चर्चा प्लस
हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
विशेष रूप से उत्तर भारत में मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ अपने पांव पसारता जा रहा है। यदि आप राजनीतिक, प्रशासनिक रूप से या पैसों से पॉवरफुल हैं तो आपको उन मंदिरों में भी गर्भगृह तक जाने और देवप्रतिमा के निकट पहुंच कर दर्शन करने की सुविधा मिल जाएगी जहां आमजन के लिए प्रवेश निषेध है। क्या ईश्वर की निकटता पैसों और पॉवर से बंधी हुई है? हम श्रीमदभगवद्गीता पढ़ते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उसकी शपथ भी लेते हैं, हम वेद, पुराण पढ़ते-सुनते हैं और प्रवचनों में उनके उद्धरण सुन कर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। क्या कभी हमने ध्यान से पढ़ा है कि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने किसे असली भक्त और अपना प्रिय बताया है? ‘‘ऋग्वेद’’ में किसे ईश्वर का प्रिय बताया गया है? या फिर क्या हमने कभी ध्यान दिया गया है कि ‘‘रामचरित मानस’’ में किसे असली भक्त कहा गया है? इन सबको समझे बिना यदि हम मंदिरों में ईश-दर्शन पर वीआईपी संस्कृति थोपते जाएंगे तो हम अपने धर्म का भी व्यवसायीकरण करते जाएंगे। जबकि धर्म आस्था है बाजार नहीं।
यह तो सभी ने देखा होगा कि नवरात्रि अथवा विशेष हिन्दू पर्वों में ग्रामीण अथवा आर्थिकरूप से कमजोर तबके के लोग, चाहे वे स्त्री हो या पुरुष ईश्वर की आस्था से प्रेरित हो कर धर्म ध्वज उठाए पैदल निकल पड़ते हैं मंदिरों की ओर। कुछ लोग तो डामरीकृत अथवा सीसीरोड पर तपन की परवाह किए बिना लेट-लेट कर अपने घर से मंदिर तक की दूरी तय करते हैं। कांवरियों के बारे में तो सभी जानते हैं। जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को ईशस्थल के दर्शन कराने के लिए कांवर में उन्हें ढोया था ठीक वैसे ही एक पलड़े में आस्था और दूसरे पलड़े में ईश्वर के प्रति प्रेममय समर्पण रख कर कांवरियां निकल पड़ते हैं। इस प्रकार के समर्पित भक्तों को जिनके मन में श्रद्धा और भक्ति हिलोरें लेती रहती हैं क्या वीआईपी दर्शन मिलते हैं? उत्तर होगा ‘नहीं!’ क्योंकि ये विशुद्ध भक्त हैं, धनपति, पॉवरपति या प्रशासनपति नहीं। इन्हें गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति कभी नहीं होती है।
हर वर्ष नवरात्रि पर मैं अपनी आंखों से देखती हूं कि किस प्रकार वीआईपी कल्चर उन मंदिरों में भी प्रवेश पा चुका है जहां पहले हर प्रकार के भक्त को कदम रखने की अनुमति थी। पिछले वर्ष की नवरात्रि की घटना है, मैं रानगिर मंदिर दर्शन करने गई थी। रास्ते में मैंने अनेक ऐसे भक्त देखे जो माता का ध्वज पैदल जा रहे थे। उनमें कुछ ऐसे भी थे जो सड़क पर दंडवत लेट-लेट कर रस्ता तय कर रहे थे। आस्था का घोर समर्पित रूप जिसमें श्रद्धालु स्वयं को कष्ट पहुंचाता है ताकि देवी को प्रसन्न कर सके। देवी के दर्शन कर के उसकी कृपा पा सके। किन्तु मंदिर में पहुंच कर लंबी लाईन में लगने के बाद भी उसे वह निकट दर्शन नहीं मिलते हैं जो एक विधायक, मंत्री, कमिश्नर, कलेक्टर या किया धन सम्पन्न व्यक्ति को सुगमता से मिलते हैं। क्या कष्ट उठा कर पहुंचने वाले भक्त की भक्ति में कोई कमी है और शक्ति सम्पन्न भक्त की भक्ति विशिष्ट है? दोनों की भक्ति में कोई अंतर होता तो नहीं है लेकिन बना दिया जाता है। फिर भी यदि बारीकी से धर्म के पलड़े पर तौला जाए तो कष्ट उठा कर आने वाले भक्त का पलड़ा भारी ही रहेगा। फिर भी उसे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं मिलेगा, जबकि एक वीआईपी को तत्काल मिल जाएगा। जब ईश्वर अपने भक्तों में भेद-भाव नहीं करता है तो हमारे मंदिरों में इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है?
इस बात का आशय यह नहीं है कि हर व्यक्ति को मंदरों के गर्भगृह में प्रवेश दिया जाए। यदि सुरक्षा कारणों से यह उचित नहीं है तो प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। मंदिर के पुरोहित या पुजारी आदि को ही यह अनुमति मिलनी चाहिए। हर भक्त एक निश्चित दूरी से ईशप्रतिमा के दर्शन करे। लेकिन ‘‘हर भक्त’’। इस नियम को कोई वीआईपी भी न तोड़ सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। क्या यह उचित नहीं होगा? कि या तो हर भक्त को प्रवेश मिले अथवा किसी भी भक्त को प्रवेश न मिले। ईश्वर के दरबार में सभी एक समान महसूस कर सकें। यही धर्मोचित व्यवस्था कहलाएगी।
ईश्वर का प्रिय भक्त कौन है और उसकी क्या विशेषता होनी चाहिए इस बारे में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में स्पष्ट उल्लेख है कि ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त है जो निस्वार्थ, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान रहता है और निरंतर प्रभु के प्रति समर्पित होता है। ‘‘गीता’’ के 12वें अध्याय के 13वें और 14वें श्लोक में स्पष्ट कहा किया कि -
श्लोकःअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्याे मद्भक्तः स मे प्रियः।।
- अर्थात जो व्यक्ति किसी भी जीव से द्वेषभाव नहीं रखता, सब प्राणियों का मित्र और दयालु है, ममता से युक्त, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान (शांत) रहने वाला और क्षमाशील है। जो योगी निरंतर संतुष्ट है, जिसने मन और इंद्रियों को वश में कर रखा है, जिसका मन और बुद्धि मुझमें अर्पित हैं, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
इसी प्रकार गीता के 12वें अध्याय का 15वां श्लोक है कि
‘‘रूयस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोड्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।
- अर्थात जिससे किसी भी जीव को कष्ट नहीं होता, जो किसी जीव से स्वयं भी भयभीत नहीं होता, और जो हर्ष (अत्यधिक ख़ुशी), अमर्ष (ईर्ष्या/क्रोध), भय तथा उद्वेगों से मुक्त है, वह भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है।
गीता के 12वें अध्याय का 16वां श्लोक इस संबंध में और अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि-
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।
- अर्थात जो भक्त सांसारिक कामनाओं से रहित, भीतर-बाहर से पवित्र, कार्य करने में कुशल, पक्षपातरहित, दुखों से मुक्त है और जिसने सभी आरंभों (कर्मों के फलों की चाहना) का त्याग कर दिया है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है।
भगवद गीता के अलावा, अन्य हिंदू धर्मग्रंथों जैसे रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और ऋग्वेद में भी ईश्वर के प्रिय भक्त के गुणों और लक्षणों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में उन लोगों को ईश्वर का प्रिय बताया गया है जो सत्य मार्ग पर चलते हैं और ईश्वर की स्तुति करते हैं। देखिए ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 31, श्लोक 6 -
सत्यं वदन्तं कवयः पृच्छन्ति
नयन्ति धीराः सुकृताय लोकं।।
- अर्थात जो मनुष्य हमेशा सत्य का आचरण करता है, सत्य बोलता है, वही बुद्धिमान, श्रेष्ठ और ईश्वर का प्रिय है। ऐसे ही सच्चे ज्ञानी मनुष्य को ईश्वर उत्तम लोक तक ले जाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त होता है जो निष्कपट, अहंकारहीन हो और सांसारिक दिखावे से दूर रहकर निष्काम भाव से प्रभु के प्रेम में लीन रहता है। इस संबंध में श्रीहरि और नारद मुनि की एक बहुत प्रसिद्ध पौराणिक कथा है। श्रीमद्भागवत पुराण इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण प्रह्लाद के चरित्र के माध्यम से बताते हैं कि ईश्वर का प्रिय कौन है? (स्कंध 7, अध्याय 14)-
निर्ममा निरहङ्काराः समदुःखसुखाः सुहृदः।
निःसङ्गाः सर्वतो येषां मयि सन्निवेशितं मनः।।
- अर्थात जो ममता और अहंकार से रहित हैं, सुख-दुख में समान हैं, सब प्राणियों के सच्चे हितैषी (सुहृद) हैं, आसक्तिहीन हैं और जिनका मन पूरी तरह से मुझमें (परमात्मा में) लगा हुआ है, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
तुलसीदासकृत ‘‘रामचरितमानस’’ में प्रभु श्रीराम ने शबरी को बताते हुए ईश्वर के प्रिय के लक्षण स्पष्ट किए हैं। रामचरितमानस में यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। देखिए अरण्यकाण्ड, दोहा 35-36, रामचरित मानस -
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
करम बचन मन राउर चेरा।
सोइ जनु मोर परम प्रिय नेरा।।
-अर्थात जिसका मन निष्कपट और निर्मल होता है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है। मुझे छल-कपट और दूसरों में दोष (छिद्र) ढूँढना बिल्कुल पसंद नहीं है। जो मनुष्य कर्म, वचन और मन से मेरा (ईश्वर का) दास है, वही मेरा परम प्रिय है।
संत रैदास की भक्ति मुख्य रूप से दास्य भाव और बिना शर्त समर्पण पर आधारित है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि शुद्ध मन और प्रेम से प्राप्त होती है। इसीलिए तो वे कहते हैं कि ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’’ संत कबीर ने अपनी रचनाओं में ईश्वर भक्ति के नाम पर होने वाले आडंबरों, दिखावे और कर्मकांडों का घोर विरोध किया है। उनके अनुसार, ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्रेम में बसते हैं। चाहे रैदास हों या कबीर यही कहते हैं कि ईश्वर की निकटता आडम्बरहीन रहने में है, आडम्बरों नहीं।
दरअसल, मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन’’ एक ज्वलंत विषय है। ईश्वर के दरबार में सभी भक्तों को समान माना जाना चाहिए, लेकिन वीआईपी संस्कृति के तहत प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं और अधिकारियों को विशेष सुविधाएँ मिलती हैं, जिससे आम जनता को घंटों लाइनों में इंतजार करना पड़ता है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि भगवान के सामने सभी भक्त बराबर हैं। अदालतों का मानना है कि मंदिरों में विशेषाधिकार की बजाय समानता का भाव होना चाहिए। जहां वीआईपी कुछ ही मिनटों में दर्शन करके लौट जाते हैं, वहीं आम श्रद्धालुओं को कई घंटों तक लंबी और थका देने वाली कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। वीआईपी आगमन के समय अक्सर आम कतारों को रोक दिया जाता है या सुरक्षाकर्मियों को आम जनता से धक्का-मुक्की करनी पड़ती है, जिससे भगदड़ का खतरा बढ़ जाता है। कई मंदिरों में वीआईपी और विशेष दर्शन के लिए अलग-अलग राशि तय कर दी गई है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति भी अब एक व्यापार बन चुकी है।
जबकि सिख धर्म में ऐसा नहीं है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां किसी भी प्रकार का वीआईपी या प्राथमिकता पास नहीं होता। सभी को एक ही आम कतार से गुजरना पड़ता है। अन्य गुरु़द्वारे भी इसका पालन करते हैं। फिर हिन्दू मंदिरों में वीआईपी कल्चर की अपसंस्कृति को क्यों घुसपैंठ करने दिया जा रहा है? इससे हिन्दू धर्म को ही ठेस पहुंच रही है। वैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वीआईपी दर्शन जैसी कोई सुविधा देनी ही है तो वह वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और अतिआवश्यक संवैधानिक पदों तक ही सीमित रखना चाहिए। बहरहाल, इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार किया जाना जरूरी है। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 25.06.2026 को प्रकाशित)
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