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Thursday, February 14, 2019

चर्चा प्लस ... राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ. शरद सिंह

यूं तो वेलेंटाइन के दिन तलाक की चर्चा अटपटी लगती है लेकिन बात स्त्री के अधिकारों की हो तो मुझे हर दिन उचित लगता है...
      चर्चा प्लस ...
      राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़
        - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
                                 राजनीतिज्ञ महिलाओं का सचमुच हित चाहते हैं या फिर सिर्फ़ दिखावा करते हैं, इनदिनों यह यक्षप्रश्न मुंह बाए खड़ा है। एक दल ने ट्रिपल तलाक के विरोध में आवाज़ उठाई तो दूसरा दल कह रहा है कि वह सत्ता पर आया तो ट्रिपल तलाक से संबंधित कानून को रद्द कर देगा। न पहले मुस्लिम महिलाओं से बहुमत लिया गया और न अब महिलाओं से पूछा जा रहा है। ट्रिपल तलाक का मुद्दा सफलता की पींगें भरेगा या औंधेमुंह गिरेगा, यह कहना अभी कठिन है लेकिन यह तो तय है कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीति के झूले में जिस तरह झुलाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है।       
 चर्चा प्लस .. राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ शरद सिंह ... Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily
     23 अगस्त 2017 ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘आखिर मिल ही गया तीन तलाक से तलाक’’। जिसमें मैंने लिखा था कि -‘‘ 22 अगस्त 2017 का दिन भारतीय न्यायायिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह तारीख गवाह रहेगी भारतीय मुस्लिम महिलाओं की उस जीत की जो उन्होंने अपने मानवीय अधिकारों पक्ष में हासिल की। यही वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय उस मार्ग को भी प्रशस्त करता है जो एक दिन सभी भारतीय मुस्लिम महिलाएं को दुनिया की सभी प्रगतिशील महिलाओं की पंक्ति में ला खड़ा करेगा। ‘तीन तलाक’ की प्रथा के विरोध ने भले ही कड़ा संघर्ष झेला लेकिन अनेक चौंकाने वाली सच्चाइयां भी सामने आईं जिनसे स्वयं अधिकांश भारतीय मुस्लिम महिलाएं अनभिज्ञ थीं।

इससे पहले 30 मार्च 2016 को ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘मुस्लिम महिलाओं का भविष्य’’। इस लेख में मैंने एक सर्वे के हवाले से आंकड़े देते हुए लिखा था कि -‘‘सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ।’’ इसी लेख में मैंने आगे जानकारी दी थी कि ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और विषेषरुप से मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है। यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और ‘कुरआन’ के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी।’’

आज स्थितियां इतनी अधिक राजनीतिक हो गई हैं कि महिलाओं के हित के बजाएं ‘ट्रिपल तलाक कानून’ पुरुषों के विरुद्ध दिखाई देने लगा है। इस कानून में यदि कोई विसंगति है तो इसमें संशोधन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बेहतर होगा कि संशोधन से पहले मुस्लिम महिलाओं से उस पर बहुमत लिया जाए। जिस राजनीतिक दल की पहचान सेक्यूलर के रूप में हमेशा रही हो, उसके तरफ से ऐसे बयान चौंकाने के लिए पर्याप्त हैं, वह भी लोक सभा चुनाव के ठीक पहले। जबकि एक साथ तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में से तीन जजों ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना। कोर्ट ने सरकार को इस पर कानून बनाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सरकार संसद में इस पर कानून बनाए।
ट्रिपल तलाक कानून को लेकर कांग्रेस की तरफ से बड़ा बयान उस समय सामने आया जब कांग्रेस के अल्पसंख्यक महाधिवेशन में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने कहा, ’अगर हमारी सरकार आई, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लाए ट्रिपल तलाक कानून को खत्म कर देंगे।“ उन्होंने यह भी कहा कि ये कानून मुस्लिम पुरुषों को जेल में भेजने की एक साजिश है। उस समय वे विगत 07 फरवरी 2019 को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्यम कार्यकर्ता भी मौजूद थे। जबकि 30 जनवरी 2019 की घटना है कि एटा की महिला को कथित तौर पर घर समय पर नहीं आने की वजह से उसके पति ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया। पीड़ित महिला ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि उसने अपने पति से वादा किया था कि वह तीस मिनट के भीतर लौट आएगी, मगर ऐसा नहीं करने पर उसे तुंरत तलाक दे दिया गया। महिला ने कहा कि ’मैं अपनी दादी मां को देखने अपने मायके गई थी. मेरे पति ने आधे घंटे के भीतर आने को कहा था। मैं दस मिनट लेट हो गई. उसके बाद उन्होंने मेरे भाई के मोबाइल पर फोन किया और तीन बार ’तलाक-तलाक-तलाक’ कहा. उनकी इस हरकत से मैं पूरी तरह से टूट गई।’

एक ओर महिला नेतृत्व प्रदान करती प्रियंका गांधी आपनी पूरी ताकत आगामी चुनाव में झोंक देने को दृढ़संकल्प हैं और इधर सुष्मिता देव अपने बयान पर अडिग हैं। कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव  ने कहा है कि वह तीन तलाक विधेयक पर दिए अपने बयान पर कायम हैं। देव ने कहा था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो पार्टी मुस्लिम समुदाय के भीतर चर्चा से निकले विकल्पों पर जाने के बजाए तीन तलाक विधेयक  को रद्द करेगी। सांसद देव ने बताया, “जो मैंने उस दिन (गुरुवार) बैठक में कहा था, वहीं मैंने संसद के अंदर भी कहा है। तीन तलाक को अपराध करार देने वाले सभी कानूनों को कांग्रेस बदार्श्त नहीं करेगी।” उन्होंने कहा, “और उसके बाद मैंने यह भी कहा था कि जो भी कानून महिला सशक्तिकरण के लिए हैं, हम उन कानून का समर्थन करेंगे। लेकिन हम (तलाक के) अपराधीकरण का समर्थन नहीं करेंगे।”
यह हठधर्मिता है या एक ऐसा तुष्टिकरण वाला कदम जो कम से कम मुस्लिम महिलाओं के हित में तो दिखाई नहीं दे रहा हैं। देखा जाए तो यह मुद्दा समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ है। यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएं सन् 1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। देखा जाए तो संशोधन की शुरुआत सन् 1772 की हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुआ। यद्यपि सन् 1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की। इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई थी।
सन् 1985 में मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो को पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया कि उन्हें आजीवन गुजारा भत्ता दिया जाए। शाहबानो के मामले पर जमकर हंगामा हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने संसद में ’मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स आफ डाइवोर्स) एक्ट पास कराया जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के मामले में दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और निर्वाह भत्ते को आजीवन न रखते हुए तलाक के बाद के 90 दिन तक सीमित रख दिया गया।
कुर्सी का लालच और मीडिया में बने रहने की चाह में डूबे कथित राजनीतिज्ञों को कम से कम एक बार उन तीन महिलाओं के संघर्ष को याद कर लेना चाहिए जो निरंतर जूझती रहीं तीन तलाक के विरुद्ध। पहली महिला - जयपुर की आफ़रीन रहमान जिन्हें एक चिट्ठी में तीन बार तलाक लिख कर तलाक दे दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया लेकिन स्वयं के लिए नहीं बल्कि इस बात को ध्यान में रख कर कि “अपने पति पर निर्भर अन्य औरतों को ऐसी नाइंसाफ़ी का सामना ना करना पड़े।’’ दूसरी महिला - सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की अतिया साबरी जिनके पति ने दस रुपए के स्टैम्पपे पर तीन तलाक लिख कर उनके मायके भेज कर उन्हें तलाक दे दिया था। निराश हो कर अतिया ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रथा को असंवैधानिक क़रार देने की अपील की। इसके साथ मांग की कि ऐसा क़ानून बनाया जाए जो मुसलमान महिलाओं को तलाक़ से जुड़े फ़ैसले लेने के समान अधिकार दे। तीसरी महिला - काशीपुर, उत्तराखंड की शायरा बानो जो अपने पति के तीन तलाक के निर्णय से आहत् हो कर सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं। अक्तूबर 2015 में जब पति ने शायरा  के पास तलाक़ वाली चिट्ठी भेजी तब उनका बेटा और बेटी उनके पति के पास ही थे जिनसे वे दोबारा कभी नहीं मिल सकती थीं। एक मां की तड़प के साथ उन्होंने कोर्ट से अपील की कि “मैं तो इस प्रथा का शिकार हुई लेकिन ये नहीं चाहती कि आने वाली पुश्तें भी इसे झेलें, इसीलिए मैंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इसे असंवैधानिक क़रार दिया जाए।“
समान नागरिक अधिकार के मुद्दों को इस तरह राजनीतिक झूले पर झुलाते रहना जहां एक ओर लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह महिला अधिकारों का भी हनन करता है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 14.02.2019)
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Wednesday, October 31, 2018

चर्चा प्लस : 31 अक्तूबर जन्मदिन पर विशेष : ‘स्टेच्यू आफॅ यूनिटी’ से ऊंचा है सरदार वल्लभ भाई पटेल का क़द - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss)Sharad Singh
चर्चा प्लस  
31 अक्तूबर जन्मदिन पर विशेष :
  ‘स्टेच्यू आफॅ यूनिटी’ से ऊंचा है सरदार वल्लभ भाई पटेल का क़द
 - डॉ. शरद सिंह
       सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा के अनावरण के साथ ही यह प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में जानी जाएगी। सरदार वल्लभ भाई पटेल राजनीति जगत के वह स्तम्भ थे जिनका क़द किसी भी स्टेच्यू या किसी भी राजनीतिज्ञ से बहुत बड़ा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में जो एकीकृत स्वरूप है, वह सरदार पटेल की ही देन है। सरदार पटेल के जन्मदिन के अवसर पर मैं अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : वल्लभ भाई पटेल’ के कुछ अंश यहां दे रही हूं जो सन् 2015 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी।    
Charcha Plus a column of Dr Sharad Singh in Daily Sagar Dinkar Newspaper
         देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा के अनावरण के साथ ही यह प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में जानी जाएगी। इसे अहमदाबाद से 200 किमी दूर सरदार सरोवर डैम के निकट स्थापित किया गया है। इस प्रोजेक्ट की घोषणा 2010 में की गई थी, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2013 में इसकी आधारशिला रखी थी तथा इंजीनियरिंग कंपनी एल एंड टी को इसका कांट्रैक्ट दिया गया था। कुल 182 मीटर ऊंची इस प्रतिमा के निर्माण में 25,000 टन लोहे और 90,000 टन सीमेंट का इस्तेमाल किया गया। स्टैच्यू को 7 किमी दूर से देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि राज्य की असेंबली सीट 182 के बराबर ही इसकी ऊंचाई 182 मीटर रखी गई है।  
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि 31 अक्टूबर 1875 को जब वल्लभ भाई का जन्म हुआ तो गांव में अनेक शुभ समाचार प्राप्त हुए जिससे वल्लभ भाई के जन्म को शुभ मानते हुए प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। वल्लभ भाई जन्म से ही आकर्षक छवि के थे। गांव के लोग उन्हें अपनी गोद में लकर दुलारना पसन्द करते थे। उस समय यह किसी को पता नहीं था कि यही बालक एक दिन आधुनिक भारत का निर्माता बनेगा। सरदार वल्लभ भाई पटेल के पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। करमसाड गांव के आस-पास दो उपजातियों क निवास था-लेवा और कहवा। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के पुत्रों लव और कुश से मानी जाती है। वल्लभ भाई पटेल का परिवार लव से उत्पन्न लेवा उपजाति का था जो पटेल उपनाम का प्रयोग करते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। स्वतंत्र भारत को सुव्यवस्थित, सुसंगठित एवं आधुनिक स्वरूप प्रदान करने वाले व्यक्तित्व सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन स्वयं में एक आदर्श जीवन था। उन्होंने कभी भी समझौतावादी नहीं किया। वे स्पष्टवादी थे तथा ऐसे ही आचरण की अपेक्षा दूसरों से भी रखते थे। उनके विचारों में असीम दृढ़ता थी। वे जो कार्य एक बार स्वीकार कर लेते उसे हर हाल में सफलतापूर्वक पूरा करके ही विश्राम करते। उनका यह स्वरूप भारतीय रियासतों के विलय के समय प्रत्यक्षरूप से उभर कर सामने आया। वैसे बाल्यावस्था से ही यह दृढ़ता उनके भीतर मौजूद थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सबसे दुरूह दायित्व वल्लभ भाई की प्रतीक्षा कर रहा था। यह दायित्व था देशी रियासतों के एकीकरण का। यदि स्वतंत्रता प्राप्त हो जाने के बाद भी भारत पूर्व की भांति अनेक रियासतों में बंटा रहता तो उस स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं रहता। क्योंकि वे रियासतें स्वार्थ के वशीभूत देश की प्रगति में बाधाएं खड़ी करने का काम करतीं। किन्तु वल्लभ भाई किसी भी मूल्य पर स्वतंत्रता के महत्व को कम नहीं होने दे सकते थे। वल्लभ भाई ने ऐसा राजनीतिक दृढ़ता का चमत्कार कर दिखाया कि एक वर्ष के भीतर ही अधिकांश रियासतें स्वेच्छा से भारतीय संघ में विलीन होकर उसका एक उपयोगी अंग बन गईं। सरदार पटेल का नाम भारत की तत्कालीन 563 रियासतों के भारत में विलीनीकरण के कारण बहुत ही सम्मान से लिया जाता है। उनके ‘लौहपुरूष’ होने का प्रमाण उनके द्वारा रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने के उनके महान कार्य में देखने को मिला।
भारत की स्वतंत्रता संग्राम में राजशाही का कोई विशेष योगदान नहीं था। बहुत से शासक केवल नाममात्र के शासक थे। छोटे-छोटे रजवाड़े अपने किलों में या दरबारों में अपनी प्रशंसा कराके ही खुश हो जाते थे। परंतु इसके उपरांत भी उनके भीतर यह इच्छा अवश्य थी कि स्वतंत्र भारत में संभवतः वह भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकेंगे। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में भी वे अपनी राजशाही का स्वप्न देख रहे थे। उनकी यह अभिलाषा उस समय और भी बलवती हो गयी जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतदारों को यह अधिकार दे दिया कि वह चाहें तो भारत के साथ जा सकते हैं, चाहें तो पाकिस्तान के साथ जा सकते हैं और यदि चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बनाए रख सकते हैं। वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली पुस्तक है ‘‘दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स’’(1955)  और दूसरी पुस्तक (1957) का ष्शीर्षक है- ‘‘दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डिया’’। पहली पुस्तक ‘‘दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स’’ पुस्तक में उल्लेख है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे एटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे। माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि ‘‘जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थी, के शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।’’
माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने सरदार पटेल की सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ‘ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया। इतिहास लेखिका ऑलेक्स फॉन टुलसेनमाल के अनुसार अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। टुलसेनमाल ने लिखा है कि -”लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबाद, कश्मीर, भोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था तथा वह मुस्लिम था जबकि  उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतः मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे। उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थी, पाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500मील से ज्यादा दूर।’’
इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरू और पटेल को ”घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेल ने कठोरता से काम लेते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल राजनीति जगत के वह स्तम्भ थे जिनका क़द किसी भी स्टेच्यू या किसी भी राजनीतिज्ञ से बहुत बड़ा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में जो एकीकृत स्वरूप है, वह सरदार पटेल की ही देन है।
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          ( सागर दिनकर, 30.10.2018)

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