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Tuesday, June 23, 2026

पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य  - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।

भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी  कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।

यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।

यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला  ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।

“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं।  विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।

कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/-  साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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