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Friday, July 18, 2025

शून्यकाल | शारीरिक कष्टों से मुक्ति का अनूठा काव्य है तुलसीदास का “हनुमान बाहुक” | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - शून्यकाल

      शारीरिक कष्टों से मुक्ति का अनूठा काव्य है तुलसीदास का “हनुमान बाहुक”
         - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                       
        गोस्वामी तुलसीदास श्री राम के अनन्य उपासक थे किंतु जब उन्हें भय, संकट या पीड़ा से मुक्ति चाहिए होती थी, तो वे श्रीराम के सेवक हनुमान जी का स्मरण करते थे। इसी मनोभाव से उन्होंने “हनुमान चालीसा” का सृजन किया। उसमें उन्होंने लिखा- “भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे / नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बल बीरा” । फिर भी उन्हें शारीरिक कष्ट दूर करने के लिए हनुमान जी से विशेष प्रार्थना करनी पड़ी जो “हनुमान बाहुक” के रूप में सामने आई। यह असीमित विश्वास से भरी हुई रचना है जिसमें एक उलाहना भी शामिल है जो कि बहुत रोचक है।
 
उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर नाम के गांव में पिता आत्मा राम दुबे और माता हुलसी के घर तुलसीदास का जन्म सम्वत 1557 में श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ। यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता है। इस शंका को बढ़ाने के लिए जो घटनाएं हुईं, उनमें कुछ हैं, जैसे तुलसीदास जी जन्मते ही रोये ही नहीं अपितु उनके मुँह से राम शब्द निकला। उनके शरीर का आकार भी सामान्य शिशु की तुलना में अधिक था और सबसे बढ़कर उनके मुख में जन्म के समय ही दाँतों की उपस्थिति थी। यह सब लक्षण देखकर उनके पिता किसी अमंगल की आशंका से भयभीत थे। उनकी माता ने घबराकर कि बालक के जीवन पर कोई संकट न आए, अपनी एक चुनियां नाम की दासी को बालक के साथ उसके ससुराल भेज दिया। विधि का विधान ही कुछ और था और वे अगले दिवस ही गोलोक वासी हो गई। चुनियां ने बालक तुलसीदास का पालन पोषण बड़े प्रेम से किया पर जब तुलसीदास जी करीब साढ़े पाँच वर्ष के हुए तो चुनियां शरीर छोड़ गई। । अनाथ बालक द्वार – द्वार भटकने लगा। इस पर माता पार्वती को दया आई और वे एक ब्राह्मणी का वेश रखकर प्रतिदिन बालक को भोजन कराने लगीं। 
          श्री अनन्तानन्दजी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्दजी जो रामशैल पर निवास कर रहे थे, उन्हें भगवान शंकर से प्रेरणा प्राप्त हुई और वे बालक तुलसीदास को ढूढ़ते हुए वहां पहुंचे और मिलकर उनका नाम रामबोला रखा। वे बालक को अपने साथ अयोध्या ले गए और वहाँ उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया। तुलसीदास जी ने जहाँ बिना सिखाए ही गायत्री मंत्र का उच्चारण कर सभी को एक बार फिर चकित कर दिया। नरहरि महाराज ने वैष्णवों के पांच संस्कार कराए और राम मंत्र से दीक्षित किया। 
इसके बाद उनका विद्याध्ययन प्रारम्भ हो गया। तुलसीदास जी एकपाठी थे। अर्थात वे जो भी एक बार सुन लेते थे उसे वे कंठस्थ कर लेते थे। उनकी प्रखर बुद्धि की सभी प्रशंसा करते थे। फिर नरहरि महाराज उन्हें काशी में शेषसनातन जी के पास वेदाध्ययन के लिए छोड़ गए। यहाँ तुलसीदास जी ने 15 वर्ष वेद-वेदांग का अध्ययन किया। 
       गोस्वामी तुलसीदास का निधन 1623 ईस्वी में वाराणसी (काशी) में हुआ था. उनकी मृत्यु अस्सी घाट पर हुई थी, जो गंगा नदी के किनारे स्थित है. यह घटना श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की तीज को हुई थी, जो विक्रम संवत 1680 के अनुसार थी. उनकी मृत्यु के संबंध में एक दोहा भी प्रचलित है: "संवत सोरह सौ असी, असी गंग के तीर, श्रावण कृष्णा तीज शनि, तुलसी तज्यो शरीर". 
        अपने दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास ने कालक्रमानुसार निम्नलिखित कालजयी ग्रन्थों का सृजन किया। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ग्रंथ इसप्रकार हैं - रामचरितमानस, रामललानहछूं, वैराग्य-संदीपनी, बरवै रामायण, पार्वती-मंगल, जानकी-मंगल, रामाज्ञाप्रश्न, दोहावली, कवितावली, गीतावली, श्रीकृष्ण-गीतावली, विनयपत्रिका, सतसई, छंदावली रामायण, कुंडलिया रामायण, राम शलाका, संकट मोचन, करखा रामायण, रोला रामायण, झूलना, छप्पय रामायण, कवित्त रामायण एवं कलिधर्माधर्म निरुपण।
         कवितावली के साथ उन्होंने ‘हनुमान बाहुक’ भी लिखा। कहा जाता है कि तुलसीदास जी को जीवन के उत्तरार्ध में बाँहों में असहनीय पीड़ा होने लगी थी। साथ ही फोड़े-फुंसी जैसे शारीरिक कष्टों ने भी ने उन्हें घेर लिया था। उन्होंने हर तरह की चिकित्सा करके देखी किंतु किसी से भी उन्हें आराम नहीं मिल रहा था। लोगों के कहने पर झाड़-फूंक भी कराया, फिर भी आराम नहीं मिला। जबकि उन्होंने स्वयं लोगों को निरोग रहने के लिए तथा पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए ‘श्रीहनुमान चालीसा’ में यह मंत्र दिया था- ‘नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा’। अतः शारीरिक कष्ट से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने श्रीहनुमान जी की स्तुति एवं प्रार्थना आरंभ कर दी। संयोगवश इससे उन्हें आराम मिला। तब उन्होंने रोग मुक्ति के लिए चवालीस पद वाली हनुमान जी की  प्रार्थना ‘हनुमान बाहुक’ लिखी। 
       ‘हनुमान बाहुक’ में छप्पय, झूलना, घनाक्षरी, सवैया आदि छंदों का प्रयोग किया गया है। मान्यता है कि इस स्तुति का सस्वर पाठ रोग पीड़ित को पीड़ा से मुक्ति दिलाता है। ‘हनुमान बाहुक’ अवधी में लिखा गया है। इसमें कुल 44 पद हैं। 
       "हनुमान बाहुक" छप्पय छंद से आरंभ होता है। इसके कुछ पद भावार्थ सहित इस प्रकार हैं -

सिंधु-तरन, सिय सोच हरन, रबि-बालबरन-तनु।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव॥
कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकट।
गुनगनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-बिकट॥1॥
       - भावार्थ है कि जिनके शरीर का रंग उदयकाल के सूर्य के समान है, जो समुद्र लाँघकर श्री जानकीजी के शोक को हरने वाले, आजानुबाहु, डरावनी सूरतवाले और मानो काल के भी काल हैं। लंका-रूपी गंम्भीर वन को, जो जलाने योग्य नहीं था, उसे जिन्होंने निःशंक जलाया और जो टेढ़ी भौंहोंवाले तथा बलवान राक्षसों के मान और गर्व का नाश करने वाले हैं, तुलसीदासजी कहते हैं - वे श्रीपवनकुमार सेवा करने पर बड़ी सुगमता से प्राप्त होने वाले, अपने सेवकों की भलाई करने के लिए सदा समीप रहने वाले तथा गुण गाने, प्रणाम करने एवं स्मरण और नाम जपने से सब भयानक संकटों को नाश करने वाले हैं।
       इस प्रकार बाहुक प्रार्थना आरंभ करते हुए तुलसीदास ने तीसरा पद झुलना छंद में लिखा। इसमें उन्होंने श्री हनुमान जी की शक्ति का उन्हें स्मरण कराया है- 
पंचमुख-छमुख-भृगुमुख्य भट-असुर-सुर,
सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो।
बाँकुरो बीर बिरूदैत बिरूदावली,
बेद बंदी बदत पैजपूरो॥
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासु बल
बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है,
पवनको पूत रजपुत रूरो॥3॥
           अर्थात  शिव, स्वामिकार्तिक, परशुराम, दैत्य और देवतावृन्द सबके युद्धरूपी नदी से पार जाने में योग्य योद्धा हैं। वेदरूपी आपकी प्रशंसा करते हैं। तुलसीदास जी हनुमान जी से कहते हैं कि आप पूरी प्रतिज्ञावाले चतुर योद्धा, बड़े कीर्तिमान और यशस्वी हैं। जिनके गुणों की कथा को रघुनाथजी ने श्रीमुख से कहा तथा जिनके अतिशय पराक्रम से अपार जल से भरा हुआ संसार-समुद्र सूख गया। तुलसी के स्वामी सुन्दर राजपूत पवनपुत्र के बिना राक्षसों के दल का नाश करने वाला दूसरा  कोई नहीं है।
     जिस प्रकार हनुमान चालीसा में तुलसीदास जी ने हनुमान जी को उलाहना दिया है कि-”कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहीं जात है टारो”,  ठीक इसी प्रकार  “हनुमान बाहुक” के सत्रहवें पद में तुलसी बाबा पवनकुमार से उलाहना भरी विनती करते हुए कहते हैं-
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरीके से जाले।
बुढ़ भये बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले॥17॥
    - अर्थात हे वानरराज! आपके बसाये हुए को शंकर भगवान भी नहीं उजाड़ सकते और जिस घर को आपने नष्ट कर दिया उसको कौन बसा सकता है ? हे गरीबनिवाज! आप जिस पर प्रसन्न हुए वे शत्रुओं के हृदय में पीड़ा रूप होकर विराजते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं, आपका नाम लेने से सम्पूर्ण संकट और सोच मकड़ी के जाले के समान फट जाते हैं। बलिहारी ! क्या आप मेरी ही बार बूढ़े हो गये अथवा बहुत से गरीबों का पालन करते-करते आप अब थक गये हैं ? (इसीलिए मेरा कष्ट दूर नहीं कर पा रहे हैं)।        
          बीसवें पद में फिर श्री हनुमान जी से प्रार्थना करते हुए तुलसीदास उन्हें आत्मीय उलाहना देते हुए स्मरण कराते हैं कि जो आपको दोना भर-भर के लड्डू खिलाता हो उसे विष खिलाकर मत मारिए। वे घनाक्षरी छंद में  कहते हैं-
जानत जहान हनुमानकौ निवाज्यौ जन,
मन अनुमानि, बलि, बोल न बिसारियै।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी,
साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति,
मोदक मरै जो, ताहि माहुर न मारिये।
साहसी समीरके दुलारे रघुबीरजूके,
बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये॥20॥

     - अर्थात  हे हनुमानजी! अपनी प्रतिज्ञा को न भुलाईये, जिसको संसार जानता है, मनमें विचारिये, आपका कृपापात्र जन बाधारहित और सदा प्रसन्न रहता है। हे स्वामी कपिराज ! तुलसी कभी सेवाके योग्य था ? क्या चूक हुई है, अपनी साहिबीको सम्हालिये। मुझे अपराधि समझते हो तो सहस्त्रों भांतिकी दुर्दशा कीजिये, किंतु जो लडडू दोनेसे मरता हो तो उसको विषसे न मारिये। हे महाबली, साहसी, पवनके दुलारे, रघुनाथ जी के प्यारे ! भुजाओं की पीड़ाको शीघ्र ही दूर कीजिये।
             “हनुमान बाहुक” के अंतिम पद में तुलसीदास दार्शनिक भाव से प्रार्थना करते हुए अपनी पीड़ा के कारणो़ं पर भी विचार करते हैं-
कहों हनुमानसों सुजान रामरायसों,
कृपानिधान संकरसों सावधान सुनिये।
हरष विषाद राग रोष गुन दोषमई,
बिरची बिरंचि सब देखियत दुनिये॥
माया जीव कालके करमके सुभायके,
करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये।
तुम्हतें कहा न होय हाहा सौ बुझैये मोहि,
हौं हूँ रहों मौन ही बयो सो जानि लुनिये॥44॥
       - अर्थात तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं हनुमानजीसे, सुजान राजा रामसे और कृपानिधान शंकरजी से कहता हूँ, उसे सावधान होकर सुनिये। देखा जाता है कि विधाताने सारी दुनियाको हर्ष, विषाद, राग, रोष, गुण और दोषमय बनाया है। वे कहते हैं कि माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव के करने वाले रामचन्द्रजी हैं। इस बात को मैंने चित्तमें सत्य माना है। मैं विनती करता हूँ, मुझे यह समझा दीजिये कि आपसे क्या नहीं हो सकता ? फिर मैं भी यह जान कर चुप रहूँगा कि जो बोया है वही काटता हूँ। 
         यद्यपि “हनुमान चालीसा” अधिक पढ़ी जाती है किंतु “हनुमान बाहुक” का महत्व भी कम नहीं है। इस रचना को भी श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है क्योंकि यह मूल रूप से व्याधियों और शारीरिक पीड़ा पर केंद्रित है। अतः इसका महत्व हनुमान चालीसा से इतर है।
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Friday, July 11, 2025

शून्यकाल | तुलसीदास के काव्य में लोक-मंगल की भावना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - शून्यकाल
    शून्यकाल
तुलसीदास के काव्य में लोक-मंगल की भावना
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
     गोस्वामी तुलसीदास उस इष्ट के उपासक थे जिन्होंने लोकमंगल के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। श्रीराम ने बाल्यकाल से ही वे सभी कार्य किए जो लोकमंगलकारी थे। अतः ऐसे इष्ट के भक्त तुलसीदास के काव्य में लोकमंगल भावना की गहन उपस्थिति स्वाभाविक है। उन्होंने ‘‘रामचरित मानस’’ लिखते हुए श्रीराम के जीवन की उन सभी घटनाओं को चयनित किया जो लोकमंगलकारी थीं, भले ही श्रीराम को स्वयं उनमें से कई घटनाओं के कारण दुख झेलना पड़ा। तुलसी ने अपने काव्य के माध्यम से लोकमंगल का सही स्वरूप प्रस्तुत किया है। आज के संवेदनाहीन होते समय में तुलसी की लोकमंगलकारिता संवेदना का संचार करने में सक्षम है। आवश्यकता है उसे मात्र पाठ करने की नहीं अपितु समझने की।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई 
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। 
- श्री रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड में यह पंक्ति गोस्वामी तुलसीदास ने लिखी है। इसका अर्थ है कि दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई अधर्म (पाप) नहीं है। इससे बढ़ कर लोकमंगल की भावना और कोई हो ही नहीं सकती है।

तुलसी दास ने अपने आदर्श, अपने इष्ट देव के रूप में श्रीराम को चुना। संभवतः इसीलिए कि श्रीराम का पूरा चरित्र एवं समूचा जीवन लोकहितकारी रहा। बाल्यावस्था में उन्होंने ऋ़षियों को राक्षसों के आतंक से मुक्त कराया। फिर बड़े होने पर गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए सीता-स्वयंवर में भाग लिया क्योंकि स्वयंवर ही वर द्वार था जहां से असुराधिपति रावण के विनाश का आरम्भ तय होना था। श्रीराम ने राजसत्ता का मोह नहीं किया वरन लोकहित में राज के अधिकार को त्याग कर वचन का पालन स्वीकार किया। अन्यथा एक महाभारत पहले ही हो जाती। ऐसा चरित्र एवं व्यक्तित्व तुलसी के काव्य का केन्द्र है। तुलसी ने राम को उनके आदर्श स्वरूप में ही अपने काव्य में प्रस्तुत किया है। तुलसी के राम सर्वगुणसम्पन्न, सर्वशक्तिमान एवं शीलवान हैं, इसलिए वे लोकमंगलकारी हैं। राम के साथ ही सीता आदर्श पत्नी हैंें, भरत आदर्श भाई हैं, हनुमान आदर्श सेवक हैं। तुलसी ने जो आदर्श की झांकी अपने शब्दों से रची है उसके मूल में लोकमंगल का ध्येय है।

तुलसीदास काव्य को भी मनोरंजन का साधन नहीं अपितु उसे लोकमंगल का साधन मानते हैं। उनकी दृष्टि में वही काव्य श्रेष्ठ है, जिसमें समाज का हित की चर्चा की गई हो -
कीरति भनिति भूति भल सोई। 
सुरसरि सम सब कहँ हित होई।। 
- अर्थात कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वहीं उत्तम है, जो गंगा के समान सबका हित करने वाली हो। 

तुलसीदास ने ‘‘रामचरितमानस’’ में श्रीराम की आगमन ही लोक कल्याण के लिए बताया है। उनके श्रीराम असुरों से आक्रांत धरती पर शांति एवं कल्याण की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं- 
जब जब होई धरम कै हानि।
बाढ़हि असुर अधम अभिमानी।।
तब-तब प्रभु धरि मनुज सरीरा।
हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।
अर्थात् जब-जब संसार में आसुरी शक्तियां आतंक मचाने लगती हैं, अधर्म करने लगती हैं तब-तब ईश्वर मनुष्य का शरीर धारण कर के इस धरती पर जन्म लेते हैं।

तुलसीदास ने रामचरितमानस के आरंभ में ही लिखा है कि- 
मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।।
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।
- भावार्थ है कि तुलसीदास कहते हैं कि श्रीरघुनाथ की कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है। मेरी इस अनगढ़ कविता रूपी नदी की चाल पवित्र जल वाली नदी (गंगाजी) की चाल की भाँति टेढ़ी है। प्रभु रघुनाथ के सुंदर यश के संग से यह कविता सुंदर तथा सज्जनों के मन को भाने वाली हो जाएगी। श्मशान की अपवित्र राख भी श्री महादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करने वाली होती है। मानस की कथा को तुलसी ने कलियुग के पापों को नष्ट करने वाली, लोक और परलोक में सुख देने वाली ,विषय विकारों को नष्ट करने वाली और अज्ञान के अंधकार को दूर करने तथा उसमें उद्दात्त मानवीय तत्वों का समावेश करके पूर्णतया लोकमंगलकारी बना दिया।  इसके मूल में त्याग, तप संतोष, सदाचार, परोपकार जैसे सुदृढ़ भावनाएं हैं जो लोकमंगल के लिए मनुष्य को प्रेरित करती हैं। 

‘‘रामचरितमानस’’ के सृजन का मूल उद्देश्य असत पर सत की विजय दिखा कर स्वयं को असहाय मानने वाले मनुष्यों के हृदय में आशा का संचार करना है।  ‘‘रामचरितमानस’’ ही नहीं वरन तुलसी ने अपने सभी सृजन में लोकमंगल को आधार बनाया है। गोस्वामी तुलसीदास ने राम को ईश्वर मानते हुए कहा कि वे मनुष्य नहीं ईश्वर हैं और मनुष्यों का कल्याण करने के लिए ही अयोध्या राजवंश में मनुष्य रूप में अवतरित हुए थे। तुलसी ने रावण के दरबार में अंगद द्वारा इसे बात को कहलाया है-
राम मनुज कस रे सठ बंगा। 
सुरभि कामधेनु सर गंगा।
गोस्वामी तुलसीदास ने श्री राम को इष्ट मानकर उनकी पग-पग पर एक लोककल्याणकारक ईश्वर के रूप में वंदना की है -
जय राम रूप अनूप निरगुन सगुन गुन प्रेरक सही ।
दशशीश बाहु प्रचण्ड खण्डन चंड शर मन्डन मही।।  
पाथोद्गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनम।
नित नौमि राम कृपाल बाहु विशाल भवभय मोचनम।।

तुलसी अपने काव्य में विभिन्न सम्प्रदायों एवं विभिन्न मतों के बीच समन्वय की बात भी करते हैं। वे शैव और वैष्णव दोनों को समझाते हुए वे कहते हैं-
सिवद्रोही मम दासा कहावा। 
सो नर मोहि सपनेहुँ नहिं भावा।
इसी तरह निर्गुण और सगुण, ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग के विवाद एवं अलगाव को भी वे लोहित में उचित नहीं मानते हैं तथा कहते हैं-
ग्यानहिं भगतिहि नहिं कछु भेदा। 
उभय हरहिं भव सम्भव खेदा।
तुलसी ने लोक कल्याण का ऐसा सहज मार्ग बताया है जिसमें धन ,बुद्धि ,वैभव की आवश्यकता नहीं है, मात्र सद्भाव की आवश्यकता है। इसीलिए तुलसी ने श्रीराम के रूप में एक आदर्श सामने रखा। तुलसी के राम ‘‘मंगल भवन अमंगल हारी’’ हैं। तुलसी मानते हैं कि श्रीराम नाम का जाप करने, सदाचार पालन करने और राम कथा का निरंतर पारायण  करने से मनुष्य का मंगल होता है। इसका व्यवहारिक पक्ष यह है कि जब व्यक्ति सदविचारों में लिप्त रहेगा तो उसके मन में परपीड़ा की भावना उपजेगी ही नहीं। फिर जिस समाज में परपीड़ा की भावना जन्म ही नहीं लेगी तो वह समाज मंगलकारी वातावरण में रहेगा। 

तुलसी के राम छोटे बड़े में भेद नहीं करते हैं। वे शबरी के जूठे बेरों को उसी आत्मीयता के साथ खाते हैं जितनी आत्मीयमा के साथ वे माता कौशल्या के हाथों भोजन ग्रहण करते थे। राम की दृष्टि में वानर, भाल्लुक, गीध आदि कोई भी छोटे नहीं हैं। वे आगे बढ़ कर सबको गले लगाते हैं तथा सबका मान-सम्मान करते हुए यथोचित उनकी सहायता भी करते हैं। 

तुलसी श्रीराम द्वारा शबरी को कहलाते हैं कि सही भक्ति दिखावे में नहीं परस्पर प्रेम और समर्पण में है। निम्नलिखित पंक्तियां नवधा भक्ति की हैं, जिसमें भगवान की कृपा पाने के नौ तरीके बताए गए हैं - 
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ।।
गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान।।
चौथी भगति मम गुन गन,करइ कपट तजि गान।।
मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा।
पंचम भगति सो वेद प्रकासा।।
छठ दम सील विरति बहु कर्मा। 
निरत निरंतर सज्जन धर्मा।।
सातव सब मोहिमय जग देखा । 
मो ते संत अधिक कर लेखा।।
आठव जथालाभ संतोषा। 
सपनेहु नहिं देखइ परदोषा।।
नवम सरल सब सम छल हीना।
मम भरोस हिय हरष न दीना।। 

स्वार्थ में डूबते समय में इस भावना को आज समझने की आवश्यकता है कि तुलसी ने काव्य में लोकमंगल भावना उच्चता को स्थापित करते हुए अपने इष्टदेव श्रीराम से स्वयं के लिए नहीं अपितु लोकमंगल के लिए द्रवित होने की याचना की है- 
मंगल भवन अमंगल हारी ।
द्रवहु सु दसरथ अजिर बिहारी।।
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Friday, June 27, 2025

शून्यकाल | लोक का महाकाव्य है तुलसी की लघु कृति ‘रामलला नहछू’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - शून्यकाल
लोक का महाकाव्य है तुलसी की लघु कृति ‘रामलला नहछू’
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
         भारतीय जनमानस में गोस्वामी तुलसीदास एक अति सम्मानित कवि के रूप में स्थापित हैं। उनकी कृति ‘‘रामचरित मानस’’ प्रत्येक हिन्दू घर में एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में पूज्य है। धर्मपरायण स्त्री-पुरुष, यहां तक कि बालक, बालिकाएं भी ‘‘रामचरित मानस’’ का पाठ करके श्रीराम से निकटता अनुभव करते हैं। गोस्वामी तुलसी दास की प्रथम कृति मानी जाती है ‘‘रामलला नहछू’’। इस कृति का भी महत्व कम नहीं है। यद्यपि इसकी प्रथम कृति होने पर विद्वानों में मतभेद भी है किन्तु इस कृति में भी विशिष्ट लोकरस है। ‘‘रामचरित मानस’’ की आभा के विस्तार के सम्मुख यह लघु कृति आज भी अपनी महत्ता बनाए हुए है।

      तुलसीदास के लिए यह कहना समीचीन होगा कि वे लोक में जन्में, लोक में रहे और लोक में समा गए। तुलसीदास ने अपनी बाल्यावस्था से ही अनेक कठिनाइयां झेलीं। उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर गांव में तुलसीदास का जन्म हुआ था। उनके पिता आत्माराम एक सम्मानित ब्राह्मण थे। तुलसीदास की माता का नाम हुलसी था। तुलसीदास का जन्म सम्वत 1554 में श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ। ज्योतिष के अनुसार यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता है। इससे तुलसीदास के प्रति एक पूर्वाग्रह जाग उठा। जबकि कहा जाता है कि  तुलसीदास  जन्म लेते ही रोए नहीं थे अपितु उनके मुख से ‘राम’ शब्द निकला था। यह भी किंवदंती है कि जन्म से ही उनके मुख में दांत थे जिससे उनके पिता ने उन्हें अमंगलकारी मान लिया। उनकी माता हुलसी ने तुलसी की रक्षा के लिए चुनियां नाम की अपनी एक दासी को सौंप दिया। तत्कालीन समाज में अमंगल के प्रभाव को नष्ट करने के लिए इस प्रकार की विधि अपनाई जाती थी। किन्तु तुलसी के जीवन में विपत्ति का आरम्भ होना तय था। इसीलिए दासी को सौंपने के दूसरे दिन ही उनकी मां ने यह संसार त्याग दिया। इस घटना से अंधविश्वासी पिता का अंधविश्वास और गहरा गया। उन्होंने तुलसी को वापस बुलाने से मना कर दिया। दासी चुनियां ने बालक तुलसी को पुत्रवत स्नेह दिया। सबकुछ ठीक चलने लगा था किन्तु जब तुलसी साढे पांच वर्ष के थे तभी दासी चुनिया का निधन हो गया। अब एक अनाथ बालक की भांति यहां-वहां भटकने के अतिरिक्त तुलसी के पास और कोई चारा नहीं था। उन्हें कई बार भूखे ही सोना पड़ता था। यह भी किंवदंती है कि बालक तुलसी कई दिनों से भूखे थे और उन्हें कोई भी भिक्षा में भोजन नहीं दे रहा था तब माता पार्वती को दया आई और वे स्वयं एक ब्राह्मणी का वेश रखकर उनके पास आईं। इसके बाद वे प्रतिदिन स्वयं आ कर बालक तुलसी को भोजन कराने लगीं।
         तुलसीदास के जीवन में दैवीय चमत्कारों की उपस्थिति मानी जाती है। मानो कोई दैवीय शक्ति उनसे वह सृजन कराना चाहती थी जिसके बारे में उन्हें आरम्भ में स्वयं कोई अनुमान नहीं था। माग्य उन्हें काशी ले गया। संवत् 1628 में वे काशी से अयोध्या की ओर चले। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। इसलिए वे कुछ समय के लिए प्रयाग में ठहर गए। संयोगवश एक दिन उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हो गए। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास वापस काशी पहुंचे और वहां के प्रहलादघाट पर एक ब्राह्मण के घर ठहरे। उस ब्राह्मण के घर पर संस्कृत ग्रंथों का पाठ होता था तथा वहां संस्कृतमय वातावरण था। अतः तुलसीदास भी संस्कृत में पद्य रचना करने लगे। किन्तु विचित्र बात यह थी कि वे दिन भर में जो संस्कृत पद्य लिखते, रात भर में वे सब गायब हो जातीं। सात दिन तक यही क्रम चलता रहा। आठवें दिन तुलसीदास को स्वप्न में भगवान शिव ने आदेश दिया कि उन्हें संस्कृत में नहीं वरन अपनी लोकभाषा में सृजन करना है। इस घटना के बाद तुलसीदास अयोध्या चले गए जहां उन्होंने लोकभाषा को अपने सृजन का माध्यम बनाया।
   अपने 126 वर्ष के दीर्घ जीवनकाल में तुलसीदास ने कई ग्रन्थों रचे- रामललानहछू, गीतावली, कृष्ण गीतावली, रामचरितमानस, पार्वतीमंगल, विनय पत्रिका, जानकीमंगल, दोहावली, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञाप्रश्न, सतसई, बरवै रामायण, कवितावली तथा हनुमान बाहुक। इनमें गोस्वामी तुलसीदास की प्रथम रचना ‘‘रामलला नहछू’’ मानी जाती है। यद्यपि इसके प्रथम होने को ले कर विद्वानों में मतभेद रहा है किन्तु अधिकांश लोग इसे ही प्रथम कृति मानते हैं। ‘‘गोसाईं चरित’’ में लिखा है कि ‘‘पार्वति मंगल’’, ‘‘जानकी मंगल’’ और ‘‘रामलला नहछू’’ की रचना मिथिला में एक साथ हुई। ‘‘पार्वती मंगल’’ में रचना-काल का उल्लेख इस प्रकार है -
जय संवत् फागुन सुदि पॉंचै गुरू दिन।
अस्विनि विचरेऊँ मंगल सुनि सुख छिन-छिन।।
           
अतः इसी के अनुरुप ‘‘रामलला नहछू’’ का रचनाकाल तय किया जाता है। यह एक लघु कृति है। इसके बीस सोहर छंदों में नहछू लोकाचार का वर्णन किया है। ’सोहर’ अवध क्षेत्र का प्रख्यात छंद है, यद्यपि यह अन्य क्षेत्रों में भी सोहर गाने का रिवाज़ है। ‘‘नहछू’’ दो शब्दों से बना है - नख और क्षुर अर्थात् नख काटना। अवध में विवाहपूर्व दूल्हे के नाखून काटे जाते हैं और इस रस्म को ‘‘नहछू’’ कहा जाता है। इस रस्म के दौरान स्त्रियां गारी सहित तरह-तरह के मनोरंजक गीत गाती हैं।
  
   ‘‘रामलला नहछू’’ की भाषा अवधि है, जिसमें गोंडा और अयोध्या के आसपास बोली जाने वाली पूर्वी अवधी के शब्द निहित हैं। जैसे- अहिरिन, महतारि, आवइ, हरखइ आदि। सोहर छंद में निबद्ध इस काव्य रचना में अप्रतिम दृश्यात्मकता है। ‘‘रामलला नहछू’’ में उपस्थित दृश्य देखिए कि जब राम की नहछू रस्म निभाई जा रही है तो वहां उपस्थित स्त्रियां यह गीत गाती हैं-

काहे राम जिउ सांवर लछिमन गोर हो।
की दहु रानी कौउसिलहीं परिगा भोर हो।
राम अहहिं दशरथ के लछिमन आनि क हो।
भरत सत्रुहन भई सिरी रघुनाथ क हो।।
    - अर्थात् स्त्रियां गारी गाती हुई कहती हैं कि हमें यह समझ में नहीं आता है कि एक ही पिता के पुत्र होकर राम सांवले क्यों हैं और लक्ष्मण गोरे क्यों हैं? फिर शंका प्रकट करती हैं कि कहीं कौशल्या से कोई चूक तो नहीं हो गयी थी? फिर स्वयं अपनी बात पलटती हुई कहती हैं कि राम तो दशरथ के ही पुत्र हैं, शायद लक्ष्मण दूसरे के पुत्र हों। आखिर भरत और शत्रुघ्न भी तो राम के भाई हैं।
वैसे, ‘‘रामलला नहछू’’ के कुछ पदों को पढना भी अपने आप में ज्ञान के उस द्वार को खोल देता है जहां तुलसीदास का लघु किन्तु एक महत्वपूर्ण सृजन दिखाई देता है-
आदि सारदा गनपति गौरि मनाइय हो।
रामलला कर नहछू गाइ सुनाइय हो।।
जेहि गाये सिधि होय परम निधि पाइय हो।
कोटि जनम कर पातक दूरि सो जाइय हो ।। 01।।
कोटिन्ह बाजन बाजहिं दसरथ के गृह हो ।
देवलोक सब देखहिं आनँद अति हिय हो।।
नगर सोहावन लागत बरनि न जातै हो।
कौसल्या के हर्ष न हृदय समातै हो ।। 02।।
आले हि बाँस के माँड़व मनिगन पूरन हो।
मोतिन्ह झालरि लागि चहूँ दिसि झूलन हो।।
गंगाजल कर कलस तौ तुरित मँगाइय हो।
जुवतिन्ह मंगल गाइ राम अन्हवाइय हो।। 03।।
गजमुकुता हीरामनि चैक पुराइय हो।
देइ सुअरघ राम कहँ लेइ बैठाइय हो।।
कनकखंभ चहुँ ओर मध्य सिंहासन हो।
मानिकदीप बराय बैठि तेहि आसन हो।। 04।।
बनि बनि आवति नारि जानि गृह मायन हो।
बिहँसत आउ लोहारिनि हाथ बरायन हो।।
अहिरिनि हाथ दहेड़ि सगुन लेइ आवइ हो।
उनरत जोबनु देखि नृपति मन भावइ हो।। 05।।
रूपसलोनि तँबोलिनि बीरा हाथहि हो।
जाकी ओर बिलोकहि मन तेहि साथहि हो।।
दरजिनि गोरे गात लिहे कर जोरा हो।
केसरि परम लगाइ सुगंधन बोरा हो।। 06 ।।
मोचिनि बदन-सकोचिनि हीरा माँगन हो।
पनहि लिहे कर सोभित सुंदर आँगन हो।।
बतिया कै सुधरि मलिनिया सुंदर गातहि हो।
कनक रतनमनि मौरा लिहे मुसुकातहि हो।। 07।।
गोस्वामी तुलसीदास ने ‘‘रामलला नहछू’’ के अपने पदों में लोकाचार और उससे जुड़ी भावनाओं को जीवंत कर दिया है। कुछ और पद देखिए-
भरि गाड़ी निवछावरि नाऊ लेइ आवइ हो।
परिजन करहिं निहाल असीसत आवइ हो।।
तापर करहिं सुमौज बहुत दुख खोवहिँ हो।
होइ सुखी सब लोग अधिक सुख सोवहिं हो ।। 17।।
गावहिं सब रनिवास देहिं प्रभु गारी हो।
रामलला सकुचाहिं देखि महतारी हो।।
हिलिमिलि करत सवाँग सभा रसकेलि हो।
नाउनि मन हरषाइ सुगंधन मेलि हो ।। 18।।
दूलह कै महतारि देखि मन हरषइ हो।
कोटिन्ह दीन्हेउ दान मेघ जनु बरखइ हो।।
रामलला कर नहछू अति सुख गाइय हो।
जेहि गाये सिधि होइ परम निधि पाइय हो ।।19।।
दसरथ राउ सिंहसान बैठि बिराजहिं हो।
तुलसिदास बलि जाहि देखि रघुराजहि हो।।
जे यह नहछू गावैं गाइ सुनावइँ हो।
ऋद्धि सिद्धि कल्यान मुक्ति नर पावइँ हो ।। 20।।
जो पग नाउनि  धोव  राम धोवावइं हो।
सो पगधूरि सिद्ध मुनि दरसन पावइं हो।।
रामलला कर नहछू इहि सुख गाइय हो।
जेहि गाए सिधि होइ परम पद पाइय हो।। 21।।
‘‘रामलला नहछू’’ में भले ही एक रस्म का वर्णन है किन्तु उसमें लोक का सुख, लोक की प्रसन्नता, लोक का व्यवहार, लोक भाषा, लोक संगीत, लोकछंद, लोक स्वर, लोक की उत्सवधर्मिता तथा लोक का परस्पर आपसी सद्भाव आदि सभी कुछ निहित है। यह कृति ‘‘रामलला नहछू’’ गोस्वामी तुलसीदास की ‘‘रामचरित मानस’’ से परे भी एक उत्कृष्ट रचनाकार स्थापित करती है। यह कृति आकार में छोटी होते हुए भी लोक का महाकाव्य रचती है।
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Wednesday, August 23, 2023

चर्चा प्लस | तुलसी जयंती विशेष | तुलसी की ‘रामलला नहछू’ लघु कृति होते हुए भी लोक का महाकाव्य है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस : तुलसी जयंती विशेष                                                                            
     तुलसी की ‘रामलला नहछू’ लघु कृति होते हुए भी लोक का महाकाव्य है
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
          भारतीय जनमानस में गोस्वामी तुलसीदास एक अति सम्मानित कवि के रूप में स्थापित हैं। उनकी कृति ‘‘रामचरित मानस’’ प्रत्येक हिन्दू घर में एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में पूज्य है। धर्मपरायण स्त्री-पुरुष, यहां तक कि बालक, बालिकाएं भी ‘‘रामचरित मानस’’ का पाठ करके श्रीराम से निकटता अनुभव करते हैं। गोस्वामी तुलसी दास की प्रथम कृति मानी जाती है ‘‘रामलला नहछू’’। इस कृति का भी महत्व कम नहीं है। यद्यपि इसकी प्रथम कृति होने पर विद्वानों में मतभेद भी है किन्तु इस कृति में भी विशिष्ट लोकरस है। ‘‘रामचरित मानस’’ की आभा के विस्तार के सम्मुख यह लघु कृति आज भी अपनी महत्ता बनाए हुए है। तो, चलिए स्मरण करते हैं तुलसीदास जी की जयंती पर उनकी प्रथम कृति का।
तुलसीदास जयंती हर साल श्रावण मास की सप्तमी तिथि को मनायी जाती है। इस गणना के अनुसार इस वर्ष 2023 में 23 अगस्त को तुलसीदास का 526 वां जन्मदिवस है। तुलसीदास के लिए यह कहना समीचीन होगा कि वे लोक में जन्में, लोक में रहे और लोक में समा गए। तुलसीदास ने अपनी बाल्यावस्था से ही अनेक कठिनाइयां झेलीं। उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर गांव में तुलसीदास का जन्म हुआ था। उनके पिता आत्माराम एक सम्मानित ब्राह्मण थे। तुलसीदास की माता का नाम हुलसी था। तुलसीदास का जन्म सम्वत 1554 में श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ। ज्योतिष के अनुसार यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता है। इससे तुलसीदास के प्रति एक पूर्वाग्रह जाग उठा। जबकि कहा जाता है कि  तुलसीदास  जन्म लेते ही रोए नहीं थे अपितु उनके मुख से ‘राम’ शब्द निकला था। यह भी किंवदंती है कि जन्म से ही उनके मुख में दांत थे जिससे उनके पिता ने उन्हें अमंगलकारी मान लिया। उनकी माता हुलसी ने तुलसी की रक्षा के लिए चुनियां नाम की अपनी एक दासी को सौंप दिया। तत्कालीन समाज में अमंगल के प्रभाव को नष्ट करने के लिए इस प्रकार की विधि अपनाई जाती थी। किन्तु तुलसी के जीवन में विपत्ति का आरम्भ होना तय था। इसीलिए दासी को सौंपने के दूसरे दिन ही उनकी मां ने यह संसार त्याग दिया। इस घटना से अंधविश्वासी पिता का अंधविश्वास और गहरा गया। उन्होंने तुलसी को वापस बुलाने से मना कर दिया। दासी चुनियां ने बालक तुलसी को पुत्रवत स्नेह दिया। सबकुछ ठीक चलने लगा था किन्तु जब तुलसी साढे पांच वर्ष के थे तभी दासी चुनिया का निधन हो गया। अब एक अनाथ बालक की भांति यहां-वहां भटकने के अतिरिक्त तुलसी के पास और कोई चारा नहीं था। उन्हें कई बार भूखे ही सोना पड़ता था। यह भी किंवदंती है कि बालक तुलसी कई दिनों से भूखे थे और उन्हें कोई भी भिक्षा में भोजन नहीं दे रहा था तब माता पार्वती को दया आई और वे स्वयं एक ब्राह्मणी का वेश रखकर उनके पास आईं। इसके बाद वे प्रतिदिन स्वयं आ कर बालक तुलसी को भोजन कराने लगीं।

तुलसीदास के जीवन में दैवीय चमत्कारों की उपस्थिति मानी जाती है। मानो कोई दैवीय शक्ति उनसे वह सृजन कराना चाहती थी जिसके बारे में उन्हें आरम्भ में स्वयं कोई अनुमान नहीं था। माग्य उन्हें काशी ले गया। संवत् 1628 में वे काशी से अयोध्या की ओर चले। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। इसलिए वे कुछ समय के लिए प्रयाग में ठहर गए। संयोगवश एक दिन उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हो गए। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास वापस काशी पहुंचे और वहां के प्रहलादघाट पर एक ब्राह्मण के घर ठहरे। उस ब्राह्मण के घर पर संस्कृत ग्रंथों का पाठ होता था तथा वहां संस्कृतमय वातावरण था। अतः तुलसीदास भी संस्कृत में पद्य रचना करने लगे। किन्तु विचित्र बात यह थी कि वे दिन भर में जो संस्कृत पद्य लिखते, रात भर में वे सब गायब हो जातीं। सात दिन तक यही क्रम चलता रहा। आठवें दिन तुलसीदास को स्वप्न में भगवान शिव ने आदेश दिया कि उन्हें संस्कृत में नहीं वरन अपनी लोकभाषा में सृजन करना है। इस घटना के बाद तुलसीदास अयोध्या चले गए जहां उन्होंने लोकभाषा को अपने सृजन का माध्यम बनाया।
अपने 126 वर्ष के दीर्घ जीवनकाल में तुलसीदास ने कई ग्रन्थों रचे- रामललानहछू, गीतावली, कृष्ण गीतावली, रामचरितमानस, पार्वतीमंगल, विनय पत्रिका, जानकीमंगल, दोहावली, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञाप्रश्न, सतसई, बरवै रामायण, कवितावली तथा हनुमान बाहुक। इनमें गोस्वामी तुलसीदास की प्रथम रचना ‘‘रामलला नहछू’’ मानी जाती है। यद्यपि इसके प्रथम होने को ले कर विद्वानों में मतभेद रहा है किन्तु अधिकांश लोग इसे ही प्रथम कृति मानते हैं। ‘‘गोसाईं चरित’’ में लिखा है कि ‘‘पार्वति मंगल’’, ‘‘जानकी मंगल’’ और ‘‘रामलला नहछू’’ की रचना मिथिला में एक साथ हुई। ‘‘पार्वती मंगल’’ में रचना-काल का उल्लेख इस प्रकार है -
जय संवत् फागुन सुदि पॉंचै गुरू दिन।
अस्विनि विचरेऊँ मंगल सुनि सुख छिन-छिन।।
अतः इसी के अनुरुप ‘‘रामलला नहछू’’ का रचनाकाल तय किया जाता है। यह एक लघु कृति है। इसके बीस सोहर छंदों में नहछू लोकाचार का वर्णन किया है। ’सोहर’ अवध क्षेत्र का प्रख्यात छंद है, यद्यपि यह अन्य क्षेत्रों में भी सोहर गाने का रिवाज़ है। ‘‘नहछू’’ दो शब्दों से बना है - नख और क्षुर अर्थात् नख काटना। अवध में विवाहपूर्व दूल्हे के नाखून काटे जाते हैं और इस रस्म को ‘‘नहछू’’ कहा जाता है। इस रस्म के दौरान स्त्रियां गारी सहित तरह-तरह के मनोरंजक गीत गाती हैं।

‘‘रामलला नहछू’’ की भाषा अवधि है जिसमें गोंडा और अयोध्या के आसपास बोली जाने वाली पूर्वी अवधी के शब्द निहित हैं। जैसे- अहिरिन, महतारि, आवइ, हरखइ आदि। सोहर छंद में निबद्ध इस काव्य रचना में अप्रतिम दृश्यात्मकता है। ‘‘रामलला नहछू’’ में उपस्थित दृश्य देखिए कि जब राम की नहछू रस्म निभाई जा रही है तो वहां उपस्थित स्त्रियां यह गीत गाती हैं-
काहे राम जिउ सांवर लछिमन गोर हो
की दहु रानी कौउसिलहीं परिगा भोर हो।
राम अहहिं दशरथ के लछिमन आनि क हो
भरत सत्रुहन भई सिरी रघुनाथ क हो।।
अर्थात् स्त्रियां गारी गाती हुई कहती हैं कि हमें यह समझ में नहीं आता है कि एक ही पिता के पुत्र होकर राम सांवले क्यों हैं और लक्ष्मण गोरे क्यों हैं? फिर शंका प्रकट करती हैं कि कहीं कौशल्या से कोई चूक तो नहीं हो गयी थी? फिर स्वयं अपनी बात पलटती हुई कहती हैं कि राम तो दशरथ के ही पुत्र हैं, शायद लक्ष्मण दूसरे के पुत्र हों। आखिर भरत और शत्रुघ्न भी तो राम के भाई हैं।

वैसे, ‘‘रामलला नहछू’’ के कुछ पदों को पढना भी अपने आप में ज्ञान के उस द्वार को खोल देता है जहां तुलसीदास का लघु किन्तु एक महत्वपूर्ण सृजन दिखाई देता है-
आदि सारदा गनपति गौरि मनाइय हो।
रामलला कर नहछू गाइ सुनाइय हो।।
जेहि गाये सिधि होय परम निधि पाइय हो।
कोटि जनम कर पातक दूरि सो जाइय हो ।। 01।।
कोटिन्ह बाजन बाजहिं दसरथ के गृह हो ।
देवलोक सब देखहिं आनँद अति हिय हो।।
नगर सोहावन लागत बरनि न जातै हो।
कौसल्या के हर्ष न हृदय समातै हो ।। 02।।
आले हि बाँस के माँड़व मनिगन पूरन हो।
मोतिन्ह झालरि लागि चहूँ दिसि झूलन हो।।
गंगाजल कर कलस तौ तुरित मँगाइय हो।
जुवतिन्ह मंगल गाइ राम अन्हवाइय हो।। 03।।
गजमुकुता हीरामनि चैक पुराइय हो।
देइ सुअरघ राम कहँ लेइ बैठाइय हो।।
कनकखंभ चहुँ ओर मध्य सिंहासन हो।
मानिकदीप बराय बैठि तेहि आसन हो।। 04।।
बनि बनि आवति नारि जानि गृह मायन हो।
बिहँसत आउ लोहारिनि हाथ बरायन हो।।
अहिरिनि हाथ दहेड़ि सगुन लेइ आवइ हो।
उनरत जोबनु देखि नृपति मन भावइ हो।। 05।।
रूपसलोनि तँबोलिनि बीरा हाथहि हो।
जाकी ओर बिलोकहि मन तेहि साथहि हो।।
दरजिनि गोरे गात लिहे कर जोरा हो।
केसरि परम लगाइ सुगंधन बोरा हो।। 06 ।।
मोचिनि बदन-सकोचिनि हीरा माँगन हो।
पनहि लिहे कर सोभित सुंदर आँगन हो।।
बतिया कै सुधरि मलिनिया सुंदर गातहि हो।
कनक रतनमनि मौरा लिहे मुसुकातहि हो।। 07।।
गोस्वामी तुलसीदास ने ‘‘रामलला नहछू’’ के अपने पदों में लोकाचार और उससे जुड़ी भावनाओं को जीवंत कर दिया है। कुछ और पद देखिए-
भरि गाड़ी निवछावरि नाऊ लेइ आवइ हो।
परिजन करहिं निहाल असीसत आवइ हो।।
तापर करहिं सुमौज बहुत दुख खोवहिँ हो।
होइ सुखी सब लोग अधिक सुख सोवहिं हो ।। 17।।
गावहिं सब रनिवास देहिं प्रभु गारी हो।
रामलला सकुचाहिं देखि महतारी हो।।
हिलिमिलि करत सवाँग सभा रसकेलि हो।
नाउनि मन हरषाइ सुगंधन मेलि हो ।। 18।।
दूलह कै महतारि देखि मन हरषइ हो।
कोटिन्ह दीन्हेउ दान मेघ जनु बरखइ हो।।
रामलला कर नहछू अति सुख गाइय हो।
जेहि गाये सिधि होइ परम निधि पाइय हो ।।19।।
दसरथ राउ सिंहसान बैठि बिराजहिं हो।
तुलसिदास बलि जाहि देखि रघुराजहि हो।।
जे यह नहछू गावैं गाइ सुनावइँ हो।
ऋद्धि सिद्धि कल्यान मुक्ति नर पावइँ हो ।। 20।।
जो पग नाउनि  धोव  राम धोवावइं हो।
सो पगधूरि सिद्ध मुनि दरसन पावइं हो।।
रामलला कर नहछू इहि सुख गाइय हो।
जेहि गाए सिधि होइ परम पद पाइय हो।। 21।।
‘‘रामलला नहछू’’ में भले ही एक रस्म का वर्णन है किन्तु उसमें लोक का सुख, लोक की प्रसन्नता, लोक का व्यवहार, लोक भाषा, लोक संगीत, लोकछंद, लोक स्वर, लोक की उत्सवधर्मिता तथा लोक का परस्पर आपसी सद्भाव आदि सभी कुछ निहित है। यह कृति गोस्वामी तुलसीदास को ‘‘रामचरित मानस’’ से परे भी एक उत्कृष्ट रचनाकार स्थापित करती है। यह कृति आकार में छोटी होते हुए भी लोक का महाकाव्य रचती है।
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