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Wednesday, October 14, 2020

साहित्य का महासागर बनता जा रहा सागर - डॉ शरद सिंह, दैनिक भास्कर में प्रकाशित

दैनिक भास्कर की 14वीं वर्षगांठ पर 60 पृष्ठीय विशेषांक मास्ट हेड 'बुंदेलखंड भास्कर' के अंतर्गत मेरा लेख " साहित्य का महासागर बनता जा रहा सागर" आज दि. 14.10.2020 को प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🙏
लेख : 
साहित्य का महासागर बनता जा रहा है सागर
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

      किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं जातीय पहचान उस क्षेत्र के साहित्य एवं साहित्यिक गतिविधियों से होती है। साहित्य में क्षेत्रविशेष के संस्कार, परम्परा एवं नवाचार का प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है। अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जोड़ कर चलना साहित्य में ही संभव है। सागर साहित्य एवं संस्कृति जगत् में अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए देश में ही नहीं वरन् विदेशों में भी विख्यात है। यहां के साहित्यकारों की रचनाएं विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधसंदर्भ के रूप में पढ़ी जाती हैं तथा उन पर शोध कार्य भी किया जाता है। वस्तुतः सागर की भूमि साहित्य सृजन के लिए सदा से उर्वरा रही है। यदि अतीत के पन्ने पलटे जाएं तो एक से बढ़ कर एक कालजयी कवि और उनकी रचनाएं दिखाई देती हैं। जिनमें सर्वप्रथम कवि पद्माकर (सन् 1753-1833) का नाम लिया जाना उचित होगा। सागर झील के तट पर स्थित चकराघाट पर स्थापित कवि पद्माकर की प्रतिमा आज भी सागर के साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्त्रोत का कार्य कर रही है। पद्माकर रचित ग्रंथों में पद्माभरण, जगद्विनोद, गंगालहरी, प्रबोध पचासा, ईश्वर पचीसी, यमुनालहरी आदि प्रमुख हैं। प्रतिवर्ष होली पर सागर का साहित्यवृंद सुबह-सवेरे सबसे पहले चकराघाट पहुंच कर कवि पद्माकर की प्रतिमा को नमन करता है, उन्हें गुलाल लगाता है और इसके बाद ही होली खेलने तथा होली पर केन्द्रित रचनापाठ का क्रम शुरू होता है। कवि पद्माकर के अनुप्रास अलंकार की बहुलता वाले कवित्त छंद हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उनका यह लोकप्रिय कवित्त देखें -
फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई  भीतर गोरी 
भाय करी मन की पदमाकर,  ऊपर  नाय अबीर की झोरी 
छीन पितंबर कंमर तें,  सु बिदा  दई  मोड़ि कपोलन रोरी 
नैन नचाई, कह्यौ मुसकाई, लला! फिर खेलन आइयो होरी

सागर के साहित्य कोे समय के साथ चलना बखूबी आता है। यहां के साहित्यकारों ने उत्सव के समय उत्सवधर्मिता को अंगीकार किया तो वे स्वतंत्रता संग्राम के समय स्वतंत्रता के पक्ष में स्वर बुलंद करने में आगे रहे। 14 मार्च 1908 को नरसिंहपुर जिले के करेली में जन्मे पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी अपनी बाल्यावस्था से ही सागर आ गए थे और जीवनपर्यन्त सागर में रहते हुए उन्होंने साहित्य सृजन किया। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं- 
जनम जनम के हैं हम बागी, 
लिखी बगावत भाग्य हमारे
जेलों मे है कटी जवानी, 
ऐसे ही कुछ पड़े सितारे

पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी के समय रामसिंह चैहान बेधड़क, शंकरलाल तिवारी ‘बेढब सागरी’, पं. लक्ष्मी प्रसाद मिश्र ‘कवि हृदय’ साहित्य सृजन कर रहे थे। हिन्दी, उर्दू और बुंदेली में साहित्य सृजन करते हुए इस यात्रा को आगे बढ़ाया इकराम सागरी, लक्ष्मण सिंह निर्मम, जहूर बख़्श, दीनदयाल बालार्क, जयनारायण दुबे, पं. लोकनाथ सिलाकारी, नेमिचन्द ‘विनम्र’, विठ्ठल भाई पटेल, रमेशदत्त दुबे, माधव शुक्ल मनोज, शिवकुमार श्रीवास्तव, अखलाक सागरी आदि ने। साथ ही पन्नालाल साहित्याचार्य ने दार्शनिकतापूर्ण साहित्य का सृजन किया।
 
अपने मौलिक सृजन से साहित्यजगत को उल्लेखनीय रचनाएं एवं कृतियां देने वाले सागर के साहित्यकारों में से कुछ प्रमुख नाम हैं- महेन्द्र फुसकेले, डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’, डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी, डाॅ. गोविंद द्विवेदी, प्रो कांति कुमार जैन, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, डाॅ. सुरेश आचार्य, कपूरचंद बैसाखिया, दिनकर राव दिनकर, यार मोहम्मद यार, निर्मलचंद ‘निर्मल’, हरगोविंद विश्व, डाॅ. गजाधर सागर, मणिकांत चैबे ‘बेलिहाज़’, डाॅ. वर्षा सिंह, डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया, डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, वृंदावन राय ‘सरल’, अशोक मिजाज़ बद्र, टीकाराम त्रिपाठी ‘रुद्र’, डाॅ. महेश तिवारी, डाॅ. लक्ष्मी पाण्डेय, डाॅ. सरोज गुप्ता, डाॅ. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, वीरेन्द्र प्रधान, डाॅ. वंदना गुप्ता, सतीश पांडे आदि। इनमें से प्रो कांति कुमार जैन, डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी, डाॅ. सुरेश आचार्य, डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, अशोक मिजाज़ बद्र का सागर का नाम देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान है। 

प्रादेशिक स्तर की साहित्यिक संस्थाओं की सागर इकाईयां भी वर्तमान में डिज़िटल माध्यमों को अपनाते हुए आॅनलाईन आयोजनों में संलग्न हैं। अध्यक्ष आशीष ज्योतिषी एवं सचिव पुष्पेन्द्र दुबे मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की सागर इकाई के तत्वावधान में साप्ताहिक गोष्ठियों का आयोजन करते रहते हैं। इसी प्रकार अध्यक्षद्वय टीकाराम त्रिपाठी रुद्र एवं सतीश पांडे द्वारा मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की सागर एवं मकरोनिया इकाईयों के अंतर्गत् आॅनलाईन काव्यपाठ एवं परिचर्चा का आयोजन कराया जाता है। मध्यप्रदेश हिन्दी लेखिका संघ की सागर इकाई की अध्यक्ष सुनीला सराफ द्वारा काव्य गोष्ठी, परिचर्चा आदि का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष कोरोना आपदा के कारण सागर इकाई की स्मारिका ‘अन्वेषिका’ का वितरण संभव नहीं हो से ई-पत्रिका  प्रकाशित की। 

 नवाचार को अपनाकर अडिग रहना साहित्यकारों एवं साहित्यसेवियों की विशेषता होती है। इस विशेषता को चरितार्थ करते हुए सागर का साहित्यकार समाज, साहित्य की मशाल को अपनी लेखनी के जरिए उठाए हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है और अपने साहित्य के प्रकाश से समाज का पथ-प्रदर्शक बना हुआ है। इसमें दो मत नहीं कि सागर सही अर्थों में साहित्य का महासागर बनता जा रहा है। 
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Thursday, August 27, 2020

साहस नहीं ये तो है दुस्साहस | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "साहस नहीं ये तो है दुस्साहस" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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साहस नहीं ये तो है दुस्साहस 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        प्रकृति के सौंदर्य को निहारना भला सभी को अच्छा लगता है। हर कोई भरी हुई नदियों, तालाबों और झर-झर झरते प्रपातों को देखना चाहता है। सागर संभाग में ऐसे अनेक स्थल हैं जो बारिश के दिनों में अपनी छटाएं बिखेरने लगते हैं और पर्यटकों तथा प्रकृतिप्रेमियों को अपने पास बुलाने लगते हैं। सागर के राहतगढ़ वाटर फॉल, राजघाट बांध, पन्ना के बृहस्पति कुण्ड, पांडव फॉल आदि अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं जहां प्रति वर्ष बारिश के मौसम में सैंकड़ों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। इस वर्ष भी ये प्राकृतिक स्थल सौंदर्य से लबालब भर गए क्योंकि प्रकृति को क्या पता कि इस वर्ष उसे देखने आने वालों के लिए जोखिम ही जोखिम है। लेकिन जिन्हें इस जोखिम का पता है वे कथित साहस का परिचय देते हुए ऐसे पर्यटन स्थलों पर जा धमके। अभी हाल ही की घटना है जब सागर के राजघाट बांध और राहतगढ़ वाटर फॉल पर दर्शनार्थियों का हुजूम उमड़ पड़ा। प्रकृति का आनंद लेने पहुंचे लोगों ने न तो सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा और न ही कोविड-19 गाईड लाईन का। मेरे एक परिचित भी उसी भीड़ में सपरिवार शामिल थे। फोन पर उन्हें मैंने उनके इस कृत्य पर उलाहना दिया तो वे बड़े आत्मविश्वास से बोले-‘‘अरे, कुछ नहीं होता। फिर हम अपनी गाड़ी से गए थे। वहां सभी ठीक-ठाक दिखाई दे रहे थे। आप चिंता मत करिए। हम सब ठीक रहेंगे।’’ मैंने भी दुआ की उनके लिए  कि उनके साथ सब ठीक ही रहे। क्योंकि उनका बेटा जो अभी अट्ठारह साल का भी नहीं हुआ है, इन्दौर में कोचिंग ले रहा था। लेकिन कोरोना संक्रमण के इस दौर में उसे अपनी कोचिंग छोड़ कर बीच में ही घर वापस आना पड़ा। उनकी बेटी अभी कक्षा दस में पढ़ रही थी। बोर्ड परीक्षा के लिए उसने बहुत मेहनत की थी लेकिन कोरोना के चलते पढ़ाई का सिलसिला गड़बड़ा गया। उसने साहस कर के परीक्षा तो दी लेकिन रिजल्ट उसके मन मुताबिक नहीं रहा। फिर भी वे दोनों बच्चे अपने भविष्य को ले कर सचेत हैं और ऑनलाईन पढ़ाई ज़ारी रखे हुए हैं। लेकिन माता-पिता अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य को ले कर कितने सजग हैं यह तो उनके राजघाट भ्रमण से ही पता चल गया। मैं इसे उनका साहस नहीं बल्कि दुस्साहस कहूंगी जो उन्होंने इतना बड़ा रिस्क लिया। यदि वे सोशल डिस्टेंसिंग और कोविड-19 गाईड लाईन का ध्यान नहीं रख सकते थे तो उन्हें ऐसे स्थान पर जाना ही नहीं था या फिर भीड़ देख कर गाड़ी से उतरे बिना उसी समय वापस लौट आना था। यह संक्रमण ऐसा नहीं है जिसके लक्षण तुरंत दिखने लगें। फिर जानते-बूझते स्वयं को, अपने परिवार को मुसीबत में क्यों डालना? इससे उन लोगों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है जो संपर्क में आते हैं। सभी जानते हैं कि जब तक संक्रमण का पता चलता है तब तक यह संक्रमण दो-चार लोगों को अपनी चपेट में ले चुका होता है।
मध्यप्रदेश में अब तक कुल 9 लाख 51 लाख 822 लोगों के टेस्ट हो चुके हैं। जिसमें से करीब 42 हजार मरीज कोरोना पॉजिटिव हुए हैं। अकेले सागर शहर में ही कोरोना मरीजों की निरंतर बढ़ती संख्या एक वार्निंग की तरह है जिसे लोग अनदेखा कर के स्वयं को मुसीबत की ओर धकेल रहे हैं। सागर शहर में जहां 10 अप्रैल को एक मरीज था वहां अब आंकड़ा रिकार्ड तोड़ता जा रहा है। बायरोलॉजी लैबों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार 25 अगस्त 2020 को सागर में कोरोना का विस्फोट हुआ। एक साथ 34 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव मिली। इस पर स्वास्थ्य विभाग का चिंतित होना स्वाभाविक है। बुंदेलखंड चिकित्सा महाविद्यालय में कोविड-19 महामारी के कारण हो रही मौतों की संख्या को कम करने तथा संक्रमण की रोकथाम के लिए संभाग कमिश्नर जेके जैन ने भी स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक अमलों तथा समाजसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों की एक बैठक ली। कमिशनर जैन ने बताया कि, कोविड-19 संक्रमण के संबंध में पॉजिटिव प्रकरणों का ’’अर्ली आइडेंटिफिकेशन’’ अर्थात प्रारंभिक अवस्था में ही संक्रमण का पता कर इलाज प्रारंभ करना बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कोविड संक्रमण की रोकथाम एवं बचाव हेतु आइडेंटिफिकेशन, आइसोलेशन, टेस्टिंग तथा ट्रीटमेंट की प्रक्रिया अपनायी जा रही है। ऐसे प्रकरण जो संक्रमण की प्रारंभिक अवस्था में ही सामने आ जाते हैं उनका इलाज सही वक्त पर शुरू हो जाता है। जिससे व्यक्ति जल्द स्वस्थ होकर घर लौट पाता है। परंतु ऐसे प्रकरण जिनमें व्यक्ति गंभीर रूप से संक्रमित होने के बाद अस्पताल पहुंचता है, उसके बचने की संभावना कम होती है। शहर में दर्ज हो रही मृत्यु का सबसे बड़ा कारण ’’लेट प्रेजेंटेशन’’ है। लेट प्रेजेंटेशन से तात्पर्य व्यक्ति के गंभीर रूप से संक्रमित होने के बाद अस्पताल पहुंचना है। ऐसी स्थिति में संक्रमण बहुत अधिक बढ़ जाता है। उन्होंने जन सामान्य से अपील की कि, कोविड-19 के लक्षण दिखने पर तत्काल रूप से चिकित्सकीय परामर्श लिया जाए। कमिश्नर ने कोविड-19 की गाईड लाईन भी याद दिलाई कि कोविड संक्रमण से बचाव हेतु फेस कवरिंग अर्थात नाक एवं मुंह को ढकना अति-आवश्यक है। इसके लिए ना केवल मास्क बल्कि कोई अन्य कपड़ा जैसे गमछा, दुपट्टा आदि के द्वारा भी चेहरे का ढंका जा सकता है। वायरस से बचाव हेतु आवश्यक है कि, कपडे़ को थ्री-फोल्ड करके पहना जाए। संभागायुक्त ने सभी को संबोधित करते हुए इस आपदा के समय देशहित में सभी से सहयोग मांगा। उन्होंने बताया कि कोविड-19 संक्रमण को फैलने से रोकने हेतु जन भागीदारी भी अत्याधिक आवश्यक है। सभी के समन्वित प्रयासों से संक्रमण को फैलने से रोका जा सकेगा साथ ही इससे होने वाली मृत्युदर को भी कम किया जा सकेगा। उन्होंने शहर के बुद्धिजीवी, गणमान्य नागरिकों से अपील की कि, आज शहर को उनकी जरूरत है। वे अपने-अपने क्षेत्र में लोगों को कोरोना के संबंध में सजग एवं जागरूक बनाएं। जिससे ना केवल सही वक्त पर मरीज अस्पताल पहुंच सके बल्कि सावधानियां रखकर इस संक्रमण से बच भी सके। इस मुहिम में भागीदारी तथा जन जागरूकता हेतु शहर की मुहल्ला समितियों को शामिल करना भी तय किया गया।

एक कहावत है कि जगाया उसे जा सकता है जो सो रहा हो। जो जाग रहा हो और जानबूझ कर सोने का ढोंग कर रहा हो, उसे जगाया नहीं जा सकता है। यही हाल उन दुस्साहसियों का है जो अपने कथित प्रकृतिप्रेम और पर्यटन के नाम पर खुद की और अपने परिवारजन की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि कोविड कोरोना संक्रमण की संख्या जितनी तेजी से घटेगी, उतनी तेजी से हमें इस भयावह स्थिति से छुटकारा मिलेगा। जब संक्रमण फैलेगा नहीं तो वायरस बढ़ेगा कैसे? और जब वायरस बढ़ेगा नहीं तो इससे छुटकारा भी मिल ही जाएगा। राजघाट बांध में नियमों को ताक में रख कर उमड़ी भीड़ जल्दी वहां से नहीं टलती यदि किसी ने उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल नहीं किया होता। उस वीडियो को देख कर प्रशासन हरकत में आया और वहां पहुंच कर लोगों को समझाईश दी। 

बेशक पर्यटन और घूमने-फिरने में बुराई नहीं है लेकिन यदि कोरोना गाईड लाईन का ध्यान नहीं रखा जाए तो फिर इसमें जानलेवा बुराई है। प्रशासन सिर्फ़ समझा सकता है, दण्डित कर सकता है लेकिन जब बात जानलेवा संक्रमण की हो तो स्वविवेक से काम लेना भी जरूरी है। ऐसे मामले में किसी भी प्रकार का दुस्साहस सभी के लिए भारी पड़ सकता है। वो कहते हैं न कि सतर्क रहें, सुरक्षित रहें।  
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(दैनिक जागरण में 27.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, August 20, 2020

चर्चा प्लस | नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह | डॉ शरद सिंह | सागर दिनकर में प्रकाशित

चर्चा प्लस ...
नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह         
     - डॉ शरद सिंह
      नई शिक्षा नीति-2020 को कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने इसे प्रेसवार्ता में जारी किया। इससे पहले 1986 में शिक्षा नीति लागू की गई थी। इस नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इस नीति की सबसे बड़ी बात है कि नई शिक्षा नीति में पांचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। इसे क्लास आठ या उससे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी लेवल से होगी। यद्यपि नई शिक्षा नीति में यह भी कहा गया है कि किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाएगा। प्रश्न यह है कि क्या इस नीति के भाषाई प्रावधान में सरकारी स्कूलों के बच्चे उन बच्चों का मुकाबला कर सकेंगे जो प्राईवेट स्कूल में पहली कक्षा से अंग्रेजी भाषा सीखते हैं। देश में अंग्रेजी के प्रभाव के चलते कहीं सरकारी स्कूलों के बच्चे और पिछड़ तो नहीं जाएंगे? इस तरह की कई बातें अभी विचार करने योग्य हैं।

.      मुझे याद है भारत भवन में सन् 2004 में हुई एक साहित्यिक संगोष्ठी जिसमें देश-विदेश से हिन्दी के जानकार एकत्र हुए थे। कथासम्राट प्रेमचंद की पोती सारा राय भी उसमें आई थीं। विदेशों में हिन्दी साहित्य विषयक सत्र के बाद जब हम भोजनसत्र में गपशप कर रहे थे तभी किसी बात पर चर्चा चलते-चलते स्कूल शिक्षा पर पहुंची और सारा राय ने हंस कर कहा-‘‘हिन्दी स्कूलों में पढ़े हुए लोग कितनी भी अच्छी अंग्रेजी बोल लें लेकिन पकड़ में आ ही जाते हैं।’’ मैंने चकित हो कर पूछा-कैसे?’’ तो उन्होंने कहा-‘‘शायद आपने ध्यान नहीं दिया होगा कि अभी पिछले सत्र में जो सज्जन भाषण दे रहे थे वे बिना वज़ह अंग्रेजी झाड़ रहे थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने ‘‘पोर्टुगल’’ को ‘‘पुर्तगाल’’ कहा, मैं ताड़ गई कि ये हिन्दी मीडियम के अंग्रेजी नवाब हैं।’’ उनका तंज इस बात पर था कि वे सज्जन हिन्दी के आयोजन में बेवज़ह अंग्रेजी झाड़ रहे थे। उस समय तो यह बात हंसी-हंसी में आई-गई हो गई लेकिन सारा राय की यह टिप्पणी फांस बन कर मेरे दिल-दिमाग़ में चुभी रही। यह बात किसी एक सज्जन की नहीं थी, बल्कि उन तमाम लोगों की थी जो हिन्दी माध्यम स्कूलों में पढ़ते हैं और स्वश्रम से अंग्रेजी में पारंगत होने का प्रयास करते हैं। अब तो अंग्रेजी सिखाने वाले कोचिंग सेंटर भी खुल गए है। यद्यपि कोरोनाकाल ने उन पर भी तालाबंदी करा दी। बहरहाल, ऑनलाईन अंग्रेजी शिक्षा की साईट्स हैं लेकिन वे इतनी सक्षम नहीं हैं कि अंग्रेजी न जानने वाले अथवा कम जानने वाले को अंग्रेजी की पर्याप्त शिक्षा दे सकें। ऐसे में नई शिक्षा नीति 2020 में भाषा शिक्षा को ले कर जो प्रावधान रखा गया है वह चिंता में डालने वाला है।

मैं भी हिन्दी माध्यम स्कूल-कॉलेज में पढ़ी हूं और मुझे अब तक अनेक ऐसे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में भाग लेने का अवसर मिला है जो हिन्दी भाषा पर केन्द्रित होते हुए भी अंग्रेजी के बोलबाले के साए में हुए। मुझे असुविधा नहीं हुई क्योंकि हिन्दी पर मेरी भाषाई पकड़ अच्छी है और कक्षा एक से ही घर पर मुझे अंग्रेजी पढ़ाई जाती रही। मेरी मां डॉ, विद्यावती ‘मालविका’ ने हिन्दी की व्याख्याता होते हुए भी मेरी अंग्रेजी भाषा की शिक्षा पर ध्यान दिया तथा उच्चारण को लेकर हमेशा सजग रखा। लेकिन जब मैं उन युवाओं के बारे में सोचती हूं जो समाज के ऐसे तबके से आते हैं जहां माता-पिता दोनों ही भाषाई ज्ञान में कच्चे होते हैं, वे युवा हिन्दी माध्यम स्कूलों में पढ़ते हुए अंग्रेजी के आतंक का कैसे मुकाबला करते होंगे? क्या उनमें हीन भावना पनपने लगती है? क्या वे स्वयं को रोजगार की दौड़ में सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा महसूस करते हैं?

कक्षा पांच तक मातृ भाषा में शिक्षा दिया जाना बड़ी सुखद बात लगती है। निश्चित रूप से इससे बच्चे को विषय को समझने और अपनी मातृभाषा से जुड़े रहने का अवसर मिलेगा। लेकिन क्या इस नीति को अंग्रेजी माध्यम के प्राईवेट स्कूल अपनाएंगे? यदि नहीं अपनाएंगे तो सरकारी और प्राईवेट स्कूलों के बीच की भाषाई खाई और गहरी हो जाएगी। हम दशकों से लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को ‘बाबू बनाने की शिक्षा नीति’’ कह कर कोसते आए हैं। लेकिन इस शिक्षा नीति के भाषा-माध्यम पक्ष को लेकर बच्चों के क्या बनने की उम्मींद कर सकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह शिक्षा नीति एक महत्वाकांक्षी नीति है। इसमें स्किल डेव्हलपमेंट के अनेक प्रावधान हैं लेकिन इस दौर में जब यह महसूस होने लगा है कि बच्चों को पहली कक्षा से ही द्विभााषी शिक्षा दी जाए तब कक्षा पांच तक केवल मातृ भाषा में शिक्षा का प्रावधान कई चुनौतियां खड़ा करता है। नई शिक्षा नीति में पांचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। इसे क्लास आठ या उससे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी लेवल से होगी। इसे लागू करने के साथ ही यह जरूरी होता कि देश में भाषाई एकरूपता पर भी नई नीति बनाई जाती और अंग्रेजी के प्रभाव को समाप्त करने की दिशा में कड़े कदम उठाए जाते। चीन, जापान, रूस, जर्मनी आदि देश एक राष्ट्र भाषा के आधार पर प्रगति कर रहे हैं तो हमारे देश में यह संभव क्यों नहीं हो पाता है? जबकि देश की आज़ादी के बाद से इस दिशा में कई बार ज़ोरदार मांग उठाई गई। यह विचारणीय है कि भाषा का मुद्दा इस नई शिक्षा नीति के व्यावहारिक उद्देश्यों को ठेस पहुंचा सकता है। 

यह अच्छी बात है कि समय के साथ शिक्षानीति में भी परिवर्तन होना चाहिए और अब देश की शिक्षा नीति में 34 साल बाद नए बदलाव किए जा रहे हैं। नई प्रणाली में प्री स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा और तीन साल की आंगनवाड़ी होगी। प्रायमरी में तीसरी, चौथी और पांचवी क्लास को रखा गया है। इसके बाद मिडिल स्कूल अर्थात् 6-8 कक्षा में विषय का परिचय कराया जाएगा। सभी छात्र केवल तीसरी, पांचवी और आठवीं कक्षा में परीक्षा देंगे। 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा पहले की तरह जारी रहेगी। लेकिन बच्चों के समग्र विकास करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए इन्हें नया स्वरूप दिया जाएगा। पढ़ने-लिखने और जोड़-घटाव (संख्यात्मक ज्ञान) की बुनियादी योग्यता पर ज़ोर दिया जाएगा। बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान अत्यंत ज़रूरी एवं पहली आवश्यकता मानते हुए ’एनईपी 2020’ में ’बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ की स्थापना की जाएगी। एनसीईआरटी 8 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचा विकसित करेगा। शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय प्रोफ़ेशनल मानक राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा वर्ष 2022 तक विकसित किया जाएगा, जिसके लिए एनसीईआरटी, एससीईआरटी, शिक्षकों और सभी स्तरों एवं क्षेत्रों के विशेषज्ञ संगठनों के साथ परामर्श किया जाएगा।

पहली बार मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम लागू किया गया है। यानी मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम की इस नई व्यवस्था में एक साल के बाद सर्टिफ़िकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और तीन-चार साल के बाद डिग्री मिल जाएगी। इससे उन छात्रों को लाभ होगा जिनकी पढ़ाई बीच में छूट जाती है। नई शिक्षा नीति में छात्रों को ये आज़ादी होगी कि अगर वो कोई कोर्स बीच में छोड़कर दूसरे कोर्स में दाखिला लेना चाहें तो वो पहले कोर्स से एक खास निश्चित समय तक ब्रेक ले सकते हैं और दूसरा कोर्स ज्वाइन कर सकते हैं। उच्च शिक्षा में कई बदलाव किए गए हैं। जो छात्र रिसर्च करना चाहते हैं उनके लिए चार साल का डिग्री प्रोग्राम होगा। जो लोग नौकरी में जाना चाहते हैं वो तीन साल का ही डिग्री प्रोग्राम करेंगे। लेकिन जो रिसर्च में जाना चाहते हैं वो एक साल के एमए के साथ चार साल के डिग्री प्रोग्राम के बाद सीधे पीएचडी कर सकते हैं। उन्हें एमफ़िल की ज़रूरत नहीं होगी। नई शिक्षा नीति में अनेक ऐसी बातें हैं जिन पर विस्तार से चर्चा अगले किसी ‘‘चर्चा प्लस’’ में करूंगी। फिलहाल भाषा तत्व जो किसी भी शिक्षा नीति की बुनियाद है, उस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यानी पहले ‘‘पुर्तगाल और ‘‘पोर्टुगल’’ की दूरी को पाटना भी जरूरी है।
  
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(दैनिक सागर दिनकर में 20.08.2020 को प्रकाशित)
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स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख :
स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
        जब मैं सुबह-सुबह अपने शहर की एनएच-26-ए रोड पर घूमने निकलती हूं तो पहले जो इलाका पड़ता है वह बजरिया कहलाता है। बजरिया की सड़क जहां मेन रोड से मिलती है वहां एक सुविधायुक्त सुलभ शौचालय है। शौचालय के बाद रोड साईड पर ही कुछ दूकाने हैं जिनमें शराब की दूकान भी है। इससे ओर आगे बढ़ने पर कुछ दूर चल कर एक ऐसा स्पॉट है जहां सड़क की दूसरी ओर के लोग कचरा डालते हैं। वहीं सुबह-सवेरे ‘‘लोटा-परेड’’ का अप्रिय, शर्मनाक दृश्य देखने को मिल जाता है। वैसे आजकल लोग लोटे के बदले प्लास्टिक की बोतल में पानी ले कर जाते हैं जो अकसर कोल्डड्रिंक की बोतल होती है। ऐसे लोगों को देख कर यही सोचती हूं कि अब इसमें दोष किसका है? प्रशासन का या लोगों का? माना कि नगरपालिका प्रशासन में अनेक गड़बड़ियां हो सकती हैं जिनके लिए हम उन्हें कोसते ही रहते हैं लेकिन जो काम जनहित में किया गया है उसका उपयोग करने में कोताही क्यों बरतते हैं? चार कदम और चल कर सुलभ शौचालय तक पहुंचा जा सकता है लेकिन ऐसा करने के बजाए सड़क पार कर के गंदगी फैलानागरिक कर्त्तव्य का उल्लंघन नहीं है? खैर, नागरिक कर्त्तव्य एक भारी-भरकम शब्द लगता है लेकिन इसे इंसान होने का फ़र्ज़ भी तो माना जा सकता है। एक गाय-भैंस कहीं भी गोबर करती है तो हम यह सोच कर अनदेखा कर देते हैं कि वह तो एक जानवर है। तो फिर उन इंसानों को क्या कहा जाए जो इस तरह की गंदगी फैलाते हैं? यदि यह कहें कि वे अनपढ़ हैं तो यह तर्क हज़म नहीं होता है क्योंकि अपने घर के बाहर गंदगी फैलाने वाले भी अपने रसोईघर और भगवान के आले को साफ़-सुथरा रखते हैं। तो यही सफ़ाई की भावना अपने घर से बाहर या सड़क के प्रति क्यों नहीं होनी चाहिए?
     मुझे लगभग रोज ही वह घटना याद आती है जब मैं सागर शहर के प्रबुद्ध नागरिकों के के संगठन ‘‘प्रजामंडल’’ की सदस्य के नाते शहर की एक बस्ती में स्वच्छता-जागरूकता अभियान पर गई थी। बस्ती की महिलाएं पहले झिझकीं फिर आहिस्ते से खुल कर बोलने लगीं। एक महिला ने जिस सरलता से मुझे अपनी सच्चाई बताई, उस पर मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसकी साफ़गोई के लिए उसे बधाई दूं या उसकी ‘लाईफ स्टाईल’ के लिए उसे फटकार लगाऊं। हुआ यूं कि जब मैंने उस महिला से पूछा कि क्या तुम्हारे घर में शौचालय है? उसने बड़े इतरा कर, मुस्कुरा कर उत्तर दिया -‘‘हऔ, है। हमाये इते शौचालय है।’’ लेकिन ग्रामीण इलाके के मेरे पूर्वअनुभवों ने मेरे भीतर घंटी बजा दी और मैंने दूसरे ही पल उससे पूछ लिया, ‘‘लेकिन तुम शौचालय में जाती हो या लोटा ले कर बाहर?’’ वह जरा झेंप कर, हंस कर बोली,‘‘हमें तो बाहर अच्छो लगत है। हम तो बाहरई जात आएं।’’ मेरी शंका सही निकली। दरअसल, यही बात बार-बार सामने आती है कि सुविधाएं उपलब्ध होने से भी कहीं बड़ी आवश्यकता है व्यवहार परिवर्तन की।

आजकल जगह-जगह सार्वजनिक शौचालय बने होते हैं, कोई भी व्यक्ति हो उसे उनका उपयोग करना चाहिए। घर का जो भी कचरा हो उसे कचरे के डिब्बे में रख कर कचरागाड़ी में ही डालना चाहिए। हमारे घर के छोटे बच्चों को भी सड़क स्वच्छता के बारे में जानकारी प्रदान करना चाहिए ताकि वह भी अपना टूटा-फूटा समान, कोल्डड्रिंक की बोतलें, प्लास्टिक की बोतल ,इधर उधर ना फेकें। साफ़ सफाई के लिए लोगो को सामने आना होगा और योगदान देना होगा।
      
“देश की सफाई एकमात्र सफाई कर्मियों की जिम्मेदारी नहीं है क्या इस में नागरिकों की कोई भूमिका नहीं है? हमें इस मानसिकता को बदलना होगा।“ यही तो कहा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ आरम्भ करते हुए। राजनैतिक स्तर पर राजनीतिक दलों में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन स्वच्छता एक ऐसा विषय है जिस पर सभी एकमत दिखाई देते है। क्योंकि स्वच्छता है तो स्वास्थ्य है। दुख की बात है कि देश को स्वतंत्र हुए 73 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आज भी हमें साफ-सुथरा रहने के सबक परस्पर एक-दूसरे को सिखाने पड़ रहे हैं। स्वच्छता हमारे घर, सड़क तक के लिए ही जरूरी नहीं होती है, यह सभी के स्वास्थ्य की पहली आवश्यकता है। इसी को मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘गंदगी भारत छोड़ो अभियान’।

आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से शुरू, भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन किया और पूर्ण स्वच्छता अभियान शुरू किया जिसको बाद में 01 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्मल भारत अभियान नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था। इसके बाद स्वच्छ भारत अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। स्वच्छ भारत अभियान 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया और 2019 तक खुले में शौच को समाप्त करना इसका उद्देश्य तय किया गया। यह एक राष्ट्रीय अभियान है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने महात्मा गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की , स्वच्छ भारत अभियान को भारत मिशन और स्वच्छता अभियान भी कहा जाता है। महात्मा गांधी जी की जयंती के अवसर पर माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी महात्मा गांधी जी की 145 वी जयंती के अवसर पर इस अभियान की शुरुआत की 2 अक्टूबर 2014 थी। साफ-सफाई को लेकर भारत की छवि को बदलने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक मुहिम से जोड़ने के लिए जन आंदोलन बनाकर इसकी शुरुआत की। हाल ही में ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान भी आरम्भ किया गया है।

स्वच्छ भारत अभियान और गंदगी भारत छोड़ो अभियान के मूल उद्देश्य हैं- खुले में शौच बंद करवाना जिसके तहत हर साल हजारों बच्चों की मौत हो जाती है, सामूहिक शौचालयों का निर्माण करवाना, लोगों की मानसिकता को बदलना, शौचालय उपयोग को बढ़ावा देना और सार्वजनिक जागरूकता लाना। इसी अभियान के तहत सन् 2019 तक सभी घरों में पानी की पूर्ति सुनिश्चित कर के गांवों में पाइपलाइन लगवाना भी तय किया गया था जो अभी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है। इनके अतिरिक्त ग्राम पंचायत के माध्यम से ठोस और तरल अपशिष्ट की अच्छी प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित करना, सड़के फुटपाथ ओर बस्तियां साफ रखना, साफ सफाई के जरिए सभी में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करना भी स्वच्छता अभियान का अभिन्न हिस्सा है। यह सब तभी संभव है जब सभी नागरिक स्वच्छता से रहने की आदत डाल लें। महात्मा गांधी ने सही कहा था -“जो परिवर्तन आप दुनिया में देखना चाहते हैं वह सबसे पहले अपने आप में लागू करें।“ 
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(दैनिक जागरण में 20.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, August 13, 2020

किसी चुनौती से कम नहीं ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण 13.08.2020 में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "किसी चुनौती से कम नहीं ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख :
किसी चुनौती से कम नहीं ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान
     - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अगस्त को दिल्ली में ’स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत बनाए गए ’राष्ट्रीय स्वच्छता केंद्र’ का उद्घाटन किया था। उसी दौरान देशवासियों से स्वतंत्रता दिवस तक एक सप्ताह लंबा ‘‘गंदगी भारत छोड़ो’’ अभियान चलाने का आह्वान किया और कहा कि ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ ने हर देशवासी के आत्मविश्वास और आत्मबल को बढ़ाया है तथा इससे जो चेतना पैदा हुई है, उसका बहुत बड़ा लाभ कोरोना वायरस के विरुद्ध लड़ाई में मिल रहा है। जैसे महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई का आंदोलन शुरू करते हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था। उसी तर्ज पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी ’गंदगी भारत छोड़ो’ का नया नारा दिया है। इस नारे के साथ जुड़े हुए अभियान की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि प्रधानमंत्री ने कहा कि महात्मा गांधी जी का अभियान था- अंग्रेजों भारत छोड़ो। अब हम लोग अभियान चला रहे हैं- गंदगी भारत छोड़ो। देश को कमजोर बनाने वाली बुराइयां भारत छोड़ें, इससे अच्छा और क्या होगा। इसी सोच के साथ पिछले छह वर्षों से देश में एक व्यापक ’भारत छोड़ो अभियान’ चल रहा है। 
     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंदगीमुक्त भारत अभियान की शुरुआत की। 8 अगस्त से शुरू हुआ अभियान 15 अगस्त तक चलना तय किया गया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ‘‘भारत छोड़ो के यह सभी संकल्प स्वराज से सुराज की भावना के अनुरूप हैं। आइए, आज से 15 अगस्त तक यानि स्वतंत्रता दिवस तक देश में एक हफ्ते का लंबा अभियान चलाएं। स्वराज के सम्मान का सप्ताह यानी ’गंदगी भारत छोड़ो सप्ताह’... उन्होंने कहा कि स्वच्छता अभियान की सफलता के बाद अब देश को गंदगीमुक्त बनाने पर जोर देना होगा। कचरे से कंचन बनाना है।’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें कचरे से खाद बनाने, सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्ति पाने की दिशा में बढ़ना होगा। इसी दौरान पिछले छह वर्षों के स्वच्छ भारत अभियान की सफलता की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इससे कोरोना से युद्ध में भी लाभ मिला है। उन्होंने कहा, ’अगर 2014 के पहले कोरोना जैसी आपदा आती तो क्या हम इसे रोक पाते। लॉकडाउन कभी सफल होता? उस समय 60 करोड़ की बड़ी आबादी खुले में शौच करने को मजबूर थी। कोरोना के दौरान शौचालय न होता तो क्या हाल होता?’’ 

प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद मध्यप्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान को मध्यप्रदेश में जन-जन तक पहुंचाया जाएगा। उनके अनुसार यह अभियान प्रदेश में 16 अगस्त से 30 अगस्त तक चलाया जाएगा। अभियान में शहरों में व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन पर नागरिकों को संवेदित और जागरूक किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में अपने शहरों को गंदगी मुक्त करने की दिशा में जुट जाएं। इस अभियान में 16 और 17 अगस्त को स्वच्छता शपथ एवं व्यक्तिगत शौचालयों का रखरखाव और सफाई पर अशासकीय संगठनों के माध्यम से झुग्गीबस्तियों एवं अन्य मोहल्लों में नागरिकों से चर्चा की जाएगी। निकाय में आवासीय परिसरों, प्रमुख स्थानों और कार्यालयों में स्वच्छता की शपथ दिलाई जाएगी। 18 से 20 अगस्त तक नो प्लास्टिक और रिसाइकिल, रियूज, रिड्यूज और रिफ्यूज के संबंध में निकायों, युवाओं और विद्यार्थियों से ऑनलाइन संवाद और परिचर्चाओं का आयोजन किया जाएगा। नागरिक संगठनों एवं जन-प्रतिनिधियों के माध्यम से बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर प्लास्टिक प्रतिबंध के संबंध में जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। अभियान में 21 से 23 अगस्त तक कोविड-19 के संबंध में लोगों को नेपकिन और उपयोग किए गए मास्क आदि के सुरक्षित निपटान के संबंध में जागरूक किया जाएगा। नगरीय निकाय द्वारा क्वारेंटाइन केन्द्रों की स्वच्छता, मास्क पहनने की समझाइश और निकायों में सफाईकर्मियों को सम्मानित करने का कार्य किया जाएगा। अभियान में 24 से 26 अगस्त तक आवासीय परिसरों में स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्कीकरण, घरेलू हानिकारक कचरे का सुरक्षित निपटान करने के संबंध में जन-जागरूकता के साथ ही स्व-सहायता समूह के सदस्यों एवं आवासीय संघों से चर्चा की जाएगी। अंतिम चरण में 26 से 30 अगस्त तक निकायों एवं सहयोगी संगठनों के सहयोग से स्वच्छता श्रमदान तथा निकायों द्वारा सभी सार्वजनिक शौचालयों के अंदर और बाहर विशेष सफाई अभियान चलाया जाएगा। कार्यक्रमों में मास्क पहनने और सोशल डिस्टेसिंग प्रोटोकॉल का अनिवार्य रूप से पालन करने तथा कंटेनमेंट जोन में यह गतिविधियां नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। गतिविधियों की नियमित रिपोर्टिंग की जाए। अभियान का व्यापक प्रचार-प्रसार कर नागरिकों को जागरूक एवं प्रोत्साहित किया जाए।

ध्यान रखने वाली बात यह होगी कि कहीं यह अभियान काग़ज़ी और समारोही हो कर न रह जाए। यहां याद दिलाना जरूरी है कि 2 अक्टूबर 2014 को ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ प्रधानमंत्री द्वारा आरम्भ किया गया था। नामचीन लोग इस अभियान के ब्रांड एम्बेस्डर बनाए गए। अभियान आरम्भ हुए लगभग छः साल होने को आ रहे हैं लेकिन परिणाम का आकलन हम अपने शहरों की गलियों और निचली बस्तियों को देख कर स्वयं ही कर सकते हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री को एक इमोशनल नारे के रूप में अभियान को सामने रखने की आवश्यकता महसूस हुई। वे भी जानते हैं कि झाड़ू और तसले के साथ फोटो खिंचवा कर मीडिया में प्रचारित कर सफ़ाई नहीं की जा सकती है। यदि नारों और अभियानों की सूची मात्र बढ़ानी है तो बात और है अन्यथा प्रशासन को असली गंदगी तक पहुंचना होगा और उसके निपटारे पर ध्यान देना होगा। इसके लिए हर व्यक्ति के मन में भी स्वच्छता की भावना जगानी होगी, जो अपने आप में सबसे बड़ी चुनौती है। कम से मध्यप्रदेश में और उसमें भी बुंदेलखंड में यह चुनौती और अधिक व्यापक है। यदि ज़मीनी स्तर पर ’गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान भी ‘‘शो बिजनेस’’ की तरह चलाया गया तो शायद अगले छः साल में एक और अभियान की ज़रूरत पड़ेगी और तब तक आम नागरिक गंदगी के ढेर पर बैठा प्रदूषित सांसें लेता बीमारियों से जूझता रहेगा। यानी कुल मिला कर अवधि कम है और चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं। 
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(दैनिक जागरण में 13.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, July 30, 2020

विशेष लेख : लापरवाहियां भारी पड़ सकती हैं अनलाॅक-3 में - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh





"लापरवाहियां भारी पड़ सकती हैं अनलाॅक-3 में " ... आज 30.07.20 #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...


हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏

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विशेष लेख :

लापरवाहियां भारी पड़ सकती हैं अनलाॅक-3 में

- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

       अनलॉक-2 की अवधि 31 जुलाई को पूरी होने वाली है और उसके बाद अनलॉक-3 लागू किया जाएगा। अनलाॅक-3 के सामने एक और बड़ी चुनौती है आगामी त्यौहारों की। बकरीद और रक्षाबंधन जैसे त्योहार 31 जुलाई के बाद आने वाले हैं। ऐसे में त्योहार को लेकर बाजार में भीड़-भाड़ बढ़ने की पूरी संभावना है। अगर लरपरवाहियां नहीं छोड़ी गईं तो संक्रमण और ज्यादा तेजी से फैल सकता है। अभी की ताज़ा स्थिति पर गौर करें तो बाज़ारों में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियों उड़ती दिखाई देती हैं। राजनीतिक सभाओं एवं संपर्कों के दौरान कोरोना गाईडलाईन अनके स्तरों पर तोड़ी गईं। बड़े रसूखदार व्यक्ति भी जिनसे समझदारी की उम्मींद की जाती है, वे भी मास्क लगाने में लापरवाही बरतते हैं। या तो मास्क लगाते ही नहीं हैं और यदि लगा लिया तो उसे ठोढ़ी या गले में फंसाए रखते हैं। मानो कोरोना वायरस का संक्रमण नाक से नहीं गले या ठोढ़ी से प्रवेश करेगा। ऐसी ही चूक का परिणाम है कि आज प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। जाहिर है कि इस महामारी का संबंध किसी विशेष जाति, धर्म, संप्रदाय राजनीतिक दल या व्यक्ति से नहीं है। इसके लिए हर इंसान टारगेट है। एक कुली भी इसका शिकार बन सकता है और मुंबई के सबसे पाॅश इलाके में रहने वाले अमिताभ बच्चन भी इसकी ग़िरफ़्त में आ सकते हैं। अब जबकि अनलाॅेक-3 के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि इसमें और अधिक छूटे मिलेंगी तो और अधिक सतर्कता जरूरी हो जाती है।
Dr (Miss) Sharad Singh article in Dainik Jagaran

        पिछले दिनों भावी उपचुनावों को लेकर हुई सभाओं में कोरोना गाईड लाईन को ताक में रख दिया गया था। बाज़ारों में फिजिकल डिस्टेंसिंग को तो लगभग भुला ही दिया गया। माॅर्निंगवाॅक और ईवनिंगवाॅक के दौरान बिना मास्क के घूमने वालों की कोई कमी नहीं है। ऐसे लोगों को भी डिस्टेंसिंग का ध्यान नहीं रहता है। बहरहाल, समाचारपत्रों एवं अन्य मीडिया द्वारा सभाओं में बरती गई लापरवाहियों पर कोई कड़ी कार्यवाही नहीं किए जाने का परिणाम यह हुआ है कि शैक्षणिक संस्थाओं में फिजिकल डिस्टेंसिंग को भुला कर कथित वेबिनार किए जा रहे हैं। जबकि वेबिनार का कंसेप्ट ही है कि वेब अथवा इंटरनेट द्वारा परस्पर चर्चा एवं संवाद। कुर्सी से कुर्सी जोड़ कर यदि पांच व्यक्ति बैठे हैं तो यह वेबिनार नहीं बल्कि संक्रमण को दावत देना ही कहलाएगा। अधिक उत्साह में आ कर व्याख्यान और सम्मान कार्यक्रम किया जाना भी ख़तरे को दावत देने के समान है। क्योंकि ऐसे आयोजन में शामिल होने वालों की कार्यक्रम-पूर्व कोरोना जांच की कोई चाक-चैबंद व्यवस्था तो होगी नहीं, लिहाज़ा इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि आयोजन में उपस्थित सभी व्यक्ति ‘‘कोरोना मुक्त’’ हैं। सागर जिला प्रशासन एक बार ऐसी चूक कर चुका है जब प्रशासन ने एक मुनिश्री को अन्यत्र जाने की अनुमति दी और साथ ही भीड़ जुड़ने का अनुमान नहीं लगा सका। उस चूक से सीख लिया जाना चाहिए था। अनलाॅक-1 और अनलाॅक-2 में मिली छूटों में आमजन भी लापरवाही बरतने में पीछे नहीं रहे हैं, नतीज़ा यह कि हर शहर में कोरोना के नए संक्रमितों की संख्या आए दिन पंद्रह से बीस के बीच बरामद होती है। यदि आंकड़ों पर ध्यान दें तो केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटे में 47,704 नए मामले सामने आए हैं और 654 लोगों की मौत हुई है। इसके बाद देशभर में कोरोना पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 14,83,157 हो गई है। जिनमें से 4,96,988 सक्रिय मामले हैं, 9,52,744 लोग ठीक हो चुके हैं या उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है और अब तक 33,425 लोगों की मौत हो चुकी है। दुनिया भर में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में भारत तीसरे स्थान पर आ गया है।
अनलॉक-3 के साथ जहां लोगों के लिए सुविधाओं में बढ़ोतरी होगी वहीं कोरोना के प्रसार को लेकर डर भी बना हुआ है। अनलॉक-3 के लिए जनता में भी उत्सुकता है। लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि सरकार किन-किन चीजों में ढील देने वाली है।  25 से 50 फीसदी दर्शकों के साथ खुल सकते हैं मल्टीप्लेक् अनलॉक-3 में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सिनेमा हॉल को खोलने पर विचार किया जा रहा है। सिनेमा हॉल खोलने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर से गृह मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा जा चुका है। सिनेमाघर मालिकों और सूचना प्रसारण मंत्रालय की बैठक में मंत्रालय ने सिनेमाघरों के मालिकों के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह 25 से 50 फीसदी दर्शकों के साथ मल्टीप्लेक्स, सिंगल विंडो सिनेमाघर खोल सकते हैं। इस पर सवाल उठता है कि क्या सिनेमाघर संचालक इतने कम दर्शकों यानी इतने बड़े घाटे के साथ अपना सिनेमाघर चला सकेंगे? यदि किसी तरह चला भी लें तो क्या वे कोरोना गाईडलाईन के नियमों का पालन करा सकेंगे? एक ही हाॅल में बैठे दर्शकों की सांसों से फैल सकने वाले संक्रमण को वे कैसे नियंत्रित रख सकेंगे? क्या नियमों के पालन में वे निरंतर सख़्ती और सजगता बनाए रख सकेंगे? क्या यह वहीं सिगरेट या शराब वाला उदाहरण होगा कि ‘‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक’’ की सूचना छाप पर उपभोक्ताओं के विवेक पर छोड़ दिया जाएगा कि उन्हें मनोरंजन प्यारा है अथवा अपना जीवन? शराब की दूकाने खोलने की अनुमति के बाद उन दूकानों पर नियमों की धज्जियां उड़ाती भीड़ की अनके तस्वीरें आंखों के सामने से गुज़री हैं। ऐसे में बड़ी चुनौती होगी सिनेमाघरों को खोलना। हमारे देश में नियम और सूचनाओं का क्या हश्र होता है वह तो अनलाॅक-2 के दौरान खुले बाज़ारों और चुनावी सभाओं में देखा ही है। बस, ट्रेन, हवाई जहाज को सर्शत छूट दिए जाने पर भी स्कूलों को बंद रखा गया है जो कि एक उचित निर्णय है। अनलाॅक-3 में भी स्कूल्स बंद रखे जाने की संभावना है।
अनलॉक-2 के बाद मध्य प्रदेश में कोरोना बेकाबू हो गया। जो स्थिति लाॅकडाउन के समय थी, उसके विपरीत अनलाॅक में स्थिति बिगडती ही गई है। आगामी त्योहारों के सीज़न को ध्यान में रख कर यह गाईडलाईन दोहराई गई है कि धार्मिक स्थलों, उपासना स्थलों पर एक बार में 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं होंगे। घर पर ही आगामी त्यौहार मनाना होगा। देव प्रतिमा घर पर ही स्थापित कर पूजा-अर्चना करना होगा। सार्वजनिक स्थलों पर प्रतिमा स्थापित करने, त्योहार मनाने की अनुमति नहीं होग। जुर्माने के प्रावधान के साथ इन नियमों का पालन कराया जाएगा। अनलाॅक-3 में छूटे बढ़ाई जानी सामान्य जीवन को व्यवस्थित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगी लेकिन उतनी भी ख़तरनाक भी। इसलिए एक अगस्त से संभावित अनलाॅक-3 में लापरवाहियां छोड़ कर सतर्कता को अपनाना होगा वरना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए भारी पड़ेंगी लापरवाहियां।       
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(दैनिक जागरण में 30.07.2020 को प्रकाशित)

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Thursday, July 23, 2020

एकरूपता हो नियमों के पालन में - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
"संक्रमितों के नामों को प्रकाशित न किए जाने का नियम सेलीब्रटीज़ पर लागू क्यों नहीं किया जाता " ... आज #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...
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विशेष लेख:
एकरूपता हो नियमों के पालन में
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
          कोरोना गाईड लाईन के अनुसार कोरोना संक्रमित व्यक्ति का नाम मीडिया पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। संक्रमित व्यक्तियों के सिर्फ क्षेत्र की सूचना दी जाती है। 'पी1', 'पी2' के छद्म नाम के साथ। ऐसे कई मामले प्रकाश में आते रहे हैं जिनमें अज्ञानतावश संक्रमितों के संपर्क में आ कर अन्य कई लोग संक्रमित हुए हैं। बेशक यह तर्क माना जा सकता है कि संक्रमितों को किसी भी तरह की अवहेलना से बचाने के लिए उनके नामों की गोपनीयता रखी जाती है। तो फिर संक्रमितों के नामों को प्रकाशित न किए जाने का नियम सेलीब्रटीज़ पर लागू क्यों नहीं किया जाता है? चाहे वे राजनीति के ख्यातिलब्ध नाम हों अथवा फिल्मी दुनिया के। आम जनता और सेलेब्स के लिए एक ही नियम का दो तरह से पालन?
Dr (Miss) Sharad Singh article in Dainik Jagaran
    यहां सवाल व्यक्ति के पद-प्रतिष्ठा का नहीं है, सवाल है नियमों के एक समान पालन का। कहा तो यही जाता है कि नियम सबके लिए बराबर होते हैं। तो फिर इस मुद्दे पर समानता दिखाई क्यों नहीं देती है? उल्लेखनीय है कि मई के अंतिम सप्ताह में भाजपा के कद्दावर नेता और बेबाक प्रवक्ता संबित महापात्रा को कोरोना के लक्षण दिखाई देने पर गुरुगांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती करवाया गया थ। संबित महापात्रा के ट्विटर पर 4.4 मिलियन फालोअर्स हैं और न्यूज चैनल की डिबेट में वो भाजपा की ओर से विपक्षी दलों को करारा जबाव देने के लिए जाने जाते हैं। वे एक सेलेब्स की भांति हैं और उनके कोरोना संक्रमित होने का समाचार सुर्खियां बटोरता रहा। इसके बाद बाॅलीबुड के शाहनशाह एवं सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के संक्रमित होने की ख़बर ने तहलका मचा दिया। बच्चन परिवार के 54 कर्मचारी क्वारंटीन में रखे गए। पहले जहां अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की खबर सामने आई तो उसके बाद अभिषेक भी पॉजिटिव निकले। वहीं बाद में ऐश्वर्या राय बच्चन और आराध्या के भी संक्रमित होने की खबर मिली। अमिताभ बच्चन के फैंस शहंशाह के साथ ही अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन और आराध्या के लिए भी प्रार्थना कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई ऐसे पोस्ट देखने को मिल रहे हैं, जहां पर फैंस बच्चन परिवार के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। स्वाभाविक है। कोई भी व्यक्ति अपने प्रिय लगने वाले व्यक्ति को कोरोना जैसे संकट में फंसा हुआ नहीं देखना चाहता है तथा उसके शीघ्र स्वस्थ होने के लिए दुआएं करने लगता है। लेकिन यदि अमिताभ बच्चन सदी के महानायक नहीं होते और एक आमजन होते तो क्या उनका अथवा उनके परिवार के सदस्यों का नाम प्रकाशित किया जाता? 

इसी तरह आगामी उपचुनावों के परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें तो अनलॉक 2 के बाद मध्य प्रदेश में कोरोना बेकाबू हो गया है। इसका संक्रमण लगातार बढ़ रहा है, प्रदेश स्तर पर 31 जुलाई तक हर रविवार लॉकडाउन करने के निर्णय के बाद अब स्थानीय प्रशासन भी शहरों और जिलों को फिर लॉकडाउन करने की तरफ बढ़ रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कहा है कि प्रदेश में कोरोना संक्रमण रोकने के लिए उत्सवों पर सार्वजनिक झाकियां नहीं लगाई जाएंगी। धार्मिक स्थलों, उपासना स्थलों पर एक बार में 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं होंगे। शादी, सगाई आदि में दोनों पक्षों के 10-10 व्यक्ति से अधिक सम्मिलित नहीं होंगे। जन्मदिन आदि उत्सवों में 10 से अधिक व्यक्ति शामिल नहीं होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा है कि कोरोना संक्रमण रोकने के लिए घर पर ही आगामी त्यौहार मनाएं। देव प्रतिमा घर पर ही स्थापित कर पूजा-अर्चना करें। सार्वजनिक स्थलों पर प्रतिमा स्थापित करने, त्योहार मनाने की अनुमति नहीं होगी। ऐसी दशा में आगामी उपचुनाव की चुनावी सभाओं का क्या होगा?

एक ओर कोविड संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए मप्र फिर लॉकडाउन की तरफ बढ़ रहा है। राज्य में रविवार को पूरी तरह लॉकडाउन लागू करने के बाद अब एक दिन और गतिविधियां प्रतिबंधित की जा रही हैं। यह दिन रविवार के पहले शनिवार या बाद के सोमवार को होगा। भोपाल में शनिवार और रविवार को लॉकडाउन रहेगा। इस दौरान अत्यावश्यक सेवाओं को ही मंजूरी रहेगी। इसके अलावा सभी जिलों में कर्फ्यू रात 8 बजे से सुबह 5 बजे तक रहेगा। राज्य सरकार ने सख्ती दिखाते हुए यह भी साफ कर दिया है कि यदि किसी निजी दफ्तर या व्यापारिक संस्थान में कोई कोरोना पॉजिटिव मिला तो उसे सात दिन के लिए बंद कर दिया जाएगा। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि संक्रमण मुक्त जिलों को छोड़कर बाकी जिलों में राज्य और केंद्र सरकार के सभी दफ्तरों में अधिकारियों व कर्मचारियों की संख्या 30 से 50 फीसदी ही रहेगी। अधिकारी शत-प्रतिशत आएंगे। निजी कार्यालय एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान भी 30 से 50 प्रतिशत क्षमता में संचालित होंगे। निजी दफ्तर तथा व्यापारिक संस्थानों में कोई कोरोना पॉजीटिव मिलने पर उसे 7 दिन के लिए बंद कर दिया जाएगा।  
फिलहाल इस बात के आसार नजर नहीं आ रहे हैं कि सितंबर अंत तक स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में आ जाएगी। चुनाव आयोग ने पोलिंग बूथ पर सोशल डिस्टेंसिंग के लिए खाका तैयार किया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव प्रचार में कोरोना गाइडलाइन के पालन की जिम्मेदारी कौन लेगा? सरकार ने सभी प्रकार के सामूहिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। तो क्या किसी भी प्रकार की चुनावी सभा इसी प्रतिबंध के दायरे में आएगी? पहले ही ऐसे मामले प्रकाश में आ चुके हैं जब संभावित उम्मींदवारों के समर्थक जनसभा में शामिल हुए और उन्होंने न तो सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा और न मास्क लगाने का। जब से चुनाव के निकट आने की संभावना बढ़ी तभी से कोरोना से बचाव के नियमों की धज्जियां उड़ाने वाली अनेक तस्वीरें समाचारपत्रों के मुखपृष्ठों पर अपनी जगह बना चुकी हैं। इस स्थिति में कोरोना गाइडलाइन का पालन सुचारु रूप से कैसे हो पाएगा, यह सबसे बड़ी चिंता का प्रश्न है। इसी परिप्रेक्ष्य में नियमों के समान रूप से पालन किया और कराया जाना प्राथमिक जरूरत है ताकि आमजन सजग और सतर्क रह कर कोरोना से अपनी रक्षा कर सके। 
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(दैनिक जागरण में 23.07.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, July 9, 2020

अब तो विकास होना चाहिए जब सितारा बुलंदी पर हो - डॉ.(सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh

अब तो विकास होना चाहिए जब सितारा बुलंदी पर हो - डॉ.(सुश्री) #शरद_सिंह

आज #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...

हार्दिक आभार "दैनिक जागरण" 🙏
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विशेष लेख :

अब तो विकास होना चाहिए जब सितारा बुलंदी पर हो 
- डॉ.(सुश्री) शरद सिंह

बुंदेलखंड के सितारे इन दिनों बुंलंदी पर हैं। शिवराज सरकार के मंत्रिमण्डल के नए विस्तार में पहली बार तीन नेताओं को एक साथ मंत्रीमंडल में स्थान दिया गया है। बुन्देलखण्ड अंचल से अब कुल चार मंत्री हो गए जिनमे भूपेंद्र सिंह, गोविंद सिंह राजपूत, बृजेन्द्र प्रताप सिंह एवं पं. गोपाल भार्गव शामिल है। एक साथ तीन नेताओं को मंत्रीपद मिलना बुंदेलखंड के विकास के लिए शुभसंकेत माना जा सकता है। बशर्ते ये तीनों-चारों मंत्री अपने विधान सभा क्षेत्रों के अलावा समूचे बुंदेलखंड के विकास पर मिल कर महत्वपूर्ण कदम उठाएं।

Dainik Jagaran, Article of Dr (Miss) Sharad Singh, 09.07.2020

इनमें से विधायक गोपाल भार्गव बुंदेलखंड के ही नहीं वरन् एमपी विधानसभा के सबसे सीनियर नेता हैं और अब वरिष्ठ  मंत्री भी बन गए हैं। पंडित भार्गव को प्रदेश राजनीति का एक लम्बा अनुभव है। वे उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह के चैथे मंत्रिमण्डल तक में शामिल रहने वाले भार्गव सागर जिले की गढाकोटा विधानसभा क्षेत्र से लगातार आठवीं दफा चुनाव जीत चुके हैं जो कि अपने आप में एक रिकाॅर्ड है। पूर्व गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह को दूसरी दफा मंत्री बनने का मौका मिला है। सीएम शिवराज सिंह के सबसे करीबियों में से एक भूपेंद्र सिंह छह बार चुनाव लड़े है। चार बार जीते है। वे एक कद्दावर नेता के रूप में प्रदेश राजनीति में अपनी साख स्थापित कर चुके हैं। ब्रजेन्द्र प्रताप सिंह पन्ना से चुनाव से चुनाव जीत कर आए हैं और एक कर्मठ नेता के रूप में उनकी छवि है। कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वाले सुरखी विधान सभा क्षेत्र के चिरपरिचित नेता गोविंद सिंह राजपूत को मंत्रीमंडल में शामिल किए जाने से उनका वह पक्ष मजबूत हो गया है जिसमें यह माना जा रहा था कि भाजपा खेमें के कुछ लोग उनसे नाखुश हैं। यद्यपि अभी गोविंद सिंह राजपूत को उपचुनाव का सामना करना है लेकिन मंत्रीपद मिल जाने से उनकी साख में जो वृद्धि हुई है वह चुनाव परिणाम उनकी झोली में आसानी से डाल सकती है। यूं भी गोविंद सिंह राजपूत की अपने सुरखी विधान सभा क्षेत्र में अच्छी पकड़ है और वे इलेक्ट्राॅनि माध्यमों द्वारा भी अपने क्षेत्र की जनता से संपर्क बनाए रखते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई मंत्रीमंडल बनता है अथवा मंत्रीमंडल का विस्तार किया जाता है तो कहीं खुशी, कहीं ग़म का माहौल बन ही जाता है। मध्यप्रदेश विधान में बुंदेलखंड के तीन नेताओं को एक साथ मंत्रीपद मिलने से जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं नाराज़गी भी उभर कर सामने आई। सागर नगर विधान सभा क्षेत्र के विधायक जो भाजपा को लगातार विजयी बनाते आ रहे हैं, मंत्रीमंडल के इस विस्तार में वंचित रह गए। जिससे उनके समर्थकों में निराशा की लहर दौड़ गई। निराश समर्थकों ने विधायक शेलेन्द्र जैन को मंत्री बनाने की मांग को ले कर ने जल सत्याग्रह करके विरोध जताया। मगर एक कुशल राजनीतिज्ञ की भांति विधायक शैलेन्द्र जैन ने अपने समर्थकों के विरोध को शांत करने के लिए बाकायदा एक सार्वजनिक अपील की। उल्लेखनीय है कि पिछली विधान सभा चुनावों के पूर्व टिकटों की घोषणा नहीं होने पर भी शैलेन्द्र जैन जनसंपर्क में जुटे रहे थे जबकि उस समय यह सुनिश्चित नहीं था कि टिकट उन्हें मिलेगा भी या नहीं। उनकी यही खूबी उन्हें एक लोकप्रिय नेता बनाती है और इसका दूसरा पक्ष यह भी कि ऐसे समर्पित नेता को मंत्रीमंडल में लिए जाने का कयास जोर पर था।
नरयावली विधान सभा के विधायक प्रदीप लारिया भी मंत्रीपद से वंचित रह गए। लेकिन उन्होंने भी अनुशासन का परिचय दिया। अर्थात् जब माहौल शांत हो और मिलजुल कर काम करने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही हो तो यह आशा की जा सकती है कि अब समूचे बुंदेलखंड नहीं तो कम से कम सागर संभाग के पांचों जिलों बुनियादी समस्याएं दूर हो सकेंगी। बुंदेलखंड के अनेक अंचल ऐसे हैं जो आज भी रेल सुविधा की बाट जोह रहे हैं। जिन्हें रेल मार्ग मिल गया है उन्हें गिनती की रेलें मिली हैं।

शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, परिवहन और स्वच्छता में पिछड़े हुए इन पांचों जिलों को विकास करने का समुचित अवसर मिल सकेगा। रोजगार के संदर्भ में युवाओं द्वारा कई बार मांग उठाई जा चुकी है कि बुंदेलखंड में आईटी सेक्टर की स्थापना की जाए ताकि युवाओं को अच्छे रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में न भटकना पड़े। किन्तु बात वहीं आवागमन के साधनों की कमी पर आ कर अटकती है। कोई भी मल्टीनेशनल कंपनी आईटी सेक्टर मंे तभी निवेश करने का मन बनाएगी जब विदेशों से आने वाले उनके प्रतिनिधियों को आवागमन की बेहतर सुविधाएं सुलभ होंगी। समूचे बुंदेलखंड में एकमात्र खजुराहो ही ऐसा हवाई अड्डा है जहां से यात्री उड़ाने भरी जाती हैं किन्तु वह भी गिनती की हैं और वहां से सभी महत्वपूर्ण शहरों के लिए उड़ानों की कमी है। इस स्थिति में जरूरी हो जाता है कि ऐसे हवाई अड्डे स्थापित किए जाएं जहां सस्ती उड़ान सेवाएं सुलभ हो सकें और बुंदेलखंड के निवासी देश के अन्य क्षेत्रों से हवाई मार्ग द्वारा जुड़ सकें। बुंदेलखंड में चिकित्सा साधनों की भी कमी यथावत बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्र एवं गरीब तबका आज भी नीम हकीमों के हाथों अपनी जान का खतरा उठाता रहता है। विकास की दर कछुआ चाल से ही चलती रही है। इस प्रकार की अनेक छोटी-बड़ी समस्याएं हैं जो क्षेत्र के विकास में बाधा बनती रहती हैं। इन बाधाओं को दूर करने का सुनहरा अवसर आ गया है जब क्षेत्र के चारों मंत्री मिल कर संभाग का नया उज्ज्वल भविष्य लिख सकते हैं।

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(दैनिक जागरण में 09.07.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, June 17, 2020

विशेष लेख - एक सबक है सुशांत का जाना - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh


दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ... आप भी पढ़िए...

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विशेष लेख
एक सबक है सुशांत का जाना
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

विशेषरूप से युवावर्ग सुशांत के इस तरह जाने से सबक ले और इस बात को गांठ में बांध ले कि अपनों से दूर रह कर पैसा और प्रसिद्धि अकेलापन और अवसाद देती है मन का सुकून नहीं। चांद पर प्लाट खरीदने की क्षमता भी कभी-कभी ज़िन्दगी जीने की इच्छा को मार देती है।


वह व्यक्ति मज़दूर या कामगार नहीं था जिसे लाॅकडाउन में अपने रोजगार और घर से विस्थापित हो कर सैंकड़ों किलोमीटर का पैदल सफ़र करना पड़ा हो। अपने अभिनय के दम पर उसने इतना धन कमा लिया था कि जिससे वह चांद पर भी प्लाट खरीद सका। जी हां, #बाॅलीवुड #अभिनेता #सुशांत_सिंह_राजपूत। एक करोड़पति अभिनेता। इंडियन #क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह #धोनी के जीवन पर बनी फिल्म में उन्होंने लीड रोल निभाया था। सुशांत सिंह राजपूत एक फिल्म के लिए 5 से 7 करोड़ रुपये लेते थे। वहीं, विज्ञापन के लिए 1 करोड़ रुपये तक लेते थे। उन्होंने कई रीयल एस्टेट प्रॉपर्टीज में भी निवेश किया हुआ था। बताया जाता है कि उनकी कुल संपत्ति 80 लाख डॉलर यानी 60 करोड़ रुपये से भी अधिक थी। उनकी फिल्म ‘एमएस धोनी’ ने कुल 220 करोड़ रुपये की कमाई की थी। सुशांत सिंह राजपूत ने 34 वर्ष की छोटी-सी आयु में फिल्मों, विज्ञापनों और निवेश के जरिए करोड़ों कमाए। बॉलीवुड के दूसरे सेलेब्रिटीज की तरह सुशांत भी मुंबई के पॉश इलाके बांद्रा में आलीशान घर में रहते थे। उन्हें कारों और बाइक्स का भी काफी शौक था। इसलिए उनके पास कारों की पूरी फ्लीट थी।


सफलता सुशांत सिंह राजपूत के कदम चूम रही थी। उनकी हर फिल्म कमाई का नया रिकॉर्ड बना रही थी। ऐसे में उनकी फीस भी लगातार बढ़ती जा रही थी। कहीं कोई आर्थिक तंगी का मसला नहीं। असफलता का मसला भी नहीं। फिर भी इस युवा अभिनेता ने आत्महत्या जैसा #पलायनवादी कदम उठाया। आखिर क्यों? इस ‘क्यों’ का उत्तर सब ढूंढ रहे हैं। इस ‘क्यों’ का उत्तर शायद ही कभी मिले। लेकिन इस घटना से एक सबक ज़रूर मिला है कि पैसा और प्रसिद्धि भी वह सुख और शांति नहीं दे सकते हैं जो ज़िन्दगी से प्रेम करना सिखा सके।

Ek Sabak Hai Sushant Ka Jana - Dr (Miss) Sharad Singh, Dainik Jagaran, 16.06.2020
कुछ समय पहले सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर #दिशा_सलियन ने भी मुंबई में 12वीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली थी। बताया जा रहा था कि वह अपने मंगेतर संग मुंबई के मलाड में रहती थीं। घटना की जानकारी मिलते ही उन्हें बोरिवली के हॉस्पिटल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। आत्महत्या के पीछे अभी कोई भी वजह सामने नहीं आई। इससे पहले ‘क्राइम पेट्रोल’ एक्ट्रेस #प्रेक्षा_मेहता ने भी पंखे से लटककर खुदकुशी की थी। बॉलीवुड इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहा है। कई #सेलेब्स ने काम न मिलने के चलते खुदकुशी की है। सोचने की बात है कि काम न मिलने की स्थिति में विस्थापित प्रवासी मज़दूरों ने आत्महत्या करने के बजाए डट कर संकट का सामना किया लेकिन ये सेलेब्स #हताशा और #अवसाद से घिर गए। आखिर इसकी वज़ह क्या हो सकती है?


आज के #बाजारवाद और #भौतिकतावाद के युग में हम जिस तरह पैसे और प्रसिद्धि के जाल में तेजी से जकड़़ते जा रहे हैं, वह हमें अपने आप से ही दूर करता जा रहा है। जिसके पास #पैसा या #प्रसिद्धि नहीं है, वह यही सोचता है कि इन दोनों से दुनिया की सारी खुशियां खरीदी जा सकती हैं, पाई जा सकती हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि यह दोनों सबसे पहले अपनों से दूर करना शुरू कर देते हैं। इसके बाद खुद पर से भी ध्यान हटता जाता है क्योंकि लक्ष्य ‘‘स्वांतः सुखाय’’ आए नहीं बल्कि ‘‘दुनिया दिखाय’’ हो जाता है। प्रदर्शन का मोह हमें भला और बुरा सोचने का अवसर नहीं देता है। वहीं दूसरी ओर जब व्यक्ति इस प्रदर्शन के #मायाजाल में लिपटकर गलत-सही कर्मों में भेद करना भी छोड़ देते हैं, तब वे अनचाही परिस्थितियों के संजाल में उलझते जाते हैं। जहां से अवसाद की यात्रा शुरू होती है। अपने ही हाथों कमाया गया एकाकीपन व्यक्ति को वह अवसाद की ओर धकेलता जाता है। एक स्थिति वह आती है जब व्यक्ति आत्महत्या की ओर अपने क़दम बढ़ा देता है। अपने ही हाथों अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। यही तो किया बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने। सुशांत ने पंखे में लटक कर आत्महत्या कर ली। वे पिछले छः माह से अधिक समय से अवसाद दूर करने की दवा खा रहे थे।



वह मानसिक स्थिति जब इंसान सही और गलत में भेद नहीं कर पाता है और अपने भ्रम पर ही अटूट विश्वास करने लगता है, उसी स्थिति में वह आत्मघात जैसे कदम उठाता है। #मनोवैज्ञानिक इस स्थिति को #सीजोफ्रेनिया कहते हैं। यह भ्रम को सच मान लेने की चरम स्थिति है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सीजोफ्रेनिया का मनोरोग आत्मीयता और प्रेम पा कर ठीक होने लगता है। लेकिन यह आत्मीयता भौतिकतावाद की दौड़ में तेजी से गुम होती जा रही है। अगर अवसाद (डिप्रेशन) की स्थिति घेरने लगे तो अपनी समस्याएं बेझिझक अपनो से साझा करें और अपनो के निकट रहें। आखिर सुशांत सिंह राजपूत ने जो आत्मघाती कदम उठाया उससे उनके करोड़ों फैन्स तो आहत हुए ही, वे अपनी बहनों और पिता के सीने पर दुखों का पहाड़ छोड़ जाने के अपराधी हैं। इसीलिए जरूरी है कि किसी भी प्रकार का आत्मघाती विचार आते ही पहले अपने परिवार और मित्रों के बारे में सोचना चाहिए कि वे इस दुख को कैसे झेलेंगे। यही समय है कि विशेष रूप से युवावर्ग सुशांत के इस तरह जाने से सबक ले और इस बात को गांठ में बांध ले कि अपनों से दूर रह कर पैसा और प्रसिद्धि अकेलापन और अवसाद देती है मन का सुकून नहीं।
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(दैनिक जागरण में 16.06.2020 को प्रकाशित)
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Late Sushant Singh Rajput Bolywood Actor

Thursday, June 4, 2020

गुलामी की छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा में 'साउगोर’ (सागर) वल्द ‘इंडिया’ - डाॅ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh  
गुलामी की  छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा में
‘साउगोर’ (सागर) वल्द ‘इंडिया’
           - डाॅ. शरद सिंह
  दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख हमारे देश और मेरे शहर के नाम के मुद्दे पर है ... आप भी पढ़िए...
हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏
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गुलामी की  छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा में
‘साउगोर’ (सागर) वल्द ‘इंडिया’
           - डाॅ. शरद सिंह
            हमारे संविधान में देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत रखे जाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। दिल्ली निवासी याचिकाकर्ता का कहना है कि इंडिया शब्द से अंग्रेजों की गुलामी झलकती है जो कि भारत की गुलामी की निशानी है। इसलिए इस इंडिया शब्द की बजाय भारत का इस्तेमाल होना चाहिए। साथ ही याचिका में कहा गया है कि संविधान के पहले अनुच्छेद में लिखा है कि इंडिया यानी भारत। लेकिन आपत्ति यह है कि जब देश एक है तो उसके दो नाम क्यों है, एक ही नाम का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाए। याचिका में दावा किया गया है कि ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ शब्द हमारी राष्ट्रीयता के प्रति गौरव का भाव पैदा करते हैं इसलिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को संविधान के अनुच्छेद 1 में संशोधन के लिए उचित कदम उठाते हुए ‘इंडिया’ शब्द को हटाकर, देश को ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ कहने का निर्देश देने की मांग की गई है। यह अनुच्छेद इस गणराज्य के नाम से संबंधित है। याचिका में कहा गया है कि संविधान में यह संशोधन इस देश के नागरिकों की औपनिवेशिक अतीत से मुक्ति सुनिश्चित करेगा। याचिका में 1948 में संविधान सभा में संविधान के तत्कालीन मसौदे के अनुच्छेद एक पर हुई चर्चा का हवाला दिया गया है जिसमें उस समय देश का नाम ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ रखने पर ज़ोर दिया गया था।
Name of Sagar , Article - Dr Sharad Singh, Dainik Jagaran, 04.06.2020
      विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्ज़ा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। अभी कुछ अरसा पहले विश्वविख्यात जैन संत आचार्य विद्यासागर ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे हैं और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया है। 
भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ़ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया था कि ‘इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।’ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं ताकि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि  ‘हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?’ उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जिसके कारण सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया, क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ‘इंडिया दैट इज़ भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ‘गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ और ‘भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है। उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है।

   ठीक ऐसे ही गुलामी की छाप से मुक्ति की प्रतीक्षा है सागर को। सागर के नाम की स्पेलिंग बहुप्रचलन के अनुरुप सही और सरलीकृत किए जाने की यह प्रतीक्षा कोई नई नहीं है। वर्षों व्यतीत हो गए बाट जोहते। लेकिन इस मुद्दे पर कोई पुरजोर प्रयास नहीं किया गया। सबसे अधिक परेशानी तब आती है जब कोई व्यक्ति सागर आने के लिए या सागर से जाने के लिए रेलवे रिजर्वेशन कराता है तो उसे रेलवे की साईट पर सागर ढूंढने पर भी नहीं मिलता है। दरअसल, अंग्रेजी में सागर की प्रचलित स्पेलिंग है ‘एस ए जी ए आर’। राज्य शासन में भी यही स्पेलिंग मान्य है। लेकिन अंग्रेजों ने इसे अपने उच्चारण के हिसाब से ‘साउगोर’ कहा। यानी स्पेलिंग रखी-‘एस ए यू जी ओ आर’। सेना छावनी तथा रेलवे में यही स्पेलिंग चलाई गई, जो आज भी कायम है जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आम व्यवहार में यह स्पेलिंग भारतीय उच्चारण के अनुरुप सरलीकृत हो कर सागर यानी ‘एस ए जी ए आर’ हो गई। आज पत्राचार से लेकर इंटरनेट की विभिन्न साईट्स में सागर की यही स्पेलिंग काम में लाई जा रही है। यह उच्चारण और शब्दों के अनुरुप है तथा लिखने में भी सरल है। फिर भी भारतीय रेलवे में आज भी सागर की स्पेलिंग अंग्रेजों वाली ‘साउगोर’ ही चल रही है। जिससे होता ये है कि जब किसी को सागर के लिए रेलगाड़ियों की जानकारी अथवा रिजर्वेशन कराना होता है तो प्रचलित स्पेलिंग से मध्यप्रदेश में स्थित यह सागर स्टेशन मिलता ही नहीं है। प्रायः कर्नाटक स्थित शिव सागर मिल जाता है। जिससे बड़ा भ्रम उत्पन्न हो जाता है।

    जिस प्रकार देश के दो नामों में से मात्र ‘भारत’ किए के पक्ष में याचिका दायर की गई है उसी प्रकार सागर के नाम की स्पेलिंग ‘साउगोर’ और ‘सागर’ में से हर स्थान पर ‘सागर’ (एस ए जी ए आर) ही होनी चाहिए। संदर्भगत उल्लेखनीय है कि इस लेख की लेखिका (डाॅ शरद सिंह) यानी मैं स्वयं सागर के नाम की अंग्रेजी स्पेलिंग सुधारे जाने के लिए विगत 5 वर्ष से आवाज उठा रही हूं। मेरी इस मांग को संज्ञान में लेते हुए चिंतक एवं समाजसेवी रघु ठाकुर ने भी अपनी ओर से प्रयास किया और दिल्ली रेल मंत्रालय को भी पत्र लिखा। इस संबंध में सांसद राज बहादुर सिंह ने भी आश्वस्त किया था कि वे इस दिशा में प्रयास करेंगे। मार्च 2020 में इस संबंध में निर्णय होने की संभावना थी किंतु कोरोना संकट के चलते इस कार्य में फिलहाल व्यवधान आ गया है। अब जरूरत है इस संबंध में पुरजोर आवाज़ उठाए जाने की। सच तो यह है कि जनआंदोलन के अभाव में ‘सागर’ वल्द ‘भारत’ आज भी ‘साउगोर’ वल्द ‘इंडिया’ के रूप में गुलामी की छाप ढो रहा है।        
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(दैनिक जागरण में 04.06.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, May 20, 2020

लोग कोरोना त्रस्त, अपराधी अपराध में मस्त - डाॅ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh

लेख 

लोग कोरोना त्रस्त, अपराधी अपराध में मस्त
  - डाॅ. शरद सिंह

         बुंदेली में एक कहावत है कि ‘एक तो दूबरे ऊपे से दो असाढ़ें’। यानी एक तो पहले ही बड़ा गहरा संकट और उस पर एक और संकट आ जाना। कोरोना महामारी से बढ़ कर इस समय कोई संकट नहीं है। यह एक ऐसा संकट है जिसने सभी लोगों को एक ही नाव पर सवार कर दिया है। सोशल डिक्टेंसिंग, प्रवासी मजदूरों का सैंकड़ों की तादाद में सागर, दमोह, टीकमगढ़ से हो कर गुरज़ना। शहर के भीतरी तबके में कोरोना ब्लास्ट। कुलमिला कर संकटों की कोई कमी नहीं। लम्बे हो चले लाॅकडाउन से उकताई हुई जनता। बिना थके डटे हुए कोरोना वारियर्स। इस सारे परिदृश्य के बीच निरंतर बढ़ते अपराध के आंकड़े देख कर अपराधियों को कोसने का मन करता है। एक तो लोग पहले से परेशान हैं और उस पर आए दिन चोरों के धावे। इन चोरों, अपराधियों को शर्म भी नहीं आती है क्या? पुलिसतंत्र जनता की सुरक्षा हेतु लाॅकडाउन को टूटने से बचाने, आमजन की मदद करने में व्यस्त है। अब महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों से उत्तर प्रदेश के लिए सागर से हो कर गुज़रने वाले प्रवासी श्रमिकों को सुरक्षित उत्तर प्रदेश की सीमा तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी पुलिस पर ही है। अब वे कोरोना से जुड़ी व्यवस्थाएं सम्हालें या चोरों और अपराधियों के पीछे भागें? जब पूरा शहर, पूरा समाज, पूरी मानवता जीवन-संकट के दौर से गुज़र रही हो तब अपराध घटित होना मानवता पर दाग़ लगने के समान है। 
सागर शहर के भगवानगंज इलाके में आॅटोपार्टस और हार्डवेयर की कई छोटी-बड़ी दूकानें हैं। उनमें से एक दूकान में पिछवाड़े से दरवाज़ा तोड़ कर अज्ञात बदमाश घुस गए। उन्होंने दूकान के लाॅकर में रखे एक लाख सत्तर हज़ार रुपयों पर हाथ साफ़ कर दिया। भगवानगंज से ही लगे हुए इलाके सदर में एक सूने मकान से चोरों ने लगभग 80 हज़ार रुपए के सोने-चांदी के ज़ेवर चुरा लिए। उल्लेखनीय है कि यह सदर क्षेत्र इनदिनों कोरोना ब्लास्ट का केन्द्र होने और कंटनमेंट जोन बनने के कारण 24 घंटे पुलिस की सख्त निगरानी में है। जिनके घर से जेवर चोरी गए वे दम्पत्ति पिछले दो माह से शहर से बाहर थे। इसी सप्ताह घर लौटने पर उन्हें वरदात का पता चला। चोरों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने सागर शहर के ही मोतीनगर थाना क्षेत्र में एक दालमिल के निकट के एक मंदिर के ताले तोड़ कर दानपेटी में रखी नगदी उड़ा दी। विडम्बना यह कि एक ओर मंदिर पुजारी संघ मंदिरों पर ताले डल जाने के कारण उत्पन्न अपने आर्थिक संकट के बारे में सरकार से गुहार लगाने को विवश हो गया और वहीं दूसरी ओर चोर-मंडली मंदिरों की दानपेटियों पर धावा बोल रही है। 
टीकमगढ़ में तो शराबी सीधे पुलिस से ही भिड़ गए। हुआ यूं कि लाॅकडाउन के कारण लोग अपने-अपने घरों में थे मगर कुंवरपुरा रोड स्थित ब्राह्मण कॉलोनी के सामने एक मकान में कुछ युवक शराब पीकर मोहल्ले में गाली-गलौज करने लगे। मना करने पर वे युवक लड़ने के लिए उतारू हो गए तो मोहल्ले के लोगों ने डायल 100 को सूचना दी। पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उन्हें थाने चलने को कहा तो वे पुलिस से ही भिड़ गए।

बात अपराधियों के हौसलों की कही जाए तो दमोह के गैसाबाद थाना के हिनौता कला में एटीएम में की गई डकैती की चर्चा आएगी ही। हिनौता कला में रात 9.05 बजे एटीएम बूथ में लूट की वारदारत को फिल्मी स्टाईल अंजाम दिया गया। एटीएम बूथ में लूट की वारदात को अंजाम देने के लिए पहुंचे बदमाशों ने पहले बूथ में डायनामाइट फिट किया फिर उसमें बाइक से तार जोड़कर विस्फोट किया। शायद उन्हें इस बात की जानकारी थी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे बंद हैं। विस्फोट के कारण एटीएम में रखे रुपए हवा में उड़ने लगे। अपराधी उन्हें बटोरने में जुट गए। उसी दौरान ग्रामीणों ने विस्फोट की आवाज़ सुन कर एटीएम की ओर रुख किया लेकिन डकैतों ने माउजर लहरा कर ग्रामीणों को धमकाया और वहां से रुपए ले कर निकल गए।
लाॅकडाउन के कारण अपराध का ग्राफ कुछ तो नीचे आया क्योंकि इस दौरान अधिकांश घर सूने नहीं रहे। लेकिन दूकानें चोरों कें लिए आसान निशाना रहीं। इस दौरान एक और तरह का अपराध तेजी से बढ़ा है। राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी और मार्च की तुलना में अप्रैल में महिलाओं संबंधी साइबर क्राइम की संख्या बढ़ी है। 25 मार्च से 25 अप्रैल तक साइबर अपराध की कुल 412 शिकायतें मिली हैं जिनमें 396 शिकायतें अश्लील प्रदर्शन, अश्लील वीडियो, धमकी, फिरौती की मांग से लेकर ब्लैकमेल करना तक की थीं।  महिलाओं की तस्वीरों में छेड़-छाड़ कर उनकी मॉर्फ्ड तस्वीरों को इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दिए जाने संबंधी शिकायतें मिलीं। जब पूरा देश बंद है, लोग घर से काम कर रहे हैं और इंटरनेट पर काफी समय बिता रहे हैं तो साईबर अपराधी भी सक्रिय हो गए हैं। हर किसी को जो इंटरनेट से जुड़ा है उसे भी सतर्क रहना होगा। 

लाॅेकडाउन 1.0, 2.0, 3.0 और अब 4.0 में आम जन-जीवन की अधिकांश गतिविधियां बंद रहीं लेकिन अपराधियों की गतिविधियां इस दौरान भी ज़ारी रहीं। चरित्र पर संदेह के कारण हत्या, आपसी रंजिश के कारण हत्या, बेटे द्वारा पिता की हत्या, प्रेमियों द्वारा आत्महत्या, आर्थिक तंगी से परेशान हो कर आत्महत्या, बलात्कार, मारपीट, चोरी-डकैती थमी नहीं। क्योंकि लोग कोरोना से त्रस्त है और अपराधी अपराध में मस्त हैं। 
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(दैनिक जागरण में 20.05.2020 को प्रकाशित)
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