- डॉ. शरद सिंह
गुलाबी रंग लड़की का और नीला रंग लड़के का प्रतीक
माना जाता है। लेकिन जब बात युवा लड़की की हो तो उसका रंग गुलाबी से सतरंगी हो
जाता है, बिलकुल उसके सपनों की तरह। इससे भी आगे बढ़ कर देखा जाए तो समूचे
स्त्री-जीवन में अनेक रंग दिखाई देने लगते हैं।
स्त्री जब युवा होती है, एक अविवाहित युवती के रूप
में, तो उसके जीवन में उसके सपनों के राजकुमार और उसके कैरियर के रंग दिखाई देते
हैं। ये रंग उसके छलछलाते आत्मविश्वास, उमंग और लावण्यता के रूप में दुनिया के
सामने होते हैं। लाल, सुनहरा और सूरज की किरणों के समान चमकदार चमकीला रंग उसके
जीवन का पर्याय होता है। दुनिया जीत लेने की, सबको अपना बना लेने की अदम्य लालसा
उसे क्रांतिकारी नारंगी रंग में रंग देती है। कभी-कभी उसे अपने सपनों के राजकुमार
को पाने के लिए भी बगावत के रंग को अपनाना पड़ता है। जब समाज परिवार उसके सपनों के
राजकुमार का विरोध करते हैं और वह उसे पाने के लिए कटिबद्ध हो उठती है। तभी उभरता
है बगावती रंग।
युवावस्था के अनेक रंगों में ठहराव का रंग भी होता
है कभी-कभी, बिलकुल शांत ठहरे हुए पानी की तरह नीला रंग। कई लड़कियां बगावत नहीं
करती हैं। वे अपने परिवार की सलाह पर चलती हैं, चाहे-अनचाहे। अनचाही स्थिति पर
नीले रंग जल्दी ही धुल जाता है और उसकी जगह ले लेता है उदासी का धूसर-पीला रंग। यह
अनचाहे समझौते का रंग है जो स्त्री के जीवन में अकसर प्रभावी रहता है। फिर भी यदि
स्त्री में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है और वह आशावादी है तो उसके जीवन
में कई बार रंगों की सतरंगी बहार अपनी छटा बिखेरती रहती है। युवा स्त्री जब विवाह
के बंधन में बंधती है तो इन्द्रधनुषी रंगों की छटा उसके जीवन में उतर आती है। यदि
ससुराल में उसे सुखद जीवन मिलता है तो इन्द्रधनुष के रंग उसके जीवन में गहराते चले
जाते हैं। यदि दुर्भाग्यवश, ससुराल में दहेज लोभियों या शराबी, दुराचारी पति से
पाला पड़ता है तो उसके जीवन के सभी सुन्दर, चटख रंग उड़ जाते हैं और शेष रह जाता
है गहरा काला रंग जो कि गहन दुख का प्रतीक होता है।
एक विवाहित स्त्री के जीवन में पति का प्यार सोने
जैसा सुनहरे रंग भर देता है। यह सुखद पारिवारिक जीवन और सुदृढ़ परिवार का आधार
होता है। आखिर पति और पत्नी ही तो परिवार के मुख्य आधार होते हैं। वे ही परिवार का
सृजन और वृद्धि करते हैं। जैसे स्वर्ण आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करता है
वैसे ही पति-पत्नी का पारस्परिक प्रेम और सम्मान पारिवारिक जीवन को मजबूत बनाता
है। पति और पत्नी पारिवारिक जीवन की दो आंखों की भांति हैं। यदि दोनों आंखें
अलग-अलग रंगों की होंगी तो परिवार का चेहरा भद्दा और विचित्र दिखेगा। इसीलिए दोनों
आंखों का एक समान रंग का होना नितान्त आवश्यक है यानी पति और पत्नी परिवार में
समान अधिकार से रहें और एक-दूसरे के सहयोगी बने रहें। न कोई दासी, न कोई नौकर, न
कोई मालकिन, न कोई मालिक-जब दोनों से मिल कर परिवार बनता है तो दोनों को एक समान
अधिकार होने चाहिए परिवार में, तभी तो हंसते-खिलखिलाते चटख रंग जीवन में प्रवेश कर
पाते हैं। अन्यथा धूसर, काले, स्लेटी जैसे डिप्रेसिव रंग ही अपनी धाक जमाए रहते और
परिवार के सभी लोगों को परेशान करते रहते हैं।
स्त्री-जीवन में उस समय दुनिया के सभी रंग एक बार
फिर समा जाते हैं जब वह एक नए जीवन को गढ़ना शुरु करती है अर्थात् मातृत्व धारण
करती है। यहीं से आरम्भ होता है स्त्री के जीवन में रंगों का दूसरा अध्याय। इसमें
वह चुन-चुन कर कोमल रंग भरने का प्रयास करती है ताकि उसके गर्भस्थ शिशु और बाद में
उसकी संतान को किसी अवसादी रंग का सामना न करना पड़े। एक मां सारे अवसादी रंग अपने
हिस्से में और सभी सुन्दर, कोमल और उत्साही रंग अपनी संतान के हिस्से में कर देना
चाहती है। रंगों के बंटवारे की यह आकांक्षा मातृत्व धारण करनने के बाद से जीवन
पर्यान्त बनी रहती है। एक मां चाहे युवा हो या प्रौढ़ा या वृद्धा, एक संतान चाहे
शिशु हो, युवा हो या पूर्ण वयस्क, मां के लिए वह संतान के रूप में कोमल और
असुरक्षित ही रहता है। मां अपनी संतान को हर पल अपनी सुरक्षा देने के लिए तत्पर
रहती है। चाहे उसे इसके लिए कोई भी कदम उठाना पड़े। वह ममत्व के कोमल रंगों को
जीती है, आवश्यकता पड़ने पर संतान की सुरक्षा के लिए चटख आक्रामक रंगों की भांति
बगावती हो उठती है और यदि जरूरी हुआ तो अपने सभी सुखों का त्याग कर के दुख के काले
रंग को जीती हुई भी ऊपर से उन रंगों की रांगोली सजाती रहती है जिससे उसकी संतान पर
शोक का काला रंग न पड़ने पाए।
‘इंडिया इनसाइड’ के अप्रैल 2013 अंक में मेरे स्तम्भ ‘वामा’ में प्रकाशित मेरा लेख
साभार)


