Tuesday, August 25, 2026

पुस्तक समीक्षा | मनस्वी बुद्धिप्रकाश सारावगी के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालता स्मृतिग्रंथ | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा      
मनस्वी बुद्धिप्रकाश सारावगी के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालता स्मृतिग्रंथ
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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स्मृति ग्रंथ - मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा
संपादक   - प्रो. सरोज गुप्ता, सुमति कुमार जैन
प्रकाशक    - प्रलेक प्रकाशन, 702, जे-50, ग्लोबल सिटी, विरार वेस्ट, मुंबई, महाराष्ट्- 401303
मूल्य       - 999/-
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जीवन में संस्कारों का सबसे अधिक महत्व होता है। विशेष रूप से उन संस्कारों का जो हमें अपने माता-पिता से मिलते हैं। यही संस्कार पितृऋण का भी स्मरण कराते हैं। सनातन धर्म और वेदों के अनुसार पितृऋण हमारे माता-पिता और पूर्वजों का वह कर्ज है, जो हमें जीवन, संस्कार और वंश परंपरा देने के कारण हम पर होता है। इस ऋण को मनुष्य का जन्मजात ऋण माना गया है। वेदों में पितृों को इंद्र, दक्ष, मरीचि और सप्तर्षियों के भी मार्गदर्शक कहा गया है-
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।। 
अर्थात, जो पूजनीय हैं, अमूर्त (सूक्ष्म रूप में) हैं, और जिनका तेज प्रदीप्त है, उन ध्यानी और दिव्यदृष्टि संपन्न पितरों को सदा नमस्कार है। जो इंद्र, दक्ष, मरीचि और सप्तर्षियों तथा अन्य महान संतों के भी मार्गदर्शक व प्रणेता हैं, और सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हैं, उन सभी पितृ देवताओं को सादर नमन है।
इसी भावना के साथ विरल व्यक्तित्व के धनी पितृ पुरुष बुद्धिप्रकाश सरावगी पर एक स्मृति ग्रंथ का प्रकाशन किया गया है जिसका संपादन एवं प्रकाशन उनकी पुत्री प्रो. सरोज गुप्ता ने सुमति कुमार जैन के संपादन सहयोग से किया है। इस स्मृतिग्रंथ का नाम है-‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा (विरासत का संवाद: डायरी के पन्नों से)।

‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ - इस स्मृति ग्रंथ में बुद्धि प्रकाश सरावगी जी के जीवन के विभिन्न पक्षों पर समुचित प्रकाश डाला गया है जिससे उनके व्यक्तित्व की विशालता का स्पष्ट दर्शन होता है। इस पुस्तक में डायरी के पन्ने, पत्र, बुद्धि प्रकाश सरावगी जी व्यक्तित्व से संबंधित विभिन्न विद्वानों के विचार संस्मरण तथा उनकी रचनात्मक को साहेजा गया है। 224 पृष्ठ की पुस्तक के कलेवर को 12 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के ब्लर्ब पर डॉ रजनी गुप्ता एवं डॉ कुमकुम गुप्ता के विचार हैं। इसके साथ ही पुस्तक के संबंध में शुभकामनाओं सहित आचार्य प्रभु दयाल मिश्रा अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थान भोपाल, दीपक पालावत दीपज्योति ग्रुप का पब्लिकेशंस के मनोभाव रखे गए हैं। तदुपरांत संपादक द्वय सुमति कुमार जैन तथा प्रोफेसर सरोज गुप्ता के संपादकीय विचार हैं।

प्रो. सरोज गुप्त ने इस स्मृति ग्रंथ के आकार लेने की पूर्वपीठिका से परिचित कराते हुए अपने संपादकीय में लिखा है कि ‘‘जनवरी 2022 में चिरगाँव से प्रकाशित गहोई गरिमा पत्रिका का जनवरी विशेषांक पिताजी पर केन्द्रित रहा। गहोई गरिमा पत्रिका के विमोचन अवसर पर श्री हरगोविंद कुशवाहा, डॉ. एस आर गुप्ता, डॉ. सुरेन्द्र दुबे, डॉ. प्रदीप तिवारी, श्री रामप्रकाश हथनोरिया सहित गणमान्य विद्वत्जनों, साहित्यकारों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। सभी ने पिताजी से सम्बंधित संस्मरण सुनाये। इन संस्मरणों को सुनकर मुझे लगा कि पिताजी की हस्तलिखित डायरी के पन्नों को देखा जाये शायद कुछ मोती माणिक्य मिलें। गहोई गरिमा पत्रिका के विमोचन के पश्चात् मैंने पिताजी के लेखन पर गहन अध्ययन व चिंतन किया। चूँकि जगमग दीपज्योति पत्रिका के सम्पादक ने मुझे 2020 में पत्रिका के महिला विशेषांक का अतिथि सम्पादक बनाया तभी से आपसे साहित्यिक चर्चा होती रहती है मैंने आपको पिताजी का स्मृति ग्रन्थ भेजकर पिताजी की पुस्तक पर चर्चा की। आपने पुस्तक को न सिर्फ पढ़ा वरन् अपनी विरासत को संजोने की बात कहकर ‘‘उदारचेता मनस्वी श्री बुद्धि प्रकाश सरावगी जिन्हें शब्दों की शिरोरेखा से नहीं बांधा जा सकता’’ लेख लिखकर मुझे भेजा साथ ही जगमग दीपज्योति के मार्च 2024 के अंक में पहले पृष्ठ पर उसका प्रकाशन भी किया।’’

इस प्रकार इस स्मृति ग्रंथ स्वरूप पर मंथन आरंभ हुआ और विभिन्न लोगों के लेखकीय सहयोग से इस ग्रंथ को आकार मिला। ग्रंथ का नाम ‘‘विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ जगमग दीपज्योति के सम्पादक सुमतिकुमार जैन ने दिया। इस ग्रंथ में बुद्धि प्रकाश सरावगी के विविध छायाचित्र भी रखे गए हैं जिनसे उनके व्यक्ति की झलक मिलती है। अपने पिताश्री के संबंध में प्रो. सरोज गुप्ता ने लिखा है कि-‘‘उनको मैंने सदैव पारस्परिकता सामंजस्य और सर्वसामान्य सामूहिक विज्ञानमय जीवन जीते रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन में सम्पूर्ण सत्ता का अपनी मानसिक, प्राणिक और भौतिक सत्ता का रुपान्तरण किया। एक सर्वथा नवीन चेतना उनके कार्य व्यापार में लोगों ने देखी। पिताजी जहाँ जाते अप्रतिम छाप छोड़ते। असफलता उनसे कोसों दूर थी। दो दो स्कूलों के संस्थापक प्राचार्य होना, सारी व्यवस्था जादुई तरीके से करना। सबको अपनापन देकर कार्य का महत्व बताना। समाज व राष्ट्र का हित चिंतन करना उनके स्वभाव में रहा। इसीलिए समाज के मन-मस्तिष्क में वह आज भी स्मरणीय हैं। यह बात मैं अपने मन से नहीं वरन् वरिष्ठ जनों के मुख से पिताजी की प्रशंसा में सुनी सुनाई बातों के आधार पर कह रही हूँ। इस ग्रन्थ के संस्मरण लेख इसके गवाह हैं।’’

वैसे वस्तुतः किसी गवाह अथवा साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है क्यों कि माता-पिता के संस्कार उनकी संतानों में परिलक्षित होते हैं। प्रो. सरोज गुप्ता की धर्मनिष्ठा, कर्मठता एवं जीवन संस्कारों को देख कर ही उनके पिताश्री की श्रेष्ठता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह सुसंस्कार ही तो है कि प्रो. सरोज गुप्ता ने पिताश्री के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए उनकी स्मृति ग्रंथ का संपादन एव. प्रकाशन किया। यह एक सुरुचिपूर्ण ग्रंथ है जो वर्तमान को अतीत से जोड़ने में सक्षम है। इस ग्रंथ के माध्यम से हम उन जीवन मूल्यों से भलीभांति परिचित हो सकते हैं जो हमारे पितृ समय में रहे हैं। इस ग्रंथ में वे कविताएं भी हैं जिन्हें बुद्धिप्रकाश सरावगी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए लिखा गया है और जो उनके उस विराट व्यक्तित्व से परिचित कराते हैं जिनकी मन-मस्तिष्क पर आज भी छाप विद्यमान है। 

प्रथम अध्याय प्रांशु प्रसंगिका में ये भावोद्गार हैं-योग क्षेमो नः कल्पन्ताम् आचार्य पं. प्रभुदयाल मिश्र, शब्द शब्द झरता कुमकुम दीपक पालावत, हृदयोदगार सुमति कुमार जैन, सम्पादकीय प्रोफेसर सरोज गुप्ता। द्वितीय अध्याय श्रद्धा के पुष्प में जो लेख हैं वे इस प्रकार हैं- विरासत का संवाद -श्री ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, निकष - डॉ. आर.डी. मिश्रा, न दैन्यम् न पलायनम् - टीकाराम त्रिपाठी, साधक एक सकल सिधि देनी प्रो. ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव, श्रद्धा के दो शब्द - डॉ. शिरोमणि सिंह पथ, बहुमुखी प्रतिभा के धनी सरावगीजी - श्रीमती शशि शर्मा।
प्रशंसा पत्र में ‘‘उदारचेता मनस्वी श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी जिन्हें शब्दों की शिरो रेखा से नहीं बाँधा जा सकताष्- श्री सुमतिकुमार जैन, गोविन्द दास रिछारिया, उपाध्यक्ष सचिवालय, बम्बई, बेनी बाई, विधायक, बबीना विधानसभा (उ.प्र.), सुदामा प्रसाद गोस्वानी, विधायक तालबेहट, ललितपुर (उ.प्र.), डॉ. भगवत दयाल, विधायक बबीना झाँसी (उ.प्र.) तथा शुभकामना संदेश के अध्याय में प्रो. सुश्री गार्गी, श्री द्वारिका प्रसाद चैतन्य श्रीमती शिवकली रूसिया, श्रीमती पुष्पा कनकने, डॉ. गंगा प्रसाद बरसैया, श्री हरिशंकर सिजरिया के संदेश हैं।
काव्यांजलि अध्याय के अंतर्गत - बड़े गाँव के लाल - डॉ. के.एल. वर्मा बिन्दु, गुरुवर बुद्धि प्रकाश - डॉ. नारायणदास कमलेश, बुद्धि प्रकाश की ज्योर्तिमय स्मृति में - डॉ. सीताराम गुप्त दिनेश, बुद्धि प्रकाश जी सरावगी अमर हैं - डॉ. आनंदकंद गुप्त, परहित साधक स्व. बुद्धि प्रकाश श्री रघुवीर प्रसाद गुप्त, मिले पिता गुरुदेव समान - डॉ. सरोज गुप्ता की कविताएं हैं।
इसके बाद के अध्यायों में जीवन दर्शन, शैक्षणिक कार्य क्षेत्र तथा डायरी के पन्नों से वे महत्वपूर्ण अध्याय हैं जिनके क्षरा बुद्धिप्रकाश सरावगी के विचार एवं मानवीय मूल्यों को बारीकी से जाना और समझा जा सकता है।
परख संग साथी नामक अध्याय में विभिन्न विद्वानों ने बुद्धिप्रकाश सरावगी जी के व्यक्तिव पर प्रकाश डाला है। जैसे - श्री सरावगी जी चलते फिरते विश्वविद्यालय - पं. गुणसागर सत्यार्थी, जैसा मैंने देखा - शिवकली रूसिया, अभिन्न आत्मीय कीर्तिशेषरू श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी - राजाराम तिवारी, श्री गुरु चरण सरोज रज - देवेन्द्र कुमार जैन, स्नेह सागर - श्रद्धेय सरावगी जी डॉ. नारायणदास गुप्त कमलेश, दैदीप्यमान स्मृति - राजाराम वर्मा, स्मृति पुंज: बड़ागाँव के मालवीय श्री सरावगी - कृष्ण बिहारी नायक, स्थित प्रज्ञ मनीषी: श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी उदय नारायण कनकने, शिक्षा क्षेत्र के देदीप्यमान प्रकाश पुंज बुद्धिप्रकाश सरावगी लखनलाल कारेखिमऊ, जीवन्त व्यक्तित्व के धनी ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, बुन्देलखण्ड की माटी के जुझारू व्यक्तित्व श्री सरावगी जी डॉ. रामकृष्ण गुप्त, एक संस्मरण वर्ष सन् 1955 रमेशचन्द्र शर्मा, परम आदरणीय गुरुवर श्रद्धेय सरावगी जी डॉ. जगदीश शरण खर्द, अक्षय प्रेरणा के स्रोत श्री सरावगी जी रामेश्वरी नायक। इसके बाद का अध्याय भावनाओं का सागर समेटे हुए है जिसका शीर्षक है ‘‘उद्गार अपनों के’’। इसमें  बुद्धिप्रकाश सरावगी जी की अर्द्धंगिनी से नवोदित पीढी के नवांकुरों तक के उद्गार हैं। इन लेखों के शीर्षक ही बहुत कुछ कह देते हैं। जैसे- पति की यादें ही पाथेय - रामप्यारी सरावगी, मेरे प्रेरणा स्रोत पिताजी - अनिल सरावगी, डॉ. विचारशील प्रखर अध्येता- हरिमोहन गुप्ता, मेरे आदर्श पिताजी - डॉ. सरोज गुप्ता, स्नेहिल पिताजी - अखिलेश सरावगी, मेरे पिता जैसा कोई नहीं - डॉ. संगीता सुहाने, वात्सल्य की प्रतिमूर्ति मेरे दादा जी - कु. ऋचा सरावगी, जगमगाते नक्षत्रः मेरे दादा जी - कु. तृप्ति सरावगी,  मेरे नानाजी एक दृष्टि - मा. कार्तिकेय गुप्ता, मेरे प्यारे दादाजी - अमित, अनुज सरावगी।
लेखों के अंतिम अध्याय ‘‘स्मृतियों के झरोखे से’’ में श्री लक्ष्मीनारायण पिपरसानियाँ, श्री प्रेमनारायण गुप्त, डॉ. नारायणदास कमलेश, रणजीत सिंह जू देव, श्री रामकिशोर वीणा,श्री जी.एस. बडैरिया. श्री रामगोपाल लहरिया, श्री छक्कीलाल रावत, श्री अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद, श्री बनमाली लाल सादेले, श्री रमेश सेठ, श्री उदयनारायण कनकने, डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त,सुल्तान सिंह चौहान, चैतन्य वाणी, रामनाथ नीखरा,गंगा प्रसाद बरसैंया आदि के संस्मरण हैं।

‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ स्मृति ग्रंथ एक विशिष्ट व्यक्ति की समग्र विशिष्टताओं को सहेजे हुए है। इस ग्रंथ के माध्यम से एक पुत्री का अपने पिता के प्रति प्रेम और श्रद्धा का अनुभव किया जा सकता है तथा विरासत की उष्मायुक्त गरिमा को आत्मसात किया जा सकता है। प्रो. सरोज गुप्ता प्रशंसा की पात्र हैं कि उन्होंने पितृऋण को समझा और उसके प्रति इस ग्रंथ के रूप में अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है। यह ग्रंथ नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के मूल्यों से जोड़ने में सक्षम है, संस्कारों के प्रवाह का साक्षी है तथा पठनीय है।     


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