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Tuesday, September 16, 2025

पुस्तक समीक्षा | भावनाओं की प्रखरता है मनीष जैन की कविताओं में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

'आचरण' में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा 
 पुस्तक समीक्षा

भावनाओं की प्रखरता है मनीष जैन की कविताओं में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - कुछ कही : कुछ अनकही 
कवि       - मनीष जैन
प्रकाशक  - 63/1, कटरा बाजार, सागर (म.प्र.)
मूल्य       - 200/-
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काव्य अभिव्यक्ति का सबसे कोमल माध्यम होता है क्योंकि यह भावनाप्रधान होता है। यदि यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि हर व्यक्ति के भीतर एक कवि मौजूद होता है। कभी व्यक्ति अपने भीतर के कवि को पहचान लेता है और अपनी भावनाओं तादात्म्य स्थापित कर लेता है। तब काव्य उसकी भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता है। कवि मनीष जैन ने भी अपने मन की कोमल भावनाओं को पहचान कर उन्हें काव्यात्मक अभिव्यक्ति का रूप दिया है। फिर भी हर अभिव्यक्ति कभी पूरी नहीं होती है, बहुत कुछ कहने पर भी बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। इसी भाव के आधार पर है कवि मनीष जैन का काव्य संग्रह ‘‘कुछ कही: कुछ अनकही’’। 

10 मार्च 1975 सागर, मध्य प्रदेश में जन्मे मनीष जैन ने डॉ. हरीसिंह गौर वि.वि. से  बी. फार्मा तथा इंदौर आई.पी.एस. से एम.बी.ए. किया है। वर्तमान में वे ज्ञानवीर विश्वविद्यालय, सागर के कुलसचिव के पद पर कार्य कर रहे हैं। प्रस्तावना में मनीष जैन ने लिखा है कि “मैंने अपने गुजरे कल से आज तक के सफर में जो देखा, सुना, महसूस किया, ख्वाबों खयालों से, चर्चाओं से, किताबों से कुछ जाना कुछ माना और जिसको लिखा मैंने, जैसे सागर में मिलती नदियां हों, नदियों में घुलती श्रद्धा हो, सागर की गहराई में सीप हों, सीपों में छुपे मोती हों, सागर के लहरों का संगीत हो, संगीत में मचलते पैर हों, पैर के निशान बनती रेत हो, रेत के ढलते आशियां हो, आशियां में बसते ख्वाब हों, ख्वाबों के टूटने पर आँसु हों, आँसुओं में धुंधले होते चेहरे हों, चेहरे जो कुछ पराये कुछ अपने हों, अपनों से कुछ कहीं कुछ अनकही बातें हों।” उनके इस उद्गार से उनकी कविताओं की भाव भूमि का स्पष्ट पता चलता है। 
मनीष जैन की कविताओं में जीवन दर्शन है और विचारों की परिपक्वता भी। उनकी कविताओं की प्रकृति बताती है कि वे सप्रयास कुछ नहीं लिखते, कविताएं स्वतः उनके मन से प्रवाहित होती है। यह कविता देखिए- 
शब्द नहीं है पास मेरे 
सागर को सागर कहना है
सूरज को सूरज कहना है 
अवतार को भगवन कहना है
इस जीवन का सार बता दे 
परदा है पर पार बता दे 
उनकी अमृत वाणी को 
प्यास सभी की कहना है
आशीष ही जिनकी दौलत है उनकी 
कल्याण करे जो जग का
उनके चरण कमल को 
जग का साहिल कहना है
दिल की करनी को जो बदल दे
आँखों की तस्वीर बदल दे 
ऐसी गीता को भाग्य विधाता कहना है।

कवि मनीष जैन अपनी कुछ कविताओं में नास्टैल्जिक हो उठते हैं और स्वयं को लक्षित कर के स्वयं से ही प्रश्न करते हैं। जैसे यह कविता है-
मैं अकेला ही खड़ा था जंग के मैदान में 
मेरी लड़ाई खुद से थी 
जंग के मैदान में मैं क्या हूँ एक प्रश्न है
मुझसे क्या चाहते हैं बड़ा प्रश्न है
मैं जो हूँ प्रश्न ही नहीं है
हो रहे हैं प्रश्न के प्रहार मुझ पर
जंग के मैदान में
पहचान खुद की खो चुकी है
आँख कई बार रो चुकी है
आडंबर का अंबर सर्वव्याप्त है
यथार्थ की धरा लुप्त हो चुकी है
जंग के मैदान में
तुम्हारे अंदर की लौ अब बुझ चुकी है
जाने क्या वजह है कि
जलने की चाह भी रूक चुकी है जंग के ।

वस्तुतः स्वयं से जंग तभी थमती है जब व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है, पूरी तरह से नहीं फिर भी आंशिक पहचान का हो जाना भी स्वयं को पहचानने से कम नहीं होता है। कवि मनीष जैन जीवन के यथार्थ को स्वीकार कर लेने का आग्रह करते हैं। यूं भी सत्य को स्वीकार कर लेने से बड़ी और कोई स्वीकार्यता नहीं होती है। जब स्वयं की पहचान हो जाती है तो भावनाएं भी किसी ग़ज़ल की अभिव्यक्ति सी संवेदनात्मक हो जाती हैं-
सच तो सच है 
पर आज सच को भी सहारा चाहिए 
आइना तुम्हे तुमसा ही दिखाएगा 
कभी खुद को औरों में भी ढूँढ़ना चाहिए 
बुढ़ापे की झुर्रियों में है छुपे कई साल देखो 
एक सवाल के तुम्हें बोलो कितने जवाब चाहिए 
किसी की यादों का झोंका गर 
आँखो में आँसू ला दे 
कागज को रूमाल बनाकर 
गजल कोई लिख देना चाहिए।

मनीष जैन ने एक ऐसे विषय को अपनी कविता का विषय बनाया है जिस पर चिंतन किया जाना आवश्यक है। यह विषय है आत्मघात अथवा आत्महत्या। कोई इंसान किन मानसिक परिस्थितियों में पड़ का आत्मघाती कदम उठाता है इसे समझने का प्रयास प्रायः कम ही किया जाता है। लोग परिणाम देखते हैं और निष्कर्ष गढ़ने लगते हैं। किन्तु मनीष जैन उस तह को टटोलते हैं जहां किसी भी प्रकार की प्रबल विवशता आत्मघात के लिए उकसाती है-
कितना मजबूर वो इंसा होगा 
खुद को मारने को जो मजबूर होगा 
यूँ ही नहीं रूठ जाता किसी से कोई
दरम्याँ उनके कोई मसला जरूर होगा
जिसका हुनर ही उसका अभिशाप बन गया 
वो हाथ कटा ताज का मजदूर होगा 
बिछड़ते वक्त उसकी आँख में आँसू नहीं थे 
हर वादे की तरह यह वादा भी उसने निभाया होगा 
खुशियाँ जिंदगी में है मृग तृष्णा की तरह
हर नये कदम के साथ लक्ष्य और दूर होगा 

संग्रह में दार्शनिक तीव्रता की कविताएं ही नहीं वरन छायावादी भाव की कविताएं भी हैं जैसे यह कविता देखिए- 
आज रात चांद सोया नहीं 
जागते-जागते सुबह हो गई 
ना जाने उसे किसका था इंतजार 
इसी इंतजार में सुबह हो गई 

मनीष जैन का यह प्रथम काव्य संग्रह है जो कवि में मौजूद अपार संभावनाओं की ओर स्पष्ट संकेत करता है। संग्रह की कविताओं में शिल्पगत शिथिलता अथवा कच्चापन अवश्य है किन्तु भावनाओं की प्रखरता ने उन्हें परिपक्वता प्रदान किया है जिससे सभी कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। ‘‘कुछ कही: कुछ अनकही’’ काव्य संग्रह में छोटी-बड़ी कुल 50 कविताएं हैं। शिल्प की दृष्टि से बेशक ये कविताएं अनगढ़ प्रतीत हो सकती हैं किंतु इनमें शब्दों का सुघड़ संयोजन एवं भावों का स्पष्ट प्रस्तुतिकरण है। जैसाकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि ‘‘काव्य भावना प्रधान होता है अतः कला पक्ष का तीव्र आग्रह कभी-कभी शिथिल भी हो सकता है।’’ बस, अनेक स्थानों पर प्रूफ का दोष खटकता है। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि संग्रह की कविताएं पढ़े जाने के बाद देर तक चेतना के परिसर में टहलती हुई अनुभव होती हैं और यही खूबी इन्हें पठनीय बनाती है।  
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(16.09.2025 )
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