Wednesday, April 29, 2026

चर्चा प्लस | तपते ट्रैफिक सिग्नल्स पर एक अदद छांव की जरूरत | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
तपते ट्रैफिक सिग्नल्स पर एक अदद छांव की जरूरत        
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह      
                                                                   
    गर्मियों के दिनों में ट्रैफिक लाइन पर खड़े होकर लाल बत्ती के हरे होने का इंतजार करना कितना मुश्किल होता है, यह वही लोग समझ सकते हैं जो दोपहिया वाहन पर ट्रैफिक लाइन पर खड़े रहते हैं। हेलमेट गर्म हो जाते हैं, शरीर जलने लगता है और छोटे बच्चे धूप की तीव्रता से घबरा जाते हैं। शहरी नियोजन के लिए चार पहिया वाहनों पर सवार होकर निकलने वाले लोग इसे नहीं समझ सकते। अगर वे एक बार अपने दोपहिया वाहन पर सवार होकर चिलचिलाती धूप में ट्रैफिक लाइन पर खड़े हों, तो निश्चित रूप से उन्हें आम जनता को धूप से बचाने के अच्छे विचार आने लगेंगे। यह आम जनता के हित में ही है, जिनके करों के भुगतान से ही नगर नियोजन साकार होता है। तो आइए इस बारे में सोचें।

    शहर में चाहे किसी बड़े नेता को आना हो या फिर कोई बड़ा त्योहार हो, सड़कें और चौराहे रंग-गिरंगे झंडों, बैनर्स और फ्लेक्स से सज जाते हैं। यहां तक कि किसी नेता या उसके सुपुत्र का जन्मदिन हो तो बैनर और कटआउट हर चौराहे की शोभा बढ़ाने लगते हैं। अपनी प्रसन्नता को प्रकट करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन उसी खर्चे में से थोड़ा पैसा बचा कर आम पब्लिक के लिए एक अदद छाया उपलब्ध कराई जा सकती है। वैसे इसका पहला दायित्व है नगरनिगम, नगर पालिका का वं सड़क व्यवस्था वालों को। यदि कोई ट्रैफिक लाईट का उल्लंघन कर दे तो उस पर तुरंत हरजाना लगता है। चालान घर पहुंच जाता है। लेकिन यदि कोई ट्रैफिक सिग्नल पर कड़ी धूप में रुके रहने के कारण चक्कर खा कर गिर जाए तो उसका हरजाना कौन भरेगा? लेकिन यहां बात हरजाने के पैसों की नहीं उस सुविधा को उपलब्ध कराए जाने की कर रही हूं जिससे किसी को चक्कर आने की नौबत ही न आए। हरजाना सेहत से बढ़ कर नहीं होता है। फिर हम बुनियादी शहर सुविधाओं को पाने के लिए टैक्स चुकाते हैं लेकिन बउले में क्या मिलती है? ट्रैफिक सिग्नल्स पर चिलचिलाती धूप।

दो दिन पहले मुझे दोपहर करीब 1 बजे स्कूटी से कहीं जाना पड़ा। सिविल लाइन चौराहे पर पहुंचते ही लाल बत्ती लग गई। इस वजह से मुझे जेब्रा क्रॉसिंग से पहले ही रुकना पड़ा। देखते ही देखते मेरा हेलमेट गर्म होने लगा और हाथ जलने लगे। जबकि मैंने सूती दस्ताने भी पहन रखे थे। हवा गर्म होना शुरू हो गई थी। माथे से पसीना बहने लगा। ऐसा लगा जैसे हेलमेट उतारकर पसीना पोंछ लूँ। लेकिन ट्रैफिक सिग्नल में हेलमेट उतारने, पसीना पोंछने और फिर से पहनने का समय नहीं था। लाल बत्ती का काउंटडाउन शुरू हो चुका था। सच कहूँ तो, वहाँ खड़े-खड़े आधा मिनट भी एक युग के बराबर लग रहा था। मैंने देखा कि मेरे बगल में एक मोटरसाइकिल रुकी हुई थी, जिसे एक आदमी चला रहा था और उसकी पत्नी गोद में एक छोटे बच्चे को लिए उसके पीछे बैठी थी। पत्नी ने बच्चे का सिर अपनी पतली साड़ी से ढका हुआ था। बच्चा धूप में बेचैन हो रहा था। चार पहिया वाहन में सवार लोगों के सिर पर घनी छाया थी, तीन पहिया टेम्पो में भी छाया थी, जबकि बाइक या स्कूटी पर सवार लोगों के सिर पर केवल हेलमेट था जो धूप में चमक रहा था। थोड़ी ही देर में लाल बत्ती हरी हो गई और हम सब चौराहे से तेजी से निकल गए।

वापसी के समय भी वही स्थिति थी, उस समय लगभग 2ः00-2ः30 बज रहे थे। धूप बहुत तेज थी। फिर उसी ट्रैफिक सिग्नल पर लाल बत्ती के हरे होने का इंतजार करना पड़ा। इसी तरह, हेलमेट पहने साइकिल सवार पसीना पोंछ रहे थे। जिन साइकिलों पर छोटे बच्चे बैठे थे, वे बच्चे छटपटा रहे थे। यह सब देखकर मुझे लगा कि अगर टोल नाकों पर शेड लग सकते हैं, तो ट्रैफिक सिग्नल पर क्यों नहीं? अब ट्रैफिक सिग्नल पर भी ऐसे शेड बनाने की जरूरत है क्योंकि अब धूप बहुत तेज पड़ती है। असहनीय स्तर तक तेज। साइकिल पर चलने वालों को भी तेज धूप का सामना करना पड़ता है। अगर ट्रैफिक सिग्नल पर शेड बना दिए जाएं तो बारिश के मौसम में भी ट्रैफिक सिग्नल पर इंतजार करने वालों को अच्छी छाया मिलेगी। जिसके नीचे खड़े होकर वे बारिश में भीगने से बच सकेंगे।
 खैर, घर लौटते ही मुझे इतिहास के वे सारे पन्ने याद आने लगे जिनमें राजाओं द्वारा सड़क के दोनों ओर छायादार पेड़ लगाने का ज़िक्र मिलता है। हम राजशाही को दोष देते हैं, बेशक लोकतंत्र से ज्यादा दोष राजशाही का ही है। लेकिन उस समय आम जनता के लिए जो अच्छे काम किए गए थे, उन्हें आज भी अपनाया जा सकता है। आज हम अपने शहरों में चौड़ी और सुंदर सीसी सड़कें देखकर बहुत खुश होते हैं। सड़कों के बीचोंबीच डिवाइडर पर सुंदर सजावटी पौधे लगे होते हैं। कई जगहों पर सुंदर फूलों वाले पौधे भी लगाए गए हैं। कहीं बोगनविलिया तो कहीं कनेर। बेशक, ये सड़क और शहर की सुंदरता बढ़ाते हैं, लेकिन ये छोटे पेड़-पौधे पैदल चलने वालों को छाया नहीं देते। जब तक धूप में छाया की जरूरत होती है, तब तक सिर पर तेज धूप ही पड़ती है। अगर हमें टोल बैरियर पर टोल टैक्स चुकाते समय ही छाया पाने का अधिकार है, तो यह भी याद रखना चाहिए कि हम शहर की सड़क के रखरखाव के लिए भी टैक्स देते हैं। इस तरह हमें सड़क पर कहीं भी छाया पाने का अधिकार है।

आज स्थिति यह है कि शहरों के चौराहों में इतनी जगह नहीं बची है कि हम उसके आसपास छायादार पेड़ लगा सकें। यद्यपि ये पेड़ ट्रैफिक सिग्नल पर रुकने वालों को तो छाया नहीं दे सकेंगे लेकिन उस क्षेत्र के तापमान को संतुलित कर सकेंगे। किन्तु अब यह संभव नहीं हो सकता है अतः विकल्प यही बचता है कि बढ़ते हुए तापमान और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए शहर के चौराहों के ट्रैफिक सिग्नल पर शेड बनाने का काम करें। बेहतर है कि इसके लिए सिंथेटिक टाट लगाने के बजाए वैसा परमानेंट शेड बनाया जाए जैसा टोल नाकों पर होता है। जमीनी सच्चाई यह है कि शहर के योजनाकार ट्रैफिक सिग्नलल्स पर धूप में नहीं तपते बल्कि अपनी एसी गाड़ियों में ठहरते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। उन्हें उस कष्ट का न तो अनुमान होता है और न एहसास जो आम पब्लिक को भोगना पड़ता है। अगर नगर योजनाकार और शहर को सुंदर बनाने वाले एक बार अपनी चार पहिया गाड़ियों से उतरकर दो पहिया वाहनों पर सवार होकर तेज धूप या भारी बारिश में ट्रैफिक सिग्नल बदलने का इंतजार करें, तो उन्हें भी राहगीरों को आराम देने वाले कई विचार आने लगेंगे।
दरअसल, शहरी नियोजन के लिए तैयार किया गया ग्रीन मिशन इस दिशा में काफी मददगार साबित हो सकता है। इसे फरवरी 2014 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से हमारे देश के जैविक संसाधनों और उनसे जुड़ी आजीविका की रक्षा करना और पारिस्थितिक स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण और खाद्य, जल एवं आजीविका सुरक्षा पर वानिकी के महत्वपूर्ण प्रभाव को पहचानना था। लेकिन हम देख सकते हैं कि 2014 से 2024 और अब 2026 हो गया है लेकिन ग्रीन मिशन आज भी पूरी तरह लागू नही किया गया है। शहरी क्षेत्र बढ़ते जलवायु जोखिमों और मानव सुविधा एवं पर्यावरणीय न्याय के लिए बढ़ते खतरों का सामना कर रहे हैं। तापमान में वृद्धि के माध्यम से देशों पर नकारात्मक दशकीय परिणाम डालने वाले चार प्रमुख वैश्विक जोखिमों में से तीन मुख्य रूप से पर्यावरणीय हैं - प्राकृतिक आपदा, चरम मौसम और जैव विविधता का नुकसान, और चौथा जलवायु कार्रवाई की विफलता है। इन चुनौतियों से निपटने के प्रयासों में, हरित (जैसे पेड़, पार्क, उद्यान, खेल के मैदान और वन) और नीले (समुद्र, नदियाँ, झीलें, आर्द्रभूमि और जल उपयोगिताएँ) क्षेत्रों की संभावित भूमिका पर ध्यान दिया जा रहा है, जिसे अक्सर हरित और नीली अवसंरचना की अवधारणा के माध्यम से समझा जाता है।

60-70 साल से ज्यादा उम्र के लोग यही कहते हैं कि जो तापमान पहले मई-जून में होता था, वह अब मार्च-अप्रैल में ही हो जाता है। अप्रैल के आखिरी सप्ताह में ही तापमान का 40 डिग्री से ऊपर चले जाना इस बात का साफ संकेत है कि मई और जून में तापमान आसानी से 47 डिग्री से ऊपर चला जाएगा। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। अप्रैल के मध्य तक, सागर, भोपाल जैसे शहर में तापमान 40 डिग्री से ऊपर जा चुका है। चल रही स्टडी में यह भी सामने आया कि 1961-2020 के दौरान अप्रैल से जून के बीच, 103 में से ज्यादातर मौसम केंद्रों ने लू (हीट वेव) की बारंबारता में काफी बढ़ोतरी दर्ज की। इसका एक मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन को माना जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, हर दो दशक में तापमान में 10-14 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है। अगर इसी रफ्तार से बढ़ोतरी होती रही, तो सन 2030-35 के आस-पास गर्मी 50 डिग्री तक पहुँच सकती है।

छोटे और बड़े शहरों में गर्मियों में स्थिति, गाँवों या खुले इलाकों के मुकाबले ज्यादा खराब हो जाती है। कई शहरों को अब ‘‘अर्बन हीट आइलैंड’’ या ‘‘हीट आइलैंड’’ कहा जाने लगा है। अगर हवा की रफ्तार कम हो, तो शहरों को आसानी से ‘‘अर्बन हीट आइलैंड’’ बनते हुए देखा जा सकता है। क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे क्या वजहें हैं? इसकी वजह यह है कि शहरों में पेड़ काटे जा रहे हैं और ऊँची-ऊँची इमारतें बढ़ती जा रही हैं। इन ऊँची इमारतों में तापमान बदलने वाले शीशे लगे होते हैं, जिनसे टकराकर गर्मी की लहरें वापस एक-दूसरे की तरफ लौट आती हैं। इसकी वजह से इमारतों के बीच की जगह, यानी सड़कें, गलियाँ वगैरह, गर्म हवाओं की नदी बन जाती हैं। वैज्ञानिक इस स्थिति को कठिन भाषा में समझाते हैं, लेकिन मैं इसे सीधे, सरल और संक्षिप्त रूप में बता रहा हूँ कि हम इमारतों के बीच की सड़कों से गुजरते हुए तेज गर्मी की मार झेलते रहते हैं। इस तरह की गर्मी देर रात तक कम नहीं होती। फिर, जब तक यह तापमान कम होता है, तब तक अगले दिन का सूरज आग बरसाना शुरू कर देता है। न केवल इमारतों के शीशे गर्मी बढ़ाते हैं, बल्कि एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्मी भी वातावरण का तापमान बढ़ा देती है। जिसके कारण इमारत के अंदर तो चाँद जैसी ठंडक महसूस होती है, लेकिन इमारत के बाहर मंगल ग्रह जैसी गर्मी महसूस की जा सकती है। हमने पेड़ों को काटकर, तापमान में संतुलन बनाए रखने के लिए पृथ्वी की वर्षों की कड़ी मेहनत को बर्बाद कर दिया है। असल में, बाहर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए किसी बड़ी तकनीक की जरूरत नहीं है। केवल छायादार पेड़ों की जरूरत है। हम वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में शोध के माध्यम से ऐसे पेड़ों को तेजी से उगा सकते हैं और इस तरह अपनी गलती सुधार सकते हैं।

शहरी नगर नियोजन को केवल ऊंची इमारतें बनाना या चौड़ी सड़कें बनाना नहीं कहा जा सकता। शहरी नगर नियोजन में जल और हरियाली की व्यवस्था सभी के लिए आवश्यक है। किसी बड़े शहर में एक छोटे से क्षेत्र में शहरी वन विकसित करना तर्कसंगत नहीं है। 60 लाख से 1 करोड़ की आबादी वाले शहर में कम से कम 4 शहरी वन विकसित करना आवश्यक है। तभी शहर का तापमान संतुलित रह सकता है और नागरिकों को बेहतर वातावरण मिल सकता है। लेकिन इससे भी छोटा और तत्काल आवश्यक कार्य है यातायात मार्ग में शेड बनाना, और टोल बैरियर शेड इसके लिए सबसे अच्छा उदाहरण हैं। सहायक सड़क के दोनों ओर घने छायादार पेड़ लगाने का कार्य भी किया जा सकता है, जिनका फैलाव केवल फुटपाथ तक ही हो, ताकि यातायात में कोई समस्या न हो और पैदल चलने वालों को जरूरत पड़ने पर छाया मिल सके। इसलिए, हरियाली अपनाएं और ठंडक का आनंद लें। 
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(दैनिक, सागर दिनकर में 29.04.2026 को प्रकाशित)  
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