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Monday, April 20, 2026

मां डॉ विद्यावती मालविका की पांचवीं पुण्यतिथि पर सीताराम रसोई में भोजन कराया - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩 कुछ देर पहले लौटी हूं सीताराम रसोई से मां की स्मृति में वृद्धजन को अपने हाथों से भोजन परोस कर... भोजन से पहले उनके साथ भजन भी गाए... उनके साथ कुछ देर को सुकून मिलता है... वरना उस दिन की याद आत्मा को कुरेदती है कि उस कोरोना काल में मां को चार कंधों पर नहीं बल्कि शव वाहन में विदा करना पड़ा था अंतिम यात्रा के लिए, जबकि उन्हें कोरोना नहीं था... टीस उठती है आज भी... वह तो भाई डॉ विनोद तिवारी जैसे समाजसेवी अनुज ने हर क़दम पर साथ दिया... सहयोग किया और मां की अंतिम यात्रा को सम्मान सहित पूर्ण कराया, अन्यथा मैं नहीं जानती कि उस समय क्या, कैसे हो पाता ....
      🚩हर वर्ष जब मैं सीताराम रसोई में वृद्धजन को भोजन परोस रही होती हूं ठीक उस समय मेरे भाई विनोद रेलवे स्टेशन में यात्रियों को निःशुल्क शीतल जल पिला रहे होते हैं.... मुझे पता है वह चाह कर भी मानव सेवा के उस काम को छोड़कर नहीं आ सकेंगे लेकिन मैं  सीताराम रसोई पहुंचने की सूचना एक दिन पूर्व उन्हीं के द्वारा प्रेषित करती हूं... 
     🚩मैं जानती हूं कि मेरी दानराशि अथाह सागर में एक बूंद के समान है किंतु वहां पहुंचकर जिंदगी का एक और रूप देखने को मिलता है... वहां भोजन करने वाले वे वृद्धजन हैं जिन्हें वहां से बाहर दो रोटी भी नसीब नहीं हो पाती है... 
 🚩सीताराम रसोई का प्रत्येक कर्मचारी बहुत मिलनसार और उदार है... वहां का भोजन भी सुस्वाद और उच्चकोटि का है... मैं हर वर्ष जब जाती हूं तो प्रसादी के तौर पर थोड़ा सा भोजन चखती जरूर हूं... इससे यह संतुष्टि भी हो जाती है कि वहां वृद्धों को अच्छा भोजन परोसा जा रहा है...
     🚩मैं आभारी हूं साहिल सिक्योरिटी सर्विसेज के डायरेक्टर पंकज शर्मा जी की जो विगत 4 वर्ष से लगातार मुझे सीताराम रसोई अपनी गाड़ी में मित्रवत ले जाते हैं क्योंकि मेरे घर से संस्था बहुत दूर है  ... शहर के बिल्कुल दूसरे छोर पर... और आज के दिन मेरी मनःस्थिति भी कुछ ठीक नहीं रहती है...
     🚩साधुवाद के पात्र हैं वे सभी लोग जो सीताराम रसोई को निरंतर चला रहे हैं...
     🚩यह पांचवा वर्ष है जब मैं मां की स्मृति में सीताराम रसोई में वृद्धजन को भोजन परोस कर आई हूं... 


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मेरी मां डॉ विद्यावती मालविका जी की 5 वीं पुण्यतिथि - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पूरे 5 वर्ष... हां, मेरी मां साहित्य साधिका डॉ. विद्यावती "मालविका" जी को मुझसे दूर गए पूरे 5 वर्ष हो गए... आज ही के दिन 20 अप्रैल 2021 को वे चिरनिद्रा में लीन हो गई थीं... 😔
   मां के जाने पर दीदी डॉ वर्षा सिंह जी ने यह पोस्ट लिखी थी कि 
"छोड़ गईं मां हमें अकेला | स्वर्गीय माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" की स्मृतियों को नमन | डॉ. वर्षा सिंह"
https://varshasingh1.blogspot.com/2021/04/blog-post_22.html?m=1
   तब क्या पता था की मां के जाने के ठीक 13 दिन बाद दीदी भी मुझे हमेशा के लिए छोड़ कर चली जाएंगी... 😥
    ये दुख एक चट्टान की तरह मेरे सीने पर ताज़िंदगी रखे रहेंगे... 😔
Miss You Maa 💔
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मां की एक कविता ...

प्रिय है धरा बुंदेली
 - डॉ. विद्यावती "मालविका"

मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, 
सागर झील सहेली।।

उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किया,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,

सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।।

महाकाल के चरणों में बचपन बीता 
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,

ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं मालव कन्या हूं मुझको, 
प्रिय है धरा बुंदेली।।
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मां के साथ मेरी ये आखिरी तस्वीर ... तमाम परेशानियों के बाद भी तब हम बहुत खुश रहा करते थे क्योंकि मां साथ थीं...😔
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Saturday, April 20, 2024

मां डॉ विद्यावती "मालविका जी की तृतीय पुण्यतिथि पर सीताराम रसोई में पुत्री डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा वृद्धजन को भोजन

प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी मैंने वृद्धजन की सेवा तथा अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित संस्था श्रीसीताराम रसोई में अपनी मां डॉ विद्यावती "मालविका" जी की स्मृति में वृद्धजन को भोजन परोसा। यद्यपि मेरी अत्यंत अल्प सहयोग राशि सागर में एक बूंद के समान है किंतु वृद्धजन को अपने हाथों से परोसना बहुत सुख देता है।
   🚩 भोजन आरंभ होने के पूर्व नियमानुसार प्रतिदिन वृद्धजन प्रार्थना करते हैं और भजन गाते हैं। आज मैंने भी उनके साथ खड़ताल बजाते हुए भजन गए। मैंने स्पष्ट महसूस किया कि मेरा इस तरह उनके साथ बैठकर गाना उनके भीतर प्रसन्नता और ऊर्जा का संचार कर रहा था। मुझे भी बहुत प्रसन्नता हो रही थी। अपनत्व की भावना हमेशा हर पक्ष को सुख प्रदान करती है।
🚩 मेरा मानना है कि अपने प्रियजन की स्मृति में इस प्रकार वृद्धाश्रम, भोजन दान स्थल, बालाश्रम आदि में अवश्य जाना चाहिए। हमारा थोड़ा सा सानिध्य उन्हें बहुत-सा अपनापन देकर खुशियां देता है और हमें भी आत्मिक शांति मिलती है।
🚩 मेरे घर से श्री सीताराम रसोई की दूरी बहुत अधिक है। मेरा घर शहर के एक छोर पर है तो श्री सीताराम रसोई  शहर के दूसरे छोर पर ... आभारी हूं श्री पंकज शर्मा जी की जो मां  के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मुझे श्री सीताराम रसोई तक पहुंचने में प्रतिवर्ष सहयोग करते हैं।
🚩 जब आज मैंने सीताराम रसोई से अपने छोटे भाई विनोद तिवारी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वे रेलवे स्टेशन में पानी पिलाने में व्यस्त है क्योंकि इस समय दो ट्रेन आई हुई हैं। फिर उन्होंने एक बड़ी सुंदर बात कही जो मेरे मन को बहुत गहरे तक छू गई। विनोद भाई ने कहा कि "दीदी, मां हमें देख रही होंगी कि उनकी बेटी सीताराम रसोई में वृद्धों को खाना खिला रही है और उनका बेटा रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को पानी पिला रहा है। वे हमें देखकर प्रसन्न हो रही होंगी।"
🚩 यह सच है कि मेरी मां की स्मृति में विनोद भाई की छवि रेलवे स्टेशन में यात्रियों को पानी पिलाने वाले जन सेवक की ही रही। क्योंकि जब वे अस्पताल में थी और हमें संशय था कि वे लोगों को पहचान पा रही हैं या नहीं? फिर भी जब विनोद भाई ने उनसे पूछा की "मां मुझे पहचाना?" तो वे मुस्कुरा कर बोलीं, "हां बेटा, तुम वही हो जो रेलवे स्टेशन में यात्रियों को पानी पिलाते हो।"  शायद नाम उन्हें विस्मरण हो रहा था किंतु विनोद भाई का कार्य उनकी स्मृति में अच्छी तरह रचा बसा था। निश्चित रूप से उनका आशीष विनोद भाई जैसे प्रत्येक कर्मठ और सच्चे जन सेवकों पर हमेशा बना रहेगा।
🚩 मेरे घर से श्री सीताराम रसोई की दूरी बहुत अधिक है। मेरा घर शहर के एक छोर पर है तो श्री सीताराम रसोई  शहर के दूसरे छोर पर ... आभारी हूं श्री पंकज शर्मा जी की जो मां  के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मुझे श्री सीताराम रसोई तक पहुंचने में प्रतिवर्ष सहयोग करते हैं।
🚩 आभारी हूं  श्री सीताराम रसोई परिवार की... जहां कर्मचारी महिलाएं हमेशा मुस्कुरा कर आत्मीयता से स्वागत करती हैं तथा बड़ी जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का निर्वाह करती हैं। यह संस्था अशक्त वृद्धों को उनके घर पर भोजन पहुंचाने का कार्य भी करती है।
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Thursday, April 21, 2022

मां डॉ विद्यावती मालविका जी की प्रथम पुण्यतिथि पर श्रीसीताराम रसोई में बुजुर्गों की भोजन-सेवा - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

 

सीताराम रसोई के द्वार पर मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रिय मित्रों, कल अपनी मां डॉ विद्यावती मालविका जी की प्रथम पुण्यतिथि पर मैंने स्थानीय श्रीसीताराम रसोई संस्था में जाकर वृद्धों को खाना खिलाया। वे श्रीसीताराम रसोई संस्था की प्रशंसक थी और हमेशा कहा करती थीं कि "देखो यह संस्था उन बुजुर्गों के लिए कितना अच्छा काम करती है जिन्हें दो रोटी भी नसीब नहीं हो पाती है, उनका पेट भरती है यह संस्था।" इसीलिए मुझे यही उचित लगा की मां की प्रथम पुण्यतिथि कि सुबह मैं श्रीसीताराम रसोई में अपना समय व्यतीत करूं और बुज़ुर्गों को खाना खिलाऊं। मैं जानती हूं की संस्था जितने लोगों का रोज पेट भर रही है उस अनुपात में मेरा सहयोग सागर में एक बूंद के समान था। मैं वास्तव में बहुत प्रभावित हुई वहां पहुंचकर स्वच्छता और साफ सफाई में अव्वल, सुस्वाद भोजन और आत्मीयता भरा वातावरण।

चलिए, मैं शुरू से सब कुछ साझा करती हूं....
जिस दिन मेरे मन में यह विचार आया कि मैं श्रीसीताराम रसोई मैं बुजुर्गों को खाना खिलाऊंगी। उसी दिन मैंने अपने अनुज विनोद तिवारी को फोन करके अपनी मंशा बताएं। उन्होंने कहा "यह बहुत अच्छा विचार है दीदी!"
भाई विनोद तिवारी भी श्रीसीताराम रसोई से संबद्ध हैं और उन्होंने मेरी इच्छा के बारे में संस्था को सूचित कर दिया। इससे पूर्व मैं स्वयं श्रीसीताराम रसोई कभी नहीं गई थी अतः एक संकोच का अनुभव भी हो रहा था कि वहां क्या होगा? कैसा होगा? कहीं मुझसे कोई त्रुटि न हो जाए। तब मैंने विनोद भाई से आग्रह किया, साथ चलने का। किंतु दुर्भाग्यवश विनोद भाई के परिवार में ग़मी हो गई और 20 तारीख की सुबह उनका फोन आया कि "दीदी, मैं नहीं आ पाऊंगा लेकिन आपको वहां ऑफिस में जो महिला मिलेंगी, वे आपकी पूरी मदद करेंगी। आपको कोई असुविधा नहीं होगी। आप वहां दान-रसीद कटा लीजिएगा और सेवा कार्य कर लीजिएगा।
यह संस्था मेरे निवास से शहर के बिल्कुल दूसरे छोर पर स्थित है। उधर मेरा कम ही आना जाना हुआ है। मुझे ध्यान आया कि उसी क्षेत्र में बुंदेली के विख्यात गायक देवी सिंह राजपूत जी का निवास है। अतः मैंने उन्हें फोन किया कि विनोद भाई नहीं आ पा रहे हैं और मुझे एक संकोच का अनुभव हो रहा है। थोड़ी घबराहट सी भी महसूस हो रही है तो क्या आप आ सकते हैं? वे सहर्ष तैयार हो गए। मैंने किसी को भी आमंत्रित नहीं किया था और देवी सिंह राजपूत जी को भी आमंत्रित करते हुए संकोच हो रहा था क्योंकि जब पारा 42-44 डिग्री चल रहा हो तो उस समय किसी से भी यह कहना कि वह घर से बाहर निकल कर मेरे साथ कहीं चले, बड़ा अजीब और संकोच भरा लगता है। सहज स्वभाव के देवी सिंह राजपूत जी उस लू-लपट में भी उत्साह पूर्वक उपस्थित हो गए। श्री पंकज शर्मा का भी उल्लेखनीय सहयोग रहा । गर्मी की तीव्रता के कारण ही मैंने बड़े भाई उमाकांत मिश्र जी, अध्यक्ष श्यामलम संस्था से सिर्फ़ चर्चा की थी, उनसे आने का आग्रह नहीं किया था ताकि वे धूप गर्मी में वे परेशान न हों, किंतु उन्हें लगा कि मैं कहीं अकेली परेशानी का अनुभव न करूं अतः वे भोजन समाप्त होने के पूर्व ही श्री कपिल बैसाखिया जी एवं श्री मुकेश तिवारी जी के साथ वहां आ गए। मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य था। निश्चित रूप से उनका यह अपनत्व अमूल्य है मेरे लिए।
बाहरहाल, में श्रीसीताराम रसोई पहुंची। वहां जैसा कि विनोद भाई ने बताया था, ऑफिस में वह महिला मिली। बहुत ही मिलनसार, बहुत ही प्यारी सी महिला। उन्होंने मेरी दान-रसीद काटी और अपनी संस्था के बारे में बहुत सी जानकारी दी। तत्पश्चात, लगभग 11:15 पर हम लोग डाइनिंग हॉल पहुंचे। जहां वृद्धजन दरियों पर बैठे हुए थे, महिलाएं भी पुरुष भी। इसके पूर्व कि खाना परोसा जाता, वहां वृद्धजन बड़े उत्साह के साथ भजन गा रहे थे और उनका उत्साह देखते ही बन रहा था। उन्हें देखकर लगा कि इतनी ऊर्जा से भरे हुए व्यक्तियों की कैसे कोई अवहेलना कर सकता है? बहुत आश्चर्य हो रहा था मुझे और साथ ही दुख भी। ठीक 11:30 बजे भोजन परोसने का समय आया तो वहां की महिला कर्मचारी ने मुझसे पूछा कि "आप खाना परोसेंगी या हम लोग परोसना शुरू कर दें ?" तो मैंने उनसे निवेदन किया कि यह कार्य मुझे भी करने दे। ... और मैंने उनके साथ मिलकर बुजुर्गों को खाना परोसा। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी मां को खाना परोस रही हूं। उस समय एक अत्यंत आत्मिक सुख का अनुभव हो रहा था। मन था भावुकता से भर उठा था आंसू छलक पड़ने को तत्पर थे किंतु मैं उन बुजुर्गों के सामने रो कर उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी। अतः मैंने अपनी भावनाओं पर बामुश्क़िल नियंत्रण रखा। मुझे यह देख कर बड़ा अच्छा लग रहा था कि वहां का पूरा स्टाफ बहुत ही हंसमुख, उदारमना और मिलनसार था। उन्होंने हमसे भी आग्रह किया कि हम बुजुर्गों को खिलाया जाने वाला भोजन खा कर देखें ताकि संतुष्ट हो सके कि उन्हें उचित भोजन दिया जा रहा है या नहीं। उनके विशेष आग्रह पर हम सभी ने थोड़ा-थोड़ा-सा खाना चखा और वास्तव में वह खाना इतना सुस्वाद की उनकी प्रशंसा किए बिना हम लोग नहीं रह सके।
वहां मेरी मुलाकात हुई श्री ठाकुर साहब से, जो बहुत ही सादगी भरे लिबास में थे और उन कर्मचारियों के साथ ही हाथ बंटा रहे थे। मैं उन्हें नहीं पहचानती थी किंतु जब परिचय हुआ तो मैं चकित रह गई कि वे श्रीसीताराम रसोई के संचालनकर्ताओं में से एक हैं और साथ ही पेट्रोल पंप के मालिक भी हैं। यूं तो मुझे ज्ञात था कि इस संस्था को संचालित करने वालों में जो प्रमुख नाम हैं, वे वास्तव में समाजसेवी प्रवृत्ति के हैं जैसे इंजीनियर प्रकाश चौबे, डॉक्टर चउदा, पेट्रोल पंपवाले ठाकुर साहब। इनमें से इंजीनियर प्रकाश चौबे और डॉ चउदा से कई बार मुलाकात हो चुकी है किंतु ठाकुर साहब से मेरी मुलाकात पहली बार हुई। ये सभी लोग इतने मिलनसार, सरल और सहज स्वभाव के हैं कि इनसे मिलकर यह महसूस नहीं होता कि हम किसी धनाढ्य व्यक्ति से मिल रहे हैं। अपने ही जैसे एक आम आदमी से मुलाक़ात जैसा अनुभव होता है। इनकी इसी सज्जनता के फलस्वरुप ही एक इतनी अच्छी संस्था शहर में संचालित हो रही है।
दानदाताओं के सहयोग से इस संस्था में आटा गूंथने, रोटी सेंकने तथा सब्जियां छीलने की ऑटोमेटिक मशीनें लगी हुई हैं। साथ ही स्वच्छ पानी के लिए आरो फिल्टर की व्यवस्था है। संस्था की ओर से उन बुजुर्गों के लिए भी डिब्बे में खाना भेजा जाता है जो वहां तक चलकर आ पाने में असमर्थ हैं। साथ ही वहां मुझे ज्ञात हुआ यह संस्था उन बच्चों के लिए दलिया, खिचड़ी जैसे पौष्टिक भोजन उनके घरों में भेजती है जो बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और जिन्हें अच्छा भोजन नहीं मिल पाता है। ऐसे बच्चों के लिए संस्था की ओर से प्रतिदिन दलिया खिचड़ी जैसे खाद्य पदार्थ भेजे जाते हैं। यह सब देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा और सबसे बड़ी बात यह महसूस करके सुकून पहुंचा कि अभी मानवता इस धरती पर विद्यमान है। लोगों ने एक दूसरे का ख्याल रखना अभी पूरी तरह से भुलाया नहीं है। इस धरती पर ऐसे लोगों की अभी भी मौजूदग़ी है जो जरूरतमंदों का निस्वार्थ भाव से ध्यान रखते हैं। कल दोपहर तक जितनी देर में श्रीसीताराम रसोई में रही बहुत ही भावुक समय था मेरे लिए... और मुझे लगता है कि मेरी मां को भी मेरा यह कार्य निश्चित रूप से सुखद लगा होगा। उन्हीं ने तो सिखाया था दुखीजन की सेवा करना।
व्यक्तिगत रूप से भी मुझे लगता है कि कर्मकांड और आडंबरों के बजाएं दुखी, पीड़ितों, अभावग्रस्त लोगों की सेवा करना ही सबसे उत्तम कार्य है। यदि पुण्य की अवधारणा को माना जाए तो इससे बड़ा पुण्य और कोई नहीं है।
संत कबीर का यह दोहा अक्सर मुझे याद आता है..
कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर।।
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संस्था द्वारा व्हाइटबोर्ड पर प्रतिदिन दानदाताओं का उल्लेख किया जाता है ... यह उनके कार्य की पारदर्शिता है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बुजुर्गों को भोजन परोसती मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बुजुर्गों को भोजन परोसती मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बुजुर्गों को भोजन परोसती मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह

भोजन परोसने का आत्मिक सुख - डॉ शरद 

डॉ शरद सिंह रसोईघर का अवलोकन करते हुए

भजन गाते वृद्धजन

भोजन की प्रतीक्षा में सुस्ताते वृद्धजन

मैं डॉ शरद सिंह एवं बड़े भाई श्री उमाकांत मिश्र

लोकगीत गायक श्री देवी सिंह राजपूत मैं डॉ शरद सिंह एवं श्री उमाकांत मिश्र अध्यक्ष श्यामलम संस्था।

लोकगीत गायक श्री देवी सिंह राजपूत मैं डॉ शरद सिंह रसोईघर का अवलोकन करते हुए


लोकगीत गायक श्री देवी सिंह राजपूत मैं डॉ शरद सिंह रसोईघर का अवलोकन करते हुए

संस्था के रसोईघर महिला कर्मचारियों द्वारा विशेष आग्रह किए जाने पर भोजन का हम सभी ने स्वाद लिया। बाएं से- श्री पंकज शर्मा, श्री उमाकांत मिश्र, श्री ठाकुर साहब, डॉ सुश्री शरद सिंह एवं श्री देवी सिंह राजपूत।

संस्था के रसोईघर महिला कर्मचारियों द्वारा विशेष आग्रह किए जाने पर भोजन का हम सभी ने स्वाद लिया। बाएं से- श्री पंकज शर्मा, श्री उमाकांत मिश्र, श्री ठाकुर साहब, डॉ सुश्री शरद सिंह एवं श्री देवी सिंह राजपूत।

संस्था के रसोईघर महिला कर्मचारियों द्वारा विशेष आग्रह किए जाने पर भोजन का हम सभी ने स्वाद लिया। बाएं से- श्री पंकज शर्मा, श्री उमाकांत मिश्र, श्री ठाकुर साहब, डॉ सुश्री शरद सिंह एवं श्री देवी सिंह राजपूत।

बाएं से- श्री  देवी सिंह राजपूत, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, श्री उमाकांत मिश्र एवं श्री ठाकुर साहब

बाएं से - श्री देवी सिंह राजपूत, श्री पंकज शर्मा श्री कपिल बैसाखिया, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, श्री उमाकांत मिश्र एवं श्री ठाकुर साहब

बाएं से - श्री देवी सिंह राजपूत, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, श्री उमाकांत मिश्र

बाएं से - श्री देवी सिंह राजपूत, श्री पंकज शर्मा श्री कपिल बैसाखिया, डॉ (सुश्री) शरद सिंह

 डॉ (सुश्री) शरद सिंह श्रीसीताराम रसोई के डाइनिंग हॉल में

 डॉ (सुश्री) शरद सिंह श्रीसीताराम रसोई के डाइनिंग हॉल में

श्रीसीताराम रसोई के द्वार पर  डॉ (सुश्री) शरदसिंह
 श्रीसीताराम रसोई के द्वार पर श्री देवी सिंह राजपूत, उमाकांत मिश्र, डॉ (सुश्री) शरदसिंह, श्री मुकेश तिवारी
श्रीसीताराम रसोई के द्वार पर श्री देवी सिंह राजपूत, उमाकांत मिश्र, डॉ (सुश्री) शरदसिंह, श्री मुकेश तिवारी