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Tuesday, September 1, 2026

पुस्तक समीक्षा | ग़ज़लकार हरेराम समीप के सृजन से परिचित कराता है सृजन-समीक्षा ग्रंथ | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
ग़ज़लकार हरेराम समीप के सृजन से परिचित कराता है सृजन- समीक्षा ग्रंथ
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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समीक्षा ग्रंथ - ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन-समीक्षा
संपादक - डॉ. वशिष्ठ अनूप
प्रकाशक - श्वेतवर्ण प्रकाशन, 212 ए, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट, सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा-201304
मूल्य - 999/- 
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         किसी भी रचनाकार का वास्तविक परिचय उसके सृजन से ही होता है। विधा, विषय, विचार, प्रस्तुति आदि रचनाकार के रचनात्मक व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब रचनाकार की रचनाएं निष्पक्ष समीक्षकों की निष्पक्ष दृष्टि से होकर गुजरती है तो उन रचनाओं का उचित मूल्यांकन होने के साथ ही रचनाकार की साहित्य के प्रति निष्ठा एवं समर्पण का भी पता चलता है। ग़ज़लकार हरिराम समीप ने अपने अब तक के जीवन का एक लंबा समय ग़ज़ल को समर्पित किया है। उन्होंने न केवल गजलों का सृजन किया अपितु गऋजऋलके कलेवर, ग़ज़लके शिल्प, गजल का इतिहास, ग़ज़लके क्षेत्र में रचनाकारों का योगदान आदि विविध दृष्टिकोण से ग़ज़लकी समग्रता का न केवल आकलन किया बल्कि एक विश्वसनीय दस्तावेज की भांति प्रस्तुत भी किया है। उनके द्वारा संपादित ऐसे ग्रंथों को हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक ग्रंथों में गिना जा सकता है। जिस प्रकार ग़ज़लकार हरेराम समीप ग़ज़लविधा के लिए समर्पित हैं, इस प्रकार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग डॉ वशिष्ठ अनूप निरंतर भारतीय ग़ज़ल को अपनी ग़ज़लों से समृद्ध कर रहे हैं। एक समर्पित व्यक्ति ही दूसरे व्यक्ति के समर्पण को भली भांति समझ सकता है तथा महसूस कर सकता है इसीलिए डॉ वशिष्ठ अनूप ने हरिराम समीप अवदान को न सिर्फ़ महसूस किया बल्कि उनके सृजन पर केंद्रित समीक्षाओं को एक ज़िल्द में समेट कर स्वयं भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ रच दिया। इस दस्तावेज़ी ग्रंथ का नाम है - ‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’।
501 पृष्ठ के इस ग्रंथ में हरेराम समीप एक व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 48 आलेख, कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और उनका साक्षात्कार संकलित है। डॉ वशिष्ठ अनूप को इस प्रकार के ग्रंथ की आवश्यकता क्यों महसूस हुई इस संबंध में उन्होंने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ‘‘हरेराम समीप हिंदी के वरिष्ठ और समर्थ रचनाकार हैं। उन्होंने लगभग पाँच दशकों से हिंदी में पर्याप्त और स्तरीय ग़ज़लें लिखी हैं। उनकी रचनात्मकता के इस उत्कर्ष-काल और उनकी उम्र के इस पड़ाव पर यह आवश्यक था कि उनकी ग़ज़लों का मूल्यांकन किया जाए और हिंदी ग़ज़ल के पाठकों के सम्मुख उनके अवदान को प्रस्तुत किया जाए। यह सुखद है कि हिंदी ग़ज़लके अध्येताओं और विशेषज्ञ विद्वानों ने समीप जी की ग़ज़लों पर बड़े मनोयोग से आलेख लिखे हैं और विभिन्न कोणों से उनकी ग़ज़लों की संवेदना और शिल्प को देखा, परखा और मूल्यांकित किया है।’’ 

इस प्रकार का विचार आते ही डॉ वशिष्ठ अनूप ने विभिन्न समीक्षकों एवं हिंदी के विद्वानों से हरिराम समीप से संबंधित आलेख आमंत्रित किए। इस प्रकार के ग्रंथ का संपादन करना भी एक श्रम साथी एवं धैर्य का कार्य होता है। एक संपादक विचार करता है, तत्संबंधी रचनाएं आमंत्रित करता है किंतु यह आवश्यक नहीं है की जिनसे रचनाएं मंगाई जाए वे तत्काल रचना भेजने की स्थिति में हों। व्यक्तिगत विशेषताओं के चलते कई बार रचनाकारों को अनचाहा विलंब हो जाता है और इसके लिए संपादक को धैर्य का परिचय देना पड़ता है। यह धैर्य ही एक अच्छे ग्रंथ को आकार दे पाता है। इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद डॉ वशिष्ठ अनूप के धैर्य का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने ग्रंथ के मूल स्वरूप को हरेराम समीप जी के की समीक्षा पर केंद्रित रखा है किंतु इसके साथ ही केंद्रीय रचनाकार के पक्ष को भी शामिल करते हुए उनके साक्षात्कार को भी स्थान दिया है जिससे यह ग्रंथ समग्रता से संपन्न है। 
‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’ ग्रंथ के मुख्य पृष्ठ पर हरेराम समीप जी का पोटे््रट प्रकाशित है जिससे उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती है। ग्रंथ की समस्त सामग्री को दो अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम खंड है - ‘‘हरेराम समीप: जीवन और लेखन’’। इस खंड में हरिराम समीप की ग़ज़लों एवं उनके ग़ज़ल संग्रहों पर विभिन्न समीक्षकों के लेख है। कुछ लेख उनके जीवनवृत्त पर भी प्रकाश डालते हैं।

प्रथम खंड में प्रस्तुत किए गए लेख इस प्रकार हैं - हरेराम समीप का ग़ज़ल -संसार रू समग्र अनुशीलन - डॉ. वरुण कुमार तिवारी, हरेराम समीप की ग़ज़ल -यात्रा - सुदेश कुमार मेहर, व्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती ग़ज़लें - प्रो. वशिष्ठ अनूप, हरेराम समीप: एक क्रांतिधर्मी, प्रयोगधर्मी ग़ज़लकार - डॉ. ऋषिपाल धीमान ऋषि, विसंगतियों का मुखर प्रतिवाद - ज्ञानप्रकाश विवेक, भविष्य के लिए एक मानवीय सपना दिखाती ग़ज़लें - गरिमा सक्सेना, समीप की हिन्दी ग़ज़ल -दृष्टि और आलोचना-कर्म - डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री, अँधेरे दौर में उजाले की तलब - डॉ. भागीनाथ यादवराव वाकले, हरेराम समीप की हिन्दी ग़ज़ल को देन - दिनेश सिंदल, खौफ़ से मोहब्बत तक की अंतर्यात्रा की ग़ज़लें - डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ, जनवादी चेतना के प्रखर ग़ज़लकार: हरेराम समीप - महेन्द्र नेह, जन-आस्था की प्रतिबद्ध ग़ज़लें - उमाशंकर सिंह परमार, हिन्दी ग़ज़लका जनपक्ष- महेश अग्रवाल, सन्नाटे के तिलिस्म को तोड़ती ग़ज़लें - डॉ. शिव ओम अम्बर, गहरे जीवन-बोध के ग़ज़लकार हरेराम समीप - महेश अश्क, ग़ज़लों में उतरा है आज का समाज - डॉ. बालस्वरूप राही, वर्तमान भावबोध को नए धरातल पर चिन्हित करती ग़ज़लें - विजय कुमार स्वर्णकार, ग़ज़लों का विस्तृत कथ्य-संसार -ओमप्रकाश यती, मौन साधना के क्रांतिकारी रचनाकार रू हरेराम समीप - महेश कटारे सुगम, सामजिक चेतना और प्रतिरोध की बेबाक ग़ज़लें - डॉ. डीएम. मिश्र, बाज़ारवाद और बढ़ते साम्राज्यवाद से टकराती ग़ज़लें - राजेन्द्र वर्मा, प्रतिबद्धता और प्रतिरोध की सशक्त ग़ज़लें - डॉ. भावना, ग़ज़लों में जनवादी रुझान - बी. आर. विप्लवी, हरेराम समीप की ग़ज़लगोई-डॉ. महेन्द्र अग्रवाल, हरेराम समीप की ग़ज़लके सरोकार - प्रदीप कान्त, समय की घटनाओं से प्रेरित समीप की ग़ज़लें - अनिरुद्ध सिन्हा, हिन्दी ग़ज़ल में आस्था का स्वर - लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, भीतर की उड़ान की ग़ज़लें - स्व. शिवराम, समाज को आईना दिखाती ग़ज़लें - डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, लोकोन्मुखी चेतना की ग़ज़ल में अभिव्यक्ति - डॉ. नितिन सेठी, हरेराम समीप की ग़ज़लधर्मिता, सरोकार एवं उपादेयता - डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता शलभ, समय की आग पीती ग़ज़लें - चंद्रभान भारद्वाज, सोच का मौसम समय और समाज का दस्तावेज़ - देवमणि पाण्डेय, हरेराम समीप की ग़ज़लों में फिक्र और फ़न का समन्वय - राहुल शिवाय, हिन्दी ग़ज़लका एक नया उन्मेष - स्व. डॉ. राम दयाल कोष्ठा श्रीकांत, विसंगतियों के जाल से समकाल तक: समीप की ग़ज़लें - डॉ. रामगोपाल भारतीय, ग़ज़लमें संवेदनशीलता के व्याख्याकार हरेराम समीप डॉ. कृष्णकुमार नाज़, समय की विसंगतियों से टकरातीं समीप जी की ग़ज़लें - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ातीं ग़ज़लें - डॉ. राकेश जोशी, हरेराम समीप की ग़ज़लों के ये दमदार शेर - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, हिन्दी ग़ज़ल में आती समकाल की आवाज़ - डॉ. अनिल गौड़, सृजन के विविध आयाम हरीलाल मिलन, जन-सरोकारों से जुड़ी हिन्दी ग़ज़लें - के. पी. अनमोल, यथा-स्थितिवाद के तिलस्म को तोड़ने का आग्रह करती ग़ज़लें - संजीव प्रभाकर, नींद से जगातीं हरेराम समीप की ग़ज़लें - डॉ. रामावतार सागर, हरेराम समीप की ग़ज़लों में समय, समाज और संवेदना - आशा पाण्डेय ओझा आशा, जनपक्षधरता की अगुआई करती ग़ज़लें - विजय, सोच का मौसम: ग़ज़ल का एक मुक़म्मल अदबी दस्तावेज़- डॉ. प्रमोद सागर और इस खंड के अंत में कुछ और महत्वपूर्ण साहित्यकारों की टिप्पणियाँ सहेजी गई हैं।

‘‘व्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती ग़ज़लें’’ में प्रो. वशिष्ठ अनूप ने लिखा है कि ‘‘हरेराम समीप शब्द साधक साहित्यकार हैं। वह जानते हैं कि हर सच्चा साहित्यकार जीवन-जगत के अन्तर्बाह्य सत्य का अनुसन्धान करता है और उस सत्य से सबका साक्षात्कार कराता है। कविता साहित्य का सर्वोत्तम रूप होती है और ग़ज़ल में अन्तर्वस्तु की सर्वाधिक सघन अन्विति होती है। सत्य के पक्ष में खड़ा होना और उसे कहना-लिखना खतरे से खाली नहीं होता। यह जानते हुए भी वह सच कहते आ रहे हैं। उन्हें पता है कि हुक्मरानों की आदत सच्चाई को सुनने की नहीं होती और इसी कारण तमाम लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और कवियों को यातनाएँ भुगतनी पड़ी हैं, पड़ रही हैं, वह जोखिम उठाकर भी सत्य और शब्द का साथ नहीं छोड़ते। इतना ही नहीं, समीप जी शब्दों की सेना को सबल बनाने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं। वह क़तरे में सैलाब को समेटने की सामथ्र्य रखते हैं-
एक शायर ही बता सकता है आखि़र उसने 
एक सैलाब को कतरे में समेटा कैसे ।

डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने अपने लेख ‘‘खौफ़ से मोहब्बत तक की अंतर्यात्रा की ग़ज़लें’’ में हरेराम समीप जी के संबंध में लिखा है कि ‘‘उन्होंने सच कहने का साहस जुटाया है। बार-बार डर या खौफ़ का उल्लेख बताता है, कि स्थितियाँ कितनी भयावह और प्रतिकूल हैं। हमको सिर्फ डर ही डर मिला, अब कौन यहाँ खौफ़ की छाया में नहीं है, खौफ़ तारी हो रहा कुछ यूँ दिलों के आसपास, जिन्दगी क्यों खफ़ा से सहमी डरी है आदि उद्गारों में परिवेश की प्रामाणिकता है। ऐसे माहौल में भी रचनाकार लिखने का ही नहीं, प्रतिरोध करने का जोखिम भी उठा रहा है। सियासत, लोकतंत्र, हुक्मरान आदि पर टिका-टिप्पणियाँ इसकी साक्षी हैं। अर्थात राजनीतिक परिदृश्य की सही पहचान इन रचनाओं में है-
साँठ-गाँठ में लगी सियासत 
करे हुकूमत अदल-बदल कर

डॉ. भारतेंदु मिश्र की यह सारगर्भित टिप्पणी गोया सब कुछ कह जाती है-‘‘यूँ तो ग़ज़लगो बहुत से हैं लेकिन हरेराम समीप की बात कुछ और है। समीप का कवि शायरी की धड़कन को पहचानता है. कवि अपने समय को कितनी गहराई से जीता है यह उसकी कविता से ही आंका जा सकता है।’’

ग्रंथ का खण्ड-दो साक्षात्कार का खंड है। इसमें कवि, ग़ज़लकार एवं आलोचक हरेराम समीप से युवा ग़ज़लकार के.पी. अनमोल की एक लम्बी बातचीत है। यह साक्षात्कार हरेराम समीप जी द्वारा स्वयं के जीवन के बारे में दी गई जानकारी से जहां अवगत कराता है वहीं हिंदी ग़ज़ल के स्वरूप में भारतीय ग़ज़ल पर समग्रता से प्रकाश डालता है। एक प्रश्न और उसके उत्तर के अंश की बानगी देखिए-         
प्रश्न - हिन्दी ग़ज़ल की व्याकरण-निबद्धता पर आज तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे हैं, इस पर आपके क्या विचार हैं?  
उत्तर - ग़ज़ल चाहे किसी भी भाषा में लिखी जाए, उसका सौंदर्य ग़ज़ल के निर्धारित व्याकरण या शिल्प से जुड़ा होना वांछित है, इसी को ग़ज़ल का अरूज़ में होनाश् भी कहते हैं। अरूज़ के अंतर्गत सिर्फ बहर-वजन के अलावा और भी बहुत सावधानियाँ रखनी होती हैं, जो उसके आतंरिक सौन्दर्य को बढ़ाती हैं। यह ‘बहुत कुछ’ ग़ज़ल में कवि की प्रकृति, श्रम और साधना से आता है। 

डाॅ वशिष्ठ अनूप ने ‘‘ग़ज़लकार हरेराम समीप सृजन समीक्षा’’ को बहुत खूबसूरती से संपादित कर इसे हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल के इतिहास का एक मील का पत्थर बना दिया है। इस ग्रंथ को हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों एवं हिन्दी ग़ज़ल में रुचि रखने वालों को अवश्य पढ़ना चाहिए।  
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Wednesday, August 19, 2026

पुस्तक समीक्षा | संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा    

संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं                              

 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - आवाज़ मौसम की
कवि       - राजेन्द्र गौतम
प्रकाशक    - अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली- 110 032
मूल्य       - 400/-
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राजेन्द्र गौतम हिन्दी की नवगीत विधा के एक वरिष्ठ और स्थापित नाम हैं। उनका ताज़ा नवगीत संग्रह ‘‘आवाज़ मौसम की’’ मात्र 61 नवगीतों का संग्रह नहीं है वरन यह अपने-आप में नवगीत की गीतात्मक यात्रा की कथा है। यह यात्रा राजेन्द्र गौतम के लगभग 1972-73 के नवगीतों से आरम्भ होती है। इनसे नवगीत की उस समय की प्रकृति एवं प्रवृत्ति को समझा जा सकता है जब नवगीत विधा अपने स्वर्णकाल में विस्तार पा रही थी। हिन्दी साहित्य में गीत विधा पहले से विद्यमान थी, फिर भी नवगीत के शिल्प की आवश्यकता को अनुभव किया गया और इस विधा को भरपूर लोकप्रियता भी मिली। नवगीत में गीत की अपेक्षा कुछ छूटें ली गई थीं जिससे इसके कथ्य को चहुंमुखी दिशाएं मिलीं। सन् 2012 में नवगीत विधा पर नवगीतकार वीरेन्द्र आस्तिक का एक लंबा लेख प्रकाशित हुआ था जो आज भी ‘‘पूर्वाभास’’ की इन्टरनेट साईट पर पढ़ा जा सकता है। अपने इस महत्वपूर्ण लेख में वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत की तत्कालीन सृदृढ़ स्थिति एवं संभावनाओं के साथ ही आवश्यकताओं पर भी प्रकाश डाला था। लेख का शीर्षक था-‘‘नवगीत का संक्षिप्त इतिहास और उसकी मौजूदा समस्याएं’’। अपने इस लेख में उन्होंने एक वाक्य लिखा था-‘‘आज नवगीत एक समृद्ध विधा है। बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि भविष्य में नवगीत का सुनहरा युग आने वाला है।’’
निश्चित रूप से वह सुनहरा युग आया। यूं तो शंभूनाथ सिंह को नवगीत का प्रणेता माना जाता है, वहीं कुछ लोग राजेन्द्र प्रसाद सिंह को नवगीत का प्रवर्तक मानते हैं। बहरहाल, आरंभ जिसने भी किया हो किन्तु इसे सोपान चढ़ाया उन अनेक नवगीतकारों ने जिनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं- त्रिलोचन शास्त्री, केदारनाथ सिंह, गोपालदास नीरज, धर्मवीर भारती, रवीन्द्र भ्रमर, रमेश रंजक, कुमार शिव, वीरेन्द्र मिश्र, कुंवर नारायण, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, बालस्वरूप राही, रामदरश मिश्र, नरेश सक्सेना, ओम प्रभाकर, बुद्धिनाथ मिश्र, अनूप अशेष, नईम, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय आदि। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि नवगीत को नेपथ्य में धकेला जाने लगा। इस संदर्भ में मैं फिर वीरेन्द्र आस्तिक के लेख का एक अंश दे रही हूं जिसमें उन्होंने नवगीत के नेपथ्य मे जाने के भावी कारण की मानो पहले ही घोषणा कर दी थी-‘‘यहां मैं आलोचना पर जोर क्यों दे रहा हूं? विगत में डॉ नामवर सिंह जैसे गद्य कविता के आलोचक यह कहते आए हैं कि ‘गीत आलोचना की वस्तु नहीं है।’ यह कहकर वे एक तीर से दो निशाने साधते रहे हैं। एक- गीत इस लायक नहीं कि उसकी आलोचना हो और दो- शैक्षिक जगत में, गद्य कविता का एकाधिकार बरकरार रहे। मेरा मानना है कि यदि गीत पर विमर्श नहीं होगा तो वह मूल्यांकित भी नहीं होगा और यदि उसका मूल्यांकन नहीं होगा तो पाठ्यक्रमों आदि में प्रवेश का रास्ता भी नहीं बन पाएगा। यहां पर मैं बड़े आदर के साथ उन सभी आलोचकों-समीक्षकों को याद करता हूं जिनकी महती भूमिका से नवगीत समृद्ध हुआ। लेकिन बात वहीं की वहीं है कि नवगीत आज साहित्य की मुख्य धारा में नहीं है जिसका वह हकदार है, क्योंकि उसकी वकालत के लिए हमारे पास बड़े आलोचक नहीं है।’’

एक कारण और भी रहा है जिसका अनुमान लेख लिखने के समय आस्तिक जी को नहीं रहा होगा कि भविष्य में साहित्य सृजन के प्रति श्रम में घोर कमी आने लगेगी। नवगीत भी श्रम की मांग करता है अर्थात् नवगीत सृजन उन कवियों के लिए धैर्य चुका देने वाला कार्य था जो रातों-रात कवि कहलना जाना चाहते हैं। नवगीतकार  माहेश्वर तिवारी ने नवगीत की खूबी बताई थी कि-‘‘नवगीत अपने समय की आधुनिकता बोध से सम्पन्न संपृक्त छांदसिक रचना है।’’
संग्रह में अपने गीतों को राजेन्द्र गौतम ने पांच उपशीर्षकों में विभक्त किया है- लपटों भरा आकाश, मेघदूत आया, शरद की भोर, शीत लहर, नंगी डालें तथा देह थिरकती है मौसम की। सभी नवगीतों में प्रकृति की प्रधानता है। कवि ने प्रकृति को लक्ष्य कर के अपनी तमाम अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध किया है। एक नवगीत है ‘‘दहकते छन्द’’। इसमें समसामयिक व्यंजना को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
बचा कर भी
कहां ले जायें
हम ये झुलसती कलियां
सुलगती आग है अब झील-तल में
या कमल-वन में।
हुआ सम्बन्ध गहरा
आंधियों से
और अब इसका
तवे-सी तप रही जो
जेठ की दोपहर पल-पल है
क्षितिज पर
दूर धुंधले में
विवश मंडरा रहीं चीलें
न जाने कब गिरे भू पर भू
थका हर पंख निर्बल है
घटाओं के सपन ढोता फिरे
आकाश बंजारा
रचें पर दग्ध तलवे रेत की छुवनें,
चुभन तन में।

राजेन्द्र गौतम समय की नब्ज़ को पकड़ना बखूबी जानते हैं। वे स्थितियों पर कटाक्ष करते हैं, दुख प्रकट करते हैं, असंतोष जताते हैं। इन सबमें उनके शब्दों का चयन अपनी महत्ता स्वयं प्रकट कर देता है। उदाहरण के लिए संग्रह का नवगीत ‘‘पथरा चुकीं झीलें’’ को ही लें-
कभी मौसम के पड़ें कोड़े
कभी हाकिम जड़े सांटे खाल मेरे गांव की
कब तक दरिन्दों से
यहाँ खिंचती रहेगी!
दूर तक जो
भूख से सहमे हुए
सीवान ठिठके हैं
कान में उनके सुबकतीं
प्यास से पथरा चुकीं झीलें
रेत के विस्तार में
यों ठूंठ दिखते हैं करीलों के
ज्यों ठुकीं गणदेवता की
काल-जर्जर देह में कीलें

नवगीत की यह विशेषता रही है कि उसने जहां यथार्थवाद के गुणों को अपनाया, वहीं छायावाद के प्रकृति के मानवीय करण को भी आत्मसात किया। इससे नवगीत में कठोरता और कोमलता संतुलित रूप में एक साथ बनी रही। आंचलिक भाषा एवं बोलियों को भी नवगीत में पर्याप्त स्थान मिलता रहा है ताकि उनका लोक एवं जनमूल्य बना रहे। राजेन्द्र गौतम के नवगीत ‘‘हिम-सी जमी है’’ के एक बंद से नवगीत की इन खूबियों को भली-भांति समझा जा सकता है-
ओस की
बूंदों सरीखी की
दूब पातों पर उतरती
जा रही है नम उदासी
एक-
अनजानी विकलता
साथ अपने खे रही है
यह नदी क्यों विफलता-सी
ये बुरुसों
की कतारें
दूर तक हिलतीं, डुलातीं-
हों तटों को ज्यों बिजलियां।

‘‘आवाज़ मौसम की’’ संग्रह की भूमिकाएं वेद प्रकाश शर्मा ‘‘वेद’’ तथा डाॅ. कुसुम सिंह ने लिखी हैं। नवगीतकार राजेन्द्र गौतम का यह नवगीत संग्रह नवगीत के भाषिक संस्कार, शिल्प के सौष्ठव एवं प्रवाह लहरियों से ठीक उसी प्रकार परिचित कराता है, मानो नवगीत की सुरम्य घाटियों में भावनाओं की बांसुरी का सप्तक स्वर गूंज रहा हो जिसमें अव्यवस्था के प्रति रोष का भारी मंद सप्तक स्वर भी है और प्रकृति के सौंदर्य का पंचम मधुर सप्क स्वर भी। वस्तुतः नवगीत विधा के शोधार्थियों तथा नवगीत सृजनधर्मियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संग्रह है।      
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