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Wednesday, March 8, 2023

होली पर व्यंग्य | लला, सम्हर के आइयो खेलन होरी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक भास्कर

मित्रो,  आज "दैनिक भास्कर" में प्रकाशित  मेरा यह व्यंग्य लेख ...
"लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी !"
🎉हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🙏🎉
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व्यंग्य
*लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी !*
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

"होली है!"
"नारीशक्ति ज़िन्दाबाद !!"
इसे कहते हैं नेचुरल जस्टिस अर्थात प्राकृतिक न्याय। मेरी महिला विंग बड़ी खुश है कि इस बार होली और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक साथ, एक ही दिन मनाया जा रहा है। सो, इस बार कुछ हिसाब-किताब बराबर होने वाले हैं। मुझे तो लगता है कि उस जमाने में भी ऐसा ही चमत्कारी संयोग पड़ा होगा जब एक गोरी को छलिया कृष्ण उर्फ़ गोविंद से हिसाब बराबर करने का मौका मिला था। वह होली की तिथि थी जिसने यह सुनहरा मौका दिया, वरना हमेशा गोपीयों को ही सारी मुसीबतें झेलनी पड़ती थीं। कभी माखन चुराना, कभी गगरी फोड़ना, कभी नहाती हुई गोपियों के कपड़े छुपा देना - इस तरह न जाने कितना परेशान करते रहे श्रीकृष्ण बेचारी गोपियों को। इसीलिए होली के दिन गोपियों ने भी बदला ले ही लिया। यानी एक गोपी ने कृष्ण को मज़ा चखा दिया। यक़ीन न आए तो कवि पद्माकर की यह पंक्तियां पढ़ लीजिए -
फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।
भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥
छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी ।
नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी ॥
      अपनी दुर्गति के बाद लला गोविंद को दुबारा होली खेलने जाने की हिम्मत नहीं हुई होगी और अगर गए भी होंगे तो बड़े सलीके से होली खेली होगी। यहां एक राज़ की बात बता दूं मैं कि यह ब्रज की गोपी नहीं बल्कि बुंदेलखंड की गोपी थी। इसीलिए उसने ईट का जवाब पत्थर से दिया और कृष्ण को न केवल रंग लगाया बल्कि उनका पीतांबर भी छीन लिया।
      तो प्यारे भाइयो, जीजाओं, देवरों, अंकलों और मित्रो ! होली के बहाने महिलाओं को परेशान करने का अगर मूड बना रहे हैं तो अपने उस मूड को भेज दीजिए तेल लेने। इस बार होली में हम महिलाएं भी अपने पूरे मूड में हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ने  हमें जोश से भर रखा है और हमने तय कर रखा है कि होली के बहाने जो 'हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा!', नहीं, ये थोड़े ओल्ड फैशन की बात हो गई। दरअसल हमने यह तय किया है कि "हमसे जो टकराएगा, फ्रेंडशिप से ब्लॉक कर दिया जाएगा"। ज़रा सोचिए कि ये भला क्या बात हुई कि गुझियां, खुरमा, पपड़ियां हम बनाए और आप सब भंग चढ़ा कर हमारे अच्छे-खासे रंग को भंग करने लगें, इस बार ये नहीं चलेगा! नो! नेवर ! यूं भी जो सोशल मीडिया की फ्रेंडशिप में ब्लॉक कर दिया जाता है उसकी लाइफ अपने आप चूर-चूर हो जाती है। सो, हम महिलाओं की "न" को "न" ही समझिए, यदि हमारी "न" को "हां" समझने की भूल करेंगे तो इस बार बचने वाले नहीं हैं। 
        और हां, एक और वार्निंग है! "बुरा न मानो होली है" के जुमले को अगर ज़बरदस्ती थोपते हुए रबर बैंड की तरह खींचकर अनलिमिटेड करने की कोशिश की तो टॉक टाईम तुरंत समाप्त समझिए!
       अगर कहीं ओवर स्मार्ट हुरियारे बनने की कोशिश की तो महिला पुलिस विंग भी डंडों में रंग-गुलाल वाला तेल लगा कर तैयार है। सो,  लला ! सम्हर के आइयो खेलन होरी ! बाकी मेरी तो यही सलाह है कि-

होली खेलें खूब, पर, रहे हमेशा ध्यान।
हुल्लड़ में होवे नहीं, नारी का अपमान।।
नारी का अपमान करे वह नहीं बचेगा
उसके चेहरे पर, फिर काला रंग रचेगा।।
गांठ बांध लो सीख "शरद" कहती है मानो।
हो जाओगे 'ब्लॉक' यक़ीनन ये तुम जानो।।

 ।।अच्छी होली, सच्ची होली ! हैप्पी होली! ।।
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Sunday, April 3, 2022

प्लीज़ कॉल मी हनी | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

#ThankYou #Navbharat 🌷
नवभारत में प्रकाशित | व्यंग्य
प्लीज़ काॅल मी हनी!
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘अप्सरा उर्वशी! आजकल मेनका दिखाई नहीं दे रही है? मैंने भी उसे कहीं नहीं भेजा, फिर वह कहां व्यस्त है?’’ देवराज इन्द्र ने अपने सिंहासन पर पहलू बदलते हुए उर्वशी से पूछा। 
‘‘बाॅस, फिलहाल बड़े चुनाव निपट गए। अब तो मेनका वेकेशन पीरियड एन्ज्वाय कर रही होगी।’’ उर्वशी ने लापरवाही से उत्तर दिया।
‘‘लेकिन ये तो गलत है। मैं देवराज इन्द्र हूं और मुझसे अनुमति लिए बिना छुट्टी मनाना, सारासर गलत है। यह मेरे दरबार के नियमों का सरासर उल्लंघन है।’’ देवराज इन्द्र की भृकुटी तन गई। वे एक टिपिकल बाॅस की तरह व्यवहार पर उतर आए।
‘‘लेखापाल को बुलाऊं क्या?’’ उर्वशी ने पूछा। दरअसल वह भी मेनका पर तनिक क्रोधित थी कि वह अकेली ही छुट्टी मनाने चली गई।
‘‘लेखापाल को क्यों? क्या मेनका के बदले अब मैं उसका नृत्य देखूंगा?’’ देवराज इन्द्र खिसिया कर बोले।
‘‘नृत्य कराने के लिए नहीं बाॅस! मेनका के लिए शोकाॅज़ नोटिस बनवाने के लिए।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। आजकल हमारे दरबार के संदेशवाहकों को भी पृथ्वी की हवा लग गई है। वे चार दिन में नोटिस पहुंचाएंगे। उस पर कहीं मेनका ने उन्हें उत्कोच का लालच दे दिया तो कह देंगे कि मेनका का उन्हें पता ही नहीं लगा। क्या मैं जानता नहीं हूं कि जब से कुछ सिफारशी पृथ्वीवासी मेरे दरबार में काम करने लगे हैं तब से यहां भी भ्रष्टाचार मच गया है। मुझे भी अब सफ़ाई अभियान चलाना होगा वरना मेरी भी दशा तेजी से कालकवलित होते राजनीतिक दलों जैसी हो जाएगी।’’ देवराज इन्द्र ने उर्वशी के सामने अपनी चिंता व्यक्त की।
‘‘यू आर राईट बाॅस।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘बाॅस इज़ आॅलवेज़ राईट!’’ इन्द्र ने अकड़ कर कहा। फिर दूसरे ही पर झुंझला कर बोल उठा,‘‘ये क्या, तुम अप्सराओं के चक्कर में मैं देवभाषा यानी अपनी भाषा संस्कृत भूल कर अंग्रेजी बोलने लगा हूं। यह मेरे लिए लज्जाजनक बात है।’’
‘‘इसमें लजाने वाली कोई बात नहीं बाॅस! पृथ्वीलोक में तो हिन्दी, संस्कृत के पक्ष में लम्बे-लम्बे भाषण देने वाले महानुभाव भी अपने बच्चों को सिर्फ़ अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना पसंद करते हैं। खाने के दांत कुछ और और दिखाने के दांत कुछ और। खैर, बाॅस! फिर क्या सोचा आपने मेनका के बारे में?’’ उर्वशी ने चर्चा को विषयांतर होने से रोक दिया।
‘‘सोचना क्या है? मैं अभी उसे मानस संदेश भेजता हूं। वह जहां कहीं भी होगी उसे तुरंत यहां उपस्थित होना होगा।’’ देवराज इन्द्र ने कहा।
‘‘बाॅस, पृथ्वीवासी भी मानस संदेश का फामूर्ला ढूंढने में जुटे हुए हैं। मुझे तो यह सोच कर भय होता है कि जब अभी मोबाईल सेवा का सहारा ले कर एक-दूसरे का जीना मुश्क़िल किए रहते हैं तो जब उन्हें मानस संदेश सेवा हासिल हो जाएगी तो फिर तो तबाही मचा देंगे।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘ठीक है, ठीक है। पृथ्वीवासी जानें और उनका काम जाने। लेकिन तुम लोग अपनी भाषा पर ध्यान दो।’’ देवराज इन्द्र ने कहा।
‘‘हम लोग ऐसा नहीं कर सकती हैं। क्योंकि जब आप हमें ड्यूटी पर पृथ्वी के भारतीय भू-भाग में  भेजते हैं तो हमें वहां अंग्रेजी में ही बात करनी पड़ती है। हिन्दी भी चल जाती है मगर संस्कृत तो बिलकुल नहीं चलती है। सो क्षमा करें बाॅस! हम आपकी इस आज्ञा का पालन नहीं कर सकेंगी। अगर हमने आपकी यह आज्ञा मानी तो भारतीय भू-भाग में पहुंच कर आपकी दूसरी आज्ञाओं का पालन नहीं हो सकेगा।’’
देवराज इन्द्र कोई उत्तर दे पाते इससे पहले मेनका वहां उपस्थित हो गई।
‘‘व्हाय आर यू काॅल मी, बाॅस?’’ मेनका ने इठलाते हुए पूछा।
‘‘ये तुमने क्या फटेचिटे कपड़े पहन रखे हैं? कहीं कटीली झाड़ियों में उलझ गई थीं क्या?’’ देवराज इन्द्र ने मेनका की कटी-फटी जींस-टाॅप की ओर इशारा करते हुए कहा।
‘‘अरे नहीं बाॅस! ये तो पृथ्वीलोक के सबसे फैशनेबुल कपड़े हैं। वह तो आपने शीघ्र उपस्थित होने का संदेश दिया इसलिए मैं कपड़े नहीं बदल पाई और पृथ्वीलोक के कपड़ों में ही यहां चली आई।’’ मेनका ने कहा और फिर पूछा,‘‘आपने बताया नहीं कि मुझे इतनी जल्दबाज़ी में क्यों बुलाया? कोई इमरजेंसी?’’
‘‘नहीं कोई इमरजेंसी नहीं! लेकिन तुम लोग यहां स्वर्ग लोक में अंग्रेजी मत बोला करो। तुम लोगों की संगत में मेरी भाषा भी भ्रष्ट हुई जा रही है...।’’
‘‘बट माई बाॅस!’’ मेनका ने देवराज इन्द्र को टोक कर कुछ कहना चाहा। जिस पर देवराज इन्द्र क्रोधित हो कर बोले-‘‘शटअप! अप्सरा मेनका तुम भूल रही हो कि मैं देवराज इन्द्र हूं और तुम एक अदना सी अप्सरा। जो मैं कहूंगा वहीं यहां होगा।’’ 
‘‘माई फुट! मैं भी देखती हूं कि यहां तो आप अपनी चला लेंगे मगर वहां पृथ्वीलोक में तपभंग कराने का काम फिर किससे कराएंगे? क्यों कि अगर आपने मेरी बात नहीं मानी तो मैं अभी, इसी समय रिज़ाइन कर दूंगी। पृथ्वीलोक में बहुत-सी कंपनियां हैं, राजनीतिक भी और कार्पोरेट जगत में भी जहां मेरी और उर्वशी की बहुत डिमांड है।’’ मेनका ने भाव दिखाते हुए कहा।
‘‘अप्सरा मेनका, क्या आशय है तुम्हारा?’’ देवराज इन्द्र ने चकित होते हुए पूछा।
‘‘पहले तो आप हमें ये अप्सरा-वप्सरा कहना बंद करें। ये आउटडेटेड हो गया है।’’ मेनका ने आपत्ति की।
‘‘तुम अप्सराओं को मैं अप्सरा न कहूं तो और क्या कहूं?’’ देवराज इन्द्र को कुछ समझ में नहीं आया।
‘‘आप हमें हनी कह कर पुकारिए!’’ मेनका ने कहा।
‘‘यस, काॅल अस हनी!’’ उर्वशी ने भी तुरंत समर्थन दिया। ठीक वैसे ही जैसे विरोधी संासद, विधायक भी अपना वेतन-भत्ता बढ़वाने के लिए एक सुर में बोलने लगते हैं। 
‘‘लेकिन हनी क्यों?’’ देवराज इन्द्र ने पूछा।
‘‘आजकल पृथ्वीलोक में तप भंग करने, अपनी सुंदरता के जाल में फंसाने वालियों को हनी और उनके जाल को हनीट्रेप कहा जाता है। आप भी हमसे यही काम कराते आए हैं। इस ऋषि का तप भंग कर दो, उस ऋषि को अपने रूपजाल में फंसा लो, तो हम लोग भी तो हनी कहलाएंगी।’’ मेनका ने देवराज इन्द्र को समझाया।
‘‘ठीक है अप्सरा मेनका...।’’
‘‘नो-नो! प्लीज़ काॅल मी हनी!’’ मेनका ने टोका।
‘‘ओके हनी मेनका डियर! रिज़ाइन मत दो! तुम लोगों के बिना मेरी सत्ता कैसे चलेगी?’’ देवराज इन्द्र अनुनय-विनय करते हुए कहा।
‘‘ठीक है, तो फिर डील! आप हमें हमारे पृथ्वीलोक के अनुरुप कपड़े पहनने दें, पृथ्वीलोक के अनुरुप भाषा बोलने दें, कुछ दिनों का वेकेशन दें फिर देखिए कि हम आपके कितने विरोधियों के ट्रेप करती हैं। क्यों उर्वशी, मैंने ठीक कहा न?’’
‘‘हंड्रेड परसेंट ट्रू!’’ उर्वशी मेनका के प्रति अपने गुस्से को भूल कर उसका समर्थन करने लगी। जैसे हर बुद्धिमान राजनेता अपनी पार्टी को धता बता कर दमदार पार्टी में शामिल हो जाता है। यह अवसरवादिता भी उसने पृथ्वीलोक में ही सीखी थी।
‘‘लेकिन मैंने तो सुना है कि हनीट्रेप वाली हनियां पैसा कमाने के लिए भी जाल बिछाती हैं।’’ देवराज इन्द्र ने कहा।
‘‘हां, आपने ठीक सुना है। पर वे लोस्टैंडर्ड की हनीज़ होती हैं, जस्ट लाईक काॅलगर्ल। लेकिन हमारी जैसी हनीज़ हाई प्रोफाईल काम करती हैं, सिर्फ पाॅलिटिक्स और कार्पोरेट के लिए। बट ओके! मैं अपना वेकेशन बरबाद नहीं होने दे सकती हूं। मैं जा रही हूं छुट्टी मनाने। हां, अगर कोई इमरजेंसी आ जाए तो आप मुझे काॅल कर सकते हैं, बाॅस!’’ मेनका ने कहा और वहां से अंतध्र्यान हो गई।
‘‘तो बाॅस, मेनका तो चली गई और मैं भी अब वेकेशन पर जा रही हूं।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘ठीक है अप्सरा उर्वशी!’’ देवराज इन्द्र ने मन मार कर कहा। क्योंकि जो वे युगों-युगों से हनीट्रेप कराते आ रहे हैं वह इन्हीं अप्सराओं के दम पर। इसलिए इन्हें खुश रखना ही होगा। उन्होंने फिर दोहराया,‘‘ठीक है अप्सरा उर्वशी, तुम भी छुट्टी मना लो।’’
‘‘थैंक यू बाॅस! बट नो अप्सरा, प्लीज़ काॅल भी हनी!’’ उर्वशी ने भी मेनका की नकल में कहा और वहां से अंतध्र्यान हो गई। वहीं, देवराज इन्द्र अपने सूने दरबार को टुकुर-टुकुर देखते रह गए।
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03.04.2022
 #व्यंग्य #चिन्ता_दिवस #नवभारत #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #शरदसिंह #हिंदीसाहित्य #हिंदीव्यंग्य #satire #hindi_satire #drsharadsingh          

Sunday, March 13, 2022

चलो, अपडेटेशन करें कहावतों का | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "चलो, अपडेटेशन करें कहावतों का" ...😀😊😛
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व्यंग्य
चलो, अपडेटेशन करें कहावतों का
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
       समय के साथ जब राजनीति का ऊंट करवट बदल सकता है और देश की सबसे बड़ी कही जाने वाली पार्टी को एक-दो रन पर आउट कर सकता है तो बोली-भाषा की गाय-बछिया करवट क्यों नहीं बदल सकती है? वह भी तो एक ही मुद्रा में बैठे-बैठे थक जाती है। उसे भी अधिकार है करवट बदलने का। गाय सीधी होती है तथा बछिया तो और भी सीधी होती है। इसलिए ये दोनों बिना किसी शोरशराबे के, बिना किसी सभा या कैम्पैन के ऐसे ही बदलती रहती हैं। चुपचाप, शांतिपूर्वक। समय बदलता है तो आदतें भी बदल जाती हैं। आदतें बदलती हैं तो बातचीत का लहज़ा बदलता है, भाषा भी बदल जाती है। अब बदला-बदली का नमूना देखिए न कि एक जमाने में बेलबाॅटम पहना जाता था। जितनी चैड़ी मोहरी उतनी ज्यादा फैशनेबल। जमाना बदला तो चमड़ी चिपकू अर्थात् स्किनटाईट जींस ने जगह ले ली। अब पैरों की आदत तो मुड़ने की होती है। सीढ़ी चढ़नी है तो घुटने मोड़ने होंगे, कुंर्सी पर भी बैठना है तो घुटने मोड़ने होंगे इसलिए जींस में काटछांट की जाने लगी है। जगह-जगह से कटी जींस पैरों की त्वचा को श्वांस भी देती है और घुटनों को मोड़ने में सहूलीयत भी देती है। भले ऐसी जींस पहन के भिखमंगा दिखें तो दिखते रहें, फैशन तो फैशन है। बेलबाॅटम के जमाने में भी लम्बेबाल वाले लड़के पागल नज़र आते थे। मगर उन्होंने परवाह नहीं की। उस समय वे समय के साथ चल रहे थे, अब हम समय से कदमताल मिला रहे हैं।
जब हम बदल रहे हैं तो हमारी भाषा क्यों न बदले? उसे भी हक है बदलने का। जरूरी है कि नई कहावतों को अपनी पुरानी भाषा में शामिल कर लिया जाए। अब आप कहेंगे कि इससे भाषा की वाट लग जाएगी। तो लगने दीजिए वाट। हम परिवर्तन के टायर को पंक्चर तो नहीं कर सकते हैं। वह तो ट्यूबलेस टायर होता है। थोड़े दचके खाएगा मगर चलता रहेगा, चलता रहेगा। तो आइए देखें कुछ नए मुहावरों को। पहले गोलमोल बातों के लिए कहा जाता था जलेबी जैसे गोल-गोल मत घुमाओ। अब कहा जाना चाहिए कि नूडल्स जैसे मत उलझाओ। क्योंकि आजकल मधुमेह के ख़तरे बढ़ गए हैं। मिठाइयों के बारे में जितना कम सोचा जाए उतना अच्छा। उस पर नवोदित पीढ़ी जलेबियों से अधिक नूडल्स से परिचित है। यदि नवोदित पीढ़ी से कहा जाएगा कि बातों को नूडल्स जैसे मत उलझाओ, तो वह तुरंत समझ जाएगी।
एक कहावत हुआ करती है-‘‘सोलह आने सच’’। अब आज के जमाने में आना-पाई भला कौन जानता है? पहले चार आने में चार समोसे आ जाते थे, ऐसा पड़ोस के दादाजी बताते हैं। अब तो चार आने ही नहीं आते, समोसे क्या खाक आएंगे? अब तो कहावत होनी चाहिए ‘‘सोलह सौ रुपया सच’’ या फिर ‘‘सोलह बिटकाईन सच’’। अब पंद्रह-सोलह रूपयों की इतनी भी कीमत तो बची नहीं है कि उसकी साख की क़समें खाई जाएं या वास्ता दिया जाए। आज के जमाने में बीस रुपए पाव से नीचे अच्छी सब्जी मिलना भी कठिन है। इसलिए सच का भरोसा दिलाने के लिए कम से कम सोलह सौ रुपयों का वास्ता दिया जाना चाहिए। उस पर यदि बिटकाईन का वास्ता दिया जाए तो और सम्मानजनक यानी अपटुडेट लगेगा। यूं भी हम व्हाट्सएप्प विश्वविद्यालय वालों को ‘‘कमस व्हाट्सएप्प’’ की खानी चाहिए। अब आप कहेंगे कि व्हाट्सएप्प पर तो झूठ की सरिता बहती रहती है। तो यह तर्क व्यर्थ है क्योंकि अदालतों में ‘‘गीता’’ पर हाथ रख कर धड़ल्ले से झूठ बोला जाता है तो व्हाट्सएप्प का क्या गुनाह? जिसको झूठ बोलना है वह झूठ बोलेगा ही और जिसको कसमें खानी हैं वह कसम खाएगा ही। तो फिर अपडेट कसम क्यों न खाई जाए? ज़रा आज के जमाने की तो लगेगी।
एक कहावत है -‘‘कुत्ता-बिल्ली की तरह लड़ना’’। अब इसे भी बदल देना चाहिए। जब कोई दो व्यक्ति कुत्ता-बिल्ली की तरह लड़ते- झगड़ते दिखें तो उनसे कहना चाहिए कि ‘‘तुम लोग टीवी डिबेट जैसे क्यों झगड़ रहे हो?’’ दरअसल, टीवी डिबेट का स्टाईल कुत्ते-बिल्ली वाला ही होता है। अब आज आप किसी को कुत्ता-बिल्ली वाला मुहावरा बोलेंगे तो कहीं वह यह न समझ ले कि आपने उसे कुत्ता कहा या बिल्ली कहा। पता चला कि वे दोनों आपस में लड़ना छोड़ कर आपके ऊपर टूट पड़े कि ‘‘हमें कुत्ता क्यों कहा?’’ या ‘‘हमें बिल्ली क्यों कहा?’’ ठंडे दिमाग से सुनने का जमाना तो यूं भी बहुत पहले जा चुका है। आजकल तो दो लोग लड़ते हैं तो तीसरा उनका झगड़ा सुलझाने के बजाए उनकी लड़ाई का वीडियो बनाने टिक जाता है। उस तीसरे को अपनी पोस्ट के वायरल होने के लाख टके के साॅरी लाख लाईक्स के ख़्वाब दिखने लगते हैं।
‘‘गाजर मूली की तरह काटना’’ यह भी एक कहावत है। यह भी अब ओल्डफैशन हो चली है। आज कल हाथ से गाजरमूली काटने का काम सिर्फ शेफ लोग करते हैं, वह भी आमतौर पर कैमरे के सामने। अब तो हैंडी, इलेक्ट्रिक आदि तरह-तरह के कटर आने लगे हैं। घरों में भी बहुतायत सलाद-कटर काम में लाए जाने लगे हैं। यूं भी गाजर, मूली जैसे काटने की धमकी पुरानी हो चली है। अब नया मुहावरा शामिल किया जाना चाहिए कि -‘‘खबरदार जो मुझसे पंगा लिया! तुम्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल कर दूंगा।’’ या फिर ‘‘तुम्हें अपने सोशल मीडिया एकाउन्ट से ब्लाॅक कर दूंगा।’’ आजकल यह गाजर, मूली जैसे काटने से अधिक प्रभावी धमकी है। इसलिए इसे मुहावरे के रूप में स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि -‘‘ट्रोल करना’’, ‘‘ब्लाॅक करना’’, हैक करना’’ आदि-आदि।
एक कहावत है ‘‘धोबी का गधा’’। अब आप ही बताइए कि आपको कहीं चार पैर वाले गधे दिखाई देते हैं? नहीं न! तो फिर धोबी के गधे और और साहब के गधे को अलग-अलग आईडेंटीफाई कैसे करेंगे? जब गधे सामने हों और वह भी दो-तीन प्रकार के तो आप उनका वर्गीकरण करते हुए उसे कहावत में जड़ सकते हैं लेकिन जब चार पैर वाले गधे नजर ही न आते हों तो ऐसी कहावत का क्या फायदा। भला कौन समझेगा इसे? आजकल तो कपड़े धोने वाले कपड़ों का गट्ठर अपनी मोटरसाईकिल पर लाद कर ले जाते हैं, गधे की पीठ पर नहीं। इसलिए यह कहावत भी आउटडेटेड है। अब नया मुहावरा होना चाहिए ‘‘निजी कंपनी का कर्मचारी’’। यह चपरासी से ले कर सीए तक हो सकता है। सब पर फिट बैठेगी यह कहावत। सिर झुकाए, बिना ना-नुकुर किए काम करते जाइए और खुद को महत्वपूर्ण समझिए। यही दशा तो धोबी के गधे की हुआ करती थी और अब इस दशा से गुजरते हैं निजी कंपनियों के कर्मचारी। काम का बोझा पीठ पर लदा होता है फिर भी यह सोच कर खुश रहते हैं कि हमारे बिना कंपनी का काम नहीं चल सकता है। इसीलिए ‘‘धोबी का गधा’’ के बजाए ‘‘निजी कंपनी का कर्मचारी’’ कहावत अधिक सटीक रहेगी।
बस एक कहावत अजर, अमर और स्थाई है, वह है-‘‘इंडियन टाईम’’। यह लगता है कि कभी पुरानी नहीं पड़ेगी। कभी आउट डेटेड नहीं होगी। चाहे किसी से भेंट करने का समय हो या किसी आयोजन के आरम्भ होने का समय, दस-पन्द्रह मिनट से ले कर दो-तीन घंटे की देरी तो मामूली बात है। पहले देर करना और फिर बत्तीसी दिखाते हुए ढिठाई से उवाचना कि ‘‘अभी देर थोड़े ही हुई है। ये तो इंडियन टाईम है।’’ इसलिए ‘‘इंडियन टाईम’’ वाली कहावत हमेशा समकालीन बनी रहेगी। लेकिन एक कहावत ऐसी है जो पुरानी पड़ चुकी है और उसे बदला जाना चाहिए, वह है-‘‘खाट खड़ी होना’’। अव्वल तो आजकल घरों में खाट होती नहीं है, पलंग होते हैं, सिंगल-पिंगल, किंग साईज़, क्वीन साईज़ आदि-आदि। जहां खाट होती भी है वहां वह बिछी ही रहती है। खडी-वड़ी नहीं की जाती है। इसलिए यह कहावत बदल कर अब कर देनी चाहिए ‘‘वाट लगना’’। यूं तो ये मुंबइया कहावत है और वहां के लिए पुरानी भी है लेकिन अब आजकल यह ‘‘हैशटेग ट्रेंड’’ यानी चलन में बनी रहती है। इसलिए हिन्दी कहावतों में ‘‘वाट लगना’’ को भी सर्वसम्मति स्वीकार किया जाना चाहिए।
तो, ये तो थीं कुछ कहावतें जिनके अपडेटेशन के बारे में मैंने सोचा अब कुछ कहावतों के बारे में आप सोचिए। इससे सोचने की आदत पड़ेगी जो छूटती जा रही है। यानी एक पंथ दो काज। या फिर सोशल मीडिया की कहावत में कहिए कि ‘‘एक पोस्ट से कई शिकार’’। 
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(नवभारत, 13.03.2022)
#व्यंग्य #हिंदीव्यंग्य  #हिंदीसाहित्य  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #नवभारत #कहावतें

Sunday, February 27, 2022

मौसम ईडी और सीडी का | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "मौसम ईडी और सीडी का" ...😀😊😛
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व्यंग्य | मौसम ईडी और सीडी का
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

देश में चार मौसम पाए जाते हैं। लेकिन एक मौसम ऐसा है जो अकसर चुनाव के मौसम के साथ नत्थी हो कर आ जाता है। ऐसा लोग कहते हैं, मैं नहीं। लेकिन लोगों का कहना बहुत महत्व रखता है। यह हमारे जातीय संस्कार हैं कि हम जनचर्चा में अगाध रुचि रखते हैं। इतनी रुचि कि मोहल्ले की जनचर्चा में भागीदारी आरम्भ करते समय हमारा यही उवाच होता है कि -‘‘मेरे पास बिलकुल टाईम नहीं है, फिर भी पांच मिनट रुक सकती हूं। जो बताना हो जल्दी बताओ।’’ यह जल्दी वाकई जल्दी ही होती है क्योंकि पांच मिनट का कहने के बाद यही कोई पचास मिनट तो जनचर्चा में रुकना हो ही जाता है। अब चूंकि यह पचास घंटे तक भी संभव है इसीलिए पचास मिनट को मैंने जल्दी चर्चा सम्पन्न होना कहा।
इसी तरह की एक जनचर्चा में कल मेरा रुकना हुआ। पांच-छः लोगों को जोड़ कर खड़े हुए भैैयाजी जोर-शोर से बतिया रहे थे। उनकी कृपादृष्टि मुझ पर पड़ी तो दूर से ही चिल्ला कर बुलाने लगे-‘‘अरे लेखिका जी, कहां जा रही हैं? यहां बहुत गंभीर मुद्दे पर चर्चा चल रही है और आप इसमें शामिल नहीं होंगी तो यह चर्चा अधूरी रह जाएगी।’’
स्पष्ट था कि यह मक्खनबाज़ी मुझे रोक कर अपना ज्ञान बखानने के लिए की जा रही थी। यह भी तय था कि अगर मैं नहीं रुकती तो भैया जी बुरा मान जाते। अतः मुझे उनकी टीवी ब्रांड इस जनचर्चा में रुकना पड़ा। टीवी ब्रांड इस लिए कहा मैंने क्योंकि उनकी चर्चाओं में कुल जमा चार-छः लोग ही शामिल रहते हैं लेकिन उनमें कुछ लोग एक साथ इतनी जोरदार आवाज़ में बोलते हैं मानो कोई अच्छा-खासा झगड़ा हो रहा हो। इससे लाभ यह होता है कि बीच-बीच में दो-चार मिनट की भीड़ भी जुड़ती रहती है। लोग झगड़ा देखने का आनंद उठाने के लिए रुकते हैं और जैसे ही उन्हें समझ में आता है कि ये तो टीवी ब्रांड बहस है तो मायूस हो कर आगे बढ़ लेते हैं। जो चीज़ घर में सोफे पर पसर कर या बिस्तर पर औंधे लेट कर देखा जा सकता है उसे देखने के लिए सड़क पर खड़े रह कर क्यों टांगे दुखाई जाएं। फिर टीवी की बहसें देखते समय बारमूडा या मैक्सी में भी नेशनल डिबेट में शामिल होने का अनुभव होता है, वह सड़क की जनचर्चा में कहां? बाकी महिलाओं का मामला अलग है क्योंकि उनकी जनचर्चा के विषय टीवी पर कभी आ ही नहीं सकते हैं, वे तो मोहल्ले में ही संभव हैं कि किसने नई-नई साड़ियां खरीदी, किसके घर नया फ्रिज आ गया या फिर किसके घर में मियां-बीवी के बीच घमासान युद्ध हुआ, आदि-आदि।
हां, तो भैयाजी ने अपनी उस जनचर्चा में मुद्दा उठा रखा था ईडी का। उसका कहना था कि जब भी किसी राज्य में चुनाव के दिन निकट आते हैं तो किसी न किसी बाहुबली के ठिकानों पर ईडी के छापे पड़ जाते हैं। इस मुद्दे पर उन्होंने मेरी राय जाननी चाही,‘‘आप ही बताइए बहनजी, मैं सही कह रहा हूं कि नहीं?’’
‘‘ये तो सरासर तीर-तुक्का है भैयाजी! अरे, चुनाव से ईडी का क्या ताल्लुक? ईडी तो अपनी जानकारी जुटाती रहती है। अब जानकारी जुटाते-जुटाते चुनावों का समय आ जाता है तो इसमें भला ईडी का क्या दोष?’’ मैंने भैयाजी की बात का खंडन करते हुए कहा।
‘‘अरे वाह! आपतो ईडी का पक्ष ले रही हैं। आप क्यों डर रही हैं? आपने कौन-सी मनीलांड्रिंग कर ली है जो आपको ईडी का डर हो?’’ भैयाजी भड़क गए।
‘‘मैं क्यों डरूंगी? मनी लांड्रिंग तो दूर दो साल से तो मैंने कपड़े भी लांड्री में नहीं धुलवाए हैं। मुझे लांड्रिंग-वांड्रिंग से क्या लेना-देना? रहा सवाल चुनाव का तो मुझे कभी चुनाव में खड़े नहीं होना है इसलिए डरने का कोई सवाल ही नहीं है।’’ मैंने कहा।
‘‘हां, देखिए आपने भी यह बात कह ही दी न कि जो चुनाव में खड़ा होता है उसकी मनी लांड्रिंग पकड़े जाने का ख़तरा होता है।’’ भैया जी खुश हो कह उछल पड़े। उन्होंने मेरे शब्दों को पकड़ जो लिया था।
‘‘देखिए आप मेरी बात को तोड़-मरोड़ रहे हैं, मैंने ऐसा बिलकुल नहीं कहा।’’ मैंने प्रतिवाद किया।
‘‘ठीक है, आपने सीधे-सीधे नहीं कहा लेकिन आड़े-टेढ़े तो कहा।’’ भैयाजी मेरे कथन को अपने समर्थन में साबित करने के लिए कटिबद्ध थे।
‘‘चलिए ठीक है, मैंने कहा तो कहा, लेकिन ये बताइए कि राजनीति में दखल रखने वाले लोग मनी लांड्रिंग जैसा काम करते ही क्यों हैं? अगर ऐसा काम न करें तो चाहे चुनाव का मौसम हो या पतझर का, उन पर ईडी का छापा पड़ेगा ही क्यों? बताइए, आप ही बताइए? चोर चोरी करेगा तो कभी तो पकड़ा ही जाएगा। अब अगर चुनाव के मौसम में पकड़ा जाए तो सब उसे चुनाव से जोड़ कर देखने लगते हैं।’’ मैंने भी अपना पक्ष रखा।
‘‘तो बहन जी, आप क्या सोचती हैं कि ये बाहुबली क्या ऐसे फोकट में बन जाते हैं? उसके लिए मनी की ज़रूरत होती है मनी की। अगर आप बाहुबली हैं तो आपके चुनावी टिकट पाने के आसार मजबूत होते हैं वरना हम-आप जैसों को टिकट न बांट दी जाती?’’ भैयाजी जो खुद भी एकाध बार टिकट पाने का सपना देख चुके हैं, दुखी हो कर बोले।
‘‘भैयाजी, दिल छोटा मत करिए। अच्छे लोगों को भी टिकट मिलती है। रहा सवाल ईडी के छापे का तो क्षेत्रीय चुनावों में तो उम्मींदवारों की आपत्तिजनक फ़र्ज़ी सीडी भी चला दी जाती है। चुनावी मौसम में बहुत कुछ होता है, कुछ संयोग से कुछ दुर्याेग से। आप क्यों इस बहस में पड़ रहे हैं?’’ मैंने भैयाजी को समझाया।
‘‘यही तो चक्कर है बहनजी, चुनाव के दौरान चली आपत्तिजनक सीडी फ़र्जी होती हैं लेकिन ईडी तो सौ बिटकाईन सच होती है।’’ भैया जी बोले। वे सौ टका के बदले सौ बिटकाइन बोलना पसंद करते हैं क्यों कि उनकी पोती टका नहीं जानती है लेकिन बिटकाइन जानती है।
खैर, बहस तो हज़ार पैर वाली सेंटीपीड होती है जो रेंगती-रेंगती किसी भी दिशा में मुड़ सकती है। इसलिए मैंने वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी,‘‘मैं जा रही हूं। वैसे आप चाहे तो ईडी और सीडी के मौसम का आनंद लीजिए। क्योंकि मुझे पता था कि अब चर्चा की दिशा सीडी की ओर मुड़ जाएगी और पिछले चुनावों के किस्से चटखारे ले-लेकर कहे-सुने जाएंगे। बेशक़, चुनावों काल की यही तो खूबी है कि हज़ार संयोग, हज़ार दुर्योग और हज़ार किस्से ईडी और सीडी की तरह मौसम बन कर साथ चले आते हैं।
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(नवभारत, 27.02.2022)
#व्यंग्य #हिंदीव्यंग्य  #हिंदीसाहित्य  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #नवभारत #ईडी #सीडी #चुनाव #Satire

Sunday, February 13, 2022

नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला" ...😀😊😛
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व्यंग्य 
नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
     क़सम से! कोरोना वायरस को किसी ने यदि उकसाया है तो वह है वायरल करने की हमारी प्रवृत्ति ने। कोई सेलीब्रिटी छींक भी दे तो वह पोस्ट वायरल हो जाती है। इंटरनेट में वायरल होना एक जुनून है। इसीलिए जब कोरोना वायरस ने देखा और सोचा कि ‘‘इंसानों को वायरल होने का शौक़ चढ़ा हुआ है तो ज़रा अपुन भी वायरल हो कर दिखा दें। अपुन तो वायरस हैं ही।’’ मजे की बात तो ये है कि वायरल होने की इस दौड़ में कोरोना थक कर अपना बोरियर-बिसतर समेटने की तैयारी में लग गया है लेकिन इंसान नहीं थके हैं। आजकल जिधर देखो ‘‘हैशटैग हिज़ाब’’ ही दिखाई देता है। इन दिनों ‘‘हैशटैग हिज़ाब’’ इतना ट्रेंड कर रहा है कि अगर यह शेयर बाज़ार के सेंसेक्स के कांटे पर खड़ा हो जाए तो एक ‘‘बूम’’ के साथ कांटा टूट जाए। खैर, बहती गंगा में सभी हाथ धोते हैं। मुझे लगा कि भैयाजी इस मामले में पीछे थोड़े ही रह सकते हैं, उन्होंने भी शाम-सवेरे ‘‘हैशटैग हिज़ाब’’ पर एक न एक पोस्ट डालने का मोर्चा सम्हाल रखा होगा।
‘‘भैयाजी! कैसा चल रहा है आपका हैशटैग हिज़ाब?’’ भैयाजी जैसे ही मिले, वैसे ही मैंने एक टीवी रिपोर्टर की भांति उन पर प्रश्न का गोला दाग़ दिया।
‘‘काहे का हैशटैग हिज़ाब? इस पल्टी मारती ठंड में खिज़ाब लगाना तक तो मुश्क़िल हो रहा है और आप पूछ रही हैं हिज़ाब के बारे में!’’ भैयाजी अपने सफ़ेद हो चले बालों पर हाथ फेरते हुए बोले।
‘‘अरे वाह, ये कैसी बात कर रहे हैं आप? आप तो हर ट्रेंड करते मुद्दे के साथ गलबहियां डाल कर खड़े रहते हैं, फिर इस बार यह अनमनापन क्यों?’’ मुझे जिज्ञासा हुई। कहीं कोई जेंडर डिस्कोर्स का मामला तो नहीं है? वैसे भैयाजी स्त्री-अधिकारों के पक्के समर्थक हैं। अतः उनसे ऐसी उम्मींद तो नहीं है। फिर भी मैंने पूछ लिया-‘‘क्यों भैयाजी, ये महिलाओं का मुद्दा है, इसलिए आप हिचक रहे हैं क्या?’’
‘‘कैसी बात कर रही हैं आप? आप तो जानती हैं कि महिलाएं पीछे रह जाएं पर मैं उनके हक में पहले खड़ा मिलता हूं। मगर इस मुद्दे में दो पेंच हैं।’’ भैयाजी ने चिंतन की मुद्रा में कहा।
यह सुन कर मैं खुश हुई कि मेरा तीर सही निशाने पर लगा। अब हिज़ाब मामले में भैयाजी की उदासीनता के असली कारण का पता चलेगा। 
‘‘तो अब बता भी दीजिए कि आपकी चुप्पी का कारण क्या है? अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के चुनाव पर तो आपने ऐसे कूद-कूद कर टिप्पणियां पोस्ट कीं जैसे चुनाव उत्तर प्रदेश में नहीं वरन अपने मध्यप्रदेश में हो रहे हों। जबकि हिज़ाब के मामले में तो अपने मध्यप्रदेश में भी बोल-बच्चन हो रहा है और आप चुप हैं। उस पर आप कह रहे हैं कि इस मुद्दे में दो पेंच हैं?’’ मैंने भैयाजी को ज़रा और उकसाया।
‘‘बिलकुल! इसमें दो पेंच हैं। पहला पेंच तो ये कि अपने पढ़ाई-लिखाई की उम्र में विद्यार्थियों को ऐसे विवाद में पड़ना ही नहीं चाहिए। उस पर दूसरा और सबसे बड़ा पेंच ये है कि अभी नक़ाब यानी मास्क के दिन लदे नहीं हैं कि हिज़ाब की चिंता में लोग दुबले होने लगे। पिछले डेढ़-दो साल से हर मौसम में नक़ाब लगा-लगा कर चेहरे की रंगत ही दो रंगी हो गई है। पिछली गर्मियों का सनबर्न अभी तक ठीक नहीं हुआ है। मास्क न लगाओ तो भी ऐसा दिखता है कि मास्क लगा हुआ है। ये देखो, मास्क वाला हिस्सा गोरा है जबकि बाकी काला पड़ गया है। देखो, ठीक से देखो!’’ भैयाजी ने अपना चेहरा मेरे आगे कर दिया। उनकी बात सही थी। उनका बदरंगा चेहरा देख कर मुझे भी अपने चेहरे पर दया आने लगी। मेरे चेहरे की दशा भी उनसे अलग नहीं है। 
‘‘आपने सही कहा।’’ मैंने उनकी बात का दिल से समर्थन किया। 
‘‘आई एम आॅलवेज़ राईट!’’ भैयाजी को शान आ गई। वे सोशल मीडिया के क्रंातिकारी नेता की तरह बोल उठे,‘‘अरे, सिर-चेहरा ढंाकने का जो मुद्दा उठाना था उसके लिए थोड़ी प्रतीक्षा की जानी चाहिए थी। अभी तो नक़ाब से ही पीछा नहीं छूटा है। और आप बुरा मत मानिएगा शरद जी, इस नका़ब यानी मास्क के पहले भी तो बालिकाएं चेहरे पर लंबा दुपट्टा बांध कर अरेबियन बनी घूमती थीं। जैसे उन्हें अक्षय कुमार के ‘बुर्ज़ ख़लीफा’ पर अपना हवाईजहाज लैण्ड करना हो। अब आप ही बताइए कि धूप से और कभी-कभी अपने घर वालों से छिपने के लिए ही सही लेकिन रहती तो पर्दे में ही थीं। तो फिर अब हंगामा क्यों? फिर वो वाला पर्दा धर्म निरपेक्ष था। वह हर धर्म की बालिकाओं के चेहरे पर होता था।’’ भैयाजी की भावनाएं वायरल होने की दिशा में बहकने लगीं। सो, मैंने उन्हें टोका।
‘‘बस-बस, भैयाजी! आप अब धर्म-वर्म की बातें मत करो। ये कोई चुनाव क्षेत्र नहीं है और न आप किसी राजनीतिक पार्टी से हो। आपको ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं। आप तो इस मुद्दे पर ही अपना पक्ष तय नहीं कर पा रहे हो कि स्कूलों में छात्राएं हिज़ाब लगा सकती हैं या नहीं?’’ मैंने उन्हें आगाह किया।
‘‘ठीक है, अभी मैंने अपना पक्ष तय नहीं किया है। जिधर का पलड़ा भारी दिखेगा, उधर का रुख कर लूंगा।’’ भैयाजी बोले।
‘‘यानी अवसरवादिता!’’
‘‘जी हां, अवसरवादिता ही तो है जो हारी हुई पार्टी के होनहारों को विजयी पार्टी के पाले में पहुंचने की प्रेरणा देती है और उन्हें कैबिनेट मिनिस्टर तक बनवा देती है। फिर मैं भी अवसरवादी क्यों न बनूं? बाकी, इसलिए तो मुझे बालिकाओं की नासमझी पर दुख हो रहा है कि नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का किस्सा छेड़ कर उन्होंने ज़ल्दबाज़ी से काम लिया है। अरे, कोरोना वायरस को पूरी तरह से टाटा-टाटा, बाय-बाय तो कर लेने देतीं।’’ भैयाजी ने ऐसा उदासा मुंह बना कर कहा कि मुझे हंसी आ गई।
‘‘हंस लीजिए, हंस लीजिए! आपकी हंसी भर सुनाई दे रही है, हंसता हुआ मुंह तो दिख नहीं रहा है।’’ भैयाजी भी चिढ़ाते हुए बोले,‘‘इस जमाने में तो नक़ाब और हिज़ाब सब बराबर हैं, सिर्फ़ दिखता है तो खि़ज़ाब!’’
जी हां, भैयाजी की बात में दम तो है। है न!  
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(नवभारत, 13.02.2022)
#व्यंग्य #हिंदीव्यंग्य  #हिंदीसाहित्य  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #नवभारत #नक़ाब #हिज़ाब #खिज़ाब #Satire

Sunday, January 30, 2022

ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर" ...😀😊😛
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व्यंग्य
ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

ग्लैमर एक ऐसी चीज है जो बड़े-बड़े तपस्वियों के तप भंग करने का माद्दा का रखता है। पुराणों में अनेक ग्लैमर सुंदरियों की चर्चा है जैसे उर्वशी, मेनका, रंभा, संभा आदि-आदि। ग्लैमर का महत्व देवताओं के राजा इन्द्र बखूबी जानते थे। इसीलिए जब उन्हें किसी ऋषि का तप भंग करना होता था तो वे अपनी सभा की ग्लैमर सुंदरी को उसके पास नाचने, गाने, रिझाने भेज दिया करते थे। महर्षि विश्वामित्र भी इससे अछूते नहीं रहे। मेनका स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा थी। महान तपस्वी ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के निर्माण के लिए जब तपस्या शुरू की तो उनके तप से देवराज इन्द्र ने घबराकर उनकी तपस्या भंग करने के लिए मेनका को भेजा। मेनका ने अपने रूप और सौंदर्य से तपस्या में लीन विश्वामित्र का तप भंग कर दिया। दरअसल, इन्द्र ने कभी नहीं चाहा कि कोई उसकी बराबरी कर सके। वाह, कितना अच्छा बाज़ारवादी था इन्द्र। प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी उसकी। आजकल बाज़ारवाद में भी तो यही होता है। अपने प्रोडक्ट की साख बनाए रखने के लिए दूसरे की साख को सिलबट्टे में पीस दिया जाता है। लेकिन यहां बात सिलबट्टे की नहीं हो रही है। यूं भी सिलबट्टा आउटडेटेड हो चला है। इलेक्ट्रिक ग्राइंडर के जमाने में सिलबट्टे को कौन पूछे। अगर बाहों की मसल्स बनानी ही है तो चमचमाते जिम और होमजिम तो हैं ही।
खैर, बात हो रही थी ग्लैमर की। तो अब ग्लैमर की दुनिया में गोबर को भी शानदार जगह मिल गई है। निश्चित रूप से यह गायों के लिए बड़ी खुशखुबरी है। उन्हें गर्व होगा यह जान कर। वरना विलायती फंड से फंडित होने वाले बड़े-बड़े अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में ‘‘काऊ डंग’’ को अस्पृश्य समझा जाता है। मुझे भी यह बात पता नहीं थी क्योंकि मैं तो हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूल की छात्रा रही हूं। लेकिन मेरी एक सहेली की बेटी उन दिनों विलायती फंड से फंडित होने वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ती थी। एक दिन मेरे घर में दाल-बाटी बनी तो मैंने सहेली को सपरिवार आमंत्रित किया। मेरी सहेली ने स्पष्टशब्दों में मुझे बताया कि वह और उसके पतिदेव तो आ जाएंगे लेकिन उसकी बेटी नहीं आएगी।
‘‘क्यों, क्या वह बहुत व्यस्त है? एक्जाम-वेक्जाम हैं क्या?’’ मैंने उससे जानना चाहा।
‘‘अरे नहीं, है तो फ़ुर्सत में लेकिन मुझे पता है कि वह नहीं आएगी।’’ मेरी सहेली ने अटपटा सा उत्तर दिया।
‘‘ऐसा क्यों? क्या वह मुझसे नाराज़ है?’’ मैंने पूछा।
‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है।‘‘ मेरी सहेली मुझे छोटा-सा उत्तर दे कर रह गई। इस पर मुझे गुस्सा आने लगा।
‘‘बात क्या है? साफ़-साफ़ बताओ!’’ मैंने उससे धमकाने की मुद्रा में पूछा।
‘‘उसे बाटियां पसंद नहीं हैं।’’ मेरी सहेली ने बताया। मगर मुझे यह बात हज़म नहीं हुई। भला कौन होगा जिसे दाल-बाटी पसंद न हों। जिसके मुंह में दांत न हों और नकली बत्तीसी भी न लग पाई हो वह भी दाल में बाटियों को मीड़-मीड़ कर चाव से खाता है। यानी मामला कुछ और है।
‘‘मुझे तुम्हारी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है, सही-सही बताओ!’’ मैंने फिर कठोरता से पूछा। तब कहीं जा कर उसने झिझकते हुए बताया कि-‘‘वो... बात ये है कि बाटियां गोबर के कंडे में बनती हैं न, और इसीलिए मेरी बेटी को पसंद नहीं है। वह तो बाटियां देखते ही चिढ़ जाती है कि ये तो काऊ डंग (गोबर) पर बनी हैं, मैं नहीं खा सकती इन्हें। वह तो गोबर या कंडे को हाथ भी लगाना पसंद नहीं करती है। बस, यही कारण है।’’
‘‘यानी उसने आज तक दाल-बाटी खाई ही नहीं?’’ मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मालवा में रहने वाला जैसे दाल-बाफले खाए बिना नहीं रह सकता है, वैसे ही बुंदेलखंड में रहने वाला दाल-बाटी का स्वाद न चखे, यह कैसे संभव है?
‘‘नहीं, उसके लिए माइक्रोवेव ओवन में बना दिया करती हूं।’’
‘‘पर, वह स्वाद कहां जो कंडे की आग में सिकीं बाटियों में होता है। तुम अपनी बेटी को समझाती क्यों नहीं कि गोबर और कंडा पवित्र वस्तुएं हैं। कंडा तो हवन-पूजन में भी काम में लाया जाता है।’’ मैंने सहेली को उलाहना दिया।
‘‘मैं कई बार समझा चुकी हूं। लेकिन उसके स्कूल में उसे यही सिखाया जाता है कि गोबर ‘‘काऊ डंग’’ होता है। तुम समझ रही हो न!’’ सहेली ने अपनी विवशता प्रकट करते हुए मुझसे कहा।
‘‘ठीक है, मैं समझ गई।’’ अब जबर्दस्ती तो किसी को कुछ खिलाया नहीं जा सकता है। मैंने भी कहा,‘‘उसके लिए मैं कुछ और बना लेती हूं। उसे भी साथ ले आना।’’
इसीलिए जब मैंने ऑन लाईन शाॅपिंग साईट पर ‘‘काऊ डंग केक’’ शब्द पढ़ा और उसके साथ लगा प्रोडक्ट का फोटो देखा तो कुछ जानी-पहचानी-सी चीज लगी। एक और क्लिक करके उस प्रोडक्ट के विवरण पर गई तो मैंने पाया कि यह तो गोबर के कंडों यानी उपलों का विज्ञापन था। करीने से पैक किए गए। एक साईज़ के। किसी खाने की वस्तु के समान। अत्यंत आकर्षक। मार्केटिंग पर एकदम खरे उतरने वाले। उन्हें देख कर मेरी आंखों में आंसू आ गए। ये दुख के नहीं, खुशी के आंसू थे। कम से कम अब मैं उस बालिका का तप भंग करने में क़ामयाब हो जाऊंगी।
चाहे मैं ऑन लाईन शाॅपिंग करूं या न करूं लेकिन अपनी सहेली की बेटी को एक दिन खाने पर अपने घर आमंत्रित ज़रूर करूंगी और उसे यही बताऊंगी कि अब जो मैंने बाटियां बनाई हैं वे लोकल गायों के लोकल गोबर से बने कंडों पर नहीं सेंकी हैं बल्कि ऑन लाईन शाॅपिंग कर मंगाए गए ‘‘काऊ डंग केक’’ की आग में सेंकी गई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इंटरनेट मार्केटिंग जेनरेशन वाली वह बालिका उन बाटियों को सहर्ष ग्रहण कर लेगी। आखिर उस ‘‘काऊ डंग केक’’ के पीछे उच्चकोटि के मार्केटिंग डिवीज़न ने महीनों काम किया होगा। आकार, प्रकार, प्रचार, प्रसार सब का ध्यान रखते हुए उसे ग्लैमरस बनाया  होगा। तब कहीं जा कर एक मल्टी नेशनल ऑन लाईन शाॅपिंग साईट पर उसे लांच किया गया होगा। लिहाज़ा, ‘‘काऊ डंग केक’’ के इस ग्लैमर से वह बालिका अछूती कैसे रह सकेगी? अब तो उसे बाटियां खाने में कोई समस्या नहीं होगी। वाकई मैं नतमस्तक हूं ग्लोबल होते गोबर के ग्लैमर के सामने। 
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(नवभारत, 30.01.2022)
#व्यंग्य #हिंदीव्यंग्य  #हिंदीसाहित्य  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #नवभारत #गोबर #ग्लोबल #ग्लैमर #काऊ #डंग #केक #ऑनलाइनशॉपिंग

Sunday, January 16, 2022

बेचारे बदरंगे बैंगन | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


प्रिय ब्लॉग साथियों, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "बेचारे बदरंगे बैंगन" ...😀😊😛
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Navbharat, Vyangya, 16.01.2022 - Dr (Miss) Sharad Singh




व्यंग्य
बेचारे बदरंगे बैंगन 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

यूं तो जब से कड़ाके की ठंड पड़नी शुरू हुई तब से रजाई और कंबल से कुछ अधिक ही प्रेम बढ़ गया है। घड़ी का निठल्ला कांटा जिसे समय दिखाने के अलावा और कुछ काम ही नहीं है, जब सुबह के सात पर जा पहुंचता है तो झक मार कर रजाई से विदा लेनी पड़ती है। रजाई भी इस बात से व्याकुल हो उठती है कि उसे अब दिन भर मेरा विरह सहना पड़ेगा। उसकी व्याकुलता देख मेरा दिल टुकड़े-टुकड़े होने लगता है लेकिन किया क्या जाए, मुआ नल में पानी भी तो साढ़े सात तक आ ही जाता है। पानी आने से पहले बहुत सारे काम निपटा लेने ज़रूरी होते हैं। 
आज भी सुबह सात बजे रजाई का विछोह सहन करते हुए नल में पानी आने से पूर्व और पानी भरने से ले कर पानी जाने के बाद तक के सारे काम निपटा कर मैं चाय का प्याला लेकर बाहर निकली। सोचा ज़रा धूप ले ली जाए। यही तो मौसम है विटामिन डी लेने का। वरना गर्मी में यही धूप विटामिन डी की जगह डेंजरस लगने लगेगी। तो मैं जैसे ही चाय का प्याला ले कर घर के बाहर निकली वैसे ही सब्ज़ीवाला हाथठेला ले कर सामने आ खड़ा हुआ।
‘‘दीदी, कुछ ले लो। भिंडी है, नए आलू हैं, टमाटर, बैंगन, पत्ता गोभी....।’’ उसने सब्ज़ियां गिनानी शुरू की। 
‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए! अभी रखी हैं सब्ज़ियां।’’ मैंने मना किया।
‘‘ले लो दीदी, अभी तुषार पड़ जाएगा तो सब्ज़ियां मंहगी हो जाएंगी। बारिश में तो ख़राब हो ही गई हैं।’’ बातूनी सब्ज़ीवाला पीछा छोड़ने के मूड में नहीं था। मैंने उससे पीछा छुड़ाने की गरज से उसके ठेले पर सजे बैंगनों की ओर इशारा करते हुए पूछा,‘‘ये इन बैंगनों को क्या हो गया? कितने बदरंगे दिख रहे हैं। कहां से ले आए ये? ज़रूर ये दवा डले हुए होंगे। अच्छे होते तो मैं ले लेती।’’
‘‘अरे, दीदी! ये बैंगन अंदर से अच्छे ही हैं। कहो तो काट के दिखा देता हूं। इनमें बीज नहीं मिलेंगे, गूदा ही गूदा मिलेगा। अच्छे रसीले हैं, बरमान घाईं।’’ सब्ज़ीवाले ने कहा। दरअसल, नर्मदा के तट पर बसे बरमान के बैंगन बहुत प्रसिद्ध हैं। हर सब्ज़ीवाला अपने बैंगन को या तो बरमान का घोषित कर देता है या फिर बरमान के बैंगनों जैसा। जैसे ग़ज़क कहीं भी बने लेकिन उस पर ग्वालियर का ठप्पा ज़रूर लगा दिया जाता है। 
‘‘लेकिन ये देखने में ही बुरे दिख रहे हैं, एकदम बदरंगे।’’ मैंने फिर बैंगनों सूरत पर छींटा कसा, ‘‘अभी तो तुषार भी नहीं पड़ा फिर ये बदरंगे कैसे हो गए?’’ मैंने उसी की बात से उसे पकड़ने की कोशिश की। 
‘‘मैंने कब कहा कि बैंगन को तुषार लग गया है? अब जे ऐसे काए हो गए हैं, जे न पूछो आप।’’ सब्ज़ीवाले ने बुंदेली मिश्रित हिन्दी में कहा। 
‘‘हां, तुम क्या बताओगे? वैसे ही दिखाई दे रहा है कि ये हानिकारक दवा डले बैंगन हैं। तभी तो बदरंगे हो गए हैं।’’ मैंने फिर कटाक्ष किया।
‘‘अरे नहीं दीदी, इनपे कोई दवा-अवा नहीं डली है। ये तो शरम के मारे बदरंगे हो गए हैं।’’ सब्ज़ीवाले की बात सुन कर मैं चकित रह गई। ऐसे उत्तर की आशा मुझे नहीं थी। 
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ मैंने उससे पूछा।
‘‘मतलब जे कि आजकल नेता हरें बैंगन घांई हो गए हैं। बल्कि उन्ने तो बैंगनों को भी मात कर दिया है। चुनाव आए नहीं कि थाली के बैंगन घांई इते से उते होने लगते हैं। आपने टीवी पे समाचार नहीं देखा क्या?’’ उसने उल्टे मुझसे प्रश्न कर दिया।
‘‘देखा है न! रोज़ देखी हूं समाचार।’’ मैंने कहा।
‘‘सो, आपने देखा ई होगा कि कित्ते नेता रोज के रोज इते से उते हो रहे हैं, इत्ते तो थाली के बैंगन भी नहीं होत हैं। जेई से हमाए जे बैंगन शरम से लाल हो गए। बाकी जे ठहरे हरे वाले सो, पूरे लाल तो न हो पाए, बदरंगे हो कर रह गए हैं, बेचारे हमाए बैंगन।’’ सब्ज़ीवाले ने भोलेपन का प्रदर्शन करते हुए कहा।
इतनी गहरी बात। मैं उसकी समझ देख कर दंग रह गई। कहावत का इतना अच्छा प्रयोग तो हिन्दी साहित्य के एम.ए. के छात्र भी नहीं कर पाएंगे, जितना सटीक प्रयोग उसने किया। 
‘‘तो दीदी, कित्ते तौल दूं बैंगन? आधा किलो कि एक किलो?’’ सब्ज़ीवाले ने मेरी मनोदशा देखते हुए मौके का फ़ायदा उठाने की कोशिश की। उसका तीर निशाने पर लगा था। वह अपने बदरंगे बैंगनों की बेगुनाही के लिए दमदार दलील दे चुका था और वह सफल भी हो गया। उसकी बातों से प्रभावित हो कर मेरे मुंह से बिना सोचे-समझे निकला,‘‘अच्छा एक किलो तौल दो!’’ 
वह भारी प्रसन्न होता हुआ बोला, ‘‘आप खुद ई छांट लो!’’
‘‘अरे, अब क्या छांटना है? छांटा-छांटी तो वहां चल रही है जहां चुनाव होने हैं। इन बेचारे बैंगनों को क्या छांटना? तुम तो अपने हिसाब से तौल दो।’’ मैंने उसकी दलील के सम्मोहन में आ कर बैंगन खरीद लिए। सब्ज़ीवाला मुझे बैंगन टिका कर चला गया और मैंने उन बैंगनों को रसोई घर में ला कर थाली में नहीं रखा बल्कि टोकरी में ही रहने दिया। थाली में रखने से कहीं बैंगन और अधिक शरमने लग सकते थे और इससे उनका बदरंगापन बढ़ जाता। उफ! बेचारे बदरंगे बैंगन, उनकी तो थाली भी छिन गई। उनकी थाली पर तो अब दूसरे ही लुढ़कने लगे हैं। 
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(नवभारत, 16.01.2022)
#व्यंग्य #हिंदीव्यंग्य  #हिंदीसाहित्य  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #नवभारत #चुनाव  #थालीकाबैंगन   #बैंगन  #बदरंग

Sunday, January 9, 2022

कुछ त्रुटियां अच्छी होती हैं | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा नन्हा-सा व्यंग्य लेख "कुछ त्रुटियां अच्छी होती हैं" ...😀😊😛
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व्यंग्य
कुछ त्रुटियां अच्छी होती हैं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

आज सुबह जब मैंने व्हाट्एप्प ग्रुप पर दृष्टिपात किया तो मन प्रसन्न हो गया कि जिस ग्रुप में मैं अपनी कोई प्रकाशित रचना शेयर नहीं करती हूं और न ही कोई ग्रुप का सदस्य मेरी रचना को ग्रुप में शेयर करने की कृपा करता है, उस ग्रुप में मेरा एक लेख चमक-दमक रहा था। मैंने गौर से देखा कि मेरे उस लेख पर इतनी कृपा किस कृपानिधान ने की? तो देख कर आश्चर्य हुआ कि जिसने कृपा की थी उन्होंने भूले-भटके ही मेरे लेखन की तारीफ़ की है। फिर आज यह कृपा क्यों? मुझे खटका हुआ कि कोई तो गड़बड़ है। उस समय तक मैंने अपना वह लेख नहीं देखा था जो उसी दिन प्रकाशित हुआ था। अब ये सोशल मीडिया भी ऐसी चिपकू चीज है कि जो एक बार आपसे चिपकी तो अलग होने का नाम नहीं लेती है। यह प्रभाती बन कर जगाती है और लोरी बन कर सुलाती है। अतः जब आप सुबह सो कर उठते हैं तो सबसे पहले सोशल मीडिया में ही ताक-झांक करते हैं। मैंने भी वही किया यानी उस समय तक वह अख़बार उठा कर नहीं देखा जिसमें मेरा लेख छपा था मगर व्हाट्सएप्प ग्रुप में झांक लिया था। 
व्हाटसएप्प ग्रुप में अपना लेख देखने के बाद मैंने तत्काल अख़बार उठा कर देखा। अपने लेख की छानबीन की तो पाया कि मेरे लेख के शीर्षक की जगह त्रुटिवश दूसरा शीर्षक छप गया है। इस त्रुटि को देखते ही मेरी समझ की घंटी बज गई कि यह कारण है मेरे लेख को ग्रुप में शेयर करने का। मेरी आंखों के सामने वह दृश्य खिंच गया कि जब उन सज्जन ने मेरा लेख देखा होगा और उसका शीर्षक दूसरे विषय का पाया होगा तो वे भारी प्रसन्न हुए होंगे कि ‘‘चलो, आज एक गलती पकड़ी गई।’’ फिर उन्होंने उसे फटाफट शेयर कर दिया होगा। ग्रुप के साथियों में से दो-चार लोगों ने बहती गंगा में डुबकी लगाने की मंशा से मुझे फोन कर के झूठी सहानुभूति भी जता दी कि ‘‘अरे, आपके लेख का तो शीर्षक ही गलत छप गया है। यह त्र्रटि आपसे हुई या अख़बारवालों से हुई? यह तो ब्लंडर मिस्टेक है।’’ आदि-आदि सुवचन मुझे फोन पर कहे गए। 
यह त्रुटि मुझसे नहीं हुई थी और यह तय था कि वह समाचारपत्र भी दूसरे दिन ‘‘भूल सुधार’’ छाप ही देगा। काम के दबाव के चलते इस प्रकार की मानवीय त्रुटियां होती ही रहती हैं। लेकिन इस घटना के बाद मेरे दिमाग़ की बत्ती जल गई। मुझे इस बात का गहन ज्ञान हो गया कि यदि सब ठीक-ठाक रहता है तो कोई बंदा भूल से भी नहीं कहता है कि उसने मेरा हर लेख पढ़ा है लेकिन त्रुटि होते ही जिस जागरूकता से जता दिया गया कि मेरे हर लेख पर लोगों की नज़र रहती है, उससे मेरे कलेजे को बहुत ठंडक पहुंची। अतः अब मैंने यह तय किया है कि अपने लेखों की ‘‘रेटिंग’’ जानने के लिए सात-आठ लेख के बाद एकाध लेख में अब मैं जानबूझ कर त्रुटि कर दिया करूंगी। इससे मुझे उन लोगों के बारे में पता चल जाया करेगा जो ऊपर से बगुला भगत बने खड़े रहते हैं और त्रुटि होते ही चोंच मार कर जता देते हैं कि उनकी दृष्टि चौकन्नी है और वे गलती ढूंढने के लिए ही सही, पर लेख पढ़ने में रुचि रखते हैं। हर क्षेत्र में यह फार्मूला अपनाया जा सकता है। अपनी ‘रेटिंग’ जाननी है तो त्रुटि करिए और जान जाइए। तो मानना पड़ेगा न कि कुछ त्रुटियां अच्छी होती हैं!!! 
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(नवभारत, 09.01.2022)
#व्यंग्य  #त्रुटियां  #रेटिंग  #हिंदीव्यंग्य  #हिंदीसाहित्य  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #नवभारत

Tuesday, October 19, 2021

पुस्तक समीक्षा | व्यंग्य की कड़ाही में विचारों की जलेबियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 19.10. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित के व्यंग्य संग्रह "कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
व्यंग्य की कड़ाही में विचारों की जलेबियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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व्यंग्य संग्रह  - कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां
लेखक      - रामस्वरूप दीक्षित
प्रकाशक     - इंडिया नेटबुक्स प्रा।लि, सी-122, सेक्टर-19, नोएडा-201301, गौतमबुद्ध नगर
मूल्य         - 250/-
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‘‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां’’ व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित का ताज़ा व्यंग्य संग्रह है। इसमें कुल 31 व्यंग्य हैं। किन्तु यदि भूमिका और अपनी बात को भी जोड़ लिया जाए तो 33 व्यंग्य कहे जा सकते हैं। ऐसा क्यों? इसकी चर्चा आगे की जाएगी। फिलहाल व्यंग्य की प्रकृति से जुड़ना ज़रूरी है। आज साहित्य में व्यंग्य विधा को स्वतंत्र विधा मान लिया गया है। समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, सामाजिक शोषण अथवा राजनीति के गिरते स्तर की घटनाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से तंज या व्यंग्य किया जाता है। साधारण तथा लघु कथा की तरह संक्षेप में घटनाओं पर व्यंग्य होता है, जो हास्य नहीं कभी-कभी आक्रोश भी पैदा करता है। हास्य और व्यंग्य में अंतर है। साहित्य की शक्तियों अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में हास्य अभिधा यानी सपाट शब्दों में हास्य की अभिव्यक्ति के द्वारा क्षणिक हंसी तो आ सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकती। व्यंजना के द्वारा प्रतीकों और शब्द-बिम्बों के द्वारा किसी घटना, नेता या विसंगितयों पर प्रतीकात्मक भाषा द्वारा जब व्यंग्य किया जाता है, तो वह चिरस्थायी प्रभाव डालता है। व्यंग्य पाठक के भीतर संवेदना, आक्रोश एवं संतुष्टि का संचार करता है। देश की स्वतंत्रता पूर्व भी व्यंग्य लेखन की सुदीर्घ परंपरा रही है। भारतेंदु हरिशचंद्र, महावीर प्रसाद चतुर्वेदी, बालकृष्ण भट्ट आदि नामचीन व्यंग्यकार हुए हैं। इनमें बाबू बालमुकुंद गुप्त का धारावाहिक ‘शिव शंभु के चिट्ठे’ समसामयिक परिवेश का विवेचन करता व्यंग्य था। देश आजादी के बाद हिन्दी साहित्य में व्यंग्यकारों ने अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की। इनमें हरिशंकर परसाई और शरद जोशी ने व्यंग्य को एक नई धार दी और व्यंग्य के प्रति जो उपेक्षा भाव था, उसे साहित्य की श्रेष्ठ विधा के रूप में अपनी रचनाओं के द्वारा प्रमाणित किया। लेखकों की कई पीढियों ने लेखन में योगदान दिया है- हरिशंकर परसाई, शंकर पुणतांबेकर, नरेंद्र कोहली, गोपाल चतुर्वेदी, विष्णुनागर, प्रेम जन्मेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, विष्णुनागर, सूर्यकांत व्यास, आलोक पुराणिक आदि अनेक लेखक हैं, जिन्होंने व्यंग्य लेखन को नया स्वरूप दिया है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने व्यंग्य की परिभाषा देते हुए कहा र्है “व्यंग्य कथन की एक ऐसी शैली है जहाँ बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्करा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे।” यानी व्यंग्य तीखा व तेज-तर्रार कथन होता है जो हमेशा सोद्देश्य होता है और जिसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है। प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान बाणभट्ट ने एक बार कुछ विद्वानों से ’आगे सूखा काठ पड़ा है’ का संस्कृत अनुवाद करने को कहा तो एक विद्वान ने कहा- ’शुष्कः काष्ठः तिष्ठति अग्रे’ और दूसरे ने बताया- ’नीरसः तरूरिहि विलसति पुरतः।‘ दोनों अनुवाद सही हैं। लेकिन दोनों की भाषिक संरचना में अन्तर है। यही अंतर अभिव्यक्ति को सरस या नीरस बनाता है। इसीलिए व्यंग्य शैली में कही गयी बात ज्यादा धारदार और प्रभावी होने के साथ ही सरस भी होती है। यूं भी जब तक समाज देश और राजनीति में भ्रष्टाचार विसंगतियॉं, मूल्यहीनता एवं विद्रूपताएं विद्यमान रहेगी इन पर चोट एवं इनका विरोध व्यंग्य द्वारा ही कारगर रूप से हो सकेगा। क्योंकि व्यंग्य ‘जो गलत है’ उस पर तल्ख चोट तो करता ही है ‘जो सही होना चाहिए’ इस सत्य की ओर इशारा भी करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि व्यंग्य आज साहित्य की सशक्त विधा बन गया है और भविष्य में साहित्य की केन्द्रीय विधा बनने की सारी संभावना इसमें मौजूद है। 
यह व्यंग्य की धार का ही कमाल है कि एक बार पढ़ने के बाद भला कौन भुला सकता है हरिशंकर परसाई  के व्यंग्य - भूत के पांव पीछे, काग भगोड़ा, आवारा भीड़ के खतरे, सदाचार का ताबीज़ आदि या फिर शरद जोशी के व्यंग्य- जीप पर सवार इल्लियां, जादू की सरकार, राग भोपाली, नदी में खड़ा कवि, घाव करे गंभीर आदि। दिलचस्प बात यह है कि हिन्दी साहित्य के ख्यातिलब्ध ये दोनों व्यंग्यकार मध्य प्रदेश में जन्में। शरद जोशी का जन्म उज्जैन में 21 मई 1931 को हुआ और हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को जमानी, होशंगाबाद में हुआ। इसी क्रम में रामस्वरूप दीक्षित भी मध्यप्रदेश के ही हैं। 1 अगस्त 1957 को जन्में रामस्वरूप दीक्षित टीकमगढ़ के निवासी हैं तथा व्यंग्य के अलावा लघुकथा, कविता और समीक्षा भी लिखते हैं। अपने इस व्यंग्य संग्रह ‘‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां’’ में सबसे पहले भूमिका लेखन पर भी व्यंग्य करते हुए भूमिकात्मक लेख रखा है। वे लिखते हैं-“जिस किताब की भूमिका लिखते हैं, उसकी 4-6 बढ़िया सी समीक्षाएं भी ये तैयार करके रखते हैं और अपने पालतू लेखकों के नाम से अपने गिरोह के अखबारों में छपवा देते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं  कि यह सारे काम उचित और प्रायः रियायती दरों पर किए जाते हैं। आपकी किताब छपी नहीं  कि समीक्षाएं आनी शुरू हो जाएंगी। आजकल ये लोग भूमिका लेखन को साहित्य की स्वतंत्र विधा माने जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”
अपनी बात लिखते हुए भी रामस्वरूप दीक्षित व्यंग्य करने से चुके नहीं है।  वे लिखते हैं -” मुझे आज तक समझ नहीं आया कि हम अपनी सारी बातें तो अपनी रचनाओं में कह जाते हैं। फिर वह कौन सी बात है जो किताब छपने के समय कहीं जाने की प्रतीक्षा में रहती है? कुछ लोग दो शब्द शीर्षक के कर दो हजार शब्दों में अपनी बात मुश्किल से कह पाते हैं शायद पाठकों पर दया करते हुए।”
इस प्रकार भूमिका और अपनी बात से ही व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित के व्यंग्य की धार दिखाई देने लगती है। संग्रह का  पहला व्यंग्य है “कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां”।  यह शीर्षक ही अपने आप में बहुत रोचक है और जिज्ञासा जगाने वाला है क्योंकि इस जाहिर है की इस जंग में कम से कम जलेबी बनाने की पद्धति तो बताई नहीं गई होगी बल्कि किसी पर करारा कटाक्ष किया गया होगा अपने आप इसे पढ़ने की रुचि जागृत होती है। यह  व्याप्त पर कटाक्ष करता है।  इस व्यंग्य में एक सम्मान है कि जो जलेबियां कड़ाही में जाने को तैयार हैं बिकी हुई जलेबी उसे कह रही हैं- “ तुम बिकी हुई जलेबी हमें समझा रही हूं? तुम्हारी औकात ही क्या है?  तुम लोग तो हर किसी की कड़ाही में सिरप पीने पहुंच जाती हो तुम्हारा कोई दीन ईमान नहीं। हम ईमान वाले लोग हैं।  हम पूंजीवादी कड़ाही में नहीं  जाते।  यह कड़ाही काले धन से खरीदी गई है। सीरे में भ्रष्टाचार की  शक्कर मिली हुई है। हम ईमानदारी के पैसे से खरीदी कड़ाही में जाने वाली जलेबियां हैं। मेहनत के पैसे की शक्कर वाले सिरे में जाते हैं। हमारे उसूल हमें यहां जाने से रोक रहे हैं।”
“ऊपर उठा हुआ लेखक” व्यंग्य में उन लेखकों की खिंचाई की है जो प्रसिद्धि की दौड़ में अपने लेखन के स्तर को भूलते चले जाते हैं और वाहवाही की भीड़ में खुद को भूलने लगते हैं। यह बात उन्होंने विशेष रूप से हिंदी लेखकों पर व्यंग्य करते हुए लिखे हैं- “हिंदी का लेखक जब ऊपर उठता है तो सबसे पहले उसका लेखन गिरता है वैसे ऊपर उठने के बाद लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। आप बिना लिखे ही लिखने वालों से ऊपर बने रह सकते हैं। फिर बोलने का काम बढ़ जाता है। आयोजनों में भागीदारी बढ़ जाती है। सभा-समितियों की बैठकों में भाग लेने की व्यस्तता रहती है। सम्मान, पुरस्कार समितियों में निर्णय का दायित्व आप पर आ जाता है देश विदेश की यात्राओं के दौर शुरू हो जाते हैं। आप अपने खुद के शहर में कम ही होते हैं बाकी सब जगह पाए जाने लगते हैं।
एक और व्यंग्य है “सवा सोलह आने आजादी”। इस व्यंग्य में स्वतंत्र भारत में आजादी के मायने बताए गए हैं जैसे स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार किया जाती सर्व व्याप्त है इसी संदर्भ में व्यंग्यकार ने लिखा है-”आप अपने आर्थिक विकास के लिए सब तरह से आजाद हैं। आप नौकरी कर सकते हैं, तनख्वाह से पेट न भरे तो रिश्वत ले सकते हैं, कालाबाजारी करके मुनाफा कमा सकते हैं, चीजों को मनचाही दरों पर बेच सकते हैं और बिना किसी डर के एक चीज में दूसरी चीज मिला सकते हैं। केवल इतना प्रतिबंध है कि मिलाई गई चीज अशुद्ध। अस्वस्थकर और सस्ती हो। बेरोजगारी की दशा में आप जेब काटने,राहजनी करने से लेकर बैंक लूटने तक सब कुछ कर सकते हैं। सरकार कहीं भी आप की आजादी में आड़े नहीं आती।” 
रामस्वरूप दीक्षित कथित बुद्धिजीवियों पर भी  व्यंग करने से नहीं चूके हैं। वह बनावटी बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं कि-” बुद्धिजीवी बात का बतंगड़ और बदनगढ़ को बात बनाने की कला में माहिर होते हैं। यह बड़े से बड़े मुद्दे को बातों में ऐसा उलझा ते हैं कि लोग उस मुद्दे पर बात करने से कतरा ने लगते हैं और जहां कोई बात नहीं होती वहां ऐसा बवाल मचा देते हैं कि देखते-देखते वह बड़ा मुद्दा बन जाता है।” 
“साहित्य में समर्पणवाद” शीर्षक व्यंग्य में साहित्य में जुझारूपन की जो कमी आती जा रही है, उस पर  ध्यान दिलाते हुए रामस्वरूप दीक्षित लिखते हैं-”इधर साहित्य में समर्पण वाद के प्रादुर्भाव के कारण विद्रोह के स्वर धीरे-धीरे मंद पढ़ते जा रहे हैं। जो कभी विद्रोहियों के जमात के अगुआ हुआ करते थे, वे भी आज अपना डंडा और झंडा किसी ना किसी के चरणों में समर्पित कर चुके हैं। कुछ लोग आत्मसमर्पण कर रहे हैं कुछ से करवाया जा रहा है। जो इसके बाद भी जो बचे हैं उनका साहित्य निकाला किया जा रहा है।”
संग्रह में “बड़े लेखक, छोटे लेखक” एक ऐसा व्यंग्य है जिसमें लेखकों की जमात के आपसी संबंध हो की चुटीली विवेचना की गई है। लेखक ने लिखा है-” हिंदी में दो तरह के लेखक होते हैं। एक बड़े लेखक, दूसरे छोटे लेखक। बड़े लेखक हर तरह से बड़े होते हैं और छोटे हर तरह से छोटे।  बड़े लेखकों में एक खास तरह का बड़प्पन होता है, जिसे वह हमेशा वही रहते हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे अपने बड़प्पन पर आंच नहीं आने देते। वह उसे हर हाल में बचाए रखते हैं। वही तो एक चीज है जो उनके पास होती है और जो औरों से उन्हें अलग करती है।”
आजकल बड़े कवि साहित्यकार बनने के लिए ही जोड़ तोड़ नहीं होता है बल्कि कार्यक्रमों की अध्यक्षता हथियाने के लिए भी लोग संघर्षशील रहते हैं और हर तरह के हथकंडे को अपनाकर प्रयास में जुटे रहते हैं। यह लगभग हर शहर की कहानी है। व्यंग्यकार की पैनी नजर से ऐसे लोग बच नहीं पाए हैं। कार्यक्रमों में अध्यक्षता करने के यह जोड़-तोड़ लगाने वालों तथाकथित अध्यक्षों पर  व्यंग्यकार ने टिप्पणी करते हुए  एक ऐसे ही अध्यक्ष के जीवनपर्यंत अध्यक्ष बने रहने के प्रसंग को बड़ी रोचकता के साथ सामने रखा है-” हमारे यहां एक सज्जन थे जो लिखने के कारण नहीं विद्वान और बड़े पद पर आसीन होने के कारण पहले बड़े साहित्यकार कहलाते रहे और उम्र बढ़ने पर वयोवृद्ध व वरिष्ठ साहित्यकार कहलाने लगे थे। अपनी वेशभूषा और रंग रूप के कारण वे जीवन भर नगर में होने वाले सभी तरह के समारोह को वह आयोजनों की अध्यक्षता करते रहे। धीरे-धीरे वे स्थाई अध्यक्ष के रूप में परिवर्तित हो गए थे। कोई भी समारोह यहां तक कि छोटी-मोटी गोष्ठी भी उनकी अध्यक्षता में ही संपन्न होती थी। समारोह में गोष्ठियों के अलावा शेष समय भी अध्यक्ष बने रहने के लिए उन्होंने एक साहित्यिक संस्था की अध्यक्षता हथिया ली थी और मरते दम तक उसके अध्यक्ष बने रहे। जीवन भर अपने लिखने के कारण नहीं अपनी अध्यक्षता के कारण चर्चित रहे लोग यहां तक कहने लगे थे कि इनका तो जन्म ही अध्यक्षता करने के लिए हुआ है।”
संग्रह के अधिकांश व्यंग्य साहित्य एवं साहित्यकारों पर लक्षित हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि साहित्यसृजन एक गंभीर कार्य है और यदि इसकी गंभीरता को अनदेखा कर के सतही स्तर पर सृजन किया जाए तो इससे न केवल साहित्य अपितु उस समाज को भी हानि पहुंचती है, जहां से यह साहित्य उपजता है। कुछ लोग मात्र ‘‘कैम्पेनिंग’’ के दम पर साहित्यकार बनने के ज ुगाड़ में लगे रहते हैं। ऐसे ही कथित साहित्यकारों पर व्यंग्य लेख है ‘‘वह बड़े लेखक के रूप में उभर रहा है’’। व्यंग्यकार ने ऐसे लेखकों की लेखक बनने की प्रक्रिसा पर इन शब्दों में प्रकाश डाला है कि -‘‘वह  लेखकों की जगह  साहित्यिक कार्यकर्ता तैयार करने में लगा है, जो देश में जगह-जगह उसके लिए आयोजन करते हैं।  इन आयोजनों में भागीदारी के लिए वह लगातार यात्राओं पर रहता है। इन यात्राओं से उसके दिन हरे, शामें गुलाबी और राते हरी होने लगी हैं।  यह यात्राएं उसे सुखी व स्वस्थ बनाए रखती हैं। वह साहित्यिक फतवे जारी करने लगा है।  लोगों को उठाने गिराने लगा है और इस तरह उसने खुद को आम लेखकों से ऊपर उठा लिया है। केवल लिखने वालों को वह कूप मंडूक समझता है।’’
कुल मिला कर ‘‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां’’ व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित का एक ऐसा व्यंग्य संग्रह है जो अपने हर व्यंग्य में पाठकों को चिकोटियां काटता अनुभूत होगा, साथ ही व्यंग्यविधा की चाशनी में पगे कटुसत्य से साक्षात्कार होगा। 
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Sunday, August 22, 2021

व्यंग्य | महात्म्य 'प' अक्षर का | डॉ (सुश्री) शरद सिंह, नवभारत में प्रकाशित, 22.08.2021

  
Dr (Miss) Sharad Singh
आज 22.08.2021 को "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में मेरा व्यंग्य लेख "महात्म्य 'प' अक्षर का" प्रकाशित हुआ है...आप भी पढ़िए और आनंद लीजिए.... हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏 __________________________


 व्यंग्य 

महात्म्य 'प' अक्षर का 

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

 एक दिन परमपिता परमेश्वर की कृपा से मेरे ज्ञानचक्षु ठीक उसी प्रकार से खुल गए जैसे ओपनर से खोले जाने पर शीतल पेय की बोतल का ढक्कन खुल जाता है-"खट्". हुआ कुछ यूं कि एक प्रोफेसर साहब ने दुखी होते हुए मुझसे चर्चा की कि आजकल भाषा के क्षेत्र में कोई नया शोध कार्य हो ही नहीं रहा है. बस, उनकी यह बात मुझे लग गई और मेरी अल्प बुद्धि का नन्हा-सा अश्व शोध के नूतन विषय की ओर खड़दम-खड़दम दौड़ने लगा. जैसा कि मैंने पहले ही निवेदन किया कि अचानक मेरी बुद्धि के पट खुल गए. बुद्धि के पट खुलते ही मुझे वर्णमाला का प,फ,ब,भ,म शिरीज़ का प्रथम अक्षर "प" जगमगाता हुआ दिखाई दिया. मैंने उसी समय तय कर लिया कि यही है वह अक्षर जिसके बाल की खाल मुझे संवारनी है. वैसे, मैं यह दावे से कह सकती हूं कि मेरे इस शोध कार्य का लोहा उद्भट विद्वानों को भी मानना पड़ेगा. खैर, लोहा न सही टीन-टप्पर ही मान लें तो भी चलेगा. मेरा एक दावा यह भी है कि "प" अक्षर से अधिक दमदार अक्षर पूरी वर्णमाला में नहीं मिलेगा. आखिर, पूरा जीवन "प" अक्षर में समाया हुआ है. विश्वास न हो तो देखिए कि "प" से होता है "प्रसव" अर्थात जीवन का प्रारंभ और यहीं से शुरू हो जाता है "प" का सिलसिला. फिर तो पाप, पापा, पापी सबसे पाला पड़ता है. "प" से प्रेमी-प्रेमिका बनते हैं. "प" से प्यार बनता है. प्रेमी-प्रेमिका और प्यार के त्रिकोण से पागलपन उत्पन्न होता है. इस पागलपन में पहले जमाने में प्रेमपत्रों की आवाजाही शुरू हो जाती थी। प्रेमपत्रों की इस आवाजाही में भी "प" अक्षर की अहम भूमिका होती थी. यानी कि पोस्टमैन की भूमिका. प्रेमपत्रों का सिलसिला प्रेमी-प्रेमिका के हृदय में प्रेम-परायणता को जगा देता था. वह कभी-कभी उनके मधुर रिश्ते को पति-पत्नी के रूप में सिरे चढ़ा कर परिवार रूपी झमेले का निर्माण करा डालता था. जी हां "प" से ही बनते हैं पति-पत्नी. "प" से ही पिता, पुत्र और पुत्री की रचना होती है. पुत्र और पुत्री के युवा होते ही मामला फिर वहीं जा पहुंचता है. पिता को पुत्र की प्रेमिका और पुत्री के प्रेमी से पीड़ा होती है और परेशानियों का एक पुराना सिलसिला दोहराया जाता है. जब पिता अपना पुराना जमाना भूल कर विलेन की भूमिका अपना लेता है तो नूतन पर पुरातन की गाज गिरती है और शहजादे सलीम जैसे प्रेमी को अनारकली जैसी प्रेमिका से बिछड़ना पड़ता है. "प" अक्षर की महिमा प्रेम-प्यार की परिधि से बाहर भी है. जी हां, इस "प" अक्षर से प्रधानमंत्री शब्द बनता है तो पहरेदार भी बनता है. पत्रकार बनता है तो प्राध्यापक भी बनता है. जहां तक साहित्यकार का प्रश्न है तो उसका संबंध "प" अक्षर से प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता किंतु गहराई से देखने पर पता चलता है कि साहित्यकारों का समूचा जीवन पा के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है, गोया साहित्यकार पतंगा हो और "प" अक्षर जलती हुई शमा हो. जी हां, यदि साहित्यकार कवि हो तो पद्य ही उसके जीवन का आधार होगा. वैसे चाहे गद्यकार हो या पद्यकार उसके सृजन में प्रेरणा की भूमिका अहम होती है. प्रेरणा के बिना वह सृजन कर ही नहीं सकता. ठीक वैसे ही जैसे अदालत में पक्षकार की भूमिका अहम होती है. अगर मुकद्दमे में पक्षकार और पैरवी करने वाला ना हो तो मुकदमा काहे का. बहरहाल, बात चल रही थी साहित्यकारों की. तो साहित्य जगत में पुरस्कार, पद, और पीठ का वर्चस्व देखने को मिलता है. यहां पीठ का मतलब है शोध संस्थान वाले पीठ से. शोध पीठ पर पीठासीन होना बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती है. जो पीठासीन नहीं हो पाते, पैंतरेबाज़ी से काम चलाते हैं। "प" अक्षर से अनेक मुहावरे और कहावतें में प्रचलित है. जैसे पूत के पांव पालने में नजर आते हैं, पानी पानी होना, पीछे पड़ना या पैर उखड़ना वगैरह- वगैरह। लगे हाथ यह भी स्मरण कर लिया जाए कि "प" अक्षर का रिश्ता मारामारी से भी है. जी हां, "प" अक्षर से पहलवानी बनती है और पहलवानी में भी धोबी पछाड़, घोड़ा पछाड़ और ना जाने कौन-कौन से पछाड़ होते हैं. "प" से पता न हो तो पत्र नहीं पहुंच सकता, "प" से पुण्य ना हो तो स्वर्ग नहीं पहुंचा जा सकता और "प" से पाप न हो तो नर्क के दर्शन नहीं हो सकते. वैसे ही परलोक की यात्रा शुरू होती है "प" से. अर्थात प्रसव से परलोक तक की यात्रा "प" के सहारे ही होती है. है न, परंपरा से हटकर एक नया शोध. तो "प" अक्षर के बारे में इतना शोध कार्य करके मैंने तो पुण्य कमा लिया, अब अगर कोई और अक्षर प्रेमी इस शोध कार्य को आगे बढ़ा कर पुण्य कमाना चाहता हो तो शीघ्र कार्य प्रारंभ कर दें. साथ ही, विश्वास रखे कि अक्षरों के इतिहास के पन्ने पर उसका नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा. परमात्मा शोधार्थी के मार्ग को प्रशस्त करें. आमीन!!! 
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(नवभारत में प्रकाशित, 22.08.2021)
Vyang- Dr (Miss) Sharad Singh, Navbharat, 22.08.2021




Sunday, June 13, 2021

व्यंग्य | चलो ‘चिन्ता दिवस’ मनाएं | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत में प्रकाशित

प्रिय साथियों, आज 13 जून 2021 को "नवभारत" के .रविवारीय परिशिष्ट में मेरा व्यंग्य लेख "चलो ‘चिन्ता दिवस’ मनाएं " प्रकाशित हुआ है...आप भी पढ़िए और आनंद लीजिए....

व्यंग्य 
चलो ‘चिन्ता दिवस’ मनाएं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        कहते हैं  चिंता चिता समान। अब भला, चिंता और चिता में क्या समानता हो सकती है? चिता पर चढ़ने से पहले ही इंसान एक स्थिर मुद्रा में आ जाता है लेकिन चिंता तो कहीं भी बैठकर, लेट कर, या खड़े हो कर की जा सकती है। चिंता के लिए चाहे आप उकडूं बैठें या लंगडी दौड़ें, चाहे दो पल चिंता करें या दो साल, इसमें कोई बंदिश नहीं है। फिर आजकल फास्टफूडी जीवन में इतना समय ही कहा कि अधिक चिंता की जाए। फिर भी यदि चिंता किए बगैर गुज़ारा नहीं हो रहा है तो हफ्तों चिंता करने के बजाए एकदिवसीय क्रिकेट मैच के समान मात्र एक दिन चिंता कर ली जाए। जी हां, एक दिन चिंता करो और दूसरे दिन पॉपकॉर्न खाओ मस्त हो जाओ!
यूं भी एक दिवसीय चिन्ताओं का हमारा अद्भुत रिकॉर्ड पाया जाता है। अब देखिए न, हम हिन्दी की चिंता सिर्फ एक दिन करते हैं। उस एक दिन हम हिंदी के उद्भव, विकास, अवसान आदि सब के बारे में चिंता कर डालते हैं। यह ठीक भी है क्योंकि शेष दिनों में अंग्रेजी के बिना हमारा काम नहीं चलता। यदि इंग्लिश-विंग्लिश नहीं बनती तो हिंग्लिश से काम चला लेते हैं। लेकिन कम से कम हिन्दी से तो दूर रहने की कोशिश करते हैं। आखिर हिंदी हमारी आजकल की तड़क-भड़क लाइफ से बेमेल है। इसलिए कई दिन तक हिंदी की चिंता में अपना खून जलाते रहने से क्या फायदा? इसीलिए हम सिर्फ एक दिन पूर्ण समर्पित भाव से हिन्दी के पाले में जा खड़े होते हैं और सुबह से देर रात तक हिंदी की वाह-वाही करते रहते हैं। वैसे हमारी एकदिवसीय चिंताओं की कोई कमी नहीं है। एकदिवसीय चिंताओं की लंबी सूची के अंतर्गत् हम साल में एक दिन बच्चों की भी चिंता करते हैं। उसे एक दिन बाल मजदूरी का जमकर विरोध करते हैं। उस दिन हम घर या होटलों में बच्चों से नौकरों की तरह काम कराए जाने का खुलकर विरोध करते हैं। यही हमारा उस दिन का विशेष कर्तव्य होता है, वरना प्रतिदिन बाल मजदूरों की तरफदारी करने से क्या फायदा? सोचने की बात है यदि हम बाकी दिन भी बाल मजदूरी का विरोध करने लगेंगे तो जूता पालिश करने वाले छोकरों का भाव हो जाएगा। फिर हमारे जूताधारी जैंटलमैन गंदे जूतों में घूमते नजर आएंगे। कूड़ा बीनने वाले बच्चों का भाव हो जाएगा तो शहर के कूड़ेदान उसे काम की वस्तुओं की छटनी नहीं हो पाएगी। और तो और, होटलों में काम करने वाले लड़कों का अभाव हो जाएगा। फिर जूठे बर्तनों का ढेर लग जाएगा। झूठे बर्तनों के ढेर लगने से मक्खियां भिन्न-भिन्न आएंगी और मक्खियां भिन्न-भिन्न आने से बीमारियां फैलेंगी। इसीलिए इन बाल मजदूरों की चिंता के लिए एक दिन ही पर्याप्त है।
हिंदी और बच्चों की भांति हम शिक्षकों के लिए भी सिर्फ एक दिन चिंता करते हैं। जी हां, ‘शिक्षक दिवस’ को ही हमें शिक्षकों की दीनदशा अथवा गरिमा की चिंता होती है, शेष दिन में शिक्षक समुदाय से यही आशा की जाती है कि वह पढ़ाई-लिखाई कराए, मनुष्यों से लेकर ढोर-डांगर तक गिने। चाहे तो ट्यूशन-व्यूशन कोचिंग-वोचिंग भी कर लिया करे। शिक्षक वैसे ही बुद्धिजीवी प्राणी होता है। उसकी हर दिन क्या चिंता करना।
एक दिवसीय चिन्ताओं के क्रम में अब हम एक दिन पिता का मनाते हैं तो एक दिन मां का। एक दिन मलेरिया का एक दिन फाइलेरिया का, एक दिन पर्यावरण का एक दिन ऊर्जा संरक्षण का, एक दिन पुरातात्विक धरोहरों का, एक दिन जनसंख्या का। मेरे विचार से तो सभी चिंताओं की चिंता करने के लिए भी एक दिन तय किया जाए। तो आइए इसके लिए हम आवाज़ उठाएं और एक दिन ‘चिन्ता दिवस’ भी मनाएं।
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