Wednesday, March 8, 2023
होली पर व्यंग्य | लला, सम्हर के आइयो खेलन होरी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक भास्कर
Sunday, April 3, 2022
प्लीज़ कॉल मी हनी | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
Sunday, March 13, 2022
चलो, अपडेटेशन करें कहावतों का | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "चलो, अपडेटेशन करें कहावतों का" ...😀😊😛
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व्यंग्य
चलो, अपडेटेशन करें कहावतों का
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
समय के साथ जब राजनीति का ऊंट करवट बदल सकता है और देश की सबसे बड़ी कही जाने वाली पार्टी को एक-दो रन पर आउट कर सकता है तो बोली-भाषा की गाय-बछिया करवट क्यों नहीं बदल सकती है? वह भी तो एक ही मुद्रा में बैठे-बैठे थक जाती है। उसे भी अधिकार है करवट बदलने का। गाय सीधी होती है तथा बछिया तो और भी सीधी होती है। इसलिए ये दोनों बिना किसी शोरशराबे के, बिना किसी सभा या कैम्पैन के ऐसे ही बदलती रहती हैं। चुपचाप, शांतिपूर्वक। समय बदलता है तो आदतें भी बदल जाती हैं। आदतें बदलती हैं तो बातचीत का लहज़ा बदलता है, भाषा भी बदल जाती है। अब बदला-बदली का नमूना देखिए न कि एक जमाने में बेलबाॅटम पहना जाता था। जितनी चैड़ी मोहरी उतनी ज्यादा फैशनेबल। जमाना बदला तो चमड़ी चिपकू अर्थात् स्किनटाईट जींस ने जगह ले ली। अब पैरों की आदत तो मुड़ने की होती है। सीढ़ी चढ़नी है तो घुटने मोड़ने होंगे, कुंर्सी पर भी बैठना है तो घुटने मोड़ने होंगे इसलिए जींस में काटछांट की जाने लगी है। जगह-जगह से कटी जींस पैरों की त्वचा को श्वांस भी देती है और घुटनों को मोड़ने में सहूलीयत भी देती है। भले ऐसी जींस पहन के भिखमंगा दिखें तो दिखते रहें, फैशन तो फैशन है। बेलबाॅटम के जमाने में भी लम्बेबाल वाले लड़के पागल नज़र आते थे। मगर उन्होंने परवाह नहीं की। उस समय वे समय के साथ चल रहे थे, अब हम समय से कदमताल मिला रहे हैं।
जब हम बदल रहे हैं तो हमारी भाषा क्यों न बदले? उसे भी हक है बदलने का। जरूरी है कि नई कहावतों को अपनी पुरानी भाषा में शामिल कर लिया जाए। अब आप कहेंगे कि इससे भाषा की वाट लग जाएगी। तो लगने दीजिए वाट। हम परिवर्तन के टायर को पंक्चर तो नहीं कर सकते हैं। वह तो ट्यूबलेस टायर होता है। थोड़े दचके खाएगा मगर चलता रहेगा, चलता रहेगा। तो आइए देखें कुछ नए मुहावरों को। पहले गोलमोल बातों के लिए कहा जाता था जलेबी जैसे गोल-गोल मत घुमाओ। अब कहा जाना चाहिए कि नूडल्स जैसे मत उलझाओ। क्योंकि आजकल मधुमेह के ख़तरे बढ़ गए हैं। मिठाइयों के बारे में जितना कम सोचा जाए उतना अच्छा। उस पर नवोदित पीढ़ी जलेबियों से अधिक नूडल्स से परिचित है। यदि नवोदित पीढ़ी से कहा जाएगा कि बातों को नूडल्स जैसे मत उलझाओ, तो वह तुरंत समझ जाएगी।
एक कहावत हुआ करती है-‘‘सोलह आने सच’’। अब आज के जमाने में आना-पाई भला कौन जानता है? पहले चार आने में चार समोसे आ जाते थे, ऐसा पड़ोस के दादाजी बताते हैं। अब तो चार आने ही नहीं आते, समोसे क्या खाक आएंगे? अब तो कहावत होनी चाहिए ‘‘सोलह सौ रुपया सच’’ या फिर ‘‘सोलह बिटकाईन सच’’। अब पंद्रह-सोलह रूपयों की इतनी भी कीमत तो बची नहीं है कि उसकी साख की क़समें खाई जाएं या वास्ता दिया जाए। आज के जमाने में बीस रुपए पाव से नीचे अच्छी सब्जी मिलना भी कठिन है। इसलिए सच का भरोसा दिलाने के लिए कम से कम सोलह सौ रुपयों का वास्ता दिया जाना चाहिए। उस पर यदि बिटकाईन का वास्ता दिया जाए तो और सम्मानजनक यानी अपटुडेट लगेगा। यूं भी हम व्हाट्सएप्प विश्वविद्यालय वालों को ‘‘कमस व्हाट्सएप्प’’ की खानी चाहिए। अब आप कहेंगे कि व्हाट्सएप्प पर तो झूठ की सरिता बहती रहती है। तो यह तर्क व्यर्थ है क्योंकि अदालतों में ‘‘गीता’’ पर हाथ रख कर धड़ल्ले से झूठ बोला जाता है तो व्हाट्सएप्प का क्या गुनाह? जिसको झूठ बोलना है वह झूठ बोलेगा ही और जिसको कसमें खानी हैं वह कसम खाएगा ही। तो फिर अपडेट कसम क्यों न खाई जाए? ज़रा आज के जमाने की तो लगेगी।
एक कहावत है -‘‘कुत्ता-बिल्ली की तरह लड़ना’’। अब इसे भी बदल देना चाहिए। जब कोई दो व्यक्ति कुत्ता-बिल्ली की तरह लड़ते- झगड़ते दिखें तो उनसे कहना चाहिए कि ‘‘तुम लोग टीवी डिबेट जैसे क्यों झगड़ रहे हो?’’ दरअसल, टीवी डिबेट का स्टाईल कुत्ते-बिल्ली वाला ही होता है। अब आज आप किसी को कुत्ता-बिल्ली वाला मुहावरा बोलेंगे तो कहीं वह यह न समझ ले कि आपने उसे कुत्ता कहा या बिल्ली कहा। पता चला कि वे दोनों आपस में लड़ना छोड़ कर आपके ऊपर टूट पड़े कि ‘‘हमें कुत्ता क्यों कहा?’’ या ‘‘हमें बिल्ली क्यों कहा?’’ ठंडे दिमाग से सुनने का जमाना तो यूं भी बहुत पहले जा चुका है। आजकल तो दो लोग लड़ते हैं तो तीसरा उनका झगड़ा सुलझाने के बजाए उनकी लड़ाई का वीडियो बनाने टिक जाता है। उस तीसरे को अपनी पोस्ट के वायरल होने के लाख टके के साॅरी लाख लाईक्स के ख़्वाब दिखने लगते हैं।
‘‘गाजर मूली की तरह काटना’’ यह भी एक कहावत है। यह भी अब ओल्डफैशन हो चली है। आज कल हाथ से गाजरमूली काटने का काम सिर्फ शेफ लोग करते हैं, वह भी आमतौर पर कैमरे के सामने। अब तो हैंडी, इलेक्ट्रिक आदि तरह-तरह के कटर आने लगे हैं। घरों में भी बहुतायत सलाद-कटर काम में लाए जाने लगे हैं। यूं भी गाजर, मूली जैसे काटने की धमकी पुरानी हो चली है। अब नया मुहावरा शामिल किया जाना चाहिए कि -‘‘खबरदार जो मुझसे पंगा लिया! तुम्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल कर दूंगा।’’ या फिर ‘‘तुम्हें अपने सोशल मीडिया एकाउन्ट से ब्लाॅक कर दूंगा।’’ आजकल यह गाजर, मूली जैसे काटने से अधिक प्रभावी धमकी है। इसलिए इसे मुहावरे के रूप में स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि -‘‘ट्रोल करना’’, ‘‘ब्लाॅक करना’’, हैक करना’’ आदि-आदि।
एक कहावत है ‘‘धोबी का गधा’’। अब आप ही बताइए कि आपको कहीं चार पैर वाले गधे दिखाई देते हैं? नहीं न! तो फिर धोबी के गधे और और साहब के गधे को अलग-अलग आईडेंटीफाई कैसे करेंगे? जब गधे सामने हों और वह भी दो-तीन प्रकार के तो आप उनका वर्गीकरण करते हुए उसे कहावत में जड़ सकते हैं लेकिन जब चार पैर वाले गधे नजर ही न आते हों तो ऐसी कहावत का क्या फायदा। भला कौन समझेगा इसे? आजकल तो कपड़े धोने वाले कपड़ों का गट्ठर अपनी मोटरसाईकिल पर लाद कर ले जाते हैं, गधे की पीठ पर नहीं। इसलिए यह कहावत भी आउटडेटेड है। अब नया मुहावरा होना चाहिए ‘‘निजी कंपनी का कर्मचारी’’। यह चपरासी से ले कर सीए तक हो सकता है। सब पर फिट बैठेगी यह कहावत। सिर झुकाए, बिना ना-नुकुर किए काम करते जाइए और खुद को महत्वपूर्ण समझिए। यही दशा तो धोबी के गधे की हुआ करती थी और अब इस दशा से गुजरते हैं निजी कंपनियों के कर्मचारी। काम का बोझा पीठ पर लदा होता है फिर भी यह सोच कर खुश रहते हैं कि हमारे बिना कंपनी का काम नहीं चल सकता है। इसीलिए ‘‘धोबी का गधा’’ के बजाए ‘‘निजी कंपनी का कर्मचारी’’ कहावत अधिक सटीक रहेगी।
बस एक कहावत अजर, अमर और स्थाई है, वह है-‘‘इंडियन टाईम’’। यह लगता है कि कभी पुरानी नहीं पड़ेगी। कभी आउट डेटेड नहीं होगी। चाहे किसी से भेंट करने का समय हो या किसी आयोजन के आरम्भ होने का समय, दस-पन्द्रह मिनट से ले कर दो-तीन घंटे की देरी तो मामूली बात है। पहले देर करना और फिर बत्तीसी दिखाते हुए ढिठाई से उवाचना कि ‘‘अभी देर थोड़े ही हुई है। ये तो इंडियन टाईम है।’’ इसलिए ‘‘इंडियन टाईम’’ वाली कहावत हमेशा समकालीन बनी रहेगी। लेकिन एक कहावत ऐसी है जो पुरानी पड़ चुकी है और उसे बदला जाना चाहिए, वह है-‘‘खाट खड़ी होना’’। अव्वल तो आजकल घरों में खाट होती नहीं है, पलंग होते हैं, सिंगल-पिंगल, किंग साईज़, क्वीन साईज़ आदि-आदि। जहां खाट होती भी है वहां वह बिछी ही रहती है। खडी-वड़ी नहीं की जाती है। इसलिए यह कहावत बदल कर अब कर देनी चाहिए ‘‘वाट लगना’’। यूं तो ये मुंबइया कहावत है और वहां के लिए पुरानी भी है लेकिन अब आजकल यह ‘‘हैशटेग ट्रेंड’’ यानी चलन में बनी रहती है। इसलिए हिन्दी कहावतों में ‘‘वाट लगना’’ को भी सर्वसम्मति स्वीकार किया जाना चाहिए।
तो, ये तो थीं कुछ कहावतें जिनके अपडेटेशन के बारे में मैंने सोचा अब कुछ कहावतों के बारे में आप सोचिए। इससे सोचने की आदत पड़ेगी जो छूटती जा रही है। यानी एक पंथ दो काज। या फिर सोशल मीडिया की कहावत में कहिए कि ‘‘एक पोस्ट से कई शिकार’’।
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(नवभारत, 13.03.2022)
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Sunday, February 27, 2022
मौसम ईडी और सीडी का | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "मौसम ईडी और सीडी का" ...😀😊😛
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व्यंग्य | मौसम ईडी और सीडी का
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
देश में चार मौसम पाए जाते हैं। लेकिन एक मौसम ऐसा है जो अकसर चुनाव के मौसम के साथ नत्थी हो कर आ जाता है। ऐसा लोग कहते हैं, मैं नहीं। लेकिन लोगों का कहना बहुत महत्व रखता है। यह हमारे जातीय संस्कार हैं कि हम जनचर्चा में अगाध रुचि रखते हैं। इतनी रुचि कि मोहल्ले की जनचर्चा में भागीदारी आरम्भ करते समय हमारा यही उवाच होता है कि -‘‘मेरे पास बिलकुल टाईम नहीं है, फिर भी पांच मिनट रुक सकती हूं। जो बताना हो जल्दी बताओ।’’ यह जल्दी वाकई जल्दी ही होती है क्योंकि पांच मिनट का कहने के बाद यही कोई पचास मिनट तो जनचर्चा में रुकना हो ही जाता है। अब चूंकि यह पचास घंटे तक भी संभव है इसीलिए पचास मिनट को मैंने जल्दी चर्चा सम्पन्न होना कहा।
इसी तरह की एक जनचर्चा में कल मेरा रुकना हुआ। पांच-छः लोगों को जोड़ कर खड़े हुए भैैयाजी जोर-शोर से बतिया रहे थे। उनकी कृपादृष्टि मुझ पर पड़ी तो दूर से ही चिल्ला कर बुलाने लगे-‘‘अरे लेखिका जी, कहां जा रही हैं? यहां बहुत गंभीर मुद्दे पर चर्चा चल रही है और आप इसमें शामिल नहीं होंगी तो यह चर्चा अधूरी रह जाएगी।’’
स्पष्ट था कि यह मक्खनबाज़ी मुझे रोक कर अपना ज्ञान बखानने के लिए की जा रही थी। यह भी तय था कि अगर मैं नहीं रुकती तो भैया जी बुरा मान जाते। अतः मुझे उनकी टीवी ब्रांड इस जनचर्चा में रुकना पड़ा। टीवी ब्रांड इस लिए कहा मैंने क्योंकि उनकी चर्चाओं में कुल जमा चार-छः लोग ही शामिल रहते हैं लेकिन उनमें कुछ लोग एक साथ इतनी जोरदार आवाज़ में बोलते हैं मानो कोई अच्छा-खासा झगड़ा हो रहा हो। इससे लाभ यह होता है कि बीच-बीच में दो-चार मिनट की भीड़ भी जुड़ती रहती है। लोग झगड़ा देखने का आनंद उठाने के लिए रुकते हैं और जैसे ही उन्हें समझ में आता है कि ये तो टीवी ब्रांड बहस है तो मायूस हो कर आगे बढ़ लेते हैं। जो चीज़ घर में सोफे पर पसर कर या बिस्तर पर औंधे लेट कर देखा जा सकता है उसे देखने के लिए सड़क पर खड़े रह कर क्यों टांगे दुखाई जाएं। फिर टीवी की बहसें देखते समय बारमूडा या मैक्सी में भी नेशनल डिबेट में शामिल होने का अनुभव होता है, वह सड़क की जनचर्चा में कहां? बाकी महिलाओं का मामला अलग है क्योंकि उनकी जनचर्चा के विषय टीवी पर कभी आ ही नहीं सकते हैं, वे तो मोहल्ले में ही संभव हैं कि किसने नई-नई साड़ियां खरीदी, किसके घर नया फ्रिज आ गया या फिर किसके घर में मियां-बीवी के बीच घमासान युद्ध हुआ, आदि-आदि।
हां, तो भैयाजी ने अपनी उस जनचर्चा में मुद्दा उठा रखा था ईडी का। उसका कहना था कि जब भी किसी राज्य में चुनाव के दिन निकट आते हैं तो किसी न किसी बाहुबली के ठिकानों पर ईडी के छापे पड़ जाते हैं। इस मुद्दे पर उन्होंने मेरी राय जाननी चाही,‘‘आप ही बताइए बहनजी, मैं सही कह रहा हूं कि नहीं?’’
‘‘ये तो सरासर तीर-तुक्का है भैयाजी! अरे, चुनाव से ईडी का क्या ताल्लुक? ईडी तो अपनी जानकारी जुटाती रहती है। अब जानकारी जुटाते-जुटाते चुनावों का समय आ जाता है तो इसमें भला ईडी का क्या दोष?’’ मैंने भैयाजी की बात का खंडन करते हुए कहा।
‘‘अरे वाह! आपतो ईडी का पक्ष ले रही हैं। आप क्यों डर रही हैं? आपने कौन-सी मनीलांड्रिंग कर ली है जो आपको ईडी का डर हो?’’ भैयाजी भड़क गए।
‘‘मैं क्यों डरूंगी? मनी लांड्रिंग तो दूर दो साल से तो मैंने कपड़े भी लांड्री में नहीं धुलवाए हैं। मुझे लांड्रिंग-वांड्रिंग से क्या लेना-देना? रहा सवाल चुनाव का तो मुझे कभी चुनाव में खड़े नहीं होना है इसलिए डरने का कोई सवाल ही नहीं है।’’ मैंने कहा।
‘‘हां, देखिए आपने भी यह बात कह ही दी न कि जो चुनाव में खड़ा होता है उसकी मनी लांड्रिंग पकड़े जाने का ख़तरा होता है।’’ भैया जी खुश हो कह उछल पड़े। उन्होंने मेरे शब्दों को पकड़ जो लिया था।
‘‘देखिए आप मेरी बात को तोड़-मरोड़ रहे हैं, मैंने ऐसा बिलकुल नहीं कहा।’’ मैंने प्रतिवाद किया।
‘‘ठीक है, आपने सीधे-सीधे नहीं कहा लेकिन आड़े-टेढ़े तो कहा।’’ भैयाजी मेरे कथन को अपने समर्थन में साबित करने के लिए कटिबद्ध थे।
‘‘चलिए ठीक है, मैंने कहा तो कहा, लेकिन ये बताइए कि राजनीति में दखल रखने वाले लोग मनी लांड्रिंग जैसा काम करते ही क्यों हैं? अगर ऐसा काम न करें तो चाहे चुनाव का मौसम हो या पतझर का, उन पर ईडी का छापा पड़ेगा ही क्यों? बताइए, आप ही बताइए? चोर चोरी करेगा तो कभी तो पकड़ा ही जाएगा। अब अगर चुनाव के मौसम में पकड़ा जाए तो सब उसे चुनाव से जोड़ कर देखने लगते हैं।’’ मैंने भी अपना पक्ष रखा।
‘‘तो बहन जी, आप क्या सोचती हैं कि ये बाहुबली क्या ऐसे फोकट में बन जाते हैं? उसके लिए मनी की ज़रूरत होती है मनी की। अगर आप बाहुबली हैं तो आपके चुनावी टिकट पाने के आसार मजबूत होते हैं वरना हम-आप जैसों को टिकट न बांट दी जाती?’’ भैयाजी जो खुद भी एकाध बार टिकट पाने का सपना देख चुके हैं, दुखी हो कर बोले।
‘‘भैयाजी, दिल छोटा मत करिए। अच्छे लोगों को भी टिकट मिलती है। रहा सवाल ईडी के छापे का तो क्षेत्रीय चुनावों में तो उम्मींदवारों की आपत्तिजनक फ़र्ज़ी सीडी भी चला दी जाती है। चुनावी मौसम में बहुत कुछ होता है, कुछ संयोग से कुछ दुर्याेग से। आप क्यों इस बहस में पड़ रहे हैं?’’ मैंने भैयाजी को समझाया।
‘‘यही तो चक्कर है बहनजी, चुनाव के दौरान चली आपत्तिजनक सीडी फ़र्जी होती हैं लेकिन ईडी तो सौ बिटकाईन सच होती है।’’ भैया जी बोले। वे सौ टका के बदले सौ बिटकाइन बोलना पसंद करते हैं क्यों कि उनकी पोती टका नहीं जानती है लेकिन बिटकाइन जानती है।
खैर, बहस तो हज़ार पैर वाली सेंटीपीड होती है जो रेंगती-रेंगती किसी भी दिशा में मुड़ सकती है। इसलिए मैंने वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी,‘‘मैं जा रही हूं। वैसे आप चाहे तो ईडी और सीडी के मौसम का आनंद लीजिए। क्योंकि मुझे पता था कि अब चर्चा की दिशा सीडी की ओर मुड़ जाएगी और पिछले चुनावों के किस्से चटखारे ले-लेकर कहे-सुने जाएंगे। बेशक़, चुनावों काल की यही तो खूबी है कि हज़ार संयोग, हज़ार दुर्योग और हज़ार किस्से ईडी और सीडी की तरह मौसम बन कर साथ चले आते हैं।
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(नवभारत, 27.02.2022)
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Sunday, February 13, 2022
नक़ाब के ज़माने में हिज़ाब का हल्ला | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
Sunday, January 30, 2022
ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
मित्रो, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर" ...😀😊😛
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व्यंग्य
ग्लोबल होते गोबर का ग्लैमर
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
ग्लैमर एक ऐसी चीज है जो बड़े-बड़े तपस्वियों के तप भंग करने का माद्दा का रखता है। पुराणों में अनेक ग्लैमर सुंदरियों की चर्चा है जैसे उर्वशी, मेनका, रंभा, संभा आदि-आदि। ग्लैमर का महत्व देवताओं के राजा इन्द्र बखूबी जानते थे। इसीलिए जब उन्हें किसी ऋषि का तप भंग करना होता था तो वे अपनी सभा की ग्लैमर सुंदरी को उसके पास नाचने, गाने, रिझाने भेज दिया करते थे। महर्षि विश्वामित्र भी इससे अछूते नहीं रहे। मेनका स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा थी। महान तपस्वी ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के निर्माण के लिए जब तपस्या शुरू की तो उनके तप से देवराज इन्द्र ने घबराकर उनकी तपस्या भंग करने के लिए मेनका को भेजा। मेनका ने अपने रूप और सौंदर्य से तपस्या में लीन विश्वामित्र का तप भंग कर दिया। दरअसल, इन्द्र ने कभी नहीं चाहा कि कोई उसकी बराबरी कर सके। वाह, कितना अच्छा बाज़ारवादी था इन्द्र। प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी उसकी। आजकल बाज़ारवाद में भी तो यही होता है। अपने प्रोडक्ट की साख बनाए रखने के लिए दूसरे की साख को सिलबट्टे में पीस दिया जाता है। लेकिन यहां बात सिलबट्टे की नहीं हो रही है। यूं भी सिलबट्टा आउटडेटेड हो चला है। इलेक्ट्रिक ग्राइंडर के जमाने में सिलबट्टे को कौन पूछे। अगर बाहों की मसल्स बनानी ही है तो चमचमाते जिम और होमजिम तो हैं ही।
खैर, बात हो रही थी ग्लैमर की। तो अब ग्लैमर की दुनिया में गोबर को भी शानदार जगह मिल गई है। निश्चित रूप से यह गायों के लिए बड़ी खुशखुबरी है। उन्हें गर्व होगा यह जान कर। वरना विलायती फंड से फंडित होने वाले बड़े-बड़े अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में ‘‘काऊ डंग’’ को अस्पृश्य समझा जाता है। मुझे भी यह बात पता नहीं थी क्योंकि मैं तो हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूल की छात्रा रही हूं। लेकिन मेरी एक सहेली की बेटी उन दिनों विलायती फंड से फंडित होने वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ती थी। एक दिन मेरे घर में दाल-बाटी बनी तो मैंने सहेली को सपरिवार आमंत्रित किया। मेरी सहेली ने स्पष्टशब्दों में मुझे बताया कि वह और उसके पतिदेव तो आ जाएंगे लेकिन उसकी बेटी नहीं आएगी।
‘‘क्यों, क्या वह बहुत व्यस्त है? एक्जाम-वेक्जाम हैं क्या?’’ मैंने उससे जानना चाहा।
‘‘अरे नहीं, है तो फ़ुर्सत में लेकिन मुझे पता है कि वह नहीं आएगी।’’ मेरी सहेली ने अटपटा सा उत्तर दिया।
‘‘ऐसा क्यों? क्या वह मुझसे नाराज़ है?’’ मैंने पूछा।
‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है।‘‘ मेरी सहेली मुझे छोटा-सा उत्तर दे कर रह गई। इस पर मुझे गुस्सा आने लगा।
‘‘बात क्या है? साफ़-साफ़ बताओ!’’ मैंने उससे धमकाने की मुद्रा में पूछा।
‘‘उसे बाटियां पसंद नहीं हैं।’’ मेरी सहेली ने बताया। मगर मुझे यह बात हज़म नहीं हुई। भला कौन होगा जिसे दाल-बाटी पसंद न हों। जिसके मुंह में दांत न हों और नकली बत्तीसी भी न लग पाई हो वह भी दाल में बाटियों को मीड़-मीड़ कर चाव से खाता है। यानी मामला कुछ और है।
‘‘मुझे तुम्हारी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है, सही-सही बताओ!’’ मैंने फिर कठोरता से पूछा। तब कहीं जा कर उसने झिझकते हुए बताया कि-‘‘वो... बात ये है कि बाटियां गोबर के कंडे में बनती हैं न, और इसीलिए मेरी बेटी को पसंद नहीं है। वह तो बाटियां देखते ही चिढ़ जाती है कि ये तो काऊ डंग (गोबर) पर बनी हैं, मैं नहीं खा सकती इन्हें। वह तो गोबर या कंडे को हाथ भी लगाना पसंद नहीं करती है। बस, यही कारण है।’’
‘‘यानी उसने आज तक दाल-बाटी खाई ही नहीं?’’ मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मालवा में रहने वाला जैसे दाल-बाफले खाए बिना नहीं रह सकता है, वैसे ही बुंदेलखंड में रहने वाला दाल-बाटी का स्वाद न चखे, यह कैसे संभव है?
‘‘नहीं, उसके लिए माइक्रोवेव ओवन में बना दिया करती हूं।’’
‘‘पर, वह स्वाद कहां जो कंडे की आग में सिकीं बाटियों में होता है। तुम अपनी बेटी को समझाती क्यों नहीं कि गोबर और कंडा पवित्र वस्तुएं हैं। कंडा तो हवन-पूजन में भी काम में लाया जाता है।’’ मैंने सहेली को उलाहना दिया।
‘‘मैं कई बार समझा चुकी हूं। लेकिन उसके स्कूल में उसे यही सिखाया जाता है कि गोबर ‘‘काऊ डंग’’ होता है। तुम समझ रही हो न!’’ सहेली ने अपनी विवशता प्रकट करते हुए मुझसे कहा।
‘‘ठीक है, मैं समझ गई।’’ अब जबर्दस्ती तो किसी को कुछ खिलाया नहीं जा सकता है। मैंने भी कहा,‘‘उसके लिए मैं कुछ और बना लेती हूं। उसे भी साथ ले आना।’’
इसीलिए जब मैंने ऑन लाईन शाॅपिंग साईट पर ‘‘काऊ डंग केक’’ शब्द पढ़ा और उसके साथ लगा प्रोडक्ट का फोटो देखा तो कुछ जानी-पहचानी-सी चीज लगी। एक और क्लिक करके उस प्रोडक्ट के विवरण पर गई तो मैंने पाया कि यह तो गोबर के कंडों यानी उपलों का विज्ञापन था। करीने से पैक किए गए। एक साईज़ के। किसी खाने की वस्तु के समान। अत्यंत आकर्षक। मार्केटिंग पर एकदम खरे उतरने वाले। उन्हें देख कर मेरी आंखों में आंसू आ गए। ये दुख के नहीं, खुशी के आंसू थे। कम से कम अब मैं उस बालिका का तप भंग करने में क़ामयाब हो जाऊंगी।
चाहे मैं ऑन लाईन शाॅपिंग करूं या न करूं लेकिन अपनी सहेली की बेटी को एक दिन खाने पर अपने घर आमंत्रित ज़रूर करूंगी और उसे यही बताऊंगी कि अब जो मैंने बाटियां बनाई हैं वे लोकल गायों के लोकल गोबर से बने कंडों पर नहीं सेंकी हैं बल्कि ऑन लाईन शाॅपिंग कर मंगाए गए ‘‘काऊ डंग केक’’ की आग में सेंकी गई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इंटरनेट मार्केटिंग जेनरेशन वाली वह बालिका उन बाटियों को सहर्ष ग्रहण कर लेगी। आखिर उस ‘‘काऊ डंग केक’’ के पीछे उच्चकोटि के मार्केटिंग डिवीज़न ने महीनों काम किया होगा। आकार, प्रकार, प्रचार, प्रसार सब का ध्यान रखते हुए उसे ग्लैमरस बनाया होगा। तब कहीं जा कर एक मल्टी नेशनल ऑन लाईन शाॅपिंग साईट पर उसे लांच किया गया होगा। लिहाज़ा, ‘‘काऊ डंग केक’’ के इस ग्लैमर से वह बालिका अछूती कैसे रह सकेगी? अब तो उसे बाटियां खाने में कोई समस्या नहीं होगी। वाकई मैं नतमस्तक हूं ग्लोबल होते गोबर के ग्लैमर के सामने।
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(नवभारत, 30.01.2022)
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Sunday, January 16, 2022
बेचारे बदरंगे बैंगन | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
प्रिय ब्लॉग साथियों, प्रस्तुत है आज "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट "सृजन" में प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख "बेचारे बदरंगे बैंगन" ...😀😊😛
Sunday, January 9, 2022
कुछ त्रुटियां अच्छी होती हैं | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत
Tuesday, October 19, 2021
पुस्तक समीक्षा | व्यंग्य की कड़ाही में विचारों की जलेबियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
Sunday, August 22, 2021
व्यंग्य | महात्म्य 'प' अक्षर का | डॉ (सुश्री) शरद सिंह, नवभारत में प्रकाशित, 22.08.2021
| Dr (Miss) Sharad Singh |