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Wednesday, November 9, 2022

चर्चा प्लस | इन बच्चों को हम किस श्रेणी में रखेंगे ? | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस       
इन बच्चों को हम किस श्रेणी में रखेंगे ?
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       यह समझ पाना मेरे लिए कठिन हो रहा है कि इन बच्चों को किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? जो माता-पिता के साथ चौराहों पर भीख मांगते हैं, जो चौराहे पर कंघी, बालपेन जैसी छोटी-छोटी वस्तुएं बेचते हैं, जो भिखारी नहीं हैं किन्तु भिखारियों की तरह धार्मिक स्थलों के आस-पास भीख मांगते हैं या फिर वे जो ढाबों और छोटे होटलों में बर्तन धोने का काम करते हैं। कई बार उनकी असली उम्र का नकली प्रमाणपत्र उन्हें कानूनी सहायता के दायरे से बाहर कर देता है। ऐसे बच्चों की संख्या देश में चौंका देने वाली है।  
मैं दूसरे शहर जाते समय रास्ते में चाय पीना पसंद नहीं करती हूं। लेकिन किराए की ली हुई गाड़ी के ड्राईवर को यह कहना नहीं भूलती हूं कि ‘‘भैया, आपको जब और जहां रूक कर चाय पीनी हो, पी लीजिएगा।’’ आखिर वाहन चालक का चैतन्य रहना सबसे जरूरी है। मुझे यातायात का वह नियम सबसे अच्छा लगता है-‘‘कभी नहीं से देर भली!’’ सो, पिछली बार भोपाल जाते समय सागर से विदिशा मार्ग पर एक ढाबे के सामने ड्राईवर ने गाड़ी रोकी। वह चाय पीने चला गया और मैं गाड़ी में बैठी-बैठी खिड़की से बाहर झंाकने लगी। उस ढाबे पर एक दुबला-पतला लड़का तेजी से कप-प्लेट धोए जा रहा था। देखने में वह सौ प्रतिशत अवयस्क लग रहा था। मुझसे रहा नहीं गया। मैं गाड़ी से उतरी और टहलती-सी ढाबे के काउंटर पर पहुंची। वहां मैंने प्रभावित होने का अभिनय करते हुए कहा-‘‘आपके यहां ये बच्चा तो बड़ी फुर्ती से काम कर रहा है।’’
‘‘अरे नहीं, कामचोर है। जब डांट पड़ती है, तब उसके हाथ तेजी से चलने लगते हैं।’’ काउंटर पर खड़े मालिक ने हंस कर कहा। फिर बोला,‘‘ये लोग चोर भी होते हैं। घरों पर काम कराने लायक नहीं होते हैं।’’

ढाबा मालिक ने शायद यह समझ लिया कि मैं उस लड़के के काम से प्रभावित हो कर उसे अपने घर ले जाने की बात करने वाली हूं। यह मेरे लिए चैंकाने वाली बात थी कि ऐसा भी होता है? खैर, मैंने उससे आगे पूछा,‘‘कितनी उम्र होगी इसकी? चैदह-पंद्रह का होगा?’’
‘‘अरे नहीं, अट्ठारह-उन्नीस का है। बिना उम्र-प्रमाणपत्र देखे तो मैं काम पर रखता ही नहीं हूं।’’ अब ढाबा मालिक सतर्क हो कर बोला। इतने में ड्राईवर चाय पी कर वहीं आ गया। उसे कौतूहल हुआ होगा कि मेरी और ढाबा मालिक की क्या बात हो रही है।
मैंने अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गई। मुझे समझ में आ गया था कि उस लड़के के परिजन और ढाबा मालिक दोनों ने खींच-तान कर प्रमाणपत्र में उसकी उम्र बालिग लिखा रखी होगी। वह लड़का कभी समझ ही नहीं पाएगा कि वह कब बच्चा था और कब बड़ा हो गया। इसके साथ ही मुझे याद आया कि यह क्षेत्र तो नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का है जिन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चों के संरक्षण में लगा दिया। ‘‘बचपन बचाओ आन्दोलन’’ के तहत वे विश्व भर के 144 देशों के लगभग 90000 से अधिक बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य कर चुके हैं। ऐसे व्यक्ति के क्षेत्र में अवयस्क श्रमिक हो ही नहीं सकता है क्योंकि बालमजदूरी कराने वाला व्यक्ति कभी भी पकड़ा जा सकता है। लेकिन यदि माता-पिता और मजदूर मालिक संगठित हो कर छल करें तो इसका हल नहीं निकाला जा सकता है। कई बार इसमें माता-पिता का भी पूरा दोष नहीं होता है। गरीबी और लाचारी उन्हें अपने बच्चे की असली उम्र की इबारत को मिटा कर नई नकली इबारत लिखने को मजबूर कर देती है। तमाम सरकारी योजनाओं के बाजजूद यह कड़वा सच आज भी हमारे बीच बहुसंख्यक मौजूद है।

धार्मिक स्थानों के आस-पास अनेक बच्चे भिखारियों की भांति मंडराते रहते हैं। उन्हें इस तरह ज़िद्दी बना दिया जाता है कि जब तक वे भीख में कुछ पा न जाएं तब तक आपका कपड़ा खींचना या बाजू पर हाथ से टोंहका लगाना बंद नहीं करते हैं। उनके माता-पिता जानते हैं कि छोटे बच्चों को कोई जोर से डांटेगा नहीं, मारेगा नहीं और थक-हार कर कुछ पैसे दे ही देगा। ये ज़िद्दी बच्चे अपनी जिद मनवाने के बाद विजेता की भांति अपने माता-पिता के पास पहुंच कर अपनी आमदनी दिखाते हैं। वे इस बात से अनजान रहते हैं कि उनसे उनके बचपन की मासूमियत छीनी जा रही है। उन्हें हठी बनाया जा रहा है। उन्हें हर तरह के हथकंडे अपना कर कुछ न कुछ हासिल कर लेने की कला में माहिर किया जा रहा है। यह ट्रेनिंग कभी-कभी आगे चल कर उन्हें अपराध जगत में पहुंचा देती है। पकड़े जाने पर मां-बाप भी उनसे पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे बच्चे अपनों के द्वारा की गई ठगी के शिकार रहते हैं। ऐसे बच्चों को हम भला किस श्रेणी में रखेंगे?
शहर चाहे बड़ा हो या छोटा, आजकल ट्रैफिक सिग्नल्स लगभग हर  चौराहे पर लगे होते हैं। उन  चौराहों पर दुपहिया, तिपहिया या चारपहिया यानी कोई भी गाड़ी रुकते ही ऐसी महिलाएं और बच्चे प्रकट हो जाते हैं जो अपनी मुट्ठी में बालपेन या कंघियां दबाए रहते हैं। वे पास आ कर जिद करते हैं कि उनसे उनका सामान खरीदा जाए। कई बच्चे अवयस्क रहते हैं। उनके द्वारा कुछ खरीद लिए जाने का दयनीय अनुनय-विनय दिल पसीजने के लिए काफी रहता है। कई ग्राहक मिल जाते हैं उन्हें। वे खुश होते हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता की इच्छा को पूरा किया। वे नहीं जानते हैं कि उनकी इस उम्र में उन्हें  चौराहों  पर जिद भरी विक्रेतागिरी करने के बजाए किसी स्कूल में पढ़ना चाहिए। भले ही सरकारी स्कूल हो। भले ही वहां बहुत अच्छी पढ़ाई न होती हो लेकिन चार अक्षर तो पढ़ ही सकेंगे। मगर उस छोटी-सी उम्र में वे अपने जीवन का अच्छा-बुरा तय नहीं कर सकते हैं और जिन्हें तय करना चाहिए, उन्हें तत्काल के चार पैसे अधिक सुखद लगते हैं। क्योंकि यदि वे कोई और रास्ता जानना चाहते होते तो बच्चों को उनका असली बचपन देने के लिए कुछ तो प्रयास करते। वहीं, उन चौराहों से गुज़रने वाले ‘हम समझदार लोग’ भी यह सब अनदेखा कर देते हैं। हम हमेशा खुद को अपनी ही मुसीबतों से घिरा हुआ पाते हैं। हमें लगता है कि हमारे पास इनके बारे में सोचने का भी समय नहीं है। गोया सरकार और एनजियो चलाने वालों का ही ठेका हो यह सब सोचने का। खैर, आमआदमी सच में अपनी ज़िन्दगी में बहुत उलझा रहता है लेकिन राजनीति के नाम पर रोटियां खाने वाले छुटभैये से छुटभैये नेता भी जब इनके बारे में विचार नहीं करते हैं तो दुख जरूर होता है।
सन् 1993 में ‘‘न्यूयार्क टाईम्स’’ में न्यूज़ फोटोग्राफर केविन कार्टर द्वारा खींची गई एक तस्वीर प्रकाशित हुई थी जो सूडान की थी। उस तस्वीर में हृदयविदारक दृश्य था। एक गिद्ध एक कुपोषित मरणासन्न बच्ची को टोह रहा था। वह उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। यह तस्वीर सूडान में भुखमरी की भयावह स्थिति बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त सबूत थी। इस तस्वीर के लिए फोटोग्राफर केविन कार्टर को पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन वहीं दूसरी ओर लोगों ने उसकी इस बात के लिए कटु निंदा की कि उसने फोटोग्राफी तो की लेकिन इंसानीयत नहीं निभाई। उसने उस बच्ची को गिद्ध से बचाने का कोई प्रयास नहीं किया बल्कि उसे तो जल्दी थी अपना वापसी का हवाईजहाज पकड़ने की। जबकि केविन को भी अपनी इस भूल का गहरा अपराधबोध था। लोगों को इस बात का अहसास तब हुआ जब पुरस्कार मिलने के तीन माह बाद केविन ने अपराधबोध न सहन कर पाने की स्थिति में आत्महत्या कर ली। उसे भी लगता रहा कि वह बच्ची को बचाने का प्रयास कर सकता था।

इसके बाद दुनिया के सामने एक और तस्वीर आई। यह नाईजीरिया के उस बच्चे की तस्वीर थी जिसे उसके समुदाय ने ‘‘शापित’’ मान कर त्याग दिया था। वह नग्नावस्था में हड्डी का ढांचा मात्र रह कर भूखा-प्यासा भटकता अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। तब डेनमार्क निवासी महिला अंजा रिंगरेन लोवेन ने उसे अपनी बॉटल से पानी पिलाया जिससे उसकी थमती सांसों में गति आई। फिर वह उसे गोद में उठा कर ऐसे लोगों के पास ले गई जो उसका लालन-पालन कर सकें। आज वह बच्चा अच्छा स्वस्थ हो चुका और पढ़ने के लिए स्कूल जाता है। देखा जाए तो उस तस्वीर के बाद पूरी दुनिया ने उसे अपने संरक्षण में ले लिया। अंजा रिंगरेन लोवेन ने अपनी नौकरी छोड़ कर उन बच्चों के लिए जीवन समर्पित कर दिया जिन्हें अंधविश्वास के चलते शापित मान कर त्याग दिया जाता था और वे बच्चे भूख-प्यास से दम तोड़ देते थे। अंजा रिंगरेन लोवेन ने ऐसे बच्चों के लिए एक आश्रम खोला। जिस पहले बच्चे को अंजा ने बचाया था उसकी दशा की अपडेट के तौर पर एक वर्ष पहले उसकी हंसती-खेलती तस्वीर जारी की गई थी ताकि पूरी दुनिया जान सके कि मौत के मुंह में खड़ा वह बच्चा अब एक अच्छी जिन्दगी जी रहा है।

हम भी अकसर कई स्वयंसेवी संस्थाओं के विज्ञापन देखते हैं जिनमें कुपोषित, दयनीय अवस्था के बच्चों की तस्वीरें दिखा कर सहयोग राशि मांगी जाती है। इनमें कई विज्ञापन चार-पांच वर्ष तक एक ही बच्चे की तस्वीर या वीडियो के साथ चलते रहते हैं। हमें विज्ञापन के रूप में उनकी दशा का अपडेट नहीं दिखाया जाता है कि दी गई सहायता राशि से उस बच्चे की जान बची या नहीं अथवा अब वह किस स्थिति में है? ऐसे बच्चों को भला हम किस श्रेणी में रखेंगे?
फरवरी 2022 में एनसीपीसीआर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि राज्यों से प्राप्त जानकारी के अनुसार देश में 17,914 बच्चे सड़कों पर हैं। आयोग के उस आंकड़े के अनुसार इनमें से 9,530 बच्चे सड़कों पर अपने परिवारों के साथ रहते हैं और 834 बच्चे सड़कों पर अकेले रहते हैं। इनके अलावा 7,550 ऐसे बच्चे भी हैं जो दिन में सड़कों पर रहते हैं और रात में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले अपने परिवारों के पास लौट जाते हैं। धार्मिक स्थलों से ट्रैफिक सिग्नल तक इन बच्चों में सबसे ज्यादा (7,522) बच्चे 8-13 साल की उम्र के रहते हैं। इसके बाद 4-7 साल की उम्र के 3,954 बच्चे हैं। राज्यवार देखें तो सड़कों पर सबसे ज्यादा बच्चे (4,952) महाराष्ट्र में, इसके बाद गुजरात (1,990) में, तमिलनाडु (1,703), दिल्ली (1,653) और मध्य प्रदेश (1,492) में हैं। यद्यपि अदालत ने इस आंकड़े पर संदेह जताते हुए राज्यों से बेहतर जानकारी देने के लिए कहा था। अदालत ने इन आंकड़ों पर सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि सड़क पर बच्चों की अनुमानित संख्या 15 से 20 लाख है और यह सीमित आंकड़े इसलिए सामने आ रहे हैं क्योंकि राज्य सरकारें राष्ट्रीय बाल आयोग के पोर्टल पर जानकारी डालने का काम ठीक से नहीं कर रही हैं।

बच्चे समाज की धरोहर और जिम्मेदारी होते हैं। केवल सरकार, आयोग, स्वयंसेवी संगठन आदि ही इनके लिए उत्तरदायी नहीं है, हम भी इन बच्चों के लिए उत्तरदायी हैं और यह हमें समझना चाहिए। दरअसल हम अपने आप में इतने सिमट गए हैं कि हमें न तो केविन कार्टर की तरह अपराधबोध होता है और न अंजा रिंगरेन लोवेन की तरह हम मदद के लिए कटिबद्ध हो पाते हैं। ऐसे बच्चों की ओर देखने से बचने के लिए हम अपने मोबाइल की ओर देखते हुए खुद को आभासीय दुनिया में धकेल देते हैं। जब मैं अपने देश के कुपोषित और सहायता से दूर या अपने ही माता-पिता के हाथों अपना बचपन गंवाते बच्चों को देखती हूं तो मुझे यह समझ में नहीं आता है कि ऐसे बच्चों को किस श्रेणी में रखा जा सकता है- भिखारी, अनाथ, कुपोषित या फिर कोई और श्रेणी? जरूरी है इस पर विचार करना।    
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Saturday, January 25, 2020

शून्यकाल ... बच्चों को स्कॉलर बना रहे हैं या हम्माल ? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल  
बच्चों को स्कॉलर बना रहे हैं या हम्माल ?
  - डॉ. शरद सिंह
      स्कूलों में बच्चों की भर्ती का समय सिर पर आते ही उसका दबाव हर माता-पिता के चेहरे पर देखा जा सकता हैं। भर्ती के बाद बच्चों के पीठ पर लदने वाले बस्ते के वज़न को देख कर घबराहट होती हैं। नन्हें बच्चों के नाज़ुक कंधों पर बस्ते का भारी बोझ देख कर समझ में नहीं आता है कि हम बच्चों को स्कॉलर बनाने के लिए स्कूल भेज रहे हैं या हम्माल (बोझा ढोने वाला) बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं। आखिर हमारे शिक्षानीति निर्माता कब उतारेंगे इस बोझ को बच्चों के कोमल कंधों से?                                                     
एक चौंकाने वाली किन्तु ऐतिहासिक घटना, अगस्त 2016, महाराष्ट्र के चंद्रपुर कस्बे के कक्षा 7 वीं में पढ़नेवाले दो बच्चे, उम्र लगभग 12 साल, प्रेस क्लब पहुंचे और उन्होंने कहा कि वे अख़बारवालों से बात करना चाहते है। उनका आशय बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से था। उनकी यह मांग सुन कर प्रेसक्लब में बैठे पत्रकार चकित रह गए। उन्होंने दोनों बच्चों के लिए आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की व्यवस्था करा दी। दोनों बच्चों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारी बस्तों की समस्या पर चर्चा की। बच्चों ने कहा कि हर रोज उन्हें अपने बैग में रख कर 18-20 किताबें स्कूल ले जानी पड़ती हैं। जिससे बस्ते का वजन लगभग 7-8 किलो हो जाता है। वे थक जाते हैं और ढंग से पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। उनके कंधे और कमर में दर्द रहने लगा है।  अपनी पीड़ा बयान करते हुए उन बच्चों ने चेतावनी भी दी कि यदि बस्ते हल्के नहीं किए जाते तो बच्चे अनशन करेंगे। दो बच्चों की इस बच्चों की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने हंगामा मचा दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को अपने संज्ञान में लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि बच्चों के बैग के वजन को हल्का किया जाए। महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को स्वीकार तो किया किन्तु इसका समुचित पालन नहीं करा पाई। गैरजरूरी मामले की भांति बच्चों के बस्ते के वजन का मामला प्रत्येक राज्य सरकारों द्वारा बहुत जल्दी ठंडे बस्ते में सरका दिया जाता है। 

एक ऑटोवाला या मज़दूर भी यह सपना देखने का अधिकार रखता है कि उसके बच्चे किसी अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ें और बड़े हो कर किसी अच्छे पद पर काम करें। वह अपनी पूरी जान लड़ा देता है बच्चों की फीस भरने और उनकी कापी-किताब, यूनीफॉर्म सहित उन तमाम खर्चों को पूरा करने के लिए जो अच्छे प्राईवेट स्कूल में पढ़ने के लिए जरूरी होते हैं। बस, नहीं संवार पाता है तो अपने बच्चे की सेहत। वह उसे उतना पौष्टिक भोजन नहीं दे पाता है जितना कि उसके दो से ले कर आठ-दस किलो तक के बस्ते को ढोन के लिए जरूरी है। इकहरे बदन का सींकिया-सा बच्चा और उसके कंधों पर दस किलो का वज़न जिसमें पानी की बोतल भी शामिल है। उस बच्चे को देख कर समझ में नहीं आता है कि हम बच्चों को स्कॉलर बनाने के लिए स्कूल भेज रहे हैं या हम्माल (बोझा ढोने वाला) बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं। हिन्दी माध्यम या सरकारी स्कूलों की दशा तो और भी बदतर रहती है। वहां बच्चों के कोमल कंधों पर लदे हुए बस्ते के इस बोझ को देखने वाला और भी कोई नहीं होता है। उस पर ऐसे स्कूलों में प्रायः कमज़ोर तबके के बच्चे पढ़ने जाते हैं जिन्हें पर्याप्त पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है। शारीरिक दृष्टि से कमजोर बच्चों को भी तन्दुरुस्त बच्चों जितना बस्ते करा वज़न ढोना पड़ता है। जो उनकी सेहत को और अधिक नुकसान पहुंचाता है। पौष्टिक भोजन के नाम पर कई स्कूलों में मिड-डे मील की दुहाई दी जाती है। तो क्या बच्चों को इसीलिए मिड-डे मील दिया जाता है ताकि वे बसते का बोझा ढो सकें।
Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 24.01.2020

          चिकित्सकों के अनुसार कक्षा 1 से 2 के बच्चों को महज 1 किलो, कक्षा 3 से 4 में पढ़नेवाले बच्चों को 2 किलो, कक्षा 5 से 7 में पढ़नेवाले बच्चों को 4 किलो और कक्षा 8 से ऊपर कक्षा में पढ़नेवाले बच्चों को 5 किलो तक का ही बैग का वज़न होना चाहिए। भारी बैग के चलते बच्चों की रीढ़ की हड्डी को नुकसान, फेफड़ों की समस्या होने की संभावनाएं होती है। और सांस लेने में  दिक्कत जैसे कई समस्याओँ उठानी पड़ सकती है। मगर सवाल वहीं है कि यह वज़न भी शारीरिक रूप से मजबूत बच्चे के लिए सही हो सकता है, कमजोर बच्चे के लिए नहीं। एक सर्वे के अनुसार, दिमाग़ से तेज लेकिन शरीर से कमजोर बच्चे सिर्फ़ बस्ते के बोझ के दबाव से पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं। 
आज से लगभग 27 साल पहले वर्ष 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने बच्चों के बस्ते के बढ़ते बोझ और उनके कमजोर कंधों का गंभीरता से अध्ययन किया। इसके बाद यशपाल कमेटी ने जुलाई 1993 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में होमवर्क से लेकर स्कूल बैग तक के लिए कई सुधार सुझाए गए थे। जिनका भरपूर स्वागत भी हुआ लेकिन अफ़सोस कि सुधार ईमानदारी से अमल में नहीं लाया गया। उस समय यह राय भी दी गई थी कि नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए होने वाले टेस्ट व इंटरव्यू बंद होने चाहिए। आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के आतंक में दबे पड़े हैं, जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी क्लासों में बच्चों को गृहकार्य इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होमवर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठय़ पुस्तक से नहीं हो। पर आज तो होमवर्क का मतलब ही पाठय़ पुस्तक के सवाल-जवाबों को कापी पर उतारना या उसे रटना रह गया है। कक्षा में 40 बच्चों पर एक टीचर, विशेष रूप से प्राइमरी में 30 बच्चों पर एक टीचर होने की सिफारिश खुद सरकारी स्कूलों में भी लागू नहीं हो पाई है।
यशपाल कमेटी के लगभग 14 साल बाद वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर बच्चों के स्कूल का वज़न तय किया, लेकिन यह क़ानून भी लागू नहीं हो सका।  भारी बैग उठाकर चलने से बच्चे आगे की ओर झुक जाते हैं जिससे बॉडी पोश्चर पर असर पड़ता है। क्षमता से अधिक वज़न उठाने से बच्चों में कमज़ोरी और थकान रहने लगती है।’’

इसके बाद स्कूली बच्चों के पीठ से बस्ते का बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किया। इसमें साफ तौर पर कहा गया कि किस कक्षा के बच्चों के बैग का वजन कितना होना चाहिए। वैसे स्कूलों में बच्चों के पीठ पर बस्ते का बोझ हमेशा एक बड़ा मुद्दा रहा है। अभिभावकों ने जहां इसे लेकर चिंता जताई, वहीं डॉक्टरों ने भी बच्चों की सेहत की दृष्टि से इसे सही नहीं बताया। बस्ते के बोझ को कम करने को लेकर समय-समय पर संबंधित विभागों की ओर से निर्देश भी जारी होते रहे हैं। कुछ महीने पहले मद्रास हाई कोर्ट ने बच्चों के पीठ से बस्ते का बोझ कम करने और पहली तथा दूसरी कक्षा तक के बच्चों को होमवर्क नहीं देने के निर्देश दिए थे, जो देशभर में चर्चा का विषय बन गई थी। अब केंद्र सरकार ने इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए। इसी आधार पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने इस संबंध में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए। इसमें राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया कि वे स्कूलों में विभिन्न विषयों की पढ़ाई और स्कूल बैग के वजन को लेकर भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार नियम बनाएं। इसमें कहा गया कि पहली से दूसरी कक्षा के छात्रों के बैग का वजन डेढ़ किग्रा से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी तरह तीसरी से 5वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बैग का वजन 2-3 किग्रा, छठी से 7वीं के बच्चों के बैग का वजन 4 किग्रा, 8वीं तथा 9वीं के छात्रों के बस्ते का वजन साढ़े चार किग्रा और 10वीं के छात्र के बस्ते का वजन 5 किलोग्राम होना चाहिए।

 उल्लेखनीय है कि चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि बच्चे के वजन के दस प्रतिशत का निर्धारण हर बच्चे के लिए अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर एक औसत मानक हर बच्चे के लिए उपयुक्त भी नहीं हो सकता है। इस समस्या का एक पक्ष और भी है। मंहगें प्राईवेट स्कूलों में बच्चों को डिज़िटल पुस्तकें और स्कूल में लॉकर्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं जिससे वे बोझमुक्त रह सकें। लेकिन सामान्य स्कूलों में यह सुविधा बच्चों को नहीं मिल पाती है। ग्रामीण बच्चे जो बिजली की लुकाछिपी से जूझते रहते हैं वे डिज़िटल किताबों की सुविधा का लाभ ठीक से उठा भी नहीं सकते हैं। जिन बच्चों को स्कूलबस नसीब हो जाती है वे तो फिर भी खुशनसीब हैं लेकिन जिन बच्चों को पीठ पर बस्ते का भारी बोझ लाद कर चार-पांच कि.मी. या उससे भी अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है या फिर रस्सी बांध कर बनाए गए पुलों से हो कर गुज़रना पड़ता है, उन पर उनके वज़न के दस प्रतिशत बोझ को लागू करना भला कैसे न्यायसंगत हो सकता है?

कुलमिला कर यही तस्वीर बनती है कि हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता का अभाव है और अभाव है बच्चों की सेहत की सुरक्षा का। इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के बावजूद आज भी करोड़ों बच्चे बस्ते का भारी बोझ उठाने को विवश है। शिक्षा नीति और शिक्षा योजनाओं के व्यवहारिक निर्माण और उसके अनुपालन की अभी भी कमी है। देश के हर बच्चे तक डिज़िटल पढ़ाई की सुविधा पहुंचाने से ही इस समस्या का हल निकल सकता है जिसके लिए सरकार द्वारा ईमानदार पहल और कड़ाई से पालन कराने की दृढ़इच्छाशक्ति की दरकार है।        
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(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 24.01.2020)
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Friday, August 24, 2018

चर्चा प्लस ... इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा - डॉ. शरद सिंह

 
चर्चा प्लस : इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस :
इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा
- डॉ. शरद सिंह
कुछ अरसा पहले ‘ब्लू व्हेल’ नाम के इन्टरनेट गेम ने दुनिया भर में कई युवाओं की जान ले ली थी। दुनिया भर में अनेक देशों ने इस गेम को न केवल प्रतिबंधित किया था बल्कि इसे न खेले जाने के लिए मुहिम भी चलाई। ब्लू व्हेल के बाद आया ‘किकी चैलेंज’। किकी चैलेंज से भी अधिक घातक सिद्ध हुआ ‘मैरी पौपिंस चैलेंज’। इसी क्रम में अब आ गया है एक घातक व्हाटएप्प गेम -‘मोमो’। ऐसा लगता है मानो कुछ साईको किस्म के गेमर्स युवा जगत को आत्मघाती उन्माद की दुनिया में ले जाना चाहते हैं। यह वह संकट है जिसके प्रति युवाओं का सचेत रहना जरूरी है। 
इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लसColumn of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
जिसने भी यह खबर सुनी वह चौंक गया। चौंकना स्वाभाविक था। आखिर 14 साल की उम्र भला कोई ऐसी उम्र होती है जिसमें फांसी लगा कर आत्महत्या करने का विचार आए और उसे अमल भी कर लिया जाए। शायद इंटरनेट की दुनिया में पहुंच कर बच्चे यह भी सीख रहे हैं कि आत्मघाती कदम कैसे उठाए जाते हैं। घटना मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की है। मोबाइल पर गेम खेल रही 14 साल की बेटी को डांट लगाना मां को भारी पड़ गया। कक्षा 9वीं में पढ़ने वाली बच्ची ने कमरा बंद करके खुद को फांसी लगा ली। घर में सबकुछ ठीकठाक चल रहा था और 14 साल की बच्ची अपनी मां के फोन पर गेम खेल रही थी। बच्ची की मां ने उसे फोन छोड़कर पढ़ाई करने को कहा तो वह अपने कमरे में चले गई। मां ने उसे आवाज लगाई तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने उसके कमरे की खिड़की खोलकर देखा तो वह स्तब्ध रह गईं। बच्ची फंदे पर लटकी हुई थी। जब उसे अस्पताल ले जाया गया तो डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यदि इस प्रश्न का उत्तर ढूंढा जाए कि यह आत्मघाती कदम उस नन्हीं बच्ची को कैसे सूझा होगा? तो उंगली इंटरनेट की ओर उठती है।
मोबाईल और इंटरनेट बच्चों और युवाओं सहज ही आकर्षित कर लेते हैं। मुझे आद है अपनी सागर से भोपाल की वह छोटी-सी यात्रा। राज्यरानी एक्सप्रेस की उस इकलौती चेयरकार में एक युवा मां अपने दो साल के बच्चे के साथ सफर कर रही थी। लगभग छब्बीस-सत्ताईस हज़ार कीमत का मोबाईल फोन उसने अपने बेटे के हाथ में दे रखा था। फोन की कीमत शायद इससे भी अधिक रही हो। उसका बेटा मोबाई के बटन दबाता जिससे की-पैड टोन बजती और वह खुश हो कर हाथ हिलाने लगता। इस फेर में कई बार उसके हाथ से फोन छूट कर गिरा। ऐसा लगता था जैसे आर्थिक रूप् से समृद्ध उस युवा मां को न तो अपने कीमती मोबाईल फोन की चिन्ता थी और न अपने बेटे पर पड़ने वाले फोन के दुष्प्रभाव की। उस नन्हें बच्चे पर फोन के रेडिएशन पर असर की परवाह थी। उसे तो मजा आ रहा था अपनी समृद्धि का प्रदर्शन करने में। मुझे विचार आया कि वह बच्चा ज़रा बड़ा होगा तब भी उसके हाथों में मोबाईल होगा। तब वह उन चीजों से रूबरू होगा जो उसे उस उम्र में देखनी भी नहीं चाहिए और उसे टोकने वाला कोई नहीं होगा। ऐसे ही बच्चे युवावस्था में पहुंचते-पहुंचते हानिकारक साईट्स और गेमर्स के हत्थे चढ़ जाते हैं।
कुछ समय पहले इन्टरनेट पर एक गेम आया था- ब्लू व्हेल। इस ब्लू व्हेल गेम की वजह से भारत समेत कई देशों में किशोरों और बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के मामले सामने आए थे। लगभग 130 से ज्यादा जान गई थीं ब्लू व्हेल गेम के कारण। इस गेम के तहत खुद को हर रोज किसी न किसी तरह से नुकसान पहुंचाना होता था 50वें दिन खुद की जान लेने के साथ यह गेम खत्म होती थी अब व्हाट्सअप मंच पर उपलब्ध ‘मोमो’ से भी वैसा ही खतरा पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। ब्लू व्हेल गेम के बाद अब इस नए व्हाट्सएप गेम ‘मोमो’ ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। यह खतरनाक गेम खासतौर से किशोरों और बच्चों को अपना निशाना बनाने की कोशिश में है। विशेषज्ञों ने दुनियाभर के माता-पिता को चेताया है कि यह व्हाट्सएप गेम ब्लू व्हेल गेम की तरह घातक साबित हो सकती है। इस गेम के जरिए यूजर को हिंसक तस्वीरें भेजी जाती हैं। अगर यूजर इसे खेलने से मना करता है, तो उसे धमकाने की भी कोशिश की जाती है। इस गेम के लिए जो डरावनी तस्वीर इस्तेमाल की जा रही है, उसे जापानी कलाकार मिदोरी हायाशी ने बनाया था। हालांकि मिदोरी का इस गेम से कोई लेना-देना नहीं है। अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में एक 12 साल की लड़की की संदिग्ध मौत के पीछे इसी गेम को माना जा रहा है। पुलिस का भी यह मानना है कि मोमो गेम की चुनौती के तहत बच्ची ने संभवतः आत्महत्या का वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करने की भी कोशिश की थी। अर्जेंटीना में प्रशासन ने इस संबंध में लोगों को जागरूक करने की मुहिम भी शुरू कर दी है।
इससे पहले सोशल मीडिया पर ‘‘आइस बकेट’’ चैलेंज चला था जिसमें बर्फ से भरी बाल्टी को अपने सिर पर उड़ेलना था और ऐसा करते हुए अपना वीडियो अपलोड करना था। इसके बाद सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर करने लगा किकी चैलेंज। कनेडियन हिप हॉप सुपरस्टार ड्रेक के लेटेस्ट ऐल्बम स्कॉर्पियन के हिट सॉन्ग ‘इन माय फीलिंग’ पर शुरू हुआ ‘किकी चैलेंज’ दुनियाभर में वायरल हो गया। इसमें सिलेब्रिटीज के भी शामिल हो जाने से अधिक से अधिक लोगो को इसने आकर्षित किया। आम लोग भी इस चैलेंज को पूरा करने में जुट गए। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि स्पेन, अमेरीका, मलेशिया और यूएई में लोग इस चैलेंज वीकार करने लगे और दूसरों के लिए मुसीबत खड़ी करने लगे। यहां तक कि पुलिस को एडवाइजरी तक जारी करनी पड़ी जिसमें लोगों से अपील की गई कि वे कीकी चैलेंज को स्वीकार न करें यह खतरनाक हो सकता है। अमेरिकी पुलिस ने इसे सबसे खतरनाक डांस मूव बताया। वहीं फ्लोरिडा की पुलिस ने यह डांस मूव करते हुए पकड़े जाने पर 1000 डॉलर का जुर्माना लगाने का एलान किया। भारत में यूपी और दिल्ली समेत कई राज्यों में पुलिस ने चेतावनी जारी की। इस चैलेंज में कैनेडियन रैपर ड्रेक के गाने ‘इन माय फीलिंग’ पर लोग चलती गाड़ी से उतरकर डांस स्टेप करते थे। इस दौरान गाड़ी की रफ्तार बहुत धीमी होती थी। चैलेंज की खास बात है कि डांस के बाद वापस चलती गाड़ी में ही बैठना होता है।
इसी तरह का घातक चैलेंज है मैरी पौपिंस चैलेंज। इसमें किसी ऊंचाई पर चढ़ कर एक खुले छाते के सहारे नीचे कूद पड़ना होता है। इस चैलेंज में भी कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। चैलेंज वाले इन गेम्स के क्रम में अब आ धमका है ‘मोमो’ गेम। इसका प्लेटफार्म व्हाट्सएप्प होने से इसके अधिक से अधिक वायरल होने की संभावना है। भले ही भारत में एक बार में व्हाट्सएप्प मैसेज को पांच से अधिक फॉवर्ड करने पर रोक लगा दी गई है लेकिन खतरों से भरे इस गेम का खतरा सिर्फ सजगता से ही टाला जा सकता है। माता-पिता, अभिभावकों, मित्रों और शिक्षकों को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए बच्चों और युवाओं की मोबाईल और इंटरनेट गतिविधियों पर ध्यान रखना होगा, तभी सुरक्षित रहेंगे बच्चे और युवा।
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(Sagar Dinkar, Daily, 22.08.2018)
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