपास रच-बस गए झूठ को बखूबी रेखांकित करता है। और हमें आगाह करने का प्रयास करता है कि हमें ज़रूरत है अपने स्वार्थ की गहरी नींद से जागने की। यूं तो शायरी का नाता प्यार-मोहब्बत, ग़म, शिक़ायत, दोस्ती, दुश्मनी आदि इन सब से बहुत क़रीब कर रहा है। लेकिन जब कृष्ण बक्षी अपनी शायरी में दोस्ती दुश्मनी की बात करते हैं तो उनका अंदाज निराला होता है बानगी देखिए -
दर्द अक्सर जब मुझे पहचान लेता है
बिन सबूतों के ही दुश्मन मान लेता है
बात उठते ही वो मेरे इन सवालों की
पांव से सर तक वो चादर तान लेता है
यह व्यवस्था ही बहुत है जान लेने को
जहर का तू किसलिए एहसान लेता है
दर्द पर ही एक ग़ज़ल के कुछ और शेर देखिए जिनमें आंतरिक पीड़ा के साथ ऐतिहासिक उद्धरण का सुंदर सामंजस्य है-
ज़ख्म मेरे आज मुझसे बात करने पर तुले हैं
और उस पर दर्द तहक़ीक़ात करने पर तुले हैं
सांझ के सूरज बचा कर रख ज़रा सी रोशनी
वक्त से पहले सितारे रात करने पर तुले हैं
वह हमारे दौर का ही आम सा इंसान है
आप आखिर क्यों उसे सुकरात करने पर तुले हैं
यह माना जाता है कि बड़े बहर की ग़ज़लें कहने से अधिक कठिन होता है छोटी बहर की ग़ज़लें कहना। सच भी है कि कम से कम शब्दों में सब कुछ कह देना एक साहित्यिक कला ही तो है। जो इस कला में पारंगत हो जाता है, वह आसानी से छोटे बहर की सटीक ग़ज़लें भी कह लेता है। इस संग्रह में बड़े बहर के साथ छोटे बहर की भी कई खूबसूरत गजलें हैं। जैसे यह एक गजल है ‘‘रोज़ मरते हैं’’ -
हम जिसे बहुत प्यार करते हैं
उसकी नाराज़गी से डरते हैं
जिनको होता है खौफ लहरों का
सिर्फ पानी में वो उतरते हैं
चल मोहब्बत से पूछ कर देखो
हम ही करते हैं कि वो भी करते हैं
छोटी बहर की ही एक और ग़ज़ल है जो आजकल के अव्यवस्था भरे माहौल पर तीखा कटाक्ष करती है। शेर देखें -
नए-नए रास्ते निकाल के
ढूंढ रहे हैं हल सवाल के
ग्रामसभा से लौटे हैं वो
कुछ ताजा मुद्दे उछाल के
आपके घर के बदलो बंधु
बूढ़े कैलेंडर दीवाल के
कवि कृष्ण बक्षी का गीत गजल की दुनिया में एक लंबा अनुभव रहा है। वे अपनी गजल में जो कुछ कहना चाहा उसे बखूबी कहने की महारत रखी। भाषा भी सरल है, आमबोलचाल की भाषा। इसीलिए कृष्ण बक्षी की गजलें, उसे पढ़ने या सुनने वाले से सीधा संवाद करने की ताकत रखती है। ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ संग्रह की तमाम ग़ज़लें शिल्प के लिहाज़ से मुक़म्मल हैं, विचारों को उद्वेलित करती हैं और पठनीय हैं।
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