Sunday, June 21, 2026

Yoga for Healthy Ageing - Dr (Ms) Sharad Singh | Happy International Yoga Day

Happy International Yoga Day.

And, follow the  this year's theme is "Yoga for Healthy Ageing".
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Thursday, June 18, 2026

बतकाव बिन्ना की | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    रामधई! जबसे हमने बा खबर पढ़ी तभईं से हमें बेजा टेंसन हो रओ। अब आप कैहो के ईरान औ अमेरिका को मेल भओ जा रओ, ईमें टेंसन की का बात? सो बात ऊ नइयां। अब आप कैहो के अपने परधानमंत्री जू जी-7 शिखर सम्मेलन में गए, ऊको टेंसन आएं? सो हमें ऊको काए खों टेंसन हुइए? बा तो अच्छो काम आए। औ रई मैंगाई के बढ़बे की बात आए, सो ऊको टेंसन के लाने तो अपन टेंसन प्रूफ हो गए आएं। काए से के अपने इते तो मैंगाई जब चाए तब बढ़त रैत आए। बा तो पूरी आवारा लुगाई आए। चाएं जबें मों उठाए निकर परत आए। कोऊ से रोके से नईं रुकत। सो ऊकी तो छोड़ो। हमें टेंसन हो रई ऊ खबर पढ़े से जोन में बताओ गओ के एनसीईआरटी वारन ने मोहनजोदड़ो के टेम की नचनियां की मूरत खों कपड़ा पैन्हा के फोटू छाप दई। अब जो का आए? अरे तुमें नईं पुसा रई तो बिलकुलई ने छापो, ऊको कपड़ा पैन्हाबे की का जरूरत हती? अब आई ओरें सोचो के जोन जमाना की बा मूरत आए, ऊ जमाना में नचनियां ऊंसई रैत रई हुइंए। जा सो देखबे वारे की नजर को दोस कहाओ के बा ऊमें कला औ इतिहास ने देख पा रए, बाकी बा उनको नंगी दिखा रई। औ छापो बी कोन सी किताब में? बा कला वारी किताब में। याने उनें कला तो तनकऊं ने दिखानी। तभई तो कई गई आए के ‘‘जाकी रई भावना जैसी...’’। 

एनसीईआरटी वरान ने जे बी ने सोची के उनकी किताबें पढ़बे वारन खों जा कैसे पतो परहे के ऊ टेम पे कैसो रओ जात्तो? ऊ टेम पे नाचने वारियां कैसो गैहना पैन्हत्तीं? और कैसे हुन्ना-लत्ता ओढ़त्ती? सोचबे की बात सो जे आए के ऊ टेम पे सोच इत्ती छोटी ने हती। ऊ टेम के लोगों के लाने नचनियों की बा सजावट कोनऊं खास बात ने हती, तभईं तो ऊ टेम के मूरत बनानबे वारे ने ऐसी मूर्ती बनाई। अब इनखों सरम आ रई। तनक औ पाछूं चलो तो एक टेम तो बा बी रओ जब अपने पुरखा रहें कपड़ा पहनबों लौं नई जानत्ते। बो का कहाउत आए के होमोसंपियंस वारे जमाना के इंसानों की फोटू छापत समै जे ओरें ऊ टेम के इसानों को सोई कओ धुतिया पैन्हा दें। 

मोहनजोदड़ो की बा मूर्ती 4500 साल पुरानी आए, आज की नोंई। ऊको कपड़ा पैन्हा के का दिखाबो चात आएं? अपन ओरें ऊ संस्कृति के आएं जीमें अजंता की गुफाओं में भगवान बुद्ध के जमाने की किसां के चित्र बनाए में लुगाइयन खों सरीर के ऊपरी भाग में कछू नईं पैन्हाओ गओ आए। काए से के ऊ टेम पे बे ऊंसई रैती रईं हुंइए। बा चित्रन से ऊ टेम के रैबो-खाबो को पता परत आए। अब का जे ओरें बे चित्रन खों बी मिटवा दैहें?
तभई से तो हमें तो अपने खजुराओ की फिकर होन लगी आए। उते तो मुतकी मूर्तियां एसी आएं जोन में पुतरियों ने आर-पार दिखात भए कपड़ा पैन्हें आएं। का बे उने बी कम्पूटर से कपड़ा पैन्हा दैहें? 
ऐ हते मुगल हरें जोन ने इते आ के सुंदर-सुंदर मूर्तियां तोड़ डारीं औ एक हैं जे एनसीआईआरटी वारे जो कला खों कला रैन देबे मे इज्जत जा रई। तनक सोचो के खजुराओ की मूर्तियन खों जो कपड़ा पैन्हा दए जाएं तो कैसो लगहे? जा सोच केई अपने सर के बार पटाबे को जी करओ।  
जे एनसीईआरटी वारे पैले बी ऐसई मुतकी बेर दोंदरा दे चुके आएं। औ हर दार मों की खा के बी नईं मानत आएं। एक तरफी तो मोहनजोदड़ो की ‘डांसगिंगर्ल’ खों कपड़ा पहनाबे को काम कर डारो औ अभई कछू मईना पैले 8 मीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में एक पाठ जोड दओ रओ जोन को टाईटल हतो ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’’। अब आपई सोचो के ऐसो पाठ पढ़ के तो बच्चा हरों को कानून से भरोसोई उठ जाहे। अरे भ्रष्टाचार को पाठ पढ़ानेई हतो तो दबंगई से पाठ जोड़ते के ‘‘एनसीईआरटी में भ्रष्टाचार’’। मनो इत्ती दम कां? जैई पे सुप्रीम कोर्ट ने उने बत्ती दई औ फटकारो सो बा पाठ हटाओ गओ।    
ऐसई तब भओ रओ जबे एनसीईआरटी वारन दने इतिहास के सिलेबस से ‘‘मुगल काल’’ खों हटा दओ। अरे भैया! मुगल हरें अच्छे हते या बुरे हते पर हते तो। उने इतिहास से हटा के  का जोर दैहो? या के जे कैहो के ऊ टेम को इतिहास पढे जाने जोग नइयां। जो घट गओ ऊको बदरो नईं जा सकत। बाकी ऊसे सीख लई जा सकत आए। बाकी ऊ टेम को इतिहास हटाए जाने पे भारी बवाल मचो रओ। अब तुमें नईं पुसा रओ तो ईको मतलब जे तो नईं के तुम कओ के बे ओरें तो हते ई नईं। जो का आए? कऊं ऐसे होत आएं सिलेबस बनाए वारे? 
चलो मुगल की तो छोरो, एक बेर तो एनसीआईआरटी वारन ने डार्विन खों काट-पीट दओ। भओ का के कक्षा 9,10 की डार्विन के विकासवाद औ अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत वारी विज्ञान की किताबन से डार्विन के ‘‘विकासवाद के सिद्धांत’’ खों गायब कर दओ। इत्तोई नईं डार्विन की दई गई ‘‘आवर्त सारणी’’ के कछू हिस्सां हटा दए गए। ईपे बी बड़ी गदर मची रईं सबरे वैज्ञानिक औ शिक्षा के विद्वान हरों ने डंडे बजाए तब कऊं जा के मामला सुदरा। 

ऐंसई कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की किताब में 2002 के गुजरात दंगे, बाबरी मस्जिद वारी घटना औ अयोध्या के झगरे वारे कछू पाठ हटा दए गए तो कछू काट-पीट के छोटे कर दए गए। ईपे बी बड़ो दोंदरा मचो। अरे भैया, जो कछू घट चुको आ तो घट चुको, ऊको छिपाबे से कछू ने बदलहे। 

हमें तो जे समझ में नईं आत आए के एनसीईआरटी में कोन टाईप के बिद्वान हरें बैठे आएं? कोन खों जे सूझो के मोहनजोदड़ो की 4500 साल पुरानी नाचबे वारी मूर्ती की फोटू खों कपड़ा पैन्हा के छाप दओ जाए? का बे जे डर रए हते के बच्चा हरें बा मूर्ती खों असली रूप में उेखहें तो बिगड़ जाहें? मगर का जोन ने मोहनजोदड़ो को पाठ बनाओ औ बा मूर्ती की फोटू छांटी, का उन्ने अपने टेम पे इतिहास नई पढ़ो रआ? हमने सोई छठीं, सामतीं कक्षा में ऊ टेम को इतिहास पढ़ो रओ औ बा मूर्ती की फोटू अपनी किताब में देखी रई, का हम बिगरे? के हमाए टेम के औ मोड़ा-मोड़ी बिगरे? जब कोऊ पढ़त आए तो ऊ टेम पे बा पढ़ाई सोच के पढ़त आए। ऊ टेम में ऊके दिमाग में औ कछू उटपटांग नईं चलत आए। फेर ऐसो सोचो जाए तो डाक्दरी की पढ़ाई में तो औरई मुस्किल दिखाहे। 

वैसे देखो जाए तो एनसीईआरटी को मकसद आए स्कूल की पढाई के स्तर खों ऊचो उठाओ जाए। नई अच्छी किताबे तैयार कराई जाएं। पढ़ाई में नईं चीजें जोड़ी जाएं। मनो नई चीजें जोड़बे को मतलब जो नईं आए के मोहनजोदड़ो की नाचबे वारी खों हुन्ना पैन्हा दए जाएं। 
जेई से तो हमें टेंसन हो रई के कऊं कोनऊं खों सूझ गओ तो बा खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर पैन्हान लगहे। बाकी मोए जा बी समझ नई परत के अपन ओरों में से कछू इत्ती छोटी सोच वारे काए हो गए? जे अपनोई देस आए औ अपनई संस्कृति आए जीमें ‘‘कामसूत्र’’ घांई किताब लिखी गई। अब कछू लोग ऊके बारे में बी सोचत आएं के बा किताब अच्छी नोंई तो जा उनको समझ को फेर आए। सोचो तो जे चाइए के अपने ओरें पैले बड़ी बुद्धि के रए। अपने पुरखा हरों की सोच बड़ी हती। बा तो मुगल हरें आए तो इते उनसे बचाबे के लाने अपनी लुगाइयन खों परदे में बेंड़ दओ गओ। ओई टेम से अपन ओरन की सोच सिकुरन लगी। ऊ टेम पे बी जे नई सोचो गओ के लुगाइन खों हथ्यिार चलाबो ऐसो सिखा दओ जाए के बेई ओरें दुस्मन के मूंड़ काट लें। ऊ टेम पे बी लुगाइयां भौतई बहादुर हतीं। ने तो का कोनऊं मरद की दम हती के बा ‘‘जौहर’’ कर लेतो? जबके जबे लुगाइन खों तलबार उठाबे को मौका मिलो तो उन्ने दिखा दओ के बे लडाई के मैदान में मार बी सकत आएं और मर बी सकत आएं। सो सवाल सोच को आए। आज के जमाना में इत्ती छोटी सोच देख के अपनो मूंड पटकबे को जी करत आए।

हमाई समझ से तो जो एनसीईआरटी वारे अपनो काम सई से नईं करपा रए औ उनकी सोच इत्ती छोटी आए तो एनसीईआरटी खों बंदई कर देओ जाइए। बाकी पंचो की राय। हमें तो बस, अपने खजुराओ की मर्तियन की फिकर हो रई, औ कछू नईं।   

बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के एनसीईआरटी की करतूत बुरई हती के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, June 17, 2026

चर्चा प्लस | जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
जीव दया और कानून के बीच फंसी आवारा कुत्तों की समस्या      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह  
      हम पशुओं का सम्मान करते हैं। हम गाय को अपनी माँ मानते हैं। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई माँ समान गाय को ज़रा भी चोट पहुँचाए। जब हम कुत्तों को सड़कों पर घूमते हुए देखते हैं, तो हमें उन पर दया आती है। जब किसी गाड़ी की टक्कर से किसी कुत्ते की मौत हो जाती है, तो उसकी बेरहम मौत पर हमें दुख होता है। जानवरों के लिए हमारे मन में कोमल भावनाएँ होती हैं, लेकिन इस जीव दया की भावना के चलते क्या हम मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बढ़ता नहीं जा रहा है? आवारा कुत्तों को न मारा जाए यह एक अच्छी मानवीय भावना है किन्तु वहीं जब 3 साल की नन्हीं बालिका माही का 55 टांकों वाले चेहरे की तस्वीर देखने को मिलती है तो आत्मा कांप उठती है। क्या गुज़री होगी उस नन्हीं बच्ची पर। उसका क्या दोष था जो उसे आवारा कुत्तों के हमले की मर्मांतक पीड़ा झेलनी पड़ी। तो क्या उन आवारा कुत्तों को पूरा दोष था जो भेड़ियों के कुल के हैं और जिनके डीएनए भेड़ियों से 99 प्रतिशत मिलते हैं? इस विषय पर गंभीरता से सोचना जरूरी है और हल निकालना भी।


लगभग हर भारतीय शहर, गांव और कस्बों में आवारा कुत्ते पीढ़ियों से घूम रहे हैं। बेशक वे हमारे मित्र हैं, वफादार हैं लेकिन उस स्थिति में जब वे हमारे पालतू हों। वैसे पालतू कुत्तों के द्वारा अपने मालिक को काट लिए जाने की भी अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं। मगर समस्या उनकी नहीं बल्कि उन कुत्तों की है जो सड़कों पर दबंगई से आवारा घूमते हैं। पहले यह कानून था कि नगरपालिका द्वारा जगहर की गोलियां दे कर कुत्तों की संख्या को नियंत्रित कर दिया जाता था किन्तु जब से माननीय मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवाया कि आवारा कुत्तों को ज़हरीली गोलियाँ देकर नहीं मारा जाना चाहिए, तब से उनकी संख्या काफ़ी बढ़ गई है। यह जीव दया के पक्ष में एक अच्छा निर्णय था। मैं खुद जानवरों को मारने के विरुद्ध हूँ। किसी जानवर को ज़हर देकर मारना मानवीय तरीका नहीं है। लेकिन इस कानून को लाते समय क्या यह सोचा गया कि इसके परिणाम क्या होंगे? यह तो पता नहीं किन्तु आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी किए जाने का कानून पास हुआ। लेकिन समस्या यह है कि हमारे देश में कई अच्छे प्रावधान तो हैं, पर उनके लागू होने में कई कमियाँ हैं। इन्हीं कमियों की वजह से कुत्ते आज भी गाँवों और शहरों में बड़ी संख्या में घूम रहे हैं और अपनी बदकिस्मती का जीवन जीते हुए मनुष्यों के जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हैं।
समाचार पत्रों में आए दिन आवारा कुत्तों द्वारा गंभीर रूप से काटे जाने की घटनाएं पढ़ने को मिलती रहती हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के माहिदपुर तहसील के देवलवाड़ी गांव में 3 वर्ष की मासूम माही अपने पिता के साथ अपने घर के बाहर आंगन में थी, तभी एक कुत्ते ने उन पर हमला कर दिया। नन्हीं माही को इतनी बुरी तरह से काटा कि उसका चेहरा लहूलुहान हो गया। चिकित्सकों को उसके घावों को सीने के लिए 55 टांके लगाने पड़े। ज़रा सोचिए कि 3 साल की नन्हीं बच्ची और 55 टांके! अखबार में छपी तस्वीर देख कर आंखों में आंसू आ गए। क्या यह जीव दया का उल्लंघन नहीं है? किन्तु आवारा कुत्तों को क्या पता कि जीव दया क्या होती है। वे तो स्वभाव से ही वन्य पशुओं के समान हैं।
यह वैज्ञानिक सत्य है कि कुत्ते भेड़ियों के कुल के हैं। कुत्तों और भेड़ियों के डीएनए में 99 प्रतिशत समानता है। वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार, पालतू कुत्ता और ग्रे भेड़िया दोनों ‘‘कैनिडे’’  कुल का हिस्सा हैं। ये आपस में प्रजनन  करके स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकते हैं। वैसे कुत्ते सीधे तौर पर आधुनिक भेड़ियों के वंशज नहीं हैं, बल्कि आज के कुत्ते और भेड़िये दोनों ही एक विलुप्त हो चुके प्राचीन भेड़ियों के वंशज हैं। मनुष्यों के साथ रहते-रहते वे मनुष्य-मित्र बन जाते हैं। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो उनके व्यवहार में परिस्थितिजन्य भिन्नता मौजूद रहती है। जैसे जिन पालतू कुत्तों को घूने-फिरने की आजादी, लोगों से मेल-मिलाप की छूट और अपने मालिक से अधिक प्रेम मिलता है वे प्रायः शांत और मिलनसार स्वभाव के हो जाते हैं। किन्तु जिन पालतू कुत्तों को अधिकतर पिंजरे में या जंजीरों से बांध कर रखा जाता है तथा रात में ही चौकीदारी के लिए बाहर लाया जाता है वे अधिक खूंखार यानी एग्रेसिव होते हैं। फिर भी दोनों ही स्थिति के पालतू कुत्तों को समय पर भोजन-पानी और दवाएं मिलती रहती हैं। कम से कम दिन में दो बार उन्हें पट्टा बांध कर घर के बाहर घुमाया भी जाता है। हमारे देश में विशेषरूप से उन्हें पौटी कराने के लिए। जोकि शर्मनाक बात है। क्योंकि एक ओर तो अपने पालतू कुत्तों को सब कुछ अच्छे से अच्छा दिया जाता है, वहीं पौटी कराने के लिए किसी भी गंदी जगह पर ले जाता जाता है। जिनसे उन कुत्तों को भी बीमारियां होने का खतरा रहता है और मनुष्यों को भी गंदगी का सामना करना पड़ता है। 
खैर, आवारा कुत्तों की स्थिति पालतू कुत्तों से भिन्न होती है। उन्हें हर उस व्यक्ति की ओर आशा भरी दृष्टि से देख कर दुम हिलाना होता है जिनसे उन्हें रोटी के कुछ टुकड़े मिलने की उम्मींद होती है। ये कुत्ते भोजन की आशा में स्वयं को वफादार और चौकीदार बनाने में जुटे रहते हैं। इसीलिए ये आवारा कुत्ते हमें अच्छे लगते हैं। हम उन्हें बचा हुआ भोजन देकर सोच लेते हैं कि उससे उनका पेट भर गया होगा। जबकि सच्चाई यह नहीं होती है। दिन भर दाने-दाने के लिए भटकने वाले कुत्ते जहां एक ओर अपने समुदाय में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए संघर्ष करने हैं वहीं निरंतर भटकते रहने के कारण उन्हें जितनी भूख लगती है, उतना खाना नहीं मिलता है। उस स्थिति में तो और भी नहीं जब कुत्तों की संख्या अधिक हो। यहीं से शुरू होता है उनके भेड़िए वाले डीएनए का कुलबुलाना। भेड़िए समूह में रहते हैं जिसका नेता उनमें सबसे शक्तिशाली यानी अल्फा भेड़िया होता है। उस अल्फा भेड़िए के नेतृत्व में ही शेष भेड़िए शिकार करते हैं। आवारा कुत्तों में भी कमजोर कुत्ते उस शक्तिशाली कुत्ते के साथ समूह बना लेते हैं जिसके बल पर उन्हें भोजन का कुछ हिस्सा मिल सके। आवारा कुत्तों के हर झुंड में एक अल्फा डॉग होता है। यह खूंखार, अवसरवादी और आक्रामक होता है। चूंकि आवारा कुत्ते मनुष्यों की बस्ती में रहते हैं और वे जानते हैं कि उन्हें मनुष्यों से ही भोजन मिलेगा, इसलिए वे मनुष्यो से ‘‘बना कर चलते’’ हैं। लेकिन जब उनका अपना झुंड बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो वे अपनी भूख मिटाने के लिए अवसर वादी बन जाते हैं। साथ ही उनके भीतर की हिंसक प्रवृत्ति जागने लगती है। अकसर यह देखने में आता है कि आवारा कुत्ते छोटे बछड़ों को घेर कर उसे काटने का प्रयास करते हैं। ऐसे मुसीबत में फंसे बछड़ों को कभी गाय बचा लेती है तो कभी मनुष्य। फिर भी कई बार नन्हें बछड़े कुत्तों का शिकार हो जाते हैं। पानी की तलाश में गांव में घुस आने वाले हिरण जैसे मासूम पशु भी आवारा कुत्तों के शिकार बन जाते हैं। क्योंकि बात वही है कि आवारा कुत्तों के भीतर का भेड़िया जाग उठा होता है।
मनुष्य आखिर मनुष्य होता है और पशु अंततः पशु। जो मनुष्य हिंसक हो जाता है उसे भी ‘‘पशुवत’’ ही कहा जाता है। तो आवारा कुत्तों के हिंसक होने और अचानक किसी कमजोर प्राणी पर हमला कर देने को उसकी हिंसक प्रवृत्ति नहीं तो और क्या कहेंगे?
अब प्रश्न यह है कि इन आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और इनके बढ़ते आतंक से बचने का उपाय क्या है? बेशक नसबंदी का उपाय लागू किया गया है जो पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इसके उदाहरण कुत्तों के झुंड के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल विचार इस बात पर होना चाहिए कि जीव दया की भावना भी बनी रहे, कुत्तों को भी कष्ट न हो और मनुष्य भी सुरक्षित रहें। जाहिर है कि इ सके लिए हमें विदेशों विशेषरूप से अमरीका, योरोप, चीन, जापान आदि की ओर देखना और उनसे सीखना होगा कि वहां की सड़कें आवारा कुत्तों से कैसे मुक्त हैं? हमारे मंत्रियों एवं अधिकारियों के दल प्रायः विभिन्न ज्ञान की प्राप्ति के लिए सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राएं करते रहते हैं किन्तु इस विषय का हल क्यों नहीं ढूंढ कर ला सके? या फिर इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई?
विदेशों में सड़कों पर कोई भी आवारा पशु घूमता दिखाई नहीं देता है। क्योंकि वहां परिस्थितिवश आवारा हुए कुत्तों के लिए डॉग शेल्टर होते हैं जहां उन्हें रख कर उनकी देखभाल की जाती है। हम स्वयं को जीव दया का सबसे कट्टर समर्थक मानते हैं किन्तु हमीं जीव दया का सही तरीका नहीं जानते हैं। यदि कोई पशु आवारा घूम रहा है और दाने-दाने के लिए मोहताज जीने को विवश है तो उसे रोटी के दो टुकड़े दे कर जीव दया का दम नहीं भर सकते हैं। सही जीव दया तो तब होगी जब हम उनके लिए रहने की उचित व्यवस्था, खाने का उचित प्रबंध कर सकें। इस बिन्दु पर विदेशी हमसे अधिक जीव दया वाले हैं। अमरिका और योरोप में तो कुत्ता पालने की बाकायदा परमीशन लेनी पड़ती है और इस बात के लिए प्रशासन को आश्वस्त करना पड़ता है कि वे जो भी पशु पालेंगे, उसका हर प्रकार से पूरा ध्यान रखेंगे। यदि वे अपनी बात पर खरे नहीं उतरते हैं और अपने पालतू पशु को पीड़ा पहुंचाते हैं तो प्रशासन उनसे उनका पालतू पशु छीन कर ले जाता है और शेल्टर होम के हवाले कर देता है। हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। देश में कुछ एनजीओ हैं जो डॉग शेल्टर होम चलाते हैं वरना अधिकतर एनजीओ भी आवारा कुत्तों को नियमित खाना खिला कर अपने कर्तव्य को पूर्ण समझ लेते हैं।
यदि कुत्ते सड़कों पर आवारा घूमेंगे और भूखे रहेंगे तो अपना झुंड बनाएंगे ही ताकि मिल कर शिकार द्वारा अपने लिए भोजन जुटा सकें। यही उनकी डीएनए प्रकृति है। इसमें उनका कोई दोष नहीं है। विपरीत परिस्थिति में उनके भीतर का भेड़िया जागने लगता है और वे एग्रेसिव हो कर वह कर बैठते हैं जो हम मनुष्यों को लगता है कि उन्हें नहीं करना चाहिए। जो कुत्ते पीढ़ियों से मनुष्यों के बीच रह रहे हैं उन्हें जंगल में नहीं खदेड़ा जा सकता है और न निर्ममता से मौत के घाट उतारा जा सकता है। लेकिन जलवायु में बढ़ती गर्मी और अधिक संख्या के कारण भोजन की कमी का दबाव आवारा कुत्तों को हमलावर बनाने लगा है। लिहाजा, अब समय आ गया है कि कुत्तों को मनुष्यों से एक निश्चित दूरी पर पहुंचा दिया जाए। यह तभी संभव है जब हर शहर, गाव, कस्बे में डॉग शेल्टर होम बनाए जाएं। क्योंकि विचारणीय बात है कि यदि आवारा कुत्तों की वर्तमान पीढ़ी को नसबंदी द्वारा संतति के अयोग्य बना भी दिया जाए तो क्या यह पीढ़ी मनुष्यों पर हमला करना छोड़ देगी? नहीं! भूख, मौसमी परेशानियां और उनकी बढ़ी हुई संख्या का दबाव उन्हें एग्रेसिव तथा हमलावर बनाता रहेगा।
यदि धार्मिक दृष्टि से विचार करें तो कुत्ता उन कालभैरव का वाहन है जो बस्ती से बाहर पहाड़ों में निवास करते हैं। हम अपने स्वार्थ में उन्हें शहर में ला कर आवारा जीवन जीने को विवश कर चुके हैं और अब वे जब हमारे लिए कालदूत बनते जा रहे हैं तो हमें भी इस पर पुनः विचार करना चाहिए कि उनका असली स्थान कहां है। अब पहाड़ों अथवा जंगलों में नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि वे हमारे स्वभाव के अनुरूप ढल गए हैं, उनका वन्य स्वभाव शांत आचरण में बदल चुका है। लेकिन उनके भीतर की हिंसा को जगाने वाले तत्वों का तोड़ ध्यान में रखते हुए उनके लिए सबसे उपयुक्त जगह है डॉग शेल्टर होम। जब सड़कों पर से आवारा कुत्ते हट जाएंगे तो उनका आतंक भी समाप्त हो जाएगा और फिर प्रत्येक माही सुरक्षित जी सकेगी।              -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 17.06.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, June 16, 2026

पुस्तक समीक्षा | सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार  
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - सॉनेट सागर
कवि        - डॉ. विनीत मोहन औदिच्य
प्रकाशक     - सर्वभाषा प्रकाशन, जे-49,गली नं.-38, राजापुरी (मेनरोड) उत्तमनगर,नई दिल्ली-110059
मूल्य       - 249/-
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सॉनेट विधा हिन्दी साहित्य के लिए हमेशा एक नूतन विधा रही है। यह माना जाता है कि सबसे पहले कवि त्रिलोचन शास्त्री ने इस विधा को हिन्दी में सम्मिलित किया। उनके समकालीन कुछ कवियों ने सॉनेट लिखे भी लेकिन फिर भी सॉनेट हिन्दी काव्य जगत में अपनी पैंठ नहीं बना सका। इधर विगत कुछ वर्षों से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य ने सॉनेट के क्षेत्र में कड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है जिससे हिन्दी साहित्य में सॉनेट को स्थापना मिलने की संभावना बढ़ी है। डॉ. औदिच्य हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के समर्थ ज्ञाता हैं। उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें ‘‘फ्रिक्र सागरी’’ के तख़ल्लुस से लिखी हैं। इसके साथ ही अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कार्य में पाब्लो नरुदा के सॉनेट्स का अनुवाद कर के हिन्दी जगत को पाब्लो की काव्यात्मक विशेषताओं से परिचित कराया है। स्वयं  के मौलिक सॉनेट संग्रह तथा भारतीय सॉनेटियर्स एवं अंग्रेजी के 101 सॉनेटियर्स के सॉनेट्स के पुस्तक संपादन के बाद डॉ औदिच्य को यह महसूस होता है कि हिन्दी जगत को सॉनेट की संरचना की बारीकियों से भी अवगत होना चाहिए। हाल ही में उनका नवीनतम सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने सॉनेट विधा के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने “सॉनेट काव्य विधा संरचना एवं हिन्दी साहित्य में प्रयोग” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘काव्यात्मक एकाकी विचार की संक्षिप्त अभिव्यक्ति के लिए एक बौद्धिक या इन्द्रियजनित लहर जो भावनात्मक और लयबद्ध रूप से तीव्रता से अनुभव हो, सॉनेट एक सर्वाेत्तम माध्यम सिद्ध होगा। एक ऐसा साधन जो मधुरता और एकता के क्रांतिकारी नियमों के आधार पर निश्चित किया गया हो। उन पाठकों को जिन्हें सॉनेट साहित्य के क्षेत्र व तकनीक का ज्ञान नहीं है उन्हें इसके विकास व क्षमताओं से परिचित कराना समीचीन होगा। सॉनेट के अनेक इतिहासकार हुए हैं जिनके अपने मत व दृष्टिकोण हैं। इनमें सर्वप्रमुख कैपल लाफ्ट हैं जिन्होंने इस रोचक विधा का विशिष्ट अध्ययन किया। उन्होंने 1813-14 में मौलिक और अनूदित इटालियन सॉनेट संकलन ‘लौरा’ प्रकाशित किया। आर एच हाउसमैन ने 1833 में एक श्रेष्ठ संकलन निर्गमित किया। डाइस, लेह हंट, टामलिंसन, डी एम मेन, मिस्टर एस वैडिंगटन सहित मिस्टर डेनिस ने इंग्लिश सॉनेट्स के माध्यम से योगदान दिया। मिस्टर हाल कैन के सॉनेट्स आफ श्री सेन्चुरीज ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। क्वार्टरली रिव्यू 1866, वे स्टमिनिस्टर रिव्यू 1871, द डब्लिन रिव्यू 1876-77 में सॉनेट साहित्य पर महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए। इटली में लेंटीनी, पैट्रार्क तथा इग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, विलियम वर्ड्सवर्थ, जान मिल्टन, स्पेंसर के अतिरिक्त अनेक देशों के कवियों ने सॉनेट काव्य विधा में लेखन कर इस विधा को लोकप्रिय बनाया। भारत में भी विभिन्न राज्यों में इस विधा को विविध स्वरूपों में लिखा जाता रहा है।’’ अपने इस लेख में डॉ. औदिच्य ने हिन्दी में सॉनेट छंद लिखे जाने के आधारभूत तत्वों को भी सामने रखा है। यह लेख सॉनेट विधा को जानने, समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
‘‘सॉनेट सागर’’ में डॉ औदिच्य के कुल 51 सॉनेट संग्रहीत हैं। इस संग्रह के संबंध में ओड़िशा की सॉनेटियर व कवयित्री अनिमा दास ने “सॉनेट सागर; एक अनंत यात्रा” शीर्षक से भूमिका में लिखा है कि “प्रस्तुत नवीन संग्रह ‘सॉनेट सागर’ सॉनेटियर विनीत मोहन जी की एक अद्भुत यात्रा धारा है। इस संग्रह में लिपिबद्ध समस्त सॉनेट्स कई भाव, विचार, विषय की विस्तृत परिभाषा है। सॉनेट के मूलतः कई तत्व होते हैं जिसमें प्रमुख है मीटर, गेयता, विशिष्ट तुकांत, भाव, एक स्वतंत्र विचार, रूपक, प्रतीक, बिम्ब एवं रहस्य। 14 पंक्तियों की किसी भी कविता को सॉनेट नहीं कहा जा सकता। सॉनेट का अन्य एक रूप है जिसे अनियंत्रित रूप कहा जाता है, जिसमें उपरोक्त सभी तत्व होते हैं किंतु छंद के नियमों से मुक्त होते हैं। डॉ. विनीत मोहन जी ने सॉनेट के दोनों रूपों को सम्पूर्ण विशेषता देते हुए कई सृजन किए हैं।”
पुस्तक में अनिमा दास ने “सॉनेटियर एवं ग़ज़लकार प्रो. (डॉ.) विनीत मोहन औदिच्य उर्फ फ़िक्र सागरी: एक परिचय” शीर्षक से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का विस्तृत परिचय भी दिया है। डॉ औदिच्य बिना शोर मचाए नेपथ्य में रहते हुए सतत सृजनशील हैं। फिर भी उन्हें अनेक राष्ट््रीय स्तर के पुरस्कार सम्मान मिल चुके हैं। उनकी अब तक की प्रमुख कृतियां हैं- ग़ज़ल संग्रह - खुशबु-ए-सुखन (2014), कारवां-ए-सुखन (2021), अंदाज-़ए-ग़ज़ल (2022), तन्हाइयाँ आवाज़ देती हैं (2023), काव्य संग्रह काव्य प्रवाह (2015), भाव स्रोतस्विनी (2019), प्रथम सॉनेट संग्रह - 69 अंग्रेजी सॉनेटस का हिंदी अनुवाद कर ‘‘प्रतीची से प्राची पर्यंत’’ साझा संग्रह (2020), द्वितीय सॉनेट संग्रह - नोबेल पुरस्कार विजेत पाब्लो नेरुदा की ‘‘हंड्रेड लव सॉनेट्स’’ पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘‘ओ प्रिया!!! (2021), तृतीय सॉनेट संग्रह ‘‘सिक्त स्वरों के सॉनेट’’ (118 सॉनेट्स) - 2022, चतुर्थ सॉनेट संग्रह ‘‘काव्य कादम्बिनी’’ - 2022 (101अंग्रेजी सॉनेट रचनाकारों के 135 सॉनेटस का हिंदी अनुवाद)। यह सुनिश्चित है कि डॉ औदिच्य द्वारा सॉनेट के लिए किया गया श्रम एवं मौलिक सॉनेट सृजन ही उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थाई पहचान दिलाएगा।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य के सॉनेट्स में वैचारिक संवाद हैं, प्रकृति की सुंदर छटा है तथा विविध मानवीय व्यवहार हैं। संग्रह का पहला सॉनेट है “अदृश्य चक्षु” जिसमें उन्होंने लिखा है कि-
ऐसा कह दूँ कि मैं आनंद में हूँ, मिथ्या यह तथ्य नहीं
मैं ही जानता हूँ अग्नि-वन में कैसे होता श्वास रुद्ध
और दुखित मेरा जीवन है,  यह भी मेरा कथ्य नहीं
है ज्ञात मुझे कैसे काँटों की शय्या पर काया हो रही वृद्ध
इस प्रकार देखा जाए तो डॉ औदिच्य अपने सॉनेट में व्यष्टि से समष्टि की ओर बड़ी सहजता से बढ़ते चले जाते हैं। उनका अपना दुख-सुख जन-जन के दुख-सुख का प्रतिबिम्ब बन कर उभरने लगता है। इसी प्रकार उनके कुठ सॉनेट्स में नॉस्टेल्जिक शेड दिखाई देता है। जैसे एक सॉनेट है ‘‘प्रहेलिका’’। इसमें प्रकृति के लक्षणों में मानवीय भावनाओं की अद्भुत छटा का रूपक है-
कहीं दूर कानन में खिल उठा था फूल
सूखी नदी की देह से उड़ गई थी धूल
मंदार सा लाल लगा था तब आकाश
शीश झुका कर शशि बिखराया प्रकाश।
कह दिया था मेघ ने वह नहीं बरसेगा
नक्षत्रों में जलकर एक कल्प तरसेगा
आशा-अरण्य में रहेगा भौरों का गुंजार
मध्यरात्रि के स्वप्न में संभावना का नीहार।
कवि डॉ. विनीत मोहन औदिच्य प्रकृति की महत्ता को समझते हैं। उनकी संवेदनाओं में उस समय तीव्र आलोड़न उठता है जब प्रकृति को किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाई जाती है। जैसे अपने एक सॉनेट में वे लिखते हैं कि-
रे मानव, अंधाधुंध वृक्ष काटे क्यों? चलो प्रकृति की ओर
उग आए कंक्रीट के जंगल, नहीं है जिनका कोई छोर
नंगे पर्वत, कठोर बंजर अवनि व सूखे सर नद-नदियाँ
है भूकंप का जोर भयंकर, वृक्षों पर मुरझाई कलियाँ।
कर्णकटु है प्रतिदिन बढ़ता शोर, रे कहाँ गई धरोहर?
जी रहें सभीत सारे थलचर, जलचर और नभचर
विषाक्त धुएँ में घुल रहा नवपल्लव का अमिय नीर
आ रही मृत्यु ध्वनि निकट, पीड़ित प्रकृति का वक्ष चीर।
जब हृदय व्यथित होता है तो ईश्वर की कृपा की आकांक्षा बढ़ जाती है। यूं भी भारतीय संस्कृति में ईश्वर की सत्ता को पूर्णतया स्वीकार किया गया है। श्रीराम के रूप में ईश्वर की छवि हर भारतीय के हृदय में बसती है। डॉ औदिच्य ने नया प्रयोग करते हुए सॉनेट में श्रीराम का स्मरण किया है। उनके सॉनेट ‘‘राम मेरे जीवन में’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
कहें राम का नाम... सुनें राम अभिराम
नित करे आराधना... हो कृतार्थ सर्वनाम
सरयु है प्राण... राम है तरणी... व निर्वाण
है आराध्य जो किया संसार का निर्माण
इस तरह देखा जाए तो संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ में विषय की विविधता है तथा नूतनता है जिससे यह संग्रह रोचक बन गया है।
पुस्तक के दूसरे खंड में कवि की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षाएं सहेजी गई हैं। यह समस्याएं हैं - “सिक्त स्वरों के सॉनेट”  संग्रह की समीक्षा “सॉनेट की विदेशी शैली का सुंदर भारतीय स्वरूप” - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह, “ओ प्रिया” (पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी अनुवाद) की समीक्षा समीक्षक  प्रो. हरेराम पाठक,  प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित काव्य संग्रह रू अविरल बहती भाव स्रोतस्विनीश् की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, काव्य संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक डॉ. चंचला दवे, आंग्ल भाषा से हिंदी में  प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित सार्वकालिक श्रेष्ठ सॉनेट संग्रह “काव्य कादम्बिनी” की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, सॉनेट संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक विजय कुमार तिवारी, पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी में विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित “ओ प्रिया” समीक्षक वीणा शर्मा वशिष्ठ, “ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक मनोरमा जैन पाखी तथा ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक: डॉ. शैलेष गुप्त वीर।
समीक्षाओं के उपरांत “श्री विनोद मोहन जी की लेखनी पर प्रबुद्ध साहित्यकारों की अन्य प्रतिक्रिया” शीर्षक से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं हैं यह साहित्यकार हैं अशोक बाजपेई, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, डॉ प्रणव भारती, प्रभु दयाल मिश्र, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, डॉ हरे राम पाठक, डॉ कविता नंदन, किशोर नायक, प्रताप नारायण सिंह, केशव मोहन पांडेय, अमरेश विश्विल, डॉ शैलेश गुप्त वीर, मनोरमा जैन पाखी, वीणा शर्मा वशिष्ठ, लिली मित्रा, डॉ छबिल कुमार मेहेर तथा अनिमा दास। पुस्तक के अंतिम परिशिष्ट में डॉ विनीत मोहन आदित्य को उनके कृतित्व के लिए दिए गए सारस्वत सम्मान की तस्वीर एवं सम्मान पत्र स्मृति चिन्ह आदि रखे गए हैं।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का यह सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ न केवल पठनीय है अपितु हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना सहित काव्यात्मक .   
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Saturday, June 13, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | तनक बतइयो के जे हादसा ओ मारकाट पे लगाम को लगाहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
तनक बतइयो के जे हादसा ओ मारकाट पे लगाम को लगाहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
परों हमारी काम कामवाली बाई ने हमें बताई के एक दिनां उकी पड़ोसन की मुंदरी खो गई रई तो बा अपनी पड़ोसन कों एक गुनिया के इते लिवा ले गई रई। बा गुनिया ने कछू मंतर सो पढ़ो औ चुटकी भरे भभूत दे के बोलों के तुमाई मुंदरी पूरब दिसा में गिरी आए। उतई एक बरिया को पेड़ आए। ओई के तरे कल संकारे ढूंढियो, मुंदरी मिल जैहे। औ दूसरे दिनां सई में बरिया तरे मुंदरी मिल गई। बाई की बात सुन के हमें कै आई के कऊं बा गुनिया के चिनारी वाले ने तो नई चुराई हती? तुम ओरन खों जा गुनिया-मुनिया के इते जाबे के बजाए थाने जा के रपट लिखानी रई। ईपे उने हमसे जो कई ऊको सुन के हम सोई सोंच में पर गए। बाई ने हमसे कई के बे ओरें बा कटर औ चाकू वारन कों तो रोक ने पा रए, भला बे हमाई पड़ोसन की मुंदरी की रपट कां से लिखते? हमने बाई खों समझाई के ऐसो नइयां, पुलिस तुमाई मुंदरी सोई ढूंढ देती। बाई हमाई बात सुन के हमपे दया दिखात भई बोली के जो आप कै रईं सो माने ले रए।
     बाकी हमने बाद में सोंची के सहर में दसा सो सई में खराब चल रई। रोजीना अखबार में एक ने एक कटर चलबे की, नें तो चाकू चलबे की खबर पढ़ें को मिलन लगी आए। पैले इत्तो गदर तो नें मचो रैत्तो। औ ऊंसई सहर में हादसा बढ़त जा रए। औ काएं नें बड़हें, लोहरे-लोहरे लड़का-बच्चा गाड़ी धौंकत रैत आएं। रई सई कसर रोड के डिबाइडरन ने पूरी कर रखी आए। अब का पब्लिक खों जा मारकाट औ हादसा रोकबे के लाने गुनिया हरों के इते जाने परहे? अब जे परसासन वाले औ जिम्मेवार हरें पब्लिक को भरोसो टूटबे से पैले तनक सोंच के बताएं के जे हादसा ओ मारकाट पे लगाम को लगाहे?
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Wednesday, June 10, 2026

चर्चा प्लस | प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                          

     यदि मध्यप्रदेश में सरकारी योजनाओं को देखा जाए तो मन खुश हो जाता है। ‘‘अच्छे दिन’’ का सपना साकार होने की संभावना बढ़ जाती है। किन्तु विडम्बना यह है कि लोकहित की योजनाएं जितनी चुस्त-दुरुस्त हैं उनका क्रियान्वयन उतना ही सुस्त है। यदि सुस्त नहीं होता तो प्रदेश की तस्वीर आज कुछ और होती। बेशक तस्वीर बदल रही है किन्तु उस गति से नहीं जिस गति से बदलनी चाहिए थी। यहां तक कि जिनके लिए योजनाएं हैं उन्हें भी सभी लाभकारी योजनाओं का ज्ञान नहीं है। सुशिक्षित लोगों को भी नहीं। यह सोचने का विषय है कि इस खामी का जिम्मेदार कौन है?


हाल ही में एक सीनियर सिटिजन से मेरी चर्चा हो रही थी। मैंने उनसे पूछा कि आपने अपना सीनियर सिटिजन कार्ड बनवाया कि नहीं? वे मेरा मुंह ताकने लगे। उन्हें ऐसे किसी भी कार्ड की जानकारी नहीं थी। हां, आयुष्मान योजना की जानकारी अवश्य थी जिसके लिए उन्होंने आह भरते हुए कहा कि ‘‘अभी तो मैं पैंसठ का ही हुआ हूं। अभी मुझे आयुष्मान योजना के लिए पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा, यदि तब तक मैं जिन्दा रहा।’’ दरअसल वे नौकरी पेशा नहीं रहे। उनका अपना छोटा-सा व्यवसाय था। उनके बच्चे पढ़-लिख कर मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी पर चले गए हैं। अब पति-पत्नी ही बचे हैं। दोनों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आता रहता है। कुछ हद तक उनकी अपनी सेविंग से काम चल जाता है लेकिन जब कोई मंहगे मेडिकल टेस्ट कराने की नौबत आती है तो उन्हें अपने बच्चों से गुहार लगानी पड़ती है। वे अकेले नहीं, अनेक ऐसे सीनियर सिटिजन हैं जो सरकारी सहायता के लिए तरसते रहते हैं। इसका पहला कारण कि उन्हें अधिकांश योजनाओं का पता ही नहीं है। जिन बहुचर्चित, बहुप्रचारित योजनाओं का पता है वे उनके दायरे में नहीं आते हैं। जिन योजनाओं दायरे में आते भी हैं उनका लाभ लेने का रास्ता उन्हें नहीं पता। सभी सीनियर सिटिजन इतने ‘‘इंटरनेट मित्र’’ नहीं हैं कि वे ऑनलाईन आवेदन कर सकें। लगभग यही हाल उन सभी का है जिन्हें इंटरनेट पर सोशल मीडिया के कुछ एप्प चलाने के अलावा और कुछ नहीं बनता है। उन्हें कियोस्क केन्द्रों की शरण में जाना पड़ता है और पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
अभी माह भर पहले की बात है मैंने अपने एक परिचित से पूछा कि ‘‘आपको अपनी मध्यप्रदेश सरकार की नवांकुर योजना का पता तो होगा?’’
‘‘ये कौन-सी योजना है?’’ उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की और फिर अटकल लगाते हुए बोले। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए होगी यह योजना, है न!’’
उनकी इस अटकल पर मुझे हंसी भी आई और रोना भी। प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में उन उच्चशिक्षित, रोज अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति को पता नहीं है तो सामान्य लोगों से तो इसकी उम्मींद करना ही व्यर्थ है। मैं कुछ बोल पाती इसके पहले ही वे बोल उठे ‘‘मुझे तो बस, लाड़ली लक्ष्मी, जननी योजना और वो जो किसानों के बिल-विल माफ कर दिए जाते हैं, बस उन्हीं पता है।’’
उनके इस कथन में दम था क्योंकि जिन योजनाओं को बहुप्रचारित किया जाए, जिनकी तस्वीरें सबसे ज्यादा छापी जाएं उनके बारे में पता रहना स्वाभाविक है। अब हर योजना के लिए फीता काटने मंत्री महोदय तो आएंगे नहीं। फिर बाकी योजनाओं पर बड़ी खबर कैसे बनेगी? और आजकल तो यही चलन है कि जिस पर विवाद हो, टीवी के न्यूज चैनल्स पर वाद-विवाद हो, टॉक-शो हो, वही जानकारी के पन्ने पर अपनी जगह बना पाता है। खैर, बात चली है नवांकुर योजना की तो उस पर एक संक्षिप्त दृष्टि डाल ली जाए। इससे कम से कम मुझे भी इस योजना की प्रमुख बातें याद रह जाएंगी, जिन्हें मैं औरों से शेयर कर सकूंगी। 
दरअसल, नवांकुर योजना का मूल उद्देश्य प्रदेश में समाज एवं शासन के मध्य सेतु के रूप में कार्य करना है। विकास के कार्यों में समाज की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि समाज विकास के विभिन्न विषयों में दक्ष स्वैच्छिक संगठन उपलब्ध हों। अतः विभिन्न विषयों जैसे जल संरक्षण, सबको शिक्षा सहित भारतीय संस्कारों की शिक्षा, नशामुक्ति, सबको स्वास्थ्य, हरियाली/पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता एवं साफ सफाई, ऊर्जा संरक्षण, कृषि को लाभकारी बनाना, कुपोषण एवं परिवार नियोजन, सामाजिक समरसता तथा विवाद रहित समाज/ग्राम आदि पर विशेषज्ञता रखने वाले स्वैच्छिक संगठन प्रत्येक सेक्टर स्तर पर विकसित किये जायेगें। इन स्वैच्छिक संगठनों द्वारा सेक्टर में गठित प्रस्फुटन समितियों को उनके कार्यों में आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जायेगा, वहीं मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठयक्रम के छात्रों को इंटर्नशिप कराई जायेगी तथा पाठयक्रम संबंधी परामर्श प्रदान किया जावेगा। समाज की स्वैच्छिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने हेतु प्रति वर्ष प्रत्येक विकासखण्ड में 05 (प्रत्येक विकासखण्ड में प्रति सेक्टर हेतु 01 नवांकुर संस्था के मान से) का चयन कर प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि रूपये 01.00 लाख निरंतर (कार्य संतोषजनक पाए जाने पर) प्रदान की जावेगी। यह संस्थायें उस विकासखण्ड के सेक्टर हेतु लीड स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करेंगी। इस प्रकार योजनांतर्गत स्वैच्छिक संगठनों के उन्मुखीकरण एवं पोषण हेतु जिला स्तर पर गठित समिति के माध्यम से प्रदेश में 1565 स्वैच्छिक संगठनों का चयन किया जायेगा। है न बेहतरीन योजना। लेकिन यह सब कुछ कितने प्रतिशत होते दिख रहा है, यह विचारणीय है।
वैसे नवांकुर योजना का लक्ष्य है सेक्टर स्तर पर सक्रिय प्रस्फुटन समितियों/नवीन स्वयंसेवी संस्थाओं का उन्मुखीकरण एवं पोषण करना तथा सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करते हुये आत्म निर्भर मध्यप्रदेश का निर्माण करना। वहीं इसका उद्देश्य है ऐसे स्वैच्छिक संगठन का निर्माण करना जो विकास के प्रमुख विषयों में विशेषज्ञता रखते हो। विकास के प्रमुख विषयों पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने हेतु विषय विशेषज्ञ/स्वैच्छिक कार्यकर्ता तैयार करना। स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से योजनाओं के संचालन हेतु परियोजना निर्माण तथा क्रियान्वयन करना। सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में स्वैच्छिक संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए विकास प्रक्रिया में नागरिक समुदाय को शामिल करना। सामाजिक सुरक्षा एवं समरसता सुनिश्चित् करना। केन्द्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार एवं उनके क्रियान्वयन में सहयोग करना। नवीन व स्थानीय संस्थाओं का पोषण व उनका क्षमतावर्द्धन करना।
चयन हेतु पात्र संस्थाओं के लिए योजनांतर्गत चयन हेतु परिषद की वेबसाइट पर विज्ञप्ति जारी की करने का प्रावधान रखा गया। उन नगर/ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी रखा गया जिनके द्वारा संबंधित विकासखण्ड अंतर्गत लगातार तीन वर्ष तक कार्य किया गया हो तथा परिषद द्वारा संचालित कार्यक्रमों/अभियानों में उनकी निरन्तर भागीदारी रही हो। यह भी सुनिश्चित किया गया कि म.प्र. फमर््स एवं संस्थायें पंजीकरण अधिनियम 1973 के अंतर्गत वे ही पंजीकृत संस्थाएं मान्य होगी जिनमें 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित विकासखण्ड तथा 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित जिले के स्थानीय निवासी हो।
इस सुंदर नवांकुर योजना में नवकरीण ऊर्जा के तहत ऊर्जा साक्षरता अभियान और लोक सेवा प्रबंधन के तहत सी.एम. जनसेवा योजना भी है। यह कितने लोगों को पता है? और नवांकुर की तमाम योजना के अंतर्गत अब तक कितनी प्रगति हुई यह कितने लोगों को पता है? योजना तैयार करने वालों को? कागजी कार्यवाही करने वालों को? जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों एवं जनप्रतिनिधियों को? या फिर इन सबके बारे में कितना पता है उन लोगों को जिनके हित के लिए ये योजनाएं हैं। एक योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’। मेरी एक घरेलू सहायिका यानी कामवाली बहन से बात हुई तो पता चला कि वह अपनी बहू के लिए राजगार ढूंढ रही है लेकिन घर-घर जा कर चौका-बरतन का काम उससे नहीं कराना चाहती है। उसकी बहू को लाड़ली लक्ष्मी और बीपीएल के लाभ मिल रहे हैं किन्तु बिना मेहनत के हाथ आए पैसों का उसे मोल नहीं है। इसीलिए सास चाहती है कि बहू कुछ काम करके भी पैसे कमाए ताकि उसके खर्चों पर लगाम लगे। लेकिन परेशानी ये कि उसकी बहू को घर के कामों के अलावा कुछ नहीं आता है। मैंने उससे कहा कि सरकार की योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’, सो उसे सिलाई सीखने भेजो। वहीं से उसकी कमाई भी शुरू हो जाएगी। इस बारे में उस कामवाली बहन को तनिक भी जानकारी नहीं थी। उसे जानकारी थी तो बस लाड़ली लक्ष्मी योजना की, समूह सहायता योजना ही और साहूकार से कर्जा लेने की। सच तो यह था कि समूह सहायता योजना का वास्तविक स्वरूप भी उसे पता नहीं था। उसने मुझसे पूछा कि वह अपनी बहू को सिलाई सीखने कहां भेजे? सेंटर कहां है? मैं उसे क्या बताती क्योंकि मुझे भी सेंटर के बारे में पता नहीं था। मैंने उसे महिला बाल विकास के दफ्तर का पता बता दिया कि शायद उसे वहां से कोई जानकारी मिल जाए। उसी समय मुझे लगा कि आशा कार्यकर्ता की भांति ऐसी कार्यकर्ताएं भी होनी चाहिए जो योजनाओं की विस्तृत जानकारी घर-घर पहुंचा सकें। 
चलिए बात की जाए योजनाओं के क्रियान्वयन की तो अभी हाल ही में चल रहे जनगणना योजना को ही ले लीजिए। पहली बात तो इसे भरी गर्मी में आरंभ कर दिया गया जिससे गणना करने वालों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। उन्हें चिलचिलाती धूप में दर-दर भटकना पड़ा। उस पर गर्मी की सूनी दोपहर में सब लोग दरवाजा खोलने में भी झिझकते हैं। लिहाजा अभी भी अनेक घर ऐसे हैं जहां गणना करने वाले पहुंचे ही नहीं है, या फिर पड़ोसी से पूछ कर खानापूरी कर बैठे हैं। क्या इससे योजनाओं के लिए सही जानकारी मिल सकेगी? क्या गलत आंकड़ों के आधार पर नई सही योजनाएं बन सकेंगी? वस्तुतः सरकारी योजनाओं में कोई खामी नहीं है लेकिन उनके क्रियान्वयन में अनेक व्यवहारिक खामियां हैं जिन्हें किसी अधिकारी या कर्मचारी को सस्पेंड कर के दूर नहीं किया जा सकता है। खामियां दूर करने के लिए जरूरी है कि लोकहित की योजनाओं को लोक की आवश्यकता के अनुरूप व्यापक बनाया जाए। जिनके लिए यह योजनाएं बनाई जाती हैं उन तक जानकारी की पहुंच बनाई जाए। साथ कुछ योजनाओं को और अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है तथा मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बदले रोजगार के अवसर बढ़ाने जरूरत है। तभी लोकहितकारी योजनाएं अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर सकेंगी और गतिवान बन सकेंगी।    ------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 10.06.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, June 9, 2026

पुस्तक समीक्षा | उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल”

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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उपन्यास     - पहाड़ का पाताल

लेखक      - श्यामसुंदर दुबे

प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32

मूल्य       - 550/-

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पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि पहाड़ जितना धरातल के ऊपर दिखाई देता है उससे कहीं अधिक धरातल के नीचे होता है। ठीक यही स्थिति व्यवस्था और मनुष्यों के चरित्र की होती है। ऊपर से जो कुछ जितना दिखाई देता है उससे कहीं अधिक अप्रत्यक्ष रहता है। अतः यदि पहाड़ है तो उसका पाताल भी होगा ही। कभी-कभी यह पाताल चौंकाता है, चमतना को झकणेर देता है। यही कहता है डॉ. श्यामसुंदर दुबे का उपन्यास ‘‘पाताल का पहाड़’’।  

जब किसी उपन्यास की चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। ‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार,ललित निबंधकार एवं लोकविद डॉ.श्यामसुंदर दुबे ने। 

‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’

उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनः भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।’’

विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि  ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’

यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’

इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।

उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनियर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।

व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’

उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट कर भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।

उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जन्म दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’  

‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरूप  हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं बारम्बार पठनीय है।      

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Monday, June 8, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | सिर्फ एक दिनां नोंईं, हर दिन मनो चाहिए पर्यावरण दिवस | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
सिर्फ एक दिनां नोंईं, हर दिन मनो चाहिए पर्यावरण दिवस
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
कढ़ गओ 05 जून। मन गओ पर्यावरण दिवस। गड्ढा खुदो, पौधा लगे, भासन भए, रासन भए, पेड़ बचाबे पे बड़ी-बड़ी बातें भईं। सब कछू अच्छो-अच्छो भओ। मनो दूसरे दिनां कोनऊं ने खबर लई के उनके लगाए पौधन को का भओ? नईं लई हुइए। काए से के दूसरे दिनां तो जे देखने परत आए के पौधा लगाते भए की फोटू अखबार में छपी के नईं। औ जो फोटू संगे खबर छप गई तो ऊको सोसल मीडिया में भी डारबे को काम रैत आए। सो, दूसरे दिनां कोन खों परी के पौधन कों हेरबे जाए। ऊंसई पर्यावरण दिवस तो एक दिनां को रैत आए जोन टाईप से शिक्षक दिवस, महिला दिवस, फादर दिवस मने किसम-किसम को दिवस। एक दिनां लुगाइयन के जैकारे करे और दूजे दिनां से बोई मार-कुटव्वल। जो पेरेंट्स डे भओ तो एक दिनां मताई-बाप खों गिफट-मिफट दे के पूछ लओ औ दूसरे दिनां से मूंड़ से मूंड़ जोर के सोचन लगे के अब कोन से वाले भैया के इते उने टिपाओ जाए? बस, जेई दसा रैत आए पर्यावरण की। ने तो आपई सोचो के जो हरेक साल लगाए गए पौधा सई से रै पाते औ बड्डे हो पाते तो आज पर्यावरण बचाबे की फ़िक्र ने करने परती। तनक जा बी सोचियो के पड़ोस के जिला में, जोन अपनईं संभाग में आए छतरपुर को बक्सवाहा में हीरा निकारबे के लाने पेड़े कट  रए औ अबे औ कटहें। का कोनऊं इते चीं बी बोल रओ? कोनऊं नईं! चलो उते की छोरो, अपने इते सागर में कालोनियां तो मनों मुतकीं बढ़ गईं लेकन का सहर में उत्ते पेड़ें लगाए गए? जो लगाए जाते तो पूरी गरमी नौतपा घांईं काए खों तपती? सो, भैया-भैन हरों, अपन खों पर्यावरण दिवस एक दिनां मना के नईं रै जाने, हर दिन मनाने है। तभईं अपन औ अपनों सहर अच्छें रैहें।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Saturday, June 6, 2026

अंबेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, समिति संवाद पत्रिका, अप्रैल-मई 2026 संयुक्तांक

"अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां" मेरा यह लेख पुणे की "समिति संवाद" पत्रिका के संयुक्तांक अप्रैल-मई 2026 में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका के कार्यकारी संपादक आदरणीय भाई डॉ सुनील केशव देवधर जी का हार्दिक आभार 🙏
    मुझे पहली बार इस पत्रिका को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ निश्चित रूप से यह एक उच्च कोटि की वैचारिक पत्रिका है। संपादक  ज. गं. फगरे एवं कार्यकारी संपादक डॉ. सुनील देवधर जी को पत्रिका के संपादन के लिए हार्दिक बधाई एवं साधुवाद💐
लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

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Thursday, June 4, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जे छुटकुल नेता हरें औ अर्जुन के तीर 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       जा राजनीति बी गजबई की चीज आए। जोन की लाग लग गई बा सातमें आसमान पे औ जोन की ने लगी बा कऊं को नईं। चार दिनां से भैया औ भौजी बायरे गए सो उनसे बतकाव ने हो पा रई, बाकी असल तो आप ओरें हो जोन से जी भर के बतकाव करी जा सकत आए। का आए के जब कोऊ बड़ो चुनाव जीत जात आए तो ऊके गुट के छुटभैया हरें ऐसे उचकत फिरत आएं मनो सगरे तीर उनईं ने चलाए नए होंए। बे इतरान लगत आएं। कछू के कछू बकन लगत आएं। जे बरहमेस चलत आ रओ। जेई टाईप की दो किसां आएं महाभारत वारे अर्जुन औ भीम की। सो, पैले सुनों आ ओरें अर्जुन की किसां।
का भओ के जबे महाभारत की लड़ाई खतम भई तो पांडव हरन खों राज मिल गओ। एक दिनां अर्जुन ने दरबार में कई के ‘‘हम सबसे बड़े तीरंदाज आएं। जो हमने अपने तीर से कर्ण खों ने मारो होतो तो आज कओ दुर्योधन हरें इते बैठे राज करत दिखाते। बा हमई हते जोन ने भीष्मपितामह जू के लाने अपने तीरन से बिछौना सो बना दओ रओ। औ हमई हते जोन ने अपने तीर से धरती खों फाड़ के भीष्मपितामह जू को पानी पिलाओ रओ।’’
उते जोन चमचा टाईप के दरबारी हते बे अर्जुन की जा बात सुन के उनके जैकारे लगाऊंन लगे। जा देख के किसन भगवान खों अच्छो नई लगो। उन्ने अर्जुन से कई के ‘‘बा सब तो ठीक आए, मनो तुमें ऐसो बखान नईं करो चाइए। सब कछू तुमाओ करो भओ नइयां।’’
जा सुन के अर्जुन खों लगो के किसन भगवान हमाए सारथी बने रए, जेई से अपनी तारीफ ने सुन के इने बुरौ लग रओ आए। सो बा बोलो के ‘‘आप सबई जान लेओ के हमाए रथ को हांकबे वारे जे किसन जू रए जेई से हम सई-सई तीर चला पाए।’’
ऊकी बात सुन के किसन भगवान समझ गए के जा अर्जुन ऐसे ने मानहे, ईकी आंखें खोलनई परहें।
कछू नईं! किसन भगवान ने घूमबे को प्रोगराम बनाओ। बे पाचों पांडो हरों खों ले के चल परे। एक जांगा पे पतरी सी नदी परी। ऊमें पानी बी कमई रओ। अर्जुन ने अपनों रथ बा नदी में उतार दओ के नदी पार करी जा सके। सबरे भैयन को रथ नदी पार पौंच गए मनो अर्जुन को रथ बीच नदी में पौंच के धसन लगो। अर्जंन ने भौतई कोसिस करी पर रथ को धंसबो ने थमो। अब अर्जुन तनक घबड़ानों। बा रथ से उतर के रथ को चका उठाबे की कोसिस करन लगो। पर कछू फरक ने परो। तब ऊने किसन भगवान से कई के ‘‘आप रथ पे बैठे आओ, जेई से जो धंसत जा रओ आए। अब तनक उतर आओ।’’
किसन भगवान अर्जंन के कए पे रथ से उतर गए। उनके उतरतई सात रथ के चका औ तेजी से धंसन लगे। अर्जंुन रथ के चका निकारबे के लाने जित्तो जोर लगातो, उत्तई बे धंसन लगते। अर्जंन थक गओ। तब ऊने किसन भगवान से पूछी के ‘‘जो सब का हो रओ? सबके रथ कढ़ गए, मनो मोरो रथ बीता भर पानी बारी नदी में बूड़त जा रओ। हमें तो कछू समझ में नईं आ रओ। हम उतर गए, आप उतर गए रथ पे कोनऊं ने बचो फेर बी रथ फंसो डरो। मनो चुल्लू भर पानी में डूब के मरो चात होए। कछू समझ नईे आ रई के जे का लीला आए?’’
‘‘बात जे आए अर्जुन के तुमा जे रथ खों ने तो हमने सम्हारो रओ और ने तो तुमने। ईको सम्हारबे वारो भौतई वजनदारी वारो आए। औ अबे उन्हई की वजनदारी के कारन तुमाओ रथ धंसो जा रओ।’’ किसन भगवान ने समझाई।
‘‘सो को आ बे? जिनके कारन हमाए रथ की जे दसा भई जा रई।’’ अर्जुन ने पूछा।
‘‘तनक इते आओ औ देखो को आ तुमाए रथ पे?’’ किसन भगवान बोले।
‘‘को आ?’’ कैत भए अर्जुन ने ऊ तरफी देखी जी तरफी किसन भगवान देख रए हते।
‘‘उते का दिखा रओ? उते तो पतरो सो झंडा लगो आए। उते तो एक ठंइयां बंदरा लौं नइयां।’’ अर्जुन बमकत भओ बोलो।
जेसई अर्जुन ने इत्तो बोलो के बा पतरो सो झंडा जोर से हलो औ ऊमें से हनुमान जू निकरे औ अर्जुन से बोले के ऐसो कै के तुमने ठीक नईं करो।’’
फेर बे गायब हो गए। जा देख-सुन के अर्जुन घबड़ानों।
‘‘जे हनुमान जू इते का कर रए हते? औ अब कां चले गए? अरे, जे हमाओ रथ तो ऊपरे निकर आओ।’’ कैत भओ अर्जुन थर-थर कांपन लगो।
‘‘अर्जुन भैया, तुम आओ मूरख। अरे हनुमान जू तो पूरे जुद्ध के टेम पे अपन दोई के संगे रए। तुमाए रथ खों बेई तो दाबे रए ने तो कर्ण के तीरन की आंधी में तुमाओ रथ उड़ गओ होतो औ तुम धूरा चाट रए होते। हनुमान जू तुमाए रथ के झंडा पे सवार रए आए जेई से तुमाओ रथ सई-सई चलत रओ। जेई से तुम जीत पाए।’’ किसन भगवान ने असल बात बताई। फेर बोले के तुमने बंदरा वारी बात बोल के उने नाराज कर दओ आए। सो लौट के चलबी तो उनसे माफी मंगा लइयो।’’
जा सुन के अर्जुन रोन लगो औ बोलो के ‘‘हमाओ दिमाग चल गओ रओ। हमें घमंड आ गओ रओ। हम आप से माफी मांगत आएं औ संगे हनुमान जू के सोई पांस पकर लेबी।’’ अर्जुन बोलो।
‘‘तुमें कछू करबे की जरूरत नइयां, बस इत्तई करो के जुद्ध जीतबे पे घमंड ने करियो। घमंड को फल करओ होत आए।’’ किसन भगवान बोले।
अर्जुन खो अपनी गलती समझ में आ गई औ ऊने घमंड करबो छोड़ दओ। मनो आजकाल के छुटकुल नेता हरो के समझ के लाने कोनऊं ने तो किसन भगवान आएं औ ने तो हनुमान जू। सो बे तो इतरातई रैंहें। संगे कछू बी बकत रैंहे।
रई दूसरी किसां की बात, बोई भीम वारी तो सो बा अगली बेर सुनाबी। ने तो दोई गड्मड् हो जाहे।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं बी राजनीतिक पार्टी के छुटुकुल नेता हरें बकर-बकर कर के अपनी पार्टी खों कित्तों नुकसान पौंचात आएं? सो इनपे लगाम कैसे लग सकत आए?      
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, June 3, 2026

चर्चा प्लस | क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा?      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                    
     यह सच है कि हममें से 99 प्रतिशत लोगों ने कभी खुद जाकर ग्लेशियर नहीं देखे हैं; उन्हें केवल टीवी या इंटरनेट पर ही देखा है। ग्लेशियरों को पिघलते हुए भी हमने सीधे तौर पर नहीं देखा है। तो फिर हमें इस बात की चिंता क्यों करनी चाहिए कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जबकि हम तो मैदानी इलाकों के निवासी हैं? हालाँकि, हम मैदानी इलाकों के निवासियों ने तो कभी बर्फबारी भी नहीं देखी है। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो पूरा मैदानी इलाका भी शीत लहरों की चपेट में आ जाता है। राजस्थान की गर्म हवाएं मध्यप्रदेश को झुलसा देती हैं। तो क्या हमें सचमुच चिंता नहीं करनी चाहिए?
सागरवाले कौन हैं? मैं सागरवाली हूँ। हाँ, मैं सागर में रहती हूँ, जो भारत के दिल यानी मध्य प्रदेश में स्थित एक विकासशील शहर है, और इसीलिए मैं सागरवाली हूँ। कुछ दिन पहले मैं एक परिचित से चर्चा कर रही था कि आजकल मौसम बहुत अस्थिर हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मौसम भी बदल रहा है, जिसे हम अपने जीवन में ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। माफ़ कीजिए, जब तक हम इसे समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। मेरे परिचित ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि मौसम तो बदलता ही रहता है, इसमें चिंता की क्या बात है? इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आप बेवजह ही जलवायु और मौसम को लेकर चिंता करती रहता हैं। अरे, जिस जगह पर हम रहते हैं, वहाँ इन सब चीज़ों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मैंने कहा - वाह! क्या आपने वह कहावत नहीं सुनी है कि अगर धरती पर एक पत्ता भी हिलता है, तो उसका असर दूर अंतरिक्ष तक होता है? तो जब धरती पर ही कोई घटना घटती है, तो उसका असर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक ज़रूर होगा। अब देखिए, जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसका असर पूरी धरती पर पड़ना स्वाभाविक है। यह सुनकर उन्होंने कहा, ‘‘आप कहती हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और यह चिंता का विषय है। बेशक यह चिंता का विषय होगा, लेकिन हमारे लिए नहीं। हम तो बीच के इलाके में रहते हैं। हमें चिंता क्यों करनी चाहिए? हम यहाँ सागर में रहते हैं, जो समुद्र से बहुत दूर है। हमें ग्लेशियरों के पिघलने से क्यों डरना चाहिए? अगर ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है, तो समुद्र के तटीय इलाकों में रहने वालों को चिंता करनी चाहिए, हमें नहीं।’’
क्या सचमुच एक सागरवाले, एक भोपाली, एक लखनवी या एक लुधियानवी को ग्लेशियरों के पिघलने से नहीं डरना चाहिए? असल में, ग्लेशियरों का पिघलना आज ग्लोबल वार्मिंग का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। सीधे शब्दों में कहें तो, ग्लेशियरों की सफ़ेद सतहें सूरज की किरणों को परावर्तित करती हैं, जिससे हमारे मौजूदा मौसम को मध्यम बनाए रखने में मदद मिलती है। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो नीचे की काली सतहें सामने आ जाती हैं, जो गर्मी को सोखती और छोड़ती हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है। ग्लेशियर पानी के भंडार के रूप में काम करते हैं, जो गर्मियों के मौसम में भी बने रहते हैं। ग्लेशियरों से लगातार पिघलने वाला पानी सूखे महीनों के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र को मिलता रहता है, जिससे बारहमासी जलधाराओं का निर्माण होता है और पेड़-पौधों व जानवरों के लिए पानी का स्रोत बना रहता है। ग्लेशियरों से बहकर आने वाला ठंडा पानी, नीचे की ओर बहने वाली नदियों और जलधाराओं के तापमान को भी प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है - पर्यावरण में बदलाव। यह बदलाव हमारे सामने बेमौसम बारिश, बर्फ़बारी, बढ़ती गर्मी और सूखे के रूप में आ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका से लेकर ग्रीनलैंड तक, इन क्षेत्रों का अस्तित्व खतरे में है। जीवनदायिनी नदियाँ सूख रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते निकट भविष्य में दुनिया के नक्शे से कई देशों का अस्तित्व मिट जाने की आशंका है। पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि देखी गई है। जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक और मानवीय, दोनों ही कारण हैं; लेकिन वर्तमान समय में जो परिणाम सामने आए हैं, वे मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण हैं। हमारे सामने एक बड़ा संकट खड़ा है, और दुर्भाग्य से हम इससे अनजान हैं। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज़ कर रहे हैं, जिससे उन 75 करोड़ लोगों का जीवन और आजीविका खतरे में पड़ गई है, जो इन ग्लेशियरों और बर्फ से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। पिघलते ग्लेशियर समुद्र के बढ़ते जलस्तर में योगदान देते हैं, जिससे तटीय कटाव बढ़ता है और तूफानी लहरों (ेजवतउ ेनतहमे) का खतरा बढ़ जाता है; क्योंकि गर्म होती हवा और समुद्री तापमान के कारण हरिकेन और टाइफून जैसे तटीय तूफान अधिक बार-बार और अधिक तीव्रता के साथ आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल गई, तो इससे वैश्विक समुद्र का जलस्तर 20 फीट तक बढ़ जाएगा।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर प्रमाणों में से एक है। यह इस बात का सबूत है कि ग्लोबल वार्मिंग न केवल पृथ्वी का तापमान बढ़ा रही है, बल्कि यह मौसम और जलवायु को भी बदल रही है। मौसम पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव का अर्थ है कि कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो कहीं भारी वर्षा होती है। इसका कृषि और बागवानी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जलस्तर कम होने के कारण पेयजल का संकट भी उत्पन्न हो जाता है। हमने पिछले पाँच वर्षों के दौरान बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़े सूखे के दौरान इन सभी बातों के उदाहरण पहले ही देख लिए हैं। इसलिए, यह सोचना कि हिमालय या ध्रुवीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने का हमारे देश के भीतरी इलाकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, स्वयं को भ्रम में रखना है। इसीलिए दुनिया के हर व्यक्ति के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा करने में अपना योगदान दे। हमें यह समझना होगा कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने का प्रभाव तटीय क्षेत्रों पर 50 प्रतिशत होगा, तो उसी समय भीतरी इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका प्रभाव कम से कम 10 से 20 प्रतिशत अवश्य पड़ेगा। इसलिए, जागिएकृचाहे आप सागर के निवासी हों, भोपाली हों, लखनवी हों, लुधियानवी हों, या फिर आप कहीं के भी नागरिक हों।

2025 का संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 10-21 नवंबर 2025 को ब्राजील के बेलेम में आयोजित किया गया था। इसमें 190 से अधिक देशों के नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के सदस्यों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्यों पर चर्चा करने के लिए एक साथ लाया गया, जिसमें पहले वैश्विक स्टॉकटेक  के परिणामों को ठोस राष्ट्रीय कार्यों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया गया था। अगला सम्मेलन नवंबर 2026 में होगा।

बीसवीं शताब्दी में तीव्र हुई ग्लेशियरों के पिघलने से हमारा ग्रह बर्फ़विहीन होता जा रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में मानवीय गतिविधियाँ मुख्य भूमिका निभाती हैं। समुद्र का स्तर और वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि बर्फ़ के ये विशाल भंडार किस प्रकार विकसित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के निरंतर बढ़ते प्रभाव के कारण पृथ्वी के ग्लेशियर आधी सदी से भी अधिक समय से सिकुड़ रहे हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय (स्विट्जरलैंड) द्वारा 2019 में किए गए एक उपग्रह अध्ययन के के बाद कहा गया था कि दक्षिण-पूर्व एशिया को छोड़कर पृथ्वी पर कोई भी स्थान इस घटना के प्रभावों को झेलने में सक्षम नहीं है, जिसने 1961 से अब तक दुनिया भर में 9.6 अरब टन से अधिक हिमनद बर्फ पिघला दी है, और विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, 2100 तक एक तिहाई से अधिक ग्लेशियरों के वाष्पीकृत होने का खतरा है। दुर्भाग्य से यह भविष्यवाणी सच होने लगी है।

ग्लेशियर क्या होता है और यह कैसे बनता है? दरअसल, बर्फ के ये विशालकाय गतिशील पिंड ठंडे स्थानों में जमा हुई बर्फ के संघनन और पुनरू क्रिस्टलीकरण से बनते हैं, जैसा कि उदाहरण के लिए पर्वतीय और ध्रुवीय ग्लेशियरों में होता है, जिन्हें विशाल आर्कटिक प्लेटों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। हिमनदों को उनकी आकृति विज्ञान के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है - हिमक्षेत्र, सर्क हिमनद, घाटी हिमनद, आदि - जलवायु के अनुसार - ध्रुवीय, उष्णकटिबंधीय या समशीतोष्ण - और उनकी तापीय स्थितियों के अनुसार - ठंडा, गर्म या बहुतापीय आधार। एक हिमनद के निर्माण में हजारों वर्ष लगते हैं, और इसका आकार इसके जीवनकाल में इसमें मौजूद बर्फ की मात्रा के आधार पर बदलता रहता है। बर्फ पिघलने के दौरान इन हिमनदों का व्यवहार उन नदियों के समान होता है जिन्हें ये पानी देते हैं, और इनकी गति घर्षण और उस भूभाग की ढलान पर निर्भर करती है जिस पर ये चलते हैं। कुल मिलाकर, हिमनद पृथ्वी की सतह के 10 प्रतिशत भाग को ढकते हैं और बर्फ की चोटियों के साथ मिलकर विश्व के लगभग 70 प्रतिशत ताजे पानी का स्रोत हैं।
पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने ग्लेशियरों के पिघलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज, जलवायु परिवर्तन की बढ़ती गति के कारण ये रिकॉर्ड समय में विलुप्त हो सकते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन- उद्योग, परिवहन, वनों की कटाई और जीवाश्म ईंधन जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की वायुमंडलीय सांद्रता पृथ्वी को गर्म करती है और ग्लेशियरों को पिघलाती है। महासागर पृथ्वी की 90 प्रतिशत गर्मी को अवशोषित करते हैं, और यह तथ्य समुद्री ग्लेशियरों के पिघलने को प्रभावित करता है, जो ज्यादातर ध्रुवों के पास और अलास्का (संयुक्त राज्य अमेरिका) के तटों पर स्थित हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय ने पाया कि पिछले तीन दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो गई है। बर्फ का यह नुकसान पहले ही 335 अरब टन प्रति वर्ष तक पहुंच चुका है, जो समुद्र के वर्तमान विस्तार की दर का 30 प्रतिशत  है।

ग्लेशियरों के पिघलने के मुख्य परिणाम घातक हैं। सन 1961 से हिमनदों के पिघलने के कारण समुद्र का स्तर 2.7 सेंटीमीटर बढ़ गया है। इसके अलावा, दुनिया के ग्लेशियरों में लगभग 170,000 घन किलोमीटर बर्फ मौजूद है, जो समुद्र के स्तर को लगभग आधा मीटर तक बढ़ा सकती है। ध्रुवों पर हिमनदों के पिघलने से समुद्री धाराओं की गति धीमी हो रही है, यह एक ऐसी घटना है जो वैश्विक जलवायु में परिवर्तन और दुनिया भर में तेजी से बढ़ती चरम मौसम घटनाओं की एक श्रृंखला से संबंधित है। हिमनदों के पिघलने से कई प्रजातियों का विलुप्त होना भी तय है, क्योंकि हिमनद स्थलीय और जलीय दोनों प्रकार के कई जानवरों का प्राकृतिक आवास हैं। ग्लेशियरों के लुप्त होने का अर्थ यह भी है कि जनसंख्या द्वारा उपभोग के लिए कम पानी, जलविद्युत ऊर्जा उत्पादन क्षमता में कमी और सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा कम हो जाती है।
ग्लेशियर वैज्ञानिकों का मानना है कि भारी बर्फ पिघलने के बावजूद, हमारे पास अभी भी हिमनदों को उनके अनुमानित लुप्त होने से बचाने का समय है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में हम कैसे मदद कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को कम करने और ग्लेशियरों को बचाने के लिए, यह अनिवार्य है कि अगले दशक में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम किया जाए, और 2050 के बाद इसे शून्य तक लाया जाए।
जरा सोचिए कि सागर भी इसी पृथ्वी पर है। यदि पृथ्वी में प्राकृतिक असंतुलन होगा तो उसके दुष्प्रभावों से सागर भी बचेगा नहीं। इस बार गर्मियों में रिकार्ड तोड़ तपन और हीटवेव्स ने चेतावनी दे ही दी है कि यदि हम पेड़ काटते रहे, जलाशय सुखाते रहे तो हम चाहे सागर में रहें या जबलपुर में, हमें ग्लेशियरों के पिघलने का असर झेलना ही होगा।      
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(दैनिक, सागर दिनकर में 03.06.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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