Saturday, March 30, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | बे आवारा फिर रए औ खतरा बन रए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

टाॅपिक एक्सपर्ट
बे आवारा फिर रए औ खतरा बन रए
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     जो आवारा की बात चले, सो दो टाईप के आवारा को खयाल मन में आऊत आए- एक तो दो पांव वारे औ दूसरे चार पांव वारे। दो पांव वारन के लाने तो पुलिसई भौत आए, मनो चार पांव वारों में बी पैले आवारा फिरबे वारी गैया-भैंसिया याद आउत आएं। जबके इन दोई से ज्यादा मिलत आएं कुत्ता हरें। बाकी होत का आए के ऐसे आवारा कुत्ता हरों खों देख के दया-सी आन लगत आए। ठीक बी आए के जो अपन ओरें उनें रोटी-मोटी ने ख्वाहें, तो बे तो भूके मर जैहैं। सो आवारा कुत्ता हरों के लाने दया राखने जरूरी आए। पर ईके संगे खुद के लाने सोई दया राखने जरूरी आए। काय से के अपने इते आवारा कुत्ता की संख्या बढ़त जा रई। ईमें डरबे वारी बात जे आए के कभऊं जे आवारा कुत्ता पगला जात आएं। औ इनके काटे से रैबीज नांव को जानलेवा इंफेक्शन हो जात आए। जो सही टेम पे दवा मिल जाए तभईं जान बचत आए, ने तो कटो भओ मानुस सोई पगला जात आए। औ दुख की बात जे आए के पगलाबे वारे के प्रान बच नईं पाऊत आएं।
     जे आवारा कुत्तन के बारे में डरबे वारी बात जे सोई आए के जे ओरें अब जुट्ट बना के फिरत आएं। ईसे होत का आए के जे बछड़ा-मछड़ा खों घेर के काट-कूट लेते आएं। छोटे बच्चा हरन खों सोई काट लेत आएं। सो, आज ई बात की भौतई जरूरत आए के जे आवारा कुत्तन खों को शहर से हटाबे के लाने नगरनिगम औ नगरपालिका कछू ठोस प्रयास करे, ताकि सबई सुरक्षित रए सकें।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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डाॅ. सुश्री शरद सिंह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा सम्मानित

विगत 28 मार्च को मुझे (डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह) साहित्यिक अवदान एवं इतिहास लेखन के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा  "दीवान प्रतिपाल सिंह बुंदेला स्मृति सम्मान 2024" से सम्मानित किया गया। छतरपुर के पर्यटक ग्राम बसारी में डॉ बहादुर सिंह परमार एवं शंकर प्रताप सिंह प्रयासों से विगत 24 वर्ष से सतत जारी बुन्देली विकास संस्थान द्वारा आयोजित बुंदेली उत्सव के 25 वें वार्षिक आयोजन में हुए सम्मान समारोह में राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार, राजनगर विधायक अरविंद पटेरिया, विधायक ललिता यादव, खजुराहो सांसद प्रत्याशी वीडी शर्मा, राजेश शुक्ला, पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह 'मुन्ना राजा', पन्ना विधायक बृजेंद्र प्रताप सिंह, सिद्धार्थ शंकर बुंदेला, कामाख्या प्रताप सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष चंद्रभान सिंह गौतम, किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष बॉबी राजा सहित भाजपा के प्रमुख नेता मौजूद रहे।

     आभारी हूं मेरे शहर की प्रिंट मीडिया की जिन्होंने इस समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया 🙏

Friday, March 29, 2024

शून्यकाल | कबीर और सहज समाधि परम्परा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम "शून्यकाल"

कबीर और सहज समाधि परम्परा
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

       कबीर की प्रासंगिकता कोई नकार नहीं सकता है। कबीर की वाणी कालजयी वाणी है। उन्होंने जिस मानव स्वाभिमान और निडरता का साथ देते हुए, धार्मिक आडंबर ओढ़ने वालों को ललकारा, वैसा साहस आज भी दिखाई नहीं देता है। कबीर ने स्वयं में मनुष्यता को विकसित करने के लिए सहज समाधि का मार्ग सुझाया।
  कबीर का जन्म एक जुलाहा परिवार में हुआ था। वे संत रामानंद के शिष्य बने और ज्ञान का अलख जगाया। कबीर ने किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किए बिना खरी बात कही। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकांड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्तिपूजा आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर ने हिंदू , मुस्लिम सभी समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर के विचार और उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावनअक्षरी और उलटबांसी  में मिलते हैं।
           कबीर ने समाज के साथ-साथ आत्म-उत्थान पर भी बल दिया। आत्म- उत्थान के लिए उन्होंने समाधि के उस चरण को उत्तम ठहराया जिसमें मनुष्य अपने अंतर्मन में झांक सके और अपने अंतर्मन को भलीभांति समझा सके। कबीर ने सहजयान की बहुत प्रशंसा की और इसे सबसे उत्तम कहा। 
       सहज शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है , जिसका अर्थ है 'प्राकृतिक' या जो बिना किसी प्रयास के किया जाए'। समाधि एक गहरी, आनंदमयी और ध्यान की अवस्था है। यानि सहज समाधि ध्यान का तात्पर्य है कि एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें हम आसानी से ध्यान कर सकते हैं। सहज समाधि ध्यान से वास्तविक विश्राम की अनुभूति होती है।
      बौद्ध धर्म म़े धीरे-धीरे तंत्र-मंत्र ने अपना स्थान बना लिया था। वज्रयान में तांत्रिक साधना को स्थान मिला। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार-"बौद्ध धर्म अपने हीनयान और महायान के विकास को चरम सीमा तक पहुंचाकर अब एक नई दिशा लेने की तैयारी कर रहा था, जब उसे मंत्रयान, वज्रयान या सहजयान की संज्ञा मिलने वाली थी।" सिद्धों का संबंध इस वज्रयान से था। उनकी संख्या 84 बताई जाती है। प्रथम सिद्ध 'सरहपा' (8वीं शताब्दी) सहज जीवन पर बहुत अधिक बल देते थे। इन्हें ही सहजयान का प्रवर्तक कहा जाता है। सिद्धों ने नैरात्म्य भावना, कायायोग, सहज, शून्य कथा समाधि की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णन किया है। इन्होंने वर्णाश्रम व्यवस्था पर तीव्र प्रहार किया है। इन्होंने संधा भाषा-शैली में रचनाएं की हैं। संधा भाषा-शैली अर्थात अनुभूतियों का संकेत करनेवाली प्रतीक भाषा का प्रयोग किया। इस भाषा-शैली का उपयोग नाथों ने भी किया है। कबीर आदि निर्गुण संतों कि इसी भाषा शैली को 'उलटबाँसी' कहा गया। 
       कबीर के अनुसार सहज समाधि की अवस्था दुख-सुख से परे परम सुखदायक अवस्था है। जो इस समाधि में रम जाता है वह अपने नेत्रों से अलख को देख लेता है। जो गुरु इस सहज समाधि की शिक्षा देता है वह सर्वोत्तम गुरु होता है -
     संतो, सहज समाधि भली 
     सुख-दुख के इक परे परम, 
    सुख तेहि में रहा समाई ।।

कबीर ने सहज समाधि की विशेषताओं को विस्तार से समझाते हुए कहा है कि इस समाधि को प्राप्त करने के लिए न तो शरीर को तप की आग में तपाने की आवश्यकता होती है और कामवासना में लिप्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होने की। यह समाधि अवस्था उस मधुर अनुभव की भांति है जो इसे प्राप्त करता है, तो वहीं इसकी मधुरता को जान पाता है -
      मीठा सो जो सहेजैं पावा।
     अति कलेस थैं करूं कहावा।।

      कबीर इस तथ्य को स्पष्ट किया कि वस्तुतः सहजसमाधि का नाम तो सभी लेते हैं किंतु उसके बारे में जानते कम ही लोग हैं अथवा सहज समाधि को लेकर भ्रमित रहते हैं। यह तो सामाजिक व्यवस्था है जिसमें हरि की सहज प्राप्ति हो जाती है। कबीर सहज समाधि को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यह कोई आडंबर युक्त क्रिया नहीं है अपितु सहज भाव से जीवनयापन करते हुए राम अथवा हरि में लीन हो जाना ही सहज समाधि है।
   सहज-सहज सब ही कहैं, 
   सहज न चीन्हैं कोई ।
   जिन सहजै हरिजी मिलैं
   सहज कहीजैं सोई ।।

   सहज समाधि के लिए न तो ग्रंथों की आवश्यकता है और न किसी पूजा पाठ की। इसके लिए बस इतना करना पर्याप्त है कि विषय-वासना का त्याग, संतान, धन, पत्नी और आसक्ति से मन को हटा कर "राम" के प्रति समर्पित कर दिया जाए। जो भी ऐसा कर लेता है वह सहजसमाधि में प्रविष्ट हो जाता है। कबीर कहते हैं कि यह तो बहुत सरल है-
     आंख न मूंदौं, कान न रूंधौं
     तनिक कष्ट नहीं धारों । 
    .खुले नैनी पहिचानौं हंसि हंसि 
     सुंदर रूप निहारौं ।।

इस सहज समाधि की अवस्था को पाकर साधक सहज सुख पा लेता है तथा सांसारिक दुखों के सामने अविचल खड़ा रह सकता है। वह न तो स्वयं किसी से डरता है और न किसी को डराता है। यह तो ब्रह्मज्ञान है जो मनुष्य के भीतर विवेक को स्थापित करता है, धैर्य धारण करना सिखाता है और युगों युगों के विश्राम का सुख देता है -
   अब मैं पाईबो रे, पाइबौ ब्रह्मगियान ।
   सहज समाधें सुख मैं रहिबौ 
   कोटि कलप विश्राम ।।

कबीर कहते हैं कि जब मन "राम" में लीन हो जाता है, आसक्ति दूर हो जाती है, चित्त एकाग्र हो जाता है - उस समय मन स्वयं ही भोग की ओर से हटकर योग में प्रवृत्त होने लगता है। यह साधक की साधना की चरम स्थिति ही तो है जिसमें उसे दोनों लोकों का सुख प्राप्त होने लगता है -
एक जुगति एक मिलै, किंवा जोग का भोग ।
इन दून्यूं फल पाइए, राम नाम सिद्ध जोग ।।

सहज समाधि के बारे में कबीर के विचार सिद्धों के सहजयान संबंधी विचार के बहुत समीप हैं। सिद्धों के समय सहज भावना उत्तम और सरल मानी जाती थी। सिद्ध भी यही मानते थे कि घर बार को त्याग कर साधु होना व्यर्थ है यदि त्याग करना है तो सभी प्रकार के आडंबरों का त्याग करना चाहिए। सिद्ध संत गोरखनाथ ने भी सहज जीवन के बारे में यही कहा है कि  "हंसना, खेलना और मस्त रहना चाहिए किंतु काम और क्रोध का साथ नहीं करना चाहिए। ऐसा ही हंसना, खेलना और गीत गाना चाहिए किंतु अपने चित्त की दृढ़तापूर्वक रक्षा करनी चाहिए। साथ ही सदा ध्यान लगाना और ब्रह्म ज्ञान की चर्चा करनी चाहिए।"
    हंसीबा खेलिबा रहिबा रंग, 
    काम क्रोध न करिबा संग । 
    हंसिबा खेलिबा गइबा गीत 
    दिढ करि राखि अपना चीत ।।
   हंसीबा खेलिबा धरिबा ध्यान 
    अहनिस कथिबा ब्रह्म गियान ।
    हंसै खेलै न करै मन भंग 
    ते निहचल सदा नाथ के संग।।

सिद्धों और नाथों की सहज ज्ञान परंपरा की जो प्रवृत्ति कबीर  तक पहुंची उसे कबीर ने आत्मसात किया और उसे सहज समाधि के रूप में और अधिक सरलीकृत किया। जिससे लोग सुगमता पूर्वक उसे अपना सकें। इस संदर्भ में राहुल सांकृत्यायन का यह कथन समीचीन है कि "यद्यपि कबीर के समय तक एक भी सहजयानी नहीं रह गया था फिर भी इन्हीं (पूर्ववर्ती) से कबीर तक सहज शब्द पहुंचा था। जिस प्रकार सिद्ध सहज ध्यान और प्रवज्या से रहित गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए सहज जीवन की प्रशंसा करते हैं वैसे ही कबीर साधु वेश से रहित घर में रहकर जीवन साधना में लीन थे।"
      गोरखनाथ का कहना था कि "सहज समाधि लगाना चाहिए क्योंकि संसार के मध्य एकाकी रहने वाले ही सिद्ध होते हैं। जो दो लोग एक साथ में विचरते हैं वे साधु होते हैं। चार-पांच होने पर कुटुंब और दस-बीस होने पर सेना के रूप में ढल जाते हैं।"
       एकाकी सिघ नाउं, 
       दोई रमति ते साधवा।
       चारि-पांच कुटुंब नाउं,
       दस-बीस ते लसकारा।।

गोरखनाथ की भांति सरहपा भी यही कहते थे कि "जगत सहजानंद से भरा हुआ है अतः नाचो, गाओ, भली प्रकार विलास करो किंतु विषयों में रमण करते हुए उन में लिप्त न होना जैसे पानी निकालते समय पानी को ना छुआ जाए।"

  विसअ रमन्त ण बिसअहिं लिप्पई ।
  उअअ हरन्त ण पाणि च्छुप्पई ।।

संसार में रहकर सांसारिकता के अवगुणों में न डूबना ही सहजसमाधि का मूलमंत्र कहा जा सकता है। सिद्धों के इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कबीर ने कहा है -

साधु ! सहज समाधि भली ।
गुरु प्रताप जा दिन से जागी 
दिन-दिन अधिक चली 
जंह-जंह डोलों सो परिकरमा 
जो कछु करौं सो सेवा 
जब सोवौं तब करो दंडवत 
पूजौं और न देवा 
कहौं तो नाम सुनौं सो सुमिरन 
खावौं पियौं सो पूजा 
गिरह उजाड़ एक सम लेखौं 
भाव मिटावौं दूजा

कबीर ने अपने जीवन में संयम, चिंतन, मनन एवं साधना को अपनाया। उन्होंने सदैव भक्ति का सहज मार्ग ही सुझाया। यह वही सहज मार्ग था जो सिद्धों-नाथों के बाद आडम्बरों की भीड़ में लगभग खो गया था किंतु कबीर ने उसे पुनर्स्थापित किया तथा शांति एवं धैर्यवान जीवन जीने का रास्ता दिखाया।
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Thursday, March 28, 2024

बतकाव बिन्ना की | सबसे नोनों अपनों बुंदेलखंड | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
सबसे नोनों अपनों बुंदेलखंड    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       भैयाजी के इते मैं पौंची तो मैंने देखी कि उते सयाने सरजी बैठे हते। मोय देखतई साथ उन्ने मोसे पूछी-‘‘कां थीं बिन्ना? कुल्ल दिनां से दिखानी नईं।’’
‘‘इतई हती। तनक तबीयत खराब रई सो बाहरे कम निकरी।’’ मैंने सयाने सरजी खों बताओ।
‘‘का हो गओ रओ?’’ उन्ने फेर पूछी।
‘‘अरे, जेई सर्दी-खांसी। आजकाल वायरल फैलो न!’’ मैंने कई।
‘‘हमने सुनी के तुम कहूं बाहरे हो आईं।’’ सयाने सारजी असल बात पे आ गए।
‘‘बाहरे तो नईं, मनो दिल्ली गई रई। उते साहित्य अकादमी को लिटरेचर फेस्टिवल रओ। उतई से लौटत बेरा में तो जा इंफ्ेशन लग गओ। उते रेल के डिब्बा में सबई जने छींक-खांस रए हते। मोय तो तभई समझ में आ गई रई के सागर पौंचत-पौंचत मोय सोई हो जाने। औ बोई भओ।’’ मैंने सयाने सरजी खों बताओ।
‘‘बाकी उते दिल्ली में का दसा आए? उते तो औरई प्रदूषण रैत आए।’’ सयाने सरजी ने पूछी।
‘‘हऔ, कै तो आप ठीक रए। उते तो बरहमेस प्रदूषण रैत आए। बाकी नई दिल्ली में तो चौराहा-मौराहा अच्छे कर दए गए आएं। उते फूलन के पौधा लगा दए गए आएं। तरे-ऊपरे मुतकी सड़कें बन गईं। बाकी हमने एक बात देखी के उते पैदल वारों के लाने तो कोनऊं ठिकानोंई नइयां। सबसे ज्यादा चार पहिया भगत-फिरत दिखात आएं औ दूसरे नंबर पे दो पहिया, मने मोटर सायकिल औ स्कूटरें। औ सबई कछू इत्ती-इत्ती दूरी पे आए के पैदल चलो बी नई जा सकत। मेट्रो औ सिटी बसें ने होंय तो बड़ी मुसकिल हो जाए।’’ मैंने सयाने सरजी से कई।
‘‘औ जब तुम उते गईं रईं तो बे मफलर वारे बाहरे हते के भीतरे बुक हो गए रए?’’ सयाने सरजी ने मुस्कात भए पूछी।
‘‘ऊ टेम पे तो बाहरे हते। मनो मैं उनसे मिलबे के लाने थोड़े गई रई, जो मोय उनको पूरो डिटेल पतो होय।’’ मैंने सयाने सरजी से कई। वैसे सरजी सयाने जेई से तो कहाउत आएं के बे बातकाव करत-करत कऊं से कऊं पौंच जात आएं। आएं तो बे सरकारी मास्टर, बाकी उनके घरवारी के नांव पे चार कोचिंग सेंटर चलत आएं। जेई से तो उनको नांव सयाने सरजी पड़ गओ।
‘‘उते दिल्ली में तुमें का अच्छो लगो?’’ सयाने सरजी ने पूछी।
‘‘कछू नईं। मोय दिल्ली में कभऊं कछू अच्छो नई लगत।’’ मैंने दो-टूक कै दई।
‘‘हैं? ऐसो का? काय अच्छो नईं लगत? इते तो सबरे दिल्ली जाबे खों मरत रैत आएं। औ अब तो जे दसा आए के जोन के मोड़ा-मोड़ी गुरुग्राम में या नोयडा में पौंच गए हैं, बे उते के गुनगान करत नईं थकत आएं। औ तुम कै रईं के तुमें उते कछू अच्छो नईं लगत।’’ सयाने सरजी ने पूछी। उने मोरी बात सुन के भौतई अचरज हो रओ तो।
‘‘सुनो सरजी! दो-चार दिनां खों घूमबे के लाने तो दिल्ली अच्छी आए बाकी रहबे की जो बात होय तो मैं तो जेई कहबी के अपनो बुंदेलखंड से नोनो कहूं नईयां। उते बच्चा हरों खों लाखों को पैकेज मिलत आए, मनो खर्चा करोड़ों को होत आए। उते को स्टेटस मैंटेन करबे की दौड़ में सबरे भैराने से फिरत आएं। जबके अपने इते बड़ी चैन की जिनगी ठैरी। इते तो चार-छै हजार में भी रोटी-पानी चल जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘पर इते कछू विकास कां हो रओ?’’ सयाने सरजी बोले।
‘‘कोन सो विकास चाउने आपके लाने? सड़कें जब चाए तब सुधरत रैत आएं। पानी की पाईपें डारबे के लाने सड़कें खोदत में कोनऊं कभऊं नई हिचकत। मनो काम रुकत नईयां, बरहमेस चलत रैत आए। औ कोन सो विकास चाउने?’’ मैंने हंस के सयाने सरजी से पूछी।
‘‘इते कोनऊं बड़ी इंडस्ट्री नोंईं। इते रेलें कम आएं। बस, एक ठईंयां हवाई अड्डा आए। इते आईटी सेक्टर नईयां।’’ सयाने सरजी अपने बुंदेलखंड की कमियां गिनाउन लगे। बे कै तो सई रै हते, मनो मोय उनकी बात ने पोसाई। कोऊ से बी तुलना कर ली जाए, मोय तो अपनो बुंदेलखंड नोनो लगत आए।
‘‘अच्छा आप जे बताओ के इते अच्छो हवा-पानी आए के नईं? मने औ जांगा के मुकाबले इते प्रदूषण कम आए के नईं?’’ मैंने सयाने सरजी से पूछी।
‘‘हऔ, इते प्रदूषण तो कम आए, मनो...’’ सयाने सरजी ने कई औ बे कछू आगे बोलबे जा रए हते के मैंने उने टोंकी,‘‘मनो का? जो प्रदूषण ने होय तो सेहत अच्छी रैत आए। औ जो सेहत अच्छी होय तो सबू कछू करो जा सकत आए।’’
‘‘तुमाई बात तो सही आए पर जे बी तो सोचो के खाली सेहत से पेट नईं भरत। जीबे के लाने पइसा चाउने परत आए।’’ सयाने सरजी बोले।
‘‘हऔ तो हमने कबे कई के पइसा नईं चाउने। मनो आप जे बी तो देखों के जो किराए के दो कमरा इते चार हजार में मिलत आएं, उते चालीस हजार में मिलत हैं। सो कमाई कां बची?’’ मैंने सयाने सरजी से कई।
‘‘मनो उते की लाईफ अलग आए।’’ अब सयाने सरजी ने दूसरो पैंतरा चलो।
‘‘कोन-सी लाईफ? जो इते सब जने साथ रैते तो अम्मा औ भौजी के हाथ को बनो ताजो भोजन जींमते। मनो उते तो पिज्जा, बर्गर औ चाउमिन खा के जिनगी कट रई। तनक याद करो के आपई ने बताई रई के आपको मोड़ा उते गुरुग्राम में कोनऊं मल्टीनेशनल कंपनी में आए। औ संगे बहू बी उतई काम कर रई। जे आपई ने बताई रई के उनको आॅफिस को टेम अलग-अलग आए। सात दिनां में एक-दो दिनां संगे भोजन कर पाउत आएं। ने तो एक को घरे आउत को टेम होत आए तो दूसरे को काम पे जाबे को टेम होन लगत आए। जब कभऊं संगे रैत आएं तो खाबे के लाने होटलें जाउत आएं औ संगे बियर-मियर पियत आएं। जेई लाईफ की बात कर रए आप? उनकी जे लाईफ में आप के लाने जांगा कां आए?’’ मैंने तनक करई बात पूछ लई।
‘‘हमें उनके संगे रहने ई नोईं। हम तो इतई अच्छे।’’ सयाने सरजी बोल परे।
‘‘काय? आपको उनके संगे नईं रहने के बे आपको अपने संगे ने राखहें? औ जो आपको सोई इतई अच्छो लगत आए तो आप उते की बड़वारी काय कर रए?’’ मैंने तनक औ खरी-खरी कै दई।
‘‘अब हो गई, जान देओ। औ ने गिचड़ों।’’ सयाने सरजी हथियार डारत भए बोले। बे दुखी दिखाई देन लगे। उनकी जा दसा देख के मोय अच्छो नई लगो। मैंने सोई तनक ज्यादई करई बोल दई रई। सो मैंने बात सम्हारी।
‘‘बात गिचड़बे की नोंईं। जा तो बात में बात निकरत गई। मनों जोन को जो लाईफ अच्छी लगत होय, ऊको बोई में रओ चाइए। मैं तो अपनी कै रई हती के मोय तो अपने बुंदेलखंड में अच्छो लगत आए। इते ने तो भागम-भाग, ने तो हाय-तौबा। चैन से कटत चल रई इते जिनगी। इते सबई सबखों चींनत आएं। घरे के दोरे से निकरो तो -कां जा रई बिन्ना?- पूछ लओ करत आएं। जा ठीक आए के कभऊं-कभऊं ऐसो पूछो जानो अच्छो नईं लगत, मनो जो ने पूछो जाए तो ज्यादा बुरौ लगत आए। अपने बुंदेलखंड घांईं लप्सी औ लपटा कां मिल रए? इते घाईं राई औ नौरता कऊं नचत न दिखहें। जा ठीक आए के अपने इते तनक गरीबी आए। इते किसानी कछू अच्छी नईं रैत आए। पर इते के मानुस चंट नोईं, दिल के साफ आएं।’’ मैंने कई।
‘‘सांची कै रईं बिन्ना!’’ अब के भैयाजी बोल परे, जोन अबे लौं हम दोई की बतकाव सुन रै हते।
‘‘औ का भैयाजी! रई तरक्की की बात तो तरक्की सो हुइएई। तनक धीरे-धीरे सई, पर बा तो हो के रैहे। आपई सोचो के एक टेम बा रओ के जब अपन ओरें बिजली औ सड़कों के लाने तरसत्ते। तीन घंटे को रस्ता आठ घंटा में पूरो होत्तो। बिजली कटौती को ऐसो-ऐसो टेम फिक्स करो गओ रओ के आदमी पगला जाए। मनो अब देखो, अपन ओरन खों पूरे टेम बिजली मिल रई। अच्छी सड़कें बन गईं। औ नई-नई बनत जा रई। जे तरक्की नोंई तो औ का आए?’’ मैंने कई।
‘‘मनो बुंदेलखंड राज्य बन जातो तो औ साजो रैतो।’’ सयाने सरजी अपने सयानपना से बाज नई आए औ बोल परे।
‘‘सुनो सरजी! जे फालतू की राजनीति ने करो। जो अच्छो भलो चल रओ ऊको चलन देओ। बुंदेलखंड को जोन इलाको उत्तरप्रदेश में आए, ऊके लाने उते की सरकार करत रैत आए औ जोन इलाको अपने मध्यप्रदेश में आए ऊके लाने अपने इते की सरकार काम करत रैत आए। जे काय नई सोच रै के अपने बुंदेलखंड के लाने दो-दो सरकारें लगी आएं। जो अलग राज्य बन जैहे सो एकई सरकार मिलहे।’’ मैंने सयाने सरजी खों हंस के समझाई।
‘‘बात तो ठीक कै रईं। मान गए तुमाई बात के अपनो बुंदेलखंड सबसे नोनों।’’ सयाने सरजी ने सोई मोरी बात पे ठप्पा लगा दओ।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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चर्चा प्लस | भारतीय रंगमंच और हाशिए में खड़ा हिन्दी का मौलिक नाट्यलेखन | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
भारतीय रंगमंच और हाशिए में खड़ा हिन्दी का मौलिक नाट्यलेखन
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      प्रति वर्ष 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी में नाटकों का मंचन किया जाता है। यद्यपि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में रंगमंचीय संस्कृति सीमित है। जबकि अतीत में सभी हिन्दी भाषी क्षेत्र किसी न किसी रूप में नाट्यविधा से जुड़े रहे हैं, लोकनाट्य विधा ही क्यों न हों। नाटकों का शास्त्रीय मंचन आमतौर पर बड़े मंचों तक सीमित रहा है। यद्यपि पिछले कुछ दशकों में छोटे शहरों में भी मंचन किए जाने लगे हैं किन्तु हिन्दी नाट्य लेखन अपनी न्यूनतम संख्या से उबर नहीं सका है। मंच हैं, नाटक हैं किन्तु हिन्दी नाट्य लेखन हाशिए पर खड़ा है। आखिर क्या कारण है इसका? वस्तुतः हिन्दी साहित्य और रंगमंच की दुनिया में हिन्दी नाट्यालेखन एक गम्भीर विमर्श की बाट देख रहा है।    
हिन्दी नाटकों का उद्भव और विकास हम हमेशा पढ़ते आए हैं किन्तु अब आवश्यकता है उसके भविष्य को पढ़ने की। हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। लगभग उसी दौरान आगाहसन ‘अमानत’ लखनवी के ‘इंदर सभा’ नामक गीति-रूपक का मंचन किया गया। यह बहुत लोकप्रिय हुआ। यद्यपि इसमें मंचीय तत्वों का अभाव था। यह खुले स्टेज पर प्रदर्शित किया जाता था। विद्वानों द्वारा इसे शास्त्रीय दृष्टि से नाटक माना ही नहीं गया। इसी तारतम्य में ‘मदारीलाल की इंदर सभा’, ‘दर्याई इंदर सभा’, ‘हवाई इंदर सभा’ जैसे नाटक सामने आए लेकिन इनमें ऐसा कुछ भी नहीं था जो हिन्दी नाटकों को स्थापना दिला पाता। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इनको ‘‘नाटकाभास’’ कहते थे। उन्होंने इनकी पैरोडी के रूप में ‘बंदर सभा’ लिखी थी।
सन् 1850 ई. से सन् 1868 ई. तक हिन्दी रंगमंच का उदय और प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन पारसी नाटकों के प्रभामंडल के नीचे दबा रहा। हिन्दी नाटकों को सही पहचान भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाटकों से ही मिली। यद्यपि भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के ‘‘विद्यासुंदर’’ नाटक के अनुवाद से हुई। भारतेन्दु के पिता गोपालचन्द्र द्वारा रचित ‘नहुष’ तथा महाराज विश्वनाथसिंह रचित ‘आनंद रघुनंदन’ भी पूर्ण नाटक नहीं थे, न पर्दों और दृश्यों आदि की योजना वाला विकसित रंगमंच ही निर्मित हुआ था। उस समय तक नाट्य मंचन के अधिकतर प्रयास अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुए थे और भाषा का स्वरूप भी हिन्दी-उर्दू का मिश्रित खिचड़ी रूप ही था। हिन्दी के विशुद्ध साहित्यिक रंगमंच और नाट्य-सृजन की परम्परा की दृष्टि से सन् 1868 ई. को रेखांकित किया जा सकता है। भारतेन्दु के नाटक लेखन और मंचीयकरण का श्रीगणेश इसी वर्ष हुआ। इसके पूर्व पात्रों के प्रवेश-गमन, दृश्य-योजना आदि से युक्त कोई वास्तविक नाटक हिन्दी में नहीं रचा गया था। सन् 1868 को पं. शीतलाप्रसाद त्रिपाठी रचित ‘‘जानकी मंगल’’ नाटक का अभिनय ‘बनारस थियेटर’ में आयोजित किया था। कहते हैं कि जिस लड़के को लक्ष्मण का अभिनय पार्ट करना था वह अचानक उस दिन बीमार पड़ गया। लक्ष्मण के अभिनय की समस्या उपस्थित हो गई और उस दिन युवक भारतेन्दु स्थिति को न संभालते तो नाट्यायोजन स्थगित करना पड़ता। भारतेन्दु ने एक-डेढ़ घंटे में ही न केवल लक्ष्मण की अपनी भूमिका याद कर ली। इस नाटक से भारतेन्दु ने रंगमंच पर सक्रिय भाग लेना आरम्भ किया। इसी समय उन्होंने नाट्य-सृजन भी आरम्भ किया।
भारतेन्दु ने सन् 1868 ई. से सन् 1885 ई. तक कई नाटकों का सृजन किया, कई नाटकों में स्वयं अभिनय किया, अनेक रंगशालाएं निर्मित कराईं और हिन्दी रंगमंच को एक स्थापना दी। 20 वीं शताब्दी के तीसरे दशक में सिनेमा के आगमन के पारसी रंगमंच नेपथ्य में चला गया। इसी दौरान एकांकी का चलन भी बढ़ा जो समय, स्थान और पात्रों की न्यूनता में भी खेले जा सकते थे। इसके सहारे हिन्दी रंगमंच ने स्कूल-काॅलेज में अपना स्थान बना लिया। हिन्दी के नाटककार डॉ. राम कुमार वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क, सेठ गोविन्द दास, जगदीशचन्द्र माथुर, माहन राकेश आदि ने नाटक एवं एकांकी दोनों का लेखन किया।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अतिरिक्त हिन्दी के जो नाटककार सर्वाधिक चर्चित रहे उनमें थे- जयशंकर प्रसाद, जगदीशचंद्र माथुर, लक्ष्मीनारायण लाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रामकुमार वर्मा, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, स्वदेश दीपक, नंदकिशोर आचार्य, मणि मधुकर, हरिकृष्ण प्रेमी, भीष्म साहनी, उपेंद्रनाथ अश्क आदि। इनके लिखे नाटक राष्ट्रीय स्तर के रंगमंचों पर खेले गए। हिन्दी के अनेक नाटकों ने लेाकप्रियता हासिल की। लेकिन हिन्दी क्षेत्रों में विदेशी नाटकों का हिन्दी नाट्य रूपांतर अपनी धाक जमाता चला गया। ऐसा क्यों हुआ, यह एक शोध का विषय हो सकता है। रंगमंच से जुड़े कई मनीषी मेरी इस बात से असहमत हो सकते हैं किन्तु असहमति के पक्ष में क्या इतने नाम गिनाए जा सकते हैं जितने बीसवीं सदी के मध्य तक हिन्दी नाट्य लेखन में नामों की संख्या थी? बीसवीं सदी के उत्तर्रार्द्ध एवं 21 वीं सदी के इस पहले चैथाई हिस्से में हिन्दी के मौलिक नाटकों की गिनती कम हुई है। पूर्व लिखे हिन्दी नाटकों के साथ विदेशी नाटकों अथवा विदेशी कथानकों के नाट्य रूपांतर का मंचन बढ़ा। विशेषरूप से उन छोटे शहरों में जहां हिन्दी नाटकों एवं हिन्दी रंगमंच की संस्कृति को चलन में लाने का प्रयास किया गया। विदेशी भाषाओं के नाटकों एवं कथानकों का हिन्दी रूपांतरण सप्रयास हिन्दी भाषी क्षेत्र के वातावरण में ढाल कर प्रस्तुत किए जाने के बावजूद उनकी छाप दर्शकों के मन पर गहरा नहीं सकी।
इस विडंबना पर प्रहार करने का एक उम्दा प्रयास किया फिल्म और रंगमंच के कलाकार एवं रंगकर्मी गोविंद नामदेव ने जब उन्होंने ‘‘मधुकर को कटक’’ नामक नाटक लिखा और उसका मंचन भी किया। वर्ष 2013 में फिल्म अभिनेता गोविंद नामदेव ने एक माह की वर्कशॉप लगाकर कलाकारों में अभिनय एवं प्रस्तुति का नया जोश भरा। बुंदेलखंड के नायक माने जाने वाले राजा मधुकर शाह के संघर्ष को अपने नाटक की मूल पटकथा बनाया। यह नाटक अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इसके मंचन के बाद लगा कि मंच पर स्थानीय प्रसंगों, गौरव, समस्याओं एवं विसंगतियों को स्थान मिलेगा किन्तु कुछेक उदाहरण छोड़ दिए जाएं, तो ऐसा प्रभावी ढंग से नहीं हुआ। इसके दो कारण समझ में आते हैं, पहला तो यह कि निर्देशक एवं प्रस्तुतिकर्ता स्थानीय प्रसंगों के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाता है। और दूसरा कारण कि वह अपने आप-पास मौजूद हिन्दी नाट्य लेखकों का उचित आकलन नहीं कर पाता है। यदि तीसरा कारण कोई और भी है तो उसे ले कर निर्देशकों को खुल कर बात करनी चाहिए। ‘‘मधुकर को कटक’’ एक उदाहरण के रूप में यहां उल्लेख किया गया है। ऐसा नहीं है कि छुटपुट प्रयास नहीं किए गए लेकिन वे इतने प्रभावी नहीं रहे कि हिन्दी नाट्य लेखन को बढ़ावा दे सकें।
   अब बात आती है हिन्दी क्षेत्रों में नाट्य लेखन के प्रति कम रुझान की तो सबसे प्रमुख बात है कि यदि लिखे गए नाटकों को मंच न मिले तो कोई लेखक नाटक लिखे ही क्यों? यानी मंच और हिन्दी लेखकों के बीच एक ‘गैप’ है जो बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में बढ़ता चला गया है। हिन्दी नाटकों की वह संख्या क्यों नहीं दिखाई देती है जो भारतेन्दु युग में थी जबकि वह उदयकाल था। जबकि उस समय हिन्दी क्षेत्रों का दर्शक रामलीला, नौटंकी और स्वांग के अधिक करीब था। अब जब कि दर्शक का रुझान नाटकों की ओर रहने लगा है तथा लोकनाटक की विधाएं सिमट गई हैं, फिर भी हिन्दी नाटकों की संख्या अत्यंत सीमित है। जबकि यही वह समय है जब हिन्दी के मौलिक नाटकों के लिए एक अच्छी ज़मीन तैयार हो सकती है।
आज जिन नाटकों का मंचन किया जाता है उनके मुख्यतः चार प्रकार हैं- कॉमेडी, ट्रेजेडी, ट्रेजिकोमेडी और मेलोड्रामा। सभी में प्रस्तुति का पर्याप्त स्थान है। आज साहित्य की जितनी भी विधाएं हैं जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, संस्मरण आदि उपस्थित हैं इन सब में नाटक की संख्या न्यूनता पर चल रही है। जबकि नाटक अपने-आप में एक चुनौती भरी किन्तु रोचक विधा है। यह साहित्य की सभी विधाओं को अपने भीतर स्थान देती है। एक नाटक में कथा होती है, संवाद होते हैं, काव्य होता है। साथ ही यह प्रदर्शनकारी विधा है अतः इसमें अभिनय, ध्वनि, संगीत, वस्त्रसज्जा, मंच सज्जा, प्रकाश योजना आदि विविध आयाम समाए रहते हैं। यह भी माना जाता है कि सिनेमा ने और बाद में टेलीविजन ने रंगमंच को सीमित किया है। एक सीमा तक यह सच है किन्तु यह भी सच है कि रंगमंच आज भी अपनी कलात्मक उपादेयता के साथ उपस्थिति बनाए हुए है। रंगमंच के दर्शक आज भी मौजूद हैं। लेकिन अन्य भाषाओं की अपेक्षा हिन्दी में बहुत कम नाटककार सामने आ रहे हैं। इसके कारणों को जांचना जरूरी है।
नाटक हमारी साहित्यिक परम्परा की अभिन्न विधा है। साहित्य की दुनिया ने हिन्दी नाटकों को रंगमंच से मिली उदासीनता के हवाले कर दिया है और रंगमंच की दुनिया हिन्दी की अपेक्षा विदेशी  नाटकों एवं कथानकों का सहारा लेकर अपना रास्ता तय कर रही है। जबकि वहीं दूसरी ओर हिन्दी साहित्य और रंगमंच की दुनिया में हिन्दी नाट्यालेखन एक गम्भीर विमर्श की बाट देख रहा है। इस विषय पर आत्ममंथन एवं आत्मचिंतन से आगे बढ़ कर एक साथ बैठ कर मनन करने की आवश्यकता है। तभी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी नाटकों को पुनःस्थापना मिल पाएगी।      
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Monday, March 25, 2024

Saturday, March 23, 2024

अपनी पुस्तक के पाठक के साथ डॉ (सुश्री) शरद सिंह

14 मार्च 2024 को एक ख़ूबसूरत  पल आया जब मैं टहलती हुई उस ओर जा पहुंची जहां साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की प्रदर्शनी लगी थी... मैंने देखा कि दो पाठक मेरी पुस्तक "बुंदेली लोककथाएं" अपने हाथों में लिए हैं... मैंने उनमें से एक से पूछा "आप बुंदेलखंड के हैं?" तो उस व्यक्ति ने जवाब दिया "नहीं, हम ओड़ीसा के हैं।" 
     उसका उत्तर सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। फिर उस व्यक्ति ने बताया कि वह हिंदी जानता है तथा विभिन्न क्षेत्रों के लोक जीवन के बारे में जानना चाहता है। जब उसे यह पता चला कि यह किताब मेरी है तो उसने तुरंत हस्ताक्षर के लिए किताब मेरे आगे बढ़ा दी। एक अहिंदी भाषी का हिंदी क्षेत्र की लोकसंस्कृति के प्रति यह प्रेम देखकर मेरा मन भावुक हो उठा ... सचमुच लोक संस्कृति में व्यक्तियों को परस्पर जोड़ने की क्षमता होती है....🚩
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इते की होली उते जैसी नोईं
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     होली को हुल्लड़ होय औ राधा-कृष्ण की होली खों याद ने करो जाए, भला जे कैसे हो सकत? उते ब्रज में कन्हैया होली के बहाने राधारानी खों सताउत्ते। होली को कोनऊं गीत चाए लोकगीत उठा के देख लेओ, जेई सीन मिलहे के बेचारी राधारानी कृष्ण से बिनती कर रईं के , “मोपे रंग ने डारो सांवरे!” मने उते ब्रज वारी राधारानी कृष्ण से बचती-बचातीं, लुकी-लुकी फिरबे की कोसिस करती दिखातीं आएं। पर अपने सागरे की राधारानियां डराबे वारों में नोईं। बे तो उल्टे कृष्ण लला खों चुनौंती देत रईं हतीं। जो ऐसो ने होतो तो सागर के अपने महाकवि पद्माकर जे कैसे लिखते के-
फाग के भीर अभीरन में गहि 
गोबिंदैं लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की ‘पद्माकर’
ऊपर नाइ अबीर की झोरी।
मने राधारानी ने भरी भीड़ में से कृष्ण खों खैंचों औ भीतरे खचोड़ ले गईं। औ अपने मन की करत भई उनपे झोरी भर अबीर उलट दओ। सो, बे उते ब्रज की राधा लुकाए फिर रईं, इते सागर की राधा कृष्ण खों मजा चखाए दे रईं। इत्तई नई, उन्ने कृष्ण को पीतांबर कम्मर से खैंच लऔ औ गाल पे जम के गुलाल मल दओ-
छीन पितंबबर कम्मर तें 
सु बिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी।
जो कृष्ण घबरा के भगन लगे सो राधारानी बोलीं-
नैन नचाइ कही मुसकाइ 
लला फिरि आइयौ खेलन होरी॥
सो जे रई अपने सागर की होली। सो, ने तो इते की राधारानी ब्रज की जैसीं डरात रईं औ ने इते की होली उते जैसी रई। संगे जे औ ध्यान राखियो के महाकवि पद्माकर ने रोरी मने सूको रंग-गुलाल कपोलन पे मीड़बे की बात कई आए, पानी वारे रंग की नोईं। सो, सूकी होली खेलियो, औ कोनऊं ज्यादई रार करे सो ऊको रंगे बिगैर ने छोड़ियो। सो, सबई जने खों हैप्पी होली !!!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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चित्रा मुद्गल जी एवं मैत्रेयी पुष्पा जी से डॉ (सुश्री) शरद सिंह की आत्मीय भेंट

14 मार्च 2024 की शाम बहुत विशेष रही... महेश भारद्वाज जी के सौजन्य से आदरणीया चित्रा मुद्गल जी और आदरणीया मैत्रेयी पुष्पा जी से भेंट हुई। ... दोनों की अपनत्व भरी गर्मजोशी प्रभावित करती है...
     चित्रा जी की पुत्रवधू शैली मुद्गल जी से भी मुलाक़ात हुई। वे बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। सुखद लगा उनसे मिल कर।😊

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डॉ (सुश्री) शरद सिंह की साहित्य अकादमी के साहित्योत्सव में अन्य साहित्यकारों से भेंट

14 मार्च 2024 ... कहानीपाठ के मेरे सत्र के उपरांत लाउंज में चंद्रकांता जी से चर्चाएं हुईं ... विशाखापत्तनम की प्रो. शेषा रत्नम भी हमसे आ जुड़ीं... सीधी के मिश्र जी ... कई परिचित, नवपरिचित साहित्यकारों से चर्चाएं ... परस्पर संवाद का माहौल ... 
फिर वेन्यू से बाहर निकल कर आदरणीय शिवनारायण जी के सौजन्य से एक प्रतिभावान ऊर्जावान कवयित्री अंजू रंजन जी ( Anju Ranjan ) से उनके कार्यालय में  सुखद भेंट हुई।
     साहित्यिक समारोह विमर्श और परिचय दोनों का दायरा बढ़ाते हैं...
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह का साहित्य अकादमी के विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव में कहानीपाठ, 14.03.2024


14 मार्च 2024 को साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव में "बहुभाषी कहानी-पाठ" सत्र का आरम्भ मेरे कहानीपाठ से ही हुआ... अन्य कहानीकार थे - मो. अमीन भट (कश्मीरी), विजय नायक (ओड़िआ), मदन गोपाल लढ़ा (राजस्थानी) तथा एम. नरेंद्र (तेलुगु)। 
    अध्यक्षता की वरिष्ठ कथाकार चंद्रकांता जी ने। 
     अलग ज़मीन, अलग क्षेत्र, अलग कथानक... लेकिन इन सब को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहा था कथा लेखन...
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