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Wednesday, May 22, 2019

चर्चा प्लस ..22 मई विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस पर विशेष : हम तेजी से खो रहे हैं अपनी जैव विविधता - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ..22 मई विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस पर विशेष :

हम तेजी से खो रहे हैं अपनी जैव विविधता
- डॉ. शरद सिंह


जब देश के सबसे बड़े गणतंत्र के चुनावों के पहले परिणाम घोषित होने की घड़ी करीब आ गई हो तो भला किसे याद रहेगा विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस? शायद चंद प्रकृतिविद एवं पर्यावरणचिंतकों को ही यह दिवस याद रहेगा। जबकि जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की मौजूदगी का वह महत्वपूर्ण पक्ष है जो पृथ्वी को जीवन के योग्य बनाए हुए है। भारत में 450 प्रजातियां संकटग्रस्त अथवा विलुप्त होने की कगार पर हैं। लगभग 150 स्तनधारी एवं 150 पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है, और कीटों की अनेक प्रजातियां विलुप्ति-सूची में दर्ज़ हो चुकी हैं। ये आंकड़े जैव विविधता पर मंडराते संकट को दिखाते हैं। यह हमें समझना ही होगा कि इस जैव विविधता को बचाना मानव जीवन को बचाने के लिए जरूरी है। 

 
चर्चा प्लस ..22 मई विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस पर विशेष : हम तेजी से खो रहे हैं अपनी जैव विविधता - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus -  Hum Teji Se Kho Rahe Hain Apni Jaiv Vividhta -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh

       बड़ी विचित्र-सी बात लगती है न कि मुंबई के बाहरी इलाके में नई बसाई गई बस्तियों में रात को तेंदुआ घूमता है। पर यह सच है। इसकी स्वयं नेशनल जियोग्राफिक सोसायटी की टीम ने वीडियोग्राफी की। जंगलों के निकट बसे गांवों और शहरों में वन्यपशुओं के घुस आने की अनेक घटनाएं आए दिन सामने आती हैं। अभी हाल ही में यानी इसी मई माह के पहले सप्ताह में कालेमुंह के वानरों का एक पूरा झुंड सागर जिला मुख्यालय के मकरोनिया उपनगर में उन कॉलोनियों से हो कर गुज़रा जहां कभी वानरों का प्रकोप नहीं रहा। चूंकि आधुनिक कॉलोनियों में फलदारवृक्षों का अभाव रहता है तथा छत या अांगन में भी खाने-पीने की वस्तुएं नहीं मिल पाती हैं अतः वह वानर-झुंड कॉलोनी के इलाके में रुका नहीं। छतों पर से होता हुआ आगे कहीं चला गया। निःसंदेह इस झुंड की यात्रा वहां जा कर थमी होगी जहां इन्हें खाना-पानी मिला होगा। उनका इस तरह शहर के भीड़ भरे इलाके से हो कर गुजरना इस बात का सबूत था कि उन वानरों का निवास या तो जंगल काटे जाने से उजड़ गया है या फिर उनके इलाके में उनके लिए भोजन और पानी समाप्त हो चुका है। मूल समस्या यह है कि शहरों में इनके लिए कोई जगह नहीं है और ये अपने प्राकृतिक आवास को खोते जा रहे हैं। इस प्रकार ये वानर कब तक जीवन संघर्ष में सफल होते रहेंगे? यदि वानर अथवा कोई भी वन्य पशु अथ्वा पक्षी विलुप्ति की कगार पर पहुंचता है तो यह मानना चाहिए कि पृथ्वी पर जीवन की एक कड़ी टूट कर नष्ट हो जाती है। कल्पना करिए कि पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रकार के जीव एवं वनस्पतियां मोती की माला के मोती हैं तो मानव उस माला का लॉकेट है। माला के टूटने और मोतियों के बिखरने से लॉकेट का अस्तित्व भी नहीं रहेगा।
धरती पर मौजूद जंतुओ और पौधों के बीच के संतुलन को बनाए रखने के लिए अतंर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 22 मई को मनाया जाता है। इसे ’विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस’ भी कहते है। प्रतिवर्ष सम्पूर्ण विश्व में 22 मई’ को मनाया जाता है। यह एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रारंभ किया था। इस वर्ष की थीम रखी गई है-‘अवर बायोडायवर्सिटी, अवर फूड, अवर हेल्थ’। जैव विविधता सभी जीवों एवं पारिस्थितिकी तंत्रों की विभिन्नता एवं असमानता को कहा जाता है। 1992 में ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो में हुए जैव विविधता सम्मेलन के अनुसार जैव विविधता की परिभाषा इस प्रकार है- ‘‘धरातलीय, महासागरीय एवं अन्य जलीय पारिस्थितिकीय तंत्रों में उपस्थित अथवा उससे संबंधित तंत्रों में पाए जाने वाले जीवों के बीच विभिन्नता जैवविविधता है।’’
प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में जैव विविधता का महत्व देखते हुए ही जैव विविधता दिवस को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। नैरोबी में 29 दिसंबर, 1992 को हुए जैव विविधता सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया था, किंतु कई देशों द्वारा व्यावहारिक कठिनाइयां जाहिर करने के कारण इस दिन को 29 मई की बजाय 22 मई को मनाने का निर्णय लिया गया। इसमें विशेष तौर पर वनों की सुरक्षा, संस्कृति, जीवन के कला शिल्प, संगीत, वस्त्र-भोजन, औषधीय पौधों का महत्व आदि को प्रदर्शित करके जैव विविधता के महत्व एवं उसके न होने पर होने वाले खतरों के बारे में जागरूक करना है।
जैव विविधता का संरक्षण और उसका टिकाऊ उपयोग, पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ विकास के लिये महत्वपूर्ण है। विभिन्न प्रकार के जीवों की अपनी अलग-अलग भूमिका है, जो प्रकृति को संतुलित रखने तथा हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने, तथा सतत् विकास के लिये संसाधन प्रदान करने में अपना योगदान करती है। जैव विविधता का वाणिज्यिक महत्व, भोजन, औषधियां, ईंधन, औद्योगिक कच्चा माल, रेशम, चमडा, ऊन आदि से हम सब परिचित हैं। इसके पारिस्थितिकी महत्व के रूप में खाद्य श्रृंखला, मृदा की उर्वरता को बनाये रखना, जैविक रूप से सड़ी-गली चीजों का निपटान, भू-क्षरण को रोकने, रेगिस्तान का प्रसार रोकने, प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाने एवं पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने में के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा जैव विविधता का सामाजिक, नैतिक तथा अन्य प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष महत्व है, जो हमारे लिये महत्वपूर्ण है।
वैश्विक नेताओं ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को एक जीवित ग्रह सुनिश्चित करते हुए वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के लिए ’सतत विकास’ की एक व्यापक रणनीति पर सहमति व्यक्त की थी। 193 सरकारों ने इस पर हस्ताक्षर किए गए थे। अतंरराष्ट्रीय जैव-विविधता संरक्षण का उद्देश्य ऐसे पर्यावरण का निर्माण करना है, जो जैव विविधता में समृद्ध, टिकाऊ और आर्थिक गतिविधियों के लिए अवसर प्रदान कर सके। जैव विविधता का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के जीव−जंतु और पेड़-पौधों का अस्तित्व धरती पर एक साथ बनाए रखने से होता है। इसकी कमी से बाढ़, सूखा और तूफान आदि जैसी प्राकृतिक आपदा का खतरा बढ़ जाता है। पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखने तथा खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में भी जैव विविधता की अहम भूमिका होती है। इसलिए हमे प्रकृति से उपहार के रूप में मिले पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, महासागर, समुद्र, नदिया आदि का संरक्षण करना चाहिए।
पृथ्वी पर लाखों प्रजाति के जीव व वनस्पति उप्लब्ध हैं। इन सबकी विशेषता एवं आवास विविध हैं, फिर भी यह आपस मे प्राकृतिक कड़ियों से जुड़े हैं। संक्षेप में हम इसे वैश्विक जैव विविधता मान सकते हैं। मानव के कारण पर्यावरण में हो रहे बदलाव के कारण इनकी कड़ियां टूट रही हैं, जो कि चिन्ता का विषय है। विश्व के समृद्धतम जैव विविधता वाले 17 देशों में भारत भी सम्मिलित है, जिनमें विश्व की लगभग 70 प्रतिशत जैव विविधता विद्यमान है। अन्य 16 देश हैं- ऑस्ट्रेलिया, कांगो, मेडागास्कर, दक्षिण अफ़्रीका, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, पापुआ न्यू गिनी, फिलीपींस, ब्राज़ील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, मेक्सिको, पेरू, अमेरिका और वेनेजुएला। संपूर्ण विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत भाग ही भारत में है, लेकिन यहां विश्व के ज्ञात जीव जंतुओं का लगभग 5 प्रतिशत भाग निवास करता है। ’भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण’ एवं ’भारतीय प्राणी सर्वेक्षण’ द्वारा किये गये सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में लगभग 49,000 वनस्पति प्रजातियां एवं 89,000 प्राणी प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत विश्व में वनस्पति-विविधता के आधार पर दसवें, क्षेत्र सीमित प्रजातियों के आधार पर ग्यारहवें और फसलों के उद्भव तथा विविधता के आधार पर छठवें स्थान पर है। वैसे भारत जैव विविधता संरक्षण का प्रबल पक्षकार है।

विश्व के कुल 25 जैव विविधता के सक्रिय केन्द्रों में से दो क्षेत्र पूर्वी हिमालय और पश्चिमी घाट, भारत में है। जैव विविधता के सक्रिय क्षेत्र वह हैं, जहां विभिन्न प्रजातियों की समृद्धता है और ये प्रजातियां उस क्षेत्र तक सीमित हैं। भारत में 450 प्रजातियों को संकटग्रस्त अथवा विलुप्त होने की कगार पर दर्ज किया गया है। लगभग 150 स्तनधारी एवं 150 पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है, और कीटों की अनेक प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। ये आंकड़े जैव विविधता पर निरंतर बढ़ते खतरे की ओर संकेत करते हैं। यदि यही दर बनी रही तो वर्ष 2050 तक हम एक तिहाई से ज्यादा जैव विविधता खो सकते हैं। जैव विविधता को कई कारणों से नुकसान हो रहा है। इसमें मुख्य है, आवास की कमी, आवास विखंडन एवं प्रदूषण, प्राकृतिक एवं मानवजन्य आपदायें, जलवायु परिवर्तन, आधुनिक खेती, जनसंख्या वृद्धि, शिकार और उद्योग एवं शहरों का फैलाव। अन्य कारणों में सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव, भू-उपयोग परिवर्तन, खाद्य श्रृंखला में हो रहे परिवर्तन, तथा जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी इत्यादि है। जैव विविधता का संरक्षण करना मानवजीवन के अस्तित्व के लिये आवश्यक है। भारत को विश्व के उन 12 देशों मे शमिल किया जाता है जो सर्वाधिक जैव विविधता वाले देश हैं। पक्षियों की दृष्टि से भारत का स्थान दुनिया के दस प्रमुख देशों में आता है। भारतीय उप महाद्वीप में पक्षियों की 176 प्रजातियां पाई जाती हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले 1235 प्रजातियों के पक्षी भारत में हैं, जो विश्व के पक्षियों का 14 प्रतिशत है।
गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों ही नहीं, जंगलों से खत्म हो गए। 99 प्रतिशत लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया। 1997 में रेबीज से पूरी दुनिया के 50 हजार लोग मर गए। भारत में सबसे ज्यादा 30 हजार लोग मारे गए। तब स्टेनफोर्ट विश्व विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि गिद्धों की संख्या में अचानक कमी के कारण ऐसा हुआ। वहीं दूसरी तरफ चूहों और कुत्तों की संख्या में एकाएक वृद्धि हुई। अध्ययन में बताया गया कि पक्षियों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण भी काफ़ी हद तक प्रभावित हुआ। अमेरिका जैसा पूंजीवादी और प्रगतिशील देश चमगादड़ों को संरक्षित करने का हर संभव उपाय कर रहा है। यदि हम सोचते हैं कि चमगादड़ तो पूरी तरह बेकार हैं तो हमारी यह सोच गलत है क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार चमगादड़ मच्छरों के लार्वा खाता खाते हैं और मनुष्य को मच्छरों से होने वाली अनेक बीमारियों से बचाते हैं।

यदि जंगल नहीं होगा तो वन्यपशु-पक्षी नहीं होंगे, पशु-पक्षी नहीं होंगे तो हानिकारक कीटाणु हमें क्षति पहुंचाते रहेंगे। जंगल नहीं रहेगा तो पानी भी समाप्त होता जाएगा और यदि नन्हें पक्षी नहीं रहेंगे तो जंगलों की संतति थमने लगेगी। सभी एक-दूसरे से परस्पर पूरक के समान जुड़े हुए हैं। इसीलिए जल, थल, वायु कभी स्थानों के जीवों का अपने-अपने स्थान पर होना आवश्यक है। इसे सरल शब्दों यही कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर मानव जीवन के भविष्य के लिए हर एक जीव जरूरी है और इसके लिए जरूरी है जैव विविधता का बना रहना।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 22.05.2019)
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Wednesday, April 10, 2019

चर्चा प्लस ... अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां
- डॉ. शरद सिंह
नवरात्रि... वे नौ दिन जब देवी दुर्गा के नौ रूपों की अनुष्ठानपूर्वक स्तुति की जाती है... देवी दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... स्त्रियों द्वारा पूरे अनुष्ठान के साथ मनया जाता है यह नौ दिवसीय पर्व। फिर भी आज स्त्री प्रताड़ित है। क्योंकि उसे अपने भीतर की दुर्गाशक्ति का पता ही नहीं है। देवी दुर्गा जिस स्त्री-साहस का प्रतीक हैं उस साहस को अपने भीतर जगाना होगा प्रत्येक स्त्री को, तभी सही अर्थ में सार्थक होगा नवरात्रि का अनुष्ठान।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मनाः।।
 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह
 नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह अपने आप में प्रेरणादायक है। विडम्बना यह कि इन रूपों में निहित शक्तियों को सिर्फ़ धार्मिक दृष्टि से देखा और ग्रहण किया जाता है। इसलिए तो स्त्रियां शक्ति की पूजा तो करती हैं मगर अपने भीतर की शक्ति को पहचान नहीं पाती हैं। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी दहेज हत्या तो कभी। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर सभी को दुख होता है। लेकिन सिर्फ़ शोक करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। दुर्गा के नौ रूपों की नौ कथाओं की यदि व्यवहारिक व्याख्या की जाए तो प्रत्येक कथा का सार यही मिलता है कि स्त्री में वह क्षमता है कि वह अपनी रक्षा तो कर ही सकती है बल्कि पूरे समाज की रक्षा कर सकती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दुर्गा के नौ रूपों की नौ कथाएं इस प्रकार हैं-
महाकाली - कथा के अनुसार विष्णु जी के कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो राक्षसों की उत्पत्ति हुई। मधु और कैटभ, ब्रह्मा को देख उन्हें अपना भोजन बनाने के लिए दौड़े। ब्रह्मा जी ने भयग्रस्त हो कर विष्णु जी स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी की स्तुति से विष्णु भगवान की आंख खुल गई और उनके नेत्रों में वास करने वाली महामाया वहां से लोप हो गई। विष्णु जी के जागते ही मधु-कैटभ उनसे युद्ध करने लगे। यह युद्ध पांच हजार वर्षों तक चला था। अंत में महामाया ने महाकाली का रुप धारण किया और दोनों राक्षसों की बुद्धि को बदल दिया। ऐसा होने पर दोनों असुर भगवान विष्णु से कहने लगे कि हम तुम्हारे युद्ध कौशल से बहुत प्रसन्न है। तुम जो चाहो वह वर मांग सकते हो। भगवान विष्णु बोले कि यदि तुम कुछ देना ही चाहते हो तो यह वर दो कि असुरों का नाश हो जाए। उन दोनों ने तथास्तु कहा और उन महाबली दैत्यों का नाश हो गया।
महालक्ष्मी - दैत्य महिषासुर ने अपने बल से सभी राजाओं को परास्त कर पृथ्वी और पाताल लोक पर अपना अधिकार कर लिया था। अब वह स्वर्ग पर अधिकार चाहता था। उसने देवताओं पर आक्रमण कर दी। देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु तथा शिवजी से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर दोनों के शरीर से एक तेज पुंज निकला और उसने महालक्ष्मी का रुप धारण किया। इन महालक्ष्मी ने महिषासुर का अंत किया और देवताओं को दैत्यों के कष्ट से मुक्ति दिलाई।
चामुण्डा देवी - शुम्भ व निशुम्भ नामक दो असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवताओं ने भगवान विष्णु को याद किया और उनसे प्रार्थना की। उनकी इस प्रार्थना और अनुनय से विष्णु भगवान के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो चामुण्डा के नाम से प्रसिद्ध हुई। देखने में वह बहुत सुंदर थी और उनकी सुंदरता देख कर शुम्भ-निशुम्भ ने सुग्रीव नाम के अपने एक दूत को देवी के पास भेजा कि वह उन दोनों में से किसी एक को अपने वर के रुप में स्वीकार कर ले। देवी ने उस दूत को कहा कि उन दोनों में से जो उन्हें युद्ध में परास्त करेगा उसी से वह विवाह करेगी। दूत के मुंह से यह समाचार सुनकर उन दोनो दैत्यों ने पहले युद्ध के लिए अपने सेनापति धूम्राक्ष को भेजा जो अपनी सेना समेत मारा गया। उसके बाद चण्ड-मुण्ड को भेजा गया जो देवी के हाथों मारे गए। उसके बाद रक्तबीज लड़ने आया। रक्तबीज की एक विशेषता यह थी कि उसके शरीर से खून की जो भी बूंद धरती पर गिरती उससे एक वीर पैदा हो जाता था। देवी ने उसके खून को खप्पर में भरकर पी लिया। इस तरह से रक्तबीज का भी अंत हो गया। अब अंत में शुम्भ-निशुम्भ लड़ने आ गए और वह भी देवी के हाथों मारे गए।
योगमाया - जब कंस ने देवकी और वासुदेव के छः पुत्रों को मार दिया तब सातवें गर्भ के रुप में शेषनाग के अवतार बलराम जी आए और रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित होकर प्रकट हुए। उसके बाद आठवें गर्भ में श्रीकृष्ण भगवान प्रकट हुए। उसी समय गोकुल में यशोदा जी के गर्भ से योगमाया का जन्म हुआ। वासुदेव जी कृष्ण को वहां छोड़कर योगमाया को वहां से ले आए। कंस को जब आठवें बच्चे के जन्म का पता चला तो वह योगमाया को पटककर मारने लगा लेकिन योगमाया उसके हाथों से छिटकर आकाश में चली गई और उसने देवी का रुप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने कृष्ण के हाथों योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस का संहार किया।
रक्तदंतिका - बहुत समय पहले की बात है वैप्रचिति नाम के असुर ने पृथ्वी व देवलोक में अपने कुकर्मों से आतंक मचा के रखा था। उसने सभी का जीना दूभर कर दिया था। देवताओं और पृथ्वीवासियों की पुकार से देवी दुर्गा ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया। देवी ने वैप्रचिति और अन्य असुरों का रक्तपान कर के मानमर्दन कर दिया। देवी के रक्तपान करने उनका नाम रक्तदन्तिका पड़ गया।
शाकुम्भरी देवी - प्राचीन समय में एक बार पृथ्वी पर सौ वर्षों तक बारिश ना होने से भयंकर सूखा पड़ गया। चारों ओर सूखा ही सूखा था और वनस्पति भी सूख गई थी जिससे सभी ओर हाहाकार मच गया। सूखे से निपटने के लिए ऋषि-मुनियों ने वर्षा के लिए भगवती देवी की उपासना की। उनकी स्तुति से मां जगदम्बा ने शाकुम्भरी के नाम से पृथ्वी पर स्त्री रुप में अवतार लिया। उनकी कृपा हुई और पृथ्वी पर बारिश पड़ी। मां की कृपा से सभी वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को जीवन दान मिला।
श्रीदुर्गा देवी - प्राचीन समय में दुर्गम नाम का एक राक्षस हुआ जिसके प्रकोप से पृथ्वी, पाताल और देवलोक में हड़कम्प मच गया। इस विपत्ति से निपटने के लिए भगवान की शक्ति दुर्गा ने अवतार लिया। देवी दुर्गा ने दुर्गम राक्षस का संहार किया और पृथ्वी लोक के साथ देवलोक व पाताललोक को विपत्ति से मुक्ति दिलाई। दुर्गम राक्षस का वध करने के कारण ही तीनों लोकों में इनका नाम देवी दुर्गा पड़ा।
भ्रामरी - प्राचीन समय में अरुण नाम के राक्षस की इतनी हिम्मत बढ़ गई कि वह देवलोक में रहने वाली देव-पत्नियों के सतीत्व को नष्ट करने का कुप्रयास करने लगा। अपने सतीत्व को बचाने के लिए देव पत्नियों ने भौरों का रुप धारण कर लिया। वह सब देवी दुर्गा से अपने सतीत्व को बचाने के लिए प्रार्थना करने लगी। देव-पत्नियों को दुखी देख मां दुर्गा ने भ्रामरी का रुप धारण किया और अरुण राक्षस के संहार के साथ उसकी सेना को भी नष्ट कर दिया।
चण्डिका - एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए। इन दोनों राक्षसों ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया। इससे दुखी होकर देवताओं ने मातृ शक्ति देवी का स्मरण किया। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने चण्ड-मुण्ड राक्षसों का विनाश करने के लिए चण्डिका के रुप में अवतार लिया।
जब हम देवी के इन साहसी चरित्रों की कथा का पाठ करते हैं, इन्हें सुनते हैं, इन पर आस्था रखते हैं तो फिर इनसे साहस की शिक्षा क्यों नहीं ले पाते हैं? महिलाओं के प्रति अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए यदि इन चरित्रों के साहस को महिलाएं अपने जीवन में उतार लें तो वे अपने भीतर की याक्ति रूपी दुर्गा को पहचान सकेंगी। यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 10.04.2018)
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Wednesday, April 3, 2019

चर्चा प्लस ... वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...                    
  वादों की लहरों पर चुनाव की नैया     
      - डॉ. शरद सिंह
       गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper  चर्चा प्लस ...वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह
        लोकतंत्र में असली चुनाव बाहुबल से नहीं बल्कि बुद्धिबल से लड़े जाते हैं। इसीलिए बुद्धिबल अपनी इच्छाओं को साधने के लिए पहले बाहुबल को अपना सेवक बनाता है और फिर उससे अपने अनुसार काम कराता है। ऊपर से देखने में भले ही बुद्धिबल और बाहुबल एक-दूसरे के पूरक दिखें किन्तु पलड़ा भारी रहता है बुद्धिबल का ही। तभी तो कई बार छोटा दिखने वाला राजनीतिक दल बड़े राजनीतिक दल को पटखनी दे देता है। यूं भी इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तमाम बंधनों के बावजूद आम नागरिक को जागरूक बना दिया है। वह राजनेताओं द्वारा किए जा रहे हर वादे को विश्लेषण के साथ अपने सामने पाती है और फिर उस पर स्वयं चिंतन-मनन करती है। यही कारण है कि अधिक हवा-हवाई वादों पर बवाल मचते देर नहीं लगती है। आज लगभग अस्सी प्रतिशत आम नागरिक वादों की तह तक जाने का प्रयास करता है। यह सच्चाई नेता भी समझते हैं, वे अब इस तरह के वादे करते हैं जो आम नागरिक के दिलों को छू सके तथा उन्हें विश्वास दिला सके।
लोक सभा चुनाव 2019 के मैदान में उतरे हुए छोटे राजनीतिक दलों की बात छोड़ दी जाए तो दो दल खुल्लमखुल्ला आमने-सामने खड़े नज़र आते हैं। एक कांग्रेस (आई) और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। यद्यपि दोनों टिके रहने को प्रादेशिक दलों का सहारा लेते जा रहे हैं। सवाल यह है कि ये दोनों दल स्थानीय समस्याओं को समझ पा रहे हैं या नहीं। सबसे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है इन्हें अपने उम्मीवार चुनने में। किसको खड़ा करें, किसको नहीं? जिसे टिकट नहीं मिलती है, वह दूसरे दल का रास्ता पकड़ लेता है। कहीं टिकट न मिलने का गुस्सा तो कहीं पैराशूट उम्मीदवार के प्रति नाराज़गी। रूठों को मनाने का दौर और दूसरे दलों के लोगों को फोड़ कर अपनी ओर मिलाने का दौर। इन सबके बीच चुनावी वादों की बरसात। ऐसी बरसात कि आम नागरिक की सोचने-समझने की क्षमता ही उसमें बह जाए और वह बुद्धिहीन की तरह जा कर बटन दबा आए। मगर आज की चतुर पब्लिक सब जानती है, उसकी आंखें भी खुली हुई हैं और कान भी। वह अपने विवेक से किस तरह काम लेती है यह इतिहास के पन्नों को देख कर भली-भांति जाना और समझा जा सकता है। जिस परिवार नियोजन की नीति ने कांग्रेस आई की कुर्सी छीन ली थी, सन् 1977 में जनता पार्टी ने उसी परिवार नियोजन कार्यक्रम को त्यागने के संबंध में वादा कर चुनाव में जीत हासिल की थी। सन् 1980 में इंदिरा गांधी ने कार्य-कुशल सरकार के वादे के आधार पर विजय प्राप्त की थी और 1984 में राजीव गांधी ने जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती गांधी के आदर्शो पर निर्मित एक साफ छवि वाली सरकार देने के वायदे पर भारी मतों से विजयश्री प्राप्ति की थी। लेकिन सन् 1989 में बोफोर्स तोप सौदे की दलाली की हवा ने राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार के कुर्सी छुड़ा दी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने । फिर, 1999 में कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने और गिराने के बाद स्थिर सरकार देने के वादे के साथ ‘‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन‘’ ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आम चुनाव जीता। ये वादे ही थे जो राजनीति में हार-जीत सुनिश्चित करते रहे।
        सन् 2014 में भजपा द्वारा किए गए वादों के बारे में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का कहना है कि 2019 में नए वादों की बात करने से पहले नरेन्द्र मोदी जी देश को बताएं कि उन्होंने 5 साल में अपने 2014 के घोषणापत्र में किए गए किन-किन वादों को पूरा किया है? आज उन मुद्दों पर बात करने से क्यों कतरा रहे हैं? उन भारी-भरकम आसमानी वादों, योजनाओं और घोषणाओं का क्या हुआ? बहरहाल, आम नागरिक भी जानता है कि विश्व पटल पर भारत का नाम भले ही जगमगाया हो लेकिन विदेशों में जमा कालाधन वापस देश में लाने का वादा पूरा नहीं हुआ, उल्टे नोटबंदी ने घरेलू महिलाओं की रसोईघर के डब्बों में छिपा कर की गई बचत को भी बाहर निकलवा दिया। नोटबंदी के साल भर बाद भी घर के किसी बैग, किसी कपड़े, किसी किताब में दबे हुए पांच सौ के नोट ने अचानक बरामद हो कर जो सदमा पहुंचाया है, उसे भुला पाना आसान नहीं है। फिर भी भाजपा के नए वादों की ओर आम नागरिक उत्सुकता से देख रहा है।
         इन दिनों कांग्रेस अपने प्रभाव को फिर से जगाने के लिए प्रभावी वादे किए जा रही है। राहुल गांधी ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने का वादा किया है। उन्होंने कहा है कि करीब 22 लाख सरकारी नौकरी की रिक्तियां हैं, जिन्हें उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर अगले साल 31 मार्च तक भरा जाएगा। पार्टी इस बार किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणा करने के साथ ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक, न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का वादा किया है। कांग्रेस के अन्य वादों में सबके लिए स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के बेघर लोगों को जमीन का अधिकार, पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करना और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना आदि शामिल हैं। जीडीपी का 6 प्रतिशत पैसा शिक्षा पर लगाने का वादा है। साथ ही असली जीएसटी लाने का वादा है।
कांग्रेस का यह भी वादा किया है कि अगर कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापस आती है तो न्यूनतम आय योजना के तहत 20 प्रतिशत सबसे गरीब भारतीय परिवारों के खाते में हर साल 72,000 रुपये जमा किए जाएंगे। इस संबंध में कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहना है कि यह योजना महिला केंद्रित है। यह धनराशि सीधे घरों की महिलाओं के बैंक खाते में जमा की जाएगी। महिलाओं के पक्ष में एक और वादा कि लोकसभा-विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाएगा। साथ ही केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा।
कांग्रेस ने जहां जमीनी मुद्दों को अपने वादों में पिरोया है वहीं भाजपा के हाथ से मंदिर का मुद्दा लगभग फिसल चुका है। उसे आमनागरिक की वेदना और संवेदना को जीतने वाले वादे ढूंढने में पसीना बहाना पड़ रहा है। वादे पूरे न कर पाने पर कांग्रेस से सत्ता छिनी थी अब वादे पूरे न कर पाने पर भाजपा को खाली हाथ न रह जाना पड़े।
भाजपा ने फरवरी 2019 को चुनावी वादे तय करने के लिए एक लोकतांत्रिक तरीके की घोषणा की थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ‘भारत के मन की बात, मोदी के साथ’ अभियान शुरू किया था। एक महीने तक चलने वाले इस अभियान में विभिन्न माध्यमों से देश की जनता से दस करोड़ सुझाव मांगने का लक्ष्य रखा गया था। बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी ने तब कहा था कि अगले पांच साल में राष्ट्र निर्माण का एजेंडा तय करने लिए यह सहकारी प्रयास होगा। यह प्रत्येक भारतीय को भारत ढालने के अभियान में शामिल करने का प्रयास है। योजना प्रभावी थी लेकिन इसका संचालन प्रभावी ढंग से हो नहीं सका। फिर भी भाजपा अपने वादों के साथ डटी हुई है जिसमें सवर्णों को आरक्षण जैसे मुद्दे भी हैं।
     यह विडम्बना ही है कि प्रत्येक आमचुनाव के पहले किए गए वादे आजादी के बाद से अब तक लगभग जैसे के तैसे हैं। वही बेरोजगारी हटाने, गरीबी उन्मूलन, किसानों की स्थिति में सुधार आदि के वादे। यदि जीतने वाले राजनीतिक दलों ने सत्ता मिलने के बाद अपने वादों को पूरा किया होता तो आज भी वही बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़े वादे दोहराए नहीं जाते। अब यह आम नागरिक पर निर्भर है कि वह किसके वादों को आजमाना चाहेगी और किसे सत्ता-सुख दिलाएगी। गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है। इस दौर में स्व. दुष्यंत कुमार का यह शायरी याद आ रही है-
          ख़ुदा नहीं न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
          कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।
          वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
          मैं बेक़रार हूं  आवाज़ में असर के लिए।     
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Wednesday, February 20, 2019

चर्चा प्लस ...अब जरूरी है उदारता की सीमा तय करना - डॉ. शरद सिंह

 
Dr (Miss) Sharad Singh
"जनता प्रतीक्षा कर रही है सरकार द्वारा कठोर कदम उठाए जाने की। ऐसे दौर में पाकिस्तानी निशानेबाज खिलाड़ियों को भारतीय वीजा देकर एक उदारवादी कदम और उठाया जाना ठेस पहुंचा सकता है जनता की भावनाओं को। अब उदारता की सीमा तय करना जरूरी है। " ...आज के चर्चा प्लस से।

चर्चा प्लस ...
   अब जरूरी है उदारता की सीमा तय करना
        - डॉ. शरद सिंह
पुलवामा में आतंकी हमले ने देश को झकझोर दिया है। सुरक्षा ऐजेंसियों को ले कर अनेक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। ऐसा पहली बार हुआ है कि आतंकवाद के विरुद्ध नौकरीपेशा लोगों  से लेकर गृहणियां तक सड़कों पर उतर आईं। जनता प्रतीक्षा कर रही है सरकार द्वारा कठोर कदम उठाए जाने की। ऐसे दौर में पाकिस्तानी निशानेबाज खिलाड़ियों को भारतीय वीजा देकर  एक उदारवादी कदम और उठाया जाना ठेस पहुंचा सकता है जनता की भावनाओं को। अब उदारता की सीमा तय करना जरूरी है।                 
 चर्चा प्लस ...अब जरूरी है उदारता की सीमा तय करना  - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily
    सारा देश क्रोध से उबल रहा है। आतंकवाद को प्रश्रय देने वालों के विरुद्ध कड़ा कदम उठाने को आतुर है। आतंकवाद के विरुद्ध सारी जनता एकजुट है। आमजनता नाराज़ है आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश के रुप में कुख्यात हो चले पाकिस्तान से। देश के हर शहर, हर गांव, हर गली में पुलवामा हादसे से उभरा आक्रोश फूट पड़ रहा है। सरकार से बस एक ही मांग की जा रही है कि अब कोई ऐसा कड़ा कदम उठाया जाए जिससे इस प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगे। कहीं दुनिया हमारी सहनशीलता को हमारी कायरता न समझने लगे। जो चिनगारी पुलवामा में हुई आतंकी घटना से भड़की उसने जनता की कोमल भावनाओं को धधका दिया है, इसके साथ ही विसंगतियों की जो पर्तें खुलने लगी हैं, वे भी कम चौंकाने वाली नहीं है। पुलवामा हमले के बाद समाचार माध्यमों द्वारा यह जानकारी आमजनता तक पहुंची कि अलगाववादियों की सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर सरकार हर साल 10 करोड़ से ज्यादा खर्च करती है। इसके बाद सरकार ने तुरंत कदम उठाया और मीरवाइज उमर फारुक, अब्दुल गनी भट, बिलाल लोन, हाशिम कुरैशी, फजल हक कुरैशी और शब्बीर शाह अलगाववादी नेताओं को दी गई सुरक्षा, गाड़ी और अन्य सुविधाएं वापस ले ली गईं। पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत के बाद गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीनगर में कहा था कि पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई से फंड लेने वालों की सुरक्षा हटाई जाएगी। आतंकियों से खतरे की आशंका के चलते केंद्र की सलाह पर राज्य सरकार ने इन्हें एडहॉक सुरक्षा मुहैया कराई जा रही थी। यद्यपि भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अल कायदा, लश्कर ए तैयबा, जैश ए मोहम्मद, बब्बर खालसा समेत 35 से अधिक आतंकवादी संगठनों को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में डाल रखा है। ऐसे संगठनों को सहायता देने वालों को सरकारी सुविधा देना बंद करने का निर्णय एक सही कदम है।
एक विसंगति सुधरी तो दूसरी सामने दिखाई देने लगी। जहां एक ओर देश के कोने-कोने से आवाज़ उठ रही है कि आतंकवादी गतिविधियों का सहारा लेने वाले पाकिस्तान से सभी तरह के संबंध तोड़ लिए जाएं वहीं भारतीय उच्चायोग और पाकिस्तानी निशानेबाजी महासंघ ने भी पुष्टि की है कि दो निशानेबाजों और मैनेजर के टिकट बुक हो गए हैं। इससे पहले पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमले के कारण पाकिस्तानी निशानेबाजों के विश्व कप में भाग लेने पर संदेह पैदा हो गया था। पाकिस्तान निशानेबाजी महासंघ ने कहा था कि समय से वीजा नहीं मिलने पर वह अपने निशानेबाज नहीं भेजेगा। पाकिस्तान के निशानेबाजों को नई दिल्ली में होने वाले विश्व कप के लिए वीजा दे दिया गया है। अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ के इस टूर्नामेंट के जरिए टोक्यो ओलंपिक 2020 के कोटा-स्थान तय होंगे। विश्व कप गुरुवार से कर्णी सिंह रेंज पर खेला जाएगा।
उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड की सभी बड़ी हस्तियों और खेल जगत की हस्तियों ने इस हमले पर भर्त्सनापूर्ण टिप्पणी की। सितंबर 2016 में उरी हमले के बाद इसे सबसे खतरनाक हमला बताया जा रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गंभीर ने ट्विटर पर लिखा, ‘‘चलिए अलगाववादियों से बात करते हैं। चलिए पाकिस्तान से बात करते हैं, लेकिन इस बार वार्ता मेज पर नहीं होगी बल्कि युद्ध के मैदान में होगी। अब बहुत हो चुका है।’’  क्रिकेट के दीवाने तक क्रिकेट विश्वकप में पाकिस्तान के साथ न खेलने की मांग कर रहे हैं।  क्रिकेट विश्व कप में भारत और पाकिस्तान के बीच 16 जून 2019 को मैनचेस्टर में मैच होना है। पुलवामा में हुए इस आंतकी हमले के बाद भारतीय फैन्स वर्ल्ड कप 2019 में भारत-पाकिस्तान मैच को रद्द करने की मांग भी कर रहे हैं।
बॉलीवुड ने पाकिस्तान के कलाकारों को बैन कर दिया है। फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्प्लाइज (एफडब्लूआइसीई) ने यह फैसला लिया है। एफडब्लूआइसीई के मुख्य सलाहकार अशोक पंडित ने कहा कि -‘‘यदि फिल्म जगत इस नियम को नहीं मानता और पाकिस्तान के कलाकारों के साथ काम करने का दबाव बनाता है तो शूटिंग को कैंसिल कर दिया जायेगा साथ ही उन पर भी प्रतिबंध लगाया जायेगा।  जो फिल्म निर्माता पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम करने के लिए दबाव बनाएंगे एफडब्लूआइसीई उन पर भी प्रतिबंध लगाएगी।’’ एफडब्लूआइसीई के मुख्य सलाहकार अशोक पंडित ने कहा, “एफडब्ल्यूआईसीई पाकिस्तान के कलाकारों के साथ काम करने की जिद करने वाले फिल्म निर्माताओं पर प्रतिबंध लगाएगा। हम इसकी आधिकारिक घोषणा करते हैं। सीमापार से हमारे देश पर बार-बार हमले होने के बावजूद पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम करने की जिद करने वाली म्यूजिक कंपनियों को शर्म आनी चाहिए। चूंकि उन्हें कोई शर्म नहीं है तो हमें उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर करना होगा। जम्मू एवं कश्मीर के बाहर से हम जितने नुकसान का अंदाजा लगा सकते हैं, नुकसान उससे कई गुना ज्यादा हुआ है। इसकी भरपाई में सालों लग जायेंगे। एक व्यक्ति इतना ज्यादा आरडीएक्स लेकर जम्मू एवं कश्मीर में छिपकर कैसे आ सकता है? ऐसे समय में जब आतंकवादी हमले इतने ज्यादा हो गए हैं तब ये सोचना मुश्किल है कि हमारे मनोरंजन उद्योग में कुछ लोग कलाकारों के लिए पाकिस्तान की तरफ देख रहे हैं।”
प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आज़मी ने भी ट्वीट किया है और कहा है कि पाकिस्तान के साथ सभी सांस्कृतिक आदान-प्रदान को स्थगित करने की ज़रूरत है। उन्होंने स्वयं अपना वह कार्यक्रम रद्द कर दिया जिसमें उन्हें पाकिस्तान पहुंच कर एक कार्यक्रम में भाग लेना था। यानी चाहे फिल्मी कलाकार हो, चाहे साहित्यकार हो, चाहे व्यापारी वर्ग हो सभी कठोर कदम उठाए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यहां तक कि गृहणियां भी पुलवामा की जघन्य घटना के विरोध में प्रदर्शन पर उतर आईं। फिर भी दो पाकिस्तानी निशानेबाजों को भारतीय वीजा जारी कर दिया जाना आमजनता की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला काम है। आखिर उदारता की भी कोई सीमा तय की जानी चाहिए। श्रीकृष्ण ने भी अपनी बुआ के पुत्र शिशुपाल के लिए अपनी उदारता की सीमा तय की थी। उन्होंने अपनी बुआ को वचन दिया था कि मैं शिशुपाल के सौ अपराधों को क्षमा कर दूंगा और उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन 101 वां अपराध होते ही शिशुपाल का वध कर के उसे दण्डित कर दिया था। जबकि देश के बंटवारे के समय से ही पाकिस्तान भारत के विरुद्ध अपराध पर अपराध करता आ रहा है और भारत उसके प्रति अपनी उदारता बरतता चला आ रहा है। आखिर इस उदारता की सीमा का निर्धारण अब करना ही होगा।
आज जिस कश्मीर की जमीन को रक्तरंजित किया जा रहा है, उसी कश्मीरी मूल के सन् 1901 में जन्मे लखनवी शायर आनन्दनारायण ’मुल्ला’ भारत-विभाजन से आहत होकर लिखा था जो कश्मीर की वर्तमान दशा पर भी सटीक बैठता है -
वतन फिर तुझको पैमाने-वफ़ा देने का वक़्त आया
तिरे नामूस पर सब कुछ लुटा देने का वक़्त आया
वह खि़त्ता देवताओं की जहां आरामगाहें थीं
जहां बेदाग़ नक़्शे-पाए-इंसानी से राहें थीं
जहां दुनिया की चीख़ें थीं, न आंसू थे न आहें थीं
उसी को जंग का मैदां बना देने का वक़्त आया
वतन फिर तुझको पैमाने-वफ़ा देने का वक़्त आया
रुपहली बर्फ पर है सुर्ख़ ख़ूं की आज इक धारी
सहर की नर्म किरनों ने यहां दोशीज़गी खोई
हुई आलूदा यह मासूम दुनिया अप्सराओं की
अब इन नापाक धब्बों को मिटा देने का वक़्त आया
वतन फिर तुझको पैमाने-वफ़ा देने का वक़्त आया
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( दैनिक "सागर दिनकर" , 20.02.2019 )
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Wednesday, October 17, 2018

चर्चा प्लस ... रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा - डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा
- डॉ. शरद सिंह

बुंदेलखंड में दशहरा मनाने की भी अपनी अलग परम्पराएं हैं। इस दिन सुबह से नीलकंठ के दर्शन करना अच्छा माना जाता है। इसी तरह मछली को देखना भी शुभ माना जाता है। इसीलिए कुछ लोग मछली ले कर भी घर-घर जाते हैं और मछली के दर्शन करा कर नेंग मांगते हैं। दशहरे पर पान के बीड़े के बिना तो काम ही नहीं चलता है। सागर नगर में सागरझील यानी लाखा बंजारा झील में रावण को नाव पर स्थापित कर के दहन किए जाने की परम्परा रही है। दरअसल, कई रोचक परम्पराएं त्योहारों को भी अधिक रोचक बना देती हैं और कभी-कभी कुछ परम्पराएं जानबूझ कर छोड़ दी जाती हैं, ताकि त्योहार अच्छे और अहिंसक संदेश दे सकें। 
चर्चा प्लस ... रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा - डॉ. शरद सिंह  ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper

मुझे अच्छी तरह से याद है, जब मैं छोटी थी तो दशहरे का उत्साह किस तरह चारों ओर व्याप्त हो जाता था। उन दिनों मैं सागर संभाग के पन्ना नगर में रहती थी। वह मेरी जन्मस्थली भी है। हिरणबाग कहलाती थी वह कॉलोनी जहां गिनती के छः सरकारी क्वार्टर्स थे। उन्हीं में दायीं ओर का आखिरी क्वार्टर मेरी मां के नाम एलॉट था। मेरी मां डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ पन्ना में मनहर गर्ल्स हायर सेंकेंड्री स्कूल में हिन्दी की व्याख्याता थीं। मेरी मां का बचपन मालवा में बीता था। वे मालवा की बेटी रहीं और मैं बुंदेलखंड की बेटी। दो अंचलों की संस्कृतियों के प्रभाव में मेरा आरम्भिक बचपन बीता। लेकिन पैदायशी ही बुंदेलखंड का पानी तो मेरी रगों में खून बन कर दौड़ने लगा था। मुझे अच्छा लगता था अपने शहर का दशहरा उत्सव। बहुत ही भव्य आयोजन होता था। छत्रसाल पार्क के सामने वाले बड़े से मैदान में बहुत बड़ा रावण बनाया जाता था। उस समय की मेरी दो-ढाई फुट के क़द के हिसाब से रावण कुछ ज़्यादा ही बड़ा दिखता रहा होगा मुझे। बहरहाल, घर की दीवारों पर ‘व्हाईटवॉश’ (जो कि पी.डब्ल्यू. डी. की कृपा से होता था) और आंगन में गोबर से लिपाई जो कि मां स्वयं अपने हाथों से करती थीं, जिसमें मैं भी हाथ बंटाने का प्रयास करती और डांट खाती थी। इन सबके बीच प्रतीक्षा रहती थी दशहरे की उस रात की जिसमें रावण दहन किया जाता था। रामलीला वाले राम और लक्ष्मण धनुष ले कर आते थे। पन्ना राजपरिवार से तत्कालीन महाराज नरेन्द्र सिंह आते थे। अच्छा-खासा मेला भर जाता था। तरह-तरह की दूकानें, झूले और हम बच्चों के लिए ढेर सारा आकर्षण। दशहरा मैदान मेरे घर से लगभग पचास कदम की दूरी पर था। यानी कॉलोनी के कैम्पस से निकलो और दशहरा मैदान सामने नज़र आता था। छोटे शहरों के यही तो फायदे होते हैं। सब कुछ आस-पास।
मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह अपने मामा कमल सिंह की उंगली पकड़ कर दशहरा मैदान पहुंचते थे। फिरकी, गुब्बारे, सीटी, चूड़ी और न जाने क्या-क्या ले डालते थे हम लोग। उस जमाने की हमारी गंभीर शॉपिंग होती थी हम दोनों बहनों की। नहीं, विशेष रूप से मेरी। मेरी तुलना में वर्षा दीदी को शॉपिंग का शौक़ हमेशा कम ही रहा है। आज भी वे मुझसे पीछे रहती हैं। मुझे आज भी याद है कि किस तरह पन्ना महाराज राम और लक्ष्मण का तिलक करते थे और फिर राम बना रामलीला का कलाकार धनुष में तीर चढ़ता था। जब तीर के नुकीले सिरे पर आग लगा दी जाती थी तो वह जलता हुआ तीर रावण के पुतले की ओर छोड़ देता था। तीर लगते ही रावण का पुतला धू-धू कर के जल उठता था और हम सभी बच्चे प्रफुल्लित हो कर तालियां बजाने लगते थे।
घर लौटने पर मां आरती की थाली सजा कर मामा जी की आरती उतारती थीं, यह कहती हुईं कि -‘‘मेरा भाई रावण को मार कर आया है।’’ इसके बाद हमारे घर में परम्परागत शस्त्रपूजा होती थी। मुझे उस तलवार की धुंधली स्मृति है जो मेरे बचपन में शस्त्र के रूप में पूजी जाती थी लेकिन बाद में मेरे नानाजी जो गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, घर में शस्त्रपूजन बंद करा दिया और उस तलवार को हंसिए में ढलवा दिया गया जो वर्षों तक रसोईघर में सब्ज़ी काटने के काम आता रहा। हमारे परिवार में मांसाहार नानाजी के समय से ही बंद कर दिया गया था। वे घोर अहिंसावादी थे। इसलिए बलि के प्रतीक स्वरूप कुम्हड़े को काटा जाता था किन्तु बाद में यह भी उचित नहीं लगा। नानाजी को लगा कि भले ही हम कुम्हड़े को काट रहे हैं किन्तु मन में बलि की कल्पना होने से हिंसा की भावना तो बनी रहेगी। अतः वह परम्परा भी समाप्त कर दी गई। बस, परस्पर पान की बीड़ा दिए जाने की परम्परा यथावत चलती रही।
यह सारी बातें मुझे इसलिए याद आ रही हैं क्यों कि पिछले दिनों झांसी प्रवास के दौरान मुझे हमीरपुर के विदोखर गांव के दशहरे के बारे में पता चला। कोई दशहरा इतना रक्तरंजित भी हो सकता है, यह जान कर मुझे हैरानी हुई। विदोखर में दशहरा मनाने की अपनी एक अलग ही परम्परा है। विदोखर में दशकों पहले हजारों लोग सवा मन सोना लुटाकर दशहरा मनाते थे। इस गांव में वह कुआं और राहिल देव मंदिर आज भी मौजूद है, जहां नरसंहार के बाद सोना लुटाए जाने की परंपरा शुरू हुई थी। यहां उन्नाव के गांव डोंडियाखेड़ा के लोग सोना लुटाने में अहम भूमिका निभाते थे। आपको याद दिला दूं कि यह वही जगह है जहां दो-तीन साल पहले संत शोभन सरकार ने सोने का खजाना जमीन में दबे होने का दावा किया था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भारी हंगामा छाया रहा था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि औरंगजेब के समय विदोखर के ठाकुरों को बलात् मुसलमान बनाया गया था। जिन्हें बगरी ठाकुर कहा जाता था। लगभग 530 वर्ष पहले उन्नाव के डोंडियाखेड़ा से ठाकुर बड़ी संख्या में यहां व्यापार के लिए जाते थे। ठाकुरों का यह जत्था एक बार हमीरपुर के इसी विदोखर गांव से गुजर रहे था, तभी कुआं देख पानी पीने के लिए रुक गए। इसी दौरान बगरी ठाकुर समाज के कुछ युवक यहां पहुंच गए। बगरी ठाकुर युवकों ने डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों को कुए से पानी नहीं पीने दिया और मारपीट कर डाली। अपने अपमान से हो कर डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने बगरी ठाकुरों को सबक सिखाने की ठान ली। विदोखर में बगरी ठाकुर और आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर दशहरे का जश्न मनाते थे। इसी दौरान उन्नाव के डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने योजना के साथ बगरी ठाकुरों पर हमला बोल दिया। अचानक हमले से दशहरे के जश्न में डूबे बगरी ठाकुर संभल नहीं सके और इस भीषण युद्ध में सैकड़ों की संख्या में मारे गए। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने युद्ध जीत लिया और विदोखर के आसपास मौजूद 24 गांवों पर कब्जा कर लिया। युद्ध के बाद इन ठाकुरों ने बगरी ठाकुर के घरों से सोना-चांदी लूट लिया। इस दौरान उन्होंने लूटा हुआ सोना लुटाते हुए जमकर जीत का जश्न मनाया। बस, उसी समय से वहां सोना लुटाए जाने की परंपरा का आरम्भ हुआ। लगभग पांच दशक पहले तक विदोखर गांव के आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्रित होते थे। इसके बाद अनोखे ढंग से दशहरा मनाते हुए लोग सवा मन सोना इकट्ठा कर लुटाते थे। जितना सोना जिसके हाथ लगता था, वे अपने घर ले जाता था। अब मंहगाई के जामने में सवा मन सोना लुटाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है, इसलिए प्रतीक रूप में रत्ती भर सोना लुटाया जाता है। आज भी 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर मिट्टी के गोले बनाते हैं और इन्हीं में रत्ती भर सोना डालकर लुटाते हैं। जिसके हाथ सोने वाला मिट्टी का गोला लगता है, उसे सौभाग्यशाली माना जाता है।
हो सकता था कि भविष्य में मेरे नानाजी की तरह किसी को यह परम्परा हिंसक घटना की याद दिलाने वाली लगे और इसे वह बंद करवा दे। यदि ऐसा होता है तो भी विदोखर में दशहरे का आनंद कम नहीं होगा। उत्सव वही है जो मन को आनन्दित करे, उत्साह से भर दे। उत्सव में आडंबर का कोई महत्व नहीं होता। दशहरा तो यूं भी असत्य पर सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है। इसे तो सद् विचारों और सद्परम्पराओं के साथ ही मनाया जाना चाहिए। हमेशा दस सिर वाला रावण मारा जाए, एक सिर वाला इंसान नहीं।
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( सागर दिनकर, 17.10.2018)


Wednesday, October 10, 2018

चर्चा प्लस ... स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि
- डॉ. शरद सिंह
‘देवी’ का अर्थ है निर्भयता और शक्ति। नवरात्रि वह काल खण्ड है जिसमें देवी के प्रतीक को स्थापित कर के शक्ति की उपासना का अनुष्ठान किया जाता है और देवी के रूप में शक्तिसम्पन्न निर्भय स्त्री की कल्पना को साकार किया जाता है। नवरात्रि में देवी भगवती के नौ रूपों में नौ शक्तियों की पूजा की जाती हैं। यह नौ शक
्तियां स्त्रीशक्तियां ही तो हैं। निर्भय स्त्री ही देवी है, जो असुरों का संहार करने, जो देवताओं और सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने की क्षमता रखती है। जो जगत् की जननी है, मां है, वही शक्ति है। इसीलिए इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नावरात्रि में स्त्री शक्ति को स्थापित किया जाता है और स्मरण किया जाता है कि स्त्री अशक्त नहीं सशक्त है। विडम्बना यह कि सदियों से सबसे अधिक अपराध स्त्री के विरुद्ध ही होते आ रहे हैं। आज भी आंकड़े भयावह हैं। समाचारों में आए दिन किसी भी आयुवर्ग की स्त्री की अवमानना अथवा बलात्कार के समाचार स्त्रीशक्ति की स्थापना संबंधी विचार को झुठलाने की कोशिश करते रहते हैं। फिर भी स्त्रियां अपनी शक्ति को धीरे-धीरे पहचान रही हैं और अपने आत्मसम्मान की स्थापना कर रही हैं। संघर्ष कड़ा है पर विजय असंभव नहीं। सच तो यह है कि स्त्री स्वयंसिद्धा है। उसे किसी के सामने झुकने अथवा न्याय की भीख मांगने की जरूरत नहीं। देवी दुर्गा के नौ रूप स्त्री की उस शक्ति को दर्शाते हैं जिनसे वह मानव में मौजूद राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश कर सकती है। नवरात्रि की कथाएं यही तो बताती हैं कि जहां देवता स्वयं को अक्षम पाते हैं वहां देवी अपनी क्षमता का प्रयोग कर के सब कुछ सही कर देती है। आज की स्त्री भी तो यही कर रही है। स्त्री घर सम्हाल रही है, नौकरी कर रही है, राजनीति में आगे आ चुकी है और पुरुरूोचित माने जाने वाले सुरक्षा एवं यांत्रिकक्षेत्र में भी स्वयं को साबित कर रही है। आज दुनिया का कोई भी क्षेत्र स्त्री की पहुंच से दूर नहीं है। आज की स्त्री पुरुष-प्रधान समाज के मानको को बदल रही है। जिस स्त्री-अस्मत अथवा स्त्री की दैहिक शुचिता की दुहाई दे कर स्त्री को आत्महत्या करने तक मजबूर किया जाता था, उसी दुहाई को वह आज कठोरता से ठुकरा कर उन परिस्थितियों को बेनकाब कर रही है जिनके द्वारा उन्हें डराया, दबाया गया। ‘मी टू’ और ‘यू टू’ जैसे कैम्पेन आज स्त्री को सिर उठा कर जीने की ताकत दे रहे हैं। जिस यौनिक अपराध का शिकार होने के कारण उसे जीवन भर मुंह छिपा कर जीना पड़ता था, आज उस अपराध के विरुद्ध मुंह खोलने का साहस स्त्रियों में आता जा रहा है। भारत में भी इसकी शुरुवात सेलीब्रिटी महिलाओं ने कर दी है, जिससे आमस्त्री में भी साहस का संचार होगा। यह जरूरी भी है। आज जब नन्हीं अबोध बालिकाओं को भी बलात्कारी नहीं बख़्श रहे हैं तो ऐसे दूषित माहौल में स्त्रियों का यौनहिंसा के विरुद्ध उठ खड़ा होना जरूरी है। जब स्त्रियां साहस दिखाती हैं तो पुरुषवर्ग भी उनका साथ देता है। पुरुषों की सत्ता पुरुषों के वैचारिक भिन्नता ने बनाई। दुर्भाग्यवश स्त्री को दोयम दर्जे का मानने वाले पुरुष समाज में प्रभावी स्तर पर रहे। किन्तु प्रत्येक पुरुष अपराधी नहीं होता है। वह भी पिता, भाई, पति और पुत्र होता है। उसे भी स्त्री के साथ अपने गरिमापूर्ण संबंधों का भान होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज जिस समर्थन के साथ स्त्रियां जीवन में बहुमुखी विकास कर रही हैं, वह नहीं कर पातीं और दीवारों के भीतर, हाथ भर लम्बे घूंघट में घुट रही होतीं। लेकिन यह समर्थन तभी मिला जब स्त्रियों ने साबित कर दिया कि वे हर तरह का काम करने में सक्षम हैं।
हमारी संस्कृति नारी के आदर की संस्कृति है। प्राचीन भारत में स्त्री का सम्मान किया जाता है। उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिया जाता था। पौराणि ग्रंथों में ऋषितुल्य विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। किन्तु हमारे अतीत में वह काला समय आया जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। विदेशी हमलावरों ने भारतीय पुरुषों को भ्रमित कर के स्त्री सम्मान के मायने ही बदलवा दिए। उन्होंने यह मस्तिष्क में बिठा दिया कि यदि स्त्री को परपुरुष स्पर्श भी कर ले तो उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए। इससे भी आगे बढ़ कर एक पाठ और पढ़ाया कि परपुरुष की कुदृष्टि मात्र से बचने के लिए स्त्रियों को तलवार नहीं उठानी चाहिए बल्कि जौहर कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य यह कि मातृशक्ति को देवी के रूप् में पूजने वाला पुरुष समाज इस तरह के पाठों को आत्मसात करता चला गया और स्वयं स्त्री समाज आत्महत्या में अपने सम्मान का प्रतिबिम्ब देखने लगी। लेकिन कहा जाता है न कि बुराई के पैर भले ही मजबूत दिखाई दें लेकिन होते कमजोर ही हैं और जल्दी थक जाते हैं। इन बुराइयों के पैर कई दशक बाद थके लेकिन अंततः थक कर चूर-चूर हो गए। जौहर और सती प्रथा बंद हुई। लेकिन इन काले दशकों ने स्त्रियों को शिक्षा, निर्णय लेने के अधिकार, कोख पर अधिकार और यहां तक कि खुली हवा से भी वंचित कर दिया। विचित्रता यह कि जब स्त्रियां दलित बनाई जा रही थीं, उस दौरान भी देवियां पूज्य रहीं। काल्पनिक शक्ति के सामने समाज ने सिर झुकाया किन्तु प्रत्यक्ष शक्ति को लम्बे समय तक अनदेखा किया। इतना अधिक अनदेखा किया कि आज भी समाज स्त्रीशक्ति को पूरी तरह से नहीं देख पा रहा है। शायद इसीलिए नवरात्रि के रूप में देवी के नौ रूपों वाली नौ शक्तियां प्रति वर्ष दो बार समाज के सामने आती हैं ताकि समाज स्त्रीशक्ति को पहचाने और उसे अपना सहभागी बनाए। नवरात्रि तो यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान व अपनी शक्ति का स्मरण दिलाता है, साथ ही सकल समाज को नारी शक्ति का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है। मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
यह भी सच है कि आज स्त्रियों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसल, स्त्रियों के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का सम्मान किया जाना जरूरी है। घर में मौजूद स्त्रियां अर्थात् माता, पत्नी, बेटी, बहन में नौ दुर्गा के गुण होते हैं जिन्हें स्वीकार कर के सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
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( सागर दिनकर, 10.10.2018)


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Wednesday, September 26, 2018

चर्चा प्लस ... सागर या ‘साउगोर’ : अब निर्णय लेना होगा - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा
लेख अवश्य पढ़िए और देखिए कहीं आपका शहर भी इस विडंबना का शिकार तो नहीं है? ....

चर्चा प्लस ...
सागर या ‘साउगोर’ : अब निर्णय लेना होगा

- डॉ. शरद सिंह 

 बुंदेलखंड के ऐतिहासिक महत्व का शहर है सागर। इसकी अपनी प्राकृतिक संपदा, संस्कृति और विश्वविद्यालय ने इसे हमेशा देश ही नहीं बल्कि विदेश के मानचित्र पर भी महत्वपूर्ण बनाए रखा है। किन्तु विडम्बना यह कि सागर के नाम की अंग्रेजी में प्रचलित स्पेलिंग ‘सागर’ है और भारतीय रेल में इसकी स्पेलिंग ‘साउगोर’ हो जाती है। जिससे दूसरे राज्य अथवा दूसरे देश के लोग रेलवे रिजर्वेशन के समय सागर को ढूंढते रह जाते हैं। अब समय आ गया है कि नाम की स्पेलिंग में एकरूपता लाई जाए। आखिर कब तक ढोते रहेंगे गुलामी की निशानी को? 

सागर या ‘साउगोर’ : अब निर्णय लेना होगा - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
अभी दो माह पहले की बात है मुझे तिरुअनंतपुरम के एक हिन्दी सेवी संस्थान में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। जैसा कि आजकल चलन है कि आयोजक अपने अतिथि की परेशानी को कम करने के लिए हवाई जहाज या रेल का ई-रिजर्वेशन करा कर टिकट मेल कर देते हैं। यह मेरे लिए भी सचमुच बहुत सुविधाजनक रहता है। इससे मुझे रेल और रेल कनेक्शन्स का पता नहीं करना पड़ता है, ये सारी जिम्मेदारी आयोजक वहन कर लेता है। तो मैं बता रही थी कि तिरुअनंतपुरम के एक हिन्दी सेवी संस्थान वालों ने ई-मेल, फोन आदि से मुझसे संपर्क किया और रेल का नाम, समय आदि तय कर लिया। सागर से भोपाल और भोपाल से तिरुअनंतपुरम के लिए ट्रेन। मैं निश्चिंत हो गई कि अब वे लोग रिजर्वेशन करा लेगें ओर मुझे ई-मेल कर देंगे। लेकिन दूसरे दिन उनका चिन्तित स्वर में फोन आया कि आपका शहर तो रेलवे रिजर्वेशन साईट पर मिल ही नहीं रहा है। एक पल को मुझे लगा कि कहीं वे लोग बहाना तो नहीं बना रहे हैं लेकिन दूसरे ही पल माजरा समझ में आ गया। मैंने उनसे पूछा कि आपने सागर की स्पेलिंग क्या लिखी है? और यह स्पेलिंग वहीं निकली जो आमतौर पर लिखी जा सकती है- शब्द के अनुरुप सीधे-सीधे सागर यानी ‘एस ए जी ए आर’। मैंने उन्हें बताया कि वे सागर नहीं ‘साउगोर’ लिखें। मैंने उन्हें स्पेलिंग बताई ‘एस ए यू जी ओ आर‘ ताकि वे रिजर्वेशन करा सकें। लेकिन इस चक्कर में हुए विलम्ब के कारण बची हुई दो सीट्स भी वेटिंग लिस्ट में चली गईं। जाहिर था कि मैं वेटिंग टिकट पर इतनी लम्बी यात्रा करने का जोखिम नहीं ले सकती थी जिससे मुझे अपनी यात्रा ही रद्द करना पड़ी। आयोजक भी परेशान हुए और मैं भी। न जाने कितने लोग प्रतिदिन इस तरह से परेशान होते रहते हैं।
डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय पहले भी विश्व भर में ख्याति प्राप्त था और अब केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्ज़ा पाने के बाद से देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि हो गई है। पहली बार सागर के लिए रेलवे रिजर्वेशन कराने वाले छात्रों को वे चाहे उत्तर प्रदेश के हों, बिहार के या फिर उत्तर-पूर्व राज्यों के, उन्हें सागर की दो तरह की स्पेलिंग को ले कर परेशानी का सामना करना पड़ता है।
यह परेशानी कोई नई नहीं है। वर्षों व्यतीत हो गए इस समस्या को ढोते-ढोते। लेकिन इस विडम्बना को बदलने के लिए कोई पुरजोर प्रयास नहीं किया गया। सबसे अधिक परेशानी तब आती है जब कोई व्यक्ति सागर आने के लिए या सागर से जाने के लिए रेलवे रिजर्वेशन कराता है तो उसे रेलवे की साईट पर सागर ढूंढने पर भी नहीं मिलता है। दरअसल, अंग्रेजी में सागर की प्रचलित स्पेलिंग है ‘एस ए जी ए आर’। राज्य शासन में भी यही स्पेलिंग मान्य है। लेकिन अंग्रेजों ने इसे अपने उच्चारण के हिसाब से ‘साउगोर’ कहा। यानी स्पेलिंग रखी-‘एस ए यू जी ओ आर’। सेना छावनी तथा रेलवे में यही स्पेलिंग चलाई गई। किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आम व्यवहार में यह स्पेलिंग भारतीय उच्चारण के अनुरुप सरलीकृत हो कर सागर यानी ‘एस ए जी ए आर’ हो गई। आज पत्राचार से लेकर इंटरनेट की विभिन्न साईट्स में सागर की यही स्पेलिंग काम में लाई जा रही है। यह उच्चारण और शब्दों के अनुरुप है तथा लिखने में भी सरल है। फिर भी भारतीय रेलवे में आज भी सागर की स्पेलिंग अंग्रेजों वाली ‘साउगोर’ ही चल रही है। जिससे होता ये है कि जब किसी को सागर के लिए रेलगाड़ियों की जानकारी अथवा रिजर्वेशन कराना होता है तो प्रचलित स्पेलिंग से मध्यप्रदेश में स्थित यह सागर स्टेशन मिलता ही नहीं है। प्रायः कर्नाटक स्थित शिव सागर मिल जाता है। जिससे बड़ा भ्रम उत्पन्न हो जाता है।
सागर बुंदेलखंड का शांत, सुंदर और शिक्षा की दृष्टि से समृद्ध नगर है। सागर का अपना एक अनूठा इतिहास है। सागर शहर की बसाहट 1660 ई. से मानी जाती है। प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार ऊदन शाह जो निहाल सिह के वंशज थे, उन्होंने एक छोटा सा किला बनवाया था जो परकोटा कहलाता है। यह परकोटा समय के साथ विस्तार पाता गया और आज परकोटा शहर के केन्द्र में अवस्थित हो गया है। अन्य शहरों की भांति सागर शहर ने भी विस्तार पा लिया है और इसका स्वरूप निरंतर बढ़ता जा रहा है। दरअसल, पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सागर गोंड शासकों के आधीन रहा। फिर महाराजा छत्रसाल ने धामोनी, गढ़ाकोटा और खिमलासा में मुगलों को हराकर अपनी सत्ता स्थापित की लेकिन बाद में इसे मराठों को सौंप दिया। सन् 1818 में अंग्रेजों ने अपना कब्जा जमाया और यहां ब्रिटिश साम्राज्य का आधिपत्य हो गया। सन् 1861 में इसे प्रशासनिक व्यवस्था के लिए नागपुर में मिला दिया गया और यह व्यवस्था सन् 1956 में नए मध्यप्रदेश राज्य का गठन होने तक बनी रही। जहां तक सागर शहर के नामकरण का प्रसंग है तो इसके संबंध में बड़ी ही रोचक कहानी प्रचलित है। यहां पर स्थित सागर के समान विस्तृत झील (दुर्भाग्यवश अब यह पहले जैसी विस्तृत नहीं रही) के कारण ही इसे सागर का नाम दिया गया। कहा जाता है कि इस झील को एक बंजारे ने बनाया था।
लाखा बंजारा झील अर्थात् सागर झील, सागर नगर की पहचान ही नहीं बल्कि इसके अस्तित्व की परिचायक भी है। यह काफी प्राचीन है। राजा ऊदनशाह ने जब 1660 में यहां छोटा किला बनवाकर पहली बस्ती यानि परकोटा गांव बसाया, तो तालाब पहले से ही मौजूद था। सागर के बारे में यह मान्यता है कि इसका नाम सागर इसलिए पड़ा क्योंकि यहां एक विशाल झील है। सागर झील की उत्पत्ति के बारे में वैसे तो कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। इनमें सबसे मशहूर कहानी लाखा बंजारा के बहू-बेटे के बलिदान के बारे में है। इस कथा के अनुसार एक बंजारा दल घूमता-फिरता सागर आया। उसके सरदार ने पाया कि सागर में पानी का भीषण संकट है। उसने अपने पुत्र लाखा बंजारा से विचार-विमर्श किया। दोनों ने तय किया जिस भूमि पर उन्होंने डेरा उाला है और जहां का वे नमक खा रहे हैं, उस भूमि के नमक का हक अदा करने के लिए एक झील बनाई जाए जिससे सागर के निवासियों को कभी पानी के संकट से नहीं जूझना पड़े। स्थानीय लोगों की मदद से उन बंजारों ने भूमि की खुदाई कर के एक विशाल झील तैयार कर ली। किन्तु समस्या यह थी कि उसमें पानी ठहरता ही नहीं था। झील सूखी की सूखी बनी रहती थी। तब किसी तांत्रिक ने बंजारा सरदार को सलाह दी कि यदि वह अपने बेटे और बहू की बलि देगा तो झील में पानी भर जाएगा। सरदार हिचका। लेकिन उसके बेटे और बहू ने अपना बलिदान देना स्वीकार कर लिया। कहा जाता है कि लाखा और उसकी पत्नी के बलिदान के बाद झील में पानी हिलोरें लेने लगा। लाखा के नाम पर ही सागर झील को लाखा बंजारा झील भी कहा जाता है।
ऐसे संवेदनशील अतीत की संपदा संजोए हुए सागर को अब अंग्रेजों द्वारा थोपे गई स्पेलिंग से मुक्ति मिल जानी चाहिए। एक शहर, एक नाम, एक स्पेलिंग इसकी पहचान को और अधिक सुगम बना देगा। बस, जरूरत है एक जोरदार आवाज़ उठाने की और नाम की स्पेलिंग में एकरूपता लाने का सरकार से आग्रह करने की।
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( सागर दिनकर, 26.09.2018)

चर्चा प्लस ... एक आंदोलन आई टी पार्क के लिए - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

एक आंदोलन आई टी पार्क के लिए
- डॉ. शरद सिंह

वर्तमान वैश्विक प्रगति में आई टी सेक्टर की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। युवाओं को आई टी सेक्टर से जोड़ने के लिए महानगरों में आई टी पार्क बनाए जा चुके हैं और इसके बाद बारी है शहरों की। मध्यप्रदेश के इन्दौर जैसे औद्योगिक शहर में एक से अधिक आई टी पार्क हैं, वहीं सागर जैसा शहर घोषणा के बावजूद आज भी एक अदद आई टी पार्क के लिए प्रतीक्षारत है। ऐसे में आई टी पार्क के लिए आंदोलन का सिर उठाना स्वाभाविक है। 

एक आंदोलन आई टी पार्क के लिए - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
मध्यप्रदेश में इन्दौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर के बाद अब सागर में भी आई पार्क बनाए जाने के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया जा रहा है। प्रदेश शासन द्वारा स्वीकृति के बाद जिला प्रशासन द्वारा पार्क के लिए ज़मीन भी तय की जा चुकी है। मध्यप्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम पहले ही इसे हरी झंडी दे चुका है। सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री के रूप में गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह पहले ही यह कह चुके हैं कि आई टी माध्यम से प्रदेश में कौशल विकास कार्यक्रम भी संचालित होने चाहिए जिससे युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं दूसरी ओर आई टी कम्पनियों को प्रशिक्षित मानवक्षमता का लाभ मिल सकेगा। विडम्बना यह है कि सागर में आई टी पार्क की प्रतीक्षा कुछ अधिक ही लम्बी हो गई जिससे अब नागरिकों के धैर्य का बांध टूटने लगा है और वे जुलूस निकाल कर, ज्ञापन सौंप कर अपनी मांग के पक्ष में आवाज उठाने लगे हैं। स्थानीय गैरराजनीतिक संस्था ‘‘गतिविधि’’ ने इस दिशा में हस्ताक्षर अभियान चलाया, पोस्टकार्ड अभियान चलाया, जनजागृति अभियान चलाया और जिला कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। संस्था के सचिव शिवा पुरोहित का कहना है कि यह हमारे युवाओं के रोजगार का रास्ता खोल देगा, इसलिए हम तब तक आंदोलन जारी रखेंगे जब तक कि सागर में आई टी पार्क स्थापित करने की दिशा में काम शुरू नहीं हो जाता है।
आई टी पार्क की यदि अर्थशास्त्रीय परिभाषा देखें तो एक भौगोलिक विकास है जिसमें उच्च विनिर्देश कार्यालय स्थान के साथ-साथ आवासीय और खुदरा विकास शामिल होते है जो सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर विकास इत्यादि जैसी उच्च प्रौद्योगिकी कंपनियों के स्थानीयकरण को प्रोत्साहित करने के लिए डिज़ाइन किया जाता हैं, जिससे प्रत्येक आर्थिक इकाई पर अर्थव्यवस्थाओं का लाभ मिलता है। भारत के सभी प्रमुख शहरों में अब कम से कम एक आई टी पार्क है जिसमें परिसर में सभी आवश्यक सुविधाएं हैं। प्रमुख आईटी पार्क राजीव गांधी चंडीगढ़ प्रौद्योगिकी पार्क चंडीगढ़, मिहान यह पार्क नागपुर, क्रिस्टल आईटी पार्क इंदौर, वेंकटदात्री आईटी पार्क बैंगलोर, ईन पार्क और डीएलएफ आईटी सेज हैदराबाद है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां है। उनमें से प्रमुख हैं - इंफोसिस, टी.सी.एस. , विप्रो, सत्यम, इंटेल, माइक्रोसॉफ़्ट, टी.आई., गूगल, याहू ,सैप लैब्स इंडिया, ऑरेकल आदि।
यदि अतीत में झांकें तो भारत में आई टी उद्योग को सन् 2004 में करीब पचीस बिलियन अमेरिकी डालर से अधिक का राजस्व मिला जिसमें करीब सत्रह बीस बिलियन डालर की आय अकेले निर्यात से प्राप्त हुई। भारत में इस उद्योग में एक मिलियन से भी अधिक लोग सीधे रोजगार पा रहे हैं जबकि 2.5 मिलियन से ज्यादा लोग अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ चुके हैं। आई पार्क के अंतर्गत विभिन्न देशों में उत्पाद इकाइयां बनाना, हर देश में उपलब्ध श्रेष्ठ संसाधन का उपयोग करना, विभिन्न देशों से काम करते हुए पूरे 24 घंटे अपने ग्राहक के लिए उपलब्ध रहना और ऐसे डेटा सेंटर बनाना जो कहीं से भी इस्तेमाल किए जा सकें, ये कुछ ऐसे कार्य हैं जिनसे देश की अर्थव्यवस्था के साथ ही बेरोजगारों को भी रोजगार का बहुत बड़ा क्षेत्र प्राप्त हुआ है।
भारत की वर्तमान प्रगति में आईटी का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय आईटी उद्योग देश का पहला वैश्विक व्यवसाय सिद्ध हो रहा है। भारत की टाटा कंसलटेंसी ने ब्रिटेन में प्रमुख कंप्यूटर प्रदाता कंपनी के रूप में वैश्विक बाजार में अपनी जगह बनाई है। सूचना प्रौद्योगिकी के लचीले व्यवसायिक नियमों के कारण आज कई कंपनियां ज्यादा कुशलतापूर्वक अपना काम कर रही हैं। इनमें टाटा कम्पनी ने दुनिया की दस बड़ी कंपनियों में जगह बना ली है। तीस वर्ष से टाटा कंसलटेंसी भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले व्यवसाय के अनुरूप परिवर्तन की प्रक्रिया अपनाए हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारतीय प्रतिभाओं की भारी मांग ने भारत को एशिया प्रशांत क्षेत्र में सबसे तेज गति से विकास करने वाला सूचना प्रोद्योगिकी बाजार बना दिया है। भारतीय साफ्टवेयर और आईटीईएस उद्योग का पिछले छह वर्ष के दौरान करीब 30 प्रतिशत के सीएजीआर की दर से विकास सामने आया है। उपभोक्ताओं की उभरती आवश्यकताओं का प्रबंधन बेहतर रूप से करने के लिए, बहुउद्देशीय सेवा प्रदायी क्षमताओं के लाभ और कुछ नई सेवाओं की प्रदायगी की दिशा में अपनी सेवाएं बढ़ा रही हैं।
माइक्रोसाफ्ट, ओरेकल, एसएपी जैसे साफ्टवेयर उत्पादों की बड़ी कंपनियों ने अपने विकास केंद्र भारत में स्थापित किए हैं। सूचना सुरक्षा के क्षेत्र में भारत का रिकार्ड अधिकांश देशों से बेहतर माना जा रहा है। भारत के प्राधिकारी देश में सूचना सुरक्षा के परिवेश को और मजबूत करने पर गहन रूप से बल दे रहे हैं। इस दिशा में किये जा रहे प्रयासों में सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम में संशोधन, समीक्षा, उद्योगों के प्रबंध वर्गों के बीच आपसी संपर्क में वृद्घि के बारे में जागरुकता बढ़ाई जा रही है। भारत की अधिकांश कंपनियों ने आईएसओ, सीएमएम, सिक्स सिगमा जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं और व्यवहारों को पहले ही शामिल कर लिया है, जिस कारण भारत को एक भरोसेमंद सोर्सिंग गंतव्य के रूप में स्थापित करने में सहायता मिली है। आने वाले समय में अब दुनिया में केवल प्रतिभाओं की मांग होगी। विश्व समुदाय मानता है कि भारत में आईटी के क्षेत्र में प्रतिभाओं की अद्भुत खोज हुई है। अर्थशास्त्रियों का यह अनुमान है कि एक समय बाद भारतीय प्रतिभाएं दुनिया के लिए बड़ी मजबूरी बन जाएंगी, उनके बिना किसी भी देश का काम नहीं चलेगा।
मध्यप्रदेश का ही उदाहरण लें तो मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास केन्द्र निगम (एमपीएवीकेएन) की भविष्य संबंधी परियोजना, आईटी पार्क (सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क) को इंदौर में एक उच्च तकनीकी औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह उच्च तकनीकी क्षेत्र, सभी विकासशील सूचना प्रौद्योगिकी संस्थारपना (सेटअप) में विश्व स्तर के उत्पादों और समाधानों को प्रस्तुत करने में आईटी कंपनियों को सक्षम बनायेगा। व्यापार नीतियों में कुशल समर्थन के साथ, तेजी से विकास कर रहे सभी क्षेत्रों में इस परियोजना को प्रगतिशील बनाने का एक सुनहरा अवसर है। आईएसडीएन लाइनों, उपग्रह सेटअप, ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क, और अन्य बुनियादी जरूरतों के साथ, आईटी पार्क भविष्य के लिए एक कॉस्मो सॉफ्टवेयर शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है। भोपाल आईटी पार्क में एलईडी बल्ब का उत्पादन शुरू हो चुका है। ग्रीन सर्फर नामक यह कंपनी यहां बने ऊर्जा बचत करने वाले ये बल्ब पंजाब, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात सहित पांच राज्यों को सप्लाय करने लगी है। एमपी ऑनलाइन, सोलर प्लांट बनाने वाली कंपनी डाउसन, एक्सट्रा नेट, सर्विन बीपीओ, पी नेट और स्मार्ट चिप जैसी कंपनियां यहां आ चुकी हैं। अब सागर जिले को भी प्रतीक्षा है एक आई टी पार्क की जिससे स्थानीय युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरुप रोजगार उपलब्ध करा सके और उन्हें वैश्विक विकास से सीधा जोड़ सके।
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( सागर दिनकर, 19.09.2018)


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