बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की
रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
आज संकारे से भौजी को फोन आओ के गांकरें बना रए, आ जाओ। दुफारी को इतई जीमियो। काय से भौजी खों पतो के मोए गांकरें भौतई पुसात आएं। जो पिसी के आटा की होए तो कोनऊं नईं, बाकी जुंडी औ बाजरे के आटा की होए तो औरई मजा आ जात आए। भौजी को न्योतो सुन के मोए लगो के बे अकेली कां लौं बनाहें, सो मैंने सोई उनके इते पैलई पौंचने की सोच लई औ झट्टई तैयार हो के उनके इते जा पौंची।
‘‘चलो भौजी मैं सोई हाथ बंटा दे हौं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे कछू नईं हम तो अकेले बना लेते। बाकी जो अब तुम आ गई हो सो जा भंटा को भरता बनाओ, ज्यों लौं हम गाकरों के लाने आटा गूंथ लेत आएं। अपने भैयाजी खो सोई टेर लेओ। इतई गरमा-गरम बनात जाबी औ जीमत जाबी।’’ भौजी बोलीं।
मैंने भैयाजी खों टेर लगाई। बे सोई सपर-खोंर के भगवान खों अगरबत्ती लागा-लुगू के तैयार हते। मनो मोए गरमा-गरम गाकरों से कछू पुरानी यादें आ गईं।
‘‘भौजी, कछू कर लओ जाए पर मोए बा गाकरें आ लौं ने बिसरीं जोन की सुगंध मोए पन्ना में मिलत्ती।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अच्छा, उते तुमाए इते गाकरें बनो करत रई हुइएं।’’ भौजी गाकर की लोई अपनी गदेली पे थपियात भईं बोलीं।
‘‘नईं, घरे वारी नोंईं। उते का हतो के मोरे घर के इते रओ छत्रसाल पार्क औ छत्रसाल पार्क के सामने रओ बड़ो सो मैदान। बाकी अब बा मैदान नईं बचो, लेकन ऊ टेम पे रओ। उते इतवार की बजरिया भरत्ती। भौतई बड़ी वारी। दूर-दूर से किसान हरें अपनो नाज बैलगाड़ी में भर के दो दिनां पैले से आ जात्ते। उतई एक बड़ो सो कुआ रओ। ओई कुआ के पानी से बे सपरत्ते, ओई को पानी पियत्ते, ओई पानी से खाना बनाउत्ते और बोई कुआ के पानी अपने बैलन खों पियाउत्ते। उतई कुआ के दोई तरफी बे अपनो डेरा डारत्ते। उनके संगे उनके घर की लुगाइयां ने आउत्तीं। खाली मरद हरें आउत्ते। बेई कंडा बार के दोई टेम अपने लाने गांकरें सेंकत्ते और भरता बनाउत्ते। ऊ तरफी से कढ़ो तो इत्ती नोनी सुगंध मिलत्ती के का कई जाए। पेट चाए टनटना के भरो होए, मनो लगत्तो के एकाद गाकर खाबे खों मिल जाए।’’ मैंने बताई।
‘‘फेर कभऊं खाबे खो मिली के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मिली ना! बा कई जात आए ने के जां चाह उते राह, सो मोरो जुगाड़ बी बन गओ। भओ का के ऊ टेम पे मोरे कमल मामा जू पन्ना में हते। आप ओरें तो जानत आओ के बे बतकाव करे में उस्ताद हते। उन्ने एक किसान से दोस्ती गांठ लई। फेर एक दिनां ऊसे कई के मोरी भांजी खों तुमाए हाथ की गांकरे खाने। बा किसान भौतई खुस भओ औ ऊने मोए बड़े लाड़ से भरता औ टमाटर की चटनी के संगे गाकड़े खवाईं। औ आपके लाने बता दूं के उनके लिंगे सिल-बट्टा तो रैत नई हतो सो बे टमाटर खों कंडा में भून के हाथ से मसक-मसक के चटनी बनाऊत्ते। ऊमें हरी धनां सोई डरी रैत्ती। ऊंसी गांकरें मैंने फेर कभऊं कऊं ने खांईं। ऊको स्वादई कछू औ रैत्तो। जो आज के हिसाब से तनक सयानेपन से कई जाए तो ऊमें सई की माटी की सुगंध रैत्ती।’’ मैंने बताई।
‘‘होत आए। ऐसो सई में होत आए। हमें सोई याद पर रई के लरकपन में जब हम फुआ के इते जात्ते तो उनके इते उल्टे तवा पे रोटी सेंकी जात्तीं। मनो बोई पिसी को आटा लेकन हाथ से थपिया के उल्टो तवा पे सेंकी गई रोटियन को स्वादई कछू दूसरो रैत्तो। उते से लौट के जब अम्मा के हाथ की सीदे तवा की रोटी जीमत्ते तो बा स्वाद न मिलत्तो। हम अम्मा से कैत्ते के फुआ घांई रोटियां काए नईं बनाऊंत, तो बे हम ओरन खों डांट के कैत्तीं के उते जा के उल्टे तवा की रोटियां जीम-जीम के तुम ओरन को दिमाग उलट गओ आए। जो हम बना रए, खाने होए सो बई खाओ ने तो जाओ अपनी फुआ के घरे। अब फुआ के घरे जा के बरहमेस तो रै नईं सकत्ते, सो मों दाब के अम्मा की बनाई रोटियां खान लगत्ते।’’ भैयाजी ने हंसत भए बताई।
‘‘ऊको कल्ला कओ जात आए। बा मिट्टी को होत आए। बाकी कोनऊं के लिंगे कल्ला ने होए तो बा तवा उल्टो कर के बी रोटियां सेक लेत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो ऐसई तो हमाए संगे रओ के हमें लकड़ी के चूला की रोटियां नोंनी लगत्तीं। फेर जब घरे गैस चूला आ गओ सो ऊपे सिकीं रोटियां हमाए गले से ने उतरत्ती। ऊ टेम पे हमाए बाबू कओ करत्ते के गैस चूला को बनो खाना मनो अच्छो तो नईं लगत, पर एक दिनां ऐसो आहे के चूला के लाने लकड़ियां ने मिलहें औ हमें जेई पे पको खाना खाने परहे। फेर भओ बी बोई। आज देख लेओ, चाए भरता बनाने होए चाए गाकरें बनाने होंए, गैस चूला पे बनत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘गैस चूला भर नोईं भौजी, अबतो माइक्रोवेव ओवन में बनत आए। मैं सोई भरता को भंटा ओवन में भूनत हौं। औ संगे बाटी बनाने होए तो ओवन में बनत आएं बाटियां।’’ मैंने कई।
‘‘मनो ऊको स्वाद ऊंसो सो नईं रैत जैसे कंडा में सिंकी बाटियन को होत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब तुम ओरन ने इत्ती बतकाव कर लई गाकरों औ बाटियन की के मोरो जी कर रओ के कऊं बायरे चलें औ उतई गाकरें बना के खाएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। घूमें फिरे से मन अच्छो रैत आए। कछू हवा-पानी बदलो चाइए। जेई घरे पिड़े-पिड़े बोरियत सी होन लगत आए। चलो ने कछू पिलान बनाओ जाए।’’मैंने तुरतईं कई। काय से के मैं तो मनो जनम से घुमक्कड़ ठैरी। मोए घूमबो-फिरबो भौतई पुसात आए।
‘‘हऔ, शिवरातें सोई आ रई। शिवरातों पे चलो जाए कऊं। जटाशंकर कैसो रैहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ चल तो सकत आएं मनो जटा शंकर में भारी भीर उमरहे, सो कऊं देहात के मेला वारे मंदिर में चलो जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपने सई कई। मेला की भीर से मोए याद आ गई के एक दार मैं मोरी दीदी औ एक भैयाजी पन्ना में चैमुखनाथ के मेला गए। उते भौतई भीर हती। सो मैंने दीदी को हात पकर लओ औ भैयाजू ने दीदी को हात पकर लओ, के हम ओरे कऊं बिछर ने जाएं। उते भीर इत्ती के बीच में लुगााइयों को झुंड सो आओ औ बा चक्कर में भैयाजू से दीदी को हात छूट गओ। थेड़ी देर चलत-चलत दीदी की हंसी फूट परी। मैंने पूछी के का भओ? सो बे बोलीं के देखो भैयाजू कोन को हात पकरे जा रए। मैंने देखी, बे सई में एक देहातन बिन्ना को हात पकरे चले जा रए हते औ बा बिन्ना बी गजब की कहानी, जो बा उनके संगे चलत जा रई हती। फेर हम ओरें तनक तेजी से आगे बढ़े औ भैयाजू खों टोंका मारो सो उन्ने देखो के बे तो दीदी की जांगा कोऊं औ को हात पकरे जा रए हते। उन्ने तुरतईं हात छोड़ो। फेर बे सोई देर तक हंसत रए। सो जो भारी भीर होए तो कछू बी हो सकत आए। अपन तो कम भीर वारी जांगा पे चलहें।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो पक्को रओ। जा शिवरातें में अपने खों कऊं ने कऊं बायरे चलने।’’ भौजी बोलीं। औ उन्ने थाली परसबे को इसारा करो, सो मैंने थाली परसी सुरू करी। थारी में भंटा को भरता, आम को अथान, मूरी औ टमाटर की चटनी के संगे तनक सो नोन रखो। गिलासन में पानी भरो। तब लौं भौजी गांकरें सेंकन लगीं। कछू-कछू ओई टाईप की सुगंध रई जैसी पन्ना की बजरिया में बा किसानों के बनाबे पे लगत्ती, मनो वैसी ने हती। ऊकी बातई कछू औ हती।
असल में होत का आए के जमीन से जुरो जो कछू होत आए बा ज्यादई अच्छो लगत आए। काए से के बा अपनी असल जिनगी से जुरी होत आएं। सो बे चीजें कैसे भुलाई जा सकत आएं। औ भूलबो बी नई चाउने। सो, हम ओरे जेई सब बतकाव करत भए जीतन लगे।
बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। कभऊं-कभऊं आप ओरें बी अपने पांछू की जिनगी खों याद कर लओ करे। ईसे बड़ो सुख मिलत आए। सई मानो!
---------------------------
बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
---------------------------
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #batkavbinnaki #bundeli #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat
No comments:
Post a Comment