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Friday, September 6, 2024

शून्यकाल | हर दिन प्रासंगिक हैं मानवता के पैरोकार डॉ. राधाकृष्णन के विचार | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम -                      शून्यकाल
हर दिन प्रासंगिक हैं मानवता के पैरोकार डॉ. राधाकृष्णन के विचार
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
      देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। शिक्षा के व्यावसायीकरण के दौर में आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार, अपितु हर दिन प्रासंगिक हैं। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि डॉ. राधाकृष्णन के विचारों में वह क्षमता मौजूद है जो अनेक वर्तमान समस्याओं का हल सुझा सकती है। आवश्कता है तो ‘शिक्षक दिवस’ को एक दिवसीय आयोजन के रूप में मनाने के बजाए डॉ. राधाकृष्णन के विचारों को समझने की और 365 दिन के लिए जीवन में उतारने की।
        ‘‘मानव को एक होना चाहिए।’’ यह कथन ह प्रबंधन की बात करते हैं तो हमें विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। वह शिक्षा दोषपूर्ण है जो जाति, धर्म, समुदाय अथवा लिंगभेद का पाठ पढ़ाती हो। वह शिक्षक अपराधी है जो विद्यार्थियों की कोरी स्लेट के समान मस्तिष्क में भेद-भाव की इबारत लिखते हैं। शिक्षा और शिक्षक को हमेशा तर्क की कसौटी अपने पास रखते हुए बिना किसी भेद-भाव के एकता मानव एकता की शिक्षा देना चाहिए।

आज हम हर चार कदम पर एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल, हर दो कदम पर एक कोचिंग सेंटर देखते हैं फिर भी हमें शैक्षिक उन्नति का वह स्वरूप दिखाई नहीं देता है जो वास्तव में दिखाई देना चाहिए। ऐसा लगता है कि शिक्षातंत्र कहीं भटक गया है। विद्यार्थी शिक्षित तो हो रहे हैं किन्तु एक ओर बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी ओर असंवेदनशीलता बढ़ रही है। माता-पिता और अपने शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों में वह सम्मान की भावना दिखाई नहीं देती है जो कुछ दशक पहले तक देखी जा सकती थी। इसका सबसे सीधा उत्तर है कि शिक्षा में व्यावसायिकता बढ़ गई है। व्यापमं घोटाला जैसी घटनाएं शिक्षा के वर्तमान प्रबंधन पर प्रश्नचिन्ह लगाती रहती हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि शिक्षाजगत में सबकुछ ठीक है। शिक्षा क्षेत्र के दोषों को दूर करने के लिए डॉ राधाकृष्णन ने सुझाव दिया था कि जब भी शिक्षा के प्रबंधन पर चिन्तन किया जाए, शिक्षा को और अधिक उपयोगी बनाने पर मनन किया जाए तो सबसे पहले शैक्षिक प्रबंधन में यूनीफिकेशन पर बल देना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक शिक्षा का स्वरूप एक जैसा होगा तभी पारस्परिक संवाद बढ़ेगा और लोग एक-दूसरे की समस्याओं को समझ सकेंगे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मानते थे कि यह सम्पूर्ण विश्व एक विश्वविद्यालय की तरह है जिसमें सभी को नित सीखते और सिखाते रहना पड़ता है। वे शिक्षा को सबसे बड़ी मानवीय शक्ति के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है, शिक्षा ही वह क्षमता है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्टतम साबित करती है। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति होना चाहिए और यह तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।''
         दक्षिण मद्रास में लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिरुतनी नामक छोटे से कस्बे में 5 सितंबर सन् 1888 को सर्वपल्ली वीरास्वामी के घर जन्मे डॉ. राधाकृष्णन का विवाह तत्कालीन रीतिरिवाज़ के अनुसार बहुत छोटी आयु में ही कर दिया गया था। उनके पिता वीरास्वामी जमींदार की कोर्ट में एक अधीनस्थ राजस्व अधिकारी थे। डॉ राधाकृष्णन को अपनी बाल्यावस्था से ही पढ़ाई में अगाध रूचि थी। उनकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा तिरूतनी हाईस्कूल बोर्ड व तिरुपति के हर्मेसबर्ग इवंजेलिकल लूथरन मिशन स्कूल में हुई। उन्होंने मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद येल्लोर के बोरी कालेज में प्रवेश लिया और यहां पर उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। सन् 1904 में विशेष योग्यता के साथ प्रथमकला परीक्षा उत्तीर्ण की तथा तत्कालीन मद्रास के क्रिश्चियन कालेज में 1905 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने केलिए उन्हें छात्रवृत्ति दी गयी। उच्च अध्ययन के लिए उन्होनें दर्शन शास्त्र को अपना विषय बनाया। इस विषय के अध्ययन से उन्हें समूचे विश्व में ख्याति मिली। एम.ए. की उपाधि प्राप्त करने के बाद 1909 में एक कालेज में अध्यापक नियुक्त हुए और प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ते चले गए। उन्होंने मैसूर तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय धर्मदर्शन एवं शिक्षा के अंतर्सम्बंधों की नए ढंग से व्याख्या की। ’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ नामक अपने शोधग्रंथ में उन्होंने लेख किया कि -‘‘ जो गांवों में रहते हैं, गरीब हैं और अपने धार्मिक रीतरिवाजों, संस्कारों एवं परम्पराओं में बंधे हुए हैं वे जीवन को अपेक्षाकृत अधिक अच्छे से समझते हैं। क्यों कि उन्हें जीवन के व्यावहार से ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे प्रकृति और क्रियाशीलता के अधिक निकट होते हैं। यही तो शिक्षा है वेदांत की। वेद, पुराण, दर्शन आदि सभी ग्रंथ यही कहते हैं कि देखो, समझो और सीखो।
’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ शोधग्रंथ में जहां उन्होंने दार्शनिक चीजों को सरल ढंग से समझने की का रास्ता सुझाया वहीं इसमें उन्होंने हिंदू धर्म की कमजोरियों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था, “हिदू वेदांत वर्तमान शताब्दी के लिए उपयुक्त दर्शन उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। जिससे जीवन सार्थक व सुखमय बन सकता है। सन् 1910 में सैदायेट प्रशिक्षण कालेज में विद्यार्थियों को 12 व्याख्यान दिए। उन्होंने मनोविज्ञान के अनिवार्य तत्व पर पुस्तक लिखी जो कि 1912 में प्रकाशित हुई। वह विश्व को दिखाना चाहते थे कि मानवता के समक्ष सार्वभौम एकता प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन भारतीय धर्म दर्शन है।“
जहां तक दर्शन का प्रश्न है तो डॉ. राधाकृष्णन का दर्शन प्रत्ययवादी कहा जा सकता है। वे शंकर के अद्वैतवाद से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने शंकर के अद्वैतवेदान्त की व्याख्या की जिसे ‘नववेदान्त’ के यप् में स्वीकार किया गया। डॉ. राधाकृष्णन ने पश्चिमी विचारकों की चुनौती को स्वीकार करते हुए सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म शुद्ध अध्यात्मवाद होते हुए भी जीवन और जगत की सत्यता का सच्चा उद्घोष करता है। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने डॉ राधाकृष्णन के दर्शन की व्याख्या की है। ब्रिटिश फिलॉसफर प्रोफ़ेसर सी.ई.एम. जोड ने उनके दर्शन पर ’‘काउंटर अटैक फ्रॉम दि ईस्ट : द फिलॉसफी ऑफ राधाकृष्णन’’ नामक ग्रंथ लिखा। जर्मनी में जन्मे और सन् 1952 में नोबल प्राईज़ के विजेता रहे अलबर्ट स्वाइत्ज़र ने डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन में नव हिन्दू धर्म का प्रवर्तन देखा और उसको जीवन तथा जगत की सत्ता का प्रतिपादन करने वाला दर्शन माना। विदेशी विचारकों का डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन और चिनतन के प्रति रुझान इसलिए भी था क्यों कि डॉ. राधाकृष्णन ने धर्मदर्शन को रुढ़िवादी दृष्टिकोण से बाहर निकाल कर विश्लेक्षणात्मक पद्धति से व्याख्यायित किया। उन्होंने अपनी धर्म मीमांसा में धर्ममीमांसा की आलोचना करने वाले सन्तों, सूफ़ियों और रहस्यवादियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। धर्म की महत्ता को स्थापित करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने विज्ञान की प्रगति को भी आवश्क माना। उनका कहना था कि ‘‘धर्म, चिन्तन और जीवन-ये तीनों विज्ञान के जल से सिंचित हो कर और अधिक पल्लवित हो सकते हैं।’’ यद्यपि वे मानते थे कि धर्म और विज्ञान दोनों का ही वर्तमान स्वरूप दोषपूर्ण है और इन दोनों का परिष्कार होना जरूरी है।

‘शिक्षक दिवस’ मनाते हुए इसे एक महज औपचारिक प्रक्रिया जैसे अपनाने के बजाए यदि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों एवं दर्शन को अपनाया जाए तो आपसी कटुता, आतंकवाद, मॉबलिंचिंग, हर तरह के भेदभाव की समस्या से निजात पाया जा सकता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
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Thursday, September 5, 2024

चर्चा प्लस | बलिहारी गुरु आपने ! : शिक्षक जब खुद को ऐसा बना पाते हैं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
बलिहारी गुरु आपने ! : शिक्षक जब खुद को ऐसा बना पाते हैं 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                          
           भारतीय संस्कृति में शिक्षक का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। पुरातनकाल में शिक्षक गुरुकुल में निवास करते थे और वहीं विद्यार्थियों को शिक्षादान किया करते थे। समय के साथ शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन हुए उन्होंने क्रमशः इसे व्यवसाय में परिवर्तित कर दिया। आज शिक्षा धनार्जन का साधन और व्यवसाय बन गया है। किन्तु वास्तविक पूंजी उसी शिक्षक के पास होती है जो अपने कर्म के प्रति ईमानदार रहता है। ऐसे शिक्षकों का स्थान समाज और विद्यार्थियों के हृदय में सदा रहता है। अब यह शिक्षक को स्वयं तय करना है कि वह किस तरह की पूंजी कमाना चाहता है?     
    भारतीय संस्कृति में गुरु अर्थात शिक्षक विद्यार्थियों के जीवन का निर्माता माना गया है। पौराणिक ग्रंथों एवं महाकाव्यों में अनेक ऐसे प्रसंग है जिनमें शिक्षक ने अपने शिष्य के जीवन को महत्वपूर्ण दिशा दिखाई। श्रीराम और श्रीकृष्ण जिन्हें ईश्वर का अवतार माना गया है, वे भी गुरुकुल में रह कर शिक्षा प्राप्त करते रहे। शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही शिष्यों का कार्य होता था गुरुकुल परिसर की सफाई करना, चूल्हे के लिए लकड़ियां काट कर लाना और विशेष अवसरों पर भिक्षाटन भी करना होता था। यह सब भावी जीवन के निर्माण की प्रक्रिया थी जिसमें आगे चल कर शिष्य श्रम से न डरे, घमंड न करे और मिलजुल कर रहना सीखे। वहीं, शिक्षक अपने शिष्यों के साथ वत्सल भाव रखते थे। सभी शिष्य उनके लिए संतान की भांति होते थे जिनके जीवन को संवारना उनका दायित्व था। आज जब किसी शिक्षक द्वारा अपने विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार अथवा आर्थिक शोषण का समाचार सामने आता है तो शिक्षक की परंपरागत प्रतिष्ठा खण्डित होती दिखाई पड़ती है।

एक उत्तम शिक्षक का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह मैं अपने अनुभव के आधार पर विश्वासपूर्वक बता सकती हूं। मेरे जीवन में कुछ शिक्षक ऐसे आए जिनकी दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति के कारण मुझे कुछ विषयों से अरुचि हो गई थी। किन्तु वहीं स्कूल और काॅलेज जीवन में कुछ ऐसे शिक्षक भी मिले जिनका मेरे जीवन पर सकरात्मक प्रभाव पड़ा। यूं तो मेरी माता जी डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’ स्वयं एक उच्चकोटि की शिक्षिका थीं किन्तु विद्यालय में उनसे पढ़ने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला और घर में वे मां पहले थीं, शिक्षिका बाद में। घर में मेरे आरंभिक शिक्षक रहे मेरे नानाजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संत ठाकुर श्यामचरण सिंह। क,ख,ग,घ से ले कर अखबार पढ़ना तक मैंने उन्हीं से सीखा। फिर जब मैं नौवीं कक्षा में थी तो मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिंह ने मुझे एक बार शिक्षा देने का प्रयास किया। वार्षिक परीक्षा के समय उन्होंने रात भर मुझे केमिस्ट्री में बेंजीन फार्मूला रटाया। जब सुबह परीक्षा के लिए निकलने के समय उन्होंने मुझसे वह फार्मूला पूछा तो मेरे दिमाग से वह गोल था। उसी पल दीदी ने घोषणा कर दी कि ‘‘मैं तुम्हें नहीं पढ़ा सकती।’’

उन दिनों मेरी एक टीचर थीं जिनका नाम था शमीम मसीह। अब वे कहां हैं, मुझे ज्ञात नहीं हैं। उनका स्वभाव बहुत मधुर था। वे मुझे अच्छी लगती थीं। वे कभी किसी को डांटती नहीं थीं, बस, प्यार से समझा देती थीं। वे सोशल स्टडीज़ के अलावा हमें क्राफ्ट सिखाया करती थीं। उन्होंने कार्डबोर्ड से चाय की ट्रे बनाना, राखी बनाना आदि बहुत-सी चीजें बनाना सिखाया था। उनके मधुर व्यवहार का मेरे बाल मानस पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनकी उस समय की छवि मुझे आज तक याद है। 

दूसरे टीचर मुझे मिले महाविद्यालय में जिनकी शिक्षा पद्धति ने न केवल मुझे भारतीय इतिहास विषय से प्रेम करना सिखा दिया अपितु सही शिक्षण पद्धति भी सिखाई। उनका नाम है आर. डी. दास। कुछ समय पहले तक मुझे पता नहीं था कि वे इन दिनों कहां निवास कर रहे हैं। फिर संयोगवश छत्तीसगढ़ से चिकित्सक साहित्यकार डाॅ चंद्रकांत वाघ सागर आए और उन्हें मैंने चर्चा के दौरान बताया कि दास सर राजनादगांव के रहने वाले थे और शायद अब भी वहीं कहीं हों। सुखद आश्चर्य मुझे तब हुआ जब डाॅ वाघ ने उन्हें ढूंढ निकाला और मुझे उनका फोन नंबर भी उपलब्ध कराया। दास सर इन दिनों बालोद (छत्तीसगढ़) में रह रहे हैं। वर्षों बाद फोन पर उनसे बात करना कितना सुखद था, यह मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती हूं। दास सर के प्रति मेरी श्रद्धा उनकी शिक्षण पद्धति के कारण जागृत हुई थी। वे अपने काम के प्रति समर्पित थे। वे हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस भी लिया करते थे। वे हमें इतिहास पढ़ाते थे। बिना किसी किताब या नोट्स के पूरी तारीखों सहित एक-एक घटना को इस तरह समझाते कि लगता कि इतिहास की वे सभी घटनाएं हमारी आंखों के सामने घटित हो रही हैं। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता था। उनकी शिक्षण पद्धति ने इतिहास को याद रखना इतना आसान बना दिया कि मुझे इतिहास विषय से इतना गहरा प्रेम हुआ कि आगे चल कर मैंने पहले मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एम.ए. किया। फिर प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एम.ए. किया और इसके बाद खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्वों पर पीएच.डी. कर डाली। दास सर के समय याद की हुई ऐतिहासिक तारीखें आज भी मुझे यांद हैं। वे युद्धों की व्यूह रचना ब्लैकबोर्ड पर चित्रित कर के समझाते थे। बाबर और इब्राहिम लोदी की व्यूह रचना आज भी मैं कागज़ पर उतार सकती हूं। 
यदि सच कहा जाए तो दास सर से ही मैंने पढ़ाना भी सीखा। जब मैं स्वयं विद्यालयीन शिक्षिका बनी तो मुझे दास सर की शिक्षण पद्धति याद रही। मैं पूरी तैयारी कर के कक्षा में जाती थी और किसी पुस्तक या नोट्स की सहायता के बिना अध्यापन करती थी। उस दौरान मुझे अनुभव हुआ कि मेरी शिक्षण पद्धति का मेरे छात्र भी आदर करते थे। वस्तुतः छात्र ऐसे शिक्षक को कभी गंभीरता से नहीं लेते हैं जो शिक्षा देने में लापरवाही करते हैं। ईमानदारी से पढ़ाने वाले शिक्षक छात्रों को पसंद आते हैं।

मेरे जीवन में अल्पकालिक रूप से एक और शिक्षक रहे जिनका नाम था अंबिका खरे सर। उनसे स्कूली शिक्षा तो ग्रहण नहीं की लेकिन जब मैं काॅलेज में पढ़ रही थी तो मुझे अपना अंग्रेजी ज्ञान सुधारने की इच्छा हुई। उन दिनों पन्ना जैसी छोटी जगह में इंग्लिश कोचिंग का चलन नहीं था। मेरी मां ने अंबिका खरे सर से बात की तो उन्होंने मुझे सिखाना सहर्ष स्वीकार कर लिया। मेरी पूरी स्कूली शिक्षा हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल में हुई थी इसलिए अंग्रेजी की न तो मेरी रायटिंग अच्छी थी और न स्पेंलिंग्स सही रहती थी। ग्रामर की दशा तो पूछिए ही मत। लेकिन खरे सर ने बड़े धैर्य के साथ मुझे सिखाना शुरू किया। रायटिंग सुधरवाने के लिए चार लाईन वाली काॅपी में लिखने का अभ्यास कराने लगे। यह पढ़ कर सभी को हास्यास्पद लगेगा कि काॅलेज में पढ़ने वाली एक लड़की यानी मैं चार लाईन वाली बच्चों की काॅपी में रायटिंग सुधारने का अभ्यास करती थी। उन्होंने मुझे स्पेलिंग और उच्चारण के लिए बोल-बोल कर अखबार पढ़ने का निर्देश दिया। इन सबका काफी अच्छा नतीजा रहा। दुर्भाग्यवश यह सिलसिला अधिक समय तक नहीं चल सका। उन दिनों पत्रकारिता का कीड़ा मुझे काट चुका था अतः धीेरे-धीरे खरे सर के पास जाना छूट गया। आज सोचती हूं तो पछतावा होता है कि काश! कुछ समय और मन लगा कर उनसे पढ़ लिया होता। 

वस्तुतः हर व्यक्ति के जीवन में प्रभावी और कुछ अप्रभावी शिक्षक आते हैं। याद दोनों रह जाते हैं। लेकिन जिन शिक्षकों के कारण जीवन को सही दिशा मिलती है, वे हमेशा सम्मानजनक रूप से स्मृतियों में बने रहते हैं। जो निःस्वार्थ भाव से शिक्षा देते हैं उनके प्रति जीवनपर्यंत श्रद्धाभाव रहता है। क्या कोई ऐसे शिक्षक को सम्मान देना चाहेगा जिसने शिक्षा के बदले भरपूर पैसा वसूला हो। आज कोचिंग में पढ़ने वाले छात्र अपने कोचिंग सेंटर को याद रखते हैं, उसकी चर्चा करते हैं लेकिन वहां पढ़ाने वाले टीचर्स की नहीं। ऐसे टीचर्स पूरी मेहनत करते हैं, बच्चों का भविष्य संवारते हैं किन्तु एक व्यवसायी की भांति, इसलिए वे अपने छात्रों के दिलों में जगह नहीं बना पाते हैं। आज छात्र हों या उनके अभिभावक वे शान से यह तो कहते हैं कि उन्होंने कोटा में कोचिंग ली है, इन्दौर में कोचिंग ली है, बैंगलुरु में कोचिंग ली है लेकिन कोई सिर ऊंचा कर के एक भी नाम नहीं लेता है कि हमने फलां सर या मैडम से शिक्षा ली है। 

कभी सोचा है कि एकलव्य द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु क्यों बनाना चाहता था? या फिर कर्ण जैसा योद्धा परशुराम से ही शिक्षा लेने को इतना आतुर क्यों था कि शिक्षा पाने के लिए उसने झूठ बोला। इन दोनों प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि चाहे द्रोण हो या परशुराम अपनी विद्या में पारंगत थे। उस समय हर योद्धा उन्हीं से शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। इन दो गुरुओं की शिक्षणसंबंधी विशिष्टता को आज के शिक्षिकों को समझना चाहिए। क्योंकि यह तो शिक्षकों को स्वयं ही तय करना होगा कि उन्हें शिक्षा का व्यवसायी बनना है और केवल धन कमाना है अथवा शिक्षणकर्म को ईमानदारी से निभा कर धन के साथ सम्मान भी कमाना है। अर्थात् ‘‘बलिहारी’’ वाले शिक्षक बनना है अथवा दूकानदारी वाले शिक्षक।                   
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Monday, September 5, 2022

इतिहास को समझना सिखाया - डॉ (सुश्री) शरद सिंह | जागरण सखी सितंबर 2022 | शिक्षक दिवस स्पेशल


शिक्षक दिवस स्पेशल ..."जागरण सखी" पत्रिका के सितम्बर 2022 अंक मैंने अपने इतिहास शिक्षक को याद किया है जिन्होंने मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। मेरे साथ ही टीवी कलाकार अनेरी वजानी, अभिनेता अक्षय डोगरा, चित्रकार अमित कल्ला तथा गाईकेनोलॉजिस्ट डॉ. वारिजा ने भी अपने- अपने शिक्षकों के बारे में चर्चा की है। विभिन्न क्षेत्रों के सेलिब्रिटीज़ के साथ होने का अपना एक अलग ही आनंद है 💁


यह सुअवसर देने के लिए हार्दिक धन्यवाद एवं आभार, प्रिय #जागरणसखी  🌷

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रिय विनीता जी💐

आप पत्रिका का यह अंक इस लिंक पर पढ़ सकते हैं- https://www.jagransakhi.com/mepaper/sakhi-01-sep-2022-magazine.html

शिक्षक  दिवस पर आप सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं! 

Wednesday, September 12, 2018

चर्चा प्लस ... मानव एकता के पैरोकर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस : 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष : मानव एकता के पैरोकर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - डॉ. शरद सिंह

देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। शिक्षा के व्यावसायीकरण के दौर में आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि डॉ. राधाकृष्णन के विचारों में वह क्षमता मौजूद है जो अनेक वर्तमान समस्याओं का हल सुझा सकती है। आवश्कता है तो ‘शिक्षक दिवस’ को एक दिवसीय आयोजन के रूप में मनाने के बजाए डॉ. राधाकृष्णन के विचारों को समझने की और 365 दिन के लिए जीवन में उतारने की।
मानव एकता के पैरोकर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस - 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष .. Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
‘‘मानव को एक होना चाहिए।’’ यह कथन था महान शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण का। वे कहते थे कि ‘‘ जब हम शिक्षा के प्रबंधन की बात करते हैं तो हमें विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। वह शिक्षा दोषपूर्ण है जो जाति, धर्म, समुदाय अथवा लिंगभेद का पाठ पढ़ाती हो। वह शिक्षक अपराधी है जो विद्यार्थियों की कोरी स्लेट के समान मस्तिष्क में भेद-भाव की इबारत लिखते हैं। शिक्षा और शिक्षक को हमेशा तर्क की कसौटी अपने पास रखते हुए बिना किसी भेद-भाव के एकता मानव एकता की शिक्षा देना चाहिए।

आज हम हर चार कदम पर एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल, हर दो कदम पर एक कोचिंग सेंटर देखते हैं फिर भी हमें शैक्षिक उन्नति का वह स्वरूप दिखाई नहीं देता है जो वास्तव में दिखाई देना चाहिए। ऐसा लगता है कि शिक्षातंत्र कहीं भटक गया है। विद्यार्थी शिक्षित तो हो रहे हैं किन्तु एक ओर बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी ओर असंवेदनशीलता बढ़ रही है। माता-पिता और अपने शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों में वह सम्मान की भावना दिखाई नहीं देती है जो कुछ दशक पहले तक देखी जा सकती थी। इसका सबसे सीधा उत्तर है कि शिक्षा में व्यावसायिकता बढ़ गई है। व्यापमं घोटाला जैसी घटनाएं शिक्षा के वर्तमान प्रबंधन पर प्रश्नचिन्ह लगाती रहती हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि शिक्षाजगत में सबकुछ ठीक है। शिक्षा क्षेत्र के दोषों को दूर करने के लिए डॉ राधाकृष्णन ने सुझाव दिया था कि जब भी शिक्षा के प्रबंधन पर चिन्तन किया जाए, शिक्षा को और अधिक उपयोगी बनाने पर मनन किया जाए तो सबसे पहले शैक्षिक प्रबंधन में यूनीफिकेशन पर बल देना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक शिक्षा का स्वरूप एक जैसा होगा तभी पारस्परिक संवाद बढ़ेगा और लोग एक-दूसरे की समस्याओं को समझ सकेंगे।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मानते थे कि यह सम्पूर्ण विश्व एक विश्वविद्यालय की तरह है जिसमें सभी को नित सीखते और सिखाते रहना पड़ता है। वे शिक्षा को सबसे बड़ी मानवीय शक्ति के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है, शिक्षा ही वह क्षमता है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्टतम साबित करती है। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति होना चाहिए और यह तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।''
दक्षिण मद्रास में लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिरुतनी नामक छोटे से कस्बे में 5 सितंबर सन् 1888 को सर्वपल्ली वीरास्वामी के घर जन्मे डॉ. राधाकृष्णन का विवाह तत्कालीन रीतिरिवाज़ के अनुसार बहुत छोटी आयु में ही कर दिया गया था। उनके पिता वीरास्वामी जमींदार की कोर्ट में एक अधीनस्थ राजस्व अधिकारी थे। डॉ राधाकृष्णन को अपनी बाल्यावस्था से ही पढ़ाई में अगाध रूचि थी। उनकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा तिरूतनी हाईस्कूल बोर्ड व तिरुपति के हर्मेसबर्ग इवंजेलिकल लूथरन मिशन स्कूल में हुई। उन्होंने मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद येल्लोर के बोरी कालेज में प्रवेश लिया और यहां पर उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। सन् 1904 में विशेष योग्यता के साथ प्रथमकला परीक्षा उत्तीर्ण की तथा तत्कालीन मद्रास के क्रिश्चियन कालेज में 1905 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने केलिए उन्हें छात्रवृत्ति दी गयी। उच्च अध्ययन के लिए उन्होनें दर्शन शास्त्र को अपना विषय बनाया। इस विषय के अध्ययन से उन्हें समूचे विश्व में ख्याति मिली। एम.ए. की उपाधि प्राप्त करने के बाद 1909 में एक कालेज में अध्यापक नियुक्त हुए और प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ते चले गए। उन्होंने मैसूर तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।
डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय धर्मदर्शन एवं शिक्षा के अंतर्सम्बंधों की नए ढंग से व्याख्या की। ’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ नामक अपने शोधग्रंथ में उन्होंने लेख किया कि -‘‘ जो गांवों में रहते हैं, गरीब हैं और अपने धार्मिक रीतरिवाजों, संस्कारों एवं परम्पराओं में बंधे हुए हैं वे जीवन को अपेक्षाकृत अधिक अच्छे से समझते हैं। क्यों कि उन्हें जीवन के व्यावहार से ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे प्रकृति और क्रियाशीलता के अधिक निकट होते हैं। यही तो शिक्षा है वेदांत की। वेद, पुराण, दर्शन आदि सभी ग्रंथ यही कहते हैं कि देखो, समझो और सीखो। ’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ शोधग्रंथ में जहां उन्होंने दार्शनिक चीजों को सरल ढंग से समझने की का रास्ता सुझाया वहीं इसमें उन्होंने हिंदू धर्म की कमजोरियों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था, “हिदू वेदांत वर्तमान शताब्दी के लिए उपयुक्त दर्शन उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। जिससे जीवन सार्थक व सुखमय बन सकता है। सन् 1910 में सैदायेट प्रशिक्षण कालेज में विद्यार्थियों को 12 व्याख्यान दिए। उन्होंने मनोविज्ञान के अनिवार्य तत्व पर पुस्तक लिखी जो कि 1912 में प्रकाशित हुई। वह विश्व को दिखाना चाहते थे कि मानवता के समक्ष सार्वभौम एकता प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन भारतीय धर्म दर्शन है।“
जहां तक दर्शन का प्रश्न है तो डॉ. राधाकृष्णन का दर्शन प्रत्ययवादी कहा जा सकता है। वे शंकर के अद्वैतवाद से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने शंकर के अद्वैतवेदान्त की व्याख्या की जिसे ‘नववेदान्त’ के यप् में स्वीकार किया गया। डॉ. राधाकृष्णन ने पश्चिमी विचारकों की चुनौती को स्वीकार करते हुए सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म शुद्ध अध्यात्मवाद होते हुए भी जीवन और जगत की सत्यता का सच्चा उद्घोष करता है। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने डॉ राधाकृष्णन के दर्शन की व्याख्या की है। ब्रिटिश फिलॉसफर प्रोफ़ेसर सी.ई.एम. जोड ने उनके दर्शन पर ’‘काउंटर अटैक फ्रॉम दि ईस्ट : द फिलॉसफी ऑफ राधाकृष्णन’’ नामक ग्रंथ लिखा। जर्मनी में जन्मे और सन् 1952 में नोबल प्राईज़ के विजेता रहे अलबर्ट स्वाइत्ज़र ने डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन में नव हिन्दू धर्म का प्रवर्तन देखा और उसको जीवन तथा जगत की सत्ता का प्रतिपादन करने वाला दर्शन माना। विदेशी विचारकों का डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन और चिनतन के प्रति रुझान इसलिए भी था क्यों कि डॉ. राधाकृष्णन ने धर्मदर्शन को रुढ़िवादी दृष्टिकोण से बाहर निकाल कर विश्लेक्षणात्मक पद्धति से व्याख्यायित किया। उन्होंने अपनी धर्म मीमांसा में धर्ममीमांसा की आलोचना करने वाले सन्तों, सूफ़ियों और रहस्यवादियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। धर्म की महत्ता को स्थापित करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने विज्ञान की प्रगति को भी आवश्क माना। उनका कहना था कि ‘‘धर्म, चिन्तन और जीवन-ये तीनों विज्ञान के जल से सिंचित हो कर और अधिक पल्लवित हो सकते हैं।’’ यद्यपि वे मानते थे कि धर्म और विज्ञान दोनों का ही वर्तमान स्वरूप दोषपूर्ण है और इन दोनों का परिष्कार होना जरूरी है।
‘शिक्षक दिवस’ मनाते हुए इसे एक महज औपचारिक प्रक्रिया जैसे अपनाने के बजाए यदि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों एवं दर्शन को अपनाया जाए तो आपसी कटुता, आतंकवाद, मॉबलिंचिंग, हर तरह के भेदभाव की समस्या से निजात पाया जा सकता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
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(सागर दिनकर, दैनिक, 05.09.2018 )

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