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Sunday, March 8, 2026

"मातृशक्ति के नव स्वर, मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं" में डॉ (सुश्री) शरद सिंह, राजनीति वाला पोस्ट

"राजनीति वाला पोस्ट" में "मातृशक्ति के नव स्वर, मध्यप्रदेश को संवारती नौ प्रेरणाएं" शीर्षक से डॉ ब्रह्मदीप आलूने के लेख में  स्वयं के बारे में देखकर अत्यंत सुखद लगा।
    👇इसे आप विस्तार से पढ़ सकते हैं इस लिंक पर👇
🙏 हार्दिक धन्यवाद डॉ ब्रह्मदीप आलूने एवं  राजनीति वाला पोस्ट  🙏
🙏 हार्दिक आभार भाई पंकज सोनी जी 🙏
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Friday, September 27, 2024

शून्यकाल | मध्यप्रदेश ये शुरू हुआ था बीड़ी का पहला औद्योगिक निर्माण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर


दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम -          

शून्यकाल

ध्यप्रदेश ये शुरू हुआ था बीड़ी का पहला औद्योगिक निर्माण

  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह


    बीड़ी सेहत के लिए हानिकारक है। उनके लिए भी जो बीड़ी पीते हैं और उन श्रमिकों के लिए भी जो बीड़ी बनाने का काम करते हैं। एक तम्बाखू पी कर फेफड़े गलाता है और दूसरा अनजाने में तम्बाखू के महीन पार्टिकल्स के कारण अपनी सेहत गवां देता है। फिर भी यह रेवेन्यू के लिए लाभप्रद रहा है इसीलिए इसे स्वविवेक पर छोड़ दिया गया है, सेहत की चेतावनी के साथ। यह जानना दिलचस्प है कि देश में मध्यप्रदेश में शुरू हुआ था बीड़ी का पहला औद्योगिक निर्माण।

      सन 2018 में सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका नाम है- ‘‘पत्तों में कैद औरतें’’। मेरी यह पुस्तक बुंदेलखंड में तेंदू पत्ता संग्रहण करने वाली और बीड़ी बनाने वाली औरतों के जीवन पर आधारित है। इस पुस्तक को लिखने के दौरान मैंने बीड़ी उद्योग के इतिहास को खंगाला तथा मई-जून की तपती गरमी में तेंदू पत्ता तोड़ने वाली महिलाओं के बीच भी गई। मैंने बीड़ी बनाने वाली महिलाओं के दुख-दर्द को निकट से देखा और उनसे बीड़ी बनाने की कला सीखने का प्रयास भी किया। इस दौरान मैंने उस पक्ष को भी देखा और महसूस किया जो बीड़ी श्रमिकों स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक थे। पूरे विस्तार से मेरी पुस्तक में पढ़ा जा सकता है। फिलहाल एक छोटा-सा अंश बीड़ी उद्योग के इतिहास का यहां दे रही हूं।

        भारत में बीड़ी का औद्योगिक निर्माण सन् 1902 ई. में मध्यप्रदेश के जबलपुर नगर में आरम्भ हुआ था। इसके पूर्व बीड़ी में प्रयुक्त होने वाले तम्बाकू का सेवन अन्य प्रकार से किया जाता था, जिसमें हुक्का प्रमुख था। तम्बाकू की खोज सर्वप्रथम कोलम्बस ने क्यूबा में बहंा के आदिवासियों की मदद से की थी। इसीलिए तम्बाकू का जन्म स्थान दक्षिण अमेरिका माना जाता है। तम्बाकू अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘टुबेको’ से बना है। सन् 1558 ई. में स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय के चिकित्सक फ्रांसिस्को फर्नान्डीज़ ने यूरोप को तम्बाकू से परिचित कराया। भारत में इसका सर्व प्रथम उल्लेख सोलहवीं शताब्दी में मिलता है। सन् 1605 ई. में पुर्तगाली व्यापारियों ने दरबारी असदबेग के माध्यम से तम्बाकू और हुक्का मुगल बादशाह अकबर को भेंट किया था। यद्यपि अकबर ने अपने जीवनकाल में एक ही बार हुक्के का प्रयोग किया क्योंकि अकबर के राजवैद्य हाकिम अली ने हुक्के का उपयोग करने से उन्हें मना कर दिया था। जहंागीर के काल में सर टाॅमस रो ने इंग्लैण्ड के राजा की ओर से जो उपहार दिए थे, उनमें तम्बाकू भी था।


       बुन्देलखण्ड में बीड़ी का औद्योगिक निर्माण इस क्षेत्र की विकट आर्थिक मंदी के कारण विकसित हुआ। पुराने दस्तावेज़ों और मौखिक इतिहास से पता चलता है कि बुन्देलखण्ड में ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा आगे चल कर अंग्रेजी शासन का सशस्त्र विरोध किए जाने के कारण बुन्देलखण्ड अराजकता और आर्थिक अव्यवस्था के एक लम्बे दौर से गुज़रा। इस क्षेत्र में कई छोटी-छोटी रियासतें एवं राज्य थे। उनमें परस्पर झड़पें तथा युद्ध होते ही रहते थे। सन् 1842 ई. में हुए ‘बुन्देला विद्रोह’ के  दौरान कई रियासतें अंग्रेजों से टकराने के साथ ही आपस में भी युद्धरत् रहीं। इसके बाद सन् 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का केन्द्र बुन्देलखण्ड ही रहा। इस संग्राम में समूचा बुन्देलखण्ड संघर्षरत रहा। इस संग्राम में सम्मिलित होने वाली रियासतों एवं राज्यों का राजकोष युद्ध की भेंट चढ़ गया तथा संग्राम समाप्त होने पर अंग्रेजों ने अपनी दमनकारी नीतियों के अंतर्गत् बुन्देलखण्ड की आर्थिक स्थिति को रसातल में पहुंचा दिया। गरीबी और भुखमरी के कारण यह क्षेत्र डाकुओं, ठगों और पिण्डारियों का गढ़ बन गया।
        अंग्रेजी शासन स्थापित हो जाने के बाद लम्बे समय तक बुन्देलखण्ड को कारखानों एवं उद्योगों से वंचित रखा गया। अंग्रेजी शासन के पास तर्क था अस्थिरता के वातावरण का, जबकि इस क्षेत्र के लोग मानते थे कि तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी व्यक्तिगत चिढ़ के कारण उन क्षेत्रों में कोई भी उद्योग, धंधा पनपने नहीं देना चाहते हैं जिन क्षेत्रों के निवासियों ने उनका सशस्त्र विरोध किया था।
जिस समय बुन्देलखण्ड में गरीबी अपनी चरम सीमा पर पहुंच रही थी, बीड़ी उद्योग ने अपने पैर जमाए। जिन पूंजीपतियों के पास पूंजी बची हुई थी उन्होंने ‘काम से बदले अनाज’ की भांति बीड़ी लपेटने का काम कराना शुरू किया। अपने आरम्भिक चरण में इस उद्योग ने अनेक परिवारों को भूखों मरने से बचाया। आज भी यह उद्योग ‘आड़े वक़्त में काम आने वाला’ साबित होता है। यद्यपि गुटखा पाउच ने बीड़ी उद्योग को तगड़ा झटका दिया है। बीड़ी के मुकाबले गुटखा का सेवन एक फैशन के रूप में उभरा और कुछ ही समय में इसने प्रत्येक पान-बीड़ी की दूकान पर अपना राज स्थापित कर लिया। मूल्य के आधार पर भी सिगरेट की अपेक्षा गुटका पाउच ने बीड़ी को पीछे धकेला है। विडम्बना यह है कि गुटखा हो या बीड़ी, स्वास्थ्य के लिए दोनों ही हानिकारक हैं किन्तु राज्यों को इनसे राजस्व मिलता है और लोगों को रोजगार मिलता है। विशेष रूप से औरतों के लिए बीड़ी बनाने का काम घर के बाहर जा कर किए जाने वाले कामों से बेहतर माना जाता है।
        देश में लगभग 50 लाख श्रमिक बीड़ी श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं जिनमें अधिकांश महिला श्रमिक हैं। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, बिहार, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में पंजीकृत श्रमिकों द्वारा बीड़ियां बनाई जाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकांश क्षेत्रों के श्रमिक अपना व्यवसाय बदलने को उत्सुक हैं। बीड़ी बनाने के काम को वे विवशता में स्वीकार करते हैं। पूछे जाने पर यही कहते हैं कि ,‘बीड़ी नहीं बनाएंगे तो भूखों न मर जाएंगे?’ बाल श्रम संरक्षण 1986 के अंतर्गत बच्चों को खतरनाक उद्योगों में काम नहीं कराया जा सकता है। किन्तु बीड़ी बनाने का काम घरों में होता है तथा उन धरों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को माता-पिता की निगरानी में सहायक के रूप में काम करने को आपत्तिजनक नहीं माना गया है। इन बच्चों को तम्बाकू के कणों और तेंदू पत्तों की कतरनों की सड़ी गन्ध के बीच जीवन बिताना पड़ता है जिससे उनमें दमा और तपेदिक होने की संभावना सर्वाधिक रहती है। इन बच्चों की माताएं जो मूल बीड़ी श्रमिक होती हैं, कंधे, गरदन, पीठ, पेट में दर्द तथा ऐंठन के साथ-साथ रक्ताल्पता की शिकार रहती हैं। आराम अथवा अवकाश के बिना काम, उचित पोषण आहार की कमी के कारण इन महिलाओं को गर्भावस्था के समय विशेष कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। धरेलू वातावरण भी धूल और गंदगी से भरा रहता है।  
       बीड़ी बनाने का काम देश के विभिन्न प्रदेशों में किया जाता है। कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार राज्य इनमें प्रमुख हैं।  बीड़ी बनाने के लिए बुनियादी कच्चामाल अर्थात् तेंदू पत्ता सबसे अधिक मध्यप्रदेश में पाया जाता है अतः बीड़ी उद्योग का केन्द्र मध्यप्रदेश का होना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश में बीड़ी एवं सिगार अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत संस्थान तथा श्रमिक इंदौर, उज्जैन, भोपाल, जबलपुर, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, रीवा, सागर, होशंगाबाद, तथा चम्बल संभाग में हैं।
          बुन्देलखण्ड को बीड़ी उद्योग का गढ़ माना जाता है। यह क्षेत्र स्वतंत्रतापूर्व घोर अस्थिरता के दौर से गुज़रा, जिससे इस क्षेत्र में आर्थिक गिरावट तो आई ही, वहीं रूढ़िगत परम्पराओं ने भी अपनी जड़ें और गहरी कर लीं। लूटपाट और अशांति के कारण औरतों के लिए घर से बाहर निकलना उचित नहीं माना जाने लगा। जिस क्षेत्र में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने घोड़े पर सवार हो कर युद्ध भूमि में अपने साहस का प्रदर्शन किया था, उसी क्षेत्र में औरतों को लम्बे घूघंटों और ढेर सारे प्रतिबंधों में रहने के लिए विवश कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि इस क्षेत्र की औरतें अपने परिवार और अपने क्षेत्र के आर्थिक उत्थान में सहभागी नहीं बन सकीं। बहुसदस्यीय परिवार अकेले पुरुष सदस्यों के बल पर जीवन जीने के लिए विवश हो गया। जिस परिवार में कमाने वाले पुरुषों की संख्या अन्य सदस्यों की अपेक्षा बहुत कम थी, उस परिवार की आर्थिक स्थिति रसातल में जा पहुंची। इतनी विकट स्थिति में पहुंचने के बाद यह आवश्यक हो गया कि परिवार की औरतों को धनार्जन की छूट दी जाए किन्तु उस सीमा तक जितने में उन्हें घर की दहलीज न लांघनी पड़े।
बीड़ी महिला श्रमिकों द्वारा समय-समय पर अपनी समस्याओं को ले कर प्रदर्शन एवं आंदोलन किए जाते हैं। ‘सेवा’ जैसे अनेक सामाजिक संगठन तथा श्रमिक संगठन उनके इस प्रयास को सहायता एवं समर्थन देते रहते हैं। 
       बिहार के खैरा (जमुई) प्रखण्ड की महिला बीड़ी श्रमिक समय-समय पर सभाएं आयोजित कर के अपनी समस्याओं के निराकरण की मंाग शासन से करती रहती हैं। उनकी भी वही समस्याएं हैं जो शेष बीड़ी श्रमिकों की हैं, यथा-  परिचयपत्र न दिया जाना, पर्याप्त चिकित्सा सुविधा का अभाव, बोनस का अभाव, तथा श्रम विभाग द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी श्रमिकों को नहीं दिया जाना।
     उत्तर प्रदेश के झांसी जिला मुख्यालय में बीड़ी महिला श्रमिकों द्वारा किए गए प्रदर्शन एवं कामबंद हड़तालों के दौरान यह तथ्य सामने आया कि उत्तर प्रदेश में बीड़ी बनाने के बड़े केन्द्रों इलाहाबाद और गुरसहायगंज में भी शासन द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक से कम राशि का भुगतान श्रमिकों को किया जाता है।
      गुजरात के अहमदाबाद में लगभग 15,000-25000 से अधिक श्रमिक बीड़ी उद्योग में संलग्न हैं। इन श्रमिकों की समसयाएं देश के अन्य बीड़ी श्रमिकों की समस्याओं से अलग नहीं है। दिन में लगभग 10 घंटे लगातार बीड़ी बनाने का काम स्त्रियों को थका देता है। कुछ वर्ष लगातार बीड़ियां बनाने का काम करने के बाद नेत्र ज्योति पर विपरीत असर और हाथ, पैरों, कंधों तथा उंगलियों में दर्द स्थाई रूप लेने लगता है।
     अर्थशास्त्रियों का मत है कि आर्थिक विपन्नता साहूकार को भी बढ़ावा देती है। जहां-जहां निर्धनप्राय बीड़ी श्रमिक थे, वहां-वहां साहूकारी तेजी से फूली-फली। बीड़ी श्रमिक अर्थतंत्र के विचित्र चक्र में फंस गए। जहां से उन्हें काम करने पर पारिश्रमिक मिला, वहीं से उन्हें ऋण भी लेना पड़ा। इस तरह उनकी नाममात्र की आमदनी भी कर्ज के बही-खाते पर चढ़ी रहती थी।
        अब सरकार बीड़ी श्रमिकों की ओर ध्यान दे रही है किन्तु उनमें स्वास्थ्य संबंधी सजगता लाना बेहद जरूरी है। क्यों खतरों के खिलाड़ी बन कर कमाया गया रेवेन्यू मानवता पर खरा नहीं उतरता है।
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Wednesday, November 1, 2023

चर्चा प्लस | मध्यप्रदेश का स्थापना मास मनेगा चुनावी महोत्सव के संग | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
मध्यप्रदेश का स्थापना मास मनेगा चुनावी महोत्सव के संग
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                       
       1 नवंबर अर्थात मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस। एक ऐसी तिथि जो अविभाजित मध्यप्रदेश की भी याद दिलाती है। इस बार प्रदेश का स्थापना मास चुनाव का मास भी है। जिससे आचार संहिता लागू हो जाने पर कई समारोह एवं आयोजन स्थगित किए गए हैं किन्तु लोकतंत्र में चुनाव से बड़ा और कोई आयोजन एवं महोत्सव हो ही नहीं सकता है। वर्ष 2023 का नवंबर मास प्रदेश के स्थापना समारोह को प्रजातंत्र के सबसे बड़े चुनाव अनुष्ठान के साथ मना रहा है। यह चुनाव अनुष्ठान प्रदेश के भावी विकास की दिशा एवं गति को निर्धारित तथा सुनिश्चित करेगा। इसलिए इस बार का स्थापना मास और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। 

मध्य प्रदेश चूंकि देश के मध्य भाग में स्थित है इसलिये इसे भारत का हृदय प्रदेश भी कहा जाता है। जब देश स्वतंत्र हुआ उस समय मध्यप्रदेश अस्तित्व में नहीं था। यह क्षेत्र मध्य भारत के नाम से जाना जाता था। इसके साथ बरार क्षेत्र भी जुड़ा हुआ था। इसीलिए इसे सीपी एंड बरार यानी सेंट्रल प्राविंसेस एंड बरार के नाम से अभिलेखित किया जाता था।  1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तब मध्य भारत और विंध्य प्रदेश के नए राज्यों को पुरानी सेंट्रल इंडिया एजेंसी से अलग कर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन साल बाद राज्यों का पुनर्गठन किया गया। सन 1950 में मध्य प्रांत और बरार का नाम बदलकर मध्य प्रदेश कर दिया गया। यह पुर्नगठन भाषीय आधार पर किया गया था। इसके घटक राज्य मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश एवं भोपाल थे, जिनकी अपनी विधानसभाएं थीं। इस राज्य का निर्माण तत्कालीन सीपी एंड बरार, मध्य भारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल राज्य को मिलाकर किया गया था।
एक नवंबर 1956 को नए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को बनाया गया। पंडित रविशंकर शुक्ल मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने और डाॅ. बी पट्टाभिसीतारमैया पहले राज्यपाल। राजधानी के रूप में भोपाल का चयन आसान नहीं रहा। ग्वालियर, इन्दौर और जबलपुर की दावेदारी के बीच भोपाल को चुना गया। राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी मध्य प्रदेश की राजधानी के लिए जबलपुर के नाम भी सुझाव दिया था। भोपाल को अधिक उपयुक्त माना गया। कुछ इतिहासविद भोपाल को चुने जाने के पीछे दो कारण बताते हैं। पहला कारण कि भोपाल में कई ऐसी इमारते थीं जिनमें फौरी तौर पर अच्छी तरह कामकाज का संचालन किया जा सकता था। दूसरा कारण राजनीतिक तथा अधिक ठोस प्रतीत होता है। यह भोपाल की राजनीति को एक ऐसी गरिमा के साथ जोड़ देने का राजनीतिक कदम था जिससे वहां के नवाब भविष्य में कभी अलगाव की बात न सोचें। दरअसल, राज्यों के विलय के समय जब सरदार वल्लभ भाई पटेल साम, दाम, दण्ड का प्रयोग करते हुए राज्यों का का विलय कर के भारत को एक एकीकृत राष्ट्र का स्वरूप दे रहे थे, उस समय भोपाल के नवाब भारत से संबंध ही रखना नहीं चाहते थे। वे हैदराबाद के निजाम के पदचिन्हों पर चलते हुए अपनी स्वायत्ता बनाए रखना चाहते थे। उन्होंने निजाम से मिल कर भारत से न मिलने के गुपचुप उपाय किए किन्तु अंततः सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नवाब को भोपाल का विलय करने के लिए राजी कर लिया। किन्तु अलगाव की भावना वह कीड़ा था जो कभी कुलबुला सकता था। अतः यह तय किया गया कि भोपाल को प्रदेश की राजधानी बना दिए जाने से अलगाव का विचार कभी सिर नहीं उठा सकेगा। इन दो कारणों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कारण गिनाए जाते हैं किन्तु राजनीतिक कारण निर्विवाद रूप से सटीक बैठता है।

मध्यप्रदेश राज्य में आरंभ में 43 जिले थे। इसके बाद, वर्ष 1972 में दो बड़े जिलों का बंटवारा किया गया, सीहोर से भोपाल और दुर्ग से राजनांदगांव अलग किया गया। तब जिलों की कुल संख्या 45 हो गई। वर्ष 1998 में, बड़े जिलों से 16 और जिले बनाए गए और जिलों की संख्या 61 हो गई। नवंबर 2000 में राज्य का बंटवारा हो गया। भौगोलिक दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। राज्य का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा विभाजित कर छत्तीसगढ़ का नया राज्य बनाया गया। इस प्रकार, वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य अस्तित्व में आया, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और जो 308 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र पर फैला हुआ है।
अविभाजित मध्यप्रदेश का इतिहास अत्यंत सम्पन्न रहा है। इस भू-भाग को प्रागैतिहासिक काल से मानवों ने अपने निवास स्थान के रूप में चुना था। भीमबैठका, आबचंद की गुफाएं, खरबई के शैलचित्र, भीमकुण्ड का प्रचीनतम ज्वालामुखीय जलकुण्ड, रायगढ़ जिले के शैलाश्रय, लगभग 32 हजार साल पुराने सिंघनपुर के शैलाश्रय। कोटमसर अथवा कुटुम्बसर अथवा कोटसर की भूमि की सतह से 55 फीट नीचे 330 मीटर तक की लंबाई तक फैली गुफाएं संयुक्त मध्यप्रदेश की भौगोलिक प्राचीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। विभाजित मध्य प्रदेश में विंध्याचल पर्वत तथा सतपुड़ा की पर्वत-घाटियों पुराणों में में भी उल्लेख है। विपरीत दिशा में बहने वाली चिर कुंवारी नदी नर्मदा तथा सोन का नद मध्यप्रदेश की प्राकृतिक संपदा का गौरवशाली अभिन्न अंग है। बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमाड़ आदि की संस्कृतियों ने मध्यप्रदेश को अतुल्य सम्पन्नता दी है। प्रागैतिहासिक काल पाषाणकाल से शुरू होता है, जिसके गवाह भीमबेटका, भेड़ाघाट, जावरा, रायसेन, पचमढ़ी जैसे स्थान है। हालांकि राजवंशीय इतिहास, महान बौद्ध सम्राट अशोक के समय के साथ शुरू होता है, जिसका मौर्य साम्राज्य मालवा और अवंती तक विस्तृत था। कहा जाता है कि राजा अशोक की पत्नी विदिशा की थी, जिसके निकट बौद्ध तीर्थस्थल सांची मौजूद है। सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ और ई. पू. तीन से पहली सदी के दौरान मध्य भारत की सत्ता के लिए शुंग, कुशान, सातवाहन और स्थानीय राजवंशों के बीच संघर्ष हुआ। ई. पू. पहली शताब्दी में उज्जैन प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र था। गुप्ता साम्राज्य के दौरान चैथी से छठी शताब्दी में यह क्षेत्र उत्तरी भारत का हिस्सा बन गया, जो श्रेष्ठ युग के रूप में जाना जाता है। हूणों के हमले के बाद गुप्त साम्राज्य का पतन हुआ और उसका छोटे राज्यों में विघटन हो गया। हालांकि, मालवा के राजा यशोधर्मन ने ई. सन 528 में हूणों को पराभूत करते हुए उनका विस्तार समाप्त कर दिया। बाद में थानेश्वर के हर्षा ने अपनी मृत्यु से पहले ई.सन 647 तक उत्तरी भारत को फिर से एक कर दिया। मध्ययुगीन राजपूत काल में 950 से 1060 ई.सन के दौरान मालवा के परमरस और बुंदेलखंड के चंदेल जैसे कुलों का इस क्षेत्र पर प्रभुत्व रहा। भोपाल शहर को नाम देनेवाले परमार राजा भोज ने इंदौर और धार पर राज किया। गोंडवना और महाकौशल में गोंड राजसत्ता का उदय हुआ। 13 वीं सदी में, दिल्ली सल्तनत ने उत्तरी मध्यप्रदेश को हासील किया था, जो 14 वीं सदी में ग्वालियर की तोमर और मालवा की मुस्लिम सल्तनत (राजधानी मांडू) जैसे क्षेत्रीय राज्यों के उभरने के बाद ढह गई। 1156-1605 अवधि के दौरान, वर्तमान मध्यप्रदेश का संपूर्ण क्षेत्र मुगल साम्राज्य के तहत आया, जबकि गोंडवाना और महाकौशल, मुगल वर्चस्व वाले गोंड नियंत्रण के तहत बने रहे, लेकिन उन्होने आभासी स्वायत्तता का आनंद लिया। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल नियंत्रण कमजोर हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप मराठों ने विस्तार करना शुरू किया और 1720-1760 के बीच उन्होने मध्यप्रदेश के सबसे अधिक हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इंदौर में बसे अधिकतर मालवा पर होलकर ने शासन किया, ग्वालियर पर सिंधिया ने तथा नागपुर द्वारा नियंत्रित महाकौशल, गोंडवाना और महाराष्ट्र में विदर्भ पर भोसले ने शासन किया। इसी समय मुस्लिम राजवंश के अफगान के जनरल दोस्त मोहम्मद खान के वंशज भोपाल के शासक थे। कुछ ही समय में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल, बंबई और मद्रास जैसे अपने गढ़ों से शक्ति का विस्तार किया। उन्होने 1775-1818 में मराठों को पराजित किया और उनके राज्यों के साथ संधि कर उनपर सर्वोपरिता स्थापित की। मध्यप्रदेश के इंदौर, भोपाल, नागपुर, रीवा जैसे बड़े राज्यों सहित अधिकांश छोटे राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए। उत्तरी मध्यप्रदेश के राजसी राज्य सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा संचालित किए जाते थे। सीपी एंड बरार रूपी मध्यप्रदेश ने बहुत से राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे।

मध्यप्रदेश वनोपज का धनी है तथा वन्य जीवन से सुसम्पन्न है। इसके कुछ अंचल आर्थिक दृष्टि से पिछड़े रहे हैं क्योंकि ब्रिटिश काल में इनकी अवहेलना की गई। विशेष रूप से बुंदेलखंड में अंग्रेजों को सबसे अधिक विरोध का सामना करना पड़ा। ठग और पिण्डारियों से जूझना पड़ा अतः उन्होंने इस क्षेत्र को शिक्षा और विकास से दूर रखा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रदेश के पिछड़े हिस्सों में प्रगति की लहर दौड़ी। गति धीमी ही सही किन्तु थमी नहीं।
आज मध्यप्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। खेलकूद निरंतर गौरव हासिल कर रहा है। बस, कमी है तो संसाधनों के उचित दोहन की और विकास के आधुनिक प्रयासों की। प्रदेश के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जो खनिज संपदा से सम्पन्न हैं किन्तु कोई बड़ा औद्योगिक केन्द्र न होने से पिछड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में उद्योग-धंधे इसलिए भी नहीं लग पाते हैं क्योंकि हवाई संपर्क का अभाव है, रेलों की कमी है। पिछले कुछ दशक में सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ है किन्तु आईटी क्षेत्र सीमित है जिससे रोजगार के अवसर कम हैं। युवाओं को अपना राज्य छोड़ कर दूसरे राज्य जाना पड़ता है। युवाशक्ति का यह पलायन प्रदेश के विकास के लिए उचित नहीं है। प्रदेश में पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं। खजुराहो, ओरछा, मांडू, भेड़ाघाट, कान्हा, भेड़ाघाट आदि स्थलों के अतिरिक्त अनेक ऐसे स्थान हैं जिनका पर्यटन स्थलों के रूप में विकास किया जा सकता है।

प्रदेश में निरंतर प्रशासनिक इकाइयां बढ़ रही हैं। जैसे 15 अगस्त 2003 को तीन नए जिले अशोकनगर, बुरहानपुर तथा अनूपपुर का निर्माण किया गया। 17 मई 2008 को अलीराजपुर, 24 मई 2008 को सिंगरौली, 14 जून 2008 को शहडोल संभाग, 25 मार्च 2013 को नर्मदापुरम संभाग का गठन किया गया। 16 अगस्त 2013 को आगर मालवा का निर्माण हुआ। मध्य प्रदेश का 52 वां जिला निवाड़ी 01 अक्टूबर 2018 को अस्तित्व में आया। जो टीकमगढ़ जिले की 3 तहसील निवाड़ी, ओरछा, और पृथ्वीपुर को मिलकर बनाया गया। 5 अक्टूबर 2023 को दो नए जिले सतना से मैहर और छिंदवाड़ा से पांढुर्ना जिला अस्तित्व में आया। दो जिले नागदा व पिछोर प्रस्तावित हैं अगर इन 2 जिलों को मान्यता मिल गयी तो मध्य प्रदेश में 55 से बढकर 57 जिले हो जायेंगे। इसके पहले रीवा से अलग कर मऊगंज 53वां जिला बनाया गया था। प्रदेश का प्रशासनिक विकास निर्माणकार्य तथा शिक्षा आदि के विकास को सुनिश्चित करने में मदद करता है।
वर्ष 2023 में प्रदेश का स्थापना मास चुनाव का मास भी है। जिससे आचार संहिता लागू हो जाने पर कई समारोह एवं आयोजन स्थगित किए गए हैं किन्तु लोकतंत्र में चुनाव से बड़ा और कोई आयोजन एवं महोत्सव हो ही नहीं सकता है। वर्ष 2023 का नवंबर मास प्रदेश के स्थापना समारोह को प्रजातंत्र के सबसे बड़े चुनाव अनुष्ठान के साथ मना रहा है। यह चुनाव अनुष्ठान प्रदेश के भावी विकास की दिशा एवं गति को निर्धारित तथा सुनिश्चित करेगा। इसलिए इस बार का स्थापना मास और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। अंत में मेरी काव्यमय दो पंक्तियां भी अपने प्रदेश के लिए-
हृदय देश का, हरित, ललित है
मेरा मध्यप्रदेश।
उर्वर  धरती, नित्य श्रमित है 
मेरा  मध्यप्रदेश। 

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#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #CharchaPlus  #SagarDinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह #मध्यप्रदेश #स्थापनादिवस #MadhyaPradesh

Wednesday, November 28, 2018

हां, आज मैंने मतदान किया ...डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November
 मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में मैंने अपनी दीदी डॉ. वर्षा सिंह के साथ जाकर मतदान किया और मध्यप्रदेश के विकसित भविष्य की कामना की।
Dr (Miss) Sharad Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November

I am Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018
Dr (Miss) Sharad Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November

Dr Varsha Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November

Dr (Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November

Dr (Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November


Dr (Miss) Sharad Singh today Voted in Madhya Pradesh Legislative Assembly Election 2018, 28 November

Tuesday, November 13, 2018

एक दिल तोड़ने वाली यात्रा ... - डॉ शरद सिंह

A Heartbreaking Journey - Dr Sharad Singh

 एक दिल तोड़ने वाली यात्रा ... पन्ना (मध्य प्रदेश) की मेरी संक्षिप्त यात्रा ... किसी तरह से समय निकाल कर उस हिरणबाग कॉलोनी में पहुंची जहां मैं पैदा हुई, जहां मेरा बचपन बीता और जहां मैंने ज़िन्दगी को समझना शुरू किया। हिरणबाग का वह कैम्पस तो है लेकिन उसमें इतना दुखद परिवर्तन हो चुका है कि मैं देख कर अवाक् रह गई। एक पॉश कॉलोनी का कैसे सत्यानाश हो सकता है, यह देख कर मैं रो पड़ी... मेरे वह प्यारे घर (जो पी डब्ल्यू डी का सरकारी आवास था) का नक्शा ही बदल चुका है। अब लगता ही नहीं कि वहां कभी सुंदर और व्यवस्थित क्वार्टर्स रहे होंगे। वह विशाल कुआ जिसके पास हम बच्चों को जाने की मनाही थी, अवहेलना का दंश सहते हुए जर्जर हो चुका है ... आंसू आ गए यह सब देख कर... हां, पन्ना शहर ने कांक्रीट की सड़कों और घरों के रूप में विस्तार अवश्य कर लिया है किन्तु वह अपने अतीत की संपदा को खोता जा रहा है... अफ़सोस ....
 
Ruined Birth Place of Dr (Miss) Sharad Singh, Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Ruined Birth Place of Dr (Miss) Sharad Singh, Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Campus of Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Campus of Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Old Deep Well, Campus of Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)


Friday, February 13, 2015

शरद सिंह को साहित्य अकादमी सम्मान....Dr Sharad Singh honoured by Sahitya Academy Samman


Dr Sharad Singh honoured by Sahitya Academy Samman, 09.02.2015
हिन्दी की प्रतिष्ठित लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को उनके चर्चित उपन्यास
" कस्बाई सिमोन " के लिए वर्ष 2012 के प्रादेशिक "पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार " से साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद की ओर से दिनांक 09 फरवरी 2015 को राज्य पुरातत्व संग्रहालय सभागार, भोपाल में आयोजित अलंकरण समारोह में सम्मानित किया गया। उन्हें यह पुरस्कार समाजसेवी श्रीधर पराड़कर, कालिदास संस्कृत अकादमी उज्जैन के पूर्व निदेशक आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी, संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव, संस्कृति संचालक रेनू तिवारी एवं साहित्य अकादमी के निदेशक प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल ने प्रदान किया। सम्मान स्वरूप डॉ. शरद सिंह को 31 हजार रूपए की राशि के साथ स्मृतिचिन्ह, शॉल, श्रीफल एवं सम्मान-पत्र प्रदान किया गया। भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों पर " लिव इन रिलेशन " को परखने वाले उनके इस पुरस्कृत उपन्यास " कस्बाई सिमोन " को इससे पूर्व हेमंत फाउण्डेशन, मुंबई के " विजय वर्मा कथा सम्मान " एवं मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल के " वागीश्वरी सम्मान" से सम्मानित किया जा चुका है।  उल्लेखनीय है कि डॉ. शरद सिंह के अभी तक तीन उपन्यास, पांच कहानी संग्रह सहित विविध विषयों पर लगभग पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।



Dr Sharad Singh honoured by Sahitya Academy Samman, 09.02.2015
Dr Sharad Singh honoured by Sahitya Academy Samman, 09.02.2015

Dr Sharad Singh honoured by Sahitya Academy Samman, 09.02.2015

Dr Sharad Singh honoured by Sahitya Academy Samman, 09.02.2015