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Friday, June 24, 2022

बतकाव बिन्ना की | बेलन काए, फटफटिया काए नईं? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

मित्रो, "बेलन काए, फटफटिया काए नईं?" ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीणप्रभात 🙏
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बतकाव बिन्ना की
बेलन काए, फटफटिया काए नईं?
      - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘भैैयाजी, जबलों चुनाव को टेम आओ है तभईं से आप मूंड़ पकरे घूमत दिखात होे, आपके लाने हो का गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कछु नईं बिन्ना!’’ भैयाजी बोले, मनो उनको मों लटकई रओ। 
‘‘ऐसो नईं! कछु तो बोलो भैयाजी! दुख बांटबे से कम होत आए। मनो मैं अपनी तरफा से नईं कै रई, ऐसो कहो जात है।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘दुख? मनो दुख तो आए पर बांटबे जोग नइयां।’’ भैयाजी ऊंसई मों बनात भए बोले।
‘‘ऐं? चलो छोड़ो आप, जो बिन्ना हरों से कहबे जोग नइयां, सो ने कहो।’’ मोए लगो के कछु ऊंसई-सी बात आए जो भैयाजी मोसे ने कह पा रए।
‘‘अरे, नईं-नईं! ऐसो कछु नइयां!’’ भैयाजी झेंपत से बोले,‘‘कछु गोपनीय नइयां। बा तो हम जे कै रए हते के बोलबे से कछु बदलबे है नइयां, सो काए के लाने बोलो जाए।’’
‘‘जो ऐसई आए सो आप इत्ती सोच-फिकर काए कर रए? अखीर सोचबे के जोग बात हुइए, तभईं तो आप सोच में डूबे दिखा रए। अब बताई दो आप। कै देबे से जी हल्को हो जेहे।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘मोए एक बात समझ में कभऊं नईं आई के जोन जागां पे महिला सीट होत आए, मने चुनाव के लाने लुगाइयां ठाढ़ी होत आएं, उते चुनाव चिन्ह चुड़ियां, मुंगरिया, थाली, मटका, बेलन घाईं लेडीज़ वारे आईटम काए रखे जात आएं?’’ भैयाजी ने कही।
‘‘जे तो ई लाने के लुगाइयन खों चुनाव चिन्ह अपनो सो लगे।’’ मैंने उने समझाओ।
‘‘काए, तुमाई भौजी खों तो अपनो बेलन से हमाई फटफटिया ज्यादा पोसात आए। हर दूसरे, तीसरे दिना हमें ताना मारत आएं के जो तुम हमें जे फटफटिया पे कहूं घुमा नईं सकत तो काए के लाने अस्सी-नब्बे हजार फूंके। अब की देखियो, झांसीवारी को मोड़ा दिल्ली से छुट्टियन में घरे आहे सो ऊसे कहबी के हमें सिखा देओ जे फटफटिया चलाबो। एक दार सींख जाएं फेर तुम घरे बैठ के चैका-बासन करियो औ हम खूबई घूमाई करहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हैं? भौजी ऐसी कैत आएं?’’ मोए जे सुन के बड़ो मजो आओ।
‘‘औ का! एक दिना तो खुदई स्टार्ट करबे की कोसिस कर रई हतीं, मनो बनी नईं उनसे। नईं तो आज हम इते ठाड़े ने दिखाते। हम घरे को काम सम्हार रए होते औ बे कहूं फर्राटे भर रई होतीं।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘सो का गलत है ईमें? आजकाल तो मुतकी लुगाइयों फटफटिया चलाउत आएं।’’ मैंने कहीं।
‘‘जे ई सो हम कै रै बिन्ना के जब आजकाल लुगाइयन खों फटफटिया, मोटर कार, टैक्टर, मोबाईल वगैरा सबईं से मोहब्बत कहानी सो उने जे ऐसे चुनावचिन्ह काए नईं दए जा रए? एक तरफी कैत आएं के लुगाइयन खों आए बढ़ाने हैं, औ उतई दूसरी तरफी लुगाइन खों चुनाव चिन्ह के नांव पे बी बेई पटा-बेलन थमा दए जात हैं।’’ भैयाजी तनक लुगाइनवादी होत भए बोले। जे देख के मोए अच्छो लगो। पर उने चवन्नी को दूसरो पहलू दिखाबो औ याद कराबो सोई जरूरी सो लगो।
‘‘बात तो आप ठीक कै रए भैयाजी, मनो जे बताओ के चुनाव जीतबे के बाद कितनी लुगाइयां पंचायत, नगरपालिका या नगर निगम में दिखाहें? मने मतलब जे के उनमें से आधी से ज्यादा तो घरई में चूला फूंकत रैंहें। सो, उनके लाने पटा-बेलन के चुनाव चिन्ह में का खराबी आए?’’ मैंने याद दिलाई।
‘‘हऔ! मनोे जे ढंग से सोचो जाए सो फटफटिया, टैक्टर वगैरा औरई फिट बैठत आएं। काए से के उन ओरन के पतियन खों राज करने रैत आए औ उने सो कार, मोटर, ट्रैक्टर, फटफटिया चलाने रैत है।’’ भैयाजी बोले।
‘‘नईं भैयाजी! जे तो गलत सोच कहानी आपकी।’’ मैंने विरोध करो।
‘‘का गलत कही?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘जेई के आप पैले जे बताओ के आप जो जे चुनाव चिन्ह में लुगवा-लुगाई के भेद की बात कर रए हो सो, जे आप लुगाइन के पक्ष में बोल रए के लुगवा हरों के पक्ष में?’’ मैंने सोई पूछी।
‘‘अरे, लुगाइन के पक्ष में ई बोल रए हम। तनक सोचो के चुनाव चिन्ह तक में लुगवा-लुगाई के अन्तर वारी सोच रखी जात आए। लुगाई के लाने पटा-बेलन औ लुगवा ठाड़ो होय सो फटफटिया चुनाव चिन्ह, भला जे का बात भई? काए पटा बेलन अकेले लुगाइन के काम को रैत आए? बे जो बाहरे रैत आएं लुगवा हरें सो का बे ओरें फटफटिया से रोटी बनाऊत आएं? औ जे फटफटिया पे के अकेले लुगवा सवारी करत आएं? जे मान लई के फटफटिया लुगवा चलात आएं मनो रैत को पूरे घरे के लाने आए। ऊपे बुड्ढा चढ़त हैं, बच्चा चढ़त हैं, लुगाइयां सो पूरी सज-धज के सवारी करत हैं। बोलो, का हम गलत बोल रए?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘नईं भैया, आप कै तो सांची रए हो। मनो जे तो जन्मई से भेद-भाव करो जात आए के मोड़ा भओ तो ऊको बुस्सर्ट पैनाई जात आए औ जो मोड़ी होए तो ऊके लाने फ्राक रैत आए। औ अब बिदेसियन खों देख-देख के बिटिया के लाने गुलाबी रंग औ बेटा के लाने नीलो रंग रखो जात आए। जेई से चुनाव चिन्ह चुनबे के टेम पे लगत हुइए के लुगाइन के लाने घर-गिरसती को आईटम रखो जाए औ लुगवा हरों के लाने बाहर वारो आईटम। जे तो सोच-सोच की बात ठैरी।’’ मैंने कही।
‘‘जे ई सोच सो हमें नईं पोसा रई। अरे जब लुगाइयन खों आगे बढ़ाने है सो उने घर-गिरसती से बाहर की दुनिया देखन देओ।’’ भैयाजी बड़ी शान से बोले।
‘‘हऔ, बात तो आप ठीक कै रै! सो मैं ऐसो करई के मोए गाड़ी सिखाबे वारो को मोबाईल नंबर पतो आए, सो ऊको अभई फोन कर के पक्को कर ले रई के कल से बो आ जाओ करे।’’ मैंने कही।
‘‘काए के लाने? तुम पे तो बनत आए गाड़ी चलात।’’
‘‘अपने लाने नईं, भौजी के लाने। तनक सोचो के कबे झांसीवारी खों मोड़ा दिल्ली से आहे औ कबे हमाई भौजी फटफटिया चलाना सीख पाहें? सो बो डिराइविंग स्कूल वारे खों बुला लेओ चाइए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘जे का कर रईं?’’ भैयाजी हड़बड़ात भए बोले। 
‘‘फोन कर रई गाड़ी सिखाबे वारे खों।’’ मैंने कही।
‘‘ने करो! तुमाई भौजी का करहें फटफटिया सीख कें? औ बा ऊपे चढ़हें कैसे? अबईं तो एक तरफी टांगें करके ऊपे बैठत आएं।’’ भैयाजी ने बहाना दओ।
‘‘काए? जब बे फटफटिया चलाहें सो पैंट, जींस पहन हें। अब ई जमाने में झांसी की रानी घांई कछौटा मारे के साड़ी पहन के सो ने चड़हें फटफटिया पे।’’ मैंने गंभीर होने की एक्टिंग करी। मनो अन्दर से मोरी हंसी फूट पड़रई हती। भैयाजी को मों देखन जोग हतो।
‘‘अरे, जे सब छोड़ो! बे कोन चुनाव में ठाड़ी हुई हैं के उनको बाहर निकरने परहे।’’ भैयाजी खिझात भए बोले।
‘‘मनो भैयाजी, आप चुनाव चिन्ह पे बहस कर सकत आओ पर भौजी खों फटफटिया चलान नईं दे सकत हो, जे तो दोहरी बात कहानी।’’ मैंने भैयाजी की खिंचाई करी।
‘‘अच्छा कर लेओ फोन, बुला लेओ सिखाबे वारे खों। तुमाए लाने सो अच्छो रैहे, ननद भौजाई दोई फटफटिया में घुमाई करहो। बाकी जे भेद-भाव वारी बात मोए नईं पोसा रई आए के लुगाई होय सो चुनाव में बी हाथ में बेलन ले के ई फिरत रए।’’ भैयाजी बोले।      
‘‘खैर, आप भौजी से फेर के एक बार पूछ लेओ तब गाड़ी सिखाबे वारे खों फोन करबी। अबई नईं कर रई, घबड़ाओ नईं।’’ मैंने हंस के कही।
भैयाजी सोई मुस्कात भए बढ़ लिए। मोसे कह-बोल के उनको जी हल्को हो गओ। मनो बात बे ठक्का-ठाई कर गए। अब तो मोए चुनाव चिन्ह में सोई ‘‘जेंडर डिस्कोर्स’’ नज़र आउने है, जे बात तय कहानी।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए अलाने की घरवारी जीते के, फलाने की घरवारी, मोए का? रैने सो ‘‘पति राज’’ आए ( कछु अपवाद छोड़ दओ जाए)। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!    
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(23.06.2022)
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Thursday, June 9, 2022

बतकाव बिन्ना की | उनकी सो निकर परी | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

 "उनकी सो निकर परी" ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीणप्रभात 🙏
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बतकाव बिन्ना की
उनकी सो निकर परी
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
           ‘‘काए भैैयाजी का हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी, काए से के बे भैराने से आ के मोरे आंगूं ठाड़े हो गए।
भैयाजी कछु ने बोले। अपने गमछा से अपने मों को पसीना पोंछन लगे। 
‘‘चलो आप पैले बैठ लेओ, ठंडो पानी पी लेओ। फेर बताओ के का भओ।’’
मैंने भैयाजी खों को मटको को ठंडो पानी दओ। बिजना सोई झलन लगी। काए से के ई दिना लाईट आवारा सी हो गई कहानी। जब मन परे आ जात आए, जब मन परे चली जात आए। ई टेम पे बी लाईट कहूं नैनमटक्का करबे गई हुइए। मैं सोई अपने लाने कुल्ल देर से बिजना डुला रई हती।
‘‘रैन दे बिन्ना, हाथ पिरान लगहें।’’ भैयाजी मोए रोकत भए बोले।
‘‘ने पिरेहें। बिजना सो डुलाने ई परहें। एक मिनट खों हवा ने लगें सो जी अकुलान लगत आएं। प्राण से कढ़त आएं। को जाने जे बारिस कबे हुइए?’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, अब की बेरा सो गजबई हो गई आए। हमें सो लगत आए के अब चुनाव बाद ई पानी गिरहे।’’
‘‘पानी को चुनाव से का लेबो-देबो? मौसम बदलबे की, पर्यावरण की बात कैते सो समझ में आती, जे चुनाव वारी बात हमाई समझ में ने आई।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अरे बिन्ना, सूदी सी बात आए के जबे चुनाव आत आएं सो सबई कछु चुनाव के हिसाब से होन लगत आए। ने मानो सो अभईं कोनऊ सरकारी दफ़्तर में जा के देख लेओ। इना-गिना जने अपनी सीट पे मिलहें। ओ तनक उनसे पूछो के जे आपके बाजू वारे भैया कहां निकर गए? सो जेई जवाब मिलत आए के कहूं निकरे नईयां, चुनाव की टरेनिंग में गए हैं। सो, बारिस सोई टरेनिंग के डर से ने आ रई हुइए।’’ कैत भए भैयाजी हंसन लगे।
‘‘खूबई कही भैयाजी आपने! मनो, जे बाजू में कागज़ को बंडल सो का दबा रखो आए? कोनऊ कचेरी-अदालत के कागज आएं का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। 
‘‘जे! अरे हऔ बिन्ना, जेई कागज सो दिखाने आए तुमें!’’ भैयाजी अपने दोई हाथ से कागज सीधे करत भए बोले।
‘‘जो का आए? जे कचेरी के कागज सो नई दिखा रए। सरकारी बी नोईं! काए के कागज आएं?’’ मैंने पूछी।
‘‘तनक गम्म खाओ बिन्ना! तुमाए लाने सो लाए हैं, दिखाए बिना ने लौटहें।’’ भैयाजी गोलमोल सो बोल गए।
‘‘बाद में सीधो कर लइयो, पैले बताओ तो के ईमें है का? काए के कागज आएं जे?’’ मोए सो रहाई नई पर रई हती।
‘‘जे! जे देखो!’’ कैत भए भैयाजी ने कागज मोरे हाथ पे धर दए।
‘‘जे तो कछु कविता सी दिखा रई।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, कवितई आए!’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन की आए?’’ मैंने फेर पूछी।
‘‘कोन की का मतलब? हमाई आए!’’ भैयाजी शान से बोले।
‘‘आपकी? आप कब से कविता लिखन लगे?’’ मोए बड़ो अचरज भओ। काए से भैयाजी सो कविता लिखन वारन की खिल्ली उड़ात रैत आएं, औ अब खुदई कविता लिख लाए? भौतई गजब???
‘‘जे ऐसे आंखें फाड़ के काए देख रईं, का हम पे कविता लिखत नईं बनत?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बनत हुइए, मनो मैंने सो कभऊं आपकी कविता ने पढ़ी, ने सुनी। सो अचरज हुइए ई।’’ मैंने सोई कही।
‘‘हऔ, जे बात सांची आए के स्कूल-कालेज के दिना में लव-लेटर के लाने दो-चार कविताएं लिखीं रईं, मनो उनसे कछु काम नई बनो सो सब छोड़-छाड़ दओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नई बनो काम? का आपने भौजी से लवमैरीज नईं करी हती? बाकी अब समझ में आई के आपने कविताएं लिख-लिख के भौजी खों मनाओ हुइए।’’ मैंने चुटकी सी लई।
‘‘अरे कहां बिन्ना, उने कविता-वमिता से कछु नई फरक परत रओ। बो तो एक दफा तुमाई भौजी किरोसिन लेबे के लाने राशन की लंबी लाईन में ठाड़ी हतीं। ठाड़े-ठाड़े उनके पांव दुखन लगे हते। इत्ते में हम उते पौंचे। हमसे उनको कष्ट ने देखो गओ। सो हमने उने लाई से बाहरे करो औ हम उनकी जांगा पे ठाड़े हो गए। हमें पूरे तीन घंटा उते ठाड़े रहने परो, मनो तुमाई भौजी हमाई ई तपस्या से प्रसन्न हो गईं। ऊके बाद किरोसिन की लाईन में तब तक हमई ने उनके बदले टांगें दुखाईं जब तक लों बे हमाए संगे शादी के लाने मान नई गईं। फेर कछु दिना बाद गैस को चूला आ गओ सो किरोसिन को काम ई खतम हो गओ।’’ भैयाजी कविता भूल के अपनी कहानी सुनान लगे।
‘‘फेर का भओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर जे भओ के तुम हमें बतकाव में ने उरझाओ, हमाई जे कविताएं पढ़ो औ बताओ के ईमें कोन सी काम की आएं और कोन सी फालतू आएं।’’ भैयाजी की गाड़ी फेर पटरी पे आ गई।
मैंने पैली कविता पढ़के ई चैंक परी। आप ओरें सोई पढ़ लेओ-
बेलन/ झाड़ू/मटका पे तुम बटन दबाओ।
पुरा, मोहल्ला, घर-घर में खुसियाली लाओ।

‘‘जे का है भैयाजी? जे कविता नईं, जे तो नारा आए, वो बी चुनावी नारा।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, सो नारा कै लेओ। जो चाओ सो कहो, पर जे बताओ के जो है कैसो?’’ भैयाजी अकुलाने से पूछन लगे। 
‘‘मनो नारा कहो सो ठीक आए, पर ईमें सो आपने तीन-तीन उम्मीदवारान के लाने एक संगे वोटे मांग लईं। बेलन/ झाड़ू/मटका... कोनऊ एक पे रहो आप।’’ मैंने कही।
‘‘नईं, हम सो एक पे ई रैबी। जे सो नमूना आए। जोन दम्मीवार हमसे जे कविता लैहे, ऊको चुनाव चिन्ह ईमें रख दओ जेहे, बाकी के हटा लए जेंहें। है न सही?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, एकदम सही। मनो जे तो बताओ आप खों जे नारे लिखबे को आपको विचार आओ हां से?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब तुमने का छिपाने बिन्ना! ऊ दिना गोबिंद से हमाई गिचड़ हो रई हती के कोन की लुगाई चुनाव में ठाड़ी हुइए। तुमने देखी हती। मनो हम दोनों की लुगाइयन ने साफ कै दओ के चुनाव में खड़े होबे की कही सो घरे खाना-पानी बंद समझियो। सो, बात उतई बढ़ा के रै गई। मनो हमने देखी के गोबिंद जे ई टाईप की कविता लिख रओ आए। पूछबे पे ऊके मों से निकर आओ के जे चुनाव के लाने आए। ऐसो लिखबे के उम्मींवार हरें पइसा देते आएं। सो हमें सोई बात जम गई। चुनाव को सीजन आए, कछु कमाई कर लई जाए। चुनाव के बाद सो जीतन वारे कमाई करहें, तब अपन ओरन खों कौन पूछ रओ। हम तो कै रै के तुम सोई ई टाईप की कविताएं लिख डारो। तुमाई बी कछु कमाई हो जेहे।’’ भैया जी बोले।
‘‘रैन दो भैयाजी! आपई कमाओ! आप खुस, सो मैं खुस।’’ मैंने कही। 
‘‘बात जे है बिन्ना के जोन खों उम्मीदवार बनने खों मिल रओ, उनकी सो निकर परी, अब हमाई सोई तनक निकर परे। जे बाकी कविताएं सोई देख के बताइयो के ठीक आएं के नईं। हम संझा खों आ के ले जाहें।’’ कहत भए भैयाजी अपने चुनावी नारे मोरे हाथ पे टिका के बढ़ लिए। खैर, पढ़ लेबी। चुनाव को सीजन आए सो जे सोई करने पड़हे। 
मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए कोनऊ नारे लिखे, चाए वारे लिखे, मोए का? जीतबे वारे जीत बे के बाद कौन शकल दिखा हें। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(09.06.2022)
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Thursday, June 2, 2022

बतकाव बिन्ना की | हमाई लुगाई काय नईं? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

मित्रो, "हमाई लुगाई काय नईं?" ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीणप्रभात 🙏
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बतकाव बिन्ना की
हमाई लुगाई काय नईं?
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            मोए भीड़-भाड़ में जाबो तनकऊ नईं पोसात। मनो मैंने देखी के प्याज बढ़ा गई आएं सो, सोची के बजरिया से प्याज ले आओ जाए। मैंने थैला उठाओ। तनक सो बटुआ धरो। काय से के बजरिया में बड़ो पर्स को का काम? उते कोन कोई खों फुरसत धरी के मोरो पर्स देखहे। सो मैंने थैला लओ, बटुआ धरो औ किवरिया पे तालो डारो। निकल परी बजरिया खों। बजरिया पोंचबे के पैलऊं मोए भैयाजी दिखाने। कोनऊ संगे गिचड़ कर रए हते। मैंने सोची के बे तो लगे हैं गिचड़ करबे में सो मोपे उनकी नज़र ने परहे। मगर भैयाजी तो ठैरे, भैयाजी। 
‘‘काए बिन्ना बजरिया जा रईं?’’ उन्ने पूछई लओ।
‘‘हौ!’’ मैंने कही।
‘‘हौ सो, हो आओ, मनो आजकाल तुम बजरिया जात नईयां सो पूछी।’’ भैयाजी साफाई देत भए बोले।
‘‘हौ, भैयाजी! ठीक कही आपने। मोए भीड़ में अच्छो नईं लगत जेई से नई जात हों, बाकी प्याज बढ़ा गई रही सो जान पड़ रओ आए।’’ मैंने सोई खुलासा बता दओ।
‘‘बाकी आप जे गोबिंद भैया से काए की गिचड़ कर रए?’’ निकट पोंच के मैंने पहचान लओ हतो के भैयाजी जोन संगे बहस करबे टिके हैं बे गोबिंद भैया आएं।
‘‘गिचड़ नोई बिन्ना, जे तो सूदी सी बात आए।’’ भैया जी बोलबे खों भए के गोबिंद भैया ने उनकी बात काट दई।
‘‘काए की सूदी बात? तुम तो दोंदरा दए फिर रए। ऐसो कहूं होत आए?’’ गोबिंद भैया बमकत भए बोले।
‘‘ई में दोंदरा की का बात? तुमाई लुगाई ठाड़ी हो सकत सो हमाई लुगाई काय नईं?’’ भैयाजी सोई तैस खात भए बोले।
‘‘नईं हो सकत।’’ गोबिंद भैया सो अड़ी दिखान लगे।
‘‘काए नईं हो सकत?’’
‘‘नई हो सकत? कह दई ना!’’
‘‘हऔ, तुमाए कहे से दुनिया चलत आए? हमाई लुगाई काए ठाड़ी नईं हो सकत जे तुम हमें बताओ!’’ भैयाजी फेर गिचड़ परे।
पुरखा हरें कै गए आएं के दोई के झगरा के बीच में नई परो चाइए। पर जब मत मारी जाए सो, का करो जा सकत आए। ई बेरा मोरी मत मारी गई हती।
‘‘का हो गओ भैया हरों! काय की बहस कर रए?’’ मोए जाने हतो प्याज लाबे खों औ मैं पर गई उन ओरन के दोंदरा में।
‘‘देखो शरद बिन्ना, तुमाए भैयाजी की मत मारी गई आए। जे कछु समझबे-बूझबे खों तैयारई नईयां।’’ गोबिंद भैया मोसे बोले।
‘‘हमें का समझने? समझने तुमें आए!’’ भैयाजी बोले।’’
‘‘हो का गओ? कोन बात पे गिचड़ रए?’’ मैंने पूछी।
‘‘जे इनईं से पूछ लेओ।’’ गोविंद भैया उंगरिया से भैयाजी की ओर इसारा करते भए बोले। 
‘‘हौ, सो आपई बोलो, कछु तो पता परे के ऐसो कौन सो कांड हो गओ के आप दोई टकरा रए।’’ ई बेरा मैंने भैयाजी से पूछी। 
‘‘बात कछृ नईं, औ सोचो तो सबई कछु आए!’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब बातई देओ! बुझउव्वल ने बुझाओ! मोए बजरिया सोई जाने आए।’’ मैंने भैया जी से कही।
‘‘अरे बिन्ना! अबई कछु दिनां में चुनाव होने वारे आएं!’’
‘‘हऔ, सो?’’
‘‘सो, जे के इते की सीट महिलाओं के लाने सुरक्षित कर दई गई आए।’’
‘‘सो?’’
‘‘सो, जे के हम जे गोबिंद से कै रए के ई बेरा हम अपनी लुगाई खों चुनाव में ठाड़ो करबी। पर जे गोबिंद कै रओ के ऐसो नईं हो सकत।’’
‘‘काए नई हो सकत?’’ मोरे मों से सोई जे कह आओ।
‘‘अरे, बिन्ना तुमाए भैयाजी की लुगाई खों कोनऊ अनुभव नई आए! बे चुनाव में का करहें? औ मनो चुनाव में जीत गईं सो का कर लेहें?’’ गोबिंद भैया बोले।
‘‘हऔ, जैसे तुमाई लुगाई खों सो खूबई अनुभव रओ? का हमें पतो नईं। तीन बार खड़ी भईं, दो बार हार गईं और एकई बार जीतीं। ऊमें बे कभऊं ने दफ़्तर गईं औ ने मीटिंग में गईं। तुमई जात्ते सरपंचपति कहाऊत भए।’’ भैयाजी गोबिंद भैया की पोल खोलत भए बोले।
‘‘हऔ, हम जात्तो हते! ई में छुपो का आए? सबई जानत आएं। अरे, हमाई लुगाई कोनऊं ऐसी-वेसी नोई के मीटिंग-सीटिंग में जाए। उते का भभ्ड़ मचत आए हमें पतो आए, तुमें नईं।’’ गोबिंद भैया बोले।
‘‘हअै, औ उते भभ्ड़ मचात कोन आए? तुमई ओरे। बड़े आए पंचपति, सरपंचपति, पार्षद पति, महापौर पति, विधायक पति....’’ भैयाजी को पारा चढ़ गओ।
‘‘अरे, तो उते बोलने परत आए। सवाल करने परत आए और लुगाई के बदले जबाव सोई देने परत आए।’’ गोबिंद भैया बोले।
‘‘सो आपई काए नईं ठाड़े हो जा हो चुनाव में?’’ मोसे ने रहो गओ। जे रबरस्टाम्प घाईं लुगाइयन खों देख के मोरो मूंड़ सोई भन्ना जात आए। कहबे के लाने स्त्री ससक्तीकरण औ स्त्रीबाईं बैठीं चूल्हा के ऐंगर भजिया तलत भईं। अरे, ऐसी लुगाई होए जो सब सम्हारे, अपनी अकल से सब करे, सो कहो के लुगाईयन खों ताकत मिल गई। जो सबई कछु लुगवा मने घरवारे सम्हारें सो काए की ससक्तीकरण?
‘‘हम तो हो जाएं चुनाव में ठाड़े, मनो सीट सो महिलाओं के लाने कर दई गई आए।’’ गोबिंद भैया बोले।
‘‘हऔ, पर की बेरा सो नईं हती महिलाओं के लाने तब काए नईं ठाड़े भए?’’ भैयाजी ने पिछलो चुनाव याद करा दओ।
‘‘हमें तुमसे कोनऊं बहस नई करने! बस, जे जान लेओ के जो हमाई लुगाई ठाड़ी हुइए, सो तुमाई लुगाई ठाड़ी नईं हो सकत।’’ गोबिंद भैया रिजल्ट सो सुनात भए बोले।
‘‘जे कोन सी बात भई? तुम सरपंचपति कहलाबो को सुख भोग सकत हो औ हम नईं? जे तो गल्त बात आए। हम ने मानहें। हमाई लुगाई सोई चुनाव में ठाड़ी हुईए औ हमें सोई सरपंचपति कहलाने है। तुम पे जो बने सो कर लेओ।’’ भैयाजी सोई धमकात भए बोले।   
‘‘लेओ तुम दोई इते लड़ रए औ उते देखो दोई भौजी हरें संगे बजार कर के कैसी हंसत-बोलत लौट रईं। उनई से पूछ लेओ के कौन ठाड़ी होन चात आए औ कौन नई?’’ मैंने भौजी हरों की ओर इसारा करके कही।
‘‘तुम ओरें इते का कर रए? हमने तुमसे कही रई के घरे रहियो औ तुम हो के पांव घरई नईं टिकत!’’ भैयाजी खो देखतईं भौजी ने चार सुनाई।
‘‘औ तुम! तुम सुन लेओ कान खोल के हमें ई बेरा चुनाव-उनाव नई लरने! अपने नावं पे तुमें उते जा के नैनमटक्का नईं करन देहें।’’ गोबिंद भैयाजी भौजी सोई डांटत भई बोलीं। 
दोई चोखरवा घांई सुट्ट पर गए। जे देख मोए कह आई के जे है असल स्त्रीसशक्तीकरण। 
सो, दोई भैया हरें भौजियन से सब्जियन वारो थैला ले उनके पांछू-पांछू चल परे। मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। बाकी सरपंच जाने, सरपंचपति जाने। मोए का करने। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(02.06.2022)
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