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Wednesday, October 17, 2018

चर्चा प्लस ... रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा - डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा
- डॉ. शरद सिंह

बुंदेलखंड में दशहरा मनाने की भी अपनी अलग परम्पराएं हैं। इस दिन सुबह से नीलकंठ के दर्शन करना अच्छा माना जाता है। इसी तरह मछली को देखना भी शुभ माना जाता है। इसीलिए कुछ लोग मछली ले कर भी घर-घर जाते हैं और मछली के दर्शन करा कर नेंग मांगते हैं। दशहरे पर पान के बीड़े के बिना तो काम ही नहीं चलता है। सागर नगर में सागरझील यानी लाखा बंजारा झील में रावण को नाव पर स्थापित कर के दहन किए जाने की परम्परा रही है। दरअसल, कई रोचक परम्पराएं त्योहारों को भी अधिक रोचक बना देती हैं और कभी-कभी कुछ परम्पराएं जानबूझ कर छोड़ दी जाती हैं, ताकि त्योहार अच्छे और अहिंसक संदेश दे सकें। 
चर्चा प्लस ... रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा - डॉ. शरद सिंह  ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper

मुझे अच्छी तरह से याद है, जब मैं छोटी थी तो दशहरे का उत्साह किस तरह चारों ओर व्याप्त हो जाता था। उन दिनों मैं सागर संभाग के पन्ना नगर में रहती थी। वह मेरी जन्मस्थली भी है। हिरणबाग कहलाती थी वह कॉलोनी जहां गिनती के छः सरकारी क्वार्टर्स थे। उन्हीं में दायीं ओर का आखिरी क्वार्टर मेरी मां के नाम एलॉट था। मेरी मां डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ पन्ना में मनहर गर्ल्स हायर सेंकेंड्री स्कूल में हिन्दी की व्याख्याता थीं। मेरी मां का बचपन मालवा में बीता था। वे मालवा की बेटी रहीं और मैं बुंदेलखंड की बेटी। दो अंचलों की संस्कृतियों के प्रभाव में मेरा आरम्भिक बचपन बीता। लेकिन पैदायशी ही बुंदेलखंड का पानी तो मेरी रगों में खून बन कर दौड़ने लगा था। मुझे अच्छा लगता था अपने शहर का दशहरा उत्सव। बहुत ही भव्य आयोजन होता था। छत्रसाल पार्क के सामने वाले बड़े से मैदान में बहुत बड़ा रावण बनाया जाता था। उस समय की मेरी दो-ढाई फुट के क़द के हिसाब से रावण कुछ ज़्यादा ही बड़ा दिखता रहा होगा मुझे। बहरहाल, घर की दीवारों पर ‘व्हाईटवॉश’ (जो कि पी.डब्ल्यू. डी. की कृपा से होता था) और आंगन में गोबर से लिपाई जो कि मां स्वयं अपने हाथों से करती थीं, जिसमें मैं भी हाथ बंटाने का प्रयास करती और डांट खाती थी। इन सबके बीच प्रतीक्षा रहती थी दशहरे की उस रात की जिसमें रावण दहन किया जाता था। रामलीला वाले राम और लक्ष्मण धनुष ले कर आते थे। पन्ना राजपरिवार से तत्कालीन महाराज नरेन्द्र सिंह आते थे। अच्छा-खासा मेला भर जाता था। तरह-तरह की दूकानें, झूले और हम बच्चों के लिए ढेर सारा आकर्षण। दशहरा मैदान मेरे घर से लगभग पचास कदम की दूरी पर था। यानी कॉलोनी के कैम्पस से निकलो और दशहरा मैदान सामने नज़र आता था। छोटे शहरों के यही तो फायदे होते हैं। सब कुछ आस-पास।
मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह अपने मामा कमल सिंह की उंगली पकड़ कर दशहरा मैदान पहुंचते थे। फिरकी, गुब्बारे, सीटी, चूड़ी और न जाने क्या-क्या ले डालते थे हम लोग। उस जमाने की हमारी गंभीर शॉपिंग होती थी हम दोनों बहनों की। नहीं, विशेष रूप से मेरी। मेरी तुलना में वर्षा दीदी को शॉपिंग का शौक़ हमेशा कम ही रहा है। आज भी वे मुझसे पीछे रहती हैं। मुझे आज भी याद है कि किस तरह पन्ना महाराज राम और लक्ष्मण का तिलक करते थे और फिर राम बना रामलीला का कलाकार धनुष में तीर चढ़ता था। जब तीर के नुकीले सिरे पर आग लगा दी जाती थी तो वह जलता हुआ तीर रावण के पुतले की ओर छोड़ देता था। तीर लगते ही रावण का पुतला धू-धू कर के जल उठता था और हम सभी बच्चे प्रफुल्लित हो कर तालियां बजाने लगते थे।
घर लौटने पर मां आरती की थाली सजा कर मामा जी की आरती उतारती थीं, यह कहती हुईं कि -‘‘मेरा भाई रावण को मार कर आया है।’’ इसके बाद हमारे घर में परम्परागत शस्त्रपूजा होती थी। मुझे उस तलवार की धुंधली स्मृति है जो मेरे बचपन में शस्त्र के रूप में पूजी जाती थी लेकिन बाद में मेरे नानाजी जो गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, घर में शस्त्रपूजन बंद करा दिया और उस तलवार को हंसिए में ढलवा दिया गया जो वर्षों तक रसोईघर में सब्ज़ी काटने के काम आता रहा। हमारे परिवार में मांसाहार नानाजी के समय से ही बंद कर दिया गया था। वे घोर अहिंसावादी थे। इसलिए बलि के प्रतीक स्वरूप कुम्हड़े को काटा जाता था किन्तु बाद में यह भी उचित नहीं लगा। नानाजी को लगा कि भले ही हम कुम्हड़े को काट रहे हैं किन्तु मन में बलि की कल्पना होने से हिंसा की भावना तो बनी रहेगी। अतः वह परम्परा भी समाप्त कर दी गई। बस, परस्पर पान की बीड़ा दिए जाने की परम्परा यथावत चलती रही।
यह सारी बातें मुझे इसलिए याद आ रही हैं क्यों कि पिछले दिनों झांसी प्रवास के दौरान मुझे हमीरपुर के विदोखर गांव के दशहरे के बारे में पता चला। कोई दशहरा इतना रक्तरंजित भी हो सकता है, यह जान कर मुझे हैरानी हुई। विदोखर में दशहरा मनाने की अपनी एक अलग ही परम्परा है। विदोखर में दशकों पहले हजारों लोग सवा मन सोना लुटाकर दशहरा मनाते थे। इस गांव में वह कुआं और राहिल देव मंदिर आज भी मौजूद है, जहां नरसंहार के बाद सोना लुटाए जाने की परंपरा शुरू हुई थी। यहां उन्नाव के गांव डोंडियाखेड़ा के लोग सोना लुटाने में अहम भूमिका निभाते थे। आपको याद दिला दूं कि यह वही जगह है जहां दो-तीन साल पहले संत शोभन सरकार ने सोने का खजाना जमीन में दबे होने का दावा किया था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भारी हंगामा छाया रहा था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि औरंगजेब के समय विदोखर के ठाकुरों को बलात् मुसलमान बनाया गया था। जिन्हें बगरी ठाकुर कहा जाता था। लगभग 530 वर्ष पहले उन्नाव के डोंडियाखेड़ा से ठाकुर बड़ी संख्या में यहां व्यापार के लिए जाते थे। ठाकुरों का यह जत्था एक बार हमीरपुर के इसी विदोखर गांव से गुजर रहे था, तभी कुआं देख पानी पीने के लिए रुक गए। इसी दौरान बगरी ठाकुर समाज के कुछ युवक यहां पहुंच गए। बगरी ठाकुर युवकों ने डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों को कुए से पानी नहीं पीने दिया और मारपीट कर डाली। अपने अपमान से हो कर डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने बगरी ठाकुरों को सबक सिखाने की ठान ली। विदोखर में बगरी ठाकुर और आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर दशहरे का जश्न मनाते थे। इसी दौरान उन्नाव के डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने योजना के साथ बगरी ठाकुरों पर हमला बोल दिया। अचानक हमले से दशहरे के जश्न में डूबे बगरी ठाकुर संभल नहीं सके और इस भीषण युद्ध में सैकड़ों की संख्या में मारे गए। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने युद्ध जीत लिया और विदोखर के आसपास मौजूद 24 गांवों पर कब्जा कर लिया। युद्ध के बाद इन ठाकुरों ने बगरी ठाकुर के घरों से सोना-चांदी लूट लिया। इस दौरान उन्होंने लूटा हुआ सोना लुटाते हुए जमकर जीत का जश्न मनाया। बस, उसी समय से वहां सोना लुटाए जाने की परंपरा का आरम्भ हुआ। लगभग पांच दशक पहले तक विदोखर गांव के आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्रित होते थे। इसके बाद अनोखे ढंग से दशहरा मनाते हुए लोग सवा मन सोना इकट्ठा कर लुटाते थे। जितना सोना जिसके हाथ लगता था, वे अपने घर ले जाता था। अब मंहगाई के जामने में सवा मन सोना लुटाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है, इसलिए प्रतीक रूप में रत्ती भर सोना लुटाया जाता है। आज भी 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर मिट्टी के गोले बनाते हैं और इन्हीं में रत्ती भर सोना डालकर लुटाते हैं। जिसके हाथ सोने वाला मिट्टी का गोला लगता है, उसे सौभाग्यशाली माना जाता है।
हो सकता था कि भविष्य में मेरे नानाजी की तरह किसी को यह परम्परा हिंसक घटना की याद दिलाने वाली लगे और इसे वह बंद करवा दे। यदि ऐसा होता है तो भी विदोखर में दशहरे का आनंद कम नहीं होगा। उत्सव वही है जो मन को आनन्दित करे, उत्साह से भर दे। उत्सव में आडंबर का कोई महत्व नहीं होता। दशहरा तो यूं भी असत्य पर सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है। इसे तो सद् विचारों और सद्परम्पराओं के साथ ही मनाया जाना चाहिए। हमेशा दस सिर वाला रावण मारा जाए, एक सिर वाला इंसान नहीं।
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( सागर दिनकर, 17.10.2018)


Wednesday, October 10, 2018

चर्चा प्लस ... स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि
- डॉ. शरद सिंह
‘देवी’ का अर्थ है निर्भयता और शक्ति। नवरात्रि वह काल खण्ड है जिसमें देवी के प्रतीक को स्थापित कर के शक्ति की उपासना का अनुष्ठान किया जाता है और देवी के रूप में शक्तिसम्पन्न निर्भय स्त्री की कल्पना को साकार किया जाता है। नवरात्रि में देवी भगवती के नौ रूपों में नौ शक्तियों की पूजा की जाती हैं। यह नौ शक
्तियां स्त्रीशक्तियां ही तो हैं। निर्भय स्त्री ही देवी है, जो असुरों का संहार करने, जो देवताओं और सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने की क्षमता रखती है। जो जगत् की जननी है, मां है, वही शक्ति है। इसीलिए इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नावरात्रि में स्त्री शक्ति को स्थापित किया जाता है और स्मरण किया जाता है कि स्त्री अशक्त नहीं सशक्त है। विडम्बना यह कि सदियों से सबसे अधिक अपराध स्त्री के विरुद्ध ही होते आ रहे हैं। आज भी आंकड़े भयावह हैं। समाचारों में आए दिन किसी भी आयुवर्ग की स्त्री की अवमानना अथवा बलात्कार के समाचार स्त्रीशक्ति की स्थापना संबंधी विचार को झुठलाने की कोशिश करते रहते हैं। फिर भी स्त्रियां अपनी शक्ति को धीरे-धीरे पहचान रही हैं और अपने आत्मसम्मान की स्थापना कर रही हैं। संघर्ष कड़ा है पर विजय असंभव नहीं। सच तो यह है कि स्त्री स्वयंसिद्धा है। उसे किसी के सामने झुकने अथवा न्याय की भीख मांगने की जरूरत नहीं। देवी दुर्गा के नौ रूप स्त्री की उस शक्ति को दर्शाते हैं जिनसे वह मानव में मौजूद राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश कर सकती है। नवरात्रि की कथाएं यही तो बताती हैं कि जहां देवता स्वयं को अक्षम पाते हैं वहां देवी अपनी क्षमता का प्रयोग कर के सब कुछ सही कर देती है। आज की स्त्री भी तो यही कर रही है। स्त्री घर सम्हाल रही है, नौकरी कर रही है, राजनीति में आगे आ चुकी है और पुरुरूोचित माने जाने वाले सुरक्षा एवं यांत्रिकक्षेत्र में भी स्वयं को साबित कर रही है। आज दुनिया का कोई भी क्षेत्र स्त्री की पहुंच से दूर नहीं है। आज की स्त्री पुरुष-प्रधान समाज के मानको को बदल रही है। जिस स्त्री-अस्मत अथवा स्त्री की दैहिक शुचिता की दुहाई दे कर स्त्री को आत्महत्या करने तक मजबूर किया जाता था, उसी दुहाई को वह आज कठोरता से ठुकरा कर उन परिस्थितियों को बेनकाब कर रही है जिनके द्वारा उन्हें डराया, दबाया गया। ‘मी टू’ और ‘यू टू’ जैसे कैम्पेन आज स्त्री को सिर उठा कर जीने की ताकत दे रहे हैं। जिस यौनिक अपराध का शिकार होने के कारण उसे जीवन भर मुंह छिपा कर जीना पड़ता था, आज उस अपराध के विरुद्ध मुंह खोलने का साहस स्त्रियों में आता जा रहा है। भारत में भी इसकी शुरुवात सेलीब्रिटी महिलाओं ने कर दी है, जिससे आमस्त्री में भी साहस का संचार होगा। यह जरूरी भी है। आज जब नन्हीं अबोध बालिकाओं को भी बलात्कारी नहीं बख़्श रहे हैं तो ऐसे दूषित माहौल में स्त्रियों का यौनहिंसा के विरुद्ध उठ खड़ा होना जरूरी है। जब स्त्रियां साहस दिखाती हैं तो पुरुषवर्ग भी उनका साथ देता है। पुरुषों की सत्ता पुरुषों के वैचारिक भिन्नता ने बनाई। दुर्भाग्यवश स्त्री को दोयम दर्जे का मानने वाले पुरुष समाज में प्रभावी स्तर पर रहे। किन्तु प्रत्येक पुरुष अपराधी नहीं होता है। वह भी पिता, भाई, पति और पुत्र होता है। उसे भी स्त्री के साथ अपने गरिमापूर्ण संबंधों का भान होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज जिस समर्थन के साथ स्त्रियां जीवन में बहुमुखी विकास कर रही हैं, वह नहीं कर पातीं और दीवारों के भीतर, हाथ भर लम्बे घूंघट में घुट रही होतीं। लेकिन यह समर्थन तभी मिला जब स्त्रियों ने साबित कर दिया कि वे हर तरह का काम करने में सक्षम हैं।
हमारी संस्कृति नारी के आदर की संस्कृति है। प्राचीन भारत में स्त्री का सम्मान किया जाता है। उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिया जाता था। पौराणि ग्रंथों में ऋषितुल्य विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। किन्तु हमारे अतीत में वह काला समय आया जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। विदेशी हमलावरों ने भारतीय पुरुषों को भ्रमित कर के स्त्री सम्मान के मायने ही बदलवा दिए। उन्होंने यह मस्तिष्क में बिठा दिया कि यदि स्त्री को परपुरुष स्पर्श भी कर ले तो उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए। इससे भी आगे बढ़ कर एक पाठ और पढ़ाया कि परपुरुष की कुदृष्टि मात्र से बचने के लिए स्त्रियों को तलवार नहीं उठानी चाहिए बल्कि जौहर कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य यह कि मातृशक्ति को देवी के रूप् में पूजने वाला पुरुष समाज इस तरह के पाठों को आत्मसात करता चला गया और स्वयं स्त्री समाज आत्महत्या में अपने सम्मान का प्रतिबिम्ब देखने लगी। लेकिन कहा जाता है न कि बुराई के पैर भले ही मजबूत दिखाई दें लेकिन होते कमजोर ही हैं और जल्दी थक जाते हैं। इन बुराइयों के पैर कई दशक बाद थके लेकिन अंततः थक कर चूर-चूर हो गए। जौहर और सती प्रथा बंद हुई। लेकिन इन काले दशकों ने स्त्रियों को शिक्षा, निर्णय लेने के अधिकार, कोख पर अधिकार और यहां तक कि खुली हवा से भी वंचित कर दिया। विचित्रता यह कि जब स्त्रियां दलित बनाई जा रही थीं, उस दौरान भी देवियां पूज्य रहीं। काल्पनिक शक्ति के सामने समाज ने सिर झुकाया किन्तु प्रत्यक्ष शक्ति को लम्बे समय तक अनदेखा किया। इतना अधिक अनदेखा किया कि आज भी समाज स्त्रीशक्ति को पूरी तरह से नहीं देख पा रहा है। शायद इसीलिए नवरात्रि के रूप में देवी के नौ रूपों वाली नौ शक्तियां प्रति वर्ष दो बार समाज के सामने आती हैं ताकि समाज स्त्रीशक्ति को पहचाने और उसे अपना सहभागी बनाए। नवरात्रि तो यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान व अपनी शक्ति का स्मरण दिलाता है, साथ ही सकल समाज को नारी शक्ति का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है। मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
यह भी सच है कि आज स्त्रियों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसल, स्त्रियों के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का सम्मान किया जाना जरूरी है। घर में मौजूद स्त्रियां अर्थात् माता, पत्नी, बेटी, बहन में नौ दुर्गा के गुण होते हैं जिन्हें स्वीकार कर के सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
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( सागर दिनकर, 10.10.2018)


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