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Wednesday, January 19, 2022

चर्चा प्लस | स्त्रियों की आवाज़ वाया कोरोना आपदा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस
स्त्रियों की आवाज़ वाया कोरोना आपदा
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
             
हाल ही में यह तथ्य सामने आया है कि कोविड के टीके से माहवारी में अनियमितता होने लगती है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान यह तथ्य सामने आया था किन्तु घर-परिवार में इसे गंभीरता से नहीं लिया। अकसर देखने में आता है कि स्त्रियों की बातें अमूमन गंभीरता से ली ही नहीं जाती हैं। यदि स्त्री बड़े पद पर है तो भी उसके निर्णय को उसका अधीनस्थ पुरुषवर्ग संदेह की दृष्टि से ही देखता है। स्त्री की सलाह को हल्के से लेना आम बात है। जबकि यह प्रवृत्ति संकट में डाल सकती है।


प्रजनन क्षमता की दृष्टि से स्त्रियों में माहवारी का सबसे अधिक महत्व है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो माहवारी स्त्री की प्रजनन क्षमता को तय करती है। अतः माहवारी चक्र में किसी भी प्रकार का अचानक परिवर्तन होना चिन्ता का विषय होना चाहिए। हर परिवार, हर दंपत्ति अपनी संतति अथवा वंश बढ़ाने के लिए संतान पैदा करना चाहता है। भले ही इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि यदि संतान नहीं हो पा रही है तो उसका कारण सिर्फ़ स्त्री नहीं बल्कि पुरुष में भी कमी के कारण ऐसा हो सकता है। भारत जैसे विकासशील देश में स्त्रियां अभी भी माहवारी जैसे विषय पर अपने परिजन से भी खुल कर बात नहीं कर पाती हैं। लेकिन योरोप में स्थिति थोड़ी भिन्न है। वहां स्त्रियां अपनी शारीरिक समस्याओं को ले कर जागरूक रहती हैं और खुल कर डाॅक्टरी सलाह लेती हैं। उनकी इसी अगुवाई के कारण वह तथ्य सामने आया जो भारतीय स्त्रियों में भी रहा होगा किन्तु वह प्रमुखता से सामने नहीं आ सका, जिससे उसके संबंध में यहां कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन भी नहीं हो सका। 
सोन्या अंगेलिका डीन एक योरोपियन महिला हैं जिन्होंने कोविड के दोनों टीके समय पर लगवाए। लेकिन इसके बाद उन्हें माहवारी की गंभीर अनियमित झेलनी पड़ी। सोन्या अंगेलिका डीन ने जो विशेषज्ञ समिति को जो जानकारी दी, वह उन्हीं के शब्दों में -‘‘मुझे बायोनटेक-फाइजर का पहला टीका गर्मियों में लगा था। वैसे तो कुछ लोगों ने मुझे बताया था कि टीका लगने के बाद वे कितना बीमार महसूस कर रहे थे। लेकिन मुझे तसल्ली थी कि मेरे साइड इफेक्ट हल्के-फुल्के ही थे। एक महीने बाद, मुझे दूसरा टीका लगा और उसके बाद मैं अपने परिवार के साथ छुट्टियों पर निकल गईं। यात्रा की शुरुआत में ही मेरे पीरियड आ जाने चाहिए थे। एक दिन मुझे काफी ज्यादा ब्लीडिंग हुई। अगले दिन एक बूंद भी नहीं। फिर एक सप्ताह से ज्यादा समय तक यानी करीब-करीब पूरी छुट्टियों के दौरान मेरा रक्तस्राव होता रहा। ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हो रही थी और दर्द भी ज्यादा हो रहा था। मेरे लिए ये सामान्य बात नहीं थी।’’
घबरा कर सोन्या अंगेलिका ने पहले गूगल सर्च किया। उससे उन्हें कोई विशेष मदद नहीं मिली। यद्यपि यह जानकारी जरूर मिली कि कुछ अन्य महिलाओं को भी टीका लगवाने के बाद इस तरह की अनियमितताओं का समाना करना पड़ा है। चूंकि इस संबंध में कोई चेतावनी नहीं दी गई थी कि इस प्रकार का साईड इफैक्ट भी हो सकता है अतः महिलाओं का भयभीत होना स्वाभाविक था। इसके बाद महिलाओं की प्रमुखता वाली एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई जिसने अध्ययन कर के पाया कि टीके का माहवारी पर कुछ समय के लिए दुष्प्रभाव पड़ा है। लगभग 4,000 महिलाएं जिनमें से कुछ को टीके लगे थे और कुछ को नहीं, उन सभी के डाटा की मदद से, माहवारी के एक ट्रैकिंग ऐप का इस्तेमाल करते हुए शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन्हें नया-नया टीका लगा था, उनके माहवारीचक्र में सामान्य की अपेक्षा अहम बदलाव आया था। उनके पीरियड औसतन एक दिन अधिक समय तक चले थे। इस जानकारी से जहां टीके में सुधार संभव हो सकेगा वहीं इस बात की घबराहट भी दूर हो जाएगी कि यह दुष्प्रभाव स्त्री की प्रजनन क्षमता पर गहरा असर डाल सकता है।
वैज्ञानिक, शोध अथवा चिकित्सकीय धरातल पर यह महत्वपूर्ण तथ्य इसलिए सामने आ सका क्यों कि पीड़ित महिलाओं ने अपनी समस्या पर खुल कर चर्चा की और उनके परिजनों ने भी आगे बढ़ कर उनका साथ दिया। जबकि भारत जैसे देश में माहवारी को ले कर अनेक वर्जनाएं आज भी व्याप्त हैं। महिलाओं को यदि माहवारी संबंधी कोई समस्या हो तो वे खुल कर बात नहीं कर पाती हैं। इस संबंध में उन्हें झिझक होती है। क्योंकि यह उनके मन में एक वर्जित विषय के रूप में बैठा हुआ है। अधिक से अधिक वे इस विषय पर बात करेंगी भी तो ऐसी दूसरी महिला से जो ज्ञान के मामले में उसी के समकक्ष रहती है या फिर और कमतर रहती है। स्थिति गंभीर होने पर ही वे किसी महिला चिकित्सक तक पहुंचती हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि घर का पुरुषवर्ग विशेष रूप से पति भी अपनी पत्नी की गायनिक समस्याओं के प्रति ध्यान नहीं देते हैं और न इस संबंध में उनसे चर्चा करते हैं। यदि पति-पत्नी दोनों के बीच इस संबंध में चर्चा हो भी जाए तो वह परिवार की या किसी परिचित महिला के साथ पत्नी को चिकित्सक के पास जाने की सलाह दे देता है। स्वयं साथ जाने में उसे झिझक महसूस होती है। पढ़े-लिखे तबके में इस संबंध में जागरूकता आती जा रही है लेकिन ग्रामीण अंचलों में बसे परिवारों तथा शहरों में भी घोर परंपरावादी परिवारों में अभी भी पति अपनी पत्नी की गायनिक परेशानियों के बारे में लापरवाही से पेश आते हैं।
समाज और परिवार में आमस्त्रियों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वह विज्ञापन आज भी टीवी के पर्दे पर स्त्री की स्थिति की सच्चाई बयान करता है जिसमें बाॅलीबुड अभिनेता अक्षय कुमार अस्पताल की ओर इशारा कर के बीड़ी फूंकते एक व्यक्ति से पूछता है कि यहां कैसे? और वह व्यक्ति लापरवाही से उत्तर देता है कि तुम्हारी भाभी को वही औरतों वाली बीमारी हो गई है। उसका उत्तर देने का अंदाज़ बताता है कि उसे बीमारी की गंभीरता से कोई सरोकार नहीं है। यह एक कड़वा सच है जिसे सेनेटरीपैड के विज्ञापन में बड़ी गंभीरता से सामने रखा गया। इसी विज्ञापन में आगे अक्षय कुमार उसे झिड़कता है कि सिगरेट में फूंकने के लिए तेरे पास पैसे हैं लेकिन सेनेटरीपैड खरीदने को पैसे नहीं है? यही सच्चाई है समाज के एक बड़े हिस्से की जिसे हम मध्यम वर्गीय, निम्न मध्यम वर्गीय या निम्न वर्गीय के रूप में अपने बीच पाते हैं। वस्तुतः हम स्वयं भी उसी का हिस्सा हैं। हर सेनेटरीपैड मंहगा नहीं होता है। सरकार, एन्जियोज़ और अनेक संस्थाएं ग़रीब तबके की महिलाओं के लिए, लड़कियों के लिए सेनेटरीपैड निःशुल्क अथवा न्यूनतम दाम में उपलब्ध कराती हैं। किन्तु इसकी मांग की जानी भी तो ज़रूरी है। जब स्त्री स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर स्त्री, पुरुष, परिजन कोई भी पहल नहीं करेगा तो इन मुद्दों का हल कैसे निकलेगा? 
किसी भी दवा अथवा टीके का साईड इफैक्ट होना स्वाभाविक है क्योंकि इस दुनिया में हर इंसान पर पर टीकों का कुछ न कुछ अलग असर होता है। वहीं, साईड इफैक्ट का पता चलने पर स्थिति की गंभीरता का आकलन करने में सुविधा होती है। माहवारी अनियमितता के संबंध में यदि विशेषज्ञ आगाह नहीं कर पाए तो वह इसलिए कि उन्हें इस प्रकार कोई सूचना मिली ही नहीं। कुछ महिलाओं के आगे आने और अपनी समस्या बताने पर आज दुनिया को इस साईड इफैक्ट का पता चल पाया है। जबकि हमें आज भी पता नहीं है कि हमारे देश में कोविड-19 के टीके लगवाने के बाद कितनी महिलाओं को माहवारीचक्र में समस्या का सामना करना पड़ा? अगर यह आंकड़े हमारे देश में सामने आते तो हमारे वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ भी इस दिशा में अध्ययन करते और निदान ढूंढते। यह तो मात्र एक ताज़ा उदाहरण है अन्यथा ऐसी न जाने कितनी समस्याएं हैं जो स्त्रियों के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं, जिन पर खुल कर चर्चा करने से स्वयं स्त्रियां, कतराती हैं, डरती हैं अथवा संकोच करती हैं। वस्तुतः समर्थन की कमी उनके मनोबल को तोड़ती है। यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उन्हें अपनी समस्याओं को बताने से रोकता है कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा और उनका मज़ाक बनाया जाएगा। इस आपदा के दौर ने यह एक और सबक दे दिया है कि यदि गंभीर दुष्परिणामों से बचना है तो स्त्रियों की समस्याओं को हल्के में लेने अथवा अनदेखा करने की आदत छोड़नी होगी। यानी स्त्रियों को अपनी समस्याएं बताने में मुखर होना होगा और पुरुषवर्ग को उसे गंभीरता से सुनना और समझना होगा। तरह-तरह की आपदाओं के बीच मानवता को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है।  
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Wednesday, September 16, 2020

चर्चा प्लस : विश्व ओजोन दिवस (16 सितम्बर) पर विशेष: धरती की छत में कोई छेद न रहे - डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
 
चर्चा प्लस :  विश्व ओजोन दिवस (16 सितम्बर) पर विशेष:


 धरती की छत में कोई छेद न रहे          

 - डाॅ शरद सिंह


         ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना काल में दुनिया के विभिन्न देशों में हुए लाॅकडाउन से हानिकारक उत्सर्जन घट गया जिसने ओजोन परत में बढ़ते छेदों को छोटा करने में मदद की है। लेकिन यह तो स्थाई हल नहीं है। दुनिया हमेशा लाॅकडाउन नहीं रह सकती है। जंगल कटेंगे, जलेंगे और विषाक्त उत्सर्जन फिर बढ़ेगा तो ओजोन परत के लिए फिर खतरा पैदा हो जाएगा। आम इंसान को ये बातें गै़रज़रूरी लग सकती हैं लेकिन ओजोन परत का सरोकार इंसान सहित हर प्राणी की संासों से है। इसलिए इसके बारे में सभी को सोचना होगा। 


 हर इंसान को, हर प्राणी को जीवित रहने के लिए सांसें चाहिए। हवा और पर्यावरण की शुद्धता ही स्वस्थ सांसें दे पाती है। लेकिन हम इंसानों ने अपने ही हाथों अपने घर को जलाने और प्रदूषण फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दिल्ली को ही लें तो हर वर्ष शीतऋतु में स्माॅग के चलते वहां इंसानों का दम घुटने लगता है। संास की बीमारियां बढ़ जाती हैं और अब कोरोना संक्रमण जो संासों के जरिए तेजी से फैलता है, ने ख़तरा और बढ़ा दिया है। माॅस्क के पीछे क़ैद संासें और उस पर शुद्ध हवा की कमी सेहत के लिए घातक परिणाम पैदा कर सकती है। किन्तु शुद्ध हवा, शुद्ध पर्यावरण आए कहां से, जब हमने वायुमण्डल को विषैली गैसों का ‘डम्पिंग स्टेशन’ बना रखा है। यह सोच कर सुखद लगता है कि इस कोरोना काल में दुनिया भर के देशों में किए गए लाॅकडाउन ने धरती की छत यानी ओजोन परत में मरम्मत की है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण दुनिया के अधिकांश देशों में लाॅकडाउन किया गया। उद्योगों के संचालन को बंद किया गया। सड़कों पर परिवहन सीमित हो गए। इससे वायु प्रदूषण अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। नदियों का जल साफ होने लगा, आसमान साफ और नीला दिखाई देने लगा। लाॅकडाउन के दौरान बड़े पैमाने पर उद्योगों के बंद रहने से विषैली गैसों के उत्सर्जन में बड़ी गिरावट आई जिससे ओजोन परत के बड़े होते छेद सिकुड़ने लगे, छोटे होने लगे। लेकिन यह स्थाई हल नहीं है। कोरोना-संक्रमण के बावजूद दुनिया अपनी पुरानी पटरी पर लौट रही है। यह जरूरी भी है। उद्योग नहीं रहेंगे तो अर्थव्यवस्था और विकास ध्वस्त हो जाएगा और तब बेरोजगारी और भुखमरी को सम्हाल पाना कठिन से कठिनतर हो जाएगा। कहने का आशय यह है कि जो हमें अपनी नंगी आंखों से दिखाई नहीं देता है वह भी हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण है- ओजोन परत।  

Dr (Miss) Sharad Singh Column Charch Plus in Dainik Sagar Dinkar, 16. 09. 2020 World Ozone Day

वर्ष 1980 में पहली बार ओजोन परत में छेद का पता चला था। प्रदूषण बढ़ने के साथ साथ ओजोन छिद्र भी बढ़ता गया। जिस कारण सूर्य की पैराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुंचने लगी, इससे त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचने के साथ ही पौधों को भी नुकसान पहुंचने लगा। इससे बचने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 1987 में एक माॅन्ट्रियल प्रोटोकाॅल संधि की गई।

ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है। ओजोन परत हमें सूरज से आने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाती है। वायुमंडल में 91 प्रतिशत से अधिक ओजोन गैसें यहां मौजूद हंै, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ओजोन परत सूर्य की पैराबैंगनी किरणों से बचाने के लिए सन स्क्रीन की तरह काम करती है। ओजोन की परत की खोज 1913 में फ्रांस के भौतिकविदों फैबरी चार्ल्स और हेनरी बुसोन ने की थी। धरती से 30-40 किमी की ऊंचाई पर ओजोन गैस का 91 प्रतिशत हिस्सा एकसाथ मिलकर ओजोन की परत का निर्माण करता है। ओजोन सूर्य के उच्च आवृत्ति के प्रकाश की 93 से 99 प्रतिशत मात्रा अवशोषित कर लेती है। ओजोन परत में छेद के लिए क्लोरोफ्लोरो कार्बन यानी सीएफसी गैसों को भी जिम्मेदार माना जाता है। सन् 1985 में सबसे पहले ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन परत में एक बड़े छेद की खोज की थी। वैज्ञानिकों को पता चला कि इसकी जिम्मेदार क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस है। जिसके बाद इस गैस के उपयोग को रोकने के लिए दुनियाभर के देशों में सहमति बनी और 16 सितंबर 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया गया था। जिसके बाद से ओजोन परत के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा साल 1994 में 16 सितंबर की तारीख को ‘‘विश्व ओजोन दिवस’’ मनाने की घोषणा की गई। पहली बार ‘‘विश्व ओजोन दिवस’’ साल 1995 में मनाया गया था, जिसके बाद हर साल 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है।

ओजोन परत को इंसानों द्वारा बनाए गए कैमिकल्स से काफी नुकसान होता है। इन कैमिकल्स से ओजोन की परत पतली हो रही है। फैक्ट्री और अन्य उद्योगों से निकलने वाले कैमिकल्स हवा में फैलकर प्रदूषण फैला रहे हैं। ओजोन परत के बिगड़ने से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में अब गंभीर संकट को देखते हुए दुनियाभर में इसके संरक्षण को लेकर जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन कोरोना संक्रमण के दौरान लाॅकडाउन ने जहां उद्योगों में रुकावट डाल कर तात्कालिक रूप से ओजोन परत को संवारा वहीं दूसरी ओर स्थाई हल की ओर कदम बढ़ाने का आह्वान करते लोगों और उनके धरना-प्रदर्शनों पर बाधा पहुंचा दी। अकसर सरकारें अकेले अपने दम पर बड़े उद्योंगों के उत्पादन के घातक तरीकों पर अंकुश नहीं लगा पाती हैं लेकिन जब उन्हें जनता के दबाव के रूप में समर्थन मिलता है तो वे ठोस कदम उठा पाती हैं। पर्यावरण के हित में किए जा रहे सक्रिय सामूहिक प्रयासों की गति में कमी पर्यावरण और विषैली गैसों के उत्सर्जन के समीकरण को एक बार फिर चिंताजनक स्तर तक ले जा सकती है। 

और अंत में एक रोचक कथा। बहुत पहले एक राजकुमारी हुआ करती थी जिसका नाम था विद्योत्तमा। वह असाधारण विदुषी थी। उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह उसी से विवाह करेगी जो उससे अधिक विद्वान हो। उससे विवाह के लिए अनेक विद्वान आये पर शास्त्रार्थ में उससे पराजित होकर लौट गए। विवाह में असफल विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए षडयंत्र रचा और किसी महामूर्ख से उसका विवाह करवा देने का निश्चय किया। वे सभी किसी महामूर्ख को खोजने के लिए चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक व्यक्ति मिला जो वृक्ष की जिस डाल पर बैठा हुआ था, उसी को ही काट रहा था। ऐसा महामूर्ख उन्होंने कभी नहीं देखा था। उसे वृक्ष से उतारा गया और समझाया गया कि वह एकदम मौन रहेगा तो उसका विवाह राजकुमारी से करवा दिया जाएगा। उस व्यक्ति का परिचय विद्योत्तमा को यह कह कर दिया गया कि यह अद्वितीय विद्वान है लेकिन इस समय मौन व्रत धारण किए हुए है, अतः जो पूछना हो, वह इशारों से पूछा जाए। विद्योत्तमा ने उसकी ओर एक अंगुली उठाई जिसका तात्पर्य था कि ब्रह्म एक है। उस व्यक्ति ने समझा कि वह मेरी एक आंख फोडना चाहती है। उसने दो अंगुलियां उठा दीं, जिसका तात्पर्य था कि यदि तुम एक आंख फोड़ोगी तो मैं तुम्हारी दोनों आंख फोड़ दूंगा। लेकिन पंडितों ने संकेत की व्याख्या कर दी कि ब्रह्म के दो रूप हैं। एक पुरुष और एक प्रकृति। अब विद्योत्तमा ने पंचतत्वों को बताने के लिए पांच अंगुली दिर्खाइंं। पर उस व्यक्ति ने समझा कि विद्योत्तमा मुझे थप्पड़ मारना चाहती है। उसने उसे मुक्का दिखाया कि यदि तुम मुझे थप्पड़ मारोगी तो मैं मुक्का मारूंगा। पंडितों ने व्याख्या कर दी कि तत्व तो पांच अवश्य होते हैं पर जब एक साथ मिलते हैं, तभी उनकी सार्थकता है। विद्योत्तमा ने उस व्यक्ति को विद्वान मान लिया और दोनों का विवाह हो गया। लेकिन विवाह की प्रथम रात्रि को ही उस व्यक्ति की मूर्खता का भेद खुल गया और इस छल से क्रोधित विद्योत्तमा ने उसे महामूर्ख कहते हुए धक्का दे दिया। वह व्यक्ति सीढियों से लुढ़कते हुए नीचे आ गिरा। उसी पल उस व्यक्ति ने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि जब तक ज्ञानी नहीं हो जाऊंगा तब तक विद्योत्तमा को मुंह नहीं दिखाऊंगा। उस व्यक्ति ने न केवल ज्ञान अर्जित किया बल्कि ‘‘अभिज्ञान शकुन्तलम’’, ‘‘मेघदूत’’ आदि महान काव्यों की रचना की और कालिदास के नाम से विख्यात हुआ। इस कहानी को याद करने का उद्देश्य यही है कि हमने कालिदास के मूर्खरूप को जीते हुए उस धरती और उसके पर्यावरण को पर्याप्त नुकसान पहुंचाया है, जिस धरती पर हम रहते हैं। अब आवश्यकता है कालिदास की तरह प्रण करने और बुद्धिमान बन कर अपनी धरती की छत को बचाने की।

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(दैनिक सागर दिनकर में 16.09.2020 को प्रकाशित)


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Wednesday, September 9, 2020

चर्चा प्लस - 9 सितम्बर जन्मदिन विशेष : टाॅल्सटाॅय वैचारिक गुरु थे महात्मा गांधी के - डाॅ शरद सिंह

 


चर्चा प्लस - 9 सितम्बर जन्मदिन विशेष :

      टाॅल्सटाॅय वैचारिक गुरु थे महात्मा गांधी के      

      - डाॅ शरद सिंह

 

जिसने ‘युद्ध और शांति’, ‘अन्ना करेनीना’ और ‘पुनरुत्थान’ नहीं पढ़ा उसने विश्व साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानो पढ़ा ही नहीं। रूसी लेखक लियो टाॅल्सटाॅय ने अपनी महान कृतियों से विश्व के साहित्य पर तो अपनी छाप छोड़ी ही, वहीं अपने विचारों से महात्मा गांधी का मार्गदर्शन किया। विश्व की दो महान विभूतियों के बीच महत्वपूर्ण पत्राचार होता रहा जिसने वैश्विक वैचारिकता को जन्म दिया। देश की सीमाओं को पीछे छोड़ कर मानवता की दिशा में की गई यह पहलकदमी आज के अशांत विश्व को शांति का रास्ता दिखा सकती है।

 

9 सितंबर 1828 को जन्मे लियो टॉलस्टॉय उन कालजयी लेखकों में से एक हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से समूचे विश्व के साहित्य को प्रभावित किया। उनका जन्म मास्को से लगभग 100 मील दक्षिण में स्थित रियासत यास्नाया पोलिनाया में एक संपन्न परिवार हुआ था। इनके माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। अतः लालन-पालन इनकी चाची कात्याना ने किया। सन 1844 में लियो टॉलस्टॉय कजान विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और सन 1847 तक उन्होंने पूर्वीं भाषाओं और विधि संहिताओं का अध्ययन किया। ज़मींदारी के विवाद के कारणों से उन्हें स्नातक हुए बिना ही विश्वविद्यालय छोड देना पडा। सन 1851 में लियो टॉलस्टॉय कुछ समय के लिए सेना में भी प्रविष्ट हुए थे। उनकी नियुक्ति कॉकेशस पर्वतीय कबीलों से होने वाली दीर्घकालीन लडाई में हुई, जहां अवकाश का समय वे लिखने-पढने में लगाते रहे। यहीं पर उन्हें अपनी प्रथम रचना ‘चाईल्डहुड’ (1852) में लिखी, जो ‘‘एलटी’’ के नाम ‘‘द कंटपोरेरी’’ नामक पत्र में प्रकाशित हुई। उनकी लगभग सभी कृतियों ने प्रसिद्धि पाई लेकिन उनमें उनके उपन्यास ‘‘युद्ध और शांति’’ (1869), ‘‘अन्ना करेनिना’’ (1877), ‘‘पुनरुत्थान’’ (1899) ने वैश्विक कृतियां होने का इतिहास रच दिया। 


 
महात्मा गांधी टॉलस्टॉय के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। यद्यपि वे दोनों कभी एक-दूसरे से मिल नहीं सके किन्तु पत्रों के माध्यम से उनके बीच महत्वपूर्ण विचार विनिमय होता रहा। अपनी आत्मकथा में गांधी ने लिखा है कि टॉलस्टॉय की किताब ‘‘द किंगडम ऑफ गॉड इज विदइन यू’’ ने उनकी जिंदगी बदल दी। सन् 1894 में जर्मनी में प्रकाशित यह किताब स्वयं टाॅल्सटाय के देश रूस में प्रतिबंधित हो कर दी गई थी क्योंकि इसमें ईसाईत को नए दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया गया था जो धर्मान्ध सत्ताधारियों को पसंद नहीं आई। टॉलस्टॉय की इस किताब को गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में जोहानिसबर्ग से डरबन की ट्रेन यात्रा के दौरान एक अक्टूबर 1904 को पढ़ी थी। वह इस किताब से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने एक अक्टूबर 1909 को ही टॉलस्टॉय को पत्र लिखा। यहां से आरम्भ हुआ टॉलस्टॉय और गांधी के बीच पत्राचार का सिलसिला।


टॉलस्टॉय ने अपने विचारों से चर्च की व्यस्थाओं पर जबरदस्त प्रहार किया था। टॉल्सटॉय ने लिखा कि ‘‘चर्च का इतिहास क्रूरतापूर्ण और भयावह है और ईसा के सिद्धातों के खिलाफ है। यह बात हर जगह, हर धर्म के लिए क्यों इतनी सटीक मालूम होती है? हर धर्म- नए या पुराने- के तथाकथित रक्षकों ने अपना-अपना दमन चक्र चलाया है। यूरोप और ईसाई धर्म भी इससे अछूता नहीं रहा।’’ टॉलस्टॉय ने उपनिवेशवाद पर भी कड़ाई से लिखा। उन्होंने लिखा कि ‘‘एक इंसान का दूसरे के लिए सबसे बड़ा उपहार है ‘शान्ति’ और फिर भी यूरोप के ईसाई देशों ने अपने मातहत लगभग तीन करोड़ लोगों के भाग्य का फैसला हथियारों से किया है।’


हिंसा का उत्तर अहिंसा से देने का रास्ता भी उन्होंने ईसा के उपदेशों से ही सुझाया कि ‘‘तुम अपने पडोसी से झगड़ो मत, और न ही हिंसा का सहारा लो। किसी और को पीड़ा देने से अच्छा है खुद पीड़ित हो जाओ और बिना किसी प्रतिरोध के हिंसा के सामना करो।’’ उनके इस सुझाव का महात्मा गांधी के विचारों पर गहरा प्रभाव डाला। गांधी जी के अहिंसावादी विचारों को इससे दृढ़ता मिली और आगे चल कर गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन चलाया। गोपाल कृष्ण गोखले गांधी के राजनैतिक गुरु थे तो टॉलस्टॉय उनके वैचारिक गुरु थे।


गांधी जी द्वारा दक्षिण अफ्रीका का ट्रांसवाल सविनय अवज्ञा आंदोलन टॉलस्टॉय की विचारधारा से प्रभावित था। जिसकी चर्चा गांधीजी ने अपने टाल्सटाॅय को लिखे अपने पहले पत्र में की थी। इस पत्र के बारे में टॉलस्टॉय ने अपनी डायरी में लिखा था- ‘‘आज मुझे एक हिंदू द्वारा लिखा हुआ दिलचस्प पत्र मिला है।’’ इसके जवाब में उन्होंने गांधी को लिखा, ‘मुझे अभी आपके द्वारा भेजा गया दिलचस्प पत्र मिला है और इसे पढ़कर मुझे अत्यंत खुशी हुई। ईश्वर हमारे उन सब भाइयों की मदद करे जो ट्रांसवाल में संघर्ष कर रहे हैं। ‘सौम्यता’ का ‘कठोरता’ से संघर्ष, ‘प्रेम’ का ‘हिंसा’ से संघर्ष हम सभी यहां पर भी महसूस कर रहे हैं। मैं, आप सभी का अभिवादन करता हूं।’’


गांधीजी ने उन्हें दूसरा खत 4 अप्रैल, 1910 में लिखा और साथ में अपनी किताब ‘हिंद स्वराज’ भी भेजा। गांधीजी ने आग्रह किया कि अगर उनका स्वास्थ्य ठीक हो तो किताब के बारे में अपनेे विचारों से अवगत कराएं। उन दिनों टॉलस्टॉय अस्वस्थ रहने लगे थे। टॉलस्टॉय ने 10 अप्रैल 1910 को अपनी डायरी में लिखा कि ‘‘आज मुझसे दो जापानी मिलने आये जो यूरोपियन सभ्यता की प्रशंसा किए जा रहे थे और वहीं मुझे एक हिंदू का पत्र और उसकी किताब मिली जो यूरोप की सभ्यता में कमियों को साफ-साफ उजागर करते हैं।’’


गांधीजी के पत्र के उत्तर में टॉलस्टॉय ने 24 अप्रैल 1910 को लिखा कि ‘‘मुझे आपका पत्र और किताब मिली। सत्याग्रह सिर्फ हिंदुस्तान के लिए ही नहीं वरन, संपूर्ण विश्व के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण है।’’

गांधी 15 अगस्त 1910 को लिखे अपने अगले खत में टॉलस्टॉय को लिखा कि उन्होंने अपने साथी कालेनबाख के साथ मिल कर जोहनिसबर्ग में ‘टॉलस्टॉय फार्म’ की स्थापना की है। गांधी जी के इन पत्रों ने और विचारों ने टॉलस्टॉय को गांधी जी की ओर आकर्षित किया। अब टॉलस्टॉय की डायरी में ‘गांधी’ शब्द कई बार आने लग था और वे उनके ट्रांसवाल के संघर्ष में काफी दिलचस्पी भी ले रहे थे। टॉलस्टॉय ने गांधीजी को अपना आखिरी पत्र 20 सितम्बर 1910 को लिखा। यह पत्र लम्बा होने के साथ-साथ मार्मिक भी था। पत्र में उन्होंने लिचाा के -‘‘अब जब मौत को मैं अपने बिलकुल नजदीक देख रहा हूं तो मैं कहना चाहता हूं जो मेरे जेहन में साफ- साफ नजर आता है और जो आज सबसे ज्यादा जरूरी है, और वह है - ‘निष्क्रय प्रतिरोध‘ (इसे आप ‘सत्याग्रह’ भी कह सकते हैं) जोकि कुछ और नहीं बल्कि प्रेम का पाठ है। प्रेम इंसान के जीवन का एकमात्र और सर्वोच्च नियम है और यह बात हर इंसान की आत्मा भी जानती हैय और अगर इंसान किसी गलत अवधारणा को न माने, तो शायद वह इसे समझ सकता है। इसी प्रेम की उद्घोषणा सभी संतों ने की है फिर वह चाहे भारतीय हो, चीनी हो, यहूदी हो, यूनानी हो या रोमन हो। जब प्रेम में बल का प्रवेश हो जाता है तो फिर वह जीवन का नियम नहीं रह पाता और हिंसा का रूप धारण कर लेता है और ताकतवर की शक्ति बन जाता है।’’


20 नवम्बर, 1910 को टॉलस्टॉय ने अंतिम सांस ली। टॉलस्टॉय की मृत्यु के समाचार से गांधी जी को बहुत ठेस पहुंचीं। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा कि ‘‘मुझको तो अभी बहुत सीखना था उनसे। काल के क्रूर हाथों ने मुझसे मेरा पथ-प्रदर्शक छीन लिया। इस पीड़ा से उबरने के लिए मैंने कुछ समय एकांत में बिताया।’’

यदि विभिन्न देशों के बीच भौगोलिक विवाद त्याग कर दुनिया के सभी देश परस्पर वैचारिक विचार-विमर्श करें तो युद्ध, हिंसा और अशांति के दरवाजे़ आसानी से बंद हो सकते हैं। यही तो संदेश था टॉलस्टॉय का।

 

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(दैनिक सागर दिनकर में 02.09.2020 को प्रकाशित)


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Wednesday, December 25, 2019

चर्चा प्लस ... शीतऋतु में गरमाता रहा पुस्तक प्रकाशन, पाठक और राॅयल्टी चिंतन - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... शीतऋतु में गरमाता रहा पुस्तक प्रकाशन, पाठक और राॅयल्टी चिंतन
  - डाॅ. शरद सिंह
    21- 23 दिसंबर 2019 को ‘इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल’ हुआ मध्यप्रदेश की व्यावसायिक नगरी इन्दौर में। इस दौरान देश में माहौल रहा कैब के विरोध का। अनेक उड़ान स्थगित, अनेक ट्रेन रद्द। कहीं घना कोहरा, कहीं बादल, तो कहीं शीत लहर। किंतु साहित्य की दुनिया में दुनिया के चिंतन के साथ ही साहित्य की दिशा, दशा और भविष्य पर भी चिंता की गई। पुस्तकें प्रकाशन, पाठक, राॅयल्टी चिंतन और पाकिस्तान की हरक़तें ये सभी प्रश्न एक साथ उमड़ते-घुमड़ते रहे। यह पर्याप्त था वैचारिक शीत को गरमाने के लिए।     
भारतीय मूल के कनेडियन लेखक तारेक फतेह ने ‘‘पाकिस्तान: स्टेट स्पाॅन्सर आॅफ टेरोरिज़्म’ विषय पर बोलते हुए कहा कि ‘‘दिल्ली के लोदी रोड का नाम बदल देना चाहिए’’ तो मुद्दा आ सिमटा भारत के आंतरिक मामलों पर। इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल के संकल्पनाकार एवं माॅडरेटर प्रवीण शर्मा ने अपनी वाक्पटुता से उन्हें पुनः पाकिस्तान और वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान से उनकी निकटता का स्मरण कराया। यह सत्र वाकई विचारोत्तेजक रहा। सत्र के बाद कुछ लोगों का यह सोचना भी वाज़िब था कि दूसरे देश की नागरिकता ले कर भारतीयों पर आक्षेप लगाना सरल है, बेहतर होता कि वे अपने देश भारत की नागरिकता ले कर यहीं रहते हुए यहां की परिस्थितियों से जूझते हुए अपनी उन सभी बातों पर अमल करते जो वे मंच से कह रहे थे। बहरहाल, इस आयोजन पर वर्तमान वातावरण का कुछ तो असर पड़ना ही था। लिहाज़ा नादिरा बब्बर, तरुण भटनागर आदि कुछ स्पीकरर्स नहीं आ सके किन्तु अप्रत्याशित रूप से तस्लीमा नसरीन का उपस्थित हा जाना सुखद किन्तु चैंका देने वाला रहा क्योंकि वे घोषित कार्यक्रम में शामिल नहीं थीं।
चर्चा प्लस ... शीतऋतु में गरमाता रहा पुस्तक प्रकाशन, पाठक और राॅयल्टी चिंतन - डाॅ. शरद सिंह
         हैलो हिन्दुस्तान द्वारा आयोजित इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में बतौर स्पीकर मैंने भी दो सत्रों में साहित्य पर चर्चाएं की। मेरे प्रथम सत्र में साहित्यकार डाॅ आशुतोष दुबे ने मुझसे मेरे लेखन के बारे में विस्तृत चर्चा की। मेरे उपन्यासों एवं स्त्रीविमर्श लेखन के संदर्भ में उन्होंने बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। जिनमें से एक प्रश्न था कि क्या साहित्य में फोटोग्राफिक यथार्थ होना चाहिए? मैं व्यक्तिगतरूप से यथार्थवादी लेखन की हिमायती हूं और यथार्थ मेरे साहित्य में मुखर रहता है। चूंकि यह साहित्य होता है अतः कल्पना और साहित्यिक शिल्प की सरसता तो इसमें स्वतः शामिल हो जाती है। इसी तारतम्य में डाॅ आशुतोष दुबे ने एक और मुद्दा उठाया कि हिन्दी में अकसर समीक्षकों द्वारा गढ़े गए फार्मेट पर खरे न उतर पाने का डर लेखक को बना रहता है जो लेखन को प्रभावित करता है। इस पर मैंने उत्तर दिया कि यह लेखक को स्वयं तय करना चाहिए कि वह अपने विषय के साथ न्याय करने के लिए और पाठकों के लिए लिख रहा है अथवा समीक्षकों के लिए। मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समीक्षकों के डंडे डर के साए में कोई अच्छा साहित्य नहीं रच सकता है। लेखक में अपनी छूट लेने का हौसला होना चाहिए। चर्चा हुई मेरे उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ के संदर्भ में लिव इन रिलेशन पर। इस पर मैंने वही कहा जो मेरे उपन्यास के केन्द्र में है कि लिव इन रिलेशन एक आग का दरिया है, जो तैरने का हौसला रखता हो वह तैरे, लेकिन उससे जुड़ी चैतरफा समस्याओं को ध्यान में रख कर। ऐसे संबंधों में सबसे अधिक नुकसान अगर किसी का होता है तो वह स्त्री का ही। फलां के साथ रह चुकी का टैग उसके नाम के साथ जुड़ जाता है जबकि उसका पुरुष साथी स्वतंत्र जीवन जीता है।    
मेरे दूसरे सत्र का संयुक्त विषय था-‘साहित्यकार पाठक संबंधों में सूखा क्यों? तथा हिन्दी में बेस्टसेलर मारीचिका’। इस दोनों मुद्दों पर महत्वपूर्ण विचार विमर्श हुआ, जिसमें मेरे साथ शामिल थे वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी, आशुतोष दुबे, नीलोत्पल मृणाल और निर्मला जी। इसी सत्र में हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तकों और पाठकों का पारस्परिक संबंध और पुस्तकों की राॅयल्टी पर चर्चा हुई। युवा लेखक नीलोत्पल मृणाल का कहना था कि उन्हें राॅयल्टी की कोई समस्या नहीं है। वहीं, लीलाधर जगूड़ी और डाॅ आशुतोष दुबे ने माना कि हिन्दी जगत में राॅयल्टी की समस्या है, उस पर कविता की किताबों पर तो और भी अधिक समस्या है। निर्मला जी ने उस ओर संकेत किया कि हिन्दी में बेस्टसेलर के चयन का तरीका संदिग्ध है। मैंने भी अपने विचार सामने रखे कि यदि हिन्दी में भी जब नए कथानक और नए शिल्प ले कर उपन्यास सामने आते हैं तो पाठक उसे हाथों-हाथ लेते हैं। मैंने अपने नवीनतम उपन्यास के अनुभव को भी वहां सामने रखा कि सोशल मीडिया पर अपने नवीनतम उपन्यास ‘शिखण्डी...स्त्री देह से परे’ के बारे में जैसे ही पोस्ट डाॅली तो फेसबुक से इंस्टाग्राम और ट्विटर तक मुढसे ये प्रश्न किए जाने लगे कि इसे किसने प्रकाशित किया है? यह कहां मिलेगा? यह कब तक उपलब्ध हो जाएगा? क्या यह विश्व पुस्तक मेले में मिल जाएगा? यानी पाठक नए विषय और नए दृष्टिकोण के प्रति हमेशा जिज्ञासु रहते हैं। रहा पुस्तक के बेस्टसेलर की दौड़ का सवाल तो इस दौड़ में बुराई नहीं है बशर्ते हम अपने लेखन की मूलप्रवृत्ति को न गिरने दें। सोशल मीडिया के प्रभाव पर भी कई सत्रों में चर्चा हुई जिसमें अंग्रेजी के युवा लेखकों ने अपने विचार साझा किए और चिंता जताई।
एक प्रश्न जिस पर विचार होना चाहिए कि जब हम हिन्दी साहित्य की दशा का आकलन करते हैं तो किताबों की बिक्री और अंग्रेजी के भारतीय लेखकों की बेस्टसेलर की लिस्ट को ले कर बैठ जाते हैं, क्या ऐसा ही होना चाहिए? क्या हमें यह ध्यान नहीं रखना चाहिए कि हिन्दी में साहित्य का स्तर आज भी ज़मीन से अधिक जुड़ा हुआ है, भारतीय अंग्रेजी साहित्य की तुलना में। दूसरी सबसे बड़ी बात कि हिन्दी और अंग्रेजी के पाठकों का अंतर वहीं से शुरू हो जाता है जहां माता-पिता अपने बच्चों को हिन्दी स्कूल और अंग्रेजी स्कूल में भर्ती करने की अपनी आर्थिक क्षमता में बंट जाते हैं। हिन्दी स्कूल से पढ़ कर निकला पाठक आमतौर पर औसत आमदनी वाला होता है और वह कई बार अपनी साहित्य पढ़ने की भूख मांग कर मिटाने को विवश रहता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो किताब कम बिकी वह कम ही पढ़ी गई। हिन्दी साहित्य में अभी भी बिक्री और पाठकों का अनुपात बराबर का नहीं है। इसी का दूसरा पक्ष देखें तो जो बिकता है वह जरूरी नहीं है कि बेहतर ही हो। हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती। बेशक़ यह मुद्दा भी लम्बी और गहन चर्चा का विषय है जिस पर एक अच्छा-खासा सेमिनार हो सकता है।  
बहरहाल हमेशा की तरह कुछ वरिष्ठजन, कुछ मित्रो और कुछ नए सहधर्मियों से मुलाकात हुई। वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी, डॉ नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, डॉ शैलेंद्र कुमार शर्मा, श्रीमती निर्मला भुराड़िया, डॉ तेज प्रकाश व्यास आदि से मिलना सुखद रहा। जैसा कि हमेशा होता है कि ऐसे लिटरेचर फेस्टिवल कई ज्वलंत मुद्दे उठाते हैं, कई विचार दिमाग़ों में सुलगते हुए छोड़ जाते हैं जिनसे वैचारिक शीत की चादर धीरे-धीरे गरमाती रहती है।                  ---------------------------  
(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 25.12. 2019)
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Wednesday, December 18, 2019

चर्चा प्लस ...अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसम्बर) और नागरिकता संशोधन कानून 2019 - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसम्बर) और नागरिकता संशोधन कानून 2019
         - डाॅ. शरद सिंह                                                                                        
     आज अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को मनाया जा रहा है। यह दिवस प्रति वर्ष 18 दिसंबर 1992 से सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा, उनकी भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति, परंपरा आदि की सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस पर यह विचार करना जरूरी है कि आखिर क्या है नागरिकता (संशोधन) कानून 2019? इसकी राह में आने वाले अवरोध का मूल कारण क्या है? कहीं दफ़्तरों की लापरवाही भरी कार्यप्रणाली तो नहीं है भय का मूल कारण? जिसे पूर्वोंत्तर ने झेला है।
चर्चा प्लस ...अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसम्बर) और नागरिकता संशोधन कानून 2019  - डाॅ. शरद सिंह

आज जब देश में दिल्ली से लेकर असम तक, उत्तर प्रदेश से लेकर बेंगलुरु-मुंबई तक हर जगह नए नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है। देश का अल्पसंख्यक समुदाय भी चिंतित हो उठा है। आज अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को मनाया जा रहा है। यह दिवस प्रति वर्ष 18 दिसंबर 1992 से सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा, उनकी भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति, परंपरा आदि की सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु मनाया जाता है। अल्पसंख्यक किसे माना जाना चाहिए? संयुक्त राष्ट्र के एक विशेष प्रतिवेदक फ्रेंसिस्को कॉपोटोर्टी ने एक वैश्विक परिभाषा दी, जिसके अनुसार- “किसी राष्ट्र-राज्य में रहने वाले ऐसे समुदाय जो संख्या में कम हों और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक रूप से कमजोर हों एवं जिनकी प्रजाति, धर्म, भाषा आदि बहुसंख्यकों से अलग होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण, विकास, एकता, संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय भाषा को बनाये रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हों, तो ऐसे समुदायों को उस राष्ट्र-राज्य में अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए।”
अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस की शुरुआत 18 दिसंबर 1992 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक घोषणा से हुई थी। भारत में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय अल्पसंख्यकों से संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। भारत के संविधान में अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म और भाषा को माना गया है। भारत के अल्पसंख्यक समुदायों में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी शामिल हैं। बहाई और यहूदी अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन इन्हें संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। भारत सरकार ने अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1978 में अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया था। इसे बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम-1992 के तहत कानून के रूप में 1992 में पारित किया गया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वर्ष 2006 जनवरी में यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन कर दिए। इसे वे सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जो दीवानी अदालतों को हैं। इस आयोग का गठन भारत के लिए इसलिए भी महत्व रखता है, क्योंकि पूरे यूरोप के किसी भी राष्ट्र में ऐसा कोई आयोग नहीं है। आज भारत के कई अन्य राज्यों में भी राज्य अल्पसंख्यक आयोग हैं।

अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस पर यह विचार करना जरूरी है कि आखिर क्या है नागरिकता (संशोधन) कानून 2019? अविभाजित भारत में रहने वाले लाखों लोग अलग धर्म को मानते हुए आजादी के वक्त से साल 1947 से पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे थे। इसके साथ ही अफगानिस्तान भी मुस्लिम राष्ट्र है और इन देशों में हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन और ईसाई समुदायों के बहुत से लोग धार्मिक आधार पर उत्पीड़न झेलते हैं। नागरिकता कानून 1955 के अनुसार, किसी अवैध अप्रवासी नागरिक को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती। सरकार ने इस कानून में संशोधन के जरिए अब नागरिकता कानून 2019 के हिसाब से अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता आसानी से देने का फैसला किया है। बिल की विशेषता यह है कि इसमें भारत की नागरिकता पाने के लिए भारत में कम से कम 12 साल रहने की आवश्यक शर्त को कम करके सात साल कर दिया गया है।
इसमें सरकार का पक्ष है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इन तीनों देशों में अल्पसंख्यकों को अपनी धार्मिक पद्धति, उसके पालन और आस्था रखने में बाधा आती है। इनमें से बहुत से लोग भारत में शरण के लिए आए और वे अब यहीं रहना चाहते हैं। इन लोगों के वीजा या पासपोर्ट की अवधि भी समाप्त हो चुकी है। कुछ लोगों के पास कोई दस्तावेज नहीं है, लेकिन अगर वे भारत को अपना देश मानकर यहां रहना चाहते हैं तो सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है।

वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है, जिन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है। इस हिसाब से यह संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है। केंद्र सरकार ने कहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मुस्लिम राष्ट्र हैं, वहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, इस वजह से उन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता। केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि सरकार दूसरे समुदायों की प्रार्थना पत्रों पर अलग-अलग मामले में गौर करेगी।

जहां तक भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए सरकार द्वारा अनेक सहायता योजनाएं हैं। विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाए तो मानव संसाधन विकास केंद्र की शैक्षिक योजनाओं के तहत शैक्षिक रुप से पिछड़े अल्पसंख्यकों के लिए एरिया इंटेनसिव प्रोग्राम है। इस प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य उन भागों में जहां शिक्षा में पिछड़े हुए अल्पसंख्यक भारी संख्या में रहते हैं, वहां शिक्षा के लिए सुविधा मुहैया कराना। मदरसा शिक्षा को माडर्न बनाने के लिए वित्तीय सहायता, फारसी और अरबी भाषा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को वित्तीय सहायता, अल्पसंख्यकों को प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने के लिए कोचिंग क्लासों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की वित्तीय सहायता, केंद्रीय वक्फ परिषद तकनीकि संस्थानों तथा वोकेशनल कोर्स करने वालों को वजीफा तथा वित्तीय सहायता देती है। इसके साथ ही मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय सहायता योजना है जो पूरी तरह स्वैच्छिक है। इसको वित्तीय सहायता केंद्र सरकार द्वारा प्राप्त है। इस योजना को ग्रहण करना मदरसों की इच्छा पर निर्भर करता है। इसका उद्देश्य प्राचीन संस्थानों जैसे मकतबा, मदरसों में आधुनिक शिक्षा को बढावा देने के लिए वित्तीय सहायता देना है।

सरकार कोई भी हो भारत में सभी अल्पसंख्यकों के हितों एवं अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाता है। बेशक इसके साथ कार्यालयों की लचर व्यवस्था को सुधारे जाने की जरूरत है जिनके चलते अल्पसंख्यकों को अपनी नागरिकता के अधिकारों को सिद्ध करने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसका उदाहरण असम आदि पूर्वोंत्तर क्षेत्रों में देखा जा चुका है, जहां नागरिकता सूची बनाने में भयंकर लापरवाही बरती गई थी। वस्तुतः नागरिकता बिल को ले कर उद्वेलित होने का मूल कारण भी यही है। ऐसी लापरवाहियों को दूर किया किया जाना पहले जरूरी है।
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