Showing posts with label डॉ. शरद सिंह. Show all posts
Showing posts with label डॉ. शरद सिंह. Show all posts

Thursday, April 23, 2026

मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में मेरी पुस्तक पर चल रहा शोध - डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

विश्व पुस्तक दिवस पर आज राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण में "पत्रिका" में .... मेरे ही शब्दों में मेरा सृजनकर्म... वैसे मुझे संकोच होता है यूं ख़ुद के बारे में बताने में... लेकिन अच्छा भी लगता है जब लोग मेरी मेहनत के बारे में जानें..😊
-------------------------
मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में मेरी पुस्तक पर चल रहा शोध

सच कहूं तो लिखना मेरा पैशन है और पुस्तक मेरा पहला प्रेम। हाल ही में मेरी 60 वीं पुस्तक प्रकाशित हुई है, लोकमाता अहिल्याबाई होलकर। यह अहिल्याबाई की जीवनी है। मेरी किताबों के पाठक अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और मिस्र जैसे देशों में भी हैं। कुछ किताबों के 6 से 8 संस्करण तक आ चुके हैं। मेरी पुस्तक बुंदेली लोककथाओं पर मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में शोधकार्य चल रहा है। स्त्री विमर्श पर देश की विभिन्न विश्वविद्यालय में शोध कार्य किया जा गया है। मेरे उपन्यासों एवं कहानियों का पंजाबी, उर्दू, मराठी एवं कन्नड़ में भी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। लगातार कई वर्ष मेरी पुस्तकों का मनोरम ईयरबुक में उल्लेख किया गया। स्त्री विमर्श, थर्ड जेंडर विमर्श, आदिवासी जीवन एवं संस्कृति, खजुराहो की मूर्तिकला, प्राचीन भारतीय इतिहास, बुंदेली संस्कृति, फोरेंसिक साईंस, पर्यावरण, कहानी, नाटक, नवगीत आदि की पुस्तकों सहित विभिन्न विषयों एवं विभिन्न विधाओं में 60 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
- डॉ. शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
--------------------------
हार्दिक धन्यवाद #पत्रिका 🙏
हार्दिक धन्यवाद रेशू 🙏
#डॉसुश्रीशरदसिंह  #DrMissSharadSingh  #विश्वपुस्तकदिवस  #WorldBookDay

Saturday, October 2, 2021

गांधी जयंती पर प्रगतिशील लेखक संघ की मकरोनिया इकाई द्वारा आयोजन में डॉ शरद सिंह

 02 अक्टूबर 21 को गांधी जयंती के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ सागर की मकरोनिया इकाई की दो सत्रों में गोष्ठी संपन्न हुई, जिसमें पहले सत्र में महात्मा गांधी के विचारों व्यक्तित्व एवं गांधी दर्शन पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई इसके उपरांत काव्य पाठ का सत्र रहा। आज की गोष्ठी की अध्यक्षता की पूर्वकुलपति रीवा विश्वविद्यालय, डॉ उदय जैन नेभ तथा संचालन किया इकाई के अध्यक्ष डॉ सतीश पांडेय ने। मैं यानी डॉ शरद सिंह सहित सहभागी रहे सर्वश्री डॉ टीकाराम त्रिपाठी रुद्र, मलैया जी, वृंदावन राय सरल, वीरेंद्र प्रधान, प्रभात कटारे, ज.ल.राठौर आदि साहित्यकार। 
तस्वीर उसी अवसर की...

Thursday, March 11, 2021

चर्चा प्लस | शिवरात्रि पर्व पर विशेष | खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप | डॉ. शरद सिंह

🚩शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩
चर्चा प्लस 
शिवरात्रि पर्व पर विशेष :
खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप
- डॉ. शरद सिंह 
         शिव समस्त संसार का कल्याण करने वाले देवता माने गए हैं। समुद्र-मंथन से निकला हुआ गरल यानी विष स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को भी भस्म कर सकता था यदि शिव उसे अपने गले में धारण नहीं करते। आदि ग्रंथों एवं पुराणों में शिव के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ का वह अंश दे रही हूं जिसमें खजुराहो की शिव प्रतिमाओं की पूर्ण विविधता का विवरण है।
‘शिवपुराण’ के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र-मंथन किया तो उसमें हलाहल विष निकला। यह इतना घातक था कि देवताओं को भी भस्म कर सकता था। देवता हलाहल विष की विषाक्तता से भयभीत हो उठे तक शिव ने आगे बढ़ कर उस विष का पान कर लिया। लेकिन वे भी उसे यदि अपने गले से नीचे पेट में उतरने देते तो वह विष शिव को भी क्षति पहुंचा सकता था अतः विष को शिव ने अपने गले में ही रोक लिया जिससे शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष को गले में धारण करने के बावजूद उसका प्रभाव इतना तेज था कि उनके शरीर में जलन होने लगी और उन्हें गरती का अनुभव होने लगा तब वे हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। बीच में विंध्य पर्वत के ऊपर से गुज़रते हुए उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ और वे कुछ समय के लिए वहीं रुक गए। वह विश्रामस्थल कालंजर था। उस समय कालंजर में निवास कर रही देवी उमा से शिव ने विवाह किया और दोनों साथ-साथ कुछ समय वहां रहे। इसके बाद देवी उमा कामाख्या चली गईं और शिव हिमालय के लिए निकल पड़े। इस पौराणिक कथानक के आधार पर कालंजर में उमा-महेश्वर की अनेक प्रतिमाओं से ले कर विवाहमंडप तक मिलता है। शिल्पकारों ने जिस सुंदरता से कालंजर में नीलंकठ एवं उमा-महेश्वर के विवाह की कथा को पत्थरों में तराशा है ठीक उसी प्रकार खजुराहो में शिव के विवध रूपों की अनेक प्रतिमाएं हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। सन् 2000 में डॉक्टरेट की उपाधि के लिए खजुराहो की मूर्तिकला पर शोध करते समय और उसके बाद ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ पुस्तक लिखते समय मुझे खजुराहो के मंदिरों में मौजूद शिव प्रतिमाओं की सम्पूर्ण विविधता को देखने और जानने का अवसर मिला। मेरी यह पुस्तक सन् 2006 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, उ.प्र. से प्रकाशित हुई। खजुराहो के मंदिर 950 से 1050 ई. के मध्य निर्मित हुए जिनमें मातंगेश्वर मंदिर प्राचीनतम हैं। विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण और कंदरिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी है। इस मंदिर के मंडप दीवार पर लगे शिलालेख से पता चलता है, कि धंग द्वारा 1002 ई. में शंभु मरकतेश्वर के मंदिरों का निर्माण कराया गया था जिसमें मरकत तथा पाषाण निर्मित दो लिंगों की स्थापना का उल्लेख है। वर्तमान में पाषाण लिंग ही शेष है। इसी मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर स्थित है। यह विश्वनाथ मंदिर का समकालीन है।

त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव कारूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा। सांख्यायन तथा कौशितकि उपनिषदों में शिव, रूद्र, महादेव, महेश्वर, ईशान आदि नाम आते हैं। महाभारत में शिव के सहस्त्र नामों का उल्लेख हुआ है। उनके लिये शंकर, ईशान, शर्व, नीलकंठ, त्रयम्बक, धूर्जटि, नंदीश्वर, शिखिन, व्योमकेश, महादेव आदि नाम आये हैं। इन सभी रूपों में आयुध प्रतीकों की भिन्नता पायी जाती है, कभी शिव के हाथ में डमरू, खड्ग, खेटक, पारा तथा त्रिशूल रहता है तो कभी खप्पर, रूद्राक्षमाला, तलवार, धनुष, खट्वांग तथा ढाल आदि आयुध प्रतीक रहते हैं। खजुराहो में निर्मित शिव मूर्तियों में चतुर्भुजी, अष्टभुजी, बारहभुजी, सोलहभुजी रूप मिलते है। जिनमें विविध आयुध प्रदर्शित है।
चतुर्भुजी नटराज - दूला देव मंदिर में चतुर्भुज नटराज की मूर्ति है जिसमें उनकी प्रथम तीन भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, डमरू, खप्पर (कपाल) है जबकि चौथी भुजा भग्नावस्था में है। कुछ प्रतिमाओं में एक भुजा में अग्नि लिये हुये भी प्रदर्शित किया जाता है।
अष्टभुजी नटराज - खजुराहो संग्रहालय में स्थित अष्टभुजी प्रतिमा में उनकी आठों-भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, खड्ग, डमरू, खेटक, खट्वांग तथा खप्पर हैं। एक अन्य प्रतिमा में त्रिशूल, पाश, डमरू, अभय, कपाल अग्नि तथा घंटा प्रदर्शित है।
बारह भुजी नटराज - दूलादेव मंदिर में बारहभुजी नटराज की एक सुन्दर प्रतिमा है जिसमें बायां पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। भुजाओं में त्रिशूल, पाश, डमरू, खेटक, खट्वांग, खड्ग, खप्पर, दृष्टिगत् है।
कल्याण सुन्दर शिव - शिव का कल्याण सुन्दर रूप शिव पार्वती के विवाह के अवसर का है। खजुराहो संग्रहालय, वामन मंदिर तथा भरत चित्रगुप्त मंदिर में स्थित कल्याण सुन्दर शिव को त्रिशूल के आयुध प्रतीक से युक्त दिखाया गया है।
नीलकंठ - खजुराहो के विभिन्न मंदिरों में नीलकंठ शिव की मूर्तियां हैं। कंदरिया मंदिर में नीलकंठ की भुजाओं में पदम, त्रिशूल, खट्वांग, तथा विषपात्र है। भरत चित्रगुप्त मंदिर में नीलकंठ को विषपात्र, त्रिशूल खट्वांग कमंडलु, डमरू तथा कमल सहित दिखाया गया है। एक अन्य प्रतिमा में नीलकंठ को खप्पर, डमरू, कमल तथा खट्वांग धारी दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया मंदिर में उन्हें विषपात्र, डमरू, खट्वांग तथा कमंडलु युक्त प्रदर्शित किया है। पार्श्वनाथ मंदिर में आलिंगनबद्ध नीलकंठ की भुजाओं में खट्वांग एवं कमल नाल दिखाया गया है।

अघोर शिव - जगदंबा मंदिर में अघोर शिव की प्रतिमा है। जिसमें उन्हें शूल, डमरू, पाश, दंड, धारण किये हुये बताया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर में खट्वांग, पुस्तक तथा नीलकंठ पक्षी धारी अघोर शिव है। पार्श्वनाथ मंदिर में शिव के हाथ में घंटिका है। कंदरिया महादेव मंदिर में अष्टभुजी अघोर प्रतिमा है। जिसमें खप्पर, त्रिशूल, शक्ति डमरू, घंटिका, सर्प, खट्वांग तथा कमंडलु दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में अघोर शिव त्रिशूल डमरू घंटिका गदा और कमंडलुधारी हैं। दूलादेव मंदिर में शिव अघोर की वरद् मुद्रा, सर्प, त्रिशूल, डमरू, खट्वांग और कमंडलु धारी हैं।
गज संहार शिव - खजुराहो में गज संहार शिव की विभिन्न प्रतिमायें हैं। कंदरिया महादेव मंदिर में सोलह भुजी गज संहार शिव है। जबकि कुछ अन्य प्रतिमायें बारहमुखी हैं। शिव के इस रूप में उन्हें त्रिशूल वज्र डमरू तथा हाथी का चमड़ा लिये हुये प्रदर्शित किया गया है।

भैरव - खजुराहो में दो प्रकार की भैरव प्रतिमायें है। प्रथम श्वान वाहन सहित तथा दूसरी नग्न प्रतिमा है। एक अन्य प्रकार भी भैरव प्रतिमा का है जिसमें उन्हें भैरवी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। इस प्रतिमा में भैरव चक्र (छल्ला), कमल तथा घंटिका धारी हैं। कंदरिया महादेव, वामन तथा चतुर्भुज मंदिर में नग्न भैरव को पेय पात्र, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, सहित दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, भरत चित्रगुप्त मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर में भैरव पेय, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, तथा खड्ग लिये हुये हैं। विश्वनाथ मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उन्हें कमल, सर्प, खट्वांग तथा नरमुण्ड लिये हुये दिखाया गया है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में खड्ग, घंटिका तथा सर्प सहित वामन मंदिर में खड्ग, करबाल तथा खट्वांग सहित हैं। कंदरिया मंदिर की प्रदक्षिणा में खड्ग, जगदम्बा मंदिर में पाश तथा खड्ग तथा विश्वनाथ मंदिर में खेटक, खड्ग तथा सर्प सहित भैरव हैं। श्वान वाहन युक्त भैरव प्रतिमा में गदा, डमरू, घंटिका, खप्पर, कमल तथा सर्प आयुध प्रतीक हैं। आदिनाथ मंदिर में गदा, सर्प के साथ फल प्रदर्शित हैं जबकि विश्वनाथ मंदिर की प्रदक्षिणा में गदा, खड्ग सर्प तथा नरमुण्ड और दूलादेव मंदिर में स्थित प्रतिमा में खड्ग, ढाल तथा नरमुण्ड है। जगदम्बा मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उनके एक हाथ में पक्षी तथा शेष दो हाथों में घंटिका तथा खट्वांग है।

त्रिपुरान्तक - खजुराहो में आलिंगन मुद्रा की त्रिपुरान्तक प्रतिमा है। जिसमें उन्हें, घट, धनुष, बाण तथा नरमुण्ड धारण किये हुये बताया गया है।
यदि मुद्राओं के आधार पर देखा जाए तो खजुराहो में मौजूद शिव की चतुर्भज प्रतिमाओं को ही तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है - प्रथम श्रेणी में शिव की वे चतुर्भुजी प्रतिमायें है जिनमें शिव वरद मुद्रा में त्रिशूल, घट तथा सर्प धारण किये है। द्वितीय श्रेणी में वे शैव मूर्तियां हैं जिसमें पहली भुजा वरद अथवा अभय मुद्रा में है। तथा दूसरी भुजा में त्रिशूल है। अन्य भुजाओं में पाश, कमल अथवा पुस्तक है। तृतीय श्रेणी में शिव की वे प्रतिमायें है जिनमें शिव के दूसरी अथवा तीसरी भुजा में सर्प प्रदर्शित है जबकि पहली भुजा वरद, अभय अथवा आलिंगन मुद्रा में है। वरद मुद्रा में दूसरे हाथ में पुस्तक अथवा कमल तीसरे में सर्प और चौथे में घट प्रदर्शित है। अभय मुद्रा में दूसरे हाथ में पाश तीसरे में सर्प तथा चौथा कटि पर है।

भारतीय शिल्पकला यूं भी अत्यंत समृद्ध है और जब उसमें कथानक का समावेश हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे प्रतिमाएं जीवंत हो कर उन कथाओं को स्टेज पर मंचित कर रही हों। यूं भी भारत में प्रतिमा निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। खजुराहो का मूर्तिशिल्प शिव प्रतिमाओं के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकता था। शिव जो संहारक हैं तो कल्याणकर्त्ता भी हैं। भोले हैं लेकिन दुखहर्त्ता हैं। संभवतः खजुराहो का शैव-शिल्प भी यही कहना चाहता है कि -‘शिव सबका कल्याण करें!’
------------------------
(दैनिक सागर दिनकर 11.03.2021 को प्रकाशित)
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #miss_sharad #दैनिक #सागर_दिनकर #चर्चाप्लस #शिवरात्रि #खजुराहो #शिव

Sunday, December 13, 2020

डॉ. शरद सिंह 'जागरण सखी' दिसंबर 2020 में

प्रिय मित्रो,  ‘‘जागरण सखी’’ दिसम्बर 2020 की कव्हर स्टोरी में पढ़िए मेरे यानी आपकी इस मित्र डॉ. शरद सिंह के विचार।   मैं अत्यंत आभारी हूं ‘जागरण सखी’ और विनीता जी की। 
 इस कव्हर स्टोरी में मेरे साथ शामिल हैं देश के अन्य सेलिब्रिटीज़ - बॉबी देओल (अभिनेता), पुलकित सम्राट  (अभिनेता), सौरभ शुक्ला (अभिनेता), सतीश कौशिक (अभिनेता), अभिमन्यु दसानी (अभिनेता), अपरा मेहता (अभिनेत्री), डॉ. वारिजा (गायनेकोलॉजिस्ट), गीता चंद्रन (भरतनाट्यम नृत्यांगना)।

Dear Friends, Please read my views in "Jagran Sakhi" Dec.2020 .Hearty Gratitude to 'Jagran Sakhi' and Vinita ji.
In this Cover Story with me (Dr Sharad Singh) - Bobby Deol (Actor), Pulkit Samrat (Actor), Saurabh Shukla (Actor),  Satish Kaushik (Actor), Abhimanyu Dasani (Actor), Apara Mehta (Actress), Dr. Varija (Gynecologist) and Geeta Chandran ( Bharatnatyam Dancer).


#jagransakhi #जागरणसखी #डॉशरदसिंह #drsharadsingh #SpecialFeature #DecemberIssue2020 #Celebrities


Friday, October 2, 2020

सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार | डॉ. शरद सिंह | 2 अक्टूबर | जन्मतिथि पर विशेष

2 अक्टूबर - जन्मतिथि पर विशेष :
  सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार
                - डॉ. शरद सिंह
       अपने जीवन को कष्टों के सांचे में ढालकर दूसरों के लिए सुखों की खोज करने वाले महात्मा गांधी बीसवीं सदी के महानायकों में से एक थे। उनके विचारों, उनके कार्यों एवं उनके जीवन-दर्शन ने समूची मानवता को नये आदर्श प्रदान किए। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है।’’ स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
    वैश्विक स्तर पर महात्मा गांधी के विचारों को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि 15 जून, 2007 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित करने के लिए मतदान हुआ, तदुपरान्त संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 अक्टूबर के दिन को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया। महात्मा गांधी के विचारों को ‘गांधीवाद’ के नाम से पुकारा जाता है। गांधीवाद को अपनाने के लिए उनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विचारों को अपनाना आवश्यक है।
     महात्मा गांधी राजनीति का परिष्कृत रूप स्थापित करना चाहते थे। उनका मानना था कि राजनीति के परिष्कार के लिए राजनीति में सत्य, अहिंसा, नैतिकता, परोपकार, सादगी एवं सदाचार का अधिक से अधिक प्रतिशत होना चाहिए तभी राजनीति दूषित होने से बची रहती है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में राजनीति में जो हिंसा, बाहुबल, बेईमानी, भाई-भतीजावाद एवं आर्थिक घोटालों का बोलबाला दिखाई देता है, उसमें महात्मा गांधी के ‘राजनीति के परिष्कार’ का मूलमंत्र प्रासंगिक एवं व्यावहारिक ठहरता है। यदि राजनेताओं में संयम रहे अथवा संयमित व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करें तो राजनीति का परिष्कार सम्भव है। एक स्वस्थ राजनीतिक परिवेश देश के प्रत्येक तबके को उसके अधिकारों से जोड़ सकता है और राजनीतिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों के मन में विश्वास पैदा कर सकता है।
         महिलाओं को सशक्त बनाने का स्वप्न ही महात्मा गांधी के स्त्री-आंदोलन की बुनियाद था। महात्मा गांधी मानते थे कि स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष सशक्त होना चाहिए। वे राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के पक्षधर थे। वस्तुतः महात्मा गांधी का अहिंसावादी आंदोलन स्त्रियों की उपस्थिति के कारण अधिक सार्थक परिणाम दे सका। इस तथ्य को महात्मा गांधी ने स्वीकार करते हुए एक बार कहा था कि स्त्रियां प्रकृति से ही अहिंसावादी होती हैं। स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं, अतः स्त्रियों की उपस्थिति से अहिंसावादी आंदोलन एवं सत्याग्रह अधिक कारगर हो सकते हैं।
     महात्मा गांधी स्त्रियों को अबला कहने के विरोधी थे। वे मानते थे कि स्त्री पुरुषों की भांति सबल और शक्ति सम्पन्न है। जिस प्रकार एक सशस्त्र पुरुष के सामने निःशस्त्र पुरुष कमजोर प्रतीत होता है, ठीक उसी तरह सर्वअधिकार प्राप्त पुरुषों के सामने स्त्री अबला प्रतीत होती है जो कि वस्तुतः अबला नहीं है। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।’’
          गांधी जी मानते थे कि स्त्रियों की उपस्थिति पुरुषों को भी आचरण की सीमाओं में बांधे रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में स्त्रियों को शामिल होने दिया। उन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत स्त्रियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। वे स्त्रियों को एक स्त्री के रूप में न देखकर एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखते थे। वे पारिवारिक सम्पत्ति पर पुरुषों के बराबर स्त्रियों को स्वामित्व दिए जाने के भी पक्षधर थे।
          महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘कोई भी राष्ट्र अपनी आधी आबादी (अर्थात् स्त्रियों) की अनदेखी करके विकास नहीं कर सकता है।’’ वे कहते थे कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कमजोर नहीं समझना चाहिए। वे स्त्रियों के आर्थिक स्वावलम्बन एवं शिक्षा के पक्षधर थे। शुचिता एवं सतीत्व के नाम पर स्त्रियों को बन्धन में रखना वे पसन्द नहीं करते थे। महात्मा गांधी का यह विचार हर युग में खरा उतरता है।
      महात्मा गांधी ने स्वच्छता पर विशेष बल दिया। जब वे दक्षिण अफ्रीका में थे तो वहां उन्हें अनुभव हुआ कि वहां बसे भारतीय स्वच्छता पर ध्यान नहीं देते हैं जिसके कारण अंग्रेज उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं। इस पर महात्मा गांधी ने वहां स्वच्छता आंदोलन चलाया। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अफ्रीका में बसे भारतीय समाज में घर-बार साफ रखने के महत्त्व को स्वीकार कर लिया गया।
      महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी का सामना असीम गन्दगी से हुआ। कई बार उन्होंने स्वयं झाड़ू लेकर दूसरों का भी पाखाना साफ किया। अपनी भारत-यात्रा के दौरान भी रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बे में व्याप्त गन्दगी का साम्राज्य तथा काशी की गलियों में फैली हुई गन्दगी ने उनके मन को आहत किया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
  यदि महात्मा गांधी के विचारों को अपनाकर स्वच्छता को जीवन का अंग बना लिया जाए तो नागरिकों को स्वस्थ तन-मन की सम्पदा मिल सकती है। वस्तुतः महात्मा गांधी का प्रत्येक विचार हर युग में हर परिस्थिति में प्रासंगिक है और रहेगा। यदि उनके मर्म को भली-भांति समझकर उसे आत्मसात किया जाए।
-----------------------------------
(दैनिक ‘सागर दिनकर’)
#शरदसिंह #सागरदिनकर #दैनिक #मेराकॉलम     #Charcha_Plus #Sagar_Dinkar #Daily
#SharadSingh #महात्मा_गांधी #गांधी_जयंती

Thursday, September 10, 2020

कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार? - डॉ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित



दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार?" 🚩


❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
....................................................

 

कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार? 
   - डॉ. शरद सिंह

    कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार - सरकार, अनलाॅक या हम खुद? जो आंकड़े पहले विस्फोट तक पहुंचे थे, वे अनलाॅक 4.0 में महाविस्फोट में जा पहुंचे हैं। लाॅकडाउन और कर्फ्यू लगा कर सरकार सख़्ती करती रहती तो हम इसे उसका तानाशाही रवैया कहते। सरकार ने अपने नागरिकों के विवेक पर भरोसा किया और क्रमशः अनलाॅक करते हुए आज उस चरण में पहुंचा दिया जहां से व्यापार, शिक्षा, यात्रा आदि एक बार फिर गतिमान हो सकते हैं। लेकिन बदले में हम सरकार को नहीं बल्कि खुद अपने आपको दे रहे हैं संक्रमण के विस्फोटक आंकड़े। यह लिखने का मकसद सरकार के अनलाॅक की प्रक्रिया की समीक्षा करना या उसे क्लीनचिट देना नहीं है, बल्कि मकसद है इस बात की गंभीरता को महसूस कराने का कि हमारे अपने लोग जो लापरवाहियां कर रहे हैं, वह हम पर ही भारी पड़ेंगी। ‘‘हमें कछु न हुइये!’’ की ढिठाई का नतीज़ा हमारे सामने है।
सागर जिले को ही लीजिए, 8 सितम्बर को कोरोना संक्रमण ने रिकार्ड तोड़ दिया। अभी तक  एक दिन में एक साथ सर्वाधिक 51 मरीज पॉजिटिव निकले। जिले में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 1358 हो गई है। वहीं 72 लोगो की मौत हो चुकी है। बाजार का आलम यह है कि कोरोनाकाल के पहले जिस तरह फुटपाथ पर अतिक्रमण कर के दूकानें लगाई जाती थीं, ठीक उसी तरह लगाई जाने लगीं हैं। इन दूकानों को दोपहर में हटवाया जाता है तो शाम तक वे फिर यथास्थान पहुंच जाती हैं। इनके बीच खरीददारों की भीड़। न कोई सोशल डिस्टेंसिंग और न कोई सुरक्षा उपाय। एक ग़ज़ब की ढिठाई देखी जा सकती है। सागर शहर में ही जहां विगत 10 अप्रैल तक मात्र एक कोरोना पाॅजिटिव था, वहां आज संक्रमण के आंकड़े जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वे चिंतित करने वाले हैं।

        यहां साझा करना जरूरी समझती हूं उस व्यक्ति की पीड़ा जो कोरोना संकट की ग़िरफ्त में है। शायद उसके अनुभवों से कुछ सबक लिए जा सकें। वह व्यक्ति हैं मेरे फेसबुक मित्र - देवेन्द्र कुमार पाण्डेय। वाराणसी में रहते हैं। प्रत्यक्ष भेंट कभी नहीं हुई। उनकी फेसबुक वाॅल से साभार उनकी 7 सितम्बर की पोस्ट यहां दे रही हूं- ‘‘पिछला एक सप्ताह कठिन मानसिक यातना वाला गुजरा है। पूरा घर कोरोना पॉजिटिव हो गया। घर से दूर रहने के कारण मैं बच गया। अभी सभी घर में ही आइसोलेशन में हैं। घर सील है। बनारस में रहकर भी मैं घर नहीं जा सकता। घर से थोड़ी दूर रहकर परिवार को दवा, भोजन की व्यवस्था कर रहा हूं। अब सभी के हालत में सुधार दिख रहा है। थोड़ी राहत मिली है तो पोस्ट साझा करने की हिम्मत कर रहा हूं। उम्मीद है कि अब सब ठीक होगा। 15 अगस्त को नाना बना था। सभी बारी-बारी से हॉस्पिटल आ-जा रहे थे। सिजेरियन ऑपरेशन था। अस्पताल में 9 दिन रुकना पड़ा। मेरा पुत्र जो होली से 15 अगस्त तक कभी घर से बाहर नहीं निकला, वर्क फ्रॉम होम ही करता रहा, वह भी अस्पताल गया था और 2,3 दिन जग गया। वहीं कहीं या आने-जाने में संक्रमित हो गया। पहले तो बुखार आया, दूसरे दिन सूंघने की क्षमता खतम हो गई। डॉक्टर ने तुरंत कोरोना टेस्ट की सलाह दी। 2 दिन बाद जब तक उसका रिपोर्ट आता सभी में वही लक्षण आने लगे। श्रीमतीजी भयंकर सावधानी रखती थीं। मैं दूसरे शहर से सप्ताह में एक या दो दिन के लिए घर आता तो मुझे अलग कमरे में कोरेन्टीन कर देतीं। बाकी सब आपस मे हिले मिले रहते थे। बीच मे एक दो सप्ताह तो घर भी नहीं जाता था कि जब वहां जाकर कैद ही होना है तो जाने से भी क्या फायदा! परिणाम यह हुआ कि मैं बच गया और सभी संक्रमित हो गए। मेरा बचना भी अच्छा रहा। मैं सबकी देखभाल कर पा रहा हूं। मैं भी संक्रमित हो जाता तो कौन मदद करता? सरकारी हॉस्पिटल के ऊपर इतना बोझ है कि वहां सब भगवान भरोसे हैं। प्राइवेट हॉस्पिटल  इतने मंहगे हैं कि फीस पूछ कर ही हिम्मत जवाब दे जाती है। कुछ ईश्वर की कृपा और कुछ आप लोगों की दुआएं कि अब लगता है मुसीबत टल जाएगी। सबसे कष्ट में 20 दिन के बच्चे को लेकर बड़ी बिटिया है। यह बीमारी जो है सो है, सबको पता ही है लेकिन मेरा अनुभव यह रहा कि इसमें मानसिक संतुलन भी डगमगाने लगता है। पड़ोसी दूरी बनाकर आपका हाल पूछते हैं। मुसीबत में साथ नहीं देते। कुछ तो हाल पूछते भी डरते हैं...कहीं मदद लेने घर में आ गया तो? आपके मित्रों, रिश्तेदारों में ही कोई आपके साथ खड़ा हो सकता है। यह बीमारी बड़ी घातक है। सब कुछ सही रहा, ईश्वर की कृपा रही, होम आइसोलेशन में ही आप स्वस्थ हो गए तो भी आपको एक कठिन मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है।...कोरोना हो ही न इसी में सबकी भलाई है। ईश्वर से प्रार्थना है कि यह कष्ट किसी को न सहना पड़े।’’ 

        वाकई ऐसी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा से किसी को न गुज़रना पड़े। इसलिए सावधानी में ही सुरक्षा है। चुनाव और त्यौहार हमारे सामने हैं। संक्रमण के आंकड़ें घटाना या बढ़ाना हमारे अपने हाथ में है। हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि हम सावधानी रखेंगे तो संक्रमितों के आंकड़ों का विस्फोट थम जाएगा वरना कोरोना  के महाविस्फोट की ख़बरें आना शुरु हो ही गई हैं।
-------------------------
(दैनिक जागरण में 10.09.2020 को प्रकाशित)
 #शरदसिंह #DrSharadSingh #miss_sharad #DainikJagaran
#postforawareness #corona
#Unlock4.0
#Safety #दैनिकजागरण #कोरोना #अनलॉक4.0 #विस्फोटक_आंकड़े #सावधानी #सुरक्षा #postforawareness

Thursday, July 30, 2020

कथासम्राट प्रेमचंद और उनके सृजन पर पत्रकार एवं साहित्यकार अरुण सिंह द्वारा लिया गया मेरा साक्षात्कार --- Dr Miss Sharad Singh's Interview on Premchand Literature





Dr (Miss) Sharad Singh
कथासम्राट प्रेमचंद और उनके सृजन पर पत्रकार एवं साहित्यकार अरुण सिंह द्वारा लिया गया मेरा साक्षात्कार Radio Spice Box Chicago से प्रसारित हुआ था लीजिए आप भी सुनिए...

Wednesday, June 17, 2020

विशेष लेख - उपचुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी ना पड़ जाए - डाॅ. ( सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh


उपचुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी ना पड़ जाए - डाॅ. शरद सिंह

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ... आप भी पढ़िए...


❗हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏
-----------------

विशेष लेख
उपचुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी ना पड़ जाए
- डाॅ. ( सुश्री) शरद सिंह

नवाबों के जमाने की एक कहावत है कि जिन्हें नज़ला (सर्दी) हो उन्हें बारिश में छाता ले कर ही घर से निकलना चाहिए। यानी जिन्हें दल बदलने के बाद अंदर-बाहर दोनों ओर से विरोध की सुगबुगाहट झेलनी पड़ रही हो, उन्हें एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहिए। एक भी चूक सारे राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती है। उस पर यदि यह चूक चुनावी तैयारी के जोश में होश खो कर कोरोना को दावत देने वाली हो तो समर्थकों और आमजनता को भी गहरे संकट में डाल सकती है।
जी हां, सुरखी उपचुनाव की तैयारियां गरमाने लगी हैं। राजनीतिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। कोरोना संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए जहां केन्द्रीय स्तर पर वर्चुअल रैलियां निकाली जा रही हैं, वहीं सागर जिले में ‘‘भीड़-जोड़’’ आयोजन हो गया। वैसे सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क को अनदेखा कर के जो भी राजनीतिक आयोजन हो रहे हैं, वे आग से खेलने से कम नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि कोई भी सार्वजनिक आयोजन प्रशासन की अनुमति के बिना तो होता नहीं है तो फिर प्रशासन ऐसी गंभीर चूक होने कैसे दे रहा है? माॅनीटरिंग की कमी और तुरंत संज्ञान में लेने में ऐसी ढील आमजनता के संदर्भ में तो देखने को नहीं मिलती है।
इस बार कांग्रेस की बात में दम है। मामला भले ही राजनीतिक मुद्दे के तौर पर हो लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण यह जनहित में अतिसंवेदनशील भी है। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री सुरेंद्र चौधरी और सागर जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश जैन आदि कांग्रेसी नेताओं ने आरोप लगाया है कि कोरोना वायरस को लेकर जारी केंद्रीय गाइड लाइन का खुला कर मंत्री गोविंद सिंह राजपूत द्वारा बिना अनुमति के राजनैतिक आयोजन किया गया। कांग्रेसी नेताओं ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत पर प्रकरण दर्ज करने की मांग शासन प्रशासन से की। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यउल्लंघनक्ष सुरेंद्र चौधरी के अनुसार विगत 13 जून को मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने सैकड़ों लोगों को एकत्रित कर राहतगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण का कार्यक्रम आयोजित किया जो विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हुआ। सुरेंद्र चौधरी ने प्रमाण सहित यह बात सामने रखी और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर निशाना साधा कि भगवान महावीर स्वामी की जयंती मनाने वालों पर प्रकरण दर्ज कर दिया गया, बंडा में जैन मुनि जी के दर्शन करने पहुंचे लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया, यहां तक कि शवयात्रा में जाने वालों पर भी मामला दर्ज कर दिया गया लेकिन राहतगढ़ सहित अन्य स्थानों पर बिना अनुमति के भारतीय जनता पार्टी के राजनैतिक आयोजन कर शासन की गाइड लाइन की सरेआम धज्जियां उड़ाने की खुली छूट प्रशासन द्वारा दी गई। उल्लेखनीय है कि विगत मई माह में सागर जिले के बंडा में जैनमुनि प्रमाण सागर महाराज और अन्य मुनि विहार करते हुए पहुंचे थे। उनके दर्शनों के लिए बंडा के हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए। उस समय यह मामला बहुत गरमाया था। जब भीड़ का वीडियो सामने आया तो पुलिस व प्रशासन ने इस मामले की जांच शुरू की थी।
सागर जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश जैन ने भी जिला प्रशासन पर आक्षेप लगाया है कि आमजन पर तो गाइडलाइन का पालन करने के लिए सख्ती बरती जाती है जबकि भारतीय जनता पार्टी के लोग शासन की गाइड लाइन का पालन करने के बजाय बिना अनुमति के राजनैतिक आयोजन करते रहते हैं और प्रशासन मौन रहता है। भले ही यह आरोप राजनीति प्रेरित हो लेकिन ध्यान देने योग्य है। आखिर मामला जानलेवा कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलाव से जुड़ा हुआ है। इस समय कोई भी जोखिम उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यूं भी कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या को लेकर सागर की स्थिति अभी सुधरी नहीं है। संक्रमण रोकने की दृष्टि से जिले के अनेक क्षेत्र चौदह दिन से भी अधिक समय से कन्टेमेंट क्षेत्र बने हुए हैं। कन्टेमेंट क्षेत्र की जनता खामोशी से असुविधाओं का सामना कर रही है क्योंकि सवाल संक्रमण को फैलने से रोकने का है।
यहां याद दिलाना ज़रूरी है कि सागर कलेक्टर के आदेश के अनुसार बिना मास्क पहने बाहर निकलने वालों पर सख्त कार्रवाई के साथ ही जुर्माने का प्रावधान है। नियमों का पालन हो सके इसके लिए जिले के संबंधित अधिकारियों को भी निर्देश दिया जा चुका है। जिले में कन्टेमेंट का उल्लंघन करने और बिना काम के बाहर निकलने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के आदेश हैं। कोरोना से बचाव के लिए सुरक्षा नियमों का पालन हो सके इसके लिए जिले की पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है। यह सब कुछ प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया है आमजनता ने। लोगों के मन में संक्रमण का डर अभी भी मौजूद है। हो भी क्यों न, आखिर उन्होंने अपने बीच के लोगों को कोरोना से संक्रमित होते देखा है। फिर भी कुछ नासमझ अपनी नासमझी दिखा ही देते हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद करीब 70-80 फीसदी शहरवासी प्रतिदिन अपने घर से बाहर निकल रहे हैं। उनमें ऐसे भी लोग हैं जो बाजारों में खरीदारी के दौरान शारीरिक दूरी का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोग मास्क लगाने में भी लापरवाही कर रहे हैं। नतीजतन कोरोना संक्रमण की जकड़ में आ रहे हैं और संक्रमितों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं।
जब कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा अभी गहराया हुआ हो तो ऐसे में प्रत्येक राजनीतिक दल के नेताओं को अपनी जिम्मेदारी का ध्यान रखते हुए आपदा नियमों का गंभीरता से पालन करना चाहिए। भावी चुनाव के जोश में होश खोना जनता के लिए भारी पड़ सकता है। इस समय संयम ही सबसे बड़ा शस्त्र है जिससे कोरोना को हराया जा सकता है।
---------------------
Josh me Hosh khona Janta Ke Liye Bhari na par Jaye - Dr Sharad Singh, Jagaran, 17.06.2020

(दैनिक जागरण में 17.06.2020 को प्रकाशित)
#लॉकडाउन #दैनिकजागरण #शरदसिंह #DrSharadSingh #miss_sharad #कोरोना #postforawareness #अनलॉक #Unlock

Wednesday, May 13, 2020

घर लौट रहे प्रवासी मजदूर... वे मज़बूर हैं ... क्योंकि मज़दूर हैं, मौत क़रीब है और घर दूर है - डॉ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
घर लौट रहे प्रवासी मजदूर... वे मज़बूर हैं ... क्योंकि मज़दूर हैं, मौत क़रीब है और घर दूर है - डॉ. शरद सिंह
       दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख जो समर्पित है लॉकडाउन में घर लौटते मज़दूरों की दुर्दशा को ...
❗हार्दिक आभार "दैनिक जागरण" 🙏
-----------------
लेख-
घर लौट रहे प्रवासी मजदूर....
वे मज़बूर हैं...क्योंकि मज़दूर हैं, मौत क़रीब है और घर दूर है
- डॉ. शरद सिंह
         वे इंसान हैं, वे इस देश के नागरिक हैं, वे मतदाता हैं लेकिन आज वे हज़ारों की तादाद में हज़ारों किलोमीटर के सफ़र में निकल पड़े हैं, अपने छोटे-छोटे बच्चों से ले कर 90-95 साल के माता-पिता को साथ ले कर। वे न तो एक शहर से निकले हैं और ही उन्हें किसी एक गांव जाना हैं। फिर भी सब की एक कहानी है। वे देश के विभिन्न नगरों-महानगरों से निकले हैं और लौट रहे हैं अपने-अपने घरों की ओर। दिल में सिर्फ़ एक उम्मींद लिए कि वे एक दिन अपने गांव, अपने लोगों के पास पहुंच जाएंगे। जिस दिन दुनिया ‘मदर्स डे’ मना रही थी ठीक उसी दिन ‘मदर्स डे’ से अनजान एक प्रौढ़ अपनी नब्बे साल की मां को सायकिल पर बिठा कर हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहा था ताकि अपनी बूढ़ी मां को वापस गांव ले जा सके। उसे न ट्रेन मिली, न बस, उसने अपनी जमापूंजी से सायकिल खरीदी और जीवन के एक और संघर्ष में कूद पड़ा। वह नहीं जानता है कि वह इस संषर्ष में जीतेगा या हारेगा? किन्तु वह यह जरूर जानता है कि हार का मतलब है मौत।

अधिकतर मजदूर अन्य राज्यों में या तो औद्योगिक प्रतिष्ठानों में काम कर रहे थे, घरेलू कार्यों में लगे थे या फिर प्राइवेट कंपनियों में नौकरी कर रहे थे। वहीं दिल्ली की एक मिल में काम करने वाले चित्रकूट के निवासी पन्नालाल को जो भूख और अपमान दिल्ली में मिला उसने उसे दिल्ली छोड़ने को विवश कर दिया। पन्नालाल के मन में तड़प इस बात की है कि जहां वह दस साल से काम कर रहा था, अपने मालिक को लाभ पहुंचा रहा था, उसी मालिक ने हाथ खड़े कर दिए कि जब मिल ही बंद हो गई तो अब मैं तुम्हें पैसे कहां से दूं? मालिक का कहना भी दुरुस्त था लेकिन पन्नालाल को जब उसके उस 10 गुना 10 के कमरे से भी धक्केमार कर बाहर निकाल दिया गया जहां वह अन्य आठ मजदूरों के साथ रहता था, तब उसे अहसास हुआ कि अब तो वह बेरोजगार, बेघर और दाना-पानी से मोहताज़ हो गया है। वह मात्र चार सौ रुपए की अपनी कुल जमापूंजी के सहारे पैदल ही निकल पड़ा दिल्ली से चित्रकूट के लिए। यह स्थिति मात्र पन्नालाल की नहीं है, अपितु उन हज़ारों मजदूरों की है जो सड़कों, खेतों, जंगलों और रेल की पटरियों के रास्ते अपने घरों की ओर निकल पड़े हैं।
एक और मजदूर, उसका नाम रामबलि था। वह मुंबई के पालघर जिले में एक ठेकेदार के टोल नाके पर मजदूरी करता था। मुंबई से निकले अन्य मजदूरों की भांति रामबलि भी अपने घर सिद्धार्थनगर, उ.प्र. के लिए पैदल ही निकल पड़ा था। मुंबई से मध्यप्रदेश के बंडा तहसील तक की यात्रा उसने अपार कष्ट सहते हुए भी सफलतापूर्वक तय कर ली थी। लेकिन बंडा से गुजरते समय वह अचानक गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। रिपोर्ट के अनुसार रामबलि की मौत डी-हाइड्रेशन के चलते हुई। उसकी खाली जेब से बस एक आधार कार्ड बरामद हुआ जो तेलगू़ भाषा में था। जो बयान कर रहा था कि पेट की खातिर रामबलि कभी आंध्र प्रदेश भी गया था।    
दुर्दिन भोग रहे इन मज़दूरों में से अनेक ऐसे हैं कि रोटियां भी जिनकी जान नहीं बचा पा रही हैं। औरंगाबाद की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना इस बात का सबूत है। हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हुए थक कर चूर मजदूर रेल की पटरी पर ही सो गए। तब उन्हें क्या पता था कि रेल आएगी और उन्हें कभी जागने नहीं देगी। वे रोटियां भी उनकी जान नहीं बचा पाएंगी जो उन्होंने अपने सीने पर बांध रखी थीं। क्षत-विक्षत शवों पर कपड़ों में बंधी हुई रोटियां जिसने भी घटनास्थल पर पहुंच कर देखीं, वह लौट कर अपने हलक से रोटी का निवाला नहीं उतार सका। उसके आंसू भी उसके गले को इतना तर नहीं कर सके कि निवाला हलक से उतर सके।

इससे पहले 12 साल की एक लड़की की मौत की खबर सबने पढ़ी थी। जो तेलंगाना से पैदल छत्तीसगढ़ अपने गांव आ रही थी। करीब 150 किलोमीटर लंबे रास्ते पर वह तीन दिनों से चल रही थी और घर पहुंचने से महज 14 किलोमीटर पहले उसने दम तोड़ दिया था। अभी हाल ही में नरसिंहपुर जिले की सीमा पर एक बड़े सड़क हादसे में पांच मजदूरों की मौत हो गई। नरसिंहपुर जिले के मुंगवानी थाना क्षेत्र के पास आम से भरा एक ट्रक अनियंत्रित होकर पलट गया. इस हादसे में 5 मजदूर मारे गए जबकि 11 मजदूर घायल हो गए। ट्रक में करीब 20 मजदूर सवार थे। पुलिस के मुताबिक आम के ट्रक में सवार 20 मजदूरों में से 11 मजदूर झांसी के रहने वाले थे जबकि 9 एटा के थे। सभी मजदूर हैदराबाद से अपने घर जाने के लिए निकले थे।
मेहनत कर के पेट भरने वाले मजदूरों की दशा आज भिखारियों और शराणार्थियों जैसी हो गई है। वे आज समाजसेवी संगठनों एवं स्थानीय प्रशासनों की उदारता पर निर्भर हैं। लेकिन चैकिंग और क्वारंटाईन किए जाने को ले कर उनके मन में जो अविश्वास है, उसके चलते वे रेल की पटरियों और जंगलों के रास्ते चुन रहे हैं। जिससे उन्हें हर तरह की सहायता से वंचित होना पड़ रहा है। खाली पेट-खाली जेब सैंकडों किलोमीटर पैदल सफर की असंभव सी दूरियां तय करने निकल पडे हैं वे, सिर्फ़ अपने हौसले के दम पर। जरूरत है उन्हें विश्वास दिलाए जाने की और बड़े पैमाने पर वह सुविधा मुहैया कराने की जिससे वे अपने गंतव्य पर सकुशल पहुंच सकें। अन्यथा लाॅकडाउन के दौरान हो रहे इस विस्थापन के मौत के तांडव को याद कर अनेक सदियां सिहरती रहेंगी।
-------------------------
(दैनिक जागरण में 12.05.2020 को प्रकाशित)
#प्रवासीमज़दूर #लॉकडाउन #औरंगाबाद_हादसा #Labour #MigrantLabour
#दैनिकजागरण #शरदसिंह #DrSharadSingh #miss_sharad
#कोरोना #कोरोनावायरस #महामारी #सावधानी #सुरक्षा #सतर्कता #Coronavirus #corona #pandemic #prevention #StayAtHome #SocialDistancing

Thursday, April 23, 2020

विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) पर प्रकाशित फीचर में डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh with her Books
विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) पर आज नवदुनिया द्वारा सागर नगर के तीन प्रमुख साहित्यकारों से उनके जीवन में पुस्तकों के महत्व के बारे में एक फीचर प्रकाशित किया गया जिसमें मैं डॉ. शरद सिंह और मेरी दीदी डॉ. वर्षा सिंह भी शामिल हैं। 😊 पढ़िए आप भी यह रोचक फीचर-
हार्दिक धन्यवाद ‘‘नवदुनिया’’ !!!
Navdunia, Vishwa, Pustak Diwas, 23.04.2020.- Dr Sharad Singh
Dr (Miss) Sharad Singh
 पुस्तकों ने मेरे जीवन को सार्थकता दी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, वरिष्ठ लेखिका एवं उपन्यासकार

एक साहित्यिक परिवार की होने के कारण बचपन से साहित्यिक पुस्तकों से जुड़ाव रहा। जब छोटी थी तो पंचतंत्र और चार्ल्स डिकेंस की कहानियां पढ़ती थी। कॉलेज के दिनों में टॉलस्टॉय, गोर्की, काफ्का, शेक्सपियर, प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की किताबें पढ़ीं। आज मैंने एक लेखिका के रूप में पचास से अधिक किताबें लिखी हैं जिनमें मेरे चार बेस्टसेलर उपन्यास भी शामिल हैं, तो इन सबके पीछे उन सैंकड़ों किताबों का योगदान है जिनको पढ़ कर मैं अपना अलग दृष्टिकोण और अपनी अलग लेखन शैली विकसित कर सकी। निकोलाई आस्त्रोवस्की की 'अग्निदीक्षा' ने जहां मुझे जीवन के संघर्षों से जूझने का हौसला दिया, वहीं शिवाजी सावंत की 'मृत्युंजय' ने पात्रों के मनोभावों को अभिव्यक्ति देने की मेरी समझ को मांजा। एक लेखिका और पाठक दोनों रूप में पुस्तकों ने मेरे जीवन को सार्थक बनाया है, उनके बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकती हूं।
     ………………..

Sunday, February 9, 2020

शून्यकाल ... कबीर के स्त्री-विरोधी दोहों का सच- डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल 
कबीर के स्त्री-विरोधी दोहों का सच
- डॉ. शरद सिंह
      कबीर ने समाज को आईना दिखाने वाले और मानव-प्रेम के दोहे रचे। वह भी उस काल में जब बोधन जैसे कवि को मात्र इसलिए मृत्युदण्ड दे दिया गया था कि उसका कहना था कि हिन्दू और मुस्लिम धर्म में कोई अंतर नहीं है। ऐसे दुरूह समय में पाखण्डियों को स्पष्ट शब्दों में ललकारने वाले कबीर क्या स्त्री-विरोधी दोहे लिख सकते हैं? यह एक चौंकाने वाला तथ्य है। यह एक शोध का विषय भी हो सकता है लेकिन इसके लिए पूर्वाग्रह से उठ कर बारीकी से तथ्यों को परखना होगा। इस संभावना पर भी गौर करना होगा कि कबीर को लांछित करने के लिए उनके नाम से स्त्री-विरोधी दोहे रच दिए गए हों।
कुछ समय पहले लखनऊ की एक शोध छात्रा ने मुझसे प्रश्न किया था कि ‘‘क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?’’ यह प्रश्न चेतना को आंदोलित करने वाला था। मैंने उससे पूछा कि आप किस आधार पर कबीर के बारे में यह प्रश्न कर रही हैं? इस पर उस छात्रा ने मुझे कबीर के दो दोहे सुनाए। निश्चितरूप से वे दोनों दोहे स्त्री-विरोधी थे। मैंने उस छात्रा से यही कहा कि मैं तत्काल इस प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगी दो दिन बाद उत्तर दूंगी। दो दिन में मैंने कबीर का लगभग तमाम साहित्य खंगाल डाला और साथ ही उस परिदृश्य पर भी ध्यान दिया जो कबीर के समय मौजूद था। दो दिन बाद उस शोध छात्रा ने फिर अपना प्रश्न दोहराया कि ‘‘क्या कबीर स़्त्री-विरोधी थे?’’ मैंने पूर्ण आश्वस्ति के साथ उसे उत्तर दिया कि मेरे विचार से कबीर स़्त्री-विरोधी नहीं थे। उसने प्रतिप्रश्न किया कि लेकिन वे दोहे जिनमें कबीर ने स्त्री को सर्प से अधिक विषधारी बताया है? उसने जो दो दोहे मुझे उदाहरण स्वरूप सुनाए वे इस प्रकार थे -
(1) नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग।
‘कबिरा’ तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग।।
तथा,
(2) नारी तो हमहूं करी, तब न किया विचार।
जब जानी तब परिहरि, नारी महा विकार।।
इस पर मैंने उससे पूछा कि इसका क्या प्रमाण है कि वे स्त्री-विरोधी दोहे कबीर ने ही रचे हैं। कबीर वाचिक परम्परा के कवि थे। उन्होंने स्वयं कहा है कि -“मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।“ अतः जब विरोधीजन प्रकाशित, प्रमाणित रचनाओं में भी हेरफेर कर देते हैं तो क्या यह संभव नहीं है कि कबीर की स्पष्टवादिता से खीझे हुए विरोधियों ने उन्हें अपने खेमे का दिखाने के लिए कुछ स्त्री-विरोधी दोहे उनके नाम से प्रचारित कर दिए हों। इस पर गंभीरता से शोध होना चाहिए। मेरे विचार से तो शोध के उपरांत ऐसे भ्रामक दोहे कबीर-साहित्य से खारिज़ किए जाने चाहिए।

शून्यकाल ... कबीर के स्त्री-विरोधी दोहों का सच- डॉ. शरद सिंह, Dainik Bundeli Manch, .09.02.2020

07 दिसम्बर 2016 को बीना कॉलेज की प्राचार्या डॉ संध्या टिकेकर द्वारा ग्राम हिरनछिपा में जनजागरूकता अभियान के तहत एक अत्यंत सार्थक संगोष्ठी कराई गई। जिसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखते हुए मैंने इसी विषय की चर्चा करते हुए शोधार्थियों और विद्वानों से आग्रह किया कि संत कबीर के स्त्री-विषयक दोहों की पड़ताल करना आवश्यक है क्योंकि मुझे संदेह है कि स्त्री-विरोधी दोहे संत कबीर ने लिखे हैं। वे वाचिक परम्परा के कवि थे अतः यह संभव है कि उनके विरोधियों ने दुष्प्रचार के रूप में ऐसे दोहे उनके नाम के साथ प्रचारित कर दिए हों। इस पर उपस्थित विद्वानों मेरे मेरे विचार का समर्थन किया किन्तु एकाध विद्वान ने उस संदर्भ का घालमेल कर दिया जो तुलसीदास के स्त्री-विरोधी दोहे के रूप में जाना जाता है-‘ढोर, गंवार शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।’’ मैंने उनसे आग्रह किया कि कबीर और तुलसी के दोहों के संदर्भ परस्पर एकदम भिन्न हैं। तुलसी ने जो दोहा लिखा है वह रामकथा के अंतर्गत् विशिष्ट चरित्रों के संदर्भ मे लिखा है और इस पर अलग से स्वतंत्र विचार किया जाना चाहिए। जबकि कबीर के नाम वाले ये दोहे लिखित नहीं मौखिक परम्परा से आए हैं जिनमें नाम के दुरुपयोग की पूरी संभावना है। ये दोहे किसी कथा-संदर्भ के अंतर्गत भी नहीं हैं। अतः इन पर विचार करते हुए तुलसी के दोहे को परे रखना होगा।
कबीर ने जिस काल में दोहों की रचना की उस समय सिकन्दर लोदी का शासन था। सिकन्दर लोदी एक असहिष्णु शासक था। उसकी धार्मिक भेद-भाव की नीतियों के कारण समाज हिन्दू और मुस्लिम दो भागों में बंटा हुआ था। दोनों धार्मिक समाजों में एकता की बात करना अपराध की श्रेणी में गिना जाता था। इसका उदाहरण कवि बोधन के हश्र के रूप् में देखा जा सकता है। कवि बोधन ने यही कहा कि हिन्दू और मुस्लिम धर्म एक समान है और परिणामस्वरूप उसे मुत्युदण्ड दे दिया गया। ऐसे दुरूह समय में कबीर दोनों धर्मों के पाखण्डियों को खुले शब्दों में ललकार रहे थे। पथभ्रष्ट समाज को उचित मार्ग पर लाना ही उनका प्रधान लक्ष्य है। कथनी के स्थान पर करनी को,प्रदर्शन के स्थान पर आचरण को तथा बाह्यभेदों के स्थान पर सब में अन्तर्निहित एक मूल सत्य की पहचान को महत्व प्रदान करना कबीर का उद्देश्य है। हिन्दू समाज की वर्णवादी व्यवस्था को तोडकर उन्होंने एक जाति, एक समाज का स्वरूप दिया। मूर्तिपूजा पर कबीर ने गहरा व्यंग्य किया। वे कहते है -
पहान पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार।
या तो यह चाकी भली, पीस खाये संसार।।
        इसी प्रकार खुदा को पुकारने के लिए जोर से आवाज लगाने पर वे कटाक्ष करते हैं कि -
कांकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दै, बहरा हुआ खुदाय”
कबीर का नाम हिंदी भक्त कवियों में निर्गुण भक्ति धारा की ज्ञानमार्गी शाखा में प्रमुखता से गिना जाता है। कबीर की रचनाओं को मुख्यतः निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभक्त किया जाता हैः रमैनी, सबद, साखी। ’रमैनी’ और ’सबद’ गाए जाने वाले ’गीत या भजन’ के रूप में प्रचलित हैं। ’साखी’ शब्द साक्षी शब्द का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है - “आंखों देखी अथवा भली प्रकार समझी हुई बात।“ कबीर की साखियां दोहों में लिखी गई हैं जिनमें भक्ति व ज्ञान उपदेशों को संग्रहित किया गया है। कबीर ने उलटबांसियां भी कही हैं। कबीर न तो मात्र सामाजिक सुधारवादी थे और न ही धर्म के नाम पर विभेदवादी। वह आध्यात्मिकता की सार्वभौम आधारभूमि पर सामाजिक क्रांति के नायक थे। कबीर मानववादी विचारधारा के प्रति गहन आस्थावान थे। वह युग अमानवीयता का था, इसलिए कबीर ने मानवता से परिपूर्ण भावनाओं, सम्वेदनाओं तथा चेतना को जागृत करने का प्रयास किया। कबीर वर्गसंघर्ष के विरोधी थे। वे समाज में व्याप्त शोषक-शोषित का भेद मिटाना चाहते थे। जातिप्रथा का विरोध करके वे मानवजाति को एक दूसरे के समीप लाना चाहते थे। समाज में छुआछूत का प्रचार जोरों पर देखकर कबीर ने उसका खंडन किया। उन्होंने पाखंडियों को संबोधित करके कहा कि -
जो तुम बाभन बाभनि जाया, आन घाट काहे नहि आया।
जो तुम तुरक तुरकानी जाया, तो भीतर खतना क्यूं न कराया।।
कबीर का समाज-दर्शन अथवा आदर्श समाज विषयक उनकी मान्यताएँ ठोस यथार्थ का आधार लेकर खडी हैं। अपने समय के सामन्ती समाज में जिस प्रकार का शोषण दमन और उत्पीडन उन्होंने देखा-सुना था, उनके मूल में उन्हें सामन्ती स्वार्थ एवम धार्मिक पाखण्डवाद दिखाई दिया जिसकी पुष्टि दार्शनिक सिद्धान्तों की भ्रामक व्यवस्था से की जाती थी और जिसका व्यक्त रूप बाह्याचार एवम कर्मकाण्ड थे। कबीर ने समाज व्यवस्था सत्यता, सहजता, समता और सदाचार पर आश्रित करना चाहा जिसके परिणाम स्वरूप कथनी और करनी के अन्तर को उन्होंने सामाजिक विकृतियों का मूलाधार माना और सत्याग्रह पर अवस्थित आदर्श मानव समाज की नीवं रखी। यहां विचारणीय है कि जो कवि, जो विचारक मानवप्रेम और मानव एकता की बात करता हो वह स्त्री-विरोधी दोहे कैसे रच सकता है? उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि -
जांत-पांत पूछे नहिं कोय। 
हरि को भजे सो हरि का होय।।
इसके बाद कबीर के उस पक्ष को भी ध्यान में रखना होगा जिसमें वे सूफी भावना को स्वीार करते हुए स्वयं को अर्थात् आतमा को स्त्री और परब्रह्म को पुरूष मानते हैं-
सुर तैंतीस कौतिक आए, मुनियर सहस अठासी।
कहैं ‘कबीर’ हम ब्याह चले हैं, पुरुष एक अविनासी।।
अतः कबीर ने तो स्वयं को भी स्त्री माना और अपने गुरु रामानंद का स्मरण करते हुए यही कहा कि - 
कहैं ‘कबीर’ मैं कछु न कीन्हा। 
सखि सुहाग राम मोहि दीन्हा।।
एक बिन्दु यह भी है कि कबीर का जीवन के प्रति सकारात्मक एवं तटस्थ दृष्टिकोण था। उन्होंने कहा कि - 
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। देखत ही छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।।
इस भंगुर जीवन का अंत जब मृत्यु ही है तो उससे भयभीत क्यां होना? इसी सत्य के महत्व को समझते हुए वे स्पष्टवादी बने रहे। उन्हें शासक, शासन अथवा पाखण्डियों से कभी भय नहीं लगा। उन्होंने कहा कि -
आए हैं तो जाएंगे, राजा, रंक, फकीर। 
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर।।
        कबीर ऐसे कवि थे जिन्होंने प्रेम की महत्ता को ज्ञान से भी ऊंचा बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञान व्यक्ति को ज्ञानी बनाता है किन्तु प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाता है और जो सच्चे अर्थों में मनुष्य बन गया शेष ज्ञान तो उसे स्वयं हो जाएगा-
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
अतः प्रेम को सर्वोपरि मानने वाले, पाखण्ड को ललकारते हुए स्पष्ट बोलने वाले, आत्मा को स्त्री और ब्रह्म को पुरुष मानने वाले कबीर स्त्री-विरोधी दोहे भला कैसे रच सकते थे? मुझे तो संदेह है इन दोहों पर। मेरा हमेशा यही आग्रह रहेगा कि कबीर के विचारों के प्रति भ्रम उत्पन्न करने वाले दोहों को जांचने और संदेहास्पद निकलने पर खारिज करने की जरूरत है।
-----------------------------
(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 09.02.2020)
#दैनिकबुंदेलीमंच #कॉलम #शून्यकाल #स्री_विरोधी #कबीर #दोहे #सच #ColumnShoonyakaal #Shoonyakaal #Column 
#DrSharadSingh #drsharadsingh #miss_sharad

Saturday, February 8, 2020

शून्यकाल ... पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु और कुछ अनुत्तरित प्रश्न - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल 
पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु और कुछ अनुत्तरित प्रश्न
    - डॉ. शरद सिंह
      12 फरवरी, 1968, संध्या सात बज कर छः मिनट पर दीनदयाल जी के ममेरे भाई प्रभुदयाल ने मुखाग्नि दी और दीनदयाल जी की पार्थिव देह को अग्नि को समर्पित कर दिया गया। पंडित दीनदयाल जी की हत्या ने सभी के मन में ये दो प्रश्न जगा दिए थे कि ‘हत्या किसने की?’ और ‘हत्या का उद्देश्य क्या था?’ नानाजी देशमुख ने कहा था, ‘‘इस प्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या आज भी भयंकर रहस्य बनी हुई है।’’
यहां मैं अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : दीनदयाल उपाध्याय’’ के कुछ अंश साझा कर रही हूं। 
    
10 फरवरी, 1968 को सुबह आठ बजे का समय था। दीनदयाल जी उस समय लखनऊ में अपनी मुंहबोली बहन लता खन्ना के निवास पर थे। देश की तत्कालीन राजनीतिक दशा पर चर्चा चल रही थी कि उसी समय दीनदयाल जी के लिए एक फोन आया। यह फोन किया था बिहार जनसंघ के संगठन मंत्री अश्विन कुमार ने। वे पटना में बिहार जनसंघ की कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने जा रहे थे। अश्विन कुमार एवं बिहार इकाई के सभी पदाधिकारियों की यह हार्दिक इच्छा थी कि दीनदयाल जी इस सम्मेलन में उपस्थित रहें एवं सभी को उचित मार्गनिर्देश दें। इसी सम्बन्ध में अश्विन कुमार ने दीनदयाल जी से निवेदन किया। चूंकि 11 फरवरी, 1968 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ के संसदीय दल की बैठक होनी थी अतः दीनदयाल जी के समक्ष असमंजस की स्थिति थी। उस समय तक उन्हें स्पष्ट निर्देश नहीं मिला था कि उन्हें दिल्ली की बैठक में उपस्थित होना है अथवा नहीं। यही बात उन्होंने अश्विन कुमार से कही, ‘‘यदि सुंदर सिंह भंडारी जी ने दिल्ली की बैठक में भाग लेने को नहीं कहा तो मैं पटना आ सकता हूं।’’

शून्यकाल ... पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु और कुछ अनुत्तरित प्रश्न - डॉ. शरद सिंह, Dainik Bundeli Manch, 08.02.2020
    दीनदयाल जी की ओर से इतना अश्वासन अश्विन कुमार के लिए आशाजनक था। उधर अश्विन कुमार दीनदयाल जी के सम्भावित आगमन के समय स्वागत की तैयारी में जुट गये और इधर दीनदयाल जी सुंदर सिंह भंडारी के निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः पटना जाना तय हुआ।  पठानकोट-स्यालदह एक्सप्रेस में प्रथम श्रेणी बोगी में दीनदयाल जी के लिए बर्थ आरक्षित कराई गयी। पठानकोट-स्यालदह एक्सप्रेस शाम सात बजे लखनऊ स्टेशन पहुंचती थी।
प्रथम श्रेणी के तीन कम्पार्टमेंट थे ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’। दीनदयाल जी की बर्थ ‘ए’ श्रेणी में थी। इसी कम्पार्टमेंट में भौगोलिक सर्वेक्षण के सहायक निदेशक ए.पी. सिंह के लिए आरक्षित बर्थ थी। ‘बी’ कम्पार्टमेंट में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के कांग्रेसी सदस्य गौरीशंकर राय के लिए बर्थ आरक्षित थी। यह कहा जाता है कि दीनदयाल जी ने अपनी सुविधा के लिए गौरीशंकर राय से अपनी सीट बदल ली और वे कम्पार्टमेंट ‘बी’ में आ गये। वे गौरीशंकर राय से परिचित थे अतः इस प्रकार से सीट की अदला-बदली में कोई विशेष बात नहीं थी। गौरीशंकर राय भी बिना किसी आपत्ति के कम्पार्टमेंट ‘ए’ में दीनदयाल जी की सीट पर चले गये।
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्त एवं उत्तरप्रदेश विधान परिषद के तत्कालीन सदस्य पीताम्बर दास सहित अनेक लोग दीनदयाल जी को विदा देने स्टेशन पहुंचे थे। उस समय दीनदयाल जी ने धोती, खादी की बनियान, बिना बांह का स्वेटर, उस पर एक और स्वेटर और पश्मीना का कुर्ता पहना हुआ था। उत्तरप्रदेश की कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए कुर्ते के ऊपर ऊनी जैकेट पहन रखी थी। कन्धे पर ऊनी शॉल भी थी। उनके साथ कुल तीन सामान थेµसूटकेस, बिस्तर तथा एक थैला जिसमें पुस्तकें थीं।
नियत समय पर गाड़ी ने लखनऊ स्टेशन छोड़ दिया। दीनदयाल जी अपनी बर्थ पर बैठ कर पुस्तक पढ़ने में मगन हो गये। यात्रा के दौरान वे पुस्तकें पढ़ना और लेख इत्यादि लिखना पसन्द करते थे। यह उन्हें यात्रा के समय का सदुपयोग प्रतीत होता था। पर्याप्त समय होने पर इसीलिए कई बार वे पैसेन्जर रेल में यात्रा करना पसन्द करते थे और यात्रा के दौरान वे या तो नया लेख लिख डालते थे अथवा पुराने अधूरे लेख को पूरा कर डालते थे। वे अपने जीवन के एक-एक मिनट को उपयोगी बनाए रखना चाहते थे। 

रात्रि दो बज कर पचास मिनट पर दिल्ली-हावड़ा ट्रेन पटना की ओर जा चुकी थी। इसके लगभग चालीस मिनट बाद रात्रि तीन बज कर तीस मिनट पर रेलवे के लाइनमैन ईश्वर दयाल को अपनी ड्यूटी करते समय सूचना मिली कि प्लेटफॉर्म से लगभग एक सौ पचास गज दूर बिजली के पोल नं.1267 से लगभग तीन फुट की दूरी पर गिट्टियों के ढेर पर एक शव पड़ा हुआ है। यह स्थान रेल लाइन से दूर था अतः रेल से कट कर मरने वाले का शव नहीं हो सकता था।
ईश्वर दयाल ने तत्परता दिखाते हुए सहायक स्टेशन मास्टर को फोन पर शव के बारे में सूचना दी। ईश्वर दयाल तथा अन्य कर्मचारियों से पूछताछ करने पर पता चला कि शव को सबसे पहले रात्रि लगभग तीन बजे दिगपाल नाम के पोर्टर ने देखा था। उस समय एक इंजन शंटिंग कर रहा था जिसका ड्राइवर था गफूर और उस इंजन में सुरक्षा गार्ड किशोर मिश्र भी सवार था। किशोर मिश्र ने यह सूचना लाईनमैन ईश्वर दयाल को दी। ईश्वर दयाल ने सहायक स्टेशन मास्टर को इसकी जानकारी फोन पर दी थी।
शव का पंचनामा बनाने से पहले रेलवे चिकित्सक को बुलाया गया जिसने चिकित्सकीय आधार पर शव की पुष्टि की। इसके बाद शव की तस्वीरें लेने के लिए फोटोग्राफर को बुलाया गया। फोटोग्राफर के कैमरे में फ्लैश लाइट न होने सुबह का पर्याप्त उजाला होने की प्रतीक्षा की गयी। सुबह लगभग सात बजकर तीस मिनट पर शव की तस्वीरें खीचीं गयी। चित्र में शव की जो स्थिति दर्ज़ हुई, वह इस प्रकार थी, ‘‘शव पीठ के बल पड़ा था। सिर उत्तर दिशा की ओर तथा पैर पश्चिम की ओर थे। दायां हाथ सिर की ओर था तथा बायां हाथ शॉल के ऊपर से होकर सीने पर था। शॉल से कमर से मुंह तक का भाग ढंका था।’’
एक बात ध्यानाकर्षित करने वाली थी कि शव के बाएं हाथ की कलाई में घड़ी बंधी हुई थी तथा मुट्ठी में पांच रुपये का नोट दबा हुआ था। यह इस तथ्य की ओर संकेत था कि मृतक के साथ लूटपाट नहीं की गयी थी। मृतक के कपड़ों की तलाशी लेने पर 04348 नं. का प्रथम श्रेणी का टिकट प्राप्त हुआ, 47506 नं. की आरक्षण रसीद, कुल 26 रुपये बरामद हुए। कलाई में बंधी घड़ी की पड़ताल करने पर घड़ी के पीछे ‘नाना देशमुख’ नाम लिखा मिला।
‘अज्ञात मृतक’ के रूप में शव का पंचनामा तैयार किया गया। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाना था। भीड़ देखकर स्टेशन के एक कर्मचारी बनमाली भट्टाचार्य का ध्यान आकृष्ट हुआ। वह भी उत्सुकतावश वहां आ गया और उसने जैसे ही शव को देखा तो वह स्तब्ध रह गया। उसके मुंह से निकला,‘‘ये तो जनसंघ के प्रधान पंडित दीनदयाल जी हैं।’’
मुगलसराय के जनसंघ के कार्यकर्ताओं के बीच यह सूचना जंगल में आग की तरह फैल गयी। आरक्षण कार्यालय से मिली जानकारी ने इस बात की पुष्टि कर दी कि जिस शव को पुलिस ‘अज्ञात व्यक्ति का’ मान रही थी, वह राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त राजनीतिज्ञ पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शव था।

माननीय चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता में गठित ‘चन्द्रचूड़ आयोग’ ने पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के कारणों एवं परिस्थितियों को नये सिरे से जांचना आरम्भ किया। आयोग ने वाराणसी के विशेष जिला एवं सत्र न्यायाधीश मुरलीधर द्वारा दिए गये कई बिन्दुओं पर अपनी असहमति जताई। आयोग ने नवीन दृष्टिकोण से घटना का स्पष्टीकरण सामने रखा। आयोग ने विवेचना करते हुए लिखा, ‘‘यदि श्री उपाध्याय की मृत्यु के साथ उनके सामान की चोरी भी हुई और यदि हत्या और चोरी किसी एक योजना के अंग हैं तो यह निष्कर्ष निकालना युक्तिसंगत है कि इस हत्या का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है। हत्या कुछ लाभ के उद्देश्य से की गयी और हत्या का कुछ तत्कालीन कारण या तो चोरी करते समय पकड़े जाने से बचना था या यह कि चोरी सुविधा से की जा सके।’’
पं. दीनदयाल उपाध्याय के एक हाथ में पांच रुपए के नोट का पाया जाना एक अहम बिन्दु था। इस बिन्दु पर आयोग की ओर से टिप्पणी की गई, ‘‘केवल इस बात के अलावा मेरी समझ में बिलकुल नहीं आया कि कौन और क्यों उनके हाथ में नोट रखेगा? हत्यारे, विशेषकर राजनीतिक हत्यारे, अपना काम करने के बाद घटनास्थल पर ठहरते नहीं। यह भी समझ में आ सकता है, यद्यपि मैंने इस सम्भावना को नहीं माना है, लाश खम्भे के पास रखी गयी ताकि वह एक दुर्घटना जान पड़े परन्तु यह मैं नहीं मान सकता कि दुर्घटना सिद्ध करने के प्रयास में षड्यंत्रकारियों ने इत्मीनान से काम किया कि उसमें कोई त्रुटि न रह जाए। अतः नोट उनके हाथ में रखने की बात सर्वथा अमान्य है।’’
इसी तारतम्य में आयोग का मत था, ‘‘पहले वाले निष्कर्ष से यह युक्तियुक्त परिणाम निकलता है कि मृतक अपनी मुत्यु के समय नोट अपने साथ लिए हुए था।’’
उपरोक्त दोनों बिन्दुओं के निष्कर्षतः परिणाम न निकल पाने तथा जांच के दौरान रह जाने वाली कमियों के कारण ‘चन्द्रचूड़ आयोग’ भी पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के वास्तविक कारणों की तह तक नहीं पहुंच सका। आयोग के निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए नानाजी देशमुख ने कहा था, ‘‘इस प्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या आज भी भयंकर रहस्य बनी हुई है।’’                
 ----------------

Saturday, January 11, 2020

शून्यकाल ...बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम "शून्यकाल"... "दैनिक बुंदेली मंच" में... Please आप भी पढ़िए इसे🌿  (11.01.2020)


शून्यकाल ...

बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की
 - डॉ. शरद सिंह
       भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। इस अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है. इनमें से 14 भाषाओं को संविधान में शामिल किया गया था। सन 1967 ई. में, सिन्धी भाषा को अनुसूची में जोड़ा गया। इसके बाद, कोंकणी भाषा, मणिपुरी भाषा, और नेपाली भाषा को 1992 ई. में जोड़ा गया। हाल में 2003 में बोड़ो भाषा, डोगरी भाषा, मैथिली भाषा, और संथाली भाषा शामिल किए गए। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 38 अन्य भाषाओं को शामिल करने की मांग है जिनमें बुंदेली भी एक है। भाषा का दर्जा दिए जाने के का एक आधार यह भी निर्धारित किया गया है कि जिस बोली का अपना स्वतंत्र व्याकरण हो उसके भाषाई दर्जे के अधिकार पर गौर किया जा सकता है। इस दृष्टि से बुंदेली का अपना विशेष व्याकरण है और अपनी अलग शब्दावली है जो इसे स्वतंत्र पहचान देती है।  
बुंदेली को भाषा के रूप में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के लिए समय-समय पर मांग उठती रही है। यद्यपि कोई बड़ा प्रभावी आंदोलन नहीं छेड़ा गया। भोपाल के ही आंचलिक क्षेत्रों में, विदिशा, रायसेन, होशंगाबाद, सीहोर, राजगढ़ आदि जिलों में अथवा जबलपुर, ग्वालियर संभाग के जिलों में बोलीगत परिवर्तन के साथ बुंदेली ही बोलते हैं। बुन्देली समृद्ध भाषा है और इसमें साहित्य और लोकसाहित्य का अपार भण्डार है। बुन्देली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बहुतायत में प्रयोग की जाती है। बुन्देलखण्ड के आधार पर ही इसका नाम ’बुन्देली’ पड़ा। इसे ’बुन्देलखण्डी’ भी कहा जाता है। बुन्देली बुन्देलखण्ड की संस्कृति और अस्मिता की पहचान है। एक अनुमानित गणना के अनुसार सागर, जबलपुर, ग्वलियर, भोपाल और झांसी संभाग के जिलों के बुन्देली बोलने वालों की कुल संख्या लगभग पांच करोड़ के आसपास है। बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। बुंदेलखंड के अनेक विद्वानों द्वारा इस दिशा में प्रयास किया गया। अनेक संस्थाओं ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिखे किन्तु यह मांग जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। संभवतः इसीलिए बुंदेली को भाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास पिछड़ता रहा। यद्यपि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी और डॉ हरीसिंह केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर में बुंदेली भाषा का स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन-अध्यापन हो रहा है और इसमें शोध भी किए जा रहे हैं।
Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 11.01.2020
            बुंदेली को भाषा का सम्मान दिलाने की दिशा में पृथक बुंदेलखण्ड की मांग को भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। पृथक बुंदेलखण्ड राज्य की मांग करने वालों का यह मानना है कि यदि बुंदेलखण्ड स्वतंत्र राज्य का दर्जा पा जाए तो विकास की गति तेज हो सकती है। यह आंदोलन राख में दबी चिंनगारी के समान यदाकदा सुलगने लगता है। बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई तेज करने के इरादे से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया। विपक्ष के नेता अटल विहारी वाजपेई ने मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया। वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ उपद्रवी तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।  पृथक्करण की मांग ले कर राजा बुंदेला भी सामने आए। आज भी पृथक बुंदेलखण्ड की मांग सुगबुगाती रहती है। यह सच है कि पृथक बुंदेलखण्ड और बुंदेली को भाषाई दर्जे की बात एकरूप हो कर कभी नहीं उठी।
सन् 2017 में ओरछा में बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद, भोपाल के तत्वाधान में बुंदेली भाषा का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। जिसमें मधुकर शाह, काशी हिंदू वि.वि. के प्रो. कमलेश कुमार जैन, बुंदेलखण्ड वि.वि. के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे, जर्मनी के होमवर्ग वि.वि. की प्रो. तात्याना, बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कैलाश मड़वैया ने बुंदेली को भाषा का स्थान दिलाने के पक्ष में अपने विचार प्रकट किए थे। बुंदेली भाषा को पाठ्यक्रम में जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया था जिस पर बुंदेलखण्ड यूनीवर्सिटी द्वारा इस दिशा में सार्थक कदम उठाने का निश्चय प्रकट किया गया था। कैलाश मड़्वैया ने बुंदेली भाषा के शब्दों के संग्रह एवं मानकीकरण पर प्रस्तावना रखी थी। इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी कि क्या बुंदेली भाषा शिक्षा का माध्यम बन सकती है? यह बात होम्वर्ग यूनीवर्सिटी, जर्मनी की प्रोफेसर तात्याना रखी थी। ओरछा के राष्ट्रीय सम्मेलन की भांति अलग-अलग मंचों से अनेक बार सम्मेलनों और सेमिनारों के जरिए बुंदेली को भाषाई दर्जा दिलाए जाने की आवाज़ उठाई गई। दुर्भाग्यवश एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की कमी ने बुंदेली के संघर्ष को बार-बार हाशिए पर धकेल दिया। यही गनीमत है कि छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में संर्घष जारी है।  
------------------------------
(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 11.01.2020)

#दैनिकबुंदेलीमंच #कॉलम #शून्यकाल #शरदसिंह #ColumnShoonyakaal #Shoonyakaal #Column #SharadSingh #DainikBundeliManch