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Wednesday, July 15, 2026

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  
महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता      
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                                                          
        महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। इसीलिए माना जाता है कि यदि महात्मा गांधी के विचारों को समझना है तो उनके समग्र विचारों को जानना जरूरी है जैसे कला और सौंदर्य के संबंध में उनके विचार।


अधिकांश लोग महात्मा गांधी को एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही देखते और समझते हैं। उनकी दृष्टि में माहत्मा गांधी वे व्यक्ति थे जिन्होंने बड़े-बड़े अहिंसक आंदोलन किए और देश को स्वतंत्रता दिलाई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी में विशेष राजनीतिक सूझ-बूझ थी लेकिन इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों को ले कर उनमें अगाध जिज्ञासा थी तथा उनका अपना मौलिक दृष्टिकोण था। सादा जीवन जीने वाले महात्मा गांधी को कला और सौंदर्य की अद्भुत समझ थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंट्उ विथ ट्रू’ में कला के बारे में लिखा है- ‘‘मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता जबकि प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाह्य रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।’’
दरअसल किसी भी कला के तीन आधार तत्व होते हैं- 1. जातीय तत्ववाद  2. कल्पनात्मक विस्तार 3. ऐतिहासिक परम्परा। जातीय तत्ववाद में मानव जाति समूह का अथवा जातीय दर्शन एवं चिन्तन होता है। कभी-कभी यह तत्व अवचेतन में रहकर कला पर अपना प्रभाव डालता है तो कभी अपने जातीय तत्वों को जानबूझ कर कला में पिरोया जाता है। यह तत्व सामाजिक रुढ़ियों और जातिगत ऐतिहासिक परम्परा के रूप में भी गतिमान रहता है। कल्पनात्मक विस्तार वैचारिक परिपक्वता को दर्शाता है। कला के संदर्भ में कल्पना मूर्त और अमूर्त के मध्य संबंध स्थापन का कार्य करती है। कल्पना का हृदय से सीधा संबंध होता है इसलिए यह कला के रूप में प्रकट होने के बाद प्रायः चकित कर देती है। ऐतिहासिक परम्परा कला के विकास को वातावरण प्रदान करती है, उसे दिशा देती है। भारतीय कलाओं के आधार में मनुष्य और सृष्टि का अटूट संबंध है पाया जाता है यह संबंध सार्वभौमिक सम्पूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है।
महात्मा गांधी कला में प्राकृतिक तत्वों को असीमित मानते थे। उनके अनुसार मानवीय कला प्राकृतिक कला के सामने कुछ भी नहीं है। वे कला की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि -‘‘‘हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों, मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश को निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की कला कभी नहीं कर सकती।’’

कला के महत्व के साथ ही महात्मा गांधी  ने कला के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। वे मानते थे कि कला का कोई न कोई उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य ही कला की गुणवत्ता को सिद्ध करता है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इन्कार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि यह प्राकृतिक सौन्दर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती हैं। ’’

भारतीय दृष्टिकोण से कला की यही परिभाषा हो सकती है। हम केवल उसके लक्ष्य से ही यह लक्षण नहीं बना रहे हैं। काव्य की जो परिभाषा अपने यहाँ है, उसे यदि व्यापक रूप से लगाइए तो वह काव्य की ही परिभाषा नहीं रह जाती; चित्र, मूर्ति, कविता, संगीत आदि कलामात्र की परिभाषा हो जाती है। वस्तुतः कलामात्र की परिभाषा को ही काव्य की परिभाषा बनाने के लिए, एक देशीय रूप देकर काव्य की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। अर्थात्, काव्य की परिभाषा पूर्ण व्याप्ति तभी होती है जब हम वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” के स्थान परकृ“कृतिरसात्मिका कला कहें वा रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” के बदले रमणीयार्थप्रतिपादिका कृतिः कला”
महात्मा गांधी कला में सत्य को ढूंढते थे। यदि कला में सत्यता है तो वह सभी के लिए उपयोगी हो सकती है। उनके अनुसार ‘‘सत्य का शोध पहली चीज है, सौन्दर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि  उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था। ऐसे ही मोहम्मद साहब भी थे जिनकी ‘कुरान’ सम्पूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है, कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौन्दर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौन्दर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा।’’

महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए। मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं लेकिन मैं उनको उतना महत्त्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर मैं उन कार्यकलापों के महत्त्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। जीवन सब कलाओं से बढ़कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या?’’
सत्य महात्मा गांधी का प्रिय विषय था। वे निरंतर सत्य की खोज में लगे रहते थे। वे कहते थे कि -‘‘मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौन्दर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौन्दर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौन्दर्य के दर्शन करने लगेंगे, तब सच्ची कला का उदय होगा।’’

जर्मन दार्शनिक हेगेल का मानना थ कि ‘‘सौंदर्य संवोदी रूप में सत्य या विचार की अभिव्यक्ति है।’’ वे यह भी मानते थे कि सौंदर्य केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना और परम सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। हेगेल के दर्शन में सौंदर्य मात्र बाहरी दिखावट अथवा इंद्रियों को प्रसन्न करने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना या आत्मा की बाहरी दुनिया में अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार शुद्ध विचार या सत्य जब किसी कला माध्यम के द्वारा साकार होता है तो वही सौंदर्य है। कला में सौंदर्य प्रकृति की नकल करने से नहीं अपितु उसमें अपनी दृष्टि को शामिल करना भी है। ठीक इसी प्रकार महात्मा गांधी ने कला के साथ सौंदर्य के महत्व एवं विशेषताओं को देखा और परखा। वे कला, सौंदर्य और सत्य को परस्पर पूरक मानते थे। महात्मा गांधी के अनुसार -‘‘‘सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाह्य रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य से आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौन्दर्य नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन कहते हैं कि उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया और आपको याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अन्दर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौन्दर्य के दर्शन का अभ्यस्त था।’’

महात्मा गांधी ने वास्तविक सुंदर कृति की बड़े सरल शब्दों में व्याख्या की है। वे इस बारे में भी प्रकाश डालते हैं कि सुंदर कृति कब जन्म लेती है-‘‘सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि ‘तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है, लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।’’
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी ने न केवल राजनीतिक मसलों का हल निकाला बल्कि कला और सौंदर्य का भी गहराई आकलन किया और इन दोनों तत्वों को जनोपयोगी तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना। इसीलिए वे मानते थे कि जो कला और सौंदर्य आमजन के मन में शांति, सुंदरता और जीवंतता का बोध कराए वही सच्ची कला और सौंदर्य है। महात्मा गांधी ने जितने सुंदर ढंग से कला और सौंदर्य की व्याख्या की है, उसे पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई दार्शनिक विषय के मर्म को आत्मसात कर के अपने विचार व्यक्त कर रहा हो। महात्मा गांधी के इन विचारों को जाने बिना उनके वैचारिक व्यक्तित्व को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है।                                    ---------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 15.07.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, May 15, 2024

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी के सतर्क अनुयायी थे वल्लभ भाई पटेल | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
महात्मा गांधी के सतर्क अनुयायी थे वल्लभ भाई पटेल
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      राजनीति में यदि अंधभक्ति हो तो वह विशुद्ध राजनीति नहीं रह जाती है। फिर उसे पंथवाद ही कहा जा सकता है। किन्तु राजनीति में अनुगमन और विरोध दोनों को साधना सबके बस की बात भी नहीं है। सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय राजनीति के एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने अनुगमन और विरोध दोनों को एक साथ साधा। वे महात्मा गंाधी के एक ऐसे अनुयायी थे जो उनका आदर करते थे, उनकी सलाह एवं उनके आदेश मानते थे किन्तु वे अंधभक्त नहीं थे। आवश्यकता पड़ने पर वे तर्क एवं विरोध करने से नहीं हिचकते थे। यही कारण था कि महात्मा गांधी और वल्लभ भाई पटेल के बीच जीवनपर्यंत अटूट संबंध रहे।  
    महात्मा गांधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल के सदा परस्पर अटूट संबंध रहे। महात्मा गांधी जितना विश्वास वल्लभ भाई पर करते थे, वल्लभ भाई भी उतना ही स्नेह और आदर महात्मा गांधी के प्रति रखते थे। यद्यपि वल्लभ भाई गांधी जी के अंधानुयायी नहीं थे। जब कभी गांधी जी के विचारों से सहमत नहीं हुए तो उन्होंने खुलकर अपनी भावना को व्यक्त भी किया।
पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा था कि -‘‘जिस दिन से वल्लभ भाई ने गांधीवादी उपासना पद्धति, गांधीवादी जीवनशैली और गांधी जी के सिद्धांत अपनाए तब से वे एक भक्त की तरह कार्य करते रहे।’’
 वल्लभ भाई स्वयं भी मानते थे कि-‘‘गांधी जी से मिलने से बहुत पूर्व मेरी राजनीति के प्रति रुचि थी। पर उस समय भारत का कोई राजनीतिक दल मुझे आकर्षित नहीं कर सका। हंा, आरामकुर्सी पर राजनीति बघारने वाले कई नेता मौजूद थे और बंगाल तथा महाराष्ट्र में अराजकता फैलाने वाले भी काफी क्रियाशील थे। तब गांधी का मंच पर आगमन हुआ और उनमें मुझे वह नेता दिखाई पड़ा जिसका अनुयायी बना जा सकता था।’’
एस. के. पाटील ने गांधी जी और वल्लभ भाई के पारस्परिक संबंधों के बारे में लिखा है कि -‘‘जब से सरदार ने गांधी जी का नेतृत्व स्वीकार किया, तब से वे हमेशा गांधी जी की इच्छा के प्रमुख प्रवर्तक रहे। यह दोनों महान व्यक्ति एक विचित्र युग्म हैं-गांधी जी और सरदार जितने एक-दूसरे से अभिन्न हैं, उतने ही परस्पर एक-दूसरे के भक्त। साधारणतया पहला व्यक्ति सोचता है और दूसरा अपनी अपूर्व प्रयोजनात्मक एकता के साथ उसे कार्यान्वित करता है।’’
गांधी जी ने जिस सत्य और अहिंसा के मार्ग को प्रशस्त किया उसे व्यवहार में लाने और उसके आधार पर देश की जनता को जाग्रत करने का श्रेय वल्लभ भाई को था। वल्लभ भाई ने व्यक्तिगत जीवन में गांधी जी की सलाहों को अपनाया। गांधी जी प्राकृतिक चिकित्सा पर विश्वास करते थे तथा अस्वस्थ होने पर प्राकृतिक चिकित्सा ही अपनाते थे। जब वल्लभ भाई जब जेल में थे तब उन्हें घातक उदररोग हुआ और चिकित्सक ने स्पष्ट कह दिया कि बिना आॅपरेशन के ईलाज नहीं हो सकता है। वल्लभ भाई आॅपरेशन कराने को राजी हो गए। किन्तु चिकित्सक ने इस बात की चेतावनी दी कि आॅपरेशन का परिणाम कुछ भी हो सकता है, अर्थात् उसमें वल्लभ भाई के प्राण भी जा सकते हैं। इस बात से वल्लभ भाई तो नहीं डरे किन्तु जेल प्रशासन घबरा गया। उसे लगा कि यदि वल्लभ भाई को जेल-अवधि में कुछ हो गया तो जेल के बाहर आंदोलनकारी जनता क्रोध से उबल पड़ेगी और कोई भी कठोर कदम उठाने को आतुर हो उठेगी। अतः जेल प्रशासन ने गहन बीमारी की अवस्था में ही वल्लभ भाई को जेल से रिहा कर दिया।
जेल से बाहर आने पर उनकी विभिन्न प्रकार के चिकित्सकों ने जांच की। उन्होंने ऐलोपैथिक, आयुर्वेदिक तथा होम्योपैथिक इलाज भी कराया किन्तु विशेष लाभ नहीं हुआ। वल्लभ भाई की इस बीमार अवस्था से सभी चिन्तित थे। तब गांधी जी ने वल्लभ भाई को प्राकृतिक चिकित्सा कराने की राय दी। कुछ लोगों ने वल्लभ भाई से कहा कि जब इन बड़ी-बड़ी और मानी हुई चिकित्सा पद्धतियों से कुछ नहीं हुआ तो प्राकृतिक चिकित्सा से क्या लाभ होगा? यह तो समय बरबाद करने जैसा होगा। किन्तु वल्लभ भाई ने निःसंकोच उनकी राय स्वीकार कर ली और प्राकृतिक चिकित्सा आरम्भ कर दी। कुछ ही सप्ताह में उनका स्वास्थ सुधर गया।
वल्लभ भाई पटेल ने गांधी जी से प्रभावित हो कर पाश्चात्य वेशभूषा त्याग कर धोती-कुर्ता वाली विशुद्ध भारतीय वेश-भूषा अपना ली थी। वल्लभ भाई ने गांधी जी की जीवनशैली एवं चिकित्सापद्धति को अपनाया किन्तु जहां तक वैचारिक एवं नीतिगत स्तर का प्रश्न था तो उन्होंने समय पड़ने पर गांधी जी के विचारों को मौन सहमति देते हुए तटस्थता भी दर्शाई।
सन् 1932 में अंग्रेज सरकार द्वारा घोषित साम्प्रदायिक पंचाट का विरोध करते हुए गांधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके इस अनशन का साथ कई नेताओं ने दिया। किन्तु बाद में सरकार के साथ ‘पूना समझौता’ कर लिया। अंग्रेज सरकार ने श्वेत-पत्र के माध्यम से भारत के भावी संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की। उस समय परिवर्तनवादी गुट के लोग गांधी जी का खुला विरोध कर रहे थे। गांधी जी की सत्य और अहिंसा पर चलने की नीति उन्हें पसन्द नहीं आई थी। इन्हीं कारणों से दल में वैचारिक मतभेद उत्पन्न होने लगे थे। कांग्रेस के कुछ नेता सरकार के पंचाट को अस्वीकृत करना चाहते थे। यही समय था कि जब मदनमोहन मालवीय और एम.एस.अणे ने कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना कर ली। इससे व्यथित हो कर गांधी जी ने वर्धा में अपना एक वक्तव्य जारी किया कि-‘‘पार्टी के कुछ लोग उनके विचारों से सहमत नहीं हैं इसलिए वे कांग्रेस पार्टी छोड़ना चाहते हैं।’’
गंाधी जी का वक्तव्य पढ़ कर सभी नेतागण चकित रह गए। वल्लभ भाई ने भी इस वक्तव्य को पढ़ा किन्तु वे मौन रहे। उन्हें मौन देख कर वहां मौजूद कांग्रेस के नेताओं ने उनसे प्रश्न किया कि-‘‘ आप गांधी जी के इस वक्तव्य पर जिसमें उन्होंने पार्टी छोड़ने की बात कही है, मौन क्यों हैं? कोई टिप्पणी क्यों नहीं कर रहे हैं?’’
तब वल्लभ भाई ने कहा-‘‘इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है। यह गांधी जी की अपनी इच्छा है, वे पार्टी में रहें अथवा उसे छोड़ दें।’’
‘‘किन्तु गांधी जी द्वारा पार्टी छोड़ने का भला क्या उद्देश्य हो सकता है?’’ कांग्रेसी नेताओं ने पूछा।
‘‘उद्देश्य जो भी हो किन्तु गांधी जी जो भी करेंगे, वह देश और पार्टी के हित में ही होगा।’’
‘‘पार्टी छोड़ना पार्टी के हित में किस तरह है, यह समझ से परे है।’’ नेताओं ने पूछा। फिर आग्रह किया कि -‘‘आप उन्हें क्यों नहीं समझाते?’’
‘‘गांधी जी को भला मैं कैसे समझा सकता हूं? वे स्वयं समझदार हैं। वे अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम हैं।’’ वल्लभ भाई ने उत्तर दिया।
इस पर नेताओं ने फिर आग्रह किया कि-‘‘फिर भी आप एक बार गांधी जी से इस विषय पर चर्चा तो करिए, शायद वे मान जाएं और पार्टी छोड़ने की बात अपने मन से निकाल दें।’’
‘‘मैं और हम सब गांधी जी पर किसी तरह का कोई नैतिक दबाव नहीं डाल सकते।’’ वल्लभ भाई ने स्पष्ट स्वर उत्तर दिया।
कांग्रेसी नेताओं ने गांधी जी के इस फैसले के कई अर्थ निकाले किन्तु वल्लभ भाई मौन रहे। उन्होंने गंाधी जी पर कोई नैतिक दबाव नहीं डाला। इसी दौरान वर्धा में कांग्रेस पार्लियामेंट बोर्ड का गठन किया गया। वल्लभ भाई को उस बोर्ड का अध्यक्ष चुना गया। इसमें सभी नेताओं की सहमति थी।
लखनऊ में हुए कांग्रेस के 49 वें अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी। कांग्रेस का 50 वां अधिवेशन फैजपुर में होने वाला था। जिसकी अध्यक्षता वल्लभ भाई पटेल करने वाले थे। अध्यक्षता के लिए उनका नाम भी तय किया जा चुका था। इन्हीं दिनों नेहरू साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हो गए थे किन्तु वल्लभ भाई पटेल साम्यवाद के विरोधी थे। नेहरू कांग्रेस के सदस्यों के चुनाव और प्रांतीय सरकारों के संचालन में साम्यवादी नीतियों को प्राथमिकता देना चाहते थे। गांधी जी की सहमति उनकी ओर बन रही थी।
फैजपुर में होने वाले 50 वें अधिवेशन के ठीक पहले गंाधी जी ने विचार-विमर्श के लिए बुलाया और उनसे कहा कि फैजपुर अधिवेशन की अध्यक्षता से अपना नाम वापस ले कर नेहरू को अध्यक्षता करने दें। वल्लभ भाई पटेल ने गांधी जी के कहने पर फैजपुर अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए जवाहरलाल नेहरू के नाम की सिफारिश करते हुए अपना नाम वापस ले लिया। इस अवसर पर वल्लभ भाई पटेल ने अपने एक वक्तव्य में कहा था-‘‘अधिवेशन में अध्यक्षता के लिए मेरे द्वारा अपना नाम वापस लेने का तात्पर्य यह नहीं है कि मैं जवाहरलाल नेहरू के विचारों से सहमत हूं। कांग्रेस के सदस्य भली भांति जानते हैं कि मेरे और नेहरू के बीच कुछ बातों को ले कर मतभेद है।’’
कुछ अवसर ऐसे भी आए जब वल्लभ भाई और गांधी जी के मध्य मतभेद भी रहा। सन् 1940 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय गांधी जी से उनके मतभेद स्पष्ट दिखाई दिएं। 19 जुलाई 1940 को गुजरात प्रांतीय समिति के समक्ष भाषण देते हुए अहिंसा के प्रश्न पर वल्लभ भाई पटेल ने अपनी मनःस्थिति का वर्णन करते हुए कहा था-‘‘मौजूदा परिस्थिति में अहिंसा का सम्पूर्ण प्रयोग करना कांग्रेस के लिए संभव नहीं। हमारी शक्ति की एक मर्यादा है और देश की शक्ति के अंदाज के बारे में गांधी जी और हमारे बीच मतभेद है। यह एक अकेले व्यक्ति की बात नहीं है। व्यक्ति कितना ही ऊंचा उठ सकता है परन्तु यह सारी संस्था को साथ ले कर चलने की बात है। समाज पर अत्याचार करने वालों के साथ आवश्यक हिंसा का इस्तेमाल किए बिना काम चला सकना मेरी बुद्धि के बाहर है। यह समय सिद्धांतों की चर्चा का नहीं है। आप सबको सोचना चाहिए कि भीतरी अव्यवस्था और बाहरी आक्रमण के विरुद्ध लोग हिंसा का उपयोग चाहते हैं या नहीं? बाहर के लोग अब तक मुझे गांधी जी का अंधभक्त कहते थे। यदि मैं ऐसा बन सकूं तो मुझे गर्व होगा किन्तु मैं देख रहा हूं कि ऐसा नहीं है।’’
वल्लभ भाई पटेल गांधी जी के अनुयायी थे किन्तु यह कहा जा सकता है कि वे एक सतर्क अनुयायी थे। उनके मन में गांधी जी के प्रति वास्तविक श्रद्धा थी लेकिन यह उसी प्रकार थी जिस प्रकार एक व्यवहारिक और यथार्थवादी मनुष्य की एक आदर्शवादी के प्रति होती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ढाले गए इस्पात की तरह गांधी जी में झुकने और मुड़ने की शक्ति थी किन्तु वल्लभ भाई पटेल शुद्ध लौह की भांति नहीं झुकने वाले गुण रखते थे।  
(विशेषः यह लेख सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व सरदार वल्लभ भाई पटेल’’ के एक अध्याय का संपादित अंश है। सरदार वल्लभ भाई पटेल को जानने के लिए यह पुस्तक पढ़ी जा सकती है।)     
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Saturday, February 3, 2024

शून्यकाल | देश के संविधान के लिए 1909 से ही संकल्पित थे महात्मा गांधी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

"दैनिक नयादौर" में मेरा कॉलम "शून्यकाल"
देश के संविधान के लिए 1909 से ही संकल्पित थे महात्मा गांधी
           - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
26 जनवरी 1950 को को भारतीय संविधान लागू किया गया। इससे बहुत पहले सन 1909 से ही महात्मा गांधी ने भारतीय संविधान के बारे में विचार करना आरम्भ कर दिया था। उन्हें विश्वास था कि भारत एक दिन अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होगा और उसके बाद स्वतंत्र देश के रूप में उसे अपने एक अलग संविधान की आवश्यकता होगी। एक स्वतंत्र भारत के लिए किस तरह का संविधान उपयुक्त होगा, इस बारे में उन्होंने गंभीर चिंतन किया था जो उनके विविध लेखों से पता चलता है। क्या वर्तमान संविधान महात्मा गांधी की संकल्पना के अनुरुप है?
भारतीय संविधान लोकतांत्रिक संविधान है। एक ऐसा संविधान जो जनसामान्य के हितों की रक्षा पर केन्द्रित है। इसका ड्रफ्ट डाॅ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा ने तैयार किया था। भारतीय संविधान विभिन्न देशों के संविधान से प्रेरित है। हमारे संविधान का 75 प्रतिशत भाग भारत सरकार अधिनियम 1935 से लिया गया है लेकिन इसके साथ ही ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, सोवियत संघ, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और जर्मनी आदि देशों के संविधान के कुछ प्रमुख तत्व भी हमारे संविधान में सम्मिलित किए गए हैं। 29 अगस्त 1947 को संविधान मसौदा समिति बनी, जिसके अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर बनाए गए। 9 दिसंबर 1946 को, संविधान सभा की पहली बार बैठक हुई। 21 फरवरी 1948 को मसौदा समिति ने विभिन्न समितियों के प्रस्तावों को ध्यान में रखते हुए, भारत के संविधान का पहला मसौदा तैयार किया, जिसे 21 फरवरी 1948 को प्रकाशित किया गया था। संविधान के मसौदे की विस्तृत समिति पर पांच सप्ताह की बहस के बाद, संवैधानिक सम्मेलन ने अंतिम संस्करण तैयार करने के लिए एक समिति नियुक्त की गई। कुल 2 साल, 11 महीने और 18 दिन की अवधि में, भारतीय संविधान तैयार हुआ।

जब हमारे संविधान की रचना हुई थी तब इसमें 395 अनुच्छेद या धाराएं थीं । मूल अनुच्छेदध्धाराओं की संख्या संविधान में आज भी इतनी ही है । हालाँकि समय समय पर होने वाले संशोधनों के कारण आज कुल अनुच्छेदों की संख्या 448 हो गई है, लेकिन ये मूल अनुच्छेद के ही विस्तार के रूप में स्थापित किये गये हैं । पांडुलिपि 26 नवंबर, 1949 को पूरी हुई और 26 जनवरी, 1950 को हस्ताक्षर किए गए। यह दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखी गई है और इसके लेखक बीआर अंबेडकर और बीएन राऊ थे। इस संविधान को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। ठीक इसी दिन से देश ने संवैधानिक रूप से गणतांत्रिक प्रणाली को अपनाया। 
1950 को संविधान लागू किए जाने से बहुत पहले सन 1909 से ही महात्मा गांधी ने भारतीय संविधान के बारे में विचार करना आरम्भ कर दिया था। उन्हें विश्वास था कि भारत एक दिन अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होगा और उसके बाद स्वतंत्र देश के रूप में उसे अपने एक अलग संविधान की आवश्यकता होगी। एक स्वतंत्र भारत के लिए किस तरह का संविधान उपयुक्त होगा, इस बारे में उन्होंने गंभीर चिंतन किया था जो उनके विविध लेखों से पता चलता है। क्या वर्तमान संविधान महात्मा गांधी की संकल्पना के अनुरुप है?

 महातमा गांधी प्रबल मानवतावादी थे। वे स्वतंत्र भारत के लिए ऐसे शासनतंत्र की कल्पना करते थे जिसमें प्रत्येक नागरिका को समान अधिकार प्राप्त हो चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ण, लिंग का उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से हमेशा समता पर जोर दिया तथा समाज के अंतिम पंक्ति तक के व्यक्ति को सुखी देखने की संकल्पना की। गांधीजी ने मैला ढोने की प्रथा बंद कराई किन्तु इससे पहले स्वयं मैला साफ कर के उस पीड़ा को अनुभव किया जो मैला ढोने वालों को झेलनी पड़ती थी। इसीलिए उनका संवैधानिक आग्रह भी व्यवहारिक था, काल्पनिक नहीं। भारत के लिए संविधान को आकार देने में गांधी जी की भूमिका को परोक्ष रूप से विद्यमान रही। सन 1909 के आरम्भ में, गांधी ने ‘‘हिंद स्वराज’’ में ‘‘भारत के भविष्य के संविधान’’ पर अपने विचार लिखे। इसमें, उन्होंने संसदों के बारे में अपनी आपत्तियां जोरदार ढंग से व्यक्त कीं। संविधान की संरचना और संरचना के बारे में गांधी की धारणा की एक और, अधिक प्रमुख अभिव्यक्ति उस संविधान में प्रमाणित हुई, जिसमें उन्होंने 1923 में औंध के लोगों के लिए मसौदा तैयार करने में मदद की थी। उस संविधान में, गांधी ने एक विकेन्द्रीकृत सरकार की कल्पना की थी, क्योंकि उन्होंने अक्सर केंद्रीकृत सत्ता उचित नहीं माना। ऐसी सरकार उन्हें ‘‘महंगी, अक्षम, निर्दयी और सत्ता की भूखी’’ लगती थी। 

औंध आज महाराष्ट्र राज्य के सतारा जिले में स्थित एक बस्ती है। यह ब्रिटिश राज के काल में एक रियासत हुआ करती थी। औंध में गांधी जी ने अपनी संवैधानिक संकल्पना को प्रयोगात्मक रूप से साकार किया था। औंध में गांधी द्वारा परिकल्पित विकेन्द्रीकृत सरकार में ग्राम पंचायतें, तालुकों का गठन किया गया था। पंचायत अध्यक्ष और तालुकों द्वारा भेजे गए सदस्यों द्वारा गठित एक विधान सभा। गांधीजी ने औंध में अभ्यास करने पर जोर देने वाली दूसरी शर्त यह थी कि केवल साक्षर नागरिक ही मतदान कर सकते थे। पहले चुनाव से पहले, उन्होंने शासक को लोगों को साक्षर बनाने में मदद करने की व्यवस्था करने का सख्त निर्देश दिया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि राजकुमार को औंध के एक गरीब नागरिक के रूप में दस साल तक औंध में रहना चाहिए और काम करना चाहिए। गांधीजी ने मौलिक अधिकारों को शामिल करना भी सुनिश्चित किया।

गांधी जी अव्यवहारिक संविधान के विरोधी थे। वे 1930 के दशक तक भारत में संविधान और संसदीय प्रणाली के विरुद्ध गंभीर आपत्तियां व्यक्त करते रहे। फिर गांधीजी ने धीरे-धीरे संवैधानिक मामलों में रुचि लेना शुरू कर दिया। गांधीजी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारत के भविष्य के संविधान के लिए अपने विचारों को स्पष्ट किया। संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) द्वारा आयोजित सत्रों में भी वे सक्रिय रूप से शामिल रहे। इन सभी अवसरों पर, गांधी ने ‘‘स्वराज’’, एक राज्यविहीन समाज के विचार का आग्रह किया, क्योंकि उन्होंने केंद्रीकृत, अखंड राज्य को एक ‘‘स्मृतिहीन मशीन’’ के रूप में माना था जो नागरिकों के अधिकारों को निरस्त कर देगा। उन्होंने राजनीतिक सत्ता की भ्रष्ट प्रकृति और राजनीतिक दलों की सत्ता की राजनीति का तिरस्कार किया। स्वराज का उद्देश्य पुनर्निर्माण के अपने सिद्धांतों को प्राप्त करने के लिए लोगों और राज्य को सशक्त बनाना था।
10 सितंबर 1931 में गांधी जी ने ‘‘यंग इंडिया’’ में लिखा कि ‘‘मैं एक ऐसे संविधान के लिए प्रयास करूंगा, जो भारत को सभी बंधनों और संरक्षण से मुक्त कर देगा।’’

1934 में एम.एन. रॉय ने एक संविधान सभा की स्थापना की मांग की, जिसे कांग्रेस ने जल्द ही आगे बढ़ाया। गांधी जी उस समय भी सशंकित थे। लेकिन, 1939 में, उन्होंने कांग्रेस के प्रस्तावों में संविधान सभा की मांग को शामिल करने में जवाहरलाल नेहरू का समर्थन किया, क्योंकि उन्हें लगा कि यह बड़े पैमाने पर राजनीतिक और अन्य लोगों के लिए एक माध्यम होने के अलावा, सांप्रदायिक समस्याओं और अन्य अशांति को हल करने का एकमात्र तरीका था। 1946 में, जब कैबिनेट मिशन योजना ने एक संविधान सभा का प्रस्ताव रखा और भारतीय राजनीतिक बिरादरी द्वारा इसकी विवादास्पद प्रांतीय व्यवस्थाओं के लिए इसे अस्वीकार कर दिया गया, तो गांधी ने संविधान सभा में शामिल होने के लिए कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव को मंजूरी देने के पक्ष में बात की। उन्होंने समझा कि इसकी संरचना में कई खामियां हैं और उन्होंने कहा, ‘‘संविधान सभा आपके लिए गुलाबों का बिस्तर नहीं बल्कि केवल कांटों का बिस्तर बनने जा रही है।’’ साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘एक सत्याग्रही इंतजार नहीं कर सकता या कार्रवाई में देरी नहीं कर सकता जब तक आदर्श स्थितियाँ न आ जाए।’’ और उन्होंने कांग्रेस पार्टी से संविधान सभा को ‘‘सत्याग्रह का विकल्प’’ मानने का आग्रह किया, क्योंकि उन्होंने इसे ‘‘रचनात्मक सत्याग्रह’’ कहा।

1950 में जब संविधान लागू किया गया तो गांधी जी दिवंगत हो चुके थे किन्तु उनके संविधान संबंधी विचारों से विकेंद्रीकरण, ग्रामीण उत्थान, सहकारी खेती, ग्रामोद्योग, नई शिक्षा, महिला सशक्तिकरण आदि शामिल थे। आज भी भारतीय संविधान महात्मा गांधी के विचारों के अनुरुप जनहित के उद्देश्य को ले कर संचालित है।
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Wednesday, April 5, 2023

चर्चा प्लस | जब कुछ भी करना दुस्साहस था, तब गांधी ने दांडी मार्च किया | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस  
जब कुछ भी करना दुस्साहस था, तब गांधी ने दांडी मार्च किया
     - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                   
       05 अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी नमक कानून तोड़ने दांडी पहुंचे थे और 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ा था। आज 5 अप्रैल 2023 आने तक हम गांधी जी पर अनावश्यक वाद-विवाद में उलझने की प्रवृत्ति तक आ पहुंचे हैं। क्या आज की तारीख़ में यह मायने रखता है कि हमारे राष्ट्रपिता की डिग्री क्या थी या उन्होंने कितनी पढ़ाई की थी? और कुछ हो या न हो लेकिन ऐसी बहसों से वे लोग भ्रमित ज़रूर हो सकते हैं जिन्होंने गांधी जी की जीवनी नहीं पढ़ी। वे लोग भी भ्रमित हो सकते हैं जिन्होंने गांधी जी के कार्यों और विचारों को नहीं जाना। किसी पर लांछन लगाना आसान है लेकिन उसके जैसा जीवन जी कर दिखाना कठिन है। जब अंग्रेजों के बनाए कानून को ग़लत कहना भी अपराध था तब गांधी जी ने दांडी मार्च कर के अंग्रेजों के पसीने छुड़वा दिए थे। चाहें तो आप पढ़ सकते हैं मेरे द्वारा राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला में लिखी गई पुस्तक ‘‘महात्मा गांधी’’, जो सामयिक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुई है और जिसमें महात्मा गांधी के जीवन और कार्यों का सम्पूर्ण संक्षिप्त विवरण मौजूद है।   
 
आज नमक आसानी से उपलब्ध हो जाता है, वह भी आकर्षक पैकेजिंग में। नमक भी नाना प्रकार के। किसी में आयोडीन तो किसी में आयरन तो किसी में..... नमक बेचने वाली कंपनियां शोर मचा-मचा कर बताती हैं कि उनके नमक में क्या खूबी है। जिन्होंने आज का नमक खाया है लेकिन अंग्रेजों की गुलामी के समय के इतिहास का खारा स्वाद नहीं चखा है वे न तो दांडी मार्च के महत्व को महसूस कर सकते हैं और न महात्मा गांधी के उस व्यक्तित्व को जो देश के लाखों ग़रीबों का प्रतिनिधित्व करते थे। ईश्वर ने उन्हें ग़रीब के घर में पैदा नहीं किया था लेकिन उन्होंने ग़रीबों के दुख-दर्द को समझा। गरीबों की आर्थिक विपन्नता को समझा। गांधी जी चाहते तो अंग्रेजों के सहयोगी बन कर बैरिस्टर साहब या राय बहादुर या फिर लाट साहब जैसी आलीशान ज़िन्दगी जी सकते थे। लेकिन उनके जीवन का उद्देश्य वह नहीं था। वे तो आमजन के कंधे से कंधा मिला कर खड़े होना चाहते थे। यह सब लिखना गांधी जी को किसी भक्ति भावना से प्रेरित हो कर महिमा मंडित करना नहीं है। मैंने इतिहास के वे पन्ने पढ़े हैं जिनमें उनके कार्य दर्ज़ हैं। वे श्वेत-श्याम तस्वीरें देखी हैं जिनमें गांधी जी ‘‘बापू’’ के रूप में एक धोती और लाठी के साथ मार्च करते दिखाई देते हैं। उस समय के चलचित्र (डाक्यूमेंट्री) नेशनल आर्काईव में मौजूद हैं। वे उस समय ही खींचे गए थे जब देश पर अंग्रेजों का शासन था और हम उनके गुलाम थे।

अंग्रेजों के एक गुलाम मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने ‘‘जबरिया मालिकों’’ के विरुद्ध स्वतंत्रता का शंखनाद किया और राष्ट्र के नेतृत्व की कमान सम्भाल ली। 26 जनवरी, 1930 को उनके नेतृत्व में देश को स्वतंत्र कराने की शपथ देश के कोने-कोने में ली गयी। स्पष्ट तौर पर यह ब्रिटिश सरकार को एक कड़ी चेतावनी थी। महात्मा गांधी का ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा देश के कोने-कोने में गूंज रहा था। 12 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी ने वायसराय को सूचित किया कि वे अपने 78 अनुयाइयों के साथ ‘दांडी मार्च’ (दांडी यात्रा) करने जा रहे हैं। ‘दांडी मार्च’ से अभिप्राय उस पैदल यात्रा से है, जो महात्मा गांधी और उनके स्वयंसेवकों द्वारा 12 मार्च, 1930 ई. को प्रारम्भ की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य था, अंग्रेजों द्वारा बनाए गए अन्यायपूर्ण ‘‘नमक कानून’’ को तोड़ना। गरीब किसान ब्रिटिश कानून के कारण अपनी ‘‘नमक की खेती’’ नहीं कर पा रहे थे। गांधी जी ने अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 358 कि.मी. दूर स्थित दांडी नामक स्थान के लिए 12 मार्च, 1930 ई. को प्रस्थान किया। इससे पहले, 11 मार्च की संध्या की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गांधी जी ने कहा था, ‘‘मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरूं या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूंगा।’’

महात्मा गांधी की ‘दांडी यात्रा’ का समाचार दूर-दूर तक फैल गया। दांडी यात्रा की तैयारी देखने के लिए देश-विदेश के पत्रकार, फोटोग्राफर अहमदाबाद आए थे। आजादी के आंदोलन की यह महत्त्वपूर्ण घटना ‘वाइस आॅफ अमेरिका’ के माध्यम से प्रस्तुत की गयी। अहमदाबाद में एकत्र हुए लोगों में यह भय व्याप्त था कि 11-12 मार्च की रात में महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। ‘महात्मा गांधी की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ के जयघोष के साथ लोगों के बीच महात्मा गांधी ने रात बिताई और सुबह चार बजे उठकर सामान्य दिन की भांति दिनचर्या पूर्ण कर प्रार्थना के लिए चल पड़े। 12 मार्च को प्रातः वह ऐतिहासिक दिन आरम्भ हुआ जब 61 वर्षीय महात्मा गांधी के नेतृत्व में 78 सत्याग्रहियों ने यात्रा आरम्भ की। महात्मा गांधी के तेेजस्वी और स्फूर्तिमय व्यक्तित्व ने स्वयंसेवकों के मन में ऊर्जा का संचार किया।
दांडी यात्रा के समर्थन में पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर यात्राएं की गईं। राजगोपालाचारी ने त्रिचनापल्ली से वेदारण्यम् तक की यात्रा की। असम में लोगों ने सिलहट से नोआखली तक की यात्रा की। ‘वायकोम सत्याग्रह’ के नेताओं ने के. केलप्पन एवं टी.के. माधवन के साथ कालीकट से पयान्नूर तक की यात्रा की। इन सभी लोगों ने ‘नमक कानून’ को तोड़ा। नमक कानून इसलिए तोड़ा जा रहा था, क्योंकि सरकार द्वारा ‘नमक कर’ बढ़ा दिया गया था, जिससे दैनिक उपयोग में आने वाले नमक की कीमत बढ़ गयी थी।
उत्तर पश्चिमी सीमा प्रदेश में खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें बाद में ‘सीमांत गांधी’ कहा गया, के नेतृत्व में ‘खुदाई खिदमतगार’ संगठन के सदस्यों ने सरकार का विरोध किया। उन्होंने पठानों की क्षेत्रीय राष्ट्रवादिता के लिए तथा उपनिवेशवाद और हस्तशिल्प के कारीगरों को गरीब बनाने के विरुद्ध आवाज उठाई। इन्होंने पश्तो भाषा में ‘पख्तून’ नामक एक पत्रिका निकाली, जो बाद में ‘देशरोजा’ नाम से प्रकाशित हुई। पेशावर में गढ़वाल राइफल के सैनिकों ने अपने साथी चंद्रसिंह गढ़वाली के अनुरोध पर ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ कर रहे आंदोलनकारियों की भीड़ पर गोली चलाने के आदेश का विरोध किया। नमक कानून भंग होने के साथ ही सारे भारत में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का प्रभाव बढ़ गया था।

बम्बई में इस आंदोलन का केन्द्र धरासना था, जहां पर सरकार के दमनचक्र का सबसे भयानक रूप देखने का मिला। सरोजिनी नायडू, इमाम साहब और मणिलाल के नेतृत्व में लगभग 25 हजार स्वयं सेवकों को धरासना नामक कारखाने पर धावा बोलने से पूर्व ही पुलिस द्वारा निमर्मतापूर्वक लाठियों से पीटा गया। धरासना के भयानक रूप का उल्लेख करते हुए अमेरिका के ‘न्यू फ्रीमैन’ अखबार के पत्रकार वेब मिलर ने लिखा कि- ‘‘संवाददाता के रूप में पिछले 18 वर्ष में असंख्य नागरिक विद्रोह देखे हैं, दंगें, गली-कूचों में मार-काट वाले विद्रोह देखे हैं, लेकिन धरासना जैसा भयानक दृश्य मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा।’’

महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के बारे में सुभाषचन्द्र बोस ने लिखा कि, ‘‘महात्मा जी के दांडी मार्च की तुलना ‘इल्बा’ से लौटने पर नेपोलियन के ‘पेरिस मार्च’ और राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए मुसोलिनी के ‘रोम मार्च’ से की जा सकती है।’’

वस्तुतः मूल यात्रा के मुख्य चरण इस प्रकार थे:- आणंद से लगे सरदार वल्लभ भाई पटेल की कर्मभूमि करमसद और बारदोली से इस आंदोलन की नींव पड़ी। इलाके और आसपास के किसानों ने सरदार पटेल को अपनी समस्याएं बताईं, तो उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा किया। इससे किसानों और गांव के लोगों से सीधा जुड़ाव हुआ। किसानों से सरदार पटेल का सीधा सम्पर्क होने के कारण ही महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह की पूरी बागडोर उन्हें सौंपी। इसकी पूरी योजना और मार्ग का निर्धारण सरदार पटेल ने किया था। यात्रा की सफलता के लिए सरदार पटेल मार्च से पहले गांवों के दौरे पर निकल गए थे। सरदार पटेल की इस रणनीति से घबराए अंग्रेजों ने उन्हें 7 मार्च को गिरफ्तार कर लिया। ताकि महात्मा गांधी का मनोबल टूट जाए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि तब तक आंदोलन ने गति पकड़ ली थी।
12 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती में अपने आश्रम से समुद्र की ओर चलना शुरू किया। इस आंदोलन की शुरुआत में 78 सत्याग्रहियों के साथ दांडी कूच के लिए निकले बापू के साथ दांडी पहुंचते-पहुंचते पूरा अवाम जुट गया था।

अंग्रेजों के खिलाफ नमक आंदोलन में दांडी पहुंचने से पहले महात्मा गांधी ने सूरत को अपना पड़ाव बनाया। इसके बाद महात्मा गांधी ने डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को यात्रा के आखिरी दिनों में अपना पड़ाव बनाया। नवसारी से चलकर महात्मा गांधी कराडी पहुंचे। उन्होंने कराडी में दोपहर और रात का विश्राम किया।  महात्मा गांधी ने कंकापुरा से दांडी के लिए अगले पड़ाव का सफर महिसागर तट से पूरा किया। नाव से 9 कि.मी. की यात्रा करने के बाद उन्होंने करेली में रात्रि विश्राम किया।
24 दिन बाद 05 अप्रैल को महात्मा गांधी दांडी की सीमा पर पहुंवे और 6 अप्रैल, 1930 ई. को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा।
दांडी मार्च मात्र एक यात्रा नहीं थी वरन यह हमारे बुजुर्गों, हमारे पूर्वजों के अदम्य साहस का एक उदाहरण थी। इस यात्रा के द्वारा महात्मा गांधी ने क्या संदेश दिया? यही न कि जो ग़लत है उसका विरोध करने से नहीं डरो! न्याय और सत्य का साथ दो और अन्याय व झूठ का डट कर विराध करो। उस समय न तो सोशल मीडिया था, न टीवी और न इंटरनेट। फिर भी स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों की सूचनाएं तीव्रगति से फैलती थीं और उन सूचनाओं को पा कर सब एकजुट हो जाते थे। अब सूचनाओं का ‘‘बूम’’ है तो हम व्यर्थ के विवादों में उलझे रहते हैं। आज बुनियादी ज़रूरत के सामानों की बढ़ती कीमतों के बजाए इसमें उलझे रहते हैं कि गांधी जी के पास कानून की डिग्री थी या नहीं। पल भर को यह मान भी लें कि उनके पास कानून की डिग्री नहीं थी तो क्या हम दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन को झुठला सकते हैं? आज डिग्रीधारी तो असंख्य हैं लेकिन सच्चे जनसेवकों और देशभक्तों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। इसीलिए जरूरी है कि समय-समय पर हम अपने इतिहास की किताबों को पढ़ते रहें, उन महात्माओं की जीवनियां पढ़ते रहें जिन्होंने हमारी स्वतंत्रता, शिक्षा और मुखरता का मार्ग प्रशस्त किया। हम याद रखें दांडी मार्च को भी जो नमक कानून तोड़ कर गुलामी के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन की हुंकार थी।

इस दांडी मार्च का एक और उजला पक्ष है जो उस भ्रम को तोड़ता है कि सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी में अनबन थी। यह सच है कि दोनों में आंदोलन के तरीके को ले कर मतभेद रहा जिसे हम ‘‘नरम दल’’ और ‘‘गरम दल’’ के रूप में पढ़ते-सुनते आए हैं। लेकिन सुभाषचंद्र बोस ने महात्मा गांधी के इस दांडी मार्च की प्रशंसा करते हुए कहा था कि -‘‘महात्मा जी के त्याग और देशप्रेम को हम सभी जानते ही हैं, पर इस यात्रा के द्वारा हम उन्हें एक योग्य और सफल रणनीतिकार के रूप में पहचानेंगे।’’
आज विचारणीय है कि वैचारिक मतभेद होते हुए भी एक-दूसरे के अच्छे कार्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की वह परंपरा अब कहां गई? क्या राजनीतिक पटल पर हमारा हृदय इतना संकुचित हो गया है कि हम अब सिर्फ़ बुरा देखना और बुरा बोलना ही जानते हैं? अर्थात् हमने गांधी जी के तीनों बंदरों को भी बिसार दिया है। जबकि हमें याद रखना चाहिए कि व्यर्थ के विवाद और अनावश्यक बहसों का रास्ता हमें कहीं नहीं ले जाता है किन्तु इतिहास और अतीत का रास्ता हमें एक अच्छे भविष्य की ओर अवश्य ले जाता है।
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Saturday, December 26, 2020

गोखले के सानिंध्य में गांधी के तीन माह | लेख | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

 

Dr (Miss) Sharad Singh

लेख

गोखले के सानिंध्य में गांधी के तीन माह

 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


भारतीय इतिहास में एक ऐसा वैश्विक व्यक्ति हुआ जिसने राजनीति को सात्विक बनाने के लिए अपने जीवन की कभी परवाह नहीं की। वे व्यक्ति थे महात्मा गांधी अर्थात् मोहन दास करमचंद गांधी अर्थात् राष्ट्रपिता महात्मा गांधी। गांधी जी गोपालकृष्ण गोखले को अपना गुरु मानते थे। यह मान्यता उन्होने गोखले के सानिंध्य में तीन माह व्यतीत करने के बाद दी। गांधी जी प्रथम दृष्टि में धारणा बना लेने वाले व्यक्तियों में से नहीं थें वे जांच-परख कर, परिस्थितियों एवं विचारों को अनुभूत करने के बाद ही कोई धारणा निर्धारित करते थे। 

सन् 1906 को दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में सम्पन्न होने वाले कांग्रेस के बाइसवें अधिवेशन में शामिल होने के लिए गांधी जी कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता अधिवेशन के अनुभव उनके लिए प्रियकर तो नहीं रहे किन्तु उन्हें अनेक ऐसे अनुभव हुए जिन्होंने उनके सम्पूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। अधिवेशन के उपरांत अन्य कांग्रेसी नेता अपने-अपने क्षेत्रों में लौट गए किन्तु गांधी जी कलकत्ता में ही रुके रहे। वे वहां रुककर दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीयों के पक्ष में समर्थन जुटाना चाहते थे। गांधी जी कुछ दिन ‘इंडिया क्लब’ में ठहरे। गोपाल कृष्ण गोखले ने युवा गांधी की योग्यता को पहचान लिया। वे गांधी जी को हठपूर्वक अपने साथ अपने निवास पर ले गये। लगभग तीन माह तक गांधी जी गोखले के घर रुके। इस दौरान गांधी जी ने जो अनुभव प्राप्त किए, वे उनके लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। उन अनुभवों ने गांधी जी के विचारों को एक नया मोड़ दिया। गोखले के निवास पर व्यतीत किए गए अपने तीन महीनों के अनुभवों के बारे में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

पहला महीना 

Mahatma Gandhi and Gopal Krishna Gokhale

‘‘पहले ही दिन गोखले ने मुझे यह अनुभव न करने दिया कि मैं मेहमान हूं। उन्होंने मुझे अपने सगे भाई की तरह रखा। मेरी सब आवश्यकताएं जान लीं और उनके अनुकूल सारी व्यवस्था कर दी। सौभाग्य से मेरी आवश्यकताएं थोड़ी ही थीं। मैंने अपना सब काम स्वयं कर लेने की आदत डाली थी, इसलिए मुझे दूसरों से बहुत थोड़ी सेवा लेनी होती थी। स्वावलम्बन की मेरी इस आदत की, उस समय की मेरी पोशाक आदि की, सफाई की, मेरे उद्यम की और मेरी नियमितता की उन पर गहरी छाप पड़ी थी और इन सबकी वे इतनी तारीफ करते थे कि मैं घबरा उठता था।

‘मुझे यह अनुभव न हुआ कि उनके पास मुझसे छिपाकर रखने लायक कोई बात थी। जो भी बड़े आदमी उनसे मिलने आते, उनका मुझसे परिचय कराते थे। ऐसे परिचयांे में आज मेरी आंखांे के सामने सबसे अधिक डाॅ. प्रफुल्लचन्द्र राय आते हंै। वे गोखले के मकान के पास ही रहते थे और कह सकता हूं कि लगभग रोज ही उनसे मिलने आते थे।

‘ये प्रोफेसर राय हैं। इन्हें हर महीने आठ सौ रुपये मिलते हैं। ये अपने खर्च के लिए चालीस रुपये रखकर बाकी सब सार्वजनिक कामों में देते हैं। इन्होंने ब्याह नहीं किया है और न करना चाहते हैं।’ इन शब्दों में गोखले ने मुझसे उनका परिचय कराया।

‘आज के डाॅ. राय और उस समय के प्रो. राय में मैं थोड़ा ही फर्क पाता हूं। जो वेश-भूषा उनकी तब थी, लगभग वही आज भी है। हां, आज वे खादी पहनते हैं, उस समय खादी थी ही नहीं। स्वदेशी मिल के कपड़े रहे होंगे। गोखले और प्रो. राय की बातचीत सुनते हुए मुझे तृप्ति ही न होती थी, क्योंकि उनकी बातें देशहित की ही होती थीं अथवा कोई ज्ञानचर्चा होती थी। कई दुःखद भी होती थीं क्योंकि उनमें नेताओं की टीका रहती थी। इसलिए जिन्हें मैंने महान योद्धा समझना सीखा था, वे मुझे बौने लगने लगे।

‘गोखले की काम करने की रीति से मुझे जितना आनन्द हुआ, उतनी ही शिक्षा भी मिली। वे अपना एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे। मैंने अनुभव किया कि उनके सारे काम देशकार्य के निमित्त से ही थे। सारी चर्चाएं भी देशकार्य की खातिर ही होती थीं। उनकी बातों में मुझे कहीं मलिनता, दम्भ अथवा झूठ के दर्शन नहीं हुए। हिन्दुस्तान की गरीबी और गुलामी उन्हें प्रतिक्षण चुभती थी। अनेक लोग अनेक विषयों में उनकी रुचि जगाने के लिए आते थे। उन सबको वे एक ही जवाब देते थे, आप यह काम कीजिए। मुझे अपना काम करने दीजिए। मुझे तो देश की स्वाधीनता प्राप्त करनी है। उसके मिलने पर ही मुझे दूसरा कुछ सूझेगा। इस समय तो इस काम से मेरे पास एक क्षण भी बाकी नहीं बचता।

‘रानाडे के प्रति उनका पूज्यभाव बात-बात में देखा जा सकता था। ‘रानाडे यह कहते थे’, ये शब्द तो उनकी बातचीत में लगभग ‘सूत्र वाक्य’ जैसे हो गए थे। मैं वहां था, उन्हीं दिनों रानाडे की जयन्ती (अथवा पुण्यतिथि, इस समय ठीक याद नहीं है) पड़ी थी। ऐसा लगा कि गोखले उसे हमेशा मनाते थे। उस समय वहां मेरे सिवा उनके मित्र प्रो. काथवटे और दूसरे एक सज्जन थे, जो सब-जज थे। इनको उन्होंने जयन्ती मनाने के लिए निमंत्रित किया और उस अवसर पर उन्होंने हमें रानाडे के अनेक संस्मरण सुनाए। रानाडे, तैलंग और मांडलिक की तुलना भी की। मुझे स्मरण है कि उन्होंने तैलंग की भाषा की प्रशंसा की थी। सुधारक के रूप में मांडलिक की स्तुति की थी। अपने मुवक्किल की वे कितनी चिन्ता रखते थे, इसके दृष्टान्त के रूप में यह किस्सा सुनाया कि एक बार रोज की ट्रेन छूट जाने पर वे किस तरह स्पेशल ट्रेन से अदालत पहुंचे थे और इस तरह रानाडे की चैमुखी शक्ति का वर्णन करके उस समय के नेताओं में उनकी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध की थी। रानाडे केवल न्यायमूर्ति नहीं थे, अर्थशास्त्री थे, सुधारक थे। सरकारी जज होते हुए भी वे कांग्रेस में दर्शक की तरह निडर भाव से उपस्थित होते थे। इसी तरह उनकी बुद्धिमत्ता पर लोगों को इतना विश्वास था कि सब उनके निर्णय को स्वीकार करते थे। यह सब वर्णन करते हुए गोखले के हर्ष की सीमा न रहती थी।

गोखले घोड़ागाड़ी रखते थे। मैंने उनसे इसकी शिकायत की। मैं उनकी कठिनाइयां समझ नहीं सका था। पूछा, ‘‘आप सब जगह ट्राम में क्यांे नहीं जा सकते? क्या इससे नेतावर्ग की प्रतिष्ठा कम होती है?’’

कुछ दुःखी होकर उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘क्या तुम भी मुझे पहचान न सके? मुझे बड़ी धारासभा से जो रुपया मिलता है, उसे मैं अपने काम में नहीं लाता। तुम्हें ट्राम में घूमते देखकर मुझे ईष्र्या होती है पर मैं वैसा नहीं कर सकता। जितने लोग मुझे पहचानते हैं, उतने ही जब तुम्हें पहचानने लगेंगे, तब तुम्हारे लिए भी ट्राम में घूमना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाएगा। नेता जो कुछ करते हैं, सो मौज-शौक के लिए ही करते हैं, यह मानने का कोई कारण नहीं है। तुम्हारी सादगी मुझे पसन्द हैं। मैं यथासम्भव सादगी से रहता हूं पर तुम निश्चित मानना कि मुझ जैसों के लिए कुछ खर्च अनिवार्य है।’’

‘‘इस तरह मेरी यह शिकायत तो ठीक ढंग से रद्द हो गयी पर दूसरी जो शिकायत मैंने की, उसका कोई सन्तोषजनक उत्तर वे नहीं दे सके। मैंने कहा पर आप टहलने भी तो ठीक से नहीं जाते। ऐसी दशा में आप बीमार रहे तो इसमें आश्चर्य क्या? क्या देश के काम में से व्यायाम के लिए भी फुरसत नहीं मिल सकती?’’

जवाब मिला, ‘‘तुम मुझे किस समय फुरसत में देखते हो कि मैं घूमने जा सकूं?’’

मेरे मन में गोखले के लिए इतना आदर था कि मैं उन्हें प्रत्युत्तर नहीं देता था। ऊपर के उत्तर से मुझे सन्तोष नहीं हुआ था, फिर भी चुप रहा। मैंने यह माना है और आज भी मानता हूं कि कितने ही काम होने पर भी जिस तरह हम खाने का समय निकाले बिना नहीं रहते, उसी तरह व्यायाम का समय भी हमें निकालना चाहिए। मेरी यह नम्र राय है कि इससे देश की सेवा अधिक ही होती है, कम नहीं।


दूसरा महीना

Mahatma Gandhi and Gopal Krishna Gokhale

‘गोखले की छायातले रहकर मैंने सारा समय घर में बैठकर नहीं बिताया। दक्षिण अफ्रीका के अपने ईसाई मित्रें से मैंने कहा था कि मैं हिन्दुस्तान के ईसाइयों से मिलूंगा और उनकी स्थिति की जानकारी प्राप्त करूंगा। मैंने कालीचरण बैनर्जी का नाम सुना था। वे कांग्रेस के कामों में अगुआ बनकर हाथ बंटाते थे, इसलिए मेरे मन में उनके प्रति आदर था। साधारण हिन्दुस्तानी ईसाई कांग्रेस से और हिन्दू-मुसलमानों से अलग रहा करते थे। इसलिए उनके प्रति मेरे मन में जो अविश्वास था, वह कालीचरण बैनर्जी के प्रति नहीं था। मैंने उनसे मिलने के बारे में गोखले से चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘‘वहां जाकर क्या पाओगे? वे बहुत भले आदमी हैं पर मेरा विचार है कि वे तुम्हें सन्तोष नहीं दे सकेंगे। मैं उन्हें भलीभांति जानता हूं। फिर भी तुम्हें जाना हो तो शौक से जाओ।’’

‘‘मैंने समय मांगा। उन्होंने तुरन्त समय दिया और मैं गया। उनके घर उनकी धर्मपत्नी मृत्युशय्या पर पड़ी थीं। घर सादा था। कांग्रेस अधिवेशन में उनको कोट-पतलून में देखा था पर घर में उन्हें बंगाली धोती और कुर्ता पहने देखा। यह सादगी मुझे पसन्द आई। उन दिनों मैं स्वयं पारसी कोट-पतलून पहनता था, फिर भी मुझे उनकी यह पोशाक और सादगी बहुत पसन्द आई। मैंने उनका समय न गंवाते हुए अपनी उलझनें पेश कीं।

उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘आप मानते हैं कि हम अपने साथ पाप लेकर पैदा होते हैं?’’

मैंने कहा, ‘‘जी हां।’’

‘‘तो इस मूल पाप का निवारण हिन्दू धर्म में नहीं है, जबकि ईसाई धर्म में है।’’ यूं कहकर वे बोले, ‘‘पाप का बदला मौत है। बाइबल कहती है कि इस मौत से बचने का मार्ग ईसा की शरण है।’’

मैंने ‘भगवद्गीता’ के भक्तिमार्ग की चर्चा की पर मेरा बोलना निरर्थक था। मैंने इन भले आदमी का उनकी भलमनसाहत के लिए उपकार माना। मुझे संतोष न हुआ, फिर भी इस भेंट से मुझे लाभ ही हुआ।

मैं यह कह सकता हूं कि इसी महीने मैंने कलकत्ते की एक-एक गली छान डाली। अधिकांश काम मैं पैदल चलकर करता था। इन्हीं दिनों मैं न्यायमूर्ति मित्र से मिला। सर गुरुदास बैनर्जी से मिला। दक्षिण अफ्रीका के काम के लिए उनकी सहायता की आवश्यकता थी। उन्हीं दिनांे मैंने राजा सर प्यारेमोहन मुखर्जी के भी दर्शन किए।

कालीचरण बैनर्जी ने मुझसे काली-मन्दिर की चर्चा की थी। वह मन्दिर देखने की मेरी तीव्र इच्छा थी। पुस्तक में मैंने उसका वर्णन पढ़ा था। इससे एक दिन मैं वहां जा पहुंचा। न्यायमूर्ति का मकान उसी मुहल्ले में था। अतएव जिस दिन उनसे मिला, उसी दिन काली-मन्दिर भी गया। रास्ते में बलिदान के बकरों की लम्बी कतार चली जा रही थी। मन्दिर की गली में पहंुचते ही मैंने भिखारियांे की भीड़ लगी देखी। वहां साधु-संन्यासी तो थे ही। उन दिनांे भी मेरा नियम हृष्ट-पुष्ट भिखारियांे को कुछ न देने का था। भिखारियों ने मुझे बुरी तरह घेर लिया था।

एक बाबाजी चबूतरे पर बैठे थे। उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा, ‘‘क्यों बेटा, कहां जाते हो?’’

मैंने समुचित उत्तर दिया। उन्होंने मुझे और मेरे साथियों को बैठने के लिए कहा। हम बैठ गए।

मैंने पूछा, ‘‘इन बकरों के बलिदान को आप धर्म मानते हैं?’’

‘‘जीव की हत्या को धर्म कौन मानता है?’’

‘‘तो आप यहां बैठकर लोगों को समझाते क्यांे नहीं?’’

‘‘यह काम हमारा नहीं है। हम तो यहां बैठकर भगवद् भक्ति करते हैं।’’

‘पर इसके लिए आपको कोई दूसरी जगह न मिली?’

बाबाजी बोले, ‘‘हम कहीं भी बैठंे, हमारे लिए सब जगह समान है। लोग तो भेंड़ांे के झुंड की तरह हैं। बड़े लोग जिस रास्ते ले जाते हैं, उसी रास्ते वे चलते हैं। हम साधुआंे को इससे क्या मतलब?’’

मैंने संवाद आगे नहीं बढ़ाया। हम मन्दिर में पहुंचे। सामने लहू की नदी बह रही थी। दर्शनांे के लिए खड़े रहने की मेरी इच्छा न रही। मैं बहुत अकुलाया, बेचैन हुआ। वह दृश्य मैं अब तक भूल नहीं सका हूं। उसी दिन मुझे एक बंगाली सभा का निमंत्रण मिला था। वहां मैंने एक सज्जन से इस क्रूर पूजा की चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा खयाल यह है कि वहां जो नगाड़े वगैरह बजते हैं, उनके कोलाहल में बकरों को चाहे जैसे भी मारो उन्हें कोई पीड़ा नहीं होती।’’

‘उनका यह विचार मेरे गले न उतरा। मैंने उन सज्जन से कहा कि यदि बकरांे को जबान होती तो वे दूसरी ही बात कहते। मैंने अनुभव किया कि यह क्रूर रिवाज बंद होना चाहिए। बुद्धदेव वाली कथा मुझे याद आयी पर मैंने देखा कि यह काम मेरी शक्ति से बाहर है। उस समय मेरे जो विचार थे, वे आज भी हैं। मेरे ख्याल से बकरों के जीवन का मूल्य मनुष्य के जीवन से कम नहीं है। मनुष्य देह को निबाहने के लिए मैं बकरे की देह लेने को तैयार न होऊंगा। मैं यह मानता हूं कि जो जीव जितना अधिक अपंग है, उतना ही उसे मनुष्य की क्रूरता से बचने के लिए मनुष्य का आश्रय पाने का अधिक अधिकार है, पर वैसी योग्यता के अभाव में मनुष्य आश्रय देने में असमर्थ है। बकरांे को इस पापपूर्ण होम से बचाने के लिए जितनी आत्मशुद्धि और जितना त्याग मुझमें है, उससे कहीं अधिक की मुझे आवश्यकता है। जान पड़ता है कि अभी तो उस शुद्धि और त्याग का रटन करते हुए ही मुझे मरना होगा। मैं यह प्रार्थना निरन्तर करता रहता हूं कि ऐसा कोई तेजस्वी पुरुष और ऐसी कोई तेजस्विनी सती उत्पन्न हो, जो इस महापातक में से मनुष्य को बचाए, निर्दोष प्राणियों की रक्षा करे और मन्दिर को शुद्ध करे। ज्ञानी, बुद्धिशाली, त्यागवृत्तिवाला और भावना-प्रधान बंगाल यह सब कैसे सहन करता है?

तीसरा महीना 

Mahatma Gandhi, Gopal Krishna Gokhale and Sarojani Nayadu

‘कालीमाता के निमित्त से होनेवाला विकराल यज्ञ देखकर बंगाली जीवन को जानने की मेरी इच्छा बढ़ गयी। ब्रह्मसमाज के बारे में तो मैं काफी पढ़-सुन चुका था। मैं प्रतापचन्द्र मजूमदार का जीवनवृतान्त थोड़ा जानता था। उनके व्याख्यान मैं सुनने गया था। उनका लिखा केशवचन्द्र सेन का जीवनवृत्तान्त मैंने प्राप्त किया और उसे अत्यन्त रसपूर्वक पढ़ गया। मैंने साधारण ब्रह्मसमाज और आदि ब्रह्मसमाज का भेद जाना। पंडित विश्वनाथ शास्त्री के दर्शन किए। महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के दर्शनों के लिए मैं प्रो. काथवटे के साथ गया पर वे उन दिनों किसी से मिलते न थे, इससे उनके दर्शन न हो सके। उनके यहां ब्रह्मसमाज का उत्सव था। उसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण पाकर हम लोग वहां गए थे और वहां उच्च कोटि का बंगाली संगीत सुन पाए थे। तभी से बंगाली संगीत के प्रति मेरा अनुराग बढ़ गया।

‘ब्रह्मसमाज का यथासम्भव निरीक्षण करने के बाद यह तो हो ही कैसे सकता था कि मैं स्वामी विवेकानन्द के दर्शन न करूं? मैं अत्यन्त उत्साह के साथ बेलूर मठ तक लगभग पैदल पहुंचा। मुझे इस समय ठीक से याद नहीं है कि मैं पूरा चला था या आधा। मठ का एकान्त स्थान मुझे अच्छा लगा था। यह समाचार सुनकर मैं निराश हुआ कि स्वामीजी बीमार हैं, उनसे मिला नहीं जा सकता और वे अपने कलकत्तेवाले घर में हैं। मैंने भगिनी निवेदिता के निवास स्थान का पता लगाया। चैरंगी के एक महल मैं उनके दर्शन किए। उनकी तड़क-भड़क से मैं चकरा गया। बातचीत में भी हमारा मेल नहीं बैठा।

गोखले से इसकी चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘‘वह बड़ी तेज महिला हैं। अतएव उससे तुम्हारा मेल न बैठा, इसे मैं समझ सकता हूं।’’

फिर एक बार उनसे मेरी भेंट पेस्तन जी के घर हुई थी। वे पेस्तन जी की वृद्धा माता को उपदेश दे रही थी, इतने में मैं उनके घर जा पहुंचा था। अतएव मैंने उनके बीच दुभाषिए का काम किया था। हमारे बीच मेल न बैठते हुए भी इतना तो मैं देख सकता था कि हिन्दू धर्म के प्रति भगिनी का प्रेम छलका पड़ता था। उनकी पुस्तकों का परिचय मैंने बाद में किया।

मैंने दिन के दो भाग कर दिए थे। एक भाग में दक्षिण अफ्रीका के काम के सिलेसिले मैं कलकत्ते में रहनेवाले नेताआंे से मिलने में बिताता था, और दूसरा भाग कलकत्ते की धार्मिक संस्थाओं और दूसरी सार्वजनिक संस्थाओं को देखने में बिताता था।

एक दिन बोअर-युद्ध में हिन्दुस्तानी शुश्रूषा-दल में जो काम किया था, उस पर डाॅ. मलिक के सभापतित्व में मैंने भाषण किया। ‘इंग्लिशमैन’ के साथ मेरी पहचान इस समय भी बहुत सहायक सिद्ध हुई। मि. सांडर्स उन दिनों बीमार थे पर उनकी मदद तो सन् 1896 में जितनी मिली थी, उतनी ही इस समय भी मिली। यह भाषण गोखले को पसन्द आया था और जब डाॅ. राय ने मेरे भाषण की प्रशंसा की तो वे बहुत खुश हुए थे।

यूं, गोखले की छाया में रहने से बंगाल में मेरा काम बहुत सरल हो गया था। बंगाल के अग्रगण्य कुटुम्बांे की जानकारी मुझे सहज ही मिल गयी और बंगाल के साथ मेरा निकट सम्बन्ध जुड़ गया। इस चिरस्मरणीय महीने के बहुत से संस्मरण मुझे छोड़ देने पड़ेंगे। उस महीने में मैं ब्रह्मदेश का भी एक चक्कर लगा आया था। मैंने स्वर्ण-पैगोडा के दर्शन किए। मंदिर में असंख्य छोटी-छोटी मोमबत्तियां जल रही थीं। वे मुझे अच्छी नहीं लगी। मन्दिर के गर्भगृह में चूहों को दौड़ते देखकर मुझे स्वामी दयानन्द के अनुभव का स्मरण हो आया। ब्रह्मदेश की महिलाआंे की स्वतंत्रता, उनका उत्साह और वहां के पुरुषों की सुस्ती देखकर मैंने महिलाओं के लिए अनुराग और पुरुषांे के लिए दुःख अनुभव किया। उसी समय मैंने यह भी अनुभव किया कि जिस तरह बम्बई हिन्दुस्तान नहीं हैं, उसी तरह रंगून ब्रह्मदेश नहीं है और जिस प्रकार हम हिन्दुस्तान में अंग्रेज व्यापारियों के कमीशन एजेंट या दलाल बने हुए हैं, उसी प्रकार ब्रह्मदेश में हमने अंग्रेजांे के साथ मिलकर ब्रह्मदेशवासियांे को कमीशन एजेंट बनाया है।

‘ब्रह्मदेश से लौटने के बाद मैंने गोखले से विदा ली। उनका वियोग मुझे अखरा पर बंगाल अथवा सच कहा जाए तो कलकत्ते का मेरा काम पूरा हो चुका था।

‘‘मैंने सोचा था कि धन्धे में लगने से पहले हिन्दुस्तान की एक छोटी-सी यात्रा रेलगाड़ी के तीसरे दर्जे में करूंगा और तीसरे दर्जें में यात्रियों का परिचय प्राप्त करके उनका कष्ट जान लूंगा। मैंने गोखले के सामने अपना यह विचार रखा। उन्होंने पहले तो उसे हँसकर उड़ा दिया पर जब मैंने इस यात्र के विषय मैं अपनी आशाओं का वर्णन किया, तो उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मेरी योजना को स्वीकृति दे दी। मुझे पहले तो काशी जाना था और वहां पहुंचकर विदुषी ऐनी बेसेंट के दर्शन करने थे। वे उस समय बीमार थीं।’’

कलकत्ता में गोपाल कृष्ण गोखले के साथ कुछ दिन व्यतीत करना  गांधी जी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहा। सन् 1912 में गांधी जी के आमंत्रण पर गोखले स्वयं दक्षिण अफ्रीका गए और वहां जारी रंगभेद का विरोध किया। गांधी जी ने गोखले को हमेशा अपना ‘राजनीतिक गुरु’ माना। 

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महात्मा गांधी के जीवन पर मेरी पुस्तक -

Rashtravadi Vyaktitva Mahatma Gandhi written by Dr (Miss) Sharad Singh 
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Friday, October 2, 2020

सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार | डॉ. शरद सिंह | 2 अक्टूबर | जन्मतिथि पर विशेष

2 अक्टूबर - जन्मतिथि पर विशेष :
  सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार
                - डॉ. शरद सिंह
       अपने जीवन को कष्टों के सांचे में ढालकर दूसरों के लिए सुखों की खोज करने वाले महात्मा गांधी बीसवीं सदी के महानायकों में से एक थे। उनके विचारों, उनके कार्यों एवं उनके जीवन-दर्शन ने समूची मानवता को नये आदर्श प्रदान किए। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है।’’ स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
    वैश्विक स्तर पर महात्मा गांधी के विचारों को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि 15 जून, 2007 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित करने के लिए मतदान हुआ, तदुपरान्त संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 अक्टूबर के दिन को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया। महात्मा गांधी के विचारों को ‘गांधीवाद’ के नाम से पुकारा जाता है। गांधीवाद को अपनाने के लिए उनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विचारों को अपनाना आवश्यक है।
     महात्मा गांधी राजनीति का परिष्कृत रूप स्थापित करना चाहते थे। उनका मानना था कि राजनीति के परिष्कार के लिए राजनीति में सत्य, अहिंसा, नैतिकता, परोपकार, सादगी एवं सदाचार का अधिक से अधिक प्रतिशत होना चाहिए तभी राजनीति दूषित होने से बची रहती है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में राजनीति में जो हिंसा, बाहुबल, बेईमानी, भाई-भतीजावाद एवं आर्थिक घोटालों का बोलबाला दिखाई देता है, उसमें महात्मा गांधी के ‘राजनीति के परिष्कार’ का मूलमंत्र प्रासंगिक एवं व्यावहारिक ठहरता है। यदि राजनेताओं में संयम रहे अथवा संयमित व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करें तो राजनीति का परिष्कार सम्भव है। एक स्वस्थ राजनीतिक परिवेश देश के प्रत्येक तबके को उसके अधिकारों से जोड़ सकता है और राजनीतिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों के मन में विश्वास पैदा कर सकता है।
         महिलाओं को सशक्त बनाने का स्वप्न ही महात्मा गांधी के स्त्री-आंदोलन की बुनियाद था। महात्मा गांधी मानते थे कि स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष सशक्त होना चाहिए। वे राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के पक्षधर थे। वस्तुतः महात्मा गांधी का अहिंसावादी आंदोलन स्त्रियों की उपस्थिति के कारण अधिक सार्थक परिणाम दे सका। इस तथ्य को महात्मा गांधी ने स्वीकार करते हुए एक बार कहा था कि स्त्रियां प्रकृति से ही अहिंसावादी होती हैं। स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं, अतः स्त्रियों की उपस्थिति से अहिंसावादी आंदोलन एवं सत्याग्रह अधिक कारगर हो सकते हैं।
     महात्मा गांधी स्त्रियों को अबला कहने के विरोधी थे। वे मानते थे कि स्त्री पुरुषों की भांति सबल और शक्ति सम्पन्न है। जिस प्रकार एक सशस्त्र पुरुष के सामने निःशस्त्र पुरुष कमजोर प्रतीत होता है, ठीक उसी तरह सर्वअधिकार प्राप्त पुरुषों के सामने स्त्री अबला प्रतीत होती है जो कि वस्तुतः अबला नहीं है। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।’’
          गांधी जी मानते थे कि स्त्रियों की उपस्थिति पुरुषों को भी आचरण की सीमाओं में बांधे रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में स्त्रियों को शामिल होने दिया। उन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत स्त्रियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। वे स्त्रियों को एक स्त्री के रूप में न देखकर एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखते थे। वे पारिवारिक सम्पत्ति पर पुरुषों के बराबर स्त्रियों को स्वामित्व दिए जाने के भी पक्षधर थे।
          महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘कोई भी राष्ट्र अपनी आधी आबादी (अर्थात् स्त्रियों) की अनदेखी करके विकास नहीं कर सकता है।’’ वे कहते थे कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कमजोर नहीं समझना चाहिए। वे स्त्रियों के आर्थिक स्वावलम्बन एवं शिक्षा के पक्षधर थे। शुचिता एवं सतीत्व के नाम पर स्त्रियों को बन्धन में रखना वे पसन्द नहीं करते थे। महात्मा गांधी का यह विचार हर युग में खरा उतरता है।
      महात्मा गांधी ने स्वच्छता पर विशेष बल दिया। जब वे दक्षिण अफ्रीका में थे तो वहां उन्हें अनुभव हुआ कि वहां बसे भारतीय स्वच्छता पर ध्यान नहीं देते हैं जिसके कारण अंग्रेज उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं। इस पर महात्मा गांधी ने वहां स्वच्छता आंदोलन चलाया। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अफ्रीका में बसे भारतीय समाज में घर-बार साफ रखने के महत्त्व को स्वीकार कर लिया गया।
      महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी का सामना असीम गन्दगी से हुआ। कई बार उन्होंने स्वयं झाड़ू लेकर दूसरों का भी पाखाना साफ किया। अपनी भारत-यात्रा के दौरान भी रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बे में व्याप्त गन्दगी का साम्राज्य तथा काशी की गलियों में फैली हुई गन्दगी ने उनके मन को आहत किया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
  यदि महात्मा गांधी के विचारों को अपनाकर स्वच्छता को जीवन का अंग बना लिया जाए तो नागरिकों को स्वस्थ तन-मन की सम्पदा मिल सकती है। वस्तुतः महात्मा गांधी का प्रत्येक विचार हर युग में हर परिस्थिति में प्रासंगिक है और रहेगा। यदि उनके मर्म को भली-भांति समझकर उसे आत्मसात किया जाए।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’)
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Wednesday, October 2, 2019

बुंदेलखंड में महात्मा गांधी की यात्राओं का लोक पर प्रभाव - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

बुंदेलखंड में महात्मा गांधी की यात्राओं का लोक पर प्रभाव
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
 
(नवभारत में प्रकाशित)
   
 वह स्वतंत्रता आंदोलन का दौर था। प्रत्येक भारतीय स्वतंत्रता पाना चाहता था और एक ऐसे नेता के पीछे चलने को आतुर था जो आडंबर रहित और अहिंसावादी विचारों का था। वह नेता थे महात्मा गांधी। उन्होंने स्वयं को कभी नेता नहीं माना किन्तु सारी दुनिया ने उन्हें भारत का सर्वोच्च नेता माना। 
Navbharat -  Bundelkh Me Mahatma Gandhi Ki Yatrayen Aur Lok pr Prabhav  - Dr Sharad Singh
        राष्ट्रीयस्तर पर जिस मुद्दे को गंभीरता से किसी ने नहीं लिया उस ओर गांधी जी ने दृढ़तापूर्वक कदम उठाया। महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को वायसराय को सूचित किया कि वे अपने 78 अनुयाइयों के साथ ‘दांडी मार्च’ (दांडी यात्रा) करने जा रहे हैं। ‘दांडी मार्च’ से अभिप्राय उस पैदल यात्रा से है, जो महात्मा गांधी और उनके स्वयंसेवकों द्वारा 12 मार्च, 1930 ई. को प्रारम्भ की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य था, अंग्रेजों द्वारा बनाए गए ‘नमक कानून’ को तोड़ना। आश्रम के कई सदस्य, पुरुष और महिलाएं 24 दिन की ऐतिहासिक यात्रा पर रवाना हुए। गरीब किसान ब्रिटिश कानून के कारण अपनी ‘नमक की खेती’ नहीं कर पा रहे थे। गांधी जी ने वेब मिलर सहित अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 358 कि.मी. दूर स्थित दांडी नामक स्थान के लिए 12 मार्च, 1930 ई. को प्रस्थान किया। लगभग 24 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को यात्रा के आखिरी दिनों में अपना पड़ाव बनाया था। यहां से कराडी और दांडी की यात्रा पूरी की थी। नवसारी से दांडी का फासला लगभग 13 मील का है।
11 मार्च, 1930 को गांधी जी ने इच्छा प्रकट की कि आंदोलन लगातार चलता रहे, इसके लिए सत्याग्रह की अखंड धारा बहती रहनी चाहिए, कानून भले ही भंग हो पर शांति रहे। लोग अहिंसा और धैर्य का रास्ता अपनाएं। 11 मार्च की संध्या की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गांधी जी ने कहा, ‘‘मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरूं या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूंगा।’’
12 मार्च को प्रातः वह ऐतिहासिक दिन आरम्भ हुआ जब 61 वर्षीय महात्मा गांधी के नेतृत्व में 78 सत्याग्रहियों ने यात्रा आरम्भ की। उस समय किसने सोचा था कि सुदूर बुंदेलखंड में भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा होगा। महात्मा गांधी के तेजस्वी और स्फूर्तिमय व्यक्तित्व ने देश की जनता के मन में ऊर्जा का संचार किया। बुंदेलखंड में भी इस आंदोलन के विचार पहुंचे और देखते ही देखते अनेक स्वतंत्रता प्रेमी महात्मा गांधी के समर्थन में आ खड़े हुए। उस समय यह बुंदेली गीत जोर-शोर से गाया जाता था-
हमें सोई नमक तोड़बे के लाने जाने है
गांधी को साथ निभाने है,
अंग्रेजन खों मार भगाने हैं....
लगभग दस वर्ष पहले पन्ना (म.प्र.) के 75 वर्षीय ठाकुर लच्छे दाऊ ने अपना संस्मरण सुनाते हुए मुझे यह गीत सुनाया था और साथ ही एक घटना भी बताई थी कि उनकी दादी और मां इस गीत को गाती हुई चक्की चलाया करती थीं। पन्ना में नियुक्त अंग्रेजों के नुमाइंदे अधिकारी को किसी ने इस बात की शिक़ायत कर दी कि ठाकुर परिवार के घर की महिलाएं अंग्रेज विरोधी कार्यक्रम में संलिप्त हैं। इसके बाद घर पर दो सिपाही आ धमके। मां और दादी ने पर्दे के भीतर से ही बात की और गीत को बदल कर सुनाते हुए फटकार लगा दी। बेचारे सिपाही अपना-सा मुंह ले कर लौट गए। लेकिन इस घटना ने महिलाओं के बीच दांडी यात्रा की चर्चा को और हवा दे दी।
महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के संबंध में एक और गीत प्रचलित था-
मैंहगो नमक हमें नई खाने
अंग्रेजन को सबक सिखाने
आए हमाए ऐंगर गांधी
जेई बात हमखों समझाने
बुजुर्ग बताते हैं कि महात्मा गांधी सागर भी आए थे। यहां उनकी यात्रा से संबधित पोस्टर छापे गए थे। वे अनंतपुरा से 2 दिसंबर की शाम 4 बजे सागर आए थे। स्टेशन के पास उनकी आमसभा हुई थी, जो शाम 7 बजे तक चली। आज़ादी के दौर में हर तरफ गांधी का नाम गूंज रहा था। वक्ता के तौर पर उनको सुनने काफी लोगों की भीड़ जमा हुआ करती थी।
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चर्चा प्लस .. (2 अक्टूबर) जन्मतिथि पर विशेष : सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस .. (2 अक्टूबर) जन्मतिथि पर विशेष :
 

सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार
- डॉ. शरद सिंह
        

अपने जीवन को कष्टों के सांचे में ढालकर दूसरों के लिए सुखों की खोज करने वाले महात्मा गांधी बीसवीं सदी के महानायकों में से एक थे। उनके विचारों, उनके कार्यों एवं उनके जीवन-दर्शन ने समूची मानवता को नये आदर्श प्रदान किए। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है।’’ स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
Charcha Plus - (2 अक्टूबर) जन्मतिथि पर विशेष... सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
    वैश्विक स्तर पर महात्मा गांधी के विचारों को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि 15 जून, 2007 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित करने के लिए मतदान हुआ, तदुपरान्त संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 अक्टूबर के दिन को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया। महात्मा गांधी के विचारों को ‘गांधीवाद’ के नाम से पुकारा जाता है। गांधीवाद को अपनाने के लिए उनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विचारों को अपनाना आवश्यक है।
महात्मा गांधी राजनीति का परिष्कृत रूप स्थापित करना चाहते थे। उनका मानना था कि राजनीति के परिष्कार के लिए राजनीति में सत्य, अहिंसा, नैतिकता, परोपकार, सादगी एवं सदाचार का अधिक से अधिक प्रतिशत होना चाहिए तभी राजनीति दूषित होने से बची रहती है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में राजनीति में जो हिंसा, बाहुबल, बेईमानी, भाई-भतीजावाद एवं आर्थिक घोटालों का बोलबाला दिखाई देता है, उसमें महात्मा गांधी के ‘राजनीति के परिष्कार’ का मूलमंत्र प्रासंगिक एवं व्यावहारिक ठहरता है। यदि राजनेताओं में संयम रहे अथवा संयमित व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करें तो राजनीति का परिष्कार सम्भव है। एक स्वस्थ राजनीतिक परिवेश देश के प्रत्येक तबके को उसके अधिकारों से जोड़ सकता है और राजनीतिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों के मन में विश्वास पैदा कर सकता है।
महिलाओं को सशक्त बनाने का स्वप्न ही महात्मा गांधी के स्त्री-आंदोलन की बुनियाद था। महात्मा गांधी मानते थे कि स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष सशक्त होना चाहिए। वे राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के पक्षधर थे। वस्तुतः महात्मा गांधी का अहिंसावादी आंदोलन स्त्रियों की उपस्थिति के कारण अधिक सार्थक परिणाम दे सका। इस तथ्य को महात्मा गांधी ने स्वीकार करते हुए एक बार कहा था कि स्त्रियां प्रकृति से ही अहिंसावादी होती हैं। स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं, अतः स्त्रियों की उपस्थिति से अहिंसावादी आंदोलन एवं सत्याग्रह अधिक कारगर हो सकते हैं।
महात्मा गांधी स्त्रियों को अबला कहने के विरोधी थे। वे मानते थे कि स्त्री पुरुषों की भांति सबल और शक्ति सम्पन्न है। जिस प्रकार एक सशस्त्र पुरुष के सामने निःशस्त्र पुरुष कमजोर प्रतीत होता है, ठीक उसी तरह सर्वअधिकार प्राप्त पुरुषों के सामने स्त्री अबला प्रतीत होती है जो कि वस्तुतः अबला नहीं है। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।’’
गांधी जी मानते थे कि स्त्रियों की उपस्थिति पुरुषों को भी आचरण की सीमाओं में बांधे रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में स्त्रियों को शामिल होने दिया। उन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत स्त्रियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। वे स्त्रियों को एक स्त्री के रूप में न देखकर एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखते थे। वे पारिवारिक सम्पत्ति पर पुरुषों के बराबर स्त्रियों को स्वामित्व दिए जाने के भी पक्षधर थे।
महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘कोई भी राष्ट्र अपनी आधी आबादी (अर्थात् स्त्रियों) की अनदेखी करके विकास नहीं कर सकता है।’’ वे कहते थे कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कमजोर नहीं समझना चाहिए। वे स्त्रियों के आर्थिक स्वावलम्बन एवं शिक्षा के पक्षधर थे। शुचिता एवं सतीत्व के नाम पर स्त्रियों को बन्धन में रखना वे पसन्द नहीं करते थे। महात्मा गांधी का यह विचार हर युग में खरा उतरता है।
महात्मा गांधी ने स्वच्छता पर विशेष बल दिया। जब वे दक्षिण अफ्रीका में थे तो वहां उन्हें अनुभव हुआ कि वहां बसे भारतीय स्वच्छता पर ध्यान नहीं देते हैं जिसके कारण अंग्रेज उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं। इस पर महात्मा गांधी ने वहां स्वच्छता आंदोलन चलाया। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अफ्रीका में बसे भारतीय समाज में घर-बार साफ रखने के महत्त्व को स्वीकार कर लिया गया।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी का सामना असीम गन्दगी से हुआ। कई बार उन्होंने स्वयं झाड़ू लेकर दूसरों का भी पाखाना साफ किया। अपनी भारत-यात्रा के दौरान भी रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बे में व्याप्त गन्दगी का साम्राज्य तथा काशी की गलियों में फैली हुई गन्दगी ने उनके मन को आहत किया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
यदि महात्मा गांधी के विचारों को अपनाकर स्वच्छता को जीवन का अंग बना लिया जाए तो नागरिकों को स्वस्थ तन-मन की सम्पदा मिल सकती है। वस्तुतः महात्मा गांधी का प्रत्येक विचार हर युग में हर परिस्थिति में प्रासंगिक है और रहेगा। यदि उनके मर्म को भली-भांति समझकर उसे आत्मसात किया जाए।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 02.10.2019)
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